- 81,223
- 119,092
- 354
Agree! Let's see what happens, anyway thanks broYah tension dene wala kaam to ulta pad gaya Arman ke liye as ab sympathy bhi Ashok ke taraf jayegi Priya ki. Aur hona bhi chahiye.
Agree! Let's see what happens, anyway thanks broYah tension dene wala kaam to ulta pad gaya Arman ke liye as ab sympathy bhi Ashok ke taraf jayegi Priya ki. Aur hona bhi chahiye.
Besabari se intezaar rahega next update ka TheBlackBlood bhai....Next update kal
Shaandar updateUpdate ~ 11
अजीब इत्तेफ़ाक था।
जहां एक तरफ प्रिया का चेहरा बेहद उदास और कहीं खोया खोया सा था वहीं शाम को अशोक जब फ्लैट पर आया तो वो भी थोड़ा थका थका सा नज़र आया।
उसके चेहरे पर भी चिंता और परेशानी साफ झलक रही थी।
हालाकि वो अपनी परेशानी किसी को दिखाना नहीं चाहता था लेकिन अब इसका क्या किया जाए कि उसके हज़ार प्रयासों के बाद भी परेशानी के चिन्ह उसके चेहरे से ग़ायब ही नहीं हो पा रहे थे।
अपने पति अशोक को आया देख प्रिया ने अपने आपको सम्हाला और जबरन चेहरे पर खुशी के भाव पैदा किए।
वो भी नहीं चाहती कि दिन भर काम कर के लौटा उसका पति अपनी उस बीवी के चेहरे को उतरा हुआ और खोया खोया सा देखे जिसे वो बहुत प्यार करता है और जिसे वो हर खुशी देने की कोशिश करता रहता है।
मेड यानि मीरा रात के लिए डिनर बना के चली गई थी।
अंकिता अपने कमरे में पढ़ाई कर रही थी।
प्रिया ने हमेशा की तरह खुशदिली से अशोक का स्वागत किया और जब वो छोटे से ड्राइंग रूम में रखे सोफे पर बैठ गया तो उसने किचन से ला कर उसे पानी दिया।
अपने पति के चेहरे पर झलकती परेशानी के चिन्हों को वो देख चुकी थी लेकिन इस समय पति की परेशानी का सबब उससे पूछना उसने उचित नहीं समझा।
थोड़ी देर सोफे पर बैठ कर अशोक ने आराम किया।
इस बीच उसने प्रिया का और अपनी बेटी का हाल चाल भी पूछा।
फिर वो फ्रेश होने के लिए कमरे के अटैच बाथरूम की तरफ बढ़ चला।
कुछ ही समय बाद तीनों प्राणी डिनर करने बैठे थे।
अंकिता ने तो हर रोज़ की तरह अपना सामान्य ही डिनर किया लेकिन इधर ना तो अशोक ने ठीक से डिनर किया और ना ही प्रिया से खाया गया।
ज़ाहिर है दोनों पति पत्नी अपने अंदर अलग अलग तरह की चिंता और परेशानी से घिरे हुए थे जिसकी वजह से उनसे खाया नहीं गया था।
डिनर के बाद अशोक कमरे में चला गया जबकि प्रिया जूठे बर्तन समेट कर किचेन में रखने लगी।
उसकी सौतेली बेटी अंकिता थोड़ा बहुत कामों में उसका हाथ बंटा देती थी लेकिन तभी जब उसका मन करता था।
हालाकि इसके लिए प्रिया ने उसे अपने मुख से कभी नहीं कहा था और ना ही अशोक ने इस बारे में अपनी बेटी से कभी कुछ कहा था।
दोनों की नज़र में वो अभी बच्ची थी और अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा रही थी।
बहरहाल, थोड़ी ही देर में प्रिया सारे कामों से फारिग़ हो कर कमरे में पहुंची।
उसने देखा अशोक बेड पर करवट लिए लेटा हुआ है।
उसका चेहरा क्योंकि प्रिया की तरफ ही था इस लिए उसने साफ महसूस किया कि उसका पति आंखें बंद किए लेटा ज़रूर है लेकिन सोया नहीं है अभी।
ज़ाहिर है आंखें बंद किए वो उन चीज़ों के बारे में ही सोच रहा था जो उसकी परेशानी का सबब बनी हुईं थी।
प्रिया ने अपनी चिंता और परेशानी को किसी तरह एक तरफ किया और आहिस्ता से बेड पर बैठ गई।
नज़रें पति पर ही जमी हुईं थी उसकी।
उसने अपने आपको संतुलित किया।
"सो गए क्या आप?" फिर उसने हाथ बढ़ा कर हल्के से अशोक के बाजू को पकड़ा।
अशोक उसके पूछने पर सीधा हुआ।
आंखें खोल कर उसने प्रिया की तरफ देखा।
फ़ौरन ही उसने अपने अंदर की परेशानी को एक तरफ किया और चेहरे पर खुशी के भाव पैदा कर लिए।
"बस तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।" फिर उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा──"अब तुम आ गई हो तो तुम्हें अपने सीने से छुपका कर सोऊंगा। तुम्हें तो पता ही है कि ऐसे में मुझे बड़ी सुकून की नींद आती है।"
"बातें बनाना कोई आपसे सीखे।" प्रिया ने बेड पर ठीक से बैठते हुए कहा──"और ये भी कि असल बात को कैसे गोल करना होता है।"
"अरे! ये कैसा इल्ज़ाम लगा रही हो बेबी?" अशोक मुस्कुराते हुए बोला──"भला मेरे बारे में तुम ऐसा कैसे सोच सकती हो? क्या तुम जानती नहीं हो कि मैं कितना भोला और मासूम हूं?"
"हां अच्छी तरह जानती हूं आपको।" प्रिया ने जूठी नाराज़गी ज़ाहिर की──"अब गोल गोल बातें बनाना छोड़िए और साफ साफ बताइए कि क्या छुपा रहे हैं मुझसे?"
अशोक इस बार हल्के से चौंका।
उसे ये सोच कर खुद पर थोड़ा गुस्सा आया कि वो ठीक से अपनी परेशानी को प्रिया से छुपा भी नहीं सका।
इधर प्रिया अपलक उसे ही देखे जा रही थी।
उधर उसे समझ न आया कि अपनी जवान पत्नी को क्या जवाब दे?
वो ये हर्गिज़ नहीं चाहता था कि अपनी परेशानी बता कर वो उसे भी परेशानी में डाल दे।
"क्या हुआ चुप क्यों हैं अब?" जब वो कुछ न बोला तो प्रिया ने आशंकित भाव से पूछा──"पिछले दो दिनों से आपको देख रही हूं कि आप किसी बात से बेहद चिंतित और परेशान हैं। मैं आपकी पत्नी हूं, क्या मुझे इतना भी हक़ नहीं है कि आपकी परेशानी का सबब जान सकूं? अगर कोई समस्या है तो उसे आपके साथ बांट सकूं?"
"ऐसी बात नहीं है डियर।" अशोक उठ कर बैठ गया, फिर प्रिया के कंधों को प्यार से थाम कर कहा──"बात असल में ये है कि मैं तुम्हें किसी प्रकार की चिंता में नहीं डालना चाहता। तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं तुम्हारे चेहरे को हमेशा खुशी से चमकता हुआ देखना चाहता हूं।"
"तो क्या इस तरह से मेरा चेहरा आपको खुशी से चमकता हुआ नज़र आ रहा है?" प्रिया ने कहा──"आपको चिंतित और परेशान देख कर भला मैं कैसे खुश रह सकती हूं? क्या मैं आपको इतनी ख़ुदगर्ज़ लगती हूं?"
"नहीं डियर।" अशोक ने झट से कहा──"तुम तो सबसे अच्छी हो। ऊपर वाले के करम से मिली हो तुम मुझे। इतने सालों से मेरी एक अच्छी वाइफ बन कर मेरे साथ हो। कभी मुझे मेरी कमी अथवा मेरी कमज़ोरी का आभास तक नहीं होने दिया। एक अच्छी पत्नी की यही तो विशेषता होती है। सच कहूं तो तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में पा कर मैं खुश भी हूं और खुद को खुशनसीब भी समझता हूं।"
"बस बस, मुझे ज़्यादा चने के झाड़ पर मत चढ़ाइए।" प्रिया उसकी बातें सुन कर अंदर ही अंदर ये सोच कर कांप गई कि उसके बारे में ऐसी सोच रखने वाले पति को वो कैसे तलाक़ देने का सोच सकती है? फिर प्रत्यक्ष में बोली──"और अब साफ साफ बताइए कि ऐसी कौन सी बात है जिसने आपको परेशान कर रखा है?"
"कोई सीरियस बात नहीं है डियर।" अशोक ने बात को टालने की गरज से कहा──"तुम फ़िक्र मत करो। एक दो दिन में सब ठीक हो जाएगा।"
"नहीं, आज मुझे जानना है कि बात क्या है?" प्रिया ने जैसे छोटे बच्चों की तरह ज़िद की──"आज आप किसी भी तरह से बात को टाल नहीं सकते। मुझे बताइए कि प्रॉब्लम क्या है?"
अशोक ने गहरी सांस ली।
बेबसी से कुछ पलों के लिए अपने होठ भी भींच लिए।
वो इस वक्त अपनी पत्नी पर गुस्सा नहीं होना चाहता था।
ये उसके स्वभाव में था भी नहीं।
वो ये भी समझता था कि प्रिया का ज़िद करना जायज़ है।
आख़िर वो उसकी पत्नी थी और ये उसका अधिकार था कि वो उसे अपनी समस्या बताए अथवा उससे कोई बात न छुपाए।
ये सब सोच कर उसने पुनः एक गहरी सांस ली और फिर उसे कंपनी में नौजवान अधिकारी के साथ हुई बातें संक्षेप में बता दी।
प्रिया को ज़्यादा तो कुछ समझ न आया लेकिन ये ज़रूर समझ आया कि अगर उसके पति ने उचित रूप से ज़िंक नहीं बचाया तो इससे उसकी नौकरी जाने का ख़तरा है।
नौकरी छूट जाने का मतलब था घर में पैसों का आना रुक जाना।
पैसों का आना रुक जाने का मतलब था हर सुख सुविधा से वंचित हो जाना।
पलक झपकते ही प्रिया को स्थिति की गंभीरता का एहसास हो गया और इसके साथ ही वो खुद भी अशोक की तरह चिंतित हो उठी।
"हे भगवान! ये कैसी प्रॉब्लम हो गई है?" फिर वो चिंतित सी बोल पड़ी──"अब क्या होगा अशोक?"
"फ़िक्र मत करो।" अपनी प्यारी पत्नी को एकदम से चिंतित हो गया देख अशोक ने बड़े संयम के साथ उसे दिलासा दिया──"मैंने कहा न एक दो दिन में सब ठीक हो जाएगा।"
"और अगर ठीक न हुआ तो?" प्रिया की जैसे जान ही हलक में आ फंसी थी।
उसे अपने ऐशो आराम की नहीं बल्कि अपनी सौतेली बेटी अंकिता की फ़िक्र होने लगी थी।
अंकिता इस साल बारवीं में थी और अगले साल उसे कॉलेज में पढ़ना था।
वो डॉक्टर बनना चाहती थी।
ज़ाहिर है डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए ढेर सारे पैसे लगेंगे।
ऐसे में अगर अशोक नौकरी से हाथ धो बैठता है तो यकीनन बहुत कुछ बिगड़ जाएगा।
हालाकि ऐसा भी नहीं है कि अशोक को दूसरी कंपनी में इसी पोस्ट पर जॉब नहीं मिलेगी बल्कि वो तो निश्चित ही मिलेगी क्योंकि उसके पास पहले से ही दो तीन कंपनियों से ऑफर आए हुए थे लेकिन इस कंपनी में उसे ज़्यादा सैलरी मिल रही थी जिससे अंकिता की आगे की पढ़ाई का खर्चा बड़े आराम से निकल सकता था।
"मैंने कहा न फ़िक्र मत करो।" अशोक ने मजबूत लहजे में कहा──"देखना सब ठीक हो जाएगा। अच्छा अब तुम इस बात की चिंता छोड़ो और खुश हो कर मुझे अपने शहद जैसे होठों की एक पप्पी दो ताकि फिर मैं आराम से सो सकूं।"
प्रिया का मन शांत तो न हुआ लेकिन फिर उसने ये सोच कर खुद को समझाया कि शायद सच में ही सब ठीक हो जाए।
बहरहाल, उसने किसी तरह खुद को सम्हाला और फिर अशोक के लिए खुशी के भाव पैदा कर के उसे अपने होठों की पप्पी देने के लिए उसके चेहरे की तरफ बढ़ी।
अभी वो अशोक के होठों के पास अपने होठों को लाई ही थी कि जाने कैसे उसे एकाएक अरमान का ख़याल आ गया।
ज़हन में एक पुरानी याद उभर आई।
एकदम इसी तरह उसने अरमान को अपने होठों को चूम लेने के लिए अपना चेहरा उसकी तरफ किया था।
ये अलग बात है कि जब अरमान उसके होठों की तरफ बढ़ा तो उसने ऐन वक्त पर खुद को पीछे कर लिया था और अरमान को जीभ दिखा कर भाग गई थी।
ज़हन में इस याद के उभरते ही उसके अंदर एक हूक सी उठी।
पलक झपकते ही उसका दिलो दिमाग़ भारी हो गया।
उसे इस ख़याल ने अंदर तक हिला दिया कि एक वो है जिसने उसे चाहा तो इंतेहां कर दी और एक वो है जिसने उसकी चाहत का ख़याल कर के ज़रा सा भी उसका मान नहीं रखा।
पहली बार उसने हिम्मत कर के उससे उसके होठों की पप्पी मांगी थी लेकिन उसने उसके लिए इतना भी नहीं किया था।
"अरे! क्या हुआ मेरी जान?" सहसा अशोक की आवाज़ से प्रिया चौंक कर ख़यालों से बाहर आई, उधर अशोक ने जैसे उतावलेपन से कहा──"जल्दी करो डियर। मुझसे सबर नहीं हो रहा।"
प्रिया का दिल तो नहीं किया लेकिन फिर भी उसे अपने पति की चाहत के लिए मजबूरन ऐसा करना ही पड़ा।
उसने ग़ैर मन से अपने चेहरे को उसकी तरफ बढ़ा दिया।
उसकी आंखें अपने आप ही बंद हो गईं।
अगले ही पल उसने अपने होठों पर अशोक के होठों को महसूस किया।
उसका समूचा जिस्म एक अजीब से एहसास से कांप गया।
ऐसा आज पहली बार हुआ था उसके साथ।
वो खुद इस एहसास को महसूस कर के हैरान हुई कि ऐसा क्यों महसूस हुआ उसे?
क्या उसका मन अरमान के बारे में कुछ ज़्यादा ही सोचने लगा है?
रात बड़ी मुश्किल से उसकी आंख लगी।
[][][][][]
दूसरे दिन।
शाम के साढ़े आठ बज रहे थे।
मीरा एक घंटा पहले ही डिनर तैयार कर के चली गई थी।
आज का सारा दिन प्रिया के लिए बाकी दिनों की अपेक्षा थोड़ा ज़्यादा तनाव पूर्ण और अजीयत भरा रहा था।
एक तो अशोक की नौकरी जाने की चिंता और दूसरे मन में बार बार आते अरमान के ख़यालों ने प्रिया को एक पल के लिए भी चैन से रहने ना दिया था।
किसी तरह दिन गुज़रा और अकेलेपन से उसे तब मुक्ति मिली जब अंकिता स्कूल से घर आई।
हालाकि वो हल्का फुल्का खाना खाने के बाद अपने कमरे में पढ़ाई करने चली गई थी लेकिन प्रिया ने ये सोच कर थोड़ी राहत की सांस ली थी कि फ्लैट में उसके अलावा अब कोई तो है।
उसके बाद उसे थोड़ी राहत तब मिली जब मीरा रात के लिए डिनर बनाने आई।
प्रिया अपना मन बहलाने के लिए उसके साथ ही काम में उसका हाथ बंटाती रही।
काम के चलते और मीरा से बात चीत करते हुए समय के गुज़र जाने का पता ही ना चला था।
मीरा क़रीब साढ़े सात बजे डिनर तैयार कर के फ्लैट से गई थी।
उसके बाद प्रिया अशोक के आने का इंतज़ार करने लगी थी।
आम तौर पर अशोक आठ या सवा आठ बजे तक आ जाता था लेकिन आज साढ़े आठ बज चुके थे और वो अब तक नहीं आया था।
प्रिया जानती थी कि इस समय वो रास्ते में होगा और कार ड्राइव कर रहा होगा।
शाम के वक्त ट्रैफिक ज़्यादा होता है ये सोच कर प्रिया ने अशोक को फ़ोन करना भी उचित नहीं समझा था।
इंतज़ार करते करते जब आधा घंटा और गुज़र गया और नौ बज गए तो प्रिया को अनायास ही अशोक की चिंता सताने लगी।
उसका मन बेचैन सा हो उठा।
किसी तरह उसने खुद को धीरज दिया और थोड़ी देर और इंतज़ार करने का सोचा।
इस बीच अंकिता भी एक बार अपने कमरे से आ कर उससे अशोक के बारे में पूछ चुकी थी।
अंकिता अपने पापा और सौतेली मां के साथ ही डिनर करती थी।
जब डिनर का समय हो गया तो वो कमरे से बाहर आई थी।
उस वक्त घड़ी में नौ बज कर बीस मिनट हो रहे थे जब अचानक ही प्रिया का मोबाइल फ़ोन बज उठा।
मोबाइल उसके हाथ में ही था।
वो बार बार अशोक को कॉल करने से खुद को रोक लेती थी।
वजह यही थी कि कार ड्राइव करते अशोक को फ़ोन करना उचित नहीं है।
बहरहाल, मोबाइल जब अचानक बज उठा तो उसने हड़बड़ा कर अपने हाथ में लिए हुए मोबाइल को देखा।
स्क्रीन पर अशोक का ही नंबर फ्लैश हो रहा था जोकि माय हसबैंड के नाम से सेव कर रखा था उसने।
उसने फ़ौरन ही कॉल रिसीव की और फिर हेलो कहा ही था कि दूसरी तरफ से अपने पति अशोक की जगह किसी दूसरी अंजान आवाज़ को सुन कर वो एकदम से चौंक पड़ी।
अभी वो सम्हली भी न थी कि उधर से जो कुछ कहा गया उसे सुनते ही उसके हाथ से मोबाइल छूट गया और साथ ही उसके हलक से चीख निकल गई।
उसकी चीख अंकिता के कमरे तक पहुंच गई थी।
तभी तो अंकिता भागती हुई बाहर आई और उसके पास आते ही उसने पूछा──"क्या हुआ आंटी? आप इतना ज़ोर से क्यों चीखीं?"
प्रिया के मुख से कोई बोल ना फूटा।
बल्कि अंकिता को देखते ही उसकी रुलाई फूट पड़ी।
ये देख जवानी की दहलीज़ पर खड़ी अंकिता एकदम से घबरा गई।
सहसा उसकी नज़र नीचे फर्श पर पड़े मोबाइल पर पड़ी जिसकी स्क्रीन जल रही थी और उसमें उसके पापा का नंबर शो हो रहा था।
तेज़ दिमाग़ रखने वाली अंकिता को फ़ौरन ही ये समझ आया कि शायद उसकी आंटी ने फ़ोन पर कोई ऐसी बता सुनी थी जिसके चलते उनकी चीख निकल गई थी और अब वो ऐसे रो रहीं हैं।
उसने लपक कर मोबाइल उठाया और उसे कान से लगाते ही पापा कह कर पुकारा।
कॉल कट नहीं हुई थी इस लिए जैसे ही उसने पापा कह कर पुकारा तो उधर से अंजान आदमी ने उससे भी वही सब कहा जो प्रिया से कहा था।
सुनते ही अंकिता सन्नाटे में आ गई।
प्रिया की तरह उसकी भी आंखें छलक पड़ीं लेकिन इसके बावजूद जैसे उसने अपना संयम नहीं खोया और मोबाइल पर दूसरे तरफ से बोलने वाले व्यक्ति से बात की।
"अ...आंटी पापा का।" कॉल डिस्कनेक्ट होते ही वो रोते हुए प्रिया से बोली──"पापा का एक्सीडेंट हो गया है आंटी। प्लीज जल्दी चलिए। उन्हें अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती किया गया है। जल्दी चलिए न आंटी।"
अंकिता रोए जा रही थी और प्रिया से जल्दी चलने की बात कह रही थी।
प्रिया खुद भी रो रही थी।
उसने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ हो जाएगा।
अचानक ही उसे एहसास हुआ कि अगर अशोक को कुछ हो गया तो क्या होगा?
कैसे वो अकेले अंकिता का ख़याल रख पाएगी?
कैसे वो उसकी परवरिश करेगी?
कैसे वो उसे पढ़ा लिखा कर डॉक्टर बना पाएगी?
पलक झपकते ही उसे अपने सिर पर पूरा आसमान गिर गया सा महसूस हुआ।
उसका जी चाहा कि दहाड़ें मार मार कर रोए लेकिन फिर उसने किसी तरह खुद को ऐसी स्थिति में डूब जाने से रोका।
उसे अंकिता के शब्द याद आए।
अंकिता ने कहा था कि उसके पापा को अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती किया गया है।
इसका मतलब बात इतनी भी गंभीर नहीं होगी जितना कि वो सोच गई थी।
वो फ़ौरन ही खुद को सम्हालते हुए उठी।
जिस अवस्था में थी वैसे ही मुख्य दरवाज़े की तरफ दौड़ पड़ी।
अंकिता भी उसके पीछे दौड़ी।
लिफ्ट द्वारा जल्दी ही वो अंकिता के साथ नीचे पहुंची।
नीचे सिक्योरिटी गार्ड को उसने सूचित किया और फिर उसका कोई जवाब सुने बिना ही वो सड़क की तरफ भागती चली गई।
इत्तेफ़ाक से एक ऑटो वाला इस तरफ ही उसे आता दिखा तो उसने फ़ौरन ही उसे हाथ दे कर रुकवाया।
ऑटो रुका तो वो अंकिता के साथ उसमें सवार हो गई।
ऑटो वाले को फ़ौरन अपोलो हॉस्पिटल चलने को कहा और शीट की पिछली पुश्त से पीठ टिका कर दुख के गहरे समुद्र में डूबती चली गई।
अंकिता खुद भी बेहद दुखी नज़र आ रही थी।
"आंटी, पापा को कुछ होगा तो नहीं न?" मासूम अंकिता ने प्रिया का कंधा पकड़ कर दुखी स्वर में पूछा।
"उन्हें कुछ नहीं होगा बेटी।" प्रिया ने दुखी भाव से उसे दिलासा दी।
सहसा उसे किसी का ख़याल आया तो उसने हड़बड़ा कर अपना मोबाइल फ़ोन अनलॉक किया और उसमें साक्षी का नंबर देख कर उसे कॉल लगा दिया।
मोबाइल कान से लगाए वो बेचैनी के साथ दूसरी तरफ जा रही घंटी की आवाज़ सुनती रही।
क़रीब पांच घंटी बजने के बाद उधर से कॉल रिसीव की गई।
"हां प्रिया बोल।" उधर से साक्षी की आवाज़ सुनते ही उसने राहत की सांस ली किंतु पति का ख़याल आते ही उसका मन भारी हो गया।
"स....साक्षी।" प्रिया की रुलाई फूट गई, बड़ी मुश्किल से बोल पाई──"अ...अनर्थ हो गया यार। प्लीज़, भगवान के लिए मेरे हसबैंड को बचा ले।"
"अरे अरे! ये....ये क्या कह रही है तू?" उधर से साक्षी का बुरी तरह चौंकता हुआ स्वर उभरा──"और....और तू रो क्यों रही है?"
"म...मेरे हसबैंड का एक्सीडेंट हो गया है साक्षी।" प्रिया बड़ी मुश्किल से अपनी रुलाई को रोक पा रही थी──"अभी मेरे मोबाइल पर किसी ने मुझे कॉल कर के बताया है। प्लीज कुछ कर साक्षी। मेरे हसबैंड को बचा ले वरना बहुत बुरा हो जाएगा।"
"ए...एक मिनट पहले तू शांत हो जा।" उधर से साक्षी ने कहा──"देख ऐसे वक्त में अगर तू ही अपना आपा खो देगी तो बेचारी उस मासूम सी बच्ची का क्या होगा?"
"मेरे हसबैंड को बचा ले प्लीज़।" प्रिया जैसे मिन्नतें कर उठी──"तू ही उन्हें बचा सकती है। प्लीज़ जल्दी से अपोलो हॉस्पिटल आ जा।"
"हां हां मैं आ रही हूं, तू बिल्कुल भी चिंता मत कर।" साक्षी ने जैसे उसे दिलासा दिया──"तू बस खुद को शांत रख और अपनी बेटी को सम्हाल। मैं और मेरे हसबैंड फ़ौरन ही हॉस्पिटल पहुंच रहे हैं।"
"थैंक यू...थैंक यू सो मच।" प्रिया अधीर हो कर बोल पड़ी──"मैं तेरा ये उपकार कभी नहीं भूलूंगी। प्लीज़ जल्दी से आ जा।"
"हां मैं बस चल ही दी।" उधर से साक्षी ने कहा──"चल अब फोन रख और अपने साथ साथ अंकिता का भी ख़याल रखना।"
कॉल डिस्कनेक्ट होने के बाद प्रिया को थोड़ी संतुष्टि तो हुई लेकिन सांसें ये सोच कर अभी भी अटकी हुईं थी कि जाने उसके पति की हालत कैसी होगी?
To be continued...
Thanks broShaandar update
"थैंक यू...थैंक यू सो मच।" प्रिया अधीर हो कर बोल पड़ी──"मैं तेरा ये उपकार कभी नहीं भूलूंगी। प्लीज़ जल्दी से आ जा।"
"हां मैं बस चल ही दी।" उधर से साक्षी ने कहा──"चल अब फोन रख और अपने साथ साथ अंकिता का भी ख़याल रखना।"
कॉल डिस्कनेक्ट होने के बाद प्रिया को थोड़ी संतुष्टि तो हुई लेकिन सांसें ये सोच कर अभी भी अटकी हुईं थी कि जाने उसके पति की हालत कैसी होगी?
ऐसे प्रिया का इतना ज्यादा guilt होना थोड़ा बचकाना लगता है, मतलब ठीक है कि उसने अरमान को छोड़ दिया, पर उस गलती को सुधारने के लिए अपनी अच्छी बसी दुनिया बर्बाद कर लेना उच्च दर्ज कि मूर्खता है, खैर अरमान बस प्रिया को चाहता है या उसके पैसों को इसका इंतजार रहेगा
अगले अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी
Gazab ki update he TheBlackBlood Shubham Bhai,
Pata nahi mujhe aisa kyun lag raha he ki ye sakshi kahi armaan ke plan ka hissa to nahi he.........
Kyunki armaan bhi yahi chahta he ki priya bhi vahi dukh dard jhele jo armaan pichle 7 saalo me jhele he
Agali update ki pratiksha rahegi bhai
BadhiyA ja raha hai
Awesome update
Arman ne apni bato se priya ke man me bhuchal la diya hai aur sakshi ne bhi apni bato se aur usko bhadka diya hai,
Priya ab kya karti hai aage intersting rhega
Shaandar update
Sakshi konsa koi doctor he jo Ashok ko bacha legi
Par ek baat to clear he ke ye jo give & take wali relationship jisko vivah ka naam diya tha in dono ne isme prem ek taraf bhi nahi tha uss relationship me ab darar aa chuki he
Jinke hath me chaandi ke chammach the wo hath bhi ab kaam karenge ye todekhne wali baat hui na
Nice and superb update....
Nice update....
Bahut hi badhiya update diya hai TheBlackBlood bhai....
Nice and beautiful update....
Nice update....
Next update posted guysYah tension dene wala kaam to ulta pad gaya Arman ke liye as ab sympathy bhi Ashok ke taraf jayegi Priya ki. Aur hona bhi chahiye.


Shaandar updateUpdate ~ 12
अशोक की हालत सच में ठीक नहीं थी।
एक्सीडेंट बुरी तरह हुआ था।
शुक्र इस बात का था कि टक्कर विपरीत दिशा से हुई थी और वो दूसरी तरफ ड्राइविंग सीट पर था।
अगर इस तरफ से टक्कर होती तो यकीनन वो ऑन द स्पॉट यमलोक पहुंच गया होता।
हालाकि टक्कर इतनी तेज़ थी कि विपरीत दिशा में होने के बाद भी उसे गहरी चोटें आईं थी।
ये तो उसकी किस्मत थी कि दो लोगों ने फ़ौरन ही उसे हॉस्पिटल ले जाने का प्रबंध कर दिया था वरना ज़्यादा खून बह जाने की वजह से उसका ज़िंदा रहना मुश्किल ही था।
प्रिया और अंकिता जिस वक्त ऑटो से उतर रहीं थी ठीक उसी वक्त एक कार तेज़ी से आ कर ऑटो के पीछे रुकी।
अभी प्रिया ने कार की तरफ देखा ही था कि ऑटो वाले ने उससे किराए के पैसे मांगे।
प्रिया को अब जा कर ध्यान आया कि रोने धोने और मारे हड़बड़ाहट में वो अपना पर्स तो लाना ही भूल गई है।
वो ये सोच कर घबरा उठी कि अब वो ऑटो वाले को पैसे कैसे देगी?
"अरे! प्रिया अच्छा हुआ तू यहीं मिल गई मुझे।" ऑटो के पीछे रुकी कार का दरवाज़ा खोल कर साक्षी उसके पास आते ही बोली──"तेरे फ़ोन करने पर मैं जिस हालत में थी वैसे ही अपने हसबैंड के साथ यहां चली आई। चल जल्दी अंदर।"
"वो...वो साक्षी बात ये है कि इस ऑटो वाले को देने के लिए इस वक्त मेरे पास पैसे ही नहीं हैं।" प्रिया ने झिझकते हुए उससे कहा──"फ़ोन पर जब ऐसी ख़बर सुनी तो किसी बात का होश ही नहीं रह गया था मुझे।"
"ओह! हां समझ सकती हूं।" साक्षी ने फ़ौरन ही अपना पर्स खोला और उसमे से सौ का एक नोट प्रिया की तरफ बढ़ाते हुए कहा──"ये ले, इसे ऑटो वाले को पकड़ा और फ़ौरन अंदर चल।"
कुछ ही देर में तीनों हॉस्पिटल के अंदर पहुंच गए।
अभी वो इधर उधर देख ही रही थी कि साक्षी का पति यानि विशाल अग्निहोत्री भी आ गया।
प्रिया ने एक नज़र उसे देखा।
जबकि साक्षी ने अपने पति से कहा कि वो फ़ौरन पता करे कि प्रिया के हसबैंड को यहां कहां पर भर्ती किया गया है?
विशाल फ़ौरन ही इस काम में लग गया।
जल्दी ही उसने पता लगा लिया और साथ ही डॉक्टर्स से बात भी की।
इस हॉस्पिटल में उसके कुछ जान पहचान वाले डॉक्टर थे इस लिए उसे किसी बात की परेशानी अथवा असुविधा नहीं हुई।
प्रिया और अंकिता बहुत ही ज़्यादा बेचैन और दुखी नज़र आ रहीं थी।
वो एक नज़र अशोक को देख लेना चाहतीं थी।
विशाल ने डॉक्टर से बात की तो डॉक्टर ने बताया कि इस वक्त अशोक से मिलना संभव नहीं है क्योंकि इस वक्त वो आई सी यू में है।
आई सी यू का नाम सुनते ही प्रिया की आंखें एक बार फिर से छलक पड़ीं।
अंकिता भी सिसक उठी।
साक्षी ने दोनों को सम्हाला।
विशाल अपने पहचान के डॉक्टरों से बात चीत करने में लगा हुआ था।
"फ़िक्र मत कर प्रिया।" साक्षी ने प्रिया के कंधे पर हाथ रख कर कहा──"अशोक जी को कुछ नहीं होगा। ऊपर वाले की दया से वो यहां तक पहुंच गए हैं तो आगे भी सब अच्छा ही होगा।"
"पता नहीं ऊपर वाला क्या चाहता है मुझसे?" प्रिया का मन जाने कहां कहां भटक रहा था──"अब तक तो सब ठीक ही था लेकिन अब जाने कहां से ऐसी मुसीबतें और ऐसे दुख मेरे सामने आ खड़े हुए हैं?"
"धीरज रख प्रिया।" साक्षी ने कहा──"तू बिना मतलब की बातें मत सोच। तुझे भी पता है कि दुनिया में कहीं न कहीं किसी न किसी के साथ इस तरह के हादसे होते ही रहते हैं। आज तेरे साथ हुआ है तो कल किसी और के साथ होगा। दुनिया में सबके साथ कुछ न कुछ होता ही रहता है। तू बेकार की बातें मत सोच और ऊपर वाले से प्रार्थना कर कि वो अशोक जी को जल्द से जल्द ठीक कर दें।"
प्रिया सचमुच आंखें बंद कर के मन ही मन ऊपर वाले से प्रार्थना करने लगी।
मासूम अंकिता भी उसे देख कर उसी के जैसे आंखें बंद कर के ऊपर वाले से अपने डैड को जल्दी ठीक कर देने की प्रार्थना करने लगी।
[][][][][]
क़रीब दो घंटे बाद आई सी यू का दरवाज़ा खुला और एक डॉक्टर सफेद कोट पहने तथा हाथों में ग्लव्स पहने बाहर निकला।
विशाल लपक कर उसके क़रीब पहुंचा।
प्रिया, अंकिता और साक्षी भी तेज़ी से उसकी तरफ लपकीं।
"सब ठीक तो है ना डॉक्टर?" विशाल ने उससे पूछा।
डॉक्टर ने विशाल के साथ साथ बाकी तीनों की तरफ देखा।
उसके यूं देखने से प्रिया और अंकिता की सांसें अटक सी गईं।
"डोंट वरी।" तभी डॉक्टर ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"अब वो ख़तरे से बाहर हैं लेकिन....।"
"ल...लेकिन क्या डॉक्टर साहब?" प्रिया ये पूछने से खुद को रोक न सकी।
उसके मन में एकाएक ही तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे।
"हमने तो अपनी तरफ से पूरी ही कोशिश की है।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन पेशेंट को मौत के मुंह से वापस लाने में उस व्यक्ति का भी सबसे ज़्यादा योगदान है जिसने उन्हें समय पर यहां पहुंचाया भी और उन्हें अपना खून भी दिया था।"
"भगवान का लाख लाख शुक्र है।" प्रिया ने मन ही मन उस व्यक्ति के लिए प्रार्थना करते हुए कहा──"मेरे डूबते संसार को उस फ़रिश्ते ने अपना खून दे कर बचा लिया। भगवान उसे हमेशा खुश रखे और उसके जीवन में कभी भी ऐसा संकट न आए।"
"वैसे डॉक्टर वो था कौन?" विशाल ने डॉक्टर से पूछा──"हम ऐसे नेक आदमी से मिलना चाहते हैं।"
"वैसे तो वो एक मामूली सा टैक्सी ड्राइवर था।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन इतना बड़ा काम कर के वो महान बन गया। दुर्भाग्य से हमारे हॉस्पिटल में उस ग्रुप का खून बस थोड़ा ही बचा था। जब उस टैक्सी ड्राइवर को पता चला तो उसने बताया कि उसका खून भी उसी ग्रुप का है जिस ग्रुप के खून की पेशेंट को ज़रूरत थी। अब जबकि वो खुद ही अपना खून देने को तैयार था तो हमने भी देरी नहीं की। इसी लिए मैंने कहा कि वो व्यक्ति महान था और पेशेंट को मौत के मुंह से वापस लाने में उसका बहुत बड़ा हाथ है।"
डॉक्टर के मुख से टैक्सी ड्राइवर की बात सुन जाने क्यों प्रिया को अरमान का ख़याल आ गया।
उसकी धड़कनें अनायास ही तेज़ी से धड़कनें लगीं।
अनायास ही उसके मन में ख़याल उभरा कि कहीं वो टैक्सी ड्राइवर अरमान तो नहीं रहा होगा?
नहीं नहीं, इतना बड़ा इत्तेफ़ाक नहीं हो सकता।
"आपने उस टैक्सी ड्राइवर से उसका नाम पता तो पूछा ही होगा डॉक्टर।" उधर विशाल डॉक्टर से कह रहा था──"हम जानना चाहते हैं उस आदमी के बारे में। इतना बड़ा उपकार करने वाले का हम तहे दिल से धन्यवाद देना चाहते हैं।"
"हमारे पूछने पर उसने सिर्फ इतना ही बताया था कि उसका नाम अरमान है।" डॉक्टर ने कहा──"जी हां यही नाम बताया था उसने──अरमान...जिंदल। उस समय क्योंकि समय कम था इस लिए हमने उसका पता जानने पर ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई थी।"
अरमान नाम सुनते ही प्रिया का दिल धक्क से रह गया।
अभी कुछ पल पहले वो यही सोच रही थी कि इतना बड़ा इत्तेफ़ाक उसके साथ नहीं हो सकता लेकिन ऐसा इत्तेफ़ाक हो चुका था।
अरमान नाम का प्राणी अपना खून दे कर उसके पति की जान बचा चुका था।
प्रिया को समझ न आया कि ऊपर वाला ये कैसी अजीब लीला कर रहा है उसके साथ?
वो सोचने पर मजबूर हो गई कि जब उसके पति का एक्सीडेंट हुआ तो अरमान ही क्यों अपनी टैक्सी में उसे ले कर हॉस्पिटल आया था?
कोई दूसरा क्यों नहीं आया?
क्या ये सिर्फ इत्तेफ़ाक था या ऊपर वाले की कोई लीला?
आख़िर अरमान उस जगह पर कैसे था?
"क्या अब हम उन्हें देख सकते हैं डॉक्टर?" विशाल की आवाज़ से प्रिया का ध्यान भंग हुआ।
"अभी तो फिलहाल आप लोग बाहर से ही उन्हें देख सकते हैं।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन थोड़े समय बाद जब उन्हें दूसरे वार्ड में सिफ्ट कर दिया जाएगा तो आप लोग उन्हें क़रीब से देख सकेंगे। अच्छा, अब मैं चलता हूं।"
डॉक्टर इतना कह कर चला गया।
प्रिया और अंकिता फ़ौरन अशोक को देखने के लिए बेचैन हो उठीं।
यही हाल साक्षी और विशाल का भी था।
वो सब फ़ौरन ही आई सी यू की तरफ बढ़े।
आई सी यू के दरवाज़े के ऊपर लगे ग्लास से सबसे पहले प्रिया और अंकिता ने अंदर झांका।
अंदर बेड पर अशोक आंखें बंद किए लेटा हुआ था।
उसके सिर और माथे के साथ साथ दाईं बाजू पर भी पट्टी बंधी हुई थी।
उसकी ये हालत देख प्रिया और अंकिता की आंखें फिर से छलक पड़ीं।
"अरे! अब क्यों ऐसे रो रही हो तुम दोनों?" पीछे से साक्षी ने कहा──"तुम दोनों की दुआ से देखो ये सही सलामत बच गए हैं। बाकी जो थोड़ी बहुत चोटें हैं वो जल्दी ही ठीक हो जाएंगी।"
साक्षी की इस बात से प्रिया और अंकिता ने आंसू बहाना बंद किया।
वो दोनों जब ग्लास से हटीं तो विशाल और साक्षी ने भी ग्लास से अंदर झांक कर अशोक को देखा।
उसके बाद विशाल ये कह कर चला गया कि वो डॉक्टर से ये पता कर के आता है कि अशोक जी को यहां कब तक रहना होगा?
विशाल के जाने के बाद साक्षी ने प्रिया और अंकिता को एक तरफ रखे बेंच पर बैठाया।
वो खुद भी उनके साथ बैठ गई।
"आज अगर उन्हें कुछ हो जाता तो हम दोनों मां बेटी का क्या होता साक्षी?" प्रिया दुखी भाव से बोल पड़ी──"पहले ही उनकी मां मुझे करमजली और बांझ कह कर जाने क्या क्या सुनाती रहती थीं और आज अगर कोई अनर्थ हो जाता तो जाने क्या हो जाता। अंकिता को तो वो अपने पास रख लेतीं लेकिन मुझे धक्के मार कर अपने घर से निकाल देतीं।"
"ऐसा मत कहिए आंटी।" अंकिता झट से बोल पड़ी──"मैं कभी आपको कहीं नहीं जाने दूंगी। आप जहां जाएंगी मैं भी जाऊंगी।"
"मेरी बच्ची।" प्रिया ने भावना में बह कर अंकिता को खुद से छुपका लिया।
इधर अंकिता की बात सुन साक्षी ये सोचने पर मजबूर हो गई कि अगर सच में ऐसा कोई अनर्थ हो जाता तो प्रिया का सच में क्या होता?
अगर उसकी बात सच मान ली जाए तो क्या सचमुच उसकी सास उसे अपने घर से निकाल देती और क्या उसके साथ अंकिता भी रहती?
साक्षी ये भी महसूस कर रही थी कि प्रिया अशोक और अंकिता के प्रति कुछ ज़्यादा ही जज़्बात रखती है।
हालाकि ये स्वाभाविक ही है क्योंकि अशोक तो उसका पति ही है और अंकिता उसकी सौतेली बेटी है।
एक ऐसी बेटी जिसने आज तक उसे मां नहीं कहा बल्कि हमेशा आंटी ही कहा है।
साक्षी को समझ न आया कि ऐसे में प्रिया क्या इतना आसानी से अशोक को तलाक़ देने का सोच सकेगी?
क्या वो इतनी आसानी से अंकिता जैसी अपनी सौतेली बेटी से मुंह मोड़ सकेगी?
साक्षी को महसूस हुआ कि ये इतना आसान नहीं होगा।
मतलब साफ है कि अभी इसके लिए समय लगेगा।
अभी और ज़्यादा मंथन की ज़रूरत है।
[][][][][]
डॉक्टर ने अशोक को घर ले जाने की इजाज़त नहीं दी थी।
बल्कि उसे क़रीब एक हफ़्ता हॉस्पिटल में ही रखने का मशवरा दिया था।
विशाल ने भी प्रिया से यही कहा कि अशोक जी के लिए यही बेहतर होगा।
बाकी वो किसी बात की फ़िक्र न करें।
साक्षी की दोस्त होने के नाते उसका ये दुख और उसकी इस परेशानी को वो अपनी परेशानी जैसा ही समझता है।
प्रिया को इस बात से बहुत राहत मिली थी।
वो साक्षी जैसी दोस्त पर गर्व महसूस करने लगी थी और साथ ही उसका एहसान भी मानने लगी थी।
विशाल ने उसके सामने ही साक्षी से कहा था कि प्रिया को जिस किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो वो फ़ौरन ही उसे पूरी करे।
प्रिया से भी उसने कहा था कि वो किसी बात के लिए संकोच न करें।
सबके जीवन में दुख दर्द और परेशानियां आती हैं लेकिन मुसीबत में साथ देना ही इंसानियत होती है और एक दोस्त का फर्ज़ होता है।
अशोक को दूसरे दिन होश आया था।
अपने क़रीब प्रिया और अंकिता को देखते ही उसकी आंखें भर आईं थी।
यही हाल प्रिया और अंकिता का भी हुआ था।
अंकिता तो अपने डैड से लिपट कर रोने ही लगी थी।
प्रिया ने बड़ी मुश्किल से अपने आपको सम्हाला हुआ था।
अंकिता की पढ़ाई डिस्टर्ब न हो इसके लिए साक्षी ने उसे बड़े अच्छे तरीके से समझा कर स्कूल जाने के लिए मनाया था।
हालाकि प्रिया का भी इसमें उतना ही हाथ था।
अशोक साक्षी से पहली बार मिला था।
जब उसे पता चला कि साक्षी उसकी बीवी की कॉलेज के समय की दोस्त है तो उसे बड़ी हैरानी हुई और साथ ही खुशी भी।
बहरहाल ऐसे ही समय गुज़रता गया और देखते ही देखते एक हफ़्ता गुज़र गया।
इस बीच एक बात ज़रूर अजीब हुई कि अशोक जब से होश में आया था तो विशाल उससे मिलने एक बार भी नहीं आया था।
ज़ाहिर है अगर वो आता तो अशोक उसे पहचान जाता।
वो ये जान जाता कि ये उसकी कंपनी का वही नौजवान अधिकारी है जिसने उसको गहन परेशानी में डाल रखा है।
हालाकि साक्षी के द्वारा जब उसे उसके पति का नाम विशाल पता चला तो एक बार के लिए उसके मन में उसी नौजवान अधिकारी का ख़याल आ गया था।
फिर उसने ये सोच कर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया कि विशाल नाम के दुनिया में बहुत से लोग हैं।
हालाकि साक्षी से वो अक्सर कहता था कि वो विशाल जी को धन्यवाद देने के इरादे से उनसे मिलना चाहता है।
साक्षी उससे यही कहती कि वो एक ज़रूरी काम से शहर से बाहर गए हुए हैं।
जैसे ही वो आएंगे तो वो उन्हें उससे मिलने आने का ज़रूर बोलेगी।
आख़िर एक हफ्ते बाद अशोक को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई और वो प्रिया तथा साक्षी के साथ अपने फ्लैट पर आ गया।
अंकिता स्कूल गई हुई थी।
उसके एक्सीडेंट की ख़बर उसकी कंपनी में भी पहुंच गई थी।
कंपनी के कुछ लोग एक दो बार उससे मिलने हॉस्पिटल आए थे।
बाकी के कुछ लोग फ़ोन द्वारा उसका हाल चाल पूछ लेते थे।
सही सलामत अपने घर आ कर अशोक को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका नया जन्म हुआ है।
उसने अपनी बीवी प्रिया और उसकी दोस्त साक्षी को बार बार धन्यवाद दिया।
उसके इलाज़ का सारा खर्च साक्षी के पति विशाल ने उठाया था।
[][][][][]
"तू साले कब तक उस बुढ़ऊ से छुपता फिरेगा?" टैक्सी की पैसेंजर शीट पर बैठे विशाल से अरमान ने कहा──"किसी दिन बढ़िया सा मुहूर्त निकाल कर उसे अपने दर्शन करा ही दे। उस बुढ़ऊ को भी तो पता चले कि वो तू ही है जिसने कंपनी में उसकी सांसें हलक में अटका रखी हैं और एक्सीडेंट में उसके इलाज़ का खर्चा भी तूने ही उठाया है।"
"वो तो उससे मिलना ही पड़ेगा यार।" विशाल ने कहा──"लेकिन तू क्यों सच सच ये नहीं बता रहा कि उसका एक्सीडेंट स्वाभाविक रूप से हुआ था या उसमें तेरी कोई मेहरबानी थी?"
"तुझे ऐसा क्यों लगता है कि ऐसा मैंने करवाया होगा?" अरमान ने इस बार उसे गुस्से से देखा──"तू अच्छी तरह जानता है कि ऐसा घटिया काम करने का सोच भी नहीं सकता मैं। कितनी बार तुझे ये बात बता चुका हूं फिर भी तुझे मेरी बात पर भरोसा क्यों नहीं हो रहा?"
"तो तेरे अनुसार उस रात उसने दारू पी रखी थी?" विशाल ने उसकी तरफ देखते हुए कहा──"और उसके दारू पीने की वजह मैं था? मैं इस लिए क्योंकि मेरी वजह से वो बेहद चिंतित और परेशान था?"
"बिल्कुल।" अरमान ने कहा──"ये तो संयोग था कि उसी समय मैं अपनी टैक्सी से एक सवारी उतार कर उधर से गुज़र रहा था। शोर शराबा और भीड़ भाड़ देख कर मैं भी टैक्सी को एक साइड लगा कर उस तरफ चला गया था। भीड़ को चीर कर जब मैं आगे पहुंचा तो देखा कुछ लोग कार से एक आदमी को निकाल रहे थे। आदमी खून में बुरी तरह नहाए जा रहा था। अचानक मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी तो मैं ये देख के बुरी तरह चौंक गया कि ये तो प्रिया का हसबैंड है। कुछ पलों के लिए तो यकीन ही नहीं हुआ मुझे कि वो प्रिया का हसबैंड है लेकिन सच तो सच ही था। माना कि उससे प्रिया को हासिल करना मेरी आख़िरी ज़िद थी लेकिन इस तरीके से तो हर्गिज़ नहीं। मैंने फ़ौरन ही आगे बढ़ कर उन आदमियों की मदद से उसे अपनी टैक्सी में शिफ्ट किया और फिर जितना जल्दी हो सका उसे अपोलो हॉस्पिटल ले गया। शुक्र था कि एक आदमी मेरे साथ था जिसके चलते डॉक्टर ने ज़्यादा पूछताछ नहीं की और फ़ौरन ही उसे आई सी यू में शिफ्ट कर दिया। इधर उसकी इस हालत के चलते मेरे अंदर भी तूफ़ान चालू था। मुझे उसका मोबाइल उसकी जेब में ही पड़ा मिल गया था इस लिए मैंने डॉक्टर के द्वारा उसकी बीवी यानी प्रिया को फोन करवाया। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आया तो उसने कहा कि उसका खून बहुत ज़्यादा बह गया है और उसके ग्रुप का खून हॉस्पिटल में उस वक्त इतना उपलब्ध नहीं है जितने की उसे ज़रूरत है। डॉक्टर के मुख से ही मैंने सुना था कि उसका ब्लड ग्रुप क्या है। अजब संयोग था क्योंकि मेरा भी वही ब्लड ग्रुप था जो प्रिया के हसबैंड का था। मैंने फ़ौरन ही डॉक्टर को ये बात बताई और उससे कहा कि वो मेरे जिस्म से खून निकाल कर उसको चढ़ाए। बस इतनी सी ही कहानी थी।"
"बड़े आश्चर्य की बात है।" विशाल गहरी सांस लेते हुए बोला──"एक साथ कितने इत्तेफ़ाक हुए। आम तौर पर ऐसा होना इंपॉसिबल है। ख़ैर जो भी हो, अच्छी बात ये है कि तेरी मेहरबानी के चलते प्रिया का हसबैंड बच गया। वैसे हॉस्पिटल में मैंने देखा था कि इस हादसे की वजह से प्रिया बहुत ज़्यादा सदमे में आ गई थी। उस समय उसकी हालत देख कर मैं और साक्षी ये सोचने पर मजबूर हो गए थे कि अगर वो अपने हसबैंड के लिए इतने गहरे जज़्बात रखती है तो फिर कैसे वो उसे तलाक़ देने का सोचेगी और फिर कैसे वो तुझसे शादी करने का सोचेगी?"
"असंभव चीज़ को ही तो संभव बनाना है माई डियर।" अरमान ने एक सिगरेट जलाते हुए कहा──"एंड ट्रस्ट मी, ऐसा चमत्कार ज़रूर होगा।"
"यार मुझे तो ऐसा कहीं से भी नहीं लगता।" विशाल ने कहा──"पता नहीं तुझे इतना यकीन कैसे है?"
"बदले हुए वक्त और हालातों की वजह से इतना यकीन है।" अरमान ने कहा──"तुझे भी पता है कि इंसान जैसे कर्म करता है वैसा ही कर्म फल पाता है। प्रिया ने जो कर्म किया था उसका भुगतान करने के लिए एक न एक दिन इस शहर में लौट कर आना ही उसकी नियति बन चुकी थी। जिस ऐशो आराम की ख़्वाहिश के चलते उसने मुझे ठुकरा कर किसी और से शादी की थी वो ज़्यादा समय तक चलने वाला नहीं था। बड़ी सिंपल सी बात है डियर कि कोई भी इंसान किसी का इस हद तक दिल दुखा कर हमेशा खुश नहीं रह सकता। उसके बुरे कर्म जल्द ही उसकी खुशियों पर ग्रहण लगाते हैं और फिर उसे उस इंसान के सामने ला कर खड़ा कर देते हैं जिसे उसने कभी दुख दिया होता है। प्रिया के साथ कुदरत ने यही तो किया है। साढ़े सात सालों बाद जिस दिन वो मुझे उस फाइव स्टार होटल के बाहर मिली थी उसी दिन मैं समझ गया था कि कुदरत ने उसे इसी लिए मेरे सामने ला कर खड़ा किया है ताकि इस शहर में उसके बुरे कर्म का हिसाब हो सके और उसे ऐसे ऐसे दुख दर्द का एहसास हो सके जिसका उसने कभी तसव्वुर भी न किया हो।"
"यार बड़ी अजीब और ख़तरनाक बातें कर रहा है तू।" विशाल ने हैरानी से अरमान को देखा──"आख़िर क्या चल रहा है तेरे अंदर? प्रिया के प्रति तेरे इरादे कुछ ठीक नहीं लग रहे मुझे।"
"फ़िक्र मत कर।" अरमान ने सिगरेट का लंबा कश खींच कर उसके धुएं को उगलते हुए कहा──"अपनी ज़िंदगी में सिर्फ उसी को तो टूट टूट कर चाहा है मैंने। ज़ाहिर है उसे ऐसी तकलीफ़ तो नहीं दे सकूंगा जिसके चलते खुद मुझे भी तकलीफ़ हो। मगर हां, इतना तो उसे ज़रूर मिलेगा जितने में उसे ये एहसास हो सके कि किसी के द्वारा इस तरह ठुकरा दिए जाने से एक इंसान कैसे घुट घुट के जीता है?"
उसकी बातें सुन कर विशाल के समूचे जिस्म में अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
किसी अंजानी आशंका के चलते उसके अंदर थोड़ी घबराहट भी पैदा हो गई थी।
जाने कैसे कैसे ख़याल उसके मन में उभरते चले गए।
उधर अरमान के चेहरे पर अजीब सी सख़्ती छाई हुई थी।
उसके दाहिने हाथ की दो अंगुलियों के मध्य फंसी सिगरेट आधे से ज़्यादा सुलग चुकी थी।
To be continued...
Nice update....Update ~ 12
अशोक की हालत सच में ठीक नहीं थी।
एक्सीडेंट बुरी तरह हुआ था।
शुक्र इस बात का था कि टक्कर विपरीत दिशा से हुई थी और वो दूसरी तरफ ड्राइविंग सीट पर था।
अगर इस तरफ से टक्कर होती तो यकीनन वो ऑन द स्पॉट यमलोक पहुंच गया होता।
हालाकि टक्कर इतनी तेज़ थी कि विपरीत दिशा में होने के बाद भी उसे गहरी चोटें आईं थी।
ये तो उसकी किस्मत थी कि दो लोगों ने फ़ौरन ही उसे हॉस्पिटल ले जाने का प्रबंध कर दिया था वरना ज़्यादा खून बह जाने की वजह से उसका ज़िंदा रहना मुश्किल ही था।
प्रिया और अंकिता जिस वक्त ऑटो से उतर रहीं थी ठीक उसी वक्त एक कार तेज़ी से आ कर ऑटो के पीछे रुकी।
अभी प्रिया ने कार की तरफ देखा ही था कि ऑटो वाले ने उससे किराए के पैसे मांगे।
प्रिया को अब जा कर ध्यान आया कि रोने धोने और मारे हड़बड़ाहट में वो अपना पर्स तो लाना ही भूल गई है।
वो ये सोच कर घबरा उठी कि अब वो ऑटो वाले को पैसे कैसे देगी?
"अरे! प्रिया अच्छा हुआ तू यहीं मिल गई मुझे।" ऑटो के पीछे रुकी कार का दरवाज़ा खोल कर साक्षी उसके पास आते ही बोली──"तेरे फ़ोन करने पर मैं जिस हालत में थी वैसे ही अपने हसबैंड के साथ यहां चली आई। चल जल्दी अंदर।"
"वो...वो साक्षी बात ये है कि इस ऑटो वाले को देने के लिए इस वक्त मेरे पास पैसे ही नहीं हैं।" प्रिया ने झिझकते हुए उससे कहा──"फ़ोन पर जब ऐसी ख़बर सुनी तो किसी बात का होश ही नहीं रह गया था मुझे।"
"ओह! हां समझ सकती हूं।" साक्षी ने फ़ौरन ही अपना पर्स खोला और उसमे से सौ का एक नोट प्रिया की तरफ बढ़ाते हुए कहा──"ये ले, इसे ऑटो वाले को पकड़ा और फ़ौरन अंदर चल।"
कुछ ही देर में तीनों हॉस्पिटल के अंदर पहुंच गए।
अभी वो इधर उधर देख ही रही थी कि साक्षी का पति यानि विशाल अग्निहोत्री भी आ गया।
प्रिया ने एक नज़र उसे देखा।
जबकि साक्षी ने अपने पति से कहा कि वो फ़ौरन पता करे कि प्रिया के हसबैंड को यहां कहां पर भर्ती किया गया है?
विशाल फ़ौरन ही इस काम में लग गया।
जल्दी ही उसने पता लगा लिया और साथ ही डॉक्टर्स से बात भी की।
इस हॉस्पिटल में उसके कुछ जान पहचान वाले डॉक्टर थे इस लिए उसे किसी बात की परेशानी अथवा असुविधा नहीं हुई।
प्रिया और अंकिता बहुत ही ज़्यादा बेचैन और दुखी नज़र आ रहीं थी।
वो एक नज़र अशोक को देख लेना चाहतीं थी।
विशाल ने डॉक्टर से बात की तो डॉक्टर ने बताया कि इस वक्त अशोक से मिलना संभव नहीं है क्योंकि इस वक्त वो आई सी यू में है।
आई सी यू का नाम सुनते ही प्रिया की आंखें एक बार फिर से छलक पड़ीं।
अंकिता भी सिसक उठी।
साक्षी ने दोनों को सम्हाला।
विशाल अपने पहचान के डॉक्टरों से बात चीत करने में लगा हुआ था।
"फ़िक्र मत कर प्रिया।" साक्षी ने प्रिया के कंधे पर हाथ रख कर कहा──"अशोक जी को कुछ नहीं होगा। ऊपर वाले की दया से वो यहां तक पहुंच गए हैं तो आगे भी सब अच्छा ही होगा।"
"पता नहीं ऊपर वाला क्या चाहता है मुझसे?" प्रिया का मन जाने कहां कहां भटक रहा था──"अब तक तो सब ठीक ही था लेकिन अब जाने कहां से ऐसी मुसीबतें और ऐसे दुख मेरे सामने आ खड़े हुए हैं?"
"धीरज रख प्रिया।" साक्षी ने कहा──"तू बिना मतलब की बातें मत सोच। तुझे भी पता है कि दुनिया में कहीं न कहीं किसी न किसी के साथ इस तरह के हादसे होते ही रहते हैं। आज तेरे साथ हुआ है तो कल किसी और के साथ होगा। दुनिया में सबके साथ कुछ न कुछ होता ही रहता है। तू बेकार की बातें मत सोच और ऊपर वाले से प्रार्थना कर कि वो अशोक जी को जल्द से जल्द ठीक कर दें।"
प्रिया सचमुच आंखें बंद कर के मन ही मन ऊपर वाले से प्रार्थना करने लगी।
मासूम अंकिता भी उसे देख कर उसी के जैसे आंखें बंद कर के ऊपर वाले से अपने डैड को जल्दी ठीक कर देने की प्रार्थना करने लगी।
[][][][][]
क़रीब दो घंटे बाद आई सी यू का दरवाज़ा खुला और एक डॉक्टर सफेद कोट पहने तथा हाथों में ग्लव्स पहने बाहर निकला।
विशाल लपक कर उसके क़रीब पहुंचा।
प्रिया, अंकिता और साक्षी भी तेज़ी से उसकी तरफ लपकीं।
"सब ठीक तो है ना डॉक्टर?" विशाल ने उससे पूछा।
डॉक्टर ने विशाल के साथ साथ बाकी तीनों की तरफ देखा।
उसके यूं देखने से प्रिया और अंकिता की सांसें अटक सी गईं।
"डोंट वरी।" तभी डॉक्टर ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"अब वो ख़तरे से बाहर हैं लेकिन....।"
"ल...लेकिन क्या डॉक्टर साहब?" प्रिया ये पूछने से खुद को रोक न सकी।
उसके मन में एकाएक ही तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे।
"हमने तो अपनी तरफ से पूरी ही कोशिश की है।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन पेशेंट को मौत के मुंह से वापस लाने में उस व्यक्ति का भी सबसे ज़्यादा योगदान है जिसने उन्हें समय पर यहां पहुंचाया भी और उन्हें अपना खून भी दिया था।"
"भगवान का लाख लाख शुक्र है।" प्रिया ने मन ही मन उस व्यक्ति के लिए प्रार्थना करते हुए कहा──"मेरे डूबते संसार को उस फ़रिश्ते ने अपना खून दे कर बचा लिया। भगवान उसे हमेशा खुश रखे और उसके जीवन में कभी भी ऐसा संकट न आए।"
"वैसे डॉक्टर वो था कौन?" विशाल ने डॉक्टर से पूछा──"हम ऐसे नेक आदमी से मिलना चाहते हैं।"
"वैसे तो वो एक मामूली सा टैक्सी ड्राइवर था।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन इतना बड़ा काम कर के वो महान बन गया। दुर्भाग्य से हमारे हॉस्पिटल में उस ग्रुप का खून बस थोड़ा ही बचा था। जब उस टैक्सी ड्राइवर को पता चला तो उसने बताया कि उसका खून भी उसी ग्रुप का है जिस ग्रुप के खून की पेशेंट को ज़रूरत थी। अब जबकि वो खुद ही अपना खून देने को तैयार था तो हमने भी देरी नहीं की। इसी लिए मैंने कहा कि वो व्यक्ति महान था और पेशेंट को मौत के मुंह से वापस लाने में उसका बहुत बड़ा हाथ है।"
डॉक्टर के मुख से टैक्सी ड्राइवर की बात सुन जाने क्यों प्रिया को अरमान का ख़याल आ गया।
उसकी धड़कनें अनायास ही तेज़ी से धड़कनें लगीं।
अनायास ही उसके मन में ख़याल उभरा कि कहीं वो टैक्सी ड्राइवर अरमान तो नहीं रहा होगा?
नहीं नहीं, इतना बड़ा इत्तेफ़ाक नहीं हो सकता।
"आपने उस टैक्सी ड्राइवर से उसका नाम पता तो पूछा ही होगा डॉक्टर।" उधर विशाल डॉक्टर से कह रहा था──"हम जानना चाहते हैं उस आदमी के बारे में। इतना बड़ा उपकार करने वाले का हम तहे दिल से धन्यवाद देना चाहते हैं।"
"हमारे पूछने पर उसने सिर्फ इतना ही बताया था कि उसका नाम अरमान है।" डॉक्टर ने कहा──"जी हां यही नाम बताया था उसने──अरमान...जिंदल। उस समय क्योंकि समय कम था इस लिए हमने उसका पता जानने पर ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई थी।"
अरमान नाम सुनते ही प्रिया का दिल धक्क से रह गया।
अभी कुछ पल पहले वो यही सोच रही थी कि इतना बड़ा इत्तेफ़ाक उसके साथ नहीं हो सकता लेकिन ऐसा इत्तेफ़ाक हो चुका था।
अरमान नाम का प्राणी अपना खून दे कर उसके पति की जान बचा चुका था।
प्रिया को समझ न आया कि ऊपर वाला ये कैसी अजीब लीला कर रहा है उसके साथ?
वो सोचने पर मजबूर हो गई कि जब उसके पति का एक्सीडेंट हुआ तो अरमान ही क्यों अपनी टैक्सी में उसे ले कर हॉस्पिटल आया था?
कोई दूसरा क्यों नहीं आया?
क्या ये सिर्फ इत्तेफ़ाक था या ऊपर वाले की कोई लीला?
आख़िर अरमान उस जगह पर कैसे था?
"क्या अब हम उन्हें देख सकते हैं डॉक्टर?" विशाल की आवाज़ से प्रिया का ध्यान भंग हुआ।
"अभी तो फिलहाल आप लोग बाहर से ही उन्हें देख सकते हैं।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन थोड़े समय बाद जब उन्हें दूसरे वार्ड में सिफ्ट कर दिया जाएगा तो आप लोग उन्हें क़रीब से देख सकेंगे। अच्छा, अब मैं चलता हूं।"
डॉक्टर इतना कह कर चला गया।
प्रिया और अंकिता फ़ौरन अशोक को देखने के लिए बेचैन हो उठीं।
यही हाल साक्षी और विशाल का भी था।
वो सब फ़ौरन ही आई सी यू की तरफ बढ़े।
आई सी यू के दरवाज़े के ऊपर लगे ग्लास से सबसे पहले प्रिया और अंकिता ने अंदर झांका।
अंदर बेड पर अशोक आंखें बंद किए लेटा हुआ था।
उसके सिर और माथे के साथ साथ दाईं बाजू पर भी पट्टी बंधी हुई थी।
उसकी ये हालत देख प्रिया और अंकिता की आंखें फिर से छलक पड़ीं।
"अरे! अब क्यों ऐसे रो रही हो तुम दोनों?" पीछे से साक्षी ने कहा──"तुम दोनों की दुआ से देखो ये सही सलामत बच गए हैं। बाकी जो थोड़ी बहुत चोटें हैं वो जल्दी ही ठीक हो जाएंगी।"
साक्षी की इस बात से प्रिया और अंकिता ने आंसू बहाना बंद किया।
वो दोनों जब ग्लास से हटीं तो विशाल और साक्षी ने भी ग्लास से अंदर झांक कर अशोक को देखा।
उसके बाद विशाल ये कह कर चला गया कि वो डॉक्टर से ये पता कर के आता है कि अशोक जी को यहां कब तक रहना होगा?
विशाल के जाने के बाद साक्षी ने प्रिया और अंकिता को एक तरफ रखे बेंच पर बैठाया।
वो खुद भी उनके साथ बैठ गई।
"आज अगर उन्हें कुछ हो जाता तो हम दोनों मां बेटी का क्या होता साक्षी?" प्रिया दुखी भाव से बोल पड़ी──"पहले ही उनकी मां मुझे करमजली और बांझ कह कर जाने क्या क्या सुनाती रहती थीं और आज अगर कोई अनर्थ हो जाता तो जाने क्या हो जाता। अंकिता को तो वो अपने पास रख लेतीं लेकिन मुझे धक्के मार कर अपने घर से निकाल देतीं।"
"ऐसा मत कहिए आंटी।" अंकिता झट से बोल पड़ी──"मैं कभी आपको कहीं नहीं जाने दूंगी। आप जहां जाएंगी मैं भी जाऊंगी।"
"मेरी बच्ची।" प्रिया ने भावना में बह कर अंकिता को खुद से छुपका लिया।
इधर अंकिता की बात सुन साक्षी ये सोचने पर मजबूर हो गई कि अगर सच में ऐसा कोई अनर्थ हो जाता तो प्रिया का सच में क्या होता?
अगर उसकी बात सच मान ली जाए तो क्या सचमुच उसकी सास उसे अपने घर से निकाल देती और क्या उसके साथ अंकिता भी रहती?
साक्षी ये भी महसूस कर रही थी कि प्रिया अशोक और अंकिता के प्रति कुछ ज़्यादा ही जज़्बात रखती है।
हालाकि ये स्वाभाविक ही है क्योंकि अशोक तो उसका पति ही है और अंकिता उसकी सौतेली बेटी है।
एक ऐसी बेटी जिसने आज तक उसे मां नहीं कहा बल्कि हमेशा आंटी ही कहा है।
साक्षी को समझ न आया कि ऐसे में प्रिया क्या इतना आसानी से अशोक को तलाक़ देने का सोच सकेगी?
क्या वो इतनी आसानी से अंकिता जैसी अपनी सौतेली बेटी से मुंह मोड़ सकेगी?
साक्षी को महसूस हुआ कि ये इतना आसान नहीं होगा।
मतलब साफ है कि अभी इसके लिए समय लगेगा।
अभी और ज़्यादा मंथन की ज़रूरत है।
[][][][][]
डॉक्टर ने अशोक को घर ले जाने की इजाज़त नहीं दी थी।
बल्कि उसे क़रीब एक हफ़्ता हॉस्पिटल में ही रखने का मशवरा दिया था।
विशाल ने भी प्रिया से यही कहा कि अशोक जी के लिए यही बेहतर होगा।
बाकी वो किसी बात की फ़िक्र न करें।
साक्षी की दोस्त होने के नाते उसका ये दुख और उसकी इस परेशानी को वो अपनी परेशानी जैसा ही समझता है।
प्रिया को इस बात से बहुत राहत मिली थी।
वो साक्षी जैसी दोस्त पर गर्व महसूस करने लगी थी और साथ ही उसका एहसान भी मानने लगी थी।
विशाल ने उसके सामने ही साक्षी से कहा था कि प्रिया को जिस किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो वो फ़ौरन ही उसे पूरी करे।
प्रिया से भी उसने कहा था कि वो किसी बात के लिए संकोच न करें।
सबके जीवन में दुख दर्द और परेशानियां आती हैं लेकिन मुसीबत में साथ देना ही इंसानियत होती है और एक दोस्त का फर्ज़ होता है।
अशोक को दूसरे दिन होश आया था।
अपने क़रीब प्रिया और अंकिता को देखते ही उसकी आंखें भर आईं थी।
यही हाल प्रिया और अंकिता का भी हुआ था।
अंकिता तो अपने डैड से लिपट कर रोने ही लगी थी।
प्रिया ने बड़ी मुश्किल से अपने आपको सम्हाला हुआ था।
अंकिता की पढ़ाई डिस्टर्ब न हो इसके लिए साक्षी ने उसे बड़े अच्छे तरीके से समझा कर स्कूल जाने के लिए मनाया था।
हालाकि प्रिया का भी इसमें उतना ही हाथ था।
अशोक साक्षी से पहली बार मिला था।
जब उसे पता चला कि साक्षी उसकी बीवी की कॉलेज के समय की दोस्त है तो उसे बड़ी हैरानी हुई और साथ ही खुशी भी।
बहरहाल ऐसे ही समय गुज़रता गया और देखते ही देखते एक हफ़्ता गुज़र गया।
इस बीच एक बात ज़रूर अजीब हुई कि अशोक जब से होश में आया था तो विशाल उससे मिलने एक बार भी नहीं आया था।
ज़ाहिर है अगर वो आता तो अशोक उसे पहचान जाता।
वो ये जान जाता कि ये उसकी कंपनी का वही नौजवान अधिकारी है जिसने उसको गहन परेशानी में डाल रखा है।
हालाकि साक्षी के द्वारा जब उसे उसके पति का नाम विशाल पता चला तो एक बार के लिए उसके मन में उसी नौजवान अधिकारी का ख़याल आ गया था।
फिर उसने ये सोच कर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया कि विशाल नाम के दुनिया में बहुत से लोग हैं।
हालाकि साक्षी से वो अक्सर कहता था कि वो विशाल जी को धन्यवाद देने के इरादे से उनसे मिलना चाहता है।
साक्षी उससे यही कहती कि वो एक ज़रूरी काम से शहर से बाहर गए हुए हैं।
जैसे ही वो आएंगे तो वो उन्हें उससे मिलने आने का ज़रूर बोलेगी।
आख़िर एक हफ्ते बाद अशोक को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई और वो प्रिया तथा साक्षी के साथ अपने फ्लैट पर आ गया।
अंकिता स्कूल गई हुई थी।
उसके एक्सीडेंट की ख़बर उसकी कंपनी में भी पहुंच गई थी।
कंपनी के कुछ लोग एक दो बार उससे मिलने हॉस्पिटल आए थे।
बाकी के कुछ लोग फ़ोन द्वारा उसका हाल चाल पूछ लेते थे।
सही सलामत अपने घर आ कर अशोक को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका नया जन्म हुआ है।
उसने अपनी बीवी प्रिया और उसकी दोस्त साक्षी को बार बार धन्यवाद दिया।
उसके इलाज़ का सारा खर्च साक्षी के पति विशाल ने उठाया था।
[][][][][]
"तू साले कब तक उस बुढ़ऊ से छुपता फिरेगा?" टैक्सी की पैसेंजर शीट पर बैठे विशाल से अरमान ने कहा──"किसी दिन बढ़िया सा मुहूर्त निकाल कर उसे अपने दर्शन करा ही दे। उस बुढ़ऊ को भी तो पता चले कि वो तू ही है जिसने कंपनी में उसकी सांसें हलक में अटका रखी हैं और एक्सीडेंट में उसके इलाज़ का खर्चा भी तूने ही उठाया है।"
"वो तो उससे मिलना ही पड़ेगा यार।" विशाल ने कहा──"लेकिन तू क्यों सच सच ये नहीं बता रहा कि उसका एक्सीडेंट स्वाभाविक रूप से हुआ था या उसमें तेरी कोई मेहरबानी थी?"
"तुझे ऐसा क्यों लगता है कि ऐसा मैंने करवाया होगा?" अरमान ने इस बार उसे गुस्से से देखा──"तू अच्छी तरह जानता है कि ऐसा घटिया काम करने का सोच भी नहीं सकता मैं। कितनी बार तुझे ये बात बता चुका हूं फिर भी तुझे मेरी बात पर भरोसा क्यों नहीं हो रहा?"
"तो तेरे अनुसार उस रात उसने दारू पी रखी थी?" विशाल ने उसकी तरफ देखते हुए कहा──"और उसके दारू पीने की वजह मैं था? मैं इस लिए क्योंकि मेरी वजह से वो बेहद चिंतित और परेशान था?"
"बिल्कुल।" अरमान ने कहा──"ये तो संयोग था कि उसी समय मैं अपनी टैक्सी से एक सवारी उतार कर उधर से गुज़र रहा था। शोर शराबा और भीड़ भाड़ देख कर मैं भी टैक्सी को एक साइड लगा कर उस तरफ चला गया था। भीड़ को चीर कर जब मैं आगे पहुंचा तो देखा कुछ लोग कार से एक आदमी को निकाल रहे थे। आदमी खून में बुरी तरह नहाए जा रहा था। अचानक मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी तो मैं ये देख के बुरी तरह चौंक गया कि ये तो प्रिया का हसबैंड है। कुछ पलों के लिए तो यकीन ही नहीं हुआ मुझे कि वो प्रिया का हसबैंड है लेकिन सच तो सच ही था। माना कि उससे प्रिया को हासिल करना मेरी आख़िरी ज़िद थी लेकिन इस तरीके से तो हर्गिज़ नहीं। मैंने फ़ौरन ही आगे बढ़ कर उन आदमियों की मदद से उसे अपनी टैक्सी में शिफ्ट किया और फिर जितना जल्दी हो सका उसे अपोलो हॉस्पिटल ले गया। शुक्र था कि एक आदमी मेरे साथ था जिसके चलते डॉक्टर ने ज़्यादा पूछताछ नहीं की और फ़ौरन ही उसे आई सी यू में शिफ्ट कर दिया। इधर उसकी इस हालत के चलते मेरे अंदर भी तूफ़ान चालू था। मुझे उसका मोबाइल उसकी जेब में ही पड़ा मिल गया था इस लिए मैंने डॉक्टर के द्वारा उसकी बीवी यानी प्रिया को फोन करवाया। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आया तो उसने कहा कि उसका खून बहुत ज़्यादा बह गया है और उसके ग्रुप का खून हॉस्पिटल में उस वक्त इतना उपलब्ध नहीं है जितने की उसे ज़रूरत है। डॉक्टर के मुख से ही मैंने सुना था कि उसका ब्लड ग्रुप क्या है। अजब संयोग था क्योंकि मेरा भी वही ब्लड ग्रुप था जो प्रिया के हसबैंड का था। मैंने फ़ौरन ही डॉक्टर को ये बात बताई और उससे कहा कि वो मेरे जिस्म से खून निकाल कर उसको चढ़ाए। बस इतनी सी ही कहानी थी।"
"बड़े आश्चर्य की बात है।" विशाल गहरी सांस लेते हुए बोला──"एक साथ कितने इत्तेफ़ाक हुए। आम तौर पर ऐसा होना इंपॉसिबल है। ख़ैर जो भी हो, अच्छी बात ये है कि तेरी मेहरबानी के चलते प्रिया का हसबैंड बच गया। वैसे हॉस्पिटल में मैंने देखा था कि इस हादसे की वजह से प्रिया बहुत ज़्यादा सदमे में आ गई थी। उस समय उसकी हालत देख कर मैं और साक्षी ये सोचने पर मजबूर हो गए थे कि अगर वो अपने हसबैंड के लिए इतने गहरे जज़्बात रखती है तो फिर कैसे वो उसे तलाक़ देने का सोचेगी और फिर कैसे वो तुझसे शादी करने का सोचेगी?"
"असंभव चीज़ को ही तो संभव बनाना है माई डियर।" अरमान ने एक सिगरेट जलाते हुए कहा──"एंड ट्रस्ट मी, ऐसा चमत्कार ज़रूर होगा।"
"यार मुझे तो ऐसा कहीं से भी नहीं लगता।" विशाल ने कहा──"पता नहीं तुझे इतना यकीन कैसे है?"
"बदले हुए वक्त और हालातों की वजह से इतना यकीन है।" अरमान ने कहा──"तुझे भी पता है कि इंसान जैसे कर्म करता है वैसा ही कर्म फल पाता है। प्रिया ने जो कर्म किया था उसका भुगतान करने के लिए एक न एक दिन इस शहर में लौट कर आना ही उसकी नियति बन चुकी थी। जिस ऐशो आराम की ख़्वाहिश के चलते उसने मुझे ठुकरा कर किसी और से शादी की थी वो ज़्यादा समय तक चलने वाला नहीं था। बड़ी सिंपल सी बात है डियर कि कोई भी इंसान किसी का इस हद तक दिल दुखा कर हमेशा खुश नहीं रह सकता। उसके बुरे कर्म जल्द ही उसकी खुशियों पर ग्रहण लगाते हैं और फिर उसे उस इंसान के सामने ला कर खड़ा कर देते हैं जिसे उसने कभी दुख दिया होता है। प्रिया के साथ कुदरत ने यही तो किया है। साढ़े सात सालों बाद जिस दिन वो मुझे उस फाइव स्टार होटल के बाहर मिली थी उसी दिन मैं समझ गया था कि कुदरत ने उसे इसी लिए मेरे सामने ला कर खड़ा किया है ताकि इस शहर में उसके बुरे कर्म का हिसाब हो सके और उसे ऐसे ऐसे दुख दर्द का एहसास हो सके जिसका उसने कभी तसव्वुर भी न किया हो।"
"यार बड़ी अजीब और ख़तरनाक बातें कर रहा है तू।" विशाल ने हैरानी से अरमान को देखा──"आख़िर क्या चल रहा है तेरे अंदर? प्रिया के प्रति तेरे इरादे कुछ ठीक नहीं लग रहे मुझे।"
"फ़िक्र मत कर।" अरमान ने सिगरेट का लंबा कश खींच कर उसके धुएं को उगलते हुए कहा──"अपनी ज़िंदगी में सिर्फ उसी को तो टूट टूट कर चाहा है मैंने। ज़ाहिर है उसे ऐसी तकलीफ़ तो नहीं दे सकूंगा जिसके चलते खुद मुझे भी तकलीफ़ हो। मगर हां, इतना तो उसे ज़रूर मिलेगा जितने में उसे ये एहसास हो सके कि किसी के द्वारा इस तरह ठुकरा दिए जाने से एक इंसान कैसे घुट घुट के जीता है?"
उसकी बातें सुन कर विशाल के समूचे जिस्म में अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
किसी अंजानी आशंका के चलते उसके अंदर थोड़ी घबराहट भी पैदा हो गई थी।
जाने कैसे कैसे ख़याल उसके मन में उभरते चले गए।
उधर अरमान के चेहरे पर अजीब सी सख़्ती छाई हुई थी।
उसके दाहिने हाथ की दो अंगुलियों के मध्य फंसी सिगरेट आधे से ज़्यादा सुलग चुकी थी।
To be continued...
Nice update....Update ~ 12
अशोक की हालत सच में ठीक नहीं थी।
एक्सीडेंट बुरी तरह हुआ था।
शुक्र इस बात का था कि टक्कर विपरीत दिशा से हुई थी और वो दूसरी तरफ ड्राइविंग सीट पर था।
अगर इस तरफ से टक्कर होती तो यकीनन वो ऑन द स्पॉट यमलोक पहुंच गया होता।
हालाकि टक्कर इतनी तेज़ थी कि विपरीत दिशा में होने के बाद भी उसे गहरी चोटें आईं थी।
ये तो उसकी किस्मत थी कि दो लोगों ने फ़ौरन ही उसे हॉस्पिटल ले जाने का प्रबंध कर दिया था वरना ज़्यादा खून बह जाने की वजह से उसका ज़िंदा रहना मुश्किल ही था।
प्रिया और अंकिता जिस वक्त ऑटो से उतर रहीं थी ठीक उसी वक्त एक कार तेज़ी से आ कर ऑटो के पीछे रुकी।
अभी प्रिया ने कार की तरफ देखा ही था कि ऑटो वाले ने उससे किराए के पैसे मांगे।
प्रिया को अब जा कर ध्यान आया कि रोने धोने और मारे हड़बड़ाहट में वो अपना पर्स तो लाना ही भूल गई है।
वो ये सोच कर घबरा उठी कि अब वो ऑटो वाले को पैसे कैसे देगी?
"अरे! प्रिया अच्छा हुआ तू यहीं मिल गई मुझे।" ऑटो के पीछे रुकी कार का दरवाज़ा खोल कर साक्षी उसके पास आते ही बोली──"तेरे फ़ोन करने पर मैं जिस हालत में थी वैसे ही अपने हसबैंड के साथ यहां चली आई। चल जल्दी अंदर।"
"वो...वो साक्षी बात ये है कि इस ऑटो वाले को देने के लिए इस वक्त मेरे पास पैसे ही नहीं हैं।" प्रिया ने झिझकते हुए उससे कहा──"फ़ोन पर जब ऐसी ख़बर सुनी तो किसी बात का होश ही नहीं रह गया था मुझे।"
"ओह! हां समझ सकती हूं।" साक्षी ने फ़ौरन ही अपना पर्स खोला और उसमे से सौ का एक नोट प्रिया की तरफ बढ़ाते हुए कहा──"ये ले, इसे ऑटो वाले को पकड़ा और फ़ौरन अंदर चल।"
कुछ ही देर में तीनों हॉस्पिटल के अंदर पहुंच गए।
अभी वो इधर उधर देख ही रही थी कि साक्षी का पति यानि विशाल अग्निहोत्री भी आ गया।
प्रिया ने एक नज़र उसे देखा।
जबकि साक्षी ने अपने पति से कहा कि वो फ़ौरन पता करे कि प्रिया के हसबैंड को यहां कहां पर भर्ती किया गया है?
विशाल फ़ौरन ही इस काम में लग गया।
जल्दी ही उसने पता लगा लिया और साथ ही डॉक्टर्स से बात भी की।
इस हॉस्पिटल में उसके कुछ जान पहचान वाले डॉक्टर थे इस लिए उसे किसी बात की परेशानी अथवा असुविधा नहीं हुई।
प्रिया और अंकिता बहुत ही ज़्यादा बेचैन और दुखी नज़र आ रहीं थी।
वो एक नज़र अशोक को देख लेना चाहतीं थी।
विशाल ने डॉक्टर से बात की तो डॉक्टर ने बताया कि इस वक्त अशोक से मिलना संभव नहीं है क्योंकि इस वक्त वो आई सी यू में है।
आई सी यू का नाम सुनते ही प्रिया की आंखें एक बार फिर से छलक पड़ीं।
अंकिता भी सिसक उठी।
साक्षी ने दोनों को सम्हाला।
विशाल अपने पहचान के डॉक्टरों से बात चीत करने में लगा हुआ था।
"फ़िक्र मत कर प्रिया।" साक्षी ने प्रिया के कंधे पर हाथ रख कर कहा──"अशोक जी को कुछ नहीं होगा। ऊपर वाले की दया से वो यहां तक पहुंच गए हैं तो आगे भी सब अच्छा ही होगा।"
"पता नहीं ऊपर वाला क्या चाहता है मुझसे?" प्रिया का मन जाने कहां कहां भटक रहा था──"अब तक तो सब ठीक ही था लेकिन अब जाने कहां से ऐसी मुसीबतें और ऐसे दुख मेरे सामने आ खड़े हुए हैं?"
"धीरज रख प्रिया।" साक्षी ने कहा──"तू बिना मतलब की बातें मत सोच। तुझे भी पता है कि दुनिया में कहीं न कहीं किसी न किसी के साथ इस तरह के हादसे होते ही रहते हैं। आज तेरे साथ हुआ है तो कल किसी और के साथ होगा। दुनिया में सबके साथ कुछ न कुछ होता ही रहता है। तू बेकार की बातें मत सोच और ऊपर वाले से प्रार्थना कर कि वो अशोक जी को जल्द से जल्द ठीक कर दें।"
प्रिया सचमुच आंखें बंद कर के मन ही मन ऊपर वाले से प्रार्थना करने लगी।
मासूम अंकिता भी उसे देख कर उसी के जैसे आंखें बंद कर के ऊपर वाले से अपने डैड को जल्दी ठीक कर देने की प्रार्थना करने लगी।
[][][][][]
क़रीब दो घंटे बाद आई सी यू का दरवाज़ा खुला और एक डॉक्टर सफेद कोट पहने तथा हाथों में ग्लव्स पहने बाहर निकला।
विशाल लपक कर उसके क़रीब पहुंचा।
प्रिया, अंकिता और साक्षी भी तेज़ी से उसकी तरफ लपकीं।
"सब ठीक तो है ना डॉक्टर?" विशाल ने उससे पूछा।
डॉक्टर ने विशाल के साथ साथ बाकी तीनों की तरफ देखा।
उसके यूं देखने से प्रिया और अंकिता की सांसें अटक सी गईं।
"डोंट वरी।" तभी डॉक्टर ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"अब वो ख़तरे से बाहर हैं लेकिन....।"
"ल...लेकिन क्या डॉक्टर साहब?" प्रिया ये पूछने से खुद को रोक न सकी।
उसके मन में एकाएक ही तरह तरह के ख़याल उभरने लगे थे।
"हमने तो अपनी तरफ से पूरी ही कोशिश की है।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन पेशेंट को मौत के मुंह से वापस लाने में उस व्यक्ति का भी सबसे ज़्यादा योगदान है जिसने उन्हें समय पर यहां पहुंचाया भी और उन्हें अपना खून भी दिया था।"
"भगवान का लाख लाख शुक्र है।" प्रिया ने मन ही मन उस व्यक्ति के लिए प्रार्थना करते हुए कहा──"मेरे डूबते संसार को उस फ़रिश्ते ने अपना खून दे कर बचा लिया। भगवान उसे हमेशा खुश रखे और उसके जीवन में कभी भी ऐसा संकट न आए।"
"वैसे डॉक्टर वो था कौन?" विशाल ने डॉक्टर से पूछा──"हम ऐसे नेक आदमी से मिलना चाहते हैं।"
"वैसे तो वो एक मामूली सा टैक्सी ड्राइवर था।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन इतना बड़ा काम कर के वो महान बन गया। दुर्भाग्य से हमारे हॉस्पिटल में उस ग्रुप का खून बस थोड़ा ही बचा था। जब उस टैक्सी ड्राइवर को पता चला तो उसने बताया कि उसका खून भी उसी ग्रुप का है जिस ग्रुप के खून की पेशेंट को ज़रूरत थी। अब जबकि वो खुद ही अपना खून देने को तैयार था तो हमने भी देरी नहीं की। इसी लिए मैंने कहा कि वो व्यक्ति महान था और पेशेंट को मौत के मुंह से वापस लाने में उसका बहुत बड़ा हाथ है।"
डॉक्टर के मुख से टैक्सी ड्राइवर की बात सुन जाने क्यों प्रिया को अरमान का ख़याल आ गया।
उसकी धड़कनें अनायास ही तेज़ी से धड़कनें लगीं।
अनायास ही उसके मन में ख़याल उभरा कि कहीं वो टैक्सी ड्राइवर अरमान तो नहीं रहा होगा?
नहीं नहीं, इतना बड़ा इत्तेफ़ाक नहीं हो सकता।
"आपने उस टैक्सी ड्राइवर से उसका नाम पता तो पूछा ही होगा डॉक्टर।" उधर विशाल डॉक्टर से कह रहा था──"हम जानना चाहते हैं उस आदमी के बारे में। इतना बड़ा उपकार करने वाले का हम तहे दिल से धन्यवाद देना चाहते हैं।"
"हमारे पूछने पर उसने सिर्फ इतना ही बताया था कि उसका नाम अरमान है।" डॉक्टर ने कहा──"जी हां यही नाम बताया था उसने──अरमान...जिंदल। उस समय क्योंकि समय कम था इस लिए हमने उसका पता जानने पर ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई थी।"
अरमान नाम सुनते ही प्रिया का दिल धक्क से रह गया।
अभी कुछ पल पहले वो यही सोच रही थी कि इतना बड़ा इत्तेफ़ाक उसके साथ नहीं हो सकता लेकिन ऐसा इत्तेफ़ाक हो चुका था।
अरमान नाम का प्राणी अपना खून दे कर उसके पति की जान बचा चुका था।
प्रिया को समझ न आया कि ऊपर वाला ये कैसी अजीब लीला कर रहा है उसके साथ?
वो सोचने पर मजबूर हो गई कि जब उसके पति का एक्सीडेंट हुआ तो अरमान ही क्यों अपनी टैक्सी में उसे ले कर हॉस्पिटल आया था?
कोई दूसरा क्यों नहीं आया?
क्या ये सिर्फ इत्तेफ़ाक था या ऊपर वाले की कोई लीला?
आख़िर अरमान उस जगह पर कैसे था?
"क्या अब हम उन्हें देख सकते हैं डॉक्टर?" विशाल की आवाज़ से प्रिया का ध्यान भंग हुआ।
"अभी तो फिलहाल आप लोग बाहर से ही उन्हें देख सकते हैं।" डॉक्टर ने कहा──"लेकिन थोड़े समय बाद जब उन्हें दूसरे वार्ड में सिफ्ट कर दिया जाएगा तो आप लोग उन्हें क़रीब से देख सकेंगे। अच्छा, अब मैं चलता हूं।"
डॉक्टर इतना कह कर चला गया।
प्रिया और अंकिता फ़ौरन अशोक को देखने के लिए बेचैन हो उठीं।
यही हाल साक्षी और विशाल का भी था।
वो सब फ़ौरन ही आई सी यू की तरफ बढ़े।
आई सी यू के दरवाज़े के ऊपर लगे ग्लास से सबसे पहले प्रिया और अंकिता ने अंदर झांका।
अंदर बेड पर अशोक आंखें बंद किए लेटा हुआ था।
उसके सिर और माथे के साथ साथ दाईं बाजू पर भी पट्टी बंधी हुई थी।
उसकी ये हालत देख प्रिया और अंकिता की आंखें फिर से छलक पड़ीं।
"अरे! अब क्यों ऐसे रो रही हो तुम दोनों?" पीछे से साक्षी ने कहा──"तुम दोनों की दुआ से देखो ये सही सलामत बच गए हैं। बाकी जो थोड़ी बहुत चोटें हैं वो जल्दी ही ठीक हो जाएंगी।"
साक्षी की इस बात से प्रिया और अंकिता ने आंसू बहाना बंद किया।
वो दोनों जब ग्लास से हटीं तो विशाल और साक्षी ने भी ग्लास से अंदर झांक कर अशोक को देखा।
उसके बाद विशाल ये कह कर चला गया कि वो डॉक्टर से ये पता कर के आता है कि अशोक जी को यहां कब तक रहना होगा?
विशाल के जाने के बाद साक्षी ने प्रिया और अंकिता को एक तरफ रखे बेंच पर बैठाया।
वो खुद भी उनके साथ बैठ गई।
"आज अगर उन्हें कुछ हो जाता तो हम दोनों मां बेटी का क्या होता साक्षी?" प्रिया दुखी भाव से बोल पड़ी──"पहले ही उनकी मां मुझे करमजली और बांझ कह कर जाने क्या क्या सुनाती रहती थीं और आज अगर कोई अनर्थ हो जाता तो जाने क्या हो जाता। अंकिता को तो वो अपने पास रख लेतीं लेकिन मुझे धक्के मार कर अपने घर से निकाल देतीं।"
"ऐसा मत कहिए आंटी।" अंकिता झट से बोल पड़ी──"मैं कभी आपको कहीं नहीं जाने दूंगी। आप जहां जाएंगी मैं भी जाऊंगी।"
"मेरी बच्ची।" प्रिया ने भावना में बह कर अंकिता को खुद से छुपका लिया।
इधर अंकिता की बात सुन साक्षी ये सोचने पर मजबूर हो गई कि अगर सच में ऐसा कोई अनर्थ हो जाता तो प्रिया का सच में क्या होता?
अगर उसकी बात सच मान ली जाए तो क्या सचमुच उसकी सास उसे अपने घर से निकाल देती और क्या उसके साथ अंकिता भी रहती?
साक्षी ये भी महसूस कर रही थी कि प्रिया अशोक और अंकिता के प्रति कुछ ज़्यादा ही जज़्बात रखती है।
हालाकि ये स्वाभाविक ही है क्योंकि अशोक तो उसका पति ही है और अंकिता उसकी सौतेली बेटी है।
एक ऐसी बेटी जिसने आज तक उसे मां नहीं कहा बल्कि हमेशा आंटी ही कहा है।
साक्षी को समझ न आया कि ऐसे में प्रिया क्या इतना आसानी से अशोक को तलाक़ देने का सोच सकेगी?
क्या वो इतनी आसानी से अंकिता जैसी अपनी सौतेली बेटी से मुंह मोड़ सकेगी?
साक्षी को महसूस हुआ कि ये इतना आसान नहीं होगा।
मतलब साफ है कि अभी इसके लिए समय लगेगा।
अभी और ज़्यादा मंथन की ज़रूरत है।
[][][][][]
डॉक्टर ने अशोक को घर ले जाने की इजाज़त नहीं दी थी।
बल्कि उसे क़रीब एक हफ़्ता हॉस्पिटल में ही रखने का मशवरा दिया था।
विशाल ने भी प्रिया से यही कहा कि अशोक जी के लिए यही बेहतर होगा।
बाकी वो किसी बात की फ़िक्र न करें।
साक्षी की दोस्त होने के नाते उसका ये दुख और उसकी इस परेशानी को वो अपनी परेशानी जैसा ही समझता है।
प्रिया को इस बात से बहुत राहत मिली थी।
वो साक्षी जैसी दोस्त पर गर्व महसूस करने लगी थी और साथ ही उसका एहसान भी मानने लगी थी।
विशाल ने उसके सामने ही साक्षी से कहा था कि प्रिया को जिस किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो वो फ़ौरन ही उसे पूरी करे।
प्रिया से भी उसने कहा था कि वो किसी बात के लिए संकोच न करें।
सबके जीवन में दुख दर्द और परेशानियां आती हैं लेकिन मुसीबत में साथ देना ही इंसानियत होती है और एक दोस्त का फर्ज़ होता है।
अशोक को दूसरे दिन होश आया था।
अपने क़रीब प्रिया और अंकिता को देखते ही उसकी आंखें भर आईं थी।
यही हाल प्रिया और अंकिता का भी हुआ था।
अंकिता तो अपने डैड से लिपट कर रोने ही लगी थी।
प्रिया ने बड़ी मुश्किल से अपने आपको सम्हाला हुआ था।
अंकिता की पढ़ाई डिस्टर्ब न हो इसके लिए साक्षी ने उसे बड़े अच्छे तरीके से समझा कर स्कूल जाने के लिए मनाया था।
हालाकि प्रिया का भी इसमें उतना ही हाथ था।
अशोक साक्षी से पहली बार मिला था।
जब उसे पता चला कि साक्षी उसकी बीवी की कॉलेज के समय की दोस्त है तो उसे बड़ी हैरानी हुई और साथ ही खुशी भी।
बहरहाल ऐसे ही समय गुज़रता गया और देखते ही देखते एक हफ़्ता गुज़र गया।
इस बीच एक बात ज़रूर अजीब हुई कि अशोक जब से होश में आया था तो विशाल उससे मिलने एक बार भी नहीं आया था।
ज़ाहिर है अगर वो आता तो अशोक उसे पहचान जाता।
वो ये जान जाता कि ये उसकी कंपनी का वही नौजवान अधिकारी है जिसने उसको गहन परेशानी में डाल रखा है।
हालाकि साक्षी के द्वारा जब उसे उसके पति का नाम विशाल पता चला तो एक बार के लिए उसके मन में उसी नौजवान अधिकारी का ख़याल आ गया था।
फिर उसने ये सोच कर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया कि विशाल नाम के दुनिया में बहुत से लोग हैं।
हालाकि साक्षी से वो अक्सर कहता था कि वो विशाल जी को धन्यवाद देने के इरादे से उनसे मिलना चाहता है।
साक्षी उससे यही कहती कि वो एक ज़रूरी काम से शहर से बाहर गए हुए हैं।
जैसे ही वो आएंगे तो वो उन्हें उससे मिलने आने का ज़रूर बोलेगी।
आख़िर एक हफ्ते बाद अशोक को हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई और वो प्रिया तथा साक्षी के साथ अपने फ्लैट पर आ गया।
अंकिता स्कूल गई हुई थी।
उसके एक्सीडेंट की ख़बर उसकी कंपनी में भी पहुंच गई थी।
कंपनी के कुछ लोग एक दो बार उससे मिलने हॉस्पिटल आए थे।
बाकी के कुछ लोग फ़ोन द्वारा उसका हाल चाल पूछ लेते थे।
सही सलामत अपने घर आ कर अशोक को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका नया जन्म हुआ है।
उसने अपनी बीवी प्रिया और उसकी दोस्त साक्षी को बार बार धन्यवाद दिया।
उसके इलाज़ का सारा खर्च साक्षी के पति विशाल ने उठाया था।
[][][][][]
"तू साले कब तक उस बुढ़ऊ से छुपता फिरेगा?" टैक्सी की पैसेंजर शीट पर बैठे विशाल से अरमान ने कहा──"किसी दिन बढ़िया सा मुहूर्त निकाल कर उसे अपने दर्शन करा ही दे। उस बुढ़ऊ को भी तो पता चले कि वो तू ही है जिसने कंपनी में उसकी सांसें हलक में अटका रखी हैं और एक्सीडेंट में उसके इलाज़ का खर्चा भी तूने ही उठाया है।"
"वो तो उससे मिलना ही पड़ेगा यार।" विशाल ने कहा──"लेकिन तू क्यों सच सच ये नहीं बता रहा कि उसका एक्सीडेंट स्वाभाविक रूप से हुआ था या उसमें तेरी कोई मेहरबानी थी?"
"तुझे ऐसा क्यों लगता है कि ऐसा मैंने करवाया होगा?" अरमान ने इस बार उसे गुस्से से देखा──"तू अच्छी तरह जानता है कि ऐसा घटिया काम करने का सोच भी नहीं सकता मैं। कितनी बार तुझे ये बात बता चुका हूं फिर भी तुझे मेरी बात पर भरोसा क्यों नहीं हो रहा?"
"तो तेरे अनुसार उस रात उसने दारू पी रखी थी?" विशाल ने उसकी तरफ देखते हुए कहा──"और उसके दारू पीने की वजह मैं था? मैं इस लिए क्योंकि मेरी वजह से वो बेहद चिंतित और परेशान था?"
"बिल्कुल।" अरमान ने कहा──"ये तो संयोग था कि उसी समय मैं अपनी टैक्सी से एक सवारी उतार कर उधर से गुज़र रहा था। शोर शराबा और भीड़ भाड़ देख कर मैं भी टैक्सी को एक साइड लगा कर उस तरफ चला गया था। भीड़ को चीर कर जब मैं आगे पहुंचा तो देखा कुछ लोग कार से एक आदमी को निकाल रहे थे। आदमी खून में बुरी तरह नहाए जा रहा था। अचानक मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी तो मैं ये देख के बुरी तरह चौंक गया कि ये तो प्रिया का हसबैंड है। कुछ पलों के लिए तो यकीन ही नहीं हुआ मुझे कि वो प्रिया का हसबैंड है लेकिन सच तो सच ही था। माना कि उससे प्रिया को हासिल करना मेरी आख़िरी ज़िद थी लेकिन इस तरीके से तो हर्गिज़ नहीं। मैंने फ़ौरन ही आगे बढ़ कर उन आदमियों की मदद से उसे अपनी टैक्सी में शिफ्ट किया और फिर जितना जल्दी हो सका उसे अपोलो हॉस्पिटल ले गया। शुक्र था कि एक आदमी मेरे साथ था जिसके चलते डॉक्टर ने ज़्यादा पूछताछ नहीं की और फ़ौरन ही उसे आई सी यू में शिफ्ट कर दिया। इधर उसकी इस हालत के चलते मेरे अंदर भी तूफ़ान चालू था। मुझे उसका मोबाइल उसकी जेब में ही पड़ा मिल गया था इस लिए मैंने डॉक्टर के द्वारा उसकी बीवी यानी प्रिया को फोन करवाया। थोड़ी देर बाद डॉक्टर बाहर आया तो उसने कहा कि उसका खून बहुत ज़्यादा बह गया है और उसके ग्रुप का खून हॉस्पिटल में उस वक्त इतना उपलब्ध नहीं है जितने की उसे ज़रूरत है। डॉक्टर के मुख से ही मैंने सुना था कि उसका ब्लड ग्रुप क्या है। अजब संयोग था क्योंकि मेरा भी वही ब्लड ग्रुप था जो प्रिया के हसबैंड का था। मैंने फ़ौरन ही डॉक्टर को ये बात बताई और उससे कहा कि वो मेरे जिस्म से खून निकाल कर उसको चढ़ाए। बस इतनी सी ही कहानी थी।"
"बड़े आश्चर्य की बात है।" विशाल गहरी सांस लेते हुए बोला──"एक साथ कितने इत्तेफ़ाक हुए। आम तौर पर ऐसा होना इंपॉसिबल है। ख़ैर जो भी हो, अच्छी बात ये है कि तेरी मेहरबानी के चलते प्रिया का हसबैंड बच गया। वैसे हॉस्पिटल में मैंने देखा था कि इस हादसे की वजह से प्रिया बहुत ज़्यादा सदमे में आ गई थी। उस समय उसकी हालत देख कर मैं और साक्षी ये सोचने पर मजबूर हो गए थे कि अगर वो अपने हसबैंड के लिए इतने गहरे जज़्बात रखती है तो फिर कैसे वो उसे तलाक़ देने का सोचेगी और फिर कैसे वो तुझसे शादी करने का सोचेगी?"
"असंभव चीज़ को ही तो संभव बनाना है माई डियर।" अरमान ने एक सिगरेट जलाते हुए कहा──"एंड ट्रस्ट मी, ऐसा चमत्कार ज़रूर होगा।"
"यार मुझे तो ऐसा कहीं से भी नहीं लगता।" विशाल ने कहा──"पता नहीं तुझे इतना यकीन कैसे है?"
"बदले हुए वक्त और हालातों की वजह से इतना यकीन है।" अरमान ने कहा──"तुझे भी पता है कि इंसान जैसे कर्म करता है वैसा ही कर्म फल पाता है। प्रिया ने जो कर्म किया था उसका भुगतान करने के लिए एक न एक दिन इस शहर में लौट कर आना ही उसकी नियति बन चुकी थी। जिस ऐशो आराम की ख़्वाहिश के चलते उसने मुझे ठुकरा कर किसी और से शादी की थी वो ज़्यादा समय तक चलने वाला नहीं था। बड़ी सिंपल सी बात है डियर कि कोई भी इंसान किसी का इस हद तक दिल दुखा कर हमेशा खुश नहीं रह सकता। उसके बुरे कर्म जल्द ही उसकी खुशियों पर ग्रहण लगाते हैं और फिर उसे उस इंसान के सामने ला कर खड़ा कर देते हैं जिसे उसने कभी दुख दिया होता है। प्रिया के साथ कुदरत ने यही तो किया है। साढ़े सात सालों बाद जिस दिन वो मुझे उस फाइव स्टार होटल के बाहर मिली थी उसी दिन मैं समझ गया था कि कुदरत ने उसे इसी लिए मेरे सामने ला कर खड़ा किया है ताकि इस शहर में उसके बुरे कर्म का हिसाब हो सके और उसे ऐसे ऐसे दुख दर्द का एहसास हो सके जिसका उसने कभी तसव्वुर भी न किया हो।"
"यार बड़ी अजीब और ख़तरनाक बातें कर रहा है तू।" विशाल ने हैरानी से अरमान को देखा──"आख़िर क्या चल रहा है तेरे अंदर? प्रिया के प्रति तेरे इरादे कुछ ठीक नहीं लग रहे मुझे।"
"फ़िक्र मत कर।" अरमान ने सिगरेट का लंबा कश खींच कर उसके धुएं को उगलते हुए कहा──"अपनी ज़िंदगी में सिर्फ उसी को तो टूट टूट कर चाहा है मैंने। ज़ाहिर है उसे ऐसी तकलीफ़ तो नहीं दे सकूंगा जिसके चलते खुद मुझे भी तकलीफ़ हो। मगर हां, इतना तो उसे ज़रूर मिलेगा जितने में उसे ये एहसास हो सके कि किसी के द्वारा इस तरह ठुकरा दिए जाने से एक इंसान कैसे घुट घुट के जीता है?"
उसकी बातें सुन कर विशाल के समूचे जिस्म में अजीब सी सिहरन दौड़ गई।
किसी अंजानी आशंका के चलते उसके अंदर थोड़ी घबराहट भी पैदा हो गई थी।
जाने कैसे कैसे ख़याल उसके मन में उभरते चले गए।
उधर अरमान के चेहरे पर अजीब सी सख़्ती छाई हुई थी।
उसके दाहिने हाथ की दो अंगुलियों के मध्य फंसी सिगरेट आधे से ज़्यादा सुलग चुकी थी।
To be continued...