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Thriller ♡ बेरहम इश्क़ ♡

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
81,113
118,980
354
Both update awesome
Araman priya ke sath emotional card khel raha hai, priya ki najro me sabit kar rha hai ki uske thukrane ke bad arman ne apni life narak bana li hai,
Abhi priya majbut hai lekin lagta nhi Arman ke aise emotional attack ke aage rah payegi,
Priya ke ghar me aayi mad kahi arman ka hi koi mohra to nhi jo aage jakr príya ko kamjor krne me help kregi

Shaandar Mast lovely update 💓 💓 🔥

Bahut hi shaandar update diya hai TheBlackBlood bhai....
Nice and lovely update....

Superb start!

Nice and superb update....

Bahut badiya updates bhai

After reading all four parts, I can only say that the readers here missed a story that deserved to be finished. Most people don’t even know the difference between brass and gold. You write with remarkable beauty, brother—and because of such narrow-minded fools, we lost a story worth remembering.

TheBlackBlood Shubham Bhai,

Kya purani baato par mitti daal kar is kahani ko dobara shuru nahi kiya ja sakta he???
Dosto.....Main koi new story start nahi karna chahta. Readers ke dull response ki vajah se jab frustrate ho jata hu to aisi hi harkate karta hu. Main dil se chahta hu ki main jo bhi story likhu wo complete ho....but isme sabse bada sahyog readers ka hota hai. Readers ka sath...unke reviews...and unka motivation hi hota hai jiske kaaran writer ko energy milti hai aur wo story ko continue rakhta hai. So agar aap log sath doge to ye story complete karne ke safar par aage badhu.... :?:

In future main koi bhi new story start nahi karuga...balki jo incomplete hain unhen hi time nikaal kar dhire dhire complete karuga. Meri readers se bas yahi guzarish hai ki sath aur sahyog banaye rakho......Agar aap log chahte hain ki meri adhuri stories complete ho to puri imandari se sath do. Story ke bare me 4 line ka hi sahi lekin feedback do... :declare:


Ham sab apni apni life me kisi na kisi kaaran se busy hain....is liye time ki kami sabke paas hoti hai. Main ye wada nahi kar sakta ki daily update doonga lekin haan....time mila to hapte me do update zarur dene ki koshish karunga...



So guys.....let's start..... :declare:
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
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118,980
354
Update ~ 04




"क्या बात है।" रात खा पी कर प्रिया जब अपने कमरे में पहुंची तो उसके चेहरे पर छाई गंभीरता को भांप कर उसके पति अशोक ने उससे पूछा──"मेड के आ जाने पर भी तुम खुश नहीं दिख रही?"

"ज..जी??" प्रिया एकदम से हड़बड़ा सी गई, फिर जल्दी ही खुद को सम्हाल कर बोली──"मेरा मतलब है ये क्या कह रहे हैं आप? मैं तो खुश ही हूं।"

"ऐसा लग तो नहीं रहा।" अशोक ने अपलक प्रिया को देखते हुए कहा──"बहुत देर से नोटिस कर रहा हूं तुम्हें। मेड के आने के बाद से अब तक मैंने तुम्हारे चेहरे पर खुशी के भाव नहीं देखे। ज़ाहिर है, कोई तो ऐसी बात है जिसकी वजह से तुम्हारा चांद की तरह नज़र आने वाला चेहरा बुझा हुआ और थोड़ा गम्भीर सा नज़र आ रहा है।"

अपने पति अशोक की ये बातें सुनते ही प्रिया ये सोच कर एकदम से घबरा उठी कि उसके चेहरे की गंभीरता अशोक को कहीं ये न समझा दे कि वो अपने पूर्व प्रेमी से दो दो बार मिल चुकी है।

माना कि अशोक उसे बहुत प्यार करता है और उसका हर नाज़ नखरा भी खुशी से सहता है लेकिन पत्नी को अपने पूर्व प्रेमी से मिलने की बात जान लेने के बाद वो यकीनन उससे ख़फा हो सकता है।

उसकी खुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी में पलक झपकते ही तूफ़ान आ सकता है।
उसका पति उसे चरित्रहीन समझ कर उसे घर से भी निकाल सकता है।
उसकी सौतेली बेटी जो उसे भले ही मां कह कर नहीं पुकारती लेकिन सगी मां जैसी ही समझ कर उससे लगाव और स्नेह रखती है, वो ये सब जान कर उससे घृणा करने लगेगी।

प्रिया के मनो मस्तिष्क में पलक झपकते ही ये सारे ख़याल उभरते चले गए और उसकी रूह तक को थर्रा गए।

"क्या हुआ?" अभी वो ये सब सोच कर खुद को सम्हाल ही रही थी कि तभी अशोक की आवाज़ ने फिर से उसे चौंका दिया──"तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही बेबी? देखो, तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं। तुम्हें हर पल खुश देखना चाहता हूं। तुम्हारी हर ख़्वाहिश पूरी करता हूं लेकिन तुम्हारा उतरा हुआ चेहरा देख कर मैं थोड़ा चिंता में पड़ गया हूं। मैं जानना चाहता हूं कि मेरी खूबसूरत क्वीन को आख़िर किस बात ने गंभीर बना दिया है?"

"न...नहीं ऐसी कोई बात नहीं है अशोक।" प्रिया ने धड़कते दिल से कहा──"मेरा यकीन कीजिए मुझे किसी बात ने गंभीर नहीं बनाया है। बात बस इतनी सी थी कि इतने दिनों से घर के काम खुद ही कर रही थी इस लिए थकान थोड़ी ज़्यादा ही हो गई थी। शायद इसी वजह से मेरे चेहरे की रंगत थोड़ी डाउन सी लगी आपको।"

"तुम सच कह रही हो न?"

अशोक ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचते हुए कहा।

"हां बाबा, सच ही कह रही हूं।" अपने पति का स्नेह और प्यार देख प्रिया ने मन ही मन राहत की सांस ली और मुस्कुराते हुए खुद को उसके सुपुर्द करते हुए कहा──"भला इतने केयरिंग पति के रहते मुझे किस बात की फ़िक्र हो सकती है? एक ही बात की थोड़ी तकलीफ़ हो रही थी उसे भी आज आपने दूर कर दी। नाउ, आई एम सो हैप्पी।"

"दैट्स लाईक ए गुड गर्ल।" अशोक उसको अपने ऊपर लिए हुए बेड पर आहिस्ता से लेट गया।

प्रिया का पूरा भार उसके ऊपर आ गया था।
उसके सीने के ठोस उभार अशोक के सीने में मानो धंस से गए थे।
अशोक ने उसकी पीठ और कमर से अपने हाथ हटाए और फिर उसके चेहरे को हौले से थाम कर बड़े प्यार से कहा──"चलो अब तो अपने शहद जैसे होठों को चूम लेने दो।"

"चूम लीजिए।" प्रिया मुस्कुराई──"मैंने कब मना किया है भला?"

"सुबह मना की तो थी तुम।" अशोक उसकी आंखों में झांकता बोला──"कह रही थी कि जब तक मैं मेड ले कर नहीं आऊंगा तब तक तुम मुझे पप्पी नहीं दोगी।"

"हां तो।" प्रिया ने थोड़ी अदा से कहा──"अब अगर आप हर रोज़ मेड लाने का बोल कर भूल जाएंगे तो मैं भी तो थोड़ा गुस्सा दिखाऊंगी ही।"

"अच्छा, ऐसा क्या?" अशोक ने मुस्कुराते हुए कहा──"चलो, अब तो मेड भी आ गई और मेरी जान खुश भी हो गई इस लिए पप्पी के साथ साथ बाकी सब कुछ भी कर सकता हूं ना?"

अशोक की बात का मतलब समझते ही प्रिया के चेहरे पर शर्म की हल्की लाली फैल गई।
उसने शर्म से मुस्कुराते हुए अशोक के सीने में अपना चेहरा छुपा लिया।
अशोक को उसके यूं शर्मा जाने पर उस पर बेहद प्यार आया।
उसके बाद वो आहिस्ता आहिस्ता प्रिया को चूमना शुरू कर दिया।

[][][][][][]

"टैक्सी।"

दूसरे दिन प्रिया ने सड़क पर एक टैक्सी को आते देख हाथ देते हुए आवाज़ दी।
टैक्सी वाले ने उसकी आवाज़ सुनी तो उसकी तरफ टैक्सी ला कर रोक दी।

"अरे वाह!" टैक्सी ड्राइवर जोकि अरमान ही निकला, उसने प्रिया को देखते ही चहक कर कहा──"क्या बात है, आज तो अगर मैं कुछ और भी सोच लेता तो वो भी हो जाता।"

"म...मतलब??" प्रिया टैक्सी ड्राइवर के रूप में अरमान को देख कर पहले तो हैरान हुई फिर उसकी बात सुनते ही बोली।

"एक्चुअली, आज मैं ये सोच रहा था कि काश! रास्ते में मुझे तुम मिल जाओ तो तुम्हें अपनी टैक्सी में बैठा कर ले चलूं।" अरमान ने टैक्सी से बाहर आ कर प्रिया की तरफ देखते हुए कहा──"और देख लो, जो मैं चाह रहा था वही हो गया। तभी तो कह रहा हूं कि आज अगर कुछ और भी सोच लेता तो शायद वो भी हो जाता।"

"तुम कुछ ज़्यादा ही नहीं सोच रहे?" प्रिया ने धड़कते दिल से कहा──"और तुम तो रात में टैक्सी चलाते हो ना तो फिर दिन के इस वक्त टैक्सी में कहां घूम रहे हो?"

"क्या करें डियर, हम जैसे मामूली लोगों का वक्त कहां हमेशा एक जैसा रहता है?" अरमान ने टैक्सी का पिछला दरवाज़ा खोल कर प्रिया से कहा──"कल तुम्हारे जाने के बाद सो गया था। जब आंख खुली तो फील हुआ कि तबीयत कुछ ठीक नहीं है। थोड़ी कमज़ोरी भी फील हो रही थी। इस चक्कर में कल रात टैक्सी ले कर कहीं जा ही नहीं पाया। पास के एक मेडिकल स्टोर से दवा ली और खा कर फिर से सो गया। सुबह जब उठा तो तबीयत बेहतर लगी। अब क्योंकि रात टैक्सी चला कर खर्चे के लिए कुछ कमा नहीं पाया था इस लिए सोचा दिन में ही टैक्सी चला लूं।"

"कुछ तो अपने बारे में सोचो अरमान।" प्रिया को उसकी ख़राब तबीयत का जान कर उसके लिए बहुत बुरा लगा।
एकाएक ही उसे फ़िक्र होने लगी उसकी।

वो झट से खुले दरवाज़े से टैक्सी की पिछली सीट पर बैठ गई।
अरमान ने हौले से मुस्कुराते हुए टैक्सी का पिछला दरवाज़ा बंद किया और फिर घूम कर अपनी ड्राइविंग सीट पर आ गया।
अगले ही पल उसने टैक्सी को आगे बढ़ा दिया।

"तो बताईए मैडम, कहां जाना है आपको?" फिर उसने बैक व्यू मिरर में प्रिया को देखते हुए पूछा।

"किसी अच्छे से हॉस्पिटल में ले चलो।" प्रिया की नज़र भी पीछे से बैक व्यू मिरर में दिख रहे अरमान पर पड़ गई थी।

"ह...हॉस्पिटल???" अरमान हल्के से चौंका──"हॉस्पिटल क्यों? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना?"

"मेरी तबीयत ठीक है।" प्रिया ने बैक मिरर में अरमान पर नज़रें जमाए हुए ही कहा──"लेकिन तुम्हारी ठीक नहीं है इस लिए हॉस्पिटल चलो।"

"अरे! ये...ये क्या कह रही हो तुम?" अरमान एकदम से बौखला सा गया। फिर सम्हल कर बोला──"देखो, मैं बिल्कुल ठीक हूं और वैसे भी हॉस्पिटल में अपना इलाज़ करवाने के लिए पैसे नहीं हैं मेरे पास।"

"पैसे मैं दे दूंगी।" प्रिया ने सपाट लहजे में कहा──"तुम बस हॉस्पिटल चलो।"

"नहीं जाऊंगा।" अरमान ने सहसा सड़क के किनारे टैक्सी रोक दी, फिर मिरर में ही प्रिया को देखते हुए बोला───"और हां, मैं दुनिया के किसी भी इंसान का एहसान अपने ऊपर ले लूंगा लेकिन तुम्हारा नहीं।"

"अ...अरमान ये...ये तुम कैसी बातें कर रहे हो?" अचानक से उसका ये बर्ताव देख प्रिया की आंखें फैल गईं──"तुम सोच भी कैसे सकते हो कि मैं ऐसा तुम पर एहसान करने के लिए कह रही हूं?"

"बहुत खूब।" अरमान व्यंग से मुस्कुरा उठा──"उल्टा चोर कोतवाल को डांटे? ज़रा अपने गिरेबान में झांक कर तो देखो प्रिया। एक बार ज़रा देखो और फिर सोचो कि क्या तुमने ऐसा काम नहीं किया था जो मैं कभी सोच नहीं सकता था? चलो मान लिया कि मेरी हैसियत तुम्हें दुनिया का हर सुख और ऐशो आराम देने की नहीं थी जिसके चलते तुमने एक रईस व्यक्ति से शादी कर ली लेकिन....लेकिन इतने सालों बाद जब उस दिन इत्तेफ़ाक से तुमसे मुलाक़ात हुई तो तुमने कैसा बर्ताव किया था मेरे साथ? पैसे और गुरूर में तुम इतनी अंधी थी कि तुमने उस व्यक्ति का मज़ाक उड़ाया और उसे नीचा दिखाया जो तुम्हें दिलो जान से चाहता रहा है। इतना ही नहीं जिसने तुम्हारे सिवा कभी एक पल के लिए भी किसी दूसरी लड़की को अपने दिल में बैठाने का नहीं सोचा। क्या तुम्हारा वो बर्ताव और तुम्हारे वो कर्म मेरी सोच और उम्मीद से परे नहीं थे?"

प्रिया को फ़ौरन कोई जवाब नहीं सूझा।
अपराध बोध से उसका सिर झुकता चला गया।
सच ही तो कहा था अरमान ने।
उसने एक हफ़्ता पहले अरमान के साथ ऐसा ही तो बर्ताव किया था।

"सुना था औरत को कभी कोई समझ नहीं सकता।" उधर अरमान ने उसे चुप देख अधीरता से कहा──"आज तुम्हारा ये बर्ताव भी मुझे समझ नहीं आ रहा। उस दिन तो तुम मेरी हैसियत और मेरी हालत का मज़ाक उड़ा रही थी और खुद को आसमान से भी ऊंचा दिखा रही थी। कोई कसर नहीं छोड़ी थी मेरे दिल को छलनी छलनी करने में लेकिन अब मुझ पर मेहरबानी करती जा रही हो? भला किस लिए प्रिया? जो इंसान तुम्हारे लेवल का है ही नहीं उससे अचानक से ऐसा लगाव क्यों? उसकी भलाई के बारे में सोचना क्यों? उसके लिए फ़िक्र क्यों?"

प्रिया को अब भी कोई जवाब नहीं सूझा।
उसकी जुबान को जैसे ताला लग गया था।
सिर झुकाए वो ख़ामोशी से अरमान की बातें सुनती रही।
हां, उसके दिलो दिमाग़ में ज़बरदस्त हलचल ज़रूर मच गई थी।

"एक बात अच्छी तरह समझ लो प्रिया।" अरमान ने पुनः कहा──"मैं कल भी तुम्हें दिलो जान से प्यार करता था, आज भी करता हूं और आगे भी हमेशा करता रहूंगा। दुनिया का कोई भी व्यक्ति अथवा दुनिया की कोई भी ताक़त मेरे दिलो दिमाग़ से तुम्हारे प्रति इस चाहत को निकाल नहीं सकती। मैं जैसा हूं आगे भी वैसा ही रहूंगा। तुम्हें मेरी हालत पर तरस खा कर मुझ पर कोई एहसान करने की कोई ज़रूरत नहीं है और ना ही मुझ पर कोई हक़ जताने की ज़रूरत है।"

"म...मैं मानती हूं अरमान कि तुम्हें ठुकरा कर मैंने तुम्हारे साथ बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया था।" प्रिया ने थोड़ा दुखी हो कर कहा──"शायद उस समय मैं ज़रूरत से ज़्यादा ही मतलबी हो गई थी। तभी तो तुम्हारे बारे में ये तक नहीं सोचा था कि मेरे द्वारा इस तरह ठुकरा दिए जाने पर तुम्हारे दिल पर क्या गुज़रेगी। उस समय तो मेरे अंदर बस एक ही ख़्वाहिश थी कि मेरी शादी एक ऐसे व्यक्ति से हो जो अमीर हो और जो मुझे दुनिया का हर ऐशो आराम दे। उसके बाद जब सच में मेरी ख़्वाहिश पूरी हो गई तो उस खुशी में मुझे ये पता ही नहीं चला कि कब मेरे अंदर अमीरी का गुरूर आ कर घर कर गया। इतने सालों बाद जब तुम उस दिन मुझे मिले तो जाने कैसे मैं तुमसे वो सब कहती चली गई? तुम्हें और तुम्हारी हालत को देख कर उस समय मेरे अंदर शायद ये सोच कर ऐसी वाहियात भावना पैदा हो गई थी कि वो तुम ही थे जिससे मैं शादी करने वाली थी और हर चीज़ के लिए खुद को मोहताज बना लेने वाली थी। शुक्र था कि मैंने सही समय पर अपना इरादा बदल कर तुमसे शादी नहीं की, बल्कि एक अमीर व्यक्ति से की जिसके चलते आज मैं किसी रानी की तरह ऐश कर रही हूं। हां अरमान, उस समय मेरे अंदर ऐसी ही भावनाएं प्रबल रूप से उभर आईं थी और फिर मैंने वो सब कह कर तुम्हारा दिल दुखा दिया था। बाद में अपने घर जा कर जब मैंने तुम्हारे और अपने बारे में गहराई से सोचा तो एहसास हुआ कि मुझे वो सब नहीं कहना चाहिए था। वो भी एक ऐसे इंसान से जो आज भी मुझ जैसी मतलबी और बेवफ़ा लड़की से प्यार करता है और आज तक अपनी दुनिया नहीं बसाई। यकीन करो अरमान, जब ये एहसास हुआ तो मुझे अपने उस बर्ताव पर बहुत गुस्सा आया और तुम्हारे लिए बहुत दुख हुआ। रात भर नींद नहीं आई। मैंने फ़ैसला किया कि तुम्हारे घर आ कर तुमसे अपने उस बर्ताव की माफ़ी मांगूंगी।"

"ठीक है।" अरमान ने कहा──"मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया है। अब तुम वापस अपनी दुनिया में लौट जाओ। मेरे बारे में सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है तुम्हें।"

"ऐसा मत कहो प्लीज़।" प्रिया का गला भर आया। याचना सी करती हुई बोली──"देर से ही सही मुझे ये एहसास हो गया है कि मैंने तुम्हारे साथ बहुत ग़लत किया है। अपनी उस ग़लती का किसी तरह पश्चाताप करना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि तुम पिछला सब कुछ भुला कर एक नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करो। किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपना घर बसा लो। अगर तुम ऐसा कर लोगे तो मुझे सच में बहुत खुशी होगी वरना मुझे यही दुख तड़पाता रहेगा कि मेरी वजह से तुमने अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर ली अथवा ये कहूं कि मैंने तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी है। प्लीज़ अरमान, मैं तुमसे हाथ जोड़ कर विनती करती हूं। प्लीज़ आख़िरी बार मेरी ये इच्छा पूरी कर दो।"

"नो, नेवर।" अरमान ने पूरी मजबूती से इंकार में सिर हिला कर कहा──"तुम आज भी सिर्फ अपनी खुशी के बारे में ही सोच रही हो प्रिया। तुम चाहती हो कि मैं अपनी हालत सुधार लूं ताकि तुम्हें किसी प्रकार का अपराध बोध न रहे और तुम चैन से खुशी खुशी अपनी दुनिया में ऐशो आराम के साथ जी सको। वाह! प्रिया, कितना अजब सितम कर रही हो मुझ पर। एक बार भी ये नहीं सोच रही कि तुम्हारे सिवा दुनिया की किसी भी दूसरी औरत से मुझे कोई खुशी हासिल ही नहीं हो सकती। मामला मेरे दिल का है प्रिया। इस दिल ने अपने अंदर सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी चाहत को पनाह दे रखा है। उसको किसी और के बारे में सोचना गवारा ही नहीं है। अब तुम ही बताओ ऐसे में भला मैं कैसे अपनी दुनिया को नए सिरे से शुरू करूं?"

"ह...हां मैं ये समझती हूं अरमान।" प्रिया उसकी दीवानगी देख अंदर तक कांप गई, फिर बोली──"लेकिन ये भी समझती हूं कि इंसान जब किसी के साथ बंधन में बंध जाता है तो देर सवेर उससे लगाव हो ही जाता है और फिर देर सवेर वो लगाव प्रेम में भी बदल जाता है। तुम एक बार किसी लड़की से शादी तो करो। मुझे पूरा यकीन है कि तुम्हारे दिल में उस लड़की के प्रति भावनाएं ज़रूर पैदा हो जाएंगी।"

"जानता हूं।" अरमान ने कहा──"लेकिन मैं ऐसा करना ही नहीं चाहता। मैं वो काम करना ही नहीं चाहता जिसकी वजह से मेरे दिल में तुम्हारे सिवा किसी दूसरे के लिए प्रेम जैसी कोमल भावनाएं जन्म ले लें। इस जन्म में तो अब मरते दम तक सिर्फ तुम्हीं से मोहब्बत करूंगा और तुम्हारी दर्द देने वाली यादों के साथ ही पूरा जीवन गुज़ारूंगा।"

प्रिया आश्चर्य चकित सी देखती रह गई उसे।
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अरमान के अंदर उसके प्रति ऐसी दीवानगी हो सकती है।
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अरमान ऐसी सोच रख सकता है।

"तुम मेरी फ़िक्र मत करो।" उधर अरमान ने होठों पर फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"अगर मेरे बारे में सोचोगी तो ज़िंदगी को ऐशो आराम के साथ नहीं काट पाओगी। तुम अपनी दुनिया में खुश रहो। एक बात और, मेरी भलाई के लिए और मुझे सुधारने के लिए तुम चाहे कुछ भी कर लो लेकिन तुम इसमें कामयाब नहीं हो पाओगी। मैं सिर्फ उसी के साथ अपनी दुनिया बसाऊंगा जिसे मैं आज भी टूट टूट कर प्यार करता हूं, यानि तुमसे। तुम मेरी हो नहीं सकती और मैं किसी और का बनना नहीं चाहता। तुम बेकार में ही ये सब कर रही हो। जाओ, वापस अपनी दुनिया में लौट जाओ। मैं ये भी नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हारी शादीशुदा ज़िंदगी में ज़रा सा भी भूचाल आए।"

प्रिया को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका ज़हन एकदम से कुंद पड़ गया है।
उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि अब वो अरमान से क्या कहे?
उसके दिलो दिमाग़ में ज़बरदस्त हलचल मची हुई थी।
उसे ऐसा लगने लगा जैसे एकाएक वो किसी मजधार में फंस गई है जहां से निकलना उसके लिए बड़ा ही मुश्किल लग रहा है।

उसने दुखी मन से एक नज़र अरमान की तरफ डाली और फिर दरवाज़ा खोल कर टैक्सी से उतर गई।
अरमान ने उससे कुछ नहीं कहा।
यहां तक कि जब वो बिना कुछ बोले एक तरफ को चल पड़ी तो उसने उसे रोका तक नहीं।
किंतु....उसे जाता देख उसके होठों पर रहस्यमय मुस्कान ज़रूर उभर आई।
Update ~ 05



"ये सब करने का फ़ायदा क्या होगा भाई?" विशाल ने अरमान की तरफ देखते हुए पूछा──"तेरे प्लान के अनुसार तो वो तेरे क़रीब आ ही रही थी फिर तूने ऐसा बोल कर उसे खुद से दूर हो जाने वाला काम क्यों कर दिया? क्या तुझे नहीं लगता कि तेरे द्वारा इतनी बेरुखी से दुत्कारे जाने पर अब शायद ही वो दुबारा तुमसे मिलने का सोचेगी?"

"उसे इस तरह से दुत्कारना और उसे उसके कर्मों का एहसास करवाना ज़रूरी था माय डियर।" अरमान ने सिगरेट का गाढ़ा धुआं हवा में उड़ाते हुए कहा──"इंसान को जब अपनी ग़लतियों का अथवा अपने बुरे कर्मों का गहराई से एहसास होता है तभी उसे अपने कर्मों के तहत अपराध बोध होता है। तभी उसके अंदर प्रबल रूप से पश्चाताप की भावना पैदा होती है जो उसे वो करने पर विवश करती है जो सामान्य अवस्था में वो कर ही नहीं सकता। प्रिया को अपने कर्मों का आभास तो हो गया है और वो मान भी चुकी है कि उसने मेरे साथ अच्छा नहीं किया था लेकिन अभी इस भावना में उतनी शिद्दत नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि उसके अंदर अपराध बोध इस क़दर पैदा हो जाए कि पश्चाताप करने के लिए वो किसी भी हद को पार कर जाए।"

"इससे होगा क्या?"

"वही जो मैं चाहता हूं।" अरमान हल्के से मुस्कुराया──"आई मीन, एक दिन ऐसा आएगा जब वो खुद मेरी बनने के लिए बेचैन हो जाएगी। वो खुद कहेगी कि मैं अपने पति को तलाक़ दे कर तुमसे विवाह करूंगी।"

"ये तो असंभव बात बोल रहा है तू।" विशाल ने आश्चर्य से आंखें फैला कर कहा──"जिस लड़की ने सिर्फ अपने सुखों का सोच कर एक रईस व्यक्ति से शादी की वो उस ऐशो आराम को त्याग कर तुमसे शादी क्यों करेगी? मेरा ख़याल यही है कि उसे अपनी ग़लतियों का एहसास तो है और वो तुम्हारी हालत को ठीक भी करना चाहती है लेकिन सिर्फ इस लिए क्योंकि उसे तुमसे हमदर्दी है।"

"मुझे पता है कि तू इस वक्त मेरी बात का यकीन नहीं कर सकता।" अरमान ने कहा──"इस लिए तू ख़ामोशी से बस देखता जा। ऐसा दिन जल्द ही आएगा जब तुझे असंभव लगने वाली ये बात संभव में बदलती दिखेगी।"

"ख़ैर, अब आगे क्या?" विशाल ने गहरी सांस ली──"मेरा मतलब है कि तूने तो उसे दुत्कार दिया है तो अब इसके बाद क्या करेगा तू।"

"मैं कुछ नहीं करूंगा।" अरमान ने ऐश ट्रे में सिगरेट को बुझाते हुए कहा──"बल्कि जो कुछ करेगी वही करेगी। बाकी प्लान वैसा ही चलता रहेगा जैसा बनाया गया है।"

[][][][][]

प्रिया बहुत दुखी थी।
उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि आज अरमान इस तरह कड़वे शब्द बोल कर तथा उसकी ग़लतियों का एहसास करवा के उसे दुत्कार देगा।

अरमान का ऐसा रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था।
वो तो ऐसा था जो हर पल सिर्फ और सिर्फ उसी की खुशी के लिए जीता था।
भले ही उसकी हैसियत ठीक नहीं थी लेकिन उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने की जुर्रत करता था।

प्रिया के कानों में बार बार अरमान के वो कड़वे शब्द गूंज उठते थे और उसे अंदर तक झकझोर देते थे।
वो ये मानती थी कि अरमान की ऐसी हालत के लिए सिर्फ वो ही ज़िम्मेदार है और इसी लिए वो उसके लिए कुछ करने का मन बना चुकी थी लेकिन आज जिस तरह से अरमान उससे पेश आया था उसके चलते खुद उसका सीना छलनी छलनी हो गया था।

उसे इस बात का इतना दुख नहीं था कि अरमान ने उसे ऐसा बोला और दुत्कारा बल्कि इस बात का दुख हो रहा था कि वो अरमान की बेहतरी के लिए खुल कर कुछ कर नहीं सकती।

अरमान उसे कुछ करने ही नहीं दे रहा।
एक तरफ तो वो कहता है कि वो आज भी उसे टूट कर प्यार करता है लेकिन अपनी उसी मोहब्बत को कड़वे शब्द बोल कर उसे दुख भी देता है।
मोहब्बत में ऐसा तो नहीं होता।
मोहब्बत करने वाले तो अपने महबूब को चोट पहुंचाने का सोच तक नहीं सकते फिर अरमान ये कैसी मोहब्बत कर रहा है उससे कि वो उसे ऐसे हर्ट कर रहा है?

प्रिया हर बार अपने ज़हन से इन ख़यालों को निकालने की कोशिश करती मगर ये ख़याल बार बार उसके मन में उभर आते और फिर उसे तड़पाना शुरू कर देते।

"क्या हुआ प्रिया?" उसके अंदर से किसी ने उसे पुकारा──"तू एक ऐसे व्यक्ति के लिए दुखी क्यों है जो आज के समय में तेरा कुछ लगता ही नहीं है? तू सिर्फ अपने घर परिवार के बारे में सोच। अपने अतीत से जुड़ेगी तो बहुत बुरा अंजाम भुगतेगी तू।"

"जानती हूं।" प्रिया ने अपने अंदर की प्रिया को जवाब दिया──"लेकिन मैं ये कैसे भुला दूं कि मैंने उसके साथ ग़लत किया है? मैं इस सच्चाई को कैसे नकार दूं कि उसने मेरी वजह से अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली है? मैं ये कैसे भुला दूं कि एक हफ़्ते पहले जब वो इतने सालों बाद मुझे अचानक से मिला था तो मैंने सामान्य भाव से उसका हाल चाल पूछने के बजाय उसको बुरा भला कह कर उसका दिल दुखाया था?"

"जब बात अपने खुशहाल परिवार के बिखरने की आती है।" अंदर की प्रिया ने जैसे उसे समझाया──"तो इंसान को सबसे पहले अपने और अपने परिवार की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। जैसे अब तक तू उसे भूली हुई थी वैसे ही आगे भी उसे भूली रह। माना कि तूने उसका दिल दुखाया था और तेरी वजह से उसने खुद को बर्बाद किया लेकिन इसमें सारा दोष सिर्फ तेरा ही तो नहीं है। दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी अपने को धोखा दे कर अपने हित के लिए किसी और से विवाह कर लेते हैं। दुनिया ऐसे ही मतलबी लोगों से भरी पड़ी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इतने सालों बाद तू उससे मिले और फिर ऐसे चक्कर में फंस कर अपने खुशहाल परिवार पर संकट पैदा कर ले। तुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो तूने अरमान से अपनी उस ग़लती की माफ़ी मांग ली, इतना ही नहीं अपनी तरफ से ये कोशिश भी की कि वो सब कुछ भुला कर नए सिरे से अपना जीवन शुरू करे। अब अगर वो तेरी बात नहीं मान रहा और अपनी ज़िद पर ही अड़ा हुआ है तो इसमें भला तू क्या कर सकती है? तूने अपना फर्ज़ निभा दिया, अब ये उस पर निर्भर करता है कि वो अपने लिए क्या चाहता है। मैं यही कहूंगी कि अब तू उसका ख़याल छोड़ कर सिर्फ अपने परिवार की तरफ ध्यान दे।"

प्रिया को समझ न आया कि अब वो अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दे?
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि उसकी अंतरात्मा ने जो कुछ कहा था वो सच था और हर तरह से वाजिब भी था।

सच ही तो है कि उसने अपना कर्म कर दिया है, अब अगर इतने पर भी अरमान अपनी दुनिया को संवारना नहीं चाहता तो इसमें भला वो क्या कर सकती है?
मतलब साफ है, उसे अब अपने परिवार के बारे में ही सोचना चाहिए।
अरमान का ख़याल अपने दिलो दिमाग़ से निकाल देना चाहिए।

प्रिया ने एक गहरी सांस ली और सचमुच अपने दिलो दिमाग़ से अरमान के ख़यालों को निकालने की कोशिश में लग गई।
मगर....
बार बार कोशिश करने के बाद भी वो अरमान के ख़यालों को अपने दिलो दिमाग़ से निकाल नहीं पाई।
बुरी तरह झुंझला उठी वो।
चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे।

खुद को बहलाने के लिए उसने टीवी चालू कर लिया।
टीवी में कोई सीरियल आ रहा था लेकिन प्रिया की निगाहें टीवी स्क्रीन पर होते हुए भी स्क्रीन पर नहीं थी।
उसने रिमोट से चैनल बदलना शुरू कर दिया।
हर चैनल में अलग अलग प्रोग्राम चालू थे लेकिन प्रिया किसी भी चैनल पर नहीं रुकी।
अंत में झुंझला कर उसने रिमोट से टीवी बंद कर दिया।

वो बुरी तरह परेशान और आहत सी हो गई थी।
घर में इस वक्त वो अकेली ही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अरमान के ख़यालों से उसे कैसे मुक्ति मिले?

[][][][][]

"मे आई कम इन सर!" अशोक खत्री ने एक केबिन के दरवाज़े को हल्का सा खोल कर अंदर झांकते हुए कहा।

"यस कम इन।" शानदार केबिन के अंदर ऊंची पुश्त वाली रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे एक कसरती बदन वाले किन्तु हैंडसम नौजवान ने कहा।

अशोक केबिन के अंदर दाख़िल हुआ।
पीछे कांच का दरवाज़ा अपने आप ही बंद हो गया।
अशोक की नज़र टेबल के उस पार अपनी चेयर पर बैठे नौजवान पर पड़ी।

अशोक से उमर में वो काफी छोटा था लेकिन पद उससे कहीं बड़ा था इस लिए अशोक के अंदर थोड़ी झिझक और थोड़ी घबराहट थी।
उसने सुन रखा था कि ये नौजवान थोड़ा कड़क है और कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी है।

"प्लीज़ हैव ए सीट मिस्टर खत्री।" उस नौजवान ने अशोक को उसके सर नेम से संबोधित करते हुए कहा।

हालाकि उसका लहजा सपाट था।
एकदम भावहीन।
बहरहाल, अशोक खत्री धड़कते दिल के साथ आगे बढ़ा और टेबल के इस पार रखी तीन चेयर्स में से एक पर जा कर बैठ गया।

"सो, मिस्टर खत्री।" उसके बैठते ही उस नौजवान ने टेबल पर रखी कुछ फाइल्स में से एक पर से नज़र हटा कर उसकी तरफ देखा──"अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो आपको हमारी इस कंपनी में ज्वॉइन हुए लगभग एक महीना होने वाला है, राइट?"

"य...यस सर।" अशोक खत्री ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए जल्दी से कहा।

"आपने यहां ज्वाइन होने से पहले अपनी जो भी शर्तें रखीं थी।" उस आकर्षक से नौजवान ने अपलक अशोक की तरफ देखते हुए सपाट लहजे में ही कहा──"उन शर्तों को हमने माना और आपको आपके मन मुताबिक सैलरी देने को राज़ी हुए, राइट?"

"ज...जी जी बिल्कुल सर।"

अशोक को समझ नहीं आ रहा था कि सामने बैठा आकर्षक नौजवान आख़िर उससे कहना क्या चाहता है?
उसका जी चाहा कि असल बात पूछे लेकिन उसकी हिम्मत न पड़ी।

"उसके बदले आपने ये वादा किया था कि आप कम ज़िंक खर्च कर के बेहतर पाइप्स जी-आई कर के देंगे और कंपनी का फ़ायदा करवाएंगे।" सामने बैठे नौजवान ने जैसे अब जा कर असल मुद्दे की बात की──"जबकि असल में ऐसा आप अब तक नहीं कर पाए। आपकी अब तक की सारी रिपोर्ट मैंने देख ली है और ये जाना है कि आप उस व्यक्ति से भी ज़्यादा ज़िंक खर्च कर रहे हैं जो आपसे पहले यहां जी-आई के इंचार्ज पद पर था। हफ़्ते दस दिन का तो समझ में आता है मिस्टर खत्री लेकिन एक महीना होने को आया और अभी भी आप इस मामले में कुछ नहीं कर पाए।"

"म...मुझे पता है सर कि ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है।" अशोक ने अपना बचाव करते हुए मानो खुद की पैरवी की──"और इसके लिए मैं हद से ज़्यादा प्रयास भी कर रहा हूं लेकिन इसके बाद भी ज़िंक के खर्चे में कमी नहीं आ रही। असल में समस्या ये है कि जो नए वॉचमैन आए हैं उनको कितना भी समझाएं लेकिन वो सही से काम नहीं कर पा रहे। दूसरी समस्या ये है कि मटेरियल भी ख़राब आ रहा है जिसके चलते ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है। जिन पटरों से पाईप बनाए जा रहे हैं वो काफी ख़राब हैं। उनमें खुरदुरापन है जिसके चलते वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में कवर कर लेते हैं। एक्सपोर्ट के माल के लिए तो कोईल का मटेरियल चाहिए जो ज़िंक भी कम कवर करे और पाईप में शाइनिंग भी टॉप क्लास की दिखे।"

"आपके आने से पहले भी एक्सपोर्ट के माल के लिए ऐसा ही मटेरियल प्रयोग होता था मिस्टर खत्री।" सामने बैठे नौजवान ने कहा──"और जी-आई होने पर ज़िंक भी कम खर्च होता था। वेल, अगर ऐसा ही हाल रहा और ज़िंक की लागत में आप कमी नहीं कर पाए तो खुद सोचिए कि कंपनी में आपको रखने का क्या फ़ायदा? उम्मीद करता हूं कि आप एग्रीमेंट में किए गए अपने वायदे और दावे पर खरा उतरेंगे अदरवाइज़ कंपनी आपके खिलाफ़ कड़ा एक्शन लेने पर मजबूर हो जाएगी।"

नौजवान अधिकारी की ये बात सुन कर अशोक खत्री पलक झपकते ही सन्नाटे में आ गया।
उसकी धड़कनें अब किसी हथौड़े की तरह उसकी कनपटी को बजाने लगीं थी।
इतना तो वो भी जानता था कि ज़िंक की लागत में उसके हर प्रयास के बाद भी कोई कमी नहीं आ रही है।

ये सच है कि मटेरियल अच्छा नहीं मिल रहा है और वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में समेट ले रहा है लेकिन नौजवान अधिकारी के अनुसार ऐसा ही मटेरियल उसके आने से पूर्व भी मिलता था और उनमें ज़िंक उससे कम ही लग रहा था।

खत्री को समझ नहीं आ रहा था कि ज़िंक की लागत को कैसे कम करे?
अगर यही हाल रहा तो निश्चित ही उसकी नौकरी ख़तरे में पड़ जानी है।
उसे इस मामले में कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।

"आई होप, एवरीथिंग विल बी ऑल राइट मिस्टर खत्री।" उसकी सोचो को भंग करते हुए उस आकर्षक नौजवान ने कहा──"यू मे गो नाउ।"

अशोक खत्री चेयर से उठा और भारी क़दमों के साथ केबिन से बाहर आ गया।
उसने राहत की लंबी सांस ली लेकिन माथे पर से चिंता की लकीरें न मिटा सका।
थोड़ी ही देर में वो जी-आई वाले प्लांट की तरफ बढ़ता चला जा रहा था।

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"अरे! आज आने में इतनी देर क्यों लगा दी आपने?" प्रिया ने दरवाज़ा खोलते ही बाहर खड़े अपने पति से पूछा।

"क्या करें हो गई देर।" अशोक ने अजीब भाव से कहा──"काम में ये सब तो होता ही है।"

प्रिया ने महसूस किया कि आज उसके पति के चेहरे की चमक ग़ायब है।
बेहद निराश और थका थका सा नज़र आ रहा है वो।
प्रिया का जी चाहा कि पूछे मगर फिर उसने ये सोच कर अपना इरादा बदल लिया कि अभी तो उसका पति आया है और उसके आते ही उससे उसकी परेशानी का सबब पूछना ठीक नहीं होगा।

खा पी कर अशोक अपने कमरे में सोने चला गया था जबकि प्रिया जूठे बर्तन उठा कर किचन में रखने लगी थी।
उसके मन में बार बार यही ख़याल उभर रहा था कि आज उसके पति के चेहरे पर चमक क्यों नहीं है?
आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसके चलते उसका पति आज इतना निराश और थका हुआ सा लग रहा है?

जल्दी ही काम से फारिग़ हो कर प्रिया अपने कमरे में अशोक के पास पहुंच गई।
उसने खड़े खड़े ही ध्यान से अशोक की तरफ देखा।

अशोक बेड पर लेटा हुआ था।
उसका एक हाथ कोहनी से मुड़ा हुआ था और ऊपर उसके माथे पर कलाई के साथ रखा हुआ था।
आंखें बंद तो थीं लेकिन स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वो आंखें बंद किए किन्हीं गहरे विचारों में खोया हुआ है।
ये देख प्रिया के माथे पर शिकन उभर आई।

"क्या बात है अशोक?" फिर उसने बेड पर अशोक के बिल्कुल पास बैठ कर पूछा──"आज आप इतने टेंशन में क्यों दिख रहे हैं? आख़िर बात क्या है?"

"आं...क..कुछ नहीं।" अशोक ने खुद को सम्हालते हुए कहा──"बस ऐसे ही काम के बारे में सोच रहा था। तुम सुनाओ, नई मेड सही से काम कर रही है कि नहीं?"

"हां वो तो कर रही है।" प्रिया ने अशोक को ध्यान से देखते हुए कहा──"लेकिन आप मुझसे कुछ छुपा रहे हैं। आते समय ही मैंने आपके चेहरे पर परेशानी देखी थी और अभी भी आप आंखें बंद किए कुछ ऐसा सोचने में गुम थे जो शायद आपकी चिंता का कारण बना हुआ है। बताइए ना, आख़िर बात क्या है?"

प्रिया अपने पति से उसकी परेशानी जानने पर इस लिए भी ज़ोर दे रही थी क्योंकि पति को कुछ सोचते देख वो ये सोच कर खुद भी परेशान हो गई थी कि कहीं उसके पति को पता तो नहीं चल गया कि वो अपने पूर्व प्रेमी से मिली थी?

"ऐसी कोई बात नहीं है बेबी।" अशोक ने उठ कर प्रिया के चेहरे को हल्के से सहलाते हुए कहा──"असल में आज कल काम का प्रेशर थोड़ा बढ़ गया है इस लिए काम के प्रति थोड़ी चिंता और थकावट हो रही है। बाकी कोई बात नहीं है।"

"सच कह रहे हैं ना?" प्रिया ने जैसे आश्वस्त होने की गरज से पूछा।

"हां मेरी जान, मैं सच ही कह रहा हूं।" अशोक ने कहा और थोड़ा सा आगे बढ़ कर प्रिया के गुलाबी होठों को चूम लिया।

उसकी इस क्रिया से प्रिया जहां एक तरफ आश्वस्त हो गई वहीं दूसरी तरफ हल्का सा शर्मा भी गई।
बहरहाल, इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई।

अशोक मानसिक तनाव में था जिसे उसने प्रिया से छुपा लिया था।
उसने दूसरी तरफ करवट ली और आंखें बंद कर के सोने की कोशिश करने लगा।

प्रिया के लिए ये सामान्य बात थी।
अशोक उमर में उससे काफी बड़ा था जिसके चलते दोनों के बीच हर रात काम क्रीड़ा नहीं होती थी।

अशोक ने दूसरी तरफ करवट ली तो प्रिया ने भी उसकी फ़िक्र छोड़ आंख बंद कर के सोने की कोशिश करने लगी।
कुछ ही देर में उसका भटकता हुआ मन एक बार फिर अरमान की तरफ जा पहुंचा।
अगले ही पल जब अरमान के ख़याल उभरने शुरू हुए तो वो एक बार फिर से परेशान हो उठी।
रात बड़ी मुश्किल से उसकी आंख लगी।
 

Rekha rani

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"ये सब करने का फ़ायदा क्या होगा भाई?" विशाल ने अरमान की तरफ देखते हुए पूछा──"तेरे प्लान के अनुसार तो वो तेरे क़रीब आ ही रही थी फिर तूने ऐसा बोल कर उसे खुद से दूर हो जाने वाला काम क्यों कर दिया? क्या तुझे नहीं लगता कि तेरे द्वारा इतनी बेरुखी से दुत्कारे जाने पर अब शायद ही वो दुबारा तुमसे मिलने का सोचेगी?"

"उसे इस तरह से दुत्कारना और उसे उसके कर्मों का एहसास करवाना ज़रूरी था माय डियर।" अरमान ने सिगरेट का गाढ़ा धुआं हवा में उड़ाते हुए कहा──"इंसान को जब अपनी ग़लतियों का अथवा अपने बुरे कर्मों का गहराई से एहसास होता है तभी उसे अपने कर्मों के तहत अपराध बोध होता है। तभी उसके अंदर प्रबल रूप से पश्चाताप की भावना पैदा होती है जो उसे वो करने पर विवश करती है जो सामान्य अवस्था में वो कर ही नहीं सकता। प्रिया को अपने कर्मों का आभास तो हो गया है और वो मान भी चुकी है कि उसने मेरे साथ अच्छा नहीं किया था लेकिन अभी इस भावना में उतनी शिद्दत नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि उसके अंदर अपराध बोध इस क़दर पैदा हो जाए कि पश्चाताप करने के लिए वो किसी भी हद को पार कर जाए।"

"इससे होगा क्या?"

"वही जो मैं चाहता हूं।" अरमान हल्के से मुस्कुराया──"आई मीन, एक दिन ऐसा आएगा जब वो खुद मेरी बनने के लिए बेचैन हो जाएगी। वो खुद कहेगी कि मैं अपने पति को तलाक़ दे कर तुमसे विवाह करूंगी।"

"ये तो असंभव बात बोल रहा है तू।" विशाल ने आश्चर्य से आंखें फैला कर कहा──"जिस लड़की ने सिर्फ अपने सुखों का सोच कर एक रईस व्यक्ति से शादी की वो उस ऐशो आराम को त्याग कर तुमसे शादी क्यों करेगी? मेरा ख़याल यही है कि उसे अपनी ग़लतियों का एहसास तो है और वो तुम्हारी हालत को ठीक भी करना चाहती है लेकिन सिर्फ इस लिए क्योंकि उसे तुमसे हमदर्दी है।"

"मुझे पता है कि तू इस वक्त मेरी बात का यकीन नहीं कर सकता।" अरमान ने कहा──"इस लिए तू ख़ामोशी से बस देखता जा। ऐसा दिन जल्द ही आएगा जब तुझे असंभव लगने वाली ये बात संभव में बदलती दिखेगी।"

"ख़ैर, अब आगे क्या?" विशाल ने गहरी सांस ली──"मेरा मतलब है कि तूने तो उसे दुत्कार दिया है तो अब इसके बाद क्या करेगा तू।"

"मैं कुछ नहीं करूंगा।" अरमान ने ऐश ट्रे में सिगरेट को बुझाते हुए कहा──"बल्कि जो कुछ करेगी वही करेगी। बाकी प्लान वैसा ही चलता रहेगा जैसा बनाया गया है।"

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प्रिया बहुत दुखी थी।
उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि आज अरमान इस तरह कड़वे शब्द बोल कर तथा उसकी ग़लतियों का एहसास करवा के उसे दुत्कार देगा।

अरमान का ऐसा रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था।
वो तो ऐसा था जो हर पल सिर्फ और सिर्फ उसी की खुशी के लिए जीता था।
भले ही उसकी हैसियत ठीक नहीं थी लेकिन उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने की जुर्रत करता था।

प्रिया के कानों में बार बार अरमान के वो कड़वे शब्द गूंज उठते थे और उसे अंदर तक झकझोर देते थे।
वो ये मानती थी कि अरमान की ऐसी हालत के लिए सिर्फ वो ही ज़िम्मेदार है और इसी लिए वो उसके लिए कुछ करने का मन बना चुकी थी लेकिन आज जिस तरह से अरमान उससे पेश आया था उसके चलते खुद उसका सीना छलनी छलनी हो गया था।

उसे इस बात का इतना दुख नहीं था कि अरमान ने उसे ऐसा बोला और दुत्कारा बल्कि इस बात का दुख हो रहा था कि वो अरमान की बेहतरी के लिए खुल कर कुछ कर नहीं सकती।

अरमान उसे कुछ करने ही नहीं दे रहा।
एक तरफ तो वो कहता है कि वो आज भी उसे टूट कर प्यार करता है लेकिन अपनी उसी मोहब्बत को कड़वे शब्द बोल कर उसे दुख भी देता है।
मोहब्बत में ऐसा तो नहीं होता।
मोहब्बत करने वाले तो अपने महबूब को चोट पहुंचाने का सोच तक नहीं सकते फिर अरमान ये कैसी मोहब्बत कर रहा है उससे कि वो उसे ऐसे हर्ट कर रहा है?

प्रिया हर बार अपने ज़हन से इन ख़यालों को निकालने की कोशिश करती मगर ये ख़याल बार बार उसके मन में उभर आते और फिर उसे तड़पाना शुरू कर देते।

"क्या हुआ प्रिया?" उसके अंदर से किसी ने उसे पुकारा──"तू एक ऐसे व्यक्ति के लिए दुखी क्यों है जो आज के समय में तेरा कुछ लगता ही नहीं है? तू सिर्फ अपने घर परिवार के बारे में सोच। अपने अतीत से जुड़ेगी तो बहुत बुरा अंजाम भुगतेगी तू।"

"जानती हूं।" प्रिया ने अपने अंदर की प्रिया को जवाब दिया──"लेकिन मैं ये कैसे भुला दूं कि मैंने उसके साथ ग़लत किया है? मैं इस सच्चाई को कैसे नकार दूं कि उसने मेरी वजह से अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली है? मैं ये कैसे भुला दूं कि एक हफ़्ते पहले जब वो इतने सालों बाद मुझे अचानक से मिला था तो मैंने सामान्य भाव से उसका हाल चाल पूछने के बजाय उसको बुरा भला कह कर उसका दिल दुखाया था?"

"जब बात अपने खुशहाल परिवार के बिखरने की आती है।" अंदर की प्रिया ने जैसे उसे समझाया──"तो इंसान को सबसे पहले अपने और अपने परिवार की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। जैसे अब तक तू उसे भूली हुई थी वैसे ही आगे भी उसे भूली रह। माना कि तूने उसका दिल दुखाया था और तेरी वजह से उसने खुद को बर्बाद किया लेकिन इसमें सारा दोष सिर्फ तेरा ही तो नहीं है। दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी अपने को धोखा दे कर अपने हित के लिए किसी और से विवाह कर लेते हैं। दुनिया ऐसे ही मतलबी लोगों से भरी पड़ी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इतने सालों बाद तू उससे मिले और फिर ऐसे चक्कर में फंस कर अपने खुशहाल परिवार पर संकट पैदा कर ले। तुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो तूने अरमान से अपनी उस ग़लती की माफ़ी मांग ली, इतना ही नहीं अपनी तरफ से ये कोशिश भी की कि वो सब कुछ भुला कर नए सिरे से अपना जीवन शुरू करे। अब अगर वो तेरी बात नहीं मान रहा और अपनी ज़िद पर ही अड़ा हुआ है तो इसमें भला तू क्या कर सकती है? तूने अपना फर्ज़ निभा दिया, अब ये उस पर निर्भर करता है कि वो अपने लिए क्या चाहता है। मैं यही कहूंगी कि अब तू उसका ख़याल छोड़ कर सिर्फ अपने परिवार की तरफ ध्यान दे।"

प्रिया को समझ न आया कि अब वो अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दे?
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि उसकी अंतरात्मा ने जो कुछ कहा था वो सच था और हर तरह से वाजिब भी था।

सच ही तो है कि उसने अपना कर्म कर दिया है, अब अगर इतने पर भी अरमान अपनी दुनिया को संवारना नहीं चाहता तो इसमें भला वो क्या कर सकती है?
मतलब साफ है, उसे अब अपने परिवार के बारे में ही सोचना चाहिए।
अरमान का ख़याल अपने दिलो दिमाग़ से निकाल देना चाहिए।

प्रिया ने एक गहरी सांस ली और सचमुच अपने दिलो दिमाग़ से अरमान के ख़यालों को निकालने की कोशिश में लग गई।
मगर....
बार बार कोशिश करने के बाद भी वो अरमान के ख़यालों को अपने दिलो दिमाग़ से निकाल नहीं पाई।
बुरी तरह झुंझला उठी वो।
चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे।

खुद को बहलाने के लिए उसने टीवी चालू कर लिया।
टीवी में कोई सीरियल आ रहा था लेकिन प्रिया की निगाहें टीवी स्क्रीन पर होते हुए भी स्क्रीन पर नहीं थी।
उसने रिमोट से चैनल बदलना शुरू कर दिया।
हर चैनल में अलग अलग प्रोग्राम चालू थे लेकिन प्रिया किसी भी चैनल पर नहीं रुकी।
अंत में झुंझला कर उसने रिमोट से टीवी बंद कर दिया।

वो बुरी तरह परेशान और आहत सी हो गई थी।
घर में इस वक्त वो अकेली ही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अरमान के ख़यालों से उसे कैसे मुक्ति मिले?

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"मे आई कम इन सर!" अशोक खत्री ने एक केबिन के दरवाज़े को हल्का सा खोल कर अंदर झांकते हुए कहा।

"यस कम इन।" शानदार केबिन के अंदर ऊंची पुश्त वाली रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे एक कसरती बदन वाले किन्तु हैंडसम नौजवान ने कहा।

अशोक केबिन के अंदर दाख़िल हुआ।
पीछे कांच का दरवाज़ा अपने आप ही बंद हो गया।
अशोक की नज़र टेबल के उस पार अपनी चेयर पर बैठे नौजवान पर पड़ी।

अशोक से उमर में वो काफी छोटा था लेकिन पद उससे कहीं बड़ा था इस लिए अशोक के अंदर थोड़ी झिझक और थोड़ी घबराहट थी।
उसने सुन रखा था कि ये नौजवान थोड़ा कड़क है और कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी है।

"प्लीज़ हैव ए सीट मिस्टर खत्री।" उस नौजवान ने अशोक को उसके सर नेम से संबोधित करते हुए कहा।

हालाकि उसका लहजा सपाट था।
एकदम भावहीन।
बहरहाल, अशोक खत्री धड़कते दिल के साथ आगे बढ़ा और टेबल के इस पार रखी तीन चेयर्स में से एक पर जा कर बैठ गया।

"सो, मिस्टर खत्री।" उसके बैठते ही उस नौजवान ने टेबल पर रखी कुछ फाइल्स में से एक पर से नज़र हटा कर उसकी तरफ देखा──"अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो आपको हमारी इस कंपनी में ज्वॉइन हुए लगभग एक महीना होने वाला है, राइट?"

"य...यस सर।" अशोक खत्री ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए जल्दी से कहा।

"आपने यहां ज्वाइन होने से पहले अपनी जो भी शर्तें रखीं थी।" उस आकर्षक से नौजवान ने अपलक अशोक की तरफ देखते हुए सपाट लहजे में ही कहा──"उन शर्तों को हमने माना और आपको आपके मन मुताबिक सैलरी देने को राज़ी हुए, राइट?"

"ज...जी जी बिल्कुल सर।"

अशोक को समझ नहीं आ रहा था कि सामने बैठा आकर्षक नौजवान आख़िर उससे कहना क्या चाहता है?
उसका जी चाहा कि असल बात पूछे लेकिन उसकी हिम्मत न पड़ी।

"उसके बदले आपने ये वादा किया था कि आप कम ज़िंक खर्च कर के बेहतर पाइप्स जी-आई कर के देंगे और कंपनी का फ़ायदा करवाएंगे।" सामने बैठे नौजवान ने जैसे अब जा कर असल मुद्दे की बात की──"जबकि असल में ऐसा आप अब तक नहीं कर पाए। आपकी अब तक की सारी रिपोर्ट मैंने देख ली है और ये जाना है कि आप उस व्यक्ति से भी ज़्यादा ज़िंक खर्च कर रहे हैं जो आपसे पहले यहां जी-आई के इंचार्ज पद पर था। हफ़्ते दस दिन का तो समझ में आता है मिस्टर खत्री लेकिन एक महीना होने को आया और अभी भी आप इस मामले में कुछ नहीं कर पाए।"

"म...मुझे पता है सर कि ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है।" अशोक ने अपना बचाव करते हुए मानो खुद की पैरवी की──"और इसके लिए मैं हद से ज़्यादा प्रयास भी कर रहा हूं लेकिन इसके बाद भी ज़िंक के खर्चे में कमी नहीं आ रही। असल में समस्या ये है कि जो नए वॉचमैन आए हैं उनको कितना भी समझाएं लेकिन वो सही से काम नहीं कर पा रहे। दूसरी समस्या ये है कि मटेरियल भी ख़राब आ रहा है जिसके चलते ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है। जिन पटरों से पाईप बनाए जा रहे हैं वो काफी ख़राब हैं। उनमें खुरदुरापन है जिसके चलते वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में कवर कर लेते हैं। एक्सपोर्ट के माल के लिए तो कोईल का मटेरियल चाहिए जो ज़िंक भी कम कवर करे और पाईप में शाइनिंग भी टॉप क्लास की दिखे।"

"आपके आने से पहले भी एक्सपोर्ट के माल के लिए ऐसा ही मटेरियल प्रयोग होता था मिस्टर खत्री।" सामने बैठे नौजवान ने कहा──"और जी-आई होने पर ज़िंक भी कम खर्च होता था। वेल, अगर ऐसा ही हाल रहा और ज़िंक की लागत में आप कमी नहीं कर पाए तो खुद सोचिए कि कंपनी में आपको रखने का क्या फ़ायदा? उम्मीद करता हूं कि आप एग्रीमेंट में किए गए अपने वायदे और दावे पर खरा उतरेंगे अदरवाइज़ कंपनी आपके खिलाफ़ कड़ा एक्शन लेने पर मजबूर हो जाएगी।"

नौजवान अधिकारी की ये बात सुन कर अशोक खत्री पलक झपकते ही सन्नाटे में आ गया।
उसकी धड़कनें अब किसी हथौड़े की तरह उसकी कनपटी को बजाने लगीं थी।
इतना तो वो भी जानता था कि ज़िंक की लागत में उसके हर प्रयास के बाद भी कोई कमी नहीं आ रही है।

ये सच है कि मटेरियल अच्छा नहीं मिल रहा है और वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में समेट ले रहा है लेकिन नौजवान अधिकारी के अनुसार ऐसा ही मटेरियल उसके आने से पूर्व भी मिलता था और उनमें ज़िंक उससे कम ही लग रहा था।

खत्री को समझ नहीं आ रहा था कि ज़िंक की लागत को कैसे कम करे?
अगर यही हाल रहा तो निश्चित ही उसकी नौकरी ख़तरे में पड़ जानी है।
उसे इस मामले में कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।

"आई होप, एवरीथिंग विल बी ऑल राइट मिस्टर खत्री।" उसकी सोचो को भंग करते हुए उस आकर्षक नौजवान ने कहा──"यू मे गो नाउ।"

अशोक खत्री चेयर से उठा और भारी क़दमों के साथ केबिन से बाहर आ गया।
उसने राहत की लंबी सांस ली लेकिन माथे पर से चिंता की लकीरें न मिटा सका।
थोड़ी ही देर में वो जी-आई वाले प्लांट की तरफ बढ़ता चला जा रहा था।

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"अरे! आज आने में इतनी देर क्यों लगा दी आपने?" प्रिया ने दरवाज़ा खोलते ही बाहर खड़े अपने पति से पूछा।

"क्या करें हो गई देर।" अशोक ने अजीब भाव से कहा──"काम में ये सब तो होता ही है।"

प्रिया ने महसूस किया कि आज उसके पति के चेहरे की चमक ग़ायब है।
बेहद निराश और थका थका सा नज़र आ रहा है वो।
प्रिया का जी चाहा कि पूछे मगर फिर उसने ये सोच कर अपना इरादा बदल लिया कि अभी तो उसका पति आया है और उसके आते ही उससे उसकी परेशानी का सबब पूछना ठीक नहीं होगा।

खा पी कर अशोक अपने कमरे में सोने चला गया था जबकि प्रिया जूठे बर्तन उठा कर किचन में रखने लगी थी।
उसके मन में बार बार यही ख़याल उभर रहा था कि आज उसके पति के चेहरे पर चमक क्यों नहीं है?
आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसके चलते उसका पति आज इतना निराश और थका हुआ सा लग रहा है?

जल्दी ही काम से फारिग़ हो कर प्रिया अपने कमरे में अशोक के पास पहुंच गई।
उसने खड़े खड़े ही ध्यान से अशोक की तरफ देखा।

अशोक बेड पर लेटा हुआ था।
उसका एक हाथ कोहनी से मुड़ा हुआ था और ऊपर उसके माथे पर कलाई के साथ रखा हुआ था।
आंखें बंद तो थीं लेकिन स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वो आंखें बंद किए किन्हीं गहरे विचारों में खोया हुआ है।
ये देख प्रिया के माथे पर शिकन उभर आई।

"क्या बात है अशोक?" फिर उसने बेड पर अशोक के बिल्कुल पास बैठ कर पूछा──"आज आप इतने टेंशन में क्यों दिख रहे हैं? आख़िर बात क्या है?"

"आं...क..कुछ नहीं।" अशोक ने खुद को सम्हालते हुए कहा──"बस ऐसे ही काम के बारे में सोच रहा था। तुम सुनाओ, नई मेड सही से काम कर रही है कि नहीं?"

"हां वो तो कर रही है।" प्रिया ने अशोक को ध्यान से देखते हुए कहा──"लेकिन आप मुझसे कुछ छुपा रहे हैं। आते समय ही मैंने आपके चेहरे पर परेशानी देखी थी और अभी भी आप आंखें बंद किए कुछ ऐसा सोचने में गुम थे जो शायद आपकी चिंता का कारण बना हुआ है। बताइए ना, आख़िर बात क्या है?"

प्रिया अपने पति से उसकी परेशानी जानने पर इस लिए भी ज़ोर दे रही थी क्योंकि पति को कुछ सोचते देख वो ये सोच कर खुद भी परेशान हो गई थी कि कहीं उसके पति को पता तो नहीं चल गया कि वो अपने पूर्व प्रेमी से मिली थी?

"ऐसी कोई बात नहीं है बेबी।" अशोक ने उठ कर प्रिया के चेहरे को हल्के से सहलाते हुए कहा──"असल में आज कल काम का प्रेशर थोड़ा बढ़ गया है इस लिए काम के प्रति थोड़ी चिंता और थकावट हो रही है। बाकी कोई बात नहीं है।"

"सच कह रहे हैं ना?" प्रिया ने जैसे आश्वस्त होने की गरज से पूछा।

"हां मेरी जान, मैं सच ही कह रहा हूं।" अशोक ने कहा और थोड़ा सा आगे बढ़ कर प्रिया के गुलाबी होठों को चूम लिया।

उसकी इस क्रिया से प्रिया जहां एक तरफ आश्वस्त हो गई वहीं दूसरी तरफ हल्का सा शर्मा भी गई।
बहरहाल, इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई।

अशोक मानसिक तनाव में था जिसे उसने प्रिया से छुपा लिया था।
उसने दूसरी तरफ करवट ली और आंखें बंद कर के सोने की कोशिश करने लगा।

प्रिया के लिए ये सामान्य बात थी।
अशोक उमर में उससे काफी बड़ा था जिसके चलते दोनों के बीच हर रात काम क्रीड़ा नहीं होती थी।

अशोक ने दूसरी तरफ करवट ली तो प्रिया ने भी उसकी फ़िक्र छोड़ आंख बंद कर के सोने की कोशिश करने लगी।
कुछ ही देर में उसका भटकता हुआ मन एक बार फिर अरमान की तरफ जा पहुंचा।
अगले ही पल जब अरमान के ख़याल उभरने शुरू हुए तो वो एक बार फिर से परेशान हो उठी।
रात बड़ी मुश्किल से उसकी आंख लगी।
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Priya ke mansik vicharo se lag rha hai arman ne jaisa socha hai vaisa hi asar priya par ho rha hai,
Abhi priya apne vartman bhutkal aur future me uljhi huyi hai, udhar ashok apne kam aur umar ke karan khud mansik tanav me hai aur priya ke manobhav ko samjh nhi pa rha hai
 

parkas

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"ये सब करने का फ़ायदा क्या होगा भाई?" विशाल ने अरमान की तरफ देखते हुए पूछा──"तेरे प्लान के अनुसार तो वो तेरे क़रीब आ ही रही थी फिर तूने ऐसा बोल कर उसे खुद से दूर हो जाने वाला काम क्यों कर दिया? क्या तुझे नहीं लगता कि तेरे द्वारा इतनी बेरुखी से दुत्कारे जाने पर अब शायद ही वो दुबारा तुमसे मिलने का सोचेगी?"

"उसे इस तरह से दुत्कारना और उसे उसके कर्मों का एहसास करवाना ज़रूरी था माय डियर।" अरमान ने सिगरेट का गाढ़ा धुआं हवा में उड़ाते हुए कहा──"इंसान को जब अपनी ग़लतियों का अथवा अपने बुरे कर्मों का गहराई से एहसास होता है तभी उसे अपने कर्मों के तहत अपराध बोध होता है। तभी उसके अंदर प्रबल रूप से पश्चाताप की भावना पैदा होती है जो उसे वो करने पर विवश करती है जो सामान्य अवस्था में वो कर ही नहीं सकता। प्रिया को अपने कर्मों का आभास तो हो गया है और वो मान भी चुकी है कि उसने मेरे साथ अच्छा नहीं किया था लेकिन अभी इस भावना में उतनी शिद्दत नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि उसके अंदर अपराध बोध इस क़दर पैदा हो जाए कि पश्चाताप करने के लिए वो किसी भी हद को पार कर जाए।"

"इससे होगा क्या?"

"वही जो मैं चाहता हूं।" अरमान हल्के से मुस्कुराया──"आई मीन, एक दिन ऐसा आएगा जब वो खुद मेरी बनने के लिए बेचैन हो जाएगी। वो खुद कहेगी कि मैं अपने पति को तलाक़ दे कर तुमसे विवाह करूंगी।"

"ये तो असंभव बात बोल रहा है तू।" विशाल ने आश्चर्य से आंखें फैला कर कहा──"जिस लड़की ने सिर्फ अपने सुखों का सोच कर एक रईस व्यक्ति से शादी की वो उस ऐशो आराम को त्याग कर तुमसे शादी क्यों करेगी? मेरा ख़याल यही है कि उसे अपनी ग़लतियों का एहसास तो है और वो तुम्हारी हालत को ठीक भी करना चाहती है लेकिन सिर्फ इस लिए क्योंकि उसे तुमसे हमदर्दी है।"

"मुझे पता है कि तू इस वक्त मेरी बात का यकीन नहीं कर सकता।" अरमान ने कहा──"इस लिए तू ख़ामोशी से बस देखता जा। ऐसा दिन जल्द ही आएगा जब तुझे असंभव लगने वाली ये बात संभव में बदलती दिखेगी।"

"ख़ैर, अब आगे क्या?" विशाल ने गहरी सांस ली──"मेरा मतलब है कि तूने तो उसे दुत्कार दिया है तो अब इसके बाद क्या करेगा तू।"

"मैं कुछ नहीं करूंगा।" अरमान ने ऐश ट्रे में सिगरेट को बुझाते हुए कहा──"बल्कि जो कुछ करेगी वही करेगी। बाकी प्लान वैसा ही चलता रहेगा जैसा बनाया गया है।"

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प्रिया बहुत दुखी थी।
उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि आज अरमान इस तरह कड़वे शब्द बोल कर तथा उसकी ग़लतियों का एहसास करवा के उसे दुत्कार देगा।


अरमान का ऐसा रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था।
वो तो ऐसा था जो हर पल सिर्फ और सिर्फ उसी की खुशी के लिए जीता था।
भले ही उसकी हैसियत ठीक नहीं थी लेकिन उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने की जुर्रत करता था।

प्रिया के कानों में बार बार अरमान के वो कड़वे शब्द गूंज उठते थे और उसे अंदर तक झकझोर देते थे।
वो ये मानती थी कि अरमान की ऐसी हालत के लिए सिर्फ वो ही ज़िम्मेदार है और इसी लिए वो उसके लिए कुछ करने का मन बना चुकी थी लेकिन आज जिस तरह से अरमान उससे पेश आया था उसके चलते खुद उसका सीना छलनी छलनी हो गया था।

उसे इस बात का इतना दुख नहीं था कि अरमान ने उसे ऐसा बोला और दुत्कारा बल्कि इस बात का दुख हो रहा था कि वो अरमान की बेहतरी के लिए खुल कर कुछ कर नहीं सकती।

अरमान उसे कुछ करने ही नहीं दे रहा।
एक तरफ तो वो कहता है कि वो आज भी उसे टूट कर प्यार करता है लेकिन अपनी उसी मोहब्बत को कड़वे शब्द बोल कर उसे दुख भी देता है।
मोहब्बत में ऐसा तो नहीं होता।
मोहब्बत करने वाले तो अपने महबूब को चोट पहुंचाने का सोच तक नहीं सकते फिर अरमान ये कैसी मोहब्बत कर रहा है उससे कि वो उसे ऐसे हर्ट कर रहा है?

प्रिया हर बार अपने ज़हन से इन ख़यालों को निकालने की कोशिश करती मगर ये ख़याल बार बार उसके मन में उभर आते और फिर उसे तड़पाना शुरू कर देते।

"क्या हुआ प्रिया?" उसके अंदर से किसी ने उसे पुकारा──"तू एक ऐसे व्यक्ति के लिए दुखी क्यों है जो आज के समय में तेरा कुछ लगता ही नहीं है? तू सिर्फ अपने घर परिवार के बारे में सोच। अपने अतीत से जुड़ेगी तो बहुत बुरा अंजाम भुगतेगी तू।"

"जानती हूं।" प्रिया ने अपने अंदर की प्रिया को जवाब दिया──"लेकिन मैं ये कैसे भुला दूं कि मैंने उसके साथ ग़लत किया है? मैं इस सच्चाई को कैसे नकार दूं कि उसने मेरी वजह से अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली है? मैं ये कैसे भुला दूं कि एक हफ़्ते पहले जब वो इतने सालों बाद मुझे अचानक से मिला था तो मैंने सामान्य भाव से उसका हाल चाल पूछने के बजाय उसको बुरा भला कह कर उसका दिल दुखाया था?"

"जब बात अपने खुशहाल परिवार के बिखरने की आती है।" अंदर की प्रिया ने जैसे उसे समझाया──"तो इंसान को सबसे पहले अपने और अपने परिवार की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। जैसे अब तक तू उसे भूली हुई थी वैसे ही आगे भी उसे भूली रह। माना कि तूने उसका दिल दुखाया था और तेरी वजह से उसने खुद को बर्बाद किया लेकिन इसमें सारा दोष सिर्फ तेरा ही तो नहीं है। दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी अपने को धोखा दे कर अपने हित के लिए किसी और से विवाह कर लेते हैं। दुनिया ऐसे ही मतलबी लोगों से भरी पड़ी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इतने सालों बाद तू उससे मिले और फिर ऐसे चक्कर में फंस कर अपने खुशहाल परिवार पर संकट पैदा कर ले। तुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो तूने अरमान से अपनी उस ग़लती की माफ़ी मांग ली, इतना ही नहीं अपनी तरफ से ये कोशिश भी की कि वो सब कुछ भुला कर नए सिरे से अपना जीवन शुरू करे। अब अगर वो तेरी बात नहीं मान रहा और अपनी ज़िद पर ही अड़ा हुआ है तो इसमें भला तू क्या कर सकती है? तूने अपना फर्ज़ निभा दिया, अब ये उस पर निर्भर करता है कि वो अपने लिए क्या चाहता है। मैं यही कहूंगी कि अब तू उसका ख़याल छोड़ कर सिर्फ अपने परिवार की तरफ ध्यान दे।"

प्रिया को समझ न आया कि अब वो अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दे?
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि उसकी अंतरात्मा ने जो कुछ कहा था वो सच था और हर तरह से वाजिब भी था।

सच ही तो है कि उसने अपना कर्म कर दिया है, अब अगर इतने पर भी अरमान अपनी दुनिया को संवारना नहीं चाहता तो इसमें भला वो क्या कर सकती है?
मतलब साफ है, उसे अब अपने परिवार के बारे में ही सोचना चाहिए।
अरमान का ख़याल अपने दिलो दिमाग़ से निकाल देना चाहिए।

प्रिया ने एक गहरी सांस ली और सचमुच अपने दिलो दिमाग़ से अरमान के ख़यालों को निकालने की कोशिश में लग गई।
मगर....
बार बार कोशिश करने के बाद भी वो अरमान के ख़यालों को अपने दिलो दिमाग़ से निकाल नहीं पाई।
बुरी तरह झुंझला उठी वो।
चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे।

खुद को बहलाने के लिए उसने टीवी चालू कर लिया।
टीवी में कोई सीरियल आ रहा था लेकिन प्रिया की निगाहें टीवी स्क्रीन पर होते हुए भी स्क्रीन पर नहीं थी।
उसने रिमोट से चैनल बदलना शुरू कर दिया।
हर चैनल में अलग अलग प्रोग्राम चालू थे लेकिन प्रिया किसी भी चैनल पर नहीं रुकी।
अंत में झुंझला कर उसने रिमोट से टीवी बंद कर दिया।

वो बुरी तरह परेशान और आहत सी हो गई थी।
घर में इस वक्त वो अकेली ही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अरमान के ख़यालों से उसे कैसे मुक्ति मिले?

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"मे आई कम इन सर!" अशोक खत्री ने एक केबिन के दरवाज़े को हल्का सा खोल कर अंदर झांकते हुए कहा।

"यस कम इन।" शानदार केबिन के अंदर ऊंची पुश्त वाली रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे एक कसरती बदन वाले किन्तु हैंडसम नौजवान ने कहा।

अशोक केबिन के अंदर दाख़िल हुआ।
पीछे कांच का दरवाज़ा अपने आप ही बंद हो गया।
अशोक की नज़र टेबल के उस पार अपनी चेयर पर बैठे नौजवान पर पड़ी।

अशोक से उमर में वो काफी छोटा था लेकिन पद उससे कहीं बड़ा था इस लिए अशोक के अंदर थोड़ी झिझक और थोड़ी घबराहट थी।
उसने सुन रखा था कि ये नौजवान थोड़ा कड़क है और कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी है।

"प्लीज़ हैव ए सीट मिस्टर खत्री।" उस नौजवान ने अशोक को उसके सर नेम से संबोधित करते हुए कहा।

हालाकि उसका लहजा सपाट था।
एकदम भावहीन।
बहरहाल, अशोक खत्री धड़कते दिल के साथ आगे बढ़ा और टेबल के इस पार रखी तीन चेयर्स में से एक पर जा कर बैठ गया।

"सो, मिस्टर खत्री।" उसके बैठते ही उस नौजवान ने टेबल पर रखी कुछ फाइल्स में से एक पर से नज़र हटा कर उसकी तरफ देखा──"अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो आपको हमारी इस कंपनी में ज्वॉइन हुए लगभग एक महीना होने वाला है, राइट?"

"य...यस सर।" अशोक खत्री ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए जल्दी से कहा।

"आपने यहां ज्वाइन होने से पहले अपनी जो भी शर्तें रखीं थी।" उस आकर्षक से नौजवान ने अपलक अशोक की तरफ देखते हुए सपाट लहजे में ही कहा──"उन शर्तों को हमने माना और आपको आपके मन मुताबिक सैलरी देने को राज़ी हुए, राइट?"

"ज...जी जी बिल्कुल सर।"

अशोक को समझ नहीं आ रहा था कि सामने बैठा आकर्षक नौजवान आख़िर उससे कहना क्या चाहता है?
उसका जी चाहा कि असल बात पूछे लेकिन उसकी हिम्मत न पड़ी।

"उसके बदले आपने ये वादा किया था कि आप कम ज़िंक खर्च कर के बेहतर पाइप्स जी-आई कर के देंगे और कंपनी का फ़ायदा करवाएंगे।" सामने बैठे नौजवान ने जैसे अब जा कर असल मुद्दे की बात की──"जबकि असल में ऐसा आप अब तक नहीं कर पाए। आपकी अब तक की सारी रिपोर्ट मैंने देख ली है और ये जाना है कि आप उस व्यक्ति से भी ज़्यादा ज़िंक खर्च कर रहे हैं जो आपसे पहले यहां जी-आई के इंचार्ज पद पर था। हफ़्ते दस दिन का तो समझ में आता है मिस्टर खत्री लेकिन एक महीना होने को आया और अभी भी आप इस मामले में कुछ नहीं कर पाए।"

"म...मुझे पता है सर कि ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है।" अशोक ने अपना बचाव करते हुए मानो खुद की पैरवी की──"और इसके लिए मैं हद से ज़्यादा प्रयास भी कर रहा हूं लेकिन इसके बाद भी ज़िंक के खर्चे में कमी नहीं आ रही। असल में समस्या ये है कि जो नए वॉचमैन आए हैं उनको कितना भी समझाएं लेकिन वो सही से काम नहीं कर पा रहे। दूसरी समस्या ये है कि मटेरियल भी ख़राब आ रहा है जिसके चलते ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है। जिन पटरों से पाईप बनाए जा रहे हैं वो काफी ख़राब हैं। उनमें खुरदुरापन है जिसके चलते वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में कवर कर लेते हैं। एक्सपोर्ट के माल के लिए तो कोईल का मटेरियल चाहिए जो ज़िंक भी कम कवर करे और पाईप में शाइनिंग भी टॉप क्लास की दिखे।"

"आपके आने से पहले भी एक्सपोर्ट के माल के लिए ऐसा ही मटेरियल प्रयोग होता था मिस्टर खत्री।" सामने बैठे नौजवान ने कहा──"और जी-आई होने पर ज़िंक भी कम खर्च होता था। वेल, अगर ऐसा ही हाल रहा और ज़िंक की लागत में आप कमी नहीं कर पाए तो खुद सोचिए कि कंपनी में आपको रखने का क्या फ़ायदा? उम्मीद करता हूं कि आप एग्रीमेंट में किए गए अपने वायदे और दावे पर खरा उतरेंगे अदरवाइज़ कंपनी आपके खिलाफ़ कड़ा एक्शन लेने पर मजबूर हो जाएगी।"

नौजवान अधिकारी की ये बात सुन कर अशोक खत्री पलक झपकते ही सन्नाटे में आ गया।
उसकी धड़कनें अब किसी हथौड़े की तरह उसकी कनपटी को बजाने लगीं थी।
इतना तो वो भी जानता था कि ज़िंक की लागत में उसके हर प्रयास के बाद भी कोई कमी नहीं आ रही है।

ये सच है कि मटेरियल अच्छा नहीं मिल रहा है और वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में समेट ले रहा है लेकिन नौजवान अधिकारी के अनुसार ऐसा ही मटेरियल उसके आने से पूर्व भी मिलता था और उनमें ज़िंक उससे कम ही लग रहा था।

खत्री को समझ नहीं आ रहा था कि ज़िंक की लागत को कैसे कम करे?
अगर यही हाल रहा तो निश्चित ही उसकी नौकरी ख़तरे में पड़ जानी है।
उसे इस मामले में कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।

"आई होप, एवरीथिंग विल बी ऑल राइट मिस्टर खत्री।" उसकी सोचो को भंग करते हुए उस आकर्षक नौजवान ने कहा──"यू मे गो नाउ।"

अशोक खत्री चेयर से उठा और भारी क़दमों के साथ केबिन से बाहर आ गया।
उसने राहत की लंबी सांस ली लेकिन माथे पर से चिंता की लकीरें न मिटा सका।
थोड़ी ही देर में वो जी-आई वाले प्लांट की तरफ बढ़ता चला जा रहा था।

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"अरे! आज आने में इतनी देर क्यों लगा दी आपने?" प्रिया ने दरवाज़ा खोलते ही बाहर खड़े अपने पति से पूछा।

"क्या करें हो गई देर।" अशोक ने अजीब भाव से कहा──"काम में ये सब तो होता ही है।"

प्रिया ने महसूस किया कि आज उसके पति के चेहरे की चमक ग़ायब है।
बेहद निराश और थका थका सा नज़र आ रहा है वो।
प्रिया का जी चाहा कि पूछे मगर फिर उसने ये सोच कर अपना इरादा बदल लिया कि अभी तो उसका पति आया है और उसके आते ही उससे उसकी परेशानी का सबब पूछना ठीक नहीं होगा।

खा पी कर अशोक अपने कमरे में सोने चला गया था जबकि प्रिया जूठे बर्तन उठा कर किचन में रखने लगी थी।
उसके मन में बार बार यही ख़याल उभर रहा था कि आज उसके पति के चेहरे पर चमक क्यों नहीं है?
आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसके चलते उसका पति आज इतना निराश और थका हुआ सा लग रहा है?

जल्दी ही काम से फारिग़ हो कर प्रिया अपने कमरे में अशोक के पास पहुंच गई।
उसने खड़े खड़े ही ध्यान से अशोक की तरफ देखा।

अशोक बेड पर लेटा हुआ था।
उसका एक हाथ कोहनी से मुड़ा हुआ था और ऊपर उसके माथे पर कलाई के साथ रखा हुआ था।
आंखें बंद तो थीं लेकिन स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वो आंखें बंद किए किन्हीं गहरे विचारों में खोया हुआ है।
ये देख प्रिया के माथे पर शिकन उभर आई।

"क्या बात है अशोक?" फिर उसने बेड पर अशोक के बिल्कुल पास बैठ कर पूछा──"आज आप इतने टेंशन में क्यों दिख रहे हैं? आख़िर बात क्या है?"

"आं...क..कुछ नहीं।" अशोक ने खुद को सम्हालते हुए कहा──"बस ऐसे ही काम के बारे में सोच रहा था। तुम सुनाओ, नई मेड सही से काम कर रही है कि नहीं?"

"हां वो तो कर रही है।" प्रिया ने अशोक को ध्यान से देखते हुए कहा──"लेकिन आप मुझसे कुछ छुपा रहे हैं। आते समय ही मैंने आपके चेहरे पर परेशानी देखी थी और अभी भी आप आंखें बंद किए कुछ ऐसा सोचने में गुम थे जो शायद आपकी चिंता का कारण बना हुआ है। बताइए ना, आख़िर बात क्या है?"

प्रिया अपने पति से उसकी परेशानी जानने पर इस लिए भी ज़ोर दे रही थी क्योंकि पति को कुछ सोचते देख वो ये सोच कर खुद भी परेशान हो गई थी कि कहीं उसके पति को पता तो नहीं चल गया कि वो अपने पूर्व प्रेमी से मिली थी?

"ऐसी कोई बात नहीं है बेबी।" अशोक ने उठ कर प्रिया के चेहरे को हल्के से सहलाते हुए कहा──"असल में आज कल काम का प्रेशर थोड़ा बढ़ गया है इस लिए काम के प्रति थोड़ी चिंता और थकावट हो रही है। बाकी कोई बात नहीं है।"

"सच कह रहे हैं ना?" प्रिया ने जैसे आश्वस्त होने की गरज से पूछा।

"हां मेरी जान, मैं सच ही कह रहा हूं।" अशोक ने कहा और थोड़ा सा आगे बढ़ कर प्रिया के गुलाबी होठों को चूम लिया।

उसकी इस क्रिया से प्रिया जहां एक तरफ आश्वस्त हो गई वहीं दूसरी तरफ हल्का सा शर्मा भी गई।
बहरहाल, इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई।

अशोक मानसिक तनाव में था जिसे उसने प्रिया से छुपा लिया था।
उसने दूसरी तरफ करवट ली और आंखें बंद कर के सोने की कोशिश करने लगा।

प्रिया के लिए ये सामान्य बात थी।
अशोक उमर में उससे काफी बड़ा था जिसके चलते दोनों के बीच हर रात काम क्रीड़ा नहीं होती थी।

अशोक ने दूसरी तरफ करवट ली तो प्रिया ने भी उसकी फ़िक्र छोड़ आंख बंद कर के सोने की कोशिश करने लगी।
कुछ ही देर में उसका भटकता हुआ मन एक बार फिर अरमान की तरफ जा पहुंचा।
अगले ही पल जब अरमान के ख़याल उभरने शुरू हुए तो वो एक बार फिर से परेशान हो उठी।
रात बड़ी मुश्किल से उसकी आंख लगी।
Bahut hi badhiya update diya hai TheBlackBlood bhai....
Nice and beautiful update....
 

dhparikh

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Update ~ 05



"ये सब करने का फ़ायदा क्या होगा भाई?" विशाल ने अरमान की तरफ देखते हुए पूछा──"तेरे प्लान के अनुसार तो वो तेरे क़रीब आ ही रही थी फिर तूने ऐसा बोल कर उसे खुद से दूर हो जाने वाला काम क्यों कर दिया? क्या तुझे नहीं लगता कि तेरे द्वारा इतनी बेरुखी से दुत्कारे जाने पर अब शायद ही वो दुबारा तुमसे मिलने का सोचेगी?"

"उसे इस तरह से दुत्कारना और उसे उसके कर्मों का एहसास करवाना ज़रूरी था माय डियर।" अरमान ने सिगरेट का गाढ़ा धुआं हवा में उड़ाते हुए कहा──"इंसान को जब अपनी ग़लतियों का अथवा अपने बुरे कर्मों का गहराई से एहसास होता है तभी उसे अपने कर्मों के तहत अपराध बोध होता है। तभी उसके अंदर प्रबल रूप से पश्चाताप की भावना पैदा होती है जो उसे वो करने पर विवश करती है जो सामान्य अवस्था में वो कर ही नहीं सकता। प्रिया को अपने कर्मों का आभास तो हो गया है और वो मान भी चुकी है कि उसने मेरे साथ अच्छा नहीं किया था लेकिन अभी इस भावना में उतनी शिद्दत नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि उसके अंदर अपराध बोध इस क़दर पैदा हो जाए कि पश्चाताप करने के लिए वो किसी भी हद को पार कर जाए।"

"इससे होगा क्या?"

"वही जो मैं चाहता हूं।" अरमान हल्के से मुस्कुराया──"आई मीन, एक दिन ऐसा आएगा जब वो खुद मेरी बनने के लिए बेचैन हो जाएगी। वो खुद कहेगी कि मैं अपने पति को तलाक़ दे कर तुमसे विवाह करूंगी।"

"ये तो असंभव बात बोल रहा है तू।" विशाल ने आश्चर्य से आंखें फैला कर कहा──"जिस लड़की ने सिर्फ अपने सुखों का सोच कर एक रईस व्यक्ति से शादी की वो उस ऐशो आराम को त्याग कर तुमसे शादी क्यों करेगी? मेरा ख़याल यही है कि उसे अपनी ग़लतियों का एहसास तो है और वो तुम्हारी हालत को ठीक भी करना चाहती है लेकिन सिर्फ इस लिए क्योंकि उसे तुमसे हमदर्दी है।"

"मुझे पता है कि तू इस वक्त मेरी बात का यकीन नहीं कर सकता।" अरमान ने कहा──"इस लिए तू ख़ामोशी से बस देखता जा। ऐसा दिन जल्द ही आएगा जब तुझे असंभव लगने वाली ये बात संभव में बदलती दिखेगी।"

"ख़ैर, अब आगे क्या?" विशाल ने गहरी सांस ली──"मेरा मतलब है कि तूने तो उसे दुत्कार दिया है तो अब इसके बाद क्या करेगा तू।"

"मैं कुछ नहीं करूंगा।" अरमान ने ऐश ट्रे में सिगरेट को बुझाते हुए कहा──"बल्कि जो कुछ करेगी वही करेगी। बाकी प्लान वैसा ही चलता रहेगा जैसा बनाया गया है।"

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प्रिया बहुत दुखी थी।
उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि आज अरमान इस तरह कड़वे शब्द बोल कर तथा उसकी ग़लतियों का एहसास करवा के उसे दुत्कार देगा।


अरमान का ऐसा रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था।
वो तो ऐसा था जो हर पल सिर्फ और सिर्फ उसी की खुशी के लिए जीता था।
भले ही उसकी हैसियत ठीक नहीं थी लेकिन उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने की जुर्रत करता था।

प्रिया के कानों में बार बार अरमान के वो कड़वे शब्द गूंज उठते थे और उसे अंदर तक झकझोर देते थे।
वो ये मानती थी कि अरमान की ऐसी हालत के लिए सिर्फ वो ही ज़िम्मेदार है और इसी लिए वो उसके लिए कुछ करने का मन बना चुकी थी लेकिन आज जिस तरह से अरमान उससे पेश आया था उसके चलते खुद उसका सीना छलनी छलनी हो गया था।

उसे इस बात का इतना दुख नहीं था कि अरमान ने उसे ऐसा बोला और दुत्कारा बल्कि इस बात का दुख हो रहा था कि वो अरमान की बेहतरी के लिए खुल कर कुछ कर नहीं सकती।

अरमान उसे कुछ करने ही नहीं दे रहा।
एक तरफ तो वो कहता है कि वो आज भी उसे टूट कर प्यार करता है लेकिन अपनी उसी मोहब्बत को कड़वे शब्द बोल कर उसे दुख भी देता है।
मोहब्बत में ऐसा तो नहीं होता।
मोहब्बत करने वाले तो अपने महबूब को चोट पहुंचाने का सोच तक नहीं सकते फिर अरमान ये कैसी मोहब्बत कर रहा है उससे कि वो उसे ऐसे हर्ट कर रहा है?

प्रिया हर बार अपने ज़हन से इन ख़यालों को निकालने की कोशिश करती मगर ये ख़याल बार बार उसके मन में उभर आते और फिर उसे तड़पाना शुरू कर देते।

"क्या हुआ प्रिया?" उसके अंदर से किसी ने उसे पुकारा──"तू एक ऐसे व्यक्ति के लिए दुखी क्यों है जो आज के समय में तेरा कुछ लगता ही नहीं है? तू सिर्फ अपने घर परिवार के बारे में सोच। अपने अतीत से जुड़ेगी तो बहुत बुरा अंजाम भुगतेगी तू।"

"जानती हूं।" प्रिया ने अपने अंदर की प्रिया को जवाब दिया──"लेकिन मैं ये कैसे भुला दूं कि मैंने उसके साथ ग़लत किया है? मैं इस सच्चाई को कैसे नकार दूं कि उसने मेरी वजह से अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली है? मैं ये कैसे भुला दूं कि एक हफ़्ते पहले जब वो इतने सालों बाद मुझे अचानक से मिला था तो मैंने सामान्य भाव से उसका हाल चाल पूछने के बजाय उसको बुरा भला कह कर उसका दिल दुखाया था?"

"जब बात अपने खुशहाल परिवार के बिखरने की आती है।" अंदर की प्रिया ने जैसे उसे समझाया──"तो इंसान को सबसे पहले अपने और अपने परिवार की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। जैसे अब तक तू उसे भूली हुई थी वैसे ही आगे भी उसे भूली रह। माना कि तूने उसका दिल दुखाया था और तेरी वजह से उसने खुद को बर्बाद किया लेकिन इसमें सारा दोष सिर्फ तेरा ही तो नहीं है। दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी अपने को धोखा दे कर अपने हित के लिए किसी और से विवाह कर लेते हैं। दुनिया ऐसे ही मतलबी लोगों से भरी पड़ी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इतने सालों बाद तू उससे मिले और फिर ऐसे चक्कर में फंस कर अपने खुशहाल परिवार पर संकट पैदा कर ले। तुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो तूने अरमान से अपनी उस ग़लती की माफ़ी मांग ली, इतना ही नहीं अपनी तरफ से ये कोशिश भी की कि वो सब कुछ भुला कर नए सिरे से अपना जीवन शुरू करे। अब अगर वो तेरी बात नहीं मान रहा और अपनी ज़िद पर ही अड़ा हुआ है तो इसमें भला तू क्या कर सकती है? तूने अपना फर्ज़ निभा दिया, अब ये उस पर निर्भर करता है कि वो अपने लिए क्या चाहता है। मैं यही कहूंगी कि अब तू उसका ख़याल छोड़ कर सिर्फ अपने परिवार की तरफ ध्यान दे।"

प्रिया को समझ न आया कि अब वो अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दे?
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि उसकी अंतरात्मा ने जो कुछ कहा था वो सच था और हर तरह से वाजिब भी था।

सच ही तो है कि उसने अपना कर्म कर दिया है, अब अगर इतने पर भी अरमान अपनी दुनिया को संवारना नहीं चाहता तो इसमें भला वो क्या कर सकती है?
मतलब साफ है, उसे अब अपने परिवार के बारे में ही सोचना चाहिए।
अरमान का ख़याल अपने दिलो दिमाग़ से निकाल देना चाहिए।

प्रिया ने एक गहरी सांस ली और सचमुच अपने दिलो दिमाग़ से अरमान के ख़यालों को निकालने की कोशिश में लग गई।
मगर....
बार बार कोशिश करने के बाद भी वो अरमान के ख़यालों को अपने दिलो दिमाग़ से निकाल नहीं पाई।
बुरी तरह झुंझला उठी वो।
चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे।

खुद को बहलाने के लिए उसने टीवी चालू कर लिया।
टीवी में कोई सीरियल आ रहा था लेकिन प्रिया की निगाहें टीवी स्क्रीन पर होते हुए भी स्क्रीन पर नहीं थी।
उसने रिमोट से चैनल बदलना शुरू कर दिया।
हर चैनल में अलग अलग प्रोग्राम चालू थे लेकिन प्रिया किसी भी चैनल पर नहीं रुकी।
अंत में झुंझला कर उसने रिमोट से टीवी बंद कर दिया।

वो बुरी तरह परेशान और आहत सी हो गई थी।
घर में इस वक्त वो अकेली ही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अरमान के ख़यालों से उसे कैसे मुक्ति मिले?

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"मे आई कम इन सर!" अशोक खत्री ने एक केबिन के दरवाज़े को हल्का सा खोल कर अंदर झांकते हुए कहा।

"यस कम इन।" शानदार केबिन के अंदर ऊंची पुश्त वाली रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे एक कसरती बदन वाले किन्तु हैंडसम नौजवान ने कहा।

अशोक केबिन के अंदर दाख़िल हुआ।
पीछे कांच का दरवाज़ा अपने आप ही बंद हो गया।
अशोक की नज़र टेबल के उस पार अपनी चेयर पर बैठे नौजवान पर पड़ी।

अशोक से उमर में वो काफी छोटा था लेकिन पद उससे कहीं बड़ा था इस लिए अशोक के अंदर थोड़ी झिझक और थोड़ी घबराहट थी।
उसने सुन रखा था कि ये नौजवान थोड़ा कड़क है और कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी है।

"प्लीज़ हैव ए सीट मिस्टर खत्री।" उस नौजवान ने अशोक को उसके सर नेम से संबोधित करते हुए कहा।

हालाकि उसका लहजा सपाट था।
एकदम भावहीन।
बहरहाल, अशोक खत्री धड़कते दिल के साथ आगे बढ़ा और टेबल के इस पार रखी तीन चेयर्स में से एक पर जा कर बैठ गया।

"सो, मिस्टर खत्री।" उसके बैठते ही उस नौजवान ने टेबल पर रखी कुछ फाइल्स में से एक पर से नज़र हटा कर उसकी तरफ देखा──"अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो आपको हमारी इस कंपनी में ज्वॉइन हुए लगभग एक महीना होने वाला है, राइट?"

"य...यस सर।" अशोक खत्री ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए जल्दी से कहा।

"आपने यहां ज्वाइन होने से पहले अपनी जो भी शर्तें रखीं थी।" उस आकर्षक से नौजवान ने अपलक अशोक की तरफ देखते हुए सपाट लहजे में ही कहा──"उन शर्तों को हमने माना और आपको आपके मन मुताबिक सैलरी देने को राज़ी हुए, राइट?"

"ज...जी जी बिल्कुल सर।"

अशोक को समझ नहीं आ रहा था कि सामने बैठा आकर्षक नौजवान आख़िर उससे कहना क्या चाहता है?
उसका जी चाहा कि असल बात पूछे लेकिन उसकी हिम्मत न पड़ी।

"उसके बदले आपने ये वादा किया था कि आप कम ज़िंक खर्च कर के बेहतर पाइप्स जी-आई कर के देंगे और कंपनी का फ़ायदा करवाएंगे।" सामने बैठे नौजवान ने जैसे अब जा कर असल मुद्दे की बात की──"जबकि असल में ऐसा आप अब तक नहीं कर पाए। आपकी अब तक की सारी रिपोर्ट मैंने देख ली है और ये जाना है कि आप उस व्यक्ति से भी ज़्यादा ज़िंक खर्च कर रहे हैं जो आपसे पहले यहां जी-आई के इंचार्ज पद पर था। हफ़्ते दस दिन का तो समझ में आता है मिस्टर खत्री लेकिन एक महीना होने को आया और अभी भी आप इस मामले में कुछ नहीं कर पाए।"

"म...मुझे पता है सर कि ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है।" अशोक ने अपना बचाव करते हुए मानो खुद की पैरवी की──"और इसके लिए मैं हद से ज़्यादा प्रयास भी कर रहा हूं लेकिन इसके बाद भी ज़िंक के खर्चे में कमी नहीं आ रही। असल में समस्या ये है कि जो नए वॉचमैन आए हैं उनको कितना भी समझाएं लेकिन वो सही से काम नहीं कर पा रहे। दूसरी समस्या ये है कि मटेरियल भी ख़राब आ रहा है जिसके चलते ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है। जिन पटरों से पाईप बनाए जा रहे हैं वो काफी ख़राब हैं। उनमें खुरदुरापन है जिसके चलते वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में कवर कर लेते हैं। एक्सपोर्ट के माल के लिए तो कोईल का मटेरियल चाहिए जो ज़िंक भी कम कवर करे और पाईप में शाइनिंग भी टॉप क्लास की दिखे।"

"आपके आने से पहले भी एक्सपोर्ट के माल के लिए ऐसा ही मटेरियल प्रयोग होता था मिस्टर खत्री।" सामने बैठे नौजवान ने कहा──"और जी-आई होने पर ज़िंक भी कम खर्च होता था। वेल, अगर ऐसा ही हाल रहा और ज़िंक की लागत में आप कमी नहीं कर पाए तो खुद सोचिए कि कंपनी में आपको रखने का क्या फ़ायदा? उम्मीद करता हूं कि आप एग्रीमेंट में किए गए अपने वायदे और दावे पर खरा उतरेंगे अदरवाइज़ कंपनी आपके खिलाफ़ कड़ा एक्शन लेने पर मजबूर हो जाएगी।"

नौजवान अधिकारी की ये बात सुन कर अशोक खत्री पलक झपकते ही सन्नाटे में आ गया।
उसकी धड़कनें अब किसी हथौड़े की तरह उसकी कनपटी को बजाने लगीं थी।
इतना तो वो भी जानता था कि ज़िंक की लागत में उसके हर प्रयास के बाद भी कोई कमी नहीं आ रही है।

ये सच है कि मटेरियल अच्छा नहीं मिल रहा है और वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में समेट ले रहा है लेकिन नौजवान अधिकारी के अनुसार ऐसा ही मटेरियल उसके आने से पूर्व भी मिलता था और उनमें ज़िंक उससे कम ही लग रहा था।

खत्री को समझ नहीं आ रहा था कि ज़िंक की लागत को कैसे कम करे?
अगर यही हाल रहा तो निश्चित ही उसकी नौकरी ख़तरे में पड़ जानी है।
उसे इस मामले में कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।

"आई होप, एवरीथिंग विल बी ऑल राइट मिस्टर खत्री।" उसकी सोचो को भंग करते हुए उस आकर्षक नौजवान ने कहा──"यू मे गो नाउ।"

अशोक खत्री चेयर से उठा और भारी क़दमों के साथ केबिन से बाहर आ गया।
उसने राहत की लंबी सांस ली लेकिन माथे पर से चिंता की लकीरें न मिटा सका।
थोड़ी ही देर में वो जी-आई वाले प्लांट की तरफ बढ़ता चला जा रहा था।

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"अरे! आज आने में इतनी देर क्यों लगा दी आपने?" प्रिया ने दरवाज़ा खोलते ही बाहर खड़े अपने पति से पूछा।

"क्या करें हो गई देर।" अशोक ने अजीब भाव से कहा──"काम में ये सब तो होता ही है।"

प्रिया ने महसूस किया कि आज उसके पति के चेहरे की चमक ग़ायब है।
बेहद निराश और थका थका सा नज़र आ रहा है वो।
प्रिया का जी चाहा कि पूछे मगर फिर उसने ये सोच कर अपना इरादा बदल लिया कि अभी तो उसका पति आया है और उसके आते ही उससे उसकी परेशानी का सबब पूछना ठीक नहीं होगा।

खा पी कर अशोक अपने कमरे में सोने चला गया था जबकि प्रिया जूठे बर्तन उठा कर किचन में रखने लगी थी।
उसके मन में बार बार यही ख़याल उभर रहा था कि आज उसके पति के चेहरे पर चमक क्यों नहीं है?
आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसके चलते उसका पति आज इतना निराश और थका हुआ सा लग रहा है?

जल्दी ही काम से फारिग़ हो कर प्रिया अपने कमरे में अशोक के पास पहुंच गई।
उसने खड़े खड़े ही ध्यान से अशोक की तरफ देखा।

अशोक बेड पर लेटा हुआ था।
उसका एक हाथ कोहनी से मुड़ा हुआ था और ऊपर उसके माथे पर कलाई के साथ रखा हुआ था।
आंखें बंद तो थीं लेकिन स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वो आंखें बंद किए किन्हीं गहरे विचारों में खोया हुआ है।
ये देख प्रिया के माथे पर शिकन उभर आई।

"क्या बात है अशोक?" फिर उसने बेड पर अशोक के बिल्कुल पास बैठ कर पूछा──"आज आप इतने टेंशन में क्यों दिख रहे हैं? आख़िर बात क्या है?"

"आं...क..कुछ नहीं।" अशोक ने खुद को सम्हालते हुए कहा──"बस ऐसे ही काम के बारे में सोच रहा था। तुम सुनाओ, नई मेड सही से काम कर रही है कि नहीं?"

"हां वो तो कर रही है।" प्रिया ने अशोक को ध्यान से देखते हुए कहा──"लेकिन आप मुझसे कुछ छुपा रहे हैं। आते समय ही मैंने आपके चेहरे पर परेशानी देखी थी और अभी भी आप आंखें बंद किए कुछ ऐसा सोचने में गुम थे जो शायद आपकी चिंता का कारण बना हुआ है। बताइए ना, आख़िर बात क्या है?"

प्रिया अपने पति से उसकी परेशानी जानने पर इस लिए भी ज़ोर दे रही थी क्योंकि पति को कुछ सोचते देख वो ये सोच कर खुद भी परेशान हो गई थी कि कहीं उसके पति को पता तो नहीं चल गया कि वो अपने पूर्व प्रेमी से मिली थी?

"ऐसी कोई बात नहीं है बेबी।" अशोक ने उठ कर प्रिया के चेहरे को हल्के से सहलाते हुए कहा──"असल में आज कल काम का प्रेशर थोड़ा बढ़ गया है इस लिए काम के प्रति थोड़ी चिंता और थकावट हो रही है। बाकी कोई बात नहीं है।"

"सच कह रहे हैं ना?" प्रिया ने जैसे आश्वस्त होने की गरज से पूछा।

"हां मेरी जान, मैं सच ही कह रहा हूं।" अशोक ने कहा और थोड़ा सा आगे बढ़ कर प्रिया के गुलाबी होठों को चूम लिया।

उसकी इस क्रिया से प्रिया जहां एक तरफ आश्वस्त हो गई वहीं दूसरी तरफ हल्का सा शर्मा भी गई।
बहरहाल, इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई।

अशोक मानसिक तनाव में था जिसे उसने प्रिया से छुपा लिया था।
उसने दूसरी तरफ करवट ली और आंखें बंद कर के सोने की कोशिश करने लगा।

प्रिया के लिए ये सामान्य बात थी।
अशोक उमर में उससे काफी बड़ा था जिसके चलते दोनों के बीच हर रात काम क्रीड़ा नहीं होती थी।

अशोक ने दूसरी तरफ करवट ली तो प्रिया ने भी उसकी फ़िक्र छोड़ आंख बंद कर के सोने की कोशिश करने लगी।
कुछ ही देर में उसका भटकता हुआ मन एक बार फिर अरमान की तरफ जा पहुंचा।
अगले ही पल जब अरमान के ख़याल उभरने शुरू हुए तो वो एक बार फिर से परेशान हो उठी।
रात बड़ी मुश्किल से उसकी आंख लगी।
Nice update....
 

Ajju Landwalia

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Update ~ 05



"ये सब करने का फ़ायदा क्या होगा भाई?" विशाल ने अरमान की तरफ देखते हुए पूछा──"तेरे प्लान के अनुसार तो वो तेरे क़रीब आ ही रही थी फिर तूने ऐसा बोल कर उसे खुद से दूर हो जाने वाला काम क्यों कर दिया? क्या तुझे नहीं लगता कि तेरे द्वारा इतनी बेरुखी से दुत्कारे जाने पर अब शायद ही वो दुबारा तुमसे मिलने का सोचेगी?"

"उसे इस तरह से दुत्कारना और उसे उसके कर्मों का एहसास करवाना ज़रूरी था माय डियर।" अरमान ने सिगरेट का गाढ़ा धुआं हवा में उड़ाते हुए कहा──"इंसान को जब अपनी ग़लतियों का अथवा अपने बुरे कर्मों का गहराई से एहसास होता है तभी उसे अपने कर्मों के तहत अपराध बोध होता है। तभी उसके अंदर प्रबल रूप से पश्चाताप की भावना पैदा होती है जो उसे वो करने पर विवश करती है जो सामान्य अवस्था में वो कर ही नहीं सकता। प्रिया को अपने कर्मों का आभास तो हो गया है और वो मान भी चुकी है कि उसने मेरे साथ अच्छा नहीं किया था लेकिन अभी इस भावना में उतनी शिद्दत नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि उसके अंदर अपराध बोध इस क़दर पैदा हो जाए कि पश्चाताप करने के लिए वो किसी भी हद को पार कर जाए।"

"इससे होगा क्या?"

"वही जो मैं चाहता हूं।" अरमान हल्के से मुस्कुराया──"आई मीन, एक दिन ऐसा आएगा जब वो खुद मेरी बनने के लिए बेचैन हो जाएगी। वो खुद कहेगी कि मैं अपने पति को तलाक़ दे कर तुमसे विवाह करूंगी।"

"ये तो असंभव बात बोल रहा है तू।" विशाल ने आश्चर्य से आंखें फैला कर कहा──"जिस लड़की ने सिर्फ अपने सुखों का सोच कर एक रईस व्यक्ति से शादी की वो उस ऐशो आराम को त्याग कर तुमसे शादी क्यों करेगी? मेरा ख़याल यही है कि उसे अपनी ग़लतियों का एहसास तो है और वो तुम्हारी हालत को ठीक भी करना चाहती है लेकिन सिर्फ इस लिए क्योंकि उसे तुमसे हमदर्दी है।"

"मुझे पता है कि तू इस वक्त मेरी बात का यकीन नहीं कर सकता।" अरमान ने कहा──"इस लिए तू ख़ामोशी से बस देखता जा। ऐसा दिन जल्द ही आएगा जब तुझे असंभव लगने वाली ये बात संभव में बदलती दिखेगी।"

"ख़ैर, अब आगे क्या?" विशाल ने गहरी सांस ली──"मेरा मतलब है कि तूने तो उसे दुत्कार दिया है तो अब इसके बाद क्या करेगा तू।"

"मैं कुछ नहीं करूंगा।" अरमान ने ऐश ट्रे में सिगरेट को बुझाते हुए कहा──"बल्कि जो कुछ करेगी वही करेगी। बाकी प्लान वैसा ही चलता रहेगा जैसा बनाया गया है।"

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प्रिया बहुत दुखी थी।
उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि आज अरमान इस तरह कड़वे शब्द बोल कर तथा उसकी ग़लतियों का एहसास करवा के उसे दुत्कार देगा।


अरमान का ऐसा रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था।
वो तो ऐसा था जो हर पल सिर्फ और सिर्फ उसी की खुशी के लिए जीता था।
भले ही उसकी हैसियत ठीक नहीं थी लेकिन उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने की जुर्रत करता था।

प्रिया के कानों में बार बार अरमान के वो कड़वे शब्द गूंज उठते थे और उसे अंदर तक झकझोर देते थे।
वो ये मानती थी कि अरमान की ऐसी हालत के लिए सिर्फ वो ही ज़िम्मेदार है और इसी लिए वो उसके लिए कुछ करने का मन बना चुकी थी लेकिन आज जिस तरह से अरमान उससे पेश आया था उसके चलते खुद उसका सीना छलनी छलनी हो गया था।

उसे इस बात का इतना दुख नहीं था कि अरमान ने उसे ऐसा बोला और दुत्कारा बल्कि इस बात का दुख हो रहा था कि वो अरमान की बेहतरी के लिए खुल कर कुछ कर नहीं सकती।

अरमान उसे कुछ करने ही नहीं दे रहा।
एक तरफ तो वो कहता है कि वो आज भी उसे टूट कर प्यार करता है लेकिन अपनी उसी मोहब्बत को कड़वे शब्द बोल कर उसे दुख भी देता है।
मोहब्बत में ऐसा तो नहीं होता।
मोहब्बत करने वाले तो अपने महबूब को चोट पहुंचाने का सोच तक नहीं सकते फिर अरमान ये कैसी मोहब्बत कर रहा है उससे कि वो उसे ऐसे हर्ट कर रहा है?

प्रिया हर बार अपने ज़हन से इन ख़यालों को निकालने की कोशिश करती मगर ये ख़याल बार बार उसके मन में उभर आते और फिर उसे तड़पाना शुरू कर देते।

"क्या हुआ प्रिया?" उसके अंदर से किसी ने उसे पुकारा──"तू एक ऐसे व्यक्ति के लिए दुखी क्यों है जो आज के समय में तेरा कुछ लगता ही नहीं है? तू सिर्फ अपने घर परिवार के बारे में सोच। अपने अतीत से जुड़ेगी तो बहुत बुरा अंजाम भुगतेगी तू।"

"जानती हूं।" प्रिया ने अपने अंदर की प्रिया को जवाब दिया──"लेकिन मैं ये कैसे भुला दूं कि मैंने उसके साथ ग़लत किया है? मैं इस सच्चाई को कैसे नकार दूं कि उसने मेरी वजह से अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली है? मैं ये कैसे भुला दूं कि एक हफ़्ते पहले जब वो इतने सालों बाद मुझे अचानक से मिला था तो मैंने सामान्य भाव से उसका हाल चाल पूछने के बजाय उसको बुरा भला कह कर उसका दिल दुखाया था?"

"जब बात अपने खुशहाल परिवार के बिखरने की आती है।" अंदर की प्रिया ने जैसे उसे समझाया──"तो इंसान को सबसे पहले अपने और अपने परिवार की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। जैसे अब तक तू उसे भूली हुई थी वैसे ही आगे भी उसे भूली रह। माना कि तूने उसका दिल दुखाया था और तेरी वजह से उसने खुद को बर्बाद किया लेकिन इसमें सारा दोष सिर्फ तेरा ही तो नहीं है। दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी अपने को धोखा दे कर अपने हित के लिए किसी और से विवाह कर लेते हैं। दुनिया ऐसे ही मतलबी लोगों से भरी पड़ी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इतने सालों बाद तू उससे मिले और फिर ऐसे चक्कर में फंस कर अपने खुशहाल परिवार पर संकट पैदा कर ले। तुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो तूने अरमान से अपनी उस ग़लती की माफ़ी मांग ली, इतना ही नहीं अपनी तरफ से ये कोशिश भी की कि वो सब कुछ भुला कर नए सिरे से अपना जीवन शुरू करे। अब अगर वो तेरी बात नहीं मान रहा और अपनी ज़िद पर ही अड़ा हुआ है तो इसमें भला तू क्या कर सकती है? तूने अपना फर्ज़ निभा दिया, अब ये उस पर निर्भर करता है कि वो अपने लिए क्या चाहता है। मैं यही कहूंगी कि अब तू उसका ख़याल छोड़ कर सिर्फ अपने परिवार की तरफ ध्यान दे।"

प्रिया को समझ न आया कि अब वो अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दे?
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि उसकी अंतरात्मा ने जो कुछ कहा था वो सच था और हर तरह से वाजिब भी था।

सच ही तो है कि उसने अपना कर्म कर दिया है, अब अगर इतने पर भी अरमान अपनी दुनिया को संवारना नहीं चाहता तो इसमें भला वो क्या कर सकती है?
मतलब साफ है, उसे अब अपने परिवार के बारे में ही सोचना चाहिए।
अरमान का ख़याल अपने दिलो दिमाग़ से निकाल देना चाहिए।

प्रिया ने एक गहरी सांस ली और सचमुच अपने दिलो दिमाग़ से अरमान के ख़यालों को निकालने की कोशिश में लग गई।
मगर....
बार बार कोशिश करने के बाद भी वो अरमान के ख़यालों को अपने दिलो दिमाग़ से निकाल नहीं पाई।
बुरी तरह झुंझला उठी वो।
चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे।

खुद को बहलाने के लिए उसने टीवी चालू कर लिया।
टीवी में कोई सीरियल आ रहा था लेकिन प्रिया की निगाहें टीवी स्क्रीन पर होते हुए भी स्क्रीन पर नहीं थी।
उसने रिमोट से चैनल बदलना शुरू कर दिया।
हर चैनल में अलग अलग प्रोग्राम चालू थे लेकिन प्रिया किसी भी चैनल पर नहीं रुकी।
अंत में झुंझला कर उसने रिमोट से टीवी बंद कर दिया।

वो बुरी तरह परेशान और आहत सी हो गई थी।
घर में इस वक्त वो अकेली ही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अरमान के ख़यालों से उसे कैसे मुक्ति मिले?

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"मे आई कम इन सर!" अशोक खत्री ने एक केबिन के दरवाज़े को हल्का सा खोल कर अंदर झांकते हुए कहा।

"यस कम इन।" शानदार केबिन के अंदर ऊंची पुश्त वाली रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे एक कसरती बदन वाले किन्तु हैंडसम नौजवान ने कहा।

अशोक केबिन के अंदर दाख़िल हुआ।
पीछे कांच का दरवाज़ा अपने आप ही बंद हो गया।
अशोक की नज़र टेबल के उस पार अपनी चेयर पर बैठे नौजवान पर पड़ी।

अशोक से उमर में वो काफी छोटा था लेकिन पद उससे कहीं बड़ा था इस लिए अशोक के अंदर थोड़ी झिझक और थोड़ी घबराहट थी।
उसने सुन रखा था कि ये नौजवान थोड़ा कड़क है और कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी है।

"प्लीज़ हैव ए सीट मिस्टर खत्री।" उस नौजवान ने अशोक को उसके सर नेम से संबोधित करते हुए कहा।

हालाकि उसका लहजा सपाट था।
एकदम भावहीन।
बहरहाल, अशोक खत्री धड़कते दिल के साथ आगे बढ़ा और टेबल के इस पार रखी तीन चेयर्स में से एक पर जा कर बैठ गया।

"सो, मिस्टर खत्री।" उसके बैठते ही उस नौजवान ने टेबल पर रखी कुछ फाइल्स में से एक पर से नज़र हटा कर उसकी तरफ देखा──"अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो आपको हमारी इस कंपनी में ज्वॉइन हुए लगभग एक महीना होने वाला है, राइट?"

"य...यस सर।" अशोक खत्री ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए जल्दी से कहा।

"आपने यहां ज्वाइन होने से पहले अपनी जो भी शर्तें रखीं थी।" उस आकर्षक से नौजवान ने अपलक अशोक की तरफ देखते हुए सपाट लहजे में ही कहा──"उन शर्तों को हमने माना और आपको आपके मन मुताबिक सैलरी देने को राज़ी हुए, राइट?"

"ज...जी जी बिल्कुल सर।"

अशोक को समझ नहीं आ रहा था कि सामने बैठा आकर्षक नौजवान आख़िर उससे कहना क्या चाहता है?
उसका जी चाहा कि असल बात पूछे लेकिन उसकी हिम्मत न पड़ी।

"उसके बदले आपने ये वादा किया था कि आप कम ज़िंक खर्च कर के बेहतर पाइप्स जी-आई कर के देंगे और कंपनी का फ़ायदा करवाएंगे।" सामने बैठे नौजवान ने जैसे अब जा कर असल मुद्दे की बात की──"जबकि असल में ऐसा आप अब तक नहीं कर पाए। आपकी अब तक की सारी रिपोर्ट मैंने देख ली है और ये जाना है कि आप उस व्यक्ति से भी ज़्यादा ज़िंक खर्च कर रहे हैं जो आपसे पहले यहां जी-आई के इंचार्ज पद पर था। हफ़्ते दस दिन का तो समझ में आता है मिस्टर खत्री लेकिन एक महीना होने को आया और अभी भी आप इस मामले में कुछ नहीं कर पाए।"

"म...मुझे पता है सर कि ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है।" अशोक ने अपना बचाव करते हुए मानो खुद की पैरवी की──"और इसके लिए मैं हद से ज़्यादा प्रयास भी कर रहा हूं लेकिन इसके बाद भी ज़िंक के खर्चे में कमी नहीं आ रही। असल में समस्या ये है कि जो नए वॉचमैन आए हैं उनको कितना भी समझाएं लेकिन वो सही से काम नहीं कर पा रहे। दूसरी समस्या ये है कि मटेरियल भी ख़राब आ रहा है जिसके चलते ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है। जिन पटरों से पाईप बनाए जा रहे हैं वो काफी ख़राब हैं। उनमें खुरदुरापन है जिसके चलते वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में कवर कर लेते हैं। एक्सपोर्ट के माल के लिए तो कोईल का मटेरियल चाहिए जो ज़िंक भी कम कवर करे और पाईप में शाइनिंग भी टॉप क्लास की दिखे।"

"आपके आने से पहले भी एक्सपोर्ट के माल के लिए ऐसा ही मटेरियल प्रयोग होता था मिस्टर खत्री।" सामने बैठे नौजवान ने कहा──"और जी-आई होने पर ज़िंक भी कम खर्च होता था। वेल, अगर ऐसा ही हाल रहा और ज़िंक की लागत में आप कमी नहीं कर पाए तो खुद सोचिए कि कंपनी में आपको रखने का क्या फ़ायदा? उम्मीद करता हूं कि आप एग्रीमेंट में किए गए अपने वायदे और दावे पर खरा उतरेंगे अदरवाइज़ कंपनी आपके खिलाफ़ कड़ा एक्शन लेने पर मजबूर हो जाएगी।"

नौजवान अधिकारी की ये बात सुन कर अशोक खत्री पलक झपकते ही सन्नाटे में आ गया।
उसकी धड़कनें अब किसी हथौड़े की तरह उसकी कनपटी को बजाने लगीं थी।
इतना तो वो भी जानता था कि ज़िंक की लागत में उसके हर प्रयास के बाद भी कोई कमी नहीं आ रही है।

ये सच है कि मटेरियल अच्छा नहीं मिल रहा है और वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में समेट ले रहा है लेकिन नौजवान अधिकारी के अनुसार ऐसा ही मटेरियल उसके आने से पूर्व भी मिलता था और उनमें ज़िंक उससे कम ही लग रहा था।

खत्री को समझ नहीं आ रहा था कि ज़िंक की लागत को कैसे कम करे?
अगर यही हाल रहा तो निश्चित ही उसकी नौकरी ख़तरे में पड़ जानी है।
उसे इस मामले में कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।

"आई होप, एवरीथिंग विल बी ऑल राइट मिस्टर खत्री।" उसकी सोचो को भंग करते हुए उस आकर्षक नौजवान ने कहा──"यू मे गो नाउ।"

अशोक खत्री चेयर से उठा और भारी क़दमों के साथ केबिन से बाहर आ गया।
उसने राहत की लंबी सांस ली लेकिन माथे पर से चिंता की लकीरें न मिटा सका।
थोड़ी ही देर में वो जी-आई वाले प्लांट की तरफ बढ़ता चला जा रहा था।

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"अरे! आज आने में इतनी देर क्यों लगा दी आपने?" प्रिया ने दरवाज़ा खोलते ही बाहर खड़े अपने पति से पूछा।

"क्या करें हो गई देर।" अशोक ने अजीब भाव से कहा──"काम में ये सब तो होता ही है।"

प्रिया ने महसूस किया कि आज उसके पति के चेहरे की चमक ग़ायब है।
बेहद निराश और थका थका सा नज़र आ रहा है वो।
प्रिया का जी चाहा कि पूछे मगर फिर उसने ये सोच कर अपना इरादा बदल लिया कि अभी तो उसका पति आया है और उसके आते ही उससे उसकी परेशानी का सबब पूछना ठीक नहीं होगा।

खा पी कर अशोक अपने कमरे में सोने चला गया था जबकि प्रिया जूठे बर्तन उठा कर किचन में रखने लगी थी।
उसके मन में बार बार यही ख़याल उभर रहा था कि आज उसके पति के चेहरे पर चमक क्यों नहीं है?
आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसके चलते उसका पति आज इतना निराश और थका हुआ सा लग रहा है?

जल्दी ही काम से फारिग़ हो कर प्रिया अपने कमरे में अशोक के पास पहुंच गई।
उसने खड़े खड़े ही ध्यान से अशोक की तरफ देखा।

अशोक बेड पर लेटा हुआ था।
उसका एक हाथ कोहनी से मुड़ा हुआ था और ऊपर उसके माथे पर कलाई के साथ रखा हुआ था।
आंखें बंद तो थीं लेकिन स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वो आंखें बंद किए किन्हीं गहरे विचारों में खोया हुआ है।
ये देख प्रिया के माथे पर शिकन उभर आई।

"क्या बात है अशोक?" फिर उसने बेड पर अशोक के बिल्कुल पास बैठ कर पूछा──"आज आप इतने टेंशन में क्यों दिख रहे हैं? आख़िर बात क्या है?"

"आं...क..कुछ नहीं।" अशोक ने खुद को सम्हालते हुए कहा──"बस ऐसे ही काम के बारे में सोच रहा था। तुम सुनाओ, नई मेड सही से काम कर रही है कि नहीं?"

"हां वो तो कर रही है।" प्रिया ने अशोक को ध्यान से देखते हुए कहा──"लेकिन आप मुझसे कुछ छुपा रहे हैं। आते समय ही मैंने आपके चेहरे पर परेशानी देखी थी और अभी भी आप आंखें बंद किए कुछ ऐसा सोचने में गुम थे जो शायद आपकी चिंता का कारण बना हुआ है। बताइए ना, आख़िर बात क्या है?"

प्रिया अपने पति से उसकी परेशानी जानने पर इस लिए भी ज़ोर दे रही थी क्योंकि पति को कुछ सोचते देख वो ये सोच कर खुद भी परेशान हो गई थी कि कहीं उसके पति को पता तो नहीं चल गया कि वो अपने पूर्व प्रेमी से मिली थी?

"ऐसी कोई बात नहीं है बेबी।" अशोक ने उठ कर प्रिया के चेहरे को हल्के से सहलाते हुए कहा──"असल में आज कल काम का प्रेशर थोड़ा बढ़ गया है इस लिए काम के प्रति थोड़ी चिंता और थकावट हो रही है। बाकी कोई बात नहीं है।"

"सच कह रहे हैं ना?" प्रिया ने जैसे आश्वस्त होने की गरज से पूछा।

"हां मेरी जान, मैं सच ही कह रहा हूं।" अशोक ने कहा और थोड़ा सा आगे बढ़ कर प्रिया के गुलाबी होठों को चूम लिया।

उसकी इस क्रिया से प्रिया जहां एक तरफ आश्वस्त हो गई वहीं दूसरी तरफ हल्का सा शर्मा भी गई।
बहरहाल, इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई।

अशोक मानसिक तनाव में था जिसे उसने प्रिया से छुपा लिया था।
उसने दूसरी तरफ करवट ली और आंखें बंद कर के सोने की कोशिश करने लगा।

प्रिया के लिए ये सामान्य बात थी।
अशोक उमर में उससे काफी बड़ा था जिसके चलते दोनों के बीच हर रात काम क्रीड़ा नहीं होती थी।

अशोक ने दूसरी तरफ करवट ली तो प्रिया ने भी उसकी फ़िक्र छोड़ आंख बंद कर के सोने की कोशिश करने लगी।
कुछ ही देर में उसका भटकता हुआ मन एक बार फिर अरमान की तरफ जा पहुंचा।
अगले ही पल जब अरमान के ख़याल उभरने शुरू हुए तो वो एक बार फिर से परेशान हो उठी।
रात बड़ी मुश्किल से उसकी आंख लगी।

Bahut hi shandar update he TheBlackBlood Shubham Bhai

Bhai ab updates weekly hi sahi par regular dena

Keep rocking bro
 

Thakur

असला हम भी रखते है पहलवान 😼
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♡ बेरहम इश्क़ ♡
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Update ~ 01




"अरे! आ गया तू।" टैक्सी की ड्राइविंग सीट पर बैठे लगभग तीस की उमर वाले व्यक्ति ने अपनी ही उमर के उस व्यक्ति को देख कर कहा जो अभी अभी टैक्सी का दरवाज़ा खोल कर अंदर उसके बगल वाली सीट पर बैठ गया था──"बड़ा टाइम लगा दिया तूने वापस आने में?"

"क्या बताऊं अरमान।" आगंतुक व्यक्ति ने हल्की मुस्कान होठों पर सजा कर कहा──"वापस आने का तो अभी भी दिल नहीं कर रहा था लेकिन तेरी वजह से आना पड़ा। वैसे मैंने तो तुझे बाहर ही कुछ देर इंतज़ार करने को कहा था पर तू जल्दी ही चला आया, क्यों भाई?"

"आज का दिन जहां तेरे लिए बेहद ख़ास था।" अरमान ने ठंडी सांस खींचते हुए कहा──"वहीं मेरे लिए बड़ा ही अजीब और बुरा था।"

"ये क्या कह रहा है तू?" आगंतुक चौंका──"कुछ ग़लत हुआ है क्या तेरे साथ?"

"आज तक अच्छा ही क्या हुआ है मेरे साथ?" अरमान ने कहा──"मेरे लिए इस संसार की जो सबसे बड़ी खुशी और कीमती दौलत थी वो तो नसीब ही नहीं हुई।"

"यार इमोशनल बातें मत कर।" आगंतुक ने बुरा सा मुंह बना कर कहा──"और साफ साफ बता हुआ क्या है?"

"बताया तो कि बड़ा अजीब भी हुआ है और बुरा भी।" अरमान ने कहा──"अजीब ये कि जिसे कई साल तलाश कर के थक गया था और आज भी उसे भूलने की कोशिश कर रहा हूं वो मेरे सामने आज अचानक प्रगट हो गई। उसके बाद बुरा ये हुआ कि उसने एक बार फिर से दिल को गहरी चोट दे दी।"

"आर यू टॉकिंग अबाउट प्रिया?" आगंतुक ने आश्चर्य से आंखें फैला कर अरमान को देखा──"ओह! माय गॉड। तेरी प्रिया से मुलाक़ात हुई?"

"हां विशाल।" अरमान ने गहरी सांस ली──"मैंने कभी एक्सपेक्ट नहीं किया था कि उससे इस तरह मुलाक़ात होगी।"

"पूरी बात बता।" विशाल ने जैसे उत्सुकता से पूछा──"कैसे मिली वो और तुम दोनों के बीच क्या बातें हुईं?"

"जब तू उस फाइव स्टार होटल के अंदर लाबी में अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड से बात कर रहा था तो मैंने सोचा कि मेरा वहां पर मौजूद रहना ठीक नहीं है।" अरमान ने कहा──"इसी लिए मैंने तुझसे कहा था कि मैं बाहर जा रहा हूं लेकिन तूने मुझे होटल के बाहर इंतज़ार करने को कहा। मुझे पता था कि तुम दोनों कई सालों बाद मिले थे तो हाल चाल पूछने में समय ज़्यादा लग सकता है पर तूने बोला कि तू जल्दी ही बाहर आ जाएगा। मैंने सोचा ऐसा होगा तो नहीं लेकिन चलो थोड़ी देर इंतज़ार कर ही लेता हूं। बस, यही सोच के होटल के बाहर बिल्कुल गेट के पास ही आ कर खड़ा हो गया था। मुश्किल से दो ही मिनट गुज़रे रहे होंगे कि तभी पीछे से एक मधुर आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। किसी ने पीछे से अपनी मधुर आवाज़ में──'एक्सक्यूज़ मी' कहा था। आवाज़ क्योंकि जानी पहचानी सी लगी थी इस लिए मैं बिजली की स्पीड में पीछे की तरफ घूम गया था। अगले ही पल मेरी नज़र उस प्रिया पर पड़ी जिसे पिछले सात सालों से सिर्फ ख़्वाब में ही देखता आया था।"

"बड़े आश्चर्य की बात है।" विशाल तपाक से बोल पड़ा──"इतने सालों बाद वो एकदम से तेरे सामने कैसे प्रकट हो गई? सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या वो इसी शहर में थी?"

"नहीं, अगर वो इसी शहर में होती तो क्या मैं उसे ढूंढ नहीं लेता?" अरमान ने कहा──"ख़ैर, उसे देख कर उस वक्त मैं अपनी पलकें झपकाना ही भूल गया था। ऐसा फील हो रहा था जैसे मैं खुली आंखों से ही ख़्वाब देखने लगा हूं।"

"फिर?" विशाल ने उसी उत्सुकता से पूछा──"मेरा मतलब है कि क्या फिर तेरी उससे बातचीत हुई?"

"उसी की मधुर आवाज़ से मुझे होश आया था।" अरमान ने कहा──"फिर उसे देखते ही मेरे मुंह से उसका नाम निकल गया था जिसके चलते उसे पहले तो बड़ी हैरानी हुई लेकिन फिर मेरी आवाज़ से मुझे पहचान ग‌ई वो। पहचान लेने के बाद मेरे पास आई और फिर अजीब तरह से घूरने लगी मुझे। उसके बाद उसने जो कुछ कहा उसे सुन कर दिल छलनी छलनी हो गया था।"

"क्या कहा था उसने तुझे?" विशाल के चेहरे पर पलक झपकते ही कठोरता के भाव उभर आए──"मुझे बता अरमान, तेरा दिल दुखाने वाली उस प्रिया को ज़िंदा नहीं छोडूंगा मैं।"

"जाने दे।" अरमान ने कहा──"ऐसे व्यक्ति को कुछ कहने का क्या फ़ायदा जिसकी फितरत ही किसी का दिल दुखाना हो।"

"इसके बावजूद तू उस लड़की को भूल नहीं रहा?" विशाल ने इस बार नाराज़गी से कहा──"इतने पर भी तू ये उम्मीद लगाए बैठा है कि वो तुझे एक दिन वापस मिलेगी?"

"तुझे तो पता ही है कि उम्मीद पर ही ये दुनिया क़ायम है।" अरमान ने गहरी सांस ले कर कहा──"और मैं जो उम्मीद किए बैठा हूं वो एक दिन ज़रूर पूरी होगी। वैसे तेरी जानकारी के लिए बता दूं कि उसकी ख़्वाहिश पूरी हो गई है। मेरा मतलब है कि अब वो शादी शुदा है।"

"व्हाट???" विशाल बुरी तरह चौंका, फिर जल्दी ही खुद को सम्हाल कर बोला──"तो तू ये जानने के बाद भी कि वो शादी शुदा है उसे वापस पाने की उम्मीद कर रहा है?"

"बिल्कुल।" अरमान ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा──"अब तक मुझे इस बात पर शक था कि मेरी ख़्वाहिश कभी पूरी होगी भी या नहीं लेकिन अब पूरा यकीन हो गया है कि वो मुझे ज़रूर वापस मिलेगी।"

"कैसी बकवास कर रहा है तू?" विशाल ने जैसे झुंझला कर कहा──"जब वो शादी शुदा है तो भला वो कैसे तुझे वापस मिल जाएगी? उसको अगर तेरे जीवन में आना ही होता तो सात साल पहले तेरे सच्चे प्यार को वो ठोकर मार कर नहीं चली जाती।"

"जो पहले नहीं हो सका वो अब ज़रूर होगा विशाल।" अरमान ने अजीब भाव से कहा──"उसने मुझे इस लिए ठुकराया था क्योंकि मैं मिडिल क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करता था, जबकि उसे अपने शौक पूरे करने के लिए कोई रईसजादा चाहिए था। एक ऐसा पति चाहिए था जो उसकी हर इच्छा पूरी करे और उसे रानी बना कर रखे।"

"तो क्या अब उसे ऐसा ही कोई रईसजादा पति के रूप में मिला हुआ है?" विशाल ने आंखें फैला कर पूछा।

"हां, कम से कम उसकी नज़र में तो वो ऐसा ही है।" अरमान ने कहा──"आज जब वो मुझे होटल के बाहर मिली थी तो मुझसे वैसे ही लहजे में बात कर रही थी जैसे उस समय किया था जब वो मुझसे हमेशा के लिए जुदा हो रही थी। तुझे पता है उसने सबसे पहले मुझसे क्या कहा? उसने कहा──'तुम्हारी हैसियत आज भी फाइव स्टार होटल को बस दूर से ही देखने की है, जबकि वो जब चाहे इस फाइव स्टार होटल के अंदर जा कर यहां के मंहगे मंहगे पकवान या कुछ भी खा पी सकती है। और ऐसा वो इस लिए कर सकती है क्योंकि उसका पति एक बहुत बड़ी कंपनी में ऊंची पोस्ट पर काम करता है। उसके पास किसी चीज़ की कमी नहीं है।"

"तूने उससे पूछा नहीं कि अब तक कहां ग़ायब थी वो?" विशाल ने कठोरता से कहा──"तूने उससे पूछा नहीं कि आज अचानक से वो तेरे सामने कैसे प्रगट हो गई है, जबकि तूने उसे खोजने में धरती आसमान एक कर दिया था?"

"तुझे पता ही है कि आज से सवा सात साल पहले जब उसने मुझसे रिश्ता तोड़ा था तो उसका मग़रूर बाप अपना घर बार बेच कर तथा उसे ले कर यहां से कहीं और चला गया था।" अरमान ने कहा──"मैंने अपनी तरफ से ये पता करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी कि उसका बाप उसे ले कर किस जगह गया है? ख़ैर आज उसने बताया कि आज से चार साल पहले उसकी शादी एक ऐसे व्यक्ति से हुई जो घर से तो थोड़ा अमीर था ही किंतु एक प्राइवेट कंपनी में अच्छे पोस्ट पर भी था।"

"एक मिनट।" विशाल ने बीच में ही टोकते हुए कहा──"उसकी शादी किसी पैसे वाले व्यक्ति से कैसे हो गई होगी जबकि उसके खुद के बाप की इतनी हैसियत नहीं थी कि वो किसी पैसे वाले घर में अपनी लड़की की शादी कर सके?"

"असल में जिस व्यक्ति से प्रिया की शादी हुई है वो पहले से ही शादी शुदा था और उसको एक चौदह साल की बेटी थी।" अरमान ने बताया──"उसकी बीवी क्योंकि किसी गंभीर बीमारी के चलते ईश्वर को प्यारी हो गई थी तो उसने प्रिया से शादी करने में कोई आना कानी नहीं की थी। प्रिया के अनुसार उस व्यक्ति को प्रिया बहुत पसंद आ गई थी इस लिए उसने उसके बाप से प्रिया का हाथ मांग लिया था। प्रिया को भी इस रिश्ते से इंकार नहीं था। इंकार होता भी कैसे? आख़िर उसकी चाहत तो यही थी कि किसी पैसे वाले घर में उसकी शादी हो जिससे वो हर तरह का शौक पूरा कर सके और हर सुख भोग सके। उसे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ा कि वो आदमी उमर में उससे कितना बड़ा है अथवा वो पहले से ही एक चौदह साल की बेटी का बाप है।"

"ओह! तो ये बात है।" विशाल ने कहने के साथ ही एक सिगरेट जलाई और फिर धुंआ उड़ाते हुए बोला──"चलो ये तो समझ आ गया कि प्रिया की लाइफ ऐसे बदली लेकिन अभी ये जानना बाकी है कि वो इतने सालों बाद आज अचानक उसी शहर में कैसे नज़र आ गई जिस शहर में उसके अतीत के रूप में तू मौजूद है?"

"मेरे पूछने पर उसने बताया कि एक महीना पहले उसके पति को इस शहर में मौजूद एक बहुत बड़ी कंपनी से जॉब का ऑफर आया था।" अरमान ने कहा───"उसके पति ने कंपनी को पहले अपनी टर्म्स एंड कंडीसन बताई और साथ ही कंपनी का मुआयना किया। जब उसे सब कुछ ठीक लगा तो उसने अपनी पहले वाली कंपनी में स्टीफा दे कर यहां की कंपनी ज्वॉइन कर ली। अभी पिछले हफ़्ते ही वो अपने पति के साथ इस शहर में शिफ्ट हुई है।"

"इंट्रेस्टिंग।" विशाल ने कहा──"तो क्या तुमने उससे ये भी पूछा कि उसका पति यहां किस कंपनी में ज्वॉइन हुआ है?"

"पूछने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।" अरमान ने कहा──"वो इतना गुरूर में थी कि खुद ही सब कुछ बताती चली गई। उसने बताया कि उसका पति इस शहर की सबसे बड़ी कंपनी──पैराडाइज स्टील्स एण्ड पॉवर लिमिटेड में ऊंची पोस्ट पर है।

"ओह! आई सी।" विशाल के होठों पर सहसा हल्की सी मुस्कान उभर आई──"फिर तो भाई उसका यूं आसमान में उड़ना जायज़ है और साथ ही तुझे नीचा दिखाते हुए तेरा दिल दुखाना भी।"

उसकी इस बात पर अरमान कुछ न बोला।
उसके चेहरे पर कई तरह के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे थे।
उसने सीट पर ही रखे सिगरेट के पैकेट को उठाया और उससे एक सिगरेट निकाल कर जला ली।
विशाल अपनी दो उंगलियों के बीच सुलगती सिगरेट लिए उसी को देख रहा था।

"तो अब क्या सोच रहा है?" फिर उसने अरमान से पूछा──"तूने कहा कि तू इस सबके बावजूद उसे वापस हासिल करेगा लेकिन कैसे? आख़िर क्या सोचा है इस बारे में? कहीं तू....?"

"उसको जब चाहा तो चाहत की इंतहां कर दी हमने।" अरमान ने सिगरेट का गाढ़ा धुआं उड़ाते हुए अजीब भाव से कहा──"अब उसी चाहत में उसको हासिल करने की इंतहां करेंगे।"

"आख़िर क्या करने वाला है तू?" विशाल सम्हल कर बैठते हुए बोला──"कुछ ग़लत करने का तो नहीं सोच लिया है तूने?"

"इश्क़ और जंग में सब जायज़ है माय डियर फ्रेंड।" अरमान ने कहा───"बट यू डोंट वरी, मैं कोई भी काम ज़बरदस्ती नहीं करूंगा। अच्छा अब चलता हूं...।"

[][][][][]

"आंटी मेरे शूज़ कहां हैं? आपने कल उन्हें धुला था ना?" कॉलेज की यूनिफॉर्म पहने एक लड़की ने किचन की तरफ मुंह कर के आवाज़ दी──"जल्दी बताइए मुझे कॉलेज जाने के लिए लेट हो जाएगा।"

"तुम्हारे रूम में ही आलमारी के पास रख दिया था बेटा।" किचन से प्रिया ने थोड़ी ऊंची आवाज़ में बताया।

किचन में प्रिया अपने पति अशोक और अपनी सौतेली बेटी अंकिता के लिए ब्रेक फ़ास्ट तैयार कर रही थी।
प्रिया को रोज़ रोज़ किचन में खुद ही खाना बनाने में बड़ा गुस्सा आता था।

इसके पहले जिस जगह वो अपने पति के साथ रह रही थी वहां पर खाना बनाने के लिए एक नौकरानी थी। जबकि यहां पर उसे खुद ही सारे काम करने पड़ रहे थे।

उसने अशोक से कई बार कहा था कि घर के काम के लिए किसी नौकरानी का इंतज़ाम कर दें लेकिन अशोक काम की वजह से हर रोज़ टाल मटोल कर रहा था।

कंपनी जाते समय वो यही कहता कि आज इस बारे में किसी से बात करेगा लेकिन फिर वो भूल जाता था।
उसका पति अशोक लगभग पचास की उमर का व्यक्ति था।
यूं तो वो दिखने में अच्छा खासा था और रौबदार भी था लेकिन शरीर थोड़ा भारी हो गया था।
पेट थोड़ा से ज़्यादा बाहर निकल आया था।
सिर के बाल भी धीरे धीरे ग़ायब से होते नज़र आने लगे थे।
स्वभाव से वो शांत था।
अपनी बेटी अंकिता और दूसरी पत्नी प्रिया से वो बहुत प्यार करता था।

शांत स्वभाव होने के चलते प्रिया हमेशा उस पर हावी रहती थी और जो चाहती थी वो उससे करवाती रहती थी।
अशोक भी ये सोच कर कुछ नहीं बोलता था कि कम उमर की बीवी को नाराज़ करने से कहीं वो उसे छोड़ कर चली ना जाए।
वैसे भी पिछले साढ़े चार सालों से वो प्रिया की हर आदत से वाक़िफ हो गया था।

वैसे तो वो अपने इस छोटे से परिवार से बेहद खुश था लेकिन दो बातें अक्सर उसे उदास कर देती थीं।
एक तो ये कि उसके हज़ारों बार कहने पर भी उसकी बेटी अंकिता उसकी दूसरी बीवी को मां अथवा मॉम नहीं कहती थी बल्कि आंटी ही कहती थी और दूसरी ये कि औलाद के रूप में उसकी सिर्फ बेटी ही थी।
वो प्रिया से एक बेटा चाहता था लेकिन साढ़े चार साल शादी के हो जाने के बाद भी उसे प्रिया से कोई औलाद नहीं हो पाई थी।

वो जानता था कि प्रिया अभी भरपूर जवान है और वो पचास का हो चुका है।
वो सोचता था कि औलाद न होने वाली समस्या यकीनन उसी में होगी, क्योंकि संभव है कि पचास का हो जाने की वजह से वो प्रिया को प्रेग्नेंट न कर पा रहा होगा।
हालाकि प्रिया को इस बात से कोई शिकायत नहीं थी।
उसने कभी ये चाहत नहीं की थी कि उसको कोई बच्चा हो।
वो अंकिता को अपनी सगी बेटी की तरह ही मानती थी और उसे एक मां का प्यार दुलार देने की कोशिश करती रहती थी।

हां ये बात उसे भी थोड़ी तकलीफ़ देती थी कि अंकिता उसे मां नहीं बल्कि आंटी कहती है।

"आंटी, ब्रेक फ़ास्ट रेडी हुआ क्या?" अंकिता ने शूज़ पहने किचन के दरवाज़े के पास आ कर प्रिया से पूछा।

"हां बेटा रेडी हो गया है।" प्रिया ने पलट कर कहा──"तुम जा कर डायनिंग टेबल पर बैठो। तब तक मैं तुम्हारे लिए थाली में ब्रेक फ़ास्ट लगाती हूं।"

"ओके आंटी।"

"तुम्हारे डैड तैयार हुए क्या?"

"आई डोंट नो आंटी।" अंकिता ने कहा──"मेबी, रेडी हो रहे होंगे।"

थोड़ी ही देर में प्रिया ने ब्रेक फ़ास्ट अंकिता को सर्व कर दिया।
फिर वो अपने कमरे की तरफ बढ़ चली।
उसके मन में बार बार एक नौकरानी रखने का ख़याल आ रहा था।
वो इस बारे में अशोक को फिर से याद दिला देना चाहती थी।

"अरे! बस रेडी हो गया बेबी।" अशोक ने जैसे ही उसे कमरे में दाख़िल होते देखा तो झट से बोला──"और हां, मुझे याद है कि मुझे किसी से नौकरानी के बारे में चर्चा करनी है। डोंट वरी, आज मैं इस बात को बिल्कुल भी नहीं भूलूंगा।"

"आप भूलें या ना भूलें इससे मुझे कोई मतलब नहीं है।" प्रिया ने उखड़े हुए लहजे से कहा──"मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि आज शाम को आप एक मेड ले कर ही यहां आएंगे और अगर ऐसा नहीं हुआ तो सोच लीजिए मैं क्या क़दम उठाऊंगी।"

"अरे! ये क्या कह रही हो तुम?" अशोक ने एकदम से चौंक कर कहा──"देखो तुम प्लीज़ कोई भी ऐसा वैसा क़दम नहीं उठाना। आई प्रॉमिस कि आज शाम को मैं अपने साथ एक मेड ले कर ही आऊंगा। चलो अब एक प्यारी सी मुस्कान अपने इन गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर सजाओ।"

प्रिया ने अशोक को पहले तो घूर कर देखा फिर अपने चेहरे को सामान्य कर के होठों पर मुस्कान सजा ली।

"ये हुई न बात।" अशोक उसके क़रीब आ कर उसे कंधों से पकड़ कर बोला──"यू नो, जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा था तब तुम्हारी इसी मुस्कान को देख कर तुम पर मर मिटा था। यकीन मानो, आज भी तुम पर वैसे ही मिटा हुआ हूं। जब से तुम मेरी ज़िंदगी में आई हो तब से मेरी लाइफ खुशियों से भर गई है। मैं भी इसी कोशिश में लगा रहता हूं कि तुम्हें हर प्रकार की खुशियां दूं। एक पल के लिए भी तुम्हें कोई तकलीफ़ ना होने दूं। तभी तो तुम्हारी हर आरज़ू को झट से पूरा करने में लग जाता हूं।"

"चलिए अब बातें न बनाइए।" प्रिया ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा──"ब्रेक फ़ास्ट रेडी कर दिया है मैंने।"

"अच्छा सुनो ना।" अशोक ने थोड़ा धीमें से कहा──"अपने इन गुलाबी होठों की एक पप्पी दो ना।"

"नो, बिल्कुल नहीं।" प्रिया ने उससे दूर हट कर कहा──"पप्पी शप्पी तब तक नहीं मिलेगी जब तक आप कोई मेड ले कर नहीं आएंगे।"

"आज पक्का ले कर आऊंगा बेबी।" अशोक ने कहा──"आज यहां से जाते ही सबसे पहला काम यही करूंगा। मेरा यकीन करो, आज एक मेड ले कर ही आऊंगा अपने साथ। प्लीज़ अब तो खुश हो जाओ मेरी जान और अपने गुलाबी होठों को चूम लेने दो।"

अशोक जिस तरह से मिन्नतें कर रहा था और जिस प्यार से कर रहा था उससे प्रिया इंकार नहीं कर सकी।
वो जानती थी कि उसके पति ने आज तक उसकी किसी भी बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया है।

बहरहाल, वो आगे बढ़ी और अपने चेहरे को अशोक के सामने ऐसे तरीके से पेश किया कि अशोक बड़े आराम से उसके होठों को चूम सके।

कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था इस लिए अशोक ने पहले खुले दरवाज़े से बाहर की तरफ निगाह डाली।
असल में वो नहीं चाहता था कि उसकी बेटी अंकिता ये सब देख ले।
हालाकि अठारह साल की अंकिता अब इस बात से अंजान नहीं थी कि पति पत्नी के बीच किस तरह से प्यार मोहब्बत का आदान प्रदान होता है।
लेकिन शांत स्वभाव और मान मर्यादा का ख़याल रखने वाला अशोक इन सब बातों में थोड़ा परहेज़ रखता था।

बेफिक्र होने के बाद वो आगे बढ़ा और प्रिया के चेहरे को अपनी हथेलियों में ले कर बहुत ही आहिस्ता से उसके गुलाबी होठों को चूम लिया।

"बस बस इतना काफी है।" प्रिया ने खुद को उससे दूर किया और कहा──"अब चलिए वरना ब्रेक फ़ास्ट ठंडा हो जाएगा।"

मुस्कुराता हुआ अशोक उसके पीछे पीछे ही कमरे से बाहर आ गया।
जहां एक तरफ प्रिया उसके लिए ब्रेक फ़ास्ट लगाने किचन में चली गई वहीं दूसरी तरफ वो डायनिंग टेबल के पास आ कर एक कुर्सी पर बैठ गया।
उसके बाएं साइड वाली कुर्सी पर उसकी बेटी अंकिता ब्रेक फ़ास्ट कर रही थी।

"गुड मॉर्निंग डैड।"

"मॉर्निंग माय प्रिंसेस।" अशोक ने प्यार से अपनी बेटी को देखा──"बाय दि वे, कैसा लग रहा है कॉलेज में? किसी से दोस्ती हुई या नहीं?"

"नाट बैड डैड।" अंकिता ने कहा──"स्टार्टिंग में एक दो दिन अजीब फील हो रहा था बट नाऊ ऑल गुड। मेरी दो तीन गर्ल्स से दोस्ती हो गई है।"

"ओह! दैट्स ग्रेट।" अशोक ने कहा──"ये तो बहुत अच्छी बात है। वैसे मुझे यकीन है कि मेरी प्रिंसेस ने जिन लड़कियों से दोस्ती की है वो मेरी प्रिंसेस की ही तरह पढ़ाई में स्मार्ट होंगी और सिर्फ पढ़ाई पर ही फोकस रखती होंगी, राइट?"

"यस डैड।" अंकिता ने कहा──"मैं फालतू लोगों से दोस्ती ही नहीं करती।"

"वैरी गुड।"

"ये लीजिए।" तभी प्रिया ने टेबल पर ब्रेक फ़ास्ट की प्लेट रखते हुए कहा──"अब चुपचाप ब्रेक फ़ास्ट कीजिए और हां, आज अंकिता को आप कॉलेज छोड़ दीजिएगा।"

"क्यों?" अशोक चौंका──"बस नहीं आएगी क्या आज?"

"आएगी।" प्रिया ने कहा──"और ये बस में भी जा सकती है लेकिन बात ये है कि किसी ज़रूरी काम से इसके कॉलेज में आपको बुलाया गया है। तो जब आपको इसके कॉलेज जाना ही है तो अपने साथ ही कार में लेते जाइएगा इसे।"

"मुझे भला किस काम से बुलाया गया है इसके कॉलेज में?" अशोक ने कहने के साथ ही अंकिता की तरफ देखा──"बेटा तुमने बताया नहीं मुझे?"

"सॉरी डैड।" अंकिता ने कहा──"आपको बताना भूल गई थी बट आंटी को बता दिया था।"

"ओके फाईन।" अशोक ने कहा──"लेकिन तुम्हारे कॉलेज में किस काम से जाना है मुझे?"

"पता नहीं डैड।" अंकिता ने अपने कंधे उचकाए──"मुझसे प्रिंसिपल मैम ने कहा तो मैंने आ कर आंटी को बता दिया।"

"हां तो क्या?" प्रिया ने कहा──"आप चले जाइए। जो भी बात होगी वहां जाने से आपको ख़ुद ही पता चल जाएगी।"

अशोक ने इसके बाद कुछ नहीं कहा।
दोनों बाप बेटी ने ख़ामोशी से ब्रेक फ़ास्ट किया और फिर थोड़ी देर में दोनों कार से निकल गए। पीछे फ़्लैट में प्रिया अकेली घर के बाकी कामों में जुट गई थी।
Shuruat kaafi sahi he story ki

Par anjaam shayad sab ko pata ho :D
 

Thakur

असला हम भी रखते है पहलवान 😼
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Update ~ 02




प्रिया ने टैक्सी वाले को रुकने को कहा तो ड्राइवर ने उसकी बताई हुई जगह पर टैक्सी रोक दी।
दोपहर के ढाई बज रहे थे।
कुछ देर पहले धूप खिली हुई थी लेकिन अब आसमान में हल्के काले बादल छा गए थे।
ठंडी ठंडी हवा चल रही थी जिसके चलते उसके रेशमी बाल बार बार उसके चहरे को ढंक दे रहे थे।

टैक्सी ड्राइवर को उसने किराया दिया और पलट कर एक तरफ को चल दी।
चलते हुए वो इधर उधर देखती भी जा रही थी।
हर तरफ उसे बदला बदला सा नज़र आ रहा था।
एक वक्त था जब इस जगह की हर चीज़ उसके ज़हन में छपी हुई थी लेकिन अब हर जगह बदलाव नज़र आ रहा था।

"मैं क्यों खुद को रोक नहीं पा रही?" उसने जैसे खुद से ही कहा──"क्यों मेरे मन में बार बार उसके पास जाने के ख़याल उभर रहे हैं? नहीं नहीं, ये ग़लत है। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। मैं एक शादी शुदा हूं और एक इज्ज़तदार घर की बहू भी हूं। मुझे अपने अतीत के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए।"

मन में उभरते इन ख़यालों ने सहसा उसके क़दम रोक दिए।
उसने गर्दन घुमा कर इधर उधर देखा।
उसे एकदम से ऐसा लगा जैसे आस पास की हर चीज़ उसे अजीब तरह से घूरने लगी है।
इस एहसास ने एकदम से उसकी धड़कनें तेज़ कर दी।
वो खुद को अपराधी सा महसूस करने लगी।

"ये...ये कैसा महसूस हो रहा है मुझे?" उसने अपनी बढ़ चली सांसों को काबू करने के लिए अपने सीने पर एक हाथ रख कर सोचा──"आज से पहले तो ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ मुझे?"

प्रिया ने आंखें बंद कर के गहरी गहरी सांसें ली।
किसी तरह अपनी हालत को दुरुस्त किया।
उसे थोड़ी हैरानी हो रही थी कि ये कैसा महसूस हो रहा है उसे?

"वापस लौट जा प्रिया।" अचानक उसके अंदर से आवाज़ आई──"अपने गुज़रे हुए समय की तरफ देखना ठीक नहीं है।"

"हां, पर मेरे गुज़रे हुए कल का एक किरदार मेरे सामने भी तो आ गया था उस दिन, फिर उसका क्या?" प्रिया ने मन ही मन अपने अंदर की उस प्रिया से कहा जिसने उसे आवाज़ दी थी──"तुमने भी तो सुना ही होगा कि उस दिन मैंने किस लहजे में उससे बातें की थी? यकीनन मेरी उन बातों ने बहुत ज़्यादा उसका दिल दुखाया होगा। उसके चेहरे पर उभरी पीड़ा इस बात का सबूत भी दे रही थी मगर उस वक्त मुझे उसकी पीड़ा का तनिक भी आभास नहीं हुआ था। उस वक्त मैं गुरूर में अंधी जो थी। भला क्या ज़रूरत थी मुझे उसको वो सब बोलने की? बोलना तो उसे चाहिए था क्योंकि छोड़ा तो मैंने ही था उसे, मगर उसने शिकायत में एक लफ्ज़ भी नहीं कहा था मुझसे?"

"हां तो क्या हुआ?" उसके अंदर की प्रिया ने उससे कहा──"उसे छोड़ कर कौन सा ग़लत काम किया था तुमने? अपने हित और अपने सुख के बारे में तो हर कोई सोचता है। तुमने अपनी खुशियों के बारे में सोच कर जो किया वो बिल्कुल भी ग़लत नहीं था। बल्कि ग़लत तो तुम अब करने जा रही हो। वापस लौट जाओ प्रिया, ये मत भूलो कि अब तुम शादी शुदा हो और किसी के घर की अमानत के साथ साथ आबरू भी हो। अगर तुम्हारे पति को पता चल गया कि तुम अपने अतीत की तरफ पलट गई हो तो यकीन मानो अच्छा नहीं होगा।"

प्रिया अपने अंदर की इस आवाज़ को सुन कर बुरी तरह कांप गई।
पलक झपकते ही उसकी आंखों के सामने उसके पति अशोक और उसके परिवार वालों के चेहरे उजागर होते चले गए।

ठंडी ठंडी हवा चलने के बाद भी उसका चेहरा पसीने से भर गया।
उसने हड़बड़ा कर दुपट्टे से चेहरे का पसीना पोंछा और पुनः इधर उधर देखने लगी।

वो सड़क के किनारे खड़ी थी।
सड़क के दोनों तरफ तरह तरह की दुकानें थी।
सड़क पर वाहनों का आना जाना लगा हुआ था।
कई तरह के लोग आते जाते नज़र आ रहे थे उसे।
कुछ जो उसके पास से गुज़र रहे थे जो उसे अजीब तरह से देखते और आगे बढ़ जाते।

प्रिया ये सब देख बुरी तरह हड़बड़ा गई।
थोड़ा घबरा भी गई।
सहसा उसे एहसास हुआ कि सड़क के किनारे उसका यूं खड़े रहना उचित नहीं है।
अगले ही पल वो फ़ौरन ही खुद को सम्हालते हुए एक तरफ को बढ़ चली।

"क्या कर रही है प्रिया?" अंदर वाली प्रिया ने फिर से उसे पुकारा──"तू अभी भी आगे बढ़ी जा रही है? क्या पूरी तरह बेवकूफ ही है तू?"

"चुप रहो तुम।" प्रिया ने मन ही मन अपने अंदर की प्रिया को गुस्से से डांटा──"मैं जानती हूं कि ये ठीक नहीं है लेकिन एक बार, बस एक बार उससे मिलना चाहती हूं। उससे अपने उस दिन के बिहैवियर के लिए माफ़ी मांगना चाहती हूं। उसके बाद, मेरा यकीन करो...उसके बाद मैं दुबारा कभी उससे मिलने का सोचूंगी भी नहीं।"

"अच्छा? क्या सच में?" अंदर की प्रिया ने जैसे तंज़ किया।

"हां सच में।" प्रिया ने मन ही मन ये जवाब देते हुए ऐसा महसूस किया जैसे अपनी ये बात उसे खुद ही झूठी लग रही हो, बोली──"माफ़ी मांगने के बाद कभी नहीं मिलूंगी उससे।"

उसके ऐसा कहने पर इस बार उसे अपने अंदर से कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी।
उसे थोड़ी हैरानी हुई।
उसने ध्यान से अपने अंदर की आवाज़ सुनने की कोशिश की।
मगर कुछ भी महसूस नहीं हुआ उसे।

सड़क पर वाहनों का शोर हो रहा था।
प्रिया ने खुद को सम्हाला और नज़र उठा कर बाएं तरफ जाने वाले रास्ते की तरफ देखा।

"मैडम किधर जाना है आपको?" एक ऑटो वाले ने उसके क़रीब अपने ऑटो को धीमा करते हुए आवाज़ दी।

प्रिया ने उसकी तरफ देखा और फिर ना में सिर हिला कर आगे बढ़ चली।
ऑटो वाले ने अपना ऑटो आगे बढ़ा दिया।

प्रिया बाएं तरफ जाने वाले रास्ते में मुड़ गई।
उसके मन में काफी उथल पुथल चल रही थी लेकिन जैसे उसने अब पूरा मन बना लिया था कि वो वहां जा कर ही रहेगी।

सहसा वो रुक गई।
उसने एक बार पुनः इधर उधर देखा।
सब कुछ बदला बदला सा दिख रहा था उसे।

"दुनिया कितना जल्दी बदल जाती है।" उसने मन ही मन कहा किंतु अगले ही पल उसे खुद का ख़याल आ गया──"मैं भी तो बदल गई थी।"

इस ख़याल ने उसके अंदर एक टीस सी पैदा कर दी।
उसे थोड़ी तकलीफ़ हुई।
बुरा भी महसूस हुआ।
आंखें बंद कर के उसने एक गहरी सांस ली।

"यहीं से तो एक पतला रास्ता जाता था उसके घर की तरफ।" प्रिया ने एक तरफ देखते हुए सोचा──"लेकिन अब तो यहां वो रास्ता ही नहीं है। हे भगवान! अब क्या करूं?"

प्रिया एकाएक ही परेशान सी नज़र आने लगी।
उसे समझ न आया कि सवा सात सालों में कोई रास्ता कैसे ग़ायब हो सकता है?

तभी सहसा उसके मन में ख़याल उभरा कि उसे किसी से उसके घर की तरफ जाने वाले रास्ते के बारे में पूछना चाहिए।

अभी वो पलटी ही थी कि तभी एक और ऑटो वाला उसके क़रीब अपना ऑटो ले कर आ गया।
प्रिया के मन में बिजली की तरह ये विचार कौंधा कि ऑटो वालों को हर जगह की जानकारी होती है।
यानि अगर वो ऑटो वाले को पता बताए तो वो उसे उसके घर तक ज़रूर पहुंचा सकता है।

इस विचार के साथ ही उसके चेहरे पर एक चमक उभर आई।
उसने फौरन ही ऑटो वाले को पता बताया तो ऑटो वाला उसके बताए हुए पते पर चलने को तैयार हो गया।

प्रिया झट से ऑटो में बैठ गई।
ऑटो जब चल पड़ा तो उसने इत्मीनान की सांस ली।
मन में ये सोच कर खुशी हुई कि आख़िर अब वो उसके घर पहुंच ही जाएगी और उससे मिलेगी भी।

सहसा उसे याद आया कि कैसे उस दिन उसने उस फाइव स्टार होटल के सामने उसको उल्टा सीधा बोला था।
प्रिया को बहुत बुरा महसूस होने लगा।
अपनी आंखें बंद कर के उसने मन ही मन उससे माफ़ी मांगी।

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"ये लीजिए मैडम, आपने जो पता बताया था वहां पहुंच गए हम।" ऑटो वाले की इस बात से प्रिया ने एकदम से चौंक कर अपनी आंखें खोल दी।

उसे ये सोच कर हैरानी हुई कि इतनी देर से वो आंखें बंद किए जाने किन ख़यालों में गुम थी जिसके चलते उसे समय के गुज़र जाने का आभास तक नहीं हुआ।

बहरहाल, वो ऑटो से नीचे उतरी।
अपने पर्स से निकाल कर उसने ऑटो वाले को पैसे दिए।
ऑटो वाला जब चला गया तो उसने पलट कर उस जगह को देखा जहां के लिए वो आई थी।

शहर की आबादी से बस थोड़ा ही पीछे वो बस्ती थी जो उसे जानी पहचानी लग रही थी।
बस्ती के बाकी घर तो अपना रूप बदल चुके थे लेकिन उनके किनारे पर एक घर ऐसा था जो आज भी अपने पुराने रूप में ही अपना वजूद क़ायम किए हुए था।

उस घर को देख प्रिया की धड़कनें अनायास ही तेज़ हो गईं।
उसने उस घर की तरफ बढ़ने के लिए अपने क़दम बढ़ाने चाहे मगर उसे अपने क़दम एकदम से भारी भारी से महसूस होने लगे।

मन में तरह तरह के ख़यालों का बवंडर सा चल पड़ा।
उसने किसी तरह खुद को सम्हाला और फिर खुद को मजबूत करते हुए आगे बढ़ चली।
थोड़ी ही देर में वो उस घर के सामने पहुंच गई।

एक माले का घर था वो।
आज भी उसकी दीवारें नीले रंग को बचाए हुए थीं।
दीवारों को देख कर स्पष्ट प्रतीत होता था कि उनमें वर्षों से पेंट नहीं किया गया है।
कहीं कहीं पर तो दीवारों की छपाई भी उखड़ी हुई दिख रही थी।

मकान के बीचो बीच लकड़ी का एक दरवाज़ा था जो पुराना सा हो गया नज़र आ रहा था।
मकान के सामने पहले काफी जगह हुआ करती थी लेकिन अब वो जगह थोड़ी सी रह गई थी क्योंकि सामने से चौड़ी सड़क बन गई थी जोकि आरसीसी वाली थी।

प्रिया जाने कितनी ही देर तक उस दरवाज़े और मकान को देखती रही।
उसकी आंखों के सामने गुज़रे वक्त की कई सारी तस्वीरें चमकने लगीं थी।
ज़हन में कई सारी यादें उभरने लगीं थी।

तभी एक मोटर साइकिल सड़क पर हॉर्न बजाते हुए उसके पास से गुज़री जिसके चलते वो होश में आई।
उसने हड़बड़ा कर पहले इधर उधर देखा फिर वापस मकान के दरवाज़े को देखने लगी।
मकान के बाहर ही एक तरफ टैक्सी खड़ी थी।

उसने देखा, दरवाज़े पर कोई ताला नहीं लगा हुआ था और ना ही बाहर से कुंडी द्वारा बंद था। मतलब साफ था इस वक्त अंदर कोई तो था।
इस ख़याल ने प्रिया की धड़कनों को एक बार फिर से बढ़ा दिया।
फिर उसी धड़कते दिल के साथ वो दरवाज़े की तरफ बढ़ चली।

एक तरफ जहां उसकी धड़कनें बढ़ी हुईं थी वहीं दूसरी तरफ उसके अंदर तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे।

दरवाज़े के क़रीब पहुंच कर उसने अपना एक हाथ आगे बढ़ाया।
वो ये देख कर थोड़ा चौंकी कि उसका हाथ कांप रहा है।

अगले ही पल उसने दरवाज़े पर दस्तक दी और किसी के द्वारा दरवाज़ा खोले जाने का इंतज़ार करने लगी।
उसकी धड़कनें पहले से कई गुना तेज़ हो गईं थीं।
घबराहट के चलते चेहरे पर पसीना उभर आया था।

जब आधा मिनट गुज़र जाने पर भी दरवाज़ा न खुला तो उसने कांपते हाथ से एक बार फिर दरवाज़े पर दस्तक दी।

"आ रहा हूं भाई?" अंदर से उसे एक चिर परिचित आवाज़ सुनाई दी जो दरवाज़े की तरफ ही आती महसूस हुई।

पहले से ही बढ़ी हुई धड़कनें अब धाड़ धाड़ कर के बजते हुए किसी हथौड़े की तरह उसके कानों में धमकने लगीं।
उसने बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाला और आने वाले वक्त के लिए खुद को तैयार करने की कोशिश में लग गई।

कुछ ही पलों में हल्की चरमराहट के साथ दरवाज़ा खुला।
खुले दरवाज़े के बीच उसे अरमान नज़र आया।
वही अरमान जिसे दो दिन पहले उसने फाइव स्टार होटल के बाहर उल्टा सीधा बोला था।
वही अरमान जो आज भी उसे दिलो जान से प्यार करता था।
चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी मूंछें और सिर पर बड़े बड़े किंतु थोड़ा उलझे हुए बाल।

उधर दरवाज़े के बाहर प्रिया को खड़ा देख अरमान के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभरे।
ना प्रिया को समझ आया कि क्या कहे और ना ही अरमान को।

"प...प्रिया तुम? यहां?" फिर अरमान ने ही ख़ामोशी तोड़ी──"यकीन नहीं हो रहा कि मेरे ग़रीबखाने में तुम आई हो।"

"हां...वो...मैं।" प्रिया ने अटकते हुए कहा──"मैं दरअसल, आई मीन....।"

"अगर तुम्हारी शान में गुस्ताख़ी न हो।" अरमान ने दरवाज़े से एक तरफ हटते हुए कहा──"तो अंदर आ जाओ।"

अरमान की इस बात ने प्रिया के अंदर अजीब सी टीस पैदा की किंतु फिर वो खुद को सम्हालते हुए अंदर दाख़िल हो गई।

घर के अंदर आते ही प्रिया इधर उधर नज़र दौड़ाते हुए हर चीज़ को देखने लगी।
सब कुछ बड़ा ही अजीब सा दिख रहा था उसे।

मकान की जैसी हालत बाहर से थी वैसी ही हालत अंदर से भी थी।
सब कुछ अस्त व्यस्त।
कोई भी चीज़ अपनी जगह पर सही ढंग से मौजूद नहीं थी।

"माफ़ करना।" सहसा अरमान की आवाज़ ने उसे उसकी तरफ देखने पर मजबूर किया। उधर अरमान ने कहा──"मेरा ये ग़रीबखाना तुम्हारे बैठने के क़ाबिल तो नहीं है फिर भी अगर तुम ठीक समझो तो बैठ जाओ यहां। मैं तब तक तुम्हारे लिए कुछ चाय नाश्ते का प्रबंध करता हूं।"

"न...नहीं नहीं।" प्रिया ने हड़बड़ा कर जल्दी से कहा──"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है और हां मुझे यहां बैठने में भी कोई प्रोब्लम नहीं होगी।"

अरमान ने फटे पुराने सोफे पर थोड़ा साफ सुथरा एक चद्दर डाल दिया जिस पर प्रिया बैठ गई।
उसे बड़ा अजीब सा लग रहा था।
कभी वो एक नज़र अरमान को देख लेती तो कभी इधर उधर देखने लगती।

"अंकल कहां हैं?" फिर उसने जैसे बात करने का सिलसिला शुरू करते हुए पूछा।

"वहां।" अरमान ने अपने हाथ की एक उंगली को छत की तरफ उठाते हुए कहा──"मुझे छोड़ कर जाने वालों में एक तुम ही हो जो वापस लौटी हो। पापा जब से गए तो अब तक वापस नहीं लौटे और ना ही इस जीवन में कभी लौटेंगे।"

"क...क्या मतलब?" प्रिया की धड़कनें विचित्र ख़यालों के उभर आने के चलते थम सी गईं।

"मतलब ये कि।" अरमान ने फीकी मुस्कान के साथ कहा──"जो लोग ईश्वर को प्यारे हो जाते हैं वो हमारे पास वापस लौट कर नहीं आते।"

"क...क्या???" प्रिया बुरी तरह उछल पड़ी──"तु...तुम्हारा मतलब है कि अंकल अब नहीं....?"

"हां।" अरमान ने कहा──"चार साल पहले ग़लती से एक ट्रक वाले ने उन्हें टक्कर मार दी थी। हॉस्पिटल पहुंचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया था। मां तो पहले ही गुज़र गईं थी तुम्हें तो पता ही है। अपनों के नाम पर एक पापा ही थे लेकिन अब वो भी नहीं हैं। अब ये घर भी अकेला है और मैं भी।"

प्रिया उसकी बातें सुन कर कुछ बोल न सकी।
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अरमान के पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं।
उसे अरमान के लिए बहुत ही बुरा फील होने लगा।

उसे पहली बार एहसास हुआ कि अरमान वास्तव में अंदर से कितना दुखी होगा।
सहसा उसे ये सोच कर अपने आप पर गुस्सा आया कि उसने ऐसे दुखी इंसान को उल्टा सीधा बोल कर और भी कितना दुखी किया था।

उसका जी चाहा कि ये ज़मीन फटे और वो उसमें अपना मुंह छुपा कर समा जाए।
पहली बार उसे अपनी करनी पर बेहद शर्म महसूस हुई।
पहली बार उसे महसूस हुआ कि ऐसे व्यक्ति को ठुकरा कर उसने उसके साथ कितना ग़लत किया था।

"अ....अरमान।" फिर वो भारी गले से बोली──"मुझे माफ़ कर दो प्लीज़। मैं तुम्हारी गुनहगार हूं। मैंने पहले भी तुम्हारा दिल दुखाया था और उस दिन भी अपने गुरूर में दिल दुखा दिया था। वास्तव में बहुत बुरी हूं मैं।"

कहते कहते प्रिया की आंखें छलक पड़ीं।
हालाकि उसने अपने जज़्बातों को काबू करने की बहुत कोशिश की थी लेकिन भावनाओं का ज्वार इतना प्रबल हो उठा था कि उसके सम्हाले न सम्हला था।

"तुम्हें मुझसे किसी बात के लिए माफ़ी मांगने की ज़रूरत नहीं है।" अरमान ने कहा──"सच तो ये है कि जो कुछ भी हुआ था या हुआ है वो सब मेरी किस्मत में ही लिखा था। ऊपर वाले ने मेरे नसीब में कभी कुछ अच्छा होना लिखा ही नहीं, तभी तो सब मुझे छोड़ कर चले गए।"

"ऐसा मत कहो।" प्रिया ने कहा──"और ये बताओ कि तुमने अपने साथ साथ इस घर की ये कैसी हालत बना रखी है?"

"बड़ी अजीब बात है।" अरमान ने हल्के से मुस्कुरा कर कहा──"तुम मुझसे मेरी और मेरे घर की हालत के बारे में पूछ रही हो? अभी दो दिन पहले तो तुम मुझे जाने क्या क्या बोल रही थी, फिर आज तुम्हारा लहजा इतना कैसे बदल गया? तुम इतनी नर्म कैसे हो ग‌ई?""

प्रिया को फ़ौरन कुछ कहने के लिए जवाब न सूझा।
कुछ पलों तक तो वो अरमान से निगाहें चुराए रखी किंतु फिर जैसे उसने साहस जुटाया।

"अ..अरमान।" फिर वो थोड़ा संजीदा हो कर बोली──"उस दिन के लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूं। प्लीज़ मेरे उस बर्ताव के लिए मुझे माफ़ कर दो।"

"क्या मेरे माफ़ ना करने से तुम्हें कोई फ़र्क पड़ जाएगा?" अरमान ने अजीब भाव से उसे देखा──"वैसे मुझे तो ऐसा नहीं लगता। अगर फ़र्क पड़ना ही होता तो आज से सवा सात साल पहले तुमने मुझे ठुकरा नहीं दिया होता। तुम मेरी सच्ची मोहब्बत का मान रखती और जो मेरी हैसियत थी उसको कबूल कर हमेशा के लिए मेरी हो जाती। इसका तो यही मतलब हुआ प्रिया कि तुम्हें मुझसे कभी कोई प्रेम था ही नहीं बल्कि तुम्हारे दिल में सिर्फ इस बात की चाहत थी कि तुम्हारी शादी एक ऐसे व्यक्ति से हो जो तुम्हें दुनिया का हर सुख और ऐशो आराम दे सके। ख़ैर, बहुत बहुत मुबारक हो, तुमने जिन चीज़ों की ख़्वाहिश की थी वो तुम्हें मिल ग‌ईं।"

प्रिया को एक बार फिर से कोई जवाब न सूझा।
उसके दिलो दिमाग़ में जज़्बातों की ज़बरदस्त आंधियां चलने लगीं थी।
उसे शिद्दत से एहसास हो रहा था कि सचमुच उसने अरमान के साथ वैसा प्रेम नहीं किया था जैसा वो उससे करता था।

"शायद तुम सच कह रहे हो अरमान।" फिर उसने खुद को सम्हालते हुए तथा गहरी सांस ले कर कहा──"और मैं मानती हूं कि शायद मेरे दिल में तुम्हारे जैसा प्रेम नहीं था। ख़ैर एक सच ये भी है कि शायद हमारी किस्मत में एक दूसरे का होना लिखा ही नहीं था। तुम प्लीज़, खुद को सम्हालो और अपने जीवन को इस तरह बर्बाद मत करो। अभी भी वक्त है, किसी अच्छी लड़की से शादी कर लो और अपनी दुनिया को आबाद कर लो। क्या तुम मेरी इतनी सी बात नहीं मान सकते?"

"ऐसा क्यों होता है प्रिया कि प्रेम करने वाले को अपनी मोहब्बत के लिए हर तरह की कीमत चुकानी पड़ती है?" अरमान ने थोड़ी ही दूरी पर रखी एक चारपाई पर बैठने के बाद कहा──"ऐसा क्यों होता है कि आशिक को उसकी हर बात माननी पड़ती है जिसे वो टूट कर मोहब्बत कर रहा होता है? क्यों उसकी मोहब्बत उस आशिक के जज़्बातों को नहीं समझती और वो करने पर मजबूर कर देती है जो वो किसी भी कीमत पर करना नहीं चाहता मगर उसे करना ही पड़ता है?"

"शायद सच्चा प्रेम वही है जिसमें त्याग और बलिदान दिया जाता है।" प्रिया ने लरजते स्वर में कहा──"जो ऐसा करते हैं वही सच्चा प्रेम करने वाले कहलाते हैं। मुझे एहसास है कि तुमने मुझसे सच्चा प्रेम किया है। ये तो मैं थी जिसने तुम्हारे सच्चे प्रेम की क़दर नहीं की और तुम्हें ठुकरा के किसी और की हो गई। अरमान, तुमने ये गाना तो सुना ही होगा ना──'कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता।' प्रेम करने वालों का ज़्यादातर ऐसा ही इतिहास रहा है। वो बहुत खुशनसीब होते हैं जिन्हें मोहब्बत नसीब होती है। ख़ैर मेरी तुमसे बस यही विनती है कि प्लीज़ गुज़री हुई बातों और यादों को भुलाने की कोशिश करो और अपनी दुनिया बसा लो। उस दिन अपने गुरूर में तुम्हें उल्टा सीधा बोल गई थी लेकिन बाद में एहसास हुआ कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। इसी लिए तो आज तुमसे माफ़ी मांगने आई हूं। यकीन मानो उसी पल से बेचैन थी तुमसे मिल कर तुमसे माफ़ी मांगने के लिए। जब नहीं रहा गया तो आज भागी चली आई यहां।"

"चलो इसी बहाने मेरे ग़रीबखानें में तुम्हारे क़दम तो पड़े।" अरमान ने फीकी मुस्कान के साथ कहा──"मुद्दतों बाद इस उजड़े हुए आशियाने को बहार की खुशबू मिली है।"

"बहुत अजीब बातें करते हो तुम।" प्रिया की धड़कनें अरमान की बातों से धाड़ धाड़ कर के बज उठतीं थी।
खुद को बड़ी मुश्किल से सम्हाले हुए थी वो।

"वक्त और हालात इंसान को बहुत कुछ सिखा देते हैं।" अरमान ने कहा──"बातें करना भी और ऐसे हाल में रहना भी।"

"हम्म्म।" प्रिया को समझ न आया कि क्या कहे, फिर सहसा वो इधर उधर देखने के बाद बोली──"अच्छा अब बातें बंद करो। मैं ज़रा इस घर का हुलिया ठीक कर देती हूं। जाने कब से तुमने इस घर की साफ सफाई नहीं की है।"

"तुम्हें ये सब करने की ज़रूरत नहीं है।" अरमान ने कहा──"मुझे ऐसे हाल में रहने की आदत है। वैसे भी अगर तुम ये सब करोगी तो मेरे अंदर फिर से एक ऐसी उम्मीद पैदा हो जाएगी जिसका पूरा होना संभव नहीं है।"

"उम्मीद ऐसी करो जिसका पूरा होना संभव हो।" प्रिया ने कहा──"फालतू की बातें सोचना बेवकूफी होती है। अब चलो उठो और मुझे मेरा काम करने दो। मेरे पास ज़्यादा समय नहीं है। मेरी बेटी अपने स्कूल से शाम साढ़े चार बजे आती है। अभी दो ढाई घंटे हैं मेरे पास। तब तक मैं यहां का थोड़ा बहुत हुलिया तो सही कर ही दूंगी। बाकी फिर किसी दिन आ कर कर दूंगी।"

अरमान मना करता ही रह गया लेकिन प्रिया ने उसकी एक न मानी।
अरमान को उसके आगे हथियार डाल देने पड़े।
हालाकि मन ही मन उसे इस बात की खुशी हो रही थी कि चलो इसी बहाने प्रिया उसके घर में तो थी।
उसकी स्थिति देखने से उसके मन में उसके प्रति कोई भावना तो पैदा हुई थी।

उसके बाद अरमान ने देखा कि प्रिया ने डेढ़ दो घंटे में उसके घर का बहुत कुछ हुलिया बदल दिया था।
इस सबके चलते उसका अपना हुलिया बिगड़ गया था।
उसके कपड़े गंदे हो गए थे।
घर के पीछे बने बाथरूम में जा कर उसने अपने आपको थोड़ा बहुत साफ किया और फिर अरमान से किसी दिन फिर से आने का बोल कर चली गई।

उसके जाते ही अरमान के होठों पर एक रहस्यमय मुस्कान उभर आई थी।
:hint: kaand bada hoga
 
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Thakur

असला हम भी रखते है पहलवान 😼
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"ये सब करने का फ़ायदा क्या होगा भाई?" विशाल ने अरमान की तरफ देखते हुए पूछा──"तेरे प्लान के अनुसार तो वो तेरे क़रीब आ ही रही थी फिर तूने ऐसा बोल कर उसे खुद से दूर हो जाने वाला काम क्यों कर दिया? क्या तुझे नहीं लगता कि तेरे द्वारा इतनी बेरुखी से दुत्कारे जाने पर अब शायद ही वो दुबारा तुमसे मिलने का सोचेगी?"

"उसे इस तरह से दुत्कारना और उसे उसके कर्मों का एहसास करवाना ज़रूरी था माय डियर।" अरमान ने सिगरेट का गाढ़ा धुआं हवा में उड़ाते हुए कहा──"इंसान को जब अपनी ग़लतियों का अथवा अपने बुरे कर्मों का गहराई से एहसास होता है तभी उसे अपने कर्मों के तहत अपराध बोध होता है। तभी उसके अंदर प्रबल रूप से पश्चाताप की भावना पैदा होती है जो उसे वो करने पर विवश करती है जो सामान्य अवस्था में वो कर ही नहीं सकता। प्रिया को अपने कर्मों का आभास तो हो गया है और वो मान भी चुकी है कि उसने मेरे साथ अच्छा नहीं किया था लेकिन अभी इस भावना में उतनी शिद्दत नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि उसके अंदर अपराध बोध इस क़दर पैदा हो जाए कि पश्चाताप करने के लिए वो किसी भी हद को पार कर जाए।"

"इससे होगा क्या?"

"वही जो मैं चाहता हूं।" अरमान हल्के से मुस्कुराया──"आई मीन, एक दिन ऐसा आएगा जब वो खुद मेरी बनने के लिए बेचैन हो जाएगी। वो खुद कहेगी कि मैं अपने पति को तलाक़ दे कर तुमसे विवाह करूंगी।"

"ये तो असंभव बात बोल रहा है तू।" विशाल ने आश्चर्य से आंखें फैला कर कहा──"जिस लड़की ने सिर्फ अपने सुखों का सोच कर एक रईस व्यक्ति से शादी की वो उस ऐशो आराम को त्याग कर तुमसे शादी क्यों करेगी? मेरा ख़याल यही है कि उसे अपनी ग़लतियों का एहसास तो है और वो तुम्हारी हालत को ठीक भी करना चाहती है लेकिन सिर्फ इस लिए क्योंकि उसे तुमसे हमदर्दी है।"

"मुझे पता है कि तू इस वक्त मेरी बात का यकीन नहीं कर सकता।" अरमान ने कहा──"इस लिए तू ख़ामोशी से बस देखता जा। ऐसा दिन जल्द ही आएगा जब तुझे असंभव लगने वाली ये बात संभव में बदलती दिखेगी।"

"ख़ैर, अब आगे क्या?" विशाल ने गहरी सांस ली──"मेरा मतलब है कि तूने तो उसे दुत्कार दिया है तो अब इसके बाद क्या करेगा तू।"

"मैं कुछ नहीं करूंगा।" अरमान ने ऐश ट्रे में सिगरेट को बुझाते हुए कहा──"बल्कि जो कुछ करेगी वही करेगी। बाकी प्लान वैसा ही चलता रहेगा जैसा बनाया गया है।"

[][][][][]

प्रिया बहुत दुखी थी।
उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि आज अरमान इस तरह कड़वे शब्द बोल कर तथा उसकी ग़लतियों का एहसास करवा के उसे दुत्कार देगा।


अरमान का ऐसा रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था।
वो तो ऐसा था जो हर पल सिर्फ और सिर्फ उसी की खुशी के लिए जीता था।
भले ही उसकी हैसियत ठीक नहीं थी लेकिन उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने की जुर्रत करता था।

प्रिया के कानों में बार बार अरमान के वो कड़वे शब्द गूंज उठते थे और उसे अंदर तक झकझोर देते थे।
वो ये मानती थी कि अरमान की ऐसी हालत के लिए सिर्फ वो ही ज़िम्मेदार है और इसी लिए वो उसके लिए कुछ करने का मन बना चुकी थी लेकिन आज जिस तरह से अरमान उससे पेश आया था उसके चलते खुद उसका सीना छलनी छलनी हो गया था।

उसे इस बात का इतना दुख नहीं था कि अरमान ने उसे ऐसा बोला और दुत्कारा बल्कि इस बात का दुख हो रहा था कि वो अरमान की बेहतरी के लिए खुल कर कुछ कर नहीं सकती।

अरमान उसे कुछ करने ही नहीं दे रहा।
एक तरफ तो वो कहता है कि वो आज भी उसे टूट कर प्यार करता है लेकिन अपनी उसी मोहब्बत को कड़वे शब्द बोल कर उसे दुख भी देता है।
मोहब्बत में ऐसा तो नहीं होता।
मोहब्बत करने वाले तो अपने महबूब को चोट पहुंचाने का सोच तक नहीं सकते फिर अरमान ये कैसी मोहब्बत कर रहा है उससे कि वो उसे ऐसे हर्ट कर रहा है?

प्रिया हर बार अपने ज़हन से इन ख़यालों को निकालने की कोशिश करती मगर ये ख़याल बार बार उसके मन में उभर आते और फिर उसे तड़पाना शुरू कर देते।

"क्या हुआ प्रिया?" उसके अंदर से किसी ने उसे पुकारा──"तू एक ऐसे व्यक्ति के लिए दुखी क्यों है जो आज के समय में तेरा कुछ लगता ही नहीं है? तू सिर्फ अपने घर परिवार के बारे में सोच। अपने अतीत से जुड़ेगी तो बहुत बुरा अंजाम भुगतेगी तू।"

"जानती हूं।" प्रिया ने अपने अंदर की प्रिया को जवाब दिया──"लेकिन मैं ये कैसे भुला दूं कि मैंने उसके साथ ग़लत किया है? मैं इस सच्चाई को कैसे नकार दूं कि उसने मेरी वजह से अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली है? मैं ये कैसे भुला दूं कि एक हफ़्ते पहले जब वो इतने सालों बाद मुझे अचानक से मिला था तो मैंने सामान्य भाव से उसका हाल चाल पूछने के बजाय उसको बुरा भला कह कर उसका दिल दुखाया था?"

"जब बात अपने खुशहाल परिवार के बिखरने की आती है।" अंदर की प्रिया ने जैसे उसे समझाया──"तो इंसान को सबसे पहले अपने और अपने परिवार की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। जैसे अब तक तू उसे भूली हुई थी वैसे ही आगे भी उसे भूली रह। माना कि तूने उसका दिल दुखाया था और तेरी वजह से उसने खुद को बर्बाद किया लेकिन इसमें सारा दोष सिर्फ तेरा ही तो नहीं है। दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी अपने को धोखा दे कर अपने हित के लिए किसी और से विवाह कर लेते हैं। दुनिया ऐसे ही मतलबी लोगों से भरी पड़ी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इतने सालों बाद तू उससे मिले और फिर ऐसे चक्कर में फंस कर अपने खुशहाल परिवार पर संकट पैदा कर ले। तुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो तूने अरमान से अपनी उस ग़लती की माफ़ी मांग ली, इतना ही नहीं अपनी तरफ से ये कोशिश भी की कि वो सब कुछ भुला कर नए सिरे से अपना जीवन शुरू करे। अब अगर वो तेरी बात नहीं मान रहा और अपनी ज़िद पर ही अड़ा हुआ है तो इसमें भला तू क्या कर सकती है? तूने अपना फर्ज़ निभा दिया, अब ये उस पर निर्भर करता है कि वो अपने लिए क्या चाहता है। मैं यही कहूंगी कि अब तू उसका ख़याल छोड़ कर सिर्फ अपने परिवार की तरफ ध्यान दे।"

प्रिया को समझ न आया कि अब वो अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दे?
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि उसकी अंतरात्मा ने जो कुछ कहा था वो सच था और हर तरह से वाजिब भी था।

सच ही तो है कि उसने अपना कर्म कर दिया है, अब अगर इतने पर भी अरमान अपनी दुनिया को संवारना नहीं चाहता तो इसमें भला वो क्या कर सकती है?
मतलब साफ है, उसे अब अपने परिवार के बारे में ही सोचना चाहिए।
अरमान का ख़याल अपने दिलो दिमाग़ से निकाल देना चाहिए।

प्रिया ने एक गहरी सांस ली और सचमुच अपने दिलो दिमाग़ से अरमान के ख़यालों को निकालने की कोशिश में लग गई।
मगर....
बार बार कोशिश करने के बाद भी वो अरमान के ख़यालों को अपने दिलो दिमाग़ से निकाल नहीं पाई।
बुरी तरह झुंझला उठी वो।
चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे।

खुद को बहलाने के लिए उसने टीवी चालू कर लिया।
टीवी में कोई सीरियल आ रहा था लेकिन प्रिया की निगाहें टीवी स्क्रीन पर होते हुए भी स्क्रीन पर नहीं थी।
उसने रिमोट से चैनल बदलना शुरू कर दिया।
हर चैनल में अलग अलग प्रोग्राम चालू थे लेकिन प्रिया किसी भी चैनल पर नहीं रुकी।
अंत में झुंझला कर उसने रिमोट से टीवी बंद कर दिया।

वो बुरी तरह परेशान और आहत सी हो गई थी।
घर में इस वक्त वो अकेली ही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अरमान के ख़यालों से उसे कैसे मुक्ति मिले?

[][][][][]

"मे आई कम इन सर!" अशोक खत्री ने एक केबिन के दरवाज़े को हल्का सा खोल कर अंदर झांकते हुए कहा।

"यस कम इन।" शानदार केबिन के अंदर ऊंची पुश्त वाली रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे एक कसरती बदन वाले किन्तु हैंडसम नौजवान ने कहा।

अशोक केबिन के अंदर दाख़िल हुआ।
पीछे कांच का दरवाज़ा अपने आप ही बंद हो गया।
अशोक की नज़र टेबल के उस पार अपनी चेयर पर बैठे नौजवान पर पड़ी।

अशोक से उमर में वो काफी छोटा था लेकिन पद उससे कहीं बड़ा था इस लिए अशोक के अंदर थोड़ी झिझक और थोड़ी घबराहट थी।
उसने सुन रखा था कि ये नौजवान थोड़ा कड़क है और कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी है।

"प्लीज़ हैव ए सीट मिस्टर खत्री।" उस नौजवान ने अशोक को उसके सर नेम से संबोधित करते हुए कहा।

हालाकि उसका लहजा सपाट था।
एकदम भावहीन।
बहरहाल, अशोक खत्री धड़कते दिल के साथ आगे बढ़ा और टेबल के इस पार रखी तीन चेयर्स में से एक पर जा कर बैठ गया।

"सो, मिस्टर खत्री।" उसके बैठते ही उस नौजवान ने टेबल पर रखी कुछ फाइल्स में से एक पर से नज़र हटा कर उसकी तरफ देखा──"अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो आपको हमारी इस कंपनी में ज्वॉइन हुए लगभग एक महीना होने वाला है, राइट?"

"य...यस सर।" अशोक खत्री ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए जल्दी से कहा।

"आपने यहां ज्वाइन होने से पहले अपनी जो भी शर्तें रखीं थी।" उस आकर्षक से नौजवान ने अपलक अशोक की तरफ देखते हुए सपाट लहजे में ही कहा──"उन शर्तों को हमने माना और आपको आपके मन मुताबिक सैलरी देने को राज़ी हुए, राइट?"

"ज...जी जी बिल्कुल सर।"

अशोक को समझ नहीं आ रहा था कि सामने बैठा आकर्षक नौजवान आख़िर उससे कहना क्या चाहता है?
उसका जी चाहा कि असल बात पूछे लेकिन उसकी हिम्मत न पड़ी।

"उसके बदले आपने ये वादा किया था कि आप कम ज़िंक खर्च कर के बेहतर पाइप्स जी-आई कर के देंगे और कंपनी का फ़ायदा करवाएंगे।" सामने बैठे नौजवान ने जैसे अब जा कर असल मुद्दे की बात की──"जबकि असल में ऐसा आप अब तक नहीं कर पाए। आपकी अब तक की सारी रिपोर्ट मैंने देख ली है और ये जाना है कि आप उस व्यक्ति से भी ज़्यादा ज़िंक खर्च कर रहे हैं जो आपसे पहले यहां जी-आई के इंचार्ज पद पर था। हफ़्ते दस दिन का तो समझ में आता है मिस्टर खत्री लेकिन एक महीना होने को आया और अभी भी आप इस मामले में कुछ नहीं कर पाए।"

"म...मुझे पता है सर कि ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है।" अशोक ने अपना बचाव करते हुए मानो खुद की पैरवी की──"और इसके लिए मैं हद से ज़्यादा प्रयास भी कर रहा हूं लेकिन इसके बाद भी ज़िंक के खर्चे में कमी नहीं आ रही। असल में समस्या ये है कि जो नए वॉचमैन आए हैं उनको कितना भी समझाएं लेकिन वो सही से काम नहीं कर पा रहे। दूसरी समस्या ये है कि मटेरियल भी ख़राब आ रहा है जिसके चलते ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है। जिन पटरों से पाईप बनाए जा रहे हैं वो काफी ख़राब हैं। उनमें खुरदुरापन है जिसके चलते वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में कवर कर लेते हैं। एक्सपोर्ट के माल के लिए तो कोईल का मटेरियल चाहिए जो ज़िंक भी कम कवर करे और पाईप में शाइनिंग भी टॉप क्लास की दिखे।"

"आपके आने से पहले भी एक्सपोर्ट के माल के लिए ऐसा ही मटेरियल प्रयोग होता था मिस्टर खत्री।" सामने बैठे नौजवान ने कहा──"और जी-आई होने पर ज़िंक भी कम खर्च होता था। वेल, अगर ऐसा ही हाल रहा और ज़िंक की लागत में आप कमी नहीं कर पाए तो खुद सोचिए कि कंपनी में आपको रखने का क्या फ़ायदा? उम्मीद करता हूं कि आप एग्रीमेंट में किए गए अपने वायदे और दावे पर खरा उतरेंगे अदरवाइज़ कंपनी आपके खिलाफ़ कड़ा एक्शन लेने पर मजबूर हो जाएगी।"

नौजवान अधिकारी की ये बात सुन कर अशोक खत्री पलक झपकते ही सन्नाटे में आ गया।
उसकी धड़कनें अब किसी हथौड़े की तरह उसकी कनपटी को बजाने लगीं थी।
इतना तो वो भी जानता था कि ज़िंक की लागत में उसके हर प्रयास के बाद भी कोई कमी नहीं आ रही है।

ये सच है कि मटेरियल अच्छा नहीं मिल रहा है और वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में समेट ले रहा है लेकिन नौजवान अधिकारी के अनुसार ऐसा ही मटेरियल उसके आने से पूर्व भी मिलता था और उनमें ज़िंक उससे कम ही लग रहा था।

खत्री को समझ नहीं आ रहा था कि ज़िंक की लागत को कैसे कम करे?
अगर यही हाल रहा तो निश्चित ही उसकी नौकरी ख़तरे में पड़ जानी है।
उसे इस मामले में कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।

"आई होप, एवरीथिंग विल बी ऑल राइट मिस्टर खत्री।" उसकी सोचो को भंग करते हुए उस आकर्षक नौजवान ने कहा──"यू मे गो नाउ।"

अशोक खत्री चेयर से उठा और भारी क़दमों के साथ केबिन से बाहर आ गया।
उसने राहत की लंबी सांस ली लेकिन माथे पर से चिंता की लकीरें न मिटा सका।
थोड़ी ही देर में वो जी-आई वाले प्लांट की तरफ बढ़ता चला जा रहा था।

[][][][][]

"अरे! आज आने में इतनी देर क्यों लगा दी आपने?" प्रिया ने दरवाज़ा खोलते ही बाहर खड़े अपने पति से पूछा।

"क्या करें हो गई देर।" अशोक ने अजीब भाव से कहा──"काम में ये सब तो होता ही है।"

प्रिया ने महसूस किया कि आज उसके पति के चेहरे की चमक ग़ायब है।
बेहद निराश और थका थका सा नज़र आ रहा है वो।
प्रिया का जी चाहा कि पूछे मगर फिर उसने ये सोच कर अपना इरादा बदल लिया कि अभी तो उसका पति आया है और उसके आते ही उससे उसकी परेशानी का सबब पूछना ठीक नहीं होगा।

खा पी कर अशोक अपने कमरे में सोने चला गया था जबकि प्रिया जूठे बर्तन उठा कर किचन में रखने लगी थी।
उसके मन में बार बार यही ख़याल उभर रहा था कि आज उसके पति के चेहरे पर चमक क्यों नहीं है?
आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसके चलते उसका पति आज इतना निराश और थका हुआ सा लग रहा है?

जल्दी ही काम से फारिग़ हो कर प्रिया अपने कमरे में अशोक के पास पहुंच गई।
उसने खड़े खड़े ही ध्यान से अशोक की तरफ देखा।

अशोक बेड पर लेटा हुआ था।
उसका एक हाथ कोहनी से मुड़ा हुआ था और ऊपर उसके माथे पर कलाई के साथ रखा हुआ था।
आंखें बंद तो थीं लेकिन स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वो आंखें बंद किए किन्हीं गहरे विचारों में खोया हुआ है।
ये देख प्रिया के माथे पर शिकन उभर आई।

"क्या बात है अशोक?" फिर उसने बेड पर अशोक के बिल्कुल पास बैठ कर पूछा──"आज आप इतने टेंशन में क्यों दिख रहे हैं? आख़िर बात क्या है?"

"आं...क..कुछ नहीं।" अशोक ने खुद को सम्हालते हुए कहा──"बस ऐसे ही काम के बारे में सोच रहा था। तुम सुनाओ, नई मेड सही से काम कर रही है कि नहीं?"

"हां वो तो कर रही है।" प्रिया ने अशोक को ध्यान से देखते हुए कहा──"लेकिन आप मुझसे कुछ छुपा रहे हैं। आते समय ही मैंने आपके चेहरे पर परेशानी देखी थी और अभी भी आप आंखें बंद किए कुछ ऐसा सोचने में गुम थे जो शायद आपकी चिंता का कारण बना हुआ है। बताइए ना, आख़िर बात क्या है?"

प्रिया अपने पति से उसकी परेशानी जानने पर इस लिए भी ज़ोर दे रही थी क्योंकि पति को कुछ सोचते देख वो ये सोच कर खुद भी परेशान हो गई थी कि कहीं उसके पति को पता तो नहीं चल गया कि वो अपने पूर्व प्रेमी से मिली थी?

"ऐसी कोई बात नहीं है बेबी।" अशोक ने उठ कर प्रिया के चेहरे को हल्के से सहलाते हुए कहा──"असल में आज कल काम का प्रेशर थोड़ा बढ़ गया है इस लिए काम के प्रति थोड़ी चिंता और थकावट हो रही है। बाकी कोई बात नहीं है।"

"सच कह रहे हैं ना?" प्रिया ने जैसे आश्वस्त होने की गरज से पूछा।

"हां मेरी जान, मैं सच ही कह रहा हूं।" अशोक ने कहा और थोड़ा सा आगे बढ़ कर प्रिया के गुलाबी होठों को चूम लिया।

उसकी इस क्रिया से प्रिया जहां एक तरफ आश्वस्त हो गई वहीं दूसरी तरफ हल्का सा शर्मा भी गई।
बहरहाल, इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई।

अशोक मानसिक तनाव में था जिसे उसने प्रिया से छुपा लिया था।
उसने दूसरी तरफ करवट ली और आंखें बंद कर के सोने की कोशिश करने लगा।

प्रिया के लिए ये सामान्य बात थी।
अशोक उमर में उससे काफी बड़ा था जिसके चलते दोनों के बीच हर रात काम क्रीड़ा नहीं होती थी।

अशोक ने दूसरी तरफ करवट ली तो प्रिया ने भी उसकी फ़िक्र छोड़ आंख बंद कर के सोने की कोशिश करने लगी।
कुछ ही देर में उसका भटकता हुआ मन एक बार फिर अरमान की तरफ जा पहुंचा।
अगले ही पल जब अरमान के ख़याल उभरने शुरू हुए तो वो एक बार फिर से परेशान हो उठी।
रात बड़ी मुश्किल से उसकी आंख लगी।
Achha he ke mene story padhna chalu kiya aur aapne restart bhi kiya :thanks:

Baaki rahi baat Ashok ke upar ke pressure ki to lag raha he ke budhau nikal na le pressure pressure khelte khelte :sad:

Honi ko kaun he taal sakta he :hint:
 
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Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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"ये सब करने का फ़ायदा क्या होगा भाई?" विशाल ने अरमान की तरफ देखते हुए पूछा──"तेरे प्लान के अनुसार तो वो तेरे क़रीब आ ही रही थी फिर तूने ऐसा बोल कर उसे खुद से दूर हो जाने वाला काम क्यों कर दिया? क्या तुझे नहीं लगता कि तेरे द्वारा इतनी बेरुखी से दुत्कारे जाने पर अब शायद ही वो दुबारा तुमसे मिलने का सोचेगी?"

"उसे इस तरह से दुत्कारना और उसे उसके कर्मों का एहसास करवाना ज़रूरी था माय डियर।" अरमान ने सिगरेट का गाढ़ा धुआं हवा में उड़ाते हुए कहा──"इंसान को जब अपनी ग़लतियों का अथवा अपने बुरे कर्मों का गहराई से एहसास होता है तभी उसे अपने कर्मों के तहत अपराध बोध होता है। तभी उसके अंदर प्रबल रूप से पश्चाताप की भावना पैदा होती है जो उसे वो करने पर विवश करती है जो सामान्य अवस्था में वो कर ही नहीं सकता। प्रिया को अपने कर्मों का आभास तो हो गया है और वो मान भी चुकी है कि उसने मेरे साथ अच्छा नहीं किया था लेकिन अभी इस भावना में उतनी शिद्दत नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि उसके अंदर अपराध बोध इस क़दर पैदा हो जाए कि पश्चाताप करने के लिए वो किसी भी हद को पार कर जाए।"

"इससे होगा क्या?"

"वही जो मैं चाहता हूं।" अरमान हल्के से मुस्कुराया──"आई मीन, एक दिन ऐसा आएगा जब वो खुद मेरी बनने के लिए बेचैन हो जाएगी। वो खुद कहेगी कि मैं अपने पति को तलाक़ दे कर तुमसे विवाह करूंगी।"

"ये तो असंभव बात बोल रहा है तू।" विशाल ने आश्चर्य से आंखें फैला कर कहा──"जिस लड़की ने सिर्फ अपने सुखों का सोच कर एक रईस व्यक्ति से शादी की वो उस ऐशो आराम को त्याग कर तुमसे शादी क्यों करेगी? मेरा ख़याल यही है कि उसे अपनी ग़लतियों का एहसास तो है और वो तुम्हारी हालत को ठीक भी करना चाहती है लेकिन सिर्फ इस लिए क्योंकि उसे तुमसे हमदर्दी है।"

"मुझे पता है कि तू इस वक्त मेरी बात का यकीन नहीं कर सकता।" अरमान ने कहा──"इस लिए तू ख़ामोशी से बस देखता जा। ऐसा दिन जल्द ही आएगा जब तुझे असंभव लगने वाली ये बात संभव में बदलती दिखेगी।"

"ख़ैर, अब आगे क्या?" विशाल ने गहरी सांस ली──"मेरा मतलब है कि तूने तो उसे दुत्कार दिया है तो अब इसके बाद क्या करेगा तू।"

"मैं कुछ नहीं करूंगा।" अरमान ने ऐश ट्रे में सिगरेट को बुझाते हुए कहा──"बल्कि जो कुछ करेगी वही करेगी। बाकी प्लान वैसा ही चलता रहेगा जैसा बनाया गया है।"

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प्रिया बहुत दुखी थी।
उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि आज अरमान इस तरह कड़वे शब्द बोल कर तथा उसकी ग़लतियों का एहसास करवा के उसे दुत्कार देगा।


अरमान का ऐसा रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था।
वो तो ऐसा था जो हर पल सिर्फ और सिर्फ उसी की खुशी के लिए जीता था।
भले ही उसकी हैसियत ठीक नहीं थी लेकिन उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने की जुर्रत करता था।

प्रिया के कानों में बार बार अरमान के वो कड़वे शब्द गूंज उठते थे और उसे अंदर तक झकझोर देते थे।
वो ये मानती थी कि अरमान की ऐसी हालत के लिए सिर्फ वो ही ज़िम्मेदार है और इसी लिए वो उसके लिए कुछ करने का मन बना चुकी थी लेकिन आज जिस तरह से अरमान उससे पेश आया था उसके चलते खुद उसका सीना छलनी छलनी हो गया था।

उसे इस बात का इतना दुख नहीं था कि अरमान ने उसे ऐसा बोला और दुत्कारा बल्कि इस बात का दुख हो रहा था कि वो अरमान की बेहतरी के लिए खुल कर कुछ कर नहीं सकती।

अरमान उसे कुछ करने ही नहीं दे रहा।
एक तरफ तो वो कहता है कि वो आज भी उसे टूट कर प्यार करता है लेकिन अपनी उसी मोहब्बत को कड़वे शब्द बोल कर उसे दुख भी देता है।
मोहब्बत में ऐसा तो नहीं होता।
मोहब्बत करने वाले तो अपने महबूब को चोट पहुंचाने का सोच तक नहीं सकते फिर अरमान ये कैसी मोहब्बत कर रहा है उससे कि वो उसे ऐसे हर्ट कर रहा है?

प्रिया हर बार अपने ज़हन से इन ख़यालों को निकालने की कोशिश करती मगर ये ख़याल बार बार उसके मन में उभर आते और फिर उसे तड़पाना शुरू कर देते।

"क्या हुआ प्रिया?" उसके अंदर से किसी ने उसे पुकारा──"तू एक ऐसे व्यक्ति के लिए दुखी क्यों है जो आज के समय में तेरा कुछ लगता ही नहीं है? तू सिर्फ अपने घर परिवार के बारे में सोच। अपने अतीत से जुड़ेगी तो बहुत बुरा अंजाम भुगतेगी तू।"

"जानती हूं।" प्रिया ने अपने अंदर की प्रिया को जवाब दिया──"लेकिन मैं ये कैसे भुला दूं कि मैंने उसके साथ ग़लत किया है? मैं इस सच्चाई को कैसे नकार दूं कि उसने मेरी वजह से अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली है? मैं ये कैसे भुला दूं कि एक हफ़्ते पहले जब वो इतने सालों बाद मुझे अचानक से मिला था तो मैंने सामान्य भाव से उसका हाल चाल पूछने के बजाय उसको बुरा भला कह कर उसका दिल दुखाया था?"

"जब बात अपने खुशहाल परिवार के बिखरने की आती है।" अंदर की प्रिया ने जैसे उसे समझाया──"तो इंसान को सबसे पहले अपने और अपने परिवार की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। जैसे अब तक तू उसे भूली हुई थी वैसे ही आगे भी उसे भूली रह। माना कि तूने उसका दिल दुखाया था और तेरी वजह से उसने खुद को बर्बाद किया लेकिन इसमें सारा दोष सिर्फ तेरा ही तो नहीं है। दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी अपने को धोखा दे कर अपने हित के लिए किसी और से विवाह कर लेते हैं। दुनिया ऐसे ही मतलबी लोगों से भरी पड़ी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इतने सालों बाद तू उससे मिले और फिर ऐसे चक्कर में फंस कर अपने खुशहाल परिवार पर संकट पैदा कर ले। तुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो तूने अरमान से अपनी उस ग़लती की माफ़ी मांग ली, इतना ही नहीं अपनी तरफ से ये कोशिश भी की कि वो सब कुछ भुला कर नए सिरे से अपना जीवन शुरू करे। अब अगर वो तेरी बात नहीं मान रहा और अपनी ज़िद पर ही अड़ा हुआ है तो इसमें भला तू क्या कर सकती है? तूने अपना फर्ज़ निभा दिया, अब ये उस पर निर्भर करता है कि वो अपने लिए क्या चाहता है। मैं यही कहूंगी कि अब तू उसका ख़याल छोड़ कर सिर्फ अपने परिवार की तरफ ध्यान दे।"

प्रिया को समझ न आया कि अब वो अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दे?
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि उसकी अंतरात्मा ने जो कुछ कहा था वो सच था और हर तरह से वाजिब भी था।

सच ही तो है कि उसने अपना कर्म कर दिया है, अब अगर इतने पर भी अरमान अपनी दुनिया को संवारना नहीं चाहता तो इसमें भला वो क्या कर सकती है?
मतलब साफ है, उसे अब अपने परिवार के बारे में ही सोचना चाहिए।
अरमान का ख़याल अपने दिलो दिमाग़ से निकाल देना चाहिए।

प्रिया ने एक गहरी सांस ली और सचमुच अपने दिलो दिमाग़ से अरमान के ख़यालों को निकालने की कोशिश में लग गई।
मगर....
बार बार कोशिश करने के बाद भी वो अरमान के ख़यालों को अपने दिलो दिमाग़ से निकाल नहीं पाई।
बुरी तरह झुंझला उठी वो।
चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे।

खुद को बहलाने के लिए उसने टीवी चालू कर लिया।
टीवी में कोई सीरियल आ रहा था लेकिन प्रिया की निगाहें टीवी स्क्रीन पर होते हुए भी स्क्रीन पर नहीं थी।
उसने रिमोट से चैनल बदलना शुरू कर दिया।
हर चैनल में अलग अलग प्रोग्राम चालू थे लेकिन प्रिया किसी भी चैनल पर नहीं रुकी।
अंत में झुंझला कर उसने रिमोट से टीवी बंद कर दिया।

वो बुरी तरह परेशान और आहत सी हो गई थी।
घर में इस वक्त वो अकेली ही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अरमान के ख़यालों से उसे कैसे मुक्ति मिले?

[][][][][]

"मे आई कम इन सर!" अशोक खत्री ने एक केबिन के दरवाज़े को हल्का सा खोल कर अंदर झांकते हुए कहा।

"यस कम इन।" शानदार केबिन के अंदर ऊंची पुश्त वाली रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे एक कसरती बदन वाले किन्तु हैंडसम नौजवान ने कहा।

अशोक केबिन के अंदर दाख़िल हुआ।
पीछे कांच का दरवाज़ा अपने आप ही बंद हो गया।
अशोक की नज़र टेबल के उस पार अपनी चेयर पर बैठे नौजवान पर पड़ी।

अशोक से उमर में वो काफी छोटा था लेकिन पद उससे कहीं बड़ा था इस लिए अशोक के अंदर थोड़ी झिझक और थोड़ी घबराहट थी।
उसने सुन रखा था कि ये नौजवान थोड़ा कड़क है और कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी है।

"प्लीज़ हैव ए सीट मिस्टर खत्री।" उस नौजवान ने अशोक को उसके सर नेम से संबोधित करते हुए कहा।

हालाकि उसका लहजा सपाट था।
एकदम भावहीन।
बहरहाल, अशोक खत्री धड़कते दिल के साथ आगे बढ़ा और टेबल के इस पार रखी तीन चेयर्स में से एक पर जा कर बैठ गया।

"सो, मिस्टर खत्री।" उसके बैठते ही उस नौजवान ने टेबल पर रखी कुछ फाइल्स में से एक पर से नज़र हटा कर उसकी तरफ देखा──"अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो आपको हमारी इस कंपनी में ज्वॉइन हुए लगभग एक महीना होने वाला है, राइट?"

"य...यस सर।" अशोक खत्री ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए जल्दी से कहा।

"आपने यहां ज्वाइन होने से पहले अपनी जो भी शर्तें रखीं थी।" उस आकर्षक से नौजवान ने अपलक अशोक की तरफ देखते हुए सपाट लहजे में ही कहा──"उन शर्तों को हमने माना और आपको आपके मन मुताबिक सैलरी देने को राज़ी हुए, राइट?"

"ज...जी जी बिल्कुल सर।"

अशोक को समझ नहीं आ रहा था कि सामने बैठा आकर्षक नौजवान आख़िर उससे कहना क्या चाहता है?
उसका जी चाहा कि असल बात पूछे लेकिन उसकी हिम्मत न पड़ी।

"उसके बदले आपने ये वादा किया था कि आप कम ज़िंक खर्च कर के बेहतर पाइप्स जी-आई कर के देंगे और कंपनी का फ़ायदा करवाएंगे।" सामने बैठे नौजवान ने जैसे अब जा कर असल मुद्दे की बात की──"जबकि असल में ऐसा आप अब तक नहीं कर पाए। आपकी अब तक की सारी रिपोर्ट मैंने देख ली है और ये जाना है कि आप उस व्यक्ति से भी ज़्यादा ज़िंक खर्च कर रहे हैं जो आपसे पहले यहां जी-आई के इंचार्ज पद पर था। हफ़्ते दस दिन का तो समझ में आता है मिस्टर खत्री लेकिन एक महीना होने को आया और अभी भी आप इस मामले में कुछ नहीं कर पाए।"

"म...मुझे पता है सर कि ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है।" अशोक ने अपना बचाव करते हुए मानो खुद की पैरवी की──"और इसके लिए मैं हद से ज़्यादा प्रयास भी कर रहा हूं लेकिन इसके बाद भी ज़िंक के खर्चे में कमी नहीं आ रही। असल में समस्या ये है कि जो नए वॉचमैन आए हैं उनको कितना भी समझाएं लेकिन वो सही से काम नहीं कर पा रहे। दूसरी समस्या ये है कि मटेरियल भी ख़राब आ रहा है जिसके चलते ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है। जिन पटरों से पाईप बनाए जा रहे हैं वो काफी ख़राब हैं। उनमें खुरदुरापन है जिसके चलते वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में कवर कर लेते हैं। एक्सपोर्ट के माल के लिए तो कोईल का मटेरियल चाहिए जो ज़िंक भी कम कवर करे और पाईप में शाइनिंग भी टॉप क्लास की दिखे।"

"आपके आने से पहले भी एक्सपोर्ट के माल के लिए ऐसा ही मटेरियल प्रयोग होता था मिस्टर खत्री।" सामने बैठे नौजवान ने कहा──"और जी-आई होने पर ज़िंक भी कम खर्च होता था। वेल, अगर ऐसा ही हाल रहा और ज़िंक की लागत में आप कमी नहीं कर पाए तो खुद सोचिए कि कंपनी में आपको रखने का क्या फ़ायदा? उम्मीद करता हूं कि आप एग्रीमेंट में किए गए अपने वायदे और दावे पर खरा उतरेंगे अदरवाइज़ कंपनी आपके खिलाफ़ कड़ा एक्शन लेने पर मजबूर हो जाएगी।"

नौजवान अधिकारी की ये बात सुन कर अशोक खत्री पलक झपकते ही सन्नाटे में आ गया।
उसकी धड़कनें अब किसी हथौड़े की तरह उसकी कनपटी को बजाने लगीं थी।
इतना तो वो भी जानता था कि ज़िंक की लागत में उसके हर प्रयास के बाद भी कोई कमी नहीं आ रही है।

ये सच है कि मटेरियल अच्छा नहीं मिल रहा है और वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में समेट ले रहा है लेकिन नौजवान अधिकारी के अनुसार ऐसा ही मटेरियल उसके आने से पूर्व भी मिलता था और उनमें ज़िंक उससे कम ही लग रहा था।

खत्री को समझ नहीं आ रहा था कि ज़िंक की लागत को कैसे कम करे?
अगर यही हाल रहा तो निश्चित ही उसकी नौकरी ख़तरे में पड़ जानी है।
उसे इस मामले में कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।

"आई होप, एवरीथिंग विल बी ऑल राइट मिस्टर खत्री।" उसकी सोचो को भंग करते हुए उस आकर्षक नौजवान ने कहा──"यू मे गो नाउ।"

अशोक खत्री चेयर से उठा और भारी क़दमों के साथ केबिन से बाहर आ गया।
उसने राहत की लंबी सांस ली लेकिन माथे पर से चिंता की लकीरें न मिटा सका।
थोड़ी ही देर में वो जी-आई वाले प्लांट की तरफ बढ़ता चला जा रहा था।

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"अरे! आज आने में इतनी देर क्यों लगा दी आपने?" प्रिया ने दरवाज़ा खोलते ही बाहर खड़े अपने पति से पूछा।

"क्या करें हो गई देर।" अशोक ने अजीब भाव से कहा──"काम में ये सब तो होता ही है।"

प्रिया ने महसूस किया कि आज उसके पति के चेहरे की चमक ग़ायब है।
बेहद निराश और थका थका सा नज़र आ रहा है वो।
प्रिया का जी चाहा कि पूछे मगर फिर उसने ये सोच कर अपना इरादा बदल लिया कि अभी तो उसका पति आया है और उसके आते ही उससे उसकी परेशानी का सबब पूछना ठीक नहीं होगा।

खा पी कर अशोक अपने कमरे में सोने चला गया था जबकि प्रिया जूठे बर्तन उठा कर किचन में रखने लगी थी।
उसके मन में बार बार यही ख़याल उभर रहा था कि आज उसके पति के चेहरे पर चमक क्यों नहीं है?
आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसके चलते उसका पति आज इतना निराश और थका हुआ सा लग रहा है?

जल्दी ही काम से फारिग़ हो कर प्रिया अपने कमरे में अशोक के पास पहुंच गई।
उसने खड़े खड़े ही ध्यान से अशोक की तरफ देखा।

अशोक बेड पर लेटा हुआ था।
उसका एक हाथ कोहनी से मुड़ा हुआ था और ऊपर उसके माथे पर कलाई के साथ रखा हुआ था।
आंखें बंद तो थीं लेकिन स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वो आंखें बंद किए किन्हीं गहरे विचारों में खोया हुआ है।
ये देख प्रिया के माथे पर शिकन उभर आई।

"क्या बात है अशोक?" फिर उसने बेड पर अशोक के बिल्कुल पास बैठ कर पूछा──"आज आप इतने टेंशन में क्यों दिख रहे हैं? आख़िर बात क्या है?"

"आं...क..कुछ नहीं।" अशोक ने खुद को सम्हालते हुए कहा──"बस ऐसे ही काम के बारे में सोच रहा था। तुम सुनाओ, नई मेड सही से काम कर रही है कि नहीं?"

"हां वो तो कर रही है।" प्रिया ने अशोक को ध्यान से देखते हुए कहा──"लेकिन आप मुझसे कुछ छुपा रहे हैं। आते समय ही मैंने आपके चेहरे पर परेशानी देखी थी और अभी भी आप आंखें बंद किए कुछ ऐसा सोचने में गुम थे जो शायद आपकी चिंता का कारण बना हुआ है। बताइए ना, आख़िर बात क्या है?"

प्रिया अपने पति से उसकी परेशानी जानने पर इस लिए भी ज़ोर दे रही थी क्योंकि पति को कुछ सोचते देख वो ये सोच कर खुद भी परेशान हो गई थी कि कहीं उसके पति को पता तो नहीं चल गया कि वो अपने पूर्व प्रेमी से मिली थी?

"ऐसी कोई बात नहीं है बेबी।" अशोक ने उठ कर प्रिया के चेहरे को हल्के से सहलाते हुए कहा──"असल में आज कल काम का प्रेशर थोड़ा बढ़ गया है इस लिए काम के प्रति थोड़ी चिंता और थकावट हो रही है। बाकी कोई बात नहीं है।"

"सच कह रहे हैं ना?" प्रिया ने जैसे आश्वस्त होने की गरज से पूछा।

"हां मेरी जान, मैं सच ही कह रहा हूं।" अशोक ने कहा और थोड़ा सा आगे बढ़ कर प्रिया के गुलाबी होठों को चूम लिया।

उसकी इस क्रिया से प्रिया जहां एक तरफ आश्वस्त हो गई वहीं दूसरी तरफ हल्का सा शर्मा भी गई।
बहरहाल, इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई।

अशोक मानसिक तनाव में था जिसे उसने प्रिया से छुपा लिया था।
उसने दूसरी तरफ करवट ली और आंखें बंद कर के सोने की कोशिश करने लगा।

प्रिया के लिए ये सामान्य बात थी।
अशोक उमर में उससे काफी बड़ा था जिसके चलते दोनों के बीच हर रात काम क्रीड़ा नहीं होती थी।

अशोक ने दूसरी तरफ करवट ली तो प्रिया ने भी उसकी फ़िक्र छोड़ आंख बंद कर के सोने की कोशिश करने लगी।
कुछ ही देर में उसका भटकता हुआ मन एक बार फिर अरमान की तरफ जा पहुंचा।
अगले ही पल जब अरमान के ख़याल उभरने शुरू हुए तो वो एक बार फिर से परेशान हो उठी।
रात बड़ी मुश्किल से उसकी आंख लगी।
Shaandar update
 
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