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Thriller ♡ बेरहम इश्क़ ♡

park

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भाग- ०३
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उसके बाद अरमान ने देखा कि प्रिया ने डेढ़ दो घंटे में उसके घर का बहुत कुछ हुलिया बदल दिया था।
इस सबके चलते उसका अपना हुलिया बिगड़ गया था।
उसके कपड़े गंदे हो गए थे।
घर के पीछे बने बाथरूम में जा कर उसने अपने आपको थोड़ा बहुत साफ किया और फिर अरमान से किसी दिन फिर से आने का बोल कर चली गई।
उसके जाते ही अरमान के होठों पर एक रहस्यमय मुस्कान उभर आई थी।



अब आगे....


प्रिया जब अपने फ्लैट पर पहुंची तो शाम के साढ़े चार बज चुके थे
उसकी सौतेली बेटी अंकिता के आने का समय हो गया था।
प्रिया ने फ़ौरन ही अपने कमरे में जा कर सबसे पहले अपने गंदे कपड़े उतारे और अटैच बाथरूम में घुस गई।

जल्दी जल्दी उसने खुद को साफ किया और फिर कमरे में आ कर दूसरे कपड़े पहन लिए।
गंदे वाले कपड़ों को वाशिंग मशीन में डाल ही रही थी कि दरवाज़े की घंटी बज उठी।
वो समझ गई कि उसकी बेटी अंकिता स्कूल से आ गई है।
कपड़ों को मशीन में डाल कर वो तेज़ी से बाहर वाले दरवाज़े के पास पहुंची और गेट खोल दिया।

"आ गई मेरी बेटी?"

अंकिता पर नज़र पड़ते ही उसने बड़े ही स्नेह से कहा और फिर दरवाज़े से एक तरफ हट कर अंकिता को अंदर आने का रास्ता दिया।

अंकिता उसे देख कर थोड़ा सा मुस्कुराई और फिर अपना बैग लिए अंदर दाख़िल हो गई।

प्रिया ने ये सोच कर मन ही मन राहत की सांस ली कि अच्छा हुआ जो वो वक्त पर आ गई थी वरना उसकी बेटी को यहां इंतज़ार करना पड़ता और संभव था कि उसके सवालों के जवाब भी देने पड़ जाते।

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"ये तो कमाल हो गया।" विशाल ने सामने वाले सोफे पर बैठे अरमान को देखते हुए थोड़ी हैरानी से कहा──"यकीन नहीं होता कि वो आज तेरे घर आई और उसने तेरे घर का हुलिया भी ठीक किया।"

"उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी।" अरमान ने कहा──"लेकिन फिर भी मेरा दिल कह रहा था कि वो मुझसे मिलने ज़रूर आएगी।"

"ये तूने उस दिन भी कहा था।" विशाल ने कहा──"ख़ैर, तो अब आगे क्या? मेरा मतलब है कि ये सब होने के बाद आगे का क्या प्लान है तेरा?"

"आगे का प्लान तब बनेगा जब ये कन्फर्म हो जाएगा कि वो मेरे लिए और क्या चाहती है?" अरमान ने एक सिगरेट जलाते हुए कहा──"मेरा मतलब है कि मेरी हालत को बेहतर बनाने के लिए वो क्या क्या करती है?"

"आज जो कुछ उसने तुझसे कहा है और जो कुछ उसने किया है।" विशाल ने भी एक सिगरेट जलाई, फिर कहा──"उससे तो यही प्रतीत होता है कि वो हर कीमत पर यही चाहती है कि तू खुद को बदले और किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपनी दुनिया आबाद कर ले। उसे एहसास है कि तेरी ये हालत उसी की वजह से है इस लिए वो पूरी कोशिश करेगी कि तू वही करे जो वो चाहती है। अगर तू खुद नहीं करेगा तो यकीनन वो खुद इसके लिए प्रयास करेगी।"

"लगता तो यही है।" अरमान ने कहा──"अब देखना ये है कि वो क्या क्या करती है?"

"वो क्या क्या करेगी ये तो ख़ैर आने वाला वक्त ही बताएगा।" विशाल ने कहा──"लेकिन जाने क्यों तेरे इरादे मुझे नेक नहीं लग रहे।"

"मेरे इरादे नेक ही हैं डियर।" अरमान ने सिगरेट का एक लंबा कश ले कर उसका धुआं उड़ाते हुए कहा──"अपनी चाहत अपनी मोहब्बत को वापस हासिल करना ग़लत तो नहीं। वैसे, इतना तो तुझे भी पता है कि जब तक इंसान के इरादे नेक होते हैं तब तक साला उसे कुछ भी हासिल नहीं होता। मुझे ही देख ले, क्या मिला मुझे इरादा नेक बनाए रखने से? सच तो ये है मेरे दोस्त कि कुछ हासिल करने के लिए कभी कभी नेक की जगह ग़लत इरादे भी रखने चाहिए। अगर यही सब सात साल पहले किया होता तो आज वो किसी और की नहीं बल्कि मेरी बीवी होती।"

"तू सच में बहुत अजीब है।" विशाल ने अपनी बची हुई सिगरेट को ऐश ट्रे में बुझाते हुए कहा──"इन सात सालों में तुझे एक से बढ़ कर एक हसीन लड़कियां मिल सकती थीं लेकिन साला तेरी सुई उस प्रिया में ही अटकी रही। तू चाहता तो कब का अपनी दुनिया बसा लेता मगर नहीं, तुझे तो वही वापस चाहिए थी जिसने तुझे ठुकरा दिया था? ऐसा पागलपन क्यों यार?"

"तुझे ये पागलपन लगता है?" अरमान ने उसकी तरफ तिरछी नज़र से देखा──"जबकि ये मेरे दिल की ख़्वाहिश की बात है। उन सच्चे जज़्बातों की बात है जिन्हें उसने ठुकरा दिया था और मेरे दिल को चूर चूर कर दिया था। ख़ैर मैं जानता था कि जिस तरह की चाहत उसने की थी वैसा ज़रूर होगा। यानि वो सचमुच किसी रईस व्यक्ति से शादी करेगी। अपनी ज़िद तो बस इतनी सी थी कि अगर वो दुबारा कहीं मिले तो उसे इस बात का एहसास कराऊं कि दुनिया में दौलत भले ही उसे हज़ारों ऐशो आराम दे देगी लेकिन खुशी का असली एहसास क्या होता है इससे वो हमेशा महरूम ही रहेगी।"

"तो क्या तुझे ये लगता है कि रईस व्यक्ति की बीवी होने के बाद भी वो खुशी के असली एहसास से महरूम है?" विशाल ने पूछा।

"हां, ऐसा हो भी सकता है।" अरमान ने कहा──"और अगर ऐसा नहीं होगा तो मैं उसे इसका एहसास कराऊंगा।"

"मुझे तो ऐसा लगता है कि तू इस बारे में ज़रूरत से ज़्यादा ही सोच रहा है।" विशाल ने कहा──"हो सकता है कि उसके प्रति तेरा ये ख़याल बेवजह अथवा बेबुनियाद ही हो।"

"बिल्कुल हो सकता है।" अरमान ने कहा──"मगर जैसा कि मैंने कहा अगर उसे एहसास नहीं होगा तो मैं खुद एहसास कराऊंगा।"

"और ऐसा तू करेगा कैसे?"

"मैं बताऊंगा नहीं बल्कि तुझे ऐसा कर के दिखाऊंगा।" अरमान ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा──"संभव है कि थोड़ा समय लग जाए लेकिन ऐसा होगा ज़रूर। बस तू देखता जा।"

विशाल अपलक उसे देखता रहा।
इस वक्त अरमान के चेहरे पर अगर उसे कुछ दिख रहा था तो वो था──आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय और पत्थर जैसी कठोरता।

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अंकिता शाम साढ़े पांच बजे ट्यूशन पढ़ने चली जाती थी। इस बीच प्रिया थोड़ी देर आराम करती थी।
उसका पति अशोक शाम के साढ़े आठ या नौ बजे के क़रीब आता था।

अंकिता के जाने के बाद प्रिया अपने कमरे में बेड पर लेटी हुई थी।
बार बार अरमान के ख़याल आ रहे थे।
हालाकि वो उसके बारे में इतना ज़्यादा सोचना नहीं चाहती थी लेकिन जाने क्यों उसका भटकता हुआ मन बार बार उसकी तरफ ही चला जाता था।

वो सोचने लग जाती थी कि अरमान सचमुच उसे दिल की गहराइयों से प्यार करता है।
ये उसके प्रेम की शिद्दत ही थी कि उसने अब तक अपने जीवन में किसी और लड़की को जगह नहीं दी थी।

एकाएक ही उसे ख़याल आया कि अरमान ने उसकी वजह से अपना कैसा हाल बना लिया है।
उसे और उसके घर को देख कर इतना तो अब वो समझ ही गई थी कि अरमान ने उसे या फिर ये कहें कि अपनी मोहब्बत को खोने के बाद हर चीज़ से जैसे किनारा ही कर लिया था।
कदाचित यही वजह है कि वो आज भी एक मिडल क्लास आदमी ही बना रहा और उसका कोई खास मुकाम नहीं बन सका।

जब तक वो उससे मिली न थी तब तक उसे कभी ख़याल तक नहीं आया था उसका लेकिन अब उससे मिलने और उसकी हालत देखने के बाद बार बार उसका मन उसी के बारे में सोचने लगता था।

उसे ऐसा प्रतीत होता जैसे उसके अंदर से कोई कह रहा हो कि──"देख प्रिया, तेरी वजह से उस व्यक्ति ने अपना जीवन बर्बाद कर लिया। वो आज भी तुझे टूट कर चाहता है। क्या उसका हाल जान लेने के बाद भी तेरा उसके प्रति कोई फर्ज़ नहीं बनता? माना कि तू उसके लिए हर चीज़ नहीं कर सकती लेकिन कम से कम इतना तो कर ही सकती है जिससे कि उसके अंदर अपनी दुनिया बसा लेने का ख़याल आ जाए।"

"मैं करूंगी।" अपने अंदर की आवाज़ सुन प्रिया के मुख से अनायास ही निकल गया──"मुझसे जितना हो सकेगा उतना उसकी भलाई के लिए कुछ न कुछ करूंगी।"

"क्या करेगी तू?" अंदर से उसकी अंतरात्मा ने उससे पूछा──"और क्या तुझे लगता है कि अरमान खुद को बदल कर तथा पिछला सब कुछ भुला कर एक नए सिरे से अपना जीवन शुरू करेगा?"

"हां, मुझे यकीन है कि अरमान मेरी कोई भी बात नहीं टालेगा।" प्रिया ने जवाब दिया।

शाम साढ़े आठ बजे के क़रीब उसका पति अशोक आया।
प्रिया ये देख कर खुश हुई कि वो अपने साथ एक मेड को ले कर आया है।
मेड शादी शुदा थी किंतु उसकी उमर प्रिया जितनी ही लग रही थी।

अशोक ने बताया कि मेड का पति कंपनी में ही काम करता है। उसके पति को कंपनी की तरफ से कालोनी में कमरा तो मिला हुआ है लेकिन वो अपनी पत्नी मीरा को कालोनी के कमरे में नहीं रख सकता। वो आज ही गांव से अपनी पत्नी को ले कर आया था और कंपनी के बाहर कहीं किराए से कमरा ढूंढ रहा था। अशोक को जब कंपनी के एक आदमी ने इस बारे में बताया तो उसने मीरा के पति को बुला कर उससे बात की और ये भी कहा कि वो उसे कहीं पास में ही कमरा दिलवा देगा बशर्ते वो अपनी बीवी को उसके यहां काम करने को राज़ी हो।

मीरा के पति को इससे कोई आपत्ति नहीं थी। बल्कि वो ये सोच कर खुशी से राज़ी हो गया था कि अशोक जैसे बड़े आदमी के घर में काम करने से उसकी पत्नी भी चार पैसे कमा लेगी जिससे उसके परिवार का गुज़ारा बेहतर तरीके से हो सकेगा।

बहरहाल, मेड के आ जाने से प्रिया खुश हो गई थी। अशोक ने बताया कि मीरा अपने पति के लिए सुबह का नाश्ता बना कर सुबह जल्दी ही यहां आ जाया करेगी और फिर दोपहर तक यहीं रहेगी। सारे काम करने के बाद वो वापस अपने घर चली जाया करेगी और फिर शाम को आएगी। शाम का खाना पीना बना कर वो वापस अपने घर पति के पास चली जाएगी।
प्रिया को इससे कोई परेशानी नहीं थी।

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अगले दिन।

"अरे! प्रिया तुम?" अरमान ने जैसे ही दरवाज़ा खोला तो बाहर प्रिया को खड़ा देख थोड़ा चौंकते हुए बोला──"मैं खुली आंखों से कोई हसीन ख़्वाब तो नहीं देख रहा?"

"मुझे लगा ही था कि तुम घर पर ही होगे।" प्रिया ने अंदर दाख़िल होते हुए कहा──"तुम्हारी और तुम्हारे घर की हालत देख कर यही लगता है कि तुम हमेशा ही ऐसे रहना चाहते हो। अरे! दुनिया के लोग कहां से कहां पहुंच गए और तुम अब भी उसी दुनिया में खोए हुए हो जिसका कोई मतलब ही नहीं है। आख़िर कब तक ऐसे बेमतलब की ज़िंदगी जीते रहोगे तुम?"

"दिल अगर ऐसे ही जीने पर मजबूर करे तो कोई क्या करे प्रिया?" अरमान ने मानो ठंडी आह भरते हुए कहा──"हालांकि कभी कभी मैं भी सोचता हूं कि अपनी इस ज़िंदगी से बाहर निकल कर कुछ करूं लेकिन ऐसा हो ही नहीं पाता। पहले भी मेरा पागल दिल मेरे दिमाग़ पर हावी था और आज भी हावी है।"

"तुम और तुम्हारी बातें दोनों ही बहुत अजीब हैं।" प्रिया ने धड़कते दिल से कहा──"और ये तुम्हारे घर के बाहर टैक्सी किसकी खड़ी है? कल भी खड़ी थी।"

"किराए की है, उसे चलाता हूं मैं।" अरमान ने कहा──"असल में अपना थोड़ा बहुत जो खर्चा है वो टैक्सी चला कर ही पूरा हो जाता है। दिन में आराम करता हूं और रात में टैक्सी चलाता हूं। रात में ठीक रहता है क्योंकि देर रात जो सवारियां मिलती हैं उससे दुगनी तिगुनी आमदनी हो जाती है। उस आमदनी में से टैक्सी मालिक को कुछ पकड़ा देता हूं और बाकी जो बचता है वो अपना पेट भरने के लिए पर्याप्त होता है।"

अरमान की ये बातें सुन कर प्रिया को ज़बरदस्त धक्का लगा।
उसके अंदर ये सोच कर दर्द भरी टीस उभरी थी कि अरमान जैसा पढ़ा लिखा इंसान आज उसकी वजह से टैक्सी चला कर अपना जीवन यापन कर रहा है।
इस एहसास ने प्रिया को अंदर ही अंदर झकझोर कर रख दिया।
एक बार पुनः उसके मन में ख़याल उभरा कि काश! उसने अरमान को ठुकराया न होता।

अरमान की बात सुनने के बाद वो जज़्बातों में बहने लगी थी और शायद यही वजह थी कि वो फ़ौरन कुछ बोल ना सकी थी।
फिर किसी तरह उसने खुद को सम्हाला और घर की बाकी की सफाई में लग गई।

उसे ख़ामोशी से काम में लग गया देख अरमान के होठों पर रहस्यमय मुस्कान उभर आई।

"अच्छा ये बताओ कुछ खाया पिया है कि नहीं?" थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद प्रिया ने उसकी तरफ देख कर पूछा।

"हां, वो बाहर एक ढाबे से खा कर ही आया था।" अरमान ने बताया──"बस आराम करने ही जा रहा था कि तुमने दरवाज़ा खटखटा दिया।"

"ओह! इसका मतलब मैं ग़लत समय पर आ गई हूं?" प्रिया ने कहा──"अगर मुझे पता होता कि ये तुम्हारे रेस्ट करने का टाइम है तो नहीं आती।"

"कोई बात नहीं।" अरमान ने उसे बड़ी मोहब्बत से देखा──"तुम अगर रोज़ इसी तरह यहां आओगी तो मुझे रेस्ट करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। तुम्हें देख लेने से ही दिलो दिमाग़ खुशी से बाग़ बाग़ हो जाया करेगा।"

प्रिया उसकी मोहब्बत भरी नज़रों का सामना न कर सकी और ना ही उसकी ऐसी बातों का कोई जवाब दे सकी।
ये अलग बात है कि उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं थी।
ये सोच कर भी कि वो किसी की पत्नी है और एक ऐसे पराए मर्द के घर आई है जो अकेला तो है ही लेकिन उसका पूर्व प्रेमी भी है।

"लुक अरमान।" फिर उसने एक गहरी सांस ले कर कहा──"ये सब ठीक नहीं है। मेरा मतलब है कि मेरे प्रति तुम्हारी ये भावनाएं ठीक नहीं हैं। तुम्हें समझना होगा कि मैं किसी की पत्नी हूं और इस जन्म में तुम्हारी नहीं हो सकती। तुम्हारे लिए बेहतर यही होगा कि तुम खुद को सम्हालो और नए सिरे से अपनी ज़िंदगी शुरू करो।"

"अगर कोई चाह ले तो सब कुछ हो सकता है प्रिया।" अरमान ने उसकी तरफ दो क़दम बढ़ कर कहा──"तुम कहती हो कि इस जन्म में तुम मेरी नहीं हो सकती जबकि मैं कहता हूं कि यकीनन हो सकती हो।"

"क...क्या मतलब है तुम्हारा?"

प्रिया को झटका सा लगा।
हैरत भरी नज़रों से अरमान को देखने लगी वो।
अंदर ही अंदर थोड़ा घबरा भी उठी।

"मतलब बहुत सीधा और सरल है प्रिया।" अरमान ने कहा──"इंसान अगर चाह ले तो असंभव चीज़ को भी संभव बना सकता है। आज तुम भले ही किसी और की पत्नी हो लेकिन अगर चाहो तो मेरी पत्नी भी बन सकती हो। उसके लिए तुम्हें सिर्फ अपने पति को तलाक़ देना होगा और फिर मुझसे विवाह कर लेना होगा।"

"क्..क्या?? पागल हो क्या?" प्रिया ने आश्चर्य से आंखें फाड़ कर उसे देखा──"तुम सोच भी कैसे सकते हो कि मैं ऐसा करूंगी?"

"मैंने कहा भी नहीं कि तुम ऐसा करो।" अरमान ने अजीब भाव से मुस्कुराते हुए कहा──"मैंने तो सिर्फ ये बताया है कि इंसान अगर चाह ले तो सब कुछ हो सकता है। तुम ऐसा नहीं करना चाहती तो ये तुम्हारी सोच और मर्ज़ी की बात है।"

प्रिया को समझ न आया कि क्या कहे?
वो अभी भी आश्चर्य से आंखें फाड़े अरमान को देखे जा रही थी।
अरमान अच्छी तरह समझता था कि उसकी बातों ने प्रिया के मनो मस्तिष्क में कैसा तूफ़ान खड़ा कर दिया होगा।

"दूसरों को समझाना और उन्हें उपदेश देना बहुत आसान होता है।" फिर अरमान ने होठों पर फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"मगर तुम भी जानती हो कि कहने में और करने में बहुत फ़र्क होता है। लोग दूसरों को बदलने के लिए जाने कैसे कैसे पैंतरे आज़माते हैं लेकिन वो एक बात ये नहीं सोचते कि जिसे वो बदलने की कोशिश कर रहे हैं वो बदलना भी चाहते हैं या नहीं? इस वक्त तुम भी मुझे बदलने की कोशिश ही कर रही हो जबकि सच्चाई ये है कि मैं किसी भी कीमत पर बदलना ही नहीं चाहता। आख़िर क्यों बदलूं? किसके लिए बदलूं? किस खुशी में बदलूं? अरे! जब मेरे अंदर किसी चीज़ की ख़्वाहिश ही नहीं है, किसी बात की कोई खुशी ही नहीं है तो किस आधार पर खुद को बदलूं? हां, एक तुम्हारी आरज़ू ज़रूर है लेकिन तुम मेरी हो नहीं सकती फिर किस लिए नई दुनिया बसाऊं? मेरा दिल किसी और की चाहत ही नहीं करता तो क्यों बेसबब किसी को अपना बना कर उसकी ज़िंदगी बर्बाद करूं, बताओ ज़रा?"

प्रिया को जैसे कोई जवाब ही न सूझा।
वो भौचक्की सी अरमान जैसे अजूबे को देखती रह गई।
फिर जैसे उसे होश आया तो उसने अपने ज़हन को झटका दे कर खुद को विचारों के भंवर से आज़ाद किया और फिर पलट कर पुनः साफ सफाई के काम में लग गई।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर अब वो ऐसा क्या करे जिससे अरमान सब कुछ भुला कर अपनी इस वीरान और बेमतलब सी ज़िंदगी से तौबा कर ले?
काम करते हुए वो यही सब सोचती जा रही थी लेकिन उसे कुछ सूझ नहीं रहा था।

अरमान ने भी आगे कुछ कहना उचित नहीं समझा था।
प्रिया क़रीब एक घंटे तक रही उसके बाद अपना हुलिया सही कर के चली गई।
जाते समय उसने सिर्फ इतना ही कहा कि समय मिला तो वो कल फिर आएगी लेकिन इसी शर्त पर कि वो थोड़ा समझने का प्रयास करे।



क्रमशः....
Nice and superb update....
 

park

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भाग- ०४
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"क्या बात है।" रात खा पी कर प्रिया जब अपने कमरे में पहुंची तो उसके चेहरे पर छाई गंभीरता को भांप कर उसके पति अशोक ने उससे पूछा──"मेड के आ जाने पर भी तुम खुश नहीं दिख रही?"

"ज..जी??" प्रिया एकदम से हड़बड़ा सी गई, फिर जल्दी ही खुद को सम्हाल कर बोली──"मेरा मतलब है ये क्या कह रहे हैं आप? मैं तो खुश ही हूं।"

"ऐसा लग तो नहीं रहा।" अशोक ने अपलक प्रिया को देखते हुए कहा──"बहुत देर से नोटिस कर रहा हूं तुम्हें। मेड के आने के बाद से अब तक मैंने तुम्हारे चेहरे पर खुशी के भाव नहीं देखे। ज़ाहिर है, कोई तो ऐसी बात है जिसकी वजह से तुम्हारा चांद की तरह नज़र आने वाला चेहरा बुझा हुआ और थोड़ा गम्भीर सा नज़र आ रहा है।"

अपने पति अशोक की ये बातें सुनते ही प्रिया ये सोच कर एकदम से घबरा उठी कि उसके चेहरे की गंभीरता अशोक को कहीं ये न समझा दे कि वो अपने पूर्व प्रेमी से दो दो बार मिल चुकी है।

माना कि अशोक उसे बहुत प्यार करता है और उसका हर नाज़ नखरा भी खुशी से सहता है लेकिन पत्नी को अपने पूर्व प्रेमी से मिलने की बात जान लेने के बाद वो यकीनन उससे ख़फा हो सकता है।

उसकी खुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी में पलक झपकते ही तूफ़ान आ सकता है।
उसका पति उसे चरित्रहीन समझ कर उसे घर से भी निकाल सकता है।
उसकी सौतेली बेटी जो उसे भले ही मां कह कर नहीं पुकारती लेकिन सगी मां जैसी ही समझ कर उससे लगाव और स्नेह रखती है, वो ये सब जान कर उससे घृणा करने लगेगी।

प्रिया के मनो मस्तिष्क में पलक झपकते ही ये सारे ख़याल उभरते चले गए और उसकी रूह तक को थर्रा गए।

"क्या हुआ?" अभी वो ये सब सोच कर खुद को सम्हाल ही रही थी कि तभी अशोक की आवाज़ ने फिर से उसे चौंका दिया──"तुम कुछ बोल क्यों नहीं रही बेबी? देखो, तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं तुमसे कितना प्यार करता हूं। तुम्हें हर पल खुश देखना चाहता हूं। तुम्हारी हर ख़्वाहिश पूरी करता हूं लेकिन तुम्हारा उतरा हुआ चेहरा देख कर मैं थोड़ा चिंता में पड़ गया हूं। मैं जानना चाहता हूं कि मेरी खूबसूरत क्वीन को आख़िर किस बात ने गंभीर बना दिया है?"

"न...नहीं ऐसी कोई बात नहीं है अशोक।" प्रिया ने धड़कते दिल से कहा──"मेरा यकीन कीजिए मुझे किसी बात ने गंभीर नहीं बनाया है। बात बस इतनी सी थी कि इतने दिनों से घर के काम खुद ही कर रही थी इस लिए थकान थोड़ी ज़्यादा ही हो गई थी। शायद इसी वजह से मेरे चेहरे की रंगत थोड़ी डाउन सी लगी आपको।"

"तुम सच कह रही हो न?"

अशोक ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचते हुए कहा।

"हां बाबा, सच ही कह रही हूं।" अपने पति का स्नेह और प्यार देख प्रिया ने मन ही मन राहत की सांस ली और मुस्कुराते हुए खुद को उसके सुपुर्द करते हुए कहा──"भला इतने केयरिंग पति के रहते मुझे किस बात की फ़िक्र हो सकती है? एक ही बात की थोड़ी तकलीफ़ हो रही थी उसे भी आज आपने दूर कर दी। नाउ, आई एम सो हैप्पी।"

"दैट्स लाईक ए गुड गर्ल।" अशोक उसको अपने ऊपर लिए हुए बेड पर आहिस्ता से लेट गया।

प्रिया का पूरा भार उसके ऊपर आ गया था।
उसके सीने के ठोस उभार अशोक के सीने में मानो धंस से गए थे।
अशोक ने उसकी पीठ और कमर से अपने हाथ हटाए और फिर उसके चेहरे को हौले से थाम कर बड़े प्यार से कहा──"चलो अब तो अपने शहद जैसे होठों को चूम लेने दो।"

"चूम लीजिए।" प्रिया मुस्कुराई──"मैंने कब मना किया है भला?"

"सुबह मना की तो थी तुम।" अशोक उसकी आंखों में झांकता बोला──"कह रही थी कि जब तक मैं मेड ले कर नहीं आऊंगा तब तक तुम मुझे पप्पी नहीं दोगी।"

"हां तो।" प्रिया ने थोड़ी अदा से कहा──"अब अगर आप हर रोज़ मेड लाने का बोल कर भूल जाएंगे तो मैं भी तो थोड़ा गुस्सा दिखाऊंगी ही।"

"अच्छा, ऐसा क्या?" अशोक ने मुस्कुराते हुए कहा──"चलो, अब तो मेड भी आ गई और मेरी जान खुश भी हो गई इस लिए पप्पी के साथ साथ बाकी सब कुछ भी कर सकता हूं ना?"

अशोक की बात का मतलब समझते ही प्रिया के चेहरे पर शर्म की हल्की लाली फैल गई।
उसने शर्म से मुस्कुराते हुए अशोक के सीने में अपना चेहरा छुपा लिया।
अशोक को उसके यूं शर्मा जाने पर उस पर बेहद प्यार आया।
उसके बाद वो आहिस्ता आहिस्ता प्रिया को चूमना शुरू कर दिया।

[][][][][]

"टैक्सी।"

दूसरे दिन प्रिया ने सड़क पर एक टैक्सी को आते देख हाथ देते हुए आवाज़ दी।
टैक्सी वाले ने उसकी आवाज़ सुनी तो उसकी तरफ टैक्सी ला कर रोक दी।

"अरे वाह!" टैक्सी ड्राइवर जोकि अरमान ही निकला, उसने प्रिया को देखते ही चहक कर कहा──"क्या बात है, आज तो अगर मैं कुछ और भी सोच लेता तो वो भी हो जाता।"

"म...मतलब??" प्रिया टैक्सी ड्राइवर के रूप में अरमान को देख कर पहले तो हैरान हुई फिर उसकी बात सुनते ही बोली।

"एक्चुअली, आज मैं ये सोच रहा था कि काश! रास्ते में मुझे तुम मिल जाओ तो तुम्हें अपनी टैक्सी में बैठा कर ले चलूं।" अरमान ने टैक्सी से बाहर आ कर प्रिया की तरफ देखते हुए कहा──"और देख लो, जो मैं चाह रहा था वही हो गया। तभी तो कह रहा हूं कि आज अगर कुछ और भी सोच लेता तो शायद वो भी हो जाता।"

"तुम कुछ ज़्यादा ही नहीं सोच रहे?" प्रिया ने धड़कते दिल से कहा──"और तुम तो रात में टैक्सी चलाते हो ना तो फिर दिन के इस वक्त टैक्सी में कहां घूम रहे हो?"

"क्या करें डियर, हम जैसे मामूली लोगों का वक्त कहां हमेशा एक जैसा रहता है?" अरमान ने टैक्सी का पिछला दरवाज़ा खोल कर प्रिया से कहा──"कल तुम्हारे जाने के बाद सो गया था। जब आंख खुली तो फील हुआ कि तबीयत कुछ ठीक नहीं है। थोड़ी कमज़ोरी भी फील हो रही थी। इस चक्कर में कल रात टैक्सी ले कर कहीं जा ही नहीं पाया। पास के एक मेडिकल स्टोर से दवा ली और खा कर फिर से सो गया। सुबह जब उठा तो तबीयत बेहतर लगी। अब क्योंकि रात टैक्सी चला कर खर्चे के लिए कुछ कमा नहीं पाया था इस लिए सोचा दिन में ही टैक्सी चला लूं।"

"कुछ तो अपने बारे में सोचो अरमान।" प्रिया को उसकी ख़राब तबीयत का जान कर उसके लिए बहुत बुरा लगा।
एकाएक ही उसे फ़िक्र होने लगी उसकी।

वो झट से खुले दरवाज़े से टैक्सी की पिछली सीट पर बैठ गई।
अरमान ने हौले से मुस्कुराते हुए टैक्सी का पिछला दरवाज़ा बंद किया और फिर घूम कर अपनी ड्राइविंग सीट पर आ गया।
अगले ही पल उसने टैक्सी को आगे बढ़ा दिया।

"तो बताईए मैडम, कहां जाना है आपको?" फिर उसने बैक व्यू मिरर में प्रिया को देखते हुए पूछा।

"किसी अच्छे से हॉस्पिटल में ले चलो।" प्रिया की नज़र भी पीछे से बैक व्यू मिरर में दिख रहे अरमान पर पड़ गई थी।

"ह...हॉस्पिटल???" अरमान हल्के से चौंका──"हॉस्पिटल क्यों? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना?"

"मेरी तबीयत ठीक है।" प्रिया ने बैक मिरर में अरमान पर नज़रें जमाए हुए ही कहा──"लेकिन तुम्हारी ठीक नहीं है इस लिए हॉस्पिटल चलो।"

"अरे! ये...ये क्या कह रही हो तुम?" अरमान एकदम से बौखला सा गया। फिर सम्हल कर बोला──"देखो, मैं बिल्कुल ठीक हूं और वैसे भी हॉस्पिटल में अपना इलाज़ करवाने के लिए पैसे नहीं हैं मेरे पास।"

"पैसे मैं दे दूंगी।" प्रिया ने सपाट लहजे में कहा──"तुम बस हॉस्पिटल चलो।"

"नहीं जाऊंगा।" अरमान ने सहसा सड़क के किनारे टैक्सी रोक दी, फिर मिरर में ही प्रिया को देखते हुए बोला───"और हां, मैं दुनिया के किसी भी इंसान का एहसान अपने ऊपर ले लूंगा लेकिन तुम्हारा नहीं।"

"अ...अरमान ये...ये तुम कैसी बातें कर रहे हो?" अचानक से उसका ये बर्ताव देख प्रिया की आंखें फैल गईं──"तुम सोच भी कैसे सकते हो कि मैं ऐसा तुम पर एहसान करने के लिए कह रही हूं?"

"बहुत खूब।" अरमान व्यंग से मुस्कुरा उठा──"उल्टा चोर कोतवाल को डांटे? ज़रा अपने गिरेबान में झांक कर तो देखो प्रिया। एक बार ज़रा देखो और फिर सोचो कि क्या तुमने ऐसा काम नहीं किया था जो मैं कभी सोच नहीं सकता था? चलो मान लिया कि मेरी हैसियत तुम्हें दुनिया का हर सुख और ऐशो आराम देने की नहीं थी जिसके चलते तुमने एक रईस व्यक्ति से शादी कर ली लेकिन....लेकिन इतने सालों बाद जब उस दिन इत्तेफ़ाक से तुमसे मुलाक़ात हुई तो तुमने कैसा बर्ताव किया था मेरे साथ? पैसे और गुरूर में तुम इतनी अंधी थी कि तुमने उस व्यक्ति का मज़ाक उड़ाया और उसे नीचा दिखाया जो तुम्हें दिलो जान से चाहता रहा है। इतना ही नहीं जिसने तुम्हारे सिवा कभी एक पल के लिए भी किसी दूसरी लड़की को अपने दिल में बैठाने का नहीं सोचा। क्या तुम्हारा वो बर्ताव और तुम्हारे वो कर्म मेरी सोच और उम्मीद से परे नहीं थे?"

प्रिया को फ़ौरन कोई जवाब नहीं सूझा।
अपराध बोध से उसका सिर झुकता चला गया।
सच ही तो कहा था अरमान ने।
उसने एक हफ़्ता पहले अरमान के साथ ऐसा ही तो बर्ताव किया था।

"सुना था औरत को कभी कोई समझ नहीं सकता।" उधर अरमान ने उसे चुप देख अधीरता से कहा──"आज तुम्हारा ये बर्ताव भी मुझे समझ नहीं आ रहा। उस दिन तो तुम मेरी हैसियत और मेरी हालत का मज़ाक उड़ा रही थी और खुद को आसमान से भी ऊंचा दिखा रही थी। कोई कसर नहीं छोड़ी थी मेरे दिल को छलनी छलनी करने में लेकिन अब मुझ पर मेहरबानी करती जा रही हो? भला किस लिए प्रिया? जो इंसान तुम्हारे लेवल का है ही नहीं उससे अचानक से ऐसा लगाव क्यों? उसकी भलाई के बारे में सोचना क्यों? उसके लिए फ़िक्र क्यों?"

प्रिया को अब भी कोई जवाब नहीं सूझा।
उसकी जुबान को जैसे ताला लग गया था।
सिर झुकाए वो ख़ामोशी से अरमान की बातें सुनती रही।
हां, उसके दिलो दिमाग़ में ज़बरदस्त हलचल ज़रूर मच गई थी।

"एक बात अच्छी तरह समझ लो प्रिया।" अरमान ने पुनः कहा──"मैं कल भी तुम्हें दिलो जान से प्यार करता था, आज भी करता हूं और आगे भी हमेशा करता रहूंगा। दुनिया का कोई भी व्यक्ति अथवा दुनिया की कोई भी ताक़त मेरे दिलो दिमाग़ से तुम्हारे प्रति इस चाहत को निकाल नहीं सकती। मैं जैसा हूं आगे भी वैसा ही रहूंगा। तुम्हें मेरी हालत पर तरस खा कर मुझ पर कोई एहसान करने की कोई ज़रूरत नहीं है और ना ही मुझ पर कोई हक़ जताने की ज़रूरत है।"

"म...मैं मानती हूं अरमान कि तुम्हें ठुकरा कर मैंने तुम्हारे साथ बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया था।" प्रिया ने थोड़ा दुखी हो कर कहा──"शायद उस समय मैं ज़रूरत से ज़्यादा ही मतलबी हो गई थी। तभी तो तुम्हारे बारे में ये तक नहीं सोचा था कि मेरे द्वारा इस तरह ठुकरा दिए जाने पर तुम्हारे दिल पर क्या गुज़रेगी। उस समय तो मेरे अंदर बस एक ही ख़्वाहिश थी कि मेरी शादी एक ऐसे व्यक्ति से हो जो अमीर हो और जो मुझे दुनिया का हर ऐशो आराम दे। उसके बाद जब सच में मेरी ख़्वाहिश पूरी हो गई तो उस खुशी में मुझे ये पता ही नहीं चला कि कब मेरे अंदर अमीरी का गुरूर आ कर घर कर गया। इतने सालों बाद जब तुम उस दिन मुझे मिले तो जाने कैसे मैं तुमसे वो सब कहती चली गई? तुम्हें और तुम्हारी हालत को देख कर उस समय मेरे अंदर शायद ये सोच कर ऐसी वाहियात भावना पैदा हो गई थी कि वो तुम ही थे जिससे मैं शादी करने वाली थी और हर चीज़ के लिए खुद को मोहताज बना लेने वाली थी। शुक्र था कि मैंने सही समय पर अपना इरादा बदल कर तुमसे शादी नहीं की, बल्कि एक अमीर व्यक्ति से की जिसके चलते आज मैं किसी रानी की तरह ऐश कर रही हूं। हां अरमान, उस समय मेरे अंदर ऐसी ही भावनाएं प्रबल रूप से उभर आईं थी और फिर मैंने वो सब कह कर तुम्हारा दिल दुखा दिया था। बाद में अपने घर जा कर जब मैंने तुम्हारे और अपने बारे में गहराई से सोचा तो एहसास हुआ कि मुझे वो सब नहीं कहना चाहिए था। वो भी एक ऐसे इंसान से जो आज भी मुझ जैसी मतलबी और बेवफ़ा लड़की से प्यार करता है और आज तक अपनी दुनिया नहीं बसाई। यकीन करो अरमान, जब ये एहसास हुआ तो मुझे अपने उस बर्ताव पर बहुत गुस्सा आया और तुम्हारे लिए बहुत दुख हुआ। रात भर नींद नहीं आई। मैंने फ़ैसला किया कि तुम्हारे घर आ कर तुमसे अपने उस बर्ताव की माफ़ी मांगूंगी।"

"ठीक है।" अरमान ने कहा──"मैंने तुम्हें माफ़ कर दिया है। अब तुम वापस अपनी दुनिया में लौट जाओ। मेरे बारे में सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है तुम्हें।"

"ऐसा मत कहो प्लीज़।" प्रिया का गला भर आया। याचना सी करती हुई बोली──"देर से ही सही मुझे ये एहसास हो गया है कि मैंने तुम्हारे साथ बहुत ग़लत किया है। अपनी उस ग़लती का किसी तरह पश्चाताप करना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि तुम पिछला सब कुछ भुला कर एक नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करो। किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपना घर बसा लो। अगर तुम ऐसा कर लोगे तो मुझे सच में बहुत खुशी होगी वरना मुझे यही दुख तड़पाता रहेगा कि मेरी वजह से तुमने अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर ली अथवा ये कहूं कि मैंने तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी है। प्लीज़ अरमान, मैं तुमसे हाथ जोड़ कर विनती करती हूं। प्लीज़ आख़िरी बार मेरी ये इच्छा पूरी कर दो।"

"नो, नेवर।" अरमान ने पूरी मजबूती से इंकार में सिर हिला कर कहा──"तुम आज भी सिर्फ अपनी खुशी के बारे में ही सोच रही हो प्रिया। तुम चाहती हो कि मैं अपनी हालत सुधार लूं ताकि तुम्हें किसी प्रकार का अपराध बोध न रहे और तुम चैन से खुशी खुशी अपनी दुनिया में ऐशो आराम के साथ जी सको। वाह! प्रिया, कितना अजब सितम कर रही हो मुझ पर। एक बार भी ये नहीं सोच रही कि तुम्हारे सिवा दुनिया की किसी भी दूसरी औरत से मुझे कोई खुशी हासिल ही नहीं हो सकती। मामला मेरे दिल का है प्रिया। इस दिल ने अपने अंदर सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी चाहत को पनाह दे रखा है। उसको किसी और के बारे में सोचना गवारा ही नहीं है। अब तुम ही बताओ ऐसे में भला मैं कैसे अपनी दुनिया को नए सिरे से शुरू करूं?"

"ह...हां मैं ये समझती हूं अरमान।" प्रिया उसकी दीवानगी देख अंदर तक कांप गई, फिर बोली──"लेकिन ये भी समझती हूं कि इंसान जब किसी के साथ बंधन में बंध जाता है तो देर सवेर उससे लगाव हो ही जाता है और फिर देर सवेर वो लगाव प्रेम में भी बदल जाता है। तुम एक बार किसी लड़की से शादी तो करो। मुझे पूरा यकीन है कि तुम्हारे दिल में उस लड़की के प्रति भावनाएं ज़रूर पैदा हो जाएंगी।"

"जानता हूं।" अरमान ने कहा──"लेकिन मैं ऐसा करना ही नहीं चाहता। मैं वो काम करना ही नहीं चाहता जिसकी वजह से मेरे दिल में तुम्हारे सिवा किसी दूसरे के लिए प्रेम जैसी कोमल भावनाएं जन्म ले लें। इस जन्म में तो अब मरते दम तक सिर्फ तुम्हीं से मोहब्बत करूंगा और तुम्हारी दर्द देने वाली यादों के साथ ही पूरा जीवन गुज़ारूंगा।"

प्रिया आश्चर्य चकित सी देखती रह गई उसे।
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अरमान के अंदर उसके प्रति ऐसी दीवानगी हो सकती है।
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि अरमान ऐसी सोच रख सकता है।

"तुम मेरी फ़िक्र मत करो।" उधर अरमान ने होठों पर फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"अगर मेरे बारे में सोचोगी तो ज़िंदगी को ऐशो आराम के साथ नहीं काट पाओगी। तुम अपनी दुनिया में खुश रहो। एक बात और, मेरी भलाई के लिए और मुझे सुधारने के लिए तुम चाहे कुछ भी कर लो लेकिन तुम इसमें कामयाब नहीं हो पाओगी। मैं सिर्फ उसी के साथ अपनी दुनिया बसाऊंगा जिसे मैं आज भी टूट टूट कर प्यार करता हूं, यानि तुमसे। तुम मेरी हो नहीं सकती और मैं किसी और का बनना नहीं चाहता। तुम बेकार में ही ये सब कर रही हो। जाओ, वापस अपनी दुनिया में लौट जाओ। मैं ये भी नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हारी शादीशुदा ज़िंदगी में ज़रा सा भी भूचाल आए।"

प्रिया को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका ज़हन एकदम से कुंद पड़ गया है।
उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि अब वो अरमान से क्या कहे?
उसके दिलो दिमाग़ में ज़बरदस्त हलचल मची हुई थी।
उसे ऐसा लगने लगा जैसे एकाएक वो किसी मजधार में फंस गई है जहां से निकलना उसके लिए बड़ा ही मुश्किल लग रहा है।

उसने दुखी मन से एक नज़र अरमान की तरफ डाली और फिर दरवाज़ा खोल कर टैक्सी से उतर गई।
अरमान ने उससे कुछ नहीं कहा।
यहां तक कि जब वो बिना कुछ बोले एक तरफ को चल पड़ी तो उसने उसे रोका तक नहीं।
किंतु....उसे जाता देख उसके होठों पर रहस्यमय मुस्कान ज़रूर उभर आई।


क्रमशः....
Nice and superb update....
 

dhparikh

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भाग- ०३
━━━━━━━━━━━━


उसके बाद अरमान ने देखा कि प्रिया ने डेढ़ दो घंटे में उसके घर का बहुत कुछ हुलिया बदल दिया था।
इस सबके चलते उसका अपना हुलिया बिगड़ गया था।
उसके कपड़े गंदे हो गए थे।
घर के पीछे बने बाथरूम में जा कर उसने अपने आपको थोड़ा बहुत साफ किया और फिर अरमान से किसी दिन फिर से आने का बोल कर चली गई।
उसके जाते ही अरमान के होठों पर एक रहस्यमय मुस्कान उभर आई थी।



अब आगे....


प्रिया जब अपने फ्लैट पर पहुंची तो शाम के साढ़े चार बज चुके थे
उसकी सौतेली बेटी अंकिता के आने का समय हो गया था।
प्रिया ने फ़ौरन ही अपने कमरे में जा कर सबसे पहले अपने गंदे कपड़े उतारे और अटैच बाथरूम में घुस गई।

जल्दी जल्दी उसने खुद को साफ किया और फिर कमरे में आ कर दूसरे कपड़े पहन लिए।
गंदे वाले कपड़ों को वाशिंग मशीन में डाल ही रही थी कि दरवाज़े की घंटी बज उठी।
वो समझ गई कि उसकी बेटी अंकिता स्कूल से आ गई है।
कपड़ों को मशीन में डाल कर वो तेज़ी से बाहर वाले दरवाज़े के पास पहुंची और गेट खोल दिया।

"आ गई मेरी बेटी?"

अंकिता पर नज़र पड़ते ही उसने बड़े ही स्नेह से कहा और फिर दरवाज़े से एक तरफ हट कर अंकिता को अंदर आने का रास्ता दिया।

अंकिता उसे देख कर थोड़ा सा मुस्कुराई और फिर अपना बैग लिए अंदर दाख़िल हो गई।

प्रिया ने ये सोच कर मन ही मन राहत की सांस ली कि अच्छा हुआ जो वो वक्त पर आ गई थी वरना उसकी बेटी को यहां इंतज़ार करना पड़ता और संभव था कि उसके सवालों के जवाब भी देने पड़ जाते।

[][][][][]

"ये तो कमाल हो गया।" विशाल ने सामने वाले सोफे पर बैठे अरमान को देखते हुए थोड़ी हैरानी से कहा──"यकीन नहीं होता कि वो आज तेरे घर आई और उसने तेरे घर का हुलिया भी ठीक किया।"

"उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी।" अरमान ने कहा──"लेकिन फिर भी मेरा दिल कह रहा था कि वो मुझसे मिलने ज़रूर आएगी।"

"ये तूने उस दिन भी कहा था।" विशाल ने कहा──"ख़ैर, तो अब आगे क्या? मेरा मतलब है कि ये सब होने के बाद आगे का क्या प्लान है तेरा?"

"आगे का प्लान तब बनेगा जब ये कन्फर्म हो जाएगा कि वो मेरे लिए और क्या चाहती है?" अरमान ने एक सिगरेट जलाते हुए कहा──"मेरा मतलब है कि मेरी हालत को बेहतर बनाने के लिए वो क्या क्या करती है?"

"आज जो कुछ उसने तुझसे कहा है और जो कुछ उसने किया है।" विशाल ने भी एक सिगरेट जलाई, फिर कहा──"उससे तो यही प्रतीत होता है कि वो हर कीमत पर यही चाहती है कि तू खुद को बदले और किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपनी दुनिया आबाद कर ले। उसे एहसास है कि तेरी ये हालत उसी की वजह से है इस लिए वो पूरी कोशिश करेगी कि तू वही करे जो वो चाहती है। अगर तू खुद नहीं करेगा तो यकीनन वो खुद इसके लिए प्रयास करेगी।"

"लगता तो यही है।" अरमान ने कहा──"अब देखना ये है कि वो क्या क्या करती है?"

"वो क्या क्या करेगी ये तो ख़ैर आने वाला वक्त ही बताएगा।" विशाल ने कहा──"लेकिन जाने क्यों तेरे इरादे मुझे नेक नहीं लग रहे।"

"मेरे इरादे नेक ही हैं डियर।" अरमान ने सिगरेट का एक लंबा कश ले कर उसका धुआं उड़ाते हुए कहा──"अपनी चाहत अपनी मोहब्बत को वापस हासिल करना ग़लत तो नहीं। वैसे, इतना तो तुझे भी पता है कि जब तक इंसान के इरादे नेक होते हैं तब तक साला उसे कुछ भी हासिल नहीं होता। मुझे ही देख ले, क्या मिला मुझे इरादा नेक बनाए रखने से? सच तो ये है मेरे दोस्त कि कुछ हासिल करने के लिए कभी कभी नेक की जगह ग़लत इरादे भी रखने चाहिए। अगर यही सब सात साल पहले किया होता तो आज वो किसी और की नहीं बल्कि मेरी बीवी होती।"

"तू सच में बहुत अजीब है।" विशाल ने अपनी बची हुई सिगरेट को ऐश ट्रे में बुझाते हुए कहा──"इन सात सालों में तुझे एक से बढ़ कर एक हसीन लड़कियां मिल सकती थीं लेकिन साला तेरी सुई उस प्रिया में ही अटकी रही। तू चाहता तो कब का अपनी दुनिया बसा लेता मगर नहीं, तुझे तो वही वापस चाहिए थी जिसने तुझे ठुकरा दिया था? ऐसा पागलपन क्यों यार?"

"तुझे ये पागलपन लगता है?" अरमान ने उसकी तरफ तिरछी नज़र से देखा──"जबकि ये मेरे दिल की ख़्वाहिश की बात है। उन सच्चे जज़्बातों की बात है जिन्हें उसने ठुकरा दिया था और मेरे दिल को चूर चूर कर दिया था। ख़ैर मैं जानता था कि जिस तरह की चाहत उसने की थी वैसा ज़रूर होगा। यानि वो सचमुच किसी रईस व्यक्ति से शादी करेगी। अपनी ज़िद तो बस इतनी सी थी कि अगर वो दुबारा कहीं मिले तो उसे इस बात का एहसास कराऊं कि दुनिया में दौलत भले ही उसे हज़ारों ऐशो आराम दे देगी लेकिन खुशी का असली एहसास क्या होता है इससे वो हमेशा महरूम ही रहेगी।"

"तो क्या तुझे ये लगता है कि रईस व्यक्ति की बीवी होने के बाद भी वो खुशी के असली एहसास से महरूम है?" विशाल ने पूछा।

"हां, ऐसा हो भी सकता है।" अरमान ने कहा──"और अगर ऐसा नहीं होगा तो मैं उसे इसका एहसास कराऊंगा।"

"मुझे तो ऐसा लगता है कि तू इस बारे में ज़रूरत से ज़्यादा ही सोच रहा है।" विशाल ने कहा──"हो सकता है कि उसके प्रति तेरा ये ख़याल बेवजह अथवा बेबुनियाद ही हो।"

"बिल्कुल हो सकता है।" अरमान ने कहा──"मगर जैसा कि मैंने कहा अगर उसे एहसास नहीं होगा तो मैं खुद एहसास कराऊंगा।"

"और ऐसा तू करेगा कैसे?"

"मैं बताऊंगा नहीं बल्कि तुझे ऐसा कर के दिखाऊंगा।" अरमान ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा──"संभव है कि थोड़ा समय लग जाए लेकिन ऐसा होगा ज़रूर। बस तू देखता जा।"

विशाल अपलक उसे देखता रहा।
इस वक्त अरमान के चेहरे पर अगर उसे कुछ दिख रहा था तो वो था──आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय और पत्थर जैसी कठोरता।

[][][][][]

अंकिता शाम साढ़े पांच बजे ट्यूशन पढ़ने चली जाती थी। इस बीच प्रिया थोड़ी देर आराम करती थी।
उसका पति अशोक शाम के साढ़े आठ या नौ बजे के क़रीब आता था।

अंकिता के जाने के बाद प्रिया अपने कमरे में बेड पर लेटी हुई थी।
बार बार अरमान के ख़याल आ रहे थे।
हालाकि वो उसके बारे में इतना ज़्यादा सोचना नहीं चाहती थी लेकिन जाने क्यों उसका भटकता हुआ मन बार बार उसकी तरफ ही चला जाता था।

वो सोचने लग जाती थी कि अरमान सचमुच उसे दिल की गहराइयों से प्यार करता है।
ये उसके प्रेम की शिद्दत ही थी कि उसने अब तक अपने जीवन में किसी और लड़की को जगह नहीं दी थी।

एकाएक ही उसे ख़याल आया कि अरमान ने उसकी वजह से अपना कैसा हाल बना लिया है।
उसे और उसके घर को देख कर इतना तो अब वो समझ ही गई थी कि अरमान ने उसे या फिर ये कहें कि अपनी मोहब्बत को खोने के बाद हर चीज़ से जैसे किनारा ही कर लिया था।
कदाचित यही वजह है कि वो आज भी एक मिडल क्लास आदमी ही बना रहा और उसका कोई खास मुकाम नहीं बन सका।

जब तक वो उससे मिली न थी तब तक उसे कभी ख़याल तक नहीं आया था उसका लेकिन अब उससे मिलने और उसकी हालत देखने के बाद बार बार उसका मन उसी के बारे में सोचने लगता था।

उसे ऐसा प्रतीत होता जैसे उसके अंदर से कोई कह रहा हो कि──"देख प्रिया, तेरी वजह से उस व्यक्ति ने अपना जीवन बर्बाद कर लिया। वो आज भी तुझे टूट कर चाहता है। क्या उसका हाल जान लेने के बाद भी तेरा उसके प्रति कोई फर्ज़ नहीं बनता? माना कि तू उसके लिए हर चीज़ नहीं कर सकती लेकिन कम से कम इतना तो कर ही सकती है जिससे कि उसके अंदर अपनी दुनिया बसा लेने का ख़याल आ जाए।"

"मैं करूंगी।" अपने अंदर की आवाज़ सुन प्रिया के मुख से अनायास ही निकल गया──"मुझसे जितना हो सकेगा उतना उसकी भलाई के लिए कुछ न कुछ करूंगी।"

"क्या करेगी तू?" अंदर से उसकी अंतरात्मा ने उससे पूछा──"और क्या तुझे लगता है कि अरमान खुद को बदल कर तथा पिछला सब कुछ भुला कर एक नए सिरे से अपना जीवन शुरू करेगा?"

"हां, मुझे यकीन है कि अरमान मेरी कोई भी बात नहीं टालेगा।" प्रिया ने जवाब दिया।

शाम साढ़े आठ बजे के क़रीब उसका पति अशोक आया।
प्रिया ये देख कर खुश हुई कि वो अपने साथ एक मेड को ले कर आया है।
मेड शादी शुदा थी किंतु उसकी उमर प्रिया जितनी ही लग रही थी।

अशोक ने बताया कि मेड का पति कंपनी में ही काम करता है। उसके पति को कंपनी की तरफ से कालोनी में कमरा तो मिला हुआ है लेकिन वो अपनी पत्नी मीरा को कालोनी के कमरे में नहीं रख सकता। वो आज ही गांव से अपनी पत्नी को ले कर आया था और कंपनी के बाहर कहीं किराए से कमरा ढूंढ रहा था। अशोक को जब कंपनी के एक आदमी ने इस बारे में बताया तो उसने मीरा के पति को बुला कर उससे बात की और ये भी कहा कि वो उसे कहीं पास में ही कमरा दिलवा देगा बशर्ते वो अपनी बीवी को उसके यहां काम करने को राज़ी हो।

मीरा के पति को इससे कोई आपत्ति नहीं थी। बल्कि वो ये सोच कर खुशी से राज़ी हो गया था कि अशोक जैसे बड़े आदमी के घर में काम करने से उसकी पत्नी भी चार पैसे कमा लेगी जिससे उसके परिवार का गुज़ारा बेहतर तरीके से हो सकेगा।

बहरहाल, मेड के आ जाने से प्रिया खुश हो गई थी। अशोक ने बताया कि मीरा अपने पति के लिए सुबह का नाश्ता बना कर सुबह जल्दी ही यहां आ जाया करेगी और फिर दोपहर तक यहीं रहेगी। सारे काम करने के बाद वो वापस अपने घर चली जाया करेगी और फिर शाम को आएगी। शाम का खाना पीना बना कर वो वापस अपने घर पति के पास चली जाएगी।
प्रिया को इससे कोई परेशानी नहीं थी।

[][][][][]

अगले दिन।

"अरे! प्रिया तुम?" अरमान ने जैसे ही दरवाज़ा खोला तो बाहर प्रिया को खड़ा देख थोड़ा चौंकते हुए बोला──"मैं खुली आंखों से कोई हसीन ख़्वाब तो नहीं देख रहा?"

"मुझे लगा ही था कि तुम घर पर ही होगे।" प्रिया ने अंदर दाख़िल होते हुए कहा──"तुम्हारी और तुम्हारे घर की हालत देख कर यही लगता है कि तुम हमेशा ही ऐसे रहना चाहते हो। अरे! दुनिया के लोग कहां से कहां पहुंच गए और तुम अब भी उसी दुनिया में खोए हुए हो जिसका कोई मतलब ही नहीं है। आख़िर कब तक ऐसे बेमतलब की ज़िंदगी जीते रहोगे तुम?"

"दिल अगर ऐसे ही जीने पर मजबूर करे तो कोई क्या करे प्रिया?" अरमान ने मानो ठंडी आह भरते हुए कहा──"हालांकि कभी कभी मैं भी सोचता हूं कि अपनी इस ज़िंदगी से बाहर निकल कर कुछ करूं लेकिन ऐसा हो ही नहीं पाता। पहले भी मेरा पागल दिल मेरे दिमाग़ पर हावी था और आज भी हावी है।"

"तुम और तुम्हारी बातें दोनों ही बहुत अजीब हैं।" प्रिया ने धड़कते दिल से कहा──"और ये तुम्हारे घर के बाहर टैक्सी किसकी खड़ी है? कल भी खड़ी थी।"

"किराए की है, उसे चलाता हूं मैं।" अरमान ने कहा──"असल में अपना थोड़ा बहुत जो खर्चा है वो टैक्सी चला कर ही पूरा हो जाता है। दिन में आराम करता हूं और रात में टैक्सी चलाता हूं। रात में ठीक रहता है क्योंकि देर रात जो सवारियां मिलती हैं उससे दुगनी तिगुनी आमदनी हो जाती है। उस आमदनी में से टैक्सी मालिक को कुछ पकड़ा देता हूं और बाकी जो बचता है वो अपना पेट भरने के लिए पर्याप्त होता है।"

अरमान की ये बातें सुन कर प्रिया को ज़बरदस्त धक्का लगा।
उसके अंदर ये सोच कर दर्द भरी टीस उभरी थी कि अरमान जैसा पढ़ा लिखा इंसान आज उसकी वजह से टैक्सी चला कर अपना जीवन यापन कर रहा है।
इस एहसास ने प्रिया को अंदर ही अंदर झकझोर कर रख दिया।
एक बार पुनः उसके मन में ख़याल उभरा कि काश! उसने अरमान को ठुकराया न होता।

अरमान की बात सुनने के बाद वो जज़्बातों में बहने लगी थी और शायद यही वजह थी कि वो फ़ौरन कुछ बोल ना सकी थी।
फिर किसी तरह उसने खुद को सम्हाला और घर की बाकी की सफाई में लग गई।

उसे ख़ामोशी से काम में लग गया देख अरमान के होठों पर रहस्यमय मुस्कान उभर आई।

"अच्छा ये बताओ कुछ खाया पिया है कि नहीं?" थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद प्रिया ने उसकी तरफ देख कर पूछा।

"हां, वो बाहर एक ढाबे से खा कर ही आया था।" अरमान ने बताया──"बस आराम करने ही जा रहा था कि तुमने दरवाज़ा खटखटा दिया।"

"ओह! इसका मतलब मैं ग़लत समय पर आ गई हूं?" प्रिया ने कहा──"अगर मुझे पता होता कि ये तुम्हारे रेस्ट करने का टाइम है तो नहीं आती।"

"कोई बात नहीं।" अरमान ने उसे बड़ी मोहब्बत से देखा──"तुम अगर रोज़ इसी तरह यहां आओगी तो मुझे रेस्ट करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। तुम्हें देख लेने से ही दिलो दिमाग़ खुशी से बाग़ बाग़ हो जाया करेगा।"

प्रिया उसकी मोहब्बत भरी नज़रों का सामना न कर सकी और ना ही उसकी ऐसी बातों का कोई जवाब दे सकी।
ये अलग बात है कि उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं थी।
ये सोच कर भी कि वो किसी की पत्नी है और एक ऐसे पराए मर्द के घर आई है जो अकेला तो है ही लेकिन उसका पूर्व प्रेमी भी है।

"लुक अरमान।" फिर उसने एक गहरी सांस ले कर कहा──"ये सब ठीक नहीं है। मेरा मतलब है कि मेरे प्रति तुम्हारी ये भावनाएं ठीक नहीं हैं। तुम्हें समझना होगा कि मैं किसी की पत्नी हूं और इस जन्म में तुम्हारी नहीं हो सकती। तुम्हारे लिए बेहतर यही होगा कि तुम खुद को सम्हालो और नए सिरे से अपनी ज़िंदगी शुरू करो।"

"अगर कोई चाह ले तो सब कुछ हो सकता है प्रिया।" अरमान ने उसकी तरफ दो क़दम बढ़ कर कहा──"तुम कहती हो कि इस जन्म में तुम मेरी नहीं हो सकती जबकि मैं कहता हूं कि यकीनन हो सकती हो।"

"क...क्या मतलब है तुम्हारा?"

प्रिया को झटका सा लगा।
हैरत भरी नज़रों से अरमान को देखने लगी वो।
अंदर ही अंदर थोड़ा घबरा भी उठी।

"मतलब बहुत सीधा और सरल है प्रिया।" अरमान ने कहा──"इंसान अगर चाह ले तो असंभव चीज़ को भी संभव बना सकता है। आज तुम भले ही किसी और की पत्नी हो लेकिन अगर चाहो तो मेरी पत्नी भी बन सकती हो। उसके लिए तुम्हें सिर्फ अपने पति को तलाक़ देना होगा और फिर मुझसे विवाह कर लेना होगा।"

"क्..क्या?? पागल हो क्या?" प्रिया ने आश्चर्य से आंखें फाड़ कर उसे देखा──"तुम सोच भी कैसे सकते हो कि मैं ऐसा करूंगी?"

"मैंने कहा भी नहीं कि तुम ऐसा करो।" अरमान ने अजीब भाव से मुस्कुराते हुए कहा──"मैंने तो सिर्फ ये बताया है कि इंसान अगर चाह ले तो सब कुछ हो सकता है। तुम ऐसा नहीं करना चाहती तो ये तुम्हारी सोच और मर्ज़ी की बात है।"

प्रिया को समझ न आया कि क्या कहे?
वो अभी भी आश्चर्य से आंखें फाड़े अरमान को देखे जा रही थी।
अरमान अच्छी तरह समझता था कि उसकी बातों ने प्रिया के मनो मस्तिष्क में कैसा तूफ़ान खड़ा कर दिया होगा।

"दूसरों को समझाना और उन्हें उपदेश देना बहुत आसान होता है।" फिर अरमान ने होठों पर फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"मगर तुम भी जानती हो कि कहने में और करने में बहुत फ़र्क होता है। लोग दूसरों को बदलने के लिए जाने कैसे कैसे पैंतरे आज़माते हैं लेकिन वो एक बात ये नहीं सोचते कि जिसे वो बदलने की कोशिश कर रहे हैं वो बदलना भी चाहते हैं या नहीं? इस वक्त तुम भी मुझे बदलने की कोशिश ही कर रही हो जबकि सच्चाई ये है कि मैं किसी भी कीमत पर बदलना ही नहीं चाहता। आख़िर क्यों बदलूं? किसके लिए बदलूं? किस खुशी में बदलूं? अरे! जब मेरे अंदर किसी चीज़ की ख़्वाहिश ही नहीं है, किसी बात की कोई खुशी ही नहीं है तो किस आधार पर खुद को बदलूं? हां, एक तुम्हारी आरज़ू ज़रूर है लेकिन तुम मेरी हो नहीं सकती फिर किस लिए नई दुनिया बसाऊं? मेरा दिल किसी और की चाहत ही नहीं करता तो क्यों बेसबब किसी को अपना बना कर उसकी ज़िंदगी बर्बाद करूं, बताओ ज़रा?"

प्रिया को जैसे कोई जवाब ही न सूझा।
वो भौचक्की सी अरमान जैसे अजूबे को देखती रह गई।
फिर जैसे उसे होश आया तो उसने अपने ज़हन को झटका दे कर खुद को विचारों के भंवर से आज़ाद किया और फिर पलट कर पुनः साफ सफाई के काम में लग गई।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर अब वो ऐसा क्या करे जिससे अरमान सब कुछ भुला कर अपनी इस वीरान और बेमतलब सी ज़िंदगी से तौबा कर ले?
काम करते हुए वो यही सब सोचती जा रही थी लेकिन उसे कुछ सूझ नहीं रहा था।

अरमान ने भी आगे कुछ कहना उचित नहीं समझा था।
प्रिया क़रीब एक घंटे तक रही उसके बाद अपना हुलिया सही कर के चली गई।
जाते समय उसने सिर्फ इतना ही कहा कि समय मिला तो वो कल फिर आएगी लेकिन इसी शर्त पर कि वो थोड़ा समझने का प्रयास करे।



क्रमशः....
Nice update....
 
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Xavionyx

Class Never Begs For Attention
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18
After reading all four parts, I can only say that the readers here missed a story that deserved to be finished. Most people don’t even know the difference between brass and gold. You write with remarkable beauty, brother—and because of such narrow-minded fools, we lost a story worth remembering.
 

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
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5 - 6 log ne response kiya thaa , I understand aise me kya mood hoga story ko aage badhane ka.
U can understand ki aise me writer kya ho kar sakega, ham sochte hain ki yaha log ko padhne ke liye aisi story likhe jisme ek achha content ho, kuch alag ho, kahani ki har baat logical ho, jise log ye kah kar hamesha yaad rakhe ki fala story kya story thi.....but yaha aisi story ko na padhne wale log hain aur na hi kadra karne wale, rarely jo ek do padhne wale aate bhi hain to unke sath bhi aise jhathuhe logo ki vajah se anyaay karne par majboor ho jana padta hai, anyway kya kar sakta hai koi....jab tak yaha par admin/staff ke log aisi problem ka koi solution nahi nikaalte ya incest ban nahi karte tab tak yahi hal rahega, yaha aise hi maa bahan beti ki choot me ghusne ki chaah rakhne wale log hi apni maa chudaate rahege :roll:
 

Ajju Landwalia

Well-Known Member
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U can understand ki aise me writer kya ho kar sakega, ham sochte hain ki yaha log ko padhne ke liye aisi story likhe jisme ek achha content ho, kuch alag ho, kahani ki har baat logical ho, jise log ye kah kar hamesha yaad rakhe ki fala story kya story thi.....but yaha aisi story ko na padhne wale log hain aur na hi kadra karne wale, rarely jo ek do padhne wale aate bhi hain to unke sath bhi aise jhathuhe logo ki vajah se anyaay karne par majboor ho jana padta hai, anyway kya kar sakta hai koi....jab tak yaha par admin/staff ke log aisi problem ka koi solution nahi nikaalte ya incest ban nahi karte tab tak yahi hal rahega, yaha aise hi maa bahan beti ki choot me ghusne ki chaah rakhne wale log hi apni maa chudaate rahege :roll:

TheBlackBlood Shubham Bhai,

Kya purani baato par mitti daal kar is kahani ko dobara shuru nahi kiya ja sakta he???
 
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