Nice and superb update....भाग- ०३उसके बाद अरमान ने देखा कि प्रिया ने डेढ़ दो घंटे में उसके घर का बहुत कुछ हुलिया बदल दिया था।
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इस सबके चलते उसका अपना हुलिया बिगड़ गया था।
उसके कपड़े गंदे हो गए थे।
घर के पीछे बने बाथरूम में जा कर उसने अपने आपको थोड़ा बहुत साफ किया और फिर अरमान से किसी दिन फिर से आने का बोल कर चली गई।
उसके जाते ही अरमान के होठों पर एक रहस्यमय मुस्कान उभर आई थी।
अब आगे....
प्रिया जब अपने फ्लैट पर पहुंची तो शाम के साढ़े चार बज चुके थे
उसकी सौतेली बेटी अंकिता के आने का समय हो गया था।
प्रिया ने फ़ौरन ही अपने कमरे में जा कर सबसे पहले अपने गंदे कपड़े उतारे और अटैच बाथरूम में घुस गई।
जल्दी जल्दी उसने खुद को साफ किया और फिर कमरे में आ कर दूसरे कपड़े पहन लिए।
गंदे वाले कपड़ों को वाशिंग मशीन में डाल ही रही थी कि दरवाज़े की घंटी बज उठी।
वो समझ गई कि उसकी बेटी अंकिता स्कूल से आ गई है।
कपड़ों को मशीन में डाल कर वो तेज़ी से बाहर वाले दरवाज़े के पास पहुंची और गेट खोल दिया।
"आ गई मेरी बेटी?"
अंकिता पर नज़र पड़ते ही उसने बड़े ही स्नेह से कहा और फिर दरवाज़े से एक तरफ हट कर अंकिता को अंदर आने का रास्ता दिया।
अंकिता उसे देख कर थोड़ा सा मुस्कुराई और फिर अपना बैग लिए अंदर दाख़िल हो गई।
प्रिया ने ये सोच कर मन ही मन राहत की सांस ली कि अच्छा हुआ जो वो वक्त पर आ गई थी वरना उसकी बेटी को यहां इंतज़ार करना पड़ता और संभव था कि उसके सवालों के जवाब भी देने पड़ जाते।
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"ये तो कमाल हो गया।" विशाल ने सामने वाले सोफे पर बैठे अरमान को देखते हुए थोड़ी हैरानी से कहा──"यकीन नहीं होता कि वो आज तेरे घर आई और उसने तेरे घर का हुलिया भी ठीक किया।"
"उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी।" अरमान ने कहा──"लेकिन फिर भी मेरा दिल कह रहा था कि वो मुझसे मिलने ज़रूर आएगी।"
"ये तूने उस दिन भी कहा था।" विशाल ने कहा──"ख़ैर, तो अब आगे क्या? मेरा मतलब है कि ये सब होने के बाद आगे का क्या प्लान है तेरा?"
"आगे का प्लान तब बनेगा जब ये कन्फर्म हो जाएगा कि वो मेरे लिए और क्या चाहती है?" अरमान ने एक सिगरेट जलाते हुए कहा──"मेरा मतलब है कि मेरी हालत को बेहतर बनाने के लिए वो क्या क्या करती है?"
"आज जो कुछ उसने तुझसे कहा है और जो कुछ उसने किया है।" विशाल ने भी एक सिगरेट जलाई, फिर कहा──"उससे तो यही प्रतीत होता है कि वो हर कीमत पर यही चाहती है कि तू खुद को बदले और किसी अच्छी लड़की से शादी कर के अपनी दुनिया आबाद कर ले। उसे एहसास है कि तेरी ये हालत उसी की वजह से है इस लिए वो पूरी कोशिश करेगी कि तू वही करे जो वो चाहती है। अगर तू खुद नहीं करेगा तो यकीनन वो खुद इसके लिए प्रयास करेगी।"
"लगता तो यही है।" अरमान ने कहा──"अब देखना ये है कि वो क्या क्या करती है?"
"वो क्या क्या करेगी ये तो ख़ैर आने वाला वक्त ही बताएगा।" विशाल ने कहा──"लेकिन जाने क्यों तेरे इरादे मुझे नेक नहीं लग रहे।"
"मेरे इरादे नेक ही हैं डियर।" अरमान ने सिगरेट का एक लंबा कश ले कर उसका धुआं उड़ाते हुए कहा──"अपनी चाहत अपनी मोहब्बत को वापस हासिल करना ग़लत तो नहीं। वैसे, इतना तो तुझे भी पता है कि जब तक इंसान के इरादे नेक होते हैं तब तक साला उसे कुछ भी हासिल नहीं होता। मुझे ही देख ले, क्या मिला मुझे इरादा नेक बनाए रखने से? सच तो ये है मेरे दोस्त कि कुछ हासिल करने के लिए कभी कभी नेक की जगह ग़लत इरादे भी रखने चाहिए। अगर यही सब सात साल पहले किया होता तो आज वो किसी और की नहीं बल्कि मेरी बीवी होती।"
"तू सच में बहुत अजीब है।" विशाल ने अपनी बची हुई सिगरेट को ऐश ट्रे में बुझाते हुए कहा──"इन सात सालों में तुझे एक से बढ़ कर एक हसीन लड़कियां मिल सकती थीं लेकिन साला तेरी सुई उस प्रिया में ही अटकी रही। तू चाहता तो कब का अपनी दुनिया बसा लेता मगर नहीं, तुझे तो वही वापस चाहिए थी जिसने तुझे ठुकरा दिया था? ऐसा पागलपन क्यों यार?"
"तुझे ये पागलपन लगता है?" अरमान ने उसकी तरफ तिरछी नज़र से देखा──"जबकि ये मेरे दिल की ख़्वाहिश की बात है। उन सच्चे जज़्बातों की बात है जिन्हें उसने ठुकरा दिया था और मेरे दिल को चूर चूर कर दिया था। ख़ैर मैं जानता था कि जिस तरह की चाहत उसने की थी वैसा ज़रूर होगा। यानि वो सचमुच किसी रईस व्यक्ति से शादी करेगी। अपनी ज़िद तो बस इतनी सी थी कि अगर वो दुबारा कहीं मिले तो उसे इस बात का एहसास कराऊं कि दुनिया में दौलत भले ही उसे हज़ारों ऐशो आराम दे देगी लेकिन खुशी का असली एहसास क्या होता है इससे वो हमेशा महरूम ही रहेगी।"
"तो क्या तुझे ये लगता है कि रईस व्यक्ति की बीवी होने के बाद भी वो खुशी के असली एहसास से महरूम है?" विशाल ने पूछा।
"हां, ऐसा हो भी सकता है।" अरमान ने कहा──"और अगर ऐसा नहीं होगा तो मैं उसे इसका एहसास कराऊंगा।"
"मुझे तो ऐसा लगता है कि तू इस बारे में ज़रूरत से ज़्यादा ही सोच रहा है।" विशाल ने कहा──"हो सकता है कि उसके प्रति तेरा ये ख़याल बेवजह अथवा बेबुनियाद ही हो।"
"बिल्कुल हो सकता है।" अरमान ने कहा──"मगर जैसा कि मैंने कहा अगर उसे एहसास नहीं होगा तो मैं खुद एहसास कराऊंगा।"
"और ऐसा तू करेगा कैसे?"
"मैं बताऊंगा नहीं बल्कि तुझे ऐसा कर के दिखाऊंगा।" अरमान ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा──"संभव है कि थोड़ा समय लग जाए लेकिन ऐसा होगा ज़रूर। बस तू देखता जा।"
विशाल अपलक उसे देखता रहा।
इस वक्त अरमान के चेहरे पर अगर उसे कुछ दिख रहा था तो वो था──आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय और पत्थर जैसी कठोरता।
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अंकिता शाम साढ़े पांच बजे ट्यूशन पढ़ने चली जाती थी। इस बीच प्रिया थोड़ी देर आराम करती थी।
उसका पति अशोक शाम के साढ़े आठ या नौ बजे के क़रीब आता था।
अंकिता के जाने के बाद प्रिया अपने कमरे में बेड पर लेटी हुई थी।
बार बार अरमान के ख़याल आ रहे थे।
हालाकि वो उसके बारे में इतना ज़्यादा सोचना नहीं चाहती थी लेकिन जाने क्यों उसका भटकता हुआ मन बार बार उसकी तरफ ही चला जाता था।
वो सोचने लग जाती थी कि अरमान सचमुच उसे दिल की गहराइयों से प्यार करता है।
ये उसके प्रेम की शिद्दत ही थी कि उसने अब तक अपने जीवन में किसी और लड़की को जगह नहीं दी थी।
एकाएक ही उसे ख़याल आया कि अरमान ने उसकी वजह से अपना कैसा हाल बना लिया है।
उसे और उसके घर को देख कर इतना तो अब वो समझ ही गई थी कि अरमान ने उसे या फिर ये कहें कि अपनी मोहब्बत को खोने के बाद हर चीज़ से जैसे किनारा ही कर लिया था।
कदाचित यही वजह है कि वो आज भी एक मिडल क्लास आदमी ही बना रहा और उसका कोई खास मुकाम नहीं बन सका।
जब तक वो उससे मिली न थी तब तक उसे कभी ख़याल तक नहीं आया था उसका लेकिन अब उससे मिलने और उसकी हालत देखने के बाद बार बार उसका मन उसी के बारे में सोचने लगता था।
उसे ऐसा प्रतीत होता जैसे उसके अंदर से कोई कह रहा हो कि──"देख प्रिया, तेरी वजह से उस व्यक्ति ने अपना जीवन बर्बाद कर लिया। वो आज भी तुझे टूट कर चाहता है। क्या उसका हाल जान लेने के बाद भी तेरा उसके प्रति कोई फर्ज़ नहीं बनता? माना कि तू उसके लिए हर चीज़ नहीं कर सकती लेकिन कम से कम इतना तो कर ही सकती है जिससे कि उसके अंदर अपनी दुनिया बसा लेने का ख़याल आ जाए।"
"मैं करूंगी।" अपने अंदर की आवाज़ सुन प्रिया के मुख से अनायास ही निकल गया──"मुझसे जितना हो सकेगा उतना उसकी भलाई के लिए कुछ न कुछ करूंगी।"
"क्या करेगी तू?" अंदर से उसकी अंतरात्मा ने उससे पूछा──"और क्या तुझे लगता है कि अरमान खुद को बदल कर तथा पिछला सब कुछ भुला कर एक नए सिरे से अपना जीवन शुरू करेगा?"
"हां, मुझे यकीन है कि अरमान मेरी कोई भी बात नहीं टालेगा।" प्रिया ने जवाब दिया।
शाम साढ़े आठ बजे के क़रीब उसका पति अशोक आया।
प्रिया ये देख कर खुश हुई कि वो अपने साथ एक मेड को ले कर आया है।
मेड शादी शुदा थी किंतु उसकी उमर प्रिया जितनी ही लग रही थी।
अशोक ने बताया कि मेड का पति कंपनी में ही काम करता है। उसके पति को कंपनी की तरफ से कालोनी में कमरा तो मिला हुआ है लेकिन वो अपनी पत्नी मीरा को कालोनी के कमरे में नहीं रख सकता। वो आज ही गांव से अपनी पत्नी को ले कर आया था और कंपनी के बाहर कहीं किराए से कमरा ढूंढ रहा था। अशोक को जब कंपनी के एक आदमी ने इस बारे में बताया तो उसने मीरा के पति को बुला कर उससे बात की और ये भी कहा कि वो उसे कहीं पास में ही कमरा दिलवा देगा बशर्ते वो अपनी बीवी को उसके यहां काम करने को राज़ी हो।
मीरा के पति को इससे कोई आपत्ति नहीं थी। बल्कि वो ये सोच कर खुशी से राज़ी हो गया था कि अशोक जैसे बड़े आदमी के घर में काम करने से उसकी पत्नी भी चार पैसे कमा लेगी जिससे उसके परिवार का गुज़ारा बेहतर तरीके से हो सकेगा।
बहरहाल, मेड के आ जाने से प्रिया खुश हो गई थी। अशोक ने बताया कि मीरा अपने पति के लिए सुबह का नाश्ता बना कर सुबह जल्दी ही यहां आ जाया करेगी और फिर दोपहर तक यहीं रहेगी। सारे काम करने के बाद वो वापस अपने घर चली जाया करेगी और फिर शाम को आएगी। शाम का खाना पीना बना कर वो वापस अपने घर पति के पास चली जाएगी।
प्रिया को इससे कोई परेशानी नहीं थी।
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अगले दिन।
"अरे! प्रिया तुम?" अरमान ने जैसे ही दरवाज़ा खोला तो बाहर प्रिया को खड़ा देख थोड़ा चौंकते हुए बोला──"मैं खुली आंखों से कोई हसीन ख़्वाब तो नहीं देख रहा?"
"मुझे लगा ही था कि तुम घर पर ही होगे।" प्रिया ने अंदर दाख़िल होते हुए कहा──"तुम्हारी और तुम्हारे घर की हालत देख कर यही लगता है कि तुम हमेशा ही ऐसे रहना चाहते हो। अरे! दुनिया के लोग कहां से कहां पहुंच गए और तुम अब भी उसी दुनिया में खोए हुए हो जिसका कोई मतलब ही नहीं है। आख़िर कब तक ऐसे बेमतलब की ज़िंदगी जीते रहोगे तुम?"
"दिल अगर ऐसे ही जीने पर मजबूर करे तो कोई क्या करे प्रिया?" अरमान ने मानो ठंडी आह भरते हुए कहा──"हालांकि कभी कभी मैं भी सोचता हूं कि अपनी इस ज़िंदगी से बाहर निकल कर कुछ करूं लेकिन ऐसा हो ही नहीं पाता। पहले भी मेरा पागल दिल मेरे दिमाग़ पर हावी था और आज भी हावी है।"
"तुम और तुम्हारी बातें दोनों ही बहुत अजीब हैं।" प्रिया ने धड़कते दिल से कहा──"और ये तुम्हारे घर के बाहर टैक्सी किसकी खड़ी है? कल भी खड़ी थी।"
"किराए की है, उसे चलाता हूं मैं।" अरमान ने कहा──"असल में अपना थोड़ा बहुत जो खर्चा है वो टैक्सी चला कर ही पूरा हो जाता है। दिन में आराम करता हूं और रात में टैक्सी चलाता हूं। रात में ठीक रहता है क्योंकि देर रात जो सवारियां मिलती हैं उससे दुगनी तिगुनी आमदनी हो जाती है। उस आमदनी में से टैक्सी मालिक को कुछ पकड़ा देता हूं और बाकी जो बचता है वो अपना पेट भरने के लिए पर्याप्त होता है।"
अरमान की ये बातें सुन कर प्रिया को ज़बरदस्त धक्का लगा।
उसके अंदर ये सोच कर दर्द भरी टीस उभरी थी कि अरमान जैसा पढ़ा लिखा इंसान आज उसकी वजह से टैक्सी चला कर अपना जीवन यापन कर रहा है।
इस एहसास ने प्रिया को अंदर ही अंदर झकझोर कर रख दिया।
एक बार पुनः उसके मन में ख़याल उभरा कि काश! उसने अरमान को ठुकराया न होता।
अरमान की बात सुनने के बाद वो जज़्बातों में बहने लगी थी और शायद यही वजह थी कि वो फ़ौरन कुछ बोल ना सकी थी।
फिर किसी तरह उसने खुद को सम्हाला और घर की बाकी की सफाई में लग गई।
उसे ख़ामोशी से काम में लग गया देख अरमान के होठों पर रहस्यमय मुस्कान उभर आई।
"अच्छा ये बताओ कुछ खाया पिया है कि नहीं?" थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद प्रिया ने उसकी तरफ देख कर पूछा।
"हां, वो बाहर एक ढाबे से खा कर ही आया था।" अरमान ने बताया──"बस आराम करने ही जा रहा था कि तुमने दरवाज़ा खटखटा दिया।"
"ओह! इसका मतलब मैं ग़लत समय पर आ गई हूं?" प्रिया ने कहा──"अगर मुझे पता होता कि ये तुम्हारे रेस्ट करने का टाइम है तो नहीं आती।"
"कोई बात नहीं।" अरमान ने उसे बड़ी मोहब्बत से देखा──"तुम अगर रोज़ इसी तरह यहां आओगी तो मुझे रेस्ट करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। तुम्हें देख लेने से ही दिलो दिमाग़ खुशी से बाग़ बाग़ हो जाया करेगा।"
प्रिया उसकी मोहब्बत भरी नज़रों का सामना न कर सकी और ना ही उसकी ऐसी बातों का कोई जवाब दे सकी।
ये अलग बात है कि उसकी धड़कनें तेज़ हो गईं थी।
ये सोच कर भी कि वो किसी की पत्नी है और एक ऐसे पराए मर्द के घर आई है जो अकेला तो है ही लेकिन उसका पूर्व प्रेमी भी है।
"लुक अरमान।" फिर उसने एक गहरी सांस ले कर कहा──"ये सब ठीक नहीं है। मेरा मतलब है कि मेरे प्रति तुम्हारी ये भावनाएं ठीक नहीं हैं। तुम्हें समझना होगा कि मैं किसी की पत्नी हूं और इस जन्म में तुम्हारी नहीं हो सकती। तुम्हारे लिए बेहतर यही होगा कि तुम खुद को सम्हालो और नए सिरे से अपनी ज़िंदगी शुरू करो।"
"अगर कोई चाह ले तो सब कुछ हो सकता है प्रिया।" अरमान ने उसकी तरफ दो क़दम बढ़ कर कहा──"तुम कहती हो कि इस जन्म में तुम मेरी नहीं हो सकती जबकि मैं कहता हूं कि यकीनन हो सकती हो।"
"क...क्या मतलब है तुम्हारा?"
प्रिया को झटका सा लगा।
हैरत भरी नज़रों से अरमान को देखने लगी वो।
अंदर ही अंदर थोड़ा घबरा भी उठी।
"मतलब बहुत सीधा और सरल है प्रिया।" अरमान ने कहा──"इंसान अगर चाह ले तो असंभव चीज़ को भी संभव बना सकता है। आज तुम भले ही किसी और की पत्नी हो लेकिन अगर चाहो तो मेरी पत्नी भी बन सकती हो। उसके लिए तुम्हें सिर्फ अपने पति को तलाक़ देना होगा और फिर मुझसे विवाह कर लेना होगा।"
"क्..क्या?? पागल हो क्या?" प्रिया ने आश्चर्य से आंखें फाड़ कर उसे देखा──"तुम सोच भी कैसे सकते हो कि मैं ऐसा करूंगी?"
"मैंने कहा भी नहीं कि तुम ऐसा करो।" अरमान ने अजीब भाव से मुस्कुराते हुए कहा──"मैंने तो सिर्फ ये बताया है कि इंसान अगर चाह ले तो सब कुछ हो सकता है। तुम ऐसा नहीं करना चाहती तो ये तुम्हारी सोच और मर्ज़ी की बात है।"
प्रिया को समझ न आया कि क्या कहे?
वो अभी भी आश्चर्य से आंखें फाड़े अरमान को देखे जा रही थी।
अरमान अच्छी तरह समझता था कि उसकी बातों ने प्रिया के मनो मस्तिष्क में कैसा तूफ़ान खड़ा कर दिया होगा।
"दूसरों को समझाना और उन्हें उपदेश देना बहुत आसान होता है।" फिर अरमान ने होठों पर फीकी सी मुस्कान सजा कर कहा──"मगर तुम भी जानती हो कि कहने में और करने में बहुत फ़र्क होता है। लोग दूसरों को बदलने के लिए जाने कैसे कैसे पैंतरे आज़माते हैं लेकिन वो एक बात ये नहीं सोचते कि जिसे वो बदलने की कोशिश कर रहे हैं वो बदलना भी चाहते हैं या नहीं? इस वक्त तुम भी मुझे बदलने की कोशिश ही कर रही हो जबकि सच्चाई ये है कि मैं किसी भी कीमत पर बदलना ही नहीं चाहता। आख़िर क्यों बदलूं? किसके लिए बदलूं? किस खुशी में बदलूं? अरे! जब मेरे अंदर किसी चीज़ की ख़्वाहिश ही नहीं है, किसी बात की कोई खुशी ही नहीं है तो किस आधार पर खुद को बदलूं? हां, एक तुम्हारी आरज़ू ज़रूर है लेकिन तुम मेरी हो नहीं सकती फिर किस लिए नई दुनिया बसाऊं? मेरा दिल किसी और की चाहत ही नहीं करता तो क्यों बेसबब किसी को अपना बना कर उसकी ज़िंदगी बर्बाद करूं, बताओ ज़रा?"
प्रिया को जैसे कोई जवाब ही न सूझा।
वो भौचक्की सी अरमान जैसे अजूबे को देखती रह गई।
फिर जैसे उसे होश आया तो उसने अपने ज़हन को झटका दे कर खुद को विचारों के भंवर से आज़ाद किया और फिर पलट कर पुनः साफ सफाई के काम में लग गई।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर अब वो ऐसा क्या करे जिससे अरमान सब कुछ भुला कर अपनी इस वीरान और बेमतलब सी ज़िंदगी से तौबा कर ले?
काम करते हुए वो यही सब सोचती जा रही थी लेकिन उसे कुछ सूझ नहीं रहा था।
अरमान ने भी आगे कुछ कहना उचित नहीं समझा था।
प्रिया क़रीब एक घंटे तक रही उसके बाद अपना हुलिया सही कर के चली गई।
जाते समय उसने सिर्फ इतना ही कहा कि समय मिला तो वो कल फिर आएगी लेकिन इसी शर्त पर कि वो थोड़ा समझने का प्रयास करे।
क्रमशः....

