Nice and superb update....Update ~ 05
"ये सब करने का फ़ायदा क्या होगा भाई?" विशाल ने अरमान की तरफ देखते हुए पूछा──"तेरे प्लान के अनुसार तो वो तेरे क़रीब आ ही रही थी फिर तूने ऐसा बोल कर उसे खुद से दूर हो जाने वाला काम क्यों कर दिया? क्या तुझे नहीं लगता कि तेरे द्वारा इतनी बेरुखी से दुत्कारे जाने पर अब शायद ही वो दुबारा तुमसे मिलने का सोचेगी?"
"उसे इस तरह से दुत्कारना और उसे उसके कर्मों का एहसास करवाना ज़रूरी था माय डियर।" अरमान ने सिगरेट का गाढ़ा धुआं हवा में उड़ाते हुए कहा──"इंसान को जब अपनी ग़लतियों का अथवा अपने बुरे कर्मों का गहराई से एहसास होता है तभी उसे अपने कर्मों के तहत अपराध बोध होता है। तभी उसके अंदर प्रबल रूप से पश्चाताप की भावना पैदा होती है जो उसे वो करने पर विवश करती है जो सामान्य अवस्था में वो कर ही नहीं सकता। प्रिया को अपने कर्मों का आभास तो हो गया है और वो मान भी चुकी है कि उसने मेरे साथ अच्छा नहीं किया था लेकिन अभी इस भावना में उतनी शिद्दत नहीं है जितनी कि होनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि उसके अंदर अपराध बोध इस क़दर पैदा हो जाए कि पश्चाताप करने के लिए वो किसी भी हद को पार कर जाए।"
"इससे होगा क्या?"
"वही जो मैं चाहता हूं।" अरमान हल्के से मुस्कुराया──"आई मीन, एक दिन ऐसा आएगा जब वो खुद मेरी बनने के लिए बेचैन हो जाएगी। वो खुद कहेगी कि मैं अपने पति को तलाक़ दे कर तुमसे विवाह करूंगी।"
"ये तो असंभव बात बोल रहा है तू।" विशाल ने आश्चर्य से आंखें फैला कर कहा──"जिस लड़की ने सिर्फ अपने सुखों का सोच कर एक रईस व्यक्ति से शादी की वो उस ऐशो आराम को त्याग कर तुमसे शादी क्यों करेगी? मेरा ख़याल यही है कि उसे अपनी ग़लतियों का एहसास तो है और वो तुम्हारी हालत को ठीक भी करना चाहती है लेकिन सिर्फ इस लिए क्योंकि उसे तुमसे हमदर्दी है।"
"मुझे पता है कि तू इस वक्त मेरी बात का यकीन नहीं कर सकता।" अरमान ने कहा──"इस लिए तू ख़ामोशी से बस देखता जा। ऐसा दिन जल्द ही आएगा जब तुझे असंभव लगने वाली ये बात संभव में बदलती दिखेगी।"
"ख़ैर, अब आगे क्या?" विशाल ने गहरी सांस ली──"मेरा मतलब है कि तूने तो उसे दुत्कार दिया है तो अब इसके बाद क्या करेगा तू।"
"मैं कुछ नहीं करूंगा।" अरमान ने ऐश ट्रे में सिगरेट को बुझाते हुए कहा──"बल्कि जो कुछ करेगी वही करेगी। बाकी प्लान वैसा ही चलता रहेगा जैसा बनाया गया है।"
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प्रिया बहुत दुखी थी।
उसे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि आज अरमान इस तरह कड़वे शब्द बोल कर तथा उसकी ग़लतियों का एहसास करवा के उसे दुत्कार देगा।
अरमान का ऐसा रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था।
वो तो ऐसा था जो हर पल सिर्फ और सिर्फ उसी की खुशी के लिए जीता था।
भले ही उसकी हैसियत ठीक नहीं थी लेकिन उसके लिए बहुत कुछ कर गुज़रने की जुर्रत करता था।
प्रिया के कानों में बार बार अरमान के वो कड़वे शब्द गूंज उठते थे और उसे अंदर तक झकझोर देते थे।
वो ये मानती थी कि अरमान की ऐसी हालत के लिए सिर्फ वो ही ज़िम्मेदार है और इसी लिए वो उसके लिए कुछ करने का मन बना चुकी थी लेकिन आज जिस तरह से अरमान उससे पेश आया था उसके चलते खुद उसका सीना छलनी छलनी हो गया था।
उसे इस बात का इतना दुख नहीं था कि अरमान ने उसे ऐसा बोला और दुत्कारा बल्कि इस बात का दुख हो रहा था कि वो अरमान की बेहतरी के लिए खुल कर कुछ कर नहीं सकती।
अरमान उसे कुछ करने ही नहीं दे रहा।
एक तरफ तो वो कहता है कि वो आज भी उसे टूट कर प्यार करता है लेकिन अपनी उसी मोहब्बत को कड़वे शब्द बोल कर उसे दुख भी देता है।
मोहब्बत में ऐसा तो नहीं होता।
मोहब्बत करने वाले तो अपने महबूब को चोट पहुंचाने का सोच तक नहीं सकते फिर अरमान ये कैसी मोहब्बत कर रहा है उससे कि वो उसे ऐसे हर्ट कर रहा है?
प्रिया हर बार अपने ज़हन से इन ख़यालों को निकालने की कोशिश करती मगर ये ख़याल बार बार उसके मन में उभर आते और फिर उसे तड़पाना शुरू कर देते।
"क्या हुआ प्रिया?" उसके अंदर से किसी ने उसे पुकारा──"तू एक ऐसे व्यक्ति के लिए दुखी क्यों है जो आज के समय में तेरा कुछ लगता ही नहीं है? तू सिर्फ अपने घर परिवार के बारे में सोच। अपने अतीत से जुड़ेगी तो बहुत बुरा अंजाम भुगतेगी तू।"
"जानती हूं।" प्रिया ने अपने अंदर की प्रिया को जवाब दिया──"लेकिन मैं ये कैसे भुला दूं कि मैंने उसके साथ ग़लत किया है? मैं इस सच्चाई को कैसे नकार दूं कि उसने मेरी वजह से अपनी पूरी दुनिया उजाड़ ली है? मैं ये कैसे भुला दूं कि एक हफ़्ते पहले जब वो इतने सालों बाद मुझे अचानक से मिला था तो मैंने सामान्य भाव से उसका हाल चाल पूछने के बजाय उसको बुरा भला कह कर उसका दिल दुखाया था?"
"जब बात अपने खुशहाल परिवार के बिखरने की आती है।" अंदर की प्रिया ने जैसे उसे समझाया──"तो इंसान को सबसे पहले अपने और अपने परिवार की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। जैसे अब तक तू उसे भूली हुई थी वैसे ही आगे भी उसे भूली रह। माना कि तूने उसका दिल दुखाया था और तेरी वजह से उसने खुद को बर्बाद किया लेकिन इसमें सारा दोष सिर्फ तेरा ही तो नहीं है। दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी अपने को धोखा दे कर अपने हित के लिए किसी और से विवाह कर लेते हैं। दुनिया ऐसे ही मतलबी लोगों से भरी पड़ी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इतने सालों बाद तू उससे मिले और फिर ऐसे चक्कर में फंस कर अपने खुशहाल परिवार पर संकट पैदा कर ले। तुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ तो तूने अरमान से अपनी उस ग़लती की माफ़ी मांग ली, इतना ही नहीं अपनी तरफ से ये कोशिश भी की कि वो सब कुछ भुला कर नए सिरे से अपना जीवन शुरू करे। अब अगर वो तेरी बात नहीं मान रहा और अपनी ज़िद पर ही अड़ा हुआ है तो इसमें भला तू क्या कर सकती है? तूने अपना फर्ज़ निभा दिया, अब ये उस पर निर्भर करता है कि वो अपने लिए क्या चाहता है। मैं यही कहूंगी कि अब तू उसका ख़याल छोड़ कर सिर्फ अपने परिवार की तरफ ध्यान दे।"
प्रिया को समझ न आया कि अब वो अपनी अंतरात्मा को क्या जवाब दे?
वो अच्छी तरह समझ रही थी कि उसकी अंतरात्मा ने जो कुछ कहा था वो सच था और हर तरह से वाजिब भी था।
सच ही तो है कि उसने अपना कर्म कर दिया है, अब अगर इतने पर भी अरमान अपनी दुनिया को संवारना नहीं चाहता तो इसमें भला वो क्या कर सकती है?
मतलब साफ है, उसे अब अपने परिवार के बारे में ही सोचना चाहिए।
अरमान का ख़याल अपने दिलो दिमाग़ से निकाल देना चाहिए।
प्रिया ने एक गहरी सांस ली और सचमुच अपने दिलो दिमाग़ से अरमान के ख़यालों को निकालने की कोशिश में लग गई।
मगर....
बार बार कोशिश करने के बाद भी वो अरमान के ख़यालों को अपने दिलो दिमाग़ से निकाल नहीं पाई।
बुरी तरह झुंझला उठी वो।
चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव गर्दिश करते नज़र आने लगे।
खुद को बहलाने के लिए उसने टीवी चालू कर लिया।
टीवी में कोई सीरियल आ रहा था लेकिन प्रिया की निगाहें टीवी स्क्रीन पर होते हुए भी स्क्रीन पर नहीं थी।
उसने रिमोट से चैनल बदलना शुरू कर दिया।
हर चैनल में अलग अलग प्रोग्राम चालू थे लेकिन प्रिया किसी भी चैनल पर नहीं रुकी।
अंत में झुंझला कर उसने रिमोट से टीवी बंद कर दिया।
वो बुरी तरह परेशान और आहत सी हो गई थी।
घर में इस वक्त वो अकेली ही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि अरमान के ख़यालों से उसे कैसे मुक्ति मिले?
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"मे आई कम इन सर!" अशोक खत्री ने एक केबिन के दरवाज़े को हल्का सा खोल कर अंदर झांकते हुए कहा।
"यस कम इन।" शानदार केबिन के अंदर ऊंची पुश्त वाली रिवॉल्विंग चेयर पर बैठे एक कसरती बदन वाले किन्तु हैंडसम नौजवान ने कहा।
अशोक केबिन के अंदर दाख़िल हुआ।
पीछे कांच का दरवाज़ा अपने आप ही बंद हो गया।
अशोक की नज़र टेबल के उस पार अपनी चेयर पर बैठे नौजवान पर पड़ी।
अशोक से उमर में वो काफी छोटा था लेकिन पद उससे कहीं बड़ा था इस लिए अशोक के अंदर थोड़ी झिझक और थोड़ी घबराहट थी।
उसने सुन रखा था कि ये नौजवान थोड़ा कड़क है और कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी है।
"प्लीज़ हैव ए सीट मिस्टर खत्री।" उस नौजवान ने अशोक को उसके सर नेम से संबोधित करते हुए कहा।
हालाकि उसका लहजा सपाट था।
एकदम भावहीन।
बहरहाल, अशोक खत्री धड़कते दिल के साथ आगे बढ़ा और टेबल के इस पार रखी तीन चेयर्स में से एक पर जा कर बैठ गया।
"सो, मिस्टर खत्री।" उसके बैठते ही उस नौजवान ने टेबल पर रखी कुछ फाइल्स में से एक पर से नज़र हटा कर उसकी तरफ देखा──"अगर मैं ग़लत नहीं हूं तो आपको हमारी इस कंपनी में ज्वॉइन हुए लगभग एक महीना होने वाला है, राइट?"
"य...यस सर।" अशोक खत्री ने अपनी बढ़ी हुई धड़कनों को नियंत्रित करने का असफल प्रयास करते हुए जल्दी से कहा।
"आपने यहां ज्वाइन होने से पहले अपनी जो भी शर्तें रखीं थी।" उस आकर्षक से नौजवान ने अपलक अशोक की तरफ देखते हुए सपाट लहजे में ही कहा──"उन शर्तों को हमने माना और आपको आपके मन मुताबिक सैलरी देने को राज़ी हुए, राइट?"
"ज...जी जी बिल्कुल सर।"
अशोक को समझ नहीं आ रहा था कि सामने बैठा आकर्षक नौजवान आख़िर उससे कहना क्या चाहता है?
उसका जी चाहा कि असल बात पूछे लेकिन उसकी हिम्मत न पड़ी।
"उसके बदले आपने ये वादा किया था कि आप कम ज़िंक खर्च कर के बेहतर पाइप्स जी-आई कर के देंगे और कंपनी का फ़ायदा करवाएंगे।" सामने बैठे नौजवान ने जैसे अब जा कर असल मुद्दे की बात की──"जबकि असल में ऐसा आप अब तक नहीं कर पाए। आपकी अब तक की सारी रिपोर्ट मैंने देख ली है और ये जाना है कि आप उस व्यक्ति से भी ज़्यादा ज़िंक खर्च कर रहे हैं जो आपसे पहले यहां जी-आई के इंचार्ज पद पर था। हफ़्ते दस दिन का तो समझ में आता है मिस्टर खत्री लेकिन एक महीना होने को आया और अभी भी आप इस मामले में कुछ नहीं कर पाए।"
"म...मुझे पता है सर कि ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है।" अशोक ने अपना बचाव करते हुए मानो खुद की पैरवी की──"और इसके लिए मैं हद से ज़्यादा प्रयास भी कर रहा हूं लेकिन इसके बाद भी ज़िंक के खर्चे में कमी नहीं आ रही। असल में समस्या ये है कि जो नए वॉचमैन आए हैं उनको कितना भी समझाएं लेकिन वो सही से काम नहीं कर पा रहे। दूसरी समस्या ये है कि मटेरियल भी ख़राब आ रहा है जिसके चलते ज़िंक ज़्यादा खर्च हो रहा है। जिन पटरों से पाईप बनाए जा रहे हैं वो काफी ख़राब हैं। उनमें खुरदुरापन है जिसके चलते वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में कवर कर लेते हैं। एक्सपोर्ट के माल के लिए तो कोईल का मटेरियल चाहिए जो ज़िंक भी कम कवर करे और पाईप में शाइनिंग भी टॉप क्लास की दिखे।"
"आपके आने से पहले भी एक्सपोर्ट के माल के लिए ऐसा ही मटेरियल प्रयोग होता था मिस्टर खत्री।" सामने बैठे नौजवान ने कहा──"और जी-आई होने पर ज़िंक भी कम खर्च होता था। वेल, अगर ऐसा ही हाल रहा और ज़िंक की लागत में आप कमी नहीं कर पाए तो खुद सोचिए कि कंपनी में आपको रखने का क्या फ़ायदा? उम्मीद करता हूं कि आप एग्रीमेंट में किए गए अपने वायदे और दावे पर खरा उतरेंगे अदरवाइज़ कंपनी आपके खिलाफ़ कड़ा एक्शन लेने पर मजबूर हो जाएगी।"
नौजवान अधिकारी की ये बात सुन कर अशोक खत्री पलक झपकते ही सन्नाटे में आ गया।
उसकी धड़कनें अब किसी हथौड़े की तरह उसकी कनपटी को बजाने लगीं थी।
इतना तो वो भी जानता था कि ज़िंक की लागत में उसके हर प्रयास के बाद भी कोई कमी नहीं आ रही है।
ये सच है कि मटेरियल अच्छा नहीं मिल रहा है और वो ज़िंक को ज़्यादा मात्रा में समेट ले रहा है लेकिन नौजवान अधिकारी के अनुसार ऐसा ही मटेरियल उसके आने से पूर्व भी मिलता था और उनमें ज़िंक उससे कम ही लग रहा था।
खत्री को समझ नहीं आ रहा था कि ज़िंक की लागत को कैसे कम करे?
अगर यही हाल रहा तो निश्चित ही उसकी नौकरी ख़तरे में पड़ जानी है।
उसे इस मामले में कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।
"आई होप, एवरीथिंग विल बी ऑल राइट मिस्टर खत्री।" उसकी सोचो को भंग करते हुए उस आकर्षक नौजवान ने कहा──"यू मे गो नाउ।"
अशोक खत्री चेयर से उठा और भारी क़दमों के साथ केबिन से बाहर आ गया।
उसने राहत की लंबी सांस ली लेकिन माथे पर से चिंता की लकीरें न मिटा सका।
थोड़ी ही देर में वो जी-आई वाले प्लांट की तरफ बढ़ता चला जा रहा था।
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"अरे! आज आने में इतनी देर क्यों लगा दी आपने?" प्रिया ने दरवाज़ा खोलते ही बाहर खड़े अपने पति से पूछा।
"क्या करें हो गई देर।" अशोक ने अजीब भाव से कहा──"काम में ये सब तो होता ही है।"
प्रिया ने महसूस किया कि आज उसके पति के चेहरे की चमक ग़ायब है।
बेहद निराश और थका थका सा नज़र आ रहा है वो।
प्रिया का जी चाहा कि पूछे मगर फिर उसने ये सोच कर अपना इरादा बदल लिया कि अभी तो उसका पति आया है और उसके आते ही उससे उसकी परेशानी का सबब पूछना ठीक नहीं होगा।
खा पी कर अशोक अपने कमरे में सोने चला गया था जबकि प्रिया जूठे बर्तन उठा कर किचन में रखने लगी थी।
उसके मन में बार बार यही ख़याल उभर रहा था कि आज उसके पति के चेहरे पर चमक क्यों नहीं है?
आख़िर ऐसी क्या बात हो गई है जिसके चलते उसका पति आज इतना निराश और थका हुआ सा लग रहा है?
जल्दी ही काम से फारिग़ हो कर प्रिया अपने कमरे में अशोक के पास पहुंच गई।
उसने खड़े खड़े ही ध्यान से अशोक की तरफ देखा।
अशोक बेड पर लेटा हुआ था।
उसका एक हाथ कोहनी से मुड़ा हुआ था और ऊपर उसके माथे पर कलाई के साथ रखा हुआ था।
आंखें बंद तो थीं लेकिन स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वो आंखें बंद किए किन्हीं गहरे विचारों में खोया हुआ है।
ये देख प्रिया के माथे पर शिकन उभर आई।
"क्या बात है अशोक?" फिर उसने बेड पर अशोक के बिल्कुल पास बैठ कर पूछा──"आज आप इतने टेंशन में क्यों दिख रहे हैं? आख़िर बात क्या है?"
"आं...क..कुछ नहीं।" अशोक ने खुद को सम्हालते हुए कहा──"बस ऐसे ही काम के बारे में सोच रहा था। तुम सुनाओ, नई मेड सही से काम कर रही है कि नहीं?"
"हां वो तो कर रही है।" प्रिया ने अशोक को ध्यान से देखते हुए कहा──"लेकिन आप मुझसे कुछ छुपा रहे हैं। आते समय ही मैंने आपके चेहरे पर परेशानी देखी थी और अभी भी आप आंखें बंद किए कुछ ऐसा सोचने में गुम थे जो शायद आपकी चिंता का कारण बना हुआ है। बताइए ना, आख़िर बात क्या है?"
प्रिया अपने पति से उसकी परेशानी जानने पर इस लिए भी ज़ोर दे रही थी क्योंकि पति को कुछ सोचते देख वो ये सोच कर खुद भी परेशान हो गई थी कि कहीं उसके पति को पता तो नहीं चल गया कि वो अपने पूर्व प्रेमी से मिली थी?
"ऐसी कोई बात नहीं है बेबी।" अशोक ने उठ कर प्रिया के चेहरे को हल्के से सहलाते हुए कहा──"असल में आज कल काम का प्रेशर थोड़ा बढ़ गया है इस लिए काम के प्रति थोड़ी चिंता और थकावट हो रही है। बाकी कोई बात नहीं है।"
"सच कह रहे हैं ना?" प्रिया ने जैसे आश्वस्त होने की गरज से पूछा।
"हां मेरी जान, मैं सच ही कह रहा हूं।" अशोक ने कहा और थोड़ा सा आगे बढ़ कर प्रिया के गुलाबी होठों को चूम लिया।
उसकी इस क्रिया से प्रिया जहां एक तरफ आश्वस्त हो गई वहीं दूसरी तरफ हल्का सा शर्मा भी गई।
बहरहाल, इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई।
अशोक मानसिक तनाव में था जिसे उसने प्रिया से छुपा लिया था।
उसने दूसरी तरफ करवट ली और आंखें बंद कर के सोने की कोशिश करने लगा।
प्रिया के लिए ये सामान्य बात थी।
अशोक उमर में उससे काफी बड़ा था जिसके चलते दोनों के बीच हर रात काम क्रीड़ा नहीं होती थी।
अशोक ने दूसरी तरफ करवट ली तो प्रिया ने भी उसकी फ़िक्र छोड़ आंख बंद कर के सोने की कोशिश करने लगी।
कुछ ही देर में उसका भटकता हुआ मन एक बार फिर अरमान की तरफ जा पहुंचा।
अगले ही पल जब अरमान के ख़याल उभरने शुरू हुए तो वो एक बार फिर से परेशान हो उठी।
रात बड़ी मुश्किल से उसकी आंख लगी।


waise Quality wala maal har jagah nahi milta
uska pata sirf hum jaise shaukin ko hota he 



Abe aise kaise nikal lega budhau...apan hai na usko rokne ke liye 