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चेतावनी: यह कहानी पारिवारिक व्यभिचार के विषय पर आधारित है, जिसमें माता और पुत्र के यौन-संबंधों का विस्तृत विवरण है। जो पाठक, ऐसी सामग्री से असहज हैं, वह कृपया इसे न पढ़ें। यह कहानी, पूरी तरह से काल्पनिक है और इसमें लिखी गई किसी भी घटना, व्यक्ति, स्थिति या विधि का वास्तविक जीवन से, कोई संबंध नहीं है। किसी भी समानता का होना केवल संयोग है।
सन १०२६ की बात है.. जब पूरा प्रदेश कई छोटी छोटी रियासतों में विभाजित था।
यह कथा, ऐसी ही एक वैतालनगर नामक छोटी सी रियासत की है। सामान्य सी रियासत थी। सीमित क्षेत्र, साधारण किसान प्रजा और छोटी सी सेना वाली इस रियासत के अवशेषों में जो सब से अनोखा था, वह था पिशाचिनी का प्रासाद। कोई नहीं जानता था की यह प्रासाद अस्तित्व में कब और कैसे आया.. हाँ, अपने पुरखों से इस विषय में, अनगिनत किस्से व दंतकथाएं अवश्य सुनी थी।
पिशाचिनी के इस प्रासाद में, किसी भी प्रकार की कोई प्रतिमा या बुत नहीं था, ना ही कोई प्रतीक या प्रतिरूप। थे तो केवल पुरुषों और स्त्रीओं के अति-आकर्षक संभोगरत शिल्प, जिन्हें बलुआ पत्थर से अति सुंदरतापूर्वक तराशा गया था। जिस प्रकार स्त्रीओं के लचकदार सुवक्र देहों को, पेड़ और लताओं से लिपटे हुए, चंचल मुद्रा में दिखाया गया था, वह अत्यंत मनोहर था। यह प्रासाद, कला और स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण था। स्त्री-रूप की मादक कामुकता को कलाकार के निपुण कौशल्य ने अभिवृद्धित किया था। स्त्री के नग्न कामुक सौन्दर्य और संभोगक्रिया को एक उत्सव के स्वरूप में स्थापित करता यह प्रासाद, एक रहस्यमयी और कौतुहलपूर्ण स्थान था।
चूँकि उस युग के अधिकांश अभिलेख और साहित्य लुप्त हो चुके थे, इसलिए उसके वास्तविक इतिहास का यथार्थ में पता लगाना अत्यंत कठिन था। हालाँकि, कुछ पांडुलिपियाँ अभी भी प्राप्त थी, जो उस युग को समझने में सहायक बन रही थी। उनमें से अधिकांश को, सामान्य प्रजा के लिए, प्रतिबंधित घोषित कर दिया गया था क्योंकि उन लिपियों की सामग्री, उनकी मान्यताओं और संस्कृति को ठेस पहुंचा सकती थी, उन्हें आंदोलित कर सकती थी। इस अभिलेख में लिखित एक प्रसंग था, जो संभवतः पिशाचिनी प्रासाद के पीछे की कहानी हो सकता था। मूल कथा, पद्य स्वरूप में और अति-प्राचीन लिपि में थी। इसे पढ़ते समय, यह ज्ञात रहें कि उस काल में नग्नता वर्जित नहीं थी, संभोग को एक उत्सव की तरह मनाया जाता था। यथार्थ में कहें तो उस काल में, कुछ भी वर्जित नहीं था।
उस लिपि का सम्पूर्ण अनुवाद बड़ा कठिन है, पर अर्थ का निष्कर्ष कुछ इस प्रकार है
॥पांडुलिपि की पहली गाथा का अनुवाद॥
जन्मदात्री के उन्नत मादक मनोहारी स्तन
कामांग में असीम वासना, जैसे धधकता ज्वालामुखी
चुंबन करे पुत्र, उस माता की मांग के सिंदूर को
जननी को कर वस्त्र-विहीन, शयन-आसन पर करता प्रस्थापित
नाम है उसका, कालाग्नि और वो है एक पिशाचिनी
यह है उसका आख्यान, एक अनाचार की कथा, व्यभिचार की कथा
पृथ्वी सभी की माता है। वह प्रकाश संग संभोग कर जीवन की रचना करती है। वह कभी किसी की वास्तविक माता का रूप धारण कर या फिर किसी अन्य स्वरूप में, हर जीव को असीम प्रेम देती है। यह शुद्ध प्रेम बढ़ते हुए अपनी पूर्णता को तब प्राप्त करता है, जब वह संभोग में परिवर्तित होता है। हर प्रेम को अपनी पूर्णता प्राप्त करने का अधिकार है, अन्यथा उस जीव की आत्मा, बिना पानी के पौधों की तरह अतृप्त रह जाती है।
यह जीवदायी शक्ति, किसी स्वजन या आत्मीय संबंधी का रूप भी ले सकती है या वह किसी की बेटी, माँ, बहन, मौसी, दादी.. यहाँ तक कि प्रेमिका या पत्नी के रूप में भी प्रकट हो सकती है। स्त्री का, किसी भी प्रकार का स्वरूप, पुरुष के जीवन के शून्यवकाश को भरने के लिए, स्त्री स्वरूप को किसी न किसी रूप में अवतरित होना ही पड़ता है, ताकि वह विभिन्न रूप में, प्रेम का आदान-प्रदान कर सके। यह स्वरूप माता या बहन के प्रेम के रूप में भी हो सकता है; और यह प्रेम यौनसंबंधों का स्वरूप भी धारण कर सकता है। किंवदंती के अनुसार ऐसी ही एक स्त्री का जन्म, शाकिनी के रूप में हुआ था, जो वैतालनगर रियासत के राजकुमार कामशस्त्र की मां थी।
राजकुमार कामशस्त्र वैतालनगर के राजा रतिदंड का पुत्र था। पतला गौरवर्ण शरीर और चमकदार चेहरे पर बालक जैसी निर्दोषता लिप्त थी और साथ ही, एक अनोखी दिव्यता की झलक भी थी। उसके पिता रतिदंड ने उसे राजपुरोहित के पद पर नियुक्त किया था और उसे यह विशेषाधिकार प्रदान किया गया था की हर महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले, कामशस्त्र से परामर्श अनिवार्य रूप से किया जाएँ। राजकुमार कामशस्त्र का स्थान, राजा के सिंहासन के बगल में था और शासन के हर निर्णय में वह अपने प्रभाव का पूर्ण उपयोग भी करता था।
सायंकाल का अधिकतर समय वह उस पिशाचिनी प्रासाद में, साधना करते हुए व्यतीत करता था। कामशस्त्र के दो रूप थे, एक राजा के दरबार में कर्तव्यनिष्ठ राजपुरोहित का तो दूसरा अपने महल में, एक पुत्र के स्वरूप में। उसकी अति आकर्षक देहसृष्टि वाली माँ शाकिनी, उसे स्नेह से राजा कहकर पुकारती थी।
जब उसकी आयु इक्कीस वर्ष की थी, तब उसके पिता, महाराजा रतिदंड की मृत्यु हो गई और उसका राज्याभिषेक किया गया। अब राजपुरोहित के पद के साथ, उसे राजा होने का कर्तव्य भी निभाना था। कामशस्त्र ने ज्यादातर प्रसंगों को अच्छी तरह से संभाला किन्तु अपनी अनुभवहीनता के चलते उसने कुछ गलतियां भी कीं। चूंकि वह आयु में छोटा था और अल्प-अनुभवी भी, इसलिए वह अपनी विधवा माता से, विभिन्न विषयों पर चर्चा करता था। कई मुद्दों पर वह दोनों एक-दूसरे से परामर्श करते रहते और अक्सर वे नैतिकता के विषय पर विस्तृत चर्चा करते। अधिकतर उनकी बातों का विषय यह होता था की प्रजाजनों के लिए नैतिक संहिता कैसी होनी चाहिए। दरबार में भी इस मुद्दे पर सामाजिक मर्यादा और नैतिकता पर प्रश्न होते रहते।
राजा तब हैरान रह जाता था, जब एक ही परिवार के सभ्यों के आपस में विवाह के मामले सामने आते थे। यह किस्से उसे चकित कर देते थे और चौंकाने वाली बात तो यह थी की ऐसे मामले पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ चुके थे। ऐसे उदाहरण भी थे, जब पुत्रों ने अपनी माताओं से विवाह किया था या फिर भाइयों ने धन और संपत्ति के संरक्षण के लिए, अपनी बहनों से शादी की थी।
दरबारी जीवन के अलावा, कामशस्त्र एक असामान्य सा जीवन जीता था। दरबार से जब वह अपने महल लौटता तब उसकी सुंदर लचकदार शरीर की साम्राज्ञी माँ शाकिनी, कुमकुम, पुष्प तथा इत्र से भरी थाली लेकर उसके स्वागत के लिए तैयार रहती। शाकिनी उसका पुष्पों से व इत्र छिड़ककर स्वागत करती और राजा उसके पैर छूता। राजपरिवार का पहले से चला आया अनकहा रिवाज था, इस तरह पुत्र प्रवेश के लिए अनुमति माँगता और माता उसे अंदर आने की आज्ञा देती थी। उसके पश्चात, महल के सभी दासियों को कमरे से बाहर जाने का आदेश दिया जाता।
युवान राजा फिर कुछ समय के लिए विराम करता और उसकी माता शाकिनी, अपने कामुक शरीर पर, सुंदर से रेशमी वस्त्र और गहने धारण कर, राजा को अपने कक्ष में आमंत्रित करती। उस काल में विधवाएँ सामान्य जीवन जी सकती थी। उन्हें रंगबिरंगी वस्त्र पहनने की और साज-सजावट करने की पूर्ण स्वतंत्रता भी थी।
शाकिनी का कमरा पुष्पों से सजा हुआ था। फर्श पर लाल रेशम की चादरें बिछी हुई थी। कक्ष में पूरी तरह से सन्नाटा छाया हुआ था और मेहंदी के पुष्पों की मनोहक सुगंध, वातावरण को मादकता से भर रही थी। राजा एक सामान्य सी धोती और कुर्ता पहनकर कमरे में प्रवेश करें, उससे पहले, शाकिनी कुछ सुगंधित मोमबत्तियाँ प्रज्वलित करती थी। राजा के कक्ष-प्रवेश के पश्चात, वह उसे उसका कुर्ता उतारने और केवल धोती में ही बैठने का निर्देश करती है। कामशस्त्र के पास, शाही वस्त्रों को उतारकर, केवल धोती पहनने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। उसे लज्जा इसलिए आती थी क्योंकि उसने धोती के नीचे कुछ भी नहीं पहना होता था।
पूरा दिन अपने राजसी कर्तव्य को निष्ठा से निभाने के बाद, वे दोनों साधना करने एक साथ बैठते थे। कामशस्त्र के पिता, महाराजा रतिदंड एक तांत्रिक थे। उन्होंने किसी शक्ति की उपासना प्रारंभ की थी और उसी दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी। मृत्यु से पूर्व महाराजा ने अपनी पत्नी शाकिनी को उनकी साधना पूर्ण करने का निर्देश दिया था। एक ऐसी शक्ति की साधना, जिसे वह पहले ही जागृत कर चुके थे। यदि उस साधना को पूरा न किया जाएँ, तो वह शक्ति, शाही परिवार को ऐसा श्राप दे सकती थी, जो सभी सभ्यों की बुद्धि और विचार करने की क्षमता को कुंठित कर सकती थी, उनके मन में विकार व कुविचार को जन्म दे सकती थी, उन्हें विनाश के मार्ग पर भेज सकती थी। इसलिए शाकिनी अपने पति की मृत्यु के बाद, उस आज्ञा का पालन कर रही थी। माँ और बेटा दोनों मिलकर, उस सुगंधित कक्ष में एक साथ बैठकर घंटों तक साधना करते रहते थे।
हालाँकि पिछले कुछ वर्षों से, उनके साधना करने के प्रणाली में काफी परिवर्तन आ गया था। प्रारम्भिक समय में, वह दोनों अपने शरीर को पूर्ण कपड़ों से ढँककर बैठते थे, पर दीर्घ प्रहरों की साधना में इससे कठिनाई होती थी। कुछ विशेष विधियों के लिए शाकिनी अति-अल्प वस्त्र धारण करती थी। कई मौकों पर, उभारदार स्तनों वाली माता और पुत्र के बीच, एक पतली सी सफेद पारदर्शी चादर ही रहती थी, जिसके आरपार वह अपने पुत्र को साधना करते हुए देखती थी।
समय बीतता गया और दिन-प्रतिदिन वस्त्रों की संख्या घटती गई क्योंकि समय गर्मियों का था और साधना करने से ऊर्जावान हो उठे शरीर, और भी अधिक गर्म हो जाते थे। कभी-कभी शाकिनी, बेटे के सामने ही अपनी उदार कामुकता को प्रकट करते हुए, उत्तुंग विराट स्तनों को ढँक रही चोली उतारकर, केवल कमर के नीचे का वस्त्र धारण कर बैठती थी। इस प्रथा का वह दोनों अब सालों से अनुसरण कर रहे थे। प्रायः दोनों को एक दूसरे की अर्ध-नग्नता से, न कोई संकोच था और ना ही किसी प्रकार की जुगुप्सा।
॥पांडुलिपि में लिखी गाथा का अनुवाद॥
स्पष्टवक्ता व सौन्दर्यवती
स्पर्श जनमावे सिहरन
थिरकें नितंब हो प्रफुल्ल
उभरे उरोज का द्रश्य सुहाना
आंगन में वह जब धोएं स्तन
देखें लिंग हो कठोर निरंतर
एक दिन की बात है। शाकिनी ने अपने पुत्र कामशस्त्र का हाथ पकड़कर उसे अपने पास बैठने के लिए कहा। राजा ने पहले ही अपने शरीर के ऊपरी वस्त्र उतार दिए थे और नीचे धारण की हुई धोती के पतले वस्त्र से, उसके लिंग की कठोरता द्रश्यमान हो रही थी। शाकिनी ने अपना पल्लू झटकाकर गिरा दिया और कमर पर लपेटी हुई साड़ी को उतारना शुरू कर दिया। जैसे जैसे माता शाकिनी के वस्त्र उतरते गए, उनके गौर अंगों को देखकर राजा का सिर चकराने लगा। उसकी माँ के उन्नत स्तनों के बीच नजर आ रही लंबी दरार को देखकर उसकी सांसें फूलने लगी। साड़ी पूर्णतः उतर जाने पर अंदर पहना एक रेशम-जालीदार परिधान उजागर हुआ, जो शरीर के अंगों को छुपाता कम और दिखाता ज्यादा था। शाकिनी के चेहरे पर न कोई लज्जा थी और ना ही किसी प्रकार की हिचकिचाहट। बड़े ही उत्साह से वह अपनी चोली खोलने लगी।
अपनी माता को इस अवस्था में देखना, राजा के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। किन्तु उसे इस बात की जिज्ञासा अवश्य थी की माता का आखिर प्रयोजन क्या था..!! राजा की सांसें बीच में तब अटक गईं, जब उसने अपनी माँ की गोरी फुर्तीली उंगलियों को बटन-दर-बटन, चोली खोलते हुए देखा। हर बटन के साथ उसकी सुंदर मां के स्तन का, और अधिक हिस्सा, उसकी नज़रों के सामने खुलता जा रहा था। बटनों को खोलते हुए माता शाकिनी, बड़ी ही मादकता से, अपने स्तनों के बीच की दरार पर अपनी उंगलियां फेर रही थी। जब वह अंतिम बटन पर पहुंची तब उसने अपने पुत्र को, उन मातृत्व के शाश्वत खजाने को, अनिमेष आँखों से तांकते हुए देखा - राजा जब शिशु-अवस्था में था, तब यही तो उसका भोजन स्थल हुआ करता था..!!
शाकिनी ने एक नजर अपने पुत्र की ओर देखा और मुस्कुराने लगी। राजा ने अपनी माँ की आँखों में आँखें डालकर देखा, यह आश्वासन देने के लिए, की वह अब भी, एक पुत्र की दृष्टि से ही देख रहा है..!! उस युवा पुत्र की पवित्र माँ ने, अपनी चोली को पूरी तरह से उतार दिया और उसे फर्श पर बिछी लाल मखमली चादर पर फेंक दिया। अपनी दोनों हथेली से, उन विराट चरबीदार स्तनों को दबाते हुए, स्तनाग्रों (निप्पलों) को मसल लिया। अब उसने अपने स्तनों को थोड़ा उभार दिया और कंधों को चौड़ा कर, उन उत्तुंग शिखरों को अपनी मर्जी से झूलने के लिए छोड़ दिया, ताकि उसका पुत्र, स्तनों के सौन्दर्य का अच्छी तरह रसपान कर सकें।
इस द्रश्य को देखकर राजा पागल सा हो रहा था और उसका मजबूत लिंग, नींद से जागे हुए असुर की तरह अंगड़ाई लेकर, धोती में उभार बना रहा था। उसकी विचार करने की क्षमता क्षीण हो रही थी। पूरा शरीर विशिष्ट प्रकार की गर्मी से झुलस रहा था। हर पल उसकी सांसें और अधिक तेज व भारी होती जा रही थी। वह अपनी माता की नग्नता को भोंचक्का होकर देख रहा था। हालांकि इससे पहले भी वह दोनों अल्प वस्त्रों में अर्धनग्न होकर एक दूसरे के सामने साधना कर चुके थे, पर आज उसका पौरुषत्व, सामाजिक मर्यादाओं पर हावी होता प्रतीत हो रहा था।
अपने नग्न स्तनों का वैभव दिखाते हुए, शाकिनी ने राजा कामशस्त्र को अपनी आँखें बंद कर, साधना में लीन होने के लिए कहा। दोनों के बीच एक पतला अर्ध-पारदर्शी पर्दा भी डाल दिया जिसमें एक छेद था, जहाँ से माँ और पुत्र, एक दूसरे को देख सकते थे। जल्द ही, दोनों साधना में ध्यानमग्न हो गए। उन्होंने एक साथ कुछ गाथाओं का पठन किया। हालाँकि, कर्तव्यनिष्ठ पुत्र उन गाथाओं का मन से पाठ कर रहा था, फिर भी वह अपनी माँ के अनावृत्त स्तनों से अपना ध्यान हटा नही पा रहा था। प्राकृतिक इच्छाओं और सामाजिक मर्यादाओं के बीच भीषण युद्ध चल रहा था उसके दिमाग में। उन दोनों मांसल उरोज की कल्पना उसे बंद आँखों में भी उत्तेजित कर रही थी। साधना के दौरान उसका मन, अपनी माँ के पूर्ण नग्न शरीर की कल्पना करने लगा और बेकाबू मन की इस क्रिया से, वह काफी अस्वस्थता का अनुभव कर रहा था। उसने अपनी माता के स्तनों को इतना गौर से देख लिया था की उन गोलों का परिघ, रंग, तने हुए स्तनाग्र, सब कुछ उसके मस्तिष्क में छप चुका था। अब जब भी वो अपनी आँखें बंद करता तब उसे अपनी माँ के वे बड़े-बड़े सुंदर सफेद टीले ही नजर आते थे।
कई पूर्णिमाओ की साधना के दौरान, उसने घंटों तक उन स्तनों को देखा था। निप्पलों के स्तन चक्रों को उसने इतने स्पष्ट रूप से देखा था कि कागज पर, बिना किसी त्रुटि के, बिल्कुल वैसा ही चक्र बना सकता था। उनकी स्तनाग्र (निप्पलें) तो अब उसे स्वप्न में भी नजर आने लगी थी। दोनों स्तन, मातृ-प्रेम के दो ऐसे मिनारे, जिनके पौष्टिक फव्वारों का लाभ उसने बचपन में भरपूर उठाया था। भूरे रंग के निप्पल, दो छोटे लिंगों की तरह सीधे खड़े थे। चूँकि माता शाकिनी, अक्सर अपनी चोली उतारने के बाद स्तनों और निप्पलों को एक साथ रगड़ती थीं, उसकी निप्पल अक्सर तंग और नुकीली हो जाती थी। दोनों के बीच, पतली चादर का पर्दा डालने से पहले, उसे अपनी माता के उन पुष्ट पयोधरों के दर्शन का लाभ मिलता।
उसके पश्चात, वे दोनों घंटों साधना करते थे। माता शाकिनी शायद वास्तव में साधना कर रही थी परंतु बेटा अपनी माँ के सुंदर स्तनों के अलावा किसी और वस्तु पर अपना ध्यान केंद्रित ही नहीं कर पा रहा था। दोनों स्तन ऐसे चुंबक बन गए थे जिस पर राजा कामशस्त्र का ध्यान और मन, चिपके ही रहते थे। साधना के बाद, वे अपना रात्रिभोजन भी उसी अवस्था में करते थे। चूंकि उन दिनों नग्नता वर्जित नहीं थी, इस कारण से शाकिनी को इसमें कुछ भी असहज या आपत्तिजनक प्रतीत नहीं होता था।
नग्नता भले ही सहज थी किन्तु अब माता-पुत्र के बीच जो चल रहा था वह पारिवारिक स्नेह से कुछ अधिक ही था। जब राजा अपनी माता से करीब होता था तब वह अपनी प्राकृतिक इच्छाओं को खुद पर हावी होने से रोक नहीं पाता था। एक बार शाकिनी रानीमहल के आँगन में नग्न होकर स्नान कर रही थी तब उसे देखकर राजा अपने वस्त्र में लगभग स्खलित ही हो गया।!! इतनी उम्र में भी शाकिनी का शरीर, तंग और कसा हुआ था। झुर्रियों रहित गोरा शरीर बेहद आकर्षक था। गोल घुमावदार गोरे कूल्हें, ऐसे लग रहे थे जैसे हस्तीदंत से बने हुए हो। और स्वर्ग की अप्सरा जैसे उन्मुक्त स्तन। गोरे तन पर पानी ऐसे बह रहा था जैसे वह चाँदनी से नहा रही हो। ऐसा नहीं था की केवल राजा ही ऐसा महसूस कर रहा था। शाकिनी के मन में भी यौन इच्छाएं जागृत हो रही थी।!!
जब युवा शाकिनी ने कामशस्त्र को जन्म दिया ,तब वह छोटे स्तनों वाली, पतली सी लड़की थी। प्रसव के पश्चात उसके स्तन, दूध से भरकर इतने उभर गए की फिर कभी पुराने कद पर लौट ही नहीं पाए और दिन-ब-दिन विकसित होते गए। वासना टपकाते, वह दो मांसल गोलों की सुंदरता को छिपाने के लिए उसकी तंग चोली कुछ अधिक कर भी नहीं पा रही थी। पूरी रियासत के सब से सुंदर स्तन थे वह..!! बड़ी गेंद जैसा उनका आकार और स्तन-चक्र पर स्थापित तनी हुई निप्पल। स्तनों के आकार के विपरीत, कमर पतली और सुगठित, सूडोल जांघें जैसे केले के तने। और नितंब ऐसे भरे भरे की देखते ही आरोहण करने का मन करें..!!
विधवा शाकिनी का जिस्म, कामवासना से झुलस रहा था। चूंकि वह एक रानी थी इसलिए वह किसी सामान्य नर से संभोग नहीं कर सकती थी। उसके संभोग साथी का शाही घराने से होना अनिवार्य था। वह अपने शरीर की कामाग्नि से अवगत थी और मन ही मन कई बार अपने पुत्र के पुष्ट लिंग को अपनी योनि में भरकर, पूरी रात संभोग करने के स्वप्न देख चुकी थी। हर गुजरते दिन के साथ यह इच्छा और भी अधिक तीव्र होती जा रही थी। पर वह एक पवित्र स्त्री थी और फिलहाल अपने पति की साधना को आगे बढ़ाना, उसकी प्राथमिकता थी।
शाकिनी को इसी साधना प्रक्रिया ने एक उपाय सुझाया। यदि वह साधना को संभोग से जोड़कर, उसे एक विधि के रूप में प्रस्तुत करें, तो क्या उसका पुत्र उसे करने के लिए राजी होगा?? इस प्रयोग के लिए वह अधीरता से शाम होने का प्रतीक्षा करने लगी
॥ पांडुलिपि की अगली गाथा का अनुवाद ॥
शाम ढलें, नभ रक्त प्रकाशें
योनि मदमस्त होकर मचलें
निशा देखें राह तिमिर की
कब आवै सजन जो भोगें
खनके चूड़ी, मटके जोबन
स्वयं को परोसे थाल में बैठी
हररोज की तरह राजा शाम को आया तब उसकी माता शाकिनी साड़ी का लाल जोड़ा पहने हुई थी। उसकी बाहें स्वर्ण आभूषणों से लदी हुई थी और कस्तूरी-युक्त पान चबाने से, उसके होंठ सुर्ख-लाल हो गए थे। ललाट पर कुमकुम और चेहरे पर खुमार - ऐसा खुमार, जो माताओं के चेहरों पर तब होता है, जब वह अपनी योनि, अपने पुत्र को अर्पण करने जा रही हो..! नवविवाहित दुल्हन जैसी चमक थी चेहरे पर। रेशमी साड़ी के नीचे जालीदार चोली, जिसपर कलात्मक कढ़ाई की गई थी। चोली के महीन कपड़ों से, शाकिनी की अंगूर जैसी निप्पलें, तनकर आकार बनाते नजर आ रही थी। राजा ने देखा की कई पुरुष सेवकों की नजर, उसकी माता के उन्नत शिखरों पर चिपकी हुई थी। इससे पहले की राजा अपनी जन्मदात्री के पैर छूता, दासियाँ ने दोनों पर फूलों की वर्षा कर दी।
यह देख शाकिनी मुस्कुराई और उसने कामशस्त्र को गले लगाते हुए अपने विशाल स्तन-युग्मों से दबा दिया। उनका आलिंगन नौकरों-दासियों के लिए, कक्ष छोड़कर चले जाने का संकेत था। वह आलिंगन काफी समय तक चला और उस दौरान राजा का लिंग, उसके वस्त्रों में उपद्रव करने लग गया था। आलिंगन से मुक्त होते ही, शाकिनी अपनी साड़ी और चोली उतारने लगी। राजा चकित होकर देखता रहा क्योंकि अब तक वह दोनों साधना के लिए बैठे भी नहीं थे और माता ने वस्त्र उतारने शुरू कर दिए थे..!!
"क्षमा चाहता हूँ माँ, पर आप इतनी जल्दी वस्त्र क्यों त्याग रही हो? साधना में बैठने से पहले, मुझे कुछ क्षण विराम तो करने दीजिए" राजा ने कहा
"मेरे राजा, आज विशेष अनुष्ठान करना है इसलिए जल्दी ही अपनी धोती पहन कर, साधना कक्ष की ओर प्रस्थान करो" कुटिल मुस्कान के साथ विराट स्तनधारी शाकिनी साधना कक्ष की ओर चल दी। वो पहले से ही कमर के ऊपर नग्न हो चुकी थी। हर कदम के साथ उसके मांसल स्तन यहाँ वहाँ झूलते हुए, राजा का वशीकरण कर रहे थे।
यंत्रवत राजा पीछे पीछे गया। उसे अपनी माँ की दृष्ट योजना का कोई अंदेशा नहीं था। जब उसने कक्ष में प्रवेश किया तो अंदर का द्रश्य चौंकाने वाला था.! कक्ष के बीचोंबीच एक बड़ा बिस्तर पड़ा था, जिसे ऐसा सजाया गया था, जैसे प्रथम रात्री को नवविवाहित जोड़ें के लिए सजाया जाता है। साथ ही, ऐसे वस्त्र थे, जो दूल्हा और दुल्हन विवाह के समय पहनते है। राजा ने विस्मय से अपनी माता के सामने देखा, जो कमर पर लपेटी साड़ी उतारकर, केवल साया पहने खड़ी थी। कठोर तने हुए स्तनों की निप्पल, राजा की आँखों में देख रही थी। शाकिनी के शरीर का एक भी उभार ऐसा नहीं था, जो द्रश्यमान न हो।!!
शाकिनी ने कामशस्त्र का हाथ पकड़ लिया और नयन से नयन मिलाते हुए कहा..
"प्यारे पुत्र, इस ब्रह्मांड में ऐसा कोई भी नहीं है, जो तुझसे मुझ जैसा स्नेह करता हो। इतने वर्षों से, तुम मेरे प्रमुख आधार बने रहें, खासकर तुम्हारे पिता के निधन के बाद, तुमने मेरी ऐसे देखभाल की है, जैसी कोई पुरुष अपनी स्त्री की करता है, और इस प्रक्रिया में, तूने अपनी युवावस्था के स्वर्णिम काल का भी व्यय कर दिया। काश, तुम्हारी यह बूढ़ी लाचार माँ, इस विषय में कुछ कर पाती..!! परंतु तुम्हें कुछ देने के बजाय मैं आज, तुमसे कुछ मांगने वाली हूँ। अपने लिए नहीं, तुम्हारे मृत पिता की आत्मा के लिए..! क्या तुम उनकी दिवंगत आत्मा की शांति हेतु मेरा साथ दोगे? बताओ पुत्र।!!!" शाकिनी बड़ी ही सावधानी और होशियारी से अपनी चाल चल रही थी
"हाँ माँ, निश्चित रूप से आपकी सहायता करूंगा, ऐसा करना तो हर बेटे का कर्तव्य है। और यह तो मेरा सौभाग्य होगा। आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा। पर वह क्या बात है जिसके बारे में मुझे ज्ञान नहीं है? कृपया बताने का कष्ट कीजिए"
"ठीक है पुत्र। यदि तुम सज्ज और तत्पर हो, तो मैं तुम्हें इस बारे में बताती हूँ। दरअसल, तुम्हारे पिता, एक उच्च कोटि के तांत्रिक थे। अपनी मृत्यु से पहले वह एक पिशाचिनी की साधना कर रहे थे। पिशाचिनी का आह्वान तो हो गया था, परंतु उसे तृप्त नहीं किया जा सका क्योंकि तुम्हारे पिता की असमय मृत्यु हो गई और अनुष्ठान अधूरा रह गया। अब हमें पिशाचिनी को तृप्त कर, उस अनुष्ठान को पूरा करना होगा, ताकि तुम्हारे पिता की आत्मा को मुक्ति मिलें" वासना में अंध हो चुकी शाकिनी ने बताया
विस्मित राजा ने पूछा "परंतु माँ, मुझे उस पिशाचिनी को तृप्त करने के लिए क्या करना होगा??"
शाकिनी को बस इसी पल का तो इंतज़ार था।!!
"पुत्र, मैं उसका आह्वान करूंगी और वह मेरे माध्यम से तुमसे बात करेगी। परंतु एक बात का ध्यान रहें, तुम्हें उसे पूर्णतः संतुष्ट करना होगा और वह जो चाहे उसे करने देना होगा। साधना के माध्यम से, मैंने जाना है, कि वह मेरे शरीर में प्रवेश करना चाहती है। आह्वान होते ही, वह मेरे अंदर प्रविष्ट हो जाएगी, फिर शब्द उसके होंगे और जुबान मेरी होगी। उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने का विचार भी मत करना, अन्यथा तुम्हारे पिता की आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी। जो भी करना बड़ी सावधानी से करना। मेरी शुभेच्छा तुम्हारे साथ है " शाकिनी ने आखिर अपना जाल बिछा ही दिया, जिसमे उसका पुत्र फँसता जा रहा था। जैसा वह चाहती थी, वैसा ही हो रहा था। नतमस्तक होकर पुत्र अपनी माता की बात सुनता रहा।
अब दोनों जमीन पर बैठ गए और साधना करने लगे। शाकिनी ने एक दिए को छोड़कर, अन्य सारे दिये और मोमबत्तियाँ बुझा दी। सन्नाटे भरे अंधेरे से कक्ष का वातावरण काफी गंभीर और डरावना सा प्रतीत हो रहा था। कुछ देर बाद, शाकिनी जोर-जोर से रोने लगी, चीखने चिल्लाने लगी और फर्श पर गिर गई। यह केवल एक दिखावा था, अपने पुत्र को जताने के लिए, की पिशाचिनी उसके शरीर में प्रवेश कर चुकी थी।
"माँ, क्या हुआ??" चिंतित कामशस्त्र अपनी माँ के करीब जा बैठा और तब शाकिनी सीधी होकर बैठी और जोर से हंसने लगी। उसने टूटी कर्कश आवाज़ में कहा, "मैं तेरी माँ नहीं हूँ, मूर्ख, मैं एक पिशाचिनी हूँ, जिसका आह्वान तेरे पिता ने किया था।" फिर वह खिलखिलाकर डरावनी हंसी हंसने लगी। अपनी माँ को पिशाचिनी समझकर, कामशस्त्र नमन करते हुए झुक गया।
"हे पिशाचिनी, मैं आपके लिए कर सकता हूं? आप आदेश करें, मैं वहीं करूंगा किन्तु मेरे पिता की आत्मा को मुक्त कीजिए" राजा ने कहा,
शाकिनी मन ही मन प्रसन्न हो रही थी क्योंकि उसे प्रतीत हो गया था की उसके पुत्र को इस नाटक पर विश्वास हो चुका था।
शाकिनी उत्कृष्ट अभिनय कर रही थी और अपने बेटे को मूर्ख बना रही थी। अब वह पिशाचिनी के रूप में, अपनी वासना की आग बुझा सकती थी। लालसा और प्रत्याशा से उसका योनिमार्ग सिकुड़ने-खुलने लगा। वह क्षण आ पहुंची थी की वह अपने पुत्र के साथ संभोग कर सके।
शाकिनी ने गुर्राते हुए कहा "मूर्ख राजा, मेरी बात ध्यान से सुन, तुझे मेरे साथ मैथुन कर मुझे तृप्त करना होगा। यदि तू मुझे प्रभावशाली संभोग से संतुष्ट करने में सफल रहा, तभी मैं तेरे पिता की आत्मा को मुक्त करूंगी..! अन्यथा यदि तू मेरी वासना की भूख की अवज्ञा करेगा या फिर सक्षमता से संभोग कर, मेरी योनि द्रवित नहीं कर पाएगा, तो मैं तेरे पूरे परिवार को नष्ट कर दूँगी। साथ ही तेरी प्रजा को भी"
राजा यह सुनकर स्तब्ध रह गया..!! कंठ से कोई शब्द निकल ही नहीं रहा था। यह पिशाचिनी की बातें उसे भयभीत कर गई। फिर उसने अपने मनोबल को जागृत किया। पिशाचिनी के प्रस्ताव को आदेश मानकर, अचानक उसकी नसों में रक्त, तेजी से बहने लगा..!! परंतु उसका मन अब भी दुविधा में था। आखिर वह शरीर तो उसकी माँ का ही था। कैसे वह अपने जन्म-स्थान में लिंग-प्रवेश कर सकता है?? क्या वह यह घोर पाप कर पाएगा?? राज-दरबार में ऐसे कई प्रसंग आए थे, जब उसने माताओं को अपने पुत्रों से विवाह और संभोग करने की अनुमति दी थी। पर उसने अपनी ही माता के बारे में ऐसी कल्पना, स्वप्न में भी नहीं की थी..!!
अपने पुत्र के मस्तिष्क में चल रहे इस विचार-युद्ध को शाकिनी ने भांप लिया।
उसने कहा "तुझे दूल्हा बनकर और मुझे दुल्हन बनाकर, पवित्र अग्नि के सात फेरे लेने होंगे। मेरी मांग में सिंदूर भरना होगा। उसके पश्चात तुझे मेरे साथ तब तक संभोग करना होगा, जब तक मेरी राक्षसी योनि स्खलित न हो जाए। तभी मैं तेरी माँ का शरीर छोड़ूँगी और तेरे पिता की आत्मा को मुक्त करूंगी" इतना सुनते ही कामशस्त्र की बचीकूची झिझक भी गायब हो गई। अपने माता के शरीर, पिता की आत्मा और प्रजा की कुशलता के लिए, अब उसे आगे बढ़ना ही था।
उसने शाकिनी के शरीर को अपनी मजबूत बाहों में उठाया और उसे बिस्तर पर ले गया। फिर उसके शरीर को सहलाते हुए, उसे दुल्हन के वस्त्रों में सजाया। चोली पहनाते समय जब उसके विराट स्तन दब गए तब शाकिनी सिहर उठी। कितने वर्षों के बाद किसी पुरुष ने उसके स्तनों को दबाया था..!! अपने बेटे की मर्दाना पकड़ से वह चकित हो उठी। उसकी विशाल हथेलियाँ, उन असाधारण भारी स्तनों को पकड़ने के लिए उपयुक्त थे। अपनी माता के स्तनों को हथेलियों से सहारा देते हुए कामशस्त्र पर, उसने मदहोश अदा से लंबे बालों को गिराया। शाकिनी की कमर धनुष की प्रत्यंचा की तरह मूड गई।
कामशस्त्र ने अपनी माता के शरीर को, वस्त्र और आभूषण का उपयोग कर, दुल्हन की तरह सजा दिया। वास्तव में वह अप्सरा जैसी सौंदर्यवती प्रतीत हो रही थी और अपने पुत्र से संभोग करने के लिए व्याकुल हो रही थी।
कामशस्त्र ने दूल्हे के वस्त्र धारण किए और शाकिनी को बिस्तर पर लेटा दिया। बिस्तर पर रेशम की चादर फैली हुई थी और ढेर सारे पुष्प भी थे। कुछ पुष्प तो शाकिनी के स्तनों जितने बड़े थे। फिर पिशाचिनी के रूप में शाकिनी ने अपने पुत्र को बाहों में खींच लिया और जोर से चिल्लाई
"हे जड़बुद्धि, किस बात की प्रतीक्षा कर रहा है? तत्काल मेरे शरीर को ग्रहण कर मूर्ख..!! वासना की आग मुझे जला रही है।" अपनी माता के मुख से ऐसे अश्लील उच्चारण सुनकर कामशस्त्र स्तब्ध हो गया।!! उसने अपनी माँ को कदापि ऐसे शब्द का उपयोग करते नहीं सुना था किन्तु वो समझ रहा था की यह शब्द उसकी माता नहीं, परंतु उसके शरीर में प्रविष्ट पिशाचिनी बोल रही है। अपने पुत्र की इस भ्रांति का दुरुपयोग कर, शाकिनी बोलने की इस निर्बाध स्वतंत्रता का आनंद लेते हुए, नीच से नीच शब्द-प्रयोग करती जा रही थी
"हाँ, मैं वह सब करूँगा जो आप चाहती हैं। कृपया पथ प्रदर्शित करें और बताइए की मुझे आगे क्या करना है " राजा ने डरते हुए पूछा
अब पिशाचिनी ने बेतहाशा अपना सिर दायें-बाएं घुमाया और अपने वस्त्र फाड़ दिए और अपने सुव्यवस्थित बालों को नोचने लगी..!! शाकिनी यह सारी क्रियाएं इसलिए कर रही थी, ताकि उसके पुत्र के मन में एक असली पिशाचिनी की छाप पैदा कर सकें। उसने जानबूझकर अपनी निप्पल वाली जगह से चोली फाड़ दी और साड़ी को कमर तक इस तरह उठा दिया, ताकि उसकी जांघें और योनि के बाल उजागर हो जाएँ।
इस अत्यंत उत्तेजित कर देने वाले नज़ारे को देखते ही, राजा का लिंग कांप उठा। अपनी माँ का शरीर शांत करने के लिए वह नजदीक गया। शाकिनी अभी भी पागलपन करते हुए कांप रही थी..!! शाकिनी के उन्माद को शांत करने के लिए, वह उसके पीछे गया और अपने दोनों हाथों से उसकी नंगी कमर को जकड़ लिया।
अपनी नग्न गोरी त्वचा पर अपने पुत्र के हाथों का यह कामुक स्पर्श, शाकिनी को अत्यंत प्रसन्न कर गया। उसके शरीर में जैसे बिजली सी कौंध गई। शांत होने के बजाय वह ओर तीव्रता से कांपते हुए शरीर हिलाने लगी ताकि उसके पुत्र के स्पर्श का अधिक से अधिक अनुभव कर सकें। वह कामशस्त्र की हथेली को, अपनी पीठ से लेकर पेट तक रगड़ने लगी।
अपनी माँ को शांत करने के लिए उसने अपनी बाहों को, उसके कंधों से लपेट दिया। ऐसा करने से उसकी हथेली और शाकिनी की निप्पलों के बीच की दूरी कम होती गई और जैसे ही उसकी उंगलियों का स्पर्श निप्पलों पर हुआ, शाकिनी अनियंत्रित जुनून से थरथराने लगी। कामशस्त्र ने निःसंकोच होकर दोनों निप्पलों को रगड़ दिया। शाकिनी ने चोली इस तरह फाड़ी थी की उसके दोनों स्तन-चक्र (ऐरोला) उजागर हो गए थे। चोली के उन छेदों से, राजा ने स्तनों की नंगी त्वचा को सहलाना शुरू कर दिया, और उसकी माँ पिशाचिनी होने का ढोंग किए जा रही थी। शाकिनी की हवस और उत्तेजना अब शिखर पर थी।
अचानक वह कर्कश आवाज में चिल्लाई, "यह व्यर्थ क्रियाएं क्यों कर रहा है।!! तूने अपने लिंग को मेरी योनि में अब तक डाला क्यों नहीं? क्या यह करने भी तेरा कोई सेवक आएगा।!!! मूर्ख राजा" चिल्लाते हुए वह उठ खड़ी हुई और अपने सारे वस्त्र उतार फेंकें। साथ ही उसने हिंसक रूप से अपने पुत्र के वस्त्र भी फाड़ दिए। पिशाचिनी के रूप में, सम्पूर्ण नग्न होकर वह अपने पुत्र के चेहरे पर बैठ गईं।
बिस्तर पर लेटे हुए राजा के मुख पर मंडरा रही अपनी माता के जंघा मूल और उसके मध्य में योनि की दरार को देखकर उसे घृणा होने लगी। किन्तु उसे तुरंत ही अपने कर्तव्य की याद आई। अपनी माँ और प्रजा को बचाने और पिता की आत्मा की मुक्ति के लिए उसे यह करना ही होगा..!!
शाकिनी अपनी योनि को राजा की नाक पर रगड़ते हुए उसके मुँह की ओर ले गई। कामशस्त्र को अपनी माँ की योनि से तेज़ मूत्र की गंध आ रही थी (उस काल में गुप्तांगों की स्वच्छता को इतना प्राधान्य नहीं दिया जाता था) उसकी माँ ने कभी गुप्तांग के बालों को नहीं काटा था, इसलिए उनकी लंबाई चार इंच से अधिक हो गई थी।
राजा के चेहरे पर उसकी माँ के योनि के बाल चुभ रहे थे। न चाहते हुए भी, उसे अपना मुख योनिद्वार के करीब ले जाना पड़ा। प्रारंभ में घृणास्पद लगने वाला कार्य, तब सुखद लगने लगा, जब शाकिनी ने अपनी योनि के होंठों को राजा के होंठों पर रख दिया और उसका लंड तुरंत क्रियाशील होकर कठोर हो गया। उसके होंठ यंत्रवत खुल गए और उसकी जीभ शाकिनी की गहरी सुरंग में घुस गई। वही स्थान में, जहां से वह इस दुनिया में आया था। वही स्थान, जिसमे उसके पिता ने संभोग कर, पर्याप्त मात्रा में वीर्य स्खलित कर, उसका सर्जन किया था।
शुरू में योनि का स्वाद उसे नमकीन लगा था किन्तु योनिस्त्राव का रिसाव होते ही, उसे अनोखा स्वाद आने लगा। उसकी जीभ गहरी.. और गहरी घुसती गई। शाकिनी अपने पुत्र द्वारा हो रहे इस मुख-मैथुन का आनंद लेते हुए, खुशी से पागल हो रही थी। इसी परमानंद में, उसने राजा के चेहरे पर अपने कूल्हों को घुमाना शुरू कर दिया और उसके गुदाद्वार का कुछ हिस्सा राजा की जीभ पर रगड़ गया। शाकिनी की कामुकता और प्रबल हो रही थी।
अब तक धीरजपूर्वक सारी क्रियाएं कर रहे राजा के लिए, यह सब असहनीय होता जा रहा था। मन ही मन वह सोच रहा था की यह पिशाचिनी तो वाकई में बेहद गंदी और कुटिल है। इसे तो हिंसक संभोग कर, पाठ पढ़ाना ही चाहिए..!!
धीरे से उसने माँ की चूत से अपना चेहरा हटाया और मातृत्व के प्रतीक जैसे दोनों विराट स्तनों के सामने आ गया। आह्ह।!! कितना अद्भुत द्रश्य था..!! साधना के उन सभी वर्षों में, जब से शाकिनी अपने स्तन खोलकर बैठती थी, तब से राजा की निंद्रा अनियमित हो गई थी। स्वप्न में भी, उसे वह स्तन नजर आते थे। इससे पहले की वह अपने गीले अधरों से, उन उन्मुक्त निप्पलों का पान कर पाता, उसकी हथेलियों ने उन विराट स्तनों को पकड़ लिया। स्तनों पर पुत्र के हाथ पड़ते ही, शाकिनी शांत हो गई। उसे यह स्पर्श बड़ा ही आनंददायी और अनोखा प्रतीत हो रहा था।
राजा ने शाकिनी को अपनी ओर खींचा और उन शानदार स्तनों की निप्पलों को चूसना शुरू कर दिया, शाकिनी अपने पुत्र के बालों में बड़े ही स्नेह से उँगलियाँ फेर रही थी। यह द्रश्य देखने में तो सहज लग सकता था। माता की गोद में लेटा पुत्र स्तनपान कर रहा था। अंतर केवल इतना था की अमूमन बालक स्तनपान कर सो जाता है, पर यहाँ तो माता और उसका बालिग पुत्र, इस क्रिया को, होने वाले संभोग की पूर्वक्रीडा के रूप में देख रहे थे।
शाकिनी अपने पुत्र कामशस्त्र को, अपने अति-आकर्षक अंगों से, लुभा रही थी ताकि वह उसका कामदंड उसकी यौनगुफा में प्रवेश करने के लिए आतुर हो जाएँ..!! राजा कामशस्त्र उन निप्पलों को बारी बारी से, इतने चाव से चूस रहा था की दोनों निप्पलें लार से सन कर चमक रही थी। इतने चूसे-चबाए जाने पर भी, वह निप्पलें तनकर खड़ी थी, जैसे और अधिक प्रहारों के लिए अब भी उत्सुक हो..!! उत्तेजित राजा ने निप्पलों को उंगली और अंगूठे के बीच दबाकर मरोड़ दिया। अब वह धीरे धीरे नीचे की ओर अपना सिर लेकर गया। माता की योनि की तरफ नहीं, पर उसके सुंदर गोरे चरबीदार पेट की ओर। मांसल चर्बी की एक परत चढ़ा हुआ पेट और उसके बीच गहरे कुएं जैसी गोल नाभि, योनि की तरह ही प्रतीत हो रही थी। इतनी आकर्षक, की देखने वाले को अपना लिंग उसमें प्रविष्ट करने के लिए उकसा दें..!!
माता शाकिनी ने भांप लिया की खेल को अंतिम चरण तक ले जाने का समय आ चुका है। हवस और वासना अपने प्रखरता पर थी। दोनों के शरीर कामज्वर से तप रहे थे। वह उठी और बिस्तर पर अपने पैर पसारकर ऐसे बैठ गई, की उसकी बालों से आच्छादित योनि, खुलकर उजागर हो जाएँ। पहले तो उसने योनि के बालों को दोनों तरफ कर मार्ग को खोल दिया और फिर अपने पुत्र को ऊपर लेकर उसके लिंग का दिशानिर्देश करते हुए योनि-प्रवेश करवा दिया। राजा को विश्वास नहीं हो रहा था की उसका लिंग अपनी माता की यौन-गुफा से स्पर्श कर रहा है..!! योनि के होंठों ने, बड़ी ही आसानी से राजा के लिंग को मार्ग दिया और उसने अपनी कमर को हल्का सा धक्का दिया। यह वही स्थान था जहां उसका गर्भकाल व्यतीत हुआ था..!! इसी स्थान ने फैलकर, उसे इस सृष्टि में जन्म दिया था..!! और अब उसका पौरुषसभर लिंग, उत्तेजना और आनंद की तलाश में उसे छेद रहा था। उसका लिंग-मुंड(सुपाड़ा), योनि मार्ग की इतनी गहराई तक पहुँच चुका था, उसका एहसास तब हुआ, जब उसकी माता के मुख से दर्द और आनंद मिश्रित सिसकारी निकल गई..!! किन्तु जब उसने अपनी माँ के चेहरे की ओर देखा, तब उसे अब भी पिशाचिनी की वही हिंसक अश्लीलता नजर आ रही थी। शाकिनी अत्यंत कुशलता से उत्तेजित पिशाचिनी की आड़ में अपनी कामाग्नि तृप्त कर रही थी।
राजा अपनी कमर को आगे पीछे करते हुए संभोग में प्रवृत्त हो रहा था। इस बात की अवज्ञा करते हुए की जिस योनि को उसका लिंग छेद रहा था, वह उसकी माता की थी।!! शाकिनी की यौनगुफा को वर्षों के बाद कोई लिंग नसीब हुआ था। खाली पड़े इस गृह में, नए मेहमान के स्वागत के लिए, योनि की दीवारों ने रसों का स्त्राव शुरू किया और आगंतुक को उस शहद की बारिश से भिगोने लगी। उस अतिथि को, जो आज रात, लंबी अवधि तक यही रहने वाला था..!! राजा के धक्कों का अनुकूल जवाब देने के लिए, शाकिनी भी अपनी जांघों और कमर से, लयबद्ध धक्के लगाने लगी। दोनों के बीच ऐसा ताल-मेल बैठ गया था जैसे किसी संगीत-संध्या में सितारवादक और तबलची के बीच जुगलबंदी चल रही हो।!!
अब शाकिनी ने राजा की दोनों हथेलियों को पकड़कर, दोनों स्तनों पर रख दिया ताकि संभोग के धक्के लगाते वक्त उसे आधार मिलें। अपनी माता के स्तनों को मींजते हुए और योनि में दमदार धक्के लगाते हुए, राजा को अजीब सी घबराहट और हल्की सी हिचकिचाहट अनुभवित हो रही थी। बालों वाली उस खाई के अंदर-बाहर हो रहे लिंग को, स्वर्गीय अनुभूति हो रही थी। पूरा कक्ष, योनि और लिंग के मिलन तथा दोनों की जंघाओं की थपकियों की सुखद ध्वनि से गूंज रहा था। वातावरण में यौन रसों की मादक गंध भी फैल रही थी।
पुत्र द्वारा माता की योनि का कर्तव्यनिष्ठ संभोग, शाकिनी को आनंद के महासागर में गोते खिला रहा था। कामशस्त्र का लिंग-मुंड, योनि के अंदर, काफी विस्तृत होकर फुल चुका था। राजा ने अपनी माता की आँखों में देखा, किन्तु वह लिंग के अंदर बाहर होने की प्रक्रिया से परमानन्द को अनुभवित करते हुए, आँखें बंद कर लेटी हुई थी। एक पल के लिए, शाकिनी यह भूल गई, कि उसे पिशाचिनी के रूप में ही अभिनय करना था और आनंद की उस प्रखरता में, वह बोल पड़ी..
"अत्यंत आनंद आ रहा है मुझे, पुत्र..!! इस विषय में तुम्हें इतना ज्ञान कैसे है..!! तुम्हारी यह काम क्रीड़ाएं, मुझे उन्मत्त कर रही है..!! आह्ह!! और अधिक तीव्रता से जोर लगाओ.. तुम्हारे शक्तिशाली लिंग से आज मेरी आग बुझा दो..!! मेरी योनि की तड़प अब असहनीय हो रही है.. पर मुझे अत्याधिक प्रसन्नता भी हो रही है। ओह्ह..!!" शाकिनी यह भूल गई थी की ऐसा बोलने से, यह साफ प्रतीत हो रहा था की यह पिशाचिनी नहीं, पर राजा की माता, शाकिनी बोल रही थी..!! पर राजा इस समय कामलीला में इतना मग्न था, की उसे इस बात का एहसास तक नहीं हुआ।
राजा अपनी पूरी ऊर्जा लगाकर, योनि में धक्के लगाए जा रहा था। हर धक्के के साथ, उसकी तीव्रता और जोर भी बढ़ रहा था। जब राजा ने माता शाकिनी के दोनों विराट स्तनों को बड़े जोर से भींचते हुए शानदार धक्के लगाए, तब शाकिनी विचार करने की शक्ति खो बैठी और जोर से चिल्लाई "ओह मेरे प्रिय पुत्र! मेरे राजा..!! बस इसी तरह धक्के लगाते हुए मुझे स्वर्ग की अनुभूति करा। मेरी योनि को चीर दे। निचोड़ दे इसे। अपनी भूखी माता को संतुष्ट करने का कर्तव्य निभा.. आह्ह..!!"
शाकिनी की कराहें जब चीखो में परिवर्तित हुई तब राजा को तत्काल ज्ञान हुआ..!! यह शब्द तो उसकी माता के है..!! पिशाचिनी के बोलने का ढंग तो भिन्न था।!! संभवतः वह पिशाचिनी, उसकी माता के शरीर का त्याग कर चुकी थी। तो क्या वास्तव में उसकी माता ही आनंद की किलकारियाँ लगा रही थी???
शाकिनी परमानन्द की पराकाष्ठा पर पहुंचकर स्खलित हो रही थी और साथ ही साथ पिशाचिनी का अभिनय करने का व्यर्थ प्रयत्न भी कर रही थी पर अब यह दोनों के लिए स्पष्ट हो चुका था की उसका अभिनय अब राजा के मन को प्रभावित नहीं कर रहा था।
स्खलित होते हुए उत्तेजना से थरथराती शाकिनी की योनि से पुत्र कामशस्त्र ने अपना विशाल लिंग बाहर खींच लिया। पूरा लिंग उसकी माता के कामरस से लिप्त होकर चमक रहा था। उसने शाकिनी से पूछा "माँ, क्या आप कुशल है? मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है की पिशाचिनी आपका देह त्याग चुकी है। आप मुझे पुत्र कहकर संबोधित कर रही थी जब की वह पिशाचिनी तो मुझे अनुचित नामों से ही बुलाती थी..!! जब आपने मुझे पुत्र कहकर संबोधित किया, तभी मैं समझ गया और अपना लिंग बाहर निकाल लिया..!!" यह कहते हुए राजा ने देखा की उसका लिंग-मुंड, जो माता शाकिनी के योनिस्त्राव से लेपित था, वह अब भी योनिमुख के निकट था। जबरदस्त संभोग के कारण, शाकिनी का योनिमार्ग अब भी खुला हुआ था और थरथरा रहा था..!!
शाकिनी को यह प्रतीत हुआ की अब सत्य को अधिक समय तक अपने पुत्र से छुपाने का अर्थ नहीं है..!! उत्तेजना की चरमसीमा पर, उससे अभिनय करने में चूक हो गई और अब वह अपने पुत्र को और भ्रमित करने की स्थिति में नहीं थी। शाकिनी ने उलटी दिशा में एक करवट ली और बोली "हाँ मेरे पुत्र। पिशाचिनी मेरे देह को त्याग चुकी है। पर जाते जाते, वह मेरे शरीर में, प्रचुर मात्रा में कामवासना छोड़ गई है। तुम से विनती है, की इस सत्य की अवज्ञा कर तुम अपना कार्य जारी रखो, अन्यथा यह असंतोष की भावना, मेरे प्राण हर लेगी।!! मुझे यह ज्ञात है, की जो मैं तुमसे मांग रही हूँ वह उचित नहीं है, किन्तु अपनी विधवा वृद्ध माता के सुख के लिए, क्या तुम इतना नहीं कर सकते? मैं अंतिम निर्णय तुम पर छोड़ती हूँ। इस आशा के साथ की तुम मेरी यह इच्छा पूर्ण करोगे। यदि तुम्हें अब भी मेरा देह सुंदर और आकर्षक लगता हो तो।!!"
इतना कहकर, शाकिनी शांत हो गई और अपने पुत्र के उत्तर की प्रतीक्षा करने लगी।!! शाकिनी करवट लेकर कामशस्त्र की विरुद्ध दिशा में लेटी हुई थी ताकि सत्य उजागर करते समय, पुत्र की नज़रों का सामना न करना पड़े।
अपने पुत्र से की वह प्रार्थना आखिर सफल हुई। यह उसे तब प्रतीत हुआ जब उसकी योनि की मांसपेशियाँ फिर से विस्तृत हुई और एक जीवंत मांस का टुकड़ा, अंदर प्रवेश करते हुए योनि की दीवारों को चौड़ी करने लगा..!! इस अनुभूति से शाकिनी आनंद से कराह उठी..!! चूंकि वह कामशस्त्र की विरुद्ध दिशा में करवट लेकर लेटी थी इसलिए उसे यह पता ही न चला की कब उसके पुत्र ने, माता के दोनों नितंबों को हथेलियों से चौड़ा कर, योनिमार्ग को ढूंढकर अपना लिंग अंदर प्रवेश कर दिया..!!
लिंग को तीव्रता से आगे पीछे करते हुए वह अपने हाथ आगे की दिशा में ले गया और माता के स्तनों को दोनों हथेलियों से जकड़ लिया..!! यह स्थिति उसे और अधिक बल से धक्के लगाने में सहायक थी..!! शाकिनी के आनंद की कोई सीमा न रही..!!
"मेरे प्रिय राजा। आज मैं स्वयं को, ब्रह्मांड की सबसे भाग्यशाली स्त्री और माता समझती हूँ..!!" शाकिनी ने गर्व से कहा
राजा ने प्रत्युतर में कहा "हे माता, मैं आपसे इतना स्नेह करता हूँ की आज के पश्चात मैं आपको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ"
यह सुन, शाकिनी ने चिंतित स्वर में कहा "परंतु हमारा समाज और प्रजाजन, प्रायः इस संबंध को स्वीकार नहीं करेंगे। मेरे सुझाव है की हम अपना यह संबंध गुप्त रखें। यहाँ महल की चार दीवारों की सुरक्षा के बीच हम पति-पत्नी बने रह सकते है"
"समाज और प्रजाजनों की प्रतिक्रिया की चिंता मुझे नहीं है। मैं एक राजा हूँ, मेरे वचन ही नियम है। मेरी इच्छाएं कानून का पर्याय है। मैं यह घोषणा करता हूँ, की माता और पुत्र के वैवाहिक और शारीरिक संबंधों को वैद्य माना जाए और ऐसे संबंध स्थापित करने के लिए किसी की भी अनुमति की आवश्यकता न हो"
अपने पुत्र के इस निर्णय से प्रभावित होते हुए शाकिनी ने कहा "अब से मैं तुम्हारी पत्नी हूँ। मैं तुम्हारे वीर्य से गर्भधारण करना चाहती हूँ। तुम्हारी संतान को अपने गर्भ में जनना चाहती हूँ"
अति-उल्लास पूर्वक राजा ने कहा "हे माता। मेरी भार्या.. यह तो अति-सुंदर विचार है। पति और पत्नी के रूप में, हमारे प्रेम के प्रतीक रूप, मैं अपना पुष्ट वीर्य तुम्हारे गर्भाशय में प्रस्थापित करने के लिए उत्सुक हूँ..!!" राजा के मन में, उभरे हुए उदर वाली शाकिनी की छवि मंडराने लगी.. जो उनके संतान को, अपने गर्भ में पोषित कर रही हो.. इस कल्पना मात्र से ही वह रोमांचित हो उठा, की आने वाले समय में, उसकी माता गर्भवती होगी और उस दौरान वह उसके संग भरपूर संभोग कर पाएगा..!! माता-पुत्र से पति-पत्नी तक परिवर्तन की इस स्थिति पर उसे गर्व की अनुभूति हो रही थी।
शाकिनी भी उस विचार से अत्यंत रोमांचित थी की उसका पुत्र अपना बीज उसके गर्भाशय में स्थापित करने के लिए तत्पर था। एक शिशु, जिसका सर्जन, ऐसे माता और पुत्र मिलकर करेंगे, जो अब पति और पत्नी के अप्रतिबंधित संबंध से जुड़ गए थे। वह मन ही मन, उस क्षण की प्रतीक्षा करने लगी, जब उसकी योनि फैलकर, उनकी संतान को जन्म देगी। उसके स्तन, गाढ़े दूध से भर जाएंगे.. और फिर उसी दूध से, वह उस शिशु तथा अपने स्वामी रूपी पुत्र का, एक साथ पोषण करेगी।
अब राजा ऐसे पथ पर पहुँच चुका था जहां से पीछे मुड़ने का कोई मार्ग न था। उसके अंडकोश में वीर्य घौल रहा था और वह जानता था की अब अपनी माता के गर्भ में उस वीर्य को पर्याप्त मात्रा में स्खलित करने का समय आ गया था। उसने शाकिनी की योनि में गहराई तक धक्का लगाया.. और उसके लिंग से, जैसे वीर्य का विस्फोट हुआ..!! उपजाऊ वीर्य की अनगिनत चिपचिपी बौछारों ने शाकिनी के गर्भ को पूर्णतः भर दिया। उसी वीर्य का कोई एक शुक्राणु, शाकिनी के अँड से मिलन कर, नए जीव की उत्पत्ति करने वाला था।
शाकिनी अपने योनि मार्ग की गहराई में, पुत्र के गर्म वीर्य को महसूस करते हुए चीख पड़ी "ओह मेरे राजा..!! तुमने मुझे आज पूर्णता का अनुभव दिया है। वचन देती हूँ, की मैं एक आदर्श पत्नी बनकर तुम्हें खुश और संतुष्ट रखूंगी तथा अपने इस संतान का निर्वाह करूंगी, जिसका हमने अभी अभी निर्माण किया है"
उस पूरी रात्री, दोनों के बीच घमासान संभोग होता रहा।
दूसरे दिन, राजा कामशस्त्र ने राजदरबार में यह ऐलान किया की वह अपनी माता को पत्नी के रूप में स्वीकार करता है क्योंकि उनके उपयुक्त कोई भी पुरुष अस्तित्व में नहीं था। शाकिनी से विवाह के पश्चात, राजा कामशस्त्र ने यह कानून का निर्माण किया, जिसके तहत, हर पुत्र का, अपनी माता के शरीर पर अधिकार होगा। पुत्र की अनुमति के बगैर, माता अपने स्वामी से भी संभोग नहीं कर पाएगी।
इस नए कानून के परिणाम स्वरूप, वैतालनगर की उस रियासत में, ऐसे असंख्य बालकों ने जन्म लिया, जो कौटुंबिक व्यभिचार से उत्पन्न हुए। राजा कामशस्त्र और शाकिनी के शारीरिक संबंधों ने भी, एक पुत्री को जन्म दिया, जिसे नाम दिया गया योनिप्रभा।
कामशस्त्र और शाकिनी के निधन के पश्चात, योनिप्रभा की पीढ़ी दर पीढ़ी से उत्पन्न होती संतानें, आज भी प्रदेश के कई प्रांतों में, अस्तित्व में होगी।
योनिप्रभा उस बात का प्रमाण थी की एक पुत्र ने अपनी माता के गर्भ में, अपना बीज स्थापित कर, उसका निर्माण किया था। एक ऐसे घोर पाप के परिणाम से, जो क्षमायोग्य ही नहीं है।!!
॥ पांडुलिपि की अंतिम गाथा का अनुवाद ॥
दोष रहे दोष ही, इच्छा जो कहो
पतन के दोष जो छिपे न छुपते
जल-स्नान किए न पातक मिटते
सहज बनाने की कोशिश व्यर्थ
कुंठित बुद्धि जो करें अनर्थ
प्रिय पाठक गण, कथा पढ़ने के पश्चात, आप लोगों का क्या प्रतीत हुआ? क्या यह पिशाचिनी के श्राप का परिणाम था, जिसने माता और पुत्र के विचारों को दूषित कर, उन्हें इस पापी मार्ग पर धकेल दिया?? या वह दोनों स्वयं ही, अपनी शारीरिक इच्छाओं को समर्पित हो गए थे?? अपने प्रतिभाव व विचार अवश्य प्रकट करें..
Super story brother....You are an expert in writing stories on Kingdoms and Raja's and Rani's...Here is another one...rather a great one!!
Wonderful...The character names are also appropriate to the story...Raja "Kaamshaastra" and Rani "Shaakini"...
Super...!! जबरदस्त स्टोरी भाई...वैसे भी आप साम्राज्य , राजा और रानी पर आधारित कहानी लिखने में माहिर है...उसी श्रंख्ला में एक और कहानी जुड़ गयी है..रानी माँ और पुत्र के प्रेम को अच्छे से दर्शाया गया है...और आपने कहानी के पात्र के नाम भी एक दम उचित रखे है...राजा "कामशास्त्र" एंड रानी "शाकिनी"...कहानी एकदम बढ़िया है...सुपर!!! vakharia
Mai bharat ke kisi city mein rehti hun, mera naam Harpreet Kaur hai,meri umar 27 varsh hai, bahut khubsurat hu aur bahut mast figure hai meri.
Mere pati Kewal Singh, bahut handsome hain, achi 6 feet height hai,ek bade hotel mein kaam karte hain,acha pad par hain aur achi salary hai unki.
Kisi cheez ki koi kami nhi hai.
Hum dono bahut achi zindagi bita rahe hain.
Vese mai jismani taur pr bhi unse takriban santusht hi hun.
Koi khas samasya nhi hai hum dono ke beech.
Kahani shuru hoti hai jab mere pati ki chhoti behn Preet Kaur kuch samay ke liye hamare sath rehne ke liye aati hai.
Meri nanad Preet Kaur , umar 25 varsh vo bhi meri tarah bahut khubsurat hai.
Uske chuttad aur boobs bhi mere walon ki tarah bade hi hain.
Koi banda agar hamare samaan ko achi tarah dekh le aur uska khada na ho, yeh ho hi nahi sakta tha.
Asal mein Preet ke husband Pavittar Singh ek multinational company mein kaam karte hain aur unko kaam ke silsile mein aksar out of country jana padta hai kuch mahino ke liye.
Jab vo out of country jate the
to pehle to Preet apne saas sasur ke ghar rehne ke liye jaya karti thi
lekin is baar vo hamare sath rehne ke liye a gyi thi kuch mahino ke liye jab tak uske pati ne vapis nhi aana tha.
Preet bahut garam aurat thi aur usko net par porn dekhne ka bahut chaska tha .
Dhire dhire vo mere sath khulne lagi aur usne mujhe bhi porn dekhne ka shouk lga dia.
Mene porn mein vibhinn mardon ke laude dekhe jo mere pati Kewal Singh ke lund se bahut bade the.
Porn wale mardon ke lodon ka size vese mujhe kafi bda lga tha.
Lekin porn wali auratein bahut khush hokar leti thi itne bade laude apne tino chhedon mein.
Mene bhi apne pati Kewal ke lund ko muh mein to le rakha tha lekin kabhi apni gand nhi marwai thi us se.
Mujhe porn mein yeh sab dekh kar bahut ajeeb lga
aur mene Preet se kaha yaar porn wale mardon ke laude toh bahut bade hain aur ladkiyan yahan par inko apni gand mein bhi leti hain.
Tumare Kewal bhya ke lund ka size to itna bda nhi hai aur unhone kabhi meri gand bhi nhi maari ab tak.
Tum batao tumare pati yani ke mere jiju ka lauda kitna bda hai aur kya tumare pichle chhed mein daal te hain vo apna danda.
Preet ne kaha yaar ab kya batau tumhe, Pavittar ke laude ka size bhi kafi bda hai aur vo mere tino chhedon ka mza bhi bahut lete hain.
Jab vo vapis aate hain foreign se toh din raat meri jabardast thukai karte hain.
Ab tumse mera kya chhipa hai meri pyari bhabhi ji , mai tumare pass apni aisi hi thukai karwane ke liye hi tumare pass rehne ayi hun. Ab tum janti hi ho,tumare jiju to kai mahino ke liye foreign chale jate hain.
Main bhala itni der tak kese rahun apni pyasi chut ke sath.
Please bhabhi,koi jugaad kro yaar meri chut ki pyas bujha ne ka.
Kindly meri pyari bhabhi ji meri yeh ichha puri kro please.
Mene kaha yaar mai kese tumari sahayata kar paungi is sab mein
mene toh kabhi tumhare bhya ke sivay kisi aur mard ke vare mein socha bhi nahi kabhi.
Lekin ek baat toh hai Kewal ka ek dost Amar mujhe bahut pyasi nazron se dekh ta rehta hai aur ek 2 baar usne mere boobs aur gand par hath bhi fera hai bahane se.
Vo mujhe seduce karne ke liye tumare bhya ke sath kabhi kabhi ghar par bhi aata rehta hai .
Bahut achi personality hai Amar ki , bahut handsome bhi hai vo ,
aur tum se ab kya chhipa un main,mera dil bhi kabhi kabhi karta hai us se intimate hone ko .
Lekin abhi tak mene usko ghas nhi daali hai.
Agar tum chahti ho us se pyar karna toh main usko ghar bulwa lungi tumare bhya se keh kar kisi bahane se.
Fir tum dekh lena us par try maar kr aur agar tum dono ko acha lagega toh tum dono kr lena apni hasrat puri.
.Preet ne kaha, thik hai bhabhi bula lena tum Amar ji ko ghar par, fir main dekh lungi ki agge kya karna hai.
Lekin meri ek gujaarish hai bhabhi ji,
ki agar mene us se thukne ka faisla kr liya to tum bhi le lena uska danda apni chut mein.please.
Mene kaha yaar yeh tum kya keh rhi ho mere mein toh kisi paraye mard se chudne ka dare nhi hai abhi tak.
Preet ne kaha mene bhi abhi tak nhi liya kisi paraye mard ka danda apne chhedon mein aur ab agar aisa karungi mai
toh tum bhi jarur sochna bhabhi ji iske vare mein please.
Mene kaha yaar yeh mai baad mein decide karungi abhi ek baar tum us se mil kar to dekh lo , mai aaj hi bulwa dungi usko ghar pe tumare bhya se keh kar kisi bahane se.
Kewal:Aur jab Kewal jane lga hotel breakfast karne ke baad toh usne kaha ki aaj Amar ayega ghar pe.
Jab mene Amar ko bataya tha ki meri behn Preet ayi hui hai hamare sath rehne ke liye toh usne request ki thi ghar a kr Preet se milne ki.
Mene usko keh diya tha ki koi baat nahi tum jab marzi a jana Preet se milne ke liye tumari bhi toh vo behn jesi hi hai.
Mene kaha ji koi baat nahi tum bhej dena Amar bhai sahab ko ghar par,vo jab marzi a jayen tumari behn se milne ke liye.
Dil mein mene socha ki vo toh tumari patni pr bhi line maarta rehta hai.
Usne kya Preet ko apni behn samjhna hai .
Vo toh mere upar chadh ne ki firaq mein hai usne Preet ko kahan chhodna hai.
Agar usko mauka mila toh usne tumari behn ki chut maar hi leni hai.
Uske baad Kewal hotel chala gya.
Takriban ek ghante baad doorbell ring hui to mai samjh gyi ki Amar aya hoga.
Mene Preet se kaha, mai darwaja khol kar Amar ko ander bula kar tumse milwaungi aur khud chai bnane kitchen mein chali jaungi, tum mil lena us se achi tarah agar vo tumhe acha lga toh.
Mene darwaja khola toh Amar ne ander aate hi mere jism ko chhu te huye pucha kahan hai Preet behn ji.
Mene usko drawing room mein a kr Preet se milwaya aur khud kitchen mein chali gayi chai bnane ke liye.
Lekin khidki se un dono ko dekh ti rhi.
Amar ne Preet ko apni bahon mein bhar liya aur apne sath zor se bhinch liya.
Shayad Preet ko bhi acha lga hoga Amar isliye usne bhi apne boobs dba diye uski chhati par
aur jab usne Preet ke chuttadon pr hath fera toh Preet ne koi itraz nhi kiya balki smile dekar usko apne pass bitha liya.
Preet ne kaha ji ye kya tarika hua behn se milne ka, aap ne toh itni zor se dba diya mera jism.
Amar ne kaha tum jesi khubsurat aurat se toh aise hi mila jata hai baby.
Aur tum behn toh mere dost ki ho ,mera irada toh tumhe apni gf bnane ka hai.
Preet ne kaha rehne do, itni bhi khubsurat nhi hun mein aur tum itna fast kyu chal rahe ho.
Abhi abhi toh mile ho mujhse aur abhi pehli mulaqaat par hi tum mujhe gf bnane ki baat karne lage ho.
Vese mujhe pta hai, tum meri bhabhi Harpreet pr bhi latoo ho.
Tum uski bhi jarur aise hi prashansa karte honge jese ab meri kr rahe ho.
Amar ne kaha ismein galat kya hai, mujhe toh tum dono hi apsara jesi lagti ho.
Preet ne kaha vese tum kafi bold ho mere samaksh hi mujhe aur meri bhabhi dono ko hi seduce karne lage ho.
Amar ne Preet ke jism ko chhu kar kaha ab ismein mera koi kasur nhi tum dono ho hi itni khubsurat.
Tabhi mai chai leke drawing room mein a gyi aur uski dusri taraf beth gai.
Hum tino chai pine lage.
Toh usne mujhe chhute huye kaha, bhabhi ji Preet ko hotel bhejna aap ,
mai isko apna room dikha na chahta hun matlab iski kuch sewa karna chahta hu.
Mene man mein socha, mujhe pta hai tum kesi sewa karna chahte ho meri nanad rani ki.
Mene kaha koi baat nahi a jayegi Preet hotel mein tumari sewa lene ke liye
aur kya tum sirf meri nanad ki hi sewa karna chahte ho, meri nhi.
Amar ne kaha kyon nhi mai toh tum dono nanad bhabhi ki sewa karna chahta hu,a jana tum bhi Preet ke sath.
Mene kaha thik hai devar ji dekhte hain kesa program ban ta hai,ab tum hum dono ki sewa kiye bagair toh mano ge nhi.
Uske baad Amar jate samay hum dono ke sath chipak kar mila.
Amar ke chale jane ke baad, mene apni nanad Preet se pucha, kyon didi kesa laga tujhe Amar se mil kr, kya tum lena chahti ho iska danda apni gulabo mein?
Kya tumari okhli mein kuch halchal hui isko milkar?
Preet: yaar mera dil a gya hai Amar par , mene toh irada kar liya hai ab uske niche lait ne ka, tumari tum jano.
Lekin yeh sab hoga kese Kewal bhya ke hamare aas paas hote huye.
Mene kaha ab agar tumari ichha ho gyi hai Amar ke ghode ko apne taalaab mein dubki lagwane ki toh main koi raasta nikal hi lungi tumari ichha puri karne ke liye.
Tum apni bhabhi ke hote huye pyasi nhi rahogi nanad rani.
Tabhi mujhe Amar ka msg aya ki Kewal 2 dino ke liye bahar ja raha hai aur usne mujhe ghar pe rehkar tum logon ka khyal rakhne ke liye kaha hai.
Mene kaha yeh acha hai mere hubby ka ,
billi ko hi dudh ki raksha karne ke liye , dudh ke sirhane chhod kar ja rahe hain.
Amar ka reply aaya,billi ko nhi bille ko chhod kar ja rahe hain dudh ki raksha karne ke liye.
Thik hai bille bhai sahab a jana tum raat ko hamari raksha karne ke liye.
Bille ko 2 ka toh pta nhi lekin ek billi ka dudh toh jarur mil jayega grahan karne ke liye.
Preet ye sab sun kar khush ho gyi thi isliye usne Amar se milan ki sab tyari shuru kar di thi.
Usne tyari karte huye, matlab make up bagaira karte huye mujhse pucha bhabhi aaj toh bhya bahar gye hain toh meri ichha puri ho jayegi lekin mujhe toh ek baar ke milan se santushti nhi hone wali.
Baad mein ye sab kese kar paungi mai Amar ke sath.
Mene kaha tum ek baar to dalva lo Amar ka pani apne kheton mein, fir uske baad Amar khud hi koi na koi raasta nikal lega tumari regular thukai karne ka.
Aaj jab vo tumari tizori lootne ayega tab vo khud hi tumhe koi na koi raasta batayega baby.
Sham ko mere hubby toh bahar chale gye aur unke jane ke baad,billa matlab Amar a gya hamare sath rehne ke liye.
Jese hi door bell ring hui, mene Preet ko kaha,jao apne yaar ka swagat karo apne dhang se.
Mai tum dono ke beech mein nhi aungi lekin dekhti rahungi tum dono ka pyar bedroom ki khidki se.
Preet ne mujhse pucha, bhabhi kya main seedhi hi bedroom mein chali jaun unke sath.
Mene kaha jab tumne irada kar hi liya hai uske sanp ko apni gufa ki sair karwane ka , fir kahe koi formality karni hai,chali jana uske sath bedroom mein, agar vo tumhe leke jana chahega to.
Preet khush ho gyi aur apne gile fudde ke sath gate khol ne chali gai.
Jese hi usne gate khola ,Amar ne ander a kr usko apni bahon ki grifat mein le liya.
Zor se bhinch diye uske mumme apni chhati ke sath.
Usko chumne lga, uske chuttad dbane lga.
Preet bhi us se sehyog karne lagi lekin thodi der apna jism apne yaar se masalwane ke baad,usne kaha baby tum gate par hi shuru ho gye ,chalo ander chalte hain, Harpreet bhabhi kya sochegi.
Amar usko apni godh mein utha kar bedroom mein lija te huye bola, bhabhi ko toh sab pta hai, usne kya sochna hai.
Aise bolte huye vo bed par usko apni godh mein leke beth gya.
Uski gardan chumne lga, mumme dbane laga.
Upar se Amar uske chuchon se khel raha tha
aur niche uska lauda uski chut par prahar kr rha tha.
Preet ko bahut maza aane laga, jiske chalte vo siskiyaan lene lagi hhhhhhhiiiii cccccc sssiii babyyyyyy cccccc sssiii jiiii sajannnn mere yaarrrr kitna swad a raha hai tumare sath.
Apni chut achi tarah uske lund par ghiste huye kehne lagi,masal daalo mere chuche raje,kha jao inko, nikal do inki sab akad hhhhhhhiiiii cccccc sssiii raje .
Amar zor se uske chuche dbane, masal ne lga,
Nipples ko muh mein leke chusne laga.
Preet ne garam hokar uska muh apne pet pr dba diya toh vo Preet ka navel chatne lga.
Preet se ab aur intzar nhi hua lihaja usne Amar ka muh apni chut pr lga diya
Amar zor se chatne laga uski chikni chut , jeebh se chodne lga uski gulabo ko.
Uski chut chatne ke baad Amar ne apna bada lauda pakda diya uske hath mein, to Preet pyar karne lagi apne yaar ke lund se.
Kabhi uski muth maarti, kabhi chusti , kabhi pura lund muh mein leke chat ti.
Ab Amar se bhi raha nhi gya, usne Preet ko apne niche liya aur uski tange utha kar,ek zor ka dhakka maar diya uski gili chut ke chhed par.
Uska bada lund dandanata hua uski chut mein dakhal hokar uski bacchedani se ja takraya.
Ekdam pura lauda chut mein daal ne ke karn,dard se Preet ki halki si cheekh nikal gyi.
Amar usko cheekh te dekh kar thoda ruk gaya.
Preet ne kaha yaar ekdam ghusa diya itna bada lauda mere fudde mein, thoda aaram se daalna tha na.
Chalo koi baat nahi ab chod lo zor se apni aaj ki lugai ko,thoko zor se meri chut mein apna lauda.hhhhhhhiii cccccc sssiii babyyyyyyy cccccc hhhhhhhiiiii cccccc bahut swad a raha hai baby cccccc .
Amar zor se tabadtod chudai karne lga Preeti ki,
Kafi der ki dhuaan dhar chudai ke baad dono ek sath hi farig ho gye
Farig hone ke baad dono ek dusre ki bahon mein lait kar ek dusre ke jism ko sehlane lage.
Amar ne Preeti ko pucha, kyu baby maza aaya tumhe mere sath milan karne par.
Preet ne kaha ji sajan mujhe bahut maza aaya tumare sath.
Darshako ab aap btana,kesa lga aap ko Raji ka ye prayas.
Super hot story Raji....Seduction at its best...Preet seducing Harpreet (btw, both the names rhyme very well...Preet...Harpreet...) by making her see porn is a good addition..
Photos are also very good and goes well with the description of the scene accordingly!!
Great addition to your story..
Yakshini bhi khud hi sambhog karti. Ek ko dusre se sambhog ke lie prerit nahi karti. Chalo pishajni bhi badhiya hai. Vese bhi yah ek lekhak ki kalpna hai.
पिशाचिनी या यक्षिणी.. क्या कर सकती है और क्या नहीं, यह अप्रासंगिक है चूंकि कहानी में राजा की माता ने केवल यह दिखावा ही किया था की वह पिशाचिनी के प्रभाव के आधीन है..!! वास्तव में इसके पीछे पिशाचिनी का प्रभाव नहीं परंतु उस स्त्री की वासना का दुष्प्रभाव था..!!
Story line: सस्पेंस और थ्रिलर पर आधारित ये कहानी एक ऐसे गेम के बारे में है जो लोगों को एक ट्रैप में फंसा कर मौत की ओर ले जाता है। पुलिस इन्वेस्टिगेशन में इस खेल का असली मकसद, एक पुलिस ऑफिसर और एक अपराधी की आपसी रंजिश होती है जो बेगुनाह लोगों की जान ले रही है। और इस गेम को खत्म करने के लिए वो पुलिस ऑफिसर खुद उस गेम को खेलता है, और उस अपराधी को मौत के घाट उतर देता है। पर क्या खेल असल में खत्म हुआ...
Treament: साधारण लेकिन प्रभावशाली शैली में लेखक ने इस कहानी को लिखा है जो पूरे फ्लो में चलती है।
Positive points: कॉन्सेप्ट, और भाषा अच्छी है। पाठक एक जुड़ाव महसूस करता है कहानी के साथ, और थ्रिल कितना जानलेवा हो सकता है वो भी अच्छे से दर्शाया गया है इस कहानी में। साथ साथ बदले की भावना के कारण आदमी कितना बुरा कर सकता वो भी बताया गया है।
Negative points: कहानी कई जगह बहुत फास्ट जाती लगी है। और शुरुआत में जो कैरेक्टर्स को दिखाया था उनका कोई जिक्र नहीं है। अंत भी ट्विस्ट से भरा है, लेकिन क्लियर न होने से थोड़ा निराश करता है। कुछ एक दृश्य उनके भी रखने थे जिन्होंने इस गेम के कारण सुसाइड किया था।
Suggestions: इसे थोड़े और बेहतरीन तरीके से लिखा जा सकता था। जिससे अदिति या रिया के प्रोस्पेक्ट से कि एक मरा और किस सिचुएशन में मरा वो।
Kahani ek ladki ki jo kai sapne sanjokar bade shahar me aayi thi, lekin kuch aisi ghatnayen hui jisme uske sapno ke sath sath use bhi todkar rakh diya aur ant me uske paas aatmahatya karne ke siva koi aur rasta najar nahi aata.
Excellent, Brilliant, Superb
Ye shabd hi hai iss kahani ke liye. Writing flawless aur smooth hai, shuru se ant tak kahi bhi dhyan nahi bhatakta. Ek baar padhna shuru karo to khatam kiye bina uthna mushkil hai.
Vartani kamal ki hai aur hinglish me hone ke bawjood koi galti pakad me nahi aati.
Character ko bahut ache se create kiya hai, Aaradhya ke ek pahadi gaon se nikalkar shahar me bade khwab dekhne aue unhe pura karne ki lalak mehsoos ki jaa sakti hai, aradhya ke mata pita, yaa uski company ki team sabhi apni capacity ache kirdar hai aur unke dialogue bhi ache se likhe gaye hai.
Kahani kai social message bhi deti hai, aaj ke samay me AI ke badhte chalan ke side effects jo ho sakte hai. Sath hi samaj ka chehra bhi pesh karti hai jo ek mauke ki talash me hota hai taki dusro ko giraya jaa sake, aradhya par shadi ka dawab, photo viral ke baad samaj ki dutkar yahi sab dikhate hai.
Kahani smooth to hai hi lekin ant me kafi intense ho jati hai, aur phir aradhya ki maut achanak se padhne wale ko jameen par patak deti hai. Uski maut ke baad bhi samaj dwara uski burai kare jana dukhad lagta hai lekin bahut realistic tha.
Ant dukhi aur bhawook karta hai, Aradhya ki tute sapne, uski maut aur uske parents ki vyatha sab jhakjhor deta hai.
Karan ko uske kiye ki sazaa naa milna akharta hai lekin shayad ye kahani sirf aradhya ki barbadi ki thi.
Yeh kahani ek modern thriller hai jo aaj ke social media aur technology ke daur ko badi khubsurti se darshati hai. "Real Game" ka concept naya aur dilchasp hai jo shuru se lekar aakhir tak curiosity banaye rakhta hai. Aditi aur Aryan jaise characters ke zariye kahani me emotional depth bhi aati hai. Suspense ka level har stage ke saath badhta hai jo padhne wale ko bandhe rakhta hai. Karan ki backstory aur uska Aryan se personal connection ek unexpected twist deta hai jo kahani ko aur mazedaar banata hai. Mumbai ka setting aur uski bhaagdod bhari zindagi ko achhe se dikhaya gaya hai jo realistic feel deta hai.
Negative Points:
Kahani me kuch jagah plot thoda predictable lagta hai jaise Karan ka badla lena. Final confrontation thoda jaldi khatam ho jata hai, jisse climax ka impact kam ho jata hai. "Real Game Reloaded" ka aakhir me aana thoda forced lagta hai jaise kahani ko zabardasti extend kiya gaya ho. Kuch characters jaise Neha aur Vikram ko zyada develop nahi kiya gaya jo unke role ko thoda kamzor karta hai. Tasks ke descriptions me thodi repetition bhi mehsoos hoti hai.
Ek Acchi Kahani Ke Liye Kya Accha Hai Kya Bura Hai:
Accha ye hai ki yeh kahani aaj ke time ke issues jaise online addiction aur mental manipulation ko highlight karti hai. Suspense aur thrill ka balance bhi achha hai.
Bura yeh hai ki kuch plot points ko aur detail me explain kiya ja sakta tha jaise game ke peeche ka asli motive ya Karan ki planning. Climax ko thoda aur dramatic banaya ja sakta tha taaki ending memorable ho.
Wartani Aur Rhythm:
Wartani (spelling) me koi badi galti nahi hai. Rhythm kahani ka tezi se chalta hai jo thriller ke liye perfect hai lekin beech me kuch jagah slow ho jata hai jaise investigation ke scenes me. Bhasha simple aur roman hindi me hai jo padhne me asaan hai aur flow banaye rakhti hai.
Overall: "Real Game" ek acchi thriller kahani hai jo technology aur human psychology ke mix se banayi gayi hai. Thodi si polishing ke saath yeh aur bhi dhamakedaar ho sakti thi lekin jo hai wo bhi kaafi entertaining aur engaging hai.
Yeh kahani ek anokhi love story hai jo do alag-alag backgrounds ke logon, Ram aur Laila ke beech pyar ko dikhati hai. Laila ka character ek shadishuda aurat ka hai jo apni zindagi me pyar aur jazbaat ki kami mehsoos karti hai aur Ram ka sadagi bhara swabhav ise rochak banata hai. Dono ke beech ka attraction dhire-dhire badhta hai jo kahani me realism lata hai. Kitchen wala scene aur uska emotional touch kahani me josh aur gehraai deta hai. Ant me Ram ki maut aur Laila ka use yaad rakhna ek tragic touch deta hai jo dil ko chhuta hai.
Negative Points:
Kahani me kuch jagah jaldbaazi lagti hai jaise Ram aur Laila ka pyar achanak shuru hona. Laila ke pati aur uski zindagi ko aur detail me dikhaya ja sakta tha taki uska akelapan aur saaf ho. Ram ka character thoda kamzor lagta hai uski bhavnaon ko aur gehraai se dikhaya ja sakta tha. Ant me "Ram amar ho gaya" wala hissa thoda over-dramatic lagta hai jo kahani ke natural flow ko todta hai.
Ek Acchi Kahani Ke Liye Kya Accha Hai Kya Bura Hai:
Accha yeh hai ki yeh kahani do alag-alag duniya ke logon ke beech pyar ko dikhati hai jo emotional aur bold dono hai. Interfaith pehlu ise khaas banata hai.
Bura yeh hai ki kuch hisson me detail ki kami hai jaise Ram ka background ya Laila ke pati ka role jo kahani ko aur majboot kar sakte the.
Wartani Aur Rhythm:
Wartani me kuch galtiyan hain. Rhythm shuru me accha hai lekin beech me thoda dheema ho jata hai aur ant me phir tez ho jata hai. Bhasha aasaan aur bolchal wali hai jo padhne me maza deti hai.
Overall:
"Ram Aur Laila Ka Pyar" ek bhavuk aur bold kahani hai jo pyar junoon aur dukh ko milati hai. Thodi aur gehraai ke saath yeh aur shandaar ho sakti thi lekin jaisi hai waisi bhi yeh dilchasp aur yaadgaar hai.
Yeh kahani ek bold aur jazbaati kahani hai jo Kunal aur uski badi maa ke beech ek rishte ko dikhati hai. Kahani me suspense aur excitement shuru se hai jaise Kunal ka badi maa ko chupke dekhna aur baad me unka saamna. Badi maa ka character strong aur attractive banaya gaya hai jo kahani me ek alag sa josh lata hai. Sex scenes ko detail me likha gaya hai jo is tarah ki kahani ko dilchaspi banaye rakhta hai. Ant me dono ka ek saath sukoon paana ek emotional touch deta hai jo padhne wale ko connect karta hai.
Negative Points:
Kahani me kuch jagah thodi zyada bold ho gayi hai jo shayad har reader ke liye comfortable na ho. Kunal aur badi maa ke rishte ka moral side thoda sawaal khada karta hai jo kahani ko controversial bana sakta hai. Plot me naya twist ya gehraai ki kami hai jaise badi maa ke emotions ya Kunal ke guilt ko aur explore kiya ja sakta tha. Ending thodi jaldi khatam ho jati hai jo thoda unsatisfying lagta hai.
Ek Acchi Kahani Ke Liye Kya Accha Hai Kya Bura Hai:
Accha yeh hai ki kahani me passion aur excitement ka acha mix hai jo readers ko bandhe rakhta hai. Characters ke beech chemistry achhi hai.
Bura yeh hai ki kahani me sirf physical attraction pe focus hai emotional depth ya backstory ki kami hai. Thoda aur character development ya ek unexpected twist ise aur behtar bana sakta tha.
Wartani Aur Rhythm:
Wartani me chhoti-chhoti galtiyan hain. Rhythm tezi se chalta hai jo is tarah ki kahani ke liye sahi hai lekin beech me thoda rukta hai jab baat-cheet zyada lambi ho jati hai. Bhasha simple aur roman hindi me hai, jo padhne me asaan hai.
Overall: "Meri Zindagi Ki Sabse Haseen Raat" ek bold aur mazedaar kahani hai jo thrill aur passion se bhari hai. Thodi aur gehraai ya naya angle ise aur yaadgaar bana sakta tha lekin jo hai wo apne tareeke se entertaining hai aur mood banati hai.
Yeh kahani dil ko chhoo jati hai kyunki isme zindagi ke har rang, sukoon, pyar, dhoka, dukh aur nayi shuruaat ko bahut gehrai se dikhaya gaya hai. Rahul ke safar ko padhkar lagta hai jaise hum bhi uske saath chal rahe hain. Har bhaavna, jaise dosti ka mazaak, pyar ki mithaas aur dhoke ka dard ko asliyat ke saath likha gaya hai. Ashish aur Neha jaise characters kahani ko mazedaar aur real banate hain. Vipashyana ka hissa bahut inspiring hai jo dikhata hai ki dukh se bhi kuch seekha ja sakta hai. Ant mein Neha ko maaf karna aur aage badhna ek bada sandesh deta hai.
Negative Points:
Kahani thodi lambi ho gayi hai kuch jagah pe details zyada lagte hain jo rhythm ko slow kar dete hain jaise baar-baar Rahul ke man ki uljhan ko repeat karna. Neha aur Rohit ke beech ka rishta thoda surface pe hi raha unki wajah samajh nahi aayi. Kuch dialogues filmy lagte hain jo natural feel ko kam karte hain. Shuru ke hisse mein thodi speed ki kami hai jisse padhne mein thakan ho sakti hai.
Ek Acchi Kahani ke Liye Kya Accha Hai Kya Bura Hai:
Accha ye hai ki kahani zindagi ka asli pehlu dikhati hai aur har emotion ko samajhne ka mauka deti hai. Character development, jaise Rahul ka badalna, bahut strong hai.
Bura yeh hai ki agar kahani thodi chhoti hoti to impact zyada hota. Kuch scenes ko chhota karke bhi wahi baat kahi ja sakti thi.
Wartani aur Rhythm:
Wartani (spelling) bilkul sahi hai koi galti nahi dikhi. Rhythm shuru mein thoda dheema hai lekin beech mein pace badhta hai aur ant tak accha flow ban jata hai. Kuch jagah pe repetition rhythm ko todta hai lekin overall padhne mein maza aata hai.
Overall:
Kahani dil se dil tak jati kahani hai jo zindagi ko samajhne aur aage badhne ki seekh deti hai. Thodi editing se yeh aur behtar ho sakti hai lekin ab bhi yeh ek acchi aur meaningful kahani hai.