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★☆★ XForum | Ultimate Story Contest 2021 ~ Entry Thread ★☆★

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Lovely Anand

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जीवन-ज्योति


जीवन और ज्योति इन दोनों की जोड़ी कालेज में सभी की जुबान पर रहती थी. वह दोनों एक ही क्लास में थे. वो साथ-साथ पढ़ते और घूमते पर उनकी रातें अपने अपने हॉस्टल में गुजरतीं. वह दोनों एक दूसरे को अपना जीवनसाथी मान चुके थे पर साथ रातें गुजारने में अभी वक्त था.

उस दिन वैलेंटाइन डे था शायद कॉलेज में यह उनका आखिरी वैलेंटाइन डे होता. दोनों मन ही मन एक दूसरे के प्रति समर्पण को तैयार थे. उनके यौनांग भी एक दूसरे को महसूस करने के लिए तत्पर थे. आज तक जीवन और ज्योति ने एक दूसरे के अंगों को महसूस जरूर किया था पर वस्त्रों के ऊपर से. जीवन और ज्योति ने एक दूसरे को नग्न नहीं देखा था. अबतक यह उन्हें मर्यादा के खिलाफ लगता था. परंतु अब वह दोनों युवा हो चुके थे.ज्योति भी कुछ दिनों पहले मतदान योग्य हो चुकी थी. उसने भी आज मन बना लिया था कि वह अपना कौमार्य अपने प्रेमी जीवन को अर्पित कर देगी. जीवन भी यह बात जानता था पर कहां? उनके पास कोई उचित जगह नहीं थी. होटल जाना खतरनाक हो सकता था.

तभी मनीष दौड़ता हुआ आया

"यार जीवन मजा आ गया. मेरे मम्मी पापा 2 दिनों के लिए बाहर गए हैं घर पूरा खाली है तू आज ज्योति को भी वहीं बुला ले. मैने ने अपनी मनीषा को भी वही बुला लिया है. मुझे पूरी उम्मीद है ज्योति मना नहीं करेगी."

उसने मुझसे कहा

"यार राहुल, तू रश्मि को बोल ना वह उन दोनों को मना लेगी. सच बहुत मजा आएगा. कुछ ही देर में प्रोग्राम सेट हो गया. हमारी प्रेमिकाएँ सहर्ष वहां आने को तैयार हो गयीं. हम तीनों के बीच गहरी दोस्ती थी."

ज्योति को छोड़कर बाकी दोनों लड़कियां अपना कौमार्य पहले ही परित्याग कर चुकी थीं. आज जीवन और ज्योति का मिलन नियत ने सुनियोजित कर दिया था.

जीवन एक आकर्षक कद काठी का युवा था जो पढ़ने में भी उतना ही तेज था जितना खेलने में. वह कालेज का हीरो था सभी लोग उसकी तारीफ करते हुए नहीं थकते. मुझे और मनीष को उससे कभी ईर्ष्या नहीं हुई . वह हम दोनों का बहुत ख्याल रखता था. वह एक सामान्य परिवार से था उसके माता-पिता उसका ख्याल रखते पर धन की कमी अवश्य थी. एक रईसजादा ना होने के बावजूद उसके चेहरे पर चमक थी उस से जलने वाले लड़के उसके पीठ पीछे यही बात कहते हैं जरूर इसकी मां ने किसी रईसजादे के साथ अपनी रातें गुजारी होंगी.

वह कभी भी फिजूलखर्ची में नहीं पड़ता और पूरी जिम्मेदारी से अपनी पढ़ाई करता. ज्योति से उसकी मुलाकात कॉलेज के पहले साल में ही हो गई थी. वह बला की खूबसूरत थी. आप ज्योति की शारीरिक संरचना की कल्पना के लिए मनीषा कोइराला(1942 ए लव स्टोरी वाली) को याद कर सकते हैं. वह जीवन का बहुत ख्याल रखती थी उन दोनों में अद्भुत तालमेल था.

जीवन और ज्योति का मिलन नियति ने नियोजित किया था. वह दोनों स्वतः ही एक दूसरे के करीब आते गए. वह साथ साथ बैठते, साथ-साथ पढ़ते और सभी कार्यक्रमों में एक साथ ही जाते. उन दोनों दोनों में अद्भुत तारतम्य था. उनका प्रेम सभी को पता था पर उससे किसी को आपत्ति नहीं थी. मुझे ऐसा प्रतीत होता है जैसे उन्होंने अपने कॉलेज जीवन के शुरुआती 3 वर्ष एक दूसरे को समझने में ही बिता दिए. एक तरफ मैं और मनीष अपनी अपनी प्रेमिकाओं के साथ रंगरलिया मनाते और वह दोनों कभी साथ में ड्राइंग करते हैं कभी एक दूसरे से घंटों बातें. परंतु कुदरत ने शरीर की संरचना इस हिसाब से ही बनाई है कि लड़का और लड़की ज्यादा दिनों तक बिना अंतरंग हुए नहीं रह सकते. उनके यौनांग स्वयं एक दूसरे के करीब आ जाते हैं. यह बात जीवन और ज्योति पर भी लागू हुयी.

ज्योति के जन्मदिन पर जीवन ने पहली बार उसे चूमा था वह भी सीधा होंठों पर उनका यह अद्भुत चुम्बन लगभग 2 मिनट तक चलता रहा था. इस दौरान वह दोनों एक दूसरे में समा जाने के लिए तत्पर थे. इस अदभुत मिलन के गवाह और जोड़े भी थे परंतु उन्हें जैसे हमारी उपस्थिति का एहसास भी नहीं था. जब वह दोनों अलग हुए तालियां बज रही थी. जीवन ने घुटनों पर आकर ज्योति का हाथ मांग लिया ज्योति तो जैसे इसका इंतजार ही कर रही थी कुछ ही देर में दोनों फिर आलिंगन बंद हो गए. इसके पश्चात जीवन और ज्योति का शारीरिक मिलन शुरू हो गया पर उनके बीच मर्यादा कायम रही.

हम लोगों ने कई बार जीवन को उकसाया कि वह ज्योति के अंग प्रत्यंग से अपनी दोस्ती बना ले. पर उसने हमेशा बात टाल दी. हमें पूरा विश्वास था कि उन दोनों ने एक दूसरे को छुआ जरूर है पर यह बात हम भी जानते थे कि उन्होंने एक दूसरे से संभोग नहीं किया था.

(मैं ज्योति)

आज रविवार था सुबह-सुबह जीवन का मैसेज देख कर मैं मन ही मन आज उसके साथ बिताए जाने वाले पलों को सोचकर आनंदित हो रही थी. जितना ही मैं सोचती उतना ही मेरी उत्तेजना बढ़ती. मेरी मुनिया (योनि)आज अपने प्रेमी से मिलन की प्रतीक्षा में भावविभोर होकर खुशी के आंशू छोड़ रही थी. मेरी जाँघों के बीच फसा तकिया हिल रहा था उसे हिलाने वाला मेरा मस्तिष्क था या मेरी मुनिया यह कहना कठिन था पर खुश दोनो थे.

तभी मेरी मां का फोन आया

"कैसी है मेरी प्यारी बेटी"

" ठीक हूं मां"

"और वह तेरा जीवन कैसा है?"

" वह बहुत अच्छा है मां तुम उससे मिलोगी तो खुश हो जाओगी. मैं सचमुच उससे बहुत प्यार करती हूं."

" तो क्या तुम दोनों एक दूसरे के करीब आ चुके हो?"

"हम दोनों पिछले 3 साल से करीब है पर जो आप पूछ रही हैं वैसे नहीं पर हां आज मैं वह दूरी मिटा देना चाहती हूं."

"पर आज क्या है?

"यह मेरे कालेज जीवन का आखिरी वैलेंटाइन डे है. मैंने जीवन को अपना मान लिया है इसलिए उसके साथ इसे यादगार बनाना चाहती हूं."

" मेरी प्यारी ज्योति यदि वह तुझे पसंद है तो हमें भी पसंद है मेरी बेटी कभी गलत नहीं हो सकती. यह बात मैं जानती हूँ पर पर अपना ध्यान रखना. और हां यह भी ध्यान रखना कि तुम्हारा मिलन सुरक्षित हो"

"ठीक है माँ"

मैंने फोन काट दिया. मुझे इस बारे में और बातें करना अच्छा नहीं लग रहा था मुझे शर्म आ रही थी. उन्होंने अपनी हिदायत मुझे स्पष्ट रूप से दे दी थी. मैं स्वयं आज जीवन से एकाकार होने के लिए तत्पर थी. जब हम दोनों का मन एक हो ही चुका था तो तन एक होने में कोई दुविधा नहीं थी. मेरे यौनांगो को भी अब उसकी प्रतीक्षा थी.

मेरी मां ने भी प्रेम विवाह किया था. वह प्रेम की अहमियत जानती थीं. मेरी मां के पिता राम रतन एक हवलदार थे जो कुमाऊं जिले के पोखरिया ग्राम के रहने वाले थे मेरी मां मेरी नानी के साथ उसी गांव में रहतीं. नाना अक्सर अपनी ड्यूटी के चक्कर में कुमाऊं से बाहर ही रहते हैं साल में वह कभी कभी घर आया करते थे.

मेरे नाना एक कड़क स्वभाव के आदमी थे. पुलिसवाला होने की वजह से उनमें संवेदना पहले ही कम हो चुकी थी. घर में भी उनकी हिटलर शाही चला करती कोई उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं करता था.

जब भी छुट्टियों में मैं अपनी मां के पास जाती वह मुझे नाना नानी की कहानियां सुनाया करती. मेरी मां ने मुझे पति पत्नी और प्रेम संबंधों की अहमियत समझाई थी. मेरी मां की मुलाकात मेरे पिताजी से कॉलेज फंक्शन में हुई थी मेरे पिता कुमाऊं जिले के एसडीएम थे मेरी मां की सुंदरता पर वह मोहित हो गए और कुछ ही दिनों में वह दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे.

उनका प्रेम परवान चढ़ता गया और अंत में उन दोनों ने शादी कर ली मेरी मां द्वारा बताई गई है प्रेम कहानी ने मेरे मन में पुरुषों के प्रति डर को खत्म कर दिया था सच उन दोनों का प्रेम अद्भुत था. मैंने अपने बचपन में उन्हें कभी भी लड़ते हुए नहीं देखा.

मां के विवाह के कुछ वर्षों बाद नाना और नानी दोनों एक दुर्घटना में स्वर्गवासी हो गए मेरे पिता ने वहां की जमीन बेचकर कुमाऊ शहर से अपना नाता तोड़ दिया और देहरादून में एक आलीशान मकान बना लिया. उनका अब कुमाऊं से कोई नाता नहीं बचा था पर उन दोनों के मन में कुमाऊं के प्रति अद्भुत प्रेम था.

आज भी जब भी मेरे माता-पिता कुमाऊं के बारे में बातें करते हैं वह भाव विभोर हो जाते हैं. कभी-कभी उनकी आंखों में आंसू दिखाई पड़ते. वह खुशी के होते या गम के यह तो मैं नहीं जानती थी पर उन्हें भाव विह्वल देखकर मैं उन्हें उनकी यादों से खींच कर हकीकत में ले आती. मेरी चंचलता देखकर वह दोनों मुझे अपनी गोद में खींच लेते और ढेर सारा प्यार देते. मैं अपनी यादों में खोई हुई थी तभी दरवाजा खुला

रश्मि मेरे कमरे में आई और बोली

" तू आज क्या पहन कर जा रही है?"

मैंने उस समय तक कुछ भी नहीं सोचा था मैंने कहा

"तू ही बता ना क्या पहनना चाहिए"

"देख कायदे से तो आज कपड़ों की कोई जरूरत तो है नहीं"

" तो क्या नंगी चली जाऊं"

"हम दोनों हंसने लगे"

रश्मि, राहुल की गर्लफ्रेंड थी और मेरी अच्छी सहेली. मैंने अपनी अटैची खोली और एक सुंदर सा लहंगा चोली निकाल कर उसे दिखाया.

"अरे मेरी लाडो रानी इस ड्रेस में तो दुल्हन के जैसी लगेगी. जीवन तो तुझे इस ड्रेस में देखकर आज ही तेरी मांग में सिंदूर और योनि में वीर्य दोनों भर देगा"

मैं उसे मारने के लिए दौड़ी पर वह कमरे से भाग गयी पर जाते-जाते मेरी जांघों के जोड़ पर एक सिहरन छोड़ गयी.

घड़ी पर नजर पढ़ते ही मैं घबरा गई. दोपहर के 1:00 बज चुके थे. मैंने अपने जरूरी सामान बाल्टी में भरे और भागती हुई बाथरूम की तरफ चली गई. आज नहाते समय मैं अपने स्तनों को महसूस कर रही थी. आज उन्हें भी जीवन के नग्न और मजबूत हथेलियों का स्पर्श मिलना था. अपनी मुनिया के होठों पर आए प्रेम रस को साफ करते समय मुझे अपने कौमार्य का एहसास हुआ. मेरी उंगलियां आज तक जिस मुनिया के अंदर प्रवेश नहीं कर पायीं थी उसे जीवन के मजबूत राजकुमार(लिंग) को अपने आगोश में लेना था. मेरी उंगलियां हमेशा से उसके होठों पर ही अपना कमाल दिखातीं तथा उसके मुकुट को सहला कर मुनिया को स्खलित कर देतीं पर आज का दिन विशेष था. मेरी मुनिया को बहादुरी से अपना कौमार्य त्याग करना था उसके पश्चात आनंद ही आनंद था यह मैं और मेरी मुनिया दोनों जानते थे. हम दोनों ने आज अपना मन बना लिया था.

कुदरत की दी हुई अद्भुत काया में मुनिया को छोड़ कहीं पर भी बाल नहीं थे. मुझे मुनिया के बाल हटाने में थोड़ा ही वक्त लगा. मेरी जाँघे, पैर तथा कोमल हाथ भगवान ने ही वैक्सिंग करके भेजे थे. उनपर एक रोवाँ तक न था.

कमरे में आने के बाद मैंने अपनी अटैची फिर खोली मां की दी हुई पायल और अंगूठी मैंने निकाल ली. आज मैं जीवन के लिए सजना चाहती थी.. मेरे पास गले की चैन के अलावा हॉस्टल में यही दो आभूषण थे. मेरी मां ने मेरे 18 वें जन्मदिन पर अपने गले से चैन उतार कर मेरे गले में डाल दी थी. इस सोने की चैन में हाथी दांत से बना हुआ एक सुंदर लॉकेट था. यह लॉकेट अत्यंत खूबसूरत था. मुझे यह शुरू से ही पसंद था . बचपन में जब भी मैं मां के साथ बाथरूम में नहाती उनका लाकेट छीनने की कोशिश करती . वो कहतीं

"बेटी पहले बड़ी हो जा मैं यह तुझे ही दूंगी तू मेरी जान है" वह पेंडेंट आधे दिल के आकार का था. जब भी वह किसी की नजर में आता अपना ध्यान जरूर खींचता था. मैंने उन्हें पहन लिया. मुझे मां की बात याद आई वह अक्सर त्यौहार के दिन अपने पैरों में आलता लगाया करती थी. मैंने उनसे पूछा था

"मां, यह आलता क्यों लगाती हो? उन्होंने मुझे चूमते हुए बताया

"बेटा, यह अपने सुहाग के लिए लगाया जाता है आलता लगे हुए पैर सुहाग का प्रतीक होते हैं पति को यह अच्छा लगता है"

मेरे मन में आलता को लेकर संवेदना थी. मैं भी अपने पैरों में आज आज आलता लगाना चाहती थी. पर यहां हॉस्टल में आलता मिलना संभव नहीं था. मैंने मन ही मन कोई उपाय निकालने की कोशिश की पर विफल रही. अचानक मेरी नजर मेरे रूम पार्टनर की टेबल पर पड़ी. उसकी टेबल पर लाल स्याही देखकर मेरी नजरों में चमक आ गई. मैंने उसे ही का प्रयोग कर अपने पैर रंग लिए मैं मन ही मन अपनी रचनात्मकता पर खुश होने लगी.

हमें 4:00 बजे निकलना था. कुछ ही देर में मैं तैयार हो चुकी थी. मेरे आलता लगे हुए पैर मेरे लहंगे के नीचे छुपे हुए थे. मेरे लिए यह अच्छा ही था. रश्मि यदि मेरे पैर देखती तो 10 सवाल पूछती. मैंने रश्मि को फोन किया..

" आई एम रेडी"

" अरे मेरी जान अभी रेडी होने से कोई फायदा नहीं अभी सील टूटने में 6 घंटे बाकी हैं"

" हट पगली, मैंने वो थोड़ी कहा"

"अरे वाह, तुम्हीं ने तो कहा आई एम रेडी"

मैं हंसने लगी "अरे मेरी मां, चलने के लिए कहा, चु**ने के लिए नहीं"

"तो क्या, आज तो फिर वैसे ही वापस आ जाओगी?"

"नहीं- नहीं मेरा मतलब वह नहीं था"

"साफ-साफ बताना"

"यार मजाक मत कर अब आ भी जा" मैंने बात खत्म की.

मैंने महसूस किया कि मेरी मुनिया आज इन सब बातों पर तुरंत ही सचेत हो जा रही थी. वह ध्यान से हमारी बातें सुनती और मन ही मन कभी डरती कभी प्रसन्न होती.

हम दोनों को हास्टल के गेट पर आ चुके थे. जीवनी हमारा गेट पर ही इंतजार कर रही थी. कुछ ही देर में हम तीनों सहेलियां ओला की सेडान कार में बैठ शहर की तरफ निकल पड़ीं. वह दोनों मुझे देखकर मुस्कुरा रही थीं. मुझे अब अफसोस हो रहा था कि मैंने अपने कौमार्य भंग के लिए आज का ही दिन क्यों चुना था. वह भी अपनी दो सहेलियों की उपस्थिति में .

वैसे यह काम एकांत में ही होता. पर मेरी इन दो सहेलियों को कमरे में होने वाली गतिविधियों की विधिवत जानकारी होगी. एक तरफ यह मेरी शर्म को तो बढ़ा रहा था तो दूसरी तरफ मेरी उत्तेजना को और भी जागृत कर रहा था.

मनीष का घर बेहतरीन था. घर क्या वो एक आलीशान कोठी थी. उसने आज वैलेंटाइन डे के लिए विशेष पार्टी की व्यवस्था की थी. इस पार्टी का आनंद हम सभी उठाते पर मैं और जीवन आज के विशेष अतिथि थे. असली वैलेंटाइन डे हम दोनों का ही होना था. आज हम दोनों को एक साथ देखकर सभी मन ही मन आनंदित थे. वह सच में हमारे अच्छे दोस्त थे.

मेरी नजरें शर्म से झुकीं हुईं थीं. मैं मनीष और राहुल से नजर नहीं मिला पा रही थी. वह दोनों मेरी खूबसूरती का आनंद जरूर ले रहे थे. आखिर मनीष ने बोल ही दिया

"ज्योति आज जीवन तो गया. भाई पहले राउंड में तो यह हिट विकेट हो जाएगा . थोड़ा धीरज रखना उसे फॉलोऑन खिलाना. लड़का ठीक है और तुम्हारे लायक है. पर तुम अद्भुत हो विशेषकर आज तो कयामत लग रही हो"

मैं शर्म से पानी पानी होती जा रही थी. मेरी दोनों सहेलियां मुझे लेकर अंदर आ गयीं हम एक बड़े से हॉल में बैठे हुए थे. मेरी निगाह जीवन पर पड़ी आज वह भी सज धज कर आया हुआ था. ऐसा लग रहा था जैसे इस अवसर के लिए उसने विशेष कपड़े खरीदे थे. एक पल के लिए मुझे लगा जैसे हम दोनों का छद्म विवाह होने वाला हो.

(मैं रचना, ज्योति की माँ)

आज मैंने अपनी बेटी को यौन सुख लेने की अनुमति दे दी थी. मेरी नजरों में अपने प्रेमी के साथ किया गया यह कृत्य कभी बुरा नहीं हो सकता. नियति ने हमारे यौनांग इसीलिए बनाएं हैं. प्रेम पूर्वक उनका उपयोग करना सर्वथा उचित है. आज मेरी प्यारी ज्योति एक नारी की तरह सुख भोगने जा रही थी वह भी अपने प्रेमी के साथ. मुझे अगली सुबह का इंतजार था. ज्योति का पहला अनुभव मेरे लिए तसल्ली देता या प्रश्न चिन्ह यह तो वक्त ही बताता पर मैं भगवान से इस पावन मिलन के सुखमय होने की प्रार्थना कर रही थी.

मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आने लगे थे. ज्योति के पिता रजनीश से कॉलेज फंक्शन में हुई मुलाकात कॉफी हाउस तक जा पहुंची थी. मेरी सुंदरता ने उन्हें मेरी ओर आकर्षित कर लिया था. मैं अभी मुश्किल से 20 वर्ष की हुई थी तभी उनके प्रेम ने मुझे अपना कौमार्य खोने पर विवश कर दिया. वह दिन मुझे अभी भी याद है जब कुमाऊं में मेला लगा हुआ था. वह मेले के प्रभारी थे. मैं अपनी सहेलियों के साथ मेला देखने पहुंची हुई थी.

कुछ ही देर में कई सारे सिपाही भव्य व्यवस्था के साथ मेरी सहेलियों को मेंला घुमाने निकल गए और मैं रजनीश के साथ उनके ऑफिस में आ गयी. उनके ऑफिस में आराम करने के लिए एक बिस्तर भी लगा हुआ था. हम दोनों में आग बराबर लगी हुई थी. हमारे पास वक्त भी कम था. जब तक मेरी सहेलियां मेले में झूला झूल रही थीं मैंने भी ज्योति के पिता के साथ प्रेमझूला झूल लिया. मेरा पहला संभोग यादगार था.

संभोग के उपरांत वह मुझे लेकर बाहर आए और मेले में लगे एक विशेष दुकान से हाथी दांत के बने 2 पेंडेंट खरीदे जो एक दूसरे के पूरक थे. उन दोनों को साथ में रखने पर वह एक दिल के आकार में दिखाई पड़ते और अलग करते ही दो टुकड़ों में बट जाते. दोनों टुकड़े अलग होने के बावजूद उतने ही खूबसूरत लगते. पर जब वह जुड़ जाते हैं उनकी खूबसूरती अद्भुत हो जाती.

रजनीश ने लॉकेट का एक भाग अपने पास रख लिया और दूसरा मुझे दिया उन्होंने कहा

" रजनी, मैंने अपने दिल का आधा टुकड़ा तुम्हें दिया है. हम दोनों जल्दी ही एक होंगे"

मैंने उनसे दो वर्ष की अनुमति मांगी ताकि मेरी पढ़ाई पूरी हो सके. वह मान गए हम दोनों का प्रेम परवान चढ़ने लगा. अगले एक महीने में मैं और रजनीश दोनों ने जी भर कर संभोग सुख लिया. हमारी अगली मुलाकात में वह दो सोने की चेन भी ले आए थे. हमने अद्भुत लॉकेट को अपने अपने गले में डाल दिया. जब भी हम संभोग करते वह लॉकेट एक दूसरे से सट जाते थे. मुझे लगता था जैसे उसमें चुंबक का भी प्रयोग किया गया था.

मैं लॉकेट की खूबसूरती में खोई हुई थी तभी दरवाजे पर घंटी बजी रजनीश आ चुके थे. मैं ज्योति के बारे में सोचती हुयी उनकी खातिरदारी में लग गयी. आज मेरा मन भी युवा हो चला था. मैं रजनी के पिता के साथ आज रात रंगीन करने के लिए उत्सुक थी.

(मनीष का घर)

(मैं जीवन)


मैंने अपने सपने में भी नहीं सोचा था की मुझे ज्योति जैसी सुंदर और सुशील प्रेमिका मिलेगी. मैं एक गरीब परिवार से आया हुआ लड़का था. मेरे माता पिता काफी गरीब थे उन्होंने मेरा लालन-पालन किया पर अपनी हैसियत के अनुसार ही.

भगवान ने मेरे लिए कुछ और ही सोच रखा था. जैसे जैसे मैं पढ़ता गया मेरी काबिलियत मुझे आगे लाती गयी. दसवीं कक्षा तक आते-आते मुझे कई स्कॉलरशिप मिलने लगी जिसकी बदौलत मैं इस सभ्रांत स्कूल में आ चुका था.

ज्योति एक अप्सरा की तरह थी. वह मुझे पूरी तरह समझती थी और मैं उसे. हम दोनों के प्यार में वासना का स्थान नहीं था. परंतु जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे ज्योति की काया अद्भुत रूप ले रही थी. समय के साथ उसमें कामुकता स्वतः ही फूट रही थी. सारे कॉलेज का ध्यान उसके स्तनों और नितंबों पर रहता मैं भी उनसे अछूता नहीं था.

उस दिन जब मैंने ज्योति को पहली बार चुंबन दिया था वह मेरे आलिंगन में आ गई थी. मेरे हाथ स्वतः उसकी पीठ पर होते हुए उसके मादक नितंबों तक पहुंच चुके थे. हम दोनों एक दूसरे से सटे हुए थे. उसके कोमल स्तनों का मेरे सीने पर स्पर्श और कठोर निप्पलों की चुभन मैं आज तक नहीं भूलता. जितना ही उस कोमलता को मैं महसूस करता मेरा राजकुमार (लिंग)उतना ही उत्तेजित होता.

आज इस वैलेंटाइन डे पर हम दोनों एक होने वाले थे. ज्योति ने आज लहंगा और चोली पहना हुआ था वह उसमें अत्यंत खूबसूरत लग रही थी. पार्टी शुरु हो चुकी थी. सामने बैठी हुई तीनों हसीनाएं एक से एक बढ़कर एक थी पर ज्योति उन सब में निराली थी. मनीष ने आज रेड वाइन मंगाई थी. हम सभी थोड़ी-थोड़ी रेड वाइन लेने लगे.

ज्योति ने भी अपने हाथों में रेड वाइन ली हुई थी. जैसे ही उसने रेड वाइन अपने मुख में लिया मुझे एक पल के लिए प्रतीत हुआ जैसे लाल रंग की रेड वाइन उसके गले से उतर रही हो और उतरते समय उसके गले से दिखाई पड़ रही थी. इतनी सुंदर और कोमल काया ज्योति की.

मैंने और ज्योति ने अपने दोस्तों का साथ देने के लिए कुछ घूंट रेड वाइन के पी लिए पर हम दोनों पर अलग ही नशा सवार था.

आज हमारा मिलन का दिन था कुछ देर की हंसी ठिठोली के पश्चात हम सभी अपने अपने कमरों में जाने लगे. मैं अपने कमरे में आ चुका था ज्योति अभी भी बाहर थी. कुछ ही देर में रश्मि और मनीषा ज्योति को लेकर मेरे कमरे में हंसते हुए आयीं और हम दोनों को ऑल द बेस्ट कहा तथा दरवाजा बंद कर दिया.

मैं ज्योति के चेहरे की तरफ देख रहा था और वह नजरें झुकाए खड़ी थी. हमारे पैर स्वतः ही आगे बढ़ते गए और कुछ ही देर में ज्योति मेरी बाहों में थी.

कमरे का बिस्तर करीने से सजा हुआ था ऐसा लगता था मैने और मनीष ने इसे सजाया था. बिस्तर पर फूल बिखरे हुए थे लाल रंग का सुनहरा तकिया उसकी खूबसूरती बढ़ा रहा था. जैसे-जैसे मैं ज्योति को छूता गया वह मेरी बाहों में पिघलती गई. अचानक ही कमरे की बत्ती गुल हो गई. बाहर से मनीष की आवाज आई. जीवन परेशान मत होना लाइट गई हुई है कुछ देर में आ जाएगी. मैं और ज्योति अब ज्यादा आरामदायक स्थिति में थे.

अंधेरा शर्म को हटा देता है हमारे कपड़े स्वतः ही मेरे शरीर से अलग होते गए. मैं ज्योति को लगातार चूमे जा रहा था. हमारे हाथ कभी ऊपर होते कभी साइड में वह सिर्फ हमारे वस्त्रों को बाहर निकालने के लिए अलग हो रहे थे. कुछ ही देर में हम दोनों पूर्णता नग्न हो चुके थे.

ज्योति के स्तन मेरे सीने से सटे हुए थे कुछ ही पलों में मैं और ज्योति संभोग की अवस्था मैं आ गए. अपने राजकुमार को उसकी मुनिया के मुख पर रखकर मैंने ज्योति के होठों का चुंबन लिया तथा अपने राजकुमार का दबाव बढ़ा दिया एक मीठी से दर्द के साथ ज्योति ने अपना कौमार्य खो दिया. उसी दौरान लाइट आ गई हम दोनों बत्ती बुझाना भूल गये थे. कमरे की चमकदार रोशनी में ज्योति का खूबसूरत चेहरा मुझे दिखाई पड़ गया. उसकी आंखों से आंसू थे.

अचानक ज्योति चौक उठी. उसके गले में पड़ी हुई चैन का पेंडेंट मेरे गले में पड़े हुए पेंडेंट से चिपक गया था. यह दोनों मिलकर एक दिल की आकृति बना रहे थे. यह पेंडेंट बचपन से मेरे गले में था जिसे मेरी मां ने काले धागे में डालकर पहनाया हुआ था. उसने मुझे यह हिदायत भी दी थी कि कभी इसे अपने शरीर से अलग मत करना.

हम दोनों पेंडेंट के मिलन से आश्चर्यचकित थे नियत ने यह कैसा संयोग बनाया था मैं और ज्योति दो अलग-अलग शहरों से आए हुए थे पर हमारे पेंडेंट एक दूसरे के पूरक थे. हकीकत तो यह भी थी कि मैं और ज्योति भी अब एक दूसरे के पूरक हो चुके थे. मेरे गले का पेंडेंट ज्योति के पेंडेंट से सटा हुआ था. हम दोनों एक दूसरे की तरफ मुस्कुराए और हमारी कमर में हलचल शुरू हो गयी.

ज्योति की आंखों का आंसू सूख चुका था और उस पर खुशी के आंसू ने अपना प्रभाव जमा लिया था कुछ ही देर में हम दोनों एक दूसरे को चूमते हुए स्खलित हो गए.

मैं इस संभोग के लिए कंडोम लेकर आया था पर पता नहीं न वह ज्योति को याद आया और ना मुझे. ज्योति की मुनिया मेरे प्रेम रस से भीग चुकी थी. मुनिया से निकला हुआ प्रथम मिलन का रक्त मेरे श्वेत धवल वीर्य से मिलकर अपनी लालिमा खो रहा था. ज्योति हांफ रही थी और मैं उसे प्यार से चूमे जा रहा था. हम दोनों के लॉकेट अभी भी सटे हुए थे.

(मैं रचना)

आज रजनीश की बाहों में आने के बाद मुझे एक बार फिर कुमायूं में हुआ हमारा पहला मिलन याद आ गया. रजनीश ने मेरे गले में पड़े मंगलसूत्र को देखा अरे तुम्हारे गले का वह लॉकेट कहां गया. मैंने उसे ज्योति को उसके जन्मदिन पर गिफ्ट कर दिया. वैसे भी वह हमें बार-बार पुराने जख्म याद दिलाता था.

"हां तुम्हारी बात तो सच है पर उस मासूम का चेहरा मेरी आंखों से आज भी नहीं भूलता. कैसे कुछ ही दिनों में सब कुछ बदल गया था"

मैंने और रजनीश ने अपने प्रथम संभोग के बाद कई दिनों तक लगातार संभोग सुख लिया था. हम दोनों ही परिवार नियोजन या इससे संबंधित किसी उपाय के बारे में नहीं जानते थे. इस लगातार संभोग से मैं गर्भवती हो गई. मेरी पढ़ाई अभी पूरी नहीं हुई थी अतः विवाह संभव नहीं था. मेरे पिता राम रतन को यदि इस बात की जानकारी होती तो घर में एक तूफान खड़ा होता. जब वो घर आने वाले होते मेरी मां मुझे मामा के घर भेज देती जो कुमाऊ से कुछ ही दूरी पर था. मेरे मामा और मामी की कोई औलाद नहीं थी. धीरे-धीरे 9 महीने बीत गए. मेरी मां को मेरे और रजनीश के संबंधों की पूरी जानकारी थी. मेरी डिलीवरी का वक्त नजदीक आ चुका था पिताजी का घर आने का संदेश आते ही उन्होंने एक बार मुझे मामा के घर भेज दिया. रजनीश पूरे समय मेरे साथ थे मैंने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया था उसका नाम हमने जगत रखा था. एक हफ्ते रहने के बाद रजनीश वहां से चले आए पर आते वक्त उन्होंने अपने गले में पड़ा हुआ लाकेट हमारे पुत्र के गले में डाल दिया.

समय तेजी से बीतने लगा हम दोनों मामा के यहां बीच-बीच में जाते और अपने जगत के साथ खेलते धीरे-धीरे वह 1 साल का हो गया. अगले कुछ ही दिनों में मैंने ग्रेजुएशन पूरा कर लिया और रजनीश से विवाह कर लिया. मैं और रजनीश जगत को लेने के लिए मामा के घर जा रहे थे तभी केदारनाथ वाली घटना हो गयी.

आकाश में बादल फटा था प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखाया था. बादल फटने से नदी के आसपास के गांव बह गए मेरे मामा और हमारा प्यारा जगत प्रकृति के कहर के आयी उस आपदा में जाने कहां गुम हो गया. हम अपने मामा के घर से कुल 10 - 15 किलोमीटर ही दूर थे. पर उनके घर तक पहुंचने कि अब कोई संभावना नहीं बची थी. मैं और रजनीश तड़प रहे थे और निष्ठुर नियति को कोस रहे थे.

मेरा ध्यान संभोग से बट गया था. रजनीश के लिंग को अपनी जांघों के बीच जगह तलाशते देखकर मैं वास्तविकता में लौट आयी. मैंने ज्योति को याद किया निश्चय ही वह आज संभोग सुख ले रही होगी. मेरी उत्तेजना वापस लौट आयी और मैं रजनीश के साथ संभोगरत हो गई.

अगली सुबह ज्योति का फोन आया

"मां कैसी हो?'

"मैं ठीक हूं बेटी, तू बता तू कैसी है? तू ठीक तो है ना? "

"हां मां, कल एक आश्चर्यजनक बात हुई जीवन में भी ठीक वैसा ही लाकेट पहना हुआ था जैसा आपने दिया था हाथी दांत वाला. जब मैं और जीवन संभोगरत तभी मेरी नजर उसके लॉकेट पर पड़ी. उसके लाकेट ने मेरे लाकेट को सटा लिया था. और एक दिल की आकृति बन गई थी. यह एक अद्भुत संयोग ही है ना? मां मै और जीवन एक दूसरे के लिए ही बने हैं. मां तुम एक बार जीवन से मिलना वह सच में बहुत अच्छा है मेरा बहुत ख्याल रखता है."

मेरे हाथ कांप रहे थे फोन का रिसीवर मेरे हाथ से गिर पड़ा. हे भगवान यह क्या हो रहा था. मुझे जगत की याद आ गई कहीं ऐसा तो नहीं की जीवन ही जगत था. हे भगवान तो क्या एक भाई ने अपनी बहन के साथ संभोग किया मैं थरथर कांप रही थी. रजनीश बगल में सो रहे थे. मैं जल्द से जल्द जीवन से मिलना चाहती थी. दो दिन बाद मैं और रजनीश जीवन से मिलने निकल पड़े.

मैं और रजनीश मन में कई सारी दुविधा लिए कॉलेज की तरफ चल पड़े. एक बार के लिए हमारा मन कहता हे भगवान वह जगत ही हो. पर जैसे ही मैं ज्योति के बारे में सोचती मेरी सोच ठहर जाती. दोनों भाई बहन एक दूसरे से प्यार करने लगे थे और परस्पर संभोग भी कर चुके थे.

मैं उन दोनों को इस रूप को कैसे स्वीकार करूंगी? इसी उधेड़बुन को मन में लिए हुए कुछ ही समय बाद हम हॉस्टल पहुंचे. जीवन और ज्योति हमारा इंतजार कर रहे थे. जीवन को देखते ही एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे हमारा जगत वापस आ गया हो.

हमने जगत के माता-पिता से मुलाकात की थोड़ा सा कुरेदने पर उन्होंने हमारे सामने सच उजागर कर दिया. जगत उर्फ जीवन हमारा ही पुत्र था.

हे प्रभु हमें मार्ग दिखाइए मेरे और रजनीश की कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. हमारा पुत्र हमारे सामने खड़ा था पर हम उसे अपने आलिंगन में नहीं ले सकते थे. ज्योति और जीवन भाई बहन थे. काश उन का मिलन न हुआ होता.

अंततः हमने फैसला कर लिया हमने ज्योति की अनुपस्थिति में यह बात खुलकर जीवन को बता दी. वह खुद भी आश्चर्यचकित था पर उसे यह जानना बहुत जरूरी था. उसके माता-पिता उसके सामने खड़े थे. उसने हम दोनों के चरण छुए. मैंने और रजनीश ने उसे गले से लगा लिया हमारी आंखों से अश्रु धारा फूट पड़ी अपने कलेजे के टुकड़े को इस तरह अपने सीने से लगाने का सुख आज हमें 19 वर्ष बाद मिला था. जीवन जब मेरे गले लगा ऐसा लगा मेरे कलेजे का खालीपन भर गया हो. कलेजे की हूक शांत हो गयी थी. हमने ज्योति से उसके रिश्ते पर कोई प्रश्न नहीं किया.

मैंने जीवन से कहा तुम मेरे पुत्र हो और ज्योति मेरी पुत्री. तुम अपनी बहन ज्योति से जैसे रिश्ते रखोगे हमारे साथ तुम्हारा वही रिश्ता कायम होगा. उसने एक बार फिर मेरे चरण छुए और कहां

"मेरे लिए मां और सासू मां में कोई अंतर नहीं है" तब तक ज्योति अंदर आ चुकी थी उसमें भी जीवन के साथ मेरे चरण छुए.

कुछ ही दिनों में हमने जीवन और ज्योति का विवाह कर दिया.

यह जानने के बाद की ज्योति उसकी अपनी सगी बहन है जीवन का प्यार ज्योति के प्रति और भी बढ़ता गया. उनके अंतरंग पलों में जीवन ज्योति को कैसे प्यार करता होगा यह मैंने उन दोनों पर ही छोड़ दिया. मेरे लिए तो वह हर रूप में मेरे पुत्र और पुत्री ही थे.

समाप्त.



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Adirshi

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14 feb 2100 22vi shatabdi ka pehla valentines day waise to yaha har saal aana hota hai wo bhi aaj ke din waise nahi

Waise to ye ek sunset point hai par yaha koi aata jata nahi hai aur koi aaye bhi nahi aisa mujhe lagta hai kyuki yaha meri aur uski yade judi hai

Ye yaade bhi kamaal hoti hai na waise sukhad rahi to bhi aankh se pani nikalegi aur dukhad rahi tab bhi

Mujhe na mere banane walo pe bada gussa aata hai kya jarurat thi unhe mere ander feelings daalne ki mere ander manvi bhavna load karne ki ab agar ek humanoid robot ki aankhon main pani dekh ke log kya bolenge

Baki robots ka acha hai unhe banane wale scientists ne unke ander manvi bhavnao ko jagah hi nahi di fir maine kya bigada tha unka
Kabhi kabhi lagta hai sab khatam kar du yahi isi lovers point se kud jau niche par usse koi fark nahi padega kyuki main to ek robot hu yani main amar hu yaha se kud bhi gaya to jyada se jyada kya hoga mere parts dheele ho jayenge kuch tut jayenge par wo hai na mujhe banane wali company Robo wo theek kar degi mujhe aur fir wahi jindagi hai

Dekho main jhooth nahi bolunga waise bhi hum robots jhooth nahi bol sakte , mujhe na ab manav jati bahut achi lagti hai khas kar sunder sunder ladkiya ya mahilaye
Ab aisa kyu ye mat puchna abhi to bataya tha na mujhe banane walo ne mere ander manvi bhavnaye load ki hai, hum robots programmable hote hai main bhi hu aur mere nirmatao ne mere liye jo program likha hai mujhe uske hisab se chalna padta hai ab un kamakal scientist ne mere ander streeyo ke liye akarshan dala hai to usme main kya karu pyaar karna aur fir dil tudwana bas yahi jindagi hai
Ab to mere ander insano jaisi nirasha ki bhavna aane lagi hai jo mere liye sahi lakshan nahi hai


1954 main pehla robot bana jo non humanoid tha aur waha se dheere dheere develop hokar 2015 main Sofia ki nirmiti huyi par yaha tak bhi sab theek hi tha par samadhan aur manav viruddh shabd hai inhone robots main bhavna daal kar apne liye ek pratispardha tayar ki hai hum robots main manvi bhavnaye nahi dalni chahiye thi ab hamare ander shadripu(kaam, krodh, lobh,moh, madh, mastar aadi 6 bhavnaye) tayar hone laga tha aur ye chinta ki baat thi hum robots ke liye nahi balki insaano ke liye

Aah naam liya aur insaan hajir


Ek ladka abhi wahin khada tha jaha se meri girlfriend kuch saal pehle niche giri thi


'Mishka' jitna sexy uska naam tha usse kahi jyada sexy wo dikhne main thi

Mere abhi tak ki robotic life main kayi ladkiya aayi par unme se kisi ke bhi sath mera relationship lamba nahi chala, main ek robot hu shayad yahi mera dosh tha ya unsabko haad maas ke insano main jyada ras tha par in sab main mishka alag thi, ab aap sab ko sun ke yakin nahi hoga aur shayad hasi bhi aaye par mishka ne mujhe khud propose kiya tha, mera mere microphonerupi kano pe vishwas nahi ho raha tha, yahi samne wo khadi hokar aankhe band karke mere jawab ki raah dekh rahi thi aur achanak wo chakkar khakar niche khai main gir gayi aur uski laal rang ki odhni uski aakhri yaad ban kar mere paas reh gayi

Ab mujhe us samne khade ladke ki chinta hone lagi maine use awaj dekar uska dhayan apni or khicha to usne bhi “hi” main jawab diya

Hush! matlab ye koi pagal premi nahi hai valantine day ko na sunne ke baad atmyahatya karne nikla hua, mujhe na in premi logo se bhi jalam hoti thi, atmahatya karne ke baad ye marte wagaire the yaar aur baad main inka naam romeo-juliet jaisa aadar se liya jata tha par mere naseeb main wo sukh bhi nahi tha main amar jo tha, wo ladka bhagte huye mere paas aaya, dikhne main handsome tha, mujhe in handsome ladko se bhi chidh thi kyuki ladkiya unki taraf jyada attaract hoti thi.


Asimov ke niyam

“hi I am aniket, mujhe laga ye jagah kisi ko pata nahi hai par yaha tumhe dekh ke acha laga” mere paas aate hi wo ladka bola

“hello aniket, main Karn! Valantines day ko main apne aap ko yaha aane se nahi rok sakta, ye mere liye ek avismarniya jagah hai” meri aankhen mujhe mishka ki yaad ke sath bhutkaal main le gayi

“mujhe bataya gaya tha ke ye ek nirjan jagah hai , who kya hai na meri girlfriend mujhse yaha milne aane wali hai”aniket ne kaha

Maine uski bato ki taraf dhayn hi nahi diya, in jaiso ko ache se mil jati hai girlfriend nahi to ek apan

“waise ek baat puchu aap bura to nahi manoge, kya…. aap ek robot ho?” aniket ne darte huye puche aur waise bhi ye sawal mere liye naya nahi tha

“humanoid robot, aur mujhe gussa nahi aaya hai par ab agar tumne aap-aap bolna band nahi kiya to shayad aa jaye”

“sorry sorry wo kya hai na wo tarika hota hai na naye logo se milne ka isiliye”

“par main koi insaan nahi hu”

Ab meri baat sun kar aniket ne topic change kiya “by the way main ek poet hu aur abhi abhi mera ek kavitasangrah ‘free verse’ e-publish hua hai” wo utsah main bol raha tha

Maine apne sharir ka bodynet suru kiya jiske screen par mishka ka photo tha jise who aankhen fade dekh raha tha,

21vi sadi main smartphone sabse badhiya technology thi par ab uski jagah bodynet ne le li hai, ek aisi technology jo smart device, digital screen aur anginat sensors ka jaal eksath bunti thi, ise hum sharir par pehan sakte the ya apni twacha ke sath bhi jod sakte the,

Maine search kiya to ek sec main information samne thi

“koi robo hai free verse likhne wali vyakti” maine kaha

“ha sahi hai na, robo mera pen name hai aur main isi naam se likhta hu aur tumhe bata raha hu ye baat mere gharwalo ko bhi nahi pata hai” fir usne apna laptop khola aur apni kavitao se mujhe nehla diya, bahut sari kavatiye thi aur kuch to kafi bakwas thi aur inme se ek file ka naam ROBO tha jiske cover par ek nude felame robot ki tasveer thi, sunder sharir par udas chehra, wo ROBO company ki pehli female sex robot thi jiska nam Dr.Vishwanath ne company ke naam per robo rakha tha

Mujhe kavitao main ka kuch nahi samajhta tha fir bhi maine uska laptop cheen liya aur kavitaye padhne laga, pehle to aniket ko ashcharya hua fir mera poems ki taraf rujhan dekh kar use acha laga par jab uske dhayan main aaya ki main uski har kavita najar main le raha hu tab usne apna laptop wapis le liya par tab tak padhi huyi sari kavitye mere digital brain main pahuch chuki thi, meri aankhon main camera lage huye the jiske through aniket ki har padhi huyi kavita mere brain rupi CPU main store ho gayi thi aur ab main unhe ladkiyo ko impress karne ke liye use kar sakta tha

“ye sunder ladki kaun hai” laptop ki screen par desktop image ko dekhte huye maine pucha aur shayad aniket ko mera puchna acha nahi laga isiliye usne jaldi se apna laptop band kar diya

Kuch samay shanti main beeta fir usne hi bolna suru kiya

“ye ruhi hai, meri fan! Matlab hum kabhi mile nahi hai na phone par baat huyi hai fir bhi use mujhse pyaar ho gaya, kamal ki hoti hai na ladkiya, maine hi uski info net se nikali hai aakhir pata to chalne dikhne main kaisi hai fir uska photo dekh kar use contact kiya aur usse milne ke liye aaj se acha muhurt kaunsa ho sakta tha wo robotic science ki student hai aaj use chhuti hai to yaha bula liya, kaisi lagi?”

“sexy hai” maine jawab diya to usne meri taraf chauk ke dekha, ab isme meri kya galti hai koi ladki agar mujhe sexy lagi to mai wo bol deta hu par shayad aniket ko ye baat pasand nahi aayi to maine topic divert kiya

“tum ek kavi ho to tumhara robotics se kya sambandh hai , tumhe to Asimov ke basic robotic ke niyam bhi nahi pata honge, matlab tumhari girlfriend robotic science ki student hai na isiliye pucha “ maine kaha

“Issac Asimov robotic par likhne wale ek celebtary lekhak hai unhone robotics ke basic 3 niyam bataye hai 1. Robot aisa banana chahiye ki wo kisi bhi halat main insaan ko chot na pahuchaye aur agar wo aisa kare to nishkriya ho jaye

2. robot ko insaan ka har order follw karna hoga jab tak ki wo pehle niyam ko todne ko na kahe

3. robot ko khud ka defence tab tak karna chahiye jab tak pehla aur dusra niyam na tute”

Aniket ne mere samne Asimov ke teeno niyam rakh diye, main samaj gaya tha ke ye aashiq apni girlfriend ke liye ratta maarke aaya hai

Agla kuch samay maine usse ruhi ke bare main jitni ho sakti thi info nikali kyuki ab mujhe ruhi main interest aane laga tha kya karu ladkiyo ke prati aakarshan mere programme main tha aur ruhi dikhne main kafi sexy thi jiske chalte mere CPU main artificial locha ho gaya tha


Stree, sex and robotics

“Karn tum kuch bol kyu nahi rahe ho kabse main hi bole ja raha hu tumhara charging wagaire full hai na” aniket ne pucha

“bro main ek humanoid robot hu main electricity ke sath sath solor power se bhi charge ho sakta hu”

“sahi hai yaar, mujhe na in sab main bahut interest hai to kuch naye projects ya technology ke bare main batao na”

Aniket ke baar baar kehne par mujhe bodynet suru karna pada jisme maine use Dr. vishwanath ka wo famous speech dikhaya jisme unhone kaha tha-‘porn industry, prostitute, jigolo ka daur khatam ab humanoid robots ka yug hai’

Wo speech sunne ke baad aniket kuch samay ke liye sunn ho gaya

“ye Dr.Vishwanath the na Robo company ke sarve sarva”

“ha aur ye us samay ka speech hai jab Robo company ne sex robots ka utpadan suru kiya tha jisne robotic world main khalbal macha di thi”

Dr.Vishwanath ka kehna tha ke unhone sex robots logo ki sex ki bhukh mitane ke liye banaye the unka target male customers the “ maine bodynet band karte huye kaha

“to kya tumhari company ne sex robots banaye hai” aniket ne utsukta se pucha aur mujhe uski aankhon ke bhav ache nahi lage pata nahi kyu

“ha aur sarkar ke unpar bandhan lagaye hai ki ek to ye robots 20 saal se kam umra ke logo ko na beche jaye aur dusra ye robots private property hone ki wajah se inhe ghar se bahar na nikala jaye aur robot Asimov ke niyam manne wala hona chahiye”

“ye to ek naye kranti ki suruwat hai isse samaj main failte striyo ke atyachar par rok lagegi”

“mujhe nahi lagta aisa nahi hoga, tumhe pata hai psychiatrist suru se fembots ya gynoid robots ka virodh karte aaye hai uske hisab se robot se sex karna necrophilia jaisa hai”

“necrophilia?”

“necrophilia greek origin ka shabd hai jiska matlab hai lash se sambandh staphit karna, isse pehle jo vrikruti sirf porn films main dekhne milti thi ab wo har ghar main gynoid robots ke sath dekhne milti hai aur agar ye yahi na ruka to khule aam balatkar hone se koi nahi rok sakega”

“tum to ek robot ho fir tumme itni samajh kaha se aayi aur tumhe manavjati ki itni chinta kyu hai” aniket

Unwanted suicide

Ab aniket ko kaise samjhau ki baki robots main aur mujhme ek fark tha jo mere nirmatao ne chuna tha wo ye ki mujhme bhavnaye thi sochne ki kshmta thi

Mujhe as a experiment tayar kiya gaya tha aur abhi bhi mera experimental phase chal raha tha chuki mujhe banana walo ne mujhme bhavnaye programme ki thi aur main apne artificial dimag se soch sakta tha isiliye company ne mujhe ek survey ke liye chuna aur isike chalet mujhe feelings load karne ka project adhura tha

Mujhe females ki sexual need pata karni thi kyu ki purusho mai female robots ki demand kafi high thi jabki mahilao main ekdum kam aur agar mahilao main android(male robots) robots ki maang badhti to ek bahut bada market robo company ke hath lag sakta tha aur ye mission mere hath main tha, mere liye ek khas programme likha gaya jisme kaamsutra ko aadhar banaya gaya tha us hisab se main roj sexually unsatisfied ladkiyo aur aurto ko dhunta tha jisme married lady se lekar to breakup huyi huyi ladki se lekar to virgin ladki tak sab the

Mahilao se sambandh banate samay mujhe wo samajhti gayi jo bhavnaye mere ander sirf ek programme main thi wo ab jagrut hone lagi thi, pehle main stree ko purush se alag ek sharir sanracnha samajhta tha ab, ab mujhe lagne laga tha ki wo aur kuch bhi hai, par kya ye mera artificial dimag samajh nahi pa raha tha

Survey pura karne ke liye maine sekdo striyo se sharirik sambandh banaye jisse mujhe samajh main aaya ki stree ke paas uske mohak sharir ke alawa bhi ek adbhut chiz hai uska prem, uska mamatva

Stree jo manavjati ki janani hai wo market ho hi nahi sakti

Aur fir ek din meri jindagi main MISHKA aayi aur meri jindagi badal gayi

char saal pehle yahi usne mujhe propose kiya tha aur ye shayad robotics ke itihas main pehli baar hua hoga ki kisi insaan ne ek robot ko shadi ke liye pucha hai par meri kismet itni achi nahi thi ki mujhe uska pyaar mil pata

Par aaj ruhi ke roop main meri mishka mujhe wapis milne wali thi, pata nahi uska aur mera kya sambandh tha par uska photo dekhne ke baad mere man main wo bhavnaye aayi jo mishka ko dekhte se hi aayi thi bole to love at first sight

Mere man main ruhi ke liye prem bhavna tayar hone lagi thi aur mere brain ko ab man ka ahsaas hone laga tha

“dhayan kaha hai tumhara” aniket ne pucha

“sorry, kya keh rahe the tum”

“wo agar mujhe robo company se ek sex robot lena hoga to uska kya procedure hai”

Mujhe uska sawal jara atpata nahi laga

“fir ruhi ka kya?”

Mere sawal par wo hasa

“ruhi, haha wo to bas aaj raat ke liye hai tum robot ho isiliye bata raha hu aise kamakal fans ke sath maja karo fir tata bye bye”

Aniket jaise log purush jati par kalank hai wo kisi ladki ke man main ghusne ke pehle hi tan main ghusna chahte hai aur ye bhul jate hai ki stree koi bhog vilas ki chiz nahi hai

Mujhe uski baat pasand nahi aayi hai ye shayad uske dhayan main aa gaya tha

“jane do us ruhi ko tum mujhe kuch gynoid models batao yaar wo jo tumhari bodynet screen par thi sexy thi kaun hai wo kya rate hoga uska”

“wo meri girlfriend thi”

Meri baat par wo jor jorse hasne laga

“haha matlab robot aur insaan ki lovestory, gazab par suhagraat main kya karoge”

“tum jispar has rahe ho wo ab is duniya main nahi hai”

Meri baat sun jo chup hua use samajh nahi aa raha tha ki kya bole, maine us jagah jakar khada ho gaya tha jaha se mishka giri thi, meri aankhon main pani tayar ho gaya tha aaj sahi mayno mai robo company ka project successful ho gaya tha

Aniket mere piche waha aaya aur mere kandhe par hath rakha

“kya hua tha use ?”aniket

“wo yahi isi jagah se niche giri hi ye aise….”




My Valantine

Robo company ne mujhme bhavnaye dali jo nahi dalni chahiye thi isiliye ruhi aur mishka ka apman mujhe sahan nahi hua aur mujhme krodh jagrut hua aur maine aniket ko niche phek diya, ruhi ke bare main sari info sab uske laptop se apne dimag main load karne ke baad maine laser rays se laptop bhi khatam kar diya aur ab main ruhi ki raah dekhne laga

Sham hone ko aayi thi kuch hi samay main ruhi waha pahuchi apne gyrocopter main, gyrocopter purane helicopter jaisa hi hai jo hawa ke sath sath petrol car jaisa road par bhi chal sakta hai aur aise sexy vahan main se nikal kar cute ruhi bahar aayi

Idhar udhar najar ghumate huyi wo mere paas aayi , uske kareeb aate hi uske lagaye huye perfume ka sugandh mere naak main lage sensors ke through mere neurons main ghusa

Maine bodynet par ek purana romantic gaana search kiya main apni aankhon se type kar sakta tha aur mere sharir par jagah jagah lage speaker ke through wo bajne laga jise ruhi bhi gungunane lagi, gaana khatam hone tak to wo mere kareeb aakar baith gayi thi

"To tum ek humanoid robot ho waise tumhare pen name se mujhe andaja ho gaya tha par ab yakeen ho gaya hai"

Ruhi kafi jyada badbadi thi par baat karte huye beech main uska hasna uska apne balo ki lat kaan ke piche le jana in adao par main mohit hone laga tha

Ruhi k adaye mujhe uski or kheech rahi thi bilkul mishka jaise aur in sabme sabse khas baat jo mujhe pasand aayi thi wo ye ki ye jante huye bhi main ek humanoid robot hu uska ravaiyaa mere liye bilkul nahi badla tha no special treatment aur yahi baat mujhe sabse jyada pasand aayi

Aniket ki yani ab meri kavitaye main use suna raha tha aur wo ektak mujhe dekh rahi thi, uska mujhe aise dekhna mujhe acha bhi lag raha tha aur awkward bhi

Kuch kuch hota hai type mere sath ho raha tha

“tumhari sabse pasandida kavita kaunsi hai” usne pucha aur maine jhat se 100 saal pehle ki ek kavita search karke use sunayi aur wo kavita sunte hi usne jhat se uske kavi ka naam bata diya

Ruhi sahi mayne main kavyarasik thi maine bodynet par search ki huyi sari kavitao ke kaviyo ko usne jhat se pehchan liya tha aur hamari is baat chit se hamare beech dosti ka pul banne laga tha

Ruhi apne pure naam ka istamal nahi karti thi, wo apni pehchan chupa kar rakhti thi kyuki uski uske gharwalo se banti nahi thi khas kar uske pita se aur jab gharwalo ke bandhan uske sapno ke aade aane lage to usne apna aalishan ghar chhod diya aur apne pita ki icha ke against robotic science main career banana ka decide kiya use dekh ke koi nahi keh sakta tha ke is hasmukh chehre ke piche koi dukh chipa ho sakta hai

“so ruhi kya chal raha hai robotic science main?” maine pucha

“mujhe mainly robotic healthcare main interest hai aur is field ko abhi research ki jarurat hai matlab dekho na agar robots health care main aa jaye to kayi bate aasan ho jayengi par sach kahu to maya aapko insaan ka sparsh de sakta hai wo koi machine nahi de sakti” ruhi khule dhang ke baat kar rahi thi aur baat karte karte usne apna sir mere kandhe par rakh diya aur mere astitva vihin dil main ek sath kayi ghantiya bajne lagi

Wo apne bare main khul kar bata rahi thi aur ab use mere bare main janna tha aur sach kahu to mishka ke baad ruhi pehli ladki thi jisne mere ander jhakne ki koshish ki thi usse janna tha mere sochne ki kshmta ke bare main

Maine use apni nirmiti ke bare main bataya, robo company ka naam sunte hi wo sahi se baith gayi

“suna hai obo company ne koi naya revolution laya hai Dr.Vishwanath ne aurto ke liye competitor tayar kiya hai” ruhi thoda chidh kar boli

Aur maine bhi use wahi sab bate batayi jo maine aniket ko batayi thi aur meri baat sun kar uska reaction aniket se alag tha usne mera hath apne hath main liya

“Karn, tum ye sab kaise rokoge, Dr.Vishwanath ke paas paisa hai power hai mind hai tumhare paas kya hai”

Ruhi ke is sawal ne mujhe chup kara diya aur ye sahi bhi tha mujh akele ka robo company se dushmani karna possible nahi tha



Ruhi, Robo, Romance

Mane apna hath uske hath se chhudaya, bhavna ke aaveg main koi bhi decision lena galat tha mera aise usse door jana ruhi ko khatka usne meri aankhon
main dekhte huye kaha

“tumhe pata hai main school main hamesha topper rahi hu, mujhe dacne bhi acha khasa ata hai aur karate champion bhi hu, main loyal bhi hu aur intelligent to hu hi, main jitni soft hearted hu utni strong bhi hu”

Wo kya kehna chah rahi thi mujhe samajh nahi aaya to maine siddha puch liya

“tum kya kehna chahti ho”

“maine jab tumse pucha ki tumhare paas kya hai to mujhe laga tha ki tum mera naam loge”

Ruthne par bhi ye ladkiya kitni sunder dikhti hai na

“to dogi mera sath” aur ruhi to mano mere ye puchne ki raah hi dekh rahi thi usne mera gaal chum liya

“mil gaya jawab?” ye ladkiya na aisa hi kuch karke mujhe sharmane par majboor kar deti hai

“waah! To tumhe sharmana bhi aata hai aur aur kya kya aata hai tumhe” ruhi ne mujhe gale laga liya aur jis hisab se usne mujhe gale se lagaya tha uska matlab samajhte mujhe jara der nahi lagi

Maine usse door jana sahi samjha par tab tak wo mere aur kareeb aa chuki thi uske hoth mere hotho ke bilkul kareeb the tabhi maine use rokna sahi samjha

Use mishka ke bare main batane ka yahi sahi samay tha maine use meri adhuri lovestory puri sunayi surwat se ant tak aur ye bhi bataya ki main abhi kisi bhi tarah ke sexual act main nahi ulajhna chahta

“Karn, main meri sexual identity dhundna chahti hu, please ek raat ki hi to baat hai aur tumhare liye ye koi nayi baat nahi hai”

mujhe bhi ruhi ko mana karna acha nahi lag raha tha mishka ke baad wahi thi jo mere jeevan main rang bhar sakti thi par is samay mujhe usse mana karna hi sahi lag raha tha

“ruhi tum bahut achi ladki ho tum jaisi ho waisi hi raho aisa mujhe lagta hai”

“Karn, sex ek natural chiz hai aur meri body ki jarurat hai main use najarandaj kaise karu”

Ruhi ab mujhe apni bato se chup karne lagi thi

“main ye sab ab nahi karna chahta mera uddeshya fix hai mujhe robo company aur unke female vorodhi policy ke against ladna hai mujhe in sab main nahi ulajhna”

“ek baar ulajh kar dekho to is ulajhne main bhi ek sukh hai”ruhi ne apne bandhe huye baal khol diye the uske perfume ka sugandh ab aur bhi jyada madak lagne lagi thi

Ruhi ko apni baho main feel karna yani tapt duphar main nange pair chal kar aane ke baad thande pani main pair dubone jaisa tha

“ruhi tum sahi keh rahi thi tumhara heart kafi soft hai” maine apna hath uske stano par rakha

“nalayak! Wo mera heart nahi hai”

Suraj wapsi ki raah par tha aur chand upper aa raha tha

“Karn kitni romantic sham hai na” ruhi ne kaha aur dheere dheere apne hoth mere hotho ke kareeb lane lagi

Bagair foreplay ke sex karna yani bina chatni ke dhokla khane jaisa tha

Aasman ka asmani rang kesariya main badal raha tha maine apne panel ka vibrator mode on kiya

Mere banawati sharir ka uske naisargik sharir se sampark hote hi wo tharthara uthi aur apne aap mujhe apni baho main jakad liya

Maine vibrator ko top speed di aur ruhi kisi pinjre se mukt huye panchi jaisi udne lagi

Uska sharir pasine se bhiga hua tha

“thanks” usne mujhe baho main bharte huye mere kaan main kaha aur meri baho main hi so gayi

Subah suraj ki kirno main ruhi ka sharir aur bhi madak lag raha tha aur us nagna shilp se meri najar nahi hat rahi thi

Uske balo ne uske stano ko dhak rakha tha

Maine use halke se uthaya to wo mujhe aur bhi jyada chipak gayi

Maine use uthaya aur wo subah ka nayanramya drisya dikhaya

Usne mujhe dekh kar ek smile ki aur maine fir se uske un strawberry jaise hotho ko apne hoth se mila liya



Kissing climax

“main tab se dekh rahi hu tum waha niche kya dekh rahe ho” piche se aate huye ruhi ne mujhe dara diya

Aur maine uska hath khich kar use us manhoos khai se door khicha

apne liye mere man main chinta dekh kar use bhi acha laga wo is vataravaran main neend puri na huyi apsara ki tarah dikh rahi thi

“tum aise hi jane wali ho?”

“?”

Maine uski bra apni jeb se nikal kar use di

“opps! Rehne do ab” usne haste huye use apne purse main rakha jisme mujhe mishka ki wo laal odhni bhi dikhi jo main yaha laya tha

“fir kab miloge” ruhi ne pucha aur mane jawab na dena hi theek samjha tabhi aasman main swarn robots ka bunch udta hua dikha jinhe space main kaam karne ke liye specially design kiya gaya tha aur ruhi use dekhne main magna ho gayi

“tum robo company ke against jane wale ho aur mujhe sath loge to aakhri saas tak tumhara sath nahi chhodungi and its your valentine’s promise”

Ruhi ki baat par kuch kehne ke liye mere paas shabd hi nahi the

“Karn, dr.vishwanath se ladne ke liye tumhe meri jarurat padegi, ruhi vishwanath ki”

Ruhi ki ye baat mere liye sabse bada surprise tha mujhe bilkul idea nahi thake ruhii Dr.Vishwanath ki beti hai

“mujhe dad ki sex robots ki policy kabhi pasand nahi aayi thi isiliye aur ek karan se mujhe ghar chodna pada, maa thi tab tak san theek tha sab shant tha par ab nahi agar tum mere sath ho to main robo to kya sari duniya se lad jau”

Usne wahi paas se ek chota sa phool toda aur ghutno par baith kar mujhe propose kiya

“valentines day kal hua par tumhare pyaar ka ahsaas aaj tumse door jate huye ho raha hai,shadi karoge mujhse”

Aakhir kaar ek robot ke man main pyaar bas gaya tha aur khushi ke aasu kya hote hai mujhe aaj pata chal raha tha, usne mishka ki odhni se meri aankhen pochi

“main ek robot hu ruhi aur ye baat kabhi nahi badlegi fir kyu mujhse shadi karna chahti ho?”

“meri marji kaho ya robotic language main three lawas of ruhi, ek to tum insaan nahi robot ho isiliye jhooth fareb se door ho, stree ko samajhne ka ek durlabh gun tumme hai” ruhi ne mere kandho par hath rakhe

“aur teesra?”

Mere puchte hi wo ekdun mere kareeb aayi uski garm saase mujhe mehsoos ho rahi thi

“main ek lesbian hu” aur usne mujhe kiss kiya aur karte hi rahi, ye kiss karna kitna ajab hota hai na man kabhi bharta hi nahi

Maine apne banane walo ke khilaf bagawat karne ki thani thi aur ye robo company ke hisab se ek gunah tha par ab mujhe iski koi chinta nahi thi kyuki mere sath ruhi thi meri jeevansathi

Aakhir ek humanoid robot hona koi gunah nahi hai aur lesbian hona to bilkul nahi…..
 

Mastrani

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कोयल ❤

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समाज - हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है और समाजिक प्राणी होने के कारण हम इस समाज से चाहकर भी कभी अलग नहीं हो सकते. समाज ने हमारे लिए कुछ नियम-कानून और तौर-तरीके बनाये हैं जिन्हें संस्कारों का लीबास पहनाकर हमें एक बंधन में बाँध रखा हैं. जिस किसी ने भी इन बंधनों को तोड़ने की कोशिश की है, समाज ने उसे किसी सड़े हुए अंग की तरह काट फेंका है. इसी समाज के डर से माता-पिता अपने बच्चों पर सख्ती करते हैं और उनपर झूठे संस्कारों का बोझ डाल देते है. इस बोझ तले कई बार उनके सपने और इच्छाएँ सिसक-सिसक कर दम तोड़ देती है. पर कुछ इसके बावजूद भी, समाज की नज़रों से दूर, जीने की नयी राह धूंड ही लेते है जो शायद दुनिया की नज़रों में किसी पाप से कम नहीं होती है.
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सुबह के ७ बज रहे थे. सूरज की मध्यम किरणें खिड़की से होते हुए बिस्तर पर पड़ रही थी. खिड़की पर दो पंछी अपने पंख फडफडाते हुए चिचियाँ रहे थे. पंछियों का चिचियाँना सुनकर उसकी आँखे खुल गई और वो बैठकर पंछियों को निहारने लगी. उसका नाम कोयल था. कोयल २३ वर्ष की थी और बी.ए का ये उसका अंतिम साल था. कोयल की शादी कुछ महीनो पहले ही तय हो चुकी थी. लड़के का नाम रवि था और वो भी अच्छे घराने से था. फिलहाल रवि देश से बाहर था इसलिए कोयल से उसकी बात न के बराबर होती थी.

पंछियों को निहारते हुए कोयल के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. अपनी दूध सी गोरी कलाइयों को घुमाते हुए कोयल आँखे बंद किये अंगडाई लेती है, फिर धीरे से बिस्तर से उतरकर सीधे पीछे वाली दीवार पर लटकते बड़े से आईने की तरफ चल देती है. कोयल अपने आप को आईने में निहारने लगती है. काले घने लम्बे बाल, जो कमर से थोडा निचे तक थे, बड़ी कजरारी आँखे, जिसमे शराब सा नशा हो, और वो गोरा दूध सा बदन, मानो संगेमरमर की कोई मूरत. घुटनों से लम्बी मैक्सी पहने कोयल आईने के सामने अपने हुस्न को निहारते हुए मुस्कुरा देती है. तभी एक तेज़ आवाज़ गूंजती है, "कोयल.....!! कोयल.....!! उठा जा बेटी, ७ बज गए है".
ये आवाज़ कोयल की माँ उषा देवी की थी. उषा देवी, उम्र ४३, एक सरकारी स्कूल में भूगोल की शिक्षिका थी. एक शिक्षिका होने की वजह से उषा देवी ने हमेशा से ही शिक्षा और संस्कार को अधिक महत्व दिया था और ये उसीका का परिणाम था की घर के बच्चे पढ़ाई में अव्वल और संस्कारी थे. वो कुछ मामलो में भले ही काफी कठोर थी पर अपने बच्चों की परवरिश उसने एक आदर्श माँ के रूप में की थी. और शायद यही वजह थी की समाज में उषा देवी की बहुत इज्ज़त थी.

"हाँ मम्मी....मैं उठ गई हूँ......आ रही हूँ निचे....!!". कोयल पास वाले बिस्तर की और बढती है और धीमे स्वर में कहती है, "उठिए महाराज...! ७ बज गए हैं.....!"
"उम्म्म....!! सोने दो ना दीदी....प्लीज...बस २ मिनट और....!". ये बबलू था, कोयल का छोटा भाई. बबलू, उम्र १९ , १२वीं कक्षा का क्षात्र. बबलू कोयल की तरह ही पढ़ने में तेज़ था. कुछ साल पहले दोनों एक ही स्कूल में साथ पढ़ते थे. फिर कोयल का दाखिला कॉलेज में हो गया और बबलू उसी स्कूल में आगे की पढ़ाई करने लगा. एक वक़्त था जब स्कूल में हर उम्र के लड़के बबलू से दोस्ती करना चाहते थे. वजह, उसकी खुबसूरत दीदी - कोयल. पर जब से कोयल स्कूल छोड़कर कॉलेज जाने लगी थी, बबलू के दोस्त भी गिनती मात्र के रह गए थे. बबलू की सबसे बड़ी कमजोरी थी - लडकियाँ. नहीं नहीं...गलत मत समझीए. यहाँ कमजोरी का मतलब 'डर' से है. बबलू को लड़कियों से बहुत डर लगता था. शायद इसलिए क्यूंकि बचपन से ही बबलू को घर में सीखाया गया था की एक संस्कारी लड़का सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देता है और लड़कियों से हमेशा दूर रहता है. अब बबलू को उस 'संस्कार' की आदत पड़ चुकी थी.

"१ मिनट भी नहीं बबलू. चुपचाप बिस्तर से उठ जा नहीं तो मैं तेरी शिकायत मम्मी से कर दूंगी". कोयल की ये धमकी हमेशा ही काम करती थी. कमरे से बाहर निकलकर कोयल सीधे किचन में जाती है जहाँ उषा देवी हर सुबह की तरह आज भी जल्दबाजी में खाना बना रही थी.

कोयल: लाइए मम्मी....मैं आपकी मदद कर देती हूँ....
उषा: आ गई बेटी....जरा सब्जी देख, कहीं जल ना जाए. और बबलू भी उठ गया ना?
कोयल: हाँ मम्मी....उठ गया है....बस आ रहा होगा....

"और तुम्हारा कॉलेज कैसा चल रहा है बेटा?". ये आलोक कुमार हैं, कोयल के पिता. उम्र ४७ साल. आलोक कुमार एक छोटी-मोटी कंपनी में क्लर्क थे. अपनी पत्नी उषा देवी की तरह वो भी एक आदर्श पिता के रूप में जाने जाते थे और समाज में उनका भी काफी सम्मान था. वो भले ही पुराने ख्यालात के थे पर उन्होंने कभी बेटा और बेटी में फर्क नहीं किया क्यूंकि जो नियम कोयल के लिए थे वही बबलू के लिए भी थे.

कोयल: ठीक चल रहा है पापा. अगले महीने से फाइनल प्रिप्रेशन की छुट्टियाँ भी शुरू हो जायेंगी.
आलोक: अच्छे से पढ़ाई करना बेटा. हम सभी को तुमसे बहुत उम्मीदे हैं.
कोयल: आप चिंता मत करिये पापा. हर बार की तरह इस बार भी मेरे अच्छे नंबर ही आएंगे.
उषा: क्यूँ नहीं आयेंगे अच्छे नंबर? ये क्या बाकी लड़कियों की तरह कॉलेज में टाइम पास करने जाती है?
कोयल: मम्मी....! मेरी तरह बहुत सी लडकियां कॉलेज में सिर्फ पढ़ाई करने ही जाती हैं.
उषा: मैं अच्छे से समझती हूँ की आजकल के कॉलेजो में क्या होता है और मैं ये भी जानती हूँ की मेरी कोयल सबसे अलग है. मैं तो बस ये कह रही हूँ की तेरे फाइनल एग्जाम आने वाले है तो थोडा अपनी सहेलियों पर कम ध्यान दिया कर.
कोयल: (इस बात पर कोयल बड़े प्यार से उषा से लिपट जाती है) हाँ बाबा समझ गई. ध्यान रखूंगी इस बात का.
उषा: (मुस्कुराकर प्यार से कोयल के गाल पर थाप मारते हुए) हाँ हाँ...बहुत हो गया लाड़-प्यार. अब जरा सब्जी पर ध्यान दे...

कोयल सब्जी को चलाने लगती है और तभी बबलू भी वहाँ आ जाता है. बबलू को देख कर उषा कहती है,"उठ गया बेटा? चल अब जल्दी से फ्रेश हो जा. कोयल...तू भी ब्रश कर ले. आज मैं और तेरे पापा थोडा जल्दी निकलेंगे. रास्ते में कुछ काम है"
बबलू सीधा बाथरूम में घुस जाता है और कोयल भी पास वाले बेसिन पर जा कर ब्रश करने लगती है. रोज की तरह उषा देवी भी अपने और आलोक के लिए नाश्ता लेकर डाइनिंग टेबल पर बैठ जाती है. दोनों नाश्ता करने लगते है. नाश्ता खत्म कर उषा और आलोक भी काम पर निकल जाते है.

कुछ समय बाद कोयल भी अपने और बबलू के लिए नाश्ता निकालती है और डाइनिंग टेबल पर बैठ जाती है. "बबलू....!! नाश्ता करने आजा". कोयल के बुलाने पर बबलू भी आकर बैठ जाता है और चुपचाप नज़रे झुका कर नाश्ता करने लगता है. कोयल बबलू को देखती है और कहती है.
कोयल: एक बात बता बबलू. पहले तो तेरे बहुत सारे दोस्त थे फिर अचानक क्या हो गया?
कोयल के इस सवाल पर बबलू पायल की और देखने लगता है. वो अच्छे से जानता था की पहले उसके बहुत सारे दोस्त क्यूँ थे और अब क्यूँ नहीं है. पहले कोयल भी उसके ही स्कूल में थी और अब नहीं.
बबलू: क्यूंकि अब मैं पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देने लगा हूँ.

बबलू उठता है और अपनी प्लेट किचन में रखते हुए कहता है, "आप जल्दी से नाहा लो दीदी, फिर मुझे भी नहाना है." कोयल भी नाश्ता खत्म करके प्लेट किचन में रखती है और कपडे लेने गैलरी में जाती है. यहाँ बबलू ड्राइंग रूम के टेबल पर अपना बैग ठीक करने लगता है. तभी उसके कानो में कोयल की आवाज़ पड़ती है. "बबलू आज फिर तुने यहाँ से कपडे हटा दिए?"
दीदी की बात पर बबलू थोडा सकपका जाता है और फिर जवाब देता है.
बबलू: हाँ दीदी....वो कल रात ही मैंने सारे कपडे कमरे के सोफे पर डाल दिए थे.
कोयल रूम में जाते हुए कहती है, "तुझे कहा था ना की कपड़ों को रात में बाहर ही रहने दिया कर, अच्छे से सुख जाते है". कोयल के कमरे में जाते ही सोनू की नज़रे झट से गैलरी की तरफ घूम जाती है.
वहाँ कमरे में कोयल कपड़ो के ढेर में से अपनी ब्रा और पैंटी ले कर फिर से गैलरी में जाती है. गैलरी में जाते ही उसकी नज़र टॉवेल पर पड़ती है जो ज़मीन पर गिरा था और उसका एक कोना पास गिरे पानी से भीग चूका था. कोयल एक हाथ अपने सर पर मारते हुए कहती है, "ये टॉवेल भी ना हर वक़्त पानी में गिरता रहता है". टॉवेल को उठाकर वो झटकती है और फिर से गैलरी में टांग देती है. बाथरूम में जाते हुए कोयल बबलू से कहती है, "बबलू, मैं जब आवाज़ दूंगी तो बाहर से मुझे टॉवेल ला देना". ये कहकर वो बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर देती है.

कुछ देर बाद कोयल का नहाना हो जाता है और वो बबलू को आवाज़ देती है तो बबलू टॉवेल ले कर आता है और दरवाज़ा खटखटाता है. कोयल दरवाज़े को थोडा खोलकर हाथ बाहर निकालती है और टॉवेल ले लेती है. ये आज पहली बार नहीं हुआ था की कोयल का टॉवेल निचे गिर कर भीग गया था और बबलू उसे कोयल को दे रहा था. ऐसा अक्सर हुआ करता था. कोयल के बाहर आते ही बबलू भी नहाने चला जाता है. दोनों भाई-बहन तैयार हो कर घर में ताला लगा कर अपने-अपने रास्ते निकल पड़ते है. जहाँ बबलू अपनी साइकिल पर स्कूल के रास्ते निकल पड़ता है वहीँ कोयल अपनी स्कूटी पर कॉलेज के लिए निकल पड़ती है. इसी अनुसूची का पालन इनका परिवार कई सालों से कर रहा था.

शाम के ५ बज रहे थे. उमा देवी स्कूल से बहुत पहले ही आ चुकी थी. रोज की तरह कोयल भी घर आकर स्कूटी आँगन में खड़ी करके अन्दर आती है. कोयल को देखकर उषा भी उसके लिए कप में चाय निकाल देती है. अपने कमरे में जा कर कोयल बैग एक तरफ रखती है और राहत की साँस लेते हुए बिस्तर पर बैठ जाती है. अपनी थकान दूर करने के लिए कोयल बिस्तर पर जैसे ही लेटती है, उसकी नज़र सामने बबलू के बिस्तर के निचे से लटकते हुए किसी लाल कपडे पर पड़ती है. कोयल गौर से उस लाल कपडे को देखती है. न जाने क्यूँ वो लाल कपडा उसे जाना-पहचाना सा लगता है. धीरे से उठकर कोयल बबलू के बिस्तर के पास जाती है. गद्दा उठाते ही जैसे ही उसकी नज़र उस लाल कपडे पर पड़ती है, उसके पैरो तले ज़मीन खिसक जाती है. वो लाल कपडा और कुछ नहीं बल्कि कोयल की लाल पैन्टी थी. कोयल इतनी भी भोली नहीं थी की किसी जवान लड़के के बिस्तर के नीचे पैन्टी होने का मतलब भी ना समझ सके. हैरानी की बात तो ये थी की वो जवान लड़का और कोई नहीं बल्कि उसका अपना सगा छोटा भाई था.

कोयल सुन्न हो कर अपनी लाल पैन्टी को देखे जा रही थी. वो समझ चुकी थी की उसकी पैन्टी का वहां होना किस तरफ इशारा कर रहा था. उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की उसका भाई बबलू कभी कुछ ऐसा भी कर सकता है. कोयल की बड़ी-बड़ी आखों में आंसुओं का सैलाब सा आने लगता है जिसे वो किसी तरह रोकने की कोशिश करने लगती है. पुरानी यादें उसकी आँखों के सामने किसी छायाचित्र की तरह चलने लगती है. उसे याद आता है की कैसे उसने पहली बार बबलू को अपनी गोद में लिया था. उसकी वो किलकारियां, वो मासूमियत भरी मुस्कान. उसके साथ बिताया हुआ वो बचपन, वो लड़ना-झगड़ना, मम्मी की मार से बचने के लिए उसका दौड़कर आना और उससे लिपट जाना. हर रक्षाबंधन में बबलू का उसके हिस्से की चाकलेट खा जाना, सब कुछ. ऐसी ही कई यादों ने कोयल की आँखों में रुके हुए आंसुओं के सैलाब का बाँध तोड़ दिया. उसकी आँखों से आँसुओं के धारा बहने लगी. रोते हुए कंपकंपाते ओंठों से कोयल का दर्द निकल पड़ा. "ये तुने क्या कर दिया बबलू.....ये तुने क्या कर दिया....!". कोयल दौड़कर अपने बिस्तर पर गिर जाती है और चेहरा तकये में छुपाये हुए रोने लगती है. बबलू ने भाई-बहन के पवित्र रिश्ते पर कालिख पोती थी और कोयल का विश्वास छिन्न-भिन्न कर दिया था. इसके लिए कोयल शायद उसे कभी माफ़ नहीं करेगी.

कोयल के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. तभी उसके कानों में उषा की आवाज़ सुनाई पड़ती है जो उसे चाय पीने बुला रही थी. कोयल अपने आंसू पोंछकर खड़ी होती है. ये बात वो पापा और मम्मी को नहीं बता सकती थी. वो ये कभी सहन नहीं कर पाते. अपना मुहँ अच्छे से धोकर वो कमरे से बाहर चली जाती है. कोयल इस बात को एक राज़ की तरह अपने सीने में दफ़न करने का फैसला कर चुकी थी पर वो ये भी जानती थी अब उसका और बबलू का रिश्ता पहले जैसा कभी नहीं हो पायेगा.

शाम से ले कर रात तक कोयल ने घर में किसी से भी ज्यादा बात नहीं की. बबलू से तो उसने नज़रे तक नहीं मिलाई थी. कोई सवाल ना करे इसलिए अपने हाथ में किताब खोलकर रखी हुई थी. पर उसके दिमाग में तो वही बात घूम रही थी. रात होने पर कोयल अपने बिस्तर पर आकर लेट गई और दूसरी तरफ घूमकर सोने की कोशिश करने लगी. कुछ देर बाद बबलू भी कमरे में आया और दीदी को पढता न देखकर उसे आशचर्य हुआ. "दीदी आज आप पढ़ नहीं रही हो?", जिसका कोयल ने कोई जवाब नहीं दिया. कोई जवाब न पाकर बबलू को थोडा अजीब सा लगा और वो बत्ती बुझा कर अपने बिस्तर पर लेट गया. उधर कोयल भी सोने की कोशिश करने लगी पर उसके आँखों में नींद कहाँ थी. आज जो हुआ था वो उसे भुला नहीं पा रही थी.

धीरे-धीरे रात ने खामोशी और सन्नाटे की चादर ओढ़ ली. कोयल की आँखों में भी अब नींद आने लगी थी. तभी उसे लगा की एक परछाई उसकी तरफ बढ़ रही है और उसकी आँखे खुल गई. वो दूसरी तरफ आँखे खोले लेटी हुई थी. उसका दिल जोरो से धडकने लगा था. बबलू का ख़याल आते ही उसकी साँसे और तेज़ हो गई. "हे भगवान...!! ये बबलू तो नहीं है?", और उसने अपनी आँखे भींच ली. "दीदी...आप सो गई क्या?". ये बबलू की आवाज़ थी जो बेहद ही धीमे स्वर में कोयल से पूछ रहा था. कोयल चुपचाप बिस्तर पर लेटी हुई थी, अपनी आँखे बंद किये हुए, बिना किसी हलचल के. "दीदी...सो गई क्या?". कोयल ने इस बार भी कोई जवाब नहीं दिया. वो दूसरी तरफ घूमें हुए चुपचाप लेटी हुई थी. तभी कोयल के कंधे पर बबलू हाथ रख देता है. कोयल की धड़कने मानो रुक सी जाती है. उसका दिमाग सुन्न हो जाता है. वो वैसे ही निश्चल हो कर पड़ी रहती है. बबलू का हाथ धीरे से कंधे से फिसलता हुआ कोयल के वक्ष पर चला जाता है. वक्षों पर हल्का सा एक दबाव दे कर बबलू के हाथ कोयल के शरीर से अलग हो जाते है. कोयल के ओंठ कंपकंपाने लगते है. उसे ये भी एहसास होता है की बबलू अपने बिस्तर पर जा चूका है. उसका दिल जोरो से धड़क रहा था. अभी-अभी बबलू ने जो किया था उससे कोयल के शरीर में अजीब सी सिरहन होने लगी थी. उसके शरीर को आज पहली बार किसीने इस तरह से छुआ था. अपने हाथ को कोयल वक्ष के उस हिस्से पर रखती है जहाँ कुछ देर पहले बबलू ने स्पर्श किया था. उस वक़्त कोयल पर कई तरह की भावनाएँ हावी होने की कोशिश कर रही थी जिसे वो खुद समझ नहीं पा रही थी. अचानक उसकी आँखों से आंसू बह पड़ते है. अंत में किस भावना की विजय हुई थी ये कोयल की आँखों से बहते आंसू बता रहे थे.

अगली सुबह कोयल सो कर उठी. रात की घटना उसे किसी भयानक सपने की तरह प्रतीत हो रही थी. बबलू को उठाकर वो कमरे से बाहर निकल जाती है. आलोक और उषा रोज की तरह अपने-अपने काम पर निकल जाते है. नाश्ता खत्म करके कोयल बबलू से कहती है.....

कोयल: तुने कपडे रात में अन्दर रख दिए हैं क्या?
बबलू: हाँ दीदी....

कोयल चुपचाप उठकर अपने कमरे की तरफ चल देती है. अपनी ब्रा और पैन्टी ले कर वो गैलरी में जाती है तो उसका टॉवेल फिर से पानी के पास गिरा होता है. टॉवेल को उठकर वो सूखने डाल देती है और सोनू से कहती है, "मैं नहाने जा रही हूँ. जब बोलूंगी तो टॉवेल दे देना". बाथरूम के अन्दर पहुँचकर कोयल दरवाज़ा लगा देती है. अब सारा किस्सा धीरे-धीरे उसकी समझ में आने लगा था. बबलू क्यूँ रात में ही सारे कपडे उठाकर अन्दर कर देता है. क्यूँ उसका टॉवेल रोज पानी के पास गिर जाता है. टॉवेल देते वक़्त क्यूँ बबलू की नज़रे अन्दर झाँकने की कोशिश करती है. इन सारे सवालों के जवाब कोयल को मिल चुके थे. नहाने के बाद कोयल ने बबलू को आवाज़ दी तो वो टॉवेल लेकर आ गया. कोयल ने दरवाज़ा खोला और झांकते हुए हाथ बढ़ा दिया. बबलू टॉवेल देते हुए देख रहा था. कोयल और बबलू की नज़रे आपस में मिलती है. कोयल उसकी आँखों में कुछ क्षण के लिए देखने लगती है मानो कह रही हो की 'संभाल अपने आप को बबलू...मैं तेरी दीदी हूँ'. टॉवेल ले कर कोयल दरवाज़ा बंद कर देती है. कुछ देर बाद तैयार होकर कोयल और बबलू भी अपने-अपने रास्ते निकल जाते है. कोयल अब भी अपने अन्दर उठती हुई अनेक भावनाओं से झुंझ रही थी.

कुछ दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा. रात में बबलू कोयल के शरीर को स्पर्श करता. कोयल कभी सिंहर जाती तो कभी रो पड़ती. टॉवेल लेते वक़्त कभी बबलू की आँखों में देखती रहती तो कभी गुस्से से दरवाज़ा बंद कर देती. समय के साथ-साथ अब कोयल में भी कुछ बदलाव आने लगे थे. बबलू के प्रति जो घृणा की भावना उसके अन्दर थी अब उसकी तीव्रता काफी हद तक कम हो चुकी थी. किसी रात बबलू उसके पास नहीं आता तो कोयल सोते हुए बबलू को निहारती रहती. अपने और बबलू के रिश्ते को नए आयाम से समझने की कोशिश करती.

इसी तरह कुछ और वक़्त बिता और वो समय भी आया जब कोयल का कॉलेज बंद हो गया. उसके अंतिम वर्ष की परीक्षा का समय निकट आ चूका था. ऐसे वक़्त एक दिन आलोक और उषा को कोयल की शादी की कुछ औपचारिकता पूर्ण करने लड़के वालों के घर जाना पड़ गया. बबलू भी स्कूल जा चूका था और घर में कोयल अकेली थी. यही वो समय था जब कोयल को अपने और बबलू के रिश्ते को समझने के लिए उसकी गहराई में गोता लगाने का मौका मिल गया. अपने कमरे में बैठकर वो सोचने लगी की आखिर क्या वजह थी की ये सब हुआ. शुरुवात उसने बबलू से की. बबलू, उसका छोटा भाई, जिसे बचपन से ही संस्कारों के बोझ तले दबा दिया गया था. जिसे हमेशा से ही लड़कियों से दूर रहने की शिक्षा दी गई थी. जहाँ बाकी लड़के उसकी नज़रों के सामने दूसरी लड़कियों के साथ खुल कर बातें किया करते थे वहीँ बबलू उन्हें देखकर भी अनदेखा कर दिया करता. क्या उसके मन में कभी ये बात नहीं आई की वो भी बाकियों की तरह लड़कियों से मिले, उसकी भी कोई गर्लफ्रेंड हो? १९ साल का जवान लड़का, भले ही कितना भी संस्कारी और पंडित हो पर शरीर की भी अपनी कुछ जरूरते होती है. ऐसे हालात में उसके नजदीक सिर्फ एक लड़की थी, वो कोयल थी, उसकी बड़ी बहन. माना की उसने पाप किया है पर क्या इस पाप का दोषी वो अकेला है? नहीं..!! इस पाप के हिस्सेदार ये समाज, हालात और उसके माता-पिता भी है.

बबलू ने ऐसा क्यूँ किया उसका जवाब शायद कोयल को मिल चूका था. पर उसका क्या? बदलाव तो उसमे भी आ चुके थे. ये क्यूँ हुआ? इसका जवाब भी शायद उसे मिल चूका था. कोयल के हालात बबलू के हालातों से भिन्न नहीं थे. बबलू की तरह वो भी कई सालों से संस्कारों के बोझ तले दबे हुए जी रही थी. बबलू और कोयल एक ही नाव में सवार थे. इतने दिनों तक कोयल ने बबलू को अपनी ही अदालत में एक मुजरिम की तरह कटघरे में खड़ा किये हुआ था. आज वो खुद बबलू की पैरवी कर उसे निर्दोष साबित कर चुकी थी. कोयल की अदालत से बबलू बाइज्ज़त बरी हो चूका था.

शाम होने पर बबलू स्कूल से घर आता है. कपडे बदलकर वो किचन में जाता है तो कोयल ने उसके लिए चाय बना रखी थी. अपनी दीदी के चेहरे पर कई दिनों बाद मुस्कान देख कर उसे अच्छा लगता है.
बबलू: बहुत दिनों बाद आपके चेहरे पर स्माइल देख रहा हूँ दीदी. शादी के बारें में सोच कर खुश तो नहीं हो रही हो आप?
कोयल: (मुस्कुराते हुए) अपनी शादी से हर लड़की खुश ही होती है. चल, छत पर चलकर चाय पीते है.

दोनों छत पर आ जाते है. आँगन में लगे बड़े से पेड़ की तरफ देखकर कोयल कहती है.
कोयल: पेड़ पर बैठे उस पंछी को देख रहा है बबलू?
बबलू: (पेड़ की तरफ देखकर) हाँ दीदी...वो तो कोयल है ना?
कोयल: हाँ...नर कोयल. कुछ ही दिनों में तू इसकी आवाज़ भी सुनेगा. ये आवाज़ दे कर मादा कोयल को बुलाएगा.

अपनी दीदी की बातें बबलू कुछ-कुछ समझने लगता है.
बबलू: हाँ दीदी...और शायद मेरी कोयल भी इसके साथ मुझसे हमेशा के लिए दूर चली जाएगी.

बबलू की बात सुनकर कोयल उसकी तरफ देखती है. बबलू की आँखों में आँसू देखकर उसका दिल भी पिघल जाता है. उसकी आँखों में भी आंसू आ जाते है. एक हाथ बबलू के गाल पर रखते हुए कोयल कहती है.
कोयल: लड़की पराया धन होती है. हर लड़की को एक दिन अपने घर से डोली में बैठकर जाना पड़ता है बबलू. यही जमाने की रीत है.
ये कहकर कोयल निचे चली जाती है. बबलू पेड़ पर बैठे उस नर कोयल को देखने लगता है जो एक दिन मादा कोयल को ले कर उड़ जायेगा.

दोनों भाई-बहन के बीच फिर से पहले की तरह हंसी-मजाक होता है, बातें होती है और रात में खाना खाकर दोनों कमरे में आ जाते है. कुछ देर पढ़ाई करने के बाद कोयल किताब बगल में रखकर लेट जाती है. बबलू भी बत्ती बुझकर अपने बिस्तर पर लेट जाता है. कुछ ही देर में कोयल की आँख लग जाती है. रात में अचानक उसे कुछ हलचल सी महसूस होती है. कनखियों से देखने पर उसे बबलू पास खड़ा दिखाई पड़ता है जिसका हाथ उसके सीने पर था. पता नहीं आज कोयल को बबलू की ये हरकत बुरी क्यूँ नहीं लग रही थी. बबलू जैसे ही अपने पंजों से कोयल के उभारों को हलके से दबाता है, कोयल तेज़ साँस लेते हुए अपना सीना उठा देती है. कोयल के बड़े उभार बबलू के पंजों में समा जाते है. बबलू अपने आप को रोक नहीं पाता है और अपनी दीदी के उबारों को पंजों में दबोच लेता है. बबलू दोनों हाथों से कोयल के बड़े और गोल उबारों को धीरे-धीरे मसलने लगता है और कोयल बिस्तर पर लेटे हुए बिना पानी की मछली की तरह तड़पने लगती है. तेज़ साँसे लेते हुए कोयल के मुहँ से सिसकारियाँ निकलने लगती है. "सीईई....!! उफ़...!! बबलू.....सीईईइ....!!". अपनी दीदी के मुहँ से निकलती ये आवाज़े बबलू को उत्साहित कर देती है. उसके सब्र का बाँध टूट जाता है और वो कोयल के सीने के बीच अपना चेहरा छुपा लेता है. "आह...!! दीदी...उफ़..!!"

कोयल आँखे बंद किये अपने हाथ से बबलू का सर पकड़कर अपने सीने पर दबा देती है. मदहोश होकर बबलू कोयल के सीने को मैक्सी के ऊपर से चूमने लगता है. एक हाथ से कोयल की मैक्सी के बटनों को खोलने की कोशिश करता है तो कोयल खोलने में उसकी मदद करती है. अलगे ही पल उसकी मैक्सी का उपरी भाग खुल जाता है और बबलू दीदी की ब्रा को सरकाकर एक वक्ष आजाद कर देता है. कोयल के नंगे वक्ष को हाथ से दबाकर बबलू निप्पल को जैसे ही अपने मुहँ में भरता है, कोयल की सिसकारी छुट जाती है. "सीईईईइ....!! बबलू....आह्ह्हह्ह.....!!". कोयल के वक्ष को बबलू किसी नवजात शिशु की तरह चूसने लगता है. कोयल पाप-पुण्य की सारी सीमायें भूलकर नरक की आग में उतरने के लिए तैयार हो जाती है. दुसरे हाथ से बबलू मैक्सी को निचे से ऊपर करता हुआ कोयल के पेट के ऊपर तक उठा देता है. कोयल के बदन को चूमता हुआ बबलू निचे की ओर उसके नंगे पेट को चूमता है और फिर उसकी नज़रे कोयल की पैन्टी पर पड़ती है जो उसकी गोरी मांसल जांघों के बीच सबसे कीमती खजाने को ढके हुए थी. कांपते हुए हाथों से बबलू पैन्टी को धीरे से निचे की ओर खींचता है. पैन्टी धीरे-धीरे घुटनों से निचे हो जाती है. बबलू की नज़रें जाँघों के बीच पड़ती है. छोटे और रेशमी घुंगराले बालों से ढकी कोयल की योनी पर उसकी नज़रे रुक जाती है. तभी कोयल के पैर धीरे से अलग होते है और बबलू की आँखों के सामने योनी का द्वार खुल जाता है. उसकी मादक खुशबू से बबलू अपने होशो-हवास खो बैठता है. वो झट से अपना सर कोयल की जाँघों के बीच घुसा देता है. उसकी जीभ कोयल की योनी का रसपान करने लगती है.

तभी कोयल उठ बैठती है. पीछे की ओर होते हुए कोयल मैक्सी से अपने अर्धनग्न शरीर को ढकते हुए कहती है....."नहीं बबलू....ये पाप है...ये महापाप है....". बबलू समझ नहीं पाता है की दीदी को अचानक क्या हो गया. "क..क्या हुआ दीदी....?". "नहीं बबलू...हम ये नहीं कर सकते....ये बहुत बड़ा पाप है बबलू...".
कोयल की आँखों से आँसू एक बार फिर से बहने लगते है. बबलू दीदी को समझाने के लिए जैसे ही कुछ कहने को होता है, कोयल उसे जाने कह देती है. "तू जा बबलू....तू जा यहाँ से...प्लीज तू जा....!!". अपनी दीदी को रोता देख बबलू की आँखों में भी आँसू आ जाते है. नम आँखों के साथ बबलू कमरे से बाहर चले जाता है. उधर कोयल भी अपने कपडे ठीक करके लेट जाती है और रोने लगती है. कोयल समझ चुकी थी की सालों के इस रिश्ते को एक पल में नहीं बदला जा सकता है. और जिस तरह से दोनों की परवरिश हुई थी, ये और भी ज्यादा मुश्किल था.

सुबह होती है और दोनों भाई-बहन के बीच एक बार फिर दूरियाँ बन जाती है. कोयल की शादी की सारी औपचारिकता पूर्ण कर, आलोक और उषा भी घर आ जाते है. पता चलता है की कोयल की परीक्षा के बाद ही उसकी शादी कर दी जाएगी. तारीख भी तय हो चुकी थी. इस खबर का स्वागत जहाँ कोयल ने मुस्कराहट के साथ दिया, वहीँ बबलू के चेहरे पर मायूसी थी. कोयल दीदी उससे अब हमेशा के लिए दूर चले जाने वाली थी. कोयल ने अपना ध्यान पढ़ाई में लगा दिया और कभी बबलू ने कोयल को छुने की हिम्मत नहीं की. दोनों के बीच एक न दिखने वाली दरार पड़ चुकी थी.

समय बीतता चला गया और आखिर वो दिन भी आ गया जब मंडप में कोयल के होने वाले पति, रवि ने उसकी मांग भरी. कोयल ने उसके साथ ७ फेरे भी लिए. अब कोयल की विदाई हो रही थी. सभी की आखों में आंसू थे, किसी के ज्यादा, किसी के कम. जब कोयल अंतिम बार अपनी माँ उषा के गले लगी तो मानो आँसुओं का सैलाब आ गया. उसके पिता आलोक, जो अब तक अपने आँसुओं पर काबू रखे हुए थे, उनकी इच्छाशक्ति ने भी जवाब दे दिया. उनकी आँखों से भी आँसू फुट पड़े. सभी से विदाई और अपने माता-पिता का आशीर्वाद लेकर कोयल के कदम बबलू के सामने थम से जाते है. दोनों बहती आँखों से एक दुसरे की ओर देखते हैं. अपनी गलतियों को भुलाकर भाई-बहन अंतिम बार गले लगते है. भीगी आँखों से कोयल बबलू से बस इतना ही कह पाती है, "मम्मी-पापा का ख्याल रखना बबलू....अब मैं चलती हूँ". बबलू के मुहँ से "आईएम सॉरी दीदी...", बस यही निकल पाता है. कोयल कार में बैठ जाती है और निकल पड़ती है. बबलू अपनी कोयल दीदी को जाते हुए देखता है. आज उसकी कोयल दीदी अपने पति के साथ हमेशा के लिए उस से दूर जा रही थी और उसके पास अपने भाई को देने के लिए आँसुओं के अलावा और कुछ नहीं था.

समय किसी के लिए नहीं रुकता. दिन, हफ्ते और फिर महीने बीत गए. बबलू की कोयल दीदी से बात नहीं हो पाई. कोयल का कॉल आता भी था तो वो ज्यादातर उषा या आलोक से ही बात किया करती थी. कोयल और बबलू दोनों ही अच्छे नंबरों से पास हो चुके थे. बस यही एक बार था जब कोयल ने कॉल पर बबलू को बधाई दी थी. बबलू दिल ही दिल में मान चूका था की वो हमेशा के लिए अपनी दीदी को खो चूका है. बबलू कोयल को भुला नहीं पा रहा था. कहते है जब आपकी सबसे प्यारी चीज़ आपसे दूर हो जाए तो इंसान एक तो उसके वियोग में अपने आप को बर्बाद कर लेता है या उसके अन्दर छुपा कोई हुनर उसे संभाल लेता है. बबलू ने लिखना शुरू कर दिया था. ज्यादातर समय वो पढ़ता रहता और खाली समय में लिखता. कुछ समय और बीत गया. फिर एक दिन बबलू को माँ से पता चला की कोयल १ दिन के लिए घर आ रही है. रवि को कुछ काम है इसलिए आलोक कोयल को लेने जायेंगे और अगली सुबह रवि कोयल को लेने आ जायेंगे. इस बात की बबलू को ख़ुशी तो हुई पर अब शायद वो थोडा समझदार भी हो गया था. वो अपनी सीमायें जान चूका था.

फिर एक दिन आलोक के साथ कोयल ने एक बार फिर से घर में कदम रखा. उषा उसे देखकर फूलो नहीं समां रही थी. बबलू जब कोयल के सामने आया तो कोयल उसके गले लग गई. प्यार से अपने हाथ को उसके गाल पर रखते हुए पूछा, "कैसा है मेरा बबलू...?". "अच्छा हूँ दीदी...आप कैसी हो...?", बबलू ने पूछा. "मैं भी अच्छी हूँ....", कोयल ने भी उत्तर दिया. घर में एक बार फिर से पहले जैसा माहोल था. सभी खुश नज़र आ रहे थे. बहुत वक़्त के बाद सभी ने एक साथ दोपहर का खाना खाया. उसके बाद उषा कोयल से बातों में लग गई. बबलू भी अपने कमरे में जा कर लिखने लगा.

शाम के ५ बज रहे थे. आलोक और उषा बाज़ार के लिए निकल पड़े क्यूंकि कल रवि आने वाला था और उन्हें घर के दामाद के लिए कुछ कपडे लेने थे. बबलू अब भी अपने कमरे में लिख रहा था. तभी कोयल उसके लिए चाय ले कर आती है.

कोयल: अरे वाह...!! तुने कब से लिखना शुरू कर दिया.
बबलू: (कोयल को देख कर मुस्कुराते हुए) बस दीदी....आपके जाने के बाद से ही. लिखने की कोशिश करता हूँ.
कोयल बबलू का नोटपैड हाथ में लेती है और गौर से देखती है. कुछ देर देखने के बाद चेहरे पर मुस्कान के साथ कहती है.
कोयल: कमाल है बबलू...!! तू तो बहुत अच्छा लिखता है. ऐसे ही लिख. कभी बंद मत करना. मेरे साथ छत पर चाय पिएगा?
बबलू: हाँ दीदी...चलिए....

दोनों छत पर आते है. कोयल सामने पेड़ की ओर देखती है.
कोयल: याद है बबलू...एक बार मैंने तुझे पेड़ पर नर कोयल दिखाया था.
बबलू: हाँ दीदी...याद है.
कोयल: देख...आज नर कोयल के साथ मादा कोयल भी है. दोनों की जोड़ी कितनी अच्छी लग रही है ना?
बबलू: (पेड़ की तरफ देखते हुए) हाँ दीदी...बहुत प्यारी जोड़ी लग रही है, बिलकुल आपकी और जीजू की तरह.

बबलू की बात सुनकर कोयल उसकी ओर देखती है. उसकी आँखों में आँसू आ जाते है. अपनी दीदी की आँखों में आंसू देखकर बबलू भी रो पड़ता है.
बबलू: क्या हुआ दी..दीदी...? आप रो क्यूँ रही हो? आप इस शादी से खुश नहीं हो ना?
कोयल: नहीं रे पागल. ऐसी बात नहीं है. तेरे जीजू बहुत अच्छे है. मुझसे बहुत प्यार करते है. घर में सभी बहुत अच्छे है.
बबलू: फिर..? फिर आप रो क्यूँ रही हो....?
कोयल: कुछ नहीं....बस ऐसे ही...चल अब निचे चलते है.

दोनों निचे आते है. कोयल कमरे में चली जाती है और बबलू उसके पीछे. कमरे में जाकर कोयल बिस्तर पर बैठ जाती है. अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोचते हुए वो कहती है, "कुछ पुरानी बातें याद आ गई. बस इसलिए आँसू आ गए...". कोयल की बात सुनकर बबलू अपने आप को रोक नहीं पाता है और रोते हुए कोयल के पैरों में गिर जाता है. "आईएम सॉरी दीदी....मुझे माफ़ कर दो....मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई थी....". बबलू के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. कोयल भी रोते हुए अपना हाथ बबलू के सर पर रखती है. "जानता है बबलू. शादी के बाद मुझे अपने ससुराल में बहुत प्यार मिला. हर वो ख़ुशी मिली जो एक लड़की चाहती है. मेरे पति ने मुझे हर सुख दिया. जीवन और शरीर, दोनों का सुख. फिर भी पता नहीं मुझे एक कमी सी महसूस होती थी. मैं हमेशा सोचती रहती की क्या कमी है? एक अच्छा परिवार, एक पति जो मेरी हर जरुरत के साथ शरीर की जरुरत भी पूरी करता है पर फिर भी मैं अधुरा क्यूँ महसूस करती हूँ?. और एक दिन मुझे पता चला की वो क्या है जो मेरे अधूरे जीवन को पूरा कर सकता है". बबलू ने भरी आवाज़ में पूछा, "क्या दीदी..?". "तू बबलू...तू...", कोयल ने उत्तर दिया. जिसे सुनकर बबलू को विश्वास नहीं हो रहा था. "ये आप क्या बोल रही हो दीदी....? मैं..? कैसे...?". कोयल आगे कहने लगी, "हाँ बबलू...वो तू ही है. वो तूही था जिसने मेरे शरीर को पहली बार छुआ था, वो तूही था जिसके छूने से पहली बार मेरे बदन में सिरहन हुई थी, वो तू ही था बबलू जिसने पहली बार मुझे एक लड़की होने का एहसास दिलाया था. एक लड़की को उसका पति चाहे कितनी भी ख़ुशी, कितना भी प्यार क्यूँ ना देदे पर वो लड़की अपने पहले प्यार, उस पहले अहसास को कभी नहीं भुला पाती है. मेरा पहला प्यार तू ही था बबलू....मेरा पहला प्यार तू ही है". कोयल दीदी की बातें सुनकर बबलू फिर से रो पड़ता है और कोयल की कमर से लिपट जाता है. "आई लव यू दीदी...आई लव यू....!!". कोयल भी रोते हुए बबलू से लिपट जाती है. "आई लव यू टू बबलू...आई लव यू टू...!!".

दोनों भाई-बहन कुछ देर वैसे ही एक दुसरे से लिपटे रहते है फिर कोयल खड़ी होती है. आँसू और चेहरे पर मुस्कान लिए कोयल बबलू की आखों में देखती है. एक हाथ से वो अपना पल्लू निचे गिरा देती है और फिर धीरे-धीरे साड़ी खोलने लगती है. बबलू भी दीदी की आँखों में देखते हुए अपना टी-शर्ट उतार देता है और धीरे-धीरे शॉर्ट्स भी. कोयल अपना ब्लाउज और पेटीकोट उतार कर एक बार बबलू की तरफ देखती है और फिर सिर्फ ब्रा और पैन्टी पहने हुए दूसरी तरफ घूम जाती है. बबलू आगे बढ़कर कोयल की ब्रा का हुक खोल देता है और ब्रा सरककर निचे गिर जाती है. कोयल फिर एक बार बबलू की तरफ घुमती है और बबलू के ओंठों पर अपने ओंठ रख देती है. कोयल के बड़े और गोल वक्ष बबलू के सीने पर दब जाते है. दोनों किसी बिछड़े हुए प्रेमी की तरह एक दुसरे के ओंठों को चूसने लगते है. बबलू के हाथ कोयल के वक्षों को अपनी गिरफ्त में ले लेते है और कोयल आँखे बंद किये अपने शरीर को बबलू को सौंप देती है. बबलू कभी दीदी के ओंठों को पीता है तो कभी उसके वक्षों को.

कुछ ही देर में दोनों नंग्न अवस्था में बिस्तर पर लेटे हुए थे. जहाँ कोयल बिस्तर पर लेटे हुए बबलू को अपनी बाहों में जकड़ी हुई थी, वहीँ बबलू कोयल के ऊपर चढ़ कर अपने प्यार का इज़हार कर रहा था. कोयल के ओंठों को चूसते हुए जैसे ही बबलू ने अपने लिंग को कोयल की योनी के द्वार पर रखा, कोयल के पैर खुले और बबलू की कमर को अपने बंधन में बाँध लिया. एक झटका देते ही बबलू का लिंग कोयल की योनी में प्रवेश करता चला गया. कोयल की आँखे बंद हो गई और मुहँ खोले, "अह्ह्ह्हह....!!" की आवाज़ करते हुए उसका चेहरा ऊपर उठा गया. बबलू ने एक बार फिर अपने ओंठ कोयल के ओंठों पर रख दिए और चूसने लगा. बबलू की कमर की गति जो धीरे थी, अब गति पकड़ने लगी. उसका लिंग कोयल की योनी में जोरो से अन्दर-बाहर होने लगा. कोयल की बंद आँखों से आंसू बह पड़े जिसे बबलू ने निचे झुककर मुहँ से पी लिया. ये रिश्ता सबसे अलग था. इस रिश्ते में भाई-बहन का प्यार था तो प्रेमी-प्रेमिका के प्यार की गहराई भी थी.

बबलू अब अपनी चरम-सीमा पर पहुँच चूका था. उसकी कमर गति के साथ कोयल की जाँघों के बीच ऊपर-निचे हो रही थी. निचे कोयल भी अपनी योनी में तनाव महसूस कर रही थी. "दी...दीदी...मैं झड़ने वाला हूँ...आह....!!". ये कहकर जैसे ही बबलू ने कमर उठाकर अपने लिंग को योनी से बाहर निकलना चाहा, कोयल ने अपनी योनी को सिकोड़ कर बबलू के लिंग को जकड लिया और अपनी टांगो का बंधन बबलू की कमर पर और ज्यादा कस दिया. "अन्दर ही बबलू....अन्दर ही...". बबलू ने कुछ कहने के लिए मुहँ खोला तो कोयल ने उसके मुहँ पर ऊँगली रख दी. बबलू दीदी की आँखों में देखते हुए अपनी कमर की गति और बढ़ा दी और देखते ही देखते उसके लिंग ने योनी के अन्दर वीर्य छोड़ दिया. करहाते हुए बबलू अपनी कमर को हिलाता हुआ कोयल के शरीर पर गिर गया. कोयल ने किसी प्यासे को पानी पिलाकर तृप्त करने वाली संतुष्टी के एहसास के साथ बबलू को अपने शरीर में बाँध लिया. कुछ देर तक दोनों वैसे ही एक दुसरे पर निढ़ाल होकर पड़े रहे. फिर अपने होश संभालकर एक दुसरे की आँखों में देखा. दोनों की आँखों में अथाह प्यार और संतुष्टी थी. रात में सबके सोने के बाद एक बार फिर दोनों भाई-बहन प्यार के बंधन में बंधे. दोनों के बीच की दरार भर चुकी थी.

सुबह हुई और वो वक़्त भी आया जब कोयल रवि के साथ फिर एक बार इस घर को छोड़कर जाने को तैयार थी. आलोक और उषा से विदा लेकर वो बबलू के पास जाती है. दोनों की आँखों में आँसू तो थे पर चेहरे पर मुस्कान और एक दुसरे के लिए प्यार भी था.

"अपना और सबका ख्याल रखना. और हाँ...!! तू बहुत अच्छा लिखता है. लिखना बंद मत करना...", कोयल ने कहा. कोयल की आँखों में देखते हुए बबलू कहता है, "हाँ दीदी....ख्याल भी रखूँगा और लिखूंगा भी. पर दीदी....आप मुझे भूल तो नहीं जाओगी ना?". बबलू के इस सवाल पर गीली आँखों से, चेहरे पर मुस्कराहट लिए कोयल कहती है, "मैं कोयल हूँ बबलू और कोयल बहुत ख़ास पंछी होती है. तेरी दीदी कोयल है...! याद रखना बबलू....कोयल...!!". ये कहकर कोयल कार में बैठ जाती है. बबलू अपनी दीदी की कही बात का मतलब समझने की कोशिश करने लगता है. "दीदी क्या कहना चाह रही थी?", वो मन में सोचने लगता है. तभी कोयल की गाड़ी निकल पड़ती है और बबलू दौड़ता हुआ छत पर जाने लगता है. छत पर पहुँचकर वो दीदी की गाड़ी का इंतज़ार करने लगता है जो कुछ ही क्षण बाद सामने वाली सड़क से गुजरने वाली थी. तभी बबलू की नज़र सामने वाले पेड़ पर पड़ती है जहाँ कोयल का जोड़ा चोंच लड़ाते हुए बैठा था. कोयल के जोड़े को देखते हुए बबलू के मन में दीदी की कहीं बात फिर से गूंजने लगती है. 'मैं कोयल हूँ बबलू और कोयल बहुत ख़ास पंछी होती है. तेरी दीदी कोयल है...! याद रखना बबलू....कोयल...!!'. एक क्षण के लिए बबलू कुछ सोचता है और फिर उसके चेहरे पर मुस्कान छा जाती है. पेड़ पर बैठी मादा कोयल अंतिम बार नर कोयल से चोंच भिड़ा कर उड़ जाती है. तभी कोयल दीदी की गाड़ी भी सामने वाली सड़क से गुजरती है. खिड़की से हाथ निकालकर कोयल अंतिम बार बबलू से विदा लेती है. छत पर खड़ा बबलू मादा कोयल को आसमान में उड़ता हुआ देखता है और मुस्कुराता है. कोयल - वो पंछी जो नर कोयल के साथ प्रजलन करती है और फिर उड़ जाती है पराये पंछी के घोसले की तलाश में, जहाँ वो अपने अंडे देगी और वो पंछी उस अंडे को अपना मान कर उसका पालन-पोषण करेगा. और फिर जब प्रजलन का समय आएगा और नर कोयल उसे पुकारेगा वो उसकी पुकार सुनकर उडती हुई फिर उसके पास आ जाएगी.

कुछ ही देर में आसमान में उडती मादा कोयल और उसकी कोयल दीदी की गाड़ी, दोनों बबलू की आँखों से ओझल हो जाती है. चेहरे पर समाधान और संतुष्टी के भाव लिए बबलू अपने कमरे में आता है और कुर्सी पर बैठ जाता है. राइटिंग पैड खोलता है और अपनी नयी कहानी का शीर्षक लिखता है - "कोयल".

-समाप्त
 

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नया ससुराल

आज और अभी:


दिशा की आँखें उसकी सास से मिली. ललिता की आँखों में एक मुस्कान थी और दिशा को अपनी मौन स्वीकृति दी. दिशा ने अपने पति देवेश की ओर देखा. उसका पति अपनी माँ ललिता के साथ बैठा था. वो भी उसे ही देख रहा था. उसने भी अपने सिर को हिलाकर अपनी स्वीकृति दे दी. दिशा ने अपने सामने ऊपर की ओर देखा. उसके ससुर महेश की आँखों में भी एक मुस्कान थी. और होती भी क्यों न, इस समय उनका लंड जो उनकी नयी और इकलौती बहू के मुंह के सामने झूल रहा था.

कमरे में इस समय उसके पति देवेश, उसके सास ससुर तो थे ही, पर उसके दोनों देवर रितेश और जयेश भी थे जो इस समय दिशा को ही देख रहे थे. उनके बीच में उसकी इकलौती ननद काव्या बैठी अपनी भाभी को देख रही थी. दिशा इस समय बिस्तर के कोने पर नंगी अपने सास ससुर के कमरे में थी. और उसके समान कमरे में सभी निर्वस्त्र थे.

उसकी सास ललिता उसके पति के लंड को सहला रही थी, जो अपने पूरे गर्व से खड़ा था. देवेश का एक हाथ उसकी माँ के पीछे से जाकर उसके एक स्तन को सहला रहा था. काव्या भी व्यस्त थी, उसके दोनों हाथ उसके भाइयों के लंड सहला रहे थे, जो देखकर ही लगता था कि वे देवेश से इस मामले में कम तो नहीं थे. दोनों भाई अपने एक हाथ से काव्या के एक एक स्तन को दबा रहे थे.

“क्या हुआ दिशा, क्या सोच रही हो?” ललिता ने बड़े प्रेम से पूछा.

दिशा ने उन्हें देखा और सिर हिलाकर कुछ नहीं का संकेत दिया. फिर अपने सामने खड़े लंड को हाथ में लिया. आज उसे समझ आया था कि देवेश के लंड का आकार इतना बड़ा कैसे था. उसने अपना मुंह खोला और जीभ निकालकर अपने ससुर के लंड पर चमकते हुए मदन रस को चाट लिया. महेश के लंड ने एक अंगड़ाई ली और कुछ फुदका. पर दिशा ने उसे अपने हाथ में लिया और सहलाते हुए अपने मुंह में ले लिया. जब उसकी ठोड़ी उसके ससुर के अंडकोषों से टकराई तब उसने जान लिया कि उसने लंड को पूरा मुंह में ले लिया है. उसके कानों में जैसे सीटी सी बजी और लगा कि तालियाँ बज रही हैं. लंड को मुंह से निकालकर उसने अपने ससुर से आँखें मिलायीं. फिर उसे आभास हुआ कि तालियाँ सच में बज रही थीं और उसके ससुराल के सभी प्राणी उसके इस प्रयास को अनुमोदित कर रहे थे. उसे अपनी इस उपलब्धि पर गर्व हुआ और उसने एक बार फिर महेश के लंड को मुंह में ले लिया.

दो दिन पहले:

देवेश और दिशा अमेरिका में अपनी MBA की पढ़ाई के समय मिले थे. साथ पढ़ते हुए दोनों में प्रेम हो गया और सामाजिक मान्यताओं की अनदेखी करते उन्होंने एक ही साथ रहने का निर्णय लिया था.उन्होंने पढ़ाई समाप्त होते ही विवाह करने का निश्चय किया था. पढ़ाई समाप्त होने के दो महीने बाद उनका विवाह भी अमेरिका में ही हो गया. पर वहां छह महीने रहने के बाद ही दोनों ने स्वदेश में एक बड़ी कम्पनी में नौकरी ढूंढ ली. उन्हें स्वदेश लौटे हुए अभी दो ही महीने हुए थे. दिशा को एक बात सदा खटकती थी, देवेश अपने परिवार के बारे में अधिक बात नहीं करना चाहता था. मधुचन्द्र से लौटने पर दिशा को लग रहा था कि उसे अपने ससुराल में संबंध बढ़ाने चाहिए. वैसे जब वो पहली बार गयी थी तो उसके स्वागत सत्कार में कोई कमी नहीं हुई थी. उसने अपनी इच्छा देवेश को बताई तो देवेश की अनिच्छा विदित थी. पर दिशा के हट के आगे वो झुक गया और वे दो दिन पहले देवेश के घर आ गए थे. इन दो दिनों में उसके जीवन ने एक नया ही मोड़ ले लिया था.

देवेश के अनुसार इस घर, जिसे एक महल कहना अधिक उचित होगा, कई रहस्य हैं. पहली रात खाने के बाद जब उसकी सास ने देवेश को कुछ बात करने के लिए रोका था तो देवेश ने उसे कमरे में जाकर उसकी प्रतीक्षा करने के लिए कहा.

“कुछ सम्पत्ति के विषय में बात करनी है, मुझे कुछ समय लग सकता है. तुम जाकर आराम करो, मैं एक घंटे में आता हूँ.” देवेश ने उसे समझाया.

बेमन से दिशा ने उसकी बात मानी और उनके कमरे के जाकर एक पुस्तक निकाल कर पढ़ने लगी. उसका मन नहीं लग रहा था तो उसके कमरे की बत्तियाँ बंद कर दीं और लेट गयी. कमरे में बनी अलमारी के नीचे से उसे अचानक एक प्रकाश दिखा, जो पहले नहीं था. जिज्ञासावश उसने अलमारी खोली तो उसे खाली पाया, पर उसके पिछले भाग से उसे प्रकाश की किरण दिखाई पड़ी. उसने अलमारी के पिछले हिस्से को छुआ और फिर हल्के से दबाया. अलमारी का वो भाग किसी द्वार के समान खुल गया. उसके पीछे से प्रकाश अब तेज हो गया. उसने झाँका तो उसे एक गलियारा दिखा.

दिशा ने गलियारे में कदम रखा. देवेश को न जाने अभी कितना समय लगेगा. तब तक वो इस गुप्त रास्ते की छान-बीन कर सकती थी. आगे बढ़ते हुए उसने देखा कि इस गलियारे में कांच लगे हुए थे. उनके पीछे अँधेरा था. सम्भवतः वे कमरे थे. फिर उसकी दृष्टि में एक कांच में से प्रकाश आता दिखा. उत्सुकता से वो उस ओर बढ़ी और अंदर देखा. अंदर का दृश्य देखते ही उसे एक आघात लगा. उसका अनुमान सही था, ये कांच कमरों के थे, और अंदर उसकी ननद बिस्तर पर नंगी लेटी हुई अपनी चूत में एक नकली लंड चला रही थी. एक हाथ से अपने मम्मे को दबाते हुए दूसरे हाथ से वो नकली लंड उसकी चूत में चल रहा था. दिशा की चूत में पानी आ गया. उसे लगा कि वो अपनी ननद की गोपनीयता को भंग कर रही है. पर वो हट नहीं पा रही थी.

काव्या के सुंदर चेहरे पर छाए तुष्टि के भाव ने उसे हटने नहीं दिया. पर उसके अगला आश्चर्य अभी होना बाकी था. कमरे का दरवाजा खुला और उसने देखा कि उसका बड़ा देवर रितेश कमरे में आया. उसने उन दोनों को कुछ बात करते हुए देखा और उसे उनकी बातें न सुन पाने का दुःख हुआ. काव्या उससे बात करते हुए भी नकली लंड अपनी चूत में चलाती रही. दिशा अचम्भित थी कि काव्या ने अपने शरीर को छुपाने या अपने इस खेल के उजागर होने पर कोई आश्चर्य नहीं दिखाया. रितेश ने उसके हाथों से नकली लंड लिया और एक ओर रख दिया. अब दिशा चाहती भी तो हट नहीं सकती थी. ये भाई बहन क्या करने वाले हैं इसे देखे बिना वो नहीं जा सकती थी.

रितेश ने अपनी टी-शर्ट निकाली और फिर अपना लोअर भी निकाल दिया. उसके लंड का आकार देवेश से कोई कम नहीं था. रितेश ने काव्या को बिस्तर पर उसकी स्थिति बदलते हुए सीधा किया और फिर उसकी चूत पर अपना मुंह रख दिया. काव्या ने उसके सिर को जोर से पकड़ते हुए अपनी चूत पर दबा लिया. अचानक उसने लगा कि काव्या ने उसकी ओर देखा. पर उसकी आँखों में किसी भी प्रकार का कोई भाव नहीं बदला. दिशा को समझ आ गया कि ये एक-तरफा काँच हैं जिससे कि केवल एक ओर दिखता है. इस ज्ञान से अब वो निर्भय होकर सामने के कमरे में चल रही लीला को देखने लगी.

काव्या के बिस्तर पर लहराते शरीर को देखकर दिशा भी उत्तेजित हो रही थी. रितेश चूत चाटने में बहुत अनुभवी प्रतीत हो रहा था. दिशा चाहती थी कि वे जल्दी अपने अगले चरण में जाएँ ताकि वो भी अपने कमरे में जाकर देवेश से चुदवा पाए. उसे डर था कि देवेश कहीं जल्दी न आ जाये. उसके मन के विचार मानो काव्या और रितेश ने भी सुन लिए थे. रितेश अब खड़ा हो चुका था और अपने लंड को मसल रहा था. दिशा ने पहले सोचा कि काव्या उसे चूसेगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. रितेश ने सीधे लंड को काव्या की चूत पर लगाया और उसकी चुदाई करने लगा. काव्या का चेहरा आनंद से भर गया, रितेश अपनी बहन को जोर से चोद रहा था. दोनों कुछ बोल रहे थे, पर दिशा को सुनाई नहीं दे रहा था. सीधे आसन में दस मिनट की चुदाई के बाद रितेश ने कुछ कहा तो काव्या घोड़ी के आसन में आ गयी और रितेश उसे फिर से चोदने लगा.

अगर दिशा उन्हें देखकर अगर उत्तेजित थी तो अगर उनकी बातें सुन पाती तो सम्भवतः तभी झड़ जाती. अंदर चल रहे सम्भोग को वो केवल देख ही पा रही थी. रितेश इस आसन में काव्या को कुछ देर और चोदने के बाद उससे अलग हो गया. उसने अपना लंड काव्या के चेहरे के सामने कर दिया. इतनी दूर से भी दिशा उसके लंड पर चिकनाई को देख पा रही थी. काव्या ने ने निसंकोच अपने भाई का लंड मुंह में लिया और उसे चाटने लगी. कुछ ही देर उसने अपने मुंह में लेकर चूसा था कि रितेश का शरीर अकड़ गया और झटके लेने लगा. काव्या ने उसका लंड अपने मुंह से नहीं निकाला और जब रितेश ने झड़ना बंद किया तो उसके लंड को एक चुंबन देकर वो लेट गयी.

कुछ देर दोनों भाई बहन बातें करते रहे और किसी बात पर हँसते रहे. फिर रितेश ने उसके होंठ चूमे और कपड़े पहन कर कमरे से निकल गया. दिशा ने समय देखा तो अभी देवेश के आने में २० मिनट और थे. वो कुछ आगे बढ़ी तो अगले कमरे में उसने देवेश और उसकी सास को देखा. देवेश खड़ा हुआ था और दरवाजा खोल रहा था. उसकी माँ ने कुछ कहा, जिसपर देवेश ने समझते हुए सिर हिलाया. दिशा को समझ आ गया कि देवेश शीघ्र ही कमरे में पहुंच जायेगा. वो तुरंत लौट गयी और अलमारी से कमरे में जाकर उसे पहले के समान बंद किया. फिर बाथरूम में जाकर मुंह धोया ही था कि कमरे का दरवाजा खुला. उसने अपने भाग्य को धन्य किया कि वो समय पर लौट आयी. मुंह पोंछकर वो कमरे में आयी तो देवेश उसकी ओर प्रेम से देख रहा था.

चुदाई देखने के कारण दिशा पहले ही से उत्तेजित थी. देवेश को देखकर उसका संयम टूट ही गया. वो दौड़कर देवेश से लिपट गयी और उसे चूमने लगी. कुछ ही देर में वे दोनों बिस्तर पर नंगे थे और देवेश का लंड उसकी चूत की प्यास मिटा रहा था. देवेश को भी ये आभास हुआ कि किसी कारण दिशा आज अधिक ही उत्तेजित है, पर उसने इसे नए स्थान के रोमांच को सोचकर अनदेखा कर दिया. पर आज दिशा का मन इतनी जल्दी भरने वाला नहीं था. देवेश के एक बार झड़ते ही उसने लंड को चूसकर फिर से खड़ा कर दिया. और उस बार उसके ऊपर सवारी गांठते हुए एक बार फिर से चुदाई करवाई. अंततः संतुष्ट होकर वो देवेश के बगल में लेट गयी और उसे चूमती रही. और इसी के साथ उसकी आँख लग गयी.

एक दिन पहले:

अगले दिन जब अभी पुरुष बाहर बैठे बातें कर रहे थे तो उसकी सास और ननद ने उसे अपने महलनुमा घर को दिखाया. दिशा को भी अपने कमरे से काव्या के कमरे का भूगोल समझ में आया. काव्या के कमरे के साथ ही वो कमरा था जहाँ से उसने देवेश को निकलते देखा था. ये एक लाइब्रेरी या ऑफिस था. पूरे घर को देखने के बाद उसे ये भी पता लग गया कि हालाँकि कमरे तो घर में बहुत थे, पर सभी एक ही तल पर रहते थे. अन्य तलों के कमरे केवल अतिथियों के लिए ही थे. दिशा सोच रही थी कि क्या उनके कमरों में भी झाँकने के लिए उसी प्रकार का आयोजन है. पर वो पूछ नहीं सकती थी. लौटने के बाद सभी बाहर बैठे हुए बातें करते रहे. रितेश और काव्या बिलकुल सामान्य व्यवहार कर रहे थे.

दोपहर के कहने के बाद उसे अपने कमरे में जाकर नींद ली और रात के खेल के कारण वो दो घंटे तक सोती रही. देवेश ने भी उसे सोने दिया था. जब वो उठी तो तैयार होकर नीचे आयी. चाय नाश्ते के साथ सभी अन्य बातचीत में व्यस्त रहे. अधिकतर बातें राजनीति से संबंधित थीं और दिशा को उसमे कोई रूचि नहीं थी. पर उसे लगा कि उसकी सास अब उसे अलग दृष्टि से देख रही थी. यही भावना उसे अपने ससुर से भी आ रही थी. शाम होने के बाद उसके ससुर ने कुछ पीने के लिए सबको आमंत्रित किया. दिशा, काव्या और ललिता ने भी बियर ली. पुरुषों ने व्हिस्की. फिर खाने का कार्यक्रम चला. दिशा को अब देवेश के परिवार के साथ मिलकर आत्मीयता का अनुभव हो रहा था और वो बहुत खुश थी. खाने के बाद उसने देवेश और उसकी सास को बात करते देखा और देवेश ने उसे एक बार देखा.

कल की तरह उसकी सास ने देवेश को कल चल रही बातों को आगे ले जाने के लिए आग्रह किया. देवेश ने दिशा से पास आकर पूछा तो दिशा बोली, "अगर कल रात जैसी चुदाई करोगे, तो बिलकुल जाओ”. देवेश ने कहा कि आज कुछ अधिक समय लगेगा. और मैं तुम्हे आने के पहले मैसेज या फोन कर दूंगा. दिशा अब और खुश हुई, अब वो बिना देवेश के लौटने की चिंता के अपने गुप्तचर कार्य को कर सकती थी. आज वो किसी अन्य कमरे को देखना चाहती थी.

दिशा कमरे में अलमारी को हल्का सा खोलकर प्रतीक्षा करने लगी. आधे घंटे के बाद उसे वहां प्रकाश दिखा. कल के समान वो गलियारे में चल पड़ी. काव्या के कमरे में कोई नहीं था. वैसे भी दिशा को आज उस कमरे में कोई खास रूचि नहीं थी. उसे सामने गलियारे के अंत में बने कमरे में जल रही बत्ती आकर्षित कर रही थी. उसे आज क्या देखने मिलेगा इसकी उत्सुकता खाये जा रही थी. उसकी धड़कन बढ़ी हुई थी. क्यों न हो, वो एक प्रकार से चोरी कर रही थी. कमरे के पास पहुंचकर उसने अपनी गति कम की और एक और होते हुए कमरे में झाँका. पहले उसे अधिक कुछ दिखाई नहीं दिया. और फिर उसके हाथों के तोते उड़ गए.

सामने उसके सास ससुर का कमरा था. और इस समय उसके सास और ससुर के साथ उसका छोटा देवर जयेश भी था. और इस समय तीनों नंगे थे. उसके ससुर और जयेश बिस्तर पर लेटे थे और ललिता, उसकी सास उनके लंड चूसने में व्यस्त थी. दिशा ने कभी तीन लोगों को सम्भोग में लिप्त नहीं देखा था. और इसीलिए उसकी उत्सुकता और बढ़ गयी. उसकी सास रह रह कर दोनों लौंड़ों को हाथ से हिलती फिर एक एक करके चूसती। वो इस काम में अनुभवी थी. जब दोनों लंड अच्छे से खड़े हो गए, तो उसने उसकी सास को अपने पति से कुछ पूछते हुए देखा. फिर उसके चेहरे की मुस्कान देखकर दिशा उसके ऊपर रीझ गयी. उसकी सास सच में एक अत्यंत ही सुंदर महिला थी. न जाने क्यों दिशा का मन हुआ कि वो भी उसकी सास के साथ सम्भोग कर पाए. ये उसका पहला समलैंगी अनुभव होगा. फिर उसने इसकी असम्भवता पर विचार किया और सामने चल रहे दृश्य पर ध्यान दिया.

उसके ससुर अभी तक लेटे ही हुए थे और उसकी सास उनके ऊपर चढ़कर उनके लंड को अपनी चूत पर लगा रही थीं. लंड अंदर जाते ही उन्होंने उछलना आरम्भ कर दिया. फिर उन्होंने जयेश की ओर देखते हुए कुछ कहा. जिसके बाद जयेश उनके सामने खड़ा हो गया और वो उसके लंड को मुंह में लेकर चूसने लगीं. दिशा को अपनी सास की स्फूर्ति पर बहुत आश्चर्य हुआ. वो लंड पर उछलते हुए जिस सरलता से लंड चूस रही थीं वो सच में गर्व के योग्य था. उसके ससुर भी अब नीचे से धक्के लगा रहे थे और चुदाई का पूरा आनंद ले और दे रहे थे. यूँ ही कुछ देर की चुदाई के बाद उसकी सास ने जयेश के लंड को मुंह से निकालते हुए उसे चाटा और जयेश की ओर देखते हुए कुछ कहा. जयेश वहां से हटते हुए कुछ दूर गया और हाथ में कुछ लेकर आया.

जयेश ने अपनी माँ की उछलते हुए शरीर को पीछे से ठहराया और आगे की ओर झुका दिया. दिशा की साँस रुक गयी. "क्या ये…?” उसने देखा कि जयेश जो भी लाया था वो किसी प्रकार की ट्यूब या शीशी थी, जिससे उसने अपनी उँगलियों पर कुछ उढ़ेला और फिर अपनी माँ की गांड पर मलने लगा. ललिता इस समय आगे झुकी अपने पति के होंठ चूमे जा रही थी. और उनके पति उसके नितम्ब पकड़ कर फैलाये हुए थे जिसके कारण जयेश को अपनी माँ की गांड में वो पदार्थ लगाने में कोई कठिनाई नहीं हो रही थी. जब उसकी सास की गांड की तैयारी हो गयी तो जयेश ने अपने लंड पर भी वही पदार्थ लगाया. उसका लंड अब एकदम से चमक रहा था. दिशा की साँस अभी तक रुकी थी. उसकी गांड तो देवेश ने कई बार मारी थी, और उसे गांड मरवाने में मजा भी बहुत आया था, पर जो वो अब देख रही थी, उसकी कल्पना भी नहीं की थी.

दिशा के हाथ अपनी चूत को मसलने लगे. उसे तब ये आभास हुआ कि उसकी चूत अविरल रूप से बह रही है. आज भी चुदाई में मजा आने वाला है. दिशा अपनी चूत को दबाती हुई सामने आँखें गढ़ाए खड़ी थी. जयेश ने अपनी माँ की गांड के पीछे अपने शरीर को सही आसन में स्थापित किया. दिशा ने बिना पलक झपके जयेश के लंड को उसकी सास की गांड में घुसते हुए देखा. बिस्तर पर उपस्थित तीनों में से इस समय केवल जयेश ही किसी प्रकार की गति में था. दिशा के सास और ससुर दोनों जैसे जड़ थे. जयेश के लंड ने अपनी माँ की गांड की पूरी गहराई को तय करने में कुछ समय लगाया. दिशा अपनी सास और देवर के चेहरे को भी देख रही थी. जयेश का लंड जैसे जैसे उसकी सास की गांड में जा रहा था दोनों के चेहरे आनंद की अधिकता से चमक रहे थे.

जब जयेश का लंड गांड में पूरी गहराई तक जम गया तो ललिता की आँखों में एक नशा सा था. और तभी दिशा का रक्त जैसे जम गया. उसने अपनी सास को उसकी ओर देखते हुए देखा. उनकी आँखों में एक षड्यंत्रकारी मुस्कान थी. दिशा को ऐसा लगी जैसे उसकी सास उसे ही देख रही हो. उनकी आंखें मानो उसकी आँखों से मिलकर कुछ कहना चाह रही हों. उनकी मुस्कराहट में एक व्यंग्य था. दिशा दो कदम पीछे हो गयी. "क्या उसे देख लिया गया?” पर उसे कल रात का ध्यान आया. सम्भवतः उसकी सास उस शीशे को यूँ ही देख रही थी. वैसे भी अब उनकी आँखें शीशे पर केंद्रित नहीं थी. बल्कि जैसे ऊपर अपनी पुतलियों में चढ़ी हुई थीं. इस समय उसके ससुर और देवर अपने लंड उसकी सास की चूत और गांड में मिलकर चला रहे थे.

उनकी जुगलबंदी से ये तो समझा ही जा सकता था कि ये खेल वो पहली बार नहीं खेल रहे थे. जिस सरलता और सामयिकता से उनके लंड उन दोनों छेदों में आघात कर रहे थे, ये एक लम्बे अनुभव को दर्शाते थे. दिशा की सास अब भी कुछ समय में उसकी ओर देखती थी. पर दिशा को पता था कि वो सुरक्षित है. उसकी उँगलियाँ उसकी चूत में जाकर उसे चोदने का प्रयास कर रही थीं. बिस्तर पर चुदाई भीषण रूप ले रही थी. उसकी सास इस आयु में इतनी तीव्र और दोहरी चुदाई को जिस आसानी से झेल रही थी, वो अपने आप में एक चमत्कार ही था.

इस दृश्य को देखते हुए दिशा को अच्छा समय हो गया था. अब लग रहा था कि खेल में लिप्त खिलाड़ी अपने गंतव्य पर पहुंच चुके थे. उनके शरीर के हावभाव उनके पड़ाव के निकट होने का संकेत कर रहे थे. और हो भी यही रहा था. ससुर जी ने एक झटका लिया और हिलना बंद किया पर सासूमाँ उनके ऊपर सवारी गांठे रहीं. पर जब जयेश के शरीर में ऐंठन हुई तब खेल की समाप्ति हो ही गयी. जयेश अपनी माँ के ऊपर ढेर होता इसके पहले ही उसकी सास ने उसे हटा दिया, और वो बिस्तर पर लोट गया. दिशा अपनी सास की शक्ति और स्फूर्ति पर चकित तो थी ही, पर जब उसने पलटकर उन्हें उन दोनों लौंड़ों को फिर से अपने मुंह में लेते देखा तो वो उनकी प्रशंसक बन गयी.

दिशा उन तीनों की प्रणयलीला को देख रही थी कि उसके फोन में कम्पन हुआ. ओह, देवेश आने वाला है. इससे पहले कि वो अपने कमरे में लौटती, उसकी सास के कमरे का दरवाजा खुला और उसमें काव्या और रितेश ने प्रवेश किया. दिशा और रुक तो नहीं सकती थी, पर उसने ये अवश्य ही देख लिया कि रितेश और काव्या भी निर्वस्त्र ही थे. दिशा ने तीव्र गति से अपने कमरे की ओर कदम बढ़ाये. अलमारी से अंदर जाकर उसने अलमारी बंद की और कल जैसे बाथरूम में जाकर मुंह धोया. बाहर निकली तो देवेश उसकी और प्रेम भरी दृष्टि से देखते हुए अपने कपड़े उतार रहा था. वो दौड़कर देवेश की बाँहों में समा गयी. देवेश ने उसे बाँहों में लिया और चूमने लगा. उसका एक हाथ नीचे की ओर गया और उसने दिशा की चूत को टटोला.

“हम्म, लगता है आज भी चुदाई का बहुत मन हो रहा है. अगर ऐसा ही रहा तो हमें लौट कर शहर जाने का मन नहीं होगा।”

“हम्म, अगर तुम यहाँ खुश रहोगे तो मुझे यहाँ भी अच्छा ही लगेगा.” दिशा ने उसकी बाँहों में कसमसाते हुए कहा.
“चलो, देखेंगे.” ये कहते हुए देवेश ने उसे बिस्तर पर लिटाया और उसकी चूत चाटने लगा.

जब दो घंटे बाद दोनों की चुदाई समाप्त हुई तो दिशा की चूत और गांड दोनों से देवेश का रस बह रहा था. और जो उसने पिया था सो अलग था. देवेश और दिशा पूर्ण रूप से संतुष्ट होकर एक दूसरे की बाँहों में थे.

“क्या हुआ, जब से आयी हो, चुदाई की प्यासी हो गयी हो.” देवेश ने उससे पूछा.
“यहां के वातावरण का प्रभाव है. और फिर हमें अभी यहाँ किसी प्रकार की कोई बाधा या काम का बोझ भी नहीं है.”
“हमारी सम्पत्ति के बारे में जो बातें चल रही हैं, उनके अनुसार मैं अगर यहाँ रहूं तो हम दोनों जितना मिलकर कमाते हैं, उससे अधिक मिल सकता है.”
“देवेश, मुझे ये स्थान और तुम्हारा परिवार बहुत अच्छा और मिलनसार लगा है. अगर तुम चाहोगे तो हम यहाँ आ सकते हैं. मुझे कोई आपत्ति नहीं है.”

दिशा ये कहते हुए ये भी सोच रही थी कि अगर यहाँ रहे तो उसे भी देवेश के परिवार की रंगलीला में अवश्य सम्मिलित कर लिया जायेगा. अपितु देवेश का पहले का कथन कि इस घर में कई रहस्य हैं इस पारिवारिक सम्भोग के बारे में ही रहा हो. फिर अचानक दिशा के मन में एक बात कौंधी. उसने कल देवेश को तो देखा ही नहीं था! और काव्या और रितेश भी बाद में नंगे ही आये थे. देवेश तो सम्पत्ति के विषय में बात करने के लिए रुका था. "पर कहाँ? तो क्या?” उसने देवेश को देखा तो वो सो चुका था, पर उसके चेहरे की मुस्कराहट में एक शांति थी. दिशा ने ये निर्णय लिया कि कल रात अगर अवसर मिला तो देवेश क्या करता है ये जानने की चेष्टा करेगी. दिशा को जब नींद आयी तो वो स्वप्न में उसकी ससुराल के सभी सदस्यों के साथ चुदाई के खेल में मग्न थी. देवेश ने आंख खोलकर उसे देखा और दिशा को अपनी चूत सहलाते हुए देखकर, एक रहस्यमई मुस्कान के साथ आँख बंद करके सो गया.

आज:

आज दिन का आरम्भ भी कल जैसे ही रहा. नाश्ता करने के बाद पुरुष एक ओर बैठे व्यवसायिक बातों में उलझ गए और दिशा को उसकी सास और ननद ने घेर लिया. कुछ समय बाद काव्या ने अपनी माँ को किसी और काम में लगा दिया और दिशा को लेकर बाग में घुमाने ले गयी. भिन्न भिन्न प्रकार के पौधों और फूलों से बाग बहुत ही सुंदर लग रहा था. दिशा को अपने ससुराल वालों के धन से बहुत प्रभावित किया था.

चलते चलते अचानक ही काव्या ने पूछा, “भाभी, आप यहां आने के बाद बहुत खिल गयी हैं, लगता है भैया आपकी अच्छी सेवा कर रहे हैं.”

दिशा सकपका गयी. उसे कुछ बोलते न बना. तो काव्या हंस पड़ी.

“अरे भाभी. अब शर्माओ मत, आप जानती हो आपका बिस्तर सुबह कौन ठीक करता है?”

दिशा को आश्चर्य हुआ. क्योंकि दोनों दिन सुबह जब वो नहाकर निकली थी तो उसका बिस्तर ठीक किया मिला था, नयी चादर के साथ. वो समझ रही थी कि ये देवेश ने किया होगा. पर काव्या के प्रश्न ने उसे चकित कर दिया था.

“तुम्हारे भैया. और कौन?”
“अरे नहीं मेरी प्यारी भाभी. भैया ने कभी अपने घर में किया क्या? नहीं न? वो मैं ठीक कर रही हूँ दो दिन से. और उसे देखकर ही पता लगता है कि रात को उस पर घमासान हुआ होगा.”

दिशा शर्मा गयी. काव्या ने उसके चेहरे को हाथ में लिया और आँखों में झांक कर बोली.

“भाभी, हम सब किसी से कुछ भी नहीं छुपाते. भैया ने जब आपसे विवाह का निर्णय लिया था तो उन्होंने आपके बारे में सब बता दिया था. इसीलिए, आपको घबराने की आवश्यकता नहीं.”

दिशा के मन में आया कि वो बोल दे कि तुम सब भी तो मुझसे कुछ छुपा रहे हो. पर इसके पहले ही काव्या फिर बोल उठी.

“भाभी, कल भैया ने आपकी गांड भी मारी थी न? चादर पर कुछ अवशेष थे. वैसे भाभी, भैया चुदाई कैसी करते हैं? ”

अब दिशा को लगा कि अगर उसे इस परिवार में हर रूप में सम्मिलित होना है तो कुछ खुलना ही होगा.

“बहुत अच्छी, शरीर तोड़ देते हैं. और गांड में तो ऐसा लगता है कि न जाने क्या हो जाता है उनके लंड से.”

“भाभी, हमारी बहुत अच्छी पटेगी. आई लव यू, भाभी.”

दोनों लौटकर आये और सबके साथ बैठ गए.

उसके ससुर बोले, “देवेश कह रहा है कि तुम्हें यहां भी रहने में कोई आपत्ति नहीं है, बहू.”
“जी, पर अभी कोई निर्णय नहीं लिया है.”

“कोई बात नहीं अगर इसपर विचार भी कर रहे हो तुम दोनों तो भी हमें प्रसन्नता हुई. वैसे आज देवेश को हमारे व्यवसाय के बारे में विस्तार से समझना होगा. तो आज एक दिन के लिए तुम उसे हमारे पास रहने देना, हो सकता है वो तुम्हारे कमरे में बहुत देरी से आये. इसके लिए हम पहले ही तुमसे क्षमा मांगते हैं. ”

दिशा अब दुविधा में थी. जहाँ वो रात में चलते व्यभिचार को देख सकती थी, वहीं वो देवेश के प्यार से वंचित भी रह सकती थी. पर उसके पास कोई चारा नहीं था.

“नहीं, पिताजी, इसमें क्षमा वाली कोई बात ही नहीं है. बस आज ही की तो बात है.”

“थैंक यू, बहू।”

खाने के बाद सभी उठ गए और दिशा अपने कमरे में अलमारी से प्रकाश की राह देखने लगी.

दिशा को आज बहुत देर तक रुकना पड़ा. अलमारी के पीछे के गलियारे में अंधकार ही था. दिशा ने मन ही मन हँसते हुए सोचा कि लगता है आज सच में ये सब कुछ व्यवसाय सम्बन्धित बातें कर रहे हैं. तभी गलियारा जगमगा उठा और दिशा ने स्वतः अपने बढ़ चली. परन्तु आज उसका उद्देश्य ये भी देखना था कि देवेश क्या कर रहा था. अन्य कमरों में अँधेरा ही था पर अंतिम कमरे में प्रकाश था. दिशा ने धड़कते मन से उस कमरे की खिड़की पर जाकर अंदर झाँका. और जो उसने देखा उससे उसका मन व्यथित हो गया. आज बिस्तर पर कल ही के समान उसकी सास नंगी कोने पर बैठी थी और दो लंड चूस रही थी.

उसके मन के दुःख का कारण ये था कि उन दो लौंड़ों में से एक उसके पति देवेश का था. देवेश अपनी माँ के सामने नंगा खड़ा था और उसकी माँ उसका लंड चूस रही थी. दूसरा लंड उसके बड़े देवर रितेश का था. कमरे में उसके ससुर और छोटा देवर भी थे, नंगे, पर वे एक ओर बैठे शराब पीते हुए इस दृश्य को देख रहे थे. काव्या न जाने कहाँ थी. दिशा के मन में आया कि वो अंदर जाकर देवेश को छीन ले, पर उसके शरीर में उठती भावनाएं उसे रोक रही थीं. उसने अपने आप को याद दिलाया कि वो भी इस परिवार की घरेलू चुदाई में सम्मिलित होना चाहती थी. और अगर ऐसा था तो उसे देवेश को भी सबके साथ बाँटना ही होगा.

दोनों लौंड़ों को चूसने के बाद रितेश को बिस्तर पर लिटाकर उसकी सास उसके ऊपर चढ़ी और रितेश के लंड को अपनी चूत में ले लिया. ललिता ने अपने पति की ओर देखा तो उसने थम्ब्स अप संकेत किया. ललिता ने रितेश को चूमा और फिर पीछे मुड़कर देवेश से कुछ कहा. देवेश ने आगे बढ़कर अपनी माँ की गांड पर लंड लगाया और एक धक्के में अंदर पेल दिया. ललिता के चेहरे पर छाए आनंद के भाव देखकर दिशा को जलन हुई और उसके हाथ स्वतः अपनी चूत को सहलाने लगे. एक हाथ से वो अपने मम्मे दबोचने लगी और दूसरे से चूत रगड़ रही थी. उसकी चूत की सुगंध गलियारे में फ़ैल गयी थी.

अंदर उसका देवर और पति उसकी सास की चूत और गांड में लंड पेले जा रहे थे. ललिता बहुत उत्तेजित थी और कुछ बोल रही थी. देवेश और रितेश उसकी चुदाई करते हुए हंस रहे थे. उसका ससुर और दूसरा देवर भी उसकी बातों पर हंस रहे थे.

“बहुत सुंदर लग रहे हैं न सब?” दिशा ने ये सुना तो वो जड़वत रह गयी. ये काव्या ने कहा था और वो उसके साथ खड़ी थी. दिशा सामने चल रही रंगलीला में इतनी खोई थी कि उसे पता भी नहीं चला कि काव्या कब उसके पास आ खड़ी हुई थी. वो कुछ न कह पायी और अपने हाथ को चूत से हटा लिया. पर वो जानती थी कि अब देर हो चुकी है, और वो पकड़ी गयी थी.

“भाभी, घबराओ मत. हम जानते हैं आप तीन दिनों से हम सबको देख रही हो. देवेश भैया इसीलिए आपको नहीं लाना चाहते थे पहले. पर जब आपने कल की चुदाई देखने के बाद भी कुछ नहीं कहा, तो वो समझ गए कि आपको आपत्ति नहीं है. मम्मी का कहना है कि आप भी अब हमारे परिवार में पूर्ण रूप से जुड़ने के लिए तत्पर हो. क्या आप हमारे साथ जुड़ना चाहोगी, भाभी?”

काव्या ये कहते हुए दिशा के पीछे जाकर उसके मम्मों को मसलने लगी. फिर उसने एक हाथ नीचे किया और दिशा की रस से भीगी हुई चूत में एक ऊँगली अंदर डाल दी.

“बोलो न भाभी, आप भी आ जाओ. बहुत मजा रहेगा. चलोगी?” काव्य ने मानो विनती की.

दिशा ने मुड़कर काव्या को देखा. काव्या के चेहरे पर मुस्कराहट थी, जैसे वो जानती थी कि दिशा का उत्तर क्या होगा. इसके पहले कि दिशा कुछ और बोल पाती, काव्या ने उसके होंठों को चूम लिया.

“भाभी, मैंने आपसे कहा था न. आई लव यू . चलें?” काव्या बोली.

दिशा ने अपना सिर स्वीकृति में हिलाया और इस बार उसने काव्या को बाँहों में लेकर उसके होंठों पर एक प्रगाढ़ चुंबन लिया.

“वाओ, मेरी प्यारी भाभी. चलो. सब आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं.”

ये कहते हुए काव्या ने दिशा का हाथ पकड़ा और उस कमरे के साथ वाले कमरे के द्वार को खोला और अंदर चली गयी. दिशा ने जाते जाते एक बार फिर कमरे में देखा तो देवेश और रितेश अभी तक अपनी माँ की गांड और चूत में लंड घुसाए हुए उसे चोद रहे थे. और उसकी सास दिशा की और देखते हुए मुस्कुरा रही थी. उस अँधेरे कमरे को पार करने में अधिक देर नहीं लगी और फिर वो उस कमरे में अंदर गए जहाँ पर चुदाई का कार्यक्रम चल रहा था.

“चोदो मुझे, मादरचोदो! फाड दो मेरी चूत और गांड. और मारो, और तेज!” ये दिशा की सास थी. दिशा उनकी बात सुनकर सुन्न हो गयी. दिन में इतनी संभ्रांत लगने वाली महिला अपने बेटों से चुदवाती है और इस प्रकार की भाषा का उपयोग करती है, ये उसने सोचा भी न था.

“मम्मी को चुदवाते समय गालियाँ देने की आदत है. वैसे इनकी प्यास का कोई अंत नहीं है. ये चारों मिलकर भी कई बार उन्हें प्यासा छोड़ देते हैं.” काव्या ने दिशा को बताया.

दिशा सामने चल रही चुदाई को देख रही थी, उसे इस बात का आभास भी नहीं हुआ कि काव्या ने उसके गाउन की ज़िप खोल दी थी और उसके शरीर से उसके गाउन को उतार दिया था. वो तो जब दिशा को अपने शरीर पर कुछ बहने का अनुभव हुआ तो उसने देखा कि अब वो भी परिवार के अन्य सदस्यों के समान नंगी ही है.

“आओ, बहू. हम सब तुम्हारी ही प्रतीक्षा में थे.” उसके ससुर महेश ने उठकर उसकी ओर बढ़ते हुए देखा. अपने पिता की बात सुनकर देवेश ने उसकी ओर देखा और एक क्षण के लिए उसकी आँखों में अपराध का बोध दिखा. पर उसकी माँ की चीख ने उसका ध्यान बाँट दिया.

“माँ के लौड़े, अपनी बीवी को देखकर माँ की गांड भूल गया. चल तेज चला अपना लौड़ा. मैं झड़ने के निकट हूँ. फिर अपनी बीवी की गोद में जाकर बैठना.”

देवेश और रितेश अपनी पूरी क्षमता से अपनी माँ की चुदाई कर रहे थे और ललिता उनकी चुदाई का पूरा आनंद ले रही थी. दिशा के ससुर उसके सामने खड़े होकर उसके सुंदर शरीर का निरीक्षण कर रहे थे. उनके हाथ बढे और दिशा के मम्मों को दबाकर हट गए.

“देवेश ने सच में एक अपूर्व सुंदरी को चुना है. क्या मैं समझूँ कि अब तुम हमारे परिवार में पूर्ण रूप से मिलने के लिए सहमत हो.”

दिशा अब लौट नहीं सकती थी. उसे भी इस परिवार के साथ चुदाई करने का मन था.

“जी, पिताजी.”

“बहुत अच्छे. तो सबसे पहले तो तुम्हें तुम्हारे पति और देवर के लंड चाटने होंगे, जो इस समय तुम्हारी सास की गांड और चूत में हैं. उसके बाद तुम्हें मेरा और जयेश का लंड चूसना होगा. चाहो तो ललिता की चूत और गांड की भी तुम सफाई कर सकती हो, हालाँकि अब तक ये काव्या करती आयी है. ठीक है?” महेश ने उसके शरीर पर हाथ फिराते हुए कहा.

“जी, पिताजी. और मेरी…” दिशा कहने लगी तो काव्या ने उसे टोका.
“भाभी, आपकी चुदाई भी होगी. पर ये पहले. फिर मम्मी जैसा कहेंगी वैसे आपकी चुदाई होगी.”

“आआआआह, मैं गयी हरामखोरों. चोद दिया रे तुमने अपनी माँ को. फाड़ दी मेरी चूत और गांड. मजा आ गया, तुम मादरचोद, क्या चुदाई करते हो.” ललिता की इस चीख ने सबका ध्यान उसकी और खींच लिया.

देवेश ने अपने लंड को अपनी माँ की गांड से निकाला और ललिता की गांड में से उसका रस बहने लगा.
“बहू, अब जाओ और अपनी रस्म पूरी करो.” महेश ने उसे कहा.

दिशा देवेश के पास गयी और उसके लंड को देखा जो अभी उसकी सास की गांड से निकला था. अपनी गांड मरवाने के बाद कई बार देवेश के लंड को चाट चुकी थी. इसीलिए उसे कोई विरक्ति नहीं हुई. उसने देवेश के सामने बैठकर उसके लंड को अपने मुंह में लिया और चाटकर अच्छे से साफ कर दिया. उसके बाद उसने अपनी सास की उछलती गांड की ओर देखा. उसमे से रिसता हुआ देवेश का वीर्य उसे अपनी ओर खींच रहा था. उसने उठकर ललिता की गांड पर जीभ लगाई और उसे चाटने लगी.

“जुग जुग जियो, बहूरानी।” ललिता ने उसे आशीर्वाद दिया. अपने मुंह से दिशा ने ललिता की गांड के अंदर का रस भी खींचकर पी लिया और खड़ी हो गयी.

रितेश ने भी एक लम्बी सी आह के साथ अपना पानी ललिता की चूत में छोड़ दिया. ललिता झड़ते ही रितेश के लंड से हट गयी. महेश और देवेश ने दिशा को हल्के से आगे धकेला. दिशा रितेश के लंड पर चिपके हुए रस को देखकर लालसा से भर गयी. उसने आगे झुकते हुए रितेश के लंड को अपने मुंह से साफ कर दिया.

“थैंक यू , भाभी.” रितेश ने उसे कहा.

अब बारी थी उसकी सास की. तो बेशर्म होकर ललिता बिस्तर पर पाँव फैलाकर लेट गयी और दिशा ने अपना कर्तव्य निभाते हुए उसकी चूत से उसका और रितेश के मिश्रित रस का मधुपान किया. उसने ललिता के हाथ को प्रेम पूर्वक अपने सिर के ऊपर चलते हुए अनुभव किया.

“बहुत प्यारी बहू लाया है तू देवेश. हमारे साथ खूब घुलमिल कर रहेगी.” ललिता ने अपना विचार रखा.
“बिलकुल माँ. और अब तो शायद हम लोग यहीं रहेंगे, अगर ये मान गयी तो.”
“मानेगी क्यों नहीं. हम हैं न मनाने के लिए.”

दिशा ने हटते हुए अपने मुँह को पोंछा और देवेश की ओर देखा. देवेश ने अपने पिता की ओर संकेत किया. दिशा वहीँ बिस्तर पर बैठ गयी. देवेश अपनी माँ के साथ जाकर बैठा तो काव्या अपने भाइयों के बीच जाकर बैठ गयी. सब अब दिशा को देख रहे थे.

आज और अभी:

तालियों की ध्वनि के साथ दिशा अपने ससुर के लंड को बड़े प्रेम और आदर से चूस रही थी. उसके ससुर उसके बालों में प्यार से हाथ फेर रहे थे. उनके फूलते हुए लंड का आभास होते ही दिशा ने एक और रस की औषधि को अपने मुंह में ग्रहण करने के लिए स्वयं को तैयार किया. कुछ ही देर में उसके ससुर का बीज उसके मुंह से होता हुआ उसके गले को तर करते हुए पेट में समा गया. अब बस जयेश ही बचा है. उसने अपने ससुर को देखा उनकी आँखों की चमक और उसके प्रति प्रेम ने मन को जीत लिया.

“बहुत अच्छा बहू, तुमने मेरा मन प्रसन्न कर दिया.” महेश ने कहा और हट गए.

उनके हटने से दिशा को कमरे में चल रही गतिविधि देखने मिली. ललिता उसके पति के लंड पर उछल रही थी और उधर रितेश अपने लंड पर थूक लगते हुए काव्या के पीछे अपना स्थान बना रहा था. अचानक दिशा को समझ आया कि उसे केवल जयेश नहीं बल्कि काव्या को भी अपने मुंह से संतुष्ट करना होगा. वो कमसिन और कोमल सी दिखनी वाली काव्या की ओर एकटक देख रही थी कि क्या वो भी अपनी माँ जैसे दो दो लंड लेने में सक्षम है. वैसे दिशा को कोई भ्रम नहीं होना चाहिए थे. अपनी माँ की इकलौती लाड़ली इस कर्मकांड में अपनी माँ के समकक्ष ही थी. रितेश ने अपने लंड को काव्या की तंग गांड में बड़े आराम से डाला और फिर दोनों भाई अपनी बहन की चूत और गांड की दुहरी चुदाई करने लगे.

अब महेश यूँ खड़े तो रह नहीं सकता था, उसने अपनी पत्नी की गांड को टटोला और अपने लौड़े को एक ही झटके में पेल दिया. ललिता की गांड अभी पूरी बंद नहीं हुई थी इसीलिए उसके लंड को किसी भी व्यवधान का सामना नहीं करना पड़ा. दिशा बिस्तर पर बैठी अपने ससुराल के व्यभिचार को देख रही थी. यही इनके प्रेम का बंधन है जिसमे मैं एक नयी कड़ी हूँ. अच्छा है, जो मैं इनके प्यार के बीच में दीवार न बनकर इसमें जुड़ गयी हूँ. दिशा ने अपनी चूत में ऊँगली डालकर अपनी वासना को शांत करने का प्रयास किया और दोनों तिकडियों को देखते हुए अपने ही हाथों में झड़ गयी.

दोनों जोड़ियों की चुदाई अब एक आक्रामक रूप ले चुकी थी. रितेश और महेश काव्या और ललिता की गांड को मानो मथ रहे थे. उनके कूल्हों की तीव्र गति दर्शा रही थी कि वे कितनी गहरी और तेज गांड मार रहे थे. उनके नीचे पड़े जयेश और देवेश के कूल्हे भी कुछ कम चलायमान नहीं थे. काव्या और ललिता के मुंह से निकलती चीखें कमरे को हिला दे रही थीं. और दिशा ये सब एक मूक दर्शक बनकर देख रही थी. पर कुछ देर बाद सबके शरीर अकड़ने से लगे, ताल बिगड़ने लगी और फिर रुक गयी. दिशा जान गयी कि उन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है. धड़कते मन से वो अब अपनी भूमिका वहन करने के लिए उद्यत हो गयी.

रितेश ने काव्या की गांड से अपना सिकुड़ता हुआ लंड निकाला और वहीं काव्या के साथ ढेर हो गया. काव्या ने अपना स्थान छोड़ा और रितेश के साथ जा बैठी. उसके चेहरे की काँटी अविस्मरणीय थी. जयेश वहीं लेटा रहा. दिशा को अपना उद्देश्य पता था, वो उठी और जयेश के सामने बैठकर उसके लंड को चाटकर साफ करने लगी. इस मनोरम कार्य के पश्चात् उसने काव्या की ओर देखा जो उसे जयेश के लंड को चाटते हुए देख रही थी. उसकी आँखों में अभी भी कामना थी. दिशा ने अपने होठों पर जीभ फिराई और घुटनों के बल चलकर काव्या के सामने जा बैठी. काव्या की संकरी गांड को अपने दोनों हाथों से उठाकर काव्या की चूत पर अपना मुंह लगाया और उससे बहता हुआ सफेद द्रव्य पीने लगी.

चूत को पूर्ण रूप से रसविहीन करने के बाद उसने अपने हाथों से काव्या की गांड कुछ और ऊपर की. काव्या ने अपने दोनों टखने ऊपर सीने की ओर कर दिए जिसके कारण अब उसकी खुली लप्लपाती गांड दिशा के सामने आ गयी. भूरा छेद, अब लाल रंग ले चुका था और उससे रितेश का कामरस बाहर निकलने का प्रयास कर रहा था. दिशा ने समय व्यर्थ न करते हुए अपने मुंह और जीभ से काव्या की गांड को भी उस रस से मुक्ति दे दी. इसके बाद उसने काव्या की गांड और चूत पर एक प्रेम भरा चुम्बन लिया और फिर खड़ी हो गयी.

तब उसे आभास हुआ कि कमरे में नितांत शांति है, और सब उसे ही देख रहे हैं. उसकी सास उठी तो उसकी जाँघों पर उसकी चूत और गांड से निकलता रस बहने लगा. उसकी चिंता करे बिना उसने दिशा को अपनी बाँहों में ले लिया. उसके माथे, आँखों, नाक को चूमते हुए उसके होंठों पर एक प्रगाढ़ चुंबन दिया.

“मुझे बहुत प्रसन्नता है कि देवेश ने तुम्हें चुना और तुमने हम सबको. तुमने हमारे परिवार में सम्मिलित होने की रस्म पूरी कर ली है. और अब हम सबका कर्तव्य है कि आज पूरी रात तुम्हें हर प्रकार से परिवार में समाहित कर लें. आज की रात तुम्हारी ऐसी सुहागरात होगी, जो तुम्हें जीवन पर्यन्त स्मरण रहेगी.

जब उसकी सास की बात समाप्त हुई तो देवेश ने उसे पीछे से बाँहों में लिया और उसके शरीर पर चुंबनों की झड़ी लगा दी. उसकी ननद काव्या, देवर जयेश और रितेश और ससुर महेश ने उसे चारों ओर से घेर लिया. महेश ने एक शैम्पेन की बोतल से सबके लिए पेय बनाया. अपने ग्लास खनखना कर सबने दिशा का परिवार में अंतरंग रूप से स्वागत किया.

आज की रात दिशा की ससुराल में सुहागरात थी. और अब वो इस परिवार का अंतरंग हिस्सा बनने वाली थी. उसका कल का अपनी नयी ससुराल में सबके साथ उन्मुक्त चुदाई का जीवन व्यतीत करने का स्वप्न साकार हो गया.

समाप्त
 

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Lazy villain
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Doshi kon
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Ek kali sunsan Andheri rat me ek larki ki dil dahlane dene wali chikh gunj uthti hai wo aawaj bhi larki ke dard ke samne
Kamp sa uthata hai lekin wo bebas aawaj kuchh dur jakar
Apna dam tod deta hai aur aur uss aawaj ke sath hi larki ka badan nishchal par jata hai
Aur uss nishchal pare sharir ke
Awachetan man me kuchh samaya pahle ke ghatana ek chalchitra ki tarah chalane lagati hai
Uss larki ka nam hai karuna (wo nabalig nhi hai)wo apne bachapan se hi kafi chulbuli natkhat pyari thi apne papa ki pari tatha apne Bhai ki Jan thi wo … wo padane likhane me hoshiyar apne apne kam se kam rakhane wali larki thi
Samay bitata gaya aur wo jawan hoti gayi ..wo aage aur padana chahati thi isliye usne apne papa mammi ko abhi shadi na Karne ke liye bahut minnte karke aakhir me Mana hi liya …
Wo apne gav se thoda dur ke college me admission le liya
Jald hi apne college ke professor ki chaheti ban gayi aur jivan me Khushi this aur bhavishya ujjwal
Tha …ussi gav ke amirjade joki bigare hua the wo uss larki ko apne paise style se impress Karne me lag gaye lekin karuna
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Aage bad jati thi ..aur wo is bat ko apne Ghar isliye nhi batati thi ki uske Ghar wale uski study na rukawa de …aur ek din wo larka karuna ko perpose karata hai apne dosto ke samne lekin karuna usse reject karke aage bad jati hai …aur uss larke ke charo dost uss larka ka majak udana shuru kar dete aur wo larka apne dosto ke samne larki ke reject ke apman ke karan jal uthata hai aur wo sabak shikane
Ka nishchay kar leta hai ………wo rat bhar sabak sikhane ke bare me shochata hai aur yahi se uske man me ek plan aata hai ki kyo na usaka gurur tod Diya jaye ..wo us plan ko apne dosto ko batata hai tatha plan ko amlijama pahnane ka tarikh agale din rakha jata hai …aur aaj hi wo mamhus din tha Kash ye din kabhi na aata Kash ye Puri kaynat barbad ho gayi hoti uss din par shayad ye kash kabhi pura hi nhi hota .. aur uss din college se 4 baje Ghar aate samay wo larke karuna ko kidnap kar lete hai aur usse main road se bahut dur kheto ke bich le jate aur Pancho dost apne haivaniyat ka wo nanga nach dikhate hai ki Puri kaynat ro padi manvata ki duhai dene wale sharm se dub mare par waha usse koi bachane nhi aaya kahate hai ki sachche man se bhagvan ko pukaro to bhagvan daure chale aate hai par uss din uss masoom karuna joki abhi abhi to jindgi jina shuru Kari thi usse bachane ko nhi aaya shayad usne apne privet part me wood ghushate samay bhi sachche dil se bhagavan ko na pukara ho…ho sakta 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Mahi Maurya

Dil Se Dil Tak
Supreme
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BALATKARI SE MOHABBAT- EK CHHOTI SI PREM KAHANI

WRITTEN BY- MAHI MAURYA
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Raja, jaisa naam vaisa hi dil ka bhi raja. Ek maa baap jaise saput ki kamna karte hain. Raja waisa hi saput hai. Dil ka nek insan, Milansar aur sabki madad karne wala. Apne maa baap ki eklauti santan. Umar 25 varsh. Lower middle class se belong karta hai aur iron ki factory me cashier ka kaam karta hai. Bas ek kami hai ki gusse me sahi galt ka faisla nahi kar pata.

Hayaa, bahut hi khubsurat, upper middle class family se belong karti hai. Umar 22 varsh ki hai. M.Sc. Final years ki student hai. ek bada bhaai jaid hai. Pita ka naam haidar Aur maa ka naam Salma hai. Hayaa Khubsurat hone ke sath dimag ki tez padhai me thik aur acche sanskaron se paripurn ladki aur ghar me sabki ladki, haidar dharmik bhedbhav se door rahne wale selfi insan hain.

Hayaa ki ek best saheli hai Rani. Dono ki kad kathi lagbhag same hai. Dono alag alag society me rahti hain, lekin college sath sath jati hain. Hayaa ka ek BF tha Salim, jo bas uske jism ka pyasa tha, ek din usne Hayaa ke sath jabardasti karne ki koshish ki. Jiske karan Hayaa ne use thappad maar diya aur usase sabhi rishte khatm kar diye. Is karan wo ladkon se chidhti hai.

Ek din Rani aur Hayaa college se ghar aa rahi thi. Usi samay Raja bhi apni factory se kisi kaam ke liye bahar aaya tha. Hayaa kisi se phone par baat kar rahi thi wo baat karne me itni busy thi ki galti se jakar Raja se takra Gai.

Andhe ho kya. Dikhai nahi deta. Mera phone gira diya. Hayaa ne gusse se kaha.

Sorry madam, galti aapki hai. Aap hi galat direction me chal rahi thi. Raja ne kaha.

Achhe se janti hoon tum jaise ladko ko. Jahan koi ladki dikhi nahi lagte ho us par try karne. Lekin is baar tumne galat ladki se panga le liya hai. Hayaa ne gusse se kaha.

Dekhie madam waise to galti aapki hai. Fir bhi main aapse mafi mang raha hoon aur aap mujhpar galat aarop lagaye ja rahi hain. Raja chidhte huwe bola.

Ab jyada bano mat. Mujhe achhe se pata hai ki tum janboojhkar mujhse takraye the. Tum jaise majanuo ki fitrat hi yahi hai. Koi khoobsurat ladki dikhi nahi ki use chhune ka mauka dhoondhne lagte ho. Hayaa ne kaha.

Kya. Main aur tujhko touch karunga. Sakal dekhi hai apni aaine me. Ekdam bandariya lagti hai. Tune samajh kya rakha hai apne aapko. Tu koi hoor ki pari hai jo mera iman dol jaye. Raja ne apna aapa khote hue kaha.

Isi tarah dono me baat bahut jyada bigad gai. Jisko Rani ne bich bachav karke shant karwaya. Raja waha se chala gaya fir Rani ne kaha.

Tune bina matlab ke use bahut khuchh suna diya. Galti teri thi. Tu hi jakar usase takrai thi.

Ab tu jyada uski tarafdari mat kar. Mujhe achchhe se pata hai ki wo mujhse jaanboojhakar takraya tha. Hayaa ne kaha.

Rani ne baat ko aage na badhate huwe shant rahna hi behtar samjha aur uske sath aage badh gayi.

Isi tarah mahine bhar me Raja aur Hayaa kai baar aamne samne aaye. Lekin dono ke dil me ek doosre ke liye itni kadwahat bhar chuki thi ki dono ek dusre ko gusse se dekhkar najre ghuma lete the.

Raja ne ekbar fir se koshish ki apne nature ke hisab se sari kadwahat ko khatam karne ki, lekin iska natija bilkul ulta ho gaya. Hayaa ne iska galat matlab nikal liya aur usko bahut khari khoti suna di. Ab to dono me jaise dusmani ho gai thi. Dono ek dusre se nafrat karne lage the. Halanki wo dono abhi tak ek doosre ka naam nahi jante the.

Samay apni gati se chalta raha. Isi bich Hayaa ke liye ek rishta bhi aaya. Ladke wale ameer the. To Hayaa ke pita ne rishte ke liye haan kar di. Hayaa ne jab iska virodh kiya to use ye kahkar chup kara diya ki ladki jitni jaldi shadi/nikah kar ke apne ghar chali jaye utni jyada samaz me ijjat bani rahti hai. Hayaa ko majboori me is rishte ke liye haan karni padi.

Hayaa ne jab ye baat Rani ko batayi to use bhi achchha nahi laga, lekin wo kuchh kar nahin sakti thi.

Samay bitne ke sath hi Hayaa aur Rani ke exam ki date bhi final ho gai. Dono ke subject ek hi the isliye donon ke exam ki date ek hi din thi. Teen din baad exam shuru ho gaya.

Hayaa aur Rani sath jati exam deti aur sath hi wapas aati. Last paper ke din dono ne exam diya. Hayaa ko kuchh kam se market jana tha aur Rani ko ghar lautne ki jaldi thi.

Agar tumhe ghar jaldi jana hai to Tum aisa karo ghar chali jao mujhe kuchh kaam hai market me. Hayaa ne kaha.

Hayaa ko bye bolkar Rani ghar ke liye nikal padi. Udhar Hayaa ka BF Hayaa dwara mare gaye thappad se apne apko beizzat mahsoos kar raha tha aur apni beijjati ka badla lene ke liye tadap raha tha.

Exam ke baad wo ek khali khandhar numa jagah par baithkar apne kuchh doston ke sath sharab pi raha tha. Ye jagah Raja ke kaam wali jagah ke paas hi thi. Hayaa to market chali gai thi aur Rani ghar akele laut rahi thi. Tabhi achanak mausam kharab ho gaya aur jordar barish hone lagi. Jisase Rani poori tarah bheeg gai aur uske kapde jism se chipak gaye. Chunki Hayaa aur Rani ki kad kathi lagbhag same thi to jab wah us jagah se gujri to Salim ne Rani ko Hayaa Samajhkar wahshi nazaro se use dekhte huwe apne doston se kaha.

Is sali ne mujhe thappad mara tha aur mujhe beizzat kiya tha. Aaj sali ko batata hoon ki beizzat karna kisko kahte hain. Bahut ghamand hai ise apni khoobsurti par. Aaj iska rape karke iska sara ghamand tod doonga.

Salim ne itna bolkar bharish me bhigi hui Rani ka munh bandkar khandhar me kheech liya aur usko wahi jameen me patak diya Rani ne mudkar uski taraf dekha to salim ne apne doston se kaha.

Are ye to Rani hai aur ye bhi Hayaa se kisi bhi mamle me kam nahi hai. Hayaa nahi to Rani hi sahi. Ye bhi meri beizzati hone par han rahi thi. Aaj iska hi rape karunga. Hayaa ko to main baad me dekhunga.

Tum. Ye kya kar rahe ho mere sath. Nahin mujhe chhod do. Kutte agar tumne mujhe hanth bhi lagaya to munh mochi loongi tumhara. Rani ne kaha.

Lekin un sabhi ne sharab pi rakhi thi aur poore nashe me the, isliye Rani ki baaton ka unpar koi Asar Nahi huwa. Fir shuru huwa Rani ke Sath Salim aur uske doston ka darindagi ka khel. Sabhi ne milkar uska buri tarah se rape kiya. Uske jism ka ek ek ang noch dala. Rani cheekhti rahi aur dard se behosh ho gayi.

Are sale. Lagta hai ye mar gayi. Bhag lo yahan se. Agar pakde gaye to jaan se mare jaenge. Salim itna bolte huwe nashe me apne doston ke sath Rani ko wahi behoshi ki halat me chhodkar nikal gaya.

Udhar market me Hayaa ka kaam pura ho gaya to wo bhi ghar wapas aane lagi. Barish abhi bhi halki halki ho rahi thi. Wo teji se apne kadam badha rahi thi, jab tak wo us khandharnuma jagah pahuchati uske 2 minute pahle hi Raja apni factory se nikalkar bahar aaya aur peshab karne ke liye us khandhar ki taraf chala gaya.

Road aur khandar ke bich lagbhag 60-70 miters ka fasla tha. Raja ne khandhar ke pass peshab kiya aur Jaise hi wo wapas aane ko muda fisalkar gir gaya jisase uske kapdon aur hantho me gili mitty lag gai. Raja utha aur road ki taraf aane laga. thik usi samay Hayaa bhi us jagah pahuch chuki thi. Tabhi Hayaa ki nazar Rani ke bag par padi. Jo use andar ghasit-te samay Road ke bagal hi gir pada tha.

Hayaa ne use turant pahchan liya aur use utha liya. Tabhi uski Nazar Raja par padi. Jo uski taraf hi aa raha tha. Dono ne ekdusre ko nafrat se dekha fir Raja muskurate huwe aage nikal gaya.

Raja ke jane ke baad Hayaa bhi jane lagi. Tabhi uski nazar Rani ki sandel par padi jo kuchh dur khandhar ke pass padi hui thi. Hayaa ne waha jakar dekha to wo Rani ki sandel pahchan gai khandhar ke ekdam paas me uska dupatta pada hua tha. Hayaa ko kuchh anhoni ki aashanka hui to usne Rani ke no. Par call kiya jo uske bag me baja. Hayaa himmat karke khandhar me chali gayi to use waha Rani behoshi ki halat me dikhi.

Rani ke kapde puri tarah se fat chuke the. Uske jism par nakhoon ke nishan the. Hayaa kheekh markar daudakar uske paas gai aur apne dupatte se uske jism ko dhak diya aur rote huwe use aawaz lagai.

Rani uth ja. Kisne kiya ye sab. Use main chhodungi nahin Rani uth ja.

Lekin Rani ne koi harkat nahi ki to Hayaa ne apne bhaai ko phone karke waha bulaya aur Rani ko lekar hospital chali gayi. Police case hone par doctor ne police ko bula liya, Hayaa ne police ko sari baat batai.

To aapka kahna hai miss Hayaa ki apne balatkari ko dekha hai. Police ne poochha.

Haan Sir jab main waha pahuchi to wo meri saheli ka rape karke waha se bhag raha tha. Hayaa ne sisakte huwe kaha.

Kaun hai wo. Uska naam batao. Police ne kaha.

Mujhe uska naam to maloom nahin, lekin wo jahan kaam karta hai main aapko kal subah waha le chahungi. Wo wahi milega. Hayaa ne kaha.

Iske baad police chali gai. Hayaa ne Rani ke mummy papa ko bhi phone karke hospital bula liya aur unhe sari baat bata di. Hayaa ke pita haidar ko jab ye baat pata chali to wo bhi hospital pahuch gaye aur Hayaa ko ghar le aaye. Waha unhe ye bhi pata chala ki Hayaa is balatkar ki chasmdid gawah hai.

Hayaa ye kya kar rahi ho tum. Tumhe gawahi dene ki kya jaroorat. Ab jo hona tha wo ho gaya. Mamla police tak pahuchne se badnami hi milegi. Nahin tum uske khilaf gawahi nahi dogi. Haidar ne kaha.

Ye kaisi baate kar rahe hain aap abbu. Agar mere sath ye huwa hota aur Rani gawah hoti. Kya tab bhi aap yahi kahte. Hayaa ne haidar se kaha.

Tumhare sath huwa to nahi na. Lekin agar tumne apni jidd nahin chhodi to kal ko kuchh bhi ho sakte hai. Aur main nahin chahta ki tumhe kuchh ho. Uske abbu ne kaha.

Hayaa bhi jan gai ki uske abhu kisi kimat par use gawahi nahin dene denge, isliye usne baat yahi khatam kar dena hi behtar samjha. Aur bol diya ki wo gawahi nahin degi.

subah hui aur Hayaa Rani se milne ke bahane police station chali gai aur police ko lekar Raja ke paas chali gayi, kyonki khandhar ke pas usne aakhiri baar Raza ko hi dekha tha aur galatfahmi ki shikar ho usne Raza ko hi balatkari samajh liya tha. Wo Raza ke pass pahuchte hi ek jordar thappad uske gal par laga diya
Raza ke sath sath uske sath kam karne wale sabhi chakit rah gaye ki Hayaa ne thappad kyon lagaya.

Ye kya badtamiji hai. Tune mujhe thappad kyon mara. Raza ne apne gal sakate hue kaha.

Sir yahi hai wo jisne Rani ke sath balatkar kiya hai aur ab masoom banne ka natak kar raha hai. Hayaa ne police se kaha.

Sabhi ashcharyachakit the Raza ne balatkar kiya wali bat sunkar.

Ye kya bakwas kar rahi hai tu. Mana ki tu mujhse nafrat karti hai, lekin nafrat ke chalte tu mujhe balatkari bana rahi hai. Maine kisi ka balatkar nahin kiya hai. Tera dimag kharab ho gaya hai. Raja ne gusse se kaha.

Sir isi ne Rani ka rape kiya hai kyonki maine ise apni aankho se dekha hai khandhar se bahar nikalte huwe. Hayaa ne kaha.

Raza ne apni daleel rakhi lekin police ne uski ek na suni aur use giraftar karke le gayi. Hayaa iske baad Rani ko dekhne hospital pahuchi. Rani ki condition abhi bhi thik nahin hui thi. Raza ke mummy papa ko bhi uske giraftar hone ki baat pata chal gai. Unhe bharosha nahin hua ki unka beta aisa kar sakta hai. Wo bhi thane pahuche aur inspector se apne bete ko nirdosh bataya, lekin inspector ne unki baat nahi suni thak harkat wo bhi ghar wapas aa gaye.

Ab police ka torchar Raza par shuru ho gaya. Jab tak Rani ko hosh nahin aaya tabtak Raza ko torcher kiya jata raha. Raza ki halat bahut kharab ho gai thi. Rani ke hosh Aane ke baad Hayaa ne bataya ki balatkari pakda ja chuka hai aur use sakht saza milegi, Rani ne socha ki salim pakda gaya hai isliye wo Hayaa se lipatakar rone lagi. Rani ne Hayaa ko sabkuchh shuru se lekar aakhir tak bata diya, lekin usne bhi ek galti kar di ki kahi bhi salim ka naam nahi liya.

Rani ke hosh me aane ke 4 din baad court me sunwai thi. Raza mujrim ke katghare me khada tha aur wakil apni daleel pesh kar raha tha. Rani ko waha par laya gaya. Wo Raza ko mujrim ke roop me dekhkar bhauchakki rah gai.

Hayaa ko jab gawahi ke liye bulaya gaya to wah Pahle ki hi tarah apne bayan par kayam rahi. Rani Hayaa ki baat sunkar soch me bad gai ki jaroor Hayaa ko galatfahmi ho gai hai.

Main kuchh kahna chahti hoon judge sahab. Rani ne kaha.

Rani ko katghare me bulaya gaya. Fir rani ne kahna shuru kiya.

Judge sahab Samne khada ye shakhs bilkul nirdosh hai. Mere balatkar isne nahi balki Salim ne kiya hai.

Ab chaukne ki baari Hayaa ki thi. Use ab afsos ho raha tha ki usne anjane me bahut badi galti kar di hai. Rani ki gawahi ke baad salim ki giraftari ka aadesh court ne diya aur Raza ko ba-izzat bari kar diya gaya. Lekin ab Raza baizzat nahi raha. Uski sari izzat aur man maryada Hayaa ne taar taar kar di.

Raza pahle se hi gusse wala tha. Is ghatna ke baad Raza ka dimag hi fir gaya. Ab uski Hayaa ke prati nafrat ne badle ka roop le liye. Ab uske dimag me ye baat ghumne lagi ki jab us par ek balatkari ka tag lag hi gaya hai to ab wo Hayaa ko bataega ki Balatkar kise kahte hain.

Hayaa ke ghar wapas aane ke baad haidar ne use bahut data.

Jab maine tum se kaha tha Hayaa ki tum is case se door rahogi aur apni gawahi nahi dogi to tumne gawahi kyon di aur wo bhi ek nirdosh ke khilaf. Tumhe pata hai tumne kya kiya hai. pata nahi wo ladka ab kya karega.

Sorry Abbu. Maine usko hi waha aakhiri baar dekha tha aur galatfahmi ho gayi thi use lekar. Main jald hi usase milkar apne kiye ki maafi mang loongi. Mujhe ummeed hai ki wo meri baat samjhega.

Isi tarah din nikalte rahe. Ab Raza pahle wala Raza nahi raha. Ab uski zindagi ka ek hi maksad rah gaya tha Hayaa se badla lena. Hayaa ne bhi Maffi ke liye Raza ko bahut talash kiya, lekin Raza ne wahan kaam chhod diya tha. Ab wo bas mauke ki talash me tha aur bahut jald hi use wo mauka mil gaya.

Ek din Hayaa Market se akeli laut rahi thi. Tabhi ek van waha aakar ruki. Us van se Raza bahar nikla aur Hayaa ke munh par kapda rakh diya. Jisase Hayaa behosh ho gai. Raza behosh Hayaa ko van me dalkar faraar ho gaya.

Raza van lekar ek sunsan jagah par pahucha jaha koi bhi aata jata nahi tha. Raza ne van se Hayaa ko bahar nikala aur jameen par litakar uski kameez aur salwar utarkar fenk di aur uske hosh me aane ka wait karne laga. Kuchh der me Hayaa ko hosh aa gaya. Apni adhnangi halat aur samne Raza ko dekhkar use samajhte der na lagi ki aage kya hone wala hai.

Ye tum kya kar rahe ho mere sath plz aisa mat karo, mujhe jane do. Hayaa ne vinti karte huwe kaha.

Tujhe jane doon. Tune mujhe kahin ka nahi chhoda. Apni nafrat ka badla tune meri zindagi barbad karke liya. Tune mujhe wo dag diya hai. Jo main sari zindagi nahi bhool sakta. Tune mujhpar wo ilzam lagaya jo maine kiya hi nahi tha, lekin aaj main hakikat me wo sab karunga tere sath. Raza Gurraya.

Nahi. Aisa mat karo. Meri zindagi barbad mat karo. Main kisi ko munh dikhane layak nahi rahungi. Plz mujhe maaf kar do. Galatfahmi ke karan mujhse wo galti ho gai aur maine tumhe balatkari samajh liya. plz mujhe jane do. Hayaa ne gidgidate hue kaha.

Tujhe maff kar doon. Kabhi nahi. Tune kabhi socha hai ki maine ye bebuniyad ilzam lekar itne din kaise gujare hain. Are teri wajah se aaj main kisi se nazare nahi mila pa raha hoon. Log mujhe aise dekhte hain jaise maine sach me kisi ka balatkar kiya hai. Iski saza to main tujhe dunga. Ab jab balatkari na hote huwe bhi mujhpar balatkari ka ilzam lag hi gaya hai to aaj tera balatkar karke is ilzam sahi sabit karunga.Raza jor se bola.

Raza ke aisa kahne par Hayaa gidgidane lagi. Lekin Raza par to jaise badle ka bhoot sawar tha us samay. To usne Hayaa ki ek na suni aur uske jism se uski bra aur panti faadkar fenk di aur uske jism par pagal kutte ki tarah toot pada. Aur manmane tarike se uske jism se khela. Use raundta raha.

Hayaa uske niche tadapti rahi. Apni izzat ki bheekh mangti rahi, lekin Raza is samay kuchh bhi raham karne ke mood me nahi tha. 30 minute me Raza ne Hayaa ki asmat ko tar tar kar diya. Hayaa ka balatkar karne ke baad jab Raza ke sir se badle ka bhoot utra tab usko ehsas huwa ki usne gusse me aakar kya anarth kar diya hai.

Hayaa ek taraf nirvastr baithi hui ro rahi thi. Raza ne uske kapde diye pahanne ke liye. Haya ne rote rote apne bache khuche kapade pahan liye. Raza usase nazare nahin mila pa raha tha. Usne Hayaa ko pakadkar jabardasti van me baithaya aur use lakar wahi chhod diya jaha se wo roz college aati jati thi.
Hayaa luti piti awastha me ghar pahuchi. Uski haalat dekhkar uske abbu ne usse puchha.

Kya hua Hayaa. Ye kya halat bana rakhi hai tumne apni aur tumhare hantho me ye lal lal nishan kaisa.

Apne abbu ki baat sunkar Hayaa phoot phootakar rone lagi. Unse Abbu ko kuchh anhoni ko ashanka hui to unhone jor dekar haya se puchha to Hayaa ne rote huwe sara vrit-tant apne Abbu ko bata diya. Hayaa ki maa to rone lagi apni beti ki aap biti sunkar.

Main tumse pahle hi kaha tha. Ki tum gawahi mat dena aur in sab chakkar se door rahna, lekin tumne meri ek na suni. Naak kata kar rakh di aaj tumne meri. Hayaa ke abbu ne kaha.

Maine ye jaan boojhakar to nahin kiya na abbu. Main use chhodunhi nahin. Main abhi police station jati hoon aur police ko sab kuchh bata dungi. Hayaa ne apne abbu se kaha.

Tum kahi nahi jaogi. Bahut apne man ki kar li tumne. Kyon apne baap ki izzat sare bazar uchhalna chahti hai. Jab logo ko pata chalega to log mujhpar thookenge aur tujhe bhi chain se jeene nahi denge. Uske abbu ne kaha.

Ye aap kya kah rahe hain abbu. Main use saza dilakar rahoongi. Hayaa ne kaha.

Usase kya hoga. Sab kuchh thik ho jayega. Jab logo ko pata chalega ki tera balatkar huwa hai to tujhse shadi kaun karega. Ab to mujhe lagta hai ki teri sagai bhi tut jayegi agar unhe ye khabar mili to. Isliye tu ab kuchh bhi nahi karegi. Ise main apne tarike se handle karunga.

Apne abbu ki baat sunkar Hayaa ne turant apne hone wale shauhar ko phone kiya aur use poori baat bata di. Hayaa ke sath balatkar ki baat sunkar wo shadi se mukar gaya. Hayaa usse minnat karti rahi lekin wo apne phaisale par adig raha.

Apne hone wale damad ki baat sunkar Hayaa ke Abbu ne usse Raza ki purani company ka address lekar waha chale gaye. Waha par usne Raza ke baare me logon se baat ki, sabhi ne Raza ki tareef ki. Uski company se Raza ka address lekar wo Raza ke ghar chale gaye aur paas padoshi ke logo se puchhne par sabhi ne Raza ko nek aur achha bataya.

Jab Raza ke pita ko ye pata chala ki Raza ne Haidar ki beti ka balatkar kiya hai to unko Raza par bahut gussa aaya. Unhone Raza ko bulaya jo apne kamre me baitha huwa apne kiye par pachhta raha tha.

Ye main kya sun raha hoon Raza. Tumne ek masoom ladki ka balatkar kiya hai. Uske papa ne Raza se puchha.

Ji papa. Wo gusse me mujhe ye anchaha apradh ho gaya. Raza ne apne papa se apradhi ki tarah sir jhukakar kaha.

Chataakkkkkk. Tabhi pure kamre me ye shor ubhara. Raza ke papa ne ek jordar thappad uske galo par laga diya.

Nalayak. Ye kya kiya tune. Tujhe ek masoom ke sath aisa karte huwe sharam nahi aai. Yahi sankar diye hain maine tumhe. Maine tumhe maf karna sikhaya hai. Kisi se badla lena nahi. Aur tumne aaj mere sanskar ko gali di hai. Nikal ja mere ghar se abhi ke abhi. Raza ke papa ne gusse se kaha.

Dekhiye bhai sahab. Aap Raza ko ghar se mat nikaliye. Main ek prastav lekar aapke pasa ayaa hoon. Ummeed hai aap mana nahi karenge. Main ye chahta hoon ki Raza Meri beti se shadi kar le. Jisse meri badnami bhi nahi hogai aur meri beti ke upar laga kalank bhi mit jayega. Hayaa ke abbu ne kaha.

Ye kya kah rahe hain aap bhai sahab. Is nalayak ne jo kaam kiya hai uske liye to ise police me de dena chahiye. Aur aap shadi ke liye kah rahe hain. Ek to aap aur ham doosre dharam ke hain aur doosra Hamari haisiyat kuchh nahi hai apke samne.Raza ke Papa ne kaha.

Main taiyar hoon papa. Maine gusse me aakar jo galti ki hai usko main nakar nahi sakta. Main janta hoon ki meri galti mafi ke kabil nahi hai. Fir bhi main apni is galti ka prayashchitt karunga. Aap ek baar apni beti se bhi is bare me baat kar lijie.Raza ne kaha.

Raza ki baat sunkar Hayaa ke abbu ko thodi khusi mili. Wo wapas apne ghar ko laut gaye. Usne jane ke baad Raza ne kaha.

Papa plz mujhe maaf kar do. Mujhse gusse me ye galti ho gai aur main is galti ka prayashchitt karunga. Main aapko bharosha dilata hoon ki main aage aapko shikayat ka mauka nahin dunga.

Apne bete ki baat sunkar unhone Raza ko gale laga liya aur aane wale jeevan ke liye shubhkamnaye di.

Ghar lautkar jab haidar ne Hayaa ki shadi Raza se karne ki baat kahi to ghar me bawal ho gaya. Koi bhi is faisle se razi nahi hua.

Hayaa ki shadi Raza se hi hogi. Main samaz me apni badnami nahin hone dunga aur na hi Hayaa ki. Is shadi me hi sabki bhalai hai. Haidar ne kaha.

Kaafi samjhane ke baad bhi jab Hayaa is Shadi ke liye taiyar nahi hui to unhone apni jaan dene ki dhamki de di jiske karan Hayaa beman se is shadi ke liye taiyar hui.

Raza aur Hayaa ka ek nishchit din court marriage kara diya gaya. Hayaa ki taraf se uske maa aur abbu the. Hayaa ka bhaai is gair majhab shadi ke bahut khilaf tha isliye wo nahi aaya tha. Raza ki taraf se uske mata pita aaye huwe the.

Court me shadi ho jane ke baad Hayaa Raza ki dulhan bankar uske ghar aa gayi. Lekin uske dil me Raza ke liye bahut nafrat bhari thi. Raat me Raza kamre ke andar aaya aur bister par baith gaya.

Hayaa.. abhi Raza ne itna hi bola tha ki tabhi Hayaa gusse se boli.

Tumhaari himmat kaise hui mere saamne aane ki. Nikal jao mere samne se main tumhari shakl bhi nahi dekhna chahti.

Hayaa. Mujhe maaf kar do. Mujhse gusse me itna bada paap ho gaya. Main apne kiye par bahut sharminda hoon. Raza ne nazre jhukakar kaha.

Meri zindagi barbad karke mafi mang rahe ho. Mujhe tumse nafrat hai aur hamesha rahegi. Hayaa ne kaha.

Hayaa ki baat sunkar Raza ne use manane ke liye uska hanth pakad liya, lekin isase Hayaa aur bhadak gai.

Achha to tumhe mera jism chahiye. Mera balatkar karke tumhara man abhi nahi bhara. To ye lo ek baar aur mera balatkar kar lo. Itna bolte hi Hayaa ne apni sadi ka pallu niche kar diya.

Tumhara dimag kharaab ho gaya hai. Tum mere bare me itna ghatiya sochti ho. Raza itna bolkar kamare se bahar nikal gaya aur apni maa ke paas jakar let gaya. Maa ke puchhne par usne sari baat bata di.

Apne rishte ko thoda vakt de beta. Sab thik ho jayega. Bas bhagwan par bharosha rakh. Maa ne kaha.

Isi tarah din gujarte rahe aur Raza Hayaa ki nafrat aur kadwe shabdo ka ghoot pita raha.

Ek din Raza kisi kaam se bahar gaya tha aur use aane me der ho gayi. Jab wo ghar wapas aaya to Hayaa uspar barash padi.

Tum kaha Gaye the aur ye kaisi haalat bana Rakhi hai tumne Apni ekdam luti piti hui. Doosre ki izaat lootne wala aaj khud luta huwa ghar aa raha hai.

Hayaa ne gusse aur nafrat bhara tanz Raza par kiya. Jise sunkar Raza ko bahut gussa aaya. Lekin usne apne ko niyantrit kar gardan nichi kar bas itna hi keh paata hai.

Kuchh kam se bahar gaya tha waha par kuchh dost mila gaye isliye aane me der ho gayi.

Raza ne bahut dhire se ye baat kahi thi Usme ab itni himmat nahi thi ki Priya ke sawalo ka achhi aawaz me jawab de sake.

Maine socha tha ki aaj phir kisi ladki ki izzat lootne gaye the. Hayaa ne kaha.

Raza uski baato ko nazarandaz karta huwa rasoi me chala gaya aur khana nikal kar khane laga. Khana khakar wo apni maa ke pasa jakar so gaya.

Isi tarah kuchh din aur beet gaye. Hayaa bhale hi Raza se nafrat karti thi aur use mauka milte hi jaleel karne ki koshish karti thi, lekin Raza ke mummy papa ko wo pura samman deti thi. Unke khane pine nashte aur har jaroori kaam ka dhyan rakhti thi.

Kuchh din baad Raza ke kuchh dost usase milne aane wale the. Unke aane se ek din pahle Raza Hayaa ke paas gaya aur bola.

Hayaa. mere kuchh dost hai bachpan ke. jo bahar rahte hain. abhi wo sab ghar aaye huwe hain. Jab unhe maloom huwa ki meri shadi ho gayi hai to unhone tumse milne ki zid ki. To maine unhe kal bula liya hai. Kal tum achchhe se taiyar ho jana.

To main kya karu. Aur main tumhari koi bivi vibi nahi hoon. To tum mujhpar apna hukum chalana band karo. Mujhe tumse aur tumhare dosto se koi matlab nahi hai.Haya ne 2 took jawab diya.

Plz Hayaa aisa mat kaho. Maine unhe kal ke liye bol diya hai. Ab meri izzat tumhare hath me hai. Plz unke samne koi tamasha mat karna. Raza ne kaha

Tamasha main karungi. Tamasha to tumne bana diya hai meri zindagi ko. Tum bahut hi ghatiya aur behya insan ho. Jo meri zindagi kharab karke bhi besharmo ki tarah mujhse baat kar rahe ho. Hayaa ne gusse se kaha.

Raza ne ab tak bahut bardast kar liya tha Hayaa ki kadvi, jali kati baaton ko, lekin is baar uska sabr jawab de gaya. Wo bhi gusse se chillaya.

Maine zindagi barbaad ki hai tumhari. Zindagi to tumne meri barbaad kar di. Maine tumhara kya bigada tha jo tumne mujhe balatkari sabit kar diya. Usi gusse me aakar mujhse ek anchaha pap ho gaya. Jise main manta hoon aur pashchatap kar raha hoon. Lekin tum to din raat, uthate baithte mujhe jaleel kar rahi ho. Thik hai tumhara jo man ho wo karo.

Itna kahkar Raza kamre se bahar chala gaya. Hayaa aascharya se Raza ko jate hue dekhti rahi. Shadi ke itne din baad aaj pahli baar Raza ne Hayaa se itni uchhi aawaz me baat ki thi. Jo Hayaa ko achha nahi laga.

Agle din Raza ke kuchh dost Raza ke ghar aaye. Sab kuchh Hayaa ne hi banaya Chay nashta karne ke baad Sabhi logo ne Hayaa se milne ki farmaish kar di.

Baat ye hai ki Hayaa ki tabiyat kharab hai isliye wo aapse nahi mil sakti. Maaf karna mujhe dosto. Raza ne kaha

Kisne kaha ki main nahin mil sakti aur meri tabiyat kharab hai. Haan bas thodi si thakan hai. Jo aaram karne ke baad thik ho jayegi.

Hayaa ne aakar sabhi ko namaste kiya. Sabhi ne Hayaa ko namaste kiya. Sabhi doston ne Hayaa ki khoobsurti ki bahut tareef ki. Kuchh der rukne ke baad wo log chale gaye to Raza ne Hayaa ka shukriya adaa kiya.

Jyada khush hone ki jaroorat nahi hain. Maine tumhe maaf nahin kiya hai aur na kabhi karungi. Main nahi chahti thi ki jis baat ko dabane ke liye mere abbu ne meri tumhare sath jabran shadi karwai hai. Wo kisi ko pata chale, isliye main tumhare doston ke samne aai thi. Hayaa ne Raza ke shukriya ka jawab tanz bhare lehze me diya.

Aur haan. Mujhe apne Ammi se milne jana hai. To kal tum mujhe mere ghar le kar chalna. Hayaa ne kaha.

Raza ne uski baat ka koi jawab nahin diya aur ghar se bahar chala gaya. Raat me Raza ke mummy papa ne Hayaa ke apne ghar ghumne jane ki baat par apni manjuri de di.

Agle din Raza Hayaa ko liwakar apni sasural gaya. Hayaa ke abbu aur ammy apni beti se milkar bahut khush huwe, lekin Hayaa ka Bhai Jaid Raza se milne ke baad bola.

Ye tumne bilkul bhi thik nahi kiya meri bahan ke sath. Iska khamiyaza tumhe bhugatna padega.

Jaid ki baat sunkar uske abbu ne use data aur Raza se uske bartav ke liye maafi mangi. Sham ko Hayaa aur Raza vapas ghar aa gaye.

Kuchh din isi tarah gujre. Hayaa apni kadwahat Raza par ugalti rahti aur Raza apne gusse ko pite huwe prayashchitt ke karan sab sunta rahta.

Ek din Rani Hayaa se milne Raza ke ghar gayi. Us samay Raza bahar gaya huwa tha. Hayaa aur Rani baithe huwe baate kar rahe the. Kuchh der baad Raza ghar aaya. Rani ne Raza ko namaste kiya.

Aur bataiye jeeja ji sab kaisa hai aur kitna khyal rakh rahe hain meri dost ka.Rani ne poochha.

Wo to tum apni saheli se hi poochh lo. Waise kya bate ho rahi thi dono saheliyon mein.

Abhi rani kuchh bolti usse pahle hi Hayaa bol padi.

Tumhe ek baar me samajh nahi aata. Mere mamle me tang mat adaya karo. Kitne ghatiya insan ho tum jaha ladki dekhi wahi shuru ho jate ho.

Hayaa ki baat sunkar Raza ko bahut gussa aayaa. Aaj pahli baar kisi aur ke samne Hayaa ne Raza ki beijjati ki thi. Rani ko bhi Hayaa ka Raza ke liye aisa bartav achha nahi laga. Raza bina kuchh bole apna sir jhukakar waha se chala gaya. Raza ke jane ke baad Rani ne Hayaa se kaha.

Ye sab kya tha Hayaa.

Usne jo kuchh mere sath kiya. Uske liye ye to bahut kam hai. hayaa ne kaha.

Kya kiya usne tere sath. Aur tu kya kar rahi hai uske sath. Rani ne kaha.

Jaise Tujhe pata hi nahi ki isi ne mera balatkar kiya aur isi karan majbooran mujhe isase shadi karni padi.

Mujhe sab pata hai aur abhi ke tere bartav ko dekhkar mujhe lag raha hai ki tu roj Raza se aise hi baat karti hogi. Rani ne kaha.

Wo isi layak hai Rani. Isne meri zindagi barbad kar di. Hayaa ne kaha.

Dekh Hayaa ek baat kahungi tujhse. Tu uske sath bahut anyay kar rahi hai. Usne tera balatkar kyon kiya. Kyonki tune ek begunah aur sidhe sade insan ko balatkari sabit karne me koi kasar nahi chhodi. Rani ne kaha.

Haan mujhse galti ho gai thi anjane me. Hayaa ne kaha.

Aur tumne aaj tak us galti ke liye Raza se mafi nahi mangi. Upar se roj uske sath aisa bartav karti hai.usne gusse me aakar tere sath galat kiya, lekin usne apni galti sweekar ki aur apni galti ka prayashchitt kar raha hai.

Usne tere sath jabardasti to shadi ki nahin. Tere abbu khud aaye the usase shadi ke liye kahne. To tujhe apne abbu se bhi naraz hona chahiye. Acchaa ek baat bata. Shadi ke baad kya kabhi Raza ne tumhare sath jabardasti karne ki koshish ki, kya kabhi usne tumhe tumhari galti ka ehsas karaya. Kya kabhi tumhare sath galat bhasha aur unchi aawaz me baat ki. Rani ne Hayaa se puchha.

Nahi usne kabhi bhi aisa nahi kiya, balki main jo bhi usase kah deti hoon chupchap sunkar chala jata hai. Hayaa ne kaha.

To soch tu Hayaa. Jo insan apni galti ko mankar tumhara tana din raat sunta rahta hai. Tumhe palatkar jawab bhi nahi deta. Wo insan dil ka kitna achha hoga. Jo apni ek galti ke karan tumhari har jumlo sitam ko sir jhukakar sun aur sah raha hai. Kabhi tum apne aapko uski jagah par rakhkar dekho. Aur uski mano sthiti ke bare me socho. Ki wo kis daur aur pida se gujar raha hai. Meri ek baat maan le Hayaa. Sab kuchh bulakar use ek mauka de de. Wo bahut achha ladka hai.

Uske baad Rani aur Hayaa me kafi der batchit hui. Fir jab Rani jane lagi to usne ekbar fir kaha.

Hayaa. Tumhe Pati ke roop me ek achha insan mila hai. Raza hira hai. Uski chamak ko parakh. Aur apni zindagi ko ek mauka de. Kahi aisa na ho ki jab tak tumhe ye samajh me aaye tab tak bahut der ho jaye. Mujhko dekh maine to us hadse ko bhoolkar apni jindagi naye sire se shuru kar di hai. Achha ab main chalti hoon. Meri baato par ekbaar achhe se gaur karna. Baki teri marzi.

Itna bolkar Rani chali gayi, lekin Hayaa ko ek gahri soch me chhod gayi. Abhi tak Hayaa ne kabhi bhi poore ghatna kram par vichar hi nahin kiya tha, lekin Rani ke kahne par Hayaa ne shuru se lekar ab tak ki sthiti par gaur kiya. Use bhi realise huwa ki Agar Raza gunahgaar hai to usko gunahgaar banane wali wo khud hai, ab use khud par gussa aa raha tha ki usne Raza ke sath ab tak kitna bura bartav kiya. Isi soch vichar me aaj ka din bit gaya.

Agle din subah Hayaa ki tabiyat bahut jyada kharab ho gayi. Raza turant use lekar Hospital chala gaya. Janch karane par pata chala ki Wo Vidol positive hai. Raza ne turant usko admit karwaya aur apne aur Hayaa ke gharwalo ko inform kiya. Uske mata pita aur Hayaa ke Abbu aur Ammi hospital aa gaye. Rani bhi usse milne ke liye aai. Pure din hospital me rahne ke baad raat ko Raza ki mummy hospital me rukna chahti thi, lekin Raza ne sabhi ko ghar bhej diya aur khud hospital me ruk gaya.

Hayaa pure 5 Hospital me rahi aur Raza ne use ek minute bhi akela nahi chhoda. Hayaa bhi Raza ki apne liye itni care dekhkar bahut khush thi aur khud par gussa bhi aa raha tha. Use Rani ki baat yaad aa rahi thi ki Raza heera hai.

5 din baad Raza Hayaa ko discharge karakar apne ghar le aaya aur uski puri tarah se dekhbhaal ki. Ab Hayaa ke man me Raza ke liye Nafrat khatam ho gai thi aur wo Apni zindagi ko Raza ke sath ek mauka dena chahti thi.

Sadi se lekar Abhi tak usne Raza ke naam ka Sringar Nahi kiya tha. Wah apni nai zindagi Raza ke naam se shuru karna chahti thi. Wo Raza se apne kiye huwe dur-vyavhar ke liye Maffi mangna chahti thi. isliye jab Raja subah kaam par jane laga to Hayaa ne puchha.

Ho sake to tum aaj ghar jaldi aana. Mujhe kuchh jaroori baat karni hai tumse.

Raza haan mein sir hilakar kaam par chala gaya. Hayaa dophar baad se hi Raza ke naam ka solah sringar kiye uska intezar karne lagi, samay bit-ta gaya lekin Raza ghar nahi lauta. Hayaa kamre se bahar aa gayi aur Raza ka intezar karne lagi. Raza ke maa baap bahut khush huwe Hayaa ko is roop me dekhkar. Tabhi Hayaa ka phone baja. Call receive karke samne wale ki baat sunkar Hayaa ke hantho se phone chhutkara jameen par gir pada.

Mummy papa Raza ko goli lagi hai aur wo hospital me hai. Hayaa ne rote huwe kaha.

Maa baap ke hosh hi ud gaye ye sunkar. Sabhi turant hospital pahuche. Hayaa ne apne abbu Aur Rani ko phone karke ye bata diya. Uske abbu aur ammi bhi hospital pahuche. Raza ka ek mitr hospital me tha. Usne puri ghatna ki jankari gharwalon ko de di. Raza ka opration karke goli nikal di gai jo uske kandhe par lagi thi. Raza ko icu se ward me sift kar diya gaya tha. Sab gharwale Raza se milne ke liye gaye. Thodi der baad ek inspector Raza ka bayan lene ke liye aaya.

Hello Mr. Raza ab tabiyat kaisi hai aapki. Mujhe aapka bayan lena hai.

Thik hain sir. Puchhiye kya puchhna hai. Raza ne kaha.

Aap par jisne Goli Chalayi thi. Use Hamne ek chasmdid ki sinakht par giraftar kar liya hai. Uska naam jaid hai. Aur wo Mr. Haidar ka beta aur aapka sala hai. Kya aap par goli jaid ne chalai. Inspector ne puchha.

Inspector ki baat sunkar waha sab chauk gaye. Bahar baithi Hayaa aur Rani bhi chauk gai. Kisi ko vishwas hi nahi huwa ki jaid ne Raza ko goli mari hai.

Nahi inspector maine goli marne wale ko apni aankho se dekha hai. Wo jaid nahi tha dekhne wale ko jaroor kio galatfahmi hui hai. Raza ne apna bayan de diya.

Raza ke bayan ke baad jaid ko chhod diya gaya. Use bhi apni galti ka ehsas ho gaya aur wo hospital gaya. Uske abbu ne use kheech kar thappad mara Raza par goli chalane ke liye. Wo sir jhukakar Raza ke pairon par gir pada aur rote huwe bola.

Mujhe maaf kar do jeeja ji. Bahut badi bhool ho gayi mujhse. Main aapse gussa tha aur usi gusse me main apni bahan ka suhag ujadne chala tha.aap sab log mujhe maaf kar dijie.

Jaid ke maafi mangne ke baad sabhi ne use maaf kar diya.

Kya Hayaa nahi aai mujhse milne? Raza ne sawal kiya.

Raza ki baat sunkar Hayaa apne aapko rok na payi aur andar jakar Raza se lipatkar foot foot kar rone lagi aur boli.

Mujhe maaf kar do. Mujhse bahut badi galti ho gai. Maine jaan bujhkar tumhare sath bura bartav kiya. Tumse kabhi bhi pyaar se baat nahi ki. Hamesha tumhara dil dukhaya. Tumhare bare me jankar ki tum hospital me ho, meri to jaan hi nikal gai thi. Main tumhare bina nahi jee sakti Raza. Main tumse bahut pyaar karti hoon.

I LOVE YOU Raza.

Hayaa ke itna bolne par pichhe taliyon ki gadgadahat sunai padi. Jab Hayaa ne pichhe mudkar dekha to sab use hi dekh rahe the. Ye dekhkar Hayaa ko bahut sharm aai aur usne sharmakar apna sir Raza ke sine me chhipa liya.

Iske baad Raza jab tak thik nahi ho gaya Hayaa ne man lagakar uski sewa ki. Uska khyal rakha.

Is tarah nafrat se shuru hui ye kahani pyaar par aakar khatam hui.


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_SMOOKER_X_

Ne dis jamais que je t'aime
Supreme
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189
Love Triangle...
Raat 2 bje...

" Unko bhi mujhse mohabbat ho jaruri toh nahi...
Ek si dono ki halat ho jaruri toh nahi...

Dil ki chahat toh kai khaab jaga deti hai...
Haan magar sath me kismat ho jaruri toh nahi...

Woh wade karke bhool jaya karte hai..
Mujhko bhoolne ki aadat ho jaruri toh nahi...

Kehte hai aansun kar dete hai byan gum dil ke.. .
Mujhko bhi rone ki aadatho jaruri toh nahi.. "

Aankhon me nami ek haath me ciggrett dusre hath ek khoobsurat ladki ki photo liye Kabeer pritam da. Ki yehi shayri yaad kar aansun baha raha hai...

Kabeer.... Aaj tumko gaye hue 4 saal 2 mahine 12 ghante 44 minutes ho chuke hain... Pata nahin tum kahan ho... kaisi ho kya kar rahi ho shayad Tumko main yaad hoon yah Nahin bhi magar in 4 saal 2 mahine 12 ghante aur 44 minutes mai aisa koi Pal Nahin Aaya jab maine tumhen yaad na kiya ho jab Maine tumhen pyar Na kiya ho...

Kya tum bhi mujhe yaad karti ho kya tum bhi mujhe pyaar karti ho.. yeh mai kya soch raha hoon tum toh ab tak mujhe bhool bhi gayi hogi...

Mujhe aaj bhi yaad hai woh din jab pehli baar tumse mila... jab papa ka yaha transfer hua... School ke pehle din jab mai andar jaane se darr or maa ko yaad kar aansun baha raha tha tab tum aayi or mera hath pakad mujhe andar le gai.. meri saari ghabrahat door kar.. jab maine pucha kon ho tum.. tab tumne mujhe apna best friend bola... Or yehi baat apni doston ko bata mera introduction diya... tumhara yun sabke samne mujhe apna best friend kehna pata nahi kyun mere nanhe dil mai bass chuka tha...

Woh tumhari bholi soorat meethi baatain pata nahi kaisa ehsaas tha.. woh school jaha mai jaane tak se darr raha tha.. ab roj subh ka intjaar rehta.. tumse mulakaat ka intjaar rehta...

Ek din jab mai home work nahi kiya tha toh teacher ne mujhe murga banaya... Tab saare dost tumhare tumhe chida rahe the... Jisse tumhari aankhon me bhi nami aa gai thi...
Uss pal bta nahi sakta kaisa lag raha tab se mai kasam khaya tha ki meri wajah se in aankhon me fir kabhi aansun nahi aayenge...

Dhere dhere hum bade hote gaye... Or mujhe pyaar ka matlb samjh aaya magar mai toh tumse bachpan se hi krta tha toh mere liye kuch jayada naya nahi tha... Or mujhe bhi poora yakeen tha ki shayad tum bhi mujhse waisa hi pyaar karti ho jaisa mai... Par agar nahi hua or tum mujhe chodd kar chali na jao isi karan mai kabhi tumse apne dil ki baat kehna saka...

Ek din himmat kar jab tumhe apni dil ki baat kehne... jab mai tumhare ghar gaya toh pata chala ki tumhare dadaji ki maut ho chuki hai aur tumhari dadi chahti hai ki tum unke pass rehkar aage ki padhaai Puri karo... isliye tum hamesha ke liye yah shahar chhod Kar ja rahi thi.... kehne ko tumse bahut kuchh tha magar main keh Na saka use Raat main phut phut kar roya... Tumhe jaate waqt dekhne ki himmat na thi isliye khud ko kamre mai band kar liye tha... Mujhko yakeen hai shayad tum aayi ho mujhe milne magar mai kaise tumko khudse door jaate dekhta... kaise keh deta rukk jao mai tumhare bina jee nahi paunga... Uss pal ko aaj bhi yaad kar rota hoon...

Itni saari job offers ke baad bhi iss sheher ko na chhod paya mai... Tum na sahi magar iss sheher mai tumhari yaadein toh thi mere sath... Mai unhi yaadon ke sahare apni Zindagi kaat leta... magar kismat ko kuch or manjoor tha meri shaadi pakki ho chuki hai.. mere laakh mana karne ke bawajood mummy ne mujhe roo roo kar majboor kar diya... ab mai ek maa ko kaise rote dekh sakta hoon... Mai kal yeh seher chhod kar jaa raha hoon... Agar yaha raha toh shayad tumhe na bhool paaun magar mai apni maa ke liye poori koshish krunga... Poori koshish krunga jaan...

Abhi mai apni yaadon mai khoya hi tha ki tabhi gate knock hua...

Takkk takkk... beta Kabeer.... Utho kitna or sona h jaldi karo hume niklna bhi hai...

Mai sapno ki duniya se bahaar aa ek nazar ghadi ki taraf dekha toh subh ke 8 baj chuke the... Matlab poori raat kab gujar gai pata hi nahi chala... Photo ko ek baar choom kar maine use takiye ke neeche rakh diya or angdaai lete hue chal diya fresh hone...

Taiyaar hokar maine apna saara saaman pack kiya or bag le bahar chal diya... Gate par phunch ek najar palat kar room ko dekha jahan kitni hi yaadain meri jaan ke sath thi... Aansun ponch mai bahar chal diya jahan sab mera hi wait kar rahe the... Mai ghar ke har kone ko dekh raha tha jaha meri jaan ki yaadain thi... Woh saari yaadain meri aankhon ke saamne kisi film ki tarah chal rahi thi...

Dhere dhere saara jarurat ka samaan car me rakh hum chal diye seher se door... Dekhte hi dekhte kab hum phunch gye pata hi nahi chala mai toh apni jaan ki yaadon me khoya hua ki tabhi mom mujhe hosh mai laayi or maine saara saaman utar andar chal diye fir poora din... Saaman jamane mai hi lag gya.. raat ka khana sabne bahar se mangwa liye jise maine khane se inkaar kar diya tha qyunki mera yaha man hi nahi lag raha tha.. jaise hi mai apne room me phuncha mujhe ghutan si hone lagi... Maine turant apna bag khol apni jaan ka photo nikala or use betahasha chumte hue seene se lga rota raha fir kab subh ho gai pata hi nahi chala....

Suraj ki kiran jab mere chehre par padi tab mujhe hosh aaya.. mujhe yaha kuch bhi aacha nahi lag raha isliye ghar se bahar nikal park mai chal diya.. wanha phunch maine thodi bhut exercise kar ek bench par baith aane waali Zindagi ke baare mai soch raha tha ki tabhi mere Dil ki dhadkan achanak se badh gai... shareer mai baichaini badhne lagi yeh baichaini se mai aachi tarah se parichit tha..

Isliye mai turant uth kar park mein idhar udhar daud lagane laga lekin mujhe woh kahin na dikhi... Hataash or niraash hokar mein bahar ki taraf abhi ja hi raha tha ki mujhe Kisi ki awaaz sunai di aur maine use taraf palatkar Dekha to ek ladki ladke ke baahon me jhool rahe mujhe pta nhi kyun aisa lag raha tha jaise mai use jaanta hoon dil bhi ishara kar raha tha... Abhi mai usko dekhne ke liye aage badh hi raha tha ki mera phone ring kiya...

Maine dekha tou meri mangetar Sapna ka call aa raha tha... Maine pick kar kuch der baat ki usne aaj mujhe shopping ke liye bulaya tha... Waise bhi mera man ghar me nahi lag raha tha toh maine haan bol di... Fir thodi bhut baat kar aage badha hi tha ki maine ek nazar uss ladki ki taraf dekha toh woh wanha se jaa chuki thi... Fir mai bhi wanha jayada na rukk kar ghar ki taraf chal diya...


Ghar phunch kar mai taiyaar hokar bahar chal diya... Shopping me abhi time isliye mai sheher ghoomne ka soch nikal gya thoda man abhi bhi ashant tha... Qnki yaha kahi bhi meri jaan ki yaadain na thi... Doopahar tak ghoomne k baad mai mall phunch gya jaha Mai apni mangetar ka intjaar karne laga jo jayada der na chala kuch hi der mai woh mere pass aa gai...

Aate hi mere gale lag gai.. jiske jabab mai maine kuch na kiya... Ek nazar usne mujhe dekha or muskurate hue mera hath pakad andar chal di... pata nahi uska yuh sabke samne hath pakdna mujhe ajeeb si feeling de raha tha... Sapna bhi kisi se kam khoobsurat nahi thi.. magar mere jaan ki jagaah koi kaise le sakta tha... 2 ghante tak humne milkar dher saari shopping ki jisme jayadatar samaan mera hi tha... use jo kuch bhi pasand aaya mere liye leti gai...

Uske baad woh jabran mujhe coffee shop le gai jaha humne ek ek coffee pee is dauraan woh mujhse dher saari baatain karti rahi lekin mera dhyaan toh kahi or hi tha... 1 ghante tak jab uski baatain khatam hui toh usne mujhe dekha mera dhyaan kahi or paa woh thoda gussa hui.. usne mujhe jaane k liye bola jise sun mai turant uth bahar ki taraf chal diya... Use shayad aisi umeed na udaas man se woh bahaar aayi.. usne aage badh mujhe gale lagane k liye bahain failayen magar mera dhyaan fir kahi dekh gusse me bye bol chali gyi... Shayad raste mai ek do boon aasun bhi bahayen ho magar mujhe usse kya farak padd raha tha...

Mai bhi wanha se nikal ghar phunch gya... Or raat tak kamre mai band apni jaan se baatain karta raha ( photo se ) raat ko mom ne dinner k liye kaha maine bahar se kha kar aaya hoon keh kar inkaar kar diya... uske baad kab neend aa gai pata hi nahi chala...

Subh uth kar fir mai park ki sair karne laga abhi mujhe aaye hue kuch hi der hui thi ki fir se mujhe jaani pehchaani feeling aane lagi dhadkan achanak se badh gai... Mai apni exercise chhod park mein idhar udhar daud lagane laga.. tabhi mujhe kal waala ladka fir se dikhai diya... jo kal ladki ko gale lgaya hue tha uski peeth meri taraf thi isliye ladki ko na dekh paya tha...

Abhi usko aaye hue kuch hi der hui thi ki tabhi maine jo dekha use dekh meri aankhen apne aap aansun bahane lagi... Samne se meri jaan chalkar aa rahi thi jise dekh meri aankhon se jhar jhar aansun bahane lage... Mai sab kuch bhool aansun ponch uski taraf badh hi raha tha ki woh aai or aage badh usne saamne khade ladke ko gale laga liya..

Mai toh jaise stabdh hi reh gya tha... Meri saari duniya saare sapne aankhon se saamne se gujar gye or mai wanhi neeche baith rota raha... Mere dil mai mujhe ashehniy dard ho raha tha.. mai khud ko thappad maar raha tha yeh sach nahi ho sakta nahi... Yeh jhooth hai yeh sach nahi hai... Nahi meri jaan mujhe pyaar karti hai mujhe bharosha h yeh woh nahi ho sakti... Jaan jaan keh kar mai chillata raha magar wanha koi nahi tha meri cheenkh sunne wala subh ke 9 baj chuke the... Pura park khaali ho chuka tha... Or sab log apne ghar jaa chuke the... Mai bhi paagalon ki tarah rota cheenkhta chillta road par bhagne laga aati jaati gadiyan horn ki awaaz mujhe kuch sunaai nahi de raha tabhi mai kisi cheez se takaraya or meri aankhon ke saamne andhera chaa gya mujhe kuch dikhai nahi diya siwaye ek cheenkh ke...

Kabbbbbeeeerrrrrrr.......

Mai aankhen khol uss shaks ko dekhne ki koshish ki magar main dekh na paya or wanhi behosh ho gya...

Kuch samay baad jab mujhe hosh aaya or maine aankhen kholne ki koshish ki... tou achanak tej roshni se mujhe kuch dikha nahi upar se sir or badan me dard ke karan me hil bhi nahi paa raha tha... Mujhe baichaini hone lagi mujhe meri jaan ke paas jaane do kehkar mai uthne hi wala tha... Tabhi mere hath par kisine hath rakha or ek hath mere sir par uss komal sparsh ke karan me shant ho gya fir para nahi kab neend ki waadiyon me kho gya...

Dubara jab hosh aaya or maine aankhen kholi toh dekha mera poora parivar mere samne tha... Sabke chehron par aansun chalak rahe the... Sab puch rahe the kya hua tha kaise hua... But mai kya bolta mujhe toh abhi hosh hi nahi sab puchte rahe magar mujhe kuch sunai hi nahi de raha tha... Mai toh abhi bhi apni jaan ke baare mai soch raha tha kaise woh kisi or ki ho sakti hai.. itni badi saja kaise de sakti hai mujhe... Mana mai nasamjh hoon nahi bol paya but use toh mera pyaar dikhna Chahiye tha na.... Bachpan se abhi tak maine bhagwaan se kuch nahi maanga kaise woh itna kathoor ho sakta hai.. yeh sab soch ek baar fir aankhen nam ho gai..

Tabhi kisi ka hath maine gaal par mehsoos kiya yeh mom thi jo mere aansun ponch rahi thi... Maine ek nazar unko dekha unki aankhon mai aaj pehli baar aansun dekh mujhe khud par gussa aane laga... Fir ek labmi saans chod kar maine ek man gadant kahani mom ko sunai jise unhone maan liye lekin ek shaks tha jo jayada react nahi kiya... Or jab maine use goar se dekha toh uski aankhen sooji hui lag rahi thi... Jaise bhut der tak roti rahi ho....

Abhi mai use dekh hi raha tha ki mom ne jo kaha use sun mai stabdh reh gya...

"Are beta sapna wanha kyun khadi ho 2 din se toh yaha se hili bhi nahi.... Doctor ki tak naak mai dum kar diya tha mera Kabeer kab theek hoga... Use kuch hua toh nahi... Ab or jab use hosh aa gya hai toh itni door kyu khadi ho yha aao " sapna ek nazar mujhe dekha fir paas aakar khadi ho gai mom ne ek baar uske maathe ko chooma fir bolna shuru kiya...

" Aaj tum nahi hoti toh pata nahi mere Kabeer ka kya hota... Hum toh darr hi gye the jab hume tumhara call aaya iske papa bhi yaha nahi the... Mai akele yeh sab kaise sambhalti mai tumhara Zindagi bhar ehsaan mand rahungi "

Sapna " mummy ji yeh aap kya keh rahe hain kya yeh mere kuch nahi lagte.. " kehte hue usne ek nazar mujhe dekha or uski aankh se aansun girne lage.. jise mom ne gale laga kar saaf kiya or maafi maangi tab jaakar wo kahi shaant hui...

Magar kya pata yeh tofaan se pehle ki shaanti bhi ho sakti hai.. abhi tak jo baat hui usse mujhe yeh toh pata chal gya tha ki sapna hi mujhe yaha lekar aayi hai.. or ho na ho use meri jaan ke baare mai pata chal gya ho... Jaise use dekh kar pta chal raha tha ki haan use kuch shak toh hua hai.. waise bhi mai ek acche din ka intjaar kar raha tha batane ke liye... Qyunki koi bhi rishta jhooth se shuru hua ho woh jayada nahi tikta.... Magar woh din aise aayega mai soch bhi nahi sakta tha...

Khair kuch der baad doctor aaye or mujhe check karne ke baad sabko bahar jaane ko bola koi ek rukk sakta hai mere pass yeh kehkar hospital ke kuch niyam hote hai... Fir sab baari baari mujhse milte rahe magar sapna nahi aayi dheere dheere raat ka samay ho gya maine kasam de kar sabko ghar bhej diya qyunki 2 din se kisi ne aaram nahi liya tha... Sab mere haal chaal le ghar chale gye main akela reh gya fir jaan ki yaad mai chala gya uska roothna mera manana uska birthday uski favourite paani puri ke liye jhagadna sab soch aankhen fir nam ho gai...

Mujhe kuch hosh nahi tha ki mere hath par kuch geela geela mehsoos hua jab maine gaur kiya toh yeh sapna hi thi jo mere pass baithi mere hath pakad aansun baha rahi thi.. uska poora cheha bheega hua tha jiski kuch boonden mere hath par gir rahi thi...

Mai... Ab tum kyun ro rahi ho tumhe kya hua...

Sapna... ( Usne meri aankhon me aankhen daal kaha ) Kya tumne akele pyaar kiya hai... Kya mujhe rone ka bhi hak nahi...

Jise sun mere totte udd gye kuch pal ki mulakaat me usne mujhe apna sabkuch maan liya tha... Pata nahi kyun mai uska or apna pyaar compaire karne laga jaha meri soch yeh thi ki mera pyaar 14 saal purana hai or sapna se mai bas mehaz 3 mulakaat hui hai... Iske chalte mujhe apna pyaar jayada lag raha tha... Lekin fir bhi uske aansun dekh pta nahi kyun mujhe takleef ho rahi jabki mai toh ise pyaar bhi nahi karta or shayad isko bhi pta hai fir bhi yeh mere liye itna kyun kar rahi hai... Aise hi pta nahi kab tak hum dono apni apni soch me gum the ki ek nurse ne aakar humara dhyaan bhang kiya...

Usne sapna ko jane ke liye kaha kyunki meri dressing honi thi... Woh chup chaap bina kuch bole chali gai wanhi mai yeh soch raha tha isne abhi tak mujhse pucha kyun nahi... Kuch der baad nurse apna kaam khatam kar chali gayi... Jo jaate waqt mujhe ek injection de gai jiske chalte meri aankhen ojhal ho gai... Or mai neend ki waadiyon me kho gya..

Subh jab aankh khuli tab mujhe mere kandhe par wajan mehsoos hua maine dekha toh sapna mere kande par sir rakh meri baaju ko pakad soyi hui hai... Aankhon ne neeche nishaan saaf bata rahe the ki uski raat kaise gujri hogi ek pal mai uski jagah khud ko rakh kar dekha toh hum dono ki halat same hi thi... Mai jise chahta hoon woh kisi or pyaar karti hai... wanhi wo jise chahti hai woh bhi kisi or ko...

Magar mujhe fir bhi uski kismat aachi dikh rahi ki kam se uski shaadi toh ho rahi hai mujhe... Magar kya bas shaadi ho jaane se usko uska pyaar mil gya.. ?? Yeh sawaal ne mujhe andar tak hila kar rakh diya... Pehli baar mai apni jaan ke alawa kisi or ke baare mai itna soch raha tha... Tabhi gate open hua or nurse andar aayi jiski awaaj se uski neend khul gai usne ek nazar mujhe dekha toh khudko ghoorta paa kuch sharma si gai fir kuch soch gumsum si bahar chal di...

Dhere dhere sab ghar waale aa phunche or ek ek kar mera haal puchne lage aise hi poora hafta beet gaya... Jaha har roz sapna sabse zid karke mere pass soya karti thi... Uski itni care itna pyaar dekh kar kahi na kahi mujhe apna pyaar kamjoor lag raha tha.. hairat ki baat toh yeh thi ki itne din mai hospital me raha magar maine apni jaan ke baare mai na socha mujhe toh bas sapna ka khayal rehta tha.. or jab woh paas hoti toh ek apna pan sa mehsoos hota ek pal ko mai socha kahi mujhe pyaar toh nahi ho gya.. lekin pyaar toh mai meri jaan se karta aise kaise kisi or se ho sakta hai... aise hi sochte hue kab ek hafta beet gaya pata hi nahi chala...

Mere jayadatar ghaav bhar chuke the doctor ne bhi kuch medicine likh kar meri chutti kar di or mai ghar aa gya... Mujhe chalne me thodi pareshani ho rahi thi isliye papa ki madat se mai apne kamre mai phuncha or bed par let gya thodi der sabhi mere pass baithe rahe fir sab apne apne kaamo me vyast ho gye shaam ko mummy mere liye khana lekar aayi unhone gate khola mere chehre par ek pal ko muskaan aayi jo kuch hi pal me gyab ho gai... Jiski wajah shayad me sapna ko expect kar raha tha qyunki roz shaam ko woh mujhe apne haatho se khana khilati thi itne din hum sath rahe magar humme koi baat cheet nahi hui shayad abhi bhi woh ghatna dono ke dimaag me khi na khi chal rahi thi... Woh shayad mujhe yaad dilwakar dukhi na karna chahti thi wohi mai bhi use woh sab yaad nahi dilana chahta tha...

Kher mummy ne bhi mujhe apne hath se khana khilaya or kaali bartan le mere maathe par ek kiss kar chal di.. unki aankhen bhi nam thi meri halat dekh shayad maa ka pyaar aisa hi hota hai... Isi tarah ek or hafta beet gya jaha har roz mere dil or dimaag mai jung hoti rahi or hafte ant hote hote sapna ka pyaar jeet gaya mujhe ab usse milne ka dil karne lga hafte bar na maine usse baat ki na uska call aaya shayad maa se baat hui ho... Waise bhi bahu ghar mai shaadi ke baad hi aati hai isliye shayad woh mujhe milne bhi nahi aayi... Dheere dheere meri haalat bhi theek ho gai ab mai aache se chal fir sakta tha...

Abhi doopahar ke 3 baj rahe the maine apna phone uthaya or sapna ko call mila diya... Ghanti jaati rahi magar usne uthaya nahi.. maine ek or baar call kiya nateja same raha uske baad maine use message kar 4 baje pass ke hi park me milne ko bulaya... Or khud uth kar taiyaar hone chala gya kuch samay baad jab mai taiyaar hokar aaya toh iske 30 se jayada miss calls the.. yeh dekh mere chehre par muskaan aa gayi pagal ladki kitna pyaar karti hai... Sath hi iske kai saare messages bhi pade the jisme se ek haal hi ka tha jisme likha tha mai phunch gayi hoon... Maine ghadi dekha abhi 3:30 hi hua tha muskurahat apne aap ghehri ho gai mai ok message kar chal diya park ki taraf neeche mummy ne pucha kha jaa rahe ho maine kha bahu se milne shaam tak aaunga jisse unke chehre par bhi Khushi aa gai or unhone aage badh mujhe gale laga liya...

Mummy.. " Aaj mai bhut khush hoon beta mujhe laga shayad tumhe sapna pasand toh nahi... Humne tumhare sath jabardasti toh ki magar aaj tumne mera dil khush kar diya... Maine dekha hai sapna tumhe bhut pyaar karti hai jab tum hosh me nahi the... Ghanton tak mandir mai baith kar tumhari salaamati ki praathna karti rahi... Jab tumhe hosh aaya ek pal ko tumhe akela nahi chhodti tumhare liye ghar se tumhare pasand ka khana banayaa karti mere lakh mana karne ke bawajood... Sach kahun toh meri bahu laakhon mai ek hai bas ek waada karo mujhse kabhi uska dil na dukhana " .

Uske baare mai itna kuch jaankar mai apni aankhon ko nam hone se na rok saka... " Mai wada karta hoon maa ab uska dil nahi tootne dunga use har woh khushi dunga jiski woh hakdaar hai " itna keh mai ghar se bahar nikal aaya or chal pada sapna se milne har kadam ke sath meri dhadkan badhti jaa rahi thi... Ek ajeeb si baichaini ho rahi thi hafte bhar sath rehne ke karan mujhe uski aadat lag chuki thi or jo shayad jab tak use na dekh loon nahi jaane waali... Pehli baar ghar se park ki doori mujhe pareshaan kar rahi thi... Qyunki yeh doori hi thi jo mujhe or sapna ko alag kare hui thi... Jaise taise kar mai park ke gate tak phuncha jisse mere chehre par ek muskurahat aa gai...

Or maine apna rukh andar ko kar diya kehne ko toh park jayada bada nahi tha magar fir bhi mai idhar udhar ghoom sapna ko dekhne laga jo ki mujhe ek bech par baithi dikh gai.. mai ek ek kadam badha uski or jaane laga abhi usme or mujhme thoda hi fansla reh gya tha ki ek cheenkh mere kano me goonjhi...


" Kabeeeeeeerrrrr tummmm "

Jisse mere or sapna jo ki iss waqt kuch soch rahi thi uska dhyaan pehle meri or fir awaaj ki taraf gaya... Jise dekh mai shocked reh gaya yeh yaha kyun aayi hai.. Ji or koi nahi meri jaan Rani khadi thi jaise hi usne mujhe dekha bhaagkar aayi or mujhe baahon me bhar liye mai kaise kya react karun kuch samjh nahi aa raha tha.. maine palatkar sapna ko dekha toh usne apna muhh dusri taraf kar liya shayad mujhse apne aansun chupa rahi thi or waise hi wo jane lagi ki maine ek hath badha usko pakad liye usne mujhe palatkar na dekha... Upar waala bhi kya sahi game khel raha hai mere sath mai jisko pyaar karta tha uski bahoon me bhi mujhe sukoon nahi mill raha tha sapna ka mujhe na dekhna dil ko tadpa raha tha... Kuch der aise hi rehne ke baad hum alag hue... abhi mai kuch bolta usse pehle hi usne bolna shuru kar diya...

Rani.... O my God what a pleasant surprise tum yaha kya kar rahe ho kab aaye stupid stupid yeh mai kya puch rahi hoon.. kaise ho tum kitne saal ho gaye waise kaafi hansome ho gye ho not bad haan...

Or kaafi kuch non stop bolti chali gai mai chup chaap sunta raha.. jo situation hai uske baare mai soch raha tha.. tabhi ek baar fir woh mere gale lag gai... or mere gaal par ek kiss kr diya jisse mai hadbda gya... Wanhi sapna mujhse apna hath chudane lagi magar aise kaise mai chodd deta... Woh kasmasti reh gai or apna chehra dusri kar liya...

Rani... Naraaz ho mujhse aacha sorry maaf kar do mujhe mai maanti hoon maine galti kar di uski itni badi saja toh mat do bolo bolo na bolte kyu nahi...

Mujhe kuch na bolta dekh uski aankhen nam ho gai kabhi bhi aansun gir sakte the... Jise dekh ek pal ke liye maine sapna ka hath chhod kar use gale laga liya.. sapna bhi bina mujhe palat kar dekhe bahar ki taraf chali gai.. last tak mai use dekhta raha magar usne ek baar bhi palat kar mujhe na dekha shayad woh baradast na kar paati mujhe aise kisi ki baahon me dekh kar...

Rani... mai tumhe bata nahi sakti mai kitna khush hoon please mujhe maaf kar do mujhe daant lo maar lo jo chahe karo... magar mujhe baat toh karo... Pata hai jab se mai wanha se aai hoon bata nahi sakti maine tumhe kitna yaad kiya... " Ab mujhe chhod kar toh nahi jaoge na " .

Uske yeh sabd sun ek pal me gehri soch me chala gya kahi yeh bhi mujhse pyaar toh nahi karti nahi nahi aisa kaise ho sakta hai maine khud ise kisi or ke sath dekha hai... Par agar karti hai toh mujhe khush hona Chahiye me kyun udaas hoon jise maine bachpan se har pal pyaar kiya.... magar me khush kyun nahi hoon shayad abhi bhi mai sapna ka mujhe palatkar na dekhna udaas kar raha tha... mai usse milna chaah raha tha baat karna chhah raha tha magar yeh situation me mujhe kuch samjh nahi aa raha tha ek baar fir dil or dimaag me jung chhid gayi... Abhi mai soch hi raha ki mujhe mere hothon par geela ehsaas hua... Maine samne dekha toh meri jaan mere hothon par siddat se kiss kar thi jisse mai toh hakka bakka reh gaya... Kuch der baad alag hokar mujhse kehna start kiya...

Rani... I love you Kabeer.. haan sahi suna tumne mai kabse tumne yeh kehna chahti thi bata nahi sakti... Jab se mai wanha se yha aai hoon mujhe har pal tumhari kami khalti rahi 3 saal toh maine jaise taise gujaar diye magar yeh saal mujhse or ruka nahi jaa raha tha socha ek baar tumhare ghar ho aaun magar yeh soch kar darr jati thi ki agar tumne mujhe maaf na kiya toh mera kya hoga... Roz khud ko koshti rahi kaise mai bina tumhe khabar kiye aa gayi... Roz himmat karti or roz tut jaati magar tumhe aaj yaha aise dekh kar mai khud ko rokk na saki... Please mujhe maaf kar do please...

Itna kehkar woh rone lagi... Mujhe toh yeh sab samjh hi nahi aa raha kya chal raha hai.. dimaag hi kaam karna band kar gya magar fir uski aankhon me aansun dekh maine use baahon mai bhar liye... Mujhe samjh toh kuch nahi aa raha tha magar fir bhi mai uski aankhon mai aansun kaise dekh sakta tha... kuch der mai aise hi rehne ke baad woh chup ho gai.. mujhe kuch sochta dekh bol padi...

Rani... Shayad tum abhi tak shock mai ho yeh sab itni jaldi gya na.. Kabeer koi baat nahi aaj jawab dene ki jarurat nahi kal tak aaraam se soch lo haan magar kal tak mujhe tumhari haan Chahiye...

Yeh bolkar woh khud khilkhila kar hasne lagi... mujhe na haste dekh ek pal woh rukk gai mere pass aa mere gale mai baahen daal bolne lagi...

Rani... Kya hua mai kabse tumhe dekh rahi hoon tum kuch bol kyun nahi rahe kya tum khush nahi mujhe yaha dekh kar...

Mai... Nahi aisi baat nahi hai wo darasal baat yeh hai ki...

Rani... ( Beech me baat katkar ) kya aisi baat nahi pehle toh mujhe kitna pyaar karte the pani puri khilaya karte ab dekho itni der mai hi bole jaa rahi hoon.. khade sun rahe ho bolo kya hua ab kyun bolti band ho gai bolo bolo na...

Mai... Are meri maaa chupp ho ja bolne ka mauka degi tabhi toh bolunga mai jab se dekh raha hoon chapad chapad kiye jaa rahi chal aa idhar...

Or maine use apni baahon me le liya...

Rani... Haan toh maine bola ek bhi baar tumko na bolne ko tum toh jaise ghar se maun vrat rakh kar aaye ho.. ek toh itni dhoop me tumne khada kar rakha upar se gussa bhi mujhe dikha rahe ho... Mai samjh rahi hoon ab tum mujhe pehle jaisa pyaar nahi karte...


Mujhe kass kar apni baahon me bhar li Mai Ek pal uski harkat dekh muskura diya agle hi pal gambheer ho kuch bolne hi jaa raha tha ki isne ek ungli mere hothon par rakh di...


Rani... sssshhhhhh... Kuch mat kaho mujhe thodi der aise hi rehne do...

Abhi kuch der hui thi ki uska phone baja jise dekh usne call pick ki or baat karne thodi door chali gai.. kuch der baad udaas hokar mujhe dekha or call cut kar meri taraf aayi...

Rani... sorry Kabeer mujhe jaana hoga ek urgent meeting attend karni hai mai kal isi time isi jagah tumhara or tumhare jawab ka intjaar karungi..

Fir mujhe byy bol dono ne number exchange kiya or apne apne ghar ko chal diye... Jaise hi mai ghar phuncha mummy ne jo sawaal kiya use sunn mere totte udd gye... " Aa gye beta or sapna kaisi hai " jaise hi maine sapna ka naam suna mere hosh hi udd gye mai turant room mai gya usko call krne laga magar uska number band aa raha tha mai fir bhi lagataar ek ghante tak use continue call karta raha nateeja wohi raha.. hatash niraash hokar maine phone ko bed par patak diya or khud bhi uske side mai lait gaya... Uska yun mujhe nazren churana mera dil ko tadpa raha tha... Kaafi der tak mai uske baare mai sochta raha... Or lagataar call karta raha kahi koi anhoni toh nahi ho gai.... nahi nahi mai abhi jaakar usse milkar aata hoon yeh soch mai bistar se utha hi tha ki room ka gate khula mummy mujhe khana dene aayi thi... Mujhe kahi jaate dekh kehne lagi...

Mummy... Beta itni raat ko kahan jaa rahe ho...

Mai.. wo mummy wo mai sapna...

Mummy... Abhi toh usse milkar aa rahe ho abhi fir jaana hai... Aakhir aisa kya jaadu kar diya sapna ne ki mera bete ka dil ab ghar me nahi lag raha... ( Fir haste hue mere sir par hath fer kar ) beta aisa aacha nahi lagta itni raat ko use pareshaan karna... Use bhi ghar me jawaab dena hota hoga... Tum kal usse jaakar mil lena abhi chup chaap khana khakar so jana... Theek hai.. ( or maathe par kiss kar chali gayi )

Mujhe bhi mummy ki baat theek lagi or jaane ka plan drop kar mai bed par let gya.. sapna ke baare mai sochta raha or lagataar use call lagata raha... magar uska number chaalu na hua... Mai call lagata raha uski yaadon me khoya dheere dheere kab raat beet gayi pata hi na chala... Thhak haarkar jab mere phone ki battery khatam ho gai.. toh maine use charge par laga bed par lait gaya neend kab lagi mujhe yaad nahi... Pata nahi kitni hi der tak mai sota raha...

Jab meri neend khuli toh maine aas paas dekha khana ab bhi waise ka waisa hi rakha tha maine ghadi dekhti toh doopahar ke 2 baj rahe the mai jaldi se fresh hone chala or taiyaar hokar phone ko uthaya or wapas call mila di is baar ghanti jaa rahi thi magar woh phone nahi utha rahi thi.. mai lagataar call karta raha or uske ghar ki taraf chal pada neeche mummy ne mujhe kuch kehne ki koshish ki jise maine ansuna kar bahar ki taraf chal diya uska ghar mere ghar se jayada door nahi tha isliye mai paidal hi nikal pada abhi uska ghar kuch hi doori par tha ki raaste mai hi mujhe Rani mil gai...

Ranj... Kaha jaa rahe ho mai tumhe call karne hi waali thi... Aacha hua tum mujhe yehi mill gaye chalo wohi chalte hai park mai...

Mai use kuch bolta usse pehle usne mera hath pakda or mujhe lagbhag khenchte hue park mai le gai... Jo ki pass mai hi tha... Fir uski patar patar shuru ho gai mujhe kuch bolne ka mauka hi nahi mill paa raha tha ki tabhi usne apne honth mere kareeb kiye abhi kiss hone hi waali thi ki mai door hat gaya... Jo kuch bhi ho raha tha mujhe aacha nahi laga.. uth khada hua woh sawaliyan bhari nazron se mujhe dekh rahi thi tabhi maine bolna start kiya...

Mai... I love you... ( Fir kuch der rukk purani yaadon mai kho kar ) pata hai jiss din tum woh sheher chhod kar jaane waali thi uss din hi tumne batane waala tha ki mai tumhe kitna pyaar karta hoon... bachpan se aaj tak ek tum hi thi toh thi jiske saath mai hasta tha rota tha... yaad hai jab pehli baar hum mile mai jab andar jaane se ghabra raha tha toh tum aage aayi thi or mera hath pakad kar andar le gai jab sabne pucha toh tumne mujhe apna best friend bataya uss din se hi tumhare liye iss dil me khaas jagah ban gai thi jo waqt ke sath badhti chali gai...

Fir jab tum achanak mujhe chhodkar jaane waali thi mujhe aisa laga jaise mere seene se dil nikal raha ho... Mai tumhe door jaate hue kaise dekh sakta tha isliye khud ko kamre mai band kar rakha tha... Jo shayad meri ek bhut badi galti thi jisse mai tumko aakhiri baar bhi na dekh paya... Dheere dheere 4 saal beet gaye mai har raat rota khud ko kosta maine tumhe jaane kyun diya... shayad mai tumko bata deta toh tum rukk jaati kya pata tum bhi kahi mujhe pyaar karti ho... Zindagi aise hi kat rahi thi maine woh sheher or usme tumhari yaadon ke sath hi Zindagi gujarne ka fainsla kar liya tha...

Kuch der saans lekar jab maine use dekha uska poora cheha aansun se bheega hua tha ki tabhi maine fir bolna shuru kiya...

Mai... Kal jab tum mujhe mili or jab tumne mujhse kaha ki tum mujhe pyaar karti ho... yeh sunkar toh mujhe khush hona Chahiye tha hai na ab jara gour se dekho mere chehre ko kya mai tumhe kahi se bhi khush nazar aa raha hoon... Jiss ladki ko mai bachpan se aaj tak pyaar karta aaya hoon jiske sath jeene marne ki kasam khayi hui thi woh aaj mujhe pyaar karti hai magar mai khush kyun nahi hoon... jaanna nahi chahogi ki mai khush kyun nahi hoon...

Ek nazar use dekha toh woh hairat bhari nazron se mujhe dekh rahi thi... Mai fir bone laga...

Mai... " Woh wajah hai meri mangetar MERI JAAN Sapna... kehne ko toh hum sirf 3 se 4 baar mile hain jisme maine shayad hi usse thodi bhut baat ki ho magar fir bhi woh meri saari jarurat ka khyaal rakhti hai... Niswarth pyaar kya hota hai yeh mujhe sapna se milne ke baad pata chala pyaar toh bas dene ki cheez hai or woh pagli khud ko bhi mujhpar luta kar mere khyaal rakhti gai... Bina mujhe pyaar ki umeed kare mujhe pyaar karti gai karti gai...

Tumhe yaad hoga 15 din pehle jab mai subh ke time park mai ghoomne aaya tha tab tumhe maine pehli baar yahi dekha tha... Magar tumhe kisi or ki bahoon me dekh mera toh jaise mar jaane ko dil kar raha tha mai bhut der tak rota raha jab hosh aaya toh tumhe na dekh paagalon ki tarah sadkon par dhoodne laga ki tabhi ek car teji se mujhse takraai or mai behosh hone waala uss waqt sapna pta nhi aachanak kha se aayi or mujhe utha kar khoob roti rahi fir ambulance ko phone kar mujhe hospital me admit karaya mere liye din raat jaagkar bhagwaan se praathna karti rahi...

Mujhe abhi bhi yaad hai behoshi mai bhi mai har waqt tumhara naam le raha tha... Jisse shayad use pta chal gaya ho ki mai kisi or ko pyaar karta hoon magar fir bhi uska pyaar mere liye kam kyun nahi hua yeh meri samjh mai nahi aaya.. hosh mai aane ke baad bhi har waqt woh mera khyaal rakhti rahi... Woh chahe toh mujhse puch sakti thi ki tum kon ho magar yaha bhi usne mere baare mai socha ki kahi mujhe purani baatain yaad kar fir se taklef na ho...

Uska mere liye aisa pyaar dekh dheere dheere mera pyaar kab haar gaya pata hi na chala kab is dil ko uski aadat si ho gai yeh bhi na pata... kab usse baintiha mohabbat ho gayi pata hi na chala kal mai pehli baar usse apne pyaar ka ijhaar karne hi aa raha thi itne mai tum aa gai or mujhe apne pyaar ka ijhaar kar diya mai tumhe kal hi batane waala magar tum kisi ko bolne ka mauka kha deti ho... I am sorry Rani but mai Sapna se pyaar karta hoon ab shayad hi mai uske bina reh paun... Uske bina Zindagi jeena mai soch bhi nahi sakta hoon.. please I hope tum samjh rahi ho.."

Yeh sab mai aankhen band kar bol raha tha... jaise hi maine aankhen kholi apne saamne Sapna ko dekh aankhen hairat se badi ho gai fir sir jhatak kar bola...

Mai... Mai sach main pagal ho gya hoon mujhe tumhari chehre par bhi sapna dikh rahi hai... Aacha mai chalta hoon kal usne mujhe tumare sath dekh liya tha toh madam naaraz ho kar ghar baithi hai... Kal se na mera phone utha rahi na message ka reply...

Or fir usi ke samne call laga diya jo ki wanhi bajne laga maine ek baar aankhen mal use gaur se dekha yeh kya yeh toh sach me sapna hai usko poora chehra aansun se bheega hua tha... Jise dekh mai abhi kuch kehne hi waala tha ki usne aage badh mujhe baahon me bhar liya maine use apni baahon me kass liya... Kaafi der tak aise hi rehne ke baad maine use alag kiya or bola...

Mai... Janta hoon maine tumhara dil dukhaya hai magar fir bhi mai tumse kehna chahta hoon ki... I love you Sapna... I love you so so much...

Sapna... ( Mere kareeb aa meri aankhon me dekhte hue ) hamesha aise hi pyaar karte rahoge mujhe...

Mai... Marte dum tak...

Jise sunn usne apne honth mere hothon se jod diye badi hi pyaar se mujhe kiss karti rahi iss kiss mai bhi mujhe uska pyaar ka ehsaas ho raha abhi kiss chal hi raha tha ki kisi awaaz se humara dhyaan uss taraf hua... jo ki koi or nahi Rani hi thi...

Rani... Are oooo.. Laila majnu yeh sab yaha nahi ghar per jaakar karna bhari doopahar mai yeh bhi bhool gye ki kha ho... besharmo ki tarah beech park lage ho sabka mausam banane chalo yaha se... or mujhe treat Chahiye tujhse sapna bhut mehnat kawai hai tune iss ghoonchu ke chakkar mai...

Yeh bolkar woh khilkhila kar hasne lagi wanhi mai shocked or sapna shrma rahi thi... mai yeh sochne laga kya Rani Sapna ko jaanti hai or yeh kiss treat ki baat ho rahi mai yehi sab soch apna sir khujla raha tha jise dekh dono hasne lagi...

Sapna... Rani sahi keh rahi hai chalo yaha se bhut garmi hai... Tumhare saare sawalon par abhi break lagao chalo aaj khracha kro har baar mujhse karwate ho..

Uske baad hum wanha se nikal ek restaurant mai gye wanha humne coffee order ki mai sapna ki taraf dekha usne bolna shuru kiya...

Sapna... Uss din jab tum park me ise pehli baar mile toh mai wonhi thi yeh meri best friend hai humne sath hi me college complete kiya hai... Us din mujhe pata chal gaya tha ki tum isse pyaar karte ho fir maine bhi isse tumhare baare mai sab kuch pata kar liya... Yeh tumhe sirf apna dost samjhti rahi magar tumne ise apna sabkuch maan liya tha... yeh soch kar me bhut rooyi ki tum kisi or ko pyaar karte ho maine tumse door jaane ki koshish magar jaa na saki... Hospital mai jitna time maine tumhare sath bitaya kahi na Kahi mujhe aisa lagne laga tha ki tum bhi toh nahi mujhse pyaar karne lage... Uss din jab tumne mujhe milne bulaya mai dekhna chahti thi tum mujhse pyaar karte ho ya nahi maine Rani ko sab kuch samjha kar tumse milwaya or baaki sab apne hisaab se tum samjh hi gye hoge jo kuch bhi hua yaha..

Mai... Matlab tum logon ne milkar mujhe bewakoof banaya...

Yeh sunkar woh or Rani jor jor se hasne lagi...

Mai... Agar mai rani ho haan bol deta toh...

Sapna... Jaan na le leni thi maine tumhari...

Mai sochne laga baap re mai ise bholi bhaali samjh raha tha yeh toh bhut katarnak hai bhaiyaaaa... Pta nahi biwi banegi tab kya haal hoga... isse thoda bachkar hi rehna hoga...


The EnD...





by: - Abhay Smarty...
 

_SMOOKER_X_

Ne dis jamais que je t'aime
Supreme
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Bachat...

Aise To jindagi Kai acche aur bure anubhav se bhari hui hai... Aisa har Kisi ke sath hota hai... Meri jindagi mein bhi utaar chadhav bachpan se hi aate rahe hain.... Lekin beete saal lockdown ka samay ek ajeeb si anhoni ki tarah Aaya Jo mujhe jindagi ki sabse badi Seekh dekar Chala Gaya..... Darasal main paisa aur bachat ko lekar Poori Tarah befikr rahata tha Mera manana tha ki aaj sukhi raho kal ki chinta mein apna aaj kyon bigadna.... Isi Soch ke sath Maine jabse kamaana shuru Kiya apna Jeevan aise hi bitaya... main Kai saal se a computer operator ke pad par karyarat hun meri aamdani itni rahi ki main aaram se apne ghar ka kharch Chala sakta tha... lekin maine Kabhi bachat karne per dhyaan nahin diya tha the main Puri lagan se kam karta paisa aata aur use kharch kar deta tha...

Kyunki mujhe pata tha agale maah tankhwa aa hi jayegi.. Mata pita bachat karne ki baat kehte toh main agali bar kahkar unko taal deta tha... Main sochta tha ki bachat bad mein karunga abhi to jivan ke ke sare shauk pura kar lo... Soch tak to theek tha magar main apne doston ke samne branded kapde ghadiyan avam nai nai phone ka dikhawa karne se bhi baz nahin aata tha.....

Jivan isi tarah beet raha tha ki coronavirus ke prakop ke Karan achanak lockdown lag Gaya or uss waqt mere bank account mein sirf 3 hajar rupaye the... mere ghar mein meri patni aur mere Mata pita kul chaar sadasya the ghar ka kharch Mari kamaai se hichalta tha....

Lockdown ke bad sari gatividhiyan achanak se band ho gai aur log gharon mein kaid ho gaye... Kaam kaaj sab jahan the wahi tham Gaye maine Kabhi ye Nahin socha tha ki ekadam se aisa bhi kuchh ho jaega..... Parivar ki sehat ke alava meri sabse badi chinta yeh thi aage kya hoga Ghar kharch ke liye mere pass jyada paise Nahin the... Mujhe is baat ka bhi dar tha ki main jaha kaam karta hun wahan se uss maheene ki tankhvah milegi bhi ya nahin... kuch samajh nahin aa raha tha ki aage kya hoga.....

Jaise Jaise din gujar rahe the meri chinta bhi badhti ja rahi thi ration ka saman bhi dheere dheere samapt ho raha tha.... Maine isse pahle Kabhi aisi viprit paristhiti Nahin dekhi thi... isliye mai apne seh karmiyon se baat karke unse iss maheene ki tankhvah milane ke bare mein pata lagane ki koshish karta rahata mujhe donon hi Tarah ke jawab milte koi kahta hai meri tankhwa milegi to koi kahta Nahin milegi.....

Main bahut ghabrane lag gaya tha parivar chalane ki jimmedari meri thi... Yeh soch ke Kisi se udhar lekar apna Kam Chala Lunga lekin ek baat yah bhi thi ki ki aaj Toh har koi hath rok kar kharch kar raha hai fir koi mujhe udhar kyon dega ?... Main har Waqt gumsum sa rehta aur Kabhi Kabhi apni aadat se vipreet patni par bewajah gussa bhi kar baitha tha rah rahakar mujhe bachat ko najar andaj karne ki aadat per khud se ghrina bhi hoti thi.....

Uss Waqt maa pitaji ji ke bachat ke paison se gujara hota Raha shesh upar wale ki kripa se kuchh hi din mein meri salary bhi a gai... chinta aur pareshani ke un dinon mein mujhe yeh samajh aa chuka tha ki paise ki bachat kitni mahatavpurn hoti hai.... Yadi maine ab tak bachat ki hoti toh mein mansik roop se utna pareshan Nahin hota... Unn dinon ne mujhe yeh sikha Diya Ki mujhe thoda thoda paisa bachana hi chahiye taki jivan mein Kabhi bhi aisi paristhitiyon Aaye to paisa hamari madad Kare.....

Apne is anubhav ke madhyam se mai bas yahi kehana Chahta Hun ki meri Tarah aur bhi Kai log honge Jo bachat karne se bajaye Sara paisa kharch karne mein lage rahte hain jabki ki hamare bujurgon ki bachat karne ki Salah bewajah Nahin Hoti... Paisa na bachane ke bahut se bahane hote Hain jaise kharch bahut hai hamara Kam Nahin chal raha aadi lekin agar ham sankalp karte Hain to safalta milati hai.... Paise aur bachat ki ahmiyat samjhiye jyada Nahin toh tankhwa ka kuchh hissa to jarur bachaye taki ki Apaat sthitiyon mein aap dharya purvak apna wah Apne parivar ka poshan kar sake.....

Dhanyvad....
 

HalfbludPrince

मैं बादल हूं आवारा
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अपहरण

रात के आठ बज रहे है, आसमान छूती इमारतो से घिरे शहर की ये भी एक ईमारत थी जिसकी सोलहवी मंजिल पर एक परिवार जिसमे लगभग चालीस साल का व्यक्ति अपनी बेटे के साथ रात के खाने का इंतजार कर रही थी .

“मुम्मी जल्दी लाओ खाना , भूख लगी है ”

शालू- बस थोड़ी देर और

जल्दी ही खाना टेबल पर आ गया और तीनो मिल कर डिनर करने लगे.

तभी शीशे को तोड़ते हुए एक गोली आकर सीधा राहुल के सीने में आ लगी. इक पल में ही जैसे सब बदल गया था . सब लोग स्तब्ध रह गए.

“अम्बुलेंस बुलाओ जल्दी ” शालू चिल्लाई .

रवि ने तुरंत फ़ोन किया और निचे की तरफ भागा . थोड़ी ही देर में पुलिस भी आ गयी . सब ऊपर गए तो देखा की शालू रो रही थी .

रवि- क्या हुआ .

शालू- राहुल नहीं है .

रवि- क्या बकवास कर रही हो .

शालू- राहुल गायब है . मैं बस मेघा को बुलाने गयी थी इतनी ही देर में वो गायब हो गया

वो जोर जोर से रोने लगी .

रवि- पर ऐसा कैसे हो सकता है

इंस्पेक्टर- पर राहुल ऐसे कैसे गायब हुआ.

तभी वहां पर कुछ पुलिस वाले और एक आदमी अन्दर फ्लैट में आये.

“क्या हुआ , क्या हुआ राहुल को ” उस आदमी ने अन्दर आते हुए कहा

इंस्पेक्टर- आप कौन

“मैं शिव, मेघा का पति ” उसने कहा .

इंस्पेक्टर- मुझे लगता है की किसी ने आपके बेटे को किडनैप कर लिया है ,

रवि- ये क्या कह रहे है आप

इंस्पेक्टर-

मुझे लगता है की किसी ने आपके बेटे को किडनैप कर लिया है , हो सकता है वो गोली बेहोश करने वाली हो , और मुझे अब सब पर शक है



रवि- क्या बकवास कर रह हो , हम भला अपना ही बेटे को क्यों किडनैप करेंगे इंस्पेक्टर- मेरा काम ही ऐसा है शक करना पड़ता है .वैसे आप क्या काम करते है

रवि- जी बैंक मेनेजर हूँ .

पुलिस- मतलब फिरोती वाला अंगेल बनता है . वैसे आपकी कोई रंजिश किसी से .

रवि- जी नहीं , हम तो सामजिक आदमी है .

तभी शिव मेघा को लेकर अपने घर चला जाता है . रात ऐसे ही बीत जाती है , कुछ देर के लिए रवि की आँख लग जाती है .

सुबह ठीक पांच बजे फ़ोन की घंटी से रवि की आँख खुली. देखा कोई अनजान नम्बर था .

“हेल्लो ” रवि ने कहा .

“अपनी औलाद की जान सही सलामत चाहते हो तो , बैंक से बीस करोड़ मुझे लाकर दो . ” एक भारी आवाज आई.

“पर मैं इतना पैसा कहाँ से लाऊंगा ” रवि ने कहा .

“बेटा चाहिए तो लाकर दे वर्ना लाश भेजता हूँ ” इतना कहकर किडनैप करने वाले ने फ़ोन काट दिया. हताश रवि ने तुरंत शालू को जगाया जो उठते ही राहुल राहुल चिल्लाने लगी. मुश्किल से रवि ने उसे शांत किया और फ़ोन वाली बात बताई.

“दे दो उसे बीस करोड़ और मेरे बेटे को ले आओ ” शालू ने कहा

“कहाँ से लाऊंगा इतनी बड़ी रकम, बैंक में गबन करना पड़ेगा ” रवि ने कहा .

शालू- मुझे नहीं मालूम मुझे मेरा राहुल चाहिए बस

रवि- मुझे लगता है पुलिस को बताना चाहिए हमें

और रवि ने इंस्पेक्टर को सारी बात बता दी.

तभी दरवाजे की घंटी बजी और जानकी उनकी नौकरानी अन्दर आई.

जानकी- बीबी जी , निचे लोग कह रहे थे की राहुल बाबा को किडनैप कर लिया .

शालू- हाँ जानकी , तू पहले बर्तन धो ले रसोई सही कर ले फिर आना .

जानकी- बीबीजी मैं पहले सफाई कर लू , फिर बर्तन धो दूंगी .

शालू- जितना कहा है उतना कर सफाई से जरुरी है रसोई का काम जा बर्तन धो ,

जानकी शालू का व्यवहार देख कर हैरान हुई क्योंकि आज से पहले शालू ने उसे कभी नहीं डांट लगाई थी . वो अपने काम में जुट गयी ..

“मैं थाने जा रहा हूँ ” रवि ने शालू से कहा और निकल गया , बाहर निकलते ही उसकी मुलाकात शिव पर पड़ी. शुरू से ही ये दोनों एक दुसरे को ना पसंद करते थे , पर शालू और मेघा की दोस्ती थी आपस में तो इन्हें भी हाय हेल्लो करनी पड़ती थी . खैर रवि थाने पहुंचा और पुलिस इंस्पेक्टर को रिकॉर्डिंग सुनाई .

“ठीक है हम कोशिश करते है , वैसे हमने सभी थानों में राहुल की फोटो भिजवा दी है और इस नम्बर को भी सर्विलांस पर लगवा देता हूँ. ” इंस्पेक्टर ने कहा

रवि- मुझे एक बात अजीब लगी सर, वो बार बार कह रहा था की राहुल की फ़िक्र न करे बस पैसो का इंतजाम कर दो .

रवि के जाने के बाद इंस्पेक्टर राहुल के कालेज पहुँच कर प्रिंसिपल से मिलता है , माजरा जान कर प्रिंसिपल भी हैरान होता है .वो इंस्पेक्टर को बैठने को कहता है .और राहुल के क्लास टीचर को बुलाने का आदेश देता है . कुर्सी पर बैठे इंस्पेक्टर को लगा की प्रिंसिपल उसे घूर सा रहा है पर वो इग्नोर करता है .

कुछ देर में टीचर नीरज अन्दर आता है , नीरज के हुलिए को देख कर इंस्पेक्टर को अजीब लगता है , क्योंकि उसका हुलिया अजीब सा था . लम्बा कद, घुंघराले बाल आँखों पर पुराने ज़माने का गोल चश्मा और बेहद ढीले कपडे, पर चमकती आँखों में इंस्पेक्टर ने धूर्तता देख ली थी .

“मैं नीरज से अकेले में बात करना चाहता हूँ ” इंस्पेक्टर ने कहा तो प्रिंसिपल वहां से चला गया .

इंस्पेक्टर- क्या कुछ दिन पहले विक्की और राहुल का झगड़ा हुआ है .

ये सुनकर नीरज थोडा सकपका गया और बोला- अरे वो तो बस छोटी सी क्लास फाइट थी .

इंस्पेक्टर ने वही पर विक्की को बुला लिया और उस से पूछने लगा तो विक्की डर गया और बोला- सर, वो बस ऐसे ही छोटा मोटा झगडा था .

इंस्पेक्टर- मैंने तेरे बैकग्राउंड को मालूम किया है और सुन ने इसमें तेरा जरा सा भी हाथ हुआ तो खाल उतार लूँगा तेरी.

फिर इंस्पेक्टर चला गया .

इधर रवि बैंक के कैश रूम में था . तभी वहां पर कैशियर कुछ कागज़ लेकर आया और बोला सर ये कागज आये है मेंन ब्रांच से देख ले इन्हें .

रवि- हाँ देखता हूँ

पर रवि के मन में चल रहा था की कैसे वो बैंक से बीस करोड़ रूपये निकाले.





एक अजीब सी जगह जैसे कोई पुराना कारखाना, जगह जगह बदबूदार पानी और सीलन , एक कोने में कम्पूटर रखा था और पास में ही राहुल को कुर्सी पर बाँधा हुआ था . थोड़ी देर बाद वहां पर एक कला लबादा ओढ़े एक आदमी आता है और फ़ोन मिलाता है .

“क्या पैसो का इंतजाम हुआ ” उसने रवि से कहा

रवि- नहीं अभी हुआ

“तो क्या बैंक के लाकर रूम में माँ चुदाने गया था ” दूसरी तरफ से रवि को गाली सुनाई दी .

पर उसका ध्यान गाली से ज्यादा इस बात पर था की किडनैप करने वाले को कैसे मालूम हुआ की वो लाकर रूम में गया था .

“जल्दी से पैसो का इंतजाम कर वर्ना मैं इसको मार दूंगा . ”

उसने रवि के कान पर फोन लगाया और राहुल को थप्पड़ मारा , रवि रोने लगा .

“पापा मुझे बचा लो , पापा ” राहुल चिल्लाया

इधर से रवि चीखा पर तब तक फोन कट चूका था . इतना बेबस रवि ने खुद को पहले कभी नहीं पाया था . दूसरी तरफ इंस्पेक्टर रवि के घर पंहुचा और दरवाजा खटखटाया

शालू ने दरवाजा खोला और बोली- आप

इंस्पेक्टर- मुझे आपसे ही मिलना था .

शालू - अन्दर आईये.

“अपने बारे में बताइए मुझे , जैसे आप रवि से कैसे मिली, मेरा मतलब आपका बैकग्राउंड ” इंस्पेक्टर ने पूछा

शालू उसे बताने लगी की कैसे एक फॅमिली फंक्शन में रवि से मिली और फिर शादी हुई और तमाम बाते की वो सुख से रह रहे थे .

तभी इंस्पेक्टर बोला- मुझे लगता है की आपके पति ने ही राहुल को किडनैप किया है क्योंकि रवि के पिता ने अपनी तमाम दौलत अपने बेटे की जगह पोते राहुल के नाम की है .

ये सुनते ही शालू को गुस्सा आ गया , “वैरी गुड इंस्पेक्टर मैं तो आपकी तफ्तीश की कायल हो गयी , मतलब बाप ही बेटे को मारना चाहता है , आप जाइये यहाँ से इस बकवास के अलावा अपना ध्यान काम पर लगाइए ”

इंस्पेक्टर अपनी गाड़ी में बैठा और सीधा बैंक की तरफ चल दिया. और सीधा रवि के केबिन में पहुंचा

रवि- आप यहाँ

इंस्पेक्टर- कुछ बात करनी थी .

रवि- जी

इंस्पेक्टर- किसी से रंजिश या दुश्मनी कोई तो होगा ही

रवि- मुझे ऐसा नहीं लगता

इंस्पेक्टर- पर मुझे लगता है

रवि- कौन

इंस्पेक्टर- शालू आपकी बीवी

रवि- क्या बकवास है ये .

इंस्पेक्टर- क्यों नहीं हो सकता, शालू तुम्हारी दूसरी बीवी है

रवि- वो राहुल की माँ है

इंस्पेक्टर- पर सौतेली और तुम्हारी प्रोपर्टी राहुल के नाम है और शालू उसके लिए राहुल को मारना चाहती हो .

रवि- मैं ये नहीं मानता वो सगी माँ से भी जायदा राहुल से प्यार करती है . खैर मेरा तो आपको ये बताना था बस .

तभी कांस्टेबल बोला- सर, आप ने दोनों पति पत्नी को आपस में भड़काया समझ नही आया .

इंस्पेक्टर- क्या मालूम दोनों में से कोई किडनैप करने वालो में से हो , तीर फेका है क्या पता तुक्का लग जाये.

इधर रवि घर पहुंचा . तो शालू भाग कर रवि के पास गयी.

रवि- किडनैप करने वाले का फोन आया था .

शालू- क्या कहा उसने

रवि- की राहुल ठीक है .

पर रवि ने शालू से इंस्पेक्टर वाली बात छुपाई और न जाने क्यों शालू ने भी रवि से जिक्र नहीं किया . आँखों आँखों में ये रात भी कट गयी . अगली सुबह , शालू ने रवि को जगाया . रवि ने देखा की ९ बजे है

रवि- अरे आज जानकी नहीं आई .

शालू- क्या मालूम वैसे तो सुबह जल्दी ही आ जाती है

रवि- फ़ोन करता हूँ चंद्रपाल को ,

चंद्रपाल जो की जानकी का पति था और रवि की ब्रांच में ही माली का काम करता था .

“हेलो चन्द्र, क्या हुआ आज जानकी काम पर नहीं आई. ”रवि ने पूछा

“मालिक गजब हो गया जानकी नहीं रही , कल दोपहर बाजार गयी थी और अभी उसकी लाश मिली है ” चन्द्र ने रोते हुए कहा .

रवि ये सुनकर सकते में आ गया उसने तुरंत इंस्पेक्टर को फ़ोन किया और बताया की उसकी नौकरनी का कत्ल हो गया है .

इंस्पेक्टर- एक लाश तो मिली है , एक मिनट क्या उसका नाम जानकी था .

रवि - जी हाँ,

इंस्पेक्टर- अभी थाने आ जाओ .

रवि तुरंत थाने पहुंचा .

इंस्पेक्टर- जानकी की पोस्ट मार्टम रिपोट पढ़ रहा हूँ, गला दबा कर हत्या की गयी है ,आसपास के लोगो से मालूम हुआ की अंतिम बार उसे आपके घर से निकलते हुए ही देखा गया था .

रवि- मतलब

इंस्पेक्टर- मतलब उसके क़त्ल में आपका या आपकी बीवी का हाथ हो सकता है .

रवि- व्हाट नोंसेंस

इंस्पेक्टर- बैठ जाओ शांति से .और शालू को बुलाओ.

थोड़ी देर बाद वो भी आ गयी .

इंस्पेक्टर- जानकी तुम्हारे घर से कब गयी थी .

शालु- दस बजे

इंस्पेक्टर- उसका व्यवहार कैसा था .

शालू- नार्मल

इंस्पेक्टर- पर हमें मालूम हुआ की जानकी बहुत घबराई थी .

शालू- इंस्पेक्टर, हमारे घर के बाद वो कुछ घरो में और काम करती थी .

इंस्पेक्टर- पर वो उस दिन सिर्फ आपके घर ही आई थी , बाकि घर गयी ही नहीं . खैर तुम दोनों अभी घर जा सकते हो पर शहर से बाहर जाने का सोचना भी नहीं .

दोनों पति पत्नी घर की तरफ चल दिए.

शालू- क्या बकवास कर रहा था वो पुलिस वाला

रवि- वैसे उसका शक करना सही है तुम राहुल की सौतेली माँ हो प्रोपर्टी के लिए कर सकती हो .

शालू- राहुल मेरा बेटा ही है , उसके प्यार में कमी न रहे इसलिए मैंने अपनीऔलाद नहीं पैदा की .वैसे तुम भी कर सकते हो ये काम तुम भी कम लालची नहीं हो

रवि ने गुस्से से उसे देखा फिर घर आने तक कोई बात नहीं की उन दोनों ने. घर आते ही रवि के पास फ़ोन आया.

“मैंने कहा था न की पुलिस के पास मत जाना, पर तुझे चुल हुई है ” दूसरी तरफ से आवाज आई .

रवि- हमारी नौकरानी का क़त्ल हो गया तो उन्होंने बुलाया था .

“पैसो का इंतजाम हुआ के नहीं ” दूसरी तरफ से आवाज आई

रवि- बस दो दिनों का समय दो , मैं पैसो का जुगाड़ कर लूँगा .

ये बाते पास खड़ी शालू ने भी सुनी उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे.

कुछ देर बाद रवि ने अपने लैपटॉप से किसी को एक मेस्सेज किया और सेंड होते ही उसकी आँखों में अजीब सी चमक आ गयी .



दूसरी तरफ किडनैप करने वाला उसी कारखाने में राहुल को ही घूरे जा रहा था की उसका फोन बजा तो वो बोला- पैसा मिलने के बाद इसका क्या करना है ,

उधर से कुछ कहा और फोन कट गया .

किड्नेपर राहुल के पास गया और बोला- बस कुछ दिन और .

इधर रवि ने टीवी खोला और न्यूज़ देखने लगा और जो न्यूज़ उसने देखा उस पसीना आने लगा. तभी शालू भी अन्दर आई और टीवी पर नजर डालते ही उसके हाथो से प्लेट गिर गयी .

टीवी पर खबर थी की मेनेजर रवि ने २० करोड़ का गबन कर लिया. दोनों पति पत्नी हैरानी से एक दुसरे को देखने लगी की तभी शालू बोली- हमें भागना होगा, वर्ना पुलिस हमें पकड़ लेगी और दोनों वहांसे निकल पड़ी की तभी इंस्पेक्टर का फ़ोन आया .

इंस्पेक्टर- रवि कहा हो तुम, अभी शालू के साथ थाने पहुँचो .

रवि- पर मैंने चोरी नहीं की

इंस्पेक्टर- तो फिर भाग क्यों रहे हो .

रवि- मैं जानता हूँ की तुम मेरा भरोसा नहीं करोगे.

रवि ने फ़ोन काटा और भागने की कोशिश की पर इंस्पेक्टर ने नाकेबंदी में दोनों को पकड़ लिया और थाने ले आया .

इंस्पेक्टर- देख लिया भाग कर , न और कर ले कोशिश अब सीधे सीधे बता चोरी क्योंकी और पैसा कहाँ छुपाया है तेरे फ्लैट से तो कुछ नहीं मिला तलाशी में

रवि- मैंने कहा न मैंनेचोरी नहीं की .

तभी वहां पर कांस्टेबल आता है और रवि का फ़ोन देते हुए कहा की सर इस पर फ़ोन आ रहा है . इंस्पेक्टर ने फ़ोन स्पीकर पर लिया .

‘इंस्पेक्टर, ये तूने ठीक नहीं किया इन दोनों को थाने में लाकर ये हम तीनो के आपस का मामला है तू भीच में मत पड़ ’ किड्नेपर ने कहा

इंस्पेक्टर- साले मुझे धमकी देता है , सामने आकर मिल न क्या चूहे की तरफ छुपा है .

किड्नेपर- मेरे पास राहुल भी है और बीस करोड़ भी मैं चहुँ तो राहुल को अभी मार सकता हूँ

इंस्पेक्टर- तो मुझे क्यों बता रहा है , अभी तक भागा क्यों नहीं

किड्नेपर- ऐसे कैसे चला चाहू, मैं अपनी शालू को लिए बिना नहीं जाऊंगा.

तभी रवि ने फोन इंस्पेक्टर से छीना और चिल्लाते हुए बोला- मुझे नहीं पता तू कौन है बस मेरे बेटे को छोड़ दे , मुझे चाहे जो कर राहुल को छोड़ दे.

तभी लेडी कांस्टेबल भागते हुए आई और बोली- सर, मिस्टेक हो गयी .वो शालू बाथरूम गयी थी , और खिड़की तोड़ कर भाग गयी .

“चलो सही है , शालू खुद मेरे पास आ रही है अब राहुल को मार दूंगा और चैन से शालू के साथ रहूँगा ”किड्नेपर ने हँसत हुए फोन काट दिया.

इंस्पेक्टर- ये कॉल ट्रेस क्यों नहीं हुई अभी तक .

कांस्टेबल- सर जम्प हो रहा पर लोकेशन कीर्ति नगर की कंफिर्म है .

इंस्पेक्टर- नाकाबंदी करो और सर्च टीम तैयार करो.

इधर शालू पुलिस से भागते हुए उसी कारखाने में पहुंची और किड्नेपर के गले लग गयी, दोनों ने एक दुसरे को चूमा. फिर वो राहुल के पास गयी .और उसकी पट्टी खोली.

राहुल- मम्मी तुम आ गयी , मुझे बचाने

शालू------- मैं तेरी माँ नहीं हु, ये बस मेरा प्लान था तेरे बाप से पैसे ऐंठने का.

इधर किड्नेपर ने कम्पुटर तोड़ दिया. और शालू के साथ जाने ही लगा था की बाहर से पोलिस का सायरन बजने लगा.

शालू- शिट ,

और अपना फ़ोन तोड़ दिया.

शालू- अब क्या करे.

किड्नेपर- मेरे पास एक प्लान है .

पुलिस कारखाने में दाखिल हो ही रही थी की सामने से किड्नेपर, राहुल और शालू आते दिखे, किड्नेपर ने राहुल को गन पॉइंट पर लिया हुआ था .

किड्नेपर- मैं राहुल को तुम्हे देता हु, तुम मुझे शालू को ले जाने दो .

इंस्पेक्टर- एक शर्त पर , चेहरा दिखा अपना

किड्नेपर ये अपना टोपा उतारा और सब हैरान हो गए.

इंस्पेक्टर- ये तो राहुल का टीचर नीरज है .

रवि- मैं तुम्हे जान से मार दूंगा, चीखते हुए वो नीरज की तरफ भागा पर इंस्पेक्टर ने उसे रोका.

इंस्पेक्टर- अपने आप को सरेंडर कर दो ,

पर नीरज ने फायरिंग शुरू कर दी, इसी आपाधापी में एक इनोवा गाड़ी तेर्जी से उनकी तरफ आई , और शालू,तथा नीरज को ले जाने के लिए पर इंस्पेक्टर ने टायर में गोली मारी, दूसरी गोली नीरज के पैर पर लगी वो वही गिर गया और इसी बीच दुसरे पुलिस वाले ने राहुल को छुड़ा लिया. जब गाड़ी वाले का नकाब उतारा गया तो वो और कोई नहीं रवि का पडोसी शिव निकला.

इंस्पेक्टर- तो ये सब तुम तीनो का प्लान था .

जल्दी ही पुलिस तीनो को थाने ले आई .

इंस्पेक्टर- चलो अब बताओ ये सब कैसे और किसलिए किया .

शालू--- मैं और शिव दोनों प्यार करते है पर मेरे घर वालो को ये मंजूर नहीं थाउन्होंने मेरी शादी रवि से करवा दी .

पर नसीब देखो कुछ दिनों बाद शिव भी यही पर रहने आ गया . उसकी भी शादी हो गयी पर इश्क फिर से जाग गया . हम दोनों एक दुसरे से चुप चुप कर मिलने लगे.

इंस्पेक्टर- और इस नीरज का क्या रोल है .

शिव- ये मेरा दोस्त है , कम्पुटर हैकिंग में मास्टर है , पुलिस ट्रेस न कर सके इसलिए ये हमारा साथ दे रहा था .

इंस्पेक्टर- जानकी को किसने मारा और राहुल को गोली किसने मारी.

शिव- मैंने ही , नीरज वही पर था जब रवि निचे गया तो नीरज और शालू ने राहुल को उसके कमरे में छुपा दिया . ताकि बाद में उसे शिफ्ट कर सके, पर जब जानकी सुबह आई सफाई करने तो उसे ये सब मालूम हो गया की राहुल घर पर ही है , उसने नीरज को भी देख लिया था तो उसे मारना पड़ा.

इंस्पेक्टर- और बैंक में चोरी किसने की .

शिव- मैंने और नीरज ने , शालू की मदद से हमने चाबियाँ बनवा ली थी .

इंस्पेक्टर-पर प्लान फेल हो गया . क्राइम को इश्क का नाम देने वाले घटिया लोगो तुम जैसे लोग ही मोहब्बत को बदनाम करते है , अरे मोहब्बत थी तो रवि को सब कुछ बता कर शिव के साथ जा सकती थी , इस मासूम की जान को खतरे में डालने की क्या जरुरत थी . इसमें राहुल का क्या दोष था , उसकी तो माँ थी तुम पर आँखों पर हवास का पर्दा था तुम्हारे, खैर अब कानून ही करेगा तुम्हारा फैसला.

कुछ दिनों बाद उन तीनो को जानकी के खून, राहुल के अपहरण के लिए उम्र कैद हुई, रवि ने अपना दबदला किसी और शहर में करवा लिया और राहुलहोस्टल चला गया



...........................



...............................

ऐसे ही एक शाम रवि बैंक से निकल घर आया ही था की अन्दर कदम रखते ही उसे किसी ने पीछे से अपनी बाँहों में भर लिया . रवि ने भी उसे अपने आगोश में थाम लिया और अपने प्यासे होंठो को उसके लबो से जोड़ दिया.सब कुछ भूल कर दोनों एक दुसरे में जैसे खो गए थे . कुछ देर बाद जब ये तूफान थमा तो रवि ने कहा- बड़ी देर लगाई तुमने , मेघा.

मेघा- देर लगी आने में , पर अब बस हम है और हमारी ये जिन्दगी है , पिछले ज़ख्मो पर मिटटी डालने में समय तो लगता है . वैसे तुमने बड़ी अच्छी एक्टिंग की काँटा भी निकाल लिया और किसी को शक भी नहीं हुआ .

रवि- तुम्हारे बिना ये सब कहाँ कर पाता मैं इसमें रिस्क तो था पर तुम जानती हो बदले की आग में हम दोनों ही जल रहे थे, हम दोनों के मंजिल एक ही थी , शालू और शिव हमसे धोखा कर रहे थे ,हमने तो बस उनका खेल उन पर ही पलट दिया. मैं ये तो जनता था की शालू की नजर मेरी प्रोपर्टी पर है पर ये नहीं लगा था की वो राहुल को मोहरा बनाएगी, राहुल के लिए तो उसने खुद की औलाद पैदा नहीं की . मुझ से बेवफाई की मैं सह लेता माँ बनके जो उसने राहुल के साथ किया , शालू जैसी औरतो की वजह से ही दुनिया सौतेली को सगी नहीं होने देती है . और तुम्हारा साथ , तुमने जो मेरे लिए किया वो मैं कभी नहीं भूल सकता तुम्हारे बिना उन्हें ये सबक नहीं सिखा सकता था मैं .

मेघा- कहते है न दो बर्बाद लोग मिलकर एक आबाद जिन्दगी बना ही लेते है .

रवि कुछ नहीं बोला बस उसे अपनी बाँहों में भर लिया और दोनों एक दुसरे में खो गया .
 

Adirshi

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यादे अब भी है......

मुझे याद आता है.....

दूर दूर तक हरे हरे घने जंगल फैले हुए थे. दूर बहुत दूर हरी-भरी झाड़ियो के पीछे से छोटी छोटी पदादिया झांक रही थी , आसमान मैं बगुलों के झुण्ड के झुण्ड उड़ रहे थे, शाम हलके से पहाडियों के पीछे डूबता डूबता कहोतो मादक और कहो तो भयानक हो उठी थी.

मादक इसलिए की पिछली दो रातो से इस रेस्टहाउस के बरामदे मैं जिस नारी की आकृति को मैंने घूमते देखा था , यदि वह नवयौवना हो, अविवाहित हो इसलिए, और भयानक इस आशंका से की यदि कही वह भूली भटकी किसी लड़की की आत्मा हो तो? मगर... मैं इस बात पर यकीन नहीं करता था, मैंने सोचा था के खानसामा से पुछु की सामने वाले उस रेस्टहाउस मैं क्या कोई लड़की रहती है? मगर फिर मैंने खुद ही इस बात का पता लगाने का फैसला कर लिया था ! क्युकी रात को मुझे अक्सर नींद नहीं आती थी! दिनभर काम करने वाले मजदूर रातमे थककर पास ही बनाये हुए अपने खेमो मैं खर्राटे भरते और मैं अकेला उस रेस्टहाउस के कमरे मैं अपना राइटिंग वर्क पूरा करने के बाद इधर से उधर टहलता या फिर किताब पढ़कर वक़्त गुजारता और सोने की कोशिश करता! यह तो मेरी तीसरी चौथी ही रात थी अभी तो यहाँ पुरे चालीस दिन काम करना था जबतक सड़क पुनि नहीं हो जाती!

पहाड़ी इलाका था, अंधेरा होने मैं देर नहीं लगती थी, रात काफी हो चली थी, आज मुझे कुछ ज्यादा इंतजार करना पडा, वह साया मेरे कमरे के सामने से दो बार गुजरा, बहार बरामदे के बल्ब की रौशनी की वजह से उसकी छाया ठीक मेरे कमरेके द्वार पर पडी.

मैं हलके कदमो से द्वार की तरफ बढ़ा, सोचा आज सीधे उससे बात ही कर लू मगर मुझे इस का मौका ही नहीं मिला, वह नारी आकृति खुद ही लौट आयी और साइड मेरे द्वार पर दस्तक देनी सुरु कर दी ! बिलकुल हलकी दस्तक, ऐसा लगता था जैसे मुझे तो जगाना चाहती ही है पर यह भी चाहती है के आसपास किसी की नींद न टूटे.

एक बरगी मेरा दिल जोर से धड़का मगर दरवाजा खोलना जरुरी था, आखिर मैंने दरवाजा खोल ही दिया, कमरे की रौशनी उसे चेहरे पर पड़ी और उसका चेहरा देखकर मैं दंग रह गया, उचे कदकी छरहरे बदन वाली गोरी, लम्बे और घने बालो की छोटी जो कमर तक लटक रही थी, बडी बडी गहरी उदास आँखें, मैं सोचने लगा की इन आँखों मैं इतनी बेचैनी और उदासी क्यों है? पतले-पतले ओंठ, लगता जैसे एक लम्बे अरसे से वे हसे नहीं है...

मुझे देखते हि उसने एक अपराधी की तरह नजरे झुका ली, मैंने पुचा “क्या बात है? कौन चाहिए आपको?”

“जी......जी माफ़ करना मैं समझी थी विशालजी आये है”

विशाल हमारे साहब द्वारकाप्रसादजी का जैसे दाया हाथ था और एक बदचलन और रंगीन मिजाज का आदमी. पहले भी वो कई लडकियों को फसा चूका था और शायद ये उसका नया शिकार थी, वह खुद मेरी जगह यहाँ आने के लिए द्वारकाप्रसादजी को मनवा चूका था जो उसके काले कारनामो से अंजान थे मगर अचानक द्वारकाप्रसादजी को क्या सूझी की उन्होंने रातो रात मुझे यहाँ भेज दिया

मैंने कहा “जी नहीं विशालजी दूसरी तरफ भिजवादिए गए है कुछ दिनों के लिए”

सुनकर वह भरी कदमो से जाने के लिए मुडी, फिर मेरी और पलटकर बोली “क्या आपके पास नींद की गोलिया है? मुझे नींद नहीं आती”

मैंने अंदर जाकर अपने बैग मैं से उसे एक टेबलेट लाकर दे दी, वह चली गयी और मैं साडी रात उसी के बारे मैं सोचता रहा.

फिर लगातार दो तीन रातो तक यही सिलसिला चलता रहा, वह रात मैं दरवाजे पर दस्तक देती और नींद की गोलिया मांगती, धीरे धीरे काम का बोझ भी बढ़ रहा था, साडी जिम्मेदारी मेरे उपर थी.

चौथी रात को थकावट की वजह से मुझे शायद जल्दी नींद लग गयी थी मगर आधीरात को दरवाजे पर फिर वही हल्की सी दस्तक ! यह कैसा मजाक है? लगातार रोज रातो को इस तरह किसी अजनबी को जगाना? मैंने चिढ़कर दरवाजा खोला मगर जब उसके सहमे हुए चेहरे को देखा तो नरम पड गया, मैंने उसे अंदर बुलाकर बिठाया और विस्तार से पूछताछ की तो पता चला की विशाल ने उसे नौकरी का झासा दिलाकर यहाँ अपने से पहले भेज दिया. उसका पिछेसे यहाँ आना लगभग तय था मगर उसकी बदकिस्मती से मैं यहाँ पहुच गया, उस लड़की का नाम शितल था, मैंने उसे काफी समझाया, इसतरह रोज रोज नींद की गोली खाना खतरनाक साबित हो सकता है.

उस रात के बाद शितल मुझसे काफी घुलमिल गयी, कभी तो वो काफी खुश रहती मगर कभी इस कदर खामोश हो जाती जैसे पुराणी दुखभरी यादो मैं खो गयी हो, फिर वो दिनभर हमारे साथ रहती, मजदूरो की जरूरतों का ख्याल रखती ! मुझे तो ऐसा महसूस होने लगा जैसे मुझे एक अच्छा दोस्त मिल गया हो, अब तो वो खाने की मेज पर भी मेरा इंतजार करती फिर शाम को नित्य भोजन के बाद वो मेरे साथ टहलने आने लगी थी.

मुझे याद है उस रेस्टहाउस वाले पहाड़ी के निचे के गाँव मैं हम कई शाम गुजार चुके थे, वह एक झील के किनारे हम जब बैठते तो पास ही के झोपडी मैं रहने वाली एक बुढिया को आसपास के बच्चो को पुकारते हमने कई बार सुना था

एक शाम की बात है.....

हम वही बैठे थे थोड़ी देर बाद वोह बुढिया बहार आकर पुकारकर कहने लगी “अरे कोई इस बुढिया पर रहम कर के दूध बाट आओ वरना मैं जिउंगी कैसे? भैंस को क्या खिलाऊंगी?”

तब शितल ने उससे कहा था “क्यों अम्मा क्यों परेशां होती हो कहो तो मैं बाट दिया करू दूध?”

तब बुढिया ने उसे उपर से निचे तक ममता भरी नजरो से देखा और कहा “तुम? दूध बाटोगी? क्यों इस बुढिया से मजाक करती है रे? मेरी औलाद होती तो वह भी आज तुम्हारी बराबरी की रहती”

उस शाम बुढिया की बात सुनकर शितल मुस्कुरा उठी थी, मैंने उसे पहली बार इतना हसते देखा था, वो एक बेहद समझदार सुसंस्कृत और सच्ची लड़की थी, उसके व्यव्हार से ऐसे लगता था जैसे उसके अपने कुछ सिद्धांत थे, उसकी बाते सुनने मैं बडी अच्छी लगती थी हालाकि वो बोलती बहुत कम थी, शायद जीवन मैं लगातार दुखो का सामना करते हुए वो अंतर्मुख हो गयी थी, बातो के दौरान उसने बताया था के उसके माता-पिता भाई बाढ़ मैं बहकर मर चुके है,

हम जब कभी शाम को टहलने निकलते तो कई विषयों पर हमारी बाते होती थी खासकर जब मजदूरो के विषय मैं बात चलती तो मैं पता के मजदूरो के प्रति उसके दिल मैं काफी प्रेम है, एक रात एक मजदुर शराब पीकर काफी उधम मचा रहा था तब गुस्से मैं मैंने उसपर हाथ उठा लिया था तो शितल बीच बचाव कर मेरा हाथ पकड़कर ले गयी थी, मुझे समझाते हुए कहने लगी “मजदूरो की जिंदगी भी अजीब है अमीत! हम देखो कभी कबार एक तरह वक़्त निकालकर कुछ बाते तो कर लेते है मगर उन्हें देखो दिनभर की थकन के बाद अब वे किस तरह करह रहे है, उनकी इस अवस्था का मुक्ज्य कारन यही है के वे कभी आत्मचिंतन के लिए समय ही नहीं निकाल पते, सुबह मुह अँधेरे उठकर देर रात तक कठिन परिश्रम करते है, अपनी ताकत से ज्यादा म्हणत करने से और उस लायक खुराक न मिलने से बुढ़ापे मैं किसी बीमारी का शिकार हो जाते है “

उसकी बाते सुनकर ऐसा लगता की वह हर बात कहने से पहले उसपर अच्छी तरह सोच लेती है,

कुछ दिन और गुजर गए, द्वारकाप्रसादजी वहा आ चुके थे, काम की उन्होंने प्रशंसा की, फिर विशाल आया, उसके व्यवहार से मुझे लगा जैसे शितल का मुझसे मिलना उसे कतई पसंद नहीं, उसने तो खुद उसके साथ मौज करने के ख्याल से उसे यहाँ एकांत मैं रख छोड़ा था ताकि काम भी हो जाये और प्रतिष्ठा को भी धक्का न लगे, मेरा शक सही निकला,

कुछ रोज बाद उन्होंने मुझे बुलाकर वह से ३० मील दूर पहाड़ी पर चल रहे काम पर निगरानी के लिए जाने को कहा

मैं विवश था, नौकर जो ठहरा, दिल तो नहीं हो रहा था लगता था कुछ दिन और रहने को मिलता यहाँ, कैसे बताऊ शितल को दिल की हालत? फिर सोचा बताना क्या जरुरी है? उसे विशाल ने यहाँ रखा है, वो सोचेगा उसके बारे मैं? मेरी तो अपनी जिम्मेदारियाँ मुझे संभालना चाहिए मगर उस रात शितल से मिलकर जब मैंने कहा “मैं जा रहा हु शितल”

तो वो आँचल मैं मु छिपाकर रोटी हुयी कमरे मैं भाग गयी, बरामदे मैं खड़ा विशाल मुझे घुर कर देख रहा था

जाने क्यों मेरे इतन्मे करीब रहकर भी शितल मुझसे एक निश्चित दुरी बनाये रखती थी, क्यों नारी मन की थाह पाना इतना कठिन है, मैं भरी मन से चल पड़ा था,

कुछ दिनों बाद उधर से लौटकर रस्ते मैं मैंने जो कुछ देखा सुना उससे मेरा दिल कांप उठा

पहाड़ी के निचे वाले गाँव में मैं पंहुचा ही था की हमारे यूनिट का केदार मुझे वह झील के किनारे बैठा दिखाई दिया, बिलकुल उदास-निराश था वो, मैं करीब जाकर पूछा “क्या बात है केदार?”

मुझे देखते ही उसके आंसू निकल आये वो कहने लगा “सब कुछ लुट गया अमीत! सब कुछ! परसों के रोज इस गाँव के कीटनाशक कारखाने से एक विषैली गैस रिसी और इस गाँव के और अपने भी कई मजदूरो को मौत के घाट उतर गयी....शितल भी.....

“क्या.....शितल यहाँ क्यों आई” मैंने चीखते हुए पूछा

“आपके जाने के बाद एक रात विशाल ने उसकी इज्जत पर हाथ डाला फिर उसके बाद हमने किसी ने उसे नहीं देखा फिर एक रोज किसी ने उसे इस गाँव मैं दूध की केतली लेकर जाते देखा था...परसों इस गाँव के लगभग हर घर से लाशे मिली, कुछ लोगो को मैंने बाते करते सुना था, एक अकेली रहने वाली बुढिया के घर से एक जवान लड़की की लाश मिली थी”

उस दिन उस गाँव मे और मेरे मन मैं फैली ख़ामोशी कोई मामूली न थी, स्मशानघाट जैसी ख़ामोशी थी वो, हर घर सुना पड़ा था, जानवर और पक्षी तो एक भी नजर नहीं आते थे, पेड़ खामोश खड़े थे, मैंने रेस्टहाउस जाना जरुरी नहीं समझा, अब शेष क्या रह गया था, मैं उलटे पैरो से लौट आया अपने शहर

वहा से लौटा तो ऐसा महसूस हो रहा था जैसे पीछे कुछ छुट गया हो, दिल का कोई टुकड़ा वहा रह गया हो...

फिर एक दिन केदार का पत्र आया, लिखा था “शितल के सामान मैं ये ख़त मिला है आपके नाम है साथ मैं भेज रहा हु-

शितल ने लिखा था –

प्रिय अमीतजी, मुझे ऐसा लगने लगा था जैसे मैं पागल हो जाउंगी, जीवन से हार चुकी थी मैं, सच जिस नारी को पिता,भाई या पति मैं से किसी पुरुष का सहारा न हो तो उसका जीने से मर जाना अच्छा है, मैंने दो बार आत्महत्या की कोशिश की मगर असफल रही, फिर सोचा यहाँ आपके नजदीक आपको विचलित करना ठीक नहीं इसीलिए सोचती हु यह ख़त मेरी मौत के बाद तुम्हे मिले तो अच्छा है, एक नींद की गोली के बहाने तुम्हारी जिंदगी मैं आयी और अपना दिल तुम्हे दे बैठी हालाँकि मैं जानती थी मैं तुम्हारे काबिल नहीं थी इसीलिए तुमसे एक निश्चित दुरी बनाये राखी, मुझे गलत न समझना और इतने दिनों तक तुम्हे धोका देती रही इसके लिए मुझे क्षमा करना और मुझे भूल जाने की कोशिश करना ,

आपकी शितल..



आज इस घटना को कई साल बीत चुके है, मेरी बीवी है बच्चे है, भरा पूरा परिवार है, नौकरी मैं बड़े ओहदे पर हु, हमेशा व्यस्त रहता हु, अत्यधिक काम के तनाव के कारन जब कभी किसी रात नींद की टेबलेट खाने के लिए हाथ मैं लेता हु.....

तो वो सारी यादे दिमाग मैं उभर आती है, फिर नींद की गोली खाकर भी सो नहीं पता हु.....दिन बीत चुके है मगर..


यादे अब भी शेष है.........
 
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