parkas
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Bahut hi badhiya update diya hai Raj_sharma bhai....#177.
“शैफाली, पहले क्या तुम मुझे बताओगी कि यह सब क्या हो रहा है?” सुयश ने बीच में ही शैफाली को टोकते हुए कहा।
शैफाली ने जल्दी-जल्दी झील के अंदर की सारी घटना सुयश सहित सभी को सुना दी। इसके बाद वह फिर परी की ओर घूम गई।
“क्या तुम बता सकती हो कि तुम्हारा नाम क्या है? और तुम यहां कैद होने से पहले कहां रहती थी?” शैफाली ने फिर परी से एक सवाल कर दिया।
“मेरा नाम...मेरा नाम मुझे याद नहीं आ रहा। यहां तक कि मुझे यह भी याद नहीं कि मैं कहां रहती थी, बस मुझे इतना पता है कि मेरे पास हिम के स्वर हैं और उनके द्वारा मैं जादू कर सकती हूं।” परी ने कहा।
“हिम के स्वर?” तभी शैफाली को कविता की दूसरी पंक्ति याद आ गई- “थिरक उठेंगे हिम के स्वर।”
यह सोच शैफाली ने उस परी से कहा- “जरा हमें भी तो हिम के स्वर का जादू दिखाओ। हम तो देखें कि तुममें कितनी प्रतिभा है?”
शैफाली के यह कहते ही उस परी ने अपने हाथ में पकड़े राजदण्ड को हवा में हिलाया। परी के ऐसा करते ही, उसके राजदण्ड में आगे लगे बैंगनी मोती से, कुछ किरणें हवा में निकलीं और इसी के साथ हवा में एक बैंगनी रंग की तितली प्रकट हो गई।
वह तितली जैसे-जैसे अपने पंख हिला रही थी, वातावरण में गुलाबी रंग के अजीब से फाहे फैलते जा रहे थे।
इसी के साथ बर्फ से अजीब से मधुर स्वर निकल कर वातावरण में गूंजने लगे।
जैसे ही वह स्वर ऐलेक्स के कानों में पड़े, ऐलेक्स के शरीर की बर्फ पिघलने लगी। कुछ ही देर में ऐलेक्स बिल्कुल सही हो गया।
जैसे ही ऐलेक्स सही हुआ, वह परी चीख उठी- “मुझे बचा लो...मुझे कुछ हो रहा है, मैं मरना नहीं चाहती, मैं यहां से बाहर जाना चाहती हूं।”
तभी परी का शरीर हवा में धुंआ बनकर उड़ गया, अब बस हवा में उसकी चीखें बचीं थीं।
वातावरण से भी अब बैंगनी रंग पूरी तरह से गायब हो चुका था।
शैफाली को छोड़ किसी की समझ में नहीं आया कि उस परी के साथ क्या हुआ? और वह गायब होकर कहां चली गई।
परी को गायब होता देख, शैफाली की पेशानी पर बल पड़ गये। अब उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ नजर आनें लगीं।
यह देख सुयश ने शैफाली से पूछ लिया- “ये परी अचानक से कहां गायब हो गई? उसे उसका अतीत याद क्यों नहीं आ रहा था? और तुम्हारे चेहरे पर यह चिंता की लकीरें क्यों हैं शैफाली?”
“कैप्टेन अंकल, कुछ तो गलत हो रहा है तिलिस्मा में?...जो मुझे चिंता में डाल रहा है” शैफाली ने चिंतित स्वर में कहा- “दरअसल यह परी कैश्वर का ही बनाया हुआ तिलिस्मा का एक प्रोजेक्ट थी, जो कि अपना
कार्य समाप्त करके स्वतः गायब हो जाती, पर जाने कैसे इस परी को ये महसूस होने लगा, कि वह एक जीवित परी है और इसने अपने कार्य को अपनी कहानी बना लिया। ऐसा तभी हो सकता है, जबकि कैश्वर के बनाये इन प्राणियों में अपने आप भावनाएं आ जाएं।
“अगर इन प्राणियों में भावनाएं आ गईं, तो यह अपना कार्य करना छोड़ एक स्वतंत्र प्राणी की भांति जीने को सोचने लगेंगे और यह स्थिति पूरी पृथ्वी के लिये खतरनाक हो जायेगी। क्यों कि यह काल्पनिक प्राणी, तब जीवित प्राणियों से युद्ध करना शुरु कर देंगे और पृथ्वी का जीवनचक्र खराब कर देंगे। मुझे नहीं पता कि अभी ये भावना एक ही प्राणी में थी या फिर सभी में आ गई है। क्यों कि अगर यह भावना सभी तिलिस्मा के प्राणियों में आ गई, तो वह प्राणी नियमों के विरुद्ध जाकर हमें इस तिलिस्मा को पार नहीं करने देंगे, क्यों कि हमारे द्वार पार करते ही वह स्वतः खत्म हो जायेंगे।”
“मुझे तो लगता है कि कैश्वर को ईश्वर बनने की कुछ ज्यादा ही जल्दी है, इसलिये वह जान बूझकर सभी प्राणियों में भावनाएं डाल रहा है, जिससे हम इस तिलिस्मा को पार नहीं कर सकें।” सुयश ने गुस्साते हुए कहा।
“चलो, फिलहाल इस द्वार को पार करते हैं फिर आगे की बाद में सोचेंगे।” तौफीक ने सबको याद दिलाते हुए कहा।
“इस द्वार की सभी चीजें तो समाप्त हो गईं, फिर भी अभी तक हमें यहां से निकलने का दरवाजा क्यों नहीं मिला?” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।
तभी शैफाली की नजर जमीन पर गिरी, एक लाल रंग की गोल सी वस्तु पर गई, जो कि एक कंचे के समान था।
शैफाली ने आगे बढ़कर उसे ध्यान से देखा। वह कंचा नहीं बल्कि उसी मिसगर्न मछली की आँख थी, जिसकी खाल से शैफाली ने दस्ताने बनाये थे।
“जब सबकुछ गायब हो गया, तो यह आँख अभी तक क्यों गायब नहीं हुई?” यह सोच शैफाली ने आगे बढ़कर उस मछली की आँख को उठा लिया।
पर जैसे ही शैफाली ने उस आँख को जमीन से उठाया, उस आँख का आकार तेजी से बढ़ने लगा।
यह देख शैफाली ने घबराकर उस मछली की आँख को अपने हाथों से छोड़ दिया।
जमीन पर गिरते ही वह आँख फिर से सामान्य आकार की हो गई। शैफाली ने दोबारा से उसे उठाने की कोशिश की, परंतु फिर से वह आँख बड़ी होने लगी। शैफाली ने दोबारा उस आँख को जमीन पर छोड़ दिया।
यह देख ऐलेक्स ने गुस्साते हुए उस मछली की आँख को उठाकर ऊपर आसमान में उछाल दिया- “अरे फेंको इसे...यह मछली की नहीं, बल्कि शैतान की आँख है।”
अब वह मछली की आँख तेजी से आसमान की ओर जा रही थी और हर अगले पल में आकार में दुगनी होती जा रही थी।
कुछ ही देर में वह आँख अधिकतम ऊंचाई तक पहुंच गई। परंतु अब उसका आकार किसी ग्रह के बराबर हो गया था और अब वह सब पर गिरने के लिये नीचे आ रही थी।
“हे भगवान ये क्या बला है?” क्रिस्टी ने गुर्राते हुए कहा- “अब यह मछली की आँख, हम सबकी माँ की आँख करने वाली है।”
किसी के पास ना तो बचने का कोई उपाय था और ना ही छिपने की जगह। कुछ ही पलों में वह मंगल ग्रह के समान मछली की आँख उन सब पर आ गिरी।
सभी की आँखें डर के मारे बंद हो गईं और उनके मुंह से चीख निकल गई। जब सबकी आँखें खुलीं तो वह वापस पृथ्वी के ग्लोब वाले स्थान पर थे।
“वह तिलिस्मा के उस भाग से बाहर निकलने का द्वार था?” सुयश ने आश्चर्य से कहा- “भगवान बचाये ऐसे द्वार से....मुझे तो लगा कि अब हम सबका काम खत्म हो गया।”
“चलो दोस्तों, अब तिलिस्मा के चौथे भाग के आखिरी द्वार की ओर चलते है, जहां हमें ग्रीनलैंड जाकर वसंत ऋतु की बाधा को दूर करना है।” जेनिथ ने कहा।
अब सभी पृथ्वी के ग्लोब की ओर एक बार फिर से बढ़ गये।
विद्युम्ना का रहस्य: (2 दिन पहले...... 15.01.02, मंगलवार, 07:30, महावृक्ष, सामरा राज्य, अराका द्वीप)
व्योम, त्रिकाली, युगाका और कलाट महावृक्ष के सामने खड़े थे।
“हे महावृक्ष हमारे परिवार की नयी अमरबेल को आपके आशीर्वाद की जरुरत है। अतः नये वर-वधू को अपने आशीर्वाद से कृतार्थ करें।” कलाट ने महावृक्ष को देखते हुए कहा।
“महाशक्ति के रक्षक को हम पहले ही आशीर्वाद दे चुके है कलाट।” महावृक्ष की आवाज वातवरण में गूंजी- “अब तो बस इनके प्रेम की परीक्षा का समय है।”
“परीक्षा ? कैसी परीक्षा महावृक्ष?” युगाका ने आश्चर्य से महावृक्ष को देखते हुए कहा।
“ठीक वैसी ही, जैसी मैंने बचपन में तुम्हारी परीक्षा ली थी।” महावृक्ष ने कहा।
युगाका अपनी बचपन की परीक्षा को याद कर सिहर उठा, अचानक से उसे अपने शरीर के जलने का अहसास याद आ गया।
“हम किसी भी प्रकार की परीक्षा देने को सहर्ष तैयार है महावृक्ष।” व्योम ने आगे बढ़ते हुए कहा।
“तो फिर ठीक है, तैयार हो जाओ, इस विषम परीक्षा के लिये।” अचानक महावृक्ष की आवाज बहुत तेज हो गई।
ऐसा लगा जैसे महावृक्ष बहुत क्रोध में आ गया हो। अचानक से व्योम और त्रिकाली के सामने से कलाट और युगाका गायब हो गये और महावृक्ष ने अपने शरीर को विकराल कर लिया।
अब व्योम और त्रिकाली को अपना शरीर हवा में उड़ता हुआ दिखाई दिया।
इसी के साथ व्योम और त्रिकाली महावृक्ष की कोटर से होते हुए उसके अंदर समा गये। अंदर इतनी तीव्र रोशनी थी कि दोनों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
धीरे-धीरे रोशनी कम होने लगी, अब त्रिकाली और व्योम ने अपने चारो ओर देखा, उनके सामने आसमान में विशाल रुप में विद्युम्ना के चेहरा दिख रहा था।
नीचे जमीन पर, एक काँच की ट्यूब में त्रिशाल और कलिका बंद थे। उस काँच की ट्यूब के सामने 3 व्यक्ति खड़े थे। एक व्यक्ति जल से निर्मित एक जलमानव लग रहा था।
दूसरा व्यक्ति एक 20 फुट का शक्तिशाली दानव था, जिसने अपने हाथ में कुल्हाड़ा पकड़ रखा था और तीसरा व्यक्ति एक मरियल सा सुकड़ी हड्डी वाला एक बालक था।
“हा ऽऽऽ हा ऽऽऽऽ हा ऽऽऽऽ तो तुम दोनों आये हो विद्युम्ना का विनाश करने।” विद्युम्ना ने हंसते हुए कहा- “जब 2 दिव्य शक्तियों के पास होने के बावजूद भी तुम्हारे माता-पिता मेरा कुछ नहीं कर पाये, तो तुम बच्चे लोग क्या कर पाओगे?”
“यह हम सीधे विद्युम्ना के पास कैसे पहुंच गये? महावृक्ष तो हमारी परीक्षा लेने जा रहे थे।” व्योम ने फुसफुसा कर त्रिकाली से पूछा।
“मुझे भी नहीं पता, पर महावृक्ष कुछ भी कर सकते हैं?” त्रिकाली ने व्योम के समीप जाते हुए कहा।
“तो आओ, जो काम कल करना था, वह आज ही करते हैं।” व्योम ने अपने दाँत भींचते हुए कहा और इसी के साथ व्योम के हाथ में पंचशूल प्रकट हो गया।
त्रिकाली के भी दोनों हाथ बर्फ से भर गये।
“मेरे पास महादेव की दी हुई त्रिशक्ति की ताकत है, जिसे तुम कभी परास्त नहीं कर सकते व्योम।” विद्युम्ना ने हंसते हुए कहा- “तुम्हें पहले मेरी जल शक्ति से टकराना होगा।”
इतना कहते ही विद्युम्ना की आँखों से एक तरंग निकली और इसी के साथ जलमानव, एक छोटी सी झील के ऊपर खड़ा दिखाई देने लगा।
“तुम्हें इस जलमानव से इस झील के ऊपर ही लड़ना होगा व्योम। इस जलमानव की शक्ति जल ही है और तुम्हें इसे हराना भी जल के ही ऊपर होगा।” विद्युम्ना ने कहा।
यह देख व्योम उछलकर जल की सतह पर जा खड़ा हुआ- “ठीक है, तो फिर मैं इसे जल के ऊपर ही परास्त करुंगा।”
त्रिकाली हैरानी से व्योम को जल के ऊपर चलते हुए देख रही थी, त्रिकाली को व्योम की इस शक्ति के बारे में कुछ नहीं पता था।
यह व्योम की गुरुत्व शक्ति का कमाल था, जिसकी वजह से वह जल की सतह पर गुरुत्वाकर्षण से मुक्त हो खड़ा था।
जलमानव ने व्योम को जल के ऊपर आते देख, व्योम पर जल की बूंदों से प्रहार किया। उन बूंदों के शरीर पर पड़ते ही व्योम का शरीर कई जगह से जल गया, पर पंचशूल ने तुरंत ही व्योम के शरीर को सही कर दिया।
अब व्योम ने पंचशूल को फेंककर, जलमानव का सिर धड़ से अलग कर दिया। पर जलमानव का सिर तुरंत से वापस जुड़ गया। यह देख व्योम ने इस बार पंचशूल को हवा में गोल-गोल नचा कर फेंका।
पंचशूल ने पंखे की तरह से घूमते हुए जलमानव के शरीर के असंख्य टुकड़े कर झील में दूर-दूर तक फेंक दिये। पर कुछ ही देर में झील के जल ने सभी टुकड़ों को जोड़कर जलमानव को फिर से खड़ा कर दिया।
यह देख व्योम ने त्रिकाली को एक इशारा किया। इस बार जैसे ही जलमानव पूरी तरह से जुड़ा, त्रिकाली ने अपनी बर्फ की शक्तियों से जलमानव को पूरा का पूरा जमा दिया।
जलमानव को जमते देख व्योम ने एक बार फिर पंचशूल का उपयोग कर जलमानव के टुकड़े कर दिये, पर जैसे ही वह सभी बर्फ के टुकड़े पानी के सम्पर्क में आये, वह फिर से पिघलकर जलमानव का रुप लेने
लगे।
अब व्योम को यह मुसीबत थोड़ी बड़ी दिखने लगी थी। इस बार जैसे ही जलमानव सही हुआ, व्योम ने अपने पंचशूल से ऊर्जा का एक तेज प्रहार जलमानव पर किया।
इस ऊर्जा ने अग्नि के रुप में जलमानव को पिघलाकर पूर्णतया भाप में परिवर्तित कर दिया।
अब वह भाप झील के पानी से मिक्स नहीं हो सकती थी, यह देख व्योम के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई।
उसने मान लिया कि जलमानव अब खत्म हो गया। पर कहते हैं ना, कि जो सोचो, वह चीज उस हिसाब से होती नहीं है और यह कहावत यहां पूरी तरी के से चरितार्थ हो रही थी।
हवा में तैर रहे उन भाप के कणों ने आपस में मिलकर एक बादल का रुप ले लिया और बारिश बनकर वापस झील के पानी में मिल गये।
यह देख विद्युम्ना की हंसी फिर से वातावरण में गूंज गई- “यह जलमानव महा…देव की शक्ति से निर्मित है व्योम, यह इतनी आसानी से समाप्त नहीं होगा।”
जलमानव एक बार फिर जल की सतह पर खड़ा हो गया था।
इस बार व्योम ने अपना बांया हाथ जलमानव की ओर कर हवा में लहराया, पर व्योम के इस प्रहार से जलमानव को कुछ होता दिखाई नहीं दिया? अब एक बार फिर व्योम ने त्रिकाली की ओर देखकर मदद मांगी।
त्रिकाली ने फिर से जलमानव के शरीर को बर्फ में विभक्त कर दिया। इस बार व्योम ने आगे बढ़कर एक प्रचण्ड घूंसा उस जलमानव के सिर पर मार दिया।
जलमानव हर बार की तरह फिर खण्ड-खण्ड हो बिखर गया। पर इस बार जलमानव का शरीर पानी से नहीं मिला, वह बर्फ के सारे टुकड़े अब जल की सतह से कुछ ऊपर हवा में तैर रहे थे।
यह देख विद्युम्ना आश्चर्य से भर उठी- “यह कौन सी शक्ति है व्योम?”
“यह गुरुत्वाकर्षण को मुक्त करने वाली शक्ति है, अब इस शक्ति के माध्यम से यह बर्फ के टुकड़े पानी से कभी नहीं मिल सकते, यह इसी प्रकार से हवा में घूमते रहेंगे।” व्योम ने कहा- “अब दूसरी शक्ति को भेजो विद्युम्ना....मैं आज सभी को हराकर त्रिकाली के माता-पिता को यहां से ले जाऊंगा।”
यह देख विद्युम्ना ने उस दानव को अब व्योम से लड़ने के लिये भेज दिया - “यह मेरी बल शक्ति है, इसके बराबर का बल दुनिया में किसी के पास नहीं है और इस पर तुम्हारे पंचशूल का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके सामने तुम्हारा पंचशूल मात्र एक साधारण अस्त्र की तरह है। परंतु तुम्हें इससे जल पर नहीं, जमीन पर लड़ना होगा।”
उस दानव ने अब व्योम पर अपने कुल्हाड़े से आक्रमण कर दिया। व्योम ने उस दानव का वार अपने पंचशूल पर रोक लिया। अब व्योम ने पंचशूल को हवा में नचाते हुए दानव पर वार कर दिया, पर उस वार को दानव ने आसानी से बचा लिया।
अब व्योम और दानव के बीच युद्ध शुरु हो गया था। कभी लगता कि व्योम दानव पर भारी पड़ रहा है, तो कभी दानव व्योम पर भारी पड़ते दिखाई देता।
त्रिकाली मात्र दर्शक बनी उस युद्ध को निहार रही थी। लगभग आधा घंटा ऐसे ही लड़ते रहने के बाद, व्योम समझ गया कि उस दानव को ऐसे नहीं हराया जा सकता।
“अवश्य ही इस दानव के पास कोई ऐसी चमत्कारी शक्ति है? जो यह प्रयोग कर रहा है, पर मुझे वह दिखाई नहीं दे रही है” व्योम अपने मन ही मन में बड़बड़ाया- “विद्युम्ना इस दानव को ‘बल’ कह कर सम्बोधित कर रही थी, कहीं इसके नाम में ही तो कोई रहस्य नहीं छिपा?”
यह सोच अब व्योम लड़ते हुए उस दानव को ध्यान से देखने लगा। कुछ ही देर में व्योम ने उस दानव की एक आदत को पकड़ लिया और वह आदत थी कि कुछ देर लड़ने के बाद वह दानव अपने पैर को जमीन पर मार रहा था।
“यह बार-बार अपने पैर को जमीन पर मार रहा है, कहीं ये पृथ्वी से कोई शक्ति तो नहीं ले रहा।“ अब व्योम के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी।
व्योम को मुस्कुराते देख त्रिकाली ने कहा- “दिमाग खराब हो गया है क्या? यह तुम मुस्कुराकर क्यों लड़ रहे हो ?”
“क्या तुम न्यूटन को जानती हो?” व्योम ने लड़ते-लड़तें अजीब सा सवाल त्रिकाली से कर लिया।
त्रिकाली ने ‘ना’ में अपना सिर हिला दिया। यह देख व्योम ने उस दानव पर अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति का प्रयोग कर दिया।
अब उस दानव के पैर जमीन को छोड़ हवा में लहराने लगे। अब वह दानव बहुत कोशिश करने के बाद भी आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
तभी व्योम ने इस बार उछलकर एक जोर का मुक्का उस दानव के सिर पर मारा, दानव तुरंत वहीं गिर कर बेहोश हो गया।
यह देख विद्युम्ना आश्चर्य से भर उठी- “यह तुमने कैसे किया व्योम?”
“पृथ्वी के एक महान वैज्ञानिक ने कहा था कि बल हमेशा द्रव्यमान (भार) और उसके त्वरण (गति) पर निर्भर होता है। यानि की अगर हमारा वजन जितना ज्यादा हो, हम अपनी गति से उतना बल उत्पन्न कर सकते हैं, तो बस मैंने उन्हीं वैज्ञानिक के कथनों को विचार करते हुए, अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से इस दानव के भार को ही समाप्त कर दिया। अब जब किसी का भार ही नहीं बचा, तो उसमें बल कहां से आयेगा? और एक बलरहित दानव को मारने में ज्यादा समय तो लगना नहीं था।”
“बहुत अच्छे।” विद्युम्ना ने व्योम की तारीफ करते हुए कहा- “अब जरा मेरी तीसरी शक्ति से भी निपट लो।”
अब व्योम की नजर विद्युम्ना की तीसरी शक्ति की ओर गई। उस दुबले-पतले बालक को देख व्योम के चेहरे पर हंसी आ गयी- “ये भी लड़ेगा क्या?”
तभी वह बालक धीरे-धीरे व्योम की ओर बढ़ने लगा। व्योम पहले देखना चाहता था कि यह बालक कैसा है? इसलिये व्योम ने उसे कुछ नहीं कहा।
पास आकर उस बालक ने अपना जोर का घूंसा व्योम के पेट में मारा, पर व्योम को उस बालक का घूंसा गुदगुदी के समान महसूस हुआ।
बालक ने अपना मुंह बनाकर, दुखी भाव से विद्युम्ना की ओर देखा और फिर एक बार जोर का हाथ लहरा कर अपना घूंसा व्योम के पेट में मारा, बालक के इस वार से व्योम हवा में उड़ता हुआ 100 फुट से भी
ज्यादा दूर गिरा।
व्योम का पूरा शरीर दर्द से कराह उठा। व्योम को अब अपनी गलती का अहसास हो रहा था। व्योम धीरे से उठकर खड़ा हो गया।
उसने अब अपनी निगाह उस बालक पर डाली, पर तब तक बालक ने त्रिकाली को पकड़कर एक काँच के आदमकद बर्तन में डाल दिया, जो कि हवा में उल्टा लटका था और उस बर्तन का ढक्कन बंद था।
अब त्रिशाल, कलिका और त्रिकाली, तीनो अलग-अलग काँच के बर्तन में हवा में टंगे थे। उनके नीचे जमीन पर एक चाकुओं का बिस्तर सा बना था।
साफ दिख रहा था कि अगर कोई भी उस काँच के बर्तन से गिरा, तो वह सीधे उन धारदार चाकुओं पर गिरेगा।
“कैसा लगा व्योम मेरी छल शक्ति का कमाल?” विद्युम्ना ने कहा- “अब इन तीनों काँच के बर्तनों का बटन मेरे पास है। मैं तीनों बर्तनों का ढक्कन एक साथ खोलूंगी। मेरे ढक्कन खोलते ही तीनों एक साथ इन चाकुओं पर गिरेंगे। अब तुम इन तीनों में से किसी एक को ही बचा सकते हो। और मुझे जानना है कि तुम इन तीनों में से किसे बचाते हो?”
व्योम के पास समय नहीं था सोचने का। अतः उसने एक पल में अपना निर्णय ले लिया।
व्योम अब तेजी से उन चाकुओं की ओर भागा। उसे भागते देख विद्युम्ना ने अपने हाथ में पकड़े यंत्र का बटन दबा दिया।
बटन के दबते ही तीनों शरीर हवा में लहराकर नीचे की ओर जाने लगे। इसी के साथ व्योम किसी को भी बचाने की जगह, उन चाकुओं पर स्वयं लेट गया।
तीनों शरीर व्योम के ऊपर आकर गिरे। अब तीनों लोग तो बच गये थे, पर उनके भार की वजह से सारे चाकू व्योम के शरीर में घुस गये।
यह देख त्रिकाली के मुंह से चीख निकल गई, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कर पाती, रोशनी का एक तेज झमाका हुआ और त्रिकाली की आँखें बंद हो गईं, जब त्रिकाली की आँखें खुलीं, तो वह और व्योम दोनों ही सकुशल हालत में महावृक्ष के सामने खड़े थे और उनके बगल कलाट और युगाका वैसे ही खड़े थे, जैसा कि वह लोग उन्हें छोड़ कर गये थे।
व्योम और त्रिकाली हैरानी से अपने चारो ओर त्रिशाल व कलिका को ढूंढने लगे।
तभी वातावरण में महावृक्ष की आवाज गूंजी- “कलाट, मेरी परीक्षा पूर्ण हुई, अब व्योम और त्रिकाली विद्युम्ना से टकराने के लिये तैयार हैं।”
“क्या मतलब? क्या यह सिर्फ परीक्षा थी?” व्योम ने उलझे-उलझे से स्वर में पूछा।
“हां व्योम।” महावृक्ष ने कहा- “ये विद्युम्ना, उसकी शक्तियां और त्रिकाली के माता-पिता सब मेरे द्वारा फैलाया भ्रमजाल था। मैं तुम्हें यह दिखाना चाहता था, कि विद्युम्ना कितनी खतरनाक हो सकती है? मैंने अपने भ्रमजाल का निर्माण ठीक उसी प्रकार किया था, जैसे कि विद्युम्ना अपने भ्रमन्तिका का करती है। मुझे ये नहीं पता कि उसकी जल, बल और छल की शक्ति किस प्रकार होगी? पर मैंने तुम्हें अपने भ्रमजाल के माध्यम से समझाना चाहा है कि वह शक्तियां किसी भी प्रकार से हो सकती हैं? इसलिये तुम्हें हर कदम पर सावधान रहना होगा। ......अब तुम यह बताओ व्योम, कि तुम्हें मेरे भ्रमजाल से क्या सीखने को मिला?”
“मैंने सीखा कि शत्रु के चेहरे और उसके शरीर की काया देखकर, उसकी शक्ति का अंदाजा नहीं लगाना चाहिये। छल शक्ति ने मुझे इसी कारण पराजित किया था क्यों कि मैंने उसके शरीर को देखकर उसकी शक्तियों का गलत आंकलन किया था।” व्योम ने कहा।
“बिल्कुल सही व्योम...पर तुमने भ्रमजाल में एक और गलती की थी, जो तुम्हें अभी तक समझ में नहीं आयी?” महावृक्ष ने कहा- “तुम्हें अपनी शक्तियों के बारे में शत्रु को कभी नहीं बताना है, भले ही वह तुम्हारी कितनी भी तारीफ करते हुए पूछे। दरअसल विद्युम्ना की सबसे खास बात यही है, वह पहले लोगों को शब्दजाल से भ्रमित कर, या फिर उनकी किसी प्रकार से परीक्षा ले, उनकी शक्तियों के बारे में जान जाती है और फिर उनके शक्तियों को देखकर ही वह नये भ्रमन्ति का का निर्माण करती है। तो एक बात हमेशा ध्यान रखना, जब तक तुम उसके सामने ना पहुंच जाओ, तब तक अपनी, किसी एक शक्ति का प्रयोग मत करना, वहीं शक्ति अंत में तुम्हें विजय दिलायेगी।”
“जी महावृक्ष, मैं इस बात का ध्यान रखूंगा।” व्योम ने हाथ जोड़कर महावृक्ष को प्रणाम करते हुए कहा।
“तुमने तो देख ही लिया कलाट कि व्योम ने अंतिम समय में किसी एक को ना बचाकर, सभी को बचाने का प्रयत्न किया और यह एक महाशक्ति धारक की सबसे बड़ी निशानी है। त्रिकाली का चयन उत्तम है।” महावृक्ष ने कलाट की ओर देखते हुए कहा।
“जी महावृक्ष, अब आज्ञा दीजिये। त्रिकाली और व्योम को आज ही हिमालय की ओर प्रस्थान करना है।” कलाट ने महावृक्ष को प्रणाम करते हुए कहा और सभी को लेकर सामरा राज्य के महल की ओर चल दिया।
रास्ते भर त्रिकाली के कानों में महा वृक्ष के कहे शब्द गूंज रहे थे- “त्रिकाली का चयन उत्तम है।“
अब वह धीरे-धीरे मुस्कुराकर बीच-बीच में कनखियों से व्योम को देख ले रही थी।
जारी रहेगा_____![]()
Nice and beautiful update....

