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हनुका के रक्त भैरवी की डिबिया ले जाने के बाद, नीलाभ फिर से शि…वलिंग के सामने बने असंख्य त्रिशूलों पर जाकर आसन की मुद्रा में बैठ गया। कुछ देर तक उसने माया के बारे में सोचा और फिर अपनी साधना में लीन हो गया।
नीलाभ को पता था कि उसकी साधना का यह अंतिम चरण है, इसके बाद देव को उन्हें वरदान देने आना ही होगा।
कुछ घंटों के बाद नीलाभ ने अपने मंत्रोच्चारण की आखिरी आहुति को, देव को समर्पित कर दिया। अब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलकर, अपने चारो ओर देखा और फिर खड़े होकर उन त्रिशूलों के ऊपर ही तांडव करना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में नीलाभ के पैरों से निकलता खून, त्रिशूल के मध्य से होकर शिवमलिंग की ओर बढ़ा, पर इससे पहले कि अंजाने में वह खून शिवमलिंग तक पहुंचता, वातावरण में तेज डमरु की आवाज सुनाई दी, जो कि देव के प्रकट होने का द्योतक था।
हवा में एक ऊर्जा द्वार उत्पन्न हुआ, जिससे निकलकर देव, नीलाभ के समक्ष आ खड़े हुए।
महानदेव ने नीलाभ के पैरों से रिसते खून को देखा, देव के देखते ही खून का रिसाव बंद हो गया। नीलाभ ने त्रिशूल से उतरकर देव के सम्मुख दंडवत प्रणाम किया।
देव ने अपना वरदहस्त आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।
“बताओ नीलाभ, तुम इस प्रकार की कठिन साधना क्यों कर रहे हो? तुम्हें भला किस चीज की कामना है? देव ने नीलाभ से पूछा।
"आप तो अंतर्यामी है देव।” नीलाभ हाथ जोड़कर देव के सामने घुटनों के बल बैठ गया- “आप तो जानते हैं, कि मुझे मनुष्यों के कल्याण के लिये, कुछ पलों के लिये आपकी कुछ शक्तियों का वरण करना है। इसलिये हे महादेव, मुझे ये वरदान दीजिये कि मैं कुछ विषम परिस्थितियों के समय, कुछ क्षणों के लिये, आपकी कुछ शक्तियों को धारण कर सकूँ। मैंने ब्र…देव के कहे अनुसार, आपकी शक्तियों को धारण करने के लिये, अपना शरीर भी उन शक्तियों के लायक कर लिया है।'
यह सुनकर म..देव ने आगे बढ़कर नीलाभ का हाथ पकड़ लिया। इससे पहले कि नीलाभ कुछ भी समझ पाता, उसे अपना शरीर ब्रह्मांड के करोड़ों आकाशगंगाओं के मध्य दिखाई दिया।
चारो ओर अरबों-खरबों अलग-अलग रंग के सितारे फैले हुए थे। करोड़ों आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर घूम रहीं थीं। ब्लैक होल कुछ आकाशगंगाओं को अपने अंदर समाहित कर रहे थे।
कुछ न्यूट्रान स्टार अपने ही ताप से, एक धमाके के साथ फट रहे थे। कुछ आकाशगंगाएं आपस में विलय होकर, नयी आकाशगंगा का निर्माण कर रहीं थीं।
कुल मिलाकर उस स्थान पर मनुष्य तो क्या, किसी भी आकाशगंगा का अस्तित्व भी नगण्य दिखाई दे रहा था। चारो ओर अनंत ब्रह्मांड, अनवरत समय के साथ गतिमान था।
नीलाभ ने आज से पहले कभी भी इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था, इसलिये वह घबराकर ..देव को याद करने लगा।
तभी उस अनंत ब्रह्मांड में सितारों और आका शगंगाओं के मध्य देव का 5 मुखों वाला शरीर प्रकट हुआ।
उसमें पूर्व मुख-पीत वर्ण, पश्चिम मुख-श्वेत वर्ण, उत्तर मुख-कृष्ण वर्ण, दक्षिण मुख-नीलवर्ण और ऊर्ध्व मुख-ईशान दुग्ध के समान प्रतीत हो रहा था। नीलाभ, देव के इस दिव्य दर्शन को देख अविभूत होने लगा।
“हे देव, मैं आपके इस पंचमुखी दर्शन से, ब्रह्मांड के सारे कष्टों को भूल चुका हूं। अब कृपया मुझे इस दिव्य दर्शन का सार समझाइये देव?" नीलाभ ने अपने आँखों में उस अद्भुत दृश्य को भरते हुए कहा।
नीलाभ के शब्द सुन देव की आवाज वातावरण में उभरी- “नीलाभ, मैं तुम्हें ईश्वर का सार समझाने की चेष्टा कर रहा हूं। ईश्वर अनंत और निराकार हैं, तुम जिस रुप में उन्हें देखने की इच्छा करोगे, वो तुम्हें उस रुप में दर्शन देंगे। तुमने हमसे हमारी शक्तियों का वरण करने का वरदान मांगा, इसलिये ही हमने तुम्हें इस पंचमुख से दर्शन दिये। हम तुम्हें इस पंचमुख के माध्यम से बताना चाहते हैं, कि हम स्वयं अपने पंचभूत की शक्तियों से निर्मित हैं। अब अगर हम तुम्हें यह वरदान दे भी दें, तब भी तुम हमारे, इन पंचरुपों के आशीर्वाद के बिना, हमारी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाओगे। तो बताओ नीलाभ क्या तुम इन पंचभूतों से आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक हो?....परंतु ध्यान रखना, इन्हें प्रसन्न करना इतना भी आसान नहीं होगा।"
“अवश्य ..देव, आप मुझे वरदान प्रदान करिये। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि बिना इन पंचभूतों के आशीर्वाद के, मैं आपकी उन शक्तियों का वरण नहीं करूंगा।” नीलाभ ने म..देव को विश्वास दिलाते हुए कहा।
“तथास्तु। तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” यह कहकर महादेव अपने स्थान से अंतर्ध्यान हो गये।
तभी रोशनी का एक तेज झमाका हुआ, जिसकी वजह से नीलाभ की आँखें बंद हो गईं। परंतु जब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने अपने आपको रुद्रलोक के उसी मं..दिर के बाहर पाया, जहां रहकर वह इतने समय से तपस्या कर रहा था।
इस समय नीलाभ के चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता के भाव थे। अब नीलाभ देव के पहले रुप को प्रसन्न करने के लिये चल पड़ा, जो कि वीरभद्र थे और वह रुद्रलोक के ही किसी अज्ञात स्थान पर थे।
चैपटर-3
ब्लैकून: (20 वर्ष पहले.......डेल्फानो ग्रह, एरियन आकाशगंगा)
पृथ्वी से 12 लाख प्रकाशवर्ष दूर, एरियन आकाशगंगा में एक बहुत ही खूबसूरत ग्रह है, जिसका नाम है- डेल्फानो।
वैसे तो इस ग्रह का इतिहास मात्र 5000 वर्ष ही पुराना है, परंतु अपने इस छोटे से इतिहास में भी, डेल्फानो ने अनेकों अभूतपूर्व अविष्कार करके, पूरी एरियन आकाशगंगा को चकित करके रखा था।
कहने को तो यह ग्रह छोटा है, परंतु डेल्फानो ग्रह विज्ञान की तकनीक के हिसाब से, बहुत विकसित ग्रह माना जाता रहा है। कहते हैं कि इस ग्रह के लोगों का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है।
यहां के वैज्ञानिक नित नये शोध करते रहते हैं। यहां के लोग देखने में बिल्कुल पृथ्वी वासियों के जैसे ही हैं, सिर्फ उनकी औसत आयु 10,00 वर्ष की होती है।
डेल्फानो एक शांति प्रिय ग्रह होने की वजह से, इतना आधुनिक तकनीक होने के बाद भी, हथियारों का निर्माण सबसे कम मात्रा में करता है।
डेल्फानो के राजा गिरोट स्वयं भी एक निपुण वैज्ञानिक हैं, जो कि अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी प्रयोगशाला ‘ब्लैकून' को देते हैं।
कहते हैं कि गिरोट ने ही देवता नोवान का आशीर्वाद प्राप्त कर, 5,000 वर्ष पहले इस ग्रह को बसाया था। देवता नोवान के ही आशीर्वाद से गिरोट पिछले 5,000 वर्षों से वैसे ही जवान है, जैसा कि इस ग्रह के निर्माण के समय हुआ करता था।
गिरोट ने अपनी पूरी जिंदगी डेल्फानो को विकसित करने में लगा दी थी। डेल्फानो को विकसित करने में वह इतना पागल हो गया कि उसे कभी अपने विवाह का ख्याल भी नहीं आया।
आखिरकार एक रात उसे डेल्फानों के वारिस की चिंता हुई, इसलिये हजारों वर्षों के बाद गिरोट ने अपने ग्रह की ही एक साधारण सी लड़की से विवाह कर लिया।
विवाह के उपरांत, युवराज ओरस को जन्म देते हुए, गिरोट की पत्नि का स्वर्गवास हो गया। अब गिरोट के पास अपने पुत्र युवराज ओरस के सिवा कुछ भी नहीं था।
सुबह का समय था, डेल्फानो के दोनों सूर्य उदय हो चुके थे। सूर्य की पीली किरणें चारो ओर फैल गईं थीं।
इस समय गिरोट अपने महल से ब्लैकून के लिये निकलने ही वाला था, कि तभी 'कमांडर कीमोन' ने गिरोट के कक्ष में प्रवेश किया।
कीमोन को देख गिरोट की आँखों में आश्चर्य के भाव उभर आये।
“क्या हुआ कीमोन? इतनी सुबह-सुबह आने का कोई विशेष कारण है क्या?” गिरोट ने कीमोन से पूछा।
“महाराज, गुप्तचरों से समाचार मिला है, कि एंड्रोवर्स आकाशगंगा के, फेरोना ग्रह के राजा एलान्का को, आपके नये अविष्कार ‘समयचक्र' का पता लग गया है और वह किसी भी कीमत पर हमसे यह समयचक्र छीनना चाहता है।” कीमोन ने गंभीर भाव से कहा।
"एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोग?" गिरोट ने आश्चर्य से कहा- “उनके पास तो स्वयं एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जाने की शक्ति है, फिर वह हमारे समयचक्र में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?"
“वह अपनी शक्तियों से 2 ग्रहों के बीच द्वार बना सकते हैं महाराज, पर वह आकाशगंगा की अनन्त गहराइयों में, एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जा सकते और ना ही समय को रोक और चला सकते हैं, इसी लिये उन्हें आपका समयचक्र चाहिये महाराज।” कीमोन ने कहा।
"पर समयचक्र के प्रयोग को तो हमने बहुत ही गुप्त रखा था, फिर उन्हें इस समयचक्र की जानकारी कैसे हुई?” गिरोट के चेहरे पर अब चिंता के भाव उभर आये।
“जिस प्रकार हमारे गुप्तचर हर स्थान पर हैं, मुझे लगता है कि उनके गुप्तचर भी हमारे ग्रह पर होंगे? उन्हीं के माध्यम से एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोगों को हमारे समयचक्र का पता चला होगा। इसलिये महाराज से निवेदन है, कि वह सदैव अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें। मैं तब तक सेना को भी एलर्ट पर डाल देता हूं।" इतना कहकर कीमोन शांत हो गया और गिरोट के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
गिरोट ने इशारे से कीमोन को जाने का आदेश दिया और स्वयं कक्ष में रखी एक कुर्सी पर बैठकर समयचक्र के बारे में सोचने लगे।
“समयचक्र का निर्माण तो पूरा हो गया है, पर इसे किसी भी प्रकार से सुरक्षित रखना होगा? पर कैसे? इतने बड़े ब्लैकून को हम किसी की नजरों से छिपा भी नहीं सकते.... क्या करूं?.....हे देवता नोवान हमारी मदद करो।” गिरोट मन ही मन अपने देवता को याद करने लगा।
तभी अचानक वह खुशी से उछल पड़ा- “अरे वाह मुझे पहले 'ज़ेप्टो नाइजर' का ध्यान क्यों नहीं आया? ...हां ...उससे मेरी समस्या हल हो सकती है।"
अभी गिरोट यह सब सोच ही रहा था कि तभी 5 वर्षीय नन्हें युवराज ‘ओरस' ने कक्ष में प्रवेश किया।
“आप क्या कर रहे हैं पिताजी?" ओरस ने अपने छोटे से यान नुमा खिलौने को हाथों से घुमाते हुए कहा।
"हम तो अपने नये प्रयोग के बारे में सोच रहे थे युवराज।” गिरोट ने मुस्कुराकर अपनी बांहें फैलाते हुए कहा - “आप बताओ, आप अपने इस नन्हें से यान से, कहां की सैर कर रहे हो?"
गिरोट को बांहें फैलाते देख, नन्हा ओरस दौड़कर उनकी बांहों में समा गया।
“मैं तो अपने यान से आकाशगंगा के, दूसरे छोर की सैर कर रहा था पिताजी।" ओरस ने अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हुए कहा- “पर मुझे ये बताइये कि आपका यह नया प्रयोग क्या है? जिसके बारे में आप मुझसे भी ज्यादा सोचते हो।" ओरस की बात सुन गिरोट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“अभी तुम उस प्रयोग के बारे में जानने के लिये बहुत छोटे हो युवराज, समय आने पर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा।” गिरोट ने ओरस को फुसलाते हुए कहा।
“मैं इतना भी छोटा नहीं हूं। मैं आकाशगंगा की सारी जानकारी रखता हूं। आप चाहो तो मेरे ज्ञान का परीक्षण कर सकते हो?” ओरस ने किसी ज्ञानी की तरह ज्ञान देते हुए कहा।
“अच्छा, तो बताओ कि नेबुला क्या होता है?" गिरोट सच में ही ओरस की परीक्षा लेने लगा। वैसे गिरोट को पता था, कि ओरस इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेगा।
"जब कोई सितारा अपनी आयु का पूरा करने के बाद फटकर कणों में बिखर जाता है, तो उससे बने गैस और धूल के बादलों को नेबुला कहते हैं।” ओरस ने अपना यान उड़ाते हुए कहा।
ओरस का उत्तर सुन गिरोट हैरान रह गया क्यों कि ओरस ने शत-प्रतिशत सही कहा था।
“अच्छा अब बताओ कि सुपरनोआ क्या होता है?" ओरस ने अपने प्रश्न को थोड़ा और कठिन कर दिया।
“जब नेबुला के बहुत से कण आपस में संकुचित हो कर मिलते हैं, तो वह एक सितारे यानि की सूर्य का निर्माण करते हैं। वह सितारा 75 प्रतिशत तक हाइड्रोजन से बना होता है। यानि की हाइड्रोजन उस सूर्य में ईधन का काम करता है। धीरे-धीरे जब उस सितारे का पूरा हाईड्रोजन खत्म होकर, हीलीयम में परिवर्तित हो जाता है, इस स्थिति में वह सितारा अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण को संभाल नहीं पाता और एक महा विस्फोट के साथ फट जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते हैं।” ओरस ने भोलेपन से कहा।
गिरोट अब आश्चर्य से ओरस की ओर देख रहा था।
“क्या तुम 'न्यूट्रान स्टार' और 'ब्लैक होल' के बारे में भी जानते हो?” गिरोट ने अब क्लास 1 के बच्चे से ग्रेजुएशन का प्रश्न पूछ लिया था।
"जब सुपरनो वा विस्फोट होता है, तो सितारे का सबसे बड़ा टुकड़ा, जो सबसे ज्यादा घनत्व लिये होता है, वह एक गोलाकार आकृति लेकर एक न्यूट्रान स्टार में परिवर्तित हो जाता है। यह न्यूट्रान स्टार जब संकुचन की अधिकतक सीमा तक पहुंच जाता है, तो यह छोटा होकर अदृश्य हो जाता है। इसी अदृश्य पिंड को ब्लैक होल कहते हैं।" इस प्रकार क्लास 1 के बच्चे ने ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर, अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।
“ये सब ज्ञान तुम्हें किसने दिया?” गिरोट ने आश्चर्य से ओरस से पूछा।
ओरस ने मुस्कुराते हुए, कक्ष में रखी एक प्रतिमा की ओर इशारा किया। वह प्रतिमा डेल्फानो के देवता नोवान की थी।
ओरस का इशारा देख गिरोट और भी ज्यादा आश्चर्यचकित हो गया। उसने ओरस को अपने गले से लगा लिया।
“चलो ओरस, आज मैं तुम्हें अपने उस नये प्रयोग को दिखाता हूं।” गिरोट ने खड़े होते हुए कहा।
"पर आप तो कह रहे थे कि मैं अभी छोटा हं और मैं उस प्रयोग को समझ नहीं पाऊंगा?" ओरस ने अपनी भोली जुबान में कहा।
“मैं गलत था युवराज, आप नहीं छोटे हो, मेरी मानसिकता छोटी थी, जो मैं यह सोच रहा था कि आपको कुछ समझ नहीं आयेगा? आओ, अब चलते हैं ब्लैकून की ओर, जहां मेरा प्रयोग बेसब्री से आपका इंतजार कर रहा है।
यह कहकर गिरोट ने नन्हें वैज्ञानिक को अपनी गोद में उठाया और हवा में उड़ने वाले एक यान में बैठकर ब्लैकून के पास जा पहुंचा।
ब्लैकून लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली, एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसका आकार बिल्कुल गोल और काले रंग का था। दूर से देखने पर वह एक बड़े से काले मोती के समान प्रतीत हो रही थी। गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के पास पहुंच गया।
“ब्लैकून में प्रवेश करने का प्रवेश द्वार तो है ही नहीं पिताजी। फिर हम इसमें प्रवेश कैसे करेंगे?" ओरस ने कहा।
“ब्लैकून का पूरा नियंत्रण अंदर मौजूद एक कंप्यूटर 'जेनिक्स' करती है। वह हमें देखते ही स्वयं द्वार खोल देगी। तभी ब्लैकून में एक स्थान पर एक द्वार खुलता दिखाई देने लगा।
“क्या यह मुझे देखकर भी द्वार खोल देगी?” ओरस ने अपनी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।
“हां पुत्र, ज़ेनिक्स में डेल्फानों के राजवंश के, किसी भी व्यक्ति के शरीर को सेंस करने की अद्भुत क्षमता है।" ओरस ने कहा।
गिरोट और ओरस उस द्वार से अंदर प्रवेश कर गये। ब्लैकून में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था, पूरा सिस्टम ज़ेनिक्स के हवाले था।
अंदर प्रवेश करते ही ओरस को पूरा ब्लैकून, किसी एक छोटे ब्रह्मांड के समान प्रतीत हुआ। चारो ओर निहारिकाएं (नेबुला) फैली हुई थी, जिसके आसपास अनेकों ग्रह घूम रहे थे।
चूंकि ओरस पहली बार ब्लैकून में आया था, इसलिये वह आश्चर्य से सभी चीजों को निहार रहा था।
“यह कैसी प्रयोगशाला है पिताजी? यहां पर कोई मशीन तो दिखाई ही नहीं दे रही है?” ओरस ने कहा।
“ब्लैकून कुल 4 भागों में बंटा है पुत्र, कुछ देर प्रतीक्षा करो, अभी तुम्हें सबकुछ पता चल जायेगा।...यह तो अभी ब्लैकून का प्रथम भाग है, इस भाग में हम तारों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं।" गिरोट ने कहा।
उस भाग को पार करने के बाद, ओरस एक ऐसे भाग में पहुंचा, जहां पर देवता नोवान की एक बड़ी सी प्रतिमा लगी थी। देवता नोवान के कंधे पर एक फीनीक्स पक्षी बैठा था। उस भाग में और कुछ भी नहीं था।
यह ब्लैकून का दूसरा भाग था। देवता की प्रतिमा के नीचे, सामने की ओर एक गोल काँच का पारदर्शी केबिन बना था। उसे देख ओरस ने पूछ ही लिया।
हनुका के रक्त भैरवी की डिबिया ले जाने के बाद, नीलाभ फिर से शि…वलिंग के सामने बने असंख्य त्रिशूलों पर जाकर आसन की मुद्रा में बैठ गया। कुछ देर तक उसने माया के बारे में सोचा और फिर अपनी साधना में लीन हो गया।
नीलाभ को पता था कि उसकी साधना का यह अंतिम चरण है, इसके बाद देव को उन्हें वरदान देने आना ही होगा।
कुछ घंटों के बाद नीलाभ ने अपने मंत्रोच्चारण की आखिरी आहुति को, देव को समर्पित कर दिया। अब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलकर, अपने चारो ओर देखा और फिर खड़े होकर उन त्रिशूलों के ऊपर ही तांडव करना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में नीलाभ के पैरों से निकलता खून, त्रिशूल के मध्य से होकर शिवमलिंग की ओर बढ़ा, पर इससे पहले कि अंजाने में वह खून शिवमलिंग तक पहुंचता, वातावरण में तेज डमरु की आवाज सुनाई दी, जो कि देव के प्रकट होने का द्योतक था।
हवा में एक ऊर्जा द्वार उत्पन्न हुआ, जिससे निकलकर देव, नीलाभ के समक्ष आ खड़े हुए।
महानदेव ने नीलाभ के पैरों से रिसते खून को देखा, देव के देखते ही खून का रिसाव बंद हो गया। नीलाभ ने त्रिशूल से उतरकर देव के सम्मुख दंडवत प्रणाम किया।
देव ने अपना वरदहस्त आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।
“बताओ नीलाभ, तुम इस प्रकार की कठिन साधना क्यों कर रहे हो? तुम्हें भला किस चीज की कामना है? देव ने नीलाभ से पूछा।
"आप तो अंतर्यामी है देव।” नीलाभ हाथ जोड़कर देव के सामने घुटनों के बल बैठ गया- “आप तो जानते हैं, कि मुझे मनुष्यों के कल्याण के लिये, कुछ पलों के लिये आपकी कुछ शक्तियों का वरण करना है। इसलिये हे महादेव, मुझे ये वरदान दीजिये कि मैं कुछ विषम परिस्थितियों के समय, कुछ क्षणों के लिये, आपकी कुछ शक्तियों को धारण कर सकूँ। मैंने ब्र…देव के कहे अनुसार, आपकी शक्तियों को धारण करने के लिये, अपना शरीर भी उन शक्तियों के लायक कर लिया है।'
यह सुनकर म..देव ने आगे बढ़कर नीलाभ का हाथ पकड़ लिया। इससे पहले कि नीलाभ कुछ भी समझ पाता, उसे अपना शरीर ब्रह्मांड के करोड़ों आकाशगंगाओं के मध्य दिखाई दिया।
चारो ओर अरबों-खरबों अलग-अलग रंग के सितारे फैले हुए थे। करोड़ों आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर घूम रहीं थीं। ब्लैक होल कुछ आकाशगंगाओं को अपने अंदर समाहित कर रहे थे।
कुछ न्यूट्रान स्टार अपने ही ताप से, एक धमाके के साथ फट रहे थे। कुछ आकाशगंगाएं आपस में विलय होकर, नयी आकाशगंगा का निर्माण कर रहीं थीं।
कुल मिलाकर उस स्थान पर मनुष्य तो क्या, किसी भी आकाशगंगा का अस्तित्व भी नगण्य दिखाई दे रहा था। चारो ओर अनंत ब्रह्मांड, अनवरत समय के साथ गतिमान था।
नीलाभ ने आज से पहले कभी भी इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था, इसलिये वह घबराकर ..देव को याद करने लगा।
तभी उस अनंत ब्रह्मांड में सितारों और आका शगंगाओं के मध्य देव का 5 मुखों वाला शरीर प्रकट हुआ।
उसमें पूर्व मुख-पीत वर्ण, पश्चिम मुख-श्वेत वर्ण, उत्तर मुख-कृष्ण वर्ण, दक्षिण मुख-नीलवर्ण और ऊर्ध्व मुख-ईशान दुग्ध के समान प्रतीत हो रहा था। नीलाभ, देव के इस दिव्य दर्शन को देख अविभूत होने लगा।
“हे देव, मैं आपके इस पंचमुखी दर्शन से, ब्रह्मांड के सारे कष्टों को भूल चुका हूं। अब कृपया मुझे इस दिव्य दर्शन का सार समझाइये देव?" नीलाभ ने अपने आँखों में उस अद्भुत दृश्य को भरते हुए कहा।
नीलाभ के शब्द सुन देव की आवाज वातावरण में उभरी- “नीलाभ, मैं तुम्हें ईश्वर का सार समझाने की चेष्टा कर रहा हूं। ईश्वर अनंत और निराकार हैं, तुम जिस रुप में उन्हें देखने की इच्छा करोगे, वो तुम्हें उस रुप में दर्शन देंगे। तुमने हमसे हमारी शक्तियों का वरण करने का वरदान मांगा, इसलिये ही हमने तुम्हें इस पंचमुख से दर्शन दिये। हम तुम्हें इस पंचमुख के माध्यम से बताना चाहते हैं, कि हम स्वयं अपने पंचभूत की शक्तियों से निर्मित हैं। अब अगर हम तुम्हें यह वरदान दे भी दें, तब भी तुम हमारे, इन पंचरुपों के आशीर्वाद के बिना, हमारी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाओगे। तो बताओ नीलाभ क्या तुम इन पंचभूतों से आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक हो?....परंतु ध्यान रखना, इन्हें प्रसन्न करना इतना भी आसान नहीं होगा।"
“अवश्य ..देव, आप मुझे वरदान प्रदान करिये। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि बिना इन पंचभूतों के आशीर्वाद के, मैं आपकी उन शक्तियों का वरण नहीं करूंगा।” नीलाभ ने म..देव को विश्वास दिलाते हुए कहा।
“तथास्तु। तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” यह कहकर महादेव अपने स्थान से अंतर्ध्यान हो गये।
तभी रोशनी का एक तेज झमाका हुआ, जिसकी वजह से नीलाभ की आँखें बंद हो गईं। परंतु जब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने अपने आपको रुद्रलोक के उसी मं..दिर के बाहर पाया, जहां रहकर वह इतने समय से तपस्या कर रहा था।
इस समय नीलाभ के चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता के भाव थे। अब नीलाभ देव के पहले रुप को प्रसन्न करने के लिये चल पड़ा, जो कि वीरभद्र थे और वह रुद्रलोक के ही किसी अज्ञात स्थान पर थे।
चैपटर-3
ब्लैकून: (20 वर्ष पहले.......डेल्फानो ग्रह, एरियन आकाशगंगा)
पृथ्वी से 12 लाख प्रकाशवर्ष दूर, एरियन आकाशगंगा में एक बहुत ही खूबसूरत ग्रह है, जिसका नाम है- डेल्फानो।
वैसे तो इस ग्रह का इतिहास मात्र 5000 वर्ष ही पुराना है, परंतु अपने इस छोटे से इतिहास में भी, डेल्फानो ने अनेकों अभूतपूर्व अविष्कार करके, पूरी एरियन आकाशगंगा को चकित करके रखा था।
कहने को तो यह ग्रह छोटा है, परंतु डेल्फानो ग्रह विज्ञान की तकनीक के हिसाब से, बहुत विकसित ग्रह माना जाता रहा है। कहते हैं कि इस ग्रह के लोगों का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है।
यहां के वैज्ञानिक नित नये शोध करते रहते हैं। यहां के लोग देखने में बिल्कुल पृथ्वी वासियों के जैसे ही हैं, सिर्फ उनकी औसत आयु 10,00 वर्ष की होती है।
डेल्फानो एक शांति प्रिय ग्रह होने की वजह से, इतना आधुनिक तकनीक होने के बाद भी, हथियारों का निर्माण सबसे कम मात्रा में करता है।
डेल्फानो के राजा गिरोट स्वयं भी एक निपुण वैज्ञानिक हैं, जो कि अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी प्रयोगशाला ‘ब्लैकून' को देते हैं।
कहते हैं कि गिरोट ने ही देवता नोवान का आशीर्वाद प्राप्त कर, 5,000 वर्ष पहले इस ग्रह को बसाया था। देवता नोवान के ही आशीर्वाद से गिरोट पिछले 5,000 वर्षों से वैसे ही जवान है, जैसा कि इस ग्रह के निर्माण के समय हुआ करता था।
गिरोट ने अपनी पूरी जिंदगी डेल्फानो को विकसित करने में लगा दी थी। डेल्फानो को विकसित करने में वह इतना पागल हो गया कि उसे कभी अपने विवाह का ख्याल भी नहीं आया।
आखिरकार एक रात उसे डेल्फानों के वारिस की चिंता हुई, इसलिये हजारों वर्षों के बाद गिरोट ने अपने ग्रह की ही एक साधारण सी लड़की से विवाह कर लिया।
विवाह के उपरांत, युवराज ओरस को जन्म देते हुए, गिरोट की पत्नि का स्वर्गवास हो गया। अब गिरोट के पास अपने पुत्र युवराज ओरस के सिवा कुछ भी नहीं था।
सुबह का समय था, डेल्फानो के दोनों सूर्य उदय हो चुके थे। सूर्य की पीली किरणें चारो ओर फैल गईं थीं।
इस समय गिरोट अपने महल से ब्लैकून के लिये निकलने ही वाला था, कि तभी 'कमांडर कीमोन' ने गिरोट के कक्ष में प्रवेश किया।
कीमोन को देख गिरोट की आँखों में आश्चर्य के भाव उभर आये।
“क्या हुआ कीमोन? इतनी सुबह-सुबह आने का कोई विशेष कारण है क्या?” गिरोट ने कीमोन से पूछा।
“महाराज, गुप्तचरों से समाचार मिला है, कि एंड्रोवर्स आकाशगंगा के, फेरोना ग्रह के राजा एलान्का को, आपके नये अविष्कार ‘समयचक्र' का पता लग गया है और वह किसी भी कीमत पर हमसे यह समयचक्र छीनना चाहता है।” कीमोन ने गंभीर भाव से कहा।
"एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोग?" गिरोट ने आश्चर्य से कहा- “उनके पास तो स्वयं एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जाने की शक्ति है, फिर वह हमारे समयचक्र में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?"
“वह अपनी शक्तियों से 2 ग्रहों के बीच द्वार बना सकते हैं महाराज, पर वह आकाशगंगा की अनन्त गहराइयों में, एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जा सकते और ना ही समय को रोक और चला सकते हैं, इसी लिये उन्हें आपका समयचक्र चाहिये महाराज।” कीमोन ने कहा।
"पर समयचक्र के प्रयोग को तो हमने बहुत ही गुप्त रखा था, फिर उन्हें इस समयचक्र की जानकारी कैसे हुई?” गिरोट के चेहरे पर अब चिंता के भाव उभर आये।
“जिस प्रकार हमारे गुप्तचर हर स्थान पर हैं, मुझे लगता है कि उनके गुप्तचर भी हमारे ग्रह पर होंगे? उन्हीं के माध्यम से एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोगों को हमारे समयचक्र का पता चला होगा। इसलिये महाराज से निवेदन है, कि वह सदैव अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें। मैं तब तक सेना को भी एलर्ट पर डाल देता हूं।" इतना कहकर कीमोन शांत हो गया और गिरोट के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
गिरोट ने इशारे से कीमोन को जाने का आदेश दिया और स्वयं कक्ष में रखी एक कुर्सी पर बैठकर समयचक्र के बारे में सोचने लगे।
“समयचक्र का निर्माण तो पूरा हो गया है, पर इसे किसी भी प्रकार से सुरक्षित रखना होगा? पर कैसे? इतने बड़े ब्लैकून को हम किसी की नजरों से छिपा भी नहीं सकते.... क्या करूं?.....हे देवता नोवान हमारी मदद करो।” गिरोट मन ही मन अपने देवता को याद करने लगा।
तभी अचानक वह खुशी से उछल पड़ा- “अरे वाह मुझे पहले 'ज़ेप्टो नाइजर' का ध्यान क्यों नहीं आया? ...हां ...उससे मेरी समस्या हल हो सकती है।"
अभी गिरोट यह सब सोच ही रहा था कि तभी 5 वर्षीय नन्हें युवराज ‘ओरस' ने कक्ष में प्रवेश किया।
“आप क्या कर रहे हैं पिताजी?" ओरस ने अपने छोटे से यान नुमा खिलौने को हाथों से घुमाते हुए कहा।
"हम तो अपने नये प्रयोग के बारे में सोच रहे थे युवराज।” गिरोट ने मुस्कुराकर अपनी बांहें फैलाते हुए कहा - “आप बताओ, आप अपने इस नन्हें से यान से, कहां की सैर कर रहे हो?"
गिरोट को बांहें फैलाते देख, नन्हा ओरस दौड़कर उनकी बांहों में समा गया।
“मैं तो अपने यान से आकाशगंगा के, दूसरे छोर की सैर कर रहा था पिताजी।" ओरस ने अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हुए कहा- “पर मुझे ये बताइये कि आपका यह नया प्रयोग क्या है? जिसके बारे में आप मुझसे भी ज्यादा सोचते हो।" ओरस की बात सुन गिरोट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“अभी तुम उस प्रयोग के बारे में जानने के लिये बहुत छोटे हो युवराज, समय आने पर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा।” गिरोट ने ओरस को फुसलाते हुए कहा।
“मैं इतना भी छोटा नहीं हूं। मैं आकाशगंगा की सारी जानकारी रखता हूं। आप चाहो तो मेरे ज्ञान का परीक्षण कर सकते हो?” ओरस ने किसी ज्ञानी की तरह ज्ञान देते हुए कहा।
“अच्छा, तो बताओ कि नेबुला क्या होता है?" गिरोट सच में ही ओरस की परीक्षा लेने लगा। वैसे गिरोट को पता था, कि ओरस इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेगा।
"जब कोई सितारा अपनी आयु का पूरा करने के बाद फटकर कणों में बिखर जाता है, तो उससे बने गैस और धूल के बादलों को नेबुला कहते हैं।” ओरस ने अपना यान उड़ाते हुए कहा।
ओरस का उत्तर सुन गिरोट हैरान रह गया क्यों कि ओरस ने शत-प्रतिशत सही कहा था।
“अच्छा अब बताओ कि सुपरनोआ क्या होता है?" ओरस ने अपने प्रश्न को थोड़ा और कठिन कर दिया।
“जब नेबुला के बहुत से कण आपस में संकुचित हो कर मिलते हैं, तो वह एक सितारे यानि की सूर्य का निर्माण करते हैं। वह सितारा 75 प्रतिशत तक हाइड्रोजन से बना होता है। यानि की हाइड्रोजन उस सूर्य में ईधन का काम करता है। धीरे-धीरे जब उस सितारे का पूरा हाईड्रोजन खत्म होकर, हीलीयम में परिवर्तित हो जाता है, इस स्थिति में वह सितारा अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण को संभाल नहीं पाता और एक महा विस्फोट के साथ फट जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते हैं।” ओरस ने भोलेपन से कहा।
गिरोट अब आश्चर्य से ओरस की ओर देख रहा था।
“क्या तुम 'न्यूट्रान स्टार' और 'ब्लैक होल' के बारे में भी जानते हो?” गिरोट ने अब क्लास 1 के बच्चे से ग्रेजुएशन का प्रश्न पूछ लिया था।
"जब सुपरनो वा विस्फोट होता है, तो सितारे का सबसे बड़ा टुकड़ा, जो सबसे ज्यादा घनत्व लिये होता है, वह एक गोलाकार आकृति लेकर एक न्यूट्रान स्टार में परिवर्तित हो जाता है। यह न्यूट्रान स्टार जब संकुचन की अधिकतक सीमा तक पहुंच जाता है, तो यह छोटा होकर अदृश्य हो जाता है। इसी अदृश्य पिंड को ब्लैक होल कहते हैं।" इस प्रकार क्लास 1 के बच्चे ने ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर, अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।
“ये सब ज्ञान तुम्हें किसने दिया?” गिरोट ने आश्चर्य से ओरस से पूछा।
ओरस ने मुस्कुराते हुए, कक्ष में रखी एक प्रतिमा की ओर इशारा किया। वह प्रतिमा डेल्फानो के देवता नोवान की थी।
ओरस का इशारा देख गिरोट और भी ज्यादा आश्चर्यचकित हो गया। उसने ओरस को अपने गले से लगा लिया।
“चलो ओरस, आज मैं तुम्हें अपने उस नये प्रयोग को दिखाता हूं।” गिरोट ने खड़े होते हुए कहा।
"पर आप तो कह रहे थे कि मैं अभी छोटा हं और मैं उस प्रयोग को समझ नहीं पाऊंगा?" ओरस ने अपनी भोली जुबान में कहा।
“मैं गलत था युवराज, आप नहीं छोटे हो, मेरी मानसिकता छोटी थी, जो मैं यह सोच रहा था कि आपको कुछ समझ नहीं आयेगा? आओ, अब चलते हैं ब्लैकून की ओर, जहां मेरा प्रयोग बेसब्री से आपका इंतजार कर रहा है।
यह कहकर गिरोट ने नन्हें वैज्ञानिक को अपनी गोद में उठाया और हवा में उड़ने वाले एक यान में बैठकर ब्लैकून के पास जा पहुंचा।
ब्लैकून लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली, एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसका आकार बिल्कुल गोल और काले रंग का था। दूर से देखने पर वह एक बड़े से काले मोती के समान प्रतीत हो रही थी। गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के पास पहुंच गया।
“ब्लैकून में प्रवेश करने का प्रवेश द्वार तो है ही नहीं पिताजी। फिर हम इसमें प्रवेश कैसे करेंगे?" ओरस ने कहा।
“ब्लैकून का पूरा नियंत्रण अंदर मौजूद एक कंप्यूटर 'जेनिक्स' करती है। वह हमें देखते ही स्वयं द्वार खोल देगी। तभी ब्लैकून में एक स्थान पर एक द्वार खुलता दिखाई देने लगा।
“क्या यह मुझे देखकर भी द्वार खोल देगी?” ओरस ने अपनी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।
“हां पुत्र, ज़ेनिक्स में डेल्फानों के राजवंश के, किसी भी व्यक्ति के शरीर को सेंस करने की अद्भुत क्षमता है।" ओरस ने कहा।
गिरोट और ओरस उस द्वार से अंदर प्रवेश कर गये। ब्लैकून में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था, पूरा सिस्टम ज़ेनिक्स के हवाले था।
अंदर प्रवेश करते ही ओरस को पूरा ब्लैकून, किसी एक छोटे ब्रह्मांड के समान प्रतीत हुआ। चारो ओर निहारिकाएं (नेबुला) फैली हुई थी, जिसके आसपास अनेकों ग्रह घूम रहे थे।
चूंकि ओरस पहली बार ब्लैकून में आया था, इसलिये वह आश्चर्य से सभी चीजों को निहार रहा था।
“यह कैसी प्रयोगशाला है पिताजी? यहां पर कोई मशीन तो दिखाई ही नहीं दे रही है?” ओरस ने कहा।
“ब्लैकून कुल 4 भागों में बंटा है पुत्र, कुछ देर प्रतीक्षा करो, अभी तुम्हें सबकुछ पता चल जायेगा।...यह तो अभी ब्लैकून का प्रथम भाग है, इस भाग में हम तारों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं।" गिरोट ने कहा।
उस भाग को पार करने के बाद, ओरस एक ऐसे भाग में पहुंचा, जहां पर देवता नोवान की एक बड़ी सी प्रतिमा लगी थी। देवता नोवान के कंधे पर एक फीनीक्स पक्षी बैठा था। उस भाग में और कुछ भी नहीं था।
यह ब्लैकून का दूसरा भाग था। देवता की प्रतिमा के नीचे, सामने की ओर एक गोल काँच का पारदर्शी केबिन बना था। उसे देख ओरस ने पूछ ही लिया।
हनुका के रक्त भैरवी की डिबिया ले जाने के बाद, नीलाभ फिर से शि…वलिंग के सामने बने असंख्य त्रिशूलों पर जाकर आसन की मुद्रा में बैठ गया। कुछ देर तक उसने माया के बारे में सोचा और फिर अपनी साधना में लीन हो गया।
नीलाभ को पता था कि उसकी साधना का यह अंतिम चरण है, इसके बाद देव को उन्हें वरदान देने आना ही होगा।
कुछ घंटों के बाद नीलाभ ने अपने मंत्रोच्चारण की आखिरी आहुति को, देव को समर्पित कर दिया। अब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलकर, अपने चारो ओर देखा और फिर खड़े होकर उन त्रिशूलों के ऊपर ही तांडव करना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में नीलाभ के पैरों से निकलता खून, त्रिशूल के मध्य से होकर शिवमलिंग की ओर बढ़ा, पर इससे पहले कि अंजाने में वह खून शिवमलिंग तक पहुंचता, वातावरण में तेज डमरु की आवाज सुनाई दी, जो कि देव के प्रकट होने का द्योतक था।
हवा में एक ऊर्जा द्वार उत्पन्न हुआ, जिससे निकलकर देव, नीलाभ के समक्ष आ खड़े हुए।
महानदेव ने नीलाभ के पैरों से रिसते खून को देखा, देव के देखते ही खून का रिसाव बंद हो गया। नीलाभ ने त्रिशूल से उतरकर देव के सम्मुख दंडवत प्रणाम किया।
देव ने अपना वरदहस्त आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।
“बताओ नीलाभ, तुम इस प्रकार की कठिन साधना क्यों कर रहे हो? तुम्हें भला किस चीज की कामना है? देव ने नीलाभ से पूछा।
"आप तो अंतर्यामी है देव।” नीलाभ हाथ जोड़कर देव के सामने घुटनों के बल बैठ गया- “आप तो जानते हैं, कि मुझे मनुष्यों के कल्याण के लिये, कुछ पलों के लिये आपकी कुछ शक्तियों का वरण करना है। इसलिये हे महादेव, मुझे ये वरदान दीजिये कि मैं कुछ विषम परिस्थितियों के समय, कुछ क्षणों के लिये, आपकी कुछ शक्तियों को धारण कर सकूँ। मैंने ब्र…देव के कहे अनुसार, आपकी शक्तियों को धारण करने के लिये, अपना शरीर भी उन शक्तियों के लायक कर लिया है।'
यह सुनकर म..देव ने आगे बढ़कर नीलाभ का हाथ पकड़ लिया। इससे पहले कि नीलाभ कुछ भी समझ पाता, उसे अपना शरीर ब्रह्मांड के करोड़ों आकाशगंगाओं के मध्य दिखाई दिया।
चारो ओर अरबों-खरबों अलग-अलग रंग के सितारे फैले हुए थे। करोड़ों आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर घूम रहीं थीं। ब्लैक होल कुछ आकाशगंगाओं को अपने अंदर समाहित कर रहे थे।
कुछ न्यूट्रान स्टार अपने ही ताप से, एक धमाके के साथ फट रहे थे। कुछ आकाशगंगाएं आपस में विलय होकर, नयी आकाशगंगा का निर्माण कर रहीं थीं।
कुल मिलाकर उस स्थान पर मनुष्य तो क्या, किसी भी आकाशगंगा का अस्तित्व भी नगण्य दिखाई दे रहा था। चारो ओर अनंत ब्रह्मांड, अनवरत समय के साथ गतिमान था।
नीलाभ ने आज से पहले कभी भी इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था, इसलिये वह घबराकर ..देव को याद करने लगा।
तभी उस अनंत ब्रह्मांड में सितारों और आका शगंगाओं के मध्य देव का 5 मुखों वाला शरीर प्रकट हुआ।
उसमें पूर्व मुख-पीत वर्ण, पश्चिम मुख-श्वेत वर्ण, उत्तर मुख-कृष्ण वर्ण, दक्षिण मुख-नीलवर्ण और ऊर्ध्व मुख-ईशान दुग्ध के समान प्रतीत हो रहा था। नीलाभ, देव के इस दिव्य दर्शन को देख अविभूत होने लगा।
“हे देव, मैं आपके इस पंचमुखी दर्शन से, ब्रह्मांड के सारे कष्टों को भूल चुका हूं। अब कृपया मुझे इस दिव्य दर्शन का सार समझाइये देव?" नीलाभ ने अपने आँखों में उस अद्भुत दृश्य को भरते हुए कहा।
नीलाभ के शब्द सुन देव की आवाज वातावरण में उभरी- “नीलाभ, मैं तुम्हें ईश्वर का सार समझाने की चेष्टा कर रहा हूं। ईश्वर अनंत और निराकार हैं, तुम जिस रुप में उन्हें देखने की इच्छा करोगे, वो तुम्हें उस रुप में दर्शन देंगे। तुमने हमसे हमारी शक्तियों का वरण करने का वरदान मांगा, इसलिये ही हमने तुम्हें इस पंचमुख से दर्शन दिये। हम तुम्हें इस पंचमुख के माध्यम से बताना चाहते हैं, कि हम स्वयं अपने पंचभूत की शक्तियों से निर्मित हैं। अब अगर हम तुम्हें यह वरदान दे भी दें, तब भी तुम हमारे, इन पंचरुपों के आशीर्वाद के बिना, हमारी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाओगे। तो बताओ नीलाभ क्या तुम इन पंचभूतों से आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक हो?....परंतु ध्यान रखना, इन्हें प्रसन्न करना इतना भी आसान नहीं होगा।"
“अवश्य ..देव, आप मुझे वरदान प्रदान करिये। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि बिना इन पंचभूतों के आशीर्वाद के, मैं आपकी उन शक्तियों का वरण नहीं करूंगा।” नीलाभ ने म..देव को विश्वास दिलाते हुए कहा।
“तथास्तु। तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” यह कहकर महादेव अपने स्थान से अंतर्ध्यान हो गये।
तभी रोशनी का एक तेज झमाका हुआ, जिसकी वजह से नीलाभ की आँखें बंद हो गईं। परंतु जब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने अपने आपको रुद्रलोक के उसी मं..दिर के बाहर पाया, जहां रहकर वह इतने समय से तपस्या कर रहा था।
इस समय नीलाभ के चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता के भाव थे। अब नीलाभ देव के पहले रुप को प्रसन्न करने के लिये चल पड़ा, जो कि वीरभद्र थे और वह रुद्रलोक के ही किसी अज्ञात स्थान पर थे।
चैपटर-3
ब्लैकून: (20 वर्ष पहले.......डेल्फानो ग्रह, एरियन आकाशगंगा)
पृथ्वी से 12 लाख प्रकाशवर्ष दूर, एरियन आकाशगंगा में एक बहुत ही खूबसूरत ग्रह है, जिसका नाम है- डेल्फानो।
वैसे तो इस ग्रह का इतिहास मात्र 5000 वर्ष ही पुराना है, परंतु अपने इस छोटे से इतिहास में भी, डेल्फानो ने अनेकों अभूतपूर्व अविष्कार करके, पूरी एरियन आकाशगंगा को चकित करके रखा था।
कहने को तो यह ग्रह छोटा है, परंतु डेल्फानो ग्रह विज्ञान की तकनीक के हिसाब से, बहुत विकसित ग्रह माना जाता रहा है। कहते हैं कि इस ग्रह के लोगों का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है।
यहां के वैज्ञानिक नित नये शोध करते रहते हैं। यहां के लोग देखने में बिल्कुल पृथ्वी वासियों के जैसे ही हैं, सिर्फ उनकी औसत आयु 10,00 वर्ष की होती है।
डेल्फानो एक शांति प्रिय ग्रह होने की वजह से, इतना आधुनिक तकनीक होने के बाद भी, हथियारों का निर्माण सबसे कम मात्रा में करता है।
डेल्फानो के राजा गिरोट स्वयं भी एक निपुण वैज्ञानिक हैं, जो कि अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी प्रयोगशाला ‘ब्लैकून' को देते हैं।
कहते हैं कि गिरोट ने ही देवता नोवान का आशीर्वाद प्राप्त कर, 5,000 वर्ष पहले इस ग्रह को बसाया था। देवता नोवान के ही आशीर्वाद से गिरोट पिछले 5,000 वर्षों से वैसे ही जवान है, जैसा कि इस ग्रह के निर्माण के समय हुआ करता था।
गिरोट ने अपनी पूरी जिंदगी डेल्फानो को विकसित करने में लगा दी थी। डेल्फानो को विकसित करने में वह इतना पागल हो गया कि उसे कभी अपने विवाह का ख्याल भी नहीं आया।
आखिरकार एक रात उसे डेल्फानों के वारिस की चिंता हुई, इसलिये हजारों वर्षों के बाद गिरोट ने अपने ग्रह की ही एक साधारण सी लड़की से विवाह कर लिया।
विवाह के उपरांत, युवराज ओरस को जन्म देते हुए, गिरोट की पत्नि का स्वर्गवास हो गया। अब गिरोट के पास अपने पुत्र युवराज ओरस के सिवा कुछ भी नहीं था।
सुबह का समय था, डेल्फानो के दोनों सूर्य उदय हो चुके थे। सूर्य की पीली किरणें चारो ओर फैल गईं थीं।
इस समय गिरोट अपने महल से ब्लैकून के लिये निकलने ही वाला था, कि तभी 'कमांडर कीमोन' ने गिरोट के कक्ष में प्रवेश किया।
कीमोन को देख गिरोट की आँखों में आश्चर्य के भाव उभर आये।
“क्या हुआ कीमोन? इतनी सुबह-सुबह आने का कोई विशेष कारण है क्या?” गिरोट ने कीमोन से पूछा।
“महाराज, गुप्तचरों से समाचार मिला है, कि एंड्रोवर्स आकाशगंगा के, फेरोना ग्रह के राजा एलान्का को, आपके नये अविष्कार ‘समयचक्र' का पता लग गया है और वह किसी भी कीमत पर हमसे यह समयचक्र छीनना चाहता है।” कीमोन ने गंभीर भाव से कहा।
"एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोग?" गिरोट ने आश्चर्य से कहा- “उनके पास तो स्वयं एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जाने की शक्ति है, फिर वह हमारे समयचक्र में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?"
“वह अपनी शक्तियों से 2 ग्रहों के बीच द्वार बना सकते हैं महाराज, पर वह आकाशगंगा की अनन्त गहराइयों में, एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जा सकते और ना ही समय को रोक और चला सकते हैं, इसी लिये उन्हें आपका समयचक्र चाहिये महाराज।” कीमोन ने कहा।
"पर समयचक्र के प्रयोग को तो हमने बहुत ही गुप्त रखा था, फिर उन्हें इस समयचक्र की जानकारी कैसे हुई?” गिरोट के चेहरे पर अब चिंता के भाव उभर आये।
“जिस प्रकार हमारे गुप्तचर हर स्थान पर हैं, मुझे लगता है कि उनके गुप्तचर भी हमारे ग्रह पर होंगे? उन्हीं के माध्यम से एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोगों को हमारे समयचक्र का पता चला होगा। इसलिये महाराज से निवेदन है, कि वह सदैव अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें। मैं तब तक सेना को भी एलर्ट पर डाल देता हूं।" इतना कहकर कीमोन शांत हो गया और गिरोट के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
गिरोट ने इशारे से कीमोन को जाने का आदेश दिया और स्वयं कक्ष में रखी एक कुर्सी पर बैठकर समयचक्र के बारे में सोचने लगे।
“समयचक्र का निर्माण तो पूरा हो गया है, पर इसे किसी भी प्रकार से सुरक्षित रखना होगा? पर कैसे? इतने बड़े ब्लैकून को हम किसी की नजरों से छिपा भी नहीं सकते.... क्या करूं?.....हे देवता नोवान हमारी मदद करो।” गिरोट मन ही मन अपने देवता को याद करने लगा।
तभी अचानक वह खुशी से उछल पड़ा- “अरे वाह मुझे पहले 'ज़ेप्टो नाइजर' का ध्यान क्यों नहीं आया? ...हां ...उससे मेरी समस्या हल हो सकती है।"
अभी गिरोट यह सब सोच ही रहा था कि तभी 5 वर्षीय नन्हें युवराज ‘ओरस' ने कक्ष में प्रवेश किया।
“आप क्या कर रहे हैं पिताजी?" ओरस ने अपने छोटे से यान नुमा खिलौने को हाथों से घुमाते हुए कहा।
"हम तो अपने नये प्रयोग के बारे में सोच रहे थे युवराज।” गिरोट ने मुस्कुराकर अपनी बांहें फैलाते हुए कहा - “आप बताओ, आप अपने इस नन्हें से यान से, कहां की सैर कर रहे हो?"
गिरोट को बांहें फैलाते देख, नन्हा ओरस दौड़कर उनकी बांहों में समा गया।
“मैं तो अपने यान से आकाशगंगा के, दूसरे छोर की सैर कर रहा था पिताजी।" ओरस ने अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हुए कहा- “पर मुझे ये बताइये कि आपका यह नया प्रयोग क्या है? जिसके बारे में आप मुझसे भी ज्यादा सोचते हो।" ओरस की बात सुन गिरोट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“अभी तुम उस प्रयोग के बारे में जानने के लिये बहुत छोटे हो युवराज, समय आने पर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा।” गिरोट ने ओरस को फुसलाते हुए कहा।
“मैं इतना भी छोटा नहीं हूं। मैं आकाशगंगा की सारी जानकारी रखता हूं। आप चाहो तो मेरे ज्ञान का परीक्षण कर सकते हो?” ओरस ने किसी ज्ञानी की तरह ज्ञान देते हुए कहा।
“अच्छा, तो बताओ कि नेबुला क्या होता है?" गिरोट सच में ही ओरस की परीक्षा लेने लगा। वैसे गिरोट को पता था, कि ओरस इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेगा।
"जब कोई सितारा अपनी आयु का पूरा करने के बाद फटकर कणों में बिखर जाता है, तो उससे बने गैस और धूल के बादलों को नेबुला कहते हैं।” ओरस ने अपना यान उड़ाते हुए कहा।
ओरस का उत्तर सुन गिरोट हैरान रह गया क्यों कि ओरस ने शत-प्रतिशत सही कहा था।
“अच्छा अब बताओ कि सुपरनोआ क्या होता है?" ओरस ने अपने प्रश्न को थोड़ा और कठिन कर दिया।
“जब नेबुला के बहुत से कण आपस में संकुचित हो कर मिलते हैं, तो वह एक सितारे यानि की सूर्य का निर्माण करते हैं। वह सितारा 75 प्रतिशत तक हाइड्रोजन से बना होता है। यानि की हाइड्रोजन उस सूर्य में ईधन का काम करता है। धीरे-धीरे जब उस सितारे का पूरा हाईड्रोजन खत्म होकर, हीलीयम में परिवर्तित हो जाता है, इस स्थिति में वह सितारा अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण को संभाल नहीं पाता और एक महा विस्फोट के साथ फट जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते हैं।” ओरस ने भोलेपन से कहा।
गिरोट अब आश्चर्य से ओरस की ओर देख रहा था।
“क्या तुम 'न्यूट्रान स्टार' और 'ब्लैक होल' के बारे में भी जानते हो?” गिरोट ने अब क्लास 1 के बच्चे से ग्रेजुएशन का प्रश्न पूछ लिया था।
"जब सुपरनो वा विस्फोट होता है, तो सितारे का सबसे बड़ा टुकड़ा, जो सबसे ज्यादा घनत्व लिये होता है, वह एक गोलाकार आकृति लेकर एक न्यूट्रान स्टार में परिवर्तित हो जाता है। यह न्यूट्रान स्टार जब संकुचन की अधिकतक सीमा तक पहुंच जाता है, तो यह छोटा होकर अदृश्य हो जाता है। इसी अदृश्य पिंड को ब्लैक होल कहते हैं।" इस प्रकार क्लास 1 के बच्चे ने ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर, अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।
“ये सब ज्ञान तुम्हें किसने दिया?” गिरोट ने आश्चर्य से ओरस से पूछा।
ओरस ने मुस्कुराते हुए, कक्ष में रखी एक प्रतिमा की ओर इशारा किया। वह प्रतिमा डेल्फानो के देवता नोवान की थी।
ओरस का इशारा देख गिरोट और भी ज्यादा आश्चर्यचकित हो गया। उसने ओरस को अपने गले से लगा लिया।
“चलो ओरस, आज मैं तुम्हें अपने उस नये प्रयोग को दिखाता हूं।” गिरोट ने खड़े होते हुए कहा।
"पर आप तो कह रहे थे कि मैं अभी छोटा हं और मैं उस प्रयोग को समझ नहीं पाऊंगा?" ओरस ने अपनी भोली जुबान में कहा।
“मैं गलत था युवराज, आप नहीं छोटे हो, मेरी मानसिकता छोटी थी, जो मैं यह सोच रहा था कि आपको कुछ समझ नहीं आयेगा? आओ, अब चलते हैं ब्लैकून की ओर, जहां मेरा प्रयोग बेसब्री से आपका इंतजार कर रहा है।
यह कहकर गिरोट ने नन्हें वैज्ञानिक को अपनी गोद में उठाया और हवा में उड़ने वाले एक यान में बैठकर ब्लैकून के पास जा पहुंचा।
ब्लैकून लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली, एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसका आकार बिल्कुल गोल और काले रंग का था। दूर से देखने पर वह एक बड़े से काले मोती के समान प्रतीत हो रही थी। गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के पास पहुंच गया।
“ब्लैकून में प्रवेश करने का प्रवेश द्वार तो है ही नहीं पिताजी। फिर हम इसमें प्रवेश कैसे करेंगे?" ओरस ने कहा।
“ब्लैकून का पूरा नियंत्रण अंदर मौजूद एक कंप्यूटर 'जेनिक्स' करती है। वह हमें देखते ही स्वयं द्वार खोल देगी। तभी ब्लैकून में एक स्थान पर एक द्वार खुलता दिखाई देने लगा।
“क्या यह मुझे देखकर भी द्वार खोल देगी?” ओरस ने अपनी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।
“हां पुत्र, ज़ेनिक्स में डेल्फानों के राजवंश के, किसी भी व्यक्ति के शरीर को सेंस करने की अद्भुत क्षमता है।" ओरस ने कहा।
गिरोट और ओरस उस द्वार से अंदर प्रवेश कर गये। ब्लैकून में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था, पूरा सिस्टम ज़ेनिक्स के हवाले था।
अंदर प्रवेश करते ही ओरस को पूरा ब्लैकून, किसी एक छोटे ब्रह्मांड के समान प्रतीत हुआ। चारो ओर निहारिकाएं (नेबुला) फैली हुई थी, जिसके आसपास अनेकों ग्रह घूम रहे थे।
चूंकि ओरस पहली बार ब्लैकून में आया था, इसलिये वह आश्चर्य से सभी चीजों को निहार रहा था।
“यह कैसी प्रयोगशाला है पिताजी? यहां पर कोई मशीन तो दिखाई ही नहीं दे रही है?” ओरस ने कहा।
“ब्लैकून कुल 4 भागों में बंटा है पुत्र, कुछ देर प्रतीक्षा करो, अभी तुम्हें सबकुछ पता चल जायेगा।...यह तो अभी ब्लैकून का प्रथम भाग है, इस भाग में हम तारों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं।" गिरोट ने कहा।
उस भाग को पार करने के बाद, ओरस एक ऐसे भाग में पहुंचा, जहां पर देवता नोवान की एक बड़ी सी प्रतिमा लगी थी। देवता नोवान के कंधे पर एक फीनीक्स पक्षी बैठा था। उस भाग में और कुछ भी नहीं था।
यह ब्लैकून का दूसरा भाग था। देवता की प्रतिमा के नीचे, सामने की ओर एक गोल काँच का पारदर्शी केबिन बना था। उसे देख ओरस ने पूछ ही लिया।
नटखट हनुका: (20,005 वर्ष पहले....... नीलमहल, माया लोक, हिमालय)
दिव्यशक्तियां प्राप्त करने के बाद माया ने 15 लोकों का निर्माण कार्य शुरु कर दिया था।
सबसे पहले माया ने माया लोक की स्थापना की। इस माया लोक को उसने, अपने और नीलाभ के निवास स्थान के रुप में चुना।
इस माया लोक में माया ने एक बहुत ही सुंदर नीलमहल की रचना की, जिसमें कि नीले रंग को सर्वोत्तम स्थान दिया गया था।
नीलमहल पूर्णरुप से सोने का बना था, जिसमें जगह-जगह पर नीलम रत्न जड़े हुए थे। महल के सभी पर्दे भी नीले रंग के ही थे। माया ने यह महल नीलाभ को समर्पित किया था।
हनुका अब 0x06x0 वर्ष का हो गया था। आज प्रातः काल का समय था। माया ने सुबह उठकर, बगल में सो रहे नन्हें हनुका को देखा और फिर स्नान करने चली गईं।
माया के जाते ही हनुका ने अपनी आँखें खोल दीं। आँखें खुलते ही प्रतिदिन की भांति, मस्तिष्क में शैतानियां कुलबुलाने लगीं।
अब वह उठकर बिस्तर से नीचे आ गया। हनुका की नजर अब सो रहे नीलाभ पर थी।
शांत भाव से सो रहे नीलाभ को देख हनुका से रहा ना गया, अब उसकी नजरें कमरे में चारो ओर घूमने लगीं।
तभी हनुका की नजर माया द्वारा बनाई गई, एक चित्रकारी की ओर गया, जिसमें माया ने कूची से प्रकृति के रंगों को दर्शाया था।
हनुका दबे पांव उस चित्र के पास गया और उसके बगल रखे, विभिन्न प्रकार के रंगों से भरी थाली को उठा लिया।
अब हनुका धीरे-धीरे नीलाभ के पास पहुंचा और अपने नन्हें हाथों से नीलाभ के चेहरे पर अपनी कला का प्रदर्शन करने लगा।
नीलाभ इस समय गहरी निद्रा में था, उसे पता भी ना चला, कि कब उसका चेहरा एक कला प्रदर्शनी की भांति, विविध रंगों से सज चुका है।
कुछ ही देर में हनुका अपने प्रदर्शन से संतुष्ट हो गया।
तभी हनुका को स्नान घर का द्वार खुलने का अहसास हुआ। हनुका इस आवाज को सुन तेजी से, पलंग के नीचे छिप गया।
माया स्नान करके निकली और पूजा घर की ओर चल दी, तभी उसका ध्यान नीलाभ के चेहरे की ओर गया।
नीलाभ का चेहरा देख, माया का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया। माया की तेज हंसी को सुन, नीलाभ भी नींद से जाग गया।
“क्या हुआ माया? आपको सुबह-सुबह इतनी हंसी क्यों आ रही है? आज कुछ विशेष है क्या?” नीलाभ ने पूछा।
"हां नीलाभ, आज बहुत विशेष दिन है। अगर आप दर्पण देखोगे, तो तुम्हें भी आज की विशेषता का आभास हो जायेगा।" माया ने हंसते हुए कहा।
माया की बात सुन, नीलाभ उछलकर पलंग से खड़ा हो गया और दर्पण की ओर लपका। पर दर्पण में चेहरा देखते ही नीलाभ की भी हंसी छूट गई।
हनुका की नन्हीं कूची ने, अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए, नीलाभ के चेहरे को किसी राक्षस से पूरा मिलाने की कोशिश की थी।
“कहां गया वो हनुका? आज तो वो मेरे हाथों से मार खाएगा।” नीलाभ ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा“ अच्छे भले चेहरे को राक्षस बना दिया।"
"हनुका, इतनी अच्छी चित्रकारी कर बाहर की ओर भाग गया है।" माया ने कहा- “आप स्नान घर में जाकर अपना चेहरा साफ कर लीजिये, तब तक मैं उसे ढूंढकर लाती हूं।"
माया के शब्द सुनकर नीलाभ मुस्कुराया और स्नान घर की ओर चल दिया।
नीलाभ के जाते ही माया ने पलंग के नीचे झांककर, हनुका को देखते हुए कहा- “अब पलंग के नीचे से बाहर आ जाओ हनुका, तुम्हारे पिता जी स्नान घर में चले गये हैं।”
“आप जानती थीं कि मैं पलंग के नीचे छिपा हूं?" हनुका ने पलंग के नीचे से निकलते हुए कहा।
“प्रत्येक माँ को अपने पुत्र के बारे में सब कुछ पता रहता है। वो तो मैंने आपके पिताजी को इसलिये नहीं बताया, कि कहीं सुबह-सुबह मेरे पुत्र को मार ना पड़ जाये?” माया ने हनुका को अपनी ओर खींचते हुए कहा“ वैसे तुम्हारी चित्रकारी मुझे बहुत पसंद आयी हनुका।”
“अच्छा! फिर कल मैं आपके चेहरे पर भी ऐसी ही चित्रकारी कर दूंगा।” हनुका ने भोलेपन से कहा।
“अरे नहीं-नहीं ! मुझे क्षमा करो पुत्र, तुम अपने पिताजी पर ही चित्रकारी करते रहो। मुझे अपने चेहरे पर चित्रकारी नहीं करवानी।" माया ने डरने का अभिनय करते हुए कहा।
“ठीक है माता, मैं आप पर चित्रकारी नहीं करूंगा, पर मुझे आपसे एक चीज पूछनी है माता?” हनुका ने माया को देखते हुए कहा- “आपके और पिता जी के शरीर पर तो ऐसे बाल नहीं हैं, फिर मेरे शरीर पर ऐसे बाल क्यों हैं? मैं आप दोनों की तरह क्यों नहीं दिखता माता?" हनुका अपने शरीर के बालों को दिखाते हुए बोला।
“तुम्हारे शरीर पर इसलिये इतने बाल हैं, कि तुम्हें हिमालय की बर्फ में ठंडक ना महसूस हो। महानदेव बालकों को ठंड से बचाने के लिये, उनके शरीर पर ऐसे बाल दे देते हैं।” माया ने नन्हें हनुका को समझाते हुए कहा।
"फिर महल के बाकी दास-दासियों के, पुत्रों के शरीर पर बाल क्यों नहीं हैं माता?” हनुका ने एक और प्रश्न कर दिया।
'क्यों कि देव, केवल युवराज के शरीर पर इतने बाल देते हैं और तुम तो हिमालय के युवराज हो ना? बस इसीलिये तुम्हारे शरीर पर इस प्रकार से बाल हैं।” माया ने कहा- “क्या तुम्हें ये बाल नहीं पसंद हैं हनुका?"
“नहीं माता, मुझे भी अन्य बालकों की तरह दिखना है।” हनुका ने अपना दर्द व्यक्त करते हुए कहा- “क्या मैं उनकी तरह नहीं बन सकता माता?"
“बन सकते हो, पर इसके लिये तुम्हें देवशक्तियों की आवश्यकता होगी।” माया ने हनुका को समझाते हुए कहा- “पर मुझे नहीं लगता कि तुम अन्य बालकों के समान बनकर प्रसन्न रह पाओगे?"
“आपको ऐसा क्यों लगता है माता?” हनुका के मस्तिष्क में घुमड़-घुमड़ कर नये प्रश्न आ रहे थे।
“क्यों कि हनुका, हम जैसे हैं हमें वैसी ही प्रवृति के लोग अच्छे लगते है। हो सकता है कि क्षणिक मात्र, हमारा हृदय किसी अन्य प्रवृति की कामना करे, पर कुछ देर के बाद ही, हम स्वयं पहले की ही तरह बनना चाहते हैं।" माया ने कहा।
“मैं आपके कहने का अभिप्राय नहीं समझा माता?" हनुका के चेहरे पर उलझन के भाव नजर आये।
“ठीक है, मैं तुम्हें सरल भाषा में समझाने के लिये एक छोटी सी कथा सुनाती हूं।” माया ने पलंग पर बैठते हुए हनुका को अपनी गोद में बैठा लिया।
"अरे वाह! कथा फिर तो बहुत मजा आयेगा। नन्हा हनुका खुश होते हुए बोला।
"तो सुनो, एक बार हिमालय की कंदराओं में एक ऋषि रहते थे, जो प्रतिदिन प्रातः काल, गंगा नदी के पानी में स्नान करते थे और सूर्यदेव को जल चढ़ाते थे। प्रति दिन की भांति एक दिन जब, वह नदी में स्नान कर, सूर्य को जल चढ़ाने के लिये अपनी अंजुली में पानी भर रहे थे, तभी उनकी अंजुली में एक नन्हीं सी चुहिया आ गई, जो कि शायद नदी की धारा में डूब रही थी। ऋषि ने उस चुहिया को कन्या बनाकर अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। पुत्री जब बड़ी हुई तो ऋषि ने अपनी पुत्री से पूछा कि तुम्हें किस प्रकार का वर चाहिये? तो पुत्री ने कहा कि जो इस पूरे संसार में सर्वशक्तिमान हो, मुझे उससे विवाह करना है।
“ऋषि ने बहुत सोचने के बाद पुत्री को सूर्यदेव का प्रस्ताव दिया। ऋषि ने कहा कि सूर्यदेव ही इस पृथ्वी पर
सर्वशक्ति मान हैं। पर ऋषि पुत्री ने कहा कि सूर्यदेव से शक्तिशाली तो मेघ हैं, जो कि उन्हें पल भर में पूर्णतया ढक लेते हैं। तो ऋषि ने मेघों के देवता का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा, पर पुत्री ने उसे भी अस्वीकार कर दिया। पुत्री ने कहा कि मेघों के देवता से शक्तिशाली, तो पर्वतराज हिमालय हैं, जो मेघों को भी रोककर, उन्हें बरसने पर विवश कर देते हैं। यह सुनकर ऋषि ने इस बार हिमालय के विवाह का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा। तभी उस पुत्रि को हिमालय में छेद करता हुआ एक चूहा दिखाई दिया।
“उसे देख पुत्री ने कहा कि हिमालय से शक्तिशाली तो यह चूहा है, जो हिमालय में भी छेद कर सकता है, मैं तो इस चूहे से ही शादी करूंगी। फिर ऋषि समझ गये कि इस चुहिया को पूरी पृथ्वी पर, चूहा ही सबसे
शक्तिशाली दिखाई दिया, इसलिये ऋषि ने उस कन्या को फिर से चुहिया बना दिया और उसका विवाह खुशी-खुशी उस चूहे से कर दिया। तो इस कथा से यह पता चलता है हनुका कि जो जिस प्रकार है, उसे सदैव वैसी ही चीजें भाती हैं।' यह कहकर माया शांत हो गई और हनुका की ओर देखने लगी।
हनुका माया की कथा सुनकर कुछ सोच में पड़ गया। उसे सोचता देख माया ने पूछ लिया- “क्या सोच रहे हो हनुका?”
"तो फिर मेरा भी विवाह किसी बालों वाली कन्या के साथ ही होगा?" हनुका ने अपने चेहरा रोने सा बनाते हुए पूछा।
हनुका की बात सुन माया जोर से हंसते हुए बोली“अरे नहीं हनुका, तुम्हारा विवाह तो मैं पृथ्वी की सबसे सुंदर कन्या से करुंगी और तब तक तो तुम देवशक्ति प्राप्त कर, अपने भी शरीर के बाल हटा चुके होगे?"
“फिर ठीक है।" माया की बात सुन अब हनुका खुश हो गया।
“अच्छा, अब मैं महानदेव की पूजा करने जा रही हूं। पर इस बीच, तुम कोई और शरारत मत करना। ठीक है?” माया ने हनुका को पलंग पर बैठाते हुए कहा।
“जी माता, मैं आपके पूजा करने तक, चुपचाप पलंग पर बैठा रहूंगा, मैं कोई शरारत नहीं करूंगा। हनुका ने भोलेपन से कहा।
हनुका के वचन सुन माया ने हनुका के सिर पर धीरे से हाथ फेरा और पूजा स्थल की ओर बढ़ गई।
माया तो चली गई, पर हनुका अभी भी पलंग पर बैठा देवशक्ति के बारे में सोच रहा था- “माता ने कहा कि अगर मुझे देवशक्ति मिल जाये तो मैं भी दूसरे मनुष्यों की ही भांति, सुंदर दिखने लगूंगा, पर दूसरे कमरे में एक डिब्बे में बहुत सी देवशक्तियां रखी हैं, फिर माता, मुझे उन देवशक्तियों से सुंदर क्यों नहीं बना देती? शायद माता उन देवशक्तियों के बारे में भूल गई होंगी? एक काम करता हूं, मैं स्वयं उन देवशक्तियों से सुंदर बन जाता हूं और माता जब पूजा करके आयेगी, तो मैं उसे अपना सुंदर चेहरा दिखाकर, आश्चर्यचकित कर दूंगा हां-हां यही सही रहेगा।“ यह सोच नन्हा हनुका दूसरे कक्ष की ओर चल दिया, जहां देवशक्तियां रखीं थीं।
हनुका ने दूसरे कमरे में रखी अलमारी खोल ली, नीचे के दोनों खानों में वह सुनहरा डिब्बा नहीं था। अतः हनुका एक कुर्सी को खींचकर, अलमारी के पास ले आया और उस पर चढ़कर देखने लगा।
अब हनुका को अलमारी के तीसरे खाने में रखा, वह सुनहरा डिब्बा दिखाई दे गया। हनुका ने दोनों हाथ लगाकर उस सुनहरे डिब्बे को उठा लिया।
अब वह कुर्सी से उतरकर, वहीं कक्ष में जमीन पर ही बैठ गया। हनुका ने अब डिब्बे को खोल लिया।
रंग-बिरंगे रत्नों से हनुका की आँखें चमक उठीं। हनुका अब एक-एक रत्न को उठाकर देखने लगा, पर उसे समझ ना आया कि इन देवशक्तियों का प्रयोग करना कैसे है?
तभी हनुका को उस सुनहरे डिब्बे में एक छोटी सी डिबिया दिखाई दी। यह वहीं डिबिया थी, जिसे माया को महानदेव ने दिया था।
हनुका को इन सभी रत्नों के बीच, वह छोटी सी डिबिया का रखा होना, बहुत अजीब सा लगा, इसलिये हनुका ने उस डिबिया को खोल लिया।
“ये क्या बात हुई? इस डिबिया में तो जल की मात्र एक बूंद है?” हनुका ने सोचा- “कुछ सोच हनुका ने उस डिबिया को मुंह लगा कर, जल की उस बूंद को पी लिया।
“इससे तो प्यास भी नहीं बुझी। पता नहीं यह कैसी देवशक्ति थी ?” हनुका ने कहा।
तभी हनुका को कक्ष में किसी के आने की आहट सुनाई दी। वह आहट सुन हनुका डर कर तेजी से अलमारी के पीछे छिप गया।
सभी देवशक्तियां कमरे में वैसे ही बिखरी हुईं थीं। आने वाली आहट माया की थी, जो कि पूजा करके हनुका को ढूंढते हुए उधर ही आ गई थी- “हनुका !"
हनुका को पुकारते हुए, माया कक्ष में प्रविष्ठ हो गई, पर कक्ष में प्रविष्ठ होते ही माया के चेहरे पर हैरानी और क्रोध के भाव एक साथ आ गये। “हे मेरे ईश्वर, यह हनुका भी ना, पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?"
माया ने घबराकर सभी देवशक्तियों को जमीन से उठाकर, वापस डिब्बे में रखना शुरु कर दिया। साथ ही साथ वह उन देवशक्तियों की गिनती भी करती जा रही थी। 14 देवशक्तियों की गिनती कर उन्हें डिब्बे में रखने के बाद, माया की नजर अब दूर पड़ी सुनहरी डिबिया पर गई।
माया ने उस डिबिया को खोलकर देखा, पर उसमें गंगा की पहली बूंद नहीं थी।
यह देखकर माया का कंठ सूख गया, पर इससे पहले कि वह हनुका को ढूंढकर, उसे कोई दण्ड दे पाती, माया की आँखों के सामने ही, हवा में एक बूंद प्रकट होकर, उस डिबिया के अंदर चली गई।
माया यह चमत्कार देख आश्चर्य में पड़ गई, तभी माया को अपने सामने महानदेव का ऊर्जा रुप दिखाई दिया।
यह देख माया ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया।
तभी वातावरण में देव की आवाज गूंजी “माया, तुम्हें देवशक्तियों को और ध्यान से रखना होगा, यह तुम्हारा कर्तव्य है, कि तुम इन देवशक्तियों को सदैव उचित व्यक्ति को ही दो। आज अंजाने में ही सही परंतु गुरुत्व शक्ति का प्रयोग हुआ है। परंतु तुम्हारे सद्भाग्य के कारण, वह गुरुत्व शक्ति सही पात्र के पास पहुंच गई है और यही कारण है कि तुम इस डिबिया की गुरुत्व शक्ति को दोबारा से देख पा रही हो। ध्यान रखना जब भी इस गुरुत्व शक्ति का वरण कोई सुपात्र करेगा, तो इसकी दूसरी बूंद इस डिबिया में आ जायेगी, परंतु यदि कभी इस बूंद का वरण किसी कुपात्र ने किया, तो यह बूंद कभी धरती पर प्रकट नहीं होगी और ऐसी स्थिति में, तुम्हें देवताओं के क्रोध का भी सामना करना पड़ सकता है। इसलिये तुम्हें इन देवशक्तियों को लेकर अत्यंत सावधान रहने की जरुरत है।"
“जी देव, मैं आगे से सदैव आपकी बात का ध्यान रखूगी। मैं आज ही हिमालय पर आपके एक शिव मंदिर का निर्माण कर, इस गुरुत्व शक्ति को उसमें रख दूंगी।" माया ने कहा- “वह शिव मंदिर इस गुरुत्व शक्ति को लेकर हिमालय के गर्भ में प्रवेश कर जायेगा और जब तक मुझे इस गुरुत्व शक्ति के लिये, कोई सुपात्र नहीं मिल जाता? तब तक मैं इसे वहीं रहने दूंगी। हां वह शिव मंदिर प्रत्येक वर्ष, आपकी पूजा-अर्चना के लिये हिमालय के गर्भ से एक बार बाहर आयेगा और संध्या वंदना के साथ, वापस हिमालय की गर्भ में समा जायेगा। अब रही बात इन बाकी की देवशक्ति यों की, तो इन्हें मैं ऐसे स्थान पर रखूगी, कि वहां तक कोई कुपात्र पहुंच कर, इन शक्तियों को प्राप्त ही नहीं कर पायेगा। आज की घटना ने मुझे अच्छा ज्ञान दिया है देव, अब मुझसे कभी भी इस प्रकार की त्रुटि नहीं होगी, ऐसा मैं आपको विश्वास दिलाती हूं।"
"कल्याण हो माया।" यह कहकर देव अंतर्ध्यान हो गये। अब माया ने जल्दी से गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी, अपने सुनहरे डिब्बे में रखा और पूरे डिब्बे को अपने हाथ में लेकर कोई मंत्र पढ़ने लगी।
कुछ ही देर में वह सुनहरा डिब्बा माया के हाथों से कहीं हवा में विलीन हो गया। अब माया की नजर हनुका को ढूंढने में लग गई।
"हनुका ऽऽऽऽऽ।” माया ने कमरे के एक-एक स्थान का सामान हटाकर, हनुका को ढूंढना शुरु कर दिया।
माया ने अलमारी के पीछे भी देखा, पर हनुका पूरे कमरे में कहीं दिखाई नहीं दिया। तभी माया को हनुका की हंसी सुनाई दी।
माया ने हंसी की आवाज का पीछा करते हुए, कक्ष की छत की ओर देखा, तो माया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्यों कि हनुका इस समय पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण छोड़, कक्ष के छत की ओर, हवा में तैर रहा था।
एक पल में माया को समझ में आ गया कि देव किस सुपात्र की बात कर रहे थे। वह जान गई थी कि हनुका ने ही गुरुत्व शक्ति का वरण किया था।
माया ने हनुका को नीचे आने का इशारा किया, पर हनुका ने डरकर अपना सिर ना में हिलाया।
“आप मुझे मारोगी?” हनुका ने भोलेपन से कहा।
“नहीं मारुंगी, परंतु नीचे आओ।” माया ने हनुका को घूरते हुए कहा।
हनुका डरते-डरते नीचे आ गया। माया ने हनुका के कान पकड़े और उसे लेकर महल के अंदर की ओर चल दी- “चलो तुम्हें अपने हाथ के बने लड्डू खिलाती हूं।
“लड्डू! वाह, फिर तो आनन्द ही आ जायेगा। हनुका यह सुनकर खुश हो गया।
माया ने हनुका का हाथ पकड़ा और फिर उसे प्यार करते हुए महल के अंदर की ओर चल दी।
इस दृश्य को देखकर तो बस यही कहा जा सकता है कि माँ तो आखिर माँ ही होती है।
हनुका के रक्त भैरवी की डिबिया ले जाने के बाद, नीलाभ फिर से शि…वलिंग के सामने बने असंख्य त्रिशूलों पर जाकर आसन की मुद्रा में बैठ गया। कुछ देर तक उसने माया के बारे में सोचा और फिर अपनी साधना में लीन हो गया।
नीलाभ को पता था कि उसकी साधना का यह अंतिम चरण है, इसके बाद देव को उन्हें वरदान देने आना ही होगा।
कुछ घंटों के बाद नीलाभ ने अपने मंत्रोच्चारण की आखिरी आहुति को, देव को समर्पित कर दिया। अब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलकर, अपने चारो ओर देखा और फिर खड़े होकर उन त्रिशूलों के ऊपर ही तांडव करना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में नीलाभ के पैरों से निकलता खून, त्रिशूल के मध्य से होकर शिवमलिंग की ओर बढ़ा, पर इससे पहले कि अंजाने में वह खून शिवमलिंग तक पहुंचता, वातावरण में तेज डमरु की आवाज सुनाई दी, जो कि देव के प्रकट होने का द्योतक था।
हवा में एक ऊर्जा द्वार उत्पन्न हुआ, जिससे निकलकर देव, नीलाभ के समक्ष आ खड़े हुए।
महानदेव ने नीलाभ के पैरों से रिसते खून को देखा, देव के देखते ही खून का रिसाव बंद हो गया। नीलाभ ने त्रिशूल से उतरकर देव के सम्मुख दंडवत प्रणाम किया।
देव ने अपना वरदहस्त आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।
“बताओ नीलाभ, तुम इस प्रकार की कठिन साधना क्यों कर रहे हो? तुम्हें भला किस चीज की कामना है? देव ने नीलाभ से पूछा।
"आप तो अंतर्यामी है देव।” नीलाभ हाथ जोड़कर देव के सामने घुटनों के बल बैठ गया- “आप तो जानते हैं, कि मुझे मनुष्यों के कल्याण के लिये, कुछ पलों के लिये आपकी कुछ शक्तियों का वरण करना है। इसलिये हे महादेव, मुझे ये वरदान दीजिये कि मैं कुछ विषम परिस्थितियों के समय, कुछ क्षणों के लिये, आपकी कुछ शक्तियों को धारण कर सकूँ। मैंने ब्र…देव के कहे अनुसार, आपकी शक्तियों को धारण करने के लिये, अपना शरीर भी उन शक्तियों के लायक कर लिया है।'
यह सुनकर म..देव ने आगे बढ़कर नीलाभ का हाथ पकड़ लिया। इससे पहले कि नीलाभ कुछ भी समझ पाता, उसे अपना शरीर ब्रह्मांड के करोड़ों आकाशगंगाओं के मध्य दिखाई दिया।
चारो ओर अरबों-खरबों अलग-अलग रंग के सितारे फैले हुए थे। करोड़ों आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर घूम रहीं थीं। ब्लैक होल कुछ आकाशगंगाओं को अपने अंदर समाहित कर रहे थे।
कुछ न्यूट्रान स्टार अपने ही ताप से, एक धमाके के साथ फट रहे थे। कुछ आकाशगंगाएं आपस में विलय होकर, नयी आकाशगंगा का निर्माण कर रहीं थीं।
कुल मिलाकर उस स्थान पर मनुष्य तो क्या, किसी भी आकाशगंगा का अस्तित्व भी नगण्य दिखाई दे रहा था। चारो ओर अनंत ब्रह्मांड, अनवरत समय के साथ गतिमान था।
नीलाभ ने आज से पहले कभी भी इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था, इसलिये वह घबराकर ..देव को याद करने लगा।
तभी उस अनंत ब्रह्मांड में सितारों और आका शगंगाओं के मध्य देव का 5 मुखों वाला शरीर प्रकट हुआ।
उसमें पूर्व मुख-पीत वर्ण, पश्चिम मुख-श्वेत वर्ण, उत्तर मुख-कृष्ण वर्ण, दक्षिण मुख-नीलवर्ण और ऊर्ध्व मुख-ईशान दुग्ध के समान प्रतीत हो रहा था। नीलाभ, देव के इस दिव्य दर्शन को देख अविभूत होने लगा।
“हे देव, मैं आपके इस पंचमुखी दर्शन से, ब्रह्मांड के सारे कष्टों को भूल चुका हूं। अब कृपया मुझे इस दिव्य दर्शन का सार समझाइये देव?" नीलाभ ने अपने आँखों में उस अद्भुत दृश्य को भरते हुए कहा।
नीलाभ के शब्द सुन देव की आवाज वातावरण में उभरी- “नीलाभ, मैं तुम्हें ईश्वर का सार समझाने की चेष्टा कर रहा हूं। ईश्वर अनंत और निराकार हैं, तुम जिस रुप में उन्हें देखने की इच्छा करोगे, वो तुम्हें उस रुप में दर्शन देंगे। तुमने हमसे हमारी शक्तियों का वरण करने का वरदान मांगा, इसलिये ही हमने तुम्हें इस पंचमुख से दर्शन दिये। हम तुम्हें इस पंचमुख के माध्यम से बताना चाहते हैं, कि हम स्वयं अपने पंचभूत की शक्तियों से निर्मित हैं। अब अगर हम तुम्हें यह वरदान दे भी दें, तब भी तुम हमारे, इन पंचरुपों के आशीर्वाद के बिना, हमारी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाओगे। तो बताओ नीलाभ क्या तुम इन पंचभूतों से आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक हो?....परंतु ध्यान रखना, इन्हें प्रसन्न करना इतना भी आसान नहीं होगा।"
“अवश्य ..देव, आप मुझे वरदान प्रदान करिये। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि बिना इन पंचभूतों के आशीर्वाद के, मैं आपकी उन शक्तियों का वरण नहीं करूंगा।” नीलाभ ने म..देव को विश्वास दिलाते हुए कहा।
“तथास्तु। तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” यह कहकर महादेव अपने स्थान से अंतर्ध्यान हो गये।
तभी रोशनी का एक तेज झमाका हुआ, जिसकी वजह से नीलाभ की आँखें बंद हो गईं। परंतु जब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने अपने आपको रुद्रलोक के उसी मं..दिर के बाहर पाया, जहां रहकर वह इतने समय से तपस्या कर रहा था।
इस समय नीलाभ के चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता के भाव थे। अब नीलाभ देव के पहले रुप को प्रसन्न करने के लिये चल पड़ा, जो कि वीरभद्र थे और वह रुद्रलोक के ही किसी अज्ञात स्थान पर थे।
चैपटर-3
ब्लैकून: (20 वर्ष पहले.......डेल्फानो ग्रह, एरियन आकाशगंगा)
पृथ्वी से 12 लाख प्रकाशवर्ष दूर, एरियन आकाशगंगा में एक बहुत ही खूबसूरत ग्रह है, जिसका नाम है- डेल्फानो।
वैसे तो इस ग्रह का इतिहास मात्र 5000 वर्ष ही पुराना है, परंतु अपने इस छोटे से इतिहास में भी, डेल्फानो ने अनेकों अभूतपूर्व अविष्कार करके, पूरी एरियन आकाशगंगा को चकित करके रखा था।
कहने को तो यह ग्रह छोटा है, परंतु डेल्फानो ग्रह विज्ञान की तकनीक के हिसाब से, बहुत विकसित ग्रह माना जाता रहा है। कहते हैं कि इस ग्रह के लोगों का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है।
यहां के वैज्ञानिक नित नये शोध करते रहते हैं। यहां के लोग देखने में बिल्कुल पृथ्वी वासियों के जैसे ही हैं, सिर्फ उनकी औसत आयु 10,00 वर्ष की होती है।
डेल्फानो एक शांति प्रिय ग्रह होने की वजह से, इतना आधुनिक तकनीक होने के बाद भी, हथियारों का निर्माण सबसे कम मात्रा में करता है।
डेल्फानो के राजा गिरोट स्वयं भी एक निपुण वैज्ञानिक हैं, जो कि अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी प्रयोगशाला ‘ब्लैकून' को देते हैं।
कहते हैं कि गिरोट ने ही देवता नोवान का आशीर्वाद प्राप्त कर, 5,000 वर्ष पहले इस ग्रह को बसाया था। देवता नोवान के ही आशीर्वाद से गिरोट पिछले 5,000 वर्षों से वैसे ही जवान है, जैसा कि इस ग्रह के निर्माण के समय हुआ करता था।
गिरोट ने अपनी पूरी जिंदगी डेल्फानो को विकसित करने में लगा दी थी। डेल्फानो को विकसित करने में वह इतना पागल हो गया कि उसे कभी अपने विवाह का ख्याल भी नहीं आया।
आखिरकार एक रात उसे डेल्फानों के वारिस की चिंता हुई, इसलिये हजारों वर्षों के बाद गिरोट ने अपने ग्रह की ही एक साधारण सी लड़की से विवाह कर लिया।
विवाह के उपरांत, युवराज ओरस को जन्म देते हुए, गिरोट की पत्नि का स्वर्गवास हो गया। अब गिरोट के पास अपने पुत्र युवराज ओरस के सिवा कुछ भी नहीं था।
सुबह का समय था, डेल्फानो के दोनों सूर्य उदय हो चुके थे। सूर्य की पीली किरणें चारो ओर फैल गईं थीं।
इस समय गिरोट अपने महल से ब्लैकून के लिये निकलने ही वाला था, कि तभी 'कमांडर कीमोन' ने गिरोट के कक्ष में प्रवेश किया।
कीमोन को देख गिरोट की आँखों में आश्चर्य के भाव उभर आये।
“क्या हुआ कीमोन? इतनी सुबह-सुबह आने का कोई विशेष कारण है क्या?” गिरोट ने कीमोन से पूछा।
“महाराज, गुप्तचरों से समाचार मिला है, कि एंड्रोवर्स आकाशगंगा के, फेरोना ग्रह के राजा एलान्का को, आपके नये अविष्कार ‘समयचक्र' का पता लग गया है और वह किसी भी कीमत पर हमसे यह समयचक्र छीनना चाहता है।” कीमोन ने गंभीर भाव से कहा।
"एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोग?" गिरोट ने आश्चर्य से कहा- “उनके पास तो स्वयं एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जाने की शक्ति है, फिर वह हमारे समयचक्र में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?"
“वह अपनी शक्तियों से 2 ग्रहों के बीच द्वार बना सकते हैं महाराज, पर वह आकाशगंगा की अनन्त गहराइयों में, एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जा सकते और ना ही समय को रोक और चला सकते हैं, इसी लिये उन्हें आपका समयचक्र चाहिये महाराज।” कीमोन ने कहा।
"पर समयचक्र के प्रयोग को तो हमने बहुत ही गुप्त रखा था, फिर उन्हें इस समयचक्र की जानकारी कैसे हुई?” गिरोट के चेहरे पर अब चिंता के भाव उभर आये।
“जिस प्रकार हमारे गुप्तचर हर स्थान पर हैं, मुझे लगता है कि उनके गुप्तचर भी हमारे ग्रह पर होंगे? उन्हीं के माध्यम से एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोगों को हमारे समयचक्र का पता चला होगा। इसलिये महाराज से निवेदन है, कि वह सदैव अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें। मैं तब तक सेना को भी एलर्ट पर डाल देता हूं।" इतना कहकर कीमोन शांत हो गया और गिरोट के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
गिरोट ने इशारे से कीमोन को जाने का आदेश दिया और स्वयं कक्ष में रखी एक कुर्सी पर बैठकर समयचक्र के बारे में सोचने लगे।
“समयचक्र का निर्माण तो पूरा हो गया है, पर इसे किसी भी प्रकार से सुरक्षित रखना होगा? पर कैसे? इतने बड़े ब्लैकून को हम किसी की नजरों से छिपा भी नहीं सकते.... क्या करूं?.....हे देवता नोवान हमारी मदद करो।” गिरोट मन ही मन अपने देवता को याद करने लगा।
तभी अचानक वह खुशी से उछल पड़ा- “अरे वाह मुझे पहले 'ज़ेप्टो नाइजर' का ध्यान क्यों नहीं आया? ...हां ...उससे मेरी समस्या हल हो सकती है।"
अभी गिरोट यह सब सोच ही रहा था कि तभी 5 वर्षीय नन्हें युवराज ‘ओरस' ने कक्ष में प्रवेश किया।
“आप क्या कर रहे हैं पिताजी?" ओरस ने अपने छोटे से यान नुमा खिलौने को हाथों से घुमाते हुए कहा।
"हम तो अपने नये प्रयोग के बारे में सोच रहे थे युवराज।” गिरोट ने मुस्कुराकर अपनी बांहें फैलाते हुए कहा - “आप बताओ, आप अपने इस नन्हें से यान से, कहां की सैर कर रहे हो?"
गिरोट को बांहें फैलाते देख, नन्हा ओरस दौड़कर उनकी बांहों में समा गया।
“मैं तो अपने यान से आकाशगंगा के, दूसरे छोर की सैर कर रहा था पिताजी।" ओरस ने अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हुए कहा- “पर मुझे ये बताइये कि आपका यह नया प्रयोग क्या है? जिसके बारे में आप मुझसे भी ज्यादा सोचते हो।" ओरस की बात सुन गिरोट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“अभी तुम उस प्रयोग के बारे में जानने के लिये बहुत छोटे हो युवराज, समय आने पर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा।” गिरोट ने ओरस को फुसलाते हुए कहा।
“मैं इतना भी छोटा नहीं हूं। मैं आकाशगंगा की सारी जानकारी रखता हूं। आप चाहो तो मेरे ज्ञान का परीक्षण कर सकते हो?” ओरस ने किसी ज्ञानी की तरह ज्ञान देते हुए कहा।
“अच्छा, तो बताओ कि नेबुला क्या होता है?" गिरोट सच में ही ओरस की परीक्षा लेने लगा। वैसे गिरोट को पता था, कि ओरस इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेगा।
"जब कोई सितारा अपनी आयु का पूरा करने के बाद फटकर कणों में बिखर जाता है, तो उससे बने गैस और धूल के बादलों को नेबुला कहते हैं।” ओरस ने अपना यान उड़ाते हुए कहा।
ओरस का उत्तर सुन गिरोट हैरान रह गया क्यों कि ओरस ने शत-प्रतिशत सही कहा था।
“अच्छा अब बताओ कि सुपरनोआ क्या होता है?" ओरस ने अपने प्रश्न को थोड़ा और कठिन कर दिया।
“जब नेबुला के बहुत से कण आपस में संकुचित हो कर मिलते हैं, तो वह एक सितारे यानि की सूर्य का निर्माण करते हैं। वह सितारा 75 प्रतिशत तक हाइड्रोजन से बना होता है। यानि की हाइड्रोजन उस सूर्य में ईधन का काम करता है। धीरे-धीरे जब उस सितारे का पूरा हाईड्रोजन खत्म होकर, हीलीयम में परिवर्तित हो जाता है, इस स्थिति में वह सितारा अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण को संभाल नहीं पाता और एक महा विस्फोट के साथ फट जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते हैं।” ओरस ने भोलेपन से कहा।
गिरोट अब आश्चर्य से ओरस की ओर देख रहा था।
“क्या तुम 'न्यूट्रान स्टार' और 'ब्लैक होल' के बारे में भी जानते हो?” गिरोट ने अब क्लास 1 के बच्चे से ग्रेजुएशन का प्रश्न पूछ लिया था।
"जब सुपरनो वा विस्फोट होता है, तो सितारे का सबसे बड़ा टुकड़ा, जो सबसे ज्यादा घनत्व लिये होता है, वह एक गोलाकार आकृति लेकर एक न्यूट्रान स्टार में परिवर्तित हो जाता है। यह न्यूट्रान स्टार जब संकुचन की अधिकतक सीमा तक पहुंच जाता है, तो यह छोटा होकर अदृश्य हो जाता है। इसी अदृश्य पिंड को ब्लैक होल कहते हैं।" इस प्रकार क्लास 1 के बच्चे ने ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर, अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।
“ये सब ज्ञान तुम्हें किसने दिया?” गिरोट ने आश्चर्य से ओरस से पूछा।
ओरस ने मुस्कुराते हुए, कक्ष में रखी एक प्रतिमा की ओर इशारा किया। वह प्रतिमा डेल्फानो के देवता नोवान की थी।
ओरस का इशारा देख गिरोट और भी ज्यादा आश्चर्यचकित हो गया। उसने ओरस को अपने गले से लगा लिया।
“चलो ओरस, आज मैं तुम्हें अपने उस नये प्रयोग को दिखाता हूं।” गिरोट ने खड़े होते हुए कहा।
"पर आप तो कह रहे थे कि मैं अभी छोटा हं और मैं उस प्रयोग को समझ नहीं पाऊंगा?" ओरस ने अपनी भोली जुबान में कहा।
“मैं गलत था युवराज, आप नहीं छोटे हो, मेरी मानसिकता छोटी थी, जो मैं यह सोच रहा था कि आपको कुछ समझ नहीं आयेगा? आओ, अब चलते हैं ब्लैकून की ओर, जहां मेरा प्रयोग बेसब्री से आपका इंतजार कर रहा है।
यह कहकर गिरोट ने नन्हें वैज्ञानिक को अपनी गोद में उठाया और हवा में उड़ने वाले एक यान में बैठकर ब्लैकून के पास जा पहुंचा।
ब्लैकून लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली, एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसका आकार बिल्कुल गोल और काले रंग का था। दूर से देखने पर वह एक बड़े से काले मोती के समान प्रतीत हो रही थी। गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के पास पहुंच गया।
“ब्लैकून में प्रवेश करने का प्रवेश द्वार तो है ही नहीं पिताजी। फिर हम इसमें प्रवेश कैसे करेंगे?" ओरस ने कहा।
“ब्लैकून का पूरा नियंत्रण अंदर मौजूद एक कंप्यूटर 'जेनिक्स' करती है। वह हमें देखते ही स्वयं द्वार खोल देगी। तभी ब्लैकून में एक स्थान पर एक द्वार खुलता दिखाई देने लगा।
“क्या यह मुझे देखकर भी द्वार खोल देगी?” ओरस ने अपनी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।
“हां पुत्र, ज़ेनिक्स में डेल्फानों के राजवंश के, किसी भी व्यक्ति के शरीर को सेंस करने की अद्भुत क्षमता है।" ओरस ने कहा।
गिरोट और ओरस उस द्वार से अंदर प्रवेश कर गये। ब्लैकून में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था, पूरा सिस्टम ज़ेनिक्स के हवाले था।
अंदर प्रवेश करते ही ओरस को पूरा ब्लैकून, किसी एक छोटे ब्रह्मांड के समान प्रतीत हुआ। चारो ओर निहारिकाएं (नेबुला) फैली हुई थी, जिसके आसपास अनेकों ग्रह घूम रहे थे।
चूंकि ओरस पहली बार ब्लैकून में आया था, इसलिये वह आश्चर्य से सभी चीजों को निहार रहा था।
“यह कैसी प्रयोगशाला है पिताजी? यहां पर कोई मशीन तो दिखाई ही नहीं दे रही है?” ओरस ने कहा।
“ब्लैकून कुल 4 भागों में बंटा है पुत्र, कुछ देर प्रतीक्षा करो, अभी तुम्हें सबकुछ पता चल जायेगा।...यह तो अभी ब्लैकून का प्रथम भाग है, इस भाग में हम तारों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं।" गिरोट ने कहा।
उस भाग को पार करने के बाद, ओरस एक ऐसे भाग में पहुंचा, जहां पर देवता नोवान की एक बड़ी सी प्रतिमा लगी थी। देवता नोवान के कंधे पर एक फीनीक्स पक्षी बैठा था। उस भाग में और कुछ भी नहीं था।
यह ब्लैकून का दूसरा भाग था। देवता की प्रतिमा के नीचे, सामने की ओर एक गोल काँच का पारदर्शी केबिन बना था। उसे देख ओरस ने पूछ ही लिया।
हनुका के रक्त भैरवी की डिबिया ले जाने के बाद, नीलाभ फिर से शि…वलिंग के सामने बने असंख्य त्रिशूलों पर जाकर आसन की मुद्रा में बैठ गया। कुछ देर तक उसने माया के बारे में सोचा और फिर अपनी साधना में लीन हो गया।
नीलाभ को पता था कि उसकी साधना का यह अंतिम चरण है, इसके बाद देव को उन्हें वरदान देने आना ही होगा।
कुछ घंटों के बाद नीलाभ ने अपने मंत्रोच्चारण की आखिरी आहुति को, देव को समर्पित कर दिया। अब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलकर, अपने चारो ओर देखा और फिर खड़े होकर उन त्रिशूलों के ऊपर ही तांडव करना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में नीलाभ के पैरों से निकलता खून, त्रिशूल के मध्य से होकर शिवमलिंग की ओर बढ़ा, पर इससे पहले कि अंजाने में वह खून शिवमलिंग तक पहुंचता, वातावरण में तेज डमरु की आवाज सुनाई दी, जो कि देव के प्रकट होने का द्योतक था।
हवा में एक ऊर्जा द्वार उत्पन्न हुआ, जिससे निकलकर देव, नीलाभ के समक्ष आ खड़े हुए।
महानदेव ने नीलाभ के पैरों से रिसते खून को देखा, देव के देखते ही खून का रिसाव बंद हो गया। नीलाभ ने त्रिशूल से उतरकर देव के सम्मुख दंडवत प्रणाम किया।
देव ने अपना वरदहस्त आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।
“बताओ नीलाभ, तुम इस प्रकार की कठिन साधना क्यों कर रहे हो? तुम्हें भला किस चीज की कामना है? देव ने नीलाभ से पूछा।
"आप तो अंतर्यामी है देव।” नीलाभ हाथ जोड़कर देव के सामने घुटनों के बल बैठ गया- “आप तो जानते हैं, कि मुझे मनुष्यों के कल्याण के लिये, कुछ पलों के लिये आपकी कुछ शक्तियों का वरण करना है। इसलिये हे महादेव, मुझे ये वरदान दीजिये कि मैं कुछ विषम परिस्थितियों के समय, कुछ क्षणों के लिये, आपकी कुछ शक्तियों को धारण कर सकूँ। मैंने ब्र…देव के कहे अनुसार, आपकी शक्तियों को धारण करने के लिये, अपना शरीर भी उन शक्तियों के लायक कर लिया है।'
यह सुनकर म..देव ने आगे बढ़कर नीलाभ का हाथ पकड़ लिया। इससे पहले कि नीलाभ कुछ भी समझ पाता, उसे अपना शरीर ब्रह्मांड के करोड़ों आकाशगंगाओं के मध्य दिखाई दिया।
चारो ओर अरबों-खरबों अलग-अलग रंग के सितारे फैले हुए थे। करोड़ों आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर घूम रहीं थीं। ब्लैक होल कुछ आकाशगंगाओं को अपने अंदर समाहित कर रहे थे।
कुछ न्यूट्रान स्टार अपने ही ताप से, एक धमाके के साथ फट रहे थे। कुछ आकाशगंगाएं आपस में विलय होकर, नयी आकाशगंगा का निर्माण कर रहीं थीं।
कुल मिलाकर उस स्थान पर मनुष्य तो क्या, किसी भी आकाशगंगा का अस्तित्व भी नगण्य दिखाई दे रहा था। चारो ओर अनंत ब्रह्मांड, अनवरत समय के साथ गतिमान था।
नीलाभ ने आज से पहले कभी भी इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था, इसलिये वह घबराकर ..देव को याद करने लगा।
तभी उस अनंत ब्रह्मांड में सितारों और आका शगंगाओं के मध्य देव का 5 मुखों वाला शरीर प्रकट हुआ।
उसमें पूर्व मुख-पीत वर्ण, पश्चिम मुख-श्वेत वर्ण, उत्तर मुख-कृष्ण वर्ण, दक्षिण मुख-नीलवर्ण और ऊर्ध्व मुख-ईशान दुग्ध के समान प्रतीत हो रहा था। नीलाभ, देव के इस दिव्य दर्शन को देख अविभूत होने लगा।
“हे देव, मैं आपके इस पंचमुखी दर्शन से, ब्रह्मांड के सारे कष्टों को भूल चुका हूं। अब कृपया मुझे इस दिव्य दर्शन का सार समझाइये देव?" नीलाभ ने अपने आँखों में उस अद्भुत दृश्य को भरते हुए कहा।
नीलाभ के शब्द सुन देव की आवाज वातावरण में उभरी- “नीलाभ, मैं तुम्हें ईश्वर का सार समझाने की चेष्टा कर रहा हूं। ईश्वर अनंत और निराकार हैं, तुम जिस रुप में उन्हें देखने की इच्छा करोगे, वो तुम्हें उस रुप में दर्शन देंगे। तुमने हमसे हमारी शक्तियों का वरण करने का वरदान मांगा, इसलिये ही हमने तुम्हें इस पंचमुख से दर्शन दिये। हम तुम्हें इस पंचमुख के माध्यम से बताना चाहते हैं, कि हम स्वयं अपने पंचभूत की शक्तियों से निर्मित हैं। अब अगर हम तुम्हें यह वरदान दे भी दें, तब भी तुम हमारे, इन पंचरुपों के आशीर्वाद के बिना, हमारी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाओगे। तो बताओ नीलाभ क्या तुम इन पंचभूतों से आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक हो?....परंतु ध्यान रखना, इन्हें प्रसन्न करना इतना भी आसान नहीं होगा।"
“अवश्य ..देव, आप मुझे वरदान प्रदान करिये। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि बिना इन पंचभूतों के आशीर्वाद के, मैं आपकी उन शक्तियों का वरण नहीं करूंगा।” नीलाभ ने म..देव को विश्वास दिलाते हुए कहा।
“तथास्तु। तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” यह कहकर महादेव अपने स्थान से अंतर्ध्यान हो गये।
तभी रोशनी का एक तेज झमाका हुआ, जिसकी वजह से नीलाभ की आँखें बंद हो गईं। परंतु जब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने अपने आपको रुद्रलोक के उसी मं..दिर के बाहर पाया, जहां रहकर वह इतने समय से तपस्या कर रहा था।
इस समय नीलाभ के चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता के भाव थे। अब नीलाभ देव के पहले रुप को प्रसन्न करने के लिये चल पड़ा, जो कि वीरभद्र थे और वह रुद्रलोक के ही किसी अज्ञात स्थान पर थे।
चैपटर-3
ब्लैकून: (20 वर्ष पहले.......डेल्फानो ग्रह, एरियन आकाशगंगा)
पृथ्वी से 12 लाख प्रकाशवर्ष दूर, एरियन आकाशगंगा में एक बहुत ही खूबसूरत ग्रह है, जिसका नाम है- डेल्फानो।
वैसे तो इस ग्रह का इतिहास मात्र 5000 वर्ष ही पुराना है, परंतु अपने इस छोटे से इतिहास में भी, डेल्फानो ने अनेकों अभूतपूर्व अविष्कार करके, पूरी एरियन आकाशगंगा को चकित करके रखा था।
कहने को तो यह ग्रह छोटा है, परंतु डेल्फानो ग्रह विज्ञान की तकनीक के हिसाब से, बहुत विकसित ग्रह माना जाता रहा है। कहते हैं कि इस ग्रह के लोगों का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है।
यहां के वैज्ञानिक नित नये शोध करते रहते हैं। यहां के लोग देखने में बिल्कुल पृथ्वी वासियों के जैसे ही हैं, सिर्फ उनकी औसत आयु 10,00 वर्ष की होती है।
डेल्फानो एक शांति प्रिय ग्रह होने की वजह से, इतना आधुनिक तकनीक होने के बाद भी, हथियारों का निर्माण सबसे कम मात्रा में करता है।
डेल्फानो के राजा गिरोट स्वयं भी एक निपुण वैज्ञानिक हैं, जो कि अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी प्रयोगशाला ‘ब्लैकून' को देते हैं।
कहते हैं कि गिरोट ने ही देवता नोवान का आशीर्वाद प्राप्त कर, 5,000 वर्ष पहले इस ग्रह को बसाया था। देवता नोवान के ही आशीर्वाद से गिरोट पिछले 5,000 वर्षों से वैसे ही जवान है, जैसा कि इस ग्रह के निर्माण के समय हुआ करता था।
गिरोट ने अपनी पूरी जिंदगी डेल्फानो को विकसित करने में लगा दी थी। डेल्फानो को विकसित करने में वह इतना पागल हो गया कि उसे कभी अपने विवाह का ख्याल भी नहीं आया।
आखिरकार एक रात उसे डेल्फानों के वारिस की चिंता हुई, इसलिये हजारों वर्षों के बाद गिरोट ने अपने ग्रह की ही एक साधारण सी लड़की से विवाह कर लिया।
विवाह के उपरांत, युवराज ओरस को जन्म देते हुए, गिरोट की पत्नि का स्वर्गवास हो गया। अब गिरोट के पास अपने पुत्र युवराज ओरस के सिवा कुछ भी नहीं था।
सुबह का समय था, डेल्फानो के दोनों सूर्य उदय हो चुके थे। सूर्य की पीली किरणें चारो ओर फैल गईं थीं।
इस समय गिरोट अपने महल से ब्लैकून के लिये निकलने ही वाला था, कि तभी 'कमांडर कीमोन' ने गिरोट के कक्ष में प्रवेश किया।
कीमोन को देख गिरोट की आँखों में आश्चर्य के भाव उभर आये।
“क्या हुआ कीमोन? इतनी सुबह-सुबह आने का कोई विशेष कारण है क्या?” गिरोट ने कीमोन से पूछा।
“महाराज, गुप्तचरों से समाचार मिला है, कि एंड्रोवर्स आकाशगंगा के, फेरोना ग्रह के राजा एलान्का को, आपके नये अविष्कार ‘समयचक्र' का पता लग गया है और वह किसी भी कीमत पर हमसे यह समयचक्र छीनना चाहता है।” कीमोन ने गंभीर भाव से कहा।
"एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोग?" गिरोट ने आश्चर्य से कहा- “उनके पास तो स्वयं एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जाने की शक्ति है, फिर वह हमारे समयचक्र में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?"
“वह अपनी शक्तियों से 2 ग्रहों के बीच द्वार बना सकते हैं महाराज, पर वह आकाशगंगा की अनन्त गहराइयों में, एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जा सकते और ना ही समय को रोक और चला सकते हैं, इसी लिये उन्हें आपका समयचक्र चाहिये महाराज।” कीमोन ने कहा।
"पर समयचक्र के प्रयोग को तो हमने बहुत ही गुप्त रखा था, फिर उन्हें इस समयचक्र की जानकारी कैसे हुई?” गिरोट के चेहरे पर अब चिंता के भाव उभर आये।
“जिस प्रकार हमारे गुप्तचर हर स्थान पर हैं, मुझे लगता है कि उनके गुप्तचर भी हमारे ग्रह पर होंगे? उन्हीं के माध्यम से एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोगों को हमारे समयचक्र का पता चला होगा। इसलिये महाराज से निवेदन है, कि वह सदैव अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें। मैं तब तक सेना को भी एलर्ट पर डाल देता हूं।" इतना कहकर कीमोन शांत हो गया और गिरोट के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
गिरोट ने इशारे से कीमोन को जाने का आदेश दिया और स्वयं कक्ष में रखी एक कुर्सी पर बैठकर समयचक्र के बारे में सोचने लगे।
“समयचक्र का निर्माण तो पूरा हो गया है, पर इसे किसी भी प्रकार से सुरक्षित रखना होगा? पर कैसे? इतने बड़े ब्लैकून को हम किसी की नजरों से छिपा भी नहीं सकते.... क्या करूं?.....हे देवता नोवान हमारी मदद करो।” गिरोट मन ही मन अपने देवता को याद करने लगा।
तभी अचानक वह खुशी से उछल पड़ा- “अरे वाह मुझे पहले 'ज़ेप्टो नाइजर' का ध्यान क्यों नहीं आया? ...हां ...उससे मेरी समस्या हल हो सकती है।"
अभी गिरोट यह सब सोच ही रहा था कि तभी 5 वर्षीय नन्हें युवराज ‘ओरस' ने कक्ष में प्रवेश किया।
“आप क्या कर रहे हैं पिताजी?" ओरस ने अपने छोटे से यान नुमा खिलौने को हाथों से घुमाते हुए कहा।
"हम तो अपने नये प्रयोग के बारे में सोच रहे थे युवराज।” गिरोट ने मुस्कुराकर अपनी बांहें फैलाते हुए कहा - “आप बताओ, आप अपने इस नन्हें से यान से, कहां की सैर कर रहे हो?"
गिरोट को बांहें फैलाते देख, नन्हा ओरस दौड़कर उनकी बांहों में समा गया।
“मैं तो अपने यान से आकाशगंगा के, दूसरे छोर की सैर कर रहा था पिताजी।" ओरस ने अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हुए कहा- “पर मुझे ये बताइये कि आपका यह नया प्रयोग क्या है? जिसके बारे में आप मुझसे भी ज्यादा सोचते हो।" ओरस की बात सुन गिरोट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“अभी तुम उस प्रयोग के बारे में जानने के लिये बहुत छोटे हो युवराज, समय आने पर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा।” गिरोट ने ओरस को फुसलाते हुए कहा।
“मैं इतना भी छोटा नहीं हूं। मैं आकाशगंगा की सारी जानकारी रखता हूं। आप चाहो तो मेरे ज्ञान का परीक्षण कर सकते हो?” ओरस ने किसी ज्ञानी की तरह ज्ञान देते हुए कहा।
“अच्छा, तो बताओ कि नेबुला क्या होता है?" गिरोट सच में ही ओरस की परीक्षा लेने लगा। वैसे गिरोट को पता था, कि ओरस इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेगा।
"जब कोई सितारा अपनी आयु का पूरा करने के बाद फटकर कणों में बिखर जाता है, तो उससे बने गैस और धूल के बादलों को नेबुला कहते हैं।” ओरस ने अपना यान उड़ाते हुए कहा।
ओरस का उत्तर सुन गिरोट हैरान रह गया क्यों कि ओरस ने शत-प्रतिशत सही कहा था।
“अच्छा अब बताओ कि सुपरनोआ क्या होता है?" ओरस ने अपने प्रश्न को थोड़ा और कठिन कर दिया।
“जब नेबुला के बहुत से कण आपस में संकुचित हो कर मिलते हैं, तो वह एक सितारे यानि की सूर्य का निर्माण करते हैं। वह सितारा 75 प्रतिशत तक हाइड्रोजन से बना होता है। यानि की हाइड्रोजन उस सूर्य में ईधन का काम करता है। धीरे-धीरे जब उस सितारे का पूरा हाईड्रोजन खत्म होकर, हीलीयम में परिवर्तित हो जाता है, इस स्थिति में वह सितारा अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण को संभाल नहीं पाता और एक महा विस्फोट के साथ फट जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते हैं।” ओरस ने भोलेपन से कहा।
गिरोट अब आश्चर्य से ओरस की ओर देख रहा था।
“क्या तुम 'न्यूट्रान स्टार' और 'ब्लैक होल' के बारे में भी जानते हो?” गिरोट ने अब क्लास 1 के बच्चे से ग्रेजुएशन का प्रश्न पूछ लिया था।
"जब सुपरनो वा विस्फोट होता है, तो सितारे का सबसे बड़ा टुकड़ा, जो सबसे ज्यादा घनत्व लिये होता है, वह एक गोलाकार आकृति लेकर एक न्यूट्रान स्टार में परिवर्तित हो जाता है। यह न्यूट्रान स्टार जब संकुचन की अधिकतक सीमा तक पहुंच जाता है, तो यह छोटा होकर अदृश्य हो जाता है। इसी अदृश्य पिंड को ब्लैक होल कहते हैं।" इस प्रकार क्लास 1 के बच्चे ने ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर, अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।
“ये सब ज्ञान तुम्हें किसने दिया?” गिरोट ने आश्चर्य से ओरस से पूछा।
ओरस ने मुस्कुराते हुए, कक्ष में रखी एक प्रतिमा की ओर इशारा किया। वह प्रतिमा डेल्फानो के देवता नोवान की थी।
ओरस का इशारा देख गिरोट और भी ज्यादा आश्चर्यचकित हो गया। उसने ओरस को अपने गले से लगा लिया।
“चलो ओरस, आज मैं तुम्हें अपने उस नये प्रयोग को दिखाता हूं।” गिरोट ने खड़े होते हुए कहा।
"पर आप तो कह रहे थे कि मैं अभी छोटा हं और मैं उस प्रयोग को समझ नहीं पाऊंगा?" ओरस ने अपनी भोली जुबान में कहा।
“मैं गलत था युवराज, आप नहीं छोटे हो, मेरी मानसिकता छोटी थी, जो मैं यह सोच रहा था कि आपको कुछ समझ नहीं आयेगा? आओ, अब चलते हैं ब्लैकून की ओर, जहां मेरा प्रयोग बेसब्री से आपका इंतजार कर रहा है।
यह कहकर गिरोट ने नन्हें वैज्ञानिक को अपनी गोद में उठाया और हवा में उड़ने वाले एक यान में बैठकर ब्लैकून के पास जा पहुंचा।
ब्लैकून लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली, एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसका आकार बिल्कुल गोल और काले रंग का था। दूर से देखने पर वह एक बड़े से काले मोती के समान प्रतीत हो रही थी। गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के पास पहुंच गया।
“ब्लैकून में प्रवेश करने का प्रवेश द्वार तो है ही नहीं पिताजी। फिर हम इसमें प्रवेश कैसे करेंगे?" ओरस ने कहा।
“ब्लैकून का पूरा नियंत्रण अंदर मौजूद एक कंप्यूटर 'जेनिक्स' करती है। वह हमें देखते ही स्वयं द्वार खोल देगी। तभी ब्लैकून में एक स्थान पर एक द्वार खुलता दिखाई देने लगा।
“क्या यह मुझे देखकर भी द्वार खोल देगी?” ओरस ने अपनी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।
“हां पुत्र, ज़ेनिक्स में डेल्फानों के राजवंश के, किसी भी व्यक्ति के शरीर को सेंस करने की अद्भुत क्षमता है।" ओरस ने कहा।
गिरोट और ओरस उस द्वार से अंदर प्रवेश कर गये। ब्लैकून में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था, पूरा सिस्टम ज़ेनिक्स के हवाले था।
अंदर प्रवेश करते ही ओरस को पूरा ब्लैकून, किसी एक छोटे ब्रह्मांड के समान प्रतीत हुआ। चारो ओर निहारिकाएं (नेबुला) फैली हुई थी, जिसके आसपास अनेकों ग्रह घूम रहे थे।
चूंकि ओरस पहली बार ब्लैकून में आया था, इसलिये वह आश्चर्य से सभी चीजों को निहार रहा था।
“यह कैसी प्रयोगशाला है पिताजी? यहां पर कोई मशीन तो दिखाई ही नहीं दे रही है?” ओरस ने कहा।
“ब्लैकून कुल 4 भागों में बंटा है पुत्र, कुछ देर प्रतीक्षा करो, अभी तुम्हें सबकुछ पता चल जायेगा।...यह तो अभी ब्लैकून का प्रथम भाग है, इस भाग में हम तारों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं।" गिरोट ने कहा।
उस भाग को पार करने के बाद, ओरस एक ऐसे भाग में पहुंचा, जहां पर देवता नोवान की एक बड़ी सी प्रतिमा लगी थी। देवता नोवान के कंधे पर एक फीनीक्स पक्षी बैठा था। उस भाग में और कुछ भी नहीं था।
यह ब्लैकून का दूसरा भाग था। देवता की प्रतिमा के नीचे, सामने की ओर एक गोल काँच का पारदर्शी केबिन बना था। उसे देख ओरस ने पूछ ही लिया।
हनुका के रक्त भैरवी की डिबिया ले जाने के बाद, नीलाभ फिर से शि…वलिंग के सामने बने असंख्य त्रिशूलों पर जाकर आसन की मुद्रा में बैठ गया। कुछ देर तक उसने माया के बारे में सोचा और फिर अपनी साधना में लीन हो गया।
नीलाभ को पता था कि उसकी साधना का यह अंतिम चरण है, इसके बाद देव को उन्हें वरदान देने आना ही होगा।
कुछ घंटों के बाद नीलाभ ने अपने मंत्रोच्चारण की आखिरी आहुति को, देव को समर्पित कर दिया। अब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलकर, अपने चारो ओर देखा और फिर खड़े होकर उन त्रिशूलों के ऊपर ही तांडव करना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में नीलाभ के पैरों से निकलता खून, त्रिशूल के मध्य से होकर शिवमलिंग की ओर बढ़ा, पर इससे पहले कि अंजाने में वह खून शिवमलिंग तक पहुंचता, वातावरण में तेज डमरु की आवाज सुनाई दी, जो कि देव के प्रकट होने का द्योतक था।
हवा में एक ऊर्जा द्वार उत्पन्न हुआ, जिससे निकलकर देव, नीलाभ के समक्ष आ खड़े हुए।
महानदेव ने नीलाभ के पैरों से रिसते खून को देखा, देव के देखते ही खून का रिसाव बंद हो गया। नीलाभ ने त्रिशूल से उतरकर देव के सम्मुख दंडवत प्रणाम किया।
देव ने अपना वरदहस्त आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।
“बताओ नीलाभ, तुम इस प्रकार की कठिन साधना क्यों कर रहे हो? तुम्हें भला किस चीज की कामना है? देव ने नीलाभ से पूछा।
"आप तो अंतर्यामी है देव।” नीलाभ हाथ जोड़कर देव के सामने घुटनों के बल बैठ गया- “आप तो जानते हैं, कि मुझे मनुष्यों के कल्याण के लिये, कुछ पलों के लिये आपकी कुछ शक्तियों का वरण करना है। इसलिये हे महादेव, मुझे ये वरदान दीजिये कि मैं कुछ विषम परिस्थितियों के समय, कुछ क्षणों के लिये, आपकी कुछ शक्तियों को धारण कर सकूँ। मैंने ब्र…देव के कहे अनुसार, आपकी शक्तियों को धारण करने के लिये, अपना शरीर भी उन शक्तियों के लायक कर लिया है।'
यह सुनकर म..देव ने आगे बढ़कर नीलाभ का हाथ पकड़ लिया। इससे पहले कि नीलाभ कुछ भी समझ पाता, उसे अपना शरीर ब्रह्मांड के करोड़ों आकाशगंगाओं के मध्य दिखाई दिया।
चारो ओर अरबों-खरबों अलग-अलग रंग के सितारे फैले हुए थे। करोड़ों आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर घूम रहीं थीं। ब्लैक होल कुछ आकाशगंगाओं को अपने अंदर समाहित कर रहे थे।
कुछ न्यूट्रान स्टार अपने ही ताप से, एक धमाके के साथ फट रहे थे। कुछ आकाशगंगाएं आपस में विलय होकर, नयी आकाशगंगा का निर्माण कर रहीं थीं।
कुल मिलाकर उस स्थान पर मनुष्य तो क्या, किसी भी आकाशगंगा का अस्तित्व भी नगण्य दिखाई दे रहा था। चारो ओर अनंत ब्रह्मांड, अनवरत समय के साथ गतिमान था।
नीलाभ ने आज से पहले कभी भी इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था, इसलिये वह घबराकर ..देव को याद करने लगा।
तभी उस अनंत ब्रह्मांड में सितारों और आका शगंगाओं के मध्य देव का 5 मुखों वाला शरीर प्रकट हुआ।
उसमें पूर्व मुख-पीत वर्ण, पश्चिम मुख-श्वेत वर्ण, उत्तर मुख-कृष्ण वर्ण, दक्षिण मुख-नीलवर्ण और ऊर्ध्व मुख-ईशान दुग्ध के समान प्रतीत हो रहा था। नीलाभ, देव के इस दिव्य दर्शन को देख अविभूत होने लगा।
“हे देव, मैं आपके इस पंचमुखी दर्शन से, ब्रह्मांड के सारे कष्टों को भूल चुका हूं। अब कृपया मुझे इस दिव्य दर्शन का सार समझाइये देव?" नीलाभ ने अपने आँखों में उस अद्भुत दृश्य को भरते हुए कहा।
नीलाभ के शब्द सुन देव की आवाज वातावरण में उभरी- “नीलाभ, मैं तुम्हें ईश्वर का सार समझाने की चेष्टा कर रहा हूं। ईश्वर अनंत और निराकार हैं, तुम जिस रुप में उन्हें देखने की इच्छा करोगे, वो तुम्हें उस रुप में दर्शन देंगे। तुमने हमसे हमारी शक्तियों का वरण करने का वरदान मांगा, इसलिये ही हमने तुम्हें इस पंचमुख से दर्शन दिये। हम तुम्हें इस पंचमुख के माध्यम से बताना चाहते हैं, कि हम स्वयं अपने पंचभूत की शक्तियों से निर्मित हैं। अब अगर हम तुम्हें यह वरदान दे भी दें, तब भी तुम हमारे, इन पंचरुपों के आशीर्वाद के बिना, हमारी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाओगे। तो बताओ नीलाभ क्या तुम इन पंचभूतों से आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक हो?....परंतु ध्यान रखना, इन्हें प्रसन्न करना इतना भी आसान नहीं होगा।"
“अवश्य ..देव, आप मुझे वरदान प्रदान करिये। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि बिना इन पंचभूतों के आशीर्वाद के, मैं आपकी उन शक्तियों का वरण नहीं करूंगा।” नीलाभ ने म..देव को विश्वास दिलाते हुए कहा।
“तथास्तु। तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” यह कहकर महादेव अपने स्थान से अंतर्ध्यान हो गये।
तभी रोशनी का एक तेज झमाका हुआ, जिसकी वजह से नीलाभ की आँखें बंद हो गईं। परंतु जब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने अपने आपको रुद्रलोक के उसी मं..दिर के बाहर पाया, जहां रहकर वह इतने समय से तपस्या कर रहा था।
इस समय नीलाभ के चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता के भाव थे। अब नीलाभ देव के पहले रुप को प्रसन्न करने के लिये चल पड़ा, जो कि वीरभद्र थे और वह रुद्रलोक के ही किसी अज्ञात स्थान पर थे।
चैपटर-3
ब्लैकून: (20 वर्ष पहले.......डेल्फानो ग्रह, एरियन आकाशगंगा)
पृथ्वी से 12 लाख प्रकाशवर्ष दूर, एरियन आकाशगंगा में एक बहुत ही खूबसूरत ग्रह है, जिसका नाम है- डेल्फानो।
वैसे तो इस ग्रह का इतिहास मात्र 5000 वर्ष ही पुराना है, परंतु अपने इस छोटे से इतिहास में भी, डेल्फानो ने अनेकों अभूतपूर्व अविष्कार करके, पूरी एरियन आकाशगंगा को चकित करके रखा था।
कहने को तो यह ग्रह छोटा है, परंतु डेल्फानो ग्रह विज्ञान की तकनीक के हिसाब से, बहुत विकसित ग्रह माना जाता रहा है। कहते हैं कि इस ग्रह के लोगों का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है।
यहां के वैज्ञानिक नित नये शोध करते रहते हैं। यहां के लोग देखने में बिल्कुल पृथ्वी वासियों के जैसे ही हैं, सिर्फ उनकी औसत आयु 10,00 वर्ष की होती है।
डेल्फानो एक शांति प्रिय ग्रह होने की वजह से, इतना आधुनिक तकनीक होने के बाद भी, हथियारों का निर्माण सबसे कम मात्रा में करता है।
डेल्फानो के राजा गिरोट स्वयं भी एक निपुण वैज्ञानिक हैं, जो कि अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी प्रयोगशाला ‘ब्लैकून' को देते हैं।
कहते हैं कि गिरोट ने ही देवता नोवान का आशीर्वाद प्राप्त कर, 5,000 वर्ष पहले इस ग्रह को बसाया था। देवता नोवान के ही आशीर्वाद से गिरोट पिछले 5,000 वर्षों से वैसे ही जवान है, जैसा कि इस ग्रह के निर्माण के समय हुआ करता था।
गिरोट ने अपनी पूरी जिंदगी डेल्फानो को विकसित करने में लगा दी थी। डेल्फानो को विकसित करने में वह इतना पागल हो गया कि उसे कभी अपने विवाह का ख्याल भी नहीं आया।
आखिरकार एक रात उसे डेल्फानों के वारिस की चिंता हुई, इसलिये हजारों वर्षों के बाद गिरोट ने अपने ग्रह की ही एक साधारण सी लड़की से विवाह कर लिया।
विवाह के उपरांत, युवराज ओरस को जन्म देते हुए, गिरोट की पत्नि का स्वर्गवास हो गया। अब गिरोट के पास अपने पुत्र युवराज ओरस के सिवा कुछ भी नहीं था।
सुबह का समय था, डेल्फानो के दोनों सूर्य उदय हो चुके थे। सूर्य की पीली किरणें चारो ओर फैल गईं थीं।
इस समय गिरोट अपने महल से ब्लैकून के लिये निकलने ही वाला था, कि तभी 'कमांडर कीमोन' ने गिरोट के कक्ष में प्रवेश किया।
कीमोन को देख गिरोट की आँखों में आश्चर्य के भाव उभर आये।
“क्या हुआ कीमोन? इतनी सुबह-सुबह आने का कोई विशेष कारण है क्या?” गिरोट ने कीमोन से पूछा।
“महाराज, गुप्तचरों से समाचार मिला है, कि एंड्रोवर्स आकाशगंगा के, फेरोना ग्रह के राजा एलान्का को, आपके नये अविष्कार ‘समयचक्र' का पता लग गया है और वह किसी भी कीमत पर हमसे यह समयचक्र छीनना चाहता है।” कीमोन ने गंभीर भाव से कहा।
"एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोग?" गिरोट ने आश्चर्य से कहा- “उनके पास तो स्वयं एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जाने की शक्ति है, फिर वह हमारे समयचक्र में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?"
“वह अपनी शक्तियों से 2 ग्रहों के बीच द्वार बना सकते हैं महाराज, पर वह आकाशगंगा की अनन्त गहराइयों में, एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जा सकते और ना ही समय को रोक और चला सकते हैं, इसी लिये उन्हें आपका समयचक्र चाहिये महाराज।” कीमोन ने कहा।
"पर समयचक्र के प्रयोग को तो हमने बहुत ही गुप्त रखा था, फिर उन्हें इस समयचक्र की जानकारी कैसे हुई?” गिरोट के चेहरे पर अब चिंता के भाव उभर आये।
“जिस प्रकार हमारे गुप्तचर हर स्थान पर हैं, मुझे लगता है कि उनके गुप्तचर भी हमारे ग्रह पर होंगे? उन्हीं के माध्यम से एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोगों को हमारे समयचक्र का पता चला होगा। इसलिये महाराज से निवेदन है, कि वह सदैव अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें। मैं तब तक सेना को भी एलर्ट पर डाल देता हूं।" इतना कहकर कीमोन शांत हो गया और गिरोट के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
गिरोट ने इशारे से कीमोन को जाने का आदेश दिया और स्वयं कक्ष में रखी एक कुर्सी पर बैठकर समयचक्र के बारे में सोचने लगे।
“समयचक्र का निर्माण तो पूरा हो गया है, पर इसे किसी भी प्रकार से सुरक्षित रखना होगा? पर कैसे? इतने बड़े ब्लैकून को हम किसी की नजरों से छिपा भी नहीं सकते.... क्या करूं?.....हे देवता नोवान हमारी मदद करो।” गिरोट मन ही मन अपने देवता को याद करने लगा।
तभी अचानक वह खुशी से उछल पड़ा- “अरे वाह मुझे पहले 'ज़ेप्टो नाइजर' का ध्यान क्यों नहीं आया? ...हां ...उससे मेरी समस्या हल हो सकती है।"
अभी गिरोट यह सब सोच ही रहा था कि तभी 5 वर्षीय नन्हें युवराज ‘ओरस' ने कक्ष में प्रवेश किया।
“आप क्या कर रहे हैं पिताजी?" ओरस ने अपने छोटे से यान नुमा खिलौने को हाथों से घुमाते हुए कहा।
"हम तो अपने नये प्रयोग के बारे में सोच रहे थे युवराज।” गिरोट ने मुस्कुराकर अपनी बांहें फैलाते हुए कहा - “आप बताओ, आप अपने इस नन्हें से यान से, कहां की सैर कर रहे हो?"
गिरोट को बांहें फैलाते देख, नन्हा ओरस दौड़कर उनकी बांहों में समा गया।
“मैं तो अपने यान से आकाशगंगा के, दूसरे छोर की सैर कर रहा था पिताजी।" ओरस ने अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हुए कहा- “पर मुझे ये बताइये कि आपका यह नया प्रयोग क्या है? जिसके बारे में आप मुझसे भी ज्यादा सोचते हो।" ओरस की बात सुन गिरोट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“अभी तुम उस प्रयोग के बारे में जानने के लिये बहुत छोटे हो युवराज, समय आने पर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा।” गिरोट ने ओरस को फुसलाते हुए कहा।
“मैं इतना भी छोटा नहीं हूं। मैं आकाशगंगा की सारी जानकारी रखता हूं। आप चाहो तो मेरे ज्ञान का परीक्षण कर सकते हो?” ओरस ने किसी ज्ञानी की तरह ज्ञान देते हुए कहा।
“अच्छा, तो बताओ कि नेबुला क्या होता है?" गिरोट सच में ही ओरस की परीक्षा लेने लगा। वैसे गिरोट को पता था, कि ओरस इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेगा।
"जब कोई सितारा अपनी आयु का पूरा करने के बाद फटकर कणों में बिखर जाता है, तो उससे बने गैस और धूल के बादलों को नेबुला कहते हैं।” ओरस ने अपना यान उड़ाते हुए कहा।
ओरस का उत्तर सुन गिरोट हैरान रह गया क्यों कि ओरस ने शत-प्रतिशत सही कहा था।
“अच्छा अब बताओ कि सुपरनोआ क्या होता है?" ओरस ने अपने प्रश्न को थोड़ा और कठिन कर दिया।
“जब नेबुला के बहुत से कण आपस में संकुचित हो कर मिलते हैं, तो वह एक सितारे यानि की सूर्य का निर्माण करते हैं। वह सितारा 75 प्रतिशत तक हाइड्रोजन से बना होता है। यानि की हाइड्रोजन उस सूर्य में ईधन का काम करता है। धीरे-धीरे जब उस सितारे का पूरा हाईड्रोजन खत्म होकर, हीलीयम में परिवर्तित हो जाता है, इस स्थिति में वह सितारा अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण को संभाल नहीं पाता और एक महा विस्फोट के साथ फट जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते हैं।” ओरस ने भोलेपन से कहा।
गिरोट अब आश्चर्य से ओरस की ओर देख रहा था।
“क्या तुम 'न्यूट्रान स्टार' और 'ब्लैक होल' के बारे में भी जानते हो?” गिरोट ने अब क्लास 1 के बच्चे से ग्रेजुएशन का प्रश्न पूछ लिया था।
"जब सुपरनो वा विस्फोट होता है, तो सितारे का सबसे बड़ा टुकड़ा, जो सबसे ज्यादा घनत्व लिये होता है, वह एक गोलाकार आकृति लेकर एक न्यूट्रान स्टार में परिवर्तित हो जाता है। यह न्यूट्रान स्टार जब संकुचन की अधिकतक सीमा तक पहुंच जाता है, तो यह छोटा होकर अदृश्य हो जाता है। इसी अदृश्य पिंड को ब्लैक होल कहते हैं।" इस प्रकार क्लास 1 के बच्चे ने ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर, अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।
“ये सब ज्ञान तुम्हें किसने दिया?” गिरोट ने आश्चर्य से ओरस से पूछा।
ओरस ने मुस्कुराते हुए, कक्ष में रखी एक प्रतिमा की ओर इशारा किया। वह प्रतिमा डेल्फानो के देवता नोवान की थी।
ओरस का इशारा देख गिरोट और भी ज्यादा आश्चर्यचकित हो गया। उसने ओरस को अपने गले से लगा लिया।
“चलो ओरस, आज मैं तुम्हें अपने उस नये प्रयोग को दिखाता हूं।” गिरोट ने खड़े होते हुए कहा।
"पर आप तो कह रहे थे कि मैं अभी छोटा हं और मैं उस प्रयोग को समझ नहीं पाऊंगा?" ओरस ने अपनी भोली जुबान में कहा।
“मैं गलत था युवराज, आप नहीं छोटे हो, मेरी मानसिकता छोटी थी, जो मैं यह सोच रहा था कि आपको कुछ समझ नहीं आयेगा? आओ, अब चलते हैं ब्लैकून की ओर, जहां मेरा प्रयोग बेसब्री से आपका इंतजार कर रहा है।
यह कहकर गिरोट ने नन्हें वैज्ञानिक को अपनी गोद में उठाया और हवा में उड़ने वाले एक यान में बैठकर ब्लैकून के पास जा पहुंचा।
ब्लैकून लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली, एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसका आकार बिल्कुल गोल और काले रंग का था। दूर से देखने पर वह एक बड़े से काले मोती के समान प्रतीत हो रही थी। गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के पास पहुंच गया।
“ब्लैकून में प्रवेश करने का प्रवेश द्वार तो है ही नहीं पिताजी। फिर हम इसमें प्रवेश कैसे करेंगे?" ओरस ने कहा।
“ब्लैकून का पूरा नियंत्रण अंदर मौजूद एक कंप्यूटर 'जेनिक्स' करती है। वह हमें देखते ही स्वयं द्वार खोल देगी। तभी ब्लैकून में एक स्थान पर एक द्वार खुलता दिखाई देने लगा।
“क्या यह मुझे देखकर भी द्वार खोल देगी?” ओरस ने अपनी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।
“हां पुत्र, ज़ेनिक्स में डेल्फानों के राजवंश के, किसी भी व्यक्ति के शरीर को सेंस करने की अद्भुत क्षमता है।" ओरस ने कहा।
गिरोट और ओरस उस द्वार से अंदर प्रवेश कर गये। ब्लैकून में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था, पूरा सिस्टम ज़ेनिक्स के हवाले था।
अंदर प्रवेश करते ही ओरस को पूरा ब्लैकून, किसी एक छोटे ब्रह्मांड के समान प्रतीत हुआ। चारो ओर निहारिकाएं (नेबुला) फैली हुई थी, जिसके आसपास अनेकों ग्रह घूम रहे थे।
चूंकि ओरस पहली बार ब्लैकून में आया था, इसलिये वह आश्चर्य से सभी चीजों को निहार रहा था।
“यह कैसी प्रयोगशाला है पिताजी? यहां पर कोई मशीन तो दिखाई ही नहीं दे रही है?” ओरस ने कहा।
“ब्लैकून कुल 4 भागों में बंटा है पुत्र, कुछ देर प्रतीक्षा करो, अभी तुम्हें सबकुछ पता चल जायेगा।...यह तो अभी ब्लैकून का प्रथम भाग है, इस भाग में हम तारों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं।" गिरोट ने कहा।
उस भाग को पार करने के बाद, ओरस एक ऐसे भाग में पहुंचा, जहां पर देवता नोवान की एक बड़ी सी प्रतिमा लगी थी। देवता नोवान के कंधे पर एक फीनीक्स पक्षी बैठा था। उस भाग में और कुछ भी नहीं था।
यह ब्लैकून का दूसरा भाग था। देवता की प्रतिमा के नीचे, सामने की ओर एक गोल काँच का पारदर्शी केबिन बना था। उसे देख ओरस ने पूछ ही लिया।
हनुका के रक्त भैरवी की डिबिया ले जाने के बाद, नीलाभ फिर से शि…वलिंग के सामने बने असंख्य त्रिशूलों पर जाकर आसन की मुद्रा में बैठ गया। कुछ देर तक उसने माया के बारे में सोचा और फिर अपनी साधना में लीन हो गया।
नीलाभ को पता था कि उसकी साधना का यह अंतिम चरण है, इसके बाद देव को उन्हें वरदान देने आना ही होगा।
कुछ घंटों के बाद नीलाभ ने अपने मंत्रोच्चारण की आखिरी आहुति को, देव को समर्पित कर दिया। अब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलकर, अपने चारो ओर देखा और फिर खड़े होकर उन त्रिशूलों के ऊपर ही तांडव करना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में नीलाभ के पैरों से निकलता खून, त्रिशूल के मध्य से होकर शिवमलिंग की ओर बढ़ा, पर इससे पहले कि अंजाने में वह खून शिवमलिंग तक पहुंचता, वातावरण में तेज डमरु की आवाज सुनाई दी, जो कि देव के प्रकट होने का द्योतक था।
हवा में एक ऊर्जा द्वार उत्पन्न हुआ, जिससे निकलकर देव, नीलाभ के समक्ष आ खड़े हुए।
महानदेव ने नीलाभ के पैरों से रिसते खून को देखा, देव के देखते ही खून का रिसाव बंद हो गया। नीलाभ ने त्रिशूल से उतरकर देव के सम्मुख दंडवत प्रणाम किया।
देव ने अपना वरदहस्त आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।
“बताओ नीलाभ, तुम इस प्रकार की कठिन साधना क्यों कर रहे हो? तुम्हें भला किस चीज की कामना है? देव ने नीलाभ से पूछा।
"आप तो अंतर्यामी है देव।” नीलाभ हाथ जोड़कर देव के सामने घुटनों के बल बैठ गया- “आप तो जानते हैं, कि मुझे मनुष्यों के कल्याण के लिये, कुछ पलों के लिये आपकी कुछ शक्तियों का वरण करना है। इसलिये हे महादेव, मुझे ये वरदान दीजिये कि मैं कुछ विषम परिस्थितियों के समय, कुछ क्षणों के लिये, आपकी कुछ शक्तियों को धारण कर सकूँ। मैंने ब्र…देव के कहे अनुसार, आपकी शक्तियों को धारण करने के लिये, अपना शरीर भी उन शक्तियों के लायक कर लिया है।'
यह सुनकर म..देव ने आगे बढ़कर नीलाभ का हाथ पकड़ लिया। इससे पहले कि नीलाभ कुछ भी समझ पाता, उसे अपना शरीर ब्रह्मांड के करोड़ों आकाशगंगाओं के मध्य दिखाई दिया।
चारो ओर अरबों-खरबों अलग-अलग रंग के सितारे फैले हुए थे। करोड़ों आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर घूम रहीं थीं। ब्लैक होल कुछ आकाशगंगाओं को अपने अंदर समाहित कर रहे थे।
कुछ न्यूट्रान स्टार अपने ही ताप से, एक धमाके के साथ फट रहे थे। कुछ आकाशगंगाएं आपस में विलय होकर, नयी आकाशगंगा का निर्माण कर रहीं थीं।
कुल मिलाकर उस स्थान पर मनुष्य तो क्या, किसी भी आकाशगंगा का अस्तित्व भी नगण्य दिखाई दे रहा था। चारो ओर अनंत ब्रह्मांड, अनवरत समय के साथ गतिमान था।
नीलाभ ने आज से पहले कभी भी इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था, इसलिये वह घबराकर ..देव को याद करने लगा।
तभी उस अनंत ब्रह्मांड में सितारों और आका शगंगाओं के मध्य देव का 5 मुखों वाला शरीर प्रकट हुआ।
उसमें पूर्व मुख-पीत वर्ण, पश्चिम मुख-श्वेत वर्ण, उत्तर मुख-कृष्ण वर्ण, दक्षिण मुख-नीलवर्ण और ऊर्ध्व मुख-ईशान दुग्ध के समान प्रतीत हो रहा था। नीलाभ, देव के इस दिव्य दर्शन को देख अविभूत होने लगा।
“हे देव, मैं आपके इस पंचमुखी दर्शन से, ब्रह्मांड के सारे कष्टों को भूल चुका हूं। अब कृपया मुझे इस दिव्य दर्शन का सार समझाइये देव?" नीलाभ ने अपने आँखों में उस अद्भुत दृश्य को भरते हुए कहा।
नीलाभ के शब्द सुन देव की आवाज वातावरण में उभरी- “नीलाभ, मैं तुम्हें ईश्वर का सार समझाने की चेष्टा कर रहा हूं। ईश्वर अनंत और निराकार हैं, तुम जिस रुप में उन्हें देखने की इच्छा करोगे, वो तुम्हें उस रुप में दर्शन देंगे। तुमने हमसे हमारी शक्तियों का वरण करने का वरदान मांगा, इसलिये ही हमने तुम्हें इस पंचमुख से दर्शन दिये। हम तुम्हें इस पंचमुख के माध्यम से बताना चाहते हैं, कि हम स्वयं अपने पंचभूत की शक्तियों से निर्मित हैं। अब अगर हम तुम्हें यह वरदान दे भी दें, तब भी तुम हमारे, इन पंचरुपों के आशीर्वाद के बिना, हमारी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाओगे। तो बताओ नीलाभ क्या तुम इन पंचभूतों से आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक हो?....परंतु ध्यान रखना, इन्हें प्रसन्न करना इतना भी आसान नहीं होगा।"
“अवश्य ..देव, आप मुझे वरदान प्रदान करिये। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि बिना इन पंचभूतों के आशीर्वाद के, मैं आपकी उन शक्तियों का वरण नहीं करूंगा।” नीलाभ ने म..देव को विश्वास दिलाते हुए कहा।
“तथास्तु। तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” यह कहकर महादेव अपने स्थान से अंतर्ध्यान हो गये।
तभी रोशनी का एक तेज झमाका हुआ, जिसकी वजह से नीलाभ की आँखें बंद हो गईं। परंतु जब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने अपने आपको रुद्रलोक के उसी मं..दिर के बाहर पाया, जहां रहकर वह इतने समय से तपस्या कर रहा था।
इस समय नीलाभ के चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता के भाव थे। अब नीलाभ देव के पहले रुप को प्रसन्न करने के लिये चल पड़ा, जो कि वीरभद्र थे और वह रुद्रलोक के ही किसी अज्ञात स्थान पर थे।
चैपटर-3
ब्लैकून: (20 वर्ष पहले.......डेल्फानो ग्रह, एरियन आकाशगंगा)
पृथ्वी से 12 लाख प्रकाशवर्ष दूर, एरियन आकाशगंगा में एक बहुत ही खूबसूरत ग्रह है, जिसका नाम है- डेल्फानो।
वैसे तो इस ग्रह का इतिहास मात्र 5000 वर्ष ही पुराना है, परंतु अपने इस छोटे से इतिहास में भी, डेल्फानो ने अनेकों अभूतपूर्व अविष्कार करके, पूरी एरियन आकाशगंगा को चकित करके रखा था।
कहने को तो यह ग्रह छोटा है, परंतु डेल्फानो ग्रह विज्ञान की तकनीक के हिसाब से, बहुत विकसित ग्रह माना जाता रहा है। कहते हैं कि इस ग्रह के लोगों का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है।
यहां के वैज्ञानिक नित नये शोध करते रहते हैं। यहां के लोग देखने में बिल्कुल पृथ्वी वासियों के जैसे ही हैं, सिर्फ उनकी औसत आयु 10,00 वर्ष की होती है।
डेल्फानो एक शांति प्रिय ग्रह होने की वजह से, इतना आधुनिक तकनीक होने के बाद भी, हथियारों का निर्माण सबसे कम मात्रा में करता है।
डेल्फानो के राजा गिरोट स्वयं भी एक निपुण वैज्ञानिक हैं, जो कि अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी प्रयोगशाला ‘ब्लैकून' को देते हैं।
कहते हैं कि गिरोट ने ही देवता नोवान का आशीर्वाद प्राप्त कर, 5,000 वर्ष पहले इस ग्रह को बसाया था। देवता नोवान के ही आशीर्वाद से गिरोट पिछले 5,000 वर्षों से वैसे ही जवान है, जैसा कि इस ग्रह के निर्माण के समय हुआ करता था।
गिरोट ने अपनी पूरी जिंदगी डेल्फानो को विकसित करने में लगा दी थी। डेल्फानो को विकसित करने में वह इतना पागल हो गया कि उसे कभी अपने विवाह का ख्याल भी नहीं आया।
आखिरकार एक रात उसे डेल्फानों के वारिस की चिंता हुई, इसलिये हजारों वर्षों के बाद गिरोट ने अपने ग्रह की ही एक साधारण सी लड़की से विवाह कर लिया।
विवाह के उपरांत, युवराज ओरस को जन्म देते हुए, गिरोट की पत्नि का स्वर्गवास हो गया। अब गिरोट के पास अपने पुत्र युवराज ओरस के सिवा कुछ भी नहीं था।
सुबह का समय था, डेल्फानो के दोनों सूर्य उदय हो चुके थे। सूर्य की पीली किरणें चारो ओर फैल गईं थीं।
इस समय गिरोट अपने महल से ब्लैकून के लिये निकलने ही वाला था, कि तभी 'कमांडर कीमोन' ने गिरोट के कक्ष में प्रवेश किया।
कीमोन को देख गिरोट की आँखों में आश्चर्य के भाव उभर आये।
“क्या हुआ कीमोन? इतनी सुबह-सुबह आने का कोई विशेष कारण है क्या?” गिरोट ने कीमोन से पूछा।
“महाराज, गुप्तचरों से समाचार मिला है, कि एंड्रोवर्स आकाशगंगा के, फेरोना ग्रह के राजा एलान्का को, आपके नये अविष्कार ‘समयचक्र' का पता लग गया है और वह किसी भी कीमत पर हमसे यह समयचक्र छीनना चाहता है।” कीमोन ने गंभीर भाव से कहा।
"एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोग?" गिरोट ने आश्चर्य से कहा- “उनके पास तो स्वयं एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जाने की शक्ति है, फिर वह हमारे समयचक्र में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?"
“वह अपनी शक्तियों से 2 ग्रहों के बीच द्वार बना सकते हैं महाराज, पर वह आकाशगंगा की अनन्त गहराइयों में, एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जा सकते और ना ही समय को रोक और चला सकते हैं, इसी लिये उन्हें आपका समयचक्र चाहिये महाराज।” कीमोन ने कहा।
"पर समयचक्र के प्रयोग को तो हमने बहुत ही गुप्त रखा था, फिर उन्हें इस समयचक्र की जानकारी कैसे हुई?” गिरोट के चेहरे पर अब चिंता के भाव उभर आये।
“जिस प्रकार हमारे गुप्तचर हर स्थान पर हैं, मुझे लगता है कि उनके गुप्तचर भी हमारे ग्रह पर होंगे? उन्हीं के माध्यम से एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोगों को हमारे समयचक्र का पता चला होगा। इसलिये महाराज से निवेदन है, कि वह सदैव अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें। मैं तब तक सेना को भी एलर्ट पर डाल देता हूं।" इतना कहकर कीमोन शांत हो गया और गिरोट के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
गिरोट ने इशारे से कीमोन को जाने का आदेश दिया और स्वयं कक्ष में रखी एक कुर्सी पर बैठकर समयचक्र के बारे में सोचने लगे।
“समयचक्र का निर्माण तो पूरा हो गया है, पर इसे किसी भी प्रकार से सुरक्षित रखना होगा? पर कैसे? इतने बड़े ब्लैकून को हम किसी की नजरों से छिपा भी नहीं सकते.... क्या करूं?.....हे देवता नोवान हमारी मदद करो।” गिरोट मन ही मन अपने देवता को याद करने लगा।
तभी अचानक वह खुशी से उछल पड़ा- “अरे वाह मुझे पहले 'ज़ेप्टो नाइजर' का ध्यान क्यों नहीं आया? ...हां ...उससे मेरी समस्या हल हो सकती है।"
अभी गिरोट यह सब सोच ही रहा था कि तभी 5 वर्षीय नन्हें युवराज ‘ओरस' ने कक्ष में प्रवेश किया।
“आप क्या कर रहे हैं पिताजी?" ओरस ने अपने छोटे से यान नुमा खिलौने को हाथों से घुमाते हुए कहा।
"हम तो अपने नये प्रयोग के बारे में सोच रहे थे युवराज।” गिरोट ने मुस्कुराकर अपनी बांहें फैलाते हुए कहा - “आप बताओ, आप अपने इस नन्हें से यान से, कहां की सैर कर रहे हो?"
गिरोट को बांहें फैलाते देख, नन्हा ओरस दौड़कर उनकी बांहों में समा गया।
“मैं तो अपने यान से आकाशगंगा के, दूसरे छोर की सैर कर रहा था पिताजी।" ओरस ने अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हुए कहा- “पर मुझे ये बताइये कि आपका यह नया प्रयोग क्या है? जिसके बारे में आप मुझसे भी ज्यादा सोचते हो।" ओरस की बात सुन गिरोट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“अभी तुम उस प्रयोग के बारे में जानने के लिये बहुत छोटे हो युवराज, समय आने पर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा।” गिरोट ने ओरस को फुसलाते हुए कहा।
“मैं इतना भी छोटा नहीं हूं। मैं आकाशगंगा की सारी जानकारी रखता हूं। आप चाहो तो मेरे ज्ञान का परीक्षण कर सकते हो?” ओरस ने किसी ज्ञानी की तरह ज्ञान देते हुए कहा।
“अच्छा, तो बताओ कि नेबुला क्या होता है?" गिरोट सच में ही ओरस की परीक्षा लेने लगा। वैसे गिरोट को पता था, कि ओरस इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेगा।
"जब कोई सितारा अपनी आयु का पूरा करने के बाद फटकर कणों में बिखर जाता है, तो उससे बने गैस और धूल के बादलों को नेबुला कहते हैं।” ओरस ने अपना यान उड़ाते हुए कहा।
ओरस का उत्तर सुन गिरोट हैरान रह गया क्यों कि ओरस ने शत-प्रतिशत सही कहा था।
“अच्छा अब बताओ कि सुपरनोआ क्या होता है?" ओरस ने अपने प्रश्न को थोड़ा और कठिन कर दिया।
“जब नेबुला के बहुत से कण आपस में संकुचित हो कर मिलते हैं, तो वह एक सितारे यानि की सूर्य का निर्माण करते हैं। वह सितारा 75 प्रतिशत तक हाइड्रोजन से बना होता है। यानि की हाइड्रोजन उस सूर्य में ईधन का काम करता है। धीरे-धीरे जब उस सितारे का पूरा हाईड्रोजन खत्म होकर, हीलीयम में परिवर्तित हो जाता है, इस स्थिति में वह सितारा अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण को संभाल नहीं पाता और एक महा विस्फोट के साथ फट जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते हैं।” ओरस ने भोलेपन से कहा।
गिरोट अब आश्चर्य से ओरस की ओर देख रहा था।
“क्या तुम 'न्यूट्रान स्टार' और 'ब्लैक होल' के बारे में भी जानते हो?” गिरोट ने अब क्लास 1 के बच्चे से ग्रेजुएशन का प्रश्न पूछ लिया था।
"जब सुपरनो वा विस्फोट होता है, तो सितारे का सबसे बड़ा टुकड़ा, जो सबसे ज्यादा घनत्व लिये होता है, वह एक गोलाकार आकृति लेकर एक न्यूट्रान स्टार में परिवर्तित हो जाता है। यह न्यूट्रान स्टार जब संकुचन की अधिकतक सीमा तक पहुंच जाता है, तो यह छोटा होकर अदृश्य हो जाता है। इसी अदृश्य पिंड को ब्लैक होल कहते हैं।" इस प्रकार क्लास 1 के बच्चे ने ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर, अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।
“ये सब ज्ञान तुम्हें किसने दिया?” गिरोट ने आश्चर्य से ओरस से पूछा।
ओरस ने मुस्कुराते हुए, कक्ष में रखी एक प्रतिमा की ओर इशारा किया। वह प्रतिमा डेल्फानो के देवता नोवान की थी।
ओरस का इशारा देख गिरोट और भी ज्यादा आश्चर्यचकित हो गया। उसने ओरस को अपने गले से लगा लिया।
“चलो ओरस, आज मैं तुम्हें अपने उस नये प्रयोग को दिखाता हूं।” गिरोट ने खड़े होते हुए कहा।
"पर आप तो कह रहे थे कि मैं अभी छोटा हं और मैं उस प्रयोग को समझ नहीं पाऊंगा?" ओरस ने अपनी भोली जुबान में कहा।
“मैं गलत था युवराज, आप नहीं छोटे हो, मेरी मानसिकता छोटी थी, जो मैं यह सोच रहा था कि आपको कुछ समझ नहीं आयेगा? आओ, अब चलते हैं ब्लैकून की ओर, जहां मेरा प्रयोग बेसब्री से आपका इंतजार कर रहा है।
यह कहकर गिरोट ने नन्हें वैज्ञानिक को अपनी गोद में उठाया और हवा में उड़ने वाले एक यान में बैठकर ब्लैकून के पास जा पहुंचा।
ब्लैकून लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली, एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसका आकार बिल्कुल गोल और काले रंग का था। दूर से देखने पर वह एक बड़े से काले मोती के समान प्रतीत हो रही थी। गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के पास पहुंच गया।
“ब्लैकून में प्रवेश करने का प्रवेश द्वार तो है ही नहीं पिताजी। फिर हम इसमें प्रवेश कैसे करेंगे?" ओरस ने कहा।
“ब्लैकून का पूरा नियंत्रण अंदर मौजूद एक कंप्यूटर 'जेनिक्स' करती है। वह हमें देखते ही स्वयं द्वार खोल देगी। तभी ब्लैकून में एक स्थान पर एक द्वार खुलता दिखाई देने लगा।
“क्या यह मुझे देखकर भी द्वार खोल देगी?” ओरस ने अपनी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।
“हां पुत्र, ज़ेनिक्स में डेल्फानों के राजवंश के, किसी भी व्यक्ति के शरीर को सेंस करने की अद्भुत क्षमता है।" ओरस ने कहा।
गिरोट और ओरस उस द्वार से अंदर प्रवेश कर गये। ब्लैकून में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था, पूरा सिस्टम ज़ेनिक्स के हवाले था।
अंदर प्रवेश करते ही ओरस को पूरा ब्लैकून, किसी एक छोटे ब्रह्मांड के समान प्रतीत हुआ। चारो ओर निहारिकाएं (नेबुला) फैली हुई थी, जिसके आसपास अनेकों ग्रह घूम रहे थे।
चूंकि ओरस पहली बार ब्लैकून में आया था, इसलिये वह आश्चर्य से सभी चीजों को निहार रहा था।
“यह कैसी प्रयोगशाला है पिताजी? यहां पर कोई मशीन तो दिखाई ही नहीं दे रही है?” ओरस ने कहा।
“ब्लैकून कुल 4 भागों में बंटा है पुत्र, कुछ देर प्रतीक्षा करो, अभी तुम्हें सबकुछ पता चल जायेगा।...यह तो अभी ब्लैकून का प्रथम भाग है, इस भाग में हम तारों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं।" गिरोट ने कहा।
उस भाग को पार करने के बाद, ओरस एक ऐसे भाग में पहुंचा, जहां पर देवता नोवान की एक बड़ी सी प्रतिमा लगी थी। देवता नोवान के कंधे पर एक फीनीक्स पक्षी बैठा था। उस भाग में और कुछ भी नहीं था।
यह ब्लैकून का दूसरा भाग था। देवता की प्रतिमा के नीचे, सामने की ओर एक गोल काँच का पारदर्शी केबिन बना था। उसे देख ओरस ने पूछ ही लिया।
Wonderful update brother, Nebula, supernova aur black hole ke baare mein aapne achhe se explain kiya hai, pure universe mein hi hydrogen gas sabse jyada paya jata hai.
"नीली परी को कैद से आजाद कराना, सरल महसूस हो रहा है।" ऐलेक्स ने कहा- "इस तक तो पानी में तैर कर ही पहुंचा जा सकता है।'
ऐलेक्स की बात सुनकर क्रिस्टी के मुंह से हंसी छूट गई- “ब्वायफ्रेंड जी, लगता है आप कैश्वर को अभी ठीक तरह से समझे नहीं हैं? वो तिलिस्मा की कोई भी चीज को आसान नहीं करने वाला? विश्वास ना हो तो पानी में अपना पैर डालकर देख लो। अवश्य ही इस झील के पानी में कोई ना कोई जाल बिछा होगा?"
क्रिस्टी की बात सुनकर ऐलेक्स ने झील के पानी में अपना पैर डाला, परंतु ऐलेक्स का पैर पानी के अंदर नहीं गया। यह देख ऐलेक्स ने घूरकर क्रिस्टी की ओर देखा और पलटकर वापस आ गया।
"हम झील के पानी में तैरकर, अब नीली परी के पिंजरे तक नहीं पहुंच सकते।” ऐलेक्स ने मुंह बनाते हुए कहा- “मेरा पैर पानी के अंदर नहीं जा रहा है।"
ऐलेक्स की बात सुन क्रिस्टी ने अपनी जीभ निकालकर ऐलेक्स को चिढ़ा दिया।
"इसका मतलब वसंत ऋतु का यह भाग भी आसान नहीं होने वाला?” सुयश ने कहा- “चलो, अब सब लोग घूमकर देखो कि इस झील के पानी में प्रवेश कर नीली परी को कैसे छुड़ाया जा सकता है?"
सुयश की बात सुनकर सभी इधर-उधर बिखरकर कोई युक्ति ढूंढने की कोशिश करने लगे।
तभी तौफीक की नजर उस झरने की ओर गई, जिससे गिर रहे पानी से, झील बनी थी। अब तौफीक उस पहाड़ पर चढ़ने लगा।
कुछ देर में तौफीक उस झरने के उद्गम स्थल के पास पहुंच गया।
अब तौफीक की नजर उस झरने के पानी के बीच में पड़े, एक विशाल पत्थर पर थी, जिसके बीच में होने की वजह से झरने के पानी का मार्ग अवरुद्ध हो रहा था।
तौफीक ने जमीन पर बैठकर ध्यान से उस पत्थर को देखा, अब तौफीक की नजर उस बड़े पत्थर के नीचे मौजूद एक छोटे से पत्थर के टुकड़े पर गई।
यह छोटा पत्थर का टुकड़ा इस प्रकार रखा था कि यदि उसे हटा दिया जाता, तो वह बड़ा पत्थर लुढ़ककर झील के पानी में आ गिरता।
यह देखकर तौफीक ने ऊपर से ही चिल्ला कर कहा- “कैप्टेन, यहां पर एक चट्टान का टुकड़ा है, अगर हम उसे हटा दें, तो वह लुढ़ककर झील के पानी में गिरेगा। हो सकता है कि उससे झील का पानी का स्तर बढ़ जाये? और वह लिली का फूल तैरकर किनारे आ जाये?"
तौफीक की बात सुन सुयश ने तौफीक को चट्टान के हटाने का इशारा कर दिया। तौफीक ने सुयश का इशारा पाकर, बड़ी चट्टान के नीचे मौजूद छोटे पत्थर को, उसके स्थान से हटा दिया।
अब वह बड़ी चट्टान लुढ़कते हुए झील के पानी में जा गिरी। चट्टान के गिरने से, झील का बहुत सारा पानी चारो ओर फैल गया, परंतु लिली का फूल ज्यों का त्यों अपने स्थान पर अडिग तैरता रहा। यह देख तौफीक मायूस होकर पहाड़ से नीचे आ गया।
तभी जेनिथ की निगाह, तौफीक के द्वारा फेंकी गई चट्टान पर पड़ी, जो कि अब झील के पानी की सतह पर, किसी पत्ते की मानिंद तैर रहा था।
“कैप्टेन, यह पत्थर पानी के ऊपर तैर रहा है।" जेनिथ ने पत्थर की ओर इशारा करते हुए सुयश से कहा।
"इस पत्थर का रंग थोड़ा गाढ़ा है, जबकि यहां मौजूद बाकी पत्थर थोड़े हल्के रंग के हैं।” शैफाली ने कहा- “इसका मतलब इस रंग के पत्थर पानी पर तैरते हैं। अगर हमें ऐसे और भी पत्थर मिल जायें तो उन पत्थरों का पुल बनाकर हम उस पिंजरे तक पहुंच सकते हैं।"
शैफाली की बात सुनकर सभी का ध्यान अपने चारो ओर गया। कुछ ही देर में सभी को वहां मौजूद पत्थरों के बीच में 1 फुट के असंख्य गाढ़े पत्थर नजर आने लगे।
अब सभी उन पत्थरों को उठाकर झील के पानी में फेंकने लगे।
कुछ ही देर में सभी ने 2 मीटर लंबे एक पुल का निर्माण कर लिया।
“अब रुक जाओ।” सुयश ने सभी को रोकते हुए कहा- “पहले एक बार देख तो लें कि यह पुल हमारे शरीर का बोझ उठा भी सकता है कि नहीं? फिर बचे हुए पुल का निर्माण करेंगे।" सुयश की बात सभी को सही लगी।
अब क्रिस्टी ने उस पुल पर अपना पैर रखने की कोशिश की। पर क्रिस्टी के पैर के आगे बढ़ाते ही, सभी तैर रहे पत्थर अपने स्थान से इस प्रकार इधर-उधर होने लगे, जैसे कि वह क्रिस्टी का पैर ना होकर भगव..न वामन का पैर हो, और वह अपने एक पग में पृथ्वी मांगने जा रही हो।
“यह प्लान भी फेल है।” सुयश ने पत्थरों को देखते हुए कहा- “कैश्वर ने जानबूझकर हमारे आसपास ऐसी चीजें रखीं हैं, कि हम उसमें फंसकर अपना समय बर्बाद करते रहें। अब हमें कोई अन्य उपाय ही सोचना पड़ेगा?" सुयश की बात सुन सभी सोच में पड़ गये।
तभी शैफाली के चेहरे के आगे वही तितली आकर घूमने लगी, जिस पर बैठकर शैफाली ने ड्रोन को पकड़ने की कोशिश की थी।
शैफाली ने अपने हाथ से तितली को हटाने की कोशिश की, पर वह तितली शैफाली के चेहरे के सामने से नहीं हटी।
इस बार शैफाली ने घूरकर तितली को देखा, तभी उसके दिमाग में एक आइडिया आ गया। अब शैफाली बिना किसी को बताये अपने स्थान से उठी और उस तितली पर चढ़कर बैठ गई।
शैफाली के बैठते ही तितली हवा में उड़ी और शैफाली को लेकर लिली के फूल के पास पहुंच गई।
अब शैफाली ने किसी नट की भांति करतब दिखाते हुए, अपने दोनों पैर की कैंची बनाकर, उसे तितली के शरीर में फंसाया और तितली के शरीर से उल्टा लटककर हवा में झूलने लगी।
सभी मंत्रमुग्ध हो कर शैफाली के इस अद्भुत प्रयास को देख रहे थे। अब शैफाली के हाथ नीचे हवा में झूल रहे थे। तभी तितली लिली के फूल के ऊपर पहुंच गई। शैफाली की निगाह अब नीली परी के पिंजरे के ऊपर लगे हुक पर थी।
थोड़े ही प्रयास के बाद शैफाली ने उस हुक को अपने हाथ से पकड़ लिया। हुक को पकड़ते ही शैफाली ने अपने मुंह से एक अजीब सी ध्वनि निकाली।
इस ध्वनि को सुन तितली हवा में ऊपर उठ गई और इसी के साथ शैफाली सहित नीली परी का पिंजरा भी हवा में उठ गया।
पिंजरा अच्छा-खासा भारी था, पर इस समय शैफाली अपने शरीर की आंतरिक कोर का प्रयोग, मैग्ना की भांति कर रही थी इसलिये उसे कुछ खास परेशानी नहीं हुई? शैफाली ने वह पिंजरा सुयश के सामने रख दिया और स्वयं तितली से उतरकर नीचे आ गई।
“बहुत अच्छे शैफाली, क्या दिमाग लगाया है तुमने?” ऐलेक्स ने शैफाली की प्रशंसा करते हुए कहा।
अब सुयश ने इस पिंजरे का भी द्वार खोलकर नीली परी को बाहर निकाल दिया।
नीली परी ने बाहर निकलते ही, दूसरे ड्रम से नीले रंग को निकाल कर प्रकृति को रंग दिया। इसके बाद वह भी लाल परी की ही भांति हवा में गायब हो गई।
अब सबकी निगाहें पीली परी की ओर थीं, जिसका पिंजरा अनेक जगहों पर बार-बार प्रकट व अदृश्य हो रहा था।
“पीली परी का पिंजरा तो बहुत तेजी से अनेक स्थानों पर फ्लैश हो रहा है।" जेनिथ ने कहा- “और इसकी गति भी इतनी तेज है कि इसे पकड़ना लगभग नामुमकिन लग रहा है।
"सभी लोग अपने दिमाग के घोड़े को दौड़ाओ, अगर कैश्वर ने इस पहेली को हमारे सामने रखा है तो जरुर इसका हल हममें से किसी के पास होगा?” सुयश ने सभी को आशाओं से भरते हुए कहा- “हो सकता है कि इससे मिलती-जुलती कोई घटना हमारे दिमाग में हो? जो कि दिमाग के किसी कोने में धुंधली यादों के रुप में हो?"
सुयश की बात सुन, सभी पीली परी के पिंजरे को देखते हुए अपना दिमाग लगाने लगे।
शैफाली की तीक्ष्ण नजरें ध्यान से फ्लैश हो रहे पिंजरे का अवलोकन कर रहीं थीं। सभी को पिंजरे को इसी प्रकार देखते हुए, लगभग आधा घंटा बीत गया।
अब शैफाली को छोड़ सभी ने, थोड़ी देर के लिये अपनी नजरें पिंजरे से हटा लीं थीं।
शैफाली अब एक लकड़ी की सहायता से जमीन पर खिंचा कर, कुछ गणित की कैलकुलेशन कर रही थी।
शैफाली को यह करता देख सभी को समझ आ गया कि शैफाली को अवश्य ही कोई ना कोई क्लू मिल गया है?
कुछ ही देर में शैफाली ने लकड़ी से खिंचकर, एक छोटी सी तालिका तैयार कर ली और सभी को अपने पास बुला लिया।
सभी शैफाली के पास पहुंचकर, जमीन में बनी उस तालिका को देखने लगे, पर किसी को कुछ समझ में नहीं आया कि शैफाली ने जमीन पर, अंकों की गणना कर यह क्या बनाया है? अब सभी तालिका को छोड़ शैफाली की ओर देखने लगे।
उन्हें अपनी ओर देखता पाकर शैफाली ने बोलना शुरु कर दिया।
“कैप्टेन अंकल, जब मैंने ध्यान से पीली परी के पिंजरे को देखना शुरु किया, तो मुझे पता चला कि वह पिंजरा गायब होकर सिर्फ 8 स्थानों पर ही प्रकट हो रहा है, पर उनके बीच का क्रम बिल्कुल भी समझ में नहीं आ रहा था। तब मैंने यह तालिका बनाकर पिंजरे के क्रम का आंकलन करने की कोशिश की। अब पहले मैंने उन 8 स्थानों को चिंहित कर, उन्हें 1 से लेकर 8 तक नंबर दे दिये। यानि अगर पिंजरा पहली जगह पर प्रकट हो रहा है तो मैंने तालिका के स्थान पर 1 लिख दिया। कुछ ही देर में मेरे सामने ये आंकड़े आ गये, जो कि मैंने इस तालिका में लिख रखे हैं।" यह कहकर शैफाली ने सबका ध्यान तालिका की ओर कराते हुए कहा।
"तलिका की पहली लाइन में पहला अंक गायब है और बाकी के सभी अंकों के बीच 1 स्थान का अंतराल है, उसी प्रकार दूसरी लाइन में शुरु के 2 अंक गायब हैं और प्रत्येक 2 अंको के बीच 2 स्थान का अंतराल है। वैसे ही तीसरी लाइन में 3, चौथी लाइन में 4, पांचवी लाइन में 5, छठी लाइन में 6 अंकों का अंतराल है। अब अगर सातवीं लाइन को देखते है, तो यहां प्रत्येक अंकों के बीच 7 अंकों का अंतराल है। अगर ध्यान से देखें तो यहां पर कुल 8 ही स्थान हैं, जिनमें से 7 अंक गायब हैं। अर्थात जब पिंजरा सातवीं लाइन के हिसाब से गायब होना शुरु होता है, तो वह एक ही स्थान पर लगातार 8 बार प्रकट होता है।
“इसी प्रकार आठवीं लाइन के हिसाब से वह पिंजरा 8 बार प्रकट ही नहीं होता है। तो इस प्रकार से कैश्वर ने एक शतरंज के बोर्ड के 64 खानों का प्रयोग करके इस पहेली का निर्माण किया है। यानि अब अगर हमें इस पिंजरे को पकड़ना है, तो सबसे सही समय हमें सातवीं लाइन में मिलेगा, जब वह पिंजरा एक ही स्थान पर 8 बार प्रकट होगा।" इतना कहकर शैफाली चुप होकर सभी को देखने लगी और अब सभी आँखें फाड़े शैफाली को देख रहे थे।
“यह इतने छोटे से दिमाग में इतना गणित आता कहां से है?” सुयश ने शैफाली के बालों पर हाथ फेरते हुए पूछा।
"क्या कैप्टेन अंकल, आपने ही तो कहा था कि दिमाग के सारे घोड़े खोल दो, और दिमाग के घोड़े मैं तभी खोलती थी, जब मैं किसी के साथ 'ब्लाइंड चेस' खेलती थी। बस शतरंज के उसी खेल से मैंने ये पहेली हल कर ली।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए भोलेपन से कहा।
(ब्लाइंड चेसः शतरंज के खेल का एक प्रकार, जिसे आँखों पर पट्टी बांधकर खेला जाता है। इस गेम में खेलने वाला अपने दिमाग में शतरंज के सभी 64 खानों को याद रखता है)
"चलो फिर अब सभी आठवें स्थान पर चल कर खड़े होते हैं।” ऐलेक्स ने कहा और क्रिस्टी का हाथ पकड़ ऐसे चल दिया, जैसे कि वह अपने गार्डन में टहल रहा हो।
सभी आठवें स्थान पर पहुंच गये और शैफाली के इशारे का इंतजार करने लगे। पिंजरे के फ्लैश होने का समय इतना कम था, कि पता होने के बाद भी शुरु के 2 बार में, कोई भी पिंजरे को छू भी नहीं पाया, पर आखिरकार तीसरी बार में क्रिस्टी के हाथ में पीली परी का पिंजरा आ ही गया।
इस पिंजरे का ताला भी तोड़कर, पीली परी को निकाल दिया गया।
पिछली दोनों परियों की भांति ही पीली परी ने भी पीले ड्रम से रंग लेकर प्रकृति के पीले रंग को भर दिया। इसके बाद वह पीली परी भी गायब हो गई।
अब सभी की नजर आखिरी वाली, हरी परी की ओर गई, जो कि हवा में स्थित एक हीरे के अंदर कैद थी।
“कैप्टेन, यह परी पिंजरे की जगह हीरे में कैद है।" तौफीक ने कहा- “और हीरा तो पृथ्वी की सबसे कठोर चीजों में शुमार है, तो फिर हम इस परी को उसमें से निकालेंगे कैसे?"
तौफीक की बात सुनकर सभी उस हीरे के पास आकर खड़े हो गये।
“अरे, इस हीरे के नीचे जमीन पर लगे पत्थर पर, तो एक इंद्रधनुष दिखाई दे रहा है।” ऐलेक्स ने नीचे की ओर देखते हुए कहा। ऐलेक्स की बात सुन सभी की निगाहें जमीन पर लगे, उस वर्गाकार सफेद पत्थर पर पड़ी।
“ऐलेक्स भैया, इस हीरे पर जब सूर्य की सफेद किरणें आकर पड़ रही हैं, तो वह इस हीरे के अंदर से प्रवेश होकर, इसके निचले सिरे से बाहर निकल रहीं हैं। वही सूर्य की किरणें अलग-अलग तरंग दैर्ध्य के कारण, हमें इंद्रधनुष के रंग में नीचे के पत्थर पर दिखाई दे रहीं हैं।
"एक मिनट इस इंद्रधनुष के रंग में कुछ गड़बड़ है।” जेनिथ ने नीचे देखते हुए कहा- “हां, इसमें हरा रंग उपलब्ध नहीं है, उसका स्थान खाली है।
“यह बात तो समझ से बाहर है।" शैफाली ने कहा- “सूर्य की किरणों से तो पूर्ण इंद्रधनुष दिखाई देना चाहिये था और इस समय हमें हरी परी को ही बाहर भी निकालना है....अवश्य ही इस द्वार से निकलने का रास्ता इसी पहेली में कहीं छिपा है?"
“दोस्तों, हम भूल रहे हैं कि 3 ड्रम के अंदर तो रंग था, परंतु एक ड्रम जिसमें हरा रंग होना चाहिये था, वह अभी भी खाली है। कहीं उसके खालीपन का संबन्ध इस पहेली से तो नहीं?" ऐलेक्स ने कहा।
“वह कोई बड़ी परेशानी नहीं है।” सुयश ने कहा“ नीले और पीले रंग को चौथे ड्रम में डालने पर हरा रंग बन जायेगा।...पर हरा रंग बनाने से समस्या हल नहीं होगी....अवश्य ही यहां कहीं पर और कुछ भी है? जो हमें अभी तक दिखाई नहीं दिया है। एक काम करो, सब लोग इधर-उधर बिखर कर कुछ भी संदिग्ध चीज ढूंढने की कोशिश करो?" सुयश की बात सुनकर सभी चारो ओर फैल गये।
कुछ मिनट बाद जेनिथ की आवाज सबको सुनाई दी- “कैप्टेन, मुझे इस चट्टान के पीछे से, यह एक फुट का कपड़े का घोड़ा मिला है। क्या इसमें कुछ हो सकता है?"
जेनिथ की आवाज सुन सभी जेनिथ के पास इकठ्ठा हो गये और उस हरे कपड़े से बने उस घोड़े को देखने लगे।
सुयश ने जेनिथ के हाथ से घोड़ा ले लिया और उसे उलट-पुलट कर देखने लगा।
“यह पूरा घोड़ा कपड़े का है, पर इसकी पूंछ असली जैसी लग रही है और इसका रंग भी हरा है, जो कि साधारणतया घोड़े के रंग से अलग है।” सुयश ने कहा“ और इसका हरे रंग में होना ये साबित करता है कि इस घोड़े का कहीं ना कहीं तो उपयोग होना है? क्या कोई इस घोड़े का सम्बन्ध अप्रत्यक्ष रुप से भी, किसी प्रकार उस पहेली से जोड़ पा रहा है?"
“हां कैप्टेन, यहां बात सूर्य की किरणों की हो रही है और कहते हैं कि सूर्य का रथ भी घोड़े ही खींचते हैं। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि यही सूर्य का चौथा घोड़ा हो?" जेनिथ ने अपना तर्क देते हुए कहा।
सुयश को जेनिथ का तर्क बिल्कुल सटीक महसूस हुआ, तभी वह घोड़ा सुयश के हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया।
जमीन पर गिरते ही अचानक वह घोड़ा बड़ा होकर सजीव हो गया और हिनहिनाकर सूर्य की ओर उड़ गया। यह देख सभी सकते की सी हालत में आ गये।
“कैप्टेन, लगता है कि जेनिथ का कहना सही था, वहीं सूर्य का चौथा घोड़ा था?” क्रिस्टी ने कहा- “पर अब तो वह घोड़ा आसमान में उड़ गया, अब हम उसे पकड़ेंगे कैसे?" तभी ऐलेक्स की निगाह जमीन पर गिरी घोड़े की पूंछ की ओर गई।
“कैप्टेन, भागते भूत की लंगोटी सुनी थी, पर भागते घोड़े की पूंछ कभी नहीं सुना था?” ऐलेक्स ने घोड़े की पूंछ को सुयश को देते हुए कहा- “घोड़ा तो उड़ गया, पर उसकी पूंछ तो यहीं पर रह गई।'
सुयश ने घोड़े की पूंछ को ध्यान से देखते हुए कहा“ अरे यह पूंछ तो बिल्कुल पेंटिंग की कूची की भांति लग रही है?" यह कह सुयश के दिमाग में एक विचार कौंधा, अब वह तुरंत उस खाली ड्रम की ओर भागा।
सुयश ने घोड़े की पूंछ को जेनिथ के हाथ में पकड़ाया और स्वयं नीले व पीले रंग की कुछ मात्रा खाली ड्रम में डालकर हरे रंग का निर्माण कर दिया।
हरा रंग बनते ही सुयश ने घोड़े की पूंछ को हरे रंग में डाला और उसमें रंग लगाकर हीरे की ओर भागा।
सभी आश्चर्य से सुयश की ओर देख रहे थे।
सुयश ने अब उस पूंछरुपी कूची से, पत्थर पर मौजूद इंद्रधनुष के हरे भाग को रंग दिया। सुयश के ऐसा करते ही इंद्रधनुष के हरे रंग से एक तेज रोशनी निकलकर हीरे से टकराई।
अब हीरा एक ओर से सूर्य की सफेद किरणों से गर्म हो रहा था और दूसरी ओर से इंद्रधनुष की हरी किरणों से ठंडा हो रहा था।
कुछ देर तक लगातार यही प्रक्रिया चलते रहने के बाद, अब हीरे में कुछ दरारें दिखाई देने लगीं थीं।
यह देख सुयश ने सभी को सचेत करते हुए कहा "सभी लोग सुरक्षित स्थान को ढूंढ लो, मुझे लग रहा है कि हीरा कभी भी फट सकता है? और हीरे के फटने पर हमें नहीं पता कि कैसी ऊर्जा निकलेगी?"
सुयश की बात सुन सभी एक ऊंची सी चट्टान के पीछे छिप गये।
तभी ‘खनाक' की एक तेज आवाज के साथ हीरा टूटकर टुकड़े-टुकड़े हो गया।
कुछ देर बाद जब हीरे की ऊर्जा वातावरण से समाप्त हो गई, तो सभी ने झांककर उस स्थान की ओर देखा, जहां वह हीरा टूटा था।
अब वहां हरी परी खड़ी नजर आ रही थी।
हरी परी ने नीले और पीले रंग के ड्रम से बाकी बचा पेंट भी हरे ड्रम में मिला दिया और उससे प्रकृति के आखिरी और सबसे खूबसूरत रंग को भर दिया। इसी के साथ वह परी भी गायब हो गई।
तभी सबको उस वर्गाकार पत्थर में अंदर की ओर जाता हुआ एक द्वार दिखाई दिया।
सभी समझ गये कि यही तिलिस्मा का अगला द्वार है। सभी अब उस द्वार के रास्ते से आगे की ओर चल दिये।
हनुका के रक्त भैरवी की डिबिया ले जाने के बाद, नीलाभ फिर से शि…वलिंग के सामने बने असंख्य त्रिशूलों पर जाकर आसन की मुद्रा में बैठ गया। कुछ देर तक उसने माया के बारे में सोचा और फिर अपनी साधना में लीन हो गया।
नीलाभ को पता था कि उसकी साधना का यह अंतिम चरण है, इसके बाद देव को उन्हें वरदान देने आना ही होगा।
कुछ घंटों के बाद नीलाभ ने अपने मंत्रोच्चारण की आखिरी आहुति को, देव को समर्पित कर दिया। अब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलकर, अपने चारो ओर देखा और फिर खड़े होकर उन त्रिशूलों के ऊपर ही तांडव करना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में नीलाभ के पैरों से निकलता खून, त्रिशूल के मध्य से होकर शिवमलिंग की ओर बढ़ा, पर इससे पहले कि अंजाने में वह खून शिवमलिंग तक पहुंचता, वातावरण में तेज डमरु की आवाज सुनाई दी, जो कि देव के प्रकट होने का द्योतक था।
हवा में एक ऊर्जा द्वार उत्पन्न हुआ, जिससे निकलकर देव, नीलाभ के समक्ष आ खड़े हुए।
महानदेव ने नीलाभ के पैरों से रिसते खून को देखा, देव के देखते ही खून का रिसाव बंद हो गया। नीलाभ ने त्रिशूल से उतरकर देव के सम्मुख दंडवत प्रणाम किया।
देव ने अपना वरदहस्त आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।
“बताओ नीलाभ, तुम इस प्रकार की कठिन साधना क्यों कर रहे हो? तुम्हें भला किस चीज की कामना है? देव ने नीलाभ से पूछा।
"आप तो अंतर्यामी है देव।” नीलाभ हाथ जोड़कर देव के सामने घुटनों के बल बैठ गया- “आप तो जानते हैं, कि मुझे मनुष्यों के कल्याण के लिये, कुछ पलों के लिये आपकी कुछ शक्तियों का वरण करना है। इसलिये हे महादेव, मुझे ये वरदान दीजिये कि मैं कुछ विषम परिस्थितियों के समय, कुछ क्षणों के लिये, आपकी कुछ शक्तियों को धारण कर सकूँ। मैंने ब्र…देव के कहे अनुसार, आपकी शक्तियों को धारण करने के लिये, अपना शरीर भी उन शक्तियों के लायक कर लिया है।'
यह सुनकर म..देव ने आगे बढ़कर नीलाभ का हाथ पकड़ लिया। इससे पहले कि नीलाभ कुछ भी समझ पाता, उसे अपना शरीर ब्रह्मांड के करोड़ों आकाशगंगाओं के मध्य दिखाई दिया।
चारो ओर अरबों-खरबों अलग-अलग रंग के सितारे फैले हुए थे। करोड़ों आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर घूम रहीं थीं। ब्लैक होल कुछ आकाशगंगाओं को अपने अंदर समाहित कर रहे थे।
कुछ न्यूट्रान स्टार अपने ही ताप से, एक धमाके के साथ फट रहे थे। कुछ आकाशगंगाएं आपस में विलय होकर, नयी आकाशगंगा का निर्माण कर रहीं थीं।
कुल मिलाकर उस स्थान पर मनुष्य तो क्या, किसी भी आकाशगंगा का अस्तित्व भी नगण्य दिखाई दे रहा था। चारो ओर अनंत ब्रह्मांड, अनवरत समय के साथ गतिमान था।
नीलाभ ने आज से पहले कभी भी इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था, इसलिये वह घबराकर ..देव को याद करने लगा।
तभी उस अनंत ब्रह्मांड में सितारों और आका शगंगाओं के मध्य देव का 5 मुखों वाला शरीर प्रकट हुआ।
उसमें पूर्व मुख-पीत वर्ण, पश्चिम मुख-श्वेत वर्ण, उत्तर मुख-कृष्ण वर्ण, दक्षिण मुख-नीलवर्ण और ऊर्ध्व मुख-ईशान दुग्ध के समान प्रतीत हो रहा था। नीलाभ, देव के इस दिव्य दर्शन को देख अविभूत होने लगा।
“हे देव, मैं आपके इस पंचमुखी दर्शन से, ब्रह्मांड के सारे कष्टों को भूल चुका हूं। अब कृपया मुझे इस दिव्य दर्शन का सार समझाइये देव?" नीलाभ ने अपने आँखों में उस अद्भुत दृश्य को भरते हुए कहा।
नीलाभ के शब्द सुन देव की आवाज वातावरण में उभरी- “नीलाभ, मैं तुम्हें ईश्वर का सार समझाने की चेष्टा कर रहा हूं। ईश्वर अनंत और निराकार हैं, तुम जिस रुप में उन्हें देखने की इच्छा करोगे, वो तुम्हें उस रुप में दर्शन देंगे। तुमने हमसे हमारी शक्तियों का वरण करने का वरदान मांगा, इसलिये ही हमने तुम्हें इस पंचमुख से दर्शन दिये। हम तुम्हें इस पंचमुख के माध्यम से बताना चाहते हैं, कि हम स्वयं अपने पंचभूत की शक्तियों से निर्मित हैं। अब अगर हम तुम्हें यह वरदान दे भी दें, तब भी तुम हमारे, इन पंचरुपों के आशीर्वाद के बिना, हमारी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाओगे। तो बताओ नीलाभ क्या तुम इन पंचभूतों से आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक हो?....परंतु ध्यान रखना, इन्हें प्रसन्न करना इतना भी आसान नहीं होगा।"
“अवश्य ..देव, आप मुझे वरदान प्रदान करिये। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि बिना इन पंचभूतों के आशीर्वाद के, मैं आपकी उन शक्तियों का वरण नहीं करूंगा।” नीलाभ ने म..देव को विश्वास दिलाते हुए कहा।
“तथास्तु। तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” यह कहकर महादेव अपने स्थान से अंतर्ध्यान हो गये।
तभी रोशनी का एक तेज झमाका हुआ, जिसकी वजह से नीलाभ की आँखें बंद हो गईं। परंतु जब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने अपने आपको रुद्रलोक के उसी मं..दिर के बाहर पाया, जहां रहकर वह इतने समय से तपस्या कर रहा था।
इस समय नीलाभ के चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता के भाव थे। अब नीलाभ देव के पहले रुप को प्रसन्न करने के लिये चल पड़ा, जो कि वीरभद्र थे और वह रुद्रलोक के ही किसी अज्ञात स्थान पर थे।
चैपटर-3
ब्लैकून: (20 वर्ष पहले.......डेल्फानो ग्रह, एरियन आकाशगंगा)
पृथ्वी से 12 लाख प्रकाशवर्ष दूर, एरियन आकाशगंगा में एक बहुत ही खूबसूरत ग्रह है, जिसका नाम है- डेल्फानो।
वैसे तो इस ग्रह का इतिहास मात्र 5000 वर्ष ही पुराना है, परंतु अपने इस छोटे से इतिहास में भी, डेल्फानो ने अनेकों अभूतपूर्व अविष्कार करके, पूरी एरियन आकाशगंगा को चकित करके रखा था।
कहने को तो यह ग्रह छोटा है, परंतु डेल्फानो ग्रह विज्ञान की तकनीक के हिसाब से, बहुत विकसित ग्रह माना जाता रहा है। कहते हैं कि इस ग्रह के लोगों का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है।
यहां के वैज्ञानिक नित नये शोध करते रहते हैं। यहां के लोग देखने में बिल्कुल पृथ्वी वासियों के जैसे ही हैं, सिर्फ उनकी औसत आयु 10,00 वर्ष की होती है।
डेल्फानो एक शांति प्रिय ग्रह होने की वजह से, इतना आधुनिक तकनीक होने के बाद भी, हथियारों का निर्माण सबसे कम मात्रा में करता है।
डेल्फानो के राजा गिरोट स्वयं भी एक निपुण वैज्ञानिक हैं, जो कि अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी प्रयोगशाला ‘ब्लैकून' को देते हैं।
कहते हैं कि गिरोट ने ही देवता नोवान का आशीर्वाद प्राप्त कर, 5,000 वर्ष पहले इस ग्रह को बसाया था। देवता नोवान के ही आशीर्वाद से गिरोट पिछले 5,000 वर्षों से वैसे ही जवान है, जैसा कि इस ग्रह के निर्माण के समय हुआ करता था।
गिरोट ने अपनी पूरी जिंदगी डेल्फानो को विकसित करने में लगा दी थी। डेल्फानो को विकसित करने में वह इतना पागल हो गया कि उसे कभी अपने विवाह का ख्याल भी नहीं आया।
आखिरकार एक रात उसे डेल्फानों के वारिस की चिंता हुई, इसलिये हजारों वर्षों के बाद गिरोट ने अपने ग्रह की ही एक साधारण सी लड़की से विवाह कर लिया।
विवाह के उपरांत, युवराज ओरस को जन्म देते हुए, गिरोट की पत्नि का स्वर्गवास हो गया। अब गिरोट के पास अपने पुत्र युवराज ओरस के सिवा कुछ भी नहीं था।
सुबह का समय था, डेल्फानो के दोनों सूर्य उदय हो चुके थे। सूर्य की पीली किरणें चारो ओर फैल गईं थीं।
इस समय गिरोट अपने महल से ब्लैकून के लिये निकलने ही वाला था, कि तभी 'कमांडर कीमोन' ने गिरोट के कक्ष में प्रवेश किया।
कीमोन को देख गिरोट की आँखों में आश्चर्य के भाव उभर आये।
“क्या हुआ कीमोन? इतनी सुबह-सुबह आने का कोई विशेष कारण है क्या?” गिरोट ने कीमोन से पूछा।
“महाराज, गुप्तचरों से समाचार मिला है, कि एंड्रोवर्स आकाशगंगा के, फेरोना ग्रह के राजा एलान्का को, आपके नये अविष्कार ‘समयचक्र' का पता लग गया है और वह किसी भी कीमत पर हमसे यह समयचक्र छीनना चाहता है।” कीमोन ने गंभीर भाव से कहा।
"एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोग?" गिरोट ने आश्चर्य से कहा- “उनके पास तो स्वयं एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जाने की शक्ति है, फिर वह हमारे समयचक्र में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?"
“वह अपनी शक्तियों से 2 ग्रहों के बीच द्वार बना सकते हैं महाराज, पर वह आकाशगंगा की अनन्त गहराइयों में, एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जा सकते और ना ही समय को रोक और चला सकते हैं, इसी लिये उन्हें आपका समयचक्र चाहिये महाराज।” कीमोन ने कहा।
"पर समयचक्र के प्रयोग को तो हमने बहुत ही गुप्त रखा था, फिर उन्हें इस समयचक्र की जानकारी कैसे हुई?” गिरोट के चेहरे पर अब चिंता के भाव उभर आये।
“जिस प्रकार हमारे गुप्तचर हर स्थान पर हैं, मुझे लगता है कि उनके गुप्तचर भी हमारे ग्रह पर होंगे? उन्हीं के माध्यम से एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोगों को हमारे समयचक्र का पता चला होगा। इसलिये महाराज से निवेदन है, कि वह सदैव अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें। मैं तब तक सेना को भी एलर्ट पर डाल देता हूं।" इतना कहकर कीमोन शांत हो गया और गिरोट के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
गिरोट ने इशारे से कीमोन को जाने का आदेश दिया और स्वयं कक्ष में रखी एक कुर्सी पर बैठकर समयचक्र के बारे में सोचने लगे।
“समयचक्र का निर्माण तो पूरा हो गया है, पर इसे किसी भी प्रकार से सुरक्षित रखना होगा? पर कैसे? इतने बड़े ब्लैकून को हम किसी की नजरों से छिपा भी नहीं सकते.... क्या करूं?.....हे देवता नोवान हमारी मदद करो।” गिरोट मन ही मन अपने देवता को याद करने लगा।
तभी अचानक वह खुशी से उछल पड़ा- “अरे वाह मुझे पहले 'ज़ेप्टो नाइजर' का ध्यान क्यों नहीं आया? ...हां ...उससे मेरी समस्या हल हो सकती है।"
अभी गिरोट यह सब सोच ही रहा था कि तभी 5 वर्षीय नन्हें युवराज ‘ओरस' ने कक्ष में प्रवेश किया।
“आप क्या कर रहे हैं पिताजी?" ओरस ने अपने छोटे से यान नुमा खिलौने को हाथों से घुमाते हुए कहा।
"हम तो अपने नये प्रयोग के बारे में सोच रहे थे युवराज।” गिरोट ने मुस्कुराकर अपनी बांहें फैलाते हुए कहा - “आप बताओ, आप अपने इस नन्हें से यान से, कहां की सैर कर रहे हो?"
गिरोट को बांहें फैलाते देख, नन्हा ओरस दौड़कर उनकी बांहों में समा गया।
“मैं तो अपने यान से आकाशगंगा के, दूसरे छोर की सैर कर रहा था पिताजी।" ओरस ने अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हुए कहा- “पर मुझे ये बताइये कि आपका यह नया प्रयोग क्या है? जिसके बारे में आप मुझसे भी ज्यादा सोचते हो।" ओरस की बात सुन गिरोट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“अभी तुम उस प्रयोग के बारे में जानने के लिये बहुत छोटे हो युवराज, समय आने पर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा।” गिरोट ने ओरस को फुसलाते हुए कहा।
“मैं इतना भी छोटा नहीं हूं। मैं आकाशगंगा की सारी जानकारी रखता हूं। आप चाहो तो मेरे ज्ञान का परीक्षण कर सकते हो?” ओरस ने किसी ज्ञानी की तरह ज्ञान देते हुए कहा।
“अच्छा, तो बताओ कि नेबुला क्या होता है?" गिरोट सच में ही ओरस की परीक्षा लेने लगा। वैसे गिरोट को पता था, कि ओरस इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेगा।
"जब कोई सितारा अपनी आयु का पूरा करने के बाद फटकर कणों में बिखर जाता है, तो उससे बने गैस और धूल के बादलों को नेबुला कहते हैं।” ओरस ने अपना यान उड़ाते हुए कहा।
ओरस का उत्तर सुन गिरोट हैरान रह गया क्यों कि ओरस ने शत-प्रतिशत सही कहा था।
“अच्छा अब बताओ कि सुपरनोआ क्या होता है?" ओरस ने अपने प्रश्न को थोड़ा और कठिन कर दिया।
“जब नेबुला के बहुत से कण आपस में संकुचित हो कर मिलते हैं, तो वह एक सितारे यानि की सूर्य का निर्माण करते हैं। वह सितारा 75 प्रतिशत तक हाइड्रोजन से बना होता है। यानि की हाइड्रोजन उस सूर्य में ईधन का काम करता है। धीरे-धीरे जब उस सितारे का पूरा हाईड्रोजन खत्म होकर, हीलीयम में परिवर्तित हो जाता है, इस स्थिति में वह सितारा अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण को संभाल नहीं पाता और एक महा विस्फोट के साथ फट जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते हैं।” ओरस ने भोलेपन से कहा।
गिरोट अब आश्चर्य से ओरस की ओर देख रहा था।
“क्या तुम 'न्यूट्रान स्टार' और 'ब्लैक होल' के बारे में भी जानते हो?” गिरोट ने अब क्लास 1 के बच्चे से ग्रेजुएशन का प्रश्न पूछ लिया था।
"जब सुपरनो वा विस्फोट होता है, तो सितारे का सबसे बड़ा टुकड़ा, जो सबसे ज्यादा घनत्व लिये होता है, वह एक गोलाकार आकृति लेकर एक न्यूट्रान स्टार में परिवर्तित हो जाता है। यह न्यूट्रान स्टार जब संकुचन की अधिकतक सीमा तक पहुंच जाता है, तो यह छोटा होकर अदृश्य हो जाता है। इसी अदृश्य पिंड को ब्लैक होल कहते हैं।" इस प्रकार क्लास 1 के बच्चे ने ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर, अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।
“ये सब ज्ञान तुम्हें किसने दिया?” गिरोट ने आश्चर्य से ओरस से पूछा।
ओरस ने मुस्कुराते हुए, कक्ष में रखी एक प्रतिमा की ओर इशारा किया। वह प्रतिमा डेल्फानो के देवता नोवान की थी।
ओरस का इशारा देख गिरोट और भी ज्यादा आश्चर्यचकित हो गया। उसने ओरस को अपने गले से लगा लिया।
“चलो ओरस, आज मैं तुम्हें अपने उस नये प्रयोग को दिखाता हूं।” गिरोट ने खड़े होते हुए कहा।
"पर आप तो कह रहे थे कि मैं अभी छोटा हं और मैं उस प्रयोग को समझ नहीं पाऊंगा?" ओरस ने अपनी भोली जुबान में कहा।
“मैं गलत था युवराज, आप नहीं छोटे हो, मेरी मानसिकता छोटी थी, जो मैं यह सोच रहा था कि आपको कुछ समझ नहीं आयेगा? आओ, अब चलते हैं ब्लैकून की ओर, जहां मेरा प्रयोग बेसब्री से आपका इंतजार कर रहा है।
यह कहकर गिरोट ने नन्हें वैज्ञानिक को अपनी गोद में उठाया और हवा में उड़ने वाले एक यान में बैठकर ब्लैकून के पास जा पहुंचा।
ब्लैकून लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली, एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसका आकार बिल्कुल गोल और काले रंग का था। दूर से देखने पर वह एक बड़े से काले मोती के समान प्रतीत हो रही थी। गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के पास पहुंच गया।
“ब्लैकून में प्रवेश करने का प्रवेश द्वार तो है ही नहीं पिताजी। फिर हम इसमें प्रवेश कैसे करेंगे?" ओरस ने कहा।
“ब्लैकून का पूरा नियंत्रण अंदर मौजूद एक कंप्यूटर 'जेनिक्स' करती है। वह हमें देखते ही स्वयं द्वार खोल देगी। तभी ब्लैकून में एक स्थान पर एक द्वार खुलता दिखाई देने लगा।
“क्या यह मुझे देखकर भी द्वार खोल देगी?” ओरस ने अपनी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।
“हां पुत्र, ज़ेनिक्स में डेल्फानों के राजवंश के, किसी भी व्यक्ति के शरीर को सेंस करने की अद्भुत क्षमता है।" ओरस ने कहा।
गिरोट और ओरस उस द्वार से अंदर प्रवेश कर गये। ब्लैकून में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था, पूरा सिस्टम ज़ेनिक्स के हवाले था।
अंदर प्रवेश करते ही ओरस को पूरा ब्लैकून, किसी एक छोटे ब्रह्मांड के समान प्रतीत हुआ। चारो ओर निहारिकाएं (नेबुला) फैली हुई थी, जिसके आसपास अनेकों ग्रह घूम रहे थे।
चूंकि ओरस पहली बार ब्लैकून में आया था, इसलिये वह आश्चर्य से सभी चीजों को निहार रहा था।
“यह कैसी प्रयोगशाला है पिताजी? यहां पर कोई मशीन तो दिखाई ही नहीं दे रही है?” ओरस ने कहा।
“ब्लैकून कुल 4 भागों में बंटा है पुत्र, कुछ देर प्रतीक्षा करो, अभी तुम्हें सबकुछ पता चल जायेगा।...यह तो अभी ब्लैकून का प्रथम भाग है, इस भाग में हम तारों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं।" गिरोट ने कहा।
उस भाग को पार करने के बाद, ओरस एक ऐसे भाग में पहुंचा, जहां पर देवता नोवान की एक बड़ी सी प्रतिमा लगी थी। देवता नोवान के कंधे पर एक फीनीक्स पक्षी बैठा था। उस भाग में और कुछ भी नहीं था।
यह ब्लैकून का दूसरा भाग था। देवता की प्रतिमा के नीचे, सामने की ओर एक गोल काँच का पारदर्शी केबिन बना था। उसे देख ओरस ने पूछ ही लिया।