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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

dhalchandarun

[Death is the most beautiful thing.]
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174
#174.

दिव्य पुरुष:
(17.01.02, गुरुवार,10:40, हिमालय का गर्भग्रह, रुद्रलोक)

हिमालय पर हर ओर श्वेत, स्निग्ध सी बर्फ फैली हुई थी, इसी बर्फ पर हनुका चला जा रहा था।

बड़ा ही घुमावदार और दुर्गम रास्ता था। कुछ दूर जाने के लिये भी एक लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा था।

हनुका ने जबसे अराका द्वीप पर माया का बना सुरक्षा कवच देखा था, तब से ही वह बहुत व्यग्र रह रहा था।

वह चाहता था कि महागुरु नीलाभ से माता के बारे में सबकुछ बता दे, पर महागुरु तो हजारों वर्षों से किसी से मिल ही नहीं रहे थे।

यहां तक कि हनुका के सिवा कोई जानता भी नहीं था कि नीलाभ आखिर है कहां पर? और वह पूरी दुनिया से छिप क्यों रहे हैं?

पर आज हनुका का दिल बहुत बेचैन लग रहा था, इसलिये वह महागुरु से मिलने रुद्रलोक की ओर चल दिया था।

उसे पता था कि महागुरु हिमालय के गर्भगृह में स्थित, रुद्रलोक के रुद्रदेव मंदि.र में हैं, पर वह रुद्रलोक में सीधे रास्ते से नहीं जा सकता था, नहीं तो सभी को महागुरु के वहां होने का पता चल जाता।

इसलिये हनुका ने महागुरु से मिलने के लिये रुद्रलोक का गुप्त द्वार चुना था, जो कि ‘सागरमाथा’ पर्वत से होकर जाता था। (एवरेस्ट पर्वत का प्राचीन नाम सागरमाथा है)

कुछ ही देर में उछलते-कूदते हनुका सागरमाथा पर्वत के एक शिखर पर पहुंच गया।

हनुका ने अब अपने चारो ओर देखा और फिर उस पर्वतशिखर के एक स्थान की बर्फ अपने हाथों से साफ करने लगा।

कुछ ही देर में उस बर्फ के नीचे म…देव का एक चित्र उभर आया, जो कि शायद बहुत प्राचीन काल में ही किसी ने वहां पर बनाया था।

हनुका ध्यान से देव के उस चित्र को देखने लगा। कुछ ही देर में हनुका की निगाह चित्र में बने देव की तीसरी आँख पर गई।

देव की उस आँख के स्थान पर एक बहुत छोटा सा छिद्र नजर आ रहा था।

अब हनुका ने ‘ऊँ नमः शि…य’ का जाप किया और अपने शरीर को इतना छोटा कर लिया, कि वह शरीर उस छोटे से छिद्र के पार आसानी से चला जाता।

हनुका उस छिद्र के पार चला गया। दूसरी ओर पहाड़ में एक छोटा सा प्लेटफार्म बना था, हनुका उसी
पर जा गिरा।

अब हनुका ने अपने शरीर को पुनः पहले के आकार में कर लिया और उस छिद्र से मुंह लगा कर अपनी साँस को जोर से खींचा।
हनुका के ऐसा करते ही पर्वत शिखर पर मौजूद बर्फ ने वापस उस चित्र को ढक लिया।

अब हनुका ने अपने आसपास देखा, वह इस समय एक प्लेटफार्म पर, पर्वत के सबसे ऊंचे स्थान पर खड़ा था। हनुका के नीचे की ओर, कुछ दूरी पर एक 200 फुट ऊंची देव की विशाल प्रतिमा बनी थी।

वह प्रतिमा सिर्फ कमर तक ही थी। प्रतिमा की जटाओं से गंगा की एक धार निकलकर, नीचे स्थित एक छोटी सी झील में गिर रही थी।

झील का पानी इतना साफ था कि झील के पानी में देव की प्रतिमा की छाया बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

देव की प्रतिमा से निकली गंगा की धारा, पानी में स्थित प्रतिमा की छाया से बने, देव के तीसरे नेत्र के स्थान पर गिर रही थी। जहां पर गंगा की धारा गिर रही थी, वहां पानी में नीले रंग का एक गोल छल्ला बन गया था।

हनुका को पता था कि उस नीले गोल छल्ले से होकर ही रुद्रलोक जाया जा सकता है, पर वह नीला गोल छल्ला गंगा की धारा के सिवा, किसी को भी अपने अंदर से जाने नहीं देता।

अगर हनुका भी बिना गंगा की धारा के उस गोल छल्ले से निकलने की कोशिश करता, तो वह छल्ला उसे पीस देता।

अतः हनुका ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया और ऊंचाई से, प्रतिमा से निकल रही गंगा की धारा में छलांग लगा दी।

“जय माँ गंगे।”

हनुका का शरीर जैसे ही गंगा की धारा से टकराया, धारा ने हनुका के शरीर के चारो ओर, एक सफेद रंग का कवच सा बना दिया।

हनुका का शरीर अब वेग से नीचे गिरने की जगह, गंगा की धारा के साथ उस झील के पानी की ओर बढ़ा।

जैसे ही हनुका का शरीर झील की सतह के पास पहुंचा, वह नीला छल्ला स्वतः ही आकार में बड़ा हो गया और हनुका का शरीर उस छल्ले को पार करता हुआ, झील के पानी में जा गिरा।

पानी में गिरते ही हनुका तेजी से पानी की तली की ओर तैरने लगा। झील की तली में हनुका को एक विशाल त्रिशूल दिखाई दिया, जिस पर एक डमरु लटक रहा था।

हनुका ने त्रिशूल को प्रणाम कर उसे तेजी से घुमा दिया। त्रिशूल के घूमते ही डमरु की आवाज उस झील की तली में गूंज उठी।

इसी के साथ झील की तली में एक द्वार नजर आने लगा। हनुका उस द्वार में प्रवेश कर गया।

वह द्वार एक विशाल मैदान में खुला, जहां एक बहुत ही विशाल संगमरमर के पत्थरों से निर्मित शिव मंदिर बना था, जिसका आकार, बैठे हुए नंदी के समान था।

नंदी के मस्तक पर एक सोने का मुकुट जड़ा था, जिस पर एक नारंगी रंग की पताका (झंडा ) लहरा रही थी।

उस पताका पर एक सुनहरे रंग का त्रिशूल बना था, जिसके नीचे ‘ऊँ’ लिखा था। नंदी का मुख खुला हुआ था और उस खुले मुख से होकर ही मंदि..र का रास्ता जा रहा था।

हनुका नंदी के खुले मुख से, मंदि..र के अंदर की ओर प्रवेश कर गया। मंदि..र के अंदर पहले 12 मंडप थे, हर एक मंडप में देव की एक ज्यो ....तिर्लिंग की प्रतिकृति विराजमान थी।

इसके बाद मंदि..र का गर्भगृह था, जहां बीचो बीच में देव का एक विशाल ज्यो..तिर्लिंग उपस्थित था। उस ज्यो..तिर्लिंग के दूसरी ओर सैकड़ों त्रिशूल जमीन में धंसे थे।

उन त्रिशूलों के ऊपर, एक मानव शरीर नंगे पैर, तांडव की मुद्रा में नृत्य कर रहा था। यह और कोई नहीं, बल्कि नीलाभ था। देव का परम भक्त नीलाभ।

हलाहल से प्रकट हुआ दिव्यपुरुष नीलाभ। जिसके जीवन का उद्देश्य ही मनुष्यों को वेदों का ज्ञान देना था।

हनुका ने पहले देव को और फिर नीलाभ को प्रणाम किया और चुपचाप वहीं देव की मूर्ति के पास बैठकर नीलाभ की साधना पूर्ण होने की प्रतीक्षा करने लगा।

कुछ देर बाद नीलाभ की साधना पूर्ण हो गई और वह उन्हीं त्रिशूलों पर आसन की मुद्रा में बैठ गया।

“बताओ हनुका, कैसे आना हुआ तुम्हारा?” नीलाभ ने हनुका को देखते हुए पूछा।

“महागुरु, कुछ दिन पहले मैंने पश्चिम दिशा में स्थित एक छोटे से द्वीप पर माता की शक्तियों से बना कवच देखा। शायद माता उस स्थान के ही आसपास कहीं हैं? मैं यह समाचार देने ही आपके पास आया हूं।” हनुका ने कहा।

“तुम उस स्थान पर जाकर माया को ढूंढने की कोशिश करो हनुका, इधर मेरी भी साधना पूर्ण होने वाली है। साधना पूर्ण होने के बाद मैं भी सभी के समक्ष प्रकट हो जाऊंगा।” नीलाभ ने कहा।

“यह किस प्रकार की साधना है महागुरु? जो कि 5,000 वर्षों से अनवरत् चलती ही जा रही है।” हनुका ने अपनी जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा।

“पृथ्वी पर एक घोर संकट आने वाला है हनुका, जिसे सभी महा -शक्तियां मिलकर भी नहीं समाप्त कर सकती हैं। इसी लिये ईश्वर चाहते हैं कि मैं कुछ क्षणों के लिये देव की कुछ शक्तियों को अपने शरीर पर धारण करुं। इसी लिये 5,000 वर्षों से मैं अपने शरीर को उस योग्य बनाने के लिये प्रयास रत हूं।"

"अब तुम जाओ हनुका...और अपनी माता को ढूंढने की कोशिश करो। हां जाने से पहले शि...वलिंग के पास रखी, रक्त भैरवी की वह डिबिया भी लेते जाओ, कुछ ही दिन में वह तुम्हारे काम आने वाली है।... तुम्हें पता है कि उसका प्रयोग कैसे करना है?” इतना कहकर नीलाभ वापस अपनी साधना में लीन हो गया।

पर हनुका आवाक सा खड़ा, कभी नीलाभ को तो कभी ज्यो..तिर्लिंग के पास रखी रक्त भैरवी की डिबिया को देख रहा था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि खतरा कितना बड़ा है? जो रक्त भैरवी की डिबिया का प्रयोग करने की जरुरत आ पड़ी।

हनुका ने एक गहरी साँस भरी और रक्त भैरवी की डिबिया उठाकर अपने वस्त्रों में छिपा ली।

हनुका अब मंदिर के बाहर की ओर चल पड़ा, पर अब वह मानसिक तौर पर महायुद्ध के लिये तैयार था।


चैपटर-13

शीत ऋतु-1:
(तिलिस्मा 4.3)

सुयश के साथ सभी अगले द्वार न्यूजीलैंड में प्रवेश कर गये। पर वहां का नजारा देखकर सभी हैरान रह गये। जहां तक नजर जा रही थी, उन्हें बर्फ ही बर्फ दिखाई दे रही थी।

“यह क्या? यह तो ऐसा लग रहा है कि जैसे हम अंटार्कटिका में आ गये हों।” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

“न्यूजीलैंड भी काफी ठंडी जगह है और वैसे भी हम यहां शीत ऋतु का सामना करने आये हैं, तो बर्फ तो नजर आयेगी ही।” सुयश ने कहा।

तभी उनकी नजर उस बर्फ के मैदान के बीचो बीच खड़ी एक मूर्ति पर गई। मूर्ति देख सब उसी दिशा की ओर चल दिये।

वह एक 10 फुट ऊंची अश्वमानव की बर्फ की प्रतिमा थी, जिसका कमर के नीचे का शरीर घोड़े का और कमर से ऊपर का शरीर एक इंसान का था।

वह अश्वमानव किसी योद्धा के समान शक्तिशाली लग रहा था, उसके हाथ में विचित्र सा अस्त्र था।

उस अस्त्र की मूठ अश्वमानव के हाथ में थी, उस मूठ से एक जंजीर के द्वारा बंधा काँटे जैसा गदा हवा में झूल रहा था। यह अस्त्र बर्फ का नहीं बल्कि किसी धातु का बना दिखाई दे रहा था।

सभी ध्यान से उस अश्वमानव को देखने लगे।

“कैप्टेन, यह रोमन साम्राज्य का योद्धा ‘सेन्टौर’ है।” क्रिस्टी ने कहा- “और इसने अपने हाथ में जो अस्त्र पकड़ रखा है, उसे ‘कंटक’ कहते हैं।”

“पर कैप्टेन, एक बात आपने ध्यान दी, कि इस सेन्टौर का पूरा शरीर तो बर्फ का बना है परंतु इसकी आँख और पूंछ के बाल असली जैसे लग रहे है।” ऐलेक्स ने कहा।

“हो सकता है कि इसकी पूंछ और आँखों में ही कोई रहस्य छिपा हो?” सुयश ने सेन्टौर को देखते हुए कहा।

“लेकिन इस जगह पर सेन्टौर की मूर्ति के सिवा और कुछ तो है ही नहीं, फिर हमें यहां करना क्या है?” जेनिथ ने कहा।

“है जेनिथ दीदी, यहां पर और भी चीजें हैं, पर आप लोगों ने अभी तक उस पर ध्यान ही नहीं दिया है।” यह कहकर शैफाली ने सभी का ध्यान जमीन के नीचे बनी बर्फ की झील की ओर कर दिया- “नीचे जमीन की ओर देखिये, जमीन के नीचे एक विशाल बर्फ की झील मौजूद है, जिसमें कुछ मछलियां और समुद्री घोड़ा तैर रहा है।”

शैफाली की बात सुनकर सभी ने नीचे की ओर देखा, शैफाली सही कह रही थी, नीचे एक झील मौजूद थी।

“पर कैप्टेन, मेरी जानकारी के हिसाब से समुद्री घोड़ा ना तो झील के पानी में पाया जाता है और ना ही इतने ठंडे पानी में वह रह सकता है।” तौफीक ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“यह तिलिस्म है, यहां पर कुछ भी संभव हो सकता है?” सुयश ने कहा।

तभी शैफाली बैठकर पानी के नीचे तैर रही, उन मछलियों को ध्यान से देखने लगी। वह मछलियां साधारण मछलियों के हिसाब से बहुत धीरे तैर रहीं थीं।

“कैप्टेन अंकल, ये ऑस्ट्रेलिया में पायी जाने वाली मिसगर्न नाम की मछली है, इंसान इस मछली का प्रयोग भूकंप का पता लगाने के लिये करता है। वैसे प्रायः यह मछलियां बहुत सुस्त होतीं हैं, पर जब भी भूकंप आने वाला होता है, यह बहुत तेजी से इधर-उधर भागने लगती हैं। दरअसल यह मछलियां पृथ्वी की भूगर्भीय हलचल को कुछ समय पहले ही पहचान जातीं हैं, जिससे यह घबराकर तेज गति से तैरने लगती हैं।” शैफाली ने कहा।

“इसका मतलब हमें इस द्वार में भूकंप का सामना करना पड़ेगा क्यों कि कैश्वर इस मिसगर्न मछली को यूं ही तो नहीं रखा होगा यहां पर?” जेनिथ ने कहा।

जेनिथ की बात सभी को सही लगी।

“तो कैप्टेन हमें कहीं ना कहीं से तो इस तिलिस्म की शुरुआत करनी ही पड़ेगी, तो आप कृपया बताइये कि हमें कहां से शुरु करना सही रहेगा?” क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।

“देखो, यहां 3 चीजें ही हैं, पहला वह सेन्टौर, दूसरा समुद्री घोड़ा और तीसरा मिसगर्न मछली। अब 2 चीजें तो पानी के अंदर हैं, तो फिर हमें इस सेन्टौर से ही शुरु करना होगा।” सुयश ने कहा। यह सुन सभी सेन्टौर के पास आकर खड़े हो गये।

“इस सेन्टौर के शरीर में पूंछ और आँखें ही असली लग रहीं हैं, इस लिये इन दोनों में ही कोई ना कोई रहस्य होगा? तो ऐसा करो कि 3 लोग इसके अगले भाग में रहकर, इसकी आँखों पर नजर रखो और बाकी बचे 3 लोग पीछे की ओर जाकर इसकी पूंछ को छुओ और देखो कि इस सेन्टौर में क्या परिवर्तन हो रहें हैं?”

सुयश के यह कहते ही क्रिस्टी और जेनिथ सुयश के साथ सेन्टौर के पिछले हिस्से की ओर खड़े हो गये और तौफीक, ऐलेक्स और शैफाली सेन्टौर के अगले भाग में खड़े होकर सेन्टौर की आँखों की ओर देखने लगे।

अब क्रिस्टी ने सेन्टौर की पूंछ को धीरे से उमेठ दिया।

क्रिस्टी के पूंछ को उमेठते ही सेन्टौर की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देखने लगीं।

“कैप्टेन, क्रिस्टी के पूंछ के छूते ही सेन्टौर की दोनों आँखें पता नहीं कैसे 2 दिशाओ में देखने लगी हैं।” ऐलेक्स ने कहा- “पर इससे हमारे आसपास कोई परिवर्तन तो नहीं आया?”

“तभी पानी के नीचे घूम रहा समुद्री घोड़ा एक स्थान से बर्फ को तोड़कर बाहर आ गया। झील के पानी से बाहर निकलते ही समुद्री घोड़े का आकार 10 इंच से बढ़कर 6 फुट का हो गया।

सभी आश्चर्य से बढ़ते हुए उस समुद्री घोड़े को देख रहे थे, परंतु सभी किसी भी खतरे से बचने के लिये सावधान थे।

तभी समुद्री घोड़े का बढ़ना रुक गया। अब वह झील के ठंडे पानी को अपने मुंह में भरने लगा।

बहुत सारा पानी अपने मुंह में भरने के बाद, समुद्री घोड़े ने अपना मुंह ऊपर आसमान की ओर उठाकर, सारा पानी हवा में फूंक मार कर उड़ा दिया।

सभी आश्चर्य से ऊपर आसमान की ओर देखने लगे, किसी को समझ नहीं आया कि उस समुद्री घोड़े ने ऐसा क्यों किया?

“तभी शैफाली ने चिल्लाकर कहा- “भागो , झील का वह पानी ओले बनकर ऊपर आसमान से गिरने वाला है।”

शैफाली की चीख सुनकर सभी सेन्टौर की ओर भागे, क्यों कि उनके बचने की वही एक सुरक्षित जगह थी।

तभी एक ओले का टुकड़ा आकर ऐलेक्स से टकरा गया और सबके देखते ही देखते ऐलेक्स भी एक समुद्री घोड़े में बदल गया।

बाकी सभी लोग बचकर सेन्टौर के नीचे पहुंचने में सफल हो गये, पर अब उधर 2 समुद्री घोड़े हो गये थे।
दोनों समुद्री घोड़े एक दूसरे के पास पहुंचकर तेजी से नाचने लगे।

अब यह पहचानना बहुत ही मुश्किल हो गया कि उनमें से असली समुद्री घोड़ा कौन है और ऐलेक्स कौन है? अब दोनों समुद्री घोड़े झील से अपने मुंह में पानी भरकर, आसमान की ओर उछालने लगे।

ऐलेक्स को समुद्री घोड़ा बनते देख, क्रिस्टी इस बार ज्यादा परेशान नहीं हुई क्यों कि अब उसे तिलिस्मा के बारे में पता चल गया था। वह जानती थी कि इस द्वार को पार करते ही ऐलेक्स स्वतः ही सही हो जायेगा।

बहरहाल अब ओलों की ताकत सभी जान गये थे, इसलिये कोई भी सेन्टौर के नीचे से निकलने को नही तैयार था।

एक फायदा यह था कि दोनों समुद्री घोड़ों में से कोई भी उनके पास आने की कोशिश नहीं कर रहा था।

“मेरे हिसाब से यह परेशानी इस सेन्टौर की पूंछ उमेठने से आयी थी, तो अगर हम वापस इसकी पूंछ को सही कर दें, तो शायद ऐलेक्स भी सही हो जाये और यह असली समुद्री घोड़ा भी वापस झील में चला जाये।” जेनिथ ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा।

सेन्टौर की पूंछ उमेठने के लिये किसी को बाहर जाने की जरुरत नहीं थी।

क्रिस्टी धीरे से सेन्टौर के पूंछ वाले हिस्से की ओर आ गई और उसने सेन्टौर की पूंछ को पहली वाली स्थिति में कर दिया, पर फिर भी दोनों समुद्री घोड़ों का ओले बनाने का कार्य जारी रहा। यह देख क्रिस्टी वापस आ गई।

“कैप्टेन अब सेन्टौर की पूंछ पहले जैसे करने पर भी कुछ नहीं हो रहा?” क्रिस्टी ने कहा।

“मुझे लगता है कि इस समस्या का हल सेन्टौर की पूंछ में नहीं बल्कि उसकी आँख में छिपा है।” शैफाली ने कहा- “कैप्टेन, समुद्र घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देख सकती हैं, पर जमीन पर चलने वाला घोड़ा ऐसा नहीं कर सकता। तो फिर हो ना हो इस सेन्टौर की आँखें 2 दिशाओं में हो जाने की वजह से, वह समुद्री घोड़ा जागा था। और अगर ऐसा है तो हम सेन्टौर की आँखों को सही कर समुद्री घोड़े को रोक सकते हैं।”

शैफाली की बात सुनकर तौफीक सेन्टौर के नीचे से निकला और सेन्टौर की आँखों को अपने हाथ से एडजेस्ट कर सही कर दिया।

तौफीक के ऐसा करते ही बाहर मौजूद दोनों समुद्री घोड़े अचानक से रुक गये।

अब एक घोड़े का आकार फिर से छोटा होने लगा। कुछ ही देर में वह समुद्री घोड़ा वापस 10 इंच का हो गया और झील में कूदकर गायब हो गया।

“चलो 2 मुसीबत से पीछा छूटा।” जेनिथ ने कहा- “एक तो आसमान से ओले गिरना बंद हो गया और दूसरा वह समुद्री घोड़ा वापस झील में चला गया।”

“पर यह ऐलेक्स अभी तक अपने रुप में क्यों नहीं आया?” क्रिस्टी ने घबराते हुए कहा- “कहीं यह हमेशा के लिये समुद्री घोड़ा तो नहीं बन गया?”

“अरे नहीं-नहीं क्रिस्टी दीदी, ऐलेक्स भैया जल्दी ही सहीं हो जायेंगे।” शैफाली ने क्रिस्टी को सांत्वना देते हुए कहा- “रुकिये, मुझे सोचने दीजिये कि ऐलेक्स भैया सही क्यों नहीं हुए?....समुद्री घोड़ा, सेन्टौर की वजह से जागा था, इसलिये सेन्टौर की आँखें सही करने पर वह सही हो गया, परंतु ऐलेक्स भैया,..... वह तो ओले की वजह से समुद्री घोड़ा बने थे, इसलिये अवश्य ही ऐलेक्स भैया को सही करने के लिये समुद्री घोड़े की आँख को सही करना पड़ेगा? और मेरे सोच को तर्क देने के लिये हमें समुद्री घोड़े की आँख एक बार देखनी ही होगी?”


जारी रहेगा
_______:writing:
Shefali and uski team Alex ko kaise theek karti hai, sath hi sath New Zealand ka ye safar kaisa hone wala hai, wonderful update brother, waiting for next episode eagerly, keep writing whenever you get the leisure time.
 

kas1709

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#174.

दिव्य पुरुष:
(17.01.02, गुरुवार,10:40, हिमालय का गर्भग्रह, रुद्रलोक)

हिमालय पर हर ओर श्वेत, स्निग्ध सी बर्फ फैली हुई थी, इसी बर्फ पर हनुका चला जा रहा था।

बड़ा ही घुमावदार और दुर्गम रास्ता था। कुछ दूर जाने के लिये भी एक लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा था।

हनुका ने जबसे अराका द्वीप पर माया का बना सुरक्षा कवच देखा था, तब से ही वह बहुत व्यग्र रह रहा था।

वह चाहता था कि महागुरु नीलाभ से माता के बारे में सबकुछ बता दे, पर महागुरु तो हजारों वर्षों से किसी से मिल ही नहीं रहे थे।

यहां तक कि हनुका के सिवा कोई जानता भी नहीं था कि नीलाभ आखिर है कहां पर? और वह पूरी दुनिया से छिप क्यों रहे हैं?

पर आज हनुका का दिल बहुत बेचैन लग रहा था, इसलिये वह महागुरु से मिलने रुद्रलोक की ओर चल दिया था।

उसे पता था कि महागुरु हिमालय के गर्भगृह में स्थित, रुद्रलोक के रुद्रदेव मंदि.र में हैं, पर वह रुद्रलोक में सीधे रास्ते से नहीं जा सकता था, नहीं तो सभी को महागुरु के वहां होने का पता चल जाता।

इसलिये हनुका ने महागुरु से मिलने के लिये रुद्रलोक का गुप्त द्वार चुना था, जो कि ‘सागरमाथा’ पर्वत से होकर जाता था। (एवरेस्ट पर्वत का प्राचीन नाम सागरमाथा है)

कुछ ही देर में उछलते-कूदते हनुका सागरमाथा पर्वत के एक शिखर पर पहुंच गया।

हनुका ने अब अपने चारो ओर देखा और फिर उस पर्वतशिखर के एक स्थान की बर्फ अपने हाथों से साफ करने लगा।

कुछ ही देर में उस बर्फ के नीचे म…देव का एक चित्र उभर आया, जो कि शायद बहुत प्राचीन काल में ही किसी ने वहां पर बनाया था।

हनुका ध्यान से देव के उस चित्र को देखने लगा। कुछ ही देर में हनुका की निगाह चित्र में बने देव की तीसरी आँख पर गई।

देव की उस आँख के स्थान पर एक बहुत छोटा सा छिद्र नजर आ रहा था।

अब हनुका ने ‘ऊँ नमः शि…य’ का जाप किया और अपने शरीर को इतना छोटा कर लिया, कि वह शरीर उस छोटे से छिद्र के पार आसानी से चला जाता।

हनुका उस छिद्र के पार चला गया। दूसरी ओर पहाड़ में एक छोटा सा प्लेटफार्म बना था, हनुका उसी
पर जा गिरा।

अब हनुका ने अपने शरीर को पुनः पहले के आकार में कर लिया और उस छिद्र से मुंह लगा कर अपनी साँस को जोर से खींचा।
हनुका के ऐसा करते ही पर्वत शिखर पर मौजूद बर्फ ने वापस उस चित्र को ढक लिया।

अब हनुका ने अपने आसपास देखा, वह इस समय एक प्लेटफार्म पर, पर्वत के सबसे ऊंचे स्थान पर खड़ा था। हनुका के नीचे की ओर, कुछ दूरी पर एक 200 फुट ऊंची देव की विशाल प्रतिमा बनी थी।

वह प्रतिमा सिर्फ कमर तक ही थी। प्रतिमा की जटाओं से गंगा की एक धार निकलकर, नीचे स्थित एक छोटी सी झील में गिर रही थी।

झील का पानी इतना साफ था कि झील के पानी में देव की प्रतिमा की छाया बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

देव की प्रतिमा से निकली गंगा की धारा, पानी में स्थित प्रतिमा की छाया से बने, देव के तीसरे नेत्र के स्थान पर गिर रही थी। जहां पर गंगा की धारा गिर रही थी, वहां पानी में नीले रंग का एक गोल छल्ला बन गया था।

हनुका को पता था कि उस नीले गोल छल्ले से होकर ही रुद्रलोक जाया जा सकता है, पर वह नीला गोल छल्ला गंगा की धारा के सिवा, किसी को भी अपने अंदर से जाने नहीं देता।

अगर हनुका भी बिना गंगा की धारा के उस गोल छल्ले से निकलने की कोशिश करता, तो वह छल्ला उसे पीस देता।

अतः हनुका ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया और ऊंचाई से, प्रतिमा से निकल रही गंगा की धारा में छलांग लगा दी।

“जय माँ गंगे।”

हनुका का शरीर जैसे ही गंगा की धारा से टकराया, धारा ने हनुका के शरीर के चारो ओर, एक सफेद रंग का कवच सा बना दिया।

हनुका का शरीर अब वेग से नीचे गिरने की जगह, गंगा की धारा के साथ उस झील के पानी की ओर बढ़ा।

जैसे ही हनुका का शरीर झील की सतह के पास पहुंचा, वह नीला छल्ला स्वतः ही आकार में बड़ा हो गया और हनुका का शरीर उस छल्ले को पार करता हुआ, झील के पानी में जा गिरा।

पानी में गिरते ही हनुका तेजी से पानी की तली की ओर तैरने लगा। झील की तली में हनुका को एक विशाल त्रिशूल दिखाई दिया, जिस पर एक डमरु लटक रहा था।

हनुका ने त्रिशूल को प्रणाम कर उसे तेजी से घुमा दिया। त्रिशूल के घूमते ही डमरु की आवाज उस झील की तली में गूंज उठी।

इसी के साथ झील की तली में एक द्वार नजर आने लगा। हनुका उस द्वार में प्रवेश कर गया।

वह द्वार एक विशाल मैदान में खुला, जहां एक बहुत ही विशाल संगमरमर के पत्थरों से निर्मित शिव मंदिर बना था, जिसका आकार, बैठे हुए नंदी के समान था।

नंदी के मस्तक पर एक सोने का मुकुट जड़ा था, जिस पर एक नारंगी रंग की पताका (झंडा ) लहरा रही थी।

उस पताका पर एक सुनहरे रंग का त्रिशूल बना था, जिसके नीचे ‘ऊँ’ लिखा था। नंदी का मुख खुला हुआ था और उस खुले मुख से होकर ही मंदि..र का रास्ता जा रहा था।

हनुका नंदी के खुले मुख से, मंदि..र के अंदर की ओर प्रवेश कर गया। मंदि..र के अंदर पहले 12 मंडप थे, हर एक मंडप में देव की एक ज्यो ....तिर्लिंग की प्रतिकृति विराजमान थी।

इसके बाद मंदि..र का गर्भगृह था, जहां बीचो बीच में देव का एक विशाल ज्यो..तिर्लिंग उपस्थित था। उस ज्यो..तिर्लिंग के दूसरी ओर सैकड़ों त्रिशूल जमीन में धंसे थे।

उन त्रिशूलों के ऊपर, एक मानव शरीर नंगे पैर, तांडव की मुद्रा में नृत्य कर रहा था। यह और कोई नहीं, बल्कि नीलाभ था। देव का परम भक्त नीलाभ।

हलाहल से प्रकट हुआ दिव्यपुरुष नीलाभ। जिसके जीवन का उद्देश्य ही मनुष्यों को वेदों का ज्ञान देना था।

हनुका ने पहले देव को और फिर नीलाभ को प्रणाम किया और चुपचाप वहीं देव की मूर्ति के पास बैठकर नीलाभ की साधना पूर्ण होने की प्रतीक्षा करने लगा।

कुछ देर बाद नीलाभ की साधना पूर्ण हो गई और वह उन्हीं त्रिशूलों पर आसन की मुद्रा में बैठ गया।

“बताओ हनुका, कैसे आना हुआ तुम्हारा?” नीलाभ ने हनुका को देखते हुए पूछा।

“महागुरु, कुछ दिन पहले मैंने पश्चिम दिशा में स्थित एक छोटे से द्वीप पर माता की शक्तियों से बना कवच देखा। शायद माता उस स्थान के ही आसपास कहीं हैं? मैं यह समाचार देने ही आपके पास आया हूं।” हनुका ने कहा।

“तुम उस स्थान पर जाकर माया को ढूंढने की कोशिश करो हनुका, इधर मेरी भी साधना पूर्ण होने वाली है। साधना पूर्ण होने के बाद मैं भी सभी के समक्ष प्रकट हो जाऊंगा।” नीलाभ ने कहा।

“यह किस प्रकार की साधना है महागुरु? जो कि 5,000 वर्षों से अनवरत् चलती ही जा रही है।” हनुका ने अपनी जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा।

“पृथ्वी पर एक घोर संकट आने वाला है हनुका, जिसे सभी महा -शक्तियां मिलकर भी नहीं समाप्त कर सकती हैं। इसी लिये ईश्वर चाहते हैं कि मैं कुछ क्षणों के लिये देव की कुछ शक्तियों को अपने शरीर पर धारण करुं। इसी लिये 5,000 वर्षों से मैं अपने शरीर को उस योग्य बनाने के लिये प्रयास रत हूं।"

"अब तुम जाओ हनुका...और अपनी माता को ढूंढने की कोशिश करो। हां जाने से पहले शि...वलिंग के पास रखी, रक्त भैरवी की वह डिबिया भी लेते जाओ, कुछ ही दिन में वह तुम्हारे काम आने वाली है।... तुम्हें पता है कि उसका प्रयोग कैसे करना है?” इतना कहकर नीलाभ वापस अपनी साधना में लीन हो गया।

पर हनुका आवाक सा खड़ा, कभी नीलाभ को तो कभी ज्यो..तिर्लिंग के पास रखी रक्त भैरवी की डिबिया को देख रहा था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि खतरा कितना बड़ा है? जो रक्त भैरवी की डिबिया का प्रयोग करने की जरुरत आ पड़ी।

हनुका ने एक गहरी साँस भरी और रक्त भैरवी की डिबिया उठाकर अपने वस्त्रों में छिपा ली।

हनुका अब मंदिर के बाहर की ओर चल पड़ा, पर अब वह मानसिक तौर पर महायुद्ध के लिये तैयार था।


चैपटर-13

शीत ऋतु-1:
(तिलिस्मा 4.3)

सुयश के साथ सभी अगले द्वार न्यूजीलैंड में प्रवेश कर गये। पर वहां का नजारा देखकर सभी हैरान रह गये। जहां तक नजर जा रही थी, उन्हें बर्फ ही बर्फ दिखाई दे रही थी।

“यह क्या? यह तो ऐसा लग रहा है कि जैसे हम अंटार्कटिका में आ गये हों।” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

“न्यूजीलैंड भी काफी ठंडी जगह है और वैसे भी हम यहां शीत ऋतु का सामना करने आये हैं, तो बर्फ तो नजर आयेगी ही।” सुयश ने कहा।

तभी उनकी नजर उस बर्फ के मैदान के बीचो बीच खड़ी एक मूर्ति पर गई। मूर्ति देख सब उसी दिशा की ओर चल दिये।

वह एक 10 फुट ऊंची अश्वमानव की बर्फ की प्रतिमा थी, जिसका कमर के नीचे का शरीर घोड़े का और कमर से ऊपर का शरीर एक इंसान का था।

वह अश्वमानव किसी योद्धा के समान शक्तिशाली लग रहा था, उसके हाथ में विचित्र सा अस्त्र था।

उस अस्त्र की मूठ अश्वमानव के हाथ में थी, उस मूठ से एक जंजीर के द्वारा बंधा काँटे जैसा गदा हवा में झूल रहा था। यह अस्त्र बर्फ का नहीं बल्कि किसी धातु का बना दिखाई दे रहा था।

सभी ध्यान से उस अश्वमानव को देखने लगे।

“कैप्टेन, यह रोमन साम्राज्य का योद्धा ‘सेन्टौर’ है।” क्रिस्टी ने कहा- “और इसने अपने हाथ में जो अस्त्र पकड़ रखा है, उसे ‘कंटक’ कहते हैं।”

“पर कैप्टेन, एक बात आपने ध्यान दी, कि इस सेन्टौर का पूरा शरीर तो बर्फ का बना है परंतु इसकी आँख और पूंछ के बाल असली जैसे लग रहे है।” ऐलेक्स ने कहा।

“हो सकता है कि इसकी पूंछ और आँखों में ही कोई रहस्य छिपा हो?” सुयश ने सेन्टौर को देखते हुए कहा।

“लेकिन इस जगह पर सेन्टौर की मूर्ति के सिवा और कुछ तो है ही नहीं, फिर हमें यहां करना क्या है?” जेनिथ ने कहा।

“है जेनिथ दीदी, यहां पर और भी चीजें हैं, पर आप लोगों ने अभी तक उस पर ध्यान ही नहीं दिया है।” यह कहकर शैफाली ने सभी का ध्यान जमीन के नीचे बनी बर्फ की झील की ओर कर दिया- “नीचे जमीन की ओर देखिये, जमीन के नीचे एक विशाल बर्फ की झील मौजूद है, जिसमें कुछ मछलियां और समुद्री घोड़ा तैर रहा है।”

शैफाली की बात सुनकर सभी ने नीचे की ओर देखा, शैफाली सही कह रही थी, नीचे एक झील मौजूद थी।

“पर कैप्टेन, मेरी जानकारी के हिसाब से समुद्री घोड़ा ना तो झील के पानी में पाया जाता है और ना ही इतने ठंडे पानी में वह रह सकता है।” तौफीक ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“यह तिलिस्म है, यहां पर कुछ भी संभव हो सकता है?” सुयश ने कहा।

तभी शैफाली बैठकर पानी के नीचे तैर रही, उन मछलियों को ध्यान से देखने लगी। वह मछलियां साधारण मछलियों के हिसाब से बहुत धीरे तैर रहीं थीं।

“कैप्टेन अंकल, ये ऑस्ट्रेलिया में पायी जाने वाली मिसगर्न नाम की मछली है, इंसान इस मछली का प्रयोग भूकंप का पता लगाने के लिये करता है। वैसे प्रायः यह मछलियां बहुत सुस्त होतीं हैं, पर जब भी भूकंप आने वाला होता है, यह बहुत तेजी से इधर-उधर भागने लगती हैं। दरअसल यह मछलियां पृथ्वी की भूगर्भीय हलचल को कुछ समय पहले ही पहचान जातीं हैं, जिससे यह घबराकर तेज गति से तैरने लगती हैं।” शैफाली ने कहा।

“इसका मतलब हमें इस द्वार में भूकंप का सामना करना पड़ेगा क्यों कि कैश्वर इस मिसगर्न मछली को यूं ही तो नहीं रखा होगा यहां पर?” जेनिथ ने कहा।

जेनिथ की बात सभी को सही लगी।

“तो कैप्टेन हमें कहीं ना कहीं से तो इस तिलिस्म की शुरुआत करनी ही पड़ेगी, तो आप कृपया बताइये कि हमें कहां से शुरु करना सही रहेगा?” क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।

“देखो, यहां 3 चीजें ही हैं, पहला वह सेन्टौर, दूसरा समुद्री घोड़ा और तीसरा मिसगर्न मछली। अब 2 चीजें तो पानी के अंदर हैं, तो फिर हमें इस सेन्टौर से ही शुरु करना होगा।” सुयश ने कहा। यह सुन सभी सेन्टौर के पास आकर खड़े हो गये।

“इस सेन्टौर के शरीर में पूंछ और आँखें ही असली लग रहीं हैं, इस लिये इन दोनों में ही कोई ना कोई रहस्य होगा? तो ऐसा करो कि 3 लोग इसके अगले भाग में रहकर, इसकी आँखों पर नजर रखो और बाकी बचे 3 लोग पीछे की ओर जाकर इसकी पूंछ को छुओ और देखो कि इस सेन्टौर में क्या परिवर्तन हो रहें हैं?”

सुयश के यह कहते ही क्रिस्टी और जेनिथ सुयश के साथ सेन्टौर के पिछले हिस्से की ओर खड़े हो गये और तौफीक, ऐलेक्स और शैफाली सेन्टौर के अगले भाग में खड़े होकर सेन्टौर की आँखों की ओर देखने लगे।

अब क्रिस्टी ने सेन्टौर की पूंछ को धीरे से उमेठ दिया।

क्रिस्टी के पूंछ को उमेठते ही सेन्टौर की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देखने लगीं।

“कैप्टेन, क्रिस्टी के पूंछ के छूते ही सेन्टौर की दोनों आँखें पता नहीं कैसे 2 दिशाओ में देखने लगी हैं।” ऐलेक्स ने कहा- “पर इससे हमारे आसपास कोई परिवर्तन तो नहीं आया?”

“तभी पानी के नीचे घूम रहा समुद्री घोड़ा एक स्थान से बर्फ को तोड़कर बाहर आ गया। झील के पानी से बाहर निकलते ही समुद्री घोड़े का आकार 10 इंच से बढ़कर 6 फुट का हो गया।

सभी आश्चर्य से बढ़ते हुए उस समुद्री घोड़े को देख रहे थे, परंतु सभी किसी भी खतरे से बचने के लिये सावधान थे।

तभी समुद्री घोड़े का बढ़ना रुक गया। अब वह झील के ठंडे पानी को अपने मुंह में भरने लगा।

बहुत सारा पानी अपने मुंह में भरने के बाद, समुद्री घोड़े ने अपना मुंह ऊपर आसमान की ओर उठाकर, सारा पानी हवा में फूंक मार कर उड़ा दिया।

सभी आश्चर्य से ऊपर आसमान की ओर देखने लगे, किसी को समझ नहीं आया कि उस समुद्री घोड़े ने ऐसा क्यों किया?

“तभी शैफाली ने चिल्लाकर कहा- “भागो , झील का वह पानी ओले बनकर ऊपर आसमान से गिरने वाला है।”

शैफाली की चीख सुनकर सभी सेन्टौर की ओर भागे, क्यों कि उनके बचने की वही एक सुरक्षित जगह थी।

तभी एक ओले का टुकड़ा आकर ऐलेक्स से टकरा गया और सबके देखते ही देखते ऐलेक्स भी एक समुद्री घोड़े में बदल गया।

बाकी सभी लोग बचकर सेन्टौर के नीचे पहुंचने में सफल हो गये, पर अब उधर 2 समुद्री घोड़े हो गये थे।
दोनों समुद्री घोड़े एक दूसरे के पास पहुंचकर तेजी से नाचने लगे।

अब यह पहचानना बहुत ही मुश्किल हो गया कि उनमें से असली समुद्री घोड़ा कौन है और ऐलेक्स कौन है? अब दोनों समुद्री घोड़े झील से अपने मुंह में पानी भरकर, आसमान की ओर उछालने लगे।

ऐलेक्स को समुद्री घोड़ा बनते देख, क्रिस्टी इस बार ज्यादा परेशान नहीं हुई क्यों कि अब उसे तिलिस्मा के बारे में पता चल गया था। वह जानती थी कि इस द्वार को पार करते ही ऐलेक्स स्वतः ही सही हो जायेगा।

बहरहाल अब ओलों की ताकत सभी जान गये थे, इसलिये कोई भी सेन्टौर के नीचे से निकलने को नही तैयार था।

एक फायदा यह था कि दोनों समुद्री घोड़ों में से कोई भी उनके पास आने की कोशिश नहीं कर रहा था।

“मेरे हिसाब से यह परेशानी इस सेन्टौर की पूंछ उमेठने से आयी थी, तो अगर हम वापस इसकी पूंछ को सही कर दें, तो शायद ऐलेक्स भी सही हो जाये और यह असली समुद्री घोड़ा भी वापस झील में चला जाये।” जेनिथ ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा।

सेन्टौर की पूंछ उमेठने के लिये किसी को बाहर जाने की जरुरत नहीं थी।

क्रिस्टी धीरे से सेन्टौर के पूंछ वाले हिस्से की ओर आ गई और उसने सेन्टौर की पूंछ को पहली वाली स्थिति में कर दिया, पर फिर भी दोनों समुद्री घोड़ों का ओले बनाने का कार्य जारी रहा। यह देख क्रिस्टी वापस आ गई।

“कैप्टेन अब सेन्टौर की पूंछ पहले जैसे करने पर भी कुछ नहीं हो रहा?” क्रिस्टी ने कहा।

“मुझे लगता है कि इस समस्या का हल सेन्टौर की पूंछ में नहीं बल्कि उसकी आँख में छिपा है।” शैफाली ने कहा- “कैप्टेन, समुद्र घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देख सकती हैं, पर जमीन पर चलने वाला घोड़ा ऐसा नहीं कर सकता। तो फिर हो ना हो इस सेन्टौर की आँखें 2 दिशाओं में हो जाने की वजह से, वह समुद्री घोड़ा जागा था। और अगर ऐसा है तो हम सेन्टौर की आँखों को सही कर समुद्री घोड़े को रोक सकते हैं।”

शैफाली की बात सुनकर तौफीक सेन्टौर के नीचे से निकला और सेन्टौर की आँखों को अपने हाथ से एडजेस्ट कर सही कर दिया।

तौफीक के ऐसा करते ही बाहर मौजूद दोनों समुद्री घोड़े अचानक से रुक गये।

अब एक घोड़े का आकार फिर से छोटा होने लगा। कुछ ही देर में वह समुद्री घोड़ा वापस 10 इंच का हो गया और झील में कूदकर गायब हो गया।

“चलो 2 मुसीबत से पीछा छूटा।” जेनिथ ने कहा- “एक तो आसमान से ओले गिरना बंद हो गया और दूसरा वह समुद्री घोड़ा वापस झील में चला गया।”

“पर यह ऐलेक्स अभी तक अपने रुप में क्यों नहीं आया?” क्रिस्टी ने घबराते हुए कहा- “कहीं यह हमेशा के लिये समुद्री घोड़ा तो नहीं बन गया?”

“अरे नहीं-नहीं क्रिस्टी दीदी, ऐलेक्स भैया जल्दी ही सहीं हो जायेंगे।” शैफाली ने क्रिस्टी को सांत्वना देते हुए कहा- “रुकिये, मुझे सोचने दीजिये कि ऐलेक्स भैया सही क्यों नहीं हुए?....समुद्री घोड़ा, सेन्टौर की वजह से जागा था, इसलिये सेन्टौर की आँखें सही करने पर वह सही हो गया, परंतु ऐलेक्स भैया,..... वह तो ओले की वजह से समुद्री घोड़ा बने थे, इसलिये अवश्य ही ऐलेक्स भैया को सही करने के लिये समुद्री घोड़े की आँख को सही करना पड़ेगा? और मेरे सोच को तर्क देने के लिये हमें समुद्री घोड़े की आँख एक बार देखनी ही होगी?”


जारी रहेगा
_______:writing:
Nice update.....
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Raj_sharma

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Shefali and uski team Alex ko kaise theek karti hai, sath hi sath New Zealand ka ye safar kaisa hone wala hai, wonderful update brother, waiting for next episode eagerly, keep writing whenever you get the leisure time.
Iska pata to aane wale update me hi chalega dost. Sath bane rahiye , thank you very much for your valuable review and support bhai :hug:
 

Ajju Landwalia

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#174.

दिव्य पुरुष:
(17.01.02, गुरुवार,10:40, हिमालय का गर्भग्रह, रुद्रलोक)

हिमालय पर हर ओर श्वेत, स्निग्ध सी बर्फ फैली हुई थी, इसी बर्फ पर हनुका चला जा रहा था।

बड़ा ही घुमावदार और दुर्गम रास्ता था। कुछ दूर जाने के लिये भी एक लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा था।

हनुका ने जबसे अराका द्वीप पर माया का बना सुरक्षा कवच देखा था, तब से ही वह बहुत व्यग्र रह रहा था।

वह चाहता था कि महागुरु नीलाभ से माता के बारे में सबकुछ बता दे, पर महागुरु तो हजारों वर्षों से किसी से मिल ही नहीं रहे थे।

यहां तक कि हनुका के सिवा कोई जानता भी नहीं था कि नीलाभ आखिर है कहां पर? और वह पूरी दुनिया से छिप क्यों रहे हैं?

पर आज हनुका का दिल बहुत बेचैन लग रहा था, इसलिये वह महागुरु से मिलने रुद्रलोक की ओर चल दिया था।

उसे पता था कि महागुरु हिमालय के गर्भगृह में स्थित, रुद्रलोक के रुद्रदेव मंदि.र में हैं, पर वह रुद्रलोक में सीधे रास्ते से नहीं जा सकता था, नहीं तो सभी को महागुरु के वहां होने का पता चल जाता।

इसलिये हनुका ने महागुरु से मिलने के लिये रुद्रलोक का गुप्त द्वार चुना था, जो कि ‘सागरमाथा’ पर्वत से होकर जाता था। (एवरेस्ट पर्वत का प्राचीन नाम सागरमाथा है)

कुछ ही देर में उछलते-कूदते हनुका सागरमाथा पर्वत के एक शिखर पर पहुंच गया।

हनुका ने अब अपने चारो ओर देखा और फिर उस पर्वतशिखर के एक स्थान की बर्फ अपने हाथों से साफ करने लगा।

कुछ ही देर में उस बर्फ के नीचे म…देव का एक चित्र उभर आया, जो कि शायद बहुत प्राचीन काल में ही किसी ने वहां पर बनाया था।

हनुका ध्यान से देव के उस चित्र को देखने लगा। कुछ ही देर में हनुका की निगाह चित्र में बने देव की तीसरी आँख पर गई।

देव की उस आँख के स्थान पर एक बहुत छोटा सा छिद्र नजर आ रहा था।

अब हनुका ने ‘ऊँ नमः शि…य’ का जाप किया और अपने शरीर को इतना छोटा कर लिया, कि वह शरीर उस छोटे से छिद्र के पार आसानी से चला जाता।

हनुका उस छिद्र के पार चला गया। दूसरी ओर पहाड़ में एक छोटा सा प्लेटफार्म बना था, हनुका उसी
पर जा गिरा।

अब हनुका ने अपने शरीर को पुनः पहले के आकार में कर लिया और उस छिद्र से मुंह लगा कर अपनी साँस को जोर से खींचा।
हनुका के ऐसा करते ही पर्वत शिखर पर मौजूद बर्फ ने वापस उस चित्र को ढक लिया।

अब हनुका ने अपने आसपास देखा, वह इस समय एक प्लेटफार्म पर, पर्वत के सबसे ऊंचे स्थान पर खड़ा था। हनुका के नीचे की ओर, कुछ दूरी पर एक 200 फुट ऊंची देव की विशाल प्रतिमा बनी थी।

वह प्रतिमा सिर्फ कमर तक ही थी। प्रतिमा की जटाओं से गंगा की एक धार निकलकर, नीचे स्थित एक छोटी सी झील में गिर रही थी।

झील का पानी इतना साफ था कि झील के पानी में देव की प्रतिमा की छाया बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

देव की प्रतिमा से निकली गंगा की धारा, पानी में स्थित प्रतिमा की छाया से बने, देव के तीसरे नेत्र के स्थान पर गिर रही थी। जहां पर गंगा की धारा गिर रही थी, वहां पानी में नीले रंग का एक गोल छल्ला बन गया था।

हनुका को पता था कि उस नीले गोल छल्ले से होकर ही रुद्रलोक जाया जा सकता है, पर वह नीला गोल छल्ला गंगा की धारा के सिवा, किसी को भी अपने अंदर से जाने नहीं देता।

अगर हनुका भी बिना गंगा की धारा के उस गोल छल्ले से निकलने की कोशिश करता, तो वह छल्ला उसे पीस देता।

अतः हनुका ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया और ऊंचाई से, प्रतिमा से निकल रही गंगा की धारा में छलांग लगा दी।

“जय माँ गंगे।”

हनुका का शरीर जैसे ही गंगा की धारा से टकराया, धारा ने हनुका के शरीर के चारो ओर, एक सफेद रंग का कवच सा बना दिया।

हनुका का शरीर अब वेग से नीचे गिरने की जगह, गंगा की धारा के साथ उस झील के पानी की ओर बढ़ा।

जैसे ही हनुका का शरीर झील की सतह के पास पहुंचा, वह नीला छल्ला स्वतः ही आकार में बड़ा हो गया और हनुका का शरीर उस छल्ले को पार करता हुआ, झील के पानी में जा गिरा।

पानी में गिरते ही हनुका तेजी से पानी की तली की ओर तैरने लगा। झील की तली में हनुका को एक विशाल त्रिशूल दिखाई दिया, जिस पर एक डमरु लटक रहा था।

हनुका ने त्रिशूल को प्रणाम कर उसे तेजी से घुमा दिया। त्रिशूल के घूमते ही डमरु की आवाज उस झील की तली में गूंज उठी।

इसी के साथ झील की तली में एक द्वार नजर आने लगा। हनुका उस द्वार में प्रवेश कर गया।

वह द्वार एक विशाल मैदान में खुला, जहां एक बहुत ही विशाल संगमरमर के पत्थरों से निर्मित शिव मंदिर बना था, जिसका आकार, बैठे हुए नंदी के समान था।

नंदी के मस्तक पर एक सोने का मुकुट जड़ा था, जिस पर एक नारंगी रंग की पताका (झंडा ) लहरा रही थी।

उस पताका पर एक सुनहरे रंग का त्रिशूल बना था, जिसके नीचे ‘ऊँ’ लिखा था। नंदी का मुख खुला हुआ था और उस खुले मुख से होकर ही मंदि..र का रास्ता जा रहा था।

हनुका नंदी के खुले मुख से, मंदि..र के अंदर की ओर प्रवेश कर गया। मंदि..र के अंदर पहले 12 मंडप थे, हर एक मंडप में देव की एक ज्यो ....तिर्लिंग की प्रतिकृति विराजमान थी।

इसके बाद मंदि..र का गर्भगृह था, जहां बीचो बीच में देव का एक विशाल ज्यो..तिर्लिंग उपस्थित था। उस ज्यो..तिर्लिंग के दूसरी ओर सैकड़ों त्रिशूल जमीन में धंसे थे।

उन त्रिशूलों के ऊपर, एक मानव शरीर नंगे पैर, तांडव की मुद्रा में नृत्य कर रहा था। यह और कोई नहीं, बल्कि नीलाभ था। देव का परम भक्त नीलाभ।

हलाहल से प्रकट हुआ दिव्यपुरुष नीलाभ। जिसके जीवन का उद्देश्य ही मनुष्यों को वेदों का ज्ञान देना था।

हनुका ने पहले देव को और फिर नीलाभ को प्रणाम किया और चुपचाप वहीं देव की मूर्ति के पास बैठकर नीलाभ की साधना पूर्ण होने की प्रतीक्षा करने लगा।

कुछ देर बाद नीलाभ की साधना पूर्ण हो गई और वह उन्हीं त्रिशूलों पर आसन की मुद्रा में बैठ गया।

“बताओ हनुका, कैसे आना हुआ तुम्हारा?” नीलाभ ने हनुका को देखते हुए पूछा।

“महागुरु, कुछ दिन पहले मैंने पश्चिम दिशा में स्थित एक छोटे से द्वीप पर माता की शक्तियों से बना कवच देखा। शायद माता उस स्थान के ही आसपास कहीं हैं? मैं यह समाचार देने ही आपके पास आया हूं।” हनुका ने कहा।

“तुम उस स्थान पर जाकर माया को ढूंढने की कोशिश करो हनुका, इधर मेरी भी साधना पूर्ण होने वाली है। साधना पूर्ण होने के बाद मैं भी सभी के समक्ष प्रकट हो जाऊंगा।” नीलाभ ने कहा।

“यह किस प्रकार की साधना है महागुरु? जो कि 5,000 वर्षों से अनवरत् चलती ही जा रही है।” हनुका ने अपनी जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा।

“पृथ्वी पर एक घोर संकट आने वाला है हनुका, जिसे सभी महा -शक्तियां मिलकर भी नहीं समाप्त कर सकती हैं। इसी लिये ईश्वर चाहते हैं कि मैं कुछ क्षणों के लिये देव की कुछ शक्तियों को अपने शरीर पर धारण करुं। इसी लिये 5,000 वर्षों से मैं अपने शरीर को उस योग्य बनाने के लिये प्रयास रत हूं।"

"अब तुम जाओ हनुका...और अपनी माता को ढूंढने की कोशिश करो। हां जाने से पहले शि...वलिंग के पास रखी, रक्त भैरवी की वह डिबिया भी लेते जाओ, कुछ ही दिन में वह तुम्हारे काम आने वाली है।... तुम्हें पता है कि उसका प्रयोग कैसे करना है?” इतना कहकर नीलाभ वापस अपनी साधना में लीन हो गया।

पर हनुका आवाक सा खड़ा, कभी नीलाभ को तो कभी ज्यो..तिर्लिंग के पास रखी रक्त भैरवी की डिबिया को देख रहा था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि खतरा कितना बड़ा है? जो रक्त भैरवी की डिबिया का प्रयोग करने की जरुरत आ पड़ी।

हनुका ने एक गहरी साँस भरी और रक्त भैरवी की डिबिया उठाकर अपने वस्त्रों में छिपा ली।

हनुका अब मंदिर के बाहर की ओर चल पड़ा, पर अब वह मानसिक तौर पर महायुद्ध के लिये तैयार था।


चैपटर-13

शीत ऋतु-1:
(तिलिस्मा 4.3)

सुयश के साथ सभी अगले द्वार न्यूजीलैंड में प्रवेश कर गये। पर वहां का नजारा देखकर सभी हैरान रह गये। जहां तक नजर जा रही थी, उन्हें बर्फ ही बर्फ दिखाई दे रही थी।

“यह क्या? यह तो ऐसा लग रहा है कि जैसे हम अंटार्कटिका में आ गये हों।” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

“न्यूजीलैंड भी काफी ठंडी जगह है और वैसे भी हम यहां शीत ऋतु का सामना करने आये हैं, तो बर्फ तो नजर आयेगी ही।” सुयश ने कहा।

तभी उनकी नजर उस बर्फ के मैदान के बीचो बीच खड़ी एक मूर्ति पर गई। मूर्ति देख सब उसी दिशा की ओर चल दिये।

वह एक 10 फुट ऊंची अश्वमानव की बर्फ की प्रतिमा थी, जिसका कमर के नीचे का शरीर घोड़े का और कमर से ऊपर का शरीर एक इंसान का था।

वह अश्वमानव किसी योद्धा के समान शक्तिशाली लग रहा था, उसके हाथ में विचित्र सा अस्त्र था।

उस अस्त्र की मूठ अश्वमानव के हाथ में थी, उस मूठ से एक जंजीर के द्वारा बंधा काँटे जैसा गदा हवा में झूल रहा था। यह अस्त्र बर्फ का नहीं बल्कि किसी धातु का बना दिखाई दे रहा था।

सभी ध्यान से उस अश्वमानव को देखने लगे।

“कैप्टेन, यह रोमन साम्राज्य का योद्धा ‘सेन्टौर’ है।” क्रिस्टी ने कहा- “और इसने अपने हाथ में जो अस्त्र पकड़ रखा है, उसे ‘कंटक’ कहते हैं।”

“पर कैप्टेन, एक बात आपने ध्यान दी, कि इस सेन्टौर का पूरा शरीर तो बर्फ का बना है परंतु इसकी आँख और पूंछ के बाल असली जैसे लग रहे है।” ऐलेक्स ने कहा।

“हो सकता है कि इसकी पूंछ और आँखों में ही कोई रहस्य छिपा हो?” सुयश ने सेन्टौर को देखते हुए कहा।

“लेकिन इस जगह पर सेन्टौर की मूर्ति के सिवा और कुछ तो है ही नहीं, फिर हमें यहां करना क्या है?” जेनिथ ने कहा।

“है जेनिथ दीदी, यहां पर और भी चीजें हैं, पर आप लोगों ने अभी तक उस पर ध्यान ही नहीं दिया है।” यह कहकर शैफाली ने सभी का ध्यान जमीन के नीचे बनी बर्फ की झील की ओर कर दिया- “नीचे जमीन की ओर देखिये, जमीन के नीचे एक विशाल बर्फ की झील मौजूद है, जिसमें कुछ मछलियां और समुद्री घोड़ा तैर रहा है।”

शैफाली की बात सुनकर सभी ने नीचे की ओर देखा, शैफाली सही कह रही थी, नीचे एक झील मौजूद थी।

“पर कैप्टेन, मेरी जानकारी के हिसाब से समुद्री घोड़ा ना तो झील के पानी में पाया जाता है और ना ही इतने ठंडे पानी में वह रह सकता है।” तौफीक ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“यह तिलिस्म है, यहां पर कुछ भी संभव हो सकता है?” सुयश ने कहा।

तभी शैफाली बैठकर पानी के नीचे तैर रही, उन मछलियों को ध्यान से देखने लगी। वह मछलियां साधारण मछलियों के हिसाब से बहुत धीरे तैर रहीं थीं।

“कैप्टेन अंकल, ये ऑस्ट्रेलिया में पायी जाने वाली मिसगर्न नाम की मछली है, इंसान इस मछली का प्रयोग भूकंप का पता लगाने के लिये करता है। वैसे प्रायः यह मछलियां बहुत सुस्त होतीं हैं, पर जब भी भूकंप आने वाला होता है, यह बहुत तेजी से इधर-उधर भागने लगती हैं। दरअसल यह मछलियां पृथ्वी की भूगर्भीय हलचल को कुछ समय पहले ही पहचान जातीं हैं, जिससे यह घबराकर तेज गति से तैरने लगती हैं।” शैफाली ने कहा।

“इसका मतलब हमें इस द्वार में भूकंप का सामना करना पड़ेगा क्यों कि कैश्वर इस मिसगर्न मछली को यूं ही तो नहीं रखा होगा यहां पर?” जेनिथ ने कहा।

जेनिथ की बात सभी को सही लगी।

“तो कैप्टेन हमें कहीं ना कहीं से तो इस तिलिस्म की शुरुआत करनी ही पड़ेगी, तो आप कृपया बताइये कि हमें कहां से शुरु करना सही रहेगा?” क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।

“देखो, यहां 3 चीजें ही हैं, पहला वह सेन्टौर, दूसरा समुद्री घोड़ा और तीसरा मिसगर्न मछली। अब 2 चीजें तो पानी के अंदर हैं, तो फिर हमें इस सेन्टौर से ही शुरु करना होगा।” सुयश ने कहा। यह सुन सभी सेन्टौर के पास आकर खड़े हो गये।

“इस सेन्टौर के शरीर में पूंछ और आँखें ही असली लग रहीं हैं, इस लिये इन दोनों में ही कोई ना कोई रहस्य होगा? तो ऐसा करो कि 3 लोग इसके अगले भाग में रहकर, इसकी आँखों पर नजर रखो और बाकी बचे 3 लोग पीछे की ओर जाकर इसकी पूंछ को छुओ और देखो कि इस सेन्टौर में क्या परिवर्तन हो रहें हैं?”

सुयश के यह कहते ही क्रिस्टी और जेनिथ सुयश के साथ सेन्टौर के पिछले हिस्से की ओर खड़े हो गये और तौफीक, ऐलेक्स और शैफाली सेन्टौर के अगले भाग में खड़े होकर सेन्टौर की आँखों की ओर देखने लगे।

अब क्रिस्टी ने सेन्टौर की पूंछ को धीरे से उमेठ दिया।

क्रिस्टी के पूंछ को उमेठते ही सेन्टौर की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देखने लगीं।

“कैप्टेन, क्रिस्टी के पूंछ के छूते ही सेन्टौर की दोनों आँखें पता नहीं कैसे 2 दिशाओ में देखने लगी हैं।” ऐलेक्स ने कहा- “पर इससे हमारे आसपास कोई परिवर्तन तो नहीं आया?”

“तभी पानी के नीचे घूम रहा समुद्री घोड़ा एक स्थान से बर्फ को तोड़कर बाहर आ गया। झील के पानी से बाहर निकलते ही समुद्री घोड़े का आकार 10 इंच से बढ़कर 6 फुट का हो गया।

सभी आश्चर्य से बढ़ते हुए उस समुद्री घोड़े को देख रहे थे, परंतु सभी किसी भी खतरे से बचने के लिये सावधान थे।

तभी समुद्री घोड़े का बढ़ना रुक गया। अब वह झील के ठंडे पानी को अपने मुंह में भरने लगा।

बहुत सारा पानी अपने मुंह में भरने के बाद, समुद्री घोड़े ने अपना मुंह ऊपर आसमान की ओर उठाकर, सारा पानी हवा में फूंक मार कर उड़ा दिया।

सभी आश्चर्य से ऊपर आसमान की ओर देखने लगे, किसी को समझ नहीं आया कि उस समुद्री घोड़े ने ऐसा क्यों किया?

“तभी शैफाली ने चिल्लाकर कहा- “भागो , झील का वह पानी ओले बनकर ऊपर आसमान से गिरने वाला है।”

शैफाली की चीख सुनकर सभी सेन्टौर की ओर भागे, क्यों कि उनके बचने की वही एक सुरक्षित जगह थी।

तभी एक ओले का टुकड़ा आकर ऐलेक्स से टकरा गया और सबके देखते ही देखते ऐलेक्स भी एक समुद्री घोड़े में बदल गया।

बाकी सभी लोग बचकर सेन्टौर के नीचे पहुंचने में सफल हो गये, पर अब उधर 2 समुद्री घोड़े हो गये थे।
दोनों समुद्री घोड़े एक दूसरे के पास पहुंचकर तेजी से नाचने लगे।

अब यह पहचानना बहुत ही मुश्किल हो गया कि उनमें से असली समुद्री घोड़ा कौन है और ऐलेक्स कौन है? अब दोनों समुद्री घोड़े झील से अपने मुंह में पानी भरकर, आसमान की ओर उछालने लगे।

ऐलेक्स को समुद्री घोड़ा बनते देख, क्रिस्टी इस बार ज्यादा परेशान नहीं हुई क्यों कि अब उसे तिलिस्मा के बारे में पता चल गया था। वह जानती थी कि इस द्वार को पार करते ही ऐलेक्स स्वतः ही सही हो जायेगा।

बहरहाल अब ओलों की ताकत सभी जान गये थे, इसलिये कोई भी सेन्टौर के नीचे से निकलने को नही तैयार था।

एक फायदा यह था कि दोनों समुद्री घोड़ों में से कोई भी उनके पास आने की कोशिश नहीं कर रहा था।

“मेरे हिसाब से यह परेशानी इस सेन्टौर की पूंछ उमेठने से आयी थी, तो अगर हम वापस इसकी पूंछ को सही कर दें, तो शायद ऐलेक्स भी सही हो जाये और यह असली समुद्री घोड़ा भी वापस झील में चला जाये।” जेनिथ ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा।

सेन्टौर की पूंछ उमेठने के लिये किसी को बाहर जाने की जरुरत नहीं थी।

क्रिस्टी धीरे से सेन्टौर के पूंछ वाले हिस्से की ओर आ गई और उसने सेन्टौर की पूंछ को पहली वाली स्थिति में कर दिया, पर फिर भी दोनों समुद्री घोड़ों का ओले बनाने का कार्य जारी रहा। यह देख क्रिस्टी वापस आ गई।

“कैप्टेन अब सेन्टौर की पूंछ पहले जैसे करने पर भी कुछ नहीं हो रहा?” क्रिस्टी ने कहा।

“मुझे लगता है कि इस समस्या का हल सेन्टौर की पूंछ में नहीं बल्कि उसकी आँख में छिपा है।” शैफाली ने कहा- “कैप्टेन, समुद्र घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देख सकती हैं, पर जमीन पर चलने वाला घोड़ा ऐसा नहीं कर सकता। तो फिर हो ना हो इस सेन्टौर की आँखें 2 दिशाओं में हो जाने की वजह से, वह समुद्री घोड़ा जागा था। और अगर ऐसा है तो हम सेन्टौर की आँखों को सही कर समुद्री घोड़े को रोक सकते हैं।”

शैफाली की बात सुनकर तौफीक सेन्टौर के नीचे से निकला और सेन्टौर की आँखों को अपने हाथ से एडजेस्ट कर सही कर दिया।

तौफीक के ऐसा करते ही बाहर मौजूद दोनों समुद्री घोड़े अचानक से रुक गये।

अब एक घोड़े का आकार फिर से छोटा होने लगा। कुछ ही देर में वह समुद्री घोड़ा वापस 10 इंच का हो गया और झील में कूदकर गायब हो गया।

“चलो 2 मुसीबत से पीछा छूटा।” जेनिथ ने कहा- “एक तो आसमान से ओले गिरना बंद हो गया और दूसरा वह समुद्री घोड़ा वापस झील में चला गया।”

“पर यह ऐलेक्स अभी तक अपने रुप में क्यों नहीं आया?” क्रिस्टी ने घबराते हुए कहा- “कहीं यह हमेशा के लिये समुद्री घोड़ा तो नहीं बन गया?”

“अरे नहीं-नहीं क्रिस्टी दीदी, ऐलेक्स भैया जल्दी ही सहीं हो जायेंगे।” शैफाली ने क्रिस्टी को सांत्वना देते हुए कहा- “रुकिये, मुझे सोचने दीजिये कि ऐलेक्स भैया सही क्यों नहीं हुए?....समुद्री घोड़ा, सेन्टौर की वजह से जागा था, इसलिये सेन्टौर की आँखें सही करने पर वह सही हो गया, परंतु ऐलेक्स भैया,..... वह तो ओले की वजह से समुद्री घोड़ा बने थे, इसलिये अवश्य ही ऐलेक्स भैया को सही करने के लिये समुद्री घोड़े की आँख को सही करना पड़ेगा? और मेरे सोच को तर्क देने के लिये हमें समुद्री घोड़े की आँख एक बार देखनी ही होगी?”


जारी रहेगा
_______:writing:

Bahut hi shandar update he Raj_sharma Bhai

Kasuti jaan aafate me daal rakhi he ke-ishwar ne in sabki

Keep rocking Bro
 

Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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#174.

दिव्य पुरुष:
(17.01.02, गुरुवार,10:40, हिमालय का गर्भग्रह, रुद्रलोक)

हिमालय पर हर ओर श्वेत, स्निग्ध सी बर्फ फैली हुई थी, इसी बर्फ पर हनुका चला जा रहा था।

बड़ा ही घुमावदार और दुर्गम रास्ता था। कुछ दूर जाने के लिये भी एक लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा था।

हनुका ने जबसे अराका द्वीप पर माया का बना सुरक्षा कवच देखा था, तब से ही वह बहुत व्यग्र रह रहा था।

वह चाहता था कि महागुरु नीलाभ से माता के बारे में सबकुछ बता दे, पर महागुरु तो हजारों वर्षों से किसी से मिल ही नहीं रहे थे।

यहां तक कि हनुका के सिवा कोई जानता भी नहीं था कि नीलाभ आखिर है कहां पर? और वह पूरी दुनिया से छिप क्यों रहे हैं?

पर आज हनुका का दिल बहुत बेचैन लग रहा था, इसलिये वह महागुरु से मिलने रुद्रलोक की ओर चल दिया था।

उसे पता था कि महागुरु हिमालय के गर्भगृह में स्थित, रुद्रलोक के रुद्रदेव मंदि.र में हैं, पर वह रुद्रलोक में सीधे रास्ते से नहीं जा सकता था, नहीं तो सभी को महागुरु के वहां होने का पता चल जाता।

इसलिये हनुका ने महागुरु से मिलने के लिये रुद्रलोक का गुप्त द्वार चुना था, जो कि ‘सागरमाथा’ पर्वत से होकर जाता था। (एवरेस्ट पर्वत का प्राचीन नाम सागरमाथा है)

कुछ ही देर में उछलते-कूदते हनुका सागरमाथा पर्वत के एक शिखर पर पहुंच गया।

हनुका ने अब अपने चारो ओर देखा और फिर उस पर्वतशिखर के एक स्थान की बर्फ अपने हाथों से साफ करने लगा।

कुछ ही देर में उस बर्फ के नीचे म…देव का एक चित्र उभर आया, जो कि शायद बहुत प्राचीन काल में ही किसी ने वहां पर बनाया था।

हनुका ध्यान से देव के उस चित्र को देखने लगा। कुछ ही देर में हनुका की निगाह चित्र में बने देव की तीसरी आँख पर गई।

देव की उस आँख के स्थान पर एक बहुत छोटा सा छिद्र नजर आ रहा था।

अब हनुका ने ‘ऊँ नमः शि…य’ का जाप किया और अपने शरीर को इतना छोटा कर लिया, कि वह शरीर उस छोटे से छिद्र के पार आसानी से चला जाता।

हनुका उस छिद्र के पार चला गया। दूसरी ओर पहाड़ में एक छोटा सा प्लेटफार्म बना था, हनुका उसी
पर जा गिरा।

अब हनुका ने अपने शरीर को पुनः पहले के आकार में कर लिया और उस छिद्र से मुंह लगा कर अपनी साँस को जोर से खींचा।
हनुका के ऐसा करते ही पर्वत शिखर पर मौजूद बर्फ ने वापस उस चित्र को ढक लिया।

अब हनुका ने अपने आसपास देखा, वह इस समय एक प्लेटफार्म पर, पर्वत के सबसे ऊंचे स्थान पर खड़ा था। हनुका के नीचे की ओर, कुछ दूरी पर एक 200 फुट ऊंची देव की विशाल प्रतिमा बनी थी।

वह प्रतिमा सिर्फ कमर तक ही थी। प्रतिमा की जटाओं से गंगा की एक धार निकलकर, नीचे स्थित एक छोटी सी झील में गिर रही थी।

झील का पानी इतना साफ था कि झील के पानी में देव की प्रतिमा की छाया बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

देव की प्रतिमा से निकली गंगा की धारा, पानी में स्थित प्रतिमा की छाया से बने, देव के तीसरे नेत्र के स्थान पर गिर रही थी। जहां पर गंगा की धारा गिर रही थी, वहां पानी में नीले रंग का एक गोल छल्ला बन गया था।

हनुका को पता था कि उस नीले गोल छल्ले से होकर ही रुद्रलोक जाया जा सकता है, पर वह नीला गोल छल्ला गंगा की धारा के सिवा, किसी को भी अपने अंदर से जाने नहीं देता।

अगर हनुका भी बिना गंगा की धारा के उस गोल छल्ले से निकलने की कोशिश करता, तो वह छल्ला उसे पीस देता।

अतः हनुका ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया और ऊंचाई से, प्रतिमा से निकल रही गंगा की धारा में छलांग लगा दी।

“जय माँ गंगे।”

हनुका का शरीर जैसे ही गंगा की धारा से टकराया, धारा ने हनुका के शरीर के चारो ओर, एक सफेद रंग का कवच सा बना दिया।

हनुका का शरीर अब वेग से नीचे गिरने की जगह, गंगा की धारा के साथ उस झील के पानी की ओर बढ़ा।

जैसे ही हनुका का शरीर झील की सतह के पास पहुंचा, वह नीला छल्ला स्वतः ही आकार में बड़ा हो गया और हनुका का शरीर उस छल्ले को पार करता हुआ, झील के पानी में जा गिरा।

पानी में गिरते ही हनुका तेजी से पानी की तली की ओर तैरने लगा। झील की तली में हनुका को एक विशाल त्रिशूल दिखाई दिया, जिस पर एक डमरु लटक रहा था।

हनुका ने त्रिशूल को प्रणाम कर उसे तेजी से घुमा दिया। त्रिशूल के घूमते ही डमरु की आवाज उस झील की तली में गूंज उठी।

इसी के साथ झील की तली में एक द्वार नजर आने लगा। हनुका उस द्वार में प्रवेश कर गया।

वह द्वार एक विशाल मैदान में खुला, जहां एक बहुत ही विशाल संगमरमर के पत्थरों से निर्मित शिव मंदिर बना था, जिसका आकार, बैठे हुए नंदी के समान था।

नंदी के मस्तक पर एक सोने का मुकुट जड़ा था, जिस पर एक नारंगी रंग की पताका (झंडा ) लहरा रही थी।

उस पताका पर एक सुनहरे रंग का त्रिशूल बना था, जिसके नीचे ‘ऊँ’ लिखा था। नंदी का मुख खुला हुआ था और उस खुले मुख से होकर ही मंदि..र का रास्ता जा रहा था।

हनुका नंदी के खुले मुख से, मंदि..र के अंदर की ओर प्रवेश कर गया। मंदि..र के अंदर पहले 12 मंडप थे, हर एक मंडप में देव की एक ज्यो ....तिर्लिंग की प्रतिकृति विराजमान थी।

इसके बाद मंदि..र का गर्भगृह था, जहां बीचो बीच में देव का एक विशाल ज्यो..तिर्लिंग उपस्थित था। उस ज्यो..तिर्लिंग के दूसरी ओर सैकड़ों त्रिशूल जमीन में धंसे थे।

उन त्रिशूलों के ऊपर, एक मानव शरीर नंगे पैर, तांडव की मुद्रा में नृत्य कर रहा था। यह और कोई नहीं, बल्कि नीलाभ था। देव का परम भक्त नीलाभ।

हलाहल से प्रकट हुआ दिव्यपुरुष नीलाभ। जिसके जीवन का उद्देश्य ही मनुष्यों को वेदों का ज्ञान देना था।

हनुका ने पहले देव को और फिर नीलाभ को प्रणाम किया और चुपचाप वहीं देव की मूर्ति के पास बैठकर नीलाभ की साधना पूर्ण होने की प्रतीक्षा करने लगा।

कुछ देर बाद नीलाभ की साधना पूर्ण हो गई और वह उन्हीं त्रिशूलों पर आसन की मुद्रा में बैठ गया।

“बताओ हनुका, कैसे आना हुआ तुम्हारा?” नीलाभ ने हनुका को देखते हुए पूछा।

“महागुरु, कुछ दिन पहले मैंने पश्चिम दिशा में स्थित एक छोटे से द्वीप पर माता की शक्तियों से बना कवच देखा। शायद माता उस स्थान के ही आसपास कहीं हैं? मैं यह समाचार देने ही आपके पास आया हूं।” हनुका ने कहा।

“तुम उस स्थान पर जाकर माया को ढूंढने की कोशिश करो हनुका, इधर मेरी भी साधना पूर्ण होने वाली है। साधना पूर्ण होने के बाद मैं भी सभी के समक्ष प्रकट हो जाऊंगा।” नीलाभ ने कहा।

“यह किस प्रकार की साधना है महागुरु? जो कि 5,000 वर्षों से अनवरत् चलती ही जा रही है।” हनुका ने अपनी जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा।

“पृथ्वी पर एक घोर संकट आने वाला है हनुका, जिसे सभी महा -शक्तियां मिलकर भी नहीं समाप्त कर सकती हैं। इसी लिये ईश्वर चाहते हैं कि मैं कुछ क्षणों के लिये देव की कुछ शक्तियों को अपने शरीर पर धारण करुं। इसी लिये 5,000 वर्षों से मैं अपने शरीर को उस योग्य बनाने के लिये प्रयास रत हूं।"

"अब तुम जाओ हनुका...और अपनी माता को ढूंढने की कोशिश करो। हां जाने से पहले शि...वलिंग के पास रखी, रक्त भैरवी की वह डिबिया भी लेते जाओ, कुछ ही दिन में वह तुम्हारे काम आने वाली है।... तुम्हें पता है कि उसका प्रयोग कैसे करना है?” इतना कहकर नीलाभ वापस अपनी साधना में लीन हो गया।

पर हनुका आवाक सा खड़ा, कभी नीलाभ को तो कभी ज्यो..तिर्लिंग के पास रखी रक्त भैरवी की डिबिया को देख रहा था।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि खतरा कितना बड़ा है? जो रक्त भैरवी की डिबिया का प्रयोग करने की जरुरत आ पड़ी।

हनुका ने एक गहरी साँस भरी और रक्त भैरवी की डिबिया उठाकर अपने वस्त्रों में छिपा ली।

हनुका अब मंदिर के बाहर की ओर चल पड़ा, पर अब वह मानसिक तौर पर महायुद्ध के लिये तैयार था।


चैपटर-13

शीत ऋतु-1:
(तिलिस्मा 4.3)

सुयश के साथ सभी अगले द्वार न्यूजीलैंड में प्रवेश कर गये। पर वहां का नजारा देखकर सभी हैरान रह गये। जहां तक नजर जा रही थी, उन्हें बर्फ ही बर्फ दिखाई दे रही थी।

“यह क्या? यह तो ऐसा लग रहा है कि जैसे हम अंटार्कटिका में आ गये हों।” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।

“न्यूजीलैंड भी काफी ठंडी जगह है और वैसे भी हम यहां शीत ऋतु का सामना करने आये हैं, तो बर्फ तो नजर आयेगी ही।” सुयश ने कहा।

तभी उनकी नजर उस बर्फ के मैदान के बीचो बीच खड़ी एक मूर्ति पर गई। मूर्ति देख सब उसी दिशा की ओर चल दिये।

वह एक 10 फुट ऊंची अश्वमानव की बर्फ की प्रतिमा थी, जिसका कमर के नीचे का शरीर घोड़े का और कमर से ऊपर का शरीर एक इंसान का था।

वह अश्वमानव किसी योद्धा के समान शक्तिशाली लग रहा था, उसके हाथ में विचित्र सा अस्त्र था।

उस अस्त्र की मूठ अश्वमानव के हाथ में थी, उस मूठ से एक जंजीर के द्वारा बंधा काँटे जैसा गदा हवा में झूल रहा था। यह अस्त्र बर्फ का नहीं बल्कि किसी धातु का बना दिखाई दे रहा था।

सभी ध्यान से उस अश्वमानव को देखने लगे।

“कैप्टेन, यह रोमन साम्राज्य का योद्धा ‘सेन्टौर’ है।” क्रिस्टी ने कहा- “और इसने अपने हाथ में जो अस्त्र पकड़ रखा है, उसे ‘कंटक’ कहते हैं।”

“पर कैप्टेन, एक बात आपने ध्यान दी, कि इस सेन्टौर का पूरा शरीर तो बर्फ का बना है परंतु इसकी आँख और पूंछ के बाल असली जैसे लग रहे है।” ऐलेक्स ने कहा।

“हो सकता है कि इसकी पूंछ और आँखों में ही कोई रहस्य छिपा हो?” सुयश ने सेन्टौर को देखते हुए कहा।

“लेकिन इस जगह पर सेन्टौर की मूर्ति के सिवा और कुछ तो है ही नहीं, फिर हमें यहां करना क्या है?” जेनिथ ने कहा।

“है जेनिथ दीदी, यहां पर और भी चीजें हैं, पर आप लोगों ने अभी तक उस पर ध्यान ही नहीं दिया है।” यह कहकर शैफाली ने सभी का ध्यान जमीन के नीचे बनी बर्फ की झील की ओर कर दिया- “नीचे जमीन की ओर देखिये, जमीन के नीचे एक विशाल बर्फ की झील मौजूद है, जिसमें कुछ मछलियां और समुद्री घोड़ा तैर रहा है।”

शैफाली की बात सुनकर सभी ने नीचे की ओर देखा, शैफाली सही कह रही थी, नीचे एक झील मौजूद थी।

“पर कैप्टेन, मेरी जानकारी के हिसाब से समुद्री घोड़ा ना तो झील के पानी में पाया जाता है और ना ही इतने ठंडे पानी में वह रह सकता है।” तौफीक ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।

“यह तिलिस्म है, यहां पर कुछ भी संभव हो सकता है?” सुयश ने कहा।

तभी शैफाली बैठकर पानी के नीचे तैर रही, उन मछलियों को ध्यान से देखने लगी। वह मछलियां साधारण मछलियों के हिसाब से बहुत धीरे तैर रहीं थीं।

“कैप्टेन अंकल, ये ऑस्ट्रेलिया में पायी जाने वाली मिसगर्न नाम की मछली है, इंसान इस मछली का प्रयोग भूकंप का पता लगाने के लिये करता है। वैसे प्रायः यह मछलियां बहुत सुस्त होतीं हैं, पर जब भी भूकंप आने वाला होता है, यह बहुत तेजी से इधर-उधर भागने लगती हैं। दरअसल यह मछलियां पृथ्वी की भूगर्भीय हलचल को कुछ समय पहले ही पहचान जातीं हैं, जिससे यह घबराकर तेज गति से तैरने लगती हैं।” शैफाली ने कहा।

“इसका मतलब हमें इस द्वार में भूकंप का सामना करना पड़ेगा क्यों कि कैश्वर इस मिसगर्न मछली को यूं ही तो नहीं रखा होगा यहां पर?” जेनिथ ने कहा।

जेनिथ की बात सभी को सही लगी।

“तो कैप्टेन हमें कहीं ना कहीं से तो इस तिलिस्म की शुरुआत करनी ही पड़ेगी, तो आप कृपया बताइये कि हमें कहां से शुरु करना सही रहेगा?” क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।

“देखो, यहां 3 चीजें ही हैं, पहला वह सेन्टौर, दूसरा समुद्री घोड़ा और तीसरा मिसगर्न मछली। अब 2 चीजें तो पानी के अंदर हैं, तो फिर हमें इस सेन्टौर से ही शुरु करना होगा।” सुयश ने कहा। यह सुन सभी सेन्टौर के पास आकर खड़े हो गये।

“इस सेन्टौर के शरीर में पूंछ और आँखें ही असली लग रहीं हैं, इस लिये इन दोनों में ही कोई ना कोई रहस्य होगा? तो ऐसा करो कि 3 लोग इसके अगले भाग में रहकर, इसकी आँखों पर नजर रखो और बाकी बचे 3 लोग पीछे की ओर जाकर इसकी पूंछ को छुओ और देखो कि इस सेन्टौर में क्या परिवर्तन हो रहें हैं?”

सुयश के यह कहते ही क्रिस्टी और जेनिथ सुयश के साथ सेन्टौर के पिछले हिस्से की ओर खड़े हो गये और तौफीक, ऐलेक्स और शैफाली सेन्टौर के अगले भाग में खड़े होकर सेन्टौर की आँखों की ओर देखने लगे।

अब क्रिस्टी ने सेन्टौर की पूंछ को धीरे से उमेठ दिया।

क्रिस्टी के पूंछ को उमेठते ही सेन्टौर की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देखने लगीं।

“कैप्टेन, क्रिस्टी के पूंछ के छूते ही सेन्टौर की दोनों आँखें पता नहीं कैसे 2 दिशाओ में देखने लगी हैं।” ऐलेक्स ने कहा- “पर इससे हमारे आसपास कोई परिवर्तन तो नहीं आया?”

“तभी पानी के नीचे घूम रहा समुद्री घोड़ा एक स्थान से बर्फ को तोड़कर बाहर आ गया। झील के पानी से बाहर निकलते ही समुद्री घोड़े का आकार 10 इंच से बढ़कर 6 फुट का हो गया।

सभी आश्चर्य से बढ़ते हुए उस समुद्री घोड़े को देख रहे थे, परंतु सभी किसी भी खतरे से बचने के लिये सावधान थे।

तभी समुद्री घोड़े का बढ़ना रुक गया। अब वह झील के ठंडे पानी को अपने मुंह में भरने लगा।

बहुत सारा पानी अपने मुंह में भरने के बाद, समुद्री घोड़े ने अपना मुंह ऊपर आसमान की ओर उठाकर, सारा पानी हवा में फूंक मार कर उड़ा दिया।

सभी आश्चर्य से ऊपर आसमान की ओर देखने लगे, किसी को समझ नहीं आया कि उस समुद्री घोड़े ने ऐसा क्यों किया?

“तभी शैफाली ने चिल्लाकर कहा- “भागो , झील का वह पानी ओले बनकर ऊपर आसमान से गिरने वाला है।”

शैफाली की चीख सुनकर सभी सेन्टौर की ओर भागे, क्यों कि उनके बचने की वही एक सुरक्षित जगह थी।

तभी एक ओले का टुकड़ा आकर ऐलेक्स से टकरा गया और सबके देखते ही देखते ऐलेक्स भी एक समुद्री घोड़े में बदल गया।

बाकी सभी लोग बचकर सेन्टौर के नीचे पहुंचने में सफल हो गये, पर अब उधर 2 समुद्री घोड़े हो गये थे।
दोनों समुद्री घोड़े एक दूसरे के पास पहुंचकर तेजी से नाचने लगे।

अब यह पहचानना बहुत ही मुश्किल हो गया कि उनमें से असली समुद्री घोड़ा कौन है और ऐलेक्स कौन है? अब दोनों समुद्री घोड़े झील से अपने मुंह में पानी भरकर, आसमान की ओर उछालने लगे।

ऐलेक्स को समुद्री घोड़ा बनते देख, क्रिस्टी इस बार ज्यादा परेशान नहीं हुई क्यों कि अब उसे तिलिस्मा के बारे में पता चल गया था। वह जानती थी कि इस द्वार को पार करते ही ऐलेक्स स्वतः ही सही हो जायेगा।

बहरहाल अब ओलों की ताकत सभी जान गये थे, इसलिये कोई भी सेन्टौर के नीचे से निकलने को नही तैयार था।

एक फायदा यह था कि दोनों समुद्री घोड़ों में से कोई भी उनके पास आने की कोशिश नहीं कर रहा था।

“मेरे हिसाब से यह परेशानी इस सेन्टौर की पूंछ उमेठने से आयी थी, तो अगर हम वापस इसकी पूंछ को सही कर दें, तो शायद ऐलेक्स भी सही हो जाये और यह असली समुद्री घोड़ा भी वापस झील में चला जाये।” जेनिथ ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा।

सेन्टौर की पूंछ उमेठने के लिये किसी को बाहर जाने की जरुरत नहीं थी।

क्रिस्टी धीरे से सेन्टौर के पूंछ वाले हिस्से की ओर आ गई और उसने सेन्टौर की पूंछ को पहली वाली स्थिति में कर दिया, पर फिर भी दोनों समुद्री घोड़ों का ओले बनाने का कार्य जारी रहा। यह देख क्रिस्टी वापस आ गई।

“कैप्टेन अब सेन्टौर की पूंछ पहले जैसे करने पर भी कुछ नहीं हो रहा?” क्रिस्टी ने कहा।

“मुझे लगता है कि इस समस्या का हल सेन्टौर की पूंछ में नहीं बल्कि उसकी आँख में छिपा है।” शैफाली ने कहा- “कैप्टेन, समुद्र घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देख सकती हैं, पर जमीन पर चलने वाला घोड़ा ऐसा नहीं कर सकता। तो फिर हो ना हो इस सेन्टौर की आँखें 2 दिशाओं में हो जाने की वजह से, वह समुद्री घोड़ा जागा था। और अगर ऐसा है तो हम सेन्टौर की आँखों को सही कर समुद्री घोड़े को रोक सकते हैं।”

शैफाली की बात सुनकर तौफीक सेन्टौर के नीचे से निकला और सेन्टौर की आँखों को अपने हाथ से एडजेस्ट कर सही कर दिया।

तौफीक के ऐसा करते ही बाहर मौजूद दोनों समुद्री घोड़े अचानक से रुक गये।

अब एक घोड़े का आकार फिर से छोटा होने लगा। कुछ ही देर में वह समुद्री घोड़ा वापस 10 इंच का हो गया और झील में कूदकर गायब हो गया।

“चलो 2 मुसीबत से पीछा छूटा।” जेनिथ ने कहा- “एक तो आसमान से ओले गिरना बंद हो गया और दूसरा वह समुद्री घोड़ा वापस झील में चला गया।”

“पर यह ऐलेक्स अभी तक अपने रुप में क्यों नहीं आया?” क्रिस्टी ने घबराते हुए कहा- “कहीं यह हमेशा के लिये समुद्री घोड़ा तो नहीं बन गया?”

“अरे नहीं-नहीं क्रिस्टी दीदी, ऐलेक्स भैया जल्दी ही सहीं हो जायेंगे।” शैफाली ने क्रिस्टी को सांत्वना देते हुए कहा- “रुकिये, मुझे सोचने दीजिये कि ऐलेक्स भैया सही क्यों नहीं हुए?....समुद्री घोड़ा, सेन्टौर की वजह से जागा था, इसलिये सेन्टौर की आँखें सही करने पर वह सही हो गया, परंतु ऐलेक्स भैया,..... वह तो ओले की वजह से समुद्री घोड़ा बने थे, इसलिये अवश्य ही ऐलेक्स भैया को सही करने के लिये समुद्री घोड़े की आँख को सही करना पड़ेगा? और मेरे सोच को तर्क देने के लिये हमें समुद्री घोड़े की आँख एक बार देखनी ही होगी?”


जारी रहेगा
_______:writing:
Shaandar update
 

SHADOW KING

Supreme
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259
romanchak update .hanuka ne neelabh ko bata diya maya ke kawach ke baare me ,neelabh kyu itne varsho se tapasya kar raha hai ye pata chal gaya ,
yaha suyash aur team musibato ka saamna karne me lage hai ,dekhte hai shefali ka idea kaam aata hai ya nahi alex ko ghode se insan banane me .
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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