THE ACRO
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Sawa 10 Pe deduga abhi likhtu hu review
Sawa 10 Pe deduga abhi likhtu hu review
Okey , waise 2nd story pe bhi update de diya hai, padh liyoSawa 10 Pe deduga abhi likhtu hu review

Shandar update bhai#174.
दिव्य पुरुष: (17.01.02, गुरुवार,10:40, हिमालय का गर्भग्रह, रुद्रलोक)
हिमालय पर हर ओर श्वेत, स्निग्ध सी बर्फ फैली हुई थी, इसी बर्फ पर हनुका चला जा रहा था।
बड़ा ही घुमावदार और दुर्गम रास्ता था। कुछ दूर जाने के लिये भी एक लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा था।
हनुका ने जबसे अराका द्वीप पर माया का बना सुरक्षा कवच देखा था, तब से ही वह बहुत व्यग्र रह रहा था।
वह चाहता था कि महागुरु नीलाभ से माता के बारे में सबकुछ बता दे, पर महागुरु तो हजारों वर्षों से किसी से मिल ही नहीं रहे थे।
यहां तक कि हनुका के सिवा कोई जानता भी नहीं था कि नीलाभ आखिर है कहां पर? और वह पूरी दुनिया से छिप क्यों रहे हैं?
पर आज हनुका का दिल बहुत बेचैन लग रहा था, इसलिये वह महागुरु से मिलने रुद्रलोक की ओर चल दिया था।
उसे पता था कि महागुरु हिमालय के गर्भगृह में स्थित, रुद्रलोक के रुद्रदेव मंदि.र में हैं, पर वह रुद्रलोक में सीधे रास्ते से नहीं जा सकता था, नहीं तो सभी को महागुरु के वहां होने का पता चल जाता।
इसलिये हनुका ने महागुरु से मिलने के लिये रुद्रलोक का गुप्त द्वार चुना था, जो कि ‘सागरमाथा’ पर्वत से होकर जाता था। (एवरेस्ट पर्वत का प्राचीन नाम सागरमाथा है)
कुछ ही देर में उछलते-कूदते हनुका सागरमाथा पर्वत के एक शिखर पर पहुंच गया।
हनुका ने अब अपने चारो ओर देखा और फिर उस पर्वतशिखर के एक स्थान की बर्फ अपने हाथों से साफ करने लगा।
कुछ ही देर में उस बर्फ के नीचे म…देव का एक चित्र उभर आया, जो कि शायद बहुत प्राचीन काल में ही किसी ने वहां पर बनाया था।
हनुका ध्यान से देव के उस चित्र को देखने लगा। कुछ ही देर में हनुका की निगाह चित्र में बने देव की तीसरी आँख पर गई।
देव की उस आँख के स्थान पर एक बहुत छोटा सा छिद्र नजर आ रहा था।
अब हनुका ने ‘ऊँ नमः शि…य’ का जाप किया और अपने शरीर को इतना छोटा कर लिया, कि वह शरीर उस छोटे से छिद्र के पार आसानी से चला जाता।
हनुका उस छिद्र के पार चला गया। दूसरी ओर पहाड़ में एक छोटा सा प्लेटफार्म बना था, हनुका उसी
पर जा गिरा।
अब हनुका ने अपने शरीर को पुनः पहले के आकार में कर लिया और उस छिद्र से मुंह लगा कर अपनी साँस को जोर से खींचा।
हनुका के ऐसा करते ही पर्वत शिखर पर मौजूद बर्फ ने वापस उस चित्र को ढक लिया।
अब हनुका ने अपने आसपास देखा, वह इस समय एक प्लेटफार्म पर, पर्वत के सबसे ऊंचे स्थान पर खड़ा था। हनुका के नीचे की ओर, कुछ दूरी पर एक 200 फुट ऊंची देव की विशाल प्रतिमा बनी थी।
वह प्रतिमा सिर्फ कमर तक ही थी। प्रतिमा की जटाओं से गंगा की एक धार निकलकर, नीचे स्थित एक छोटी सी झील में गिर रही थी।
झील का पानी इतना साफ था कि झील के पानी में देव की प्रतिमा की छाया बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।
देव की प्रतिमा से निकली गंगा की धारा, पानी में स्थित प्रतिमा की छाया से बने, देव के तीसरे नेत्र के स्थान पर गिर रही थी। जहां पर गंगा की धारा गिर रही थी, वहां पानी में नीले रंग का एक गोल छल्ला बन गया था।
हनुका को पता था कि उस नीले गोल छल्ले से होकर ही रुद्रलोक जाया जा सकता है, पर वह नीला गोल छल्ला गंगा की धारा के सिवा, किसी को भी अपने अंदर से जाने नहीं देता।
अगर हनुका भी बिना गंगा की धारा के उस गोल छल्ले से निकलने की कोशिश करता, तो वह छल्ला उसे पीस देता।
अतः हनुका ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया और ऊंचाई से, प्रतिमा से निकल रही गंगा की धारा में छलांग लगा दी।
“जय माँ गंगे।”
हनुका का शरीर जैसे ही गंगा की धारा से टकराया, धारा ने हनुका के शरीर के चारो ओर, एक सफेद रंग का कवच सा बना दिया।
हनुका का शरीर अब वेग से नीचे गिरने की जगह, गंगा की धारा के साथ उस झील के पानी की ओर बढ़ा।
जैसे ही हनुका का शरीर झील की सतह के पास पहुंचा, वह नीला छल्ला स्वतः ही आकार में बड़ा हो गया और हनुका का शरीर उस छल्ले को पार करता हुआ, झील के पानी में जा गिरा।
पानी में गिरते ही हनुका तेजी से पानी की तली की ओर तैरने लगा। झील की तली में हनुका को एक विशाल त्रिशूल दिखाई दिया, जिस पर एक डमरु लटक रहा था।
हनुका ने त्रिशूल को प्रणाम कर उसे तेजी से घुमा दिया। त्रिशूल के घूमते ही डमरु की आवाज उस झील की तली में गूंज उठी।
इसी के साथ झील की तली में एक द्वार नजर आने लगा। हनुका उस द्वार में प्रवेश कर गया।
वह द्वार एक विशाल मैदान में खुला, जहां एक बहुत ही विशाल संगमरमर के पत्थरों से निर्मित शिव मंदिर बना था, जिसका आकार, बैठे हुए नंदी के समान था।
नंदी के मस्तक पर एक सोने का मुकुट जड़ा था, जिस पर एक नारंगी रंग की पताका (झंडा ) लहरा रही थी।
उस पताका पर एक सुनहरे रंग का त्रिशूल बना था, जिसके नीचे ‘ऊँ’ लिखा था। नंदी का मुख खुला हुआ था और उस खुले मुख से होकर ही मंदि..र का रास्ता जा रहा था।
हनुका नंदी के खुले मुख से, मंदि..र के अंदर की ओर प्रवेश कर गया। मंदि..र के अंदर पहले 12 मंडप थे, हर एक मंडप में देव की एक ज्यो ....तिर्लिंग की प्रतिकृति विराजमान थी।
इसके बाद मंदि..र का गर्भगृह था, जहां बीचो बीच में देव का एक विशाल ज्यो..तिर्लिंग उपस्थित था। उस ज्यो..तिर्लिंग के दूसरी ओर सैकड़ों त्रिशूल जमीन में धंसे थे।
उन त्रिशूलों के ऊपर, एक मानव शरीर नंगे पैर, तांडव की मुद्रा में नृत्य कर रहा था। यह और कोई नहीं, बल्कि नीलाभ था। देव का परम भक्त नीलाभ।
हलाहल से प्रकट हुआ दिव्यपुरुष नीलाभ। जिसके जीवन का उद्देश्य ही मनुष्यों को वेदों का ज्ञान देना था।
हनुका ने पहले देव को और फिर नीलाभ को प्रणाम किया और चुपचाप वहीं देव की मूर्ति के पास बैठकर नीलाभ की साधना पूर्ण होने की प्रतीक्षा करने लगा।
कुछ देर बाद नीलाभ की साधना पूर्ण हो गई और वह उन्हीं त्रिशूलों पर आसन की मुद्रा में बैठ गया।
“बताओ हनुका, कैसे आना हुआ तुम्हारा?” नीलाभ ने हनुका को देखते हुए पूछा।
“महागुरु, कुछ दिन पहले मैंने पश्चिम दिशा में स्थित एक छोटे से द्वीप पर माता की शक्तियों से बना कवच देखा। शायद माता उस स्थान के ही आसपास कहीं हैं? मैं यह समाचार देने ही आपके पास आया हूं।” हनुका ने कहा।
“तुम उस स्थान पर जाकर माया को ढूंढने की कोशिश करो हनुका, इधर मेरी भी साधना पूर्ण होने वाली है। साधना पूर्ण होने के बाद मैं भी सभी के समक्ष प्रकट हो जाऊंगा।” नीलाभ ने कहा।
“यह किस प्रकार की साधना है महागुरु? जो कि 5,000 वर्षों से अनवरत् चलती ही जा रही है।” हनुका ने अपनी जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा।
“पृथ्वी पर एक घोर संकट आने वाला है हनुका, जिसे सभी महा -शक्तियां मिलकर भी नहीं समाप्त कर सकती हैं। इसी लिये ईश्वर चाहते हैं कि मैं कुछ क्षणों के लिये देव की कुछ शक्तियों को अपने शरीर पर धारण करुं। इसी लिये 5,000 वर्षों से मैं अपने शरीर को उस योग्य बनाने के लिये प्रयास रत हूं।"
"अब तुम जाओ हनुका...और अपनी माता को ढूंढने की कोशिश करो। हां जाने से पहले शि...वलिंग के पास रखी, रक्त भैरवी की वह डिबिया भी लेते जाओ, कुछ ही दिन में वह तुम्हारे काम आने वाली है।... तुम्हें पता है कि उसका प्रयोग कैसे करना है?” इतना कहकर नीलाभ वापस अपनी साधना में लीन हो गया।
पर हनुका आवाक सा खड़ा, कभी नीलाभ को तो कभी ज्यो..तिर्लिंग के पास रखी रक्त भैरवी की डिबिया को देख रहा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि खतरा कितना बड़ा है? जो रक्त भैरवी की डिबिया का प्रयोग करने की जरुरत आ पड़ी।
हनुका ने एक गहरी साँस भरी और रक्त भैरवी की डिबिया उठाकर अपने वस्त्रों में छिपा ली।
हनुका अब मंदिर के बाहर की ओर चल पड़ा, पर अब वह मानसिक तौर पर महायुद्ध के लिये तैयार था।
चैपटर-13
शीत ऋतु-1: (तिलिस्मा 4.3)
सुयश के साथ सभी अगले द्वार न्यूजीलैंड में प्रवेश कर गये। पर वहां का नजारा देखकर सभी हैरान रह गये। जहां तक नजर जा रही थी, उन्हें बर्फ ही बर्फ दिखाई दे रही थी।
“यह क्या? यह तो ऐसा लग रहा है कि जैसे हम अंटार्कटिका में आ गये हों।” जेनिथ ने चारो ओर देखते हुए कहा।
“न्यूजीलैंड भी काफी ठंडी जगह है और वैसे भी हम यहां शीत ऋतु का सामना करने आये हैं, तो बर्फ तो नजर आयेगी ही।” सुयश ने कहा।
तभी उनकी नजर उस बर्फ के मैदान के बीचो बीच खड़ी एक मूर्ति पर गई। मूर्ति देख सब उसी दिशा की ओर चल दिये।
वह एक 10 फुट ऊंची अश्वमानव की बर्फ की प्रतिमा थी, जिसका कमर के नीचे का शरीर घोड़े का और कमर से ऊपर का शरीर एक इंसान का था।
वह अश्वमानव किसी योद्धा के समान शक्तिशाली लग रहा था, उसके हाथ में विचित्र सा अस्त्र था।
उस अस्त्र की मूठ अश्वमानव के हाथ में थी, उस मूठ से एक जंजीर के द्वारा बंधा काँटे जैसा गदा हवा में झूल रहा था। यह अस्त्र बर्फ का नहीं बल्कि किसी धातु का बना दिखाई दे रहा था।
सभी ध्यान से उस अश्वमानव को देखने लगे।
“कैप्टेन, यह रोमन साम्राज्य का योद्धा ‘सेन्टौर’ है।” क्रिस्टी ने कहा- “और इसने अपने हाथ में जो अस्त्र पकड़ रखा है, उसे ‘कंटक’ कहते हैं।”
“पर कैप्टेन, एक बात आपने ध्यान दी, कि इस सेन्टौर का पूरा शरीर तो बर्फ का बना है परंतु इसकी आँख और पूंछ के बाल असली जैसे लग रहे है।” ऐलेक्स ने कहा।
“हो सकता है कि इसकी पूंछ और आँखों में ही कोई रहस्य छिपा हो?” सुयश ने सेन्टौर को देखते हुए कहा।
“लेकिन इस जगह पर सेन्टौर की मूर्ति के सिवा और कुछ तो है ही नहीं, फिर हमें यहां करना क्या है?” जेनिथ ने कहा।
“है जेनिथ दीदी, यहां पर और भी चीजें हैं, पर आप लोगों ने अभी तक उस पर ध्यान ही नहीं दिया है।” यह कहकर शैफाली ने सभी का ध्यान जमीन के नीचे बनी बर्फ की झील की ओर कर दिया- “नीचे जमीन की ओर देखिये, जमीन के नीचे एक विशाल बर्फ की झील मौजूद है, जिसमें कुछ मछलियां और समुद्री घोड़ा तैर रहा है।”
शैफाली की बात सुनकर सभी ने नीचे की ओर देखा, शैफाली सही कह रही थी, नीचे एक झील मौजूद थी।
“पर कैप्टेन, मेरी जानकारी के हिसाब से समुद्री घोड़ा ना तो झील के पानी में पाया जाता है और ना ही इतने ठंडे पानी में वह रह सकता है।” तौफीक ने सुयश की ओर देखते हुए कहा।
“यह तिलिस्म है, यहां पर कुछ भी संभव हो सकता है?” सुयश ने कहा।
तभी शैफाली बैठकर पानी के नीचे तैर रही, उन मछलियों को ध्यान से देखने लगी। वह मछलियां साधारण मछलियों के हिसाब से बहुत धीरे तैर रहीं थीं।
“कैप्टेन अंकल, ये ऑस्ट्रेलिया में पायी जाने वाली मिसगर्न नाम की मछली है, इंसान इस मछली का प्रयोग भूकंप का पता लगाने के लिये करता है। वैसे प्रायः यह मछलियां बहुत सुस्त होतीं हैं, पर जब भी भूकंप आने वाला होता है, यह बहुत तेजी से इधर-उधर भागने लगती हैं। दरअसल यह मछलियां पृथ्वी की भूगर्भीय हलचल को कुछ समय पहले ही पहचान जातीं हैं, जिससे यह घबराकर तेज गति से तैरने लगती हैं।” शैफाली ने कहा।
“इसका मतलब हमें इस द्वार में भूकंप का सामना करना पड़ेगा क्यों कि कैश्वर इस मिसगर्न मछली को यूं ही तो नहीं रखा होगा यहां पर?” जेनिथ ने कहा।
जेनिथ की बात सभी को सही लगी।
“तो कैप्टेन हमें कहीं ना कहीं से तो इस तिलिस्म की शुरुआत करनी ही पड़ेगी, तो आप कृपया बताइये कि हमें कहां से शुरु करना सही रहेगा?” क्रिस्टी ने सुयश से पूछा।
“देखो, यहां 3 चीजें ही हैं, पहला वह सेन्टौर, दूसरा समुद्री घोड़ा और तीसरा मिसगर्न मछली। अब 2 चीजें तो पानी के अंदर हैं, तो फिर हमें इस सेन्टौर से ही शुरु करना होगा।” सुयश ने कहा। यह सुन सभी सेन्टौर के पास आकर खड़े हो गये।
“इस सेन्टौर के शरीर में पूंछ और आँखें ही असली लग रहीं हैं, इस लिये इन दोनों में ही कोई ना कोई रहस्य होगा? तो ऐसा करो कि 3 लोग इसके अगले भाग में रहकर, इसकी आँखों पर नजर रखो और बाकी बचे 3 लोग पीछे की ओर जाकर इसकी पूंछ को छुओ और देखो कि इस सेन्टौर में क्या परिवर्तन हो रहें हैं?”
सुयश के यह कहते ही क्रिस्टी और जेनिथ सुयश के साथ सेन्टौर के पिछले हिस्से की ओर खड़े हो गये और तौफीक, ऐलेक्स और शैफाली सेन्टौर के अगले भाग में खड़े होकर सेन्टौर की आँखों की ओर देखने लगे।
अब क्रिस्टी ने सेन्टौर की पूंछ को धीरे से उमेठ दिया।
क्रिस्टी के पूंछ को उमेठते ही सेन्टौर की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देखने लगीं।
“कैप्टेन, क्रिस्टी के पूंछ के छूते ही सेन्टौर की दोनों आँखें पता नहीं कैसे 2 दिशाओ में देखने लगी हैं।” ऐलेक्स ने कहा- “पर इससे हमारे आसपास कोई परिवर्तन तो नहीं आया?”
“तभी पानी के नीचे घूम रहा समुद्री घोड़ा एक स्थान से बर्फ को तोड़कर बाहर आ गया। झील के पानी से बाहर निकलते ही समुद्री घोड़े का आकार 10 इंच से बढ़कर 6 फुट का हो गया।
सभी आश्चर्य से बढ़ते हुए उस समुद्री घोड़े को देख रहे थे, परंतु सभी किसी भी खतरे से बचने के लिये सावधान थे।
तभी समुद्री घोड़े का बढ़ना रुक गया। अब वह झील के ठंडे पानी को अपने मुंह में भरने लगा।
बहुत सारा पानी अपने मुंह में भरने के बाद, समुद्री घोड़े ने अपना मुंह ऊपर आसमान की ओर उठाकर, सारा पानी हवा में फूंक मार कर उड़ा दिया।
सभी आश्चर्य से ऊपर आसमान की ओर देखने लगे, किसी को समझ नहीं आया कि उस समुद्री घोड़े ने ऐसा क्यों किया?
“तभी शैफाली ने चिल्लाकर कहा- “भागो , झील का वह पानी ओले बनकर ऊपर आसमान से गिरने वाला है।”
शैफाली की चीख सुनकर सभी सेन्टौर की ओर भागे, क्यों कि उनके बचने की वही एक सुरक्षित जगह थी।
तभी एक ओले का टुकड़ा आकर ऐलेक्स से टकरा गया और सबके देखते ही देखते ऐलेक्स भी एक समुद्री घोड़े में बदल गया।
बाकी सभी लोग बचकर सेन्टौर के नीचे पहुंचने में सफल हो गये, पर अब उधर 2 समुद्री घोड़े हो गये थे।
दोनों समुद्री घोड़े एक दूसरे के पास पहुंचकर तेजी से नाचने लगे।
अब यह पहचानना बहुत ही मुश्किल हो गया कि उनमें से असली समुद्री घोड़ा कौन है और ऐलेक्स कौन है? अब दोनों समुद्री घोड़े झील से अपने मुंह में पानी भरकर, आसमान की ओर उछालने लगे।
ऐलेक्स को समुद्री घोड़ा बनते देख, क्रिस्टी इस बार ज्यादा परेशान नहीं हुई क्यों कि अब उसे तिलिस्मा के बारे में पता चल गया था। वह जानती थी कि इस द्वार को पार करते ही ऐलेक्स स्वतः ही सही हो जायेगा।
बहरहाल अब ओलों की ताकत सभी जान गये थे, इसलिये कोई भी सेन्टौर के नीचे से निकलने को नही तैयार था।
एक फायदा यह था कि दोनों समुद्री घोड़ों में से कोई भी उनके पास आने की कोशिश नहीं कर रहा था।
“मेरे हिसाब से यह परेशानी इस सेन्टौर की पूंछ उमेठने से आयी थी, तो अगर हम वापस इसकी पूंछ को सही कर दें, तो शायद ऐलेक्स भी सही हो जाये और यह असली समुद्री घोड़ा भी वापस झील में चला जाये।” जेनिथ ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा।
सेन्टौर की पूंछ उमेठने के लिये किसी को बाहर जाने की जरुरत नहीं थी।
क्रिस्टी धीरे से सेन्टौर के पूंछ वाले हिस्से की ओर आ गई और उसने सेन्टौर की पूंछ को पहली वाली स्थिति में कर दिया, पर फिर भी दोनों समुद्री घोड़ों का ओले बनाने का कार्य जारी रहा। यह देख क्रिस्टी वापस आ गई।
“कैप्टेन अब सेन्टौर की पूंछ पहले जैसे करने पर भी कुछ नहीं हो रहा?” क्रिस्टी ने कहा।
“मुझे लगता है कि इस समस्या का हल सेन्टौर की पूंछ में नहीं बल्कि उसकी आँख में छिपा है।” शैफाली ने कहा- “कैप्टेन, समुद्र घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशाओं में देख सकती हैं, पर जमीन पर चलने वाला घोड़ा ऐसा नहीं कर सकता। तो फिर हो ना हो इस सेन्टौर की आँखें 2 दिशाओं में हो जाने की वजह से, वह समुद्री घोड़ा जागा था। और अगर ऐसा है तो हम सेन्टौर की आँखों को सही कर समुद्री घोड़े को रोक सकते हैं।”
शैफाली की बात सुनकर तौफीक सेन्टौर के नीचे से निकला और सेन्टौर की आँखों को अपने हाथ से एडजेस्ट कर सही कर दिया।
तौफीक के ऐसा करते ही बाहर मौजूद दोनों समुद्री घोड़े अचानक से रुक गये।
अब एक घोड़े का आकार फिर से छोटा होने लगा। कुछ ही देर में वह समुद्री घोड़ा वापस 10 इंच का हो गया और झील में कूदकर गायब हो गया।
“चलो 2 मुसीबत से पीछा छूटा।” जेनिथ ने कहा- “एक तो आसमान से ओले गिरना बंद हो गया और दूसरा वह समुद्री घोड़ा वापस झील में चला गया।”
“पर यह ऐलेक्स अभी तक अपने रुप में क्यों नहीं आया?” क्रिस्टी ने घबराते हुए कहा- “कहीं यह हमेशा के लिये समुद्री घोड़ा तो नहीं बन गया?”
“अरे नहीं-नहीं क्रिस्टी दीदी, ऐलेक्स भैया जल्दी ही सहीं हो जायेंगे।” शैफाली ने क्रिस्टी को सांत्वना देते हुए कहा- “रुकिये, मुझे सोचने दीजिये कि ऐलेक्स भैया सही क्यों नहीं हुए?....समुद्री घोड़ा, सेन्टौर की वजह से जागा था, इसलिये सेन्टौर की आँखें सही करने पर वह सही हो गया, परंतु ऐलेक्स भैया,..... वह तो ओले की वजह से समुद्री घोड़ा बने थे, इसलिये अवश्य ही ऐलेक्स भैया को सही करने के लिये समुद्री घोड़े की आँख को सही करना पड़ेगा? और मेरे सोच को तर्क देने के लिये हमें समुद्री घोड़े की आँख एक बार देखनी ही होगी?”
जारी रहेगा_______![]()
Behtreen update#175.
“पर कैसे? समुद्री घोड़ा तो अपना काम करके वापस झील में चला गया है।” सुयश ने कहा- “अब इतने बर्फ जैसे पानी में जाकर कौन उसे ढूंढ पायेगा?”
“मैं स्वयं जाऊंगी।” शैफाली ने दृढ़ता से कहा- “मैं इसके पहले भी पेंग्विन के पीछे बर्फ में गई थी, उस समय मुझ पर बर्फ की ठंडक का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था।”
यह सुनकर सुयश ने अपना सिर हिलाकर शैफाली को झील के अंदर जाने की इजाजत दे दी।
सुयश की इजाजत मिलते ही शैफाली ने अपने जूते बाहर उतारे और उसी रास्ते से झील के अंदर दाखिल हो गई, जिस रास्ते से वह समुद्री घोड़ा बाहर आया था।
सच में शैफाली को बर्फ से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, वह आसानी से इतने ठंडे पानी में तैर रही थी।
झील में प्रवेश करते ही शैफाली ने एक डुबकी मारी और पानी के अंदर अपनी नजरें घुमाना शुरु कर दिया। शैफाली को अब कुछ दूरी पर एक खूबसूरत परी की एक मूर्ति दिखाई दी।
यह मूर्ति पानी में एक स्थान पर खड़ी थी। यह मूर्ति देखने में बिल्कुल सजीव प्रतीत हो रही थी।
परी के शरीर पर बैंगनी रंग की एक बहुत ही खूबसूरत ड्रेस थी। उसने अपने हाथ में एक लंबा सा राजदंड भी पकड़ रखा था।
उस परी के चारो ओर कुछ जलपरियां, अपने हाथ में त्रिशूल लेकर घूम रहीं थीं।
ऐसा लग रहा था कि जैसे वह उस जलपरी की रक्षा कर रहीं हों या फिर उसकी परिक्रमा लगा रहीं हों। पर उन्होंने शैफाली से कुछ नहीं कहा।
“यह तो पानी के नीचे भी कोई तिलिस्म बना है?” शैफाली ने अपने मन में सोचा- “लगता है उस परी के हाथ में जो राजदण्ड है, उसमें अवश्य ही इस द्वार का कोई राज है, पर पहले मुझे वह कार्य कर लेना चाहिये, जिसके लिये मैं इस स्थान पर आयी हूं।”
अब शैफाली परी को छोड़कर उस समुद्री घोड़े को ढूंढने लगी। कुछ ही देर में शैफाली की निगाह में वह समुद्री घोड़ा आ गया, जो कि मिसगर्न मछली के बीच छिपकर पानी में तैर रहा था।
शैफाली उस समुद्री घोड़े की ओर बढ़ गयी। समुद्री घोड़े के पास पहुंचकर शैफाली ने उसे पकड़ने की कोशिश की, पर शैफाली के आगे बढ़ते ही वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो गया।
पहले प्रयास में शैफाली नाकाम रही। शैफाली ने फिर से पानी में आगे बढ़कर उस समुद्री घोड़े को पकड़ने की कोशिश की, पर इस बार भी वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो गया।
अब यह सिलसिला शुरु हो गया था, जब भी शैफाली आगे बढ़ती, वह समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे हो जाता।
यह देख शैफाली ने तेजी से अपना दिमाग लगाना शुरु कर दिया।
तभी शैफाली की नजर उस समुद्री घोड़े के आगे-पीछे घूम रही मिस गर्न मछली की ओर गई।
अब शैफाली के दिमाग में एक आइडिया आ गया था। शैफाली इस बार ध्यान से समुद्री घोड़े को देखती रही, जैसे ही एक मिसगर्न मछली, उस समुद्री घोड़े के ठीक पीछे पहुंची, शैफाली ने ठीक उसी समय पर, समुद्री घोड़े की ओर छलांग लगा दी।
हर बार की तरह इस बार भी समुद्री घोड़ा 1 फुट पीछे जाने के लिये बढ़ा, पर वह पीछे जा नहीं पाया और मिसगर्न मछली से टकराकर वहीं रह गया।
तभी शैफाली ने झपटते हुए उस समुद्री घोड़े को पकड़ लिया। अब शैफाली ने उसकी आँखों को देखा।
समुद्री घोड़े की दोनों आँखें 2 दिशा में थीं, जिसे शैफाली ने अपने हाथों से सही कर दिया और इसके बाद उस समुद्री घोड़े को वहीं झील के पानी में छोड़, वह झील की सतह की ओर चल दी।
झील की सतह पर सभी बेसब्री से शैफाली के आने का इंतजार कर रहे थे। पानी से शैफाली का चेहरा निकलते देख सभी खुश हो गये।
शैफाली ने अपना सिर हिलाकर सभी को काम पूरा होने की खबर दे दी।
शैफाली की बात सुन क्रिस्टी ने एक नजर ऐलेक्स की ओर डाली, ऐलेक्स अब अपने रुप में तो वापस आ गया था, पर वह अब भी बर्फ की
मूर्ति बना दिखाई दे रहा था।
“ये ऐलेक्स तो अब बर्फ का बन गया, अब इसे बर्फ से कैसे सही करें?” क्रिस्टी ने दुखी होते हुए कहा- “हो ना हो इस सेन्टौर में ही कोई चक्कर है, इसी की वजह से ऐलेक्स अभी तक सही नहीं हुआ है।” यह कहकर क्रिस्टी उस सेन्टौर के पास जाकर उसकी मूर्ति को जगह-जगह से हिलाकर देखने लगी।
क्रिस्टी से किसी को ऐसी आशा नहीं थी, इसलिये सभी उसे ऐसा करने से रोकने के लिये भागे।
सभी जानते थे कि क्रिस्टी की एक गलत हरकत उन्हें हमेशा के लिये इस तिलिस्म में कैद कर सकती है।
तभी क्रिस्टी के मूर्ति के हिलाने की वजह से सेन्टौर के हाथ में पकड़ा कंटक जमीन पर गिर गया और इसी के साथ सबके सामने एक मुसीबत और खड़ी हो गई।
सेन्टौर जीवित हो गया था और सबको खूनी नजरों से देख रहा था।
“हो गया काम तमाम, बड़ी मुश्किल से अभी उस समुद्री घोड़े से बचे थे, अब यह सेन्टौर जाग गया।” तौफीक ने क्रिस्टी पर नाराज होते हुए कहा।
क्रिस्टी एक पल में ही अपनी गलती को समझ गयी, पर अब क्या हो सकता था? तभी उस सेन्टौर ने अपने पैर को बर्फ की जमीन पर जोर से पटका, उसके ऐसा करने से एक जोर की आवाज हुई और इसी के साथ झील में मौजूद मिसगर्न मछलियां तेजी से गति करने लगीं।
यह देख शैफाली ने चीखकर सबको आगाह करते हुए कहा- “सब लोग सावधान हो जाओ, भूकंप आने वाला है।” तभी पूरी बर्फ की धरती हिलने लगी और बर्फ के उस हिस्से में मौजूद ऊंची चट्टानें गिरना शुरु हो गईं।
सभी किसी प्रकार उन चट्टानों से बचने की कोशिश कर रहे थे, तभी एक बड़ी चट्टान ऐलेक्स की ओर गिरने लगी, यह देख सभी के मुंह से चीख निकल गई।
इतने कम समय में कोई भी ऐलेक्स को बचा नहीं सकता था। जोर से गड़गड़ाती वह चट्टान ऐलेक्स के ऊपर आकर गिरी, पर तभी एक चमत्कार हुआ, वह भारी चट्टान ऐलेक्स के शरीर से टकराकर उसमें
समा गई।
“यह बर्फ की चट्टान ऐलेक्स के शरीर के अंदर कैसे चली गई।” जेनिथ ने आश्चर्य से ऐलेक्स की ओर देखते हुए कहा।
तभी एक और चट्टान ऐलेक्स के शरीर से टकराई, इसका हस्र भी पहले वाली चट्टान के जैसा हुआ, वह चट्टान भी ऐलेक्स के शरीर में समा गई।
यह देख सुयश ने सबसे चिल्लाकर कहा- “सभी लोग ऐलेक्स के शरीर की ओट में छिप जाओ, नहीं तो यह गिरती हुई चट्टानें हमें पीस देंगी।”
सुयश की बात सुन सभी ऐलेक्स की ओर भागे और उसके पीछे जाकर छिप गये।
ऐलेक्स के आसपास बहुत सी चट्टानें गिर रहीं थीं, परंतु समय पर सुयश का दिमाग काम करने की वजह से सभी सुरक्षित थे।
उधर जोर-जोर से सेन्टौर के पैर पटकने की वजह से झील की बहुत सी मछलियां उछलकर झील के बाहर आ गईं थीं।
“कैप्टेन, हमें जल्द से जल्द इस सेन्टौर का इलाज करना होगा, नहीं तो यह हमें चुटकियों में मसल देगा।” क्रिस्टी ने गुस्साये हुए सेन्टौर की ओर देखते हुए कहा।
तभी तौफीक की निगाह सेन्टौर के गिरे अस्त्र कंटक पर गई। उसे देखकर तौफीक बोला- “अगर सेन्टौर का यह अस्त्र भी हमारे हाथ लग जाये तो कुछ देर तक तो इससे बचा ही जा सकता है? पर वह भी कमबख्त बिल्कुल उसके बगल में ही गिरा पड़ा है।”
तौफीक की बात सुन शैफाली की आँखें सिकुड़ गईं- “कैप्टेन अंकल, कंटक तो सेन्टौर के बगल में ही गिरा पड़ा है, तो फिर यह सेन्टौर उसे उठा क्यों नहीं रहा? उसे उठाने के बाद तो यह और विनाश कर सकता है।”
“इसी कंटक के इसके हाथ से निकलने के बाद ही तो यह जिंदा हुआ था।” क्रिस्टी ने कहा।
“इसका मतलब यदि हम इस कंटक को दोबारा से इसके हाथ में पकड़ा दें, तो यह सेन्टौर फिर से बर्फ का बन सकता है।” शैफाली ने कहा।
शैफाली की बात सुन सुयश ने तौफीक की ओर देखते हुए कहा- “तौफीक, तुम इस सेन्टौर का ध्यान भटकाकर उसे दूसरी दिशा में ले जाओ, तब तक मैं इस कंटक को उठा लूंगा।”
सुयश की बात सुनकर तौफीक ने अपना सिर हिलाया और ऐलेक्स की ओ से बाहर निकल, सेन्टौर से कुछ दूरी पर जाकर दौड़ने लगा।
सामने तौफीक को दौड़ते देख सेन्टौर तौफीक की ओर चल दिया। जैसे ही सेन्टौर का चेहरा दूसरी ओर हुआ, सुयश तेजी से कंटक की ओर भागा।
एक पल में ही सुयश कंटक के पास पहुंच गया, मगर जैसे ही सुयश ने कंटक को उठाया, वह भी बर्फ की मूर्ति में परिवर्तित हो गया।
यह देख शैफाली और तौफीक दोनों ही आश्चर्य से भर उठे। अब दोनों के पास कोई और तरीका नहीं बचा था।
सूर्यपुत्र: (30 वर्ष पहले.....जनवरी,1972, प्रातः काल, अयोध्या, भारत)
“दादा जी, आप हमेशा बंदूक लेकर क्यों चलते हो?” नन्हें सुयश ने अपने दादा सूर्य नारायण सिंह को सम्बोधित करते हुए पूछा- “क्या आपको बहुत डर लगता है?”
सुयश की बात सुन सूर्य नारायण सिंह के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।
“नहीं हमें डर नहीं लगता, यह हम अपने वंश की शान के लिये, अपने साथ लेकर चलते हैं। हम सूर्यवंशी राजपूत हैं, मेरे दादा जी तो हाथ में तलवार लेकर चलते थे। अंग्रेज भी उन्हें देख थर-थर कांपते थे, पर अब
समय बदलने के साथ तलवारों का चलन खत्म हो गया और तलवारों का स्थान इस अग्नि मारक बंदूक ने ले लिया।”
सुयश से बात करते-करते सूर्य नारायण सिंह, घर के आंगन में खड़ी एक खुली जीप में बैठ गये और सुयश को उन्होंने अपने बगल में बैठा लिया।
“मैं जब बड़ा होऊंगा, तो अपने हाथ में तलवार ही लेकर चलूंगा, बंदूक तो डाकू लोग चलाते हैं।” नन्हें सुयश ने अपने दिल के उद्गार प्रकट किये।
“अच्छा-अच्छा छोटे युवराज, आप तलवार लेकर ही चलना, पर वादा करो कि कुलदेवता के मंदिर में पूजा के समय, आज आप मुझे तंग नहीं करोगे।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के बालों में हाथ फेरते हुए कहा।
“ठीक है, मैं आपको नहीं परेशान करुंगा, पर आप भी वादा करो कि वापस आने के बाद आप मुझे कैम्पा कोला पिलाओगे।” सुयश ने अपनी जुबान से चटकारा लगाते हुए कहा।
“ठीक है, मैं वादा करता हूं।” सूर्य नारायण सिंह ने अपनी हथेली को सुयश की नन्हीं हथेली से टकराते हुए कहा।
तभी दूसरी जीप में कुछ महिलाएं पूजा की थाली और कुछ पूजा की सामग्री लेकर बैठने लगीं।
“अरे अभय, तुम अपनी जीप चलाओ, बाकी लोग पीछे से आते रहेंगे। अगर हम थोड़ा जल्दी भी मंदिर पहुंच गये, तो कोई परेशानी की बात नहीं।” सूर्य नारायण सिंह ने जीप के ड्राइवर से कहा।
“जी मालिक।” सूर्य नारायण सिंह की बात सुन ड्राइवर ने जीप स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।
“अच्छा दादा जी, आप ये बताओ कि आज आप रात को मुझे कौन सी कहानी सुनाओगे?” सुयश ने अपने दादा जी से पूछा।
“मैं....मैं आज तुम्हारी सबसे प्रिय यति और उड़ने वाले घोड़े की कहानी सुनाऊंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के गाल खींचते हुए कहा।
“नहीं दादा जी आज मुझे भगवान सूर्य की कहानी सुननी है।....वह कहानी सुने बहुत दिन बीत गये।” सुयश ने अपने दिमाग के कोनों को खंगालते हुए कहा।
“ठीक है, मैं आज तुम्हें अपने कुल -देवता भग…न सूर्य की ही कहानी सुनाऊंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
रास्ते भर सुयश ऐसे ही अपने दादा जी से कुछ ना कुछ पूछता रहा। आधा घंटे के ड्राइव के बाद आखिर कुलदेवता का मंदिर आ ही गया।
अभय ने जीप को मंदिर के प्रांगण के बाहर ही रोक दिया। सूर्य मंदिर एक पर्वत की चोटी पर बना था। सुयश अपने दादा जी के साथ मंदिर के प्रांगण में आ गया।
मंदिर के मुख्य द्वार पर 7 घोड़ों के रथ पर बैठे सूर्यदेव की मूर्ति लगी थी। शिखर पर सूर्य के मुख की ज्वाला उगलती आकृति बनी थी।
“अरे दादा जी यह आकृति तो बिल्कुल वैसी ही है, जैसी आपके दाहिने हाथ की कलाई पर बनी है।” सुयश ने आश्चर्य से दादा जी की कलाई देखते हुए कहा।
“हां बेटा, यह हमारे कुलदेवता का चिन्ह है, जिसे मैंने अपनी कलाई पर बनवा लिया था। क्या यह चिन्ह आपको पसंद है?” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश से पूछा।
“हां दादा जी मुझे यह चिन्ह बहुत पसंद है, मैं एक दिन यही चिन्ह अपनी पूरी पीठ पर बनवाऊंगा।” सुयश ने दादा जी के हाथ पर बने सूर्य चिन्ह को अपनी नन्हीं हथेली से सहलाते हुए कहा।
“ठीक है, जब तुम बड़े होकर कलेक्टर बन जाओगे, तो मैं यह सूर्य चिन्ह तुम्हारे पीठ पर बनवा दूंगा।” सूर्य नारायण सिंह ने चारो ओर फैले पर्वतों को देखते हुए कहा।
“कलेक्टर? ये कलेक्टर क्या होता है दादा जी?” सुयश ने पूछा।
“कलेक्टर पूरे जिले का सबसे बड़ा ऑफिसर होता है।” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश की ओर देखते हुए जवाब दिया।
“नहीं-नहीं दादा जी, मैं कलेक्टर नहीं बनूंगा, मैं तो एक बहुत बड़े से पानी के जहाज का कप्तान बनूंगा और समुद्र की विशाल लहरों में अपना जहाज लेकर घूमूंगा।” सुयश ने अपनी कल्पना को उड़ान देते हुए कहा।
“अरे वाह, छोटे युवराज, आपकी सोच तो कमाल की है।” यह कहकर सूर्य नारायण सिंह ने सुयश को अपनी गोद में उठा लिया और चलते हुए मंदिर के प्रांगण के किनारे आ गये।
उस स्थान से उगते हुए सूर्यदेव बिल्कुल साफ नजर आ रहे थे। सूर्य की लालिमा प्रकाश का रुप ले, संपूर्ण आभा मंडल को दैदीप्यमान कर रही थी।
तभी मंदिर का एक पंडित अपने हाथ में 2 तांबे के लोटे में, जल लेकर आ गया। एक तांबे का लोटा थोड़ा छोटा था, जो कि निश्चित ही सुयश के लिये था।
“चलो बेटा, अब सूर्य को अर्घ्य दो, पर ध्यान रहे, यह पात्र तुम्हारे दोनों हाथों में सिर से ऊपर की ऊंचाई पर होना चाहिये और जल की धार टूटनी नहीं चाहिये। इस प्रकार करने से सूर्य की पहली जीवन दायिनी किरण स्वच्छ जल को पारकर हमारे शरीर से टकराती है और हमें सभी प्रकार के रोग से मुक्त करती है।” यह कहकर सूर्य नारायण सिंह ने छोटा लोटा सुयश की ओर पकड़ा दिया और बड़े लोटे से स्वयं सूर्य को अर्घ्य देने लगे।
सुयश ने भी अपने दादा जी को देखते हुए ठीक उसी प्रकार से किया, जैसा कि दादा जी ने कहा था।
तभी दूसरी जीप भी आ गई। यह देखकर सूर्य नारायण सिंह ने सूर्य को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उन लोगों की ओर बढ़ गये।
सूर्य नारायण सिंह ने अभय को सुयश का ध्यान रखने के कार्य पर लगा दिया।
दादा जी के जाने के बाद नन्हें सुयश ने भगवान सूर्य को देखा, सूर्य की लालिमा सुयश को बहुत भली लग रही थी।
धीरे-धीरे सूर्य का प्रकाश बढ़ता जा रहा था, पर सुयश अभी भी अपनी नजरें सूर्य से नहीं हटा रहा था, ऐसा लग रहा था कि जैसे सूर्य से सुयश का कोई बहुत गहरा रिश्ता हो।
तभी अचानक सुयश को सूर्य, बैंगनी रंग का होता दिखाई दिया। यह देख सुयश अचकचा गया, पर तभी सुयश को अपनी नाक पर बैठी एक नीले रंग की खूबसूरत सी तितली दिखाई दी।
उसी तितली के पंखों की वजह से सुयश को सूर्य का रंग बदलता हुआ दिखा था।
सुयश ने अपने हाथों से उस तितली को पकड़ने की कोशिश की, पर वह तितली सुयश की नाक से उड़कर दूर चली गई।
उस तितली का रंग इतना प्यारा था, कि सुयश का ध्यान अब तितली की ओर आकृष्ट हो गया था।
सुयश अब मंदिर के प्रांगण में तितली के पीछे-पीछे भागकर उसे पकड़ने की कोशिश करने लगा।
उधर अभय को जीप में रखा एक पूजा का सामान याद आ गया, उसने एक बार सुयश को खेलते हुए देखा और फिर बाहर जीप में रखें सामान को लाने के लिये चला गया।
सुयश अभी भी तितली के पीछे-पीछे भाग रहा था। तितली कभी एक स्थान पर बैठती, तो कभी दूसरे स्थान पर।
इस बार तितली मंदिर के प्रांगण के किनारे लगे एक छोटे से पेड़ की शाख पर जा बैठी।
सुयश अपना हाथ बढ़कार तितली को पकड़ने की कोशिश करने लगा, पर वह पेड़ की डाल सुयश के नन्हें हाथों से थोड़ा दूर थी, इसलिये सुयश ने अपना एक पैर मंदिर के प्रांगण की रेलिंग से बाहर निकाल लिया।
पर इससे पहले कि सुयश उस नीले रंग की तितली को पकड़ पाता, उसका पैर फिसला और वह पहाड़ से नीचे की ओर गिरने लगा।
सुयश के मुंह से चीख निकल गई। तभी सूर्य की किरणों की चमक बढ़ गई और सुयश, बिना किसी सहारे के हवा में झूलने लगा।
उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वह सूर्य की किरणों से बने झूले पर बैठा हो।
नन्हें सुयश को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तभी सुयश को अपने सामने एक दिव्य प्रकाशपुंज स्वरुप एक पुरुष दिखाई दिया।
उसे देख सुयश ने पूछ ही लिया- “आप कौन हो?”
“मैं सूर्यदेव हूं।” सूर्यदेव ने कहा- “मैंने ही तुम्हें इस ऊंचे पर्वत से गिरने से बचाया है।”
“आपने मुझे क्यों बचाया?” सुयश के शब्दों में एक बालरस झलक रहा था।
“क्यों कि मैंने तुम्हें अपने पुत्र रुप में स्वीकार किया है, फिर भला मैं तुम्हें मरने कैसे देता?” सूर्यदेव ने कहा।
“आप इतनी जल्दी उतनी ऊंचाई से मेरे पास कैसे आ गये?” सुयश ने सूर्यदेव की ओर देखते हुए पूछा।
“क्यों कि मेरी किरणों से तेज चलने वाली चीज अभी इस ब्रह्मांड में नहीं है।....अपना ध्यान रखना सुयश।” सूर्यदेव ने कहा और सुयश को उठाकर, मंदिर के प्रांगण के बाहर लगी घनी झाड़ियों पर बैठा दिया। इसी के साथ सूर्यदेव हवा में कहीं गायब हो गये।
उधर अभय जैसे ही मंदिर के प्रांगण में पहुंचा, उसे सुयश कहीं दिखाई नहीं दिया। घबराकर अभय ने मंदिर के प्रांगण के किनारे जाकर नीचे की ओर देखा।
नीचे की ओर देखते ही अभय की जान सूख गई क्यों कि सुयश इस समय नीचे एक झाड़ी में फंसा दिखाई दे रहा था।
अभय ने घबरा कर अपने चारो ओर देखा, पर उसे आसपास कोई नजर नहीं आया, यह देख अभय ने जल्दी से नीचे लटककर, सुयश का एक हाथ पकड़ा और उसे ऊपर खींच लिया।
सुयश को सही सलामत देख अभय की जान में जान आयी, पर उसे यही डर था कि कहीं सुयश, सूर्य नारायण सिंह को यह सारी बात बता ना दे।
“देखो बेटा, तुम यह बात किसी को बताना नहीं, मैं तुम्हें ढेर सारी टॉफियां दूंगा।” अभय ने सुयश को फुसलाते हुए कहा।
टॉफियों की बात सुन सुयश तुरंत मान गया। 2 घंटे के बाद सभी पूजा करके वापस घर की ओर चल दिये।
“तुम्हें भगवान सूर्यदेव कैसे लगे सुयश?” सूर्य नारायण सिंह ने सुयश को अपने से चिपटाते हुए पूछा।
“अच्छे लगे, पर जब उन्होंने मुझे गोद में उठाया, तो मुझे बहुत अच्छा लगा।” सुयश ने भोलेपन से कहा।
“अच्छा, तो भगवान सूर्य ने तुम्हें गोद में उठाकर क्या कहा?” सूर्य नारायण सिंह ने हंसते हुए पूछा।
“उन्होंने कहा कि वो मुझे ढेर सारी टॉफियां देंगे।.....नहीं-नहीं....ये तो अभय अंकल ने कहा था.....उन्होने कहा था.... उन्होने कहा था...... क्या दादा जी आपने तो सब भुलवा दिया?” सुयश ने कहा और दादा जी के सीने से चिपक गया।
“शैतान बच्चा, 2 मिनट में कहानियां बनाकर सुनाने लगता है।” सुयश की बात सुन सूर्य नारायण सिंह मुस्कुराए और फिर से सुयश के सिर पर हाथ फेरने लगे।
सुयश अब दादा जी से ऐसे चिपका था, जैसे कि वह सूर्य नारायण सिंह ना होकर साक्षात सूर्यदेव हों।
जारी रहेगा_____![]()
यही होगारिव्यू की शुरुआत की जाए
मुझे अब तिलिस्म कुछ लंबे फ़ील हो रहे हैं, मेरा मतलब ये है कि हृतु का तिलिस्म इतना लंबा चला गया कि, पतझड़, ग्रीष्म और अब सर्दियों से सामना है हमारा। मैं तो भूल ही गया कि तिलिस्मी दुनिया कितनी अपडेट हो गई है, शायद अपडेट बड़े होने की वजह से भी ये महसूस हो रहा है।
समय समय पर रिव्यू देते रहा करो।अअब अगर ज्यादा बड़े लग रहें है तो छोटे कर देता हूॅ।
पहले सब बोलते थे की बडा करो।आगे आते हैं, मिट्टी वाले भाग में, सुयश की सूझबूझ ने सॉल्व कर लिया।

भैया जी, किसी दिन अच्छे से धुलाई पक्की है तुम्हारी, क्या करते हो यार। लगा कि जेनिथ को मार दिया, मतलब सिचुएशन ऐसे बना रहे हो कि लोगों को लगे कि आज इसका नंबर है, कल उसका नंबर है।
Ab kya karu dost apna to mann hi aisa hai.Wo kon tha ye to samay aane per hi bataungaलेकिन सबसे बड़ा सवाल मुझे अब बताओ, वो कौन था जिसने जेनिथ को बचाया ,क्या वो ओरस हैं, जो कि मल्टीवर्स के समय का राजा है? मुख्य बात ये संभव कैसे? अगर नक्षत्र समय को नियंत्रित कर सकता है, तो ओरस नक्षत्र को होना चाहिए।


Mujhe kya pata wo kon hai?क्या यह संभव है कि नक्षत्र सिर्फ़ ओरस की शक्तियों को धारण करने का एक यंत्र है देखो, ओरस के अलावा मुझे नहीं लगता वो कुछ और हो सकता है।

Hain?एक ख़तरनाक विचार आ रहा है मन में क्या मकोटा और एंडोर्स लोग तिलिस्म तोड़कर उसमें जाकर अपना लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं कहीं उन्हीं में से कुछ लोग सफल तो नहीं हो गए?
Kya pata bhai?Atlantians me se koi bhi wo moti nahi le sakta, basarte wo ladki ho, yaad karo, clito ko jab kaid kiya tha tab kya bola gaya tha.लेकिन जो सोच रहे होगे कि आज क्या पीकर आया है, जो सिर-पैर की बात कर रहा है अगर ऐसा होता तो सुयश और बाकी लोगों को मार नहीं दिया जाता क्या?
इसका जवाब भी है मेरे पास। तिलिस्म को तोड़ने की शर्त है कि तिलिस्म आम मनुष्य ही तोड़ सकते हैं, तो ऐसे में दुश्मन खेमा इंतज़ार करेगा कि काला मोती के समीप पहुँचने तक।
Khud hi sawaal kar rahe ho, aur khud hi jabaab de rahe hoअगर ऐसा हो गया तो मज़ा आ जाएगा तिलिस्म के चैलेंज के साथ दूसरी चुनौतियाँ, एक नया दृष्टिकोण मिल जाएगा।
(वैसे ऐसा होने की संभावना कम है)

Abe sahi nahi karna tha, wo tilism ka hissa hai, waha se kaise bhi karke unko sab kaam niptana hai on timeआगे न्यूज़ीलैंड में पहुँच गए हैं, लेकिन यहाँ का सीनारियो मुझे समझ नहीं आया सेंटोर का।
अश्व मानव भी था, किसी की पूँछ सही करनी है तो किसी की आँख।

Shefali jab tak bachi hai tab tak sab bache hue hainलेकिन वो मुख्य बात नहीं है। मुख्य बात है सुयश और एलेक्स का बर्फ़ में फँसना, क्योंकि अब क्या रास्ता बचा है कि किससे दोनों उस मुसीबत से बाहर आएँगे।

Agar wo bachpan me mar gaya hota to aaj jinda kaise bachtaसाथ ही मेरी चिंता तब बढ़ गई जब सुयश का बालपन दिखा। एक समय लगा कि सुयश को निपटा रहे हैं, इसलिए उसका बालपन दिखाया।

Abe kaha ki cheej kaha jod raha hai? wo suyash ka bachpan alag kissa hai, aur tilisma ka alag.लेकिन मुझे कुछ ऐसा लग रहा है कि ये तिलिस्म से सुयश को बर्फ़ से बाहर निकालने का उपाय उसके बचपन में रखा है। सूर्य में तेज रहता है और सुयश में खुद भगवान सूर्य अंश मात्रा शक्तियाँ हैं, तो ऐसे में सुयश अगर अपने अंदर की ऊर्जा का इस्तेमाल करे बाहर निकलने के लिए, तो आसानी होगी तिलिस्म तोड़ने में।

Suyash surya vanshi raajpoot jai, and uske paas surya ki shakti hone ka kaaran hai, iska jabaab main ek update me de chuka hu, wo sayad tumne ya to miss kar diya ya fir yaad nahi, baaki wo surya ki aag hi hai jo uske tattoo me hai.पर मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि अगर उसके पास सूर्य नारायण की शक्तियाँ हैं, तो वो आम मनुष्य कैसे हुआ? ये बात शेफाली पर भी लागू होती है। मुझे लग रहा है कि सुयश के अतीत में कुछ ऐसा है, जिसको शायद मैं अभी समझ नहीं पाया। कुछ ऐसी गहराइयाँ जो आगे चलकर काम आएँगी। वैसे मुझे सुयश का बालपन का सीन काफ़ी पसंद आया है, बिल्कुल सुंदर, सजीव।

Sab pata lagta hai public ko pagal samjha hai kya?वैसे एक कितनी रिसर्च की है कि उस समय कोका-कोला नहीं, कैम्पा कोला ही चलती थी। बाबा जी, हैट्स ऑफ़, कितना डिटेल्स का ध्यान रखते हो।
मैं होता तो इतना सोचता नहीं, लिख देता कोका-कोला। कहा पब्लिक को इतना पता है कि उस समय क्या चलता था।
Apna kaam hi yahi hai, agar kahani ko sirf padha jaaye to kya khaakh likhaअब आते हैं हनुका और गुरु नीलाभ के सीन पर।
सबसे पहले, तालियाँ बजाई जाएँ, क्योंकि अगर लेखक महोदय चाहते तो गुरु नीलाभ का निवास स्थान एक गुफ़ा को भी बता सकते थे, लेकिन उस जगह को एक अलग रूप देने के लिए अनोखा तरीका अपनाया।
साथ ही किसी जगह को इमैजिनेशन का फ़ीलिंग देना भी एक कला है, जो कि उस समय भली-भांति दी गई थी। पूरा आस-पास का वातावरण इमैजिन करा दिया।


मुझे अब लगता है कि हनुका के ज़रिये हमें कुछ महत्वपूर्ण ज्ञात हुआ है। गुरु नीलाभ आखिर कहानी में क्यों इतना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, वो अब धीरे-धीरे समझ आ रहा है।
Very good , aakhir samajhdaar ho tum.Bilkul sahi ja rahe ho Mira , maamla kuch alag, hatke, serious, aur bada hi hoga, and bhagwan ki shakti ko dharan karna matlab samajh rahe ho naविश्वास से परे है कि एक जन सिर्फ़ 5000 साल से इसलिए तपस्या कर रहा है ताकि कुछ क्षण के लिए ईश्वर की शक्ति धारण कर सके। मामला कितना सीरियस है, इससे मुझे समझ भी आ गया है। वैसे नीलाभ और माया के बारे में और विस्तार से लिखा है जू ने, बस एक बार उसको पढ़ना पड़ेगा, शायद आगे कुछ काम आए।

Abe रक्त बीज नहींरक्त बीज इसको लेकर जू, मानोगे नहीं, मैंने इसके बारे में रिसर्च की। क्योंकि थोड़ा बहुत मैंने इसके बारे में सुन रखा था।
मुझे एक बात पता चली, जितना मैंने समझा है
रक्त बीज में इंसान के अंदर ऊर्जा का संचार होता है। इसे धारण करने वाला थोड़ा उग्र हो जाता है। रक्त बीज की शक्ति का आना ये भी दर्शाता है कि मामला अब करुणा और शांति से उठ चुका है।


बताओ?मुझे एक और बात पता चली इसे अंत और आरंभ का संकेत भी कहा जाता है।

Thank you very very much for your amazing review and wonderful support Evaran Eternity bhai, sath bane raho, dhamake bhi ho hi jyenge.कुल मिलाकर अच्छा जा रहा है।
बस तिलिस्म में मुझे जिस धमाके का इंतज़ार है, वो हो जाए। आगे की प्रतीक्षा।
Raj_sharma

Thanks for your valuable review and support bhaiShandar update bhai
Dhekte hai ye log kese alex thik karte hai

Bilkul bhai, kuch bhi ho sakta hai, sath bane rahiye, thank you very much for your valuable review and supportBehtreen update
Alex ke sath sath suyash bhi barf ka ban gaya
Jrur us pari ki murti me hi ise sahi karne ka rahasya hai
Suyash ki background story bhi hame pata chali
