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Thanks a lot for the commentsOMG, I don't know how to react to this.
I have been reading different stories on different forums for years now. Never have I seen such immaculate description of a matured lady's sexuality and perversions. Majority of the writers I see, either indulge in incest or stories involving characters less than 40 years of age. May be that would be earning them more likes but this story is different. I have always longed for a story like this. I could well relate to this age group and it feels as if it is describing me. Very surprising.
Also, how could a male (assuming you are a male, please correct me if I am wrong) depict a mature lady's feelings so precisely?
Very very good story. I will come back to read more whenever I get time to.

पिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..
शीला, वैशाली की ऑफिस पहुँचती है जहां वह दोनों पीयूष के साथ लंच करने एक रेस्टोरेंट में पहुंचते है.. वैशाली को ऑफिस के काम के सिलसिले में फोन आता है और पीयूष के कहने पर वह ऑफिस लौट जाती है..
शीला भाभी के जबरदस्त स्तनों से मुग्ध पीयूष उसे अपना जिस्म दिखाने की विनती करता है.. शीला के अंग-प्रदर्शन से प्रभावित होते हुए वह खुद को सहलाता है और आखिर शीला की मदद से चरम पर पहुंचता है..
अब आगे..
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वहाँ शीला के घर पर..
मदन, रूखी और चम्पा का दूध दुहते हुए चुदाई का भरसक मज़ा उठा रहा था.. उनके पड़ोस वाले घर पर, जो पीयूष का घर था और अब वहाँ फाल्गुनी रहती थी, उस घर के ड्रॉइंग रूम में मौसम और फाल्गुनी दोनों सोफ़े पर बैठे थे.. बेंगलोर से अपने घर आई हुई मौसम का मन किया फाल्गुनी को मिलने का तो वो खुद ड्राइव कर फाल्गुनी के शहर आ पहुंची.. जब वह फाल्गुनी के घर गई तब वो ऑफिस की पार्टी में गई हुई थी.. फाल्गुनी के निर्देश पर उसने गमले के नीचे से चाबी निकाली और घर खोलकर अंदर गई.. कुछ ही देर में फाल्गुनी भी घर आ पहुंची..
दोनों सहेलियाँ सोफ़े पर बैठी थी.. फाल्गुनी ने गुलाबी रंग की शिफॉन साड़ी और बेहद आकर्षक, बिल्कुल पीछे से खुला, बिना आस्तीन का, बहुत गहरी और चौड़ी नेकलाइन वाला, पतली डोरियों वाला बिकिनी-स्टाइल ब्लाउज़ पहना हुआ था.. उसने बेहद सेक्सी, पाँच इंच की स्टिलेटो हील वाली काली सैंडल भी पहनी थी.. दोनों के हाथ में व्हिस्की का ग्लास था और एक बड़ी स्क्रीन वाले हाई-डेफ़िनेशन टीवी लगे बैठक कक्ष में दोनों आराम से बैठीथी
"घर तो बड़ा अच्छा सजाया है तूने," मौसम ने फाल्गुनी की ओर देखते हुए कहा..
ड्रिंक का एक सिप लेते हुए फाल्गुनी ने कहा "यार, तुझे तो पता है, मुझे हमेशा से स्टाइल से रहना पसंद था.. तनख्वाह अच्छी है और कोई जिम्मेदारी भी नहीं.. इसलिए आराम से अपने ऊपर पैसे खर्च करती हूँ और बिंदास रहती हूँ"
मौसम ने बड़े ध्यान से फाल्गुनी की ओर देखा.. काफी बदलाव आ गया था उस में.. जब वह साथ पढ़ते थे तब वह बड़ी ही शांत, सहमी सी और शर्मीली लगती थी.. और तब तक लगती रही जब तक उसे फाल्गुनी और अपने पिता सुबोधकांत के बीच के अनैतिक संबंधों के बारे में पता नहीं चला था.. फिर दोनों के बीच की सारी दीवारें गिर गई.. मौसम ने परिस्थिति का स्वीकार कर लिया फिर उसके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो गई और वो शादी कर बेंगलोर चली गई.. एक बड़ा लंबा अरसा बीत चुका था.. बदलाव तो उसमें भी आया था पर इतना नहीं जितना फाल्गुनी बदल चुकी थी
फाल्गुनी: "क्या सोच रही है?"
फाल्गुनी के प्रश्न से मौसम के विचारों पर रोक लग गई
मौसम: "कुछ नहीं यार.. मुझे लगता है की अब तुझे शादी कर लेनी चाहिए"
मुंह बिगाड़ते हुए फाल्गुनी ने कहा "यार जिसे देखो मेरी शादी के पीछे पड़ा हुआ है.. उधर मम्मी-पापा और इधर तुम"
मौसम ने हँसकर कहा "तो कर ले ना शादी.. क्या दिक्कत है?"
पलटकर फाल्गुनी ने कहा "तूने कर ली शादी.. खुश है ना तू..!! बस यही बहोत है मेरे लिए"
सुनते ही मौसम ने नजरें झुका ली.. उसके चेहरे से मुस्कुराहट गायब हो गई..
"हम्म.. मतलब कुछ तो गड़बड़ है..!!" फाल्गुनी ने मौसम के चेहरे को ध्यान से देखते हुए कहा "पर चिंता मत कर.. मैं तुझे तेरी लाइफ के बारे में कुछ नहीं पूछूँगी और ना ही तू मुझे कुछ पूछेगी.. इतने टाइम बाद मिले है.. मजे करते है न यार..!!"
सोचने पर मौसम को भी यही ठीक लगा.. पुराने घावों को क्यों खरोंचना..!!
"यार फाल्गुनी, गजब की सेक्सी लग रही है तू.. इतनी बनठन कर गई थी पार्टी में? तुझे देखकर ही न जाने कितनों के खड़े हो गए होंगे" ग्लास से व्हिस्की का एक घूंट गले के नीचे उतारते हुए मौसम ने कहा
अपने कमसिन जिस्म पर हथेलियाँ फेरकर एक मस्त अंगड़ाई लेकर फाल्गुनी ने कहा "अब ऊपरवाले ने इतना हुस्न दिया है तो इसमें मेरी क्या गलती" कहते हुए वह ठहाका मारकर हंस पड़ी और साथ में मौसम भी
बातों बातों में दोनों सहेलियाँ तीन तीन पेग गटक चुकी थी.. शराब का शुरूर धीरे धीरे दोनों के मस्तिष्क पर चढ़ने लगा था
"कुछ मजेदार देखते है.. और ये हाफ बोतल तो खत्म हो गई.. मैं दूसरी निकालती हूँ" कहकर सोफ़े से उठने गई फाल्गुनी अपनी हाई-हील के सेंडल के कारण लड़खड़ा कर गिर गई
"अरे जरा संभलकर.." कहते हुए मौसम ने दोनों हाथों से गिर रही फाल्गुनी को पकड़ लिया.. फाल्गुनी उसकी गोद में लेट गई.. लेटे लेटे उसे क्या मस्ती सूझी.. उसने दोनों हाथों से मौसम के एक स्तन को पकड़ लिया और कपड़े के ऊपर से ही चूसने लगी..
"धत्त पागल.. क्या कर रही है" खिलखिलाते हुए मौसम ने कहा.. वैसे फाल्गुनी के साथ उसने भूतकाल में कई बार लेस्बियन सेक्स का अनुभव किया था.. पर उस बात को काफी समय बीत चुका था
मौसम की गोद में लेटे लेटे फाल्गुनी ने मौसम के स्तन को छोड़कर कहा "याद है मौसम, हम जब तेरे रूम में ये सब करते थे तब तू मुझे मम्मी कहकर बुलाती थी और तू मेरी बेटी बनती थी.. कितना मज़ा आता था न तब रोलप्ले करने में"
मौसम फिर भूतकाल की गलियों में सरक गई.. जब उसे अपने पिता और फाल्गुनी के संबंधों के बारे में पता चला तब पहले तो उसे बहुत गहरा सदमा लगा था.. फिर धीरे धीरे उसने वास्तविकता का स्वीकार कर लिया था.. फिर जब वो और फाल्गुनी सेक्स करते तब फाल्गुनी उसकी मम्मी बनती, उसके पिता की प्रेमिका होने के नाते, और मौसम उसकी बेटी
"क्या क्या याद दिला दिया तूने यार..!!" शराब के असर से बहकते हुए मौसम ने सामने से अपने स्तन को फाल्गुनी के चेहरे पर दबा दिया..
स्तन को वस्त्र के ऊपर से ही हल्के से काटकर फाल्गुनी खड़ी हो गई..
"चल फिर से वही पुरानी महफ़िल जमाते है..!! रुक मैं आती हूँ" कहते हुए संभलकर फाल्गुनी खड़ी हुई और लड़खड़ाते हुए अंदर के कमरे से एक बोतल लेकर बहार आई और चलकर पहले टीवी के केबिनेट के पास पहुँच गई.. ड्रॉअर से एक पेनड्राइव निकाली और टीवी के यूएसबी पोर्ट पर लगाकर रिमोट से कुछ बटन दबाने लगी..
टीवी के काले परदे पर रोशनी की एक परत दिखाई दी और फिर तीन नग्न आकृतियों के लोटने और क्रीड़ा करने के दृश्य नजर आने लगे.. उनमें दो पुरुष और एक महिला थी, दोनों पुरुष उसके शरीर को बेसब्री से सहला रहे थे, शायद उसकी मोहक चूत के अंदर सबसे पहले लंड घुसाने की होड़ में.. महिला ने अपनी टाँगें फैलाईं और अपनी धड़कती हुई चूत को उजागर कर दिया, दोनों मर्द अपने लंड हिलाते हुए उसकी तरफ जाने लगे
फाल्गुनी ने फिर ड्रॉअर से सिगरेट का पैकेट और लाइटर निकाला.. बोतल उठाई और आकर मौसम के पास सोफ़े पर बैठ गई.. सामने ब्लू लेबल की बोतल और सिगरेट रखकर
"तू सिगरेट कब से पीने लगी?" आश्चर्य से मौसम ने पूछा
"रेग्युलर नहीं हूँ यार.. कभी कभी शराब के साथ दो कश लगा लेती हूँ.. तूने कभी ट्राय नहीं की?"
"ट्राय किया है.. पर सिगरेट नहीं, बेंगलोर में काफी बार हुक्का ट्राय किया है.. मज़ा आता है" मौसम ने कहा
फिर शराब की बोतल की ओर देखते हुए मौसम ने कहा "ब्लू-लेबल स्कॉच तो बहुत एक्सपेंसिव होती है यार.. मैंने आज से पहले कभी ट्राय नहीं की" मौसम ने बोतल को हाथ में पकड़ते हुए कहा..
"हाँ यार…. महंगी है पर बहुत मस्त चीज़ है… फाल्गुनी ने कहा और ढक्कन खोलकर उसने मौसम का गिलास भर दिया
" मस्त टेस्ट है….मानना पड़ेगा" मौसम ने पेग पीते हुए कहा..
"हम्म अब तू सुना… कैसे गुजर रही है ज़िंदगी?…" फाल्गुनी ने उससे पूछा..
"यार अभी तो तूने कहा की हम अपनी ज़िंदगी के बारे में बात नहीं करेंगे"
"शादी-शुदा ज़िंदगी के बारे में बात नहीं करेंगे.. और बातें तो हो ही सकती है ना" अपनी कुहनी मौसम की कमर पर मारते हुए फाल्गुनी के शरारती ढंग से कहा
दोनों सहेलियों के बीच बातचीत का दौर चलता ही गया.. पेग पर पेग बनते गए और खाली होते गए
फाल्गुनी और मौसम, दोनों लगातार शराब पी रहे थे और सिगरेट फूंकते हुए टीवी पर चल रही ब्लू फ़िल्म भी देख रहे थे, जब मौसम थाईलेन्ड में देखे सेक्स शो के बारे में बताया रही थी तब टीवी के स्क्रीन पर गोरी अब अपनी पीठ के बल लेटी हुई थी, उसका शरीर कमर से नीचे उस पुरुष से ढका हुआ था जो उसे चोद रहा था, उसकी टाँगें उसकी अपनी टाँगों से सटी हुई थीं, उसकी बाहें उसके शरीर के दोनों ओर फैली हुई थीं, उसका मुँह पूर्ण आनंद में खुला हुआ था.. दूसरा पुरुष अपने घुटनों पर था और अपने लंड को उसके मुंह में डालकर चोद रहा था
फाल्गुनी और मौसम, दोनों नशे में धुत थे और गर्म भी हो रहे थे.. फाल्गुनी सोफ़े पर पीछे झुक गई और अपने पैर टी-टेबल पर टिका दिए.. मौसम, जो टीवी पर गरमागरम द्रश्य देख रही थी, उसने फाल्गुनी के काले ऊँची-हील वाली सैंडल में सुंदर पैरों को देखा..
"यार तेरे गोरे पैर इस सैंडल में बहुत सेक्सी लगते हैं…तू भी मेरी तरह सेक्सी हाई हील्स पहनना पसंद करती है…." मौसम ने सिगरेट का लंबा कश खींचते हुए कहा..
"हाई हील्स वाले सैंडल तो मेरी जान हैं…मेरे पास कम-से-कम २० जोड़ी सैंडल हैं… अलग अलग रंग के और डिज़ाइन के… " फाल्गुनी ने कहा.. "हाई हील्स की बात ही अलग होती है.. हील्स पहनने से चाल में कितना ग्रेस और चार्म आ जाता है…हर कदम कितना नाज़ुक और कोमल लगता है…" फाल्गुनी बोलती रही
इसी बीच मौसम ने भी अपने पाँच इंच की लाल हील्स वाले पैर मेज़ पर रख दिए.. "सबसे बड़ा फ़ायदा तो यह है कि हर देखने वाले आदमी का लंड सलामी देने के लिए खड़ा हो जाता है.." फाल्गुनी ने और झुककर मौसम के पैरों को अपनी गोद में खींच लिया.. फिर, अपना सिर थोड़ा झुकाकर और मुँह खोलकर, फाल्गुनी ने अपनी जीभ सैंडल के चमड़े पर हल्के से फेर दी.. "सैंडल की अनोखी गंध मुझे पागल बना देती है" फाल्गुनी ने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी जीभ मौसम के सैंडल की चमकदार लाल पट्टियों और हील्स पर नाचती और फिसलती रही..
मौसम ने बारीकी से देखा, खुशी से गुर्राई और बोली: "मम्म्म्म. मज़ा आ रहा है यार!"
फाल्गुनी की जीभ ने मौसम के सैंडल की बनावट पर पूरी शिद्दत से चक्कर लगाना शुरू कर दिया, और उसकी एड़ियों को लंड की तरह चूसा.. उसकी जीभ उसके खुले पंजों के बीच दौड़ी, मौसम के पसीने का तीखापन चखा, उसे अच्छी तरह साफ़ किया.. अब दोनों में से किसी की भी टीवी स्क्रीन पर दिख रहे दृश्यों में रुचि नहीं थी..
गरम हो रही मौसम ने फाल्गुनी को अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूमने लगी.. उनकी जीभों ने एक-दूसरे के मुँह के हर कोने को तलाश लिया.. वे क्षण भर के लिए अलग हुए और एक-दूसरे कपड़े उतारने में मदद करने लगे.. जैसे ही दोनों के जिस्म से लिबास का हर कतरा उतर गया, दोनों नंगे बदन एक-दूसरे से लिपट गई, उनके हाथ एक-दूसरे की चिकनी पीठ को सहला रहे थे.. फिर दोनों अलग हुए और एक-दूसरे के स्तनों को सहलाया..
मौसम के संतरे जैसे स्तनों को देखते ही फाल्गुनी उन पर झपटी और पूरा मुंह फाड़कर उसके स्तनों को लगभग निगल गई.. मौसम ने भी नीचे हाथ बढ़ाकर फाल्गुनी के स्तनों को सहलाया.. बीच-बीच में वे बार-बार किस करते रहे.. कुछ देर बाद फाल्गुनी ने सिर झुकाया और मौसम के संवेदनशील निप्पल्स को धीरे से चूसना शुरू कर दिया.. फाल्गुनी ने अपने नरम, गीले होठों से मौसम के मोटे गुलाबी निप्पल्स को तब तक खींचा जब तक उसकी आह्ह न निकल गई.. चूसने चाटने की वजह से मौसम की निप्पल लाल लाल हो गई थी.. फिर उसने निप्पलों को उंगलियों से कैंची की तरह दबाया, और उन्हें प्यार से मरोडा, कुरेदा और चिकोटी काटकर चूसने लगी.. इस बेतहाशा आनंद से मौसम पागल हुई जा रही थी..
वे दोनों अब हाँफ रहे थे, तड़प रहे थे, उत्तेजित थे.. मौसम ने अपनी बाहें फाल्गुनी की नंगी पीठ के चारों ओर डाल दीं और उसे खुद से सटा लिया.. दोनों के सख्त नंगे स्तनों को आपस में मसलते और रगड़ते हुए महसूस किया.. मौसम के सख्त निप्पल अभी भी फाल्गुनी की गर्म लार से गीले थे.. उसने अपनी जीभ फाल्गुनी के कान के सुराख में घुमा दी.. उसकी पीठ की चिकनी रेशमी त्वचा को सहलाया, उसकी लंबी मलाईदार गर्दन को चूमा और धीरे से काटा, धीमी, बेसुरी, भारी आवाज़ें निकालीं, फाल्गुनी के बालों में बुदबुदाई.. "ऊम्म्म्म…. छोड़ मुझे…कितना मज़ा आ रहा है… उफ्फ़…!!"
लगभग कामवासना से बेहाल फाल्गुनी, मौसम के काँपते शरीर से नीचे सरक गई.. मौसम अपने सैंडल के अलावा पूरी तरह नग्न थी, और फाल्गुनी की हरकतों के कारण उत्तेजना से काँप रही थी.. दोनों के तवे बेहद गरम हो चुके थे.. उनके चिकने, लचीले गोरे सेक्सी शरीर एक साथ कुंडली मार रहे थे.. मौसम ने अपने हाथ फाल्गुनी के कूल्हों तक फिराए, उन्हें दबाया, और अपनी उंगली उसकी गाँड की गर्म दरार में ऊपर-नीचे फिराई..
मौसम ने फाल्गुनी के उत्तेजित चेहरे को देखते हुए उसकी काँपती गांड के उभरे हुए गोल मांस के भूरे सँकरे छेद में अपनी उंगली डाल दी.. तेज़ गर्म झटकों ने उसके शरीर को जकड़ लिया..
"ओह्ह... ऊईईई" वह कराह उठी.. यूं गाँड में उंगली करते हुए फाल्गुनी को आनंद से बड़बड़ाते देखने में मौसम को मज़ा आ रहा था.. वह धीरे धीरे अपनी उंगली उस छेद में घूमा रही थी.. उंगली करवाते हुए भी फाल्गुनी की हरकतें जारी थी.. उसके हाथ मौसम की भीतरी जाँघों पर, हाँफते पेट पर और उसकी मुड़ती हुई कमर पर खूबसूरती से घूम रहे थे.. मौसम को इतना मज़ा आ रहा था कि सहन करना मुश्किल हो रहा था पर फिर भी वह चाहती थी की यह खेल चलता ही जाए
मौसम की चूत रस से टपक रही थी.. आग उबल रही थी.. उसकी चूत को अब मेहमानवाजी की तीव्र इच्छा हो रही थी.. और जाहीर सी बात थी की ऐसी इच्छा फाल्गुनी के मन में भी उठ रही होगी.. आँखें बंद कर लेटी मौसम करवट बदल कर ऐसी स्थिति में आना चाहती की जहां उसके मुंह और फाल्गुनी की चूत के बीच कुछ न हो.. पर इससे पहले ही मौसम का पूरा शरीर एक अनोखे आनंद से कांप उठा.. फाल्गुनी की जीभ उसकी गरम गीली दरार में घुस चुकी थी..!!
"उफ्फ़... ओह्ह्ह अह्ह्ह्ह्ह.. आह्ह.. ईशशशश.. ऊई माँ..!" वह चीख पड़ी, उसके कूल्हे बेबसी से उछल रहे थे और सोफ़े पर गोल गोल घूम रहे थे.. गरम शहद जैसा प्रवाही चूत में से बह रहा हो ऐसी अनुभूति उसकी भूखी चूत में गोली की तरह दौड़ गई.. बेतहाशा उत्तेजना से वह फाल्गुनी के शरीर, कमर और रेशमी पीठ पर अपने नाखून से खरोंचने लगी..
फाल्गुनी की जीभ जब मौसम की चूत के होंठों को कुरेदते हुए अंदर घुस गई, तब मौसम को एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे उसके प्राण निकल जाएंगे..!! उसका शरीर ढीला पड़ गया.. हाथ निर्जीव होकर सोफ़े पर गिर गए.. अब जैसे उसने अपना पूरा जिस्म फाल्गुनी के हवाले सौंप दिया था.. चरम के मदहोश अनुभव से उसका दिमाग कुछ क्षणों के लिए चकरा सा गया.. उसका मन कर रहा था की ऐसा अलौकिक अनुभव देने के लिए वो फाल्गुनी को चूम ले.. और उसकी चूत को भी ऐसे ही चाट कर मस्त कर दे.. लेकिन फिलहाल इसके बारे में वह कुछ नहीं कर सकती थी.. उसका अपना शरीर हवस की लौ से झुलस रहा था.. लहरा रहा था, पागल हुआ जा रहा था..
फाल्गुनी की जीभ ने उसकी भांप छोड़ रही चूत के गीले मांस को ओर टटोला.. मौसम को अपनी तनी हुई क्लिटोरिस और चीखती हुई तंत्रिकाओं के गुच्छे पर उसकी जीभ की रगड़न महसूस हो रही थी.. उसके मुंह से "आह्ह ओह्ह उफ्फ़" की पगलाई आवाज़ें निकल रही थी.. , वह तड़पती और कराहती रही.. कमर को गोल गोल घुमाते हुए फाल्गुनी की जीभ से अपनी चूत चटवाती रही..
एक ऑर्गेज़्म से अभी अभी उभरकर दूसरी पराकाष्ठा की ओर यात्रा कर रही मौसम, आनंद से कांपते हुए फुसफुसाई "आह्ह लीक मी.. उफ्फ़ फाल्गु.. इतना मज़ा आ रहा है की क्या बताऊँ.. फक.. ऐसे ही.. हाँ हाँ.. बिल्कुल वहीं पर.. थोड़ा और जोर से.. आह्ह फक..!!" कराहते हुए मौसम ने फाल्गुनी की जीभ के सामने सम्पूर्ण समर्पण स्वीकार लिया था..
चूत चाटते हुए फाल्गुनी के मुँह से चटकारों की तेज़ आवाज़ें सुनाई दे रही थी.. मौसम को फाल्गुनी की धीमी गुनगुनाती कराहें और घुरघुराहटें सुनाई दे रही थी.. उसके नाखूनों को अपनी जाँघों और नितंबों के मांस में गड़ता हुआ महसूस कर सकती थी.. फाल्गुनी की इन हरकतों ने उसकी कामुकता को और भी प्रचंड आग में झोंक दिया.. आँख बंद कर लेटे हुए मौसम ने अपनी दोनों हथेलियों को फाल्गुनी के हिलते हुए माथे पर रख दिया.. उसकी उँगलियाँ सिर के बालों को सहलाने लगी.. बीच में फाल्गुनी ने कुछ ऐसे जीभ चलाई की मौसम का पूरा शरीर एठ गया.. उसने फाल्गुनी की खोपड़ी पकड़ ली और उसके मुँह को अपनी रसीली बुर में जोर से दबा दिया
फाल्गुनी के सिर को अपनी उछलती जाँघों में जकड़ कर दबाते हुए, उन गहरी संवेदनाओं की भयंकर तीव्रता को बर्दाश्त करने की कोशिश कर रही थी मौसम.. उसकी चूत कभी सिकुड़ती तो कभी फैलती.. हर सिकुड़न के साथ अच्छी मात्रा में चिपचिपा गरम मीठा रस बहकर फाल्गुनी की जीभ को पावन कर रहा था.. असहाय होकर सोफ़े पर बलखाती, इठलाती मौसम जिस्म को मरोड़ते हुए आनंद के चरम पर कराह रही थी
दूसरी बार चरमसीमा की ओर यात्रा कर रही मौसम चाहती थी की ऑर्गेज़्म का वह असीम आनंद, आकर चला न जाएँ.. तब जो दिव्य अनुभूतियाँ होती है वह बस चलती रहे.. चलती ही रहे..!!
"आह्ह, और तेज चला अपनी जीभ.. फक मी हार्ड.. ऊईईई.. ओहहह फाल्गुनी.. मेरी जान.. आह्ह.. मेरा फिर से निकल रहा है, मेरी जान.. ऊँहहह.. आह्ह.. मैक मी कम डार्लिंग.. मैक मी कम वेरी लॉंग" फाल्गुनी जान गई की मौसम अब फिर से झड़ने की कगार पर है.. उसने मौसम की चेरी जैसी लाल कठोर क्लिटोरिस को मुंह में भर लिया और उसे होंठों की बीच दबाकर मुंह में शून्यवकाश रच दिया..
मौसम अपने चरम पर पहुँच गई.. वह चीख पड़ी.. उसका शरीर गर्म ऐंठनों से झुलस कर चूर हो गया.. चरमसीमा के जबरदस्त एहसास ने उसकी कोमल कच्ची तंत्रिकाओ को तोड़ कर रख दिया.. जलती हुई, कांपती हुई और बेकाबू होकर सिसक रही मौसम का शरीर थरथरा रहा था.. झटके पर झटके खा रहा था
इस धमाकेदार ऑर्गेज़्म के बाद मौसम निढाल होकर लाश की तरह सोफ़े पर पड़ी रही.. फाल्गुनी भी उसके बगल में लेट गई.. थोड़ी मिनटों तक यूं ही पड़े रहने के बाद अब फाल्गुनी का मन कर रहा थी की अपनी बुलबुलाती मुनिया को मजे कराए जाएँ
फाल्गुनी ने पास लेटी मौसम का चेहरा खींचकर अपनी लंबी लाल गीली चूत में घुसा दिया.. मौसम का मुंह फाल्गुनी के बहते हुए चूत के रस की गाढ़ी, कस्तूरी जैसी गंध से भर गया.. मौसम इस बात से दंग थी की दो भारी ऑर्गेज़्म के बाद भी उसकी इच्छा कम नहीं हुई थी..
मौसम को अपनी आँखों के पीछे, कानों के परदों में गर्म खून की धड़कन महसूस हो रही थी.. फाल्गुनी के उस सुंदर चमकते लाल घावनुमा बुर को मुग्ध होकर देखते हुए मौसम ने चूम लिया.. फाल्गुनी की चूत के मध्य में फैले लाल छेद के प्रत्येक तरफ सूजे हुए चिकने चूत-होठों को चाटा.. फाल्गुनी के कूल्हे अचानक तेज उछलती हरकतों से फड़फड़ाने लगे, उसकी गांड मरोड़ खाने लगी.. जाँघ की मांसपेशियाँ सिकुड़ने लगी.. फाल्गुनी कराहते हुए हिनहिना रही थी.. उसकी उन्मत्त उंगलियाँ सोफ़े के नरम कुशन में गड़ रही थीं..
"उफ्फ़फफ.. वाऊ.. यस यस्स.. " फाल्गुनी घुरघुराई.. "तेज़. डू इट फ़ास्ट. जोर से.. और जोर से! ओह हाँ.. ऐसे ही, उम्ममम..!!!!!"
फाल्गुनी की फैली हुई चूत रस से चमक रही थी, उसके चूत के होठ गर्म रक्त से सूजे हुए और फूले हुए थे.. उसके कूल्हे इतनी ऐंठन से उठ रहे थे, फड़फड़ा रहे थे और उछल रहे थे कि मौसम मुश्किल से अपना मुँह उस सुंदर मलाईदार दरार पर रख पा रही थी.. फिर भी, मौसम ने अपना चेहरा उसकी चूत में दबाया और अपनी जीभ को गरम जकड़ते योनिमार्ग में गहराई तक घुसा दिया..
फाल्गुनी की धधकती चूत के रसीले रस को मौसम ने बड़े ही चाव से चूसा और गटक गई.. उसने फाल्गुनी की चिपचिपी, स्वादिष्ट खाई को अपनी जीभ से खोदा और जड़ें जमाईं, जिससे फाल्गुनी की खुशी, कामुकता से भरे गरारों के रूप में व्यक्त हो रही थी.. फाल्गुनी की फुसफुसाहट भरी आवाज़ें.. उसके सुंदर शरीर का बेबस लोटना, मरोड़ना और साथ में मौसम की लपलपाती जीभ का उसकी चूत को और अंदर से कुरेदना.. उसे कामुकता के उच्च से उच्च स्तर पर ले गई..
हवस की पागल उबलती भूख से कराहते और गुनगुनाते हुए उसने फाल्गुनी की चमकती लाल दरार को चाट चाटकर साफ कर दिया.. ऊपर से नीचे तक स्वादिष्ट, मुलायम गीली परतों को चाटा, सूजे हुए लाल होंठों को अपने होठों के बीच दबाया और फाल्गुनी की सिकुड़ रही रस-बहती खाई को होठों से मसला, उसकी क्लिटोरिस के दाने को तब तक चूसती रही जब तक फाल्गुनी चीख नहीं पड़ी और बुरी तरह फड़फड़ा न उठी.. फाल्गुनी के कूल्हे उछल रहे थे और उमड़ रहे थे, उसका शरीर तन रहा था और मुड़ रहा था.. उसका पूरा शरीर एक धमाकेदार ऑर्गेज़्म की ओर अग्रेसर था..
"आआआआहहहहहह..!!!" फाल्गुनी कराह उठी, एक उन्मत्त लालसा से विक्षिप्त होकर.. मौसम ने अपनी सहेली की रसभरी स्वादिष्ट चूत को चूसा और अपनी जीभ से कुरेद कर रख दिया.. बेतहाशा प्यास से फाल्गुनी की चूत से रिस रहे मक्खन को निगलती गई.. चूत की गाढ़ी गंध को सूंघते ही उसका सिर चकरा गया, लेकिन छटपटाती, ऐंठती हुई फाल्गुनी को नीचे दबाए रखना अब मौसम के लिए मुश्किल हो रहा था.. मौसम से कद में दो इंच छोटी होने के बावजूद फाल्गुनी मज़बूत थी.. नियमित व्यायाम और जॉगिंग से उसका जिस्म कसा हुआ था.. वह उसके कूल्हे सोफे पर उछाल उछालकर हिला रही थी जिससे उसकी चूत मौसम के लालसी मुँह से टकराती जा रही थी..
मौसम ने फाल्गुनी की हिलती हुई जांघों को पकड़ा, उसकी उछलती हिलती जांघों की घूमती हड्डियों को थामने की कोशिश की, ताकि उसे स्थिर रख सके.. उसने अपनी उंगलियाँ फाल्गुनी के गोल, भिंचते कूल्हों में गड़ा दीं, और फाल्गुनी खुशी से चीख पड़ी..
"हाययययय हाँ...!" उसने दाँतों को पिसते हुए कहा.. "निचोड़ डाल मुझे, मेरी गांड दबा, मेरे बूब्स निचोड़...! आआहहहह..!!!" उसकी मजबूत जांघों ने मौसम के सिर को कसकर जकड़ लिया.. जोर जोर से हांफते हुए उसने अपनी चूत को मौसम के मुँह पर रगड़ा और मौसम ने अपने हाथ उसके सख्त निप्पल वाले हिलते स्तनों तक बढ़ाए.. उन्हें पकड़ लिया.. दबोच लिया..
उसके होंठ फाल्गुनी के भीगी सूजी हुई लाल लाल क्लिटोरिस पर कसकर चिपके हुए थे.. फाल्गुनी लहराते हुए शहद जैसे रस गिराते हुए, झटकों के साथ चरम पर पहुँचने लगी..
"ओह! ओह!" फाल्गुनी कराहते हुए बोली.. उसका शरीर तीव्र, ऐंठन भरे कंपनों से थरथरा रहा था.. "याइईईईई! उँह! याइईईईई!" वह चीखी, भयानक, हिंसक तीव्रता के साथ पूरे जिस्म को मरोड़ते हुए.. फाल्गुनी कराहती रही और ऐंठती रही और चूत से चरम का पानी गिराती रही.. उसके बुरी तरह थरथराते जिस्म को मौसम थामे रही, अपनी जीभ को उसकी चरम-त्रस्त चूत की गर्म रसीली गहराइयों में दबाए रखा, और अपने हाथों से फाल्गुनी के मस्त संतरों को मसलती रही.. जब ऑर्गेज़्म के तूफान का असर कुछ कम हुआ.. फाल्गुनी का शरीर शांत पड़ गया.. वह अभी भी हाँफ रही थी पर चेहरे पर असीम शांति और संतुष्टि के भाव थे..
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शीला के घर पर मदन, रूखी और चम्पा के साथ संबंध बना रहा होता है। वहीं दूसरी ओर, बेंगलोर से मौसम अपनी सहेली फाल्गुनी से मिलने आती है। फाल्गुनी अपने घर पर मौसम का स्वागत करती है, और दोनों शराब पीकर पुरानी यादें ताजा करती हैं। धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होती हैं और लेस्बियन संबंध बनाती हैं, जिसमें वे एक-दूसरे को चरम सुख प्रदान करती हैं। यह दृश्य टीवी पर चल रही अश्लील फिल्म के बीच और अधिक उत्तेजक हो जाता है। धमाकेदार ऑर्गेज़्म के साथ दोनों तृप्त होकर शांत हो जाती है..
अब आगे..
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कविता के आलीशान घर का द्रश्य..
विशाल ड्रॉइंग-रूम के महंगे सोफ़े पर शीला पैर पर पैर चढ़ाए बैठी थी..
कमरे की छत से लटकते हुए विशाल क्रिस्टल के झूमर की सुनहरी रौशनी उस आलीशान ड्रॉइंग रूम में एक नरम सा उजाला बिखेर रही थी.. इटालियन मार्बल के फर्श पर शीशे की मेज़ और मखमली काउच सजे थे.. यह कविता का घर था.. एक ऐसा महल जो उसके पिता सुबोधकांत के गुज़र जाने के बाद पीयूष को मिली विरासत और उसकी दिन-रात की मेहनत का नतीजा था..
शीला:"नज़र न लगे तुम्हारे इस आशियाने को! कितने टाइम बाद मिल रहे हैं हम, कविता.. सच कहूँ तो तू बिल्कुल बदल गई है, एकदम इस महल की महारानी लग रही है.."
कविता के होठों पर एक बहुत ही सधी हुई, शिष्टाचार वाली मुस्कान तैर गई.. उसने पास खड़े नौकर को इशारा किया, जिसने बेहद नज़ाकत से दोनों के सामने क्रिस्टल के गिलासों में व्हिस्की उड़ेल दी..
गिलास शीला की तरफ बढ़ाते हुए कविता ने कहा "पर आप बिल्कुल नहीं बदली भाभी! इतने वक्त बाद आपको देखकर सच में ऐसा लग रहा है जैसे कोई अपना इतने बड़े और खाली घर में आ गया हो.. अच्छा हुआ आप आई.."
व्हिस्की का एक छोटा घूंट लेते हुए शीला ने कहा "अरे, बस वक्त ही नहीं मिला.. वैशाली की ज़िंदगी में जो कुछ भी हुआ... संजय से उसका वो दर्दनाक तलाक, फिर पिंटू के साथ उसकी नई शुरुआत... इन सब में उलझ कर रह गई थी.. पर सच बताऊँ, पीयूष ने सुबोधकांत के जाने के बाद जिस तरह से बिज़नेस को बड़े अच्छे से संभाला और इतना बड़ा बना दिया, काबिले-तारीफ है.."
कविता ने अपना गिलास उठाया.. उसकी उंगलियाँ गिलास के ठंडे काँच को सहला रही थीं.. उसने एक हल्का सा घूंट लिया, लेकिन उसकी मुस्कान अब आँखों तक नहीं पहुँच रही थी..
कविता: "हाँ भाभी... पापा के अचानक चले जाने से सब बिखर गया था.. लेकिन पीयूष ने दिन-रात एक कर दिया.. ये घर, ये गाड़ियाँ, ये रुतबा... सब उसकी मेहनत का नतीजा है.."
कमरे में एक पल के लिए हल्की सी खामोशी छा गई, जिसे सिर्फ बैकग्राउंड में बज रहे बेहद धीमे वाद्य संगीत ने भरा.. शीला की पारखी नज़रें कविता के चेहरे को पढ़ रही थीं.. इतने महँगे लिबास और सजे-संवरे रूप के पीछे एक अजीब सी थकान और उदासी छुपी थी.. शीला ने अपना गिलास टेबल पर रखा और थोड़ी गंभीर हो गईं..
शीला: "घर तो बहुत खूबसूरत बना लिया है पीयूष ने.. लेकिन सच बता कविता... क्या तू खुश है यहाँ? पीयूष ने बिज़नेस तो बहुत बड़ा कर लिया, लेकिन मुझे लगता है इस आपाधापी में वो तुझे कहीं पीछे छोड़ गया है.."
शराब की गर्माहट धीरे-धीरे कविता की नसों में उतर रही थी, और उसके साथ ही वो औपचारिकता का पर्दा भी पिघलने लगा था जो उसने ओढ़ रखा था..
हल्की सी आह भरते हुए और अपनी नज़रें झुका कर कविता ने जवाब दिया "खुशी क्या होती है भाभी, अब तो मुझे याद भी नहीं.. पीयूष के पास फुर्सत ही कहाँ है? सुबह वो उठता हैं तो फोन पर बात करते हुए, रात को लौटता है तो थका हारा.. कई बार हफ्तों गुज़र जाते हैं और हम ढंग से बात भी नहीं कर पाते.. कभी-कभी तो लगता है कि मैं इस आलीशान घर में महज़ एक कीमती शोपीस बनकर रह गई हूँ, जिसकी देखभाल तो होती है, पर जिससे कोई प्यार नहीं करता.."
शीला अपनी जगह से उठीं और आकर कविता के पास सोफे पर बैठ गईं.. उसने अपना हाथ कविता के हाथ पर रखा.. शीला हमेशा से ही बहुत खुले विचारों वाली रही थीं, दुनियादारी के झूठे पर्दों से उसे कोई खास वास्ता नहीं था..
आवाज़ में एक राज़दार वाली नर्मी लाते हुए शीला ने कहा "मैं तुझे बरसों से जानती हूँ कविता.. वो भी एक वक्त था जब मेरी ही छत के नीचे, मेरे ही घर के उस छोटे से कमरे में तेरे और पिंटू के कहकहे गूँजते थे.. याद है न? तेरी शादी पीयूष से हो जाने के बाद भी मैंने तुम दोनों को कितनी बार मिलवाया था..!!"
पिंटू का नाम सुनते ही कविता के हाथ में पकड़ा गिलास हल्का सा कांप गया.. उसकी आँखों में एक पल के लिए घबराहट और एक पुरानी टीस तैर गई.. उसने जल्दी से अपना हाथ शीला की पकड़ से छुड़ाया और व्हिस्की का एक बड़ा घूंट गले के नीचे उतार लिया..
आवाज़ में हल्की सी झिझक और घबराहट के साथ कविता ने कहा "भाभी... प्लीज़... पुरानी बातें अब क्यों निकाल रही हैं? अब तो बहुत कुछ बदल गया है.. वैशाली... अब पिंटू की पत्नी है.. और सबसे बड़ी बात, वैशाली और पिंटू दोनों अब पीयूष के ही ऑफिस में काम करते हैं.. रोज़मर्रा का आमना-सामना है... मैं... मैं उस बारे में अब कोई बात नहीं करना चाहती.."
शीला ने हार नहीं मानी.. उस ने कविता के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम लिया और उसकी आँखों में सीधा देखा..
शीला: "कविता, मेरी आँखों में देख.. मैं यहाँ वैशाली की माँ बनकर नहीं बैठी हूँ.. मैं तेरी वही पुरानी शीला भाभी हूँ.. वैशाली मेरी बेटी है, और पिंटू ने उसे एक नई ज़िंदगी दी है, वो सब अपनी जगह है.. लेकिन आज मैं तेरी बात कर रही हूँ.. शराब का ये गिलास तेरे हाथ में है, और मैं जानती हूँ ये घूंट तू पीयूष की बेरुखी को भुलाने के लिए नहीं, किसी और की याद को दबाने के लिए पी रही है.. मुझे सच बता... क्या आज भी तेरे दिल में पिंटू के लिए वही जज़्बात हैं?"
कविता ने नज़रें चुराने की बहुत कोशिश की, लेकिन शीला के स्पर्श, उस पुराने अपनेपन और शराब के नशे ने उसके अंदर सालों से बनाए गए सब्र के बाँध में दरार डाल दी.. कविता की आँखें अचानक भर आईं.. उसके होंठ कांपने लगे..
रुंधे हुए गले से कविता बोली "आप क्यों पूछ रही हैं भाभी? क्यों कुरेद रही हैं उन ज़ख्मों को जिन्हें मैं रोज़ अपने इन महँगे कपड़ों और झूठी मुस्कान के नीचे छुपाती हूँ? आप सच जानना चाहती हैं? तो सुनिए..."
कविता ने अपना गिलास टेबल पर ज़ोर से रखा.. उसके चेहरे पर अब एक अजीब सी बेबसी, गुस्सा और दीवानगी एक साथ झलक रही थी..
कविता: "हाँ भाभी! हाँ, मैं आज भी उसी तरह तड़पती हूँ उसके लिए! बल्कि अब तो ये तड़प और भी जानलेवा हो गई है.. पीयूष से मेरी दूरियां अब खाई बन चुकी हैं.. हमारे बीच पति-पत्नी जैसा कुछ नहीं बचा.. और दूसरी तरफ... दूसरी तरफ जब मैं पिंटू को पीयूष के ऑफिस की पार्टियों में देखती हूँ... जब उसे वैशाली के साथ मुस्कुराते हुए देखती हूँ, तो मेरे सीने में आग लग जाती है भाभी.. मैं पागल हो जाती हूँ ये सोचकर कि वो शख्स, जिसकी बाहों में मैंने जन्नत महसूस की थी, जिसके लिए मैंने दुनिया से बगावत करने की सोची थी... वो मेरे सामने है, पर मेरा नहीं है!"
कविता की आवाज़ अब सिसकियों में बदल गई थी.. उसने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों में छुपा लिया.. शीला चुपचाप उसकी पीठ सहलाती रहीं..
रोते हुए, टूटती हुई आवाज़ में कविता ने कहा "आपको पता है भाभी, जब रात को इस बड़े से बेडरूम में मैं अकेली होती हूँ, तो ये दीवारें मुझे खाने दौड़ती हैं.. मैं फोन उठाती हूँ, उसका नंबर डायल करने ही वाली होती हूँ... फिर मुझे याद आता है कि वो अब मेरी सबसे अच्छी दोस्त, मेरी भाभी की बेटी का पति है.. मैं अपने ही होंठ काट लेती हूँ ताकि मेरी चीख बाहर न निकले.. मैं उसे भूलना चाहती हूँ, पर जितनी बार वो काम के सिलसिले में पीयूष के साथ इस घर में आता है, मेरी सालों की तपस्या एक पल में टूट जाती है.. मैं आज भी सिर्फ और सिर्फ पिंटू से प्यार करती हूँ... मैं उसके बिना घुट-घुट कर मर रही हूँ भाभी.."
कविता पूरी तरह से टूट चुकी थी.. उसने अपना सिर शीला के कंधे पर रख दिया और किसी छोटी बच्ची की तरह फूट-फूट कर रोने लगी.. शीला ने उसे अपने गले से लगा लिया, लेकिन उसके चेहरे पर एक गहरी सोच और कशमकश तैर रही थी..
कमरे में अब सिर्फ कविता की सिसकियों की आवाज़ थी, जो उस विशाल और शांत घर की दीवारों से टकराकर और भी गहरी लग रही थी.. एसी की ठंडी हवा के बावजूद माहौल में एक अजीब सा भारीपन आ गया था.. महँगी व्हिस्की की सोंधी महक और कविता के आंसुओं की नमी आपस में घुल-मिल गई थी..
शीला कुछ पलों तक बिल्कुल खामोश रहीं.. उसके चेहरे की लकीरों पर एक गहरी कशमकश और दर्द उभर आया था.. एक तरफ उसकी अपनी बेटी वैशाली थी.. दूसरी तरफ उसकी बाँहों में वो कविता थी, जिसके इश्क की वो खुद गवाह रही थीं, जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से पिंटू से मिलाया था..
शीला ने बहुत ही कोमलता से कविता के उलझे हुए बालों को सहलाया और उसे तब तक रोने दिया जब तक कि उसके सीने का गुबार आँसुओं के रास्ते थोड़ा कम नहीं हो गया.. फिर, उन्होंने एक गहरी साँस ली और कविता का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामकर ऊपर उठाया.. कविता की आँखें लाल हो चुकी थीं और काजल गालों पर फैल गया था..
बेहद शांत, ठहरी हुई और भारी आवाज़ में शीला ने कहा "रो ले कविता... आज जी भर के रो ले.. इन आँसुओं को इस महँगे मार्बल पर गिर जाने दे.. तूने बहुत सालों तक इस दर्द को अपने सीने में दबा कर रखा है.."
शीला ने टेबल से नैपकिन उठाया और बहुत ही प्यार से कविता के आँसू पोंछे.. उनकी आँखों में कोई शिकायत या तिरस्कार नहीं था, बल्कि दुनिया की कड़वी सच्चाई को समझ लेने वाली एक गहरी उदासी थी..
शीला: "तू मुझे भाभी कहती है न? तो आज एक बात बहुत ध्यान से सुन.. मैं दुनिया की उन आम औरतों में से नहीं हूँ जो तुझे ये नसीहत दूंगी कि अब तू शादीशुदा है, तुझे अपने पति पर ध्यान देना चाहिए या पिंटू अब मेरी बेटी का पति है, तुझे ये सब सोचना पाप है.. मैं जानती हूँ कविता, कि दिल के मामले किसी कागज़ के सर्टिफिकेट या समाज के बनाए दायरों के मोहताज नहीं होते.. जिस इंसान से रूह जुड़ जाए, उसे दिमाग से खुरच कर नहीं निकाला जा सकता.."
कविता सुबकते हुए शीला की आँखों में देख रही थी.. उसे उम्मीद नहीं थी कि वैशाली की माँ होने के बावजूद शीला उसे इस तरह से समझेंगी..
शीला ने अपना गिलास उठाया, उसे हल्का सा घुमाया और बिना पिए वापस रख दिया.. उनकी नज़रें अब कमरे के एक खाली कोने में टिकी थीं, जैसे वो बीते हुए वक्त को देख रही हों..
शीला: "इश्क पर किसी का ज़ोर नहीं होता कविता.. मैं तुझे गलत नहीं मानती कि तू आज भी पिंटू से प्यार करती है.. लेकिन... लेकिन किस्मत ने हम सबके साथ कैसा क्रूर मज़ाक किया है, ये देख.. जिस वैशाली को संजय ने हर दिन तिल-तिल कर मारा था, उस वैशाली को पिंटू ने समेटा है.. और दूसरी तरफ... पीयूष, जो शायद तुझे वो प्यार नहीं दे पा रहा जिसकी तू हक़दार है, लेकिन उसी पीयूष ने वैशाली और पिंटू को अपने ऑफिस में काम देकर उन्हें पैरों पर खड़ा किया है.."
शीला की आवाज़ अब थोड़ी भर्रा गई थी.. उन्होंने वापस कविता की ओर देखा, इस बार उनकी आँखों में एक अजीब सा भाव था..
शीला: "तू रोज़ एक आग के पास बैठती है कविता, और सोचती है कि तू जलेगी नहीं? पिंटू को रोज़ अपने सामने देखकर जो तू घुट रही है, ये घुटन एक दिन तुझे, पीयूष को, वैशाली को और पिंटू को... सबको भस्म कर देगी.. तू मेरी बच्ची जैसी है, और वैशाली मेरी कोख से जन्मी है.. मैं दोनों में से किसी का घर उजड़ते हुए नहीं देख सकती.."
कविता ने अपना सिर झुका लिया और अपने हाथों को ज़ोर से भींच लिया..
कांपती हुई आवाज़ में कविता ने कहा "तो मैं क्या करूँ भाभी? आप ही बताइए मैं क्या करूँ? मैं ज़हर खा लूँ? मैं कैसे निकाल दूँ उसे अपने दिल से जब हर रोज़ उसकी परछाई मेरे घर के दरवाज़े तक आती है? मैं कोशिश करती हूँ पीयूष के करीब जाने की, पर वो अपने लैपटॉप और मीटिंग्स से सिर ही नहीं उठाता.. मैं इस अकेलेपन से हार गई हूँ भाभी.."
शीला ने कविता के हाथ को कसकर पकड़ लिया.. उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी दृढ़ता थी..
शीला: "तुझे हारना नहीं है, और न ही इस अकेलेपन के ज़हर को पीना है.. अगर पीयूष तुझे वो जगह नहीं दे रहा, तो तुझे अपना हक़ छीनना होगा.. और रही बात पिंटू की... तो कविता, कुछ प्यार मुकम्मल होने के लिए नहीं बने होते.. उन्हें बस एक खूबसूरत याद बनाकर दिल के किसी बंद संदूक में उम्र भर के लिए कैद करना पड़ता है.. पिंटू अब एक बीता हुआ कल है, और वैशाली का आज.. तुझे अपने कल से लड़कर अपने आज को सुधारना होगा, वरना ये आलीशान घर तेरे लिए एक बहुत खूबसूरत कब्र बन जाएगा.."
फिर से वही खामोशी छा गई.. बाहर दूर कहीं बादलों के गरजने की हल्की सी आवाज़ आई, जैसे मौसम भी इस भारी बातचीत के साथ करवट ले रहा हो.. कविता शून्य में घूर रही थी, शीला के कहे हुए एक-एक शब्द उसके जेहन में हथौड़े की तरह बज रहे थे..
कमरे में अब सिर्फ एसी की हल्की सी भिनभिनाहट और कविता की थकी हुई सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी.. बाहर मौसम ने भी जैसे इस उदासी की चादर ओढ़ ली थी; काँच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर बारिश की बूँदें फिसल रही थीं, जो कमरे के अंदर की सुनहरी रौशनी में मोतियों जैसी चमक रही थीं.. कविता ने अपना सिर शीला की गोद में रख दिया था और आँखें मूँद ली थीं..
शीला बहुत ही नर्मी से कविता के बाल सहला रही थीं, लेकिन बाहर से जितनी शांत वो दिख रही थीं, उनके दिमाग के भीतर ख्यालों का एक भयानक तूफ़ान आकार ले रहा था.. उनकी तेज़ और पारखी नज़रें कमरे की हर एक कीमती चीज़ का जायज़ा ले रही थीं, दीवारों पर टंगी लाखों की पेंटिंग्स, पैरों के नीचे बिछा वो बेशकीमती पर्शियन कालीन, और वो शानदार इटालियन मार्बल जिस पर शराब की कुछ बूँदें गिरकर चमक रही थीं..
अचानक, शीला के दिमाग में एक ऐसी सोच ने जन्म लिया जो किसी भी आम औरत के होश उड़ाने के लिए काफी थी.. लेकिन शीला आम नहीं थीं.. समाज के बनाए खोखले उसूल और नैतिकता की बेड़ियाँ उनके आज़ाद ख्यालों को कभी बाँध नहीं पाई थीं..
शीला की नज़रें कविता के आँसुओं से भरे चेहरे से हटीं और शून्य में टिक गईं.. उसका दिमाग शतरंज के एक बहुत ही खतरनाक और रोमांचक खेल की बिसात बिछाने लगा था..
शीला मन ही मन सोच रही थी 'कितना अजीब है न इंसानी रिश्तों का ये ताना-बाना...' शीला ने गहरी साँस लेते हुए सोचा.. 'इस आलीशान घर में सब कुछ है, बस वो नहीं है जिसकी इसे ज़रूरत है.. और दूसरी तरफ मेरी वैशाली है...'
वैशाली का खयाल आते ही शीला की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई.. पिंटू ने वैशाली को संजय नाम के हैवान से ज़रूर बचाया था, लेकिन शीला एक माँ होने के साथ-साथ एक औरत भी थीं.. वो जानती थीं कि अपनी बेटी की ज़िंदगी का सबसे कड़वा सच क्या है.. वैशाली एक बेहद खूबसूरत, जवान और अरमानों से भरी औरत है, जिसकी रगों में वासना दौड़ती है.. लेकिन पिंटू? पिंटू एक अच्छा इंसान तो है, पर बिस्तर पर वो वैशाली की उस आग को बुझाने में पूरी तरह नाकाम है.. उसकी नामर्दी के कारण वैशाली की रातें एक अलग ही तरह की तड़प और घुटन में कट रही हैं.. एक औरत के लिए शारीरिक संतुष्टि के बिना एक नीरस शादी में बंधे रहना किसी सज़ा से कम नहीं होता..!!
'और ये पीयूष?' शीला की नज़र पास ही रखी पीयूष और कविता की एक बड़ी सी फ्रेम की हुई तस्वीर पर गई.. 'मैं पीयूष को जानती हूँ.. वो कोई मशीन नहीं है जो सिर्फ पैसा छापना जानता हो.. वो तो एक बेहद रोमैंटिक, जुनूनी और जज़्बाती मर्द है.. अगर आज वो कविता से दूर भाग रहा है, खुद को बिज़नेस के बहाने ऑफिस में बंद रख रहा है, तो इसका मतलब ये नहीं कि उसके अंदर का मर्द मर गया है.. इसका सीधा सा मतलब ये है कि कविता अब उसके अंदर वो आग, वो चाहत पैदा नहीं कर पाती.. पीयूष का दिल भर चुका है, वो बस इस रिश्ते को ढो रहा है..'
शीला के होंठों के कोनों पर एक बहुत ही बारीक, लगभग न दिखने वाली मुस्कान तैर गई.. उसका दिमाग अब एक परफेक्ट 'कैलकुलेशन' कर रहा था..
'क्या हो अगर इस बिसात के मोहरे बदल दिए जाएँ?' शीला के रोंगटे इस खयाल मात्र से खड़े हो गए..
'चार लोग... और चारों अपनी-अपनी जगह पर घुट रहे हैं.. प्यास किसी और चीज़ की है, और सामने जो कुआँ है, उसका पानी उन्हें चाहिए नहीं.. वैशाली को अपनी दहकती हुई जवानी के लिए पीयूष जैसा एक संपूर्ण और जुनूनी मर्द चाहिए, जो उसे भरसक चोदकर एक औरत होने का पूरा अहसास करा सके.. और पीयूष को अपने नीरस हो चुके जीवन में वैशाली जैसी एक बेबाक और हसीन आग चाहिए, जो उसके अंदर के सोए हुए आशिक को फिर से जगा दे..
और ये पगली कविता? इसे इस महलों की कोई परवाह नहीं है.. इसे तो बस अपने पिंटू का प्यार चाहिए, उसकी बाहें चाहिए.. और मुझे यकीन है कि पिंटू के दिल के किसी कोने में आज भी कविता ही बसती है.. अगर ये दोनों पुरानी जोड़ियाँ वापस मिल जाएँ, तो क्या बुराई है?'
शीला ने एक बार फिर उस विशाल, राजमहल जैसे कमरे को देखा.. इस बार उनकी आँखों में एक गहरी लालसा और महत्त्वाकांक्षा थी..
'अगर पीयूष और वैशाली एक हो जाते हैं... तो मेरी वैशाली...' शीला का दिल ज़ोर से धड़कने लगा.. 'मेरी बच्ची सिर्फ एक बिस्तर की रानी नहीं बनेगी, वो इस पूरे साम्राज्य की मल्लिका बन सकती है..!! सुबोधकांत का खड़ा किया हुआ ये करोड़ों का अंपायर, ये गाड़ियाँ, ये नौकर-चाकर... वैशाली एक महारानी की तरह राज करेगी.. और उसे वो शारीरिक सुख भी मिलेगा जिसके लिए वो आज अंदर ही अंदर जल रही है..'
एक पल के लिए शीला के दिमाग में समाज का खयाल आया.. 'तमाशा बन जाएगा.. लोग थू-थू करेंगे..'
लेकिन अगले ही पल शीला ने इस खयाल को किसी गंदे कीड़े की तरह अपने दिमाग से झटक दिया..
'माँ चूदाने जाए ये दोगला समाज!' शीला ने मन में एक ठंडी, तिरस्कार भरी हँसी हँसी.. 'जब वैशाली उस हैवान संजय के हाथों रोज़ पिटती थी, तब कौन सा समाज उसे बचाने आया था? ये दुनिया सिर्फ झूठे उसूलों का चोला पहनना जानती है.. अगर चार घुटते हुए, मरते हुए लोग अपनी जगह बदल कर एक मुकम्मल, संतुष्ट और खुशहाल ज़िंदगी पा सकते हैं, तो इसमें गलत क्या है? कोई पाप नहीं है इसमें.. ये धोखा नहीं है, ये तो एक परफेक्ट गणित है... ज़िंदगियों को सुलझाने का एक अचूक तरीका..'
शीला ने अपना गिलास उठाया और उसे एक ही घूंट में खाली कर दिया.. उसके दिमाग में अब धुंध छँट चुकी थी और मंज़िल बिल्कुल साफ थी.. कविता अभी भी उसकी गोद में सिर रखे सुबक रही थी, इस बात से बिल्कुल बेखबर कि जिस औरत के कंधे पर वो रो रही है, वो उसी के घर, उसी के पति और उसी के पुराने प्रेमी को लेकर एक ऐसी चाल चलने वाली है, जो इन चारों की ज़िंदगियों को हमेशा के लिए पलट कर रख देगी..
शीला ने बहुत ही प्यार से कविता के माथे को चूमा.. उसके चेहरे पर अब एक अजीब सा आत्मविश्वास था.. एक ऐसा मास्टरमाइंड जिसका प्लान अब एक्शन में आने के लिए पूरी तरह तैयार था..
Thanks a lot for the commentsबहुत ही गरमागरम कामुक और उत्तेजना से भरपूर खतरनाक अपडेट है भाई मजा आ गया
मौसम और फाल्गुनी के बीच सुबोधकांत और फाल्गुनी के संबंध किस तरहा से पनपे और दोनों के बीच क्या क्या और कैसे हुआ इसका वर्णन अप्रतिम हैं
ये राजेश का फाल्गुनी को एक अरसे के बाद बार बार फोन करने का का क्या कारण हो सकता है
खैर देखते हैं आगे क्या होता है
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा

Thanks a lot for the commentsJ
Badiya update but thoda chota rahe gya

Thanks a lot for the commentsBahut ही खूबसूरत

Sheela bhabhi ko zehar hai zeharपिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..
शीला के घर पर मदन, रूखी और चम्पा के साथ संबंध बना रहा होता है। वहीं दूसरी ओर, बेंगलोर से मौसम अपनी सहेली फाल्गुनी से मिलने आती है। फाल्गुनी अपने घर पर मौसम का स्वागत करती है, और दोनों शराब पीकर पुरानी यादें ताजा करती हैं। धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होती हैं और लेस्बियन संबंध बनाती हैं, जिसमें वे एक-दूसरे को चरम सुख प्रदान करती हैं। यह दृश्य टीवी पर चल रही अश्लील फिल्म के बीच और अधिक उत्तेजक हो जाता है। धमाकेदार ऑर्गेज़्म के साथ दोनों तृप्त होकर शांत हो जाती है..
अब आगे..
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कविता के आलीशान घर का द्रश्य..
विशाल ड्रॉइंग-रूम के महंगे सोफ़े पर शीला पैर पर पैर चढ़ाए बैठी थी..
कमरे की छत से लटकते हुए विशाल क्रिस्टल के झूमर की सुनहरी रौशनी उस आलीशान ड्रॉइंग रूम में एक नरम सा उजाला बिखेर रही थी.. इटालियन मार्बल के फर्श पर शीशे की मेज़ और मखमली काउच सजे थे.. यह कविता का घर था.. एक ऐसा महल जो उसके पिता सुबोधकांत के गुज़र जाने के बाद पीयूष को मिली विरासत और उसकी दिन-रात की मेहनत का नतीजा था..
शीला:"नज़र न लगे तुम्हारे इस आशियाने को! कितने टाइम बाद मिल रहे हैं हम, कविता.. सच कहूँ तो तू बिल्कुल बदल गई है, एकदम इस महल की महारानी लग रही है.."
कविता के होठों पर एक बहुत ही सधी हुई, शिष्टाचार वाली मुस्कान तैर गई.. उसने पास खड़े नौकर को इशारा किया, जिसने बेहद नज़ाकत से दोनों के सामने क्रिस्टल के गिलासों में व्हिस्की उड़ेल दी..
गिलास शीला की तरफ बढ़ाते हुए कविता ने कहा "पर आप बिल्कुल नहीं बदली भाभी! इतने वक्त बाद आपको देखकर सच में ऐसा लग रहा है जैसे कोई अपना इतने बड़े और खाली घर में आ गया हो.. अच्छा हुआ आप आई.."
व्हिस्की का एक छोटा घूंट लेते हुए शीला ने कहा "अरे, बस वक्त ही नहीं मिला.. वैशाली की ज़िंदगी में जो कुछ भी हुआ... संजय से उसका वो दर्दनाक तलाक, फिर पिंटू के साथ उसकी नई शुरुआत... इन सब में उलझ कर रह गई थी.. पर सच बताऊँ, पीयूष ने सुबोधकांत के जाने के बाद जिस तरह से बिज़नेस को बड़े अच्छे से संभाला और इतना बड़ा बना दिया, काबिले-तारीफ है.."
कविता ने अपना गिलास उठाया.. उसकी उंगलियाँ गिलास के ठंडे काँच को सहला रही थीं.. उसने एक हल्का सा घूंट लिया, लेकिन उसकी मुस्कान अब आँखों तक नहीं पहुँच रही थी..
कविता: "हाँ भाभी... पापा के अचानक चले जाने से सब बिखर गया था.. लेकिन पीयूष ने दिन-रात एक कर दिया.. ये घर, ये गाड़ियाँ, ये रुतबा... सब उसकी मेहनत का नतीजा है.."
कमरे में एक पल के लिए हल्की सी खामोशी छा गई, जिसे सिर्फ बैकग्राउंड में बज रहे बेहद धीमे वाद्य संगीत ने भरा.. शीला की पारखी नज़रें कविता के चेहरे को पढ़ रही थीं.. इतने महँगे लिबास और सजे-संवरे रूप के पीछे एक अजीब सी थकान और उदासी छुपी थी.. शीला ने अपना गिलास टेबल पर रखा और थोड़ी गंभीर हो गईं..
शीला: "घर तो बहुत खूबसूरत बना लिया है पीयूष ने.. लेकिन सच बता कविता... क्या तू खुश है यहाँ? पीयूष ने बिज़नेस तो बहुत बड़ा कर लिया, लेकिन मुझे लगता है इस आपाधापी में वो तुझे कहीं पीछे छोड़ गया है.."
शराब की गर्माहट धीरे-धीरे कविता की नसों में उतर रही थी, और उसके साथ ही वो औपचारिकता का पर्दा भी पिघलने लगा था जो उसने ओढ़ रखा था..
हल्की सी आह भरते हुए और अपनी नज़रें झुका कर कविता ने जवाब दिया "खुशी क्या होती है भाभी, अब तो मुझे याद भी नहीं.. पीयूष के पास फुर्सत ही कहाँ है? सुबह वो उठता हैं तो फोन पर बात करते हुए, रात को लौटता है तो थका हारा.. कई बार हफ्तों गुज़र जाते हैं और हम ढंग से बात भी नहीं कर पाते.. कभी-कभी तो लगता है कि मैं इस आलीशान घर में महज़ एक कीमती शोपीस बनकर रह गई हूँ, जिसकी देखभाल तो होती है, पर जिससे कोई प्यार नहीं करता.."
शीला अपनी जगह से उठीं और आकर कविता के पास सोफे पर बैठ गईं.. उसने अपना हाथ कविता के हाथ पर रखा.. शीला हमेशा से ही बहुत खुले विचारों वाली रही थीं, दुनियादारी के झूठे पर्दों से उसे कोई खास वास्ता नहीं था..
आवाज़ में एक राज़दार वाली नर्मी लाते हुए शीला ने कहा "मैं तुझे बरसों से जानती हूँ कविता.. वो भी एक वक्त था जब मेरी ही छत के नीचे, मेरे ही घर के उस छोटे से कमरे में तेरे और पिंटू के कहकहे गूँजते थे.. याद है न? तेरी शादी पीयूष से हो जाने के बाद भी मैंने तुम दोनों को कितनी बार मिलवाया था..!!"
पिंटू का नाम सुनते ही कविता के हाथ में पकड़ा गिलास हल्का सा कांप गया.. उसकी आँखों में एक पल के लिए घबराहट और एक पुरानी टीस तैर गई.. उसने जल्दी से अपना हाथ शीला की पकड़ से छुड़ाया और व्हिस्की का एक बड़ा घूंट गले के नीचे उतार लिया..
आवाज़ में हल्की सी झिझक और घबराहट के साथ कविता ने कहा "भाभी... प्लीज़... पुरानी बातें अब क्यों निकाल रही हैं? अब तो बहुत कुछ बदल गया है.. वैशाली... अब पिंटू की पत्नी है.. और सबसे बड़ी बात, वैशाली और पिंटू दोनों अब पीयूष के ही ऑफिस में काम करते हैं.. रोज़मर्रा का आमना-सामना है... मैं... मैं उस बारे में अब कोई बात नहीं करना चाहती.."
शीला ने हार नहीं मानी.. उस ने कविता के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम लिया और उसकी आँखों में सीधा देखा..
शीला: "कविता, मेरी आँखों में देख.. मैं यहाँ वैशाली की माँ बनकर नहीं बैठी हूँ.. मैं तेरी वही पुरानी शीला भाभी हूँ.. वैशाली मेरी बेटी है, और पिंटू ने उसे एक नई ज़िंदगी दी है, वो सब अपनी जगह है.. लेकिन आज मैं तेरी बात कर रही हूँ.. शराब का ये गिलास तेरे हाथ में है, और मैं जानती हूँ ये घूंट तू पीयूष की बेरुखी को भुलाने के लिए नहीं, किसी और की याद को दबाने के लिए पी रही है.. मुझे सच बता... क्या आज भी तेरे दिल में पिंटू के लिए वही जज़्बात हैं?"
कविता ने नज़रें चुराने की बहुत कोशिश की, लेकिन शीला के स्पर्श, उस पुराने अपनेपन और शराब के नशे ने उसके अंदर सालों से बनाए गए सब्र के बाँध में दरार डाल दी.. कविता की आँखें अचानक भर आईं.. उसके होंठ कांपने लगे..
रुंधे हुए गले से कविता बोली "आप क्यों पूछ रही हैं भाभी? क्यों कुरेद रही हैं उन ज़ख्मों को जिन्हें मैं रोज़ अपने इन महँगे कपड़ों और झूठी मुस्कान के नीचे छुपाती हूँ? आप सच जानना चाहती हैं? तो सुनिए..."
कविता ने अपना गिलास टेबल पर ज़ोर से रखा.. उसके चेहरे पर अब एक अजीब सी बेबसी, गुस्सा और दीवानगी एक साथ झलक रही थी..
कविता: "हाँ भाभी! हाँ, मैं आज भी उसी तरह तड़पती हूँ उसके लिए! बल्कि अब तो ये तड़प और भी जानलेवा हो गई है.. पीयूष से मेरी दूरियां अब खाई बन चुकी हैं.. हमारे बीच पति-पत्नी जैसा कुछ नहीं बचा.. और दूसरी तरफ... दूसरी तरफ जब मैं पिंटू को पीयूष के ऑफिस की पार्टियों में देखती हूँ... जब उसे वैशाली के साथ मुस्कुराते हुए देखती हूँ, तो मेरे सीने में आग लग जाती है भाभी.. मैं पागल हो जाती हूँ ये सोचकर कि वो शख्स, जिसकी बाहों में मैंने जन्नत महसूस की थी, जिसके लिए मैंने दुनिया से बगावत करने की सोची थी... वो मेरे सामने है, पर मेरा नहीं है!"
कविता की आवाज़ अब सिसकियों में बदल गई थी.. उसने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों में छुपा लिया.. शीला चुपचाप उसकी पीठ सहलाती रहीं..
रोते हुए, टूटती हुई आवाज़ में कविता ने कहा "आपको पता है भाभी, जब रात को इस बड़े से बेडरूम में मैं अकेली होती हूँ, तो ये दीवारें मुझे खाने दौड़ती हैं.. मैं फोन उठाती हूँ, उसका नंबर डायल करने ही वाली होती हूँ... फिर मुझे याद आता है कि वो अब मेरी सबसे अच्छी दोस्त, मेरी भाभी की बेटी का पति है.. मैं अपने ही होंठ काट लेती हूँ ताकि मेरी चीख बाहर न निकले.. मैं उसे भूलना चाहती हूँ, पर जितनी बार वो काम के सिलसिले में पीयूष के साथ इस घर में आता है, मेरी सालों की तपस्या एक पल में टूट जाती है.. मैं आज भी सिर्फ और सिर्फ पिंटू से प्यार करती हूँ... मैं उसके बिना घुट-घुट कर मर रही हूँ भाभी.."
कविता पूरी तरह से टूट चुकी थी.. उसने अपना सिर शीला के कंधे पर रख दिया और किसी छोटी बच्ची की तरह फूट-फूट कर रोने लगी.. शीला ने उसे अपने गले से लगा लिया, लेकिन उसके चेहरे पर एक गहरी सोच और कशमकश तैर रही थी..
कमरे में अब सिर्फ कविता की सिसकियों की आवाज़ थी, जो उस विशाल और शांत घर की दीवारों से टकराकर और भी गहरी लग रही थी.. एसी की ठंडी हवा के बावजूद माहौल में एक अजीब सा भारीपन आ गया था.. महँगी व्हिस्की की सोंधी महक और कविता के आंसुओं की नमी आपस में घुल-मिल गई थी..
शीला कुछ पलों तक बिल्कुल खामोश रहीं.. उसके चेहरे की लकीरों पर एक गहरी कशमकश और दर्द उभर आया था.. एक तरफ उसकी अपनी बेटी वैशाली थी.. दूसरी तरफ उसकी बाँहों में वो कविता थी, जिसके इश्क की वो खुद गवाह रही थीं, जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से पिंटू से मिलाया था..
शीला ने बहुत ही कोमलता से कविता के उलझे हुए बालों को सहलाया और उसे तब तक रोने दिया जब तक कि उसके सीने का गुबार आँसुओं के रास्ते थोड़ा कम नहीं हो गया.. फिर, उन्होंने एक गहरी साँस ली और कविता का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामकर ऊपर उठाया.. कविता की आँखें लाल हो चुकी थीं और काजल गालों पर फैल गया था..
बेहद शांत, ठहरी हुई और भारी आवाज़ में शीला ने कहा "रो ले कविता... आज जी भर के रो ले.. इन आँसुओं को इस महँगे मार्बल पर गिर जाने दे.. तूने बहुत सालों तक इस दर्द को अपने सीने में दबा कर रखा है.."
शीला ने टेबल से नैपकिन उठाया और बहुत ही प्यार से कविता के आँसू पोंछे.. उनकी आँखों में कोई शिकायत या तिरस्कार नहीं था, बल्कि दुनिया की कड़वी सच्चाई को समझ लेने वाली एक गहरी उदासी थी..
शीला: "तू मुझे भाभी कहती है न? तो आज एक बात बहुत ध्यान से सुन.. मैं दुनिया की उन आम औरतों में से नहीं हूँ जो तुझे ये नसीहत दूंगी कि अब तू शादीशुदा है, तुझे अपने पति पर ध्यान देना चाहिए या पिंटू अब मेरी बेटी का पति है, तुझे ये सब सोचना पाप है.. मैं जानती हूँ कविता, कि दिल के मामले किसी कागज़ के सर्टिफिकेट या समाज के बनाए दायरों के मोहताज नहीं होते.. जिस इंसान से रूह जुड़ जाए, उसे दिमाग से खुरच कर नहीं निकाला जा सकता.."
कविता सुबकते हुए शीला की आँखों में देख रही थी.. उसे उम्मीद नहीं थी कि वैशाली की माँ होने के बावजूद शीला उसे इस तरह से समझेंगी..
शीला ने अपना गिलास उठाया, उसे हल्का सा घुमाया और बिना पिए वापस रख दिया.. उनकी नज़रें अब कमरे के एक खाली कोने में टिकी थीं, जैसे वो बीते हुए वक्त को देख रही हों..
शीला: "इश्क पर किसी का ज़ोर नहीं होता कविता.. मैं तुझे गलत नहीं मानती कि तू आज भी पिंटू से प्यार करती है.. लेकिन... लेकिन किस्मत ने हम सबके साथ कैसा क्रूर मज़ाक किया है, ये देख.. जिस वैशाली को संजय ने हर दिन तिल-तिल कर मारा था, उस वैशाली को पिंटू ने समेटा है.. और दूसरी तरफ... पीयूष, जो शायद तुझे वो प्यार नहीं दे पा रहा जिसकी तू हक़दार है, लेकिन उसी पीयूष ने वैशाली और पिंटू को अपने ऑफिस में काम देकर उन्हें पैरों पर खड़ा किया है.."
शीला की आवाज़ अब थोड़ी भर्रा गई थी.. उन्होंने वापस कविता की ओर देखा, इस बार उनकी आँखों में एक अजीब सा भाव था..
शीला: "तू रोज़ एक आग के पास बैठती है कविता, और सोचती है कि तू जलेगी नहीं? पिंटू को रोज़ अपने सामने देखकर जो तू घुट रही है, ये घुटन एक दिन तुझे, पीयूष को, वैशाली को और पिंटू को... सबको भस्म कर देगी.. तू मेरी बच्ची जैसी है, और वैशाली मेरी कोख से जन्मी है.. मैं दोनों में से किसी का घर उजड़ते हुए नहीं देख सकती.."
कविता ने अपना सिर झुका लिया और अपने हाथों को ज़ोर से भींच लिया..
कांपती हुई आवाज़ में कविता ने कहा "तो मैं क्या करूँ भाभी? आप ही बताइए मैं क्या करूँ? मैं ज़हर खा लूँ? मैं कैसे निकाल दूँ उसे अपने दिल से जब हर रोज़ उसकी परछाई मेरे घर के दरवाज़े तक आती है? मैं कोशिश करती हूँ पीयूष के करीब जाने की, पर वो अपने लैपटॉप और मीटिंग्स से सिर ही नहीं उठाता.. मैं इस अकेलेपन से हार गई हूँ भाभी.."
शीला ने कविता के हाथ को कसकर पकड़ लिया.. उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी दृढ़ता थी..
शीला: "तुझे हारना नहीं है, और न ही इस अकेलेपन के ज़हर को पीना है.. अगर पीयूष तुझे वो जगह नहीं दे रहा, तो तुझे अपना हक़ छीनना होगा.. और रही बात पिंटू की... तो कविता, कुछ प्यार मुकम्मल होने के लिए नहीं बने होते.. उन्हें बस एक खूबसूरत याद बनाकर दिल के किसी बंद संदूक में उम्र भर के लिए कैद करना पड़ता है.. पिंटू अब एक बीता हुआ कल है, और वैशाली का आज.. तुझे अपने कल से लड़कर अपने आज को सुधारना होगा, वरना ये आलीशान घर तेरे लिए एक बहुत खूबसूरत कब्र बन जाएगा.."
फिर से वही खामोशी छा गई.. बाहर दूर कहीं बादलों के गरजने की हल्की सी आवाज़ आई, जैसे मौसम भी इस भारी बातचीत के साथ करवट ले रहा हो.. कविता शून्य में घूर रही थी, शीला के कहे हुए एक-एक शब्द उसके जेहन में हथौड़े की तरह बज रहे थे..
कमरे में अब सिर्फ एसी की हल्की सी भिनभिनाहट और कविता की थकी हुई सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी.. बाहर मौसम ने भी जैसे इस उदासी की चादर ओढ़ ली थी; काँच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर बारिश की बूँदें फिसल रही थीं, जो कमरे के अंदर की सुनहरी रौशनी में मोतियों जैसी चमक रही थीं.. कविता ने अपना सिर शीला की गोद में रख दिया था और आँखें मूँद ली थीं..
शीला बहुत ही नर्मी से कविता के बाल सहला रही थीं, लेकिन बाहर से जितनी शांत वो दिख रही थीं, उनके दिमाग के भीतर ख्यालों का एक भयानक तूफ़ान आकार ले रहा था.. उनकी तेज़ और पारखी नज़रें कमरे की हर एक कीमती चीज़ का जायज़ा ले रही थीं, दीवारों पर टंगी लाखों की पेंटिंग्स, पैरों के नीचे बिछा वो बेशकीमती पर्शियन कालीन, और वो शानदार इटालियन मार्बल जिस पर शराब की कुछ बूँदें गिरकर चमक रही थीं..
अचानक, शीला के दिमाग में एक ऐसी सोच ने जन्म लिया जो किसी भी आम औरत के होश उड़ाने के लिए काफी थी.. लेकिन शीला आम नहीं थीं.. समाज के बनाए खोखले उसूल और नैतिकता की बेड़ियाँ उनके आज़ाद ख्यालों को कभी बाँध नहीं पाई थीं..
शीला की नज़रें कविता के आँसुओं से भरे चेहरे से हटीं और शून्य में टिक गईं.. उसका दिमाग शतरंज के एक बहुत ही खतरनाक और रोमांचक खेल की बिसात बिछाने लगा था..
शीला मन ही मन सोच रही थी 'कितना अजीब है न इंसानी रिश्तों का ये ताना-बाना...' शीला ने गहरी साँस लेते हुए सोचा.. 'इस आलीशान घर में सब कुछ है, बस वो नहीं है जिसकी इसे ज़रूरत है.. और दूसरी तरफ मेरी वैशाली है...'
वैशाली का खयाल आते ही शीला की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई.. पिंटू ने वैशाली को संजय नाम के हैवान से ज़रूर बचाया था, लेकिन शीला एक माँ होने के साथ-साथ एक औरत भी थीं.. वो जानती थीं कि अपनी बेटी की ज़िंदगी का सबसे कड़वा सच क्या है.. वैशाली एक बेहद खूबसूरत, जवान और अरमानों से भरी औरत है, जिसकी रगों में वासना दौड़ती है.. लेकिन पिंटू? पिंटू एक अच्छा इंसान तो है, पर बिस्तर पर वो वैशाली की उस आग को बुझाने में पूरी तरह नाकाम है.. उसकी नामर्दी के कारण वैशाली की रातें एक अलग ही तरह की तड़प और घुटन में कट रही हैं.. एक औरत के लिए शारीरिक संतुष्टि के बिना एक नीरस शादी में बंधे रहना किसी सज़ा से कम नहीं होता..!!
'और ये पीयूष?' शीला की नज़र पास ही रखी पीयूष और कविता की एक बड़ी सी फ्रेम की हुई तस्वीर पर गई.. 'मैं पीयूष को जानती हूँ.. वो कोई मशीन नहीं है जो सिर्फ पैसा छापना जानता हो.. वो तो एक बेहद रोमैंटिक, जुनूनी और जज़्बाती मर्द है.. अगर आज वो कविता से दूर भाग रहा है, खुद को बिज़नेस के बहाने ऑफिस में बंद रख रहा है, तो इसका मतलब ये नहीं कि उसके अंदर का मर्द मर गया है.. इसका सीधा सा मतलब ये है कि कविता अब उसके अंदर वो आग, वो चाहत पैदा नहीं कर पाती.. पीयूष का दिल भर चुका है, वो बस इस रिश्ते को ढो रहा है..'
शीला के होंठों के कोनों पर एक बहुत ही बारीक, लगभग न दिखने वाली मुस्कान तैर गई.. उसका दिमाग अब एक परफेक्ट 'कैलकुलेशन' कर रहा था..
'क्या हो अगर इस बिसात के मोहरे बदल दिए जाएँ?' शीला के रोंगटे इस खयाल मात्र से खड़े हो गए..
'चार लोग... और चारों अपनी-अपनी जगह पर घुट रहे हैं.. प्यास किसी और चीज़ की है, और सामने जो कुआँ है, उसका पानी उन्हें चाहिए नहीं.. वैशाली को अपनी दहकती हुई जवानी के लिए पीयूष जैसा एक संपूर्ण और जुनूनी मर्द चाहिए, जो उसे भरसक चोदकर एक औरत होने का पूरा अहसास करा सके.. और पीयूष को अपने नीरस हो चुके जीवन में वैशाली जैसी एक बेबाक और हसीन आग चाहिए, जो उसके अंदर के सोए हुए आशिक को फिर से जगा दे..
और ये पगली कविता? इसे इस महलों की कोई परवाह नहीं है.. इसे तो बस अपने पिंटू का प्यार चाहिए, उसकी बाहें चाहिए.. और मुझे यकीन है कि पिंटू के दिल के किसी कोने में आज भी कविता ही बसती है.. अगर ये दोनों पुरानी जोड़ियाँ वापस मिल जाएँ, तो क्या बुराई है?'
शीला ने एक बार फिर उस विशाल, राजमहल जैसे कमरे को देखा.. इस बार उनकी आँखों में एक गहरी लालसा और महत्त्वाकांक्षा थी..
'अगर पीयूष और वैशाली एक हो जाते हैं... तो मेरी वैशाली...' शीला का दिल ज़ोर से धड़कने लगा.. 'मेरी बच्ची सिर्फ एक बिस्तर की रानी नहीं बनेगी, वो इस पूरे साम्राज्य की मल्लिका बन सकती है..!! सुबोधकांत का खड़ा किया हुआ ये करोड़ों का अंपायर, ये गाड़ियाँ, ये नौकर-चाकर... वैशाली एक महारानी की तरह राज करेगी.. और उसे वो शारीरिक सुख भी मिलेगा जिसके लिए वो आज अंदर ही अंदर जल रही है..'
एक पल के लिए शीला के दिमाग में समाज का खयाल आया.. 'तमाशा बन जाएगा.. लोग थू-थू करेंगे..'
लेकिन अगले ही पल शीला ने इस खयाल को किसी गंदे कीड़े की तरह अपने दिमाग से झटक दिया..
'माँ चूदाने जाए ये दोगला समाज!' शीला ने मन में एक ठंडी, तिरस्कार भरी हँसी हँसी.. 'जब वैशाली उस हैवान संजय के हाथों रोज़ पिटती थी, तब कौन सा समाज उसे बचाने आया था? ये दुनिया सिर्फ झूठे उसूलों का चोला पहनना जानती है.. अगर चार घुटते हुए, मरते हुए लोग अपनी जगह बदल कर एक मुकम्मल, संतुष्ट और खुशहाल ज़िंदगी पा सकते हैं, तो इसमें गलत क्या है? कोई पाप नहीं है इसमें.. ये धोखा नहीं है, ये तो एक परफेक्ट गणित है... ज़िंदगियों को सुलझाने का एक अचूक तरीका..'
शीला ने अपना गिलास उठाया और उसे एक ही घूंट में खाली कर दिया.. उसके दिमाग में अब धुंध छँट चुकी थी और मंज़िल बिल्कुल साफ थी.. कविता अभी भी उसकी गोद में सिर रखे सुबक रही थी, इस बात से बिल्कुल बेखबर कि जिस औरत के कंधे पर वो रो रही है, वो उसी के घर, उसी के पति और उसी के पुराने प्रेमी को लेकर एक ऐसी चाल चलने वाली है, जो इन चारों की ज़िंदगियों को हमेशा के लिए पलट कर रख देगी..
शीला ने बहुत ही प्यार से कविता के माथे को चूमा.. उसके चेहरे पर अब एक अजीब सा आत्मविश्वास था.. एक ऐसा मास्टरमाइंड जिसका प्लान अब एक्शन में आने के लिए पूरी तरह तैयार था..
बहुत ही जबरदस्त शानदार लाजवाब और अद्भुत रमणिय पर खतरनाक अपडेट हैं भाई मजा आ गयापिछले अपडेट में आपने पढ़ा की..
शीला के घर पर मदन, रूखी और चम्पा के साथ संबंध बना रहा होता है। वहीं दूसरी ओर, बेंगलोर से मौसम अपनी सहेली फाल्गुनी से मिलने आती है। फाल्गुनी अपने घर पर मौसम का स्वागत करती है, और दोनों शराब पीकर पुरानी यादें ताजा करती हैं। धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होती हैं और लेस्बियन संबंध बनाती हैं, जिसमें वे एक-दूसरे को चरम सुख प्रदान करती हैं। यह दृश्य टीवी पर चल रही अश्लील फिल्म के बीच और अधिक उत्तेजक हो जाता है। धमाकेदार ऑर्गेज़्म के साथ दोनों तृप्त होकर शांत हो जाती है..
अब आगे..
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कविता के आलीशान घर का द्रश्य..
विशाल ड्रॉइंग-रूम के महंगे सोफ़े पर शीला पैर पर पैर चढ़ाए बैठी थी..
कमरे की छत से लटकते हुए विशाल क्रिस्टल के झूमर की सुनहरी रौशनी उस आलीशान ड्रॉइंग रूम में एक नरम सा उजाला बिखेर रही थी.. इटालियन मार्बल के फर्श पर शीशे की मेज़ और मखमली काउच सजे थे.. यह कविता का घर था.. एक ऐसा महल जो उसके पिता सुबोधकांत के गुज़र जाने के बाद पीयूष को मिली विरासत और उसकी दिन-रात की मेहनत का नतीजा था..
शीला:"नज़र न लगे तुम्हारे इस आशियाने को! कितने टाइम बाद मिल रहे हैं हम, कविता.. सच कहूँ तो तू बिल्कुल बदल गई है, एकदम इस महल की महारानी लग रही है.."
कविता के होठों पर एक बहुत ही सधी हुई, शिष्टाचार वाली मुस्कान तैर गई.. उसने पास खड़े नौकर को इशारा किया, जिसने बेहद नज़ाकत से दोनों के सामने क्रिस्टल के गिलासों में व्हिस्की उड़ेल दी..
गिलास शीला की तरफ बढ़ाते हुए कविता ने कहा "पर आप बिल्कुल नहीं बदली भाभी! इतने वक्त बाद आपको देखकर सच में ऐसा लग रहा है जैसे कोई अपना इतने बड़े और खाली घर में आ गया हो.. अच्छा हुआ आप आई.."
व्हिस्की का एक छोटा घूंट लेते हुए शीला ने कहा "अरे, बस वक्त ही नहीं मिला.. वैशाली की ज़िंदगी में जो कुछ भी हुआ... संजय से उसका वो दर्दनाक तलाक, फिर पिंटू के साथ उसकी नई शुरुआत... इन सब में उलझ कर रह गई थी.. पर सच बताऊँ, पीयूष ने सुबोधकांत के जाने के बाद जिस तरह से बिज़नेस को बड़े अच्छे से संभाला और इतना बड़ा बना दिया, काबिले-तारीफ है.."
कविता ने अपना गिलास उठाया.. उसकी उंगलियाँ गिलास के ठंडे काँच को सहला रही थीं.. उसने एक हल्का सा घूंट लिया, लेकिन उसकी मुस्कान अब आँखों तक नहीं पहुँच रही थी..
कविता: "हाँ भाभी... पापा के अचानक चले जाने से सब बिखर गया था.. लेकिन पीयूष ने दिन-रात एक कर दिया.. ये घर, ये गाड़ियाँ, ये रुतबा... सब उसकी मेहनत का नतीजा है.."
कमरे में एक पल के लिए हल्की सी खामोशी छा गई, जिसे सिर्फ बैकग्राउंड में बज रहे बेहद धीमे वाद्य संगीत ने भरा.. शीला की पारखी नज़रें कविता के चेहरे को पढ़ रही थीं.. इतने महँगे लिबास और सजे-संवरे रूप के पीछे एक अजीब सी थकान और उदासी छुपी थी.. शीला ने अपना गिलास टेबल पर रखा और थोड़ी गंभीर हो गईं..
शीला: "घर तो बहुत खूबसूरत बना लिया है पीयूष ने.. लेकिन सच बता कविता... क्या तू खुश है यहाँ? पीयूष ने बिज़नेस तो बहुत बड़ा कर लिया, लेकिन मुझे लगता है इस आपाधापी में वो तुझे कहीं पीछे छोड़ गया है.."
शराब की गर्माहट धीरे-धीरे कविता की नसों में उतर रही थी, और उसके साथ ही वो औपचारिकता का पर्दा भी पिघलने लगा था जो उसने ओढ़ रखा था..
हल्की सी आह भरते हुए और अपनी नज़रें झुका कर कविता ने जवाब दिया "खुशी क्या होती है भाभी, अब तो मुझे याद भी नहीं.. पीयूष के पास फुर्सत ही कहाँ है? सुबह वो उठता हैं तो फोन पर बात करते हुए, रात को लौटता है तो थका हारा.. कई बार हफ्तों गुज़र जाते हैं और हम ढंग से बात भी नहीं कर पाते.. कभी-कभी तो लगता है कि मैं इस आलीशान घर में महज़ एक कीमती शोपीस बनकर रह गई हूँ, जिसकी देखभाल तो होती है, पर जिससे कोई प्यार नहीं करता.."
शीला अपनी जगह से उठीं और आकर कविता के पास सोफे पर बैठ गईं.. उसने अपना हाथ कविता के हाथ पर रखा.. शीला हमेशा से ही बहुत खुले विचारों वाली रही थीं, दुनियादारी के झूठे पर्दों से उसे कोई खास वास्ता नहीं था..
आवाज़ में एक राज़दार वाली नर्मी लाते हुए शीला ने कहा "मैं तुझे बरसों से जानती हूँ कविता.. वो भी एक वक्त था जब मेरी ही छत के नीचे, मेरे ही घर के उस छोटे से कमरे में तेरे और पिंटू के कहकहे गूँजते थे.. याद है न? तेरी शादी पीयूष से हो जाने के बाद भी मैंने तुम दोनों को कितनी बार मिलवाया था..!!"
पिंटू का नाम सुनते ही कविता के हाथ में पकड़ा गिलास हल्का सा कांप गया.. उसकी आँखों में एक पल के लिए घबराहट और एक पुरानी टीस तैर गई.. उसने जल्दी से अपना हाथ शीला की पकड़ से छुड़ाया और व्हिस्की का एक बड़ा घूंट गले के नीचे उतार लिया..
आवाज़ में हल्की सी झिझक और घबराहट के साथ कविता ने कहा "भाभी... प्लीज़... पुरानी बातें अब क्यों निकाल रही हैं? अब तो बहुत कुछ बदल गया है.. वैशाली... अब पिंटू की पत्नी है.. और सबसे बड़ी बात, वैशाली और पिंटू दोनों अब पीयूष के ही ऑफिस में काम करते हैं.. रोज़मर्रा का आमना-सामना है... मैं... मैं उस बारे में अब कोई बात नहीं करना चाहती.."
शीला ने हार नहीं मानी.. उस ने कविता के चेहरे को अपने दोनों हाथों में थाम लिया और उसकी आँखों में सीधा देखा..
शीला: "कविता, मेरी आँखों में देख.. मैं यहाँ वैशाली की माँ बनकर नहीं बैठी हूँ.. मैं तेरी वही पुरानी शीला भाभी हूँ.. वैशाली मेरी बेटी है, और पिंटू ने उसे एक नई ज़िंदगी दी है, वो सब अपनी जगह है.. लेकिन आज मैं तेरी बात कर रही हूँ.. शराब का ये गिलास तेरे हाथ में है, और मैं जानती हूँ ये घूंट तू पीयूष की बेरुखी को भुलाने के लिए नहीं, किसी और की याद को दबाने के लिए पी रही है.. मुझे सच बता... क्या आज भी तेरे दिल में पिंटू के लिए वही जज़्बात हैं?"
कविता ने नज़रें चुराने की बहुत कोशिश की, लेकिन शीला के स्पर्श, उस पुराने अपनेपन और शराब के नशे ने उसके अंदर सालों से बनाए गए सब्र के बाँध में दरार डाल दी.. कविता की आँखें अचानक भर आईं.. उसके होंठ कांपने लगे..
रुंधे हुए गले से कविता बोली "आप क्यों पूछ रही हैं भाभी? क्यों कुरेद रही हैं उन ज़ख्मों को जिन्हें मैं रोज़ अपने इन महँगे कपड़ों और झूठी मुस्कान के नीचे छुपाती हूँ? आप सच जानना चाहती हैं? तो सुनिए..."
कविता ने अपना गिलास टेबल पर ज़ोर से रखा.. उसके चेहरे पर अब एक अजीब सी बेबसी, गुस्सा और दीवानगी एक साथ झलक रही थी..
कविता: "हाँ भाभी! हाँ, मैं आज भी उसी तरह तड़पती हूँ उसके लिए! बल्कि अब तो ये तड़प और भी जानलेवा हो गई है.. पीयूष से मेरी दूरियां अब खाई बन चुकी हैं.. हमारे बीच पति-पत्नी जैसा कुछ नहीं बचा.. और दूसरी तरफ... दूसरी तरफ जब मैं पिंटू को पीयूष के ऑफिस की पार्टियों में देखती हूँ... जब उसे वैशाली के साथ मुस्कुराते हुए देखती हूँ, तो मेरे सीने में आग लग जाती है भाभी.. मैं पागल हो जाती हूँ ये सोचकर कि वो शख्स, जिसकी बाहों में मैंने जन्नत महसूस की थी, जिसके लिए मैंने दुनिया से बगावत करने की सोची थी... वो मेरे सामने है, पर मेरा नहीं है!"
कविता की आवाज़ अब सिसकियों में बदल गई थी.. उसने अपना चेहरा अपने दोनों हाथों में छुपा लिया.. शीला चुपचाप उसकी पीठ सहलाती रहीं..
रोते हुए, टूटती हुई आवाज़ में कविता ने कहा "आपको पता है भाभी, जब रात को इस बड़े से बेडरूम में मैं अकेली होती हूँ, तो ये दीवारें मुझे खाने दौड़ती हैं.. मैं फोन उठाती हूँ, उसका नंबर डायल करने ही वाली होती हूँ... फिर मुझे याद आता है कि वो अब मेरी सबसे अच्छी दोस्त, मेरी भाभी की बेटी का पति है.. मैं अपने ही होंठ काट लेती हूँ ताकि मेरी चीख बाहर न निकले.. मैं उसे भूलना चाहती हूँ, पर जितनी बार वो काम के सिलसिले में पीयूष के साथ इस घर में आता है, मेरी सालों की तपस्या एक पल में टूट जाती है.. मैं आज भी सिर्फ और सिर्फ पिंटू से प्यार करती हूँ... मैं उसके बिना घुट-घुट कर मर रही हूँ भाभी.."
कविता पूरी तरह से टूट चुकी थी.. उसने अपना सिर शीला के कंधे पर रख दिया और किसी छोटी बच्ची की तरह फूट-फूट कर रोने लगी.. शीला ने उसे अपने गले से लगा लिया, लेकिन उसके चेहरे पर एक गहरी सोच और कशमकश तैर रही थी..
कमरे में अब सिर्फ कविता की सिसकियों की आवाज़ थी, जो उस विशाल और शांत घर की दीवारों से टकराकर और भी गहरी लग रही थी.. एसी की ठंडी हवा के बावजूद माहौल में एक अजीब सा भारीपन आ गया था.. महँगी व्हिस्की की सोंधी महक और कविता के आंसुओं की नमी आपस में घुल-मिल गई थी..
शीला कुछ पलों तक बिल्कुल खामोश रहीं.. उसके चेहरे की लकीरों पर एक गहरी कशमकश और दर्द उभर आया था.. एक तरफ उसकी अपनी बेटी वैशाली थी.. दूसरी तरफ उसकी बाँहों में वो कविता थी, जिसके इश्क की वो खुद गवाह रही थीं, जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से पिंटू से मिलाया था..
शीला ने बहुत ही कोमलता से कविता के उलझे हुए बालों को सहलाया और उसे तब तक रोने दिया जब तक कि उसके सीने का गुबार आँसुओं के रास्ते थोड़ा कम नहीं हो गया.. फिर, उन्होंने एक गहरी साँस ली और कविता का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामकर ऊपर उठाया.. कविता की आँखें लाल हो चुकी थीं और काजल गालों पर फैल गया था..
बेहद शांत, ठहरी हुई और भारी आवाज़ में शीला ने कहा "रो ले कविता... आज जी भर के रो ले.. इन आँसुओं को इस महँगे मार्बल पर गिर जाने दे.. तूने बहुत सालों तक इस दर्द को अपने सीने में दबा कर रखा है.."
शीला ने टेबल से नैपकिन उठाया और बहुत ही प्यार से कविता के आँसू पोंछे.. उनकी आँखों में कोई शिकायत या तिरस्कार नहीं था, बल्कि दुनिया की कड़वी सच्चाई को समझ लेने वाली एक गहरी उदासी थी..
शीला: "तू मुझे भाभी कहती है न? तो आज एक बात बहुत ध्यान से सुन.. मैं दुनिया की उन आम औरतों में से नहीं हूँ जो तुझे ये नसीहत दूंगी कि अब तू शादीशुदा है, तुझे अपने पति पर ध्यान देना चाहिए या पिंटू अब मेरी बेटी का पति है, तुझे ये सब सोचना पाप है.. मैं जानती हूँ कविता, कि दिल के मामले किसी कागज़ के सर्टिफिकेट या समाज के बनाए दायरों के मोहताज नहीं होते.. जिस इंसान से रूह जुड़ जाए, उसे दिमाग से खुरच कर नहीं निकाला जा सकता.."
कविता सुबकते हुए शीला की आँखों में देख रही थी.. उसे उम्मीद नहीं थी कि वैशाली की माँ होने के बावजूद शीला उसे इस तरह से समझेंगी..
शीला ने अपना गिलास उठाया, उसे हल्का सा घुमाया और बिना पिए वापस रख दिया.. उनकी नज़रें अब कमरे के एक खाली कोने में टिकी थीं, जैसे वो बीते हुए वक्त को देख रही हों..
शीला: "इश्क पर किसी का ज़ोर नहीं होता कविता.. मैं तुझे गलत नहीं मानती कि तू आज भी पिंटू से प्यार करती है.. लेकिन... लेकिन किस्मत ने हम सबके साथ कैसा क्रूर मज़ाक किया है, ये देख.. जिस वैशाली को संजय ने हर दिन तिल-तिल कर मारा था, उस वैशाली को पिंटू ने समेटा है.. और दूसरी तरफ... पीयूष, जो शायद तुझे वो प्यार नहीं दे पा रहा जिसकी तू हक़दार है, लेकिन उसी पीयूष ने वैशाली और पिंटू को अपने ऑफिस में काम देकर उन्हें पैरों पर खड़ा किया है.."
शीला की आवाज़ अब थोड़ी भर्रा गई थी.. उन्होंने वापस कविता की ओर देखा, इस बार उनकी आँखों में एक अजीब सा भाव था..
शीला: "तू रोज़ एक आग के पास बैठती है कविता, और सोचती है कि तू जलेगी नहीं? पिंटू को रोज़ अपने सामने देखकर जो तू घुट रही है, ये घुटन एक दिन तुझे, पीयूष को, वैशाली को और पिंटू को... सबको भस्म कर देगी.. तू मेरी बच्ची जैसी है, और वैशाली मेरी कोख से जन्मी है.. मैं दोनों में से किसी का घर उजड़ते हुए नहीं देख सकती.."
कविता ने अपना सिर झुका लिया और अपने हाथों को ज़ोर से भींच लिया..
कांपती हुई आवाज़ में कविता ने कहा "तो मैं क्या करूँ भाभी? आप ही बताइए मैं क्या करूँ? मैं ज़हर खा लूँ? मैं कैसे निकाल दूँ उसे अपने दिल से जब हर रोज़ उसकी परछाई मेरे घर के दरवाज़े तक आती है? मैं कोशिश करती हूँ पीयूष के करीब जाने की, पर वो अपने लैपटॉप और मीटिंग्स से सिर ही नहीं उठाता.. मैं इस अकेलेपन से हार गई हूँ भाभी.."
शीला ने कविता के हाथ को कसकर पकड़ लिया.. उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी दृढ़ता थी..
शीला: "तुझे हारना नहीं है, और न ही इस अकेलेपन के ज़हर को पीना है.. अगर पीयूष तुझे वो जगह नहीं दे रहा, तो तुझे अपना हक़ छीनना होगा.. और रही बात पिंटू की... तो कविता, कुछ प्यार मुकम्मल होने के लिए नहीं बने होते.. उन्हें बस एक खूबसूरत याद बनाकर दिल के किसी बंद संदूक में उम्र भर के लिए कैद करना पड़ता है.. पिंटू अब एक बीता हुआ कल है, और वैशाली का आज.. तुझे अपने कल से लड़कर अपने आज को सुधारना होगा, वरना ये आलीशान घर तेरे लिए एक बहुत खूबसूरत कब्र बन जाएगा.."
फिर से वही खामोशी छा गई.. बाहर दूर कहीं बादलों के गरजने की हल्की सी आवाज़ आई, जैसे मौसम भी इस भारी बातचीत के साथ करवट ले रहा हो.. कविता शून्य में घूर रही थी, शीला के कहे हुए एक-एक शब्द उसके जेहन में हथौड़े की तरह बज रहे थे..
कमरे में अब सिर्फ एसी की हल्की सी भिनभिनाहट और कविता की थकी हुई सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी.. बाहर मौसम ने भी जैसे इस उदासी की चादर ओढ़ ली थी; काँच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर बारिश की बूँदें फिसल रही थीं, जो कमरे के अंदर की सुनहरी रौशनी में मोतियों जैसी चमक रही थीं.. कविता ने अपना सिर शीला की गोद में रख दिया था और आँखें मूँद ली थीं..
शीला बहुत ही नर्मी से कविता के बाल सहला रही थीं, लेकिन बाहर से जितनी शांत वो दिख रही थीं, उनके दिमाग के भीतर ख्यालों का एक भयानक तूफ़ान आकार ले रहा था.. उनकी तेज़ और पारखी नज़रें कमरे की हर एक कीमती चीज़ का जायज़ा ले रही थीं, दीवारों पर टंगी लाखों की पेंटिंग्स, पैरों के नीचे बिछा वो बेशकीमती पर्शियन कालीन, और वो शानदार इटालियन मार्बल जिस पर शराब की कुछ बूँदें गिरकर चमक रही थीं..
अचानक, शीला के दिमाग में एक ऐसी सोच ने जन्म लिया जो किसी भी आम औरत के होश उड़ाने के लिए काफी थी.. लेकिन शीला आम नहीं थीं.. समाज के बनाए खोखले उसूल और नैतिकता की बेड़ियाँ उनके आज़ाद ख्यालों को कभी बाँध नहीं पाई थीं..
शीला की नज़रें कविता के आँसुओं से भरे चेहरे से हटीं और शून्य में टिक गईं.. उसका दिमाग शतरंज के एक बहुत ही खतरनाक और रोमांचक खेल की बिसात बिछाने लगा था..
शीला मन ही मन सोच रही थी 'कितना अजीब है न इंसानी रिश्तों का ये ताना-बाना...' शीला ने गहरी साँस लेते हुए सोचा.. 'इस आलीशान घर में सब कुछ है, बस वो नहीं है जिसकी इसे ज़रूरत है.. और दूसरी तरफ मेरी वैशाली है...'
वैशाली का खयाल आते ही शीला की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई.. पिंटू ने वैशाली को संजय नाम के हैवान से ज़रूर बचाया था, लेकिन शीला एक माँ होने के साथ-साथ एक औरत भी थीं.. वो जानती थीं कि अपनी बेटी की ज़िंदगी का सबसे कड़वा सच क्या है.. वैशाली एक बेहद खूबसूरत, जवान और अरमानों से भरी औरत है, जिसकी रगों में वासना दौड़ती है.. लेकिन पिंटू? पिंटू एक अच्छा इंसान तो है, पर बिस्तर पर वो वैशाली की उस आग को बुझाने में पूरी तरह नाकाम है.. उसकी नामर्दी के कारण वैशाली की रातें एक अलग ही तरह की तड़प और घुटन में कट रही हैं.. एक औरत के लिए शारीरिक संतुष्टि के बिना एक नीरस शादी में बंधे रहना किसी सज़ा से कम नहीं होता..!!
'और ये पीयूष?' शीला की नज़र पास ही रखी पीयूष और कविता की एक बड़ी सी फ्रेम की हुई तस्वीर पर गई.. 'मैं पीयूष को जानती हूँ.. वो कोई मशीन नहीं है जो सिर्फ पैसा छापना जानता हो.. वो तो एक बेहद रोमैंटिक, जुनूनी और जज़्बाती मर्द है.. अगर आज वो कविता से दूर भाग रहा है, खुद को बिज़नेस के बहाने ऑफिस में बंद रख रहा है, तो इसका मतलब ये नहीं कि उसके अंदर का मर्द मर गया है.. इसका सीधा सा मतलब ये है कि कविता अब उसके अंदर वो आग, वो चाहत पैदा नहीं कर पाती.. पीयूष का दिल भर चुका है, वो बस इस रिश्ते को ढो रहा है..'
शीला के होंठों के कोनों पर एक बहुत ही बारीक, लगभग न दिखने वाली मुस्कान तैर गई.. उसका दिमाग अब एक परफेक्ट 'कैलकुलेशन' कर रहा था..
'क्या हो अगर इस बिसात के मोहरे बदल दिए जाएँ?' शीला के रोंगटे इस खयाल मात्र से खड़े हो गए..
'चार लोग... और चारों अपनी-अपनी जगह पर घुट रहे हैं.. प्यास किसी और चीज़ की है, और सामने जो कुआँ है, उसका पानी उन्हें चाहिए नहीं.. वैशाली को अपनी दहकती हुई जवानी के लिए पीयूष जैसा एक संपूर्ण और जुनूनी मर्द चाहिए, जो उसे भरसक चोदकर एक औरत होने का पूरा अहसास करा सके.. और पीयूष को अपने नीरस हो चुके जीवन में वैशाली जैसी एक बेबाक और हसीन आग चाहिए, जो उसके अंदर के सोए हुए आशिक को फिर से जगा दे..
और ये पगली कविता? इसे इस महलों की कोई परवाह नहीं है.. इसे तो बस अपने पिंटू का प्यार चाहिए, उसकी बाहें चाहिए.. और मुझे यकीन है कि पिंटू के दिल के किसी कोने में आज भी कविता ही बसती है.. अगर ये दोनों पुरानी जोड़ियाँ वापस मिल जाएँ, तो क्या बुराई है?'
शीला ने एक बार फिर उस विशाल, राजमहल जैसे कमरे को देखा.. इस बार उनकी आँखों में एक गहरी लालसा और महत्त्वाकांक्षा थी..
'अगर पीयूष और वैशाली एक हो जाते हैं... तो मेरी वैशाली...' शीला का दिल ज़ोर से धड़कने लगा.. 'मेरी बच्ची सिर्फ एक बिस्तर की रानी नहीं बनेगी, वो इस पूरे साम्राज्य की मल्लिका बन सकती है..!! सुबोधकांत का खड़ा किया हुआ ये करोड़ों का अंपायर, ये गाड़ियाँ, ये नौकर-चाकर... वैशाली एक महारानी की तरह राज करेगी.. और उसे वो शारीरिक सुख भी मिलेगा जिसके लिए वो आज अंदर ही अंदर जल रही है..'
एक पल के लिए शीला के दिमाग में समाज का खयाल आया.. 'तमाशा बन जाएगा.. लोग थू-थू करेंगे..'
लेकिन अगले ही पल शीला ने इस खयाल को किसी गंदे कीड़े की तरह अपने दिमाग से झटक दिया..
'माँ चूदाने जाए ये दोगला समाज!' शीला ने मन में एक ठंडी, तिरस्कार भरी हँसी हँसी.. 'जब वैशाली उस हैवान संजय के हाथों रोज़ पिटती थी, तब कौन सा समाज उसे बचाने आया था? ये दुनिया सिर्फ झूठे उसूलों का चोला पहनना जानती है.. अगर चार घुटते हुए, मरते हुए लोग अपनी जगह बदल कर एक मुकम्मल, संतुष्ट और खुशहाल ज़िंदगी पा सकते हैं, तो इसमें गलत क्या है? कोई पाप नहीं है इसमें.. ये धोखा नहीं है, ये तो एक परफेक्ट गणित है... ज़िंदगियों को सुलझाने का एक अचूक तरीका..'
शीला ने अपना गिलास उठाया और उसे एक ही घूंट में खाली कर दिया.. उसके दिमाग में अब धुंध छँट चुकी थी और मंज़िल बिल्कुल साफ थी.. कविता अभी भी उसकी गोद में सिर रखे सुबक रही थी, इस बात से बिल्कुल बेखबर कि जिस औरत के कंधे पर वो रो रही है, वो उसी के घर, उसी के पति और उसी के पुराने प्रेमी को लेकर एक ऐसी चाल चलने वाली है, जो इन चारों की ज़िंदगियों को हमेशा के लिए पलट कर रख देगी..
शीला ने बहुत ही प्यार से कविता के माथे को चूमा.. उसके चेहरे पर अब एक अजीब सा आत्मविश्वास था.. एक ऐसा मास्टरमाइंड जिसका प्लान अब एक्शन में आने के लिए पूरी तरह तैयार था..









