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बहुत ही कामुक गरमागरम और उत्तेजना से भरपूर अपडेट है आखिर सुबोधकांत ने शीला नाम की चिड़िया का शिकार कर लियादूसरी सुबह करीब साढ़े पाँच बजे.. रोज की तरह शीला की आँख खुल गई.. मदन को सोता हुआ छोड़कर वो उतरकर नीचे आई.. नाइट-गाउन में ही वो घर के आँगन में बने झूले पर बैठकर झूलने लगी.. अभी घर में कोई जागा नहीं था.. थोड़ी ही देर में अखबार वाला पेपर फेंक कर गया.. शीला उसे उठाकर पढ़ते हुए झूल रही थी..
अखबार की खबरों में डूबी हुई शीला को पता ही नहीं चला की कब सुबोधकांत उसके सामने आकर कुर्सी लगाकर बैठ गए..
"अरे आप कब आए??" शीला ने चोंक कर पूछा
"अभी अभी.. वैसे मुझे जल्दी उठ जाने की आदत है.. सुबह सुबह आसपास की खूबसूरती देखने का मज़ा ही कुछ ओर होता है.. और आज तो आपको देखकर मेरी सुबह और भी मस्त हो गई" शीला शर्मा गई.. सुबोधकांत उसके साथ खुलेआम फ़्लर्ट कर रहे थे
शीला एकदम से अपने कपड़ों को लेकर जागरूक हो गई.. उसने गाउन के अंदर ब्रा नहीं पहनी थी.. और उसके दोनों स्तन.. बिगड़ी हुई औलादों की तरह.. उसका कहा मान नहीं रहे थे.. और उभरकर मस्त आकार बना रहे थे.. सुबोधकांत उन उभारों को देखते हुए अपने होंठों पर जीभ फेर रहा था..
टी-शर्ट और ट्रेक पेंट पहने सुबोधकांत काफी हेंडसम लग रहे थे.. शीला ने उन्हें कनखियों से देखा.. उनके स्वस्थ शरीर की झलक टी-शर्ट से भलीभाँति नजर आ रही थी.. ऐसे पुरुष के साथ थोड़ा बहोत फ़्लर्ट करने में शीला को कोई दिक्कत नहीं थी
"अच्छा.. !! ऐसा तो क्या नजर आ गया आपको.. जो आपकी सुबह सुधर गई..??" शरारती मुस्कान के साथ शीला ने सुबोधकांत से कहा
"अब क्या कहूँ.. कहाँ से शुरू करू.. कुदरत ने आपको बड़े ही इत्मीनान से बनाया है.. क्या आपको कभी किसी ने कहा है की आप दुनिया की सब से सुंदर महिला हो??" सुबोधकांत ने अपनी गाड़ी चौथे गियर में डालकर दौड़ा दी
ये झूठ है.. जानते हुए भी शीला ने शरमाते हुए अपनी आँखें झुका दी.. ऐसी कौन सी स्त्री होगी जिसे अपनी तारीफ पसंद न हो? चाहे फिर झूठी ही क्यों न हो.. !!
"क्या आप भी.. !!! जो बात आपको रमिला बहन से करनी चाहिए वो आप मुझसे कर रहे है.. !!" शीला ने शरमाते हुए कहा
जवाब देने के बजाए.. सुबोधकांत अपनी कुर्सी से उठे और झूले पर शीला की बगल में बैठ गए.. झूला इतना चौड़ा नहीं था की दो लोगों को साथ समा सकें.. शीला और सुबोधकांत की जांघें एक दूसरे से सट कर रह गई.. शीला का चेहरा शर्म से लाल हो गया.. पर अपनी जांघों पर इस मजबूत पुरुष का स्पर्श उसे बड़ा ही लुभावना लगा.. वो बिना कुछ बोलें बैठी रही
"अजी क्या बताएं आपको.. तारीफ तो उसकी की जाती है जिसे कदर हो.. अब बंदर क्या जाने अदरख का स्वाद.. !! और मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ.. आप के जितनी खूबसूरत महिला मैंने आज तक नहीं देखी.. " कहते ही सुबोधकांत अपना चेहरा शीला के कानों के नजदीक लाए.. जैसे उसे सूंघ रहे हो..
शीला सहम गई.. !! सुबोधकांत की इतनी हिम्मत का वो कैसे जवाब दे, उसे पता नहीं चल रहा था.. वो वहाँ से खड़ी होकर चली जा सकती थी.. पर पता नहीं ऐसा कौन सा आकर्षण था जो उसे वहाँ से उठने ही नहीं दे रहा था..जैसे उसके कूल्हें झूले से चिपक गए थे..
"रमिला बहन भी कितनी सुंदर है.. गोरी गोरी.. " शीला ने वापिस बात को सुबोधकांत की पत्नी पर ला खड़ा किया
"शीला जी.. आप तो जानती हो.. हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती.. और कुछ हीरे ऐसे होते है जिसकी परख, मुझ जैसे जोहरी के अलावा और कोई नहीं कर सकता.. !!" सुबोधकांत अपनी हरकतों से बाज नहीं आया
"देखिए सुबोधकांत जी.. मैं आपकी बहोत इज्जत करती हूँ.. अच्छा यही होगा की हम दोनों हमारी मर्यादा का उल्लंघन न करें.. !!" शीला ने थोड़ी सी नाराजगी के साथ कहा..
ये सुनते ही.. सुबोधकांत झूले से खड़े हो गए.. मस्त अंगड़ाई लेकर वो शीला के सामने ही खड़े रहे..
"अरे आप तो बुरा मान गई.. अब मुझे नहीं पता था की आपको तारीफ पसंद नहीं है.. "
"ऐसी बात नहीं है सुबोधकांत जी.. पर जैसा मैंने कहा.. हम दोनों अपनी मर्यादा में रहे वही बेहतर होगा" शीला ने कहा
"आपको नहीं पसंद तो मैं आगे कुछ नहीं कहूँगा.. लेकिन.. ये मर्यादा की बातें आपके मुंह से अच्छी नहीं लगती, शीला जी.. !!" बेशर्मी से सुबोधकांत ने कहा.. सुनकर शीला चकित हो गई.. ऐसी कौन सी बात इन्हें पता थी जो इतने आत्मविश्वास के साथ बोल रहे थे ये?? अभी कल ही तो पहली बार मिले है.. ऐसा कौन सा राज जानते थे सुबोधकांत.. शीला के बारे में.. !!
"आप क्या कहना चाहते है, मैं समझ नहीं पाई" शीला ने पूछा
"देखिए शीला जी.. अब घुमा फिराकर बात करने की आदत मुझे ही नहीं.. और दूसरों की ज़िंदगी में दखल देने की आदत भी नहीं है.. चाहे वो कोई भी क्यों न हो.. ये तो आपने मर्यादा की बात छेड़ दी तो मैंने सोचा की आप को याद दिला दूँ.. कल आप मेरे दामाद के प्राइवेट पार्ट को दबाकर कौन सी मर्यादा का पालन कर रही थी??" शैतानी मुस्कान के साथ सुबोधकांत ने शीला की ओर देखकर कहा
शीला को चक्कर आने लगे.. कल जब वो लोग ड्रॉइंगरूम में बैठे थे ,तब चारों लड़कियां बगल वाले कमरे में थी.. पीयूष जब उठकर उस कमरे की ओर जा रहा था तब शीला भी किचन में जाने के बहाने उठी थी और बीच रास्ते पीयूष का लंड दबा दिया था.. सुबोधकांत की शातिर नजर ने ये देख लिया था इसका उसे पता भी नहीं था..
शीला ने आँखें झुका ली और दुबक कर झूले पर बैठी रही.. उसके हाथ से अखबार भी छूटकर नीचे गिर गया.. मुसकुराती हुए सुबोधकांत ने अखबार उठाया और शीला के हाथों में थमाते हुए वापिस झूले पर उसके साथ बैठ गया
"अरे पढिए पढिए.. अखबार पढ़ना जरूरी है.. पता तो चले की दुनिया में क्या हो रहा है.. पर उससे भी ज्यादा जरूरी है अपने आसपास क्या हो रहा है उस पर नजर रखना.. !!"
अब शीला के पास बोलने के लिए कुछ बचा नहीं था.. डर के मारे उसकी बोलती बंद हो गई थी.. कल रात वैसे भी संजय और हाफ़िज़ को लेकर काफी टेंशन था.. वो खतम हुआ नहीं की एक नई चिंता जुड़ गई.. वो अखबार को पकड़कर नीचे देखते हुए बैठी रही
"घबराइए मत शीला जी.. मैं ये बात किसी को नहीं बताऊँगा.. जैसा मैंने पहले ही कहा.. मुझे किसी के जीवन में दखल अंदाजी करना पसंद नहीं है" कहते हुए इस बार सुबोधकांत अपना चेहरा शीला के गालों के इतने करीब ले आए की उनकी गरम साँसों को अपने गालों पर महसूस कर रही थी शीला.. उफ्फ़.. मर्दानी गरम सांसें.. शीला की आँखें बंद हो गई..
शीला की ओर से कोई विरोध न दिखा तब सुबोधकांत ने हिम्मत करके शीला के कान को धीरे से चूम लिया.. शीला स्तब्ध हो गई.. पर वो जानती थी की उसकी दुखती नस को दबाकर ये इंसान अपनी मनमानी कर रहा था.. वो सोचने लगी.. अगर मैं इसे हड़का कर भगा दूँ तो क्या होगा?? उसने पीयूष के साथ जो हरकत की थी उसका पता अगर सब को लग गया तो कोहराम मच जाएगा.. मदन और उसके जीवन में भूकंप आ जाएगा.. कविता उससे बात नहीं करेगी कभी.. और अनुमौसी को पता चला मतलब पूरे मोहल्ले को पता चल जाएगा.. पूरी ज़िंदगी वो किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेगी.. गनीमत इसी में थी की वो उनका सहयोग करे और देखें की वो आगे कहाँ तक जाने की हिम्मत करते है
शीला ने शरमाकर अपना चेहरा दूर कर लिया..
"क्या मदमस्त खुशबू है आपकी.. जितना सुंदर तन उतनी ही मादक महक आ रही है.. " सुबोधकांत ने धीरे से अपना हाथ शीला की जांघों पर फेरना शुरू कर दिया.. शीला उसके स्पर्श से ऐसे सिहरने लगी.. न चाहते हुए भी उसका जिस्म उत्तेजित होने लगा.. अजीब सी उत्तेजना होने लगी उसे..
शीला बस अब आँखें बंद कर.. झूले पर सर पीछे टेककर बैठी रही.. और सुबोधकांत उसकी गर्दन पर चूमते हुए उसके होंठों पर कब पहुँच गए पता ही नहीं चला.. उनका एक हाथ शीला के खरबूजे जैसे बड़े स्तनों पर घूमने लगा.. बिना ब्रा के सिर्फ गाउन के अंदर कैद स्तनों की निप्पल.. बड़ी ही आसानी से सुबोधकांत के हाथ में आ गई.. शीला के होंठों को चूमते हुए जैसे ही सुबोधकांत ने निप्पल को पकड़कर दबाया.. शीला की आह्ह निकल गई.. और दोनों जांघों के बीच सुरसुरी होने के साथ गिलेपन का एहसास भी होने लगा..
शीला के बदन में खून तेजी से दौड़ने लगा.. उसका चेहरा सुर्ख लाल हो गया.. सुबोधकांत के चुंबनों से वह इतनी उत्तेजित हो गई की खुद ही अपनी निप्पल को मरोड़ने लगी.. सुबोधकांत ने शीला का गाउन नीचे से उठाना शुरू करते ही शीला संभल गई और अपना गाउन पकड़ कर उसे रोक दिया..
"सुबोधकांत जी.. ये बड़ा ही खतरनाक हो सकता है.. मुझे लगता है की हमें अब इससे आगे नहीं बढ़ना चाहिए.. !!"
"शीला जी.. आगे बढ़ना चाहिए की नहीं ये इम्पॉर्टन्ट नहीं है.. आप ये बताइए.. क्या आप आगे बढ़ना चाहती है?" बड़ा शातिर था ये बंदा.. ऐसे हिम्मत वाले पुरुष शीला को बेहद पसंद थे.. उसने कोई जवाब नहीं दिया.. और पलके झुकाकर बैठी रही..
पर सुबोधकांत को अपना जवाब मिल गया था.. उसने शीला को हाथ पकड़कर उठाया.. और घर के पिछवाड़े में बने गराज तक ले गए.. गराज का दरवाजा खोलकर दोनों अंदर गए और फिर सुबोधकांत ने उसे बंद कर दिया..
दरवाजा बंद होते ही सुबोधकांत ने शीला को दीवार से दबा दिया और उसके स्तनों को दोनों हाथों से मसलने लगे.. शीला बस आह्ह आह्ह करती रह गई.. उन्हों ने शीला के होंठों को चूसते हुए अपना एक हाथ गाउन के ऊपर से ही शीला के गरम भोसड़े पर दबा दिया.. रात को सोते वक्त शीला कभी गाउन के नीचे पेन्टी नहीं पहनती थी.. उसका भोसड़ा सुबोधकांत के हाथों चढ़ गया..
नीचे स्पर्श होते ही शीला के सब्र का बांध टूट गया.. और उसने दोनों हाथों से सुबोधकांत का चेहरा पकड़कर चूम लिया.. सुबोधकांत ने शीला का गाउन एक झटके में ही ऊपर कर दिया और उसकी लसलसित दरार में अपनी उंगली डाल दी..
गरम गरम भोसड़े में उंगली घुसते ही शीला ने अपने सारे हथियार डाल दीये.. उसने दोनों हाथों से सुबोधकांत के कंधों को दबाकर उन्हे नीचे बैठा दिया और अपनी टांगें खड़े खड़े ही चौड़ी कर दी.. इशारा स्पष्ट था और सुबोधकांत को समझने में देर भी नहीं लगी.. उसने एक ही पल में अपनी जीभ शीला की गुफा के अंदर डालकर चाटना शुरू कर दिया..
शीला की योनि विपुल मात्रा में कामरस बहाने लगी और सुबोधकांत बिना किसी घिन के उस रस को चाट रहे थे.. शीला दोनों हाथों से अपनी निप्पलों को खींचकर मरोड़ रही थी.. अब उसका जिस्म लिंग प्रवेश चाहता था.. उसने आजूबाजू देखा.. इतना कचरा पड़ा हुआ था की लेटना नामुमकिन था..
उसने धीरे से सुबोधकांत का चेहरा अपनी चूत से अलग किया और उन्हे खड़ा कर दिया.. अब वह पलट गई.. अपना गाउन कमर तक उठा लीया और अपने भोसड़े को चुदाई के लिए पेश कर दिया..
सुबोधकांत ने तुरंत ही अपना पेंट नीचे उतारा और अपना डंडा बाहर निकालकर.. मुंह से थोड़ा थूक लेकर सुपाड़े पर मल दिया.. उसका औज़ार अब शीला के किले को फतह करने के लिए तैयार हो गया था..
शीला को झुकाकर उसने अपने सुपाड़े को उसकी दोनों जांघों के बीच घुसेड़ा.. चूत की खुशबू सूंघते हुए लंड ने तुरंत ही छेड़ ढूंढ निकाला.. एक ही धक्के में लंड ऐसा घुस गया जैसे मक्खन के अंदर गरम छुरी घुस गई हो..
शीला सिसकने लगी.. और सुबोधकांत ने हौले हौले धक्के लगाने शुरू कर दीये.. दोनों हाथ आगे ले जाकर वो शीला के मदमस्त खरबूजों को मसल भी रहे थे.. दोनों उत्तेजना की पराकाष्ठा पर थे लेकिन साथ ही साथ वह जानते थे की उनके पास ज्यादा समय नहीं था..
शीला खुद ही हाथ नीचे ले जाकर अपनी क्लिटोरिस को कुरेदने लगी.. वो भी जल्द से जल्द स्खलित होना चाहती थी.. पीछे सुबोधकांत ने अपने धक्के तेज कर दीये.. शीला के विशाल चूतड़ों को अपने दोनों हाथ से पकड़कर वो धनाधन पेल रहे थे..
शीला का बदन अब थरथराने लगा.. अपनी मंजिल नजदीक नजर आते ही उसने अपनी क्लिटोरिस को दबा दिया.. उसका शरीर एकदम तंग हो गया.. और भोसड़े की मांसपेशियों ने सुबोधकांत के लंड को अंदर मजबूती से जकड़ लिया.. दोनों एक साथ झड़ गए.. वीर्य की तीन चार बड़ी पिचकारियों से सुबोधकांत ने शीला के भोसड़े को पावन कर दिया..
थोड़ी देर तक दोनों हांफते रहे.. सांसें नॉर्मल होते ही पहले सुबोधकांत ने दरवाजा खोलकर बाहर देखकर तसल्ली कर ली और फिर इशारे से शीला को बाहर जाने के लिए कहा.. शीला भागकर घर के अंदर चली गई.. अपने कमरे में जाकर देखा तो मदन अभी भी सो रहा था.. उसने चैन की सांस ली और बाथरूम में चली गई.. सुबोधकांत ने जो निशानी उसके भोसड़े में छोड़ रखी थी उसे साफ करने..
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मदन और शीला जब कविता के घर गए तब सब से अनजान थे.. आज जाते हुए सब की अच्छी दोस्ती हो चुकी थी.. सब ऐसे बातें कर रहे थे जैसे एक दूसरे को सालों से जानते हो..
शीला को बाय कहते वक्त सुबोधकांत मुस्कुराये.. पिछले चौबीस घंटों में उन्हों ने माँ और बेटी दोनों को चोद लिया था.. दोनों एक से बढ़कर एक थी.. दोनों के संग की चुदाई, सुबोधकांत को पूरी ज़िंदगी याद रहने वाली थी..
वैशाली, मौसम और फाल्गुनी के साथ कुछ गुसपुस कर रही थी.. मौसम के चेहरे पर शर्म और उदासी दोनों के भाव थे.. अब वो पहले वाली नादान लड़की नहीं रही थी.. काफी तब्दीलियाँ आ चुकी थी.. चेहरे पर गंभीरता के भाव भी थे.. कविता मौसम को गले लगाकर खूब रोई.. सुबोधकांत भी भावुक हो गए.. इंसान कितना भी नीच और हलक्त क्यों न हो.. आखिर एक बाप था.. कविता को खुश देखकर उनके दिल को ठंडक मिल रही थी और वे चाहते थे की मौसम भी ऐसे ही खुश रहे..
सब ने एक दूसरे को अलविदा कहा.. रमिला बहन की आँखों से भी आँसू निकल रहे थे.. कल तक जो घर भरा भरा सा था.. आज वो एकदम खाली हो रहा था.. सब लोग कार में बैठे.. मौसम और फाल्गुनी ने गले मिलकर वैशाली को बाय कहा..
जुदाई.. बड़ा ही पीड़ादायक शब्द है.. हर मिलन में जुदाई समाई होती है..
कार चल पड़ी और साथ कितने संबंध अपनी मंजिल पर पहुंचे बिना ही अधूरे रह गए.. ?? सुबोधकांत और रमिला बहन घर के अंदर आए.. मौसम बड़ी देर तक रास्ते को देखती रही.. जा रही कार को अंत तक ऐसे देखती रही जैसे वो अभी वापस आने वाली हो.. उसके अलावा कोई नहीं जानता था की उस कार के साथ ओर क्या क्या चला गया था.. !!
जीजू.. !! जिनके साथ उसने जीवन का प्रथम प्रेम-मिलन किया था.. जिन्होंने उसे जवानी का लुत्फ लेना सिखाया था.. काम इच्छा क्या होती है.. पुरुष और स्त्री का उसमें क्या भाग होता है.. पुरुष का प्रथम स्पर्श.. जीजू मौसम को छोड़कर जा चुके थे.. साथ ही कविता दीदी भी चली गई थी.. शीला भाभी और मदन भैया भी.. वैशाली जैसी सहेली भी जा चुकी थी.. वैशाली तो अब कब मिलेगी, क्या पता.. ?? मुझे भी एक दिन वैशाली की तरह सब को छोड़कर दूर जाना होगा.. मौसम का दिल बेचैन हो गया.. इस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन करने का मन कर रहा था.. पर नियति को भला कौन बदल सकता है.. !! और उसकी नियति भी यही थी की उसे बाप का घर छोड़ना ही था..
"कब तक धूप में खड़ी रहेगी बेटा? अंदर नहीं आना? वो सब तो चले गए.. तू अंदर आ जा.." प्यार से रमिला बहन ने मौसम को कहा
पिछले एक महीने से मौसम उन लोगों के साथ थी.. इसलिए ये जुदाई का पल उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था.. मौसम की इस स्थिति को समझकर रमिला बहन उसे पीठ सहलाते हुए सांत्वना दे रहे थे.. मौसम उनके गले लगकर खूब रोई.. रमिला बहन का दिल भी भर आया.. फिर दोनों घर के अंदर आए.. मौसम पानी पीकर शांत हुई.. रमिला बहन तुरंत अंदर से बोर्नविटा वाला दूध लेकर आए जो मौसम को बेहद पसंद था.. कितने अच्छे से समझते है माँ बाप अपनी औलाद को!! उन्हें कब क्या चाहिए होगा, उन्हें सब पता होता है..
स्त्री जाती कितनी आसानी से रोकर अपना दिल हल्का कर सकती है.. !! इसीलिए शायद उनको ह्रदयरोग की समस्या कम होती है.. वे अपने दिल पर कोई बोझ रहने नहीं देती.. रोकर हल्का कर देती है.. इसकी तुलना में अगर पुरुषों को देखें.. कितने दंभी होते है.. दिल रो रहा हो फिर भी चेहरे पर मुस्कान ही होती है.. हाँ, पुरुष बिना आँसू के भी रो लेने की अद्भुत क्षमता जरूर रखते है..
मौसम घर के अंदर आई तब सुबोधकांत किसी से फोन पर बात कर रहे थे.. मौसम उदास होकर सोफ़े पर बैठी रही.. इस खलिश भरे माहोल में एक ही अच्छी बात थी और वो थी फाल्गुनी.. फाल्गुनी मौसम के लिए ए.टी.एम के बराबर थी.. जब भी बुलाओ वो हाजिर हो जाती थी.. यही तो होती है सच्चे मित्र की व्याख्या.. मौसम ने तुरंत फाल्गुनी को फोन लगाया पर उसने फोन काट दिया.. और पीछे से आकर हँसते हुए मौसम की आँखों पर अपने हाथ रख दीये.. उसके हाथ हटाते हुए मौसम मुड़कर बोली "लो, शैतान का नाम लो और हाजिर.. !!"
मौसम का मुरझाया हुआ चेहरा देखकर फाल्गुनी ने पूछा "क्या हुआ?? तरुण की बहोत याद आ रही है क्या?" सुनकर मौसम हंस पड़ी
यहाँ वहाँ की बातें कर फाल्गुनी ने मौसम को नॉर्मल कर दिया.. फिर दोनों मौसम के कमरे में गए तब साढ़े दस बजे थे.. एक बजे तक दोनों कमरे के अंदर है बैठे रहे और तब बाहर निकले जब रमिला बहन ने खाने के लिए बुलाया.. मौसम ने उस दौरान फाल्गुनी को जरा सी भी भनक नहीं लगने दी की उसने कल अपने पापा के साथ उसकी चुदाई को अपनी आँखों से देख लिया था.. मौसम मानती थी की फाल्गुनी को उसके वहाँ होने के बारे में पता नहीं था.. पर हकीकत ये थी की वैशाली ने फोन करके फाल्गुनी को सब कुछ बता दिया था.. उसने ये भी बता दिया था की मौसम खुद ही उसे पापा की ऑफिस तक लेकर आई थी और उसने बाहर खड़े खड़े सब कुछ देख लिया था..
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मदन कार ड्राइव कर रहा था और शीला उसके बगल में बैठी थी.. कविता, पीयूष और वैशाली पीछे बैठे हुए थे.. कार फूल स्पीड पर चल रही थी.. और सबके दिमाग भी उतनी ही तेजी से चल रहे थे..
मदन का दिमाग संजय की बात को लेकर खराब हो रहा था.. अच्छा हुआ जो इंस्पेक्टर उसका दोस्त निकला.. नहीं तो बड़ी मुसीबत हो जाती.. नकली पुलिस बनकर लोगों से पैसे लेना.. कितना बड़ा जुर्म होता है.. !! जो इंसान एक गुनाह कर सकता है.. वो दुसरें भी कर सकता है.. ये संजय कब सुधरेगा? क्या करें उसे सुधारने के लिए? वैशाली के भविष्य का क्या होगा??
अचानक सामने से एक ट्रक आ गई और गाड़ी के एकदम करीब से निकल गई.. एक्सीडेंट होते होते रह गया..
"तेरा ध्यान कहाँ है मदन? अभी एक्सीडेंट हो जाता.. !!" शीला ने उसे हड़काते हुए कहा
मदन ने अपना सर झटकते हुए कहा "सही बात है यार.. विचार करते करते ड्राइविंग नहीं करना चाहिए.. " मदन ने कहा
शीला समझ गई की मदन को किस बात का टेंशन था.. कल पुलिस स्टेशन से फोन आया तब से मदन उलझा हुआ सा लग रहा था.. अब शीला को भी चिंता होने लगी.. संजय की चिंता तो थी ही पर उससे ज्यादा चिंता इस बात की थी की कहीं संजय या हाफ़िज़ ने सब कुछ बक न दिया हो.. वरना उसका भंडाफोड़ होना तय था.. अब क्या करू?? अगर सच में उन दोनों ने सब बक दिया होगा तो?? मैं मदन को क्या मुंह दिखाऊँगी?? अगर मदन को मेरे और संजय की गोवा की ट्रिप के बारे में पता चला तो उसकी नज़रों में, मैं हमेशा के लिए गिर जाऊँगी.. !!!
शीला के चेहरे का नूर उड़ गया.. चिंता उसे दीमक की तरह खाए जा रही थी.. अगर संजय ने पुलिस को दोनों के संबंधों के बारे में कुछ भी बताया होगा तो मदन को पता चलने में देर नहीं लगेगी..
पीयूष के साथ समाधान हो जाने के बाद कविता बेहद खुश थी.. अच्छा हुआ की पीयूष के साथ सारे प्रॉब्लेम एक साथ खतम हो गए.. पिछली रात के हसीन संभोग को याद करते हुए कविता की पेन्टी गीली हो रही थी.. कितने दिनों के बाद हम-बिस्तर हुए थे दोनों.. !! पीयूष के उत्तेजित लंड को याद करते हुए कविता ने अपनी जांघें आपस में दबा दी..
दूसरी तरफ पीयूष के सर पर मौसम सवार थी.. हर आती जाती लड़की में उसे मौसम नजर आ रही थी.. मौसम ने वादा तो किया था की सगाई से पहले के बार अकेले में मिलेगी.. पर ऐसा मौका क्या जाने कब मिलेगा?? मिलेगा भी या नहीं? तरुण थोड़ी देर बाद मौसम की ज़िंदगी में आया होता तो सब सही से हो जाता.. तरुण पर उसे बहोत गुस्सा आ रहा था पर क्या करता??
वैशाली को चिंता हो रही थी.. अब वापिस कलकत्ता जाना पड़ेगा.. कितने दिन हो गए.. ससुराल से किसी का एक फोन तक नहीं आया था.. बेचारे बूढ़े सास ससुर.. फोन करते तो भी किस मुंह से?? उनका बेटा ही जब हरामी निकला हो.. रखैलों के साथ भटकता रहता हो और कुछ कमाई न हो.. ऐसे पति के साथ जीने से तो अच्छा है की जिंदगी अकेले ही गुजारी जाए..
वैशाली को सुबोधकांत के संग बिताएं हसीन पल याद आ गए.. ५२-५५ की उम्र के होने के बावजूद कितनी ताकत थी उनमें.. !! दिखने में भी हेंडसम थे.. उनके मुकाबले रमिला बहन तो बेचारी बहोत सीधी थी.. अगर उनकी मेरे जैसी पत्नी होती तो रोज रात को चुदाई महोत्सव मनाती.. एक बार में ही उन्होंने मुझे पिघला दिया.. फिर बेचारी फाल्गुनी का क्या दोष?? वैसे पर्सनालिटी तो संजय की भी अच्छी है पर साला है एक नंबर का कमीना.. सुबोधकांत तो इतने बड़े बिजनेसमेन है फिर भी पैसों का घमंड नहीं है.. अच्छा हुआ जो उसने मौका देखकर उनसे चुदवा लिया.. पर एक बार करने से कभी मन संतुष्ट कहाँ होता है कभी?? आह्ह फाल्गुनी.. तेरी गलती नहीं है.. सुबोधकांत बूढ़ा है.. पर है कोहिनूर हीरा.. ओल्ड इस गोल्ड.. फिर से एक बार मौका मिले तो मज़ा आ जाएँ.. पर अब कहाँ मौका मिलने वाला था..!! मन ही मन वैशाली मुस्कुरा रही थी
मदन रियर व्यू मिरर से वैशाली को मुसकुराते हुए देखता रहा..इस बेचारी को कहाँ पता ही की उसका पति अभी जैल में बंद है.. !!
रास्ते में एक बढ़िया होटल के बाहर मदन ने गाड़ी रोकी.. सब ने चाय-नाश्ता किया.. नाश्ते के बाद पीयूष और मदन सब के लिए मीठा पान लेने के लिए गए.. शीला, वैशाली और कविता लेडिज बाथरूम की तरफ गए.. बाथरूम तो एक बहाना था इसी बहाने पैरों को रीलैक्स कर रहे थे.. कार में बैठे बैठे पैरों में जकड़न हो गई थी सब को..
जब वैशाली और कविता कुछ गुसपुस कर रहे थे तब शीला वहाँ से दूर चली गई.. उसका मानना था की जवान लड़कियों की बातों में दखलअंदाजी नहीं करने चाहिए.. और उन्हें उनके हिसाब से जीने देना चाहिए.. वैशाली को ये देखकर अपनी मम्मी की परिपक्वता पर गर्व हुआ.. कविता और वैशाली बातें करते करते टॉइलेट में पहुंचे
बाहर निकलकर कविता ने एक जोरदार सिक्सर लगाई.. "वैशाली, टॉइलेट देखकर कुछ याद आया की नहीं?"
वैशाली को समझ नहीं आया "टॉइलेट देखकर भला क्या याद आएगा!!"
"क्यों? माउंट आबू में राजेश सर के साथ.. टॉइलेट ट्रिप.. भूल गई क्या?" शरारती मुस्कुराहट के साथ कविता ने कहा
स्तब्ध रह गई वैशाली.. काटो तो खून न निकले ऐसी दशा हो गई उसकी.. पर पलट कर वार करने में वो भी कम नहीं थी.. आखिर थी तो वो शीला की ही बेटी..
"तू भी ज्यादा होशियार मत बन.. मुझे भी तेरी सारे राज पता है"
कविता: "मेरे कौन से राज.. ज्यादा से ज्यादा पिंटू को इशारे करते हुए देख लिया होगा.. और क्या.. !!"
वैशाली को इस बारे में कुछ मालूम नहीं था.. उसने तो ऐसे ही अंधेरे में तीर चला दिया था.. पर कविता ने पिंटू का नाम लेकर उसे बड़ा हिंट दे दिया था.. उसने मन में ही बात जोड़ दी..
"हाँ.. मुझे मौसम ने बताया था की तुझे पिंटू बहोत पसंद है"
कविता: "तो उसमें कौन सी बड़ी बात है.. !! सब शादी से पहले की बात थी.. और काफी सालों के बाद जब हमें कोई अपनी पहचान का मिल जाएँ तब पुरानी यादें तो ताज़ा हो ही जाती है.. !!"
वैशाली: "सही बात है.. पुरानी यादें ताज़ा हो जाती है.. और रिपिट भी हो जाती है.. बस मौका मिलना चाहिए.. हैं ना..!!"
वैशाली और कविता बातें कर रहे थे तब शीला को वो बात याद आ रही थी जब ऐसे ही किसी हाइवे होटल पर रात को हाफ़िज़ ने उसे खड़े खड़े चोद दिया था.. गोवा से लौटते वक्त जब वो लोग खाना खाने रुके थे और संजय टॉइलेट गया था तब.. साला कितना हरामी था.. बिना शरमाये अपना लंड निकालकर मेरे मुँह में दे दिया था.. और मेरी छातियाँ तो ऐसे दबाता था जैसे अपनी बीवी की दबा रहा हो..
वैशाली और कविता को करीब आते देख शीला ने अपनी यादों का पिटारा बंद कर दीया.. ये ऐसा प्रकरण था जिसे याद करते ही शीला के चेहरे पर चमक आ जाती थी.. और छुपायें छुपती नहीं थी.. संजय पाँच मिनट के लिए दूर क्या गया.. उस मामूली ड्राइवर ने कितनी हिम्मत दिखाई थी.. और उस दिन जब मदन को छोड़ने आया था तब मुझे आँख मार रहा था.. साला, रंडी समझता था मुझे..!!
"घर पहुंचकर आराम से सारी बातें करेंगे.. अभी देर हो रही है" कहते हुए कविता ने वैशाली को हाथ से खींचकर जल्दी चलने पर मजबूर कर दिया..
मदन एक कोने में खड़े खड़े सिगरेट फूँक रहा था और पीयूष से बातें कर रहा था..
जैसे ही शीला, कविता और वैशाली गाड़ी में बैठे.. मदन ने कार की चाबी पीयूष को थमा दी..
"ले भाई.. मैं तो थक गया.. वैसे भी मुझे कुछ खाने के बाद नींद आ जाती है.. कल भी मैंने ड्राइव किया था.. अब तू ही चला ले" मदन ने कहा
"कोई बात नहीं मदन भैया.. मैं चला लेता हूँ.. आप आराम से शीला भाभी की गोद में सर रखकर सो जाइए" हँसते हुए पीयूष ने कहा
"अरे पागल.. जवान बेटी के सामने ऐसा सब करना ठीक नहीं.. वो नहीं होती तो सो जाता.. " मदन ने गाड़ी में बैठते हुए कहा
पीयूष के ड्राइवर सीट पर बैठते ही कविता भी आगे आ गया.. पीछे मदन का छोटा सा परिवार बैठ गया..
गाड़ी चल पड़ी.. बार बार गियर बदलने पर पीयूष का हाथ कविता की जांघों से टच हो जाता.. और दोनों के जिस्म में अजीब सी सुरसुरी होने लगती थी.. पिछली रात आइसक्रीम लेने गए तब मारुति ८०० में जो संभोग हुआ था वो तो नाश्ते के बराबर था.. फिर रात को जो हुआ वो बड़ा ही मजेदार था.. अब दोनों की भूख जाग चुकी थी.. जल्दी से जल्दी घर पहुंचकर कपड़े उतारकर एक दूसरे में समा जाने की दोनों की चाह थी..
ड्राइव करते करते.. कविता को छेड़ते छेड़ते.. पीयूष बार बार मिरर से वैशाली की ओर देख लेता था और आँखों से इशारे भी कर रहा था.. पर फिलहाल मदन और शीला के बीच बैठी वैशाली उसकी किसी भी हरकत का जवाब नहीं दे पा रही थी.. पीयूष की नजर वैशाली के उछलते स्तनों पर टिकी हुई थी.. गड्ढे में गाड़ी उछलते ही वैशाली के स्तन ऐसे कूदते थे जैसे उसने अपने टॉप में खरगोश के बच्चे छुपाये हो..
तभी पीयूष के मोबाइल पर मेसेज आया.. ड्राइव करते करते उसने मोबाइल को अनलॉक किया और देखा.. मौसम ने ब्लेन्क मेसेज भेजा था.. उसने बिना शब्दों के ही अपने जीजू को यादें भेजी थी.. मौसम का मेसेज देखकर पीयूष फिर से उसकी यादों में खो गया.. कविता के संग संबंधों का जो रिपेर काम चल रहा था उसमे फिर से डेमेज हो गया.. दंगों के वक्त जब कर्फ्यू लगा हो.. और उसमे थोड़े समय के लिए मुक्ति मिले.. उसी दौरान छुरेबाज़ी हो जाए और शांति जिस तरह चकनाचूर हो जाती है.. वैसा ही हाल पीयूष के दिल का भी हो रहा था.. आग लगाने के लिए माचिस की एक तीली ही काफी होती है.. बड़ी मुश्किल से तैरकर वो कविता नाम के किनारे पर पहुँचने ही वाला था तब मौसम नाम की बाढ़ ने उसे फिर से तहसनहस कर दिया.. जैसे ही मौसम के विचारों ने उसके दिमाग पर कब्जा कर लिया.. वैसे ही उसने कविता को छेड़ना बंद कर दिया.. मानों कविता का स्पर्श करके वो मौसम को धोखा दे रहा हो ऐसा उसे लग रहा था
इंसान अपने नाजायज प्यार के प्रति जितना वफादार होता है उतनी ही वफादारी अपनी पत्नी की ओर क्यों नहीं दिखाता??
चार घंटों के सफर के बाद.. गाड़ी घर पहुँच गई.. एक के बाद एक सब गाड़ी से उतरें.. पिछले दिन ही तो वो सब वहाँ गए थे.. फिर भी ऐसा लग रहा था की जैसे घर छोड़े हुए अरसा हो गया हो..
बड़ी मुश्किल से पटरी पर आई हुई उसकी और कविता की प्रेम-गाड़ी को दूसरा कोई अवरोध न आए इसलिए पीयूष ने अपने दिमाग से मौसम के खयालों को फिलहाल निकाल फेंका.. और कविता के साथ बातें और मस्ती करते हुए घर की ओर जाने लगा..
Thanks bhaiबहुत ही कामुक गरमागरम और उत्तेजना से भरपूर अपडेट है चोरी चोरी वैशाली और राजेश ने अपना पानी निकाल कर खुद को शांत कर लिया
Thanks bhaiWah vakharia Bhai,
Kya madmast update diya he aapne...............aag hi laga di bhai
Sanjay jaisa chodu bhi sheela ke bhosde ki aag ke samne haar maan gaya..........
Sanjay ne hafiz aur sheela ki chudai bhi dekh li..............lekin kuch react nahi kiya............
Keep rocking Bro
Tomorrow probablynext update
WaitingTomorrow probably












Thanks a lot Ajju Landwalia bhaiWah vakharia Bhai,
Kya madmast update diya he aapne...............aag hi laga di bhai
Sanjay jaisa chodu bhi sheela ke bhosde ki aag ke samne haar maan gaya..........
Sanjay ne hafiz aur sheela ki chudai bhi dekh li..............lekin kuch react nahi kiya............
Keep rocking Bro
diya update maza aagyaबड़ी मुश्किल से पटरी पर आई हुई उसकी और कविता की प्रेम-गाड़ी को दूसरा कोई अवरोध न आए इसलिए पीयूष ने अपने दिमाग से मौसम के खयालों को फिलहाल निकाल फेंका.. और कविता के साथ बातें और मस्ती करते हुए घर की ओर जाने लगा..
कविता और पीयूष की हंसी खुशी घर के अंदर प्रवेश करता देख अनुमौसी के दिल को चैन मिला.. वो सोच रही थी.. शीला को कोई भी केस हाथ में दो तो वो उसका हल निकाल ही लेती है.. कितने अच्छे लग रहे है ये दोनों.. इसी कारण वश मौसी ने कविता को शीला और मदन के साथ मौसम के घर भेजा था.. उसे यकीन था की शीला कुछ न कुछ करके दोनों का मिलाप करवा ही देगी.. वैसे शीला का तो इसमें कोई हाथ नहीं था.. पर मौसी को ये कहाँ पता था.. !! बिना कुछ किए ही शीला को क्रेडिट मिल गया..
अनुमौसी ने मस्त कडक चाय बनाई सब के लिए.. चाय पीकर वैशाली, शीला और मदन अपने घर चले गए.. कविता किचन में बर्तन माँजने चली गई और पीयूष सीधा अपने बेडरूम मे आ गया..
बेडरूम में पहुंचते ही उसने सब से पहला काम मौसम को मेसेज करने का किया "ब्लेन्क मेसेज क्यों भेजा था जान.. !! हम बस अभी अभी घर पहुंचे.. !!" काफी देर तक मौसम का रिप्लाइ नहीं आया और पीयूष परेशान होकर बैठा रहा
फिर उसने अपने ससुराल की लेंडलाइन पर फोन किया.. फोन रमिला बहन ने उठाया.. पीयूष ने उन सब के पहुँच जाने की खबर दी.. उसका इरादा तो मौसम के बारे में जानने का था.. पर वो पूछ नहीं पाया और फोन रख दिया.. एक महीने के बाद जब पीयूष बेड पर पड़ा तो उसे मौसम की जुदाई का एहसास हुआ.. पिछले के महीने से.. वो किसी न किसी बहाने मौसम के आसपास ही रहता.. और उसके सुंदर चेहरे को देखकर खुश रहता.. पर अब मौसम नहीं थी.. पीयूष ने मोबाइल फोन की गॅलरी खोली और मौसम की तस्वीरों को देखता ही रहा.. उसे ऐसा लग रहा था जैसे तस्वीर से भी मौसम उसकी उदासी का मज़ाक उड़ा रही हो.. गुस्से में पीयूष ने फ़ोटो डिलीट कर दिया..
और तभी मौसम का रिप्लाइ आया.. "जीजू.. आई मिस यू अ लॉट.. आप के जाने के बाद मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा.. !!" मौसम का मेसेज पढ़ते ही पीयूष खुश हो गया.. एक मिनट पहले जो उदासी के बादल उसके चेहरे पर छाए थे वह सारे छट गए.. वो खड़ा होकर बाहर निकल रहा था तभी मौसी ने उसे टोका.. "कहाँ जा रहा है? सफर कर के आया है.. थोड़ा सा आराम कर ले"
"अभी आया मम्मी.. एक दोस्त का फोन था.. उसे कुछ काम है इसलिए मिलने बुलाया है.. " कहते हुए तेजी से बाहर निकल गया.. गली के नुक्कड़ पर आकार उसने मौसम को फोन किया
"हैलो.. " आहहहा.. मौसम की सुरीली आवाज को सुनकर पीयूष के मन का मोर नाचने लगा..
"मौसम.. आई लव यू यार.. तेरे बिना एक पल भी मेरा दिल नहीं लगता.. कैसी है तू?"
जीजू के मुंह से "आई लव यू" सुनकर मौसम के रोंगटे खड़े हो गए.. उसका रोम रोम पुलकित हो उठा
"मौसम.. मैं बस थोड़े समय के लिए ही बाहर निकला हूँ.. कविता मुझे ढूंढ रही होगी.. अभी ज्यादा बातें नहीं हो पाएगी.. कल ऑफिस जाने से पहले मैं तुझे कॉल करूंगा.. और तुझे अपना वादा तो याद है ना.. !! भूल मत जाना" पीयूष ने एक ही सांस में बहुत कुछ कह दिया
"याद है जीजू.. आप अभी घर जाइए.. कल बात करेंगे.. बाय जीजू"
"बाय जान.. लव यू.. " पियूँ ने फोन कट कर दिया और कॉल-लॉग से मेसेज और कॉल को डिलीट कर दिया और घर आ गया..
साढ़े सात बजे के करीब पीयूष को मदन का फोन आया "खाना खा लिया हो तो वॉक पर चलें??"
पीयूष: "हाँ चलना तो है.. पर अभी खाना बाकी है.. थोड़ी देर रुकिए.. मैं अभी खाकर आता हूँ" मदन के साथ संबंध आगे बड़ाने का ये अच्छा मौका दिखा पीयूष को
"ठीक है.. मैं गली के नुक्कड़ पर तेरा इंतज़ार करता हूँ.. जल्दी आना" मदन ने फोन काट दिया..
थोड़ी देर बाद दोनों साथ चलते चलते एक लंबा राउंड लगाकर लौटे.. मदन का घर पहला आता था इसलिए वो अंदर चला गया.. पीयूष की नजर शीला भाभी के दर्शन के लिए तरस रही थी.. छत पर बैठे बैठे शीला ये देखकर मुस्कुरा रही थी.. पीयूष बेचारा पागल हो गया है मेरे पीछे.. कैसे ढूंढ रहा है.. !!
शीला पीयूष को घर के अंदर जाने तक देखती रही..
रात के साढ़े आठ बज गए थे.. शीला छत से नीचे उतरी.. ड्रॉइंग रूम में वैशाली और मदन टीवी पर "तारक मेहता का उल्टा चश्मा" धारावाहिक देख रहे थे..
"मम्मी.. ये जेठालाल कितना क्यूट है ना.. जेठा-दया की जोड़ी देखकर मुझे तुम और पापा ही नजर आते हो.. "
"मुझे तो बबीता बहोत पसंद है.. " मदन के सामने देखकर मज़ाक करते हुए शीला ने कहा.. बबीता का जिक्र हमेशा उसके बड़े बड़े स्तनों के लिए ही होता है.. बाकी उसमें और कुछ खास तो है नहीं..
"मुझे तो माधवी भाभी बहोत पसंद है.. इतनी स्वीट स्माइल है उनकी.. " मदन ने एकमेव सेक्रेटरी की बीवी को लपेट लिया..
तीनों मस्ती भरी बातें कर रहे थे तभी घर की डोरबेल बजी.. शीला ने दरवाजा खोला और देखा तो इंस्पेक्टर तपन और उनके साथ संजय था.. मदन और शीला के साथ साथ वैशाली भी ये देखकर डर गई.. घबराहट के मारे वो भागकर किचन में चली गई..
मदन: "अरे इंस्पेक्टर साहब आप.. अभी, इस वक्त? क्या बात है?"
शीला भी पुलिस के साथ संजय को देखकर बहोत डर गई थी.. पता नहीं संजय ने क्या क्या बता दिया होगा.. !!
शीला ने घबराते हुए कहा "कहिए तपन जी.. कैसे आना हुआ?"
किचन के अंदर खड़ी वैशाली को ये सुनकर बेहद आश्चर्य हुआ.. भला मम्मी इंपेक्टर को नाम से कैसे जानती है.. !! हो सकता है की उनकी पहचान का हो.. वैशाली का डर थोड़ा कम हो गया.. उसने चुपके से किचन से बाहर देखा..
इंस्पेक्टर तपन ने मज़ाक किया "ये बहनजी बार बार किचन से क्यों झांक रही है?" वैशाली डर गई और अपना चेहरा वापिस खींच लिया
मदन ने कहा "वैशाली बेटा.. ये तपन अंकल है.. डरने की कोई बात नहीं है.. बाहर आजा.. मैं तेरी पहचान कराता हूँ.. "
बड़े ही संकोच के साथ वैशाली बाहर आई.. साथ ही ट्रे में पानी के ग्लास भरकर.. पानी सिर्फ मदन, इंस्पेक्टर और शीला को दिया.. संजय को नहीं.. इससे इन्स्पेक्टर तपन को भी साफ तौर पर पता चल गया की मियां बीवी के बीच सब कुछ ठीक नहीं था.. इस अपमान के बाद भी संजय चुप बैठा रहा क्योंकि इन्स्पेक्टर सामने खड़ा था
पानी पीकर ग्लास ट्रे में रखते हुए इंस्पेक्टर तपन ने कहा "मदन, बात दरअसल ये है की अभी एकाध घंटे पहले इन महाशय के मोबाइल पर फोन आया.. कलकत्ता से.. उनके पापा को हार्ट एटेक आया है और उनकी हालत गंभीर है.. मैंने सोच तुम्हें बता दूँ.. अब बोल.. क्या करना है? वरना जो गुनाह इसने किया है उसका अगर केस बनाऊँगा तो ये दस साल तक सलाखों के पीछे से बाहर नहीं आएगा"
वैशाली स्तब्ध हो कर सुनती ही रही.. इस संजय ने तो मायके में भी मेरी इज्जत की धज्जियां उड़ा दी.. अब ऐसा तो कौन सा गुनाह कर दिया इसने? कहीं रोज का मर्डर तो नहीं कर दिया??
धीमी आवाज में वैशाली ने शीला से पूछा.. शीला ने उसे सारी हकीकत बताई..
शीला: "तपन भैया.. आप बैठिए.. मैं चाय बनाकर लाती हूँ"
वैशाली का हाथ पकड़कर शीला उसे किचन में ले गई..
शीला: "देख बेटा.. तेरे और संजय कुमार के बीच जो कुछ भी तकलीफें हो.. पर तेरे ससुर की इस हालत के वक्त.. एक बहु होने के नाते तेरा वहाँ जाना जरूरी है.. !!"
वैशाली: "मैं इस नालायक के साथ कहीं नहीं जाने वाली.. मुझे अब उसके साथ रहना ही नहीं है.. इतना सब कुछ तो तुम देख ही रही हो.. देखे ना उसके कारनामे!! फिर भी उसके साथ जाने के लिए कह रही हो.. ?? तुझे मेरी जरा सी भी फिक्र नहीं है.. एकदम थर्ड क्लास आदमी है.. प्लीज मम्मी.. मुझे यहीं रहने दो.. " हाथ जोड़कर रो पड़ी वैशाली
शीला: "बेटा.. ये घर तेरा ही है.. तू एक बार वहाँ जा.. अपने ससुरजी की तबीयत ठीक होने तक रहना.. फिर आ जाना वापिस.. !!"
वैशाली: "मुझे बहोत डर लग रहा है मम्मी.. तुझे पता है ना.. कलकत्ता कितना दूर है? वहाँ मेरा अपना कोई है भी नहीं.. और ये संजय वहाँ मेरे साथ क्या क्या करेगा कुछ कह नहीं सकते.. प्लीज मम्मी.. तुम भी चलो मेरे साथ.. मैं अकेली नहीं जाऊँगी"
शीला: "बेटा.. मैं जरूर तेरे साथ चलती.. पर वहाँ कितने दिनों तक रुकना पड़े.. क्या पता.. !! तू पहले वहाँ जा.. थोड़े दिनों बाद मैं और तेरे पापा वहाँ आएंगे.. और लौटते वक्त तुझे साथ यहीं वापिस ले आएंगे.. ठीक है.. !!"
शीला ने वैशाली को समझा ही लिया
चाय पीकर इंस्पेक्टर तपन जाने के लिए खड़े हुए.. जाने से पहले उन्हों ने संजय का गिरहबान पकड़कर धमकाया "कुछ भी उल्टा सीधा किया ना.. तो कहीं से भी ढूंढ निकालूँगा तुझे.. इतना याद रखना.. मदन के कारण आज तुझे छोड़ रहा हूँ.. दूसरी बार हाथ में आया तो उल्टा लटकाकर डंडा घुसा दूंगा.. समझा.. !!"
संजय कुछ भी नहीं बोला..
इंस्पेक्टर तपन निकल गए.. मदन ने तुरंत अपने ट्रैवल एजेंट को फोन लगाया और कलकत्ता की फ्लाइट की दो टिकट बुक करवा दी.. साढ़े बारह की फ्लाइट थी.. वैशाली और संजय को तुरंत निकलना था..
शीला ने तुरंत वैशाली को सामान पेक करने में मदद की.. संजय बेशर्म होकर टेबल पर पैर पसारकर सिगरेट फूँक रहा था.. पुलिस की मार खाकर उसका चेहरा सूझ गया था.. शीला उसके करीब से एक बार गुजरी पर संजय ने उसकी तरफ देखा तक नहीं.. रोज क्लीन शेवड और चकाचक होकर घूमता संजय.. ४-५ दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी और गंदे बदबूदार कपड़ों के साथ बड़ा ही घिनौना लग रहा था
शीला ने वैशाली को इशारा करते हुए कहा की वो संजय से नहाने के लिए कहे.. पर वैशाली ने उससे बात करने से साफ इनकार कर दिया
आखिर मदन ने कहा "संजय कुमार.. आप जरा नहा-धोकर फ्रेश हो जाइए.. "
गुस्से से तिमिलाते हुए संजय खड़ा होकर बाथरूम चला गया.. और थोड़ी देर में तैयार होकर बाहर निकला..
घर से निकलते वक्त वैशाली खूब रोई.. घर की एक एक चीज को जैसे आखिरी बार देख रही हो वैसी व्यथा थी उसकी आँखों में.. सामान लेकर टेकसी में सब बैठ गए.. एयरपोर्ट पहुंचते ही, वैशाली और संजय अंदर गए.. शीला और मदन बाहर इंतज़ार करते रहे.. जैसे ही उनकी फ्लाइट छूती.. मदन के सब्र का बांध टूट गया.. वो फुटफुटकर रोने लगा.. शीला ने सांत्वना देते हुए उसे बिठाया.. उसे शांत करने के बाद दोनों घर वापिस लौटे
अब फिर से मदन और शीला अकेले थे.. पर आज का एकांत न शीला को उत्तेजित कर रहा था और ना ही मदन को.. वैशाली के भविष्य की चिंता दोनों को खाए जा रही थी..
बेटी ससुराल में दुखी हो तो माँ बाप बेचारे कैसे खुश रह सकते है.. !!
रात के एक बजे शीला गाउन पहनकर मदन की बगल में सो गई.. उसका हाथ सीधा मदन की शॉर्ट्स के अंदर चला गया.. पर दोनों में से किसी को भी सेक्स का मूड नहीं था.. ये तो बस सोने के लिए एक आरामदायक पोजीशन थी.. मदन शीला के स्तनों को सहलाते हुए सो गया.. मदन हमेशा से ऐसे ही सोता था.. जब से उन दोनों की शादी हुई थी, तब से.. !!
सुबह दोनों काफी देर से जागे.. शीला ने घड़ी में समय देखा और चोंक गई.. अरे बाप रे.. आठ बज गए.. !!! रसिक ने आज डोरबेल भी नहीं बजाई.. ?? अब बिना दूध के चाय कैसे बनाउ?? शीला उठकर बाहर गई और चारों तरफ देखा.. फिर जल्दबाजी में दरवाजा बंद तो किया पर लोक करना भूल गई.. बेडरूम मे आकर उसने मदन को सोते हुए देखा और सोचा.. अच्छा हुआ जो आज रसिक से मुलाकात नहीं हुई.. वैसे भी कल रात की घटना के बाद आज उसका मूड नहीं था.. अब संजय कुमार कलकत्ता जा कर कोई नया गुल ना खिलाए तो अच्छा..
मदन ने आँखें मलते हुए कहा "अब शहर में एक रसिक अकेला तो नहीं है दूध देने वाला.. मैं अभी दुकान से दूध लेकर आता हूँ.. हम दो दिन से घर पर थे नहीं.. तो बेचारे ने दरवाजा नहीं खटखटाया होगा.. लगता है तुझे रसिक का दूध पसंद आ गया है" मदन ने मज़ाक करते हुए कहा
शीला ने भी जवाब में सिक्सर लगाई.. "हाँ.. जैसे तुझे उस अंग्रेजी मेरी का दूध पसंद आ गया था.. " मदन के गाल खींचकर शीला ने कहा "उस फिरंगी का दूध पीकर तेरे गाल फूल गए है.. " रसिक वाली बात को बदलने के लिए शीला ने ये चाल चली
"इतनी सुबह सुबह तुझे मेरी की याद कहाँ से आई?" शीला के गोलमटोल स्तनों से खेलते हुए मदन ने कहा
"अभी तूने पूरी बात बताई कहाँ है.. उसके बॉयफ्रेंड से मिलने का सेटिंग करवाया था तूने अपनी ऑफिस में.. फिर अपना ये बाम्बू उस गोरी की चूत में कैसे घुसा दिया वो कहानी अभी बाकी है.. " कहते हुए शीला ने मदन की शॉर्ट्स में हाथ डालकर उसका लंड पकड़ लिया..
शीला ने ये महसूस किया था की जब जब वो मेरी की बात करती थी तब मदन की पकड़ उसके स्तनों पर और सख्त हो जाती थी.. मतलब मदन मेरी को अब तक भुला नहीं था.. वैसे तो शीला भी.. जीवा, रघु और रसिक को कहाँ भूल पाई थी.. !!
शॉर्ट्स से निकले लंड को एक प्रेमभरा स्पर्श देकर उसने जीवित कर दिया.. जैसे गहरी नींद से जाग रहा हो.. वैसे अंगड़ाई भरकर मदन का लंड खड़ा हो गया.. शीला मदन के लंड से खेल रही थी और मदन शीला के स्तनों को मसल रहा था..
तभी घर के अंदर अनुमौसी ने, दूध की पतीली हाथ में लेकर, प्रवेश किया और सीधे बेडरूम में घुस आई.. ये तो अच्छा हुआ की दोनों की हरकतें चादर के भीतर चल रही थी.. वरना अनुमौसी के सामने अनर्थ हो जाता
अनुमौसी: "शीला, ये ले.. रसिक आज दूध मेरे घर देकर गया था.. रसिक बेचारा बेल बजा बजाकर थक गया.. पर आप दोनों में से कोई जागा ही नहीं.. आखिर वो मेरे घर ही तुम्हारा दूध देकर चला गया.. "
"मौसी, आप बैठिए शीला के साथ" संभालकर अपने खड़े लंड को छुपाते हुए मदन खड़ा हुआ और ब्रश करने चला गया.. अनुमौसी भी रुकी नहीं
"ढेर सारे काम है घर पर.. मैं चलती हूँ शीला" कहते हुए मौसी भी चली गई
चलो, अच्छा हुआ.. दूध का प्रॉब्लेम तो सॉल्व हो गया.. शीला ने किचन मे जाकर चाय बनाई..
चाय पीकर मदन अखबार पढ़ रहा था और शीला किचन में मशरूफ़ हो गई..
दोपहर के एक बजे वैशाली का शीला पर फोन आया..
वैशाली: "मम्मी.. मेरे ससुरजी का देहांत हो गया.. यहाँ का वातावरण बिल्कुल भी ठीक नहीं है.. संजय मुझे बहोत परेशान कर रहा है.. तुम जल्दी यहाँ आओ और मुझे यहाँ से ले जाओ.. !!"
शीला और मदन स्तब्ध हो गए.. उनके समधीजी की मृत्यु हुई थी.. इसलिए उनका कलकत्ता जाना जरूरी था.. मदन ने वैशाली को फोन पर आश्वासन देते हुए कहा की वो दोनों जल्द से जल्द वहाँ पहुँच जाएंगे.. ऐसे मौकों पर क्या किया जाए उसका मदन को भी ज्ञान नहीं था.. आखिर उन्होंने अनुभवी अनुमौसी को बुलाया.. बुजुर्गों को इस बारे में सारी जानकारी होती है.. जब बेटी के ससुराल में इस तरह की घटना हो तो क्या करना चाहिए.. कोई धार्मिक विधि होती है या नहीं.. वैशाली को वहाँ नहीं रहना है.. तो इस परिस्थिति में उसे यहाँ लेकर आना चाहिए या नहीं..
सारी चर्चाओ के बाद ये तय हुआ की शीला और मदन परसों कलकत्ता जाने के लिए निकलेंगे.. पर ससुर की तेरहवीं खतम होने तक वैशाली का वहाँ रहना जरूरी था.. उसके बाद मदन वापिस कलकत्ता जाकर उसे यहाँ ले आएगा..
मदन के एजेंट का फोन नहीं लग रहा था इसलिए उसने पीयूष से फोन करके टिकट बुक करवाने के लिए कहा.. पीयूष ने अपने दोस्तों की मदद से दूसरे दिन की दो टिकट बुक करवा भी दी..
मदन: "मौसी, एक विनती है.. आजकल चोरियाँ बहोत हो रही है.. हमें आते आते शायद दो-तीन दिन लग जाए.. तब तक पीयूष या तो चिमनलाल क्या मेरे घर पर सोएंगे रात को?"
अनुमौसी: "तुम दोनों निश्चिंत होकर जाओ.. यहाँ की कोई चिंता मत करो.. हम सब है ना.. !! सब कुछ देख लेंगे"
शीला और मदन जाने की तैयारी में जुट गए.. पूरा दिन दोनों ने एक दूसरे से कोई ओर बात तक नहीं की.. दूसरे दिन सुबह पाँच बजे की फ्लाइट थी.. इसलिए घर से रात के तीन बजे निकले.. जाने से पहले शीला ने अपने घर की चाबी देने के लिए मौसी को जगाया.. चाबी देते वक्त उसने मौसी के कानों में कुछ कहा.. सुनते ही मौसी की आँखें चमकने लगी..
जैसे ही शीला और मदन, ऑटो में बैठकर निकले.. मौसी भी घर के अंदर घुस गई.. थोड़ी देर बाद वो बाहर आई.. और शीला के घर चली गई.. मदन और शीला के बेड पर टांगें फैलाकर लेट गई.. इतनी रात को शीला ने जब उन्हें नींद से जगाया तब उनका थोड़ा गुस्सा आया था.. पर जब शीला ने उनके कान में वो बात कही.. सुनकर उनका सारा क्रोध हवा हो गया.. लेटी हुई अनुमौसी को नींद नहीं आ रही थी.. साढ़े तीन बज रहे थे फिर भी उनकी आँख में अब नींद का नामोनिशान नहीं था.. हर थोड़ी देर में वो घड़ी देख रही थी.. उन्हें लग रहा था जैसे समय थम सा गया था.. शीला की बात सुनने के बाद उनका जिस्म तापने लगा था.. शीला ने उसे फोन करके बता तो दिया होगा ना.. !!
शीला के घर की लेंडलाइन से अनुमौसी ने शीला को मोबाइल पर फोन लगाया.. शीला के फोन की घंटी बजी.. मदन बिल्कुल उसके बगल में खड़ा था.. शीला थोड़ी दूर चली गई और फोन पर बात करने लगी.. फिर फोन काटकर उसने दूसरा फोन मिलाया.. और बात करने के बाद वो वापिस लौटी.. शीला को सुबह चार बजे किसी से फोन पर बातें करते देख मदन को आश्चर्य हुआ..
मदन: "किसका फोन था शीला??"
शीला: "अनुमौसी का फोन था.. तुमने कहा था इसलिए वो आज से ही हमारे घर सोने चली आई.. "
मदन: "अच्छा.. अच्छा.. फिर ठीक है.. इतनी सुबह फोन आया ये देखकर मुझे चिंता होने लगी.. "
फोन खतम करके शीला वापिस लौट रही थी तब उसने कॉल-लॉग से आखिरी फोन की एंट्री डिलीट कर दी थी.. दोनों कुर्सी पर बैठे बैठे बोर्डिंग की राह देखने लगे..
सुबह के साढ़े चार बजे भी एयरपोर्ट पर काफी भीड़ थी.. छोटे तंग वस्त्रों में एयर-होस्टेस भी अपनी जिस्म का जादू बिखेरते हुए मदन के दिल को बाग बाग कर रही थी.. खूबसूरती और खुशबू.. कभी छुपाये नहीं छुपती..
मदन की नजर बचाकर शीला ने अनुमौसी को फोन करके बता दिया "मैंने बात कर ली है" और फोन काट दिया
मदन को थोड़ा आश्चर्य जरूर हुआ.. फिर उसने सोचा.. होगी कोई औरतों की अपनी बात.. !! मदन फिर से एयर-होस्टेस के जलवों को देखने में मशरूफ़ हो गया.. खूबसूरती को ताड़ना मदन का पुराना शोख था.. मदन सोच रहा था.. ये एयरपोर्ट वाले.. मेरी शीला जैसी गदराई एयर-होस्टेस क्यों नहीं रखते.. !! इन पतली लड़कियों को देखकर तो फ्लाइट के पैसे भी वसूल नहीं होते.. भरे भरे जिस्म और मदमस्त जोबन वाली एयर-होस्टेस हो तो देखने वालों का भी दिल लगा रहें.. !! बड़े स्तनों वाली को देखकर सफर करने का मज़ा ही अलग होता.. !! बाकी इन सुखी भिंडियों की तो सिर्फ शक्ल ही अच्छी होती है.. बाकी उनकी हड्डियाँ देखने में कोई मज़ा नहीं आता..
फ्लाइट का टाइम हो गया.. और शीला तथा मदन बैठकर निकल भी गए
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इस तरफ अनुमौसी की आँखों में इंतज़ार था.. और वो घड़ी आखिर आ ही पहुंची.. डोरबेल बजते ही उन्होंने तुरंत दरवाजा खोला.. सामने रसिक खड़ा था
"अरे मौसी आप यहाँ कैसे? भाभी जी कहाँ गई?" जल्दबाजी में शीला रसिक को ये बताना भूल गई थी की अनुमौसी को इस आयोजन के बारे में पहले से पता था..
अनुमौसी चोंक गई.. अरे बाप रे.. इस मुए को तो कुछ पता ही नहीं है.. अब क्या करूँ!! बेहद इंतज़ार के बाद जब आखिर भारत-पाकिस्तान का मैच होने वाला हो और उसी दिन बरसात गिर जाएँ तब जैसा महसूस होता है वैसा ही कुछ हो रहा था मौसी को.. एक ही पल में न जाने कितने विचार आ गए मौसी के मन में..
"तुझे शीला का कॉल नहीं आया था क्या?? अंदर आ.. बैठकर बात करते है" रसिक का हाथ पकड़कर अंदर खींच लिया मौसी ने
"मुझे फोन तो आया था भाभी का.. पर उन्होंने ये नहीं कहा था की आप यहाँ होंगे.. !!"
"तू वो सब बातें छोड़.. और शीला ने जो करने के लिए कहा है वो कर.. समय मत बिगाड़.. !!"
रसिक के जलवों की बातें मौसी ने शीला से सुन रखी थी.. बस सामने से पहल करने में घबरा रही थी.. उनके पति चिमनलाल ने जब से सेक्स में रिटाइरमेंट ले लिया था तब से मौसी की हालत खराब हो गई थी.. पिछले पाँच सालों से मौसी तड़प रही थी.. पति के होते हुए ये दिन देखने पड़ रहे थे इस बात का मलाल था उन्हें.. उनकी उम्र के चलते वो किसी और से मुंह मारने की सोच भी नहीं सकती थी.. लेकिन आज शीला की बदौलत उन्हें ये मौका मिला था.. अगर आज ये मौका गंवाया तो न जाने फिर कब लंड नसीब होगा.. !!
रसिक की चौड़ी छाती पर हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा
"रसिक, तू शीला के साथ जो कुछ करता है.. वो सब आज मेरे साथ कर.. शीला शहर से बाहर गई है और मैं यहाँ उसके घर का खयाल रख रही हूँ.. अब शीला ने तुझे फोन करके बता तो दिया है सब.. फिर क्यों टाइम-पास कर रहा है??"
सुबह के पाँच बजे.. जब लगभग सारे लोग.. चैन की नींद सो रहे होते है.. तब अनुमौसी अपने जिस्म की भूख मिटाने के चक्कर में रसिक के सामने गिड़गिड़ा रहे थे.. वैसे रसिक ने मौसी को कभी उस नजर से पहले देखा नहीं था.. इसलिए उसे भी संकोच हो रहा था..
अनुमौसी ने रसिक को रिझाने की सारी तरकीबें आजमा ली.. रसिक बेचारा.. खाने आया था रसगुल्ला.. अब चीनी चाटनी पड़ेगी.. अनुमौसी की बूढ़ी छातियों में वो शीला के गदराएं स्तनों का अंदाज तराश रहा था.. उत्तेजना के कारण ऊपर नीचे हो रही मौसी की छातियों को देखकर रसिक को कुछ खास मज़ा नहीं आया.. पर अनुमौसी आज तय कर चुके थे.. उन्होंने रसिक का हाथ पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया.. और उसके हाथों को दबाते हुए बोली
"ओह्ह रसिक.. जल्दी जल्दी कुछ कर न यार.. " ऐसा कौन सा मर्द होगा जो स्त्री की इन हरकतों के बाद भी अड़ग रह पाए.. !! नरम मांस के गोले हाथ में आते ही उसका लंड फुदकने लगा.. शरमाते हुए रसिक ने अनुमौसी को अपनी ताकतवर भुजाओं में जकड़ लिया.. और उनकी पीठ पर हाथ सहलाने लगा..
मर्द के शरीर का स्पर्श होते ही मौसी के जिस्म में भूचाल सा आ गया.. स्त्री और पुरुष के शरीर जब एक दूजे के साथ कामुक स्पर्श करते है तब दोनों पात्रों के लिए दुनिया की सारी बातें गौण हो जाती है.. काम-वासना का इतना जबरदस्त प्रभाव होता है.. देखते ही देखते अनुमौसी के जिस्म पर हवस ने कब्जा कर लिया
अनुमौसी का हाथ पकड़कर रसिक ने अपने लंड पर रख दिया.. रसिक का मूसल पकड़कर अनुमौसी धन्य हो गई.. उनकी आँखों में आँसू आ गए.. रसिक के लंड की सख्ती को महसूस करते हुए वो सिसकने लगी.. मन ही मन अपने पति चिमनलाल को गालियां देते हुए अनुमौसी ने रसिक के लंड को हिलाना शुरू कर दिया..
उनके अनुभवी भोंसड़े से काम-रस टपकने लगा.. और पूरे कमरे में चूत-रस की विचित्र गंध फैल गई..
चूत की मांसल गंध को सूंघकर सांड की तरह उत्तेजित हो गया रसिक.. अपना पाजामा उतारते हुए उसने अनुमौसी के कानों में कुछ कहा.. सुनकर अनुमौसी तुरंत ही घुटनों के बल बैठ गई.. और रसिक के फुँकारते लंड को बड़े ही अहोभाव से देखने लगी.. जैसे छोटा बच्चा किसी नए खिलौने को कुतूहल से देखता है.. बिल्कुल वैसे ही.. !! गजब की उत्तेजना थी अनुमौसी के चेहरे पर.. अपने भोसड़े को खुजाते हुए वो बिना पलक झपकाए इस लंड की भव्यता और सख्ती को देखती ही रह गई.. एक ही पल में उनके दिमाग में अनगिनत विचार आ गए.. इस लंड से क्या क्या काम लिया जा सकता है वह सारी संभावनाएं सोचने लगा उनका दिमाग.. !! कहाँ चिमनलाल का मेले में मिलती पाँच रुपये की बाँसुरी जैसा लंड..और कहाँ रसिक का विकराल मूसल.. कोई मुकाबला ही नहीं था..!!
हतप्रभ होकर देख रही अनुमौसी के सामने रसिक अपना लंड थोड़ा सा आगे की ओर ले गया और उसके सुपाड़े ने अनुमौसी को होंठों का स्पर्श किया.. अनुमौसी ने अपना मुख खोला और उसी के साथ नो-एंट्री का बोर्ड हट गया.. एक ही धक्के में रसिक ने अपना अंगारे जैसा लाल सुपाड़ा मौसी के मुंह में डाल दिया..
अब मौसी की तकलीफ ये थी की उन्हें लंड ठीक से चूसना आता ही नहीं था.. पर शीला को उन्होंने जिस तरह लंड चूसते देखा था उसका अनुकरण करने लगी.. रसिक के लंड को स्त्री के कोमल होंठों का स्पर्श मिलते ही वो खिलने लगा.. उत्तेजित रसिक "आह्ह-आह्ह" करते हुए मौसी के मुंह को पेलने लगा.. सेक्स के अभाव से तड़प रही अनुमौसी ने जैसा समझ में आया वैसा चूसना चालू कर दिया.. इस अनोखे लंड को प्यार करना.. वो चूसते चूसते सीख गई.. और रसिक के काले चूतड़ों को अपनी हथेलियों से दबाते हुए वो लंड का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा अपने मुंह मे लेने लगी..
वह रोमांचक क्षण आ गई जब रसिक का मोटे डंडे जैसा लंड और अनुमौसी का भूखा मुंह.. दोनों एकाकार हो गए.. हवा जाने की भी जगह नहीं थी.. परिणाम स्वरूप.. अनुमौसी का दम घूँटने लगा.. वो गॉन्गियाने लगी.. उन्होंने लंड को अपने कंठ से निकालने की भरसक कोशिश की.. पर वो भूल गई थी की अब उनकी मर्जी चलने नहीं वाली थी..
पिछले कई दिनों से रोज सुबह.. रसिक शीला के जिस्म से खिलवाड़ करने के इरादे से आ रहा था.. पर उसके हाथों सिर्फ निराशा ही लग रही थी.. आज शीला नहीं तो कोई और सही.. इसी सोच के साथ उसने अनुमौसी पर हमला कर दिया था.. अनुमौसी के अंदर सालों से कैद रति..और रसिक का काम देव.. दोनों पूर्णतः जागृत हो चुके थे..
अब तक खामोश रहकर कमर हिला रहा रसिक.. अनुमौसी के अपरिपक्व मुख-मैथुन से जबरदस्त उत्तेजित हो कर मौसी का हाथ पकड़कर उन्हें शीला के बिस्तर तक खींच गया.. वही बिस्तर पर जहां वो अनगिनत बार शीला को चोद चुका था.. लगभग हररोज पाँच बजे रसिक और शीला का काम उत्सव शुरू हो जाता और साढ़े पाँच तक चलता रहता.. और रसिक के सहारे ही शीला ने मदन की जुदाई को बर्दाश्त किया था.. वरना कभी कभी शीला को डर लगा रहता की चूत की आग की वजह से वो कहीं कोई गलत कदम न उठा ले.. अच्छा हुआ जो शीला को रसिक मिल गया.. किसी को शक भी नहीं हुआ और शीला की भूख भी मिटती रही..
शीला को याद करते हुए रसिक ने अनुमौसी को बेड पर पटक दिया और उन पर सवार हो गया.. भूखे भेड़िये की तरह वो मौसी पर टूट पड़ा.. हवस से पागल हुआ रसिक, मौसी के घाघरे के अंदर घुस गया और उनके चिपचिपे भोसड़े को चूमकर चाटने लगा.. रसिक की जीभ छेद में घुसते ही.. मौसी सिहरने लगी.. सातवे आसमान पर पहुँच गई..
"आह रसिक.. बड़ा मज़ा आ रहा है यार.. एक बार और जोर से चाट.. आह्ह.. चौड़ी करके चाट नीचे.. ओह्ह कितने दिनों से तड़प रही थी मैं.. आह्ह.. जैसे शीला की चाटता है बिल्कुल वैसे ही मेरी चाट.. ऊईईई.. !!"
मौसी की बातों से रसिक को ये पता चल गया.. की उसके और शीला भाभी के कारनामों के बारे में मौसी को सब कुछ पता था.. तो उसमे क्या हो गया.. !! इस हमाम में तो सब नंगे थे.. मौसी भी.. !! तू भी चोर और मैं भी चोर.. !! अब न तो रसिक को किसी बात की फिक्र था और ना ही मौसी को कोई चिंता.. !! चिमनलाल के साथ मौसी को इतने सालों में ये सुख कभी नहीं मिला था.. उस चूतिये को ये नहीं पता था की संभोग का मतलब सिर्फ चूत में लंड डालकर हिलाना नहीं होता.. उसके अलावा भी की सारी हरकतें होती है जो स्त्री को तृप्त करने के लिए करनी जरूरी होती है.. अगर चिमनलाल को ये सब आता तो.. इस उम्र में अनुमौसी को एक मामूली दूधवाले के सामने टांगें फैलाने की नोबत नहीं आती..
रसिक की जीभ जैसे जैसे अनुमौसी के भोसड़े पर घूमती गई.. मौसी के मन में चिमनलाल के प्रति नफरत और तीव्र होती गई.. उन्हें यही मलाल था की शादी के पचास सालों तक उस कमीने चिमनलाल ने मुझे चूत-चटाई की इस अद्भुत सुख से वंचित क्यों रखा.. !!
कामदेव के अद्वितीय रूप से अभिभूत होकर अनुमौसी बिस्तर पर टांगें खोलकर अपना भोसड़ा चटवा रही थी.. दो उंगलियों से मौसी की चूत के होंठों को चौड़ा करके रसिक अंदर के लाल गुलाबी भाग पर अपनी खुरदरी जीभ रगड़ रहा था.. बीच बीच में वो अनुमौसी की जामुन जैसी बड़ी क्लिटोरिस में मुख में लेकर दबा देता था..
"ओह्ह रसिक.. ये तूने अभी क्या किया?? एक बार फिर से कर.. आह्ह आज तो मार ही देगा मुझे तू.. बहोत मज़ा आ रहा है.. रसिक.. इतनी तेज खाज हो रही है अंदर.. तू जितना चाट रहा है उतनी ही खुजली तेज होती जा रही है.. ओह्ह माँ.. " अपने चूतड़ों को उछाल उछलकर मौसी अपनी क्लिटोरिस को रसिक के चेहरे से रगड़ने लगी
रसिक के पास अब ज्यादा समय नहीं था.. उसने दो-तीन मिनट में ही अनुमौसी के तरसते भोसड़े को अपने थूक से सींच दिया.. फिर मौसी की दोनों जांघों को चौड़ा कर बीच में बाइओथ गया.. पैरों के बीच उस विकराल लंड को देखकर अनुमौसी को बेहद प्यार आ गया.. तेज हवा में जैसे पतंग लहराती है बिल्कुल वैसे ही रसिक का मजबूत लोडा लहरा रहा था.. उत्तेजना के कारण खंभे जैसे लंड को अनुमौसी देखती ही रह गई.. लाल सुपाड़े की नोक पर वीर्य की एक बूंद भी प्रकट हो चुकी थी..
"ओह्ह रसिक.. कितना मस्त है रे तेरा.. !!! इसे कहते है असली लंड.. पीयूष के पापा का तो इसकी तुलना में नुन्नी जैसा लगेगा.. अब मुझे समझ में आया की वो शीला तेरे पीछे क्यों इतनी पागल है.. ऐसा सांड जैसा मर्द मिल जाए.. और साथ में मूसल जैसा लंड.. आह्ह.. फिर जीवन में और चाहिए ही क्या.. !!" चूतड़ उठाकर अनुमौसी ने अपनी भोस का स्पर्श करवाया लंड से.. जैसे दो अनजान लोगों की पहचान करा रही हो..
रसिक का लंड अब फुँकारने लगा..
"सोच क्या रहा है.. डाल दे अंदर जल्दी.. नहीं तो तेरे लंड को मेरी ही नजर लग जाएगी.. " अनुमौसी के इस रूप को देखकर रसिक भी स्तब्ध था.. रोज भजन करती मौसी का कौन सा रूप असली था??
वैसे देखने जाए तो हर व्यक्ति के कितने अलग अलग रूप होते है.. !!
चाय की टपरी पर पॉलिटिक्स या क्रिकेट की चर्चा करते वक्त हम विवेचक होते है..
मंदिर में पूजा करते वक्त हम भक्त बन जाते है
बच्चों को उनकी गलतियों के लिए डांटते वक्त हम सर्वगुण सम्पन्न महसूस करते है..
ग्राहक को मीठी जबान से फुलसाकर माल बेचते वक्त हम होशियार होने का दावा करते है..
और बीवी या गर्लफ्रेंड की चूत चाटते वक्त हम उनके वफादार प्रेमी होने का ढोंग भी कर लेते है..
एक ही व्यक्ति.. और उसके ढेर सारे व्यक्तित्व.. कौन सा सही.. कौन सा गलत.. कीसे पता.. !!
रसिक ने मौसी के दोनों स्वरूप देखे हुए थे.. एक तो पूरे दिन भक्तिभाव में डूबी रहती स्त्री का और आज उसके सामने भोसड़ा चौड़ा कर लेटी.. चुदने के लिए बेकरार एक भूखी औरत का..
अपने लंड को टकटकी लगाकर देखती हुई मौसी को देख रहा था रसिक.. मौसी के ढल चुके स्तन देखकर उसे शीला के मदमस्त बबलों की याद आ गई.. पता नहीं क्यों.. शीला का खयाल आते ही लंड की सख्ती दोगुनी हो जाती थी.. शीला के साथ हुए संबंधों के बाद ऐसा हो रहा था.. ऐसा नहीं था.. पहली बार जब वो दूध देने आया और शीला को देखा तब से वो उसके दिमाग में बस गई थी.. उसे तब सपने में भी अंदाजा नहीं था की दूध लेते वक्त झुककर अपने स्तनों को दिखाती भाभी के दोनों बबलों के बीच लंड घुसाने का मौका मिलेगा..
शीला के विचारों में सख्त हुए लंड को देखकर अनुमौसी को ये गलतफहमी हो गई की रसिक उनको देखकर इतना उत्तेजित हो रहा था.. गर्व से उन्होंने अपने जिस्म को थोड़ा और ऊपर किया और रसिक को याद दिलाया की सिर्फ देखते रहने से काम नहीं बनेगा..
रसिक ने नीचे झुककर मौसी के दोनों पिचके स्तनों को पकड़ लिया और एक जबरदस्त धक्का लगाया..
"ओह माँ.." अनुमौसी की चीख निकल गई.. एक ही धक्के ने उन्हे अपनी जवानी की दिनों की याद दिला दी.. अनुभवी चौड़े भोसड़े वाली अनुमौसी को दर्द होने का कोई सवाल ही नहीं था.. पर रसिक का लंड काफी तगड़ा और मोटा था.. इसलिए उनके भोसड़े की दीवारों को खुरेचते हुए वो अंदर जाकर फिट हो गया.. मौसी के भोंसड़े और दिल दोनों को ठंडक मिली..
रसिक अपने विशाल जिस्म के बोझ तले अनुमौसी को कुचले जा रहा था.. और पूरी ताकत लगाकर लंड को अंदर बाहर करने लगा.. कामरस से चिपचिपी हो चुकी अनुमौसी की बूढ़ी भोस.. उत्तेजना के कारण खुल रही थी और बंद हो रही थी.. रसिक बेरहमी से पेलने लगा.. और काफी समय से बिना चुदे तड़प रही मौसी को स्खलित होने में देर नहीं लगी..
पर रसिक को मौसी के ढले हुए बदन में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी.. काफी धक्के लगाने के बावजूद उसका लंड झड़ने से इनकार कर रहा था.. बेचारा रसिक.. लंड का जहर निकालने के लिए.. वो मन मे शीला और रूखी को याद करते हुए तेजी से धक्के लगा रहा था.. पर लगातार दस मिनट तक चोदने पर भी रसिक के लंड ने वीर्य नहीं निकाला.. बूढ़ी फैली हुई चूत में वो दम कहाँ जो रसिक के लंड को दबोचकर उसका पानी निकाल दे.. !!
आखिर रसिक धक्के लगा लगा कर परेशान हो गया.. मौसी तो अब तक खुश हो ही चुकी थी.. उसने अपना लंड बाहर निकाल लिया
"मौसी, मज़ा आ गया आज तो.. ऐसा मज़ा मुझे कभी नहीं आया पहले.. " रसिक ने झूठी तारीफ की
"पर तेरा पानी क्यों नहीं निकल??" मौसी ने पूछा
"बात दरअसल ये है की जब शीला भाभी का फोन आया तब मैं रूखी को चोद रहा था.. उसने मेरा सारा रस चूस लिया.. इसलिए अभी पानी नहीं निकला.. वैसे आपको तो मज़ा आया ना.. ??"
रसिक के विकराल चमकते लंड को अहोभाव से देखते हुए मौसी ने कहा "मुझे पता है रसिक.. की ये सब तू मुझे खुश करने के लिए बोल रहा है.. पर मैं इतनी मतलबी भी नहीं हूँ.. की मेरा काम हो जाए और मैं तुझे भूल जाऊ.." ये कहते ही अनुमौसी घूमकर घोड़ी बन गई और अपनी गांड रसिक के सामने पेश कर दी
उत्तेजित रसिक को मज़ा आ गया.. मौसी की टाइट गांड में अब उसका लंड जरूर झड़ जाएगा.. लंड तो उसका पहले से ही गीला था.. अपनी हथेली में मुंह से लार निकालकर उसने अनुमौसी की गांड के छेद पर लगा दी.. फिर अपनी एक उंगली डालकर छेद के कसाव को चेक करने लगा.. जैसे मुख्यमंत्री के आने से पहले उनके सिक्योरिटी वाले स्थल का मुआयना करते है बिल्कुल वैसे ही..
अनुमौसी के कूल्हों पर अपना सुपाड़ा रगड़कर छेद पर रख दिया.. और हल्के से दबाया.. थोड़ा और दबाव बनाते ही उसका सुपाड़ा मौसी की गांड के अंदर चला गया.. अब उसने एक जोर का धक्का लगाकर मौसी की गांड में आधा लंड घुसा दिया.. अनुमौसी का बूढ़ा चेहरा पीड़ा के कारण लाल हो गया
"मर गई.. जरा धीरे धीरे डाल रसिक.. फट जाएगी मेरी.. !!" अनुमौसी की सिसकियों में दर्द से ज्यादा आनंद का भाव था.. इसलिए अब रसिक ने बिना कुछ ज्यादा सोचें दूसरा धक्का लगाया और अनुमौसी की गांड की भूगोल बदल दी..
"दर्द तो बहोत हो रहा है रसिक.. पर तू चिंता मत कर.. और अपना काम निपटा ले.. फिकर मत कर और अपना पानी निकाल.. आह्ह बहुत तगड़ा है रे तेरा तो.. "
इस पल का महीनों से इंतज़ार कर रही थी अनुमौसी.. जब से उन्हें पता चला था की शीला मदन की जुदाई का गम रसिक के साथ हल्का कर रही थी.. तब से उनकी बड़ी इच्छा थी.. पर ऐसी बातों में जल्दबाजी करना योग्य न था.. इसलिए जब तक उन्होंने अपनी सगी आँखों से रसिक और शीला के गुलछर्रों को देख नहीं लिया तब तक उन्हों ने शीला से इस बारे में कोई बात नहीं की थी.. अपने हिसाब से ही छानबीन करती रही और जब उन्हें पूरी तसल्ली हो गई तब ही उन्हों ने शीला से इस बारे में बात की.. हालांकि शीला ने पहले तो काफी शर्म और संकोच दिखाया था.. और बात को टाल दी थी.. पर उसके ध्यान में सारी बातें थी.. मौका मिलते ही शीला ने अनुमौसी के भोसड़े की भूख शांत करने का प्रबंध कर ही दिया..
मन ही मन शीला का आभार मान रही अनुमौसी की गांड में रसिक के लंड ने गरमागरम वीर्य की पिचकारी छोड़ दी.. सालों बाद अपने जिस्म के अंदर ये गुनगुना एहसास महसूस करते हुए अनुमौसी चिहुँक उठी..
रसिक के चेहरे पर तृप्ति के भाव देखकर वो और खुश हो गई.. दोनों पात्रों को संतुष्टि मिलें वहीं सम्पूर्ण संभोग कहलाता है.. अभी भी उत्तेजित रसिक अपने लंड से मौसी की गांड को ड्रिल कर रहा था.. उसका निकल गया होने के बावजूद.. टाइट गांड में धक्के लगाने मे उसे मज़ा आ रहा था..
थोड़ा सा नरम हुआ लंड अभी भी गांड के अंदर था और अप-डाउन हो रहा था.. और उसके ऊपर नीचे होने के कारण अनुमौसी के भोसड़े में कुछ कुछ होने लगा था.. मौसी के जीवन का ये एक यादगार दिवस था.. वो तो चाहती थी की ऐसा मौका उन्हें बार-बार मिले पर उसकी संभावना काफी कम थी.. वैसे रसिक को भी कहाँ अनुमौसी में ज्यादा दिलचस्पी थी.. !!! पर चूत ढीली हो या टाइट.. चेहरा सुंदर हो या कुरूप.. मर्द कभी भी अपनी हवस को संतुष्ट करने से पीछे नहीं हटता.. वो तो आँखें बंद कर अपने मनपसंद फिगर को याद करते हुए.. चूत के अंदर लंड के नृत्य का आनंद प्राप्त कर लेता है.. दोनों जिस्म शांत होने के बाद लगभग दस मिनट पश्चात.. रसिक ने हथियार डाल दीये..
दोनों के अवयव ढीले पड़ते ही.. कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसा युद्ध-समाप्ति की घोषणा के बाद हो जाता है.. वासना का उफान उतरते ही मौसी को अपने जिस्म पर रसिक का शरीर बोझ सा लगने लगा.. मौसी की गांड से लंड बाहर निकलते ही रसिक उनके शरीर से नीचे उतरा और फटाफट कपड़े पहनने लगा.. पाजामा चढ़ा रहे रसिक का हाफ-टाइट लंड देखकर मौसी सोच रही थी.. कितना अच्छा होता अगर वो जब चाहे तब रसिक के लंड का आनंद ले सकती.. !! अनुमौसी ने भी कपड़े पहने और रसिक को गले लगा लिया
"मौसी.. अब मुझे जाना होगा.. सब जगह दूध देने जाना है.. उजाला होने से पहले मुझे निकल जाना चाहिए.. " रसिक ने कहा
"ठीक है रसिक.. आज तो मुझे बड़ा मज़ा आया.. फिर कभी मौका मिले तो जरूर आना.. पीयूष का बाप तो मुझे खुश करने से रहा.. और शीला को अब उसका पति मिल गया है.. उसकी तरफ थोड़ा कम ध्यान देगा तो भी चलेगा.. पर मुझे मत तड़पाना.. तेरा कुछ भी काम हो मैं कर दूँगी.. पर तू मुझे खुश करते रहना.. भले ही मेरा जिस्म शीला जितना सुंदर न हो.. पर मेरी भूख शीला से भी ज्यादा है.. " भावुक होकर मौसी ने फिर से रसिक को गले से लगा लिया..
"कोई बात नहीं मौसी.. आप चिंता मत कीजिए.. जब भी मौका मिलेगा मैं आपको खुश करूंगा.. चलिए मैं अब चलता हूँ.. !!"
रसिक के जाते ही मौसी ने दरवाजा बंद किया और बिस्तर को ठीक करने लगी.. मौसी का हाथ अनायास ही उनकी गांड पर चला गया.. अभी भी दर्द हो रहा था.. मौसी बिस्तर पर लेट गई.. सुबह के छह बजे थे.. रोज जल्दी जागकर घर के काम निपटाने वाली मौसी का जिस्म आज सुस्त था.. थोड़ी देर तक सो कर अपनी थकान उतारकर वो घर चली गई..