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Hello Hello !! .... My reader log kaafi time hogaya kaafi saare personal reasons ki wajah so i guess ab wapas aajana chahiye 

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Bahut hi shaandar update diya hai Hell Strom bhai.....Update 42
जहां एक तरफ इकरा इफ्तिका को छेड रही थी वहीं दूसरी ओर मयंक और राजीव ने जबसे दद्दा का सच जानकर वह समझ नहीं पख रहे थे की दद्दा और बलवीर का एक साथ आना उनको कितना नुक्सान पहुंचा सकता था क्योंकि दुश्मन को पूरी तरह साफ करना बहुत आसान था।
पर यहां दद्दा के साथ ये नहीं था वो एक गलत फहमी का शिकार था तो उनको बचाते हुए बलवीर को खत्म करना था और साथ साथ ही उस आदमी का भी पता लगाना था जिसने सबको उपयोग किया।
और पता चलना काफी नहीं था उसको खत्म करना भी उतना ही जरूरी था जितना गेहूं में लगते घुन को खत्म करना होता है।
अनिल से बात करते हुए लगभग शाम के सात बज चुके थे। इसलिए उसने घर के लिए निकलना ठीक समझा और ठीक बीस मिनट बाद वह घर था । घर आकर कपड़े बदले पर तब ही उसका फोन बजा और स्क्रीन पर दिखते नाम को देखकर उसने एक लंबी आह्हह भरी और फिर हरा बटन दबाते हुए फोन कान से लगा लिया।
मयंक ने फोन तो कान से लगा लिया था पर दोनों तरफ से ही कोई आवाज नहीं आई सिर्फ एक दूसरे की सांसो की आवाज कानों में जा रही थी पर तब ही ......
"ह्ह है ...हैलो म ... मयंक"....... साक्षी ने झिझकते हुए बात शुरू की।
मयंक -"हैलो साक्षी क्या कर रही हो ?"
साक्षी -"कुछ नहीं.....पता नहीं क्यूं तुम्हें फोन लगाते हुए इतना अजीब क्यूं लग रहा है"
मयंक -"इसमें अजीब क्या है साक्षी??......हम इतने भी नये दोस्त नहीं है की तुम मुझसे बात करने में झिझक महसूस करो "
साक्षी -"तुमने ठीक कहा मयंक पर......."
इतना कहते ही एक बार फिर दोनों तरफ शांति छा गई..... मयंक ने साक्षी को जब दोस्त कहा तो साक्षी का तो जैसे दिल ही टूट गया था पर शुकून इस बात का था की अभी मयंक ने ना नहीं कहा था उसके प्यार को और मयंक की चुप्पी इस बात का सबूत थी की वह अभी उस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है.......थोडी देर चुप्पी रहने के बात फोन साक्षी की तरफ से कट चुका था। मयंक ने फोन को छोटे सोफे पर फेंका और खुद बगल से ही बडे वाले सोफे पर पसर गया ।
**************
"हैलो काका "....... मयंक ने ग्वालियर वाली कोठी का ध्यान रखने वाले काका को फोन लगाया था ये वही थे जो रीत और जानवी की सोसाइटी के गेट पर सिक्योरिटी का काम करते थे ।
काका -"हैलो बेटा .... कैसे हो"
मयंक -"मैं ठीक हूं काका और रीत और जानवी कैसी हैं ?"
काका -"दोनों ठीक है बेटा वो मेरी जिम्मेदारी है तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है"
"तब ही तो मैं निश्चिंत हूं काका मुझे पता है दो चार को तो आप अकेले ही पछीट सकते हो "....... मयंक ने हस्ते हुए कहा।
काका -"हाहहाहा ठीक कह रहा है"
मयंक -"अच्छा काका एक बात पूछनी थी "
काका -"हां पूछो बेटा "
मयंक -"काका आपने कभी दद्दा का नाम सुना है आपने ?"
जैसे ही मयंक ने दद्दा से ये सवाल किया तो एक पल के लिए खामोशी छा गई फोन पर फिर मयंक ने एक बार और पुकारा तब काका ने कहा।
काका -"बेटा ये नाम तुम्हें कैसे पता चला ?"
मयंक -"इस नाम के व्यक्ति ने मुझपे हमला किया है काका "
काका -"अच्छा !! ......ये तुम्हारे बापू के एक पुराने दोस्त हैं जो अब विष्णु का सबसे बडा दुश्मन भी है"
मयंक -"काका और क्या जानते हैं आप इनके बारे में और ऐसा क्या हुआ जो इन दोनों की दोस्ती टूट गई और दोनों में इतनी बडी दरार आ गई?"
काका -"बेटा ये बहुत लंबी कहानी है पर अब इतना ही जान लो तुम जितना इससे दूर रहोगे उतना ही अच्छा है वो दिन आज भी याद आता है तो अंदर से दिल दहल जाता है उसी हादसे में मैंने अपने बेटे और छोटू के बाप को खोया था "
मयंक -"ये बात आपने आज तक क्यूं नहीं बताई काका और मैं भी तो आपका बेटा ही हूं तो कभी ये मत कहना की आपका बेटा नहीं है "
काका -"मुझ नौकर की क्या बिसात है बेटा ये तो तू और विष्णु बाप है जो मुझे इतना सम्मान और प्यार देते हो "
मयंक -"काका किसी कुछ भी कोई देता नहीं जो उसको मिलता है वो उसके अपने कर्मों का ही नतीजा होता है....काका मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता पर अभी ये जानना बहुत जरूरी है की हुआ क्या था उस दिन"
काका -"मुझे पूरा तो नहीं पता बेटा और जिन्हें पूरा पति है वो सब मर चुके हैं दो के अलावा और वो दो नाम हैं दद्दा और विष्णु.... मैं सिर्फ इतना जानता हूं की दद्दा की एक बेटी थी वो दद्दा से अलग हो गई और इसका जिम्मेदार वह आज भी विष्णु को मानता है बाकी पूरा परिवार तो उस मंदिर में मृत पाया गया सबने देखा पर वह बच्ची ना तो जिंदा मिली और ना ही मुर्दा "
मयंक -"हम्मम बहुत ही बडी पहली मालुम पड़ती है काका आपने बताया मंदिर में लाश पाई गई थी उस मंदिर के बारे में बता सकते हो कुछ "
काका -"उस मंदिर में मेरे हिसाब से उस दिन के बाद कोई गया नहीं बस उस मंदिर के पुजारी का परिवार ही रहता है और उसकी देखभाल करणा है अब तो उस रास्ते पर भी जंगल है जहां से हम जाया करते थे हर साल बहुत बडा उत्सव हुआ करता था तेरे, दद्दा और अनिल के परिवार ही हर साल उस उत्सव को आयोजित करते थे।"
इसके बाद मयंक ने उस मंदिर का पता लिया और पता चला की वह मंदिर पहाडगड नामक एक गांव में है। जो मयंक के गांव और ग्वालियर के बीच में मिलता है।
*********
"क्या करूं मैं मेरे माल तो छोडो मिला नहीं और अपनी तरफ से पैसा और आदमी दोनों का नुक़सान हुआ वो अलग ".......ये सैफ उस्मानी ही था जो एक व्यक्ति के सामने बैठा हुआ अपना दुख बता रहा था और हाथ में में उसके शराब का एक ग्लास था।
"बिना जाने पहचाने कुछ करोगे तो यही होगा ना देखना तो चाहिए था की किस्से भिड़ने जा रहे हो अब तुम्हारी इस ग्लती की वजह से बल्ली हमारे पीछे और तुम शायद उसे जानते नहीं हो वो इतनी आसानी से पीछा छोडता नहीं है किसी का ".......इस शख्स ने हाथ में पडा जाम घुमाते हुए कहा जैसे उसमें पडी बर्फ पिघलाना चाहता हो।
"इंस्पेक्टर कुछ कर यार मुझे इस मुश्किल से निकाल"......इस इंस्पेक्टर की बात सुनकर उस्मानी कितना घबरा रहा था वो उसकी आवाज साफ बयान कर रही थी ।
"आज तेरी जितनी फाइल बंद पडी है सब की काॅपी पहुंच गई है उसके पास और ऐसा करने का आदेश सीधे Ig से आया था "...... इंस्पेक्टर ने एक सांस में वह जाम ख़त्म करते हुए कहा ।
"कल तू DSP बनने वाला है और इसमें मेरा कितना हाथ है तू अच्छे से जानता है पाटिल कुछ जुगाड लगा "...... उस्मानी ने जैसे अपनी आखरी कोशिश करते हुए कहा।
पाटिल -"बस एक ही तरीका है गायब होजा और दिखना मत चाहे जो हो जाए लंदन में तेरी पहचान है ना बस वहीं निकल और जब तक सब सही ना हो दिखना मत "
उस्मानी -"इससे मेरी इज्जत का क्या होगा साले कुछ नहीं बचेगा मेरा रसूक सब खत्म हो जाएगा "
पाटिल -"तू समझ नहीं रहा मेरे भाई इज्जत और रसूक इंसानो का होता है मुर्दों का नहीं "
और इस वाक्य ने जैसे उस्मानी को बता दिया था अब उसके पास कोई चारा नहीं था ..... यहां ये लोग जिसके बारे में बात कर रहे थे वो तो खुद महफ़िल सजाए अपने यार के साथ बैठा था।
"कैसा बना है खाना बल्ली "........ अनिल ने दूसरी बार दाल बल्ली को परोसते हुए पूछा।
"तेरे हाथ की दाल का कोई मुकाबला नहीं यारा मजा आ गया ये बनाने की रेसिपी किसी डाबे वाले को बेच खूब पैसा देगा "...... बल्ली ने खाना खाते हुए कहा।
"कुछ अलग थोडी डालता हूं भाई बस सब सही मात्रा में हो मटर का इस्तेमाल और तडका लगाओ मट्टी के दिए से ये सब इसका स्वाद को दुगुना कर देता है "........ अनिल ने भी निवाला तोड़ते हुए कहा।
ये दोनों अकेले नहीं थे इस जगह बल्ली के यहां काम करने वाले जितने भी लोग थे सब मौजूद थे इस वक्त इस खाली प्लाट में जो इनका ही एक ठिकाना था अनिल ने आते ही दाल को बनाया और बल्ली ने टिक्कर के लिए आटे और बेसन को मिलाकर उसमें थोडा पालक का इस्तेमाल किया और अच्छे से गूंथकर लगा दिया जिसके बाद ये दोनों इस खाट पर आ गये जहां बल्ली के साथ रहने वालों ने ही इनके लिए दाल और गरम गरम टिक्कर लाने का जिम्मा उठाया।
"अच्छा बल्ली नीमच से क्या पता चला उस्मानी का ?".......अनिल ने याद दिलाते हुए कहा।
बल्ली -"सारा कच्छा चिठ्ठा मंगा लिया है भाई जैसे जैसे फाइल खुलती गई उसको मारने की इच्छा तीव्र होती गई"
अनिल -"ऐसी इच्छा दबानी भी नहीं चाहिए बता कब निकालना है इसका जनाजा "
बल्ली -"जितना मैं जानता हूं अब तक उसको पता चल गया होगा की उसकी कुंडली कोई निकाल रहा है और मेरा अंदाजा कहता है की उसको हमारा नाम भी पता चल ही गया होगा।"
अनिल -"पुलिस की नौकरी छोडे तीन साल हो गये पर तेरा ये दिमाग अभी भी वही IPS वाला है भाई हाहाहा .....तो जब पत चल ही गया है फिर मुहूर्त निकला भी ठीक नहीं कर देते हैं तैयारियां उसके जनाजे की "
बल्ली -"इतना क्या घबराना भाई जाएगा कहां इस देश में कहीं भी हो पकड ही लेंगे तू आराम से खाना खा .......
दद्दा वाली कहानी थोड़ी सी सामने लाओ भाईUpdate 42
जहां एक तरफ इकरा इफ्तिका को छेड रही थी वहीं दूसरी ओर मयंक और राजीव ने जबसे दद्दा का सच जानकर वह समझ नहीं पख रहे थे की दद्दा और बलवीर का एक साथ आना उनको कितना नुक्सान पहुंचा सकता था क्योंकि दुश्मन को पूरी तरह साफ करना बहुत आसान था।
पर यहां दद्दा के साथ ये नहीं था वो एक गलत फहमी का शिकार था तो उनको बचाते हुए बलवीर को खत्म करना था और साथ साथ ही उस आदमी का भी पता लगाना था जिसने सबको उपयोग किया।
और पता चलना काफी नहीं था उसको खत्म करना भी उतना ही जरूरी था जितना गेहूं में लगते घुन को खत्म करना होता है।
अनिल से बात करते हुए लगभग शाम के सात बज चुके थे। इसलिए उसने घर के लिए निकलना ठीक समझा और ठीक बीस मिनट बाद वह घर था । घर आकर कपड़े बदले पर तब ही उसका फोन बजा और स्क्रीन पर दिखते नाम को देखकर उसने एक लंबी आह्हह भरी और फिर हरा बटन दबाते हुए फोन कान से लगा लिया।
मयंक ने फोन तो कान से लगा लिया था पर दोनों तरफ से ही कोई आवाज नहीं आई सिर्फ एक दूसरे की सांसो की आवाज कानों में जा रही थी पर तब ही ......
"ह्ह है ...हैलो म ... मयंक"....... साक्षी ने झिझकते हुए बात शुरू की।
मयंक -"हैलो साक्षी क्या कर रही हो ?"
साक्षी -"कुछ नहीं.....पता नहीं क्यूं तुम्हें फोन लगाते हुए इतना अजीब क्यूं लग रहा है"
मयंक -"इसमें अजीब क्या है साक्षी??......हम इतने भी नये दोस्त नहीं है की तुम मुझसे बात करने में झिझक महसूस करो "
साक्षी -"तुमने ठीक कहा मयंक पर......."
इतना कहते ही एक बार फिर दोनों तरफ शांति छा गई..... मयंक ने साक्षी को जब दोस्त कहा तो साक्षी का तो जैसे दिल ही टूट गया था पर शुकून इस बात का था की अभी मयंक ने ना नहीं कहा था उसके प्यार को और मयंक की चुप्पी इस बात का सबूत थी की वह अभी उस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है.......थोडी देर चुप्पी रहने के बात फोन साक्षी की तरफ से कट चुका था। मयंक ने फोन को छोटे सोफे पर फेंका और खुद बगल से ही बडे वाले सोफे पर पसर गया ।
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"हैलो काका "....... मयंक ने ग्वालियर वाली कोठी का ध्यान रखने वाले काका को फोन लगाया था ये वही थे जो रीत और जानवी की सोसाइटी के गेट पर सिक्योरिटी का काम करते थे ।
काका -"हैलो बेटा .... कैसे हो"
मयंक -"मैं ठीक हूं काका और रीत और जानवी कैसी हैं ?"
काका -"दोनों ठीक है बेटा वो मेरी जिम्मेदारी है तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है"
"तब ही तो मैं निश्चिंत हूं काका मुझे पता है दो चार को तो आप अकेले ही पछीट सकते हो "....... मयंक ने हस्ते हुए कहा।
काका -"हाहहाहा ठीक कह रहा है"
मयंक -"अच्छा काका एक बात पूछनी थी "
काका -"हां पूछो बेटा "
मयंक -"काका आपने कभी दद्दा का नाम सुना है आपने ?"
जैसे ही मयंक ने दद्दा से ये सवाल किया तो एक पल के लिए खामोशी छा गई फोन पर फिर मयंक ने एक बार और पुकारा तब काका ने कहा।
काका -"बेटा ये नाम तुम्हें कैसे पता चला ?"
मयंक -"इस नाम के व्यक्ति ने मुझपे हमला किया है काका "
काका -"अच्छा !! ......ये तुम्हारे बापू के एक पुराने दोस्त हैं जो अब विष्णु का सबसे बडा दुश्मन भी है"
मयंक -"काका और क्या जानते हैं आप इनके बारे में और ऐसा क्या हुआ जो इन दोनों की दोस्ती टूट गई और दोनों में इतनी बडी दरार आ गई?"
काका -"बेटा ये बहुत लंबी कहानी है पर अब इतना ही जान लो तुम जितना इससे दूर रहोगे उतना ही अच्छा है वो दिन आज भी याद आता है तो अंदर से दिल दहल जाता है उसी हादसे में मैंने अपने बेटे और छोटू के बाप को खोया था "
मयंक -"ये बात आपने आज तक क्यूं नहीं बताई काका और मैं भी तो आपका बेटा ही हूं तो कभी ये मत कहना की आपका बेटा नहीं है "
काका -"मुझ नौकर की क्या बिसात है बेटा ये तो तू और विष्णु बाप है जो मुझे इतना सम्मान और प्यार देते हो "
मयंक -"काका किसी कुछ भी कोई देता नहीं जो उसको मिलता है वो उसके अपने कर्मों का ही नतीजा होता है....काका मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता पर अभी ये जानना बहुत जरूरी है की हुआ क्या था उस दिन"
काका -"मुझे पूरा तो नहीं पता बेटा और जिन्हें पूरा पति है वो सब मर चुके हैं दो के अलावा और वो दो नाम हैं दद्दा और विष्णु.... मैं सिर्फ इतना जानता हूं की दद्दा की एक बेटी थी वो दद्दा से अलग हो गई और इसका जिम्मेदार वह आज भी विष्णु को मानता है बाकी पूरा परिवार तो उस मंदिर में मृत पाया गया सबने देखा पर वह बच्ची ना तो जिंदा मिली और ना ही मुर्दा "
मयंक -"हम्मम बहुत ही बडी पहली मालुम पड़ती है काका आपने बताया मंदिर में लाश पाई गई थी उस मंदिर के बारे में बता सकते हो कुछ "
काका -"उस मंदिर में मेरे हिसाब से उस दिन के बाद कोई गया नहीं बस उस मंदिर के पुजारी का परिवार ही रहता है और उसकी देखभाल करणा है अब तो उस रास्ते पर भी जंगल है जहां से हम जाया करते थे हर साल बहुत बडा उत्सव हुआ करता था तेरे, दद्दा और अनिल के परिवार ही हर साल उस उत्सव को आयोजित करते थे।"
इसके बाद मयंक ने उस मंदिर का पता लिया और पता चला की वह मंदिर पहाडगड नामक एक गांव में है। जो मयंक के गांव और ग्वालियर के बीच में मिलता है।
*********
"क्या करूं मैं मेरे माल तो छोडो मिला नहीं और अपनी तरफ से पैसा और आदमी दोनों का नुक़सान हुआ वो अलग ".......ये सैफ उस्मानी ही था जो एक व्यक्ति के सामने बैठा हुआ अपना दुख बता रहा था और हाथ में में उसके शराब का एक ग्लास था।
"बिना जाने पहचाने कुछ करोगे तो यही होगा ना देखना तो चाहिए था की किस्से भिड़ने जा रहे हो अब तुम्हारी इस ग्लती की वजह से बल्ली हमारे पीछे और तुम शायद उसे जानते नहीं हो वो इतनी आसानी से पीछा छोडता नहीं है किसी का ".......इस शख्स ने हाथ में पडा जाम घुमाते हुए कहा जैसे उसमें पडी बर्फ पिघलाना चाहता हो।
"इंस्पेक्टर कुछ कर यार मुझे इस मुश्किल से निकाल"......इस इंस्पेक्टर की बात सुनकर उस्मानी कितना घबरा रहा था वो उसकी आवाज साफ बयान कर रही थी ।
"आज तेरी जितनी फाइल बंद पडी है सब की काॅपी पहुंच गई है उसके पास और ऐसा करने का आदेश सीधे Ig से आया था "...... इंस्पेक्टर ने एक सांस में वह जाम ख़त्म करते हुए कहा ।
"कल तू DSP बनने वाला है और इसमें मेरा कितना हाथ है तू अच्छे से जानता है पाटिल कुछ जुगाड लगा "...... उस्मानी ने जैसे अपनी आखरी कोशिश करते हुए कहा।
पाटिल -"बस एक ही तरीका है गायब होजा और दिखना मत चाहे जो हो जाए लंदन में तेरी पहचान है ना बस वहीं निकल और जब तक सब सही ना हो दिखना मत "
उस्मानी -"इससे मेरी इज्जत का क्या होगा साले कुछ नहीं बचेगा मेरा रसूक सब खत्म हो जाएगा "
पाटिल -"तू समझ नहीं रहा मेरे भाई इज्जत और रसूक इंसानो का होता है मुर्दों का नहीं "
और इस वाक्य ने जैसे उस्मानी को बता दिया था अब उसके पास कोई चारा नहीं था ..... यहां ये लोग जिसके बारे में बात कर रहे थे वो तो खुद महफ़िल सजाए अपने यार के साथ बैठा था।
"कैसा बना है खाना बल्ली "........ अनिल ने दूसरी बार दाल बल्ली को परोसते हुए पूछा।
"तेरे हाथ की दाल का कोई मुकाबला नहीं यारा मजा आ गया ये बनाने की रेसिपी किसी डाबे वाले को बेच खूब पैसा देगा "...... बल्ली ने खाना खाते हुए कहा।
"कुछ अलग थोडी डालता हूं भाई बस सब सही मात्रा में हो मटर का इस्तेमाल और तडका लगाओ मट्टी के दिए से ये सब इसका स्वाद को दुगुना कर देता है "........ अनिल ने भी निवाला तोड़ते हुए कहा।
ये दोनों अकेले नहीं थे इस जगह बल्ली के यहां काम करने वाले जितने भी लोग थे सब मौजूद थे इस वक्त इस खाली प्लाट में जो इनका ही एक ठिकाना था अनिल ने आते ही दाल को बनाया और बल्ली ने टिक्कर के लिए आटे और बेसन को मिलाकर उसमें थोडा पालक का इस्तेमाल किया और अच्छे से गूंथकर लगा दिया जिसके बाद ये दोनों इस खाट पर आ गये जहां बल्ली के साथ रहने वालों ने ही इनके लिए दाल और गरम गरम टिक्कर लाने का जिम्मा उठाया।
"अच्छा बल्ली नीमच से क्या पता चला उस्मानी का ?".......अनिल ने याद दिलाते हुए कहा।
बल्ली -"सारा कच्छा चिठ्ठा मंगा लिया है भाई जैसे जैसे फाइल खुलती गई उसको मारने की इच्छा तीव्र होती गई"
अनिल -"ऐसी इच्छा दबानी भी नहीं चाहिए बता कब निकालना है इसका जनाजा "
बल्ली -"जितना मैं जानता हूं अब तक उसको पता चल गया होगा की उसकी कुंडली कोई निकाल रहा है और मेरा अंदाजा कहता है की उसको हमारा नाम भी पता चल ही गया होगा।"
अनिल -"पुलिस की नौकरी छोडे तीन साल हो गये पर तेरा ये दिमाग अभी भी वही IPS वाला है भाई हाहाहा .....तो जब पत चल ही गया है फिर मुहूर्त निकला भी ठीक नहीं कर देते हैं तैयारियां उसके जनाजे की "
बल्ली -"इतना क्या घबराना भाई जाएगा कहां इस देश में कहीं भी हो पकड ही लेंगे तू आराम से खाना खा .......
Nice and superb update....Update 42
जहां एक तरफ इकरा इफ्तिका को छेड रही थी वहीं दूसरी ओर मयंक और राजीव ने जबसे दद्दा का सच जानकर वह समझ नहीं पख रहे थे की दद्दा और बलवीर का एक साथ आना उनको कितना नुक्सान पहुंचा सकता था क्योंकि दुश्मन को पूरी तरह साफ करना बहुत आसान था।
पर यहां दद्दा के साथ ये नहीं था वो एक गलत फहमी का शिकार था तो उनको बचाते हुए बलवीर को खत्म करना था और साथ साथ ही उस आदमी का भी पता लगाना था जिसने सबको उपयोग किया।
और पता चलना काफी नहीं था उसको खत्म करना भी उतना ही जरूरी था जितना गेहूं में लगते घुन को खत्म करना होता है।
अनिल से बात करते हुए लगभग शाम के सात बज चुके थे। इसलिए उसने घर के लिए निकलना ठीक समझा और ठीक बीस मिनट बाद वह घर था । घर आकर कपड़े बदले पर तब ही उसका फोन बजा और स्क्रीन पर दिखते नाम को देखकर उसने एक लंबी आह्हह भरी और फिर हरा बटन दबाते हुए फोन कान से लगा लिया।
मयंक ने फोन तो कान से लगा लिया था पर दोनों तरफ से ही कोई आवाज नहीं आई सिर्फ एक दूसरे की सांसो की आवाज कानों में जा रही थी पर तब ही ......
"ह्ह है ...हैलो म ... मयंक"....... साक्षी ने झिझकते हुए बात शुरू की।
मयंक -"हैलो साक्षी क्या कर रही हो ?"
साक्षी -"कुछ नहीं.....पता नहीं क्यूं तुम्हें फोन लगाते हुए इतना अजीब क्यूं लग रहा है"
मयंक -"इसमें अजीब क्या है साक्षी??......हम इतने भी नये दोस्त नहीं है की तुम मुझसे बात करने में झिझक महसूस करो "
साक्षी -"तुमने ठीक कहा मयंक पर......."
इतना कहते ही एक बार फिर दोनों तरफ शांति छा गई..... मयंक ने साक्षी को जब दोस्त कहा तो साक्षी का तो जैसे दिल ही टूट गया था पर शुकून इस बात का था की अभी मयंक ने ना नहीं कहा था उसके प्यार को और मयंक की चुप्पी इस बात का सबूत थी की वह अभी उस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है.......थोडी देर चुप्पी रहने के बात फोन साक्षी की तरफ से कट चुका था। मयंक ने फोन को छोटे सोफे पर फेंका और खुद बगल से ही बडे वाले सोफे पर पसर गया ।
**************
"हैलो काका "....... मयंक ने ग्वालियर वाली कोठी का ध्यान रखने वाले काका को फोन लगाया था ये वही थे जो रीत और जानवी की सोसाइटी के गेट पर सिक्योरिटी का काम करते थे ।
काका -"हैलो बेटा .... कैसे हो"
मयंक -"मैं ठीक हूं काका और रीत और जानवी कैसी हैं ?"
काका -"दोनों ठीक है बेटा वो मेरी जिम्मेदारी है तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है"
"तब ही तो मैं निश्चिंत हूं काका मुझे पता है दो चार को तो आप अकेले ही पछीट सकते हो "....... मयंक ने हस्ते हुए कहा।
काका -"हाहहाहा ठीक कह रहा है"
मयंक -"अच्छा काका एक बात पूछनी थी "
काका -"हां पूछो बेटा "
मयंक -"काका आपने कभी दद्दा का नाम सुना है आपने ?"
जैसे ही मयंक ने दद्दा से ये सवाल किया तो एक पल के लिए खामोशी छा गई फोन पर फिर मयंक ने एक बार और पुकारा तब काका ने कहा।
काका -"बेटा ये नाम तुम्हें कैसे पता चला ?"
मयंक -"इस नाम के व्यक्ति ने मुझपे हमला किया है काका "
काका -"अच्छा !! ......ये तुम्हारे बापू के एक पुराने दोस्त हैं जो अब विष्णु का सबसे बडा दुश्मन भी है"
मयंक -"काका और क्या जानते हैं आप इनके बारे में और ऐसा क्या हुआ जो इन दोनों की दोस्ती टूट गई और दोनों में इतनी बडी दरार आ गई?"
काका -"बेटा ये बहुत लंबी कहानी है पर अब इतना ही जान लो तुम जितना इससे दूर रहोगे उतना ही अच्छा है वो दिन आज भी याद आता है तो अंदर से दिल दहल जाता है उसी हादसे में मैंने अपने बेटे और छोटू के बाप को खोया था "
मयंक -"ये बात आपने आज तक क्यूं नहीं बताई काका और मैं भी तो आपका बेटा ही हूं तो कभी ये मत कहना की आपका बेटा नहीं है "
काका -"मुझ नौकर की क्या बिसात है बेटा ये तो तू और विष्णु बाप है जो मुझे इतना सम्मान और प्यार देते हो "
मयंक -"काका किसी कुछ भी कोई देता नहीं जो उसको मिलता है वो उसके अपने कर्मों का ही नतीजा होता है....काका मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता पर अभी ये जानना बहुत जरूरी है की हुआ क्या था उस दिन"
काका -"मुझे पूरा तो नहीं पता बेटा और जिन्हें पूरा पति है वो सब मर चुके हैं दो के अलावा और वो दो नाम हैं दद्दा और विष्णु.... मैं सिर्फ इतना जानता हूं की दद्दा की एक बेटी थी वो दद्दा से अलग हो गई और इसका जिम्मेदार वह आज भी विष्णु को मानता है बाकी पूरा परिवार तो उस मंदिर में मृत पाया गया सबने देखा पर वह बच्ची ना तो जिंदा मिली और ना ही मुर्दा "
मयंक -"हम्मम बहुत ही बडी पहली मालुम पड़ती है काका आपने बताया मंदिर में लाश पाई गई थी उस मंदिर के बारे में बता सकते हो कुछ "
काका -"उस मंदिर में मेरे हिसाब से उस दिन के बाद कोई गया नहीं बस उस मंदिर के पुजारी का परिवार ही रहता है और उसकी देखभाल करणा है अब तो उस रास्ते पर भी जंगल है जहां से हम जाया करते थे हर साल बहुत बडा उत्सव हुआ करता था तेरे, दद्दा और अनिल के परिवार ही हर साल उस उत्सव को आयोजित करते थे।"
इसके बाद मयंक ने उस मंदिर का पता लिया और पता चला की वह मंदिर पहाडगड नामक एक गांव में है। जो मयंक के गांव और ग्वालियर के बीच में मिलता है।
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"क्या करूं मैं मेरे माल तो छोडो मिला नहीं और अपनी तरफ से पैसा और आदमी दोनों का नुक़सान हुआ वो अलग ".......ये सैफ उस्मानी ही था जो एक व्यक्ति के सामने बैठा हुआ अपना दुख बता रहा था और हाथ में में उसके शराब का एक ग्लास था।
"बिना जाने पहचाने कुछ करोगे तो यही होगा ना देखना तो चाहिए था की किस्से भिड़ने जा रहे हो अब तुम्हारी इस ग्लती की वजह से बल्ली हमारे पीछे और तुम शायद उसे जानते नहीं हो वो इतनी आसानी से पीछा छोडता नहीं है किसी का ".......इस शख्स ने हाथ में पडा जाम घुमाते हुए कहा जैसे उसमें पडी बर्फ पिघलाना चाहता हो।
"इंस्पेक्टर कुछ कर यार मुझे इस मुश्किल से निकाल"......इस इंस्पेक्टर की बात सुनकर उस्मानी कितना घबरा रहा था वो उसकी आवाज साफ बयान कर रही थी ।
"आज तेरी जितनी फाइल बंद पडी है सब की काॅपी पहुंच गई है उसके पास और ऐसा करने का आदेश सीधे Ig से आया था "...... इंस्पेक्टर ने एक सांस में वह जाम ख़त्म करते हुए कहा ।
"कल तू DSP बनने वाला है और इसमें मेरा कितना हाथ है तू अच्छे से जानता है पाटिल कुछ जुगाड लगा "...... उस्मानी ने जैसे अपनी आखरी कोशिश करते हुए कहा।
पाटिल -"बस एक ही तरीका है गायब होजा और दिखना मत चाहे जो हो जाए लंदन में तेरी पहचान है ना बस वहीं निकल और जब तक सब सही ना हो दिखना मत "
उस्मानी -"इससे मेरी इज्जत का क्या होगा साले कुछ नहीं बचेगा मेरा रसूक सब खत्म हो जाएगा "
पाटिल -"तू समझ नहीं रहा मेरे भाई इज्जत और रसूक इंसानो का होता है मुर्दों का नहीं "
और इस वाक्य ने जैसे उस्मानी को बता दिया था अब उसके पास कोई चारा नहीं था ..... यहां ये लोग जिसके बारे में बात कर रहे थे वो तो खुद महफ़िल सजाए अपने यार के साथ बैठा था।
"कैसा बना है खाना बल्ली "........ अनिल ने दूसरी बार दाल बल्ली को परोसते हुए पूछा।
"तेरे हाथ की दाल का कोई मुकाबला नहीं यारा मजा आ गया ये बनाने की रेसिपी किसी डाबे वाले को बेच खूब पैसा देगा "...... बल्ली ने खाना खाते हुए कहा।
"कुछ अलग थोडी डालता हूं भाई बस सब सही मात्रा में हो मटर का इस्तेमाल और तडका लगाओ मट्टी के दिए से ये सब इसका स्वाद को दुगुना कर देता है "........ अनिल ने भी निवाला तोड़ते हुए कहा।
ये दोनों अकेले नहीं थे इस जगह बल्ली के यहां काम करने वाले जितने भी लोग थे सब मौजूद थे इस वक्त इस खाली प्लाट में जो इनका ही एक ठिकाना था अनिल ने आते ही दाल को बनाया और बल्ली ने टिक्कर के लिए आटे और बेसन को मिलाकर उसमें थोडा पालक का इस्तेमाल किया और अच्छे से गूंथकर लगा दिया जिसके बाद ये दोनों इस खाट पर आ गये जहां बल्ली के साथ रहने वालों ने ही इनके लिए दाल और गरम गरम टिक्कर लाने का जिम्मा उठाया।
"अच्छा बल्ली नीमच से क्या पता चला उस्मानी का ?".......अनिल ने याद दिलाते हुए कहा।
बल्ली -"सारा कच्छा चिठ्ठा मंगा लिया है भाई जैसे जैसे फाइल खुलती गई उसको मारने की इच्छा तीव्र होती गई"
अनिल -"ऐसी इच्छा दबानी भी नहीं चाहिए बता कब निकालना है इसका जनाजा "
बल्ली -"जितना मैं जानता हूं अब तक उसको पता चल गया होगा की उसकी कुंडली कोई निकाल रहा है और मेरा अंदाजा कहता है की उसको हमारा नाम भी पता चल ही गया होगा।"
अनिल -"पुलिस की नौकरी छोडे तीन साल हो गये पर तेरा ये दिमाग अभी भी वही IPS वाला है भाई हाहाहा .....तो जब पत चल ही गया है फिर मुहूर्त निकला भी ठीक नहीं कर देते हैं तैयारियां उसके जनाजे की "
बल्ली -"इतना क्या घबराना भाई जाएगा कहां इस देश में कहीं भी हो पकड ही लेंगे तू आराम से खाना खा .......
Nice update....Update 42
जहां एक तरफ इकरा इफ्तिका को छेड रही थी वहीं दूसरी ओर मयंक और राजीव ने जबसे दद्दा का सच जानकर वह समझ नहीं पख रहे थे की दद्दा और बलवीर का एक साथ आना उनको कितना नुक्सान पहुंचा सकता था क्योंकि दुश्मन को पूरी तरह साफ करना बहुत आसान था।
पर यहां दद्दा के साथ ये नहीं था वो एक गलत फहमी का शिकार था तो उनको बचाते हुए बलवीर को खत्म करना था और साथ साथ ही उस आदमी का भी पता लगाना था जिसने सबको उपयोग किया।
और पता चलना काफी नहीं था उसको खत्म करना भी उतना ही जरूरी था जितना गेहूं में लगते घुन को खत्म करना होता है।
अनिल से बात करते हुए लगभग शाम के सात बज चुके थे। इसलिए उसने घर के लिए निकलना ठीक समझा और ठीक बीस मिनट बाद वह घर था । घर आकर कपड़े बदले पर तब ही उसका फोन बजा और स्क्रीन पर दिखते नाम को देखकर उसने एक लंबी आह्हह भरी और फिर हरा बटन दबाते हुए फोन कान से लगा लिया।
मयंक ने फोन तो कान से लगा लिया था पर दोनों तरफ से ही कोई आवाज नहीं आई सिर्फ एक दूसरे की सांसो की आवाज कानों में जा रही थी पर तब ही ......
"ह्ह है ...हैलो म ... मयंक"....... साक्षी ने झिझकते हुए बात शुरू की।
मयंक -"हैलो साक्षी क्या कर रही हो ?"
साक्षी -"कुछ नहीं.....पता नहीं क्यूं तुम्हें फोन लगाते हुए इतना अजीब क्यूं लग रहा है"
मयंक -"इसमें अजीब क्या है साक्षी??......हम इतने भी नये दोस्त नहीं है की तुम मुझसे बात करने में झिझक महसूस करो "
साक्षी -"तुमने ठीक कहा मयंक पर......."
इतना कहते ही एक बार फिर दोनों तरफ शांति छा गई..... मयंक ने साक्षी को जब दोस्त कहा तो साक्षी का तो जैसे दिल ही टूट गया था पर शुकून इस बात का था की अभी मयंक ने ना नहीं कहा था उसके प्यार को और मयंक की चुप्पी इस बात का सबूत थी की वह अभी उस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है.......थोडी देर चुप्पी रहने के बात फोन साक्षी की तरफ से कट चुका था। मयंक ने फोन को छोटे सोफे पर फेंका और खुद बगल से ही बडे वाले सोफे पर पसर गया ।
**************
"हैलो काका "....... मयंक ने ग्वालियर वाली कोठी का ध्यान रखने वाले काका को फोन लगाया था ये वही थे जो रीत और जानवी की सोसाइटी के गेट पर सिक्योरिटी का काम करते थे ।
काका -"हैलो बेटा .... कैसे हो"
मयंक -"मैं ठीक हूं काका और रीत और जानवी कैसी हैं ?"
काका -"दोनों ठीक है बेटा वो मेरी जिम्मेदारी है तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है"
"तब ही तो मैं निश्चिंत हूं काका मुझे पता है दो चार को तो आप अकेले ही पछीट सकते हो "....... मयंक ने हस्ते हुए कहा।
काका -"हाहहाहा ठीक कह रहा है"
मयंक -"अच्छा काका एक बात पूछनी थी "
काका -"हां पूछो बेटा "
मयंक -"काका आपने कभी दद्दा का नाम सुना है आपने ?"
जैसे ही मयंक ने दद्दा से ये सवाल किया तो एक पल के लिए खामोशी छा गई फोन पर फिर मयंक ने एक बार और पुकारा तब काका ने कहा।
काका -"बेटा ये नाम तुम्हें कैसे पता चला ?"
मयंक -"इस नाम के व्यक्ति ने मुझपे हमला किया है काका "
काका -"अच्छा !! ......ये तुम्हारे बापू के एक पुराने दोस्त हैं जो अब विष्णु का सबसे बडा दुश्मन भी है"
मयंक -"काका और क्या जानते हैं आप इनके बारे में और ऐसा क्या हुआ जो इन दोनों की दोस्ती टूट गई और दोनों में इतनी बडी दरार आ गई?"
काका -"बेटा ये बहुत लंबी कहानी है पर अब इतना ही जान लो तुम जितना इससे दूर रहोगे उतना ही अच्छा है वो दिन आज भी याद आता है तो अंदर से दिल दहल जाता है उसी हादसे में मैंने अपने बेटे और छोटू के बाप को खोया था "
मयंक -"ये बात आपने आज तक क्यूं नहीं बताई काका और मैं भी तो आपका बेटा ही हूं तो कभी ये मत कहना की आपका बेटा नहीं है "
काका -"मुझ नौकर की क्या बिसात है बेटा ये तो तू और विष्णु बाप है जो मुझे इतना सम्मान और प्यार देते हो "
मयंक -"काका किसी कुछ भी कोई देता नहीं जो उसको मिलता है वो उसके अपने कर्मों का ही नतीजा होता है....काका मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता पर अभी ये जानना बहुत जरूरी है की हुआ क्या था उस दिन"
काका -"मुझे पूरा तो नहीं पता बेटा और जिन्हें पूरा पति है वो सब मर चुके हैं दो के अलावा और वो दो नाम हैं दद्दा और विष्णु.... मैं सिर्फ इतना जानता हूं की दद्दा की एक बेटी थी वो दद्दा से अलग हो गई और इसका जिम्मेदार वह आज भी विष्णु को मानता है बाकी पूरा परिवार तो उस मंदिर में मृत पाया गया सबने देखा पर वह बच्ची ना तो जिंदा मिली और ना ही मुर्दा "
मयंक -"हम्मम बहुत ही बडी पहली मालुम पड़ती है काका आपने बताया मंदिर में लाश पाई गई थी उस मंदिर के बारे में बता सकते हो कुछ "
काका -"उस मंदिर में मेरे हिसाब से उस दिन के बाद कोई गया नहीं बस उस मंदिर के पुजारी का परिवार ही रहता है और उसकी देखभाल करणा है अब तो उस रास्ते पर भी जंगल है जहां से हम जाया करते थे हर साल बहुत बडा उत्सव हुआ करता था तेरे, दद्दा और अनिल के परिवार ही हर साल उस उत्सव को आयोजित करते थे।"
इसके बाद मयंक ने उस मंदिर का पता लिया और पता चला की वह मंदिर पहाडगड नामक एक गांव में है। जो मयंक के गांव और ग्वालियर के बीच में मिलता है।
*********
"क्या करूं मैं मेरे माल तो छोडो मिला नहीं और अपनी तरफ से पैसा और आदमी दोनों का नुक़सान हुआ वो अलग ".......ये सैफ उस्मानी ही था जो एक व्यक्ति के सामने बैठा हुआ अपना दुख बता रहा था और हाथ में में उसके शराब का एक ग्लास था।
"बिना जाने पहचाने कुछ करोगे तो यही होगा ना देखना तो चाहिए था की किस्से भिड़ने जा रहे हो अब तुम्हारी इस ग्लती की वजह से बल्ली हमारे पीछे और तुम शायद उसे जानते नहीं हो वो इतनी आसानी से पीछा छोडता नहीं है किसी का ".......इस शख्स ने हाथ में पडा जाम घुमाते हुए कहा जैसे उसमें पडी बर्फ पिघलाना चाहता हो।
"इंस्पेक्टर कुछ कर यार मुझे इस मुश्किल से निकाल"......इस इंस्पेक्टर की बात सुनकर उस्मानी कितना घबरा रहा था वो उसकी आवाज साफ बयान कर रही थी ।
"आज तेरी जितनी फाइल बंद पडी है सब की काॅपी पहुंच गई है उसके पास और ऐसा करने का आदेश सीधे Ig से आया था "...... इंस्पेक्टर ने एक सांस में वह जाम ख़त्म करते हुए कहा ।
"कल तू DSP बनने वाला है और इसमें मेरा कितना हाथ है तू अच्छे से जानता है पाटिल कुछ जुगाड लगा "...... उस्मानी ने जैसे अपनी आखरी कोशिश करते हुए कहा।
पाटिल -"बस एक ही तरीका है गायब होजा और दिखना मत चाहे जो हो जाए लंदन में तेरी पहचान है ना बस वहीं निकल और जब तक सब सही ना हो दिखना मत "
उस्मानी -"इससे मेरी इज्जत का क्या होगा साले कुछ नहीं बचेगा मेरा रसूक सब खत्म हो जाएगा "
पाटिल -"तू समझ नहीं रहा मेरे भाई इज्जत और रसूक इंसानो का होता है मुर्दों का नहीं "
और इस वाक्य ने जैसे उस्मानी को बता दिया था अब उसके पास कोई चारा नहीं था ..... यहां ये लोग जिसके बारे में बात कर रहे थे वो तो खुद महफ़िल सजाए अपने यार के साथ बैठा था।
"कैसा बना है खाना बल्ली "........ अनिल ने दूसरी बार दाल बल्ली को परोसते हुए पूछा।
"तेरे हाथ की दाल का कोई मुकाबला नहीं यारा मजा आ गया ये बनाने की रेसिपी किसी डाबे वाले को बेच खूब पैसा देगा "...... बल्ली ने खाना खाते हुए कहा।
"कुछ अलग थोडी डालता हूं भाई बस सब सही मात्रा में हो मटर का इस्तेमाल और तडका लगाओ मट्टी के दिए से ये सब इसका स्वाद को दुगुना कर देता है "........ अनिल ने भी निवाला तोड़ते हुए कहा।
ये दोनों अकेले नहीं थे इस जगह बल्ली के यहां काम करने वाले जितने भी लोग थे सब मौजूद थे इस वक्त इस खाली प्लाट में जो इनका ही एक ठिकाना था अनिल ने आते ही दाल को बनाया और बल्ली ने टिक्कर के लिए आटे और बेसन को मिलाकर उसमें थोडा पालक का इस्तेमाल किया और अच्छे से गूंथकर लगा दिया जिसके बाद ये दोनों इस खाट पर आ गये जहां बल्ली के साथ रहने वालों ने ही इनके लिए दाल और गरम गरम टिक्कर लाने का जिम्मा उठाया।
"अच्छा बल्ली नीमच से क्या पता चला उस्मानी का ?".......अनिल ने याद दिलाते हुए कहा।
बल्ली -"सारा कच्छा चिठ्ठा मंगा लिया है भाई जैसे जैसे फाइल खुलती गई उसको मारने की इच्छा तीव्र होती गई"
अनिल -"ऐसी इच्छा दबानी भी नहीं चाहिए बता कब निकालना है इसका जनाजा "
बल्ली -"जितना मैं जानता हूं अब तक उसको पता चल गया होगा की उसकी कुंडली कोई निकाल रहा है और मेरा अंदाजा कहता है की उसको हमारा नाम भी पता चल ही गया होगा।"
अनिल -"पुलिस की नौकरी छोडे तीन साल हो गये पर तेरा ये दिमाग अभी भी वही IPS वाला है भाई हाहाहा .....तो जब पत चल ही गया है फिर मुहूर्त निकला भी ठीक नहीं कर देते हैं तैयारियां उसके जनाजे की "
बल्ली -"इतना क्या घबराना भाई जाएगा कहां इस देश में कहीं भी हो पकड ही लेंगे तू आराम से खाना खा .......
Update 42
जहां एक तरफ इकरा इफ्तिका को छेड रही थी वहीं दूसरी ओर मयंक और राजीव ने जबसे दद्दा का सच जानकर वह समझ नहीं पख रहे थे की दद्दा और बलवीर का एक साथ आना उनको कितना नुक्सान पहुंचा सकता था क्योंकि दुश्मन को पूरी तरह साफ करना बहुत आसान था।
पर यहां दद्दा के साथ ये नहीं था वो एक गलत फहमी का शिकार था तो उनको बचाते हुए बलवीर को खत्म करना था और साथ साथ ही उस आदमी का भी पता लगाना था जिसने सबको उपयोग किया।
और पता चलना काफी नहीं था उसको खत्म करना भी उतना ही जरूरी था जितना गेहूं में लगते घुन को खत्म करना होता है।
अनिल से बात करते हुए लगभग शाम के सात बज चुके थे। इसलिए उसने घर के लिए निकलना ठीक समझा और ठीक बीस मिनट बाद वह घर था । घर आकर कपड़े बदले पर तब ही उसका फोन बजा और स्क्रीन पर दिखते नाम को देखकर उसने एक लंबी आह्हह भरी और फिर हरा बटन दबाते हुए फोन कान से लगा लिया।
मयंक ने फोन तो कान से लगा लिया था पर दोनों तरफ से ही कोई आवाज नहीं आई सिर्फ एक दूसरे की सांसो की आवाज कानों में जा रही थी पर तब ही ......
"ह्ह है ...हैलो म ... मयंक"....... साक्षी ने झिझकते हुए बात शुरू की।
मयंक -"हैलो साक्षी क्या कर रही हो ?"
साक्षी -"कुछ नहीं.....पता नहीं क्यूं तुम्हें फोन लगाते हुए इतना अजीब क्यूं लग रहा है"
मयंक -"इसमें अजीब क्या है साक्षी??......हम इतने भी नये दोस्त नहीं है की तुम मुझसे बात करने में झिझक महसूस करो "
साक्षी -"तुमने ठीक कहा मयंक पर......."
इतना कहते ही एक बार फिर दोनों तरफ शांति छा गई..... मयंक ने साक्षी को जब दोस्त कहा तो साक्षी का तो जैसे दिल ही टूट गया था पर शुकून इस बात का था की अभी मयंक ने ना नहीं कहा था उसके प्यार को और मयंक की चुप्पी इस बात का सबूत थी की वह अभी उस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है.......थोडी देर चुप्पी रहने के बात फोन साक्षी की तरफ से कट चुका था। मयंक ने फोन को छोटे सोफे पर फेंका और खुद बगल से ही बडे वाले सोफे पर पसर गया ।
**************
"हैलो काका "....... मयंक ने ग्वालियर वाली कोठी का ध्यान रखने वाले काका को फोन लगाया था ये वही थे जो रीत और जानवी की सोसाइटी के गेट पर सिक्योरिटी का काम करते थे ।
काका -"हैलो बेटा .... कैसे हो"
मयंक -"मैं ठीक हूं काका और रीत और जानवी कैसी हैं ?"
काका -"दोनों ठीक है बेटा वो मेरी जिम्मेदारी है तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है"
"तब ही तो मैं निश्चिंत हूं काका मुझे पता है दो चार को तो आप अकेले ही पछीट सकते हो "....... मयंक ने हस्ते हुए कहा।
काका -"हाहहाहा ठीक कह रहा है"
मयंक -"अच्छा काका एक बात पूछनी थी "
काका -"हां पूछो बेटा "
मयंक -"काका आपने कभी दद्दा का नाम सुना है आपने ?"
जैसे ही मयंक ने दद्दा से ये सवाल किया तो एक पल के लिए खामोशी छा गई फोन पर फिर मयंक ने एक बार और पुकारा तब काका ने कहा।
काका -"बेटा ये नाम तुम्हें कैसे पता चला ?"
मयंक -"इस नाम के व्यक्ति ने मुझपे हमला किया है काका "
काका -"अच्छा !! ......ये तुम्हारे बापू के एक पुराने दोस्त हैं जो अब विष्णु का सबसे बडा दुश्मन भी है"
मयंक -"काका और क्या जानते हैं आप इनके बारे में और ऐसा क्या हुआ जो इन दोनों की दोस्ती टूट गई और दोनों में इतनी बडी दरार आ गई?"
काका -"बेटा ये बहुत लंबी कहानी है पर अब इतना ही जान लो तुम जितना इससे दूर रहोगे उतना ही अच्छा है वो दिन आज भी याद आता है तो अंदर से दिल दहल जाता है उसी हादसे में मैंने अपने बेटे और छोटू के बाप को खोया था "
मयंक -"ये बात आपने आज तक क्यूं नहीं बताई काका और मैं भी तो आपका बेटा ही हूं तो कभी ये मत कहना की आपका बेटा नहीं है "
काका -"मुझ नौकर की क्या बिसात है बेटा ये तो तू और विष्णु बाप है जो मुझे इतना सम्मान और प्यार देते हो "
मयंक -"काका किसी कुछ भी कोई देता नहीं जो उसको मिलता है वो उसके अपने कर्मों का ही नतीजा होता है....काका मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता पर अभी ये जानना बहुत जरूरी है की हुआ क्या था उस दिन"
काका -"मुझे पूरा तो नहीं पता बेटा और जिन्हें पूरा पति है वो सब मर चुके हैं दो के अलावा और वो दो नाम हैं दद्दा और विष्णु.... मैं सिर्फ इतना जानता हूं की दद्दा की एक बेटी थी वो दद्दा से अलग हो गई और इसका जिम्मेदार वह आज भी विष्णु को मानता है बाकी पूरा परिवार तो उस मंदिर में मृत पाया गया सबने देखा पर वह बच्ची ना तो जिंदा मिली और ना ही मुर्दा "
मयंक -"हम्मम बहुत ही बडी पहली मालुम पड़ती है काका आपने बताया मंदिर में लाश पाई गई थी उस मंदिर के बारे में बता सकते हो कुछ "
काका -"उस मंदिर में मेरे हिसाब से उस दिन के बाद कोई गया नहीं बस उस मंदिर के पुजारी का परिवार ही रहता है और उसकी देखभाल करणा है अब तो उस रास्ते पर भी जंगल है जहां से हम जाया करते थे हर साल बहुत बडा उत्सव हुआ करता था तेरे, दद्दा और अनिल के परिवार ही हर साल उस उत्सव को आयोजित करते थे।"
इसके बाद मयंक ने उस मंदिर का पता लिया और पता चला की वह मंदिर पहाडगड नामक एक गांव में है। जो मयंक के गांव और ग्वालियर के बीच में मिलता है।
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"क्या करूं मैं मेरे माल तो छोडो मिला नहीं और अपनी तरफ से पैसा और आदमी दोनों का नुक़सान हुआ वो अलग ".......ये सैफ उस्मानी ही था जो एक व्यक्ति के सामने बैठा हुआ अपना दुख बता रहा था और हाथ में में उसके शराब का एक ग्लास था।
"बिना जाने पहचाने कुछ करोगे तो यही होगा ना देखना तो चाहिए था की किस्से भिड़ने जा रहे हो अब तुम्हारी इस ग्लती की वजह से बल्ली हमारे पीछे और तुम शायद उसे जानते नहीं हो वो इतनी आसानी से पीछा छोडता नहीं है किसी का ".......इस शख्स ने हाथ में पडा जाम घुमाते हुए कहा जैसे उसमें पडी बर्फ पिघलाना चाहता हो।
"इंस्पेक्टर कुछ कर यार मुझे इस मुश्किल से निकाल"......इस इंस्पेक्टर की बात सुनकर उस्मानी कितना घबरा रहा था वो उसकी आवाज साफ बयान कर रही थी ।
"आज तेरी जितनी फाइल बंद पडी है सब की काॅपी पहुंच गई है उसके पास और ऐसा करने का आदेश सीधे Ig से आया था "...... इंस्पेक्टर ने एक सांस में वह जाम ख़त्म करते हुए कहा ।
"कल तू DSP बनने वाला है और इसमें मेरा कितना हाथ है तू अच्छे से जानता है पाटिल कुछ जुगाड लगा "...... उस्मानी ने जैसे अपनी आखरी कोशिश करते हुए कहा।
पाटिल -"बस एक ही तरीका है गायब होजा और दिखना मत चाहे जो हो जाए लंदन में तेरी पहचान है ना बस वहीं निकल और जब तक सब सही ना हो दिखना मत "
उस्मानी -"इससे मेरी इज्जत का क्या होगा साले कुछ नहीं बचेगा मेरा रसूक सब खत्म हो जाएगा "
पाटिल -"तू समझ नहीं रहा मेरे भाई इज्जत और रसूक इंसानो का होता है मुर्दों का नहीं "
और इस वाक्य ने जैसे उस्मानी को बता दिया था अब उसके पास कोई चारा नहीं था ..... यहां ये लोग जिसके बारे में बात कर रहे थे वो तो खुद महफ़िल सजाए अपने यार के साथ बैठा था।
"कैसा बना है खाना बल्ली "........ अनिल ने दूसरी बार दाल बल्ली को परोसते हुए पूछा।
"तेरे हाथ की दाल का कोई मुकाबला नहीं यारा मजा आ गया ये बनाने की रेसिपी किसी डाबे वाले को बेच खूब पैसा देगा "...... बल्ली ने खाना खाते हुए कहा।
"कुछ अलग थोडी डालता हूं भाई बस सब सही मात्रा में हो मटर का इस्तेमाल और तडका लगाओ मट्टी के दिए से ये सब इसका स्वाद को दुगुना कर देता है "........ अनिल ने भी निवाला तोड़ते हुए कहा।
ये दोनों अकेले नहीं थे इस जगह बल्ली के यहां काम करने वाले जितने भी लोग थे सब मौजूद थे इस वक्त इस खाली प्लाट में जो इनका ही एक ठिकाना था अनिल ने आते ही दाल को बनाया और बल्ली ने टिक्कर के लिए आटे और बेसन को मिलाकर उसमें थोडा पालक का इस्तेमाल किया और अच्छे से गूंथकर लगा दिया जिसके बाद ये दोनों इस खाट पर आ गये जहां बल्ली के साथ रहने वालों ने ही इनके लिए दाल और गरम गरम टिक्कर लाने का जिम्मा उठाया।
"अच्छा बल्ली नीमच से क्या पता चला उस्मानी का ?".......अनिल ने याद दिलाते हुए कहा।
बल्ली -"सारा कच्छा चिठ्ठा मंगा लिया है भाई जैसे जैसे फाइल खुलती गई उसको मारने की इच्छा तीव्र होती गई"
अनिल -"ऐसी इच्छा दबानी भी नहीं चाहिए बता कब निकालना है इसका जनाजा "
बल्ली -"जितना मैं जानता हूं अब तक उसको पता चल गया होगा की उसकी कुंडली कोई निकाल रहा है और मेरा अंदाजा कहता है की उसको हमारा नाम भी पता चल ही गया होगा।"
अनिल -"पुलिस की नौकरी छोडे तीन साल हो गये पर तेरा ये दिमाग अभी भी वही IPS वाला है भाई हाहाहा .....तो जब पत चल ही गया है फिर मुहूर्त निकला भी ठीक नहीं कर देते हैं तैयारियां उसके जनाजे की "
बल्ली -"इतना क्या घबराना भाई जाएगा कहां इस देश में कहीं भी हो पकड ही लेंगे तू आराम से खाना खा .......
बहुत ही शानदार और लाज़वाब अपडेट हैUpdate no - 41
इफ्तिका खाना खाने के बाद अपने घर की तरफ चली गई थी और साथ ही अगले दिन खाने का न्यौता भी मयंक को देती गई। इफ्तिका के जाते ही मयंक फिर एक बार घर में अकेला था और उसे एक बार फिर रीत की याद और शब्दों ने घेरना शुरू किया ही था की तब ही फोन जोर से बजने लगा।
"हैलो"......... मैंने बिना देखे ही फोन का हरा बटन दबाते हुए बात शुरू की।
"हैलो छोड और घर आजा पापा आ गये "......... दूसरी ओर से राजीव की आवाज आई जैसा मैंने उससे बोला था की चाचा के आते ही मुझे बता दे आखिर इस दद्दा की बात जो करनी थी ।
मैने उस अपने आने का बताते हुए तुरंत फोन काटा और अपनी बाइक गैराज से बहार निकालते हुए बढ गया राजीव की तरफ.....
"बोल बेटा क्या बात करनी थी तुझे मुझसे?"........ अनिल चाचा ने बहार गार्डन में लगी एक टेबल पर बैठते हुए कहा मैं और राजीव दोनों उनके ठीक सामने थे ।
मयंक -"बस चाचा एक नाम आया है सामने उसके बारे में जानना चाहता हूं "
"ऐसा कौन सा नाम है जो इतना परेशान कर रहा है की मेरे पास। गये ?"........चाचा ने हल्के से हस्ते हुए कहा।
मयंक -"उसका सही नाम तो नहीं मालूम पर सब दद्दा कहकर बुलाते हैं उन्हें अपने गांव के आस पास से ही है "
और मैं बहुत अच्छे से देख पा रहा था चाचा का वह चेहरा जो बहुत कम बार ही देखा था मैंने ज्यादातर मेरी या राजीव की फ़िक्र के लिए ही ऐसी चिंता उमडती थी चाचा के चेहरे पर।
मयंक -"मैं पहले ही कह देता हूं चाचा बात टालने या घुमाने की कोशिश ना करना क्योंकि पणा तो मैं लगा कर ही रहुंगा और इससे भी बडी बात ये है की ये नाम बलवीर के साथ क्यूं आया है?"
अनिल -"मैं खुद तुमसे कुछ छुपाने वाला नहीं था बेटे क्योंकि कुछ चीजें ऐसी होती है जिन को टाला जा सकता है मिटाया नहीं जा सकता "
मयंक -"ऐसे कभी किसी के लिए बात करते नहीं देखा है मैंने आपको चाचा "
अनिल -"जैसे मेरे लिए विष्णु है और विष्णु के लिए मैं ऐसे ही आज से बीस साल पहले तेरे पहले जन्मदिन तक दद्दा के लिए मैं और विष्णु थे और हम दोनों के लिए दद्दा "
मयंक -"क्या ?"
अनिल -"हां जिसे तुम दद्दा कहकर बुलाते हो उसका असली नाम है सोमनाथ शर्मा उर्फ दद्दा ...... मुझसे और विष्णु से दो साल बडा हमारा वो भाई और जो नाम दद्दा है वह भी हम दोनों की देन है "
मयंक -"पर जितना मैने आपके इस बड़े भाई को जाना है वह अब तो बिल्कुल भी आपके वो दद्दा नहीं है "
अनिल -"उस दिन सब बदल गया था बेटा बीस साल पहले जब तुम्हारे पहले जन्मदिन मनाया जाना था उसी दिन हम तीनों को जाने किसकी नजर लगी जो सोमनाथ दद्दा हमारे सामने बंदूक लिए खडा था ।"
मयंक -" ऐसा क्या हुआ था चाचा उस दिन और अब इतने साल बाद वो अब मुझे क्यूं पकडना चाहते हैं "
अनिल -"क्या ?!.....तुम पर हमला हुआ था?"
मयंक -"हां चाचा और जब उन आदमियों से सब उगल वाया मैंने तो बस इतना पता चला की वो लोग मुझे जिंदा पकडना चाहते थे बिना एक खरोंच लगे "
अनिल -"वो तुझे नहीं तेरे जरिए विष्णु तक पहुंचना चाहते हैं बेटा जितना मैं समझ पा रहा हूं .....और रही बात उस दिन क्या हुआ था तो मैं इतना जानता हूं मैं जब वहां पहुंचा तो दद्दा के पूरे परिवार की लाशें मंदिर में पडी हुई थी और दद्दा की तलवार विष्णु के गले पर थी और उनकी जीव पर सिर्फ एक ही बात थी "मेरी बेटी कहां है विष्णु" "
मयंक -"उनकी बेटी ?"
अनिल -"हम्म आज भी अपने परिवार की मौत का जिम्मेदार वो विष्णु को मानते हैं और मुझे गद्दार जो उस दिन उनको गोली मारकर विष्णु को बचा ले गया था "
मयंक -"तो इसका मतलब ये है की उनके परिवार में सिर्फ एक उनकी बेटी जिंदा है और वो भी उनसे दूर मतलब लापता हैं "
अनिल -"हां और यही वजह है की वो तुझे पकडना चाह रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता ही की तुझे पकड़ना आसान है और तेरे जरिए वो विष्णु को पकड सकते हैं और विष्णु मिला तो मैं भी उनके सामने पहुंच ही जाउंगा "
मयंक -"अच्छा चाचा एक बात बताओ आपने कभी पापा से नहीं पूछा उस दिन के बारे में आपके पहुंचने से पहले वहां क्या हुआ "
अनिल -"हिम्मत ही नहीं हुई कभी पत्थर जैसे विष्णु को दद्दा के लिए रोते देखा है .....या शायद दद्दा से भी ज्यादा उनके परिवार के लिए जो सही मायने में हमारे लिए हमारा परिवार था आज भी वो दृश्य उतना ही दर्द देता है जितना उस दिन देता था और मैं तो फिर भी विष्णु को बचाने वाला गद्दार था पर विष्णु.... विष्णु को तो दद्दा ने अपने परिवार को मारने का इल्ज़ाम दिया "
मयंक -"मतलब आप सब को एक योजना के तहत फसाया गया है चाचा और ये एक बहुत करीबी का ही काम है.......पता तो लगाना ही पड़ेगा आखिर असली दोषी था कौन जो आप तीनों को ऐसे अलग कर गया की चाहकर भी फिर एक ना हो सको और आप लोगों को मिला एक ही चीस सकती है वो है दद्दा की बेटी जो बीस साल से ला पता है.......
***********
इकरा -"अब कैसा है मयंक छोटी ?"
इफ्तिका -"खाना तो खा लिया था उन्होंने बस अकेले हैं घर पर "
इकरा -"सुबह जब मैंने उसे पार्क में देखा था तो उसकी हालत बहुत बुरी थी इका(इफ्तिका) जैसे कोई छोटा बच्चा रोता है तो काजल पूरे चेहरे पर फैल जाता है वैसे ही आंसू के निशान थे आंखों के नीचे और आंखें पूरी लाला जैसे उन आंसुओं को रोकने में पूरी जान लडाई हो ..... "
इफ्तिका -"ऐसी क्या वजह हो सकती है बाजी और जितना हम जान पाए हैं उन्हें तीन हफ्तों में वो ऐसे तो नहीं जो किसी बात पर रोए "
इकरा -"मैंने क्या कहा शायद तुमने ठीक है सुना नहीं छोटी वो रोया नहीं बस आंसू नहीं रोक पाया कभी कभी हमारा शरीर चाहकर भी उस दर्द को सहन नहीं कर पाता है जो हमें उपर वाला देता है और फिर क्या होता है?......हमारा शरीर की इंद्रियां भी हमारी नहीं सुनती "
इफ्तिका -"हम उनकी पूरी मदद करेंगे आखिर वो हमे समझते हैं और दोस्त भी मानते हैं आपको वो दिन याद है बाजी जब हम बिना किसी को बताए ही घर से निकल गये थे और बारिश होने लगी थी।"
इकरा -"कैसे याद नहीं होगा वो पहली गलती थी तुम्हारी इसलिए माफ किया था तुम्हें और तो और दादू भी नहीं थे उस दिन "
इफ्तिका -"उस दिन के लिए हम शर्मिंदा हैं बाजी ......जैसा आपने अभी बताया ना ठीक वैसा ही हुआ हमारे साथ अम्मी और बाबा की यादों में जाने कब दिल इतना भर आया हमारा की हमें पता ही नहीं चला कब हम घर से पैदल ही निकल गये और उस पार्क में जा बैठे पर तब ही पता नहीं कहां से वो आए और हमको अपना छाता दिया और हमने उनकी आंखों में देखा था बाजी कैसे आंखों से ही हमारा दर्द कम कर रहे थे कभी कभी इंसान को पस ये जानना होता है की कोई उसे समझता भी है या नहीं और ऐसा ही हम सोच रहे थे की तब ही मयंक जी ने महसूस कर वाया की हम अकेले नहीं हैं और किसी जादू गर जैसे जादू करके चुप चाप चले गये जैसे वो जानते हों की कभी कभी इंसान बस अकेला रहना चाहता है उससे ज्यादा कुछ नहीं "
इफ्तिका ने अपने दिल का हाल तो कह सुनाया लेकिन अब इकरा उसे बडी कुटिलता से घूर रही थी ....तो इफ्तिका से रहा नहीं गया।
इफ्तिका -"आप इस तरह ना देखे बाजी "
इकरा -"तुझे प्यार तो नहीं हो गया छोटी ?......लग तो ऐसा ही रहा है"
"नहीं... नहीं बाजी ऐसा कुछ नहीं है ".......... इफ्तिका ने हड़बड़ाते हुए कहा जैसे उसकी छोरी पकड ली हो।
इकरा -"अच्छा!....फिर हड़बड़ा क्यूं रही हो जैसे किसी ने तुम्हारी चोरी पकड ली हो और वो छत्री अभी तक मयंक को क्यूं नहीं लौटाई कहीं प्यार का पहला तौफा समझ कर तो नहीं रख ली ....... वैसे एक बात कहूं छोटी मयंक हैंडसम तो बहुत है बाॅडी देखी है उसकी"..
......इकरा ने इफ्तिका को छेड़ते हुए कहा।
इफ्तिका -"बाजी आप बहुत बेकार है जाइए हम आपसे बात नहीं करते......और वैसे भी आज पता है उन्होंने क्या कहा है मायने ये नहीं रखता की हम किसे चाहते हैं मायने ये रखता है की जिसे हम चाहते हैं क्या वो भी हमें चाहता है?"
इकरा -"तू क्यूं फ़िक्र करती है ऐसा कौन होगा जो तुझे पसंद नहीं करेगा मेरी बहन है ही इतनी प्यारी .......
बहुत ही शानदार और लाज़वाब अपडेट हैUpdate 42
जहां एक तरफ इकरा इफ्तिका को छेड रही थी वहीं दूसरी ओर मयंक और राजीव ने जबसे दद्दा का सच जानकर वह समझ नहीं पख रहे थे की दद्दा और बलवीर का एक साथ आना उनको कितना नुक्सान पहुंचा सकता था क्योंकि दुश्मन को पूरी तरह साफ करना बहुत आसान था।
पर यहां दद्दा के साथ ये नहीं था वो एक गलत फहमी का शिकार था तो उनको बचाते हुए बलवीर को खत्म करना था और साथ साथ ही उस आदमी का भी पता लगाना था जिसने सबको उपयोग किया।
और पता चलना काफी नहीं था उसको खत्म करना भी उतना ही जरूरी था जितना गेहूं में लगते घुन को खत्म करना होता है।
अनिल से बात करते हुए लगभग शाम के सात बज चुके थे। इसलिए उसने घर के लिए निकलना ठीक समझा और ठीक बीस मिनट बाद वह घर था । घर आकर कपड़े बदले पर तब ही उसका फोन बजा और स्क्रीन पर दिखते नाम को देखकर उसने एक लंबी आह्हह भरी और फिर हरा बटन दबाते हुए फोन कान से लगा लिया।
मयंक ने फोन तो कान से लगा लिया था पर दोनों तरफ से ही कोई आवाज नहीं आई सिर्फ एक दूसरे की सांसो की आवाज कानों में जा रही थी पर तब ही ......
"ह्ह है ...हैलो म ... मयंक"....... साक्षी ने झिझकते हुए बात शुरू की।
मयंक -"हैलो साक्षी क्या कर रही हो ?"
साक्षी -"कुछ नहीं.....पता नहीं क्यूं तुम्हें फोन लगाते हुए इतना अजीब क्यूं लग रहा है"
मयंक -"इसमें अजीब क्या है साक्षी??......हम इतने भी नये दोस्त नहीं है की तुम मुझसे बात करने में झिझक महसूस करो "
साक्षी -"तुमने ठीक कहा मयंक पर......."
इतना कहते ही एक बार फिर दोनों तरफ शांति छा गई..... मयंक ने साक्षी को जब दोस्त कहा तो साक्षी का तो जैसे दिल ही टूट गया था पर शुकून इस बात का था की अभी मयंक ने ना नहीं कहा था उसके प्यार को और मयंक की चुप्पी इस बात का सबूत थी की वह अभी उस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है.......थोडी देर चुप्पी रहने के बात फोन साक्षी की तरफ से कट चुका था। मयंक ने फोन को छोटे सोफे पर फेंका और खुद बगल से ही बडे वाले सोफे पर पसर गया ।
**************
"हैलो काका "....... मयंक ने ग्वालियर वाली कोठी का ध्यान रखने वाले काका को फोन लगाया था ये वही थे जो रीत और जानवी की सोसाइटी के गेट पर सिक्योरिटी का काम करते थे ।
काका -"हैलो बेटा .... कैसे हो"
मयंक -"मैं ठीक हूं काका और रीत और जानवी कैसी हैं ?"
काका -"दोनों ठीक है बेटा वो मेरी जिम्मेदारी है तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है"
"तब ही तो मैं निश्चिंत हूं काका मुझे पता है दो चार को तो आप अकेले ही पछीट सकते हो "....... मयंक ने हस्ते हुए कहा।
काका -"हाहहाहा ठीक कह रहा है"
मयंक -"अच्छा काका एक बात पूछनी थी "
काका -"हां पूछो बेटा "
मयंक -"काका आपने कभी दद्दा का नाम सुना है आपने ?"
जैसे ही मयंक ने दद्दा से ये सवाल किया तो एक पल के लिए खामोशी छा गई फोन पर फिर मयंक ने एक बार और पुकारा तब काका ने कहा।
काका -"बेटा ये नाम तुम्हें कैसे पता चला ?"
मयंक -"इस नाम के व्यक्ति ने मुझपे हमला किया है काका "
काका -"अच्छा !! ......ये तुम्हारे बापू के एक पुराने दोस्त हैं जो अब विष्णु का सबसे बडा दुश्मन भी है"
मयंक -"काका और क्या जानते हैं आप इनके बारे में और ऐसा क्या हुआ जो इन दोनों की दोस्ती टूट गई और दोनों में इतनी बडी दरार आ गई?"
काका -"बेटा ये बहुत लंबी कहानी है पर अब इतना ही जान लो तुम जितना इससे दूर रहोगे उतना ही अच्छा है वो दिन आज भी याद आता है तो अंदर से दिल दहल जाता है उसी हादसे में मैंने अपने बेटे और छोटू के बाप को खोया था "
मयंक -"ये बात आपने आज तक क्यूं नहीं बताई काका और मैं भी तो आपका बेटा ही हूं तो कभी ये मत कहना की आपका बेटा नहीं है "
काका -"मुझ नौकर की क्या बिसात है बेटा ये तो तू और विष्णु बाप है जो मुझे इतना सम्मान और प्यार देते हो "
मयंक -"काका किसी कुछ भी कोई देता नहीं जो उसको मिलता है वो उसके अपने कर्मों का ही नतीजा होता है....काका मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता पर अभी ये जानना बहुत जरूरी है की हुआ क्या था उस दिन"
काका -"मुझे पूरा तो नहीं पता बेटा और जिन्हें पूरा पति है वो सब मर चुके हैं दो के अलावा और वो दो नाम हैं दद्दा और विष्णु.... मैं सिर्फ इतना जानता हूं की दद्दा की एक बेटी थी वो दद्दा से अलग हो गई और इसका जिम्मेदार वह आज भी विष्णु को मानता है बाकी पूरा परिवार तो उस मंदिर में मृत पाया गया सबने देखा पर वह बच्ची ना तो जिंदा मिली और ना ही मुर्दा "
मयंक -"हम्मम बहुत ही बडी पहली मालुम पड़ती है काका आपने बताया मंदिर में लाश पाई गई थी उस मंदिर के बारे में बता सकते हो कुछ "
काका -"उस मंदिर में मेरे हिसाब से उस दिन के बाद कोई गया नहीं बस उस मंदिर के पुजारी का परिवार ही रहता है और उसकी देखभाल करणा है अब तो उस रास्ते पर भी जंगल है जहां से हम जाया करते थे हर साल बहुत बडा उत्सव हुआ करता था तेरे, दद्दा और अनिल के परिवार ही हर साल उस उत्सव को आयोजित करते थे।"
इसके बाद मयंक ने उस मंदिर का पता लिया और पता चला की वह मंदिर पहाडगड नामक एक गांव में है। जो मयंक के गांव और ग्वालियर के बीच में मिलता है।
*********
"क्या करूं मैं मेरे माल तो छोडो मिला नहीं और अपनी तरफ से पैसा और आदमी दोनों का नुक़सान हुआ वो अलग ".......ये सैफ उस्मानी ही था जो एक व्यक्ति के सामने बैठा हुआ अपना दुख बता रहा था और हाथ में में उसके शराब का एक ग्लास था।
"बिना जाने पहचाने कुछ करोगे तो यही होगा ना देखना तो चाहिए था की किस्से भिड़ने जा रहे हो अब तुम्हारी इस ग्लती की वजह से बल्ली हमारे पीछे और तुम शायद उसे जानते नहीं हो वो इतनी आसानी से पीछा छोडता नहीं है किसी का ".......इस शख्स ने हाथ में पडा जाम घुमाते हुए कहा जैसे उसमें पडी बर्फ पिघलाना चाहता हो।
"इंस्पेक्टर कुछ कर यार मुझे इस मुश्किल से निकाल"......इस इंस्पेक्टर की बात सुनकर उस्मानी कितना घबरा रहा था वो उसकी आवाज साफ बयान कर रही थी ।
"आज तेरी जितनी फाइल बंद पडी है सब की काॅपी पहुंच गई है उसके पास और ऐसा करने का आदेश सीधे Ig से आया था "...... इंस्पेक्टर ने एक सांस में वह जाम ख़त्म करते हुए कहा ।
"कल तू DSP बनने वाला है और इसमें मेरा कितना हाथ है तू अच्छे से जानता है पाटिल कुछ जुगाड लगा "...... उस्मानी ने जैसे अपनी आखरी कोशिश करते हुए कहा।
पाटिल -"बस एक ही तरीका है गायब होजा और दिखना मत चाहे जो हो जाए लंदन में तेरी पहचान है ना बस वहीं निकल और जब तक सब सही ना हो दिखना मत "
उस्मानी -"इससे मेरी इज्जत का क्या होगा साले कुछ नहीं बचेगा मेरा रसूक सब खत्म हो जाएगा "
पाटिल -"तू समझ नहीं रहा मेरे भाई इज्जत और रसूक इंसानो का होता है मुर्दों का नहीं "
और इस वाक्य ने जैसे उस्मानी को बता दिया था अब उसके पास कोई चारा नहीं था ..... यहां ये लोग जिसके बारे में बात कर रहे थे वो तो खुद महफ़िल सजाए अपने यार के साथ बैठा था।
"कैसा बना है खाना बल्ली "........ अनिल ने दूसरी बार दाल बल्ली को परोसते हुए पूछा।
"तेरे हाथ की दाल का कोई मुकाबला नहीं यारा मजा आ गया ये बनाने की रेसिपी किसी डाबे वाले को बेच खूब पैसा देगा "...... बल्ली ने खाना खाते हुए कहा।
"कुछ अलग थोडी डालता हूं भाई बस सब सही मात्रा में हो मटर का इस्तेमाल और तडका लगाओ मट्टी के दिए से ये सब इसका स्वाद को दुगुना कर देता है "........ अनिल ने भी निवाला तोड़ते हुए कहा।
ये दोनों अकेले नहीं थे इस जगह बल्ली के यहां काम करने वाले जितने भी लोग थे सब मौजूद थे इस वक्त इस खाली प्लाट में जो इनका ही एक ठिकाना था अनिल ने आते ही दाल को बनाया और बल्ली ने टिक्कर के लिए आटे और बेसन को मिलाकर उसमें थोडा पालक का इस्तेमाल किया और अच्छे से गूंथकर लगा दिया जिसके बाद ये दोनों इस खाट पर आ गये जहां बल्ली के साथ रहने वालों ने ही इनके लिए दाल और गरम गरम टिक्कर लाने का जिम्मा उठाया।
"अच्छा बल्ली नीमच से क्या पता चला उस्मानी का ?".......अनिल ने याद दिलाते हुए कहा।
बल्ली -"सारा कच्छा चिठ्ठा मंगा लिया है भाई जैसे जैसे फाइल खुलती गई उसको मारने की इच्छा तीव्र होती गई"
अनिल -"ऐसी इच्छा दबानी भी नहीं चाहिए बता कब निकालना है इसका जनाजा "
बल्ली -"जितना मैं जानता हूं अब तक उसको पता चल गया होगा की उसकी कुंडली कोई निकाल रहा है और मेरा अंदाजा कहता है की उसको हमारा नाम भी पता चल ही गया होगा।"
अनिल -"पुलिस की नौकरी छोडे तीन साल हो गये पर तेरा ये दिमाग अभी भी वही IPS वाला है भाई हाहाहा .....तो जब पत चल ही गया है फिर मुहूर्त निकला भी ठीक नहीं कर देते हैं तैयारियां उसके जनाजे की "
बल्ली -"इतना क्या घबराना भाई जाएगा कहां इस देश में कहीं भी हो पकड ही लेंगे तू आराम से खाना खा .......
Nice update....Update 42
जहां एक तरफ इकरा इफ्तिका को छेड रही थी वहीं दूसरी ओर मयंक और राजीव ने जबसे दद्दा का सच जानकर वह समझ नहीं पख रहे थे की दद्दा और बलवीर का एक साथ आना उनको कितना नुक्सान पहुंचा सकता था क्योंकि दुश्मन को पूरी तरह साफ करना बहुत आसान था।
पर यहां दद्दा के साथ ये नहीं था वो एक गलत फहमी का शिकार था तो उनको बचाते हुए बलवीर को खत्म करना था और साथ साथ ही उस आदमी का भी पता लगाना था जिसने सबको उपयोग किया।
और पता चलना काफी नहीं था उसको खत्म करना भी उतना ही जरूरी था जितना गेहूं में लगते घुन को खत्म करना होता है।
अनिल से बात करते हुए लगभग शाम के सात बज चुके थे। इसलिए उसने घर के लिए निकलना ठीक समझा और ठीक बीस मिनट बाद वह घर था । घर आकर कपड़े बदले पर तब ही उसका फोन बजा और स्क्रीन पर दिखते नाम को देखकर उसने एक लंबी आह्हह भरी और फिर हरा बटन दबाते हुए फोन कान से लगा लिया।
मयंक ने फोन तो कान से लगा लिया था पर दोनों तरफ से ही कोई आवाज नहीं आई सिर्फ एक दूसरे की सांसो की आवाज कानों में जा रही थी पर तब ही ......
"ह्ह है ...हैलो म ... मयंक"....... साक्षी ने झिझकते हुए बात शुरू की।
मयंक -"हैलो साक्षी क्या कर रही हो ?"
साक्षी -"कुछ नहीं.....पता नहीं क्यूं तुम्हें फोन लगाते हुए इतना अजीब क्यूं लग रहा है"
मयंक -"इसमें अजीब क्या है साक्षी??......हम इतने भी नये दोस्त नहीं है की तुम मुझसे बात करने में झिझक महसूस करो "
साक्षी -"तुमने ठीक कहा मयंक पर......."
इतना कहते ही एक बार फिर दोनों तरफ शांति छा गई..... मयंक ने साक्षी को जब दोस्त कहा तो साक्षी का तो जैसे दिल ही टूट गया था पर शुकून इस बात का था की अभी मयंक ने ना नहीं कहा था उसके प्यार को और मयंक की चुप्पी इस बात का सबूत थी की वह अभी उस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है.......थोडी देर चुप्पी रहने के बात फोन साक्षी की तरफ से कट चुका था। मयंक ने फोन को छोटे सोफे पर फेंका और खुद बगल से ही बडे वाले सोफे पर पसर गया ।
**************
"हैलो काका "....... मयंक ने ग्वालियर वाली कोठी का ध्यान रखने वाले काका को फोन लगाया था ये वही थे जो रीत और जानवी की सोसाइटी के गेट पर सिक्योरिटी का काम करते थे ।
काका -"हैलो बेटा .... कैसे हो"
मयंक -"मैं ठीक हूं काका और रीत और जानवी कैसी हैं ?"
काका -"दोनों ठीक है बेटा वो मेरी जिम्मेदारी है तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है"
"तब ही तो मैं निश्चिंत हूं काका मुझे पता है दो चार को तो आप अकेले ही पछीट सकते हो "....... मयंक ने हस्ते हुए कहा।
काका -"हाहहाहा ठीक कह रहा है"
मयंक -"अच्छा काका एक बात पूछनी थी "
काका -"हां पूछो बेटा "
मयंक -"काका आपने कभी दद्दा का नाम सुना है आपने ?"
जैसे ही मयंक ने दद्दा से ये सवाल किया तो एक पल के लिए खामोशी छा गई फोन पर फिर मयंक ने एक बार और पुकारा तब काका ने कहा।
काका -"बेटा ये नाम तुम्हें कैसे पता चला ?"
मयंक -"इस नाम के व्यक्ति ने मुझपे हमला किया है काका "
काका -"अच्छा !! ......ये तुम्हारे बापू के एक पुराने दोस्त हैं जो अब विष्णु का सबसे बडा दुश्मन भी है"
मयंक -"काका और क्या जानते हैं आप इनके बारे में और ऐसा क्या हुआ जो इन दोनों की दोस्ती टूट गई और दोनों में इतनी बडी दरार आ गई?"
काका -"बेटा ये बहुत लंबी कहानी है पर अब इतना ही जान लो तुम जितना इससे दूर रहोगे उतना ही अच्छा है वो दिन आज भी याद आता है तो अंदर से दिल दहल जाता है उसी हादसे में मैंने अपने बेटे और छोटू के बाप को खोया था "
मयंक -"ये बात आपने आज तक क्यूं नहीं बताई काका और मैं भी तो आपका बेटा ही हूं तो कभी ये मत कहना की आपका बेटा नहीं है "
काका -"मुझ नौकर की क्या बिसात है बेटा ये तो तू और विष्णु बाप है जो मुझे इतना सम्मान और प्यार देते हो "
मयंक -"काका किसी कुछ भी कोई देता नहीं जो उसको मिलता है वो उसके अपने कर्मों का ही नतीजा होता है....काका मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता पर अभी ये जानना बहुत जरूरी है की हुआ क्या था उस दिन"
काका -"मुझे पूरा तो नहीं पता बेटा और जिन्हें पूरा पति है वो सब मर चुके हैं दो के अलावा और वो दो नाम हैं दद्दा और विष्णु.... मैं सिर्फ इतना जानता हूं की दद्दा की एक बेटी थी वो दद्दा से अलग हो गई और इसका जिम्मेदार वह आज भी विष्णु को मानता है बाकी पूरा परिवार तो उस मंदिर में मृत पाया गया सबने देखा पर वह बच्ची ना तो जिंदा मिली और ना ही मुर्दा "
मयंक -"हम्मम बहुत ही बडी पहली मालुम पड़ती है काका आपने बताया मंदिर में लाश पाई गई थी उस मंदिर के बारे में बता सकते हो कुछ "
काका -"उस मंदिर में मेरे हिसाब से उस दिन के बाद कोई गया नहीं बस उस मंदिर के पुजारी का परिवार ही रहता है और उसकी देखभाल करणा है अब तो उस रास्ते पर भी जंगल है जहां से हम जाया करते थे हर साल बहुत बडा उत्सव हुआ करता था तेरे, दद्दा और अनिल के परिवार ही हर साल उस उत्सव को आयोजित करते थे।"
इसके बाद मयंक ने उस मंदिर का पता लिया और पता चला की वह मंदिर पहाडगड नामक एक गांव में है। जो मयंक के गांव और ग्वालियर के बीच में मिलता है।
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"क्या करूं मैं मेरे माल तो छोडो मिला नहीं और अपनी तरफ से पैसा और आदमी दोनों का नुक़सान हुआ वो अलग ".......ये सैफ उस्मानी ही था जो एक व्यक्ति के सामने बैठा हुआ अपना दुख बता रहा था और हाथ में में उसके शराब का एक ग्लास था।
"बिना जाने पहचाने कुछ करोगे तो यही होगा ना देखना तो चाहिए था की किस्से भिड़ने जा रहे हो अब तुम्हारी इस ग्लती की वजह से बल्ली हमारे पीछे और तुम शायद उसे जानते नहीं हो वो इतनी आसानी से पीछा छोडता नहीं है किसी का ".......इस शख्स ने हाथ में पडा जाम घुमाते हुए कहा जैसे उसमें पडी बर्फ पिघलाना चाहता हो।
"इंस्पेक्टर कुछ कर यार मुझे इस मुश्किल से निकाल"......इस इंस्पेक्टर की बात सुनकर उस्मानी कितना घबरा रहा था वो उसकी आवाज साफ बयान कर रही थी ।
"आज तेरी जितनी फाइल बंद पडी है सब की काॅपी पहुंच गई है उसके पास और ऐसा करने का आदेश सीधे Ig से आया था "...... इंस्पेक्टर ने एक सांस में वह जाम ख़त्म करते हुए कहा ।
"कल तू DSP बनने वाला है और इसमें मेरा कितना हाथ है तू अच्छे से जानता है पाटिल कुछ जुगाड लगा "...... उस्मानी ने जैसे अपनी आखरी कोशिश करते हुए कहा।
पाटिल -"बस एक ही तरीका है गायब होजा और दिखना मत चाहे जो हो जाए लंदन में तेरी पहचान है ना बस वहीं निकल और जब तक सब सही ना हो दिखना मत "
उस्मानी -"इससे मेरी इज्जत का क्या होगा साले कुछ नहीं बचेगा मेरा रसूक सब खत्म हो जाएगा "
पाटिल -"तू समझ नहीं रहा मेरे भाई इज्जत और रसूक इंसानो का होता है मुर्दों का नहीं "
और इस वाक्य ने जैसे उस्मानी को बता दिया था अब उसके पास कोई चारा नहीं था ..... यहां ये लोग जिसके बारे में बात कर रहे थे वो तो खुद महफ़िल सजाए अपने यार के साथ बैठा था।
"कैसा बना है खाना बल्ली "........ अनिल ने दूसरी बार दाल बल्ली को परोसते हुए पूछा।
"तेरे हाथ की दाल का कोई मुकाबला नहीं यारा मजा आ गया ये बनाने की रेसिपी किसी डाबे वाले को बेच खूब पैसा देगा "...... बल्ली ने खाना खाते हुए कहा।
"कुछ अलग थोडी डालता हूं भाई बस सब सही मात्रा में हो मटर का इस्तेमाल और तडका लगाओ मट्टी के दिए से ये सब इसका स्वाद को दुगुना कर देता है "........ अनिल ने भी निवाला तोड़ते हुए कहा।
ये दोनों अकेले नहीं थे इस जगह बल्ली के यहां काम करने वाले जितने भी लोग थे सब मौजूद थे इस वक्त इस खाली प्लाट में जो इनका ही एक ठिकाना था अनिल ने आते ही दाल को बनाया और बल्ली ने टिक्कर के लिए आटे और बेसन को मिलाकर उसमें थोडा पालक का इस्तेमाल किया और अच्छे से गूंथकर लगा दिया जिसके बाद ये दोनों इस खाट पर आ गये जहां बल्ली के साथ रहने वालों ने ही इनके लिए दाल और गरम गरम टिक्कर लाने का जिम्मा उठाया।
"अच्छा बल्ली नीमच से क्या पता चला उस्मानी का ?".......अनिल ने याद दिलाते हुए कहा।
बल्ली -"सारा कच्छा चिठ्ठा मंगा लिया है भाई जैसे जैसे फाइल खुलती गई उसको मारने की इच्छा तीव्र होती गई"
अनिल -"ऐसी इच्छा दबानी भी नहीं चाहिए बता कब निकालना है इसका जनाजा "
बल्ली -"जितना मैं जानता हूं अब तक उसको पता चल गया होगा की उसकी कुंडली कोई निकाल रहा है और मेरा अंदाजा कहता है की उसको हमारा नाम भी पता चल ही गया होगा।"
अनिल -"पुलिस की नौकरी छोडे तीन साल हो गये पर तेरा ये दिमाग अभी भी वही IPS वाला है भाई हाहाहा .....तो जब पत चल ही गया है फिर मुहूर्त निकला भी ठीक नहीं कर देते हैं तैयारियां उसके जनाजे की "
बल्ली -"इतना क्या घबराना भाई जाएगा कहां इस देश में कहीं भी हो पकड ही लेंगे तू आराम से खाना खा .......