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दोहे -रसभरे

Umakant007

चरित्रं विचित्रं...
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केलि समागम
पुहकर

(दोहा)
पुहुकर जो मन में बसे, नैन बिलोकै ताहि।
मूरति पूज पषान की, ध्यान धरत कर जाहि॥
काम कुँवर बस काम के, कामिन कर गहि लीन॥
चतुर चारु चुंबन उरज, आलिंगन पुन दीन॥


(चौपही)
चतुर चारु जोवन भरि दोऊ। सरवर रूप न पूजै कोऊ॥
दोऊ काम कला परवीना। दोऊ नख सिख नेह नवीना॥
दोऊ सेज एक छबि छाजै। एक रासि जनु रबि ससि राजै॥
उतहि कुँवर मनमथ मतवारौ। विविध भाउ रस विलसन हारौ॥
इतहिं नवल नव वधू पियारी। गुननि पौढ़ अरु जोबन वारी॥
करहिं कलोल काम कर क्रीड़ा। क्रम-क्रम तजहि मदन बस ब्रीड़ा॥
प्रथम सुरति पिय चातुर ताई। उतहिं प्रान पति आतुरताई॥
ललित लाज भय भामिनि सोहै। चितवत चतुर चातुरी मोहै॥


(दोहा)
प्रथम सुरति प्रीय है, पहुकर सरल विलास।
कामी के चित आतुरी, कामिनि के मन आस॥


(छंद तोटकी)
मन कामिनी त्रास प्रकास लसै। जुग लोचन भीतर लाज बसै॥
उनमीलत अच्छ बिराज इमं। रवि उग्गत वारिज हास जिमं॥
जुग मूल उरोजनि आड़ दियै। कर पल्लव नीबी निरोध कियै॥
जुग जंघनु बंधनु बाँध रही। कर सौं कर आरत रूपगही॥
हिय कंपत साँस उसास भरै। मृग अच्छ कटाच्छन चोट करै।
रति केलि विलोकत वान लजै। नव नूपुर की झनकार बजै॥
छिन में जब प्रीति प्रतीति भई। छल कै बल कै उरलाइ लेई॥
दोई आनंद आनंद अंक भरै। रुचि सौं अधरामृत पान करैं॥
अवलोकन चुंबन हास रसं। रति रीति करंति बिलास वसं॥
कटि छीन पयोधर प्रान प्रिया। हरषै हित सौंह लसंत हिया॥
महकै जनु मध्यी सुगंध रची। कुहकै जनु कोकिल केलि सची॥
परसै जनु पारस प्रीत जिमं। दरसै मुख चंद चकोर इमं॥


(दोहा)
सिथलित सिर अलकावली, सिथलित जंघ दुकूल॥
मैटि लाज मरजाद तन, बढ़ी परसपर फूल॥


(सवैया)
उरज उतंग अरु उद्दित अनंग अंग,
सोभी पिय संग रति रंग के विहार की।
कुंडिल कपोल सोभा जगमगै जु दीप जोति,
पहुकर प्रीत परिरंभन प्रकार की॥
सिथिलित सुदेस केस भाल श्रम सीकरनि,
तैसियै उर लसति छबि मौतिनि के हार की।
रोम-रोम देति सुख-सुख न्यारे-न्यारे भेद,
धुनि रसनानकार रसना झनकार की॥


(दोहा)
पुहुकर सर जस वोस कन, ढिगहिं चलत विव चंद।
अहिपतिनी तहिं पर लसत, पति पावत मकरंद॥
दोऊ जोबन ज़ोर में, मदन महा मद अंध।
पुहुकर प्रेम प्रकास तैं, छूटे सकुचे बंध॥
जुरत सुरत संग्राम में, पहुकर उभै अजीत।
हारे हारि न मानहीं, केलि रची विपरीत॥


(छंद तोटक)
विपरीति रची रति केलि कला। घन ऊपर ज्यौं चमकै चपला॥
विथुरी लट आनन रूप रसै। रजनी तम वे रजनीसु लसै॥
कवरी छुटि फूल परत्ति इमं। निसि स्याम नच्छत्र गिरंति जिमं॥
मुकता गन छूटति टूटि परै। जनु फूलझरी छुटि फूल झरै॥
श्रम सीकर ल्हास सुखं हरषै। दधिजात सुधा कर से बरषै॥
कुच ऊपर मुत्तिय हार चलं। सिर संकर गंग प्रवाह ढलं॥
चमकै चल कुंडिल केस मिलै। थहरै रजनीकरु राहु गिलै॥
कट किंकिनि कंकन भेद बजै। तरुनी तिहिं ऊपर नृत्य सजै॥
रसना रस चुंबन चौज करै। तिहि तालनि में झपताल परै॥
अधरामृत पानि सुदंत लगै। हय ताजनु ज्यौं मनमथ्य जगै॥
अति लालचु लोभ सु आतुरता। अरु तैतिस बैनु सुचातुरता॥
उडुपत्ति कला जिमि रूप चढ़ै। पल ही पल प्रेम हुलासु बढ़ै॥

(दोहा)
दंपति जोबन ज़ोर तै, भिरति सुरति-संग्राम।
हारे हार न मानहीं, संग सहायक काम॥
पुहुकर नाइक मैन मय, पाइ प्रथम नवनारि।
सुख लूटत निधि रंक ज्यों, देखौ रसिक विचारि॥

(सवैया)
गाढ़ौ गढु लाज लै ढहाइ डारी कोट वोट,
नीबी पट खोलि रस जीति करि लीनै है।
छाती नख रेख, छत दसन अधर हँसि,
किधौ मधुपान सुख प्राननि कौ दीनै है॥
लूट्यौ लंकु लंका जैसे संकु तजि अंकु भरि,
पुहुकर कहै अंग-अंग बसि कीनै है।
काम की अलोल कोक कलाकी कलोल करि।
सुरति समूह सुखरंग रस भीनै है॥


(दोहा)
इत नागर नव जोवना, नव अनंग नव नेह।
मनमथ मन रथ सारथी, सुरति जुद्ध नहि छेह॥


(सवैया)
मन के सुरथ चढ़ि सारथी अनंग संग,
भृगुटी धनुक धरे वरुनी के बान जू।
अंचल धुजा सौं सोहै कंचुकि जिरह जेबि।
सुभट कटाछ सेज मसर मैदान जू॥
रति सौं रुचिर रूप रैनि रति जुद्ध कियौ,
कंकन किंकिनि बाजै विजै के निसान जू।
पुहुकर तीखे नख घाइ सनमुख लागे,
मुरी न मयंक मुखी सुरति सुजान जू॥


(दोहा)
पुहुकर रस भरि रीझि करि, आनंद भरे अपार।
त्रिपिति भये करि केलि रुचि, मदन जुद्ध तिहिं वार॥
 
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Umakant007

चरित्रं विचित्रं...
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174

बरवै नायिका-भेद : रहीम​

Barvai Nayika-Bhed : Rahim​

(दोहा)

कवित कह्यो दोहा कह्यो, तुलै न छप्पय छंद।
बिरच्या् यहै विचार कै, यह बरवैरस कंद।।1।।

(मंगलाचरण)

बंदौ देवि सरदवा, पद कर जोरि।
बरनत काव्यस बरैवा, लगै न खोरि।।2।।

(उत्त्मा)

लखि अपराध पियरवा, नहिं रिस कीन।
बिहँसत चनन चउकिया, बैठक दीन।।3।।

(मध्यनमा)

बिनुगुन पिय-उर हरवा, उपट्यो हेरि।
चुप ह्वै चित्र पुतरिया, रहि मुख फेरि।।4।।

(अधमा)

बेरिहि बेर गुमनवा, जनि करु नारि।
मानिक औ गजमुकुता, जौ लगि बारि।।5।।

(स्वकीया)

रहत नयन के कोरवा, चितवनि छाय।
चलत न पग-पैजनियॉं, मग अहटाय।।6।।

(मुग्धाम)

लहरत लहर लहरिया, लहर बहार।
मोतिन जरी किनरिया, बिथुरे बार।।7।।

लागे आन नवेलियहि, मनसिज बान।
उसकन लाग उरोजवा दृग तिरछान।।8।।

(अज्ञातयौवना)

कवन रोग दुहुँ छतिया, उपजे आय।
दुखि दुखि उठै करेजवा, लगि जनु जाय।।9।।

(ज्ञातयौवना)

औचक आइ जोबनवाँ, मोहि दुख दीन।
छुटिगो संग गोइअवॉं नहि भल कीन।।10।।

(नवोढ़ा)

पहिरति चूनि चुनरिया, भूषन भाव।
नैननि देत कजरवा, फूलनि चाव।।11।।

(विश्रब्धर नवोढ़ा)

जंघन जोरत गोरिया, करत कठोर।
छुअन न पावै पियवा, कहुँ कुच-कोर।।12।।

(मध्यतमा)

ढीलि आँख जल अँचवत, तरुनि सुभाय।
धरि खसिकाइ घइलना, मुरि मुसुकाय।।13।।

(प्रौढ़ रतिप्रीता)

भोरहि बोलि कोइलिया, बढ़वति ताप।
घरी एक घरि अलवा, रह चुपचाप।।14।।

(परकीया)

सुनि सुनि कान मुरलिया, रागन भेद।
गैल न छाँड़त गोरिया, गनत न खेद।।15।।

(ऊढ़ा)

निसु दिन सासु ननदिया, मुहि घर हेर।
सुनन न देत मुरलिया मधुरी टेर।।161।

(अनूढ़ा)

मोहि बर जोग कन्हैाया लागौं पाय।
तुहु कुल पूज देवतवा, होहु सहाय।।17।।

(भूत सुरति-संगोपना)

चूनत फूल गुलबवा डार कटील।
टुटिगा बंद अँगियवा, फटि पट नील।।18।।

आयेसि कवनेउ ओरवा, सुगना सार।
परिगा दाग अधरवा, चोंच चोटार।।19।।

(वर्तमान सुरति-गोपना)

मं पठयेउ जिहि मकवॉं, आयेस साध।
छुटिगा सीस को जुरवा, कसि के बाँध।।20।।

मुहि तुहि हरबर आवत, भा पथ खेद।
रहि रहि लेत उससवा, बहत प्रसेद।।21।।

(भविष्यत सुरति-गोपनान)

होइ कत आइ बदरिया, बरखहि पाथ।
जैहौं घन अमरैया, सुगना सा‍थ।।22।।

जैहौं चुनन कुसुमियॉं, खेत बडिे दूर।
नौआ केर छोहरिया, मुहि सँग कूर।।23।।

(क्रिया-विदग्धान)

बाहिर लैके दियवा, बारन जाय।
सासु ननद ढिग पहुँचत, देत बुझाय।।24।।

(वचन-विदग्धाग)

तनिक सी नाक नथुनिया, मित हित नीक।
कहिति नाक पहिरावहु, चित दै सींक।।25।।

(लक्षिता)

आजु नैन के कजरा, औरे भाँत।
नागर नहे नवेलिया, सुदिने जात।।26।।

(अन्य -सुरति-दु:खिता)

बालम अस मन मिलियउँ, जस पय पानि।
हँसिनि भइल सवतिया, लइ बिलगानि।।27।।

(संभोग-दु:खिता)

मैं पठयउ जिहि कमवाँ, आयसि साध।
छुटिगो सीस को जुरवा, कसि के बाँधि।।28।।

मुहि तुहि हरबत आवत, भव पथ खेद।
रहि रहि लेत उससवा, बहत प्रसेद।।29।।

(प्रेम-गर्विता)

आपुहि देत जवकवा, गूँदत हार।
चुनि पहिराव चुनरिया, प्रानअधार।।30।।

अवरन पाय जवकवा, नाइन दीन।
मुहि पग आगर गोरिया, आनन कीन।।31।।

(रूप-गर्विता)

खीन मलिन बिखभैया, औगुन तीन।
मोहिं कहत विधुबदनी, पिय मतिहीन।।32।।

दातुल भयसि सुगरुवा, निरस पखान।
यह मधु भरल अधरवा, करसि गुमान।।33।।

(प्रथम अनुशयना, भावी-संकेतनष्टार)

धीरज धरु किन गोरिया करि अनुराग।
जात जहाँ पिय देसवा, घन बन बाग।। 34।।

जनि मरु रोय दुलहिया, कर मन ऊन।
सघन कुंज ससुररिया, औ घर सून।।35।।

(द्वितीय अनुशयना, संकेत-विघट्टना)

जमुना तीर तरुनिअहि लखि भो सूल।
झरिगो रूख बेइलिया, फुलत न फूल।।36।।

ग्रीषम दवत दवरिया, कुंज कुटीर।
तिमि तिमि तकत तरुनिअहिं, बाढ़ी पीर।।37।।

(तृतीय अनुशयना, रमणगमना)

मितवा करत बँसुरिया, सुमन सपात।
फिरि फिरि तकत तरुनिया, मन पछतात।।38।।

मित उत तें फिरि आयेउ, देखु न राम।
मैं न गई अमरैया, लहेउ न काम।।39।।

(मुदिता)

नेवते गइल ननदिया, मैके सासु।
दुलहिनि तोरि खबारिया,आवै आँसु।।40।।

जैहौं काल नेवतवा, भा दु:ख दून।
गॉंव करेसि रखवरिया, सब घर सून।।41।।

(कुलटा)

जस मद मातल हथिया, हुमकत जात।
चितवत जात तरुनिया, मन मुसकात।।42।।

चितवत ऊँच अटरिया, दहिने बाम।
लाखन लखत विछियवा, लखी सकाम।।43।।

(सामान्या गणिका)

लखि लखि धनिक नयकवा बनवत भेष।
रहि गइ हेरि अरसिया कजरा रेख।।44।।

(मुग्धाि प्रोषितपतिका)

कासो कहौ सँदेसवा, पिय परदेसु।
लागेहु चइत न फले तेहि बन टेसु।।45।।

(मध्यात प्रोषितपतिका)

का तुम जुगुल तिरियवा, झगरति आय।
पिय बिन मनहुँ अटरिया, मुहि न सुहाय।।46।।

(प्रौढ़ा प्रोषितपतिका)

तैं अब जासि बेइलिया, बरु जरि मूल।
बिनु पिय सूल करेजवा, लखि तुअ फूल।।47।।

या झर में घर घर में, मदन हिलोर।
पिय नहिं अपने कर में, करमै खोर।।48।।

(मुग्धाप खंडिता)

सखि सिख मान नवेलिया, कीन्हेोसि मान।
पिय बिन कोपभवनवा, ठानेसि ठान।।49।।

सीस नवायँ नवेलिया, निचवइ जोय।
छिति खबि, छोर छिगुरिया, सुसुकति रोय।।50।।

गिरि गइ पीय पगरिया, आलस पाइ।
पवढ़हु जाइ बरोठवा, सेज डसाइ।।51।।

पोछहु अधर कजरवा, जावक भाल।
उपजेउ पीतम छतिया, बिनु गुन माल।।52।।

(प्रौढ़ा खंडिता)

पिय आवत अँगनैया, उठि कै लीन।
सा‍थे चतुर तिरियवा, बैठक दीन।।53।।

पवढ़हु पीय पलँगिया, मींजहुँ पाय।
रैनि जगे कर निंदिया, सब मिटि जाय।।54।।

(परकीया खंडिता)

जेहि लगि सजन सनेहिया, छुटि घर बार।
आपन हित परिवरवा, सोच परार।।55।।

(गणिका खंडिता)

मितवा ओठ कजरवा, जावक भाल।
लियेसि का‍ढ़ि बइरिनिया, तकि मनिमाल।।56।।

(मुग्धाज कलहांतरिता)

आयेहु अबहिं गवनवा, जुरुते मान।
अब रस लागिहि गोरिअहि, मन पछतान।।57।।

(मग्धा कलहांतरिता)

मैं मतिमंद तिरियवा, परिलिउँ भोर।
तेहि नहिं कंत मनउलेउँ, तेहि कछु खोर।।58।।

(प्रौढ़ा कलहांतरिता)

थकि गा करि मनुहरिया, फिरि गा पीय।
मैं उठि तुरति न लायेउँ, हिमकर हीय।।59।।

(परकीया कलहांतरिता)

जेहि लगि कीन बिरोधवा, ननद जिठानि।
रखिउँ न लाइ करेजवा, तेहि हित जानि।।60।।

(गणिका कलहांतरिता)

जिहि दीन्हेलउ बहु बिरिया, मुहि मनिमाल।
तिहि ते रूठेउँ सखिया, फिरि गे लाल।।61।।

(मुग्धाठ विप्रलब्धाा)

लखे न कंत सहेटवा, फिरि दुबराय।
धनिया कमलबदनिया, गइ कुम्हिलाय।।62।।

(मध्याब विप्रलब्धाइ)

देखि न केलि-भवनवा, नंदकुमार।
लै लै ऊँच उससवा, भइ बिकरार।।63।।

(प्रौढ़ा विप्रलब्धान)

देखि न कंत सहेटवा, भा दुख पूर।
भौ तन नैन कजरवा, होय गा झूर।।64।।

(परकीया विप्रलब्धा )

बैरिन भा अभिसरवा, अति दुख दानि।
प्रातउ मिलेउ न मितवा, भइ पछितानि।।65।।

(गणिका विप्रलब्धात)

करिकै सोरह सिंगरवा, अतर लगाइ।
मिलेउ न लाल सहेटवा, फिरि पछिताई।।66।।

(मुग्धाल उत्कं,ठिता)

भा जुग जाम जमिनिया, पिय नहिं जाय।
राखेउ कवन सवतिया, रहि बिलमाय।।67।।

(मध्या उत्कं,ठिता)

जोहत तीय अँगनवा, पिय की बाट।
बेचेउ चतुर तिरियवा, केहि के हाट।।68।।

(प्रौढ़ा उत्कंाठिता)

पिय पथ हेरत गोरिया, भा भिनसार।
चलहु न करिहि तिरियवा, तुअ इतबार।।69।।

(परकीया उत्कंिठिता)

उठि उठि जात खिरिकिया, जोहत बाट।
कतहुँ न आवत मितवा, सुनि सुनि खाट।।70।।

(गणिका उत्कंवठिता)

कठिन नींद भिनुसरवा, आलस पाइ।
धन दै मूरख मितवा, रहल लोभाइ।।71।।

(मुग्धा वासकसज्जार)

हरुए गवन नबेलिया, दीठि बचाइ।
पौढ़ी जाइ पलँगिया, सेज बिछाइ।।72।।

(मध्या वासकसज्जास)

सुभग बिछाई पलँगिया, अंग सिंगार।
चितवत चौंकि तरुनिया, दै दृ्ग द्वार।।73।।

(प्रौढ़ा वासकसज्जास)

हँसि हँसि हेरि अरसिया, सहज सिंगार।
उतरत चढ़त नवेलिया, तिय कै बार।।74।।

(परकीया वासकसज्जा,)

सोवत सब गुरू लोगवा, जानेउ बाल।
दीन्हेबसि खोलि खिरकिया, उठि कै हाल।।75।।

(सामान्याह वासकसज्जा,)

कीन्हेमसि सबै सिंगरवा, चातुर बाल।
ऐहै प्रानपिअरवा, लै मनिमाल।।76।।

(मुग्धाय स्वांधीनपतिका)

आपुहि देत जवकवा, गहि गहि पाय।
आपु देत मोहि पियवा, पान खवाय।।77।।

(मध्याो स्वांधीनपतिका)

प्रीतम करत पियरवा, कहल न जात।
रहत गढ़ावत सोनवा, इहै सिरात।।78।।

(प्रौढ़ा स्वाधीनपतिका)

मैं अरु मोर पियरवा, जस जल मीन।
बिछुरत तजत परनवा, रहत अधीन।।79।।

(परकीया स्वाधीनपतिका)

भो जुग नैन चकोरवा, पिय मुख चंद।
जानत है तिय अपुनै, मोहि सुखकंद।।80।।

(सामान्याअ स्वाधीनपतिका)

लै हीरन के हरवा, मानिकमाल।
मोहि रहत पहिरावत, बस ह्वै लाल।।81।।

(मुग्धाह अभिसारिका)

चलीं लिवाइ नवेलिअहि, सखि सब संग।
जस हुलसत गा गोदवा, मत्तस मतंग।।82।।

(मध्याग अभिसारिका)

पहिरे लाल अछुअवा, तिय-गज पाय।
चढ़े नेह-हथिअवहा, हुलसत जाय।।83।।

(प्रौढ़ा अभिसारिका)

चली रैनि अँधिअरिया, साहस गा‍ढि।
पायन केर कँगनिया, डारेसि का‍ढि।।84।।

(परकीया क(ष्णा,भिसारिका)

नील मनिन के हरवा, नील सिंगार।
किए रैनि अँधिअरिया, धनि अभिसार।।85।।

(शुक्लाँभिसारिका)

सेत कुसुम कै हरवा भूषन सेत।
चली रैनि उँजिअरिया, पिय के हेत।।86।।

(दिवाभिसारिका)

पहिरि बसन जरतरिया, पिय के होत।
चली जेठ दुपहरिया, मिलि रवि जोत।।87।।

(गणिका अभिसारिका)

धन हित कीन्हि सिंगरवा, चातुर बाल।
चली संग लै चेरिया, जहवाँ लाल।।88।।

(मुग्धा प्रवत्य्व त्पतिका)

परिगा कानन सखिया पिय कै गौन।
बैठी कनक पलँगिया, ह्वै कै मौन।।89।।

(मध्याप प्रवत्य्व त्पतिका)

सुठि सुकुमार तरुयिका, सुनि पिय-गौन।
लाजनि पौ‍ढि ओबरिया, ह्वै कै मौन।।90।।

(प्रौढ़ा प्रवत्य्बरित्पतिका)

बन धन फूलहि टेसुआ, बगिअनि बेलि।
चलेउ बिदेस पियरवा फगुआ खेलि।।91।।

(परकीया प्रवत्य्ग त्पतिका)

मितवा चलेउ बिदेसवा मन अनुरागि।
पिय की सुरत गगरिया, रहि मग लागि।।92।।

(गणिका प्रवत्य् म त्पतिका)

पीतम इक सुमिरिनिया, मुहि देइ जाहु।
जेहि जप तोर बिरहवा, करब निबाहु।।93।।

(गुग्धार आगतपतिका)

बहुत दिवस पर पियवा, आयेउ आज।
पुलकित नवल दुलहिवा, कर गृह-काज।।94।।

(मध्याल आगतपतिका)

पियवा आय दुअरवा, उठि किन देख।
दुरलभ पाय बिदेसिया,मुद अवरेख।।95।।

(प्रौढ़ा आगतपतिका)

आवत सुनत तिरियवा, उठि हरषाइ।
तलफत मनहुँ मछरिया, जनु जल पाइ।।96।।

(परकीया आगतपतिका)

पूछन चली खबरिया, मितवा तीर।
हरखित अतिहि तिरियवा पहिरत चीर।।97।।

(गणिका आगतपतिका)

तौ लगि मिटिहि न मितवा, तन की पीर।
जौ लगि पहिर न हरवा, जटित सुहीर।।98।।

(नायक)

सुंदर चतुर धनिकवा, जाति के ऊँच।
केलि-कला परबिनवा, सील समूच।।99।।

(नायक भेद)

पति, उपपति, वैसिकवा, त्रिबिध बखान।

(पति लक्षण)

बिधि सो ब्याणह्यो गुरु जन पति सो जानि।।100।।

(पति)

लैकै सुघर खुरुपिया, पिय के साथ।
छइवै एक छतरिया, बरखत पाथ।।101।।

(अनुकूल)

करत न हिय अपरधवा, सपनेहुँ पीय।
मान करन की बेरिया, रहि गइ हीय।।102।।

(दक्षिण)

सौतिन करहि निहोरवा, हम कहँ देहु।
चुन चु चंपक चुरिया, उच से लेहु।।103।।

(शठ)

छूटेउ लाज डगरिया, औ कुल कानि।
करत जात अपरधवा, परि गइ बानि।।104।।

(धृष्टप)

जहवाँ जात रइनियाँ तहवाँ जाहु।
जोरि नयन निरलजवा, कत मुसुकाहु।।105।।

(उपपति)

झाँकि झरोखन गोरिया, अँखियन जोर।
फिरि चितवन चित मितवा, करत निहोर।।106।।

(वचन-चतुर)

सघन कुंज अमरैया, सीतल छाँह।
झगरत आय कोइलिया, पुनि उड़ि जाह।।107।।

(क्रिया-चतुर)

खेलत जानेसि टोलवा, नंदकिसोर।
हुइ वृषभानु कुँअरिया, होगा चोर।।108।।

(वैशिक)

जनु अति नील अलकिया बनसी लाय।
भो मन बारबधुअवा, तीय बझाय।।109।।

(प्रोषित नायक)

करबौं ऊँच अटरिया, तिय सँग केलि।
कबधौं, पहिरि गजरवा, हार चमेलि।।110।।

(मानी)

अब भरि जनम सहेलिया, तकब न ओहि।
ऐंठलि गइ अभिमनिया, तजि कै मोहि।।111।।

(स्वप्न,दर्शन)

पीतम मिलेउ सपनवाँ भइ सुख-खानि।
आनि जगाएसि चेरिया, भइ दुखदानि।।112।।

(चित्र दर्शन)

पिय मूरति चितसरिया, चितवन बाल।
सुमिरत अवधि बसरवा, जपि जपि माल।।113।।

(श्रवण)

आयेउ मीत बिदेसिया, सुन सखि तोर।
उठि किन करसि सिंगरवा, सुनि सिख मोर।।114।।

(साक्षात दर्शन)

बिरहिनि अवर बिदेसिया, भै इक ठोर।
पिय-मुख तकत तिरियवा, चंद चकोर।।115।।

(मंडन)

सखियन कीन्ह सिंगरवा रचि बहु भाँति।
हेरति नैन अरसिया, मुरि मुसुकाति।।116।।

(शिक्षा)

छाकहु बैठ दुअरिया मीजहु पाय।
पिय तन पेखि गरमिया, बिजन डोलाय।।117।।

(उपालंभ)

चुप होइ रहेउ सँदेसवा, सुनि मुसुकाय।
पिय निज कर बिछवनवा, दीन्हम उठाय।।118।।

(परिहास)

बिहँसति भौहँ चढ़ाये, धुनष मनीय।
लावत उर अबलनिया, उठि उठि पीय।।119।।

1.

भोरहिं बोलि कोइलिया बढ़वति ताप।
घरी एक भरि अलिया रहु चुपचाप
बाहर लैकै दियवा बारन जाइ।
सासु ननद घर पहुँचत देति बुझाइ
पिय आवत अंगनैया उठिकै लीन।
बिहँसत चतुर तिरियवा बैठक दीन
लै कै सुघर खुरपिया पिय के साथ।
छइबै एक छतरिया बरसत पाथ
पीतम इक सुमरिनियाँ मोहिं देइ जाहु।
जेहि जपि तोर बिरहवा करब निबाहु
 
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preetesh

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भावुक उभरौंहौं भयो कछुक पर्‌यौ भरुआइ।
सीपहरा के मिस हियौ निसि-दिन देखत जाय॥27॥


भावुक (भाव+एकु) = कुछ-कुछ। उभरौंहौं = विकसित, उभरे हुए। भरु = भार, बोझ। सीपहरा = सीप से निकले मोतियों की माला। मिस = बहाना। हियो = हृदय, छाती।

(उसकी छाती) कुछ-कुछ उभरी-सी हो गई है (क्योंकि उस पर अब) कुछ बोझ भी आ पड़ा है। (इसलिए) मोती की माला के बहाने अपनी छाती देखते रहने में ही (उसके) दिन-रात बीतते हैं।
सचित्र रहता तो जादा मजा आता..
 

Delta101

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बरवै नायिका-भेद : रहीम​

Barvai Nayika-Bhed : Rahim​

(दोहा)

कवित कह्यो दोहा कह्यो, तुलै न छप्पय छंद।
बिरच्या् यहै विचार कै, यह बरवैरस कंद।।1।।

(मंगलाचरण)

बंदौ देवि सरदवा, पद कर जोरि।
बरनत काव्यस बरैवा, लगै न खोरि।।2।।

(उत्त्मा)

लखि अपराध पियरवा, नहिं रिस कीन।
बिहँसत चनन चउकिया, बैठक दीन।।3।।

(मध्यनमा)

बिनुगुन पिय-उर हरवा, उपट्यो हेरि।
चुप ह्वै चित्र पुतरिया, रहि मुख फेरि।।4।।

(अधमा)

बेरिहि बेर गुमनवा, जनि करु नारि।
मानिक औ गजमुकुता, जौ लगि बारि।।5।।

(स्वकीया)

रहत नयन के कोरवा, चितवनि छाय।
चलत न पग-पैजनियॉं, मग अहटाय।।6।।

(मुग्धाम)

लहरत लहर लहरिया, लहर बहार।
मोतिन जरी किनरिया, बिथुरे बार।।7।।

लागे आन नवेलियहि, मनसिज बान।
उसकन लाग उरोजवा दृग तिरछान।।8।।

(अज्ञातयौवना)

कवन रोग दुहुँ छतिया, उपजे आय।
दुखि दुखि उठै करेजवा, लगि जनु जाय।।9।।

(ज्ञातयौवना)

औचक आइ जोबनवाँ, मोहि दुख दीन।
छुटिगो संग गोइअवॉं नहि भल कीन।।10।।

(नवोढ़ा)

पहिरति चूनि चुनरिया, भूषन भाव।
नैननि देत कजरवा, फूलनि चाव।।11।।

(विश्रब्धर नवोढ़ा)

जंघन जोरत गोरिया, करत कठोर।
छुअन न पावै पियवा, कहुँ कुच-कोर।।12।।

(मध्यतमा)

ढीलि आँख जल अँचवत, तरुनि सुभाय।
धरि खसिकाइ घइलना, मुरि मुसुकाय।।13।।

(प्रौढ़ रतिप्रीता)

भोरहि बोलि कोइलिया, बढ़वति ताप।
घरी एक घरि अलवा, रह चुपचाप।।14।।

(परकीया)

सुनि सुनि कान मुरलिया, रागन भेद।
गैल न छाँड़त गोरिया, गनत न खेद।।15।।

(ऊढ़ा)

निसु दिन सासु ननदिया, मुहि घर हेर।
सुनन न देत मुरलिया मधुरी टेर।।161।

(अनूढ़ा)

मोहि बर जोग कन्हैाया लागौं पाय।
तुहु कुल पूज देवतवा, होहु सहाय।।17।।

(भूत सुरति-संगोपना)

चूनत फूल गुलबवा डार कटील।
टुटिगा बंद अँगियवा, फटि पट नील।।18।।

आयेसि कवनेउ ओरवा, सुगना सार।
परिगा दाग अधरवा, चोंच चोटार।।19।।

(वर्तमान सुरति-गोपना)

मं पठयेउ जिहि मकवॉं, आयेस साध।
छुटिगा सीस को जुरवा, कसि के बाँध।।20।।

मुहि तुहि हरबर आवत, भा पथ खेद।
रहि रहि लेत उससवा, बहत प्रसेद।।21।।

(भविष्यत सुरति-गोपनान)

होइ कत आइ बदरिया, बरखहि पाथ।
जैहौं घन अमरैया, सुगना सा‍थ।।22।।

जैहौं चुनन कुसुमियॉं, खेत बडिे दूर।
नौआ केर छोहरिया, मुहि सँग कूर।।23।।

(क्रिया-विदग्धान)

बाहिर लैके दियवा, बारन जाय।
सासु ननद ढिग पहुँचत, देत बुझाय।।24।।

(वचन-विदग्धाग)

तनिक सी नाक नथुनिया, मित हित नीक।
कहिति नाक पहिरावहु, चित दै सींक।।25।।

(लक्षिता)

आजु नैन के कजरा, औरे भाँत।
नागर नहे नवेलिया, सुदिने जात।।26।।

(अन्य -सुरति-दु:खिता)

बालम अस मन मिलियउँ, जस पय पानि।
हँसिनि भइल सवतिया, लइ बिलगानि।।27।।

(संभोग-दु:खिता)

मैं पठयउ जिहि कमवाँ, आयसि साध।
छुटिगो सीस को जुरवा, कसि के बाँधि।।28।।

मुहि तुहि हरबत आवत, भव पथ खेद।
रहि रहि लेत उससवा, बहत प्रसेद।।29।।

(प्रेम-गर्विता)

आपुहि देत जवकवा, गूँदत हार।
चुनि पहिराव चुनरिया, प्रानअधार।।30।।

अवरन पाय जवकवा, नाइन दीन।
मुहि पग आगर गोरिया, आनन कीन।।31।।

(रूप-गर्विता)

खीन मलिन बिखभैया, औगुन तीन।
मोहिं कहत विधुबदनी, पिय मतिहीन।।32।।

दातुल भयसि सुगरुवा, निरस पखान।
यह मधु भरल अधरवा, करसि गुमान।।33।।

(प्रथम अनुशयना, भावी-संकेतनष्टार)

धीरज धरु किन गोरिया करि अनुराग।
जात जहाँ पिय देसवा, घन बन बाग।। 34।।

जनि मरु रोय दुलहिया, कर मन ऊन।
सघन कुंज ससुररिया, औ घर सून।।35।।

(द्वितीय अनुशयना, संकेत-विघट्टना)

जमुना तीर तरुनिअहि लखि भो सूल।
झरिगो रूख बेइलिया, फुलत न फूल।।36।।

ग्रीषम दवत दवरिया, कुंज कुटीर।
तिमि तिमि तकत तरुनिअहिं, बाढ़ी पीर।।37।।

(तृतीय अनुशयना, रमणगमना)

मितवा करत बँसुरिया, सुमन सपात।
फिरि फिरि तकत तरुनिया, मन पछतात।।38।।

मित उत तें फिरि आयेउ, देखु न राम।
मैं न गई अमरैया, लहेउ न काम।।39।।

(मुदिता)

नेवते गइल ननदिया, मैके सासु।
दुलहिनि तोरि खबारिया,आवै आँसु।।40।।

जैहौं काल नेवतवा, भा दु:ख दून।
गॉंव करेसि रखवरिया, सब घर सून।।41।।

(कुलटा)

जस मद मातल हथिया, हुमकत जात।
चितवत जात तरुनिया, मन मुसकात।।42।।

चितवत ऊँच अटरिया, दहिने बाम।
लाखन लखत विछियवा, लखी सकाम।।43।।

(सामान्या गणिका)

लखि लखि धनिक नयकवा बनवत भेष।
रहि गइ हेरि अरसिया कजरा रेख।।44।।

(मुग्धाि प्रोषितपतिका)

कासो कहौ सँदेसवा, पिय परदेसु।
लागेहु चइत न फले तेहि बन टेसु।।45।।

(मध्यात प्रोषितपतिका)

का तुम जुगुल तिरियवा, झगरति आय।
पिय बिन मनहुँ अटरिया, मुहि न सुहाय।।46।।

(प्रौढ़ा प्रोषितपतिका)

तैं अब जासि बेइलिया, बरु जरि मूल।
बिनु पिय सूल करेजवा, लखि तुअ फूल।।47।।

या झर में घर घर में, मदन हिलोर।
पिय नहिं अपने कर में, करमै खोर।।48।।

(मुग्धाप खंडिता)

सखि सिख मान नवेलिया, कीन्हेोसि मान।
पिय बिन कोपभवनवा, ठानेसि ठान।।49।।

सीस नवायँ नवेलिया, निचवइ जोय।
छिति खबि, छोर छिगुरिया, सुसुकति रोय।।50।।

गिरि गइ पीय पगरिया, आलस पाइ।
पवढ़हु जाइ बरोठवा, सेज डसाइ।।51।।

पोछहु अधर कजरवा, जावक भाल।
उपजेउ पीतम छतिया, बिनु गुन माल।।52।।

(प्रौढ़ा खंडिता)

पिय आवत अँगनैया, उठि कै लीन।
सा‍थे चतुर तिरियवा, बैठक दीन।।53।।

पवढ़हु पीय पलँगिया, मींजहुँ पाय।
रैनि जगे कर निंदिया, सब मिटि जाय।।54।।

(परकीया खंडिता)

जेहि लगि सजन सनेहिया, छुटि घर बार।
आपन हित परिवरवा, सोच परार।।55।।

(गणिका खंडिता)

मितवा ओठ कजरवा, जावक भाल।
लियेसि का‍ढ़ि बइरिनिया, तकि मनिमाल।।56।।

(मुग्धाज कलहांतरिता)

आयेहु अबहिं गवनवा, जुरुते मान।
अब रस लागिहि गोरिअहि, मन पछतान।।57।।

(मग्धा कलहांतरिता)

मैं मतिमंद तिरियवा, परिलिउँ भोर।
तेहि नहिं कंत मनउलेउँ, तेहि कछु खोर।।58।।

(प्रौढ़ा कलहांतरिता)

थकि गा करि मनुहरिया, फिरि गा पीय।
मैं उठि तुरति न लायेउँ, हिमकर हीय।।59।।

(परकीया कलहांतरिता)

जेहि लगि कीन बिरोधवा, ननद जिठानि।
रखिउँ न लाइ करेजवा, तेहि हित जानि।।60।।

(गणिका कलहांतरिता)

जिहि दीन्हेलउ बहु बिरिया, मुहि मनिमाल।
तिहि ते रूठेउँ सखिया, फिरि गे लाल।।61।।

(मुग्धाठ विप्रलब्धाा)

लखे न कंत सहेटवा, फिरि दुबराय।
धनिया कमलबदनिया, गइ कुम्हिलाय।।62।।

(मध्याब विप्रलब्धाइ)

देखि न केलि-भवनवा, नंदकुमार।
लै लै ऊँच उससवा, भइ बिकरार।।63।।

(प्रौढ़ा विप्रलब्धान)

देखि न कंत सहेटवा, भा दुख पूर।
भौ तन नैन कजरवा, होय गा झूर।।64।।

(परकीया विप्रलब्धा )

बैरिन भा अभिसरवा, अति दुख दानि।
प्रातउ मिलेउ न मितवा, भइ पछितानि।।65।।

(गणिका विप्रलब्धात)

करिकै सोरह सिंगरवा, अतर लगाइ।
मिलेउ न लाल सहेटवा, फिरि पछिताई।।66।।

(मुग्धाल उत्कं,ठिता)

भा जुग जाम जमिनिया, पिय नहिं जाय।
राखेउ कवन सवतिया, रहि बिलमाय।।67।।

(मध्या उत्कं,ठिता)

जोहत तीय अँगनवा, पिय की बाट।
बेचेउ चतुर तिरियवा, केहि के हाट।।68।।

(प्रौढ़ा उत्कंाठिता)

पिय पथ हेरत गोरिया, भा भिनसार।
चलहु न करिहि तिरियवा, तुअ इतबार।।69।।

(परकीया उत्कंिठिता)

उठि उठि जात खिरिकिया, जोहत बाट।
कतहुँ न आवत मितवा, सुनि सुनि खाट।।70।।

(गणिका उत्कंवठिता)

कठिन नींद भिनुसरवा, आलस पाइ।
धन दै मूरख मितवा, रहल लोभाइ।।71।।

(मुग्धा वासकसज्जार)

हरुए गवन नबेलिया, दीठि बचाइ।
पौढ़ी जाइ पलँगिया, सेज बिछाइ।।72।।

(मध्या वासकसज्जास)

सुभग बिछाई पलँगिया, अंग सिंगार।
चितवत चौंकि तरुनिया, दै दृ्ग द्वार।।73।।

(प्रौढ़ा वासकसज्जास)

हँसि हँसि हेरि अरसिया, सहज सिंगार।
उतरत चढ़त नवेलिया, तिय कै बार।।74।।

(परकीया वासकसज्जा,)

सोवत सब गुरू लोगवा, जानेउ बाल।
दीन्हेबसि खोलि खिरकिया, उठि कै हाल।।75।।

(सामान्याह वासकसज्जा,)

कीन्हेमसि सबै सिंगरवा, चातुर बाल।
ऐहै प्रानपिअरवा, लै मनिमाल।।76।।

(मुग्धाय स्वांधीनपतिका)

आपुहि देत जवकवा, गहि गहि पाय।
आपु देत मोहि पियवा, पान खवाय।।77।।

(मध्याो स्वांधीनपतिका)

प्रीतम करत पियरवा, कहल न जात।
रहत गढ़ावत सोनवा, इहै सिरात।।78।।

(प्रौढ़ा स्वाधीनपतिका)

मैं अरु मोर पियरवा, जस जल मीन।
बिछुरत तजत परनवा, रहत अधीन।।79।।

(परकीया स्वाधीनपतिका)

भो जुग नैन चकोरवा, पिय मुख चंद।
जानत है तिय अपुनै, मोहि सुखकंद।।80।।

(सामान्याअ स्वाधीनपतिका)

लै हीरन के हरवा, मानिकमाल।
मोहि रहत पहिरावत, बस ह्वै लाल।।81।।

(मुग्धाह अभिसारिका)

चलीं लिवाइ नवेलिअहि, सखि सब संग।
जस हुलसत गा गोदवा, मत्तस मतंग।।82।।

(मध्याग अभिसारिका)

पहिरे लाल अछुअवा, तिय-गज पाय।
चढ़े नेह-हथिअवहा, हुलसत जाय।।83।।

(प्रौढ़ा अभिसारिका)

चली रैनि अँधिअरिया, साहस गा‍ढि।
पायन केर कँगनिया, डारेसि का‍ढि।।84।।

(परकीया क(ष्णा,भिसारिका)

नील मनिन के हरवा, नील सिंगार।
किए रैनि अँधिअरिया, धनि अभिसार।।85।।

(शुक्लाँभिसारिका)

सेत कुसुम कै हरवा भूषन सेत।
चली रैनि उँजिअरिया, पिय के हेत।।86।।

(दिवाभिसारिका)

पहिरि बसन जरतरिया, पिय के होत।
चली जेठ दुपहरिया, मिलि रवि जोत।।87।।

(गणिका अभिसारिका)

धन हित कीन्हि सिंगरवा, चातुर बाल।
चली संग लै चेरिया, जहवाँ लाल।।88।।

(मुग्धा प्रवत्य्व त्पतिका)

परिगा कानन सखिया पिय कै गौन।
बैठी कनक पलँगिया, ह्वै कै मौन।।89।।

(मध्याप प्रवत्य्व त्पतिका)

सुठि सुकुमार तरुयिका, सुनि पिय-गौन।
लाजनि पौ‍ढि ओबरिया, ह्वै कै मौन।।90।।

(प्रौढ़ा प्रवत्य्बरित्पतिका)

बन धन फूलहि टेसुआ, बगिअनि बेलि।
चलेउ बिदेस पियरवा फगुआ खेलि।।91।।

(परकीया प्रवत्य्ग त्पतिका)

मितवा चलेउ बिदेसवा मन अनुरागि।
पिय की सुरत गगरिया, रहि मग लागि।।92।।

(गणिका प्रवत्य् म त्पतिका)

पीतम इक सुमिरिनिया, मुहि देइ जाहु।
जेहि जप तोर बिरहवा, करब निबाहु।।93।।

(गुग्धार आगतपतिका)

बहुत दिवस पर पियवा, आयेउ आज।
पुलकित नवल दुलहिवा, कर गृह-काज।।94।।

(मध्याल आगतपतिका)

पियवा आय दुअरवा, उठि किन देख।
दुरलभ पाय बिदेसिया,मुद अवरेख।।95।।

(प्रौढ़ा आगतपतिका)

आवत सुनत तिरियवा, उठि हरषाइ।
तलफत मनहुँ मछरिया, जनु जल पाइ।।96।।

(परकीया आगतपतिका)

पूछन चली खबरिया, मितवा तीर।
हरखित अतिहि तिरियवा पहिरत चीर।।97।।

(गणिका आगतपतिका)

तौ लगि मिटिहि न मितवा, तन की पीर।
जौ लगि पहिर न हरवा, जटित सुहीर।।98।।

(नायक)

सुंदर चतुर धनिकवा, जाति के ऊँच।
केलि-कला परबिनवा, सील समूच।।99।।

(नायक भेद)

पति, उपपति, वैसिकवा, त्रिबिध बखान।

(पति लक्षण)

बिधि सो ब्याणह्यो गुरु जन पति सो जानि।।100।।

(पति)

लैकै सुघर खुरुपिया, पिय के साथ।
छइवै एक छतरिया, बरखत पाथ।।101।।

(अनुकूल)

करत न हिय अपरधवा, सपनेहुँ पीय।
मान करन की बेरिया, रहि गइ हीय।।102।।

(दक्षिण)

सौतिन करहि निहोरवा, हम कहँ देहु।
चुन चु चंपक चुरिया, उच से लेहु।।103।।

(शठ)

छूटेउ लाज डगरिया, औ कुल कानि।
करत जात अपरधवा, परि गइ बानि।।104।।

(धृष्टप)

जहवाँ जात रइनियाँ तहवाँ जाहु।
जोरि नयन निरलजवा, कत मुसुकाहु।।105।।

(उपपति)

झाँकि झरोखन गोरिया, अँखियन जोर।
फिरि चितवन चित मितवा, करत निहोर।।106।।

(वचन-चतुर)

सघन कुंज अमरैया, सीतल छाँह।
झगरत आय कोइलिया, पुनि उड़ि जाह।।107।।

(क्रिया-चतुर)

खेलत जानेसि टोलवा, नंदकिसोर।
हुइ वृषभानु कुँअरिया, होगा चोर।।108।।

(वैशिक)

जनु अति नील अलकिया बनसी लाय।
भो मन बारबधुअवा, तीय बझाय।।109।।

(प्रोषित नायक)

करबौं ऊँच अटरिया, तिय सँग केलि।
कबधौं, पहिरि गजरवा, हार चमेलि।।110।।

(मानी)

अब भरि जनम सहेलिया, तकब न ओहि।
ऐंठलि गइ अभिमनिया, तजि कै मोहि।।111।।

(स्वप्न,दर्शन)

पीतम मिलेउ सपनवाँ भइ सुख-खानि।
आनि जगाएसि चेरिया, भइ दुखदानि।।112।।

(चित्र दर्शन)

पिय मूरति चितसरिया, चितवन बाल।
सुमिरत अवधि बसरवा, जपि जपि माल।।113।।

(श्रवण)

आयेउ मीत बिदेसिया, सुन सखि तोर।
उठि किन करसि सिंगरवा, सुनि सिख मोर।।114।।

(साक्षात दर्शन)

बिरहिनि अवर बिदेसिया, भै इक ठोर।
पिय-मुख तकत तिरियवा, चंद चकोर।।115।।

(मंडन)

सखियन कीन्ह सिंगरवा रचि बहु भाँति।
हेरति नैन अरसिया, मुरि मुसुकाति।।116।।

(शिक्षा)

छाकहु बैठ दुअरिया मीजहु पाय।
पिय तन पेखि गरमिया, बिजन डोलाय।।117।।

(उपालंभ)

चुप होइ रहेउ सँदेसवा, सुनि मुसुकाय।
पिय निज कर बिछवनवा, दीन्हम उठाय।।118।।

(परिहास)

बिहँसति भौहँ चढ़ाये, धुनष मनीय।
लावत उर अबलनिया, उठि उठि पीय।।119।।

1.

भोरहिं बोलि कोइलिया बढ़वति ताप।
घरी एक भरि अलिया रहु चुपचाप
बाहर लैकै दियवा बारन जाइ।
सासु ननद घर पहुँचत देति बुझाइ
पिय आवत अंगनैया उठिकै लीन।
बिहँसत चतुर तिरियवा बैठक दीन
लै कै सुघर खुरपिया पिय के साथ।
छइबै एक छतरिया बरसत पाथ
पीतम इक सुमरिनियाँ मोहिं देइ जाहु।
जेहि जपि तोर बिरहवा करब निबाहु
मनमोहक.... यदि शब्दार्थ सहित हिन्दी व्याख्या होती तो और भी सुबोध लगता भाई
 
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Sutradhar

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छुटी न सिसुता की झलक झलक्यौ जोबनु अंग।
दीपति देह दुहूनु मिलि दिपति ताफता रंग॥24॥


सिसुता = शिशुता = बचपन। जोबनु = जवानी। देह-दीपति = देह की दीप्ति, शरीर की चमक। ताफता = धूपछाँह नामक कपड़ा जो सीप की तरह रंग-बिरंग झलकता या मोर की करदन की तरह कभी हल्का और कभी गाढ़ा चमकीला रंग झलकता है। ‘धूप+छाँह’ नाम से ही अर्थ का आभास मिलता है। दिपति = चमकती है।

अभी बचपन की झलक छूटी ही नहीं, और शरीर में जवानी झलकने लगी। यों दोनों (अवस्थाओं) के मिलने से (नायिका के) अंगों की छटा धूपछाँह के समान (दुरंगी) चमकती है।

.....

वाह कोमल जी

क्या बात है ! आप का ज्ञान अचंभित कर देता है। ऐसे ही प्रयास की आवश्यकता थी।

मेरा अभिवादन स्वीकार करें।

सादर
 

Umakant007

चरित्रं विचित्रं...
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मदन द्वादशी तिथि एवं अनंग त्रयोदशी तिथि के उपलक्ष्य में

कामदेव के किन-किन चीजों में और कहां वास करते हैं, इसको लेकर एक मंत्र में काफी स्‍पष्‍टता के साथ बताया गया है…

यौवनं स्त्री च पुष्पाणि सुवासानि महामते:।

गानं मधुरश्चैव मृदुलाण्डजशब्दक:।।

उद्यानानि वसन्तश्च सुवासाश्चन्दनादय:।
सङ्गो विषयसक्तानां नराणां गुह्यदर्शनम्।।


वायुर्मद: सुवासश्र्च वस्त्राण्यपि नवानि वै।
भूषणादिकमेवं ते देहा नाना कृता मया।।

कामदेव का वास यौवन, स्त्री, सुंदर फूल, गीत, पराग कण या फूलों का रस, पक्षियों की मीठी आवाज, सुंदर बाग-बगीचों, बसंत ऋ‍तु, चंदन, काम-वासनाओं में लिप्त मनुष्य की संगति, छुपे अंग, सुहानी व धीमी हवा, रहने के सुंदर स्थान, आकर्षक वस्त्र और सुंदर आभूषण धारण किए शरीरों में रहता है. इसके अलावा कामदेव स्त्रियों के शरीर में भी वास करते हैं. इसमें भी खासतौर पर स्त्रियों के नयन, ललाट, भौंह और होठों पर इनका असर बहुत ज्‍यादा रहता है.


ॐ वारणे मदनं बाण-पाशांकुशशरासनाः।

धारयन्तं जपारक्तं ध्यायेद्रक्त-विभूषणम् ।।

सव्येन पतिमाश्लिष्य वामेनोत्पल-धारिणीम्।
पाणिना रमणांकस्थां रतिं सम्यग् विचिन्तयेत्।।

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कामदेव रति ध्यान*

*शुभा रतिः प्रकर्तव्या वसन्तोज्ज्वलभूषणा । नृत्यमाना शुभा देवी समस्ताभरणैर्युता ।।*
*वीणावादनशीला च मदकर्पूरचर्चिता ।’*

से रति देवी का

और

*"कामदेवस्तु कर्तव्यो रुपेणाप्रतिमो भुवि। अष्टबाहुः स कर्तव्यः शंखपद्मविभूषणः।।*

*चापबाणकरश्चैव मदादञ्चितलोचनः। रतिः प्रीतिस्तथा शक्तिर्मदशक्तिस्तथोज्ज्वला ।।*
*चतस्त्रस्तस्य कर्तव्याः पत्न्यो रुपमनोहराः। चत्वारश्च करास्तस्य कार्या भार्यास्तनोपगाः।।*

*केतुश्च मकरः कार्यः पञ्चबाणमुखो महान्।’*

से कामदेव का ध्यान करके विविध प्रकार के फल, पुष्प और पत्रादि समर्पण करे तो गृहस्थ जीवन सुखमय होकर प्रत्येक कार्य में उत्साह प्राप्त होता है।
 
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komaalrani

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मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ,

शब्दार्थ होने से पाठक उन शब्दों के साथ जोड़ कर दोहे का, कविता का रस ले सकता है और पूरा अर्थ होने पर भी भाव और रस का बोध जो जाता है।

अधिकतर रीती कालीन कवितायें ब्रज भाषा में जिनसे हम सब अधिकतर अपरचित या अत्यल्प परिचित है इसलिए अर्थ सहित होने से आनंद ज्यादा आता है, भाषा एक पुल की तरह है जिससे होकर हम एक छोर से दूसरे छोर तक जा सकते हैं।

एक बात और, किसी कवि के साथ यह भी महत्वपूर्ण है की वह टीकाकार कौन है जिसने उस कविता की मीमांसा की है। जैसे बिहारी ( जिनके दोहों पर यह थ्रेड आधारित था ) के अनेक टीकाकार है लेकिन जगन्नाथ दास की टीका ' बिहारी रत्नाकर' सबसे अच्छी मानी जाती है।

मेरा यह प्रयास था की यह फोरम ' इरोटिका' पर अगर आधारित है तो इसलिए मैंने यह दुष्चेस्टा की

परन्तु फोरम के विज्ञ मॉडरेटर्स की दृष्टि यहाँ पड़ गयी और कान पकड़ कर इस सूत्र को उन्होंने लाउंज से निकाल कर ' अदर डिस्कसन ' की श्रेणी में ला कर पटक दिया जिसके तीन संवर्ग है, समाचार, तकनिकी चर्चा और फोरम गेम्स। मुझे नहीं समझ में आया की कविता इन में से किस श्रेणी में आएगी और क्यों लाउंज में कविताओं पर बात करना निषिद्ध है। पता चला की यह फोरम गेम्स में शुमार कर दिया जहाँ नया शब्द बनाओ, नान वेज जोक्स, क्रिकेट इत्यादि हैं। मैंने एक दो पोस्ट्स लिखी भी लेकिन मेरे पास एक ही विकल्प था थ्रेड बंद करने का या पोस्ट न करने का,

और मैंने पोस्ट न करने का फैसला लिया।

क्योंकि अगर मालिक लोगों को ही कविता के प्रति यह दृष्टिकोण है तो हमें उसका आदर करना चाहिए

पर उमाकांत जी का आभार की वो अभी भी रससिद्ध रसज्ञ पाठकों के लिए कभी कभी पोस्ट करते रहते हैं , मेरी भी यही अनुरोध है जब करें कोशिश करें की अर्थ सहित दें तो उसकी पहुँच बढ़ जायेगी।
 
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vakharia

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मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ,

शब्दार्थ होने से पाठक उन शब्दों के साथ जोड़ कर दोहे का, कविता का रस ले सकता है और पूरा अर्थ होने पर भी भाव और रस का बोध जो जाता है।

अधिकतर रीती कालीन कवितायें ब्रज भाषा में जिनसे हम सब अधिकतर अपरचित या अत्यल्प परिचित है इसलिए अर्थ सहित होने से आनंद ज्यादा आता है, भाषा एक पुल की तरह है जिससे होकर हम एक छोर से दूसरे छोर तक जा सकते हैं।

एक बात और, किसी कवि के साथ यह भी महत्वपूर्ण है की वह टीकाकार कौन है जिसने उस कविता की मीमांसा की है। जैसे बिहारी ( जिनके दोहों पर यह थ्रेड आधारित था ) के अनेक टीकाकार है लेकिन जगन्नाथ दास की टीका ' बिहारी रत्नाकर' सबसे अच्छी मानी जाती है।

मेरा यह प्रयास था की यह फोरम ' इरोटिका' पर अगर आधारित है तो इसलिए मैंने यह दुष्चेस्टा की

परन्तु फोरम के विज्ञ मॉडरेटर्स की दृष्टि यहाँ पड़ गयी और कान पकड़ कर इस सूत्र को उन्होंने लाउंज से निकाल कर ' अदर डिस्कसन ' की श्रेणी में ला कर पटक दिया जिसके तीन संवर्ग है, समाचार, तकनिकी चर्चा और फोरम गेम्स। मुझे नहीं समझ में आया की कविता इन में से किस श्रेणी में आएगी और क्यों लाउंज में कविताओं पर बात करना निषिद्ध है। पता चला की यह फोरम गेम्स में शुमार कर दिया जहाँ नया शब्द बनाओ, नान वेज जोक्स, क्रिकेट इत्यादि हैं। मैंने एक दो पोस्ट्स लिखी भी लेकिन मेरे पास एक ही विकल्प था थ्रेड बंद करने का या पोस्ट न करने का,

और मैंने पोस्ट न करने का फैसला लिया।

क्योंकि अगर मालिक लोगों को ही कविता के प्रति यह दृष्टिकोण है तो हमें उसका आदर करना चाहिए

पर उमाकांत जी का आभार की वो अभी भी रससिद्ध रसज्ञ पाठकों के लिए कभी कभी पोस्ट करते रहते हैं , मेरी भी यही अनुरोध है जब करें कोशिश करें की अर्थ सहित दें तो उसकी पहुँच बढ़ जायेगी।
अति-उत्कृष्ट सूत्र...

यह दोहे प्रेम, सौंदर्य, और उनसे जुड़ी भावनाओं को बड़े ही शृंगारिक ढंग से व्यक्त करते हैं। इन दोहों में उत्कृष्ट रूप से संगीतमय भाषा का प्रयोग भी है, जो पठनकर्ता के मन को मोह लेता है। कितनी सुंदरता से यह शब्द प्रेम और सुंदरता की भावनाओं को पूर्णता से उजागर करते हैं और उन्हें सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का एक माध्यम भी बनाते हैं।

बहुधा पठनकर्ता लोकभोग्य भाषा की अपेक्षा रखते है.. और यह गलत भी नही है क्योंकी विशुद्ध भाषा को आत्मसात करना प्रायः कठिन होता है।


इस धरोहर को फोरम के वाचकों को उपलब्ध करवा कर आपने उत्तम कार्य किया है। बिहारी भाषा में लिखित दोहों को अर्थ के साथ समझने का अवसर प्रदान करने के लिए दिल से धन्यवाद...
 
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Umakant007

चरित्रं विचित्रं...
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शुक्लाभिसारिका नायिका कामसूत्र ...

भारतीय साहित्य और काव्यशास्त्र (जैसे भानुदत्त की रसमंजरी) के अनुसार शुक्लाभिसारिका उस नायिका को कहते हैं जो चांदनी रात में अपने प्रेमी से मिलने के लिए जाती है....

संस्कृत साहित्य में अभिसारिका नायिका के तीन मुख्य प्रकार बताए गए हैं जो समय और परिस्थिति पर आधारित हैं....
शुक्लभिसारिका
कृष्णाभिसारिका
दिवाभीसारिका....


शुक्लाभिसारिका-

जो नायिका शुक्ल पक्ष की दूध जैसी सफेद चांदनी (चांदनी रात) में अपने प्रेमी से मिलने के लिए घर से निकलती है वह अक्सर सफेद रंग के वस्त्र और सफेद आभूषण धारण करती है ताकि वह चांदनी में घुल-मिल जाए और किसी को दिखाई न दे.....

विशेषताएँ-
साहस- वह समाज और लोक-लाज की चिंता किए बिना अपने प्रेम के लिए रात में निकलती है...

चतुराई- वह चांदनी में छिपने के लिए सफेद वस्त्रों का चुनाव करती है ताकि पहरेदारों या अन्य लोगों की नजरों से बच सके....

भाव-इसमें मिलन की तीव्र उत्कंठा और रोमांच का मिश्रण होता है...


बिहारी सतसई जैसे श्रृंगार प्रधान काव्य ग्रंथों में शुक्लाभिसारिका के सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उसका शरीर इतना गौर वर्ण (गोरा) और दीप्तिमान है कि वह चांदनी रात में सफेद कपड़े पहनने पर भी अपनी चमक से पहचानी जा सकती है...!!!
 
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komaalrani

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अति-उत्कृष्ट सूत्र...

यह दोहे प्रेम, सौंदर्य, और उनसे जुड़ी भावनाओं को बड़े ही शृंगारिक ढंग से व्यक्त करते हैं। इन दोहों में उत्कृष्ट रूप से संगीतमय भाषा का प्रयोग भी है, जो पठनकर्ता के मन को मोह लेता है। कितनी सुंदरता से यह शब्द प्रेम और सुंदरता की भावनाओं को पूर्णता से उजागर करते हैं और उन्हें सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का एक माध्यम भी बनाते हैं।

बहुधा पठनकर्ता लोकभोग्य भाषा की अपेक्षा रखते है.. और यह गलत भी नही है क्योंकी विशुद्ध भाषा को आत्मसात करना प्रायः कठिन होता है।


इस धरोहर को फोरम के वाचकों को उपलब्ध करवा कर आपने उत्तम कार्य किया है। बिहारी भाषा में लिखित दोहों को अर्थ के साथ समझने का अवसर प्रदान करने के लिए दिल से धन्यवाद...
पहले तो विलम्ब से आभार व्यक्त करने के लिए क्षमा, कोटिश क्षमा,

असल में इस सूत्र पर शायद ही कोई आता है और मॉडरेटर्स ने कान पकड़ कर इस सूत्र को वैसे ही एक कोने में डाल दिया। मैंने मानती हूँ की इरोटिका के फोरम में एक कोना इरोटिका से जुड़े साहित्य पर, और उसके अन्य पक्षों पर चर्चा करने के लिए होना चाहिए , पर

यह थ्रेड मैंने इस लिए शुरू किया था की हम सब जो लेखक लेखिकाएं है, पाठक /पाठिकाएं हैं लिखे हुए में लालित्य भी ढूँढ़ते हैं या ढूढ़ना चाहिए, बिना अलंकार के साहित्य और स्त्री दोनों सूने लगते हैं और स्त्री के लिए यह अलंकार, स्त्री सुलभ लज्जा भी हो सकती है, पलकों का उठना, झुकना और कनखियों से देखना भी हो सकता है, जो पुरुष के मन को चुरा ले, और उस दृश्यबंध को लिखते हुए हम सब अक्सर उपमा की, रूपक की तलाश करते हैं। सिर्फ यह कहना की वह स्त्री या कन्या बहुत सुन्दर थी, पाठकों तक वह भाव नहीं पहुंचा सकता जो हम चाहते हैं।

इसलिए मैंने सोचा की जो श्रृंगारिक साहित्य लिखने में हमारे अग्रज हैं उन्हें सहज सुलभ कराया जाय, और वही उपमा तो नहीं लेकिन उसी तरह की उपमा या दृश्य बंध में वह मदद कर सकते हैं।

और सिर्फ रूप में नहीं केलि क्रीड़ा में भी

लेकिन मॉडस के निर्णय के बाद मैंने भी एक फैसला लिया और एक मेसेज पोस्ट किया

i am not sure about the purpose of this thread hence i am planning to close it. Being an ignoramus, i am not aware how to do it so i had posted a request in the suggestions forum, and as soon i get advice i will be closing it.

why the thread was moved remains a mystery to me but there must have been some reason. I must have caused some infringements, some infractions,... the thread was started in lounge some time back, September 15 to be precise but not once it was told me that its an appropriate thread in this forum. There are many threads dealing with poetry and shayri, movies including mine in the lounge.

May be pics were the offensive part but let me explain that they were just explanatory. I did not receive any communication except a message that the thread has been moved to some other corner. and i respect it. thanks again, so till i am able to close it, adieu

उस के बाद मैंने इस थ्रेड पर पोस्ट करना यहाँ तक की कमेंट भी करना बंद कर दिया।

इस थ्रेड में मैंने सिर्फ बिहारी के दोहे ही नहीं लिखे उसी विषय पर उर्दू के शेर भी साथ में कोट किये, और दोनों का अर्थ दिया।

एक बार फिर से आभार यहाँ पधारने
 
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