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Hello Hello !! .... My reader log kaafi time hogaya kaafi saare personal reasons ki wajah so i guess ab wapas aajana chahiye 

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Great update and awesome writingअध्याय -03
जब राजीव मुझे आंटी के यहां छोड कर गया तब तक रात के आठ बज चुके थे। मैं घर के भीतर आया घर की बनावट कुछ इस तरह है जब हम अंदर आएंगे तो सामने ही लिविंग एरिया है गेट के दांई ओर से लगती हुई सीढ़ियां हैं ऊपर जाने के लिए..... लिविंग एरिया के बाईं तरफ एक कमरा और सीढियां से लगकर भी एक कमरा है। और लिविंग एरिया को पार करते ही किचन है और उससे लगता हुआ एक और कमरा जो की स्टोर रूम है और बाकि कमरों से छोटा भी है।
जैसे ही गेट चेक किया तो खुला था तो बिना घंटी बजाए ही मैंने गेट खोला और अंदर आकर गेट लगाया और सीढियां चढ़ने लगा तब ही आवाज आई.....
आंटी (रोमा)- "अरे बेटा तुम कब आए और अभी से ऊपर जाने लगे अब खाने का समय होने ही वाला है....खा कर ही जाना अपने कमरे में आओ बैठो इधर ही "......लगता है दरवाजा बंद करने की आवाज से आंटी को पता चला होगा तब ही वो बाहार आईं और मैं दिख गया।
मयंक - "हां आंटी मैं अभी खाने की बात करके ही आया था उधर टिफिन सेंटर पर तो कुछ देर बाद जाना है उधर ....आप परेशान क्यूं होती है।"......यह कहते हुए मैं और आंटी सोफे पर बैठ गए।
इस बात को सुनकर आंटी को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा शायद.... उनके चहरे को पढकर इतना तो पता चल गया मुझे ...आंटी बिना कुछ कहे ही चुपचाप किचन की तरफ जाने लगी।..... मुझे थोडा अजीब लगा ऐसा क्या बोल दिया भला मैंने मैं यह सब सोच ही रहा था। .....पर तब ही आंटी प्लेट में सब्जी लेकर सोफे की तरफ आने लगी ।
आंटी सोफे पर बैठी प्लेट और चाकू सामने मैज पर रखा और मैज पर रखे टेलीफोन का रिसीवर उठा कर नंबर डायल करने लगी। आंटी का एक दम से ऐसे चुप हो जाना मुझे अंदर बहुत डरा रहा था जाने क्यूं पर फट रही थी मेरी । अब ऐसा नहीं है की मैं आंटी से डर रहा हूं पर जो इंसान तुम से पहली बार मिलने के समय से ही बहुत अच्छा विहेव करे और फिर तुम्हारी कही एक बात से बिल्कुल शांत हो जाए तो लगता है बुरा फिर मैंने तो कुछ उल्टा सीधा भी नहीं कहा था।
"आंटी आप चुप क्यों हैं और आप किसको फोन कर रही है"....जब आंटी ने रिसीवर कान से लगाया तो मुझ से रहा नहीं गया और मैंने पूछ लिया
आंटी - "तुम्हारे अंकल को फोन कर रही हूं कहने के लिए की अनिल से कह दें की अपने भतीजे (मयंक)को यहां से ले जाए मैं नहीं रखने वाली इसे..."
"आंटी आप नाराज़ मत हो .... प्लीज़ फोन रख दो मुझे बताओ तो गलती क्या हो गई।"..... लेकिन आंटी ने टेलीफोन का स्पीकर वाला बटन दवा दिया ....अब तो मैं समझ गया लग गई लंका
"हां रोमा बोलो "..... सामने से अंकल की आवाज आई
आंटी -"हां आप पहुंच गए क्या अपनी ड्यूटी पर?"
अंकल -"हां रोमा ....बोलो क्या बात है "
आंटी -" काम नहीं था ....बस एक बात याद आई की....अब आप तो कार यूश करते हैं और आपकी बाइक गैराज में यूं ही पडी है...तो मैं सोच रही थी की उसको मयंक ही यूश कर लिया करेगा वैसे भी यहां पैदल थोडी घूमेगा ....तो अगर आप कहें तो मैं उसको बोलूं "
अंकल - "मोहतरमा आप हॉम मिनिस्टर हैं....और फिर सही बात के लिए क्या पूछना चाबी अपने कमरे में ही होगी ..... ठीक है रोमा मैं भी थोडा अपने कमरे की हालत सुधार लूं बाए ... गुडनाईट और जरूरत हो तो मयंक से बोल देना अपना ही बच्चा है"
अंकल की आखरी बात सुनते ही समझ गया मैं कि मुझसे क्या ग़लती हुई है ....और जब मैं सोच से बहार आया तो देखा फोंन कट चुका था आंटी मुझे ही देख रही थी और मैं समझ गया की उन्हें पता चल गया है की मैं अपनी गलती जान चुका हूं।
"सॉरी आंटी..."..... मैंने आंखें नीचे करते हुए कहा।
"कोई बात नहीं.... वैसे भी देखो तुम खुद ही समझ गए मुझे कुछ कहना ही नही पडा ......अब तुम बैठो मैं खाना बनाने जा रही हूं "
मैंने भी सामने रखी टीवी को चालू किया और देखने लगा। अभी मैं टीवी देख रहा था और सोच रहा था आंटी के बारे में की वो कितनी अच्छी है और मैंने आंटी की तरफ नजर की चूंकि लिविंग एरिया से किचन साफ साफ दिखता है और जब मैंने देखा तो मेरी नजर सीधे आंटी की कमर पर जम गई वैसे मेरे मन में आंटी के लिए कोई बुरा भाव नहीं था पर वो दृश्य इतना कामुक था आंटी ने पल्लु को कमर पर बांधा हुआ था और किचन के सिलेव पर सब्जी काट रही थी उनकी पीठ मेरी तरफ थी ।
कमर की वो ढलान से नीचे जाते ही उनका वो हिस्सा ऐसा था की साड़ी भी उस जगह बिल्कुल कसी हुई थी। फिर एक दम से ख्याल आया और मैंने अपने सर को झटकते हुए ध्यान टीवी की तरफ कर लिया।
5 मिनट बाद ही आंटी कुछ नमकीन और मिठाई लेकर आई और जैसी ही उन्होंने प्लेट रखी तो एक बार फिर वही अहसास हुआ मुझे मेरी नजर अपने आप ही उनके उन पुष्ट स्तन पर चली गई उन्होंने अभी हरे रंग का सूती ब्लाउज पहन रखा था और झुकने के साथ ही वो स्तन आगे की और आ गए जैसे अभी आगे की ओर आ ही जाएंगे मैं यकीन से कह सकता हुं उनकी गोलाई मेरे पंजे से बडी ही रही होगी।
"जब तक तुम ये नमकीन और मिठाई खालो ....दोपहर के खाने के बाद से तुमने कुछ नही खाया ना और अभी खाने में घंटा भर तो लग ही जाना है।".......आंटी की आवाज से मैं होश में आया ।
आंटी के जाते ही मैं सोचने लगा की आखिर मुझे हो क्या रहा है....आज से पहले तो कभी ऐसा फील नहीं हुआ था मुझे। मैंने अपना कालेज फाॅम प्राईवेट से भरा था जो की मेरे पिताजी की ही सलह थी उनका मानना था की रेगूलर स्टूडेंट के तौर पर कॉलेज जाना बेबकूभी है उससे अच्छा एक विघार्थियों को काॅलेज ना जाकर उन तीन सालो में अपने मन चाहे सरकारी परीक्षा के लिए तैयारी शुरू करनी चाहिए और इसी वजह से में अपने पहले इयर में ही इस शहर में आ चुका था मैंने ग्यारवीं और बारहवीं भी एक बाॅयस स्कूल से की है और यही कारण है की मेरी कन्याओं से बात करने में फट ती है।
पर वहीं दोस्त ज्यादा ना होने के कारण शुरू से ही मैं खेलों के द्वारा ही टाईम पास करता रहा हूं जिनमें से मुझे कुश्ती और कब्बड्डी में कुछ उपलब्धियां भी प्राप्त हुई। और इसका नतीजा यह है की राजीव और अपने परिवार जन के अलावा किसी से बात करने का मौका ही नहीं मिला।
और यही कारण था की आज आंटी को देख कर इन भावों का आना मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था। मैं यह सब ही सोच रहा था की आंटी ने खाने के लिए बुला लिया। और मैं भी टेवल की तरफ चल दिया और आंटी लिविंग एरिया में आई जब मैं जाने के लिए खडा हुआ उन्होंने एक नंबर डायल किया और सामने से आवाज आने के साथ ही उन्होंने सवाल किया ।
"कब तक आएगी तू....खाना भी बनकर तैयार हो गया है"
".............."
"अच्छा इतना लेट क्यूं....आज तेरी कोचिंग का पहला दिन था और उसी दिन लेट गई यह तेरी गलती थी अब उसको सुधारने के लिए देर तक आना यह कितना सही है भला ......."
".............."
" चल ठीक है इस बार माफ कर रही हूं आगे से नहीं करुंगी ध्यान रखना और एक घंटे में आ ही जाना मतलब दस बजे लास्ट "
और फिर सामने से कुछ कहा गया और आंटी ने फोन रख दिया ।
मयंक - "कौन था आंटी..?" ...... आंटी के टेवल पर बैठते ही मैंने सवाल किया ।
आंटी -"महारानी सहिबा है पहले दिन ही कोचिंग खतम होने के टाईम पर पहुंची और अब क्या क्या हुआ कोचिंग पर यह जानने के लिए अपनी सहेली के यहां हैं।"
मैं तो भूल ही गया था आंटी की एक लड़की भी है और लडकी का जिक्र आते ही मुझे वो कोचिंग वाली लडकी याद आई पर सब छोड कर मैने खाने पर ध्यान दिया और आंटी ने भी खाते वक्त बात चीत जारी रखी जैसे मेरे शहर और घर से रिलेटेड।
खाने के बाद में अपने कमरे में गया पूरे दिन जो पढाया गया उसको देखा और इसी बीच आंटी और एक लडकी की बात करने की आवाज नीचे से आई और मुझे सुनाई दिया मैं समझ गया की उनकी लडकी आ चकी है.....आंटी उसको मुझसे मिलाने की कह रही थी पर उसने मना किया और कहा की उसको नींद आ रही है और कुछ देर बाद सब शांत हो गया और मैंने भी अपनी किताबों को रखा और चला गया नींद में......
Nice update
Thanks Bhai logBahot bariya update tha bhai![]()

Nice and superb update....Update - 31
रात के करीब 12 बजे थे कि तब ही अनिल का फोन बजने लगा।
"हैलो"........अनिल ने फोन कान से लगाते हुए कहा।
"सर अभी अभी जोया का फोन चलू हुआ है और उस फोन से काॅल लगाया जा रहा है आप यहां आ जाएं ।"......... सामने से इतना कहने के साथ फोन कट गया जैसे ये फोन भी बहुत जल्दी में लगाया है।
जैसे ही सामने से अनिल ने ये सुना वो जल्दी से बिस्तर से खड़ा हुआ और अपना हुलिया ठीक करता हुआ लोवर टी-शर्ट में ही जिप्सी चालू करता हुआ घर से निकल चला ।
"क्या बात हुई और किस से"......... अनिल ने इस खंडर जैसी बिल्डिंग में आकर हेडफोन लगाए बैठे आदमी से पूछा।
"सर हुआ ये की जैसा आप ने हमसे कहा था दोनों एजेंट के फोन टेप करने है तो उसी वक्त से मैं कनेक्ट करने की कोशिश कर रहा था पर दोनों ही फोन थे जिस वजह से ना उनकी लोकेशन पता थी और ना ही उनके टेप कर सकते थे पर अभी कुछ देर पहले में जब ये सब बंद करके सोने जा रहा था तो सोचा आखरी बार और ट्राई करता हूं तो पहले तरुण का फोन चेक किया तो वहीं परिणाम था पर जैसे ही जोया के नंबर को टेप किया तो वह चालू था और तो और उससे किसी को फोन लगाया जा रहा था "........उस व्यक्ति की आंखें बड़ी मुश्किल से खुल रही थी पर उसने जिस तरह से अनिल को सब बता रहा था की वो अपनी ड्यूटी के लिए जज्बा रखता है।
"रिकोर्डिंग की"...... अनिल ने उस रेडियो जैसे उपकरण को देखते हुए सिर्फ इतना ही पूछा।
"जी सर"....... उस आदमी ने कहा इतना सुनते ही अनिल ने उसका कंधा थपथपाया और उसको सोने के लिए भेजता हुआ खुद उस कुर्सी पर बैठते हुए हेडफोन जैसे उपकरण को कान पर लगाता हुआ उस रेडियो जैसे उपकरण का एक खास बटन दबाया इसी के साथ वो रिकॉर्डिंग अनिल को सुनाई देने लगी।
(यहां जो आदमी जोया के फोन से बात कर रहा है उसको '1' और दूसरे को '2' लगाउंगा)
1 -"कैसे हो जनाब "
2-"सब खैरियत अपना बताएं"
"बस आपको इंतलआ करना था जो काम हम कल करने जा रहे हैं उससे हमारी काफी मदद हो जाने वाली है इसलिए कल की एक ग़लती हमारे मैं काम को टाल सकती है जो हमारे बोस को मंजूर नहीं होगा "
२ -"पर आपने आज इस नंबर से फोन क्यूं किया"
1 -"ये फोन उसका है जो लोगों के लिए इस दुनिया में अब मौजूद नहीं और हमारे फोन अब सुरक्षित नहीं है क्योंकि उनको हमारे मकसद के बारे में काफी खबर हो गई है कल अगर हमने काम अच्छे से किया फिर हमें काफी समय तक किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं होगी हम अपनी दहसत इस देश में फैला सकते हैं "
२-"बिल्कुल आप चिंता ना करें वैसे भी नोटों से काम खूब चला लिया हाहाहा "
इतना कहते ही सामने वाले ने फोन काट दिया और रिकोर्डिंग खत्म हो गई।
अनिल ने तुरंत बल्ली को फोन किया दो बार फोन ना उठने के बाद तीसरी बार में फोन उठा और उसको अपने आने की बताता हुआ अनिल उस खंडहर नुमा घर को बहार से ताला लगाता हुआ अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया जैसे अंदर रहने वाले उस व्यक्ति के बहार जाने का मन था ही नहीं ये अनिल जानता हो।
पर जैसे ही वो अपनी जिप्सी तक आया तो वहां राजीव और मयंक खड़े मिले।
"तुम दोनों यहां"........ अनिल उन दोनों को यहां देख हैरान था जो मयंक और राजीव ने उसके पूछने के अंदाज में देखा भी।
"अब चाचा आप आधी रात को इतनी हड़बड़ी में घर से निकलोगे तो पता तो चलना ही था और वैसे भी हम सो नहीं रहे थे I.G.I खेल रहे थे "....... मयंक ने कहा।
"फिर मेरे साथ ही आ जाते पीछा करने की क्या जरूरत थी अब जल्दी से इसको उस घर में रखो और मेरे साथ चलो "...... अनिल ने बाइक की तरफ इशारा करते हुए कहा।
कुछ देर में ही ये तीनों बल्ली के घर थे और अनिल ने जैसे ही सब कुछ बाकी सबको बताया तो मयंक ने कहा।
मयंक -"मतलब जोया जिंदा है?"
अनिल -"कहे नहीं सकते पर फोन वाले की बातें तो यही जाहिर करती है"
मयंक -"मतलब अवनी ने हमसे झूठ बोला है?"
राजीव -"यार बच्ची है वो उसको सच और झूठ का सही से अस्तित्व भी नहीं पता "
मयंक -"तो फिर ये एक साज़िश है क्यूंकि अगर जोया ब्लास्ट से पहले भागती तो तरुण उसको जाने नहीं देता और अगर कोई आदमी आया था जो जोया को ले गया तो अवनी ने हमें क्यूं नहीं बताया "
बल्ली -"बहनचोद ये चक्कर क्या है "
अनिल -"जोया के साथ क्या हुआ हम इसको बाद में सोच सकते हैं हमे उस बात पर ध्यान देना चाहिए जो उसने कहीं कल वो लोग कुछ कांड करेंगे जो हो ना हो पैसे से जुड़ा हुआ है तो हमें ये चेक करना होगा की कल शहर में कोई बड़ी डील या लेन-देन तो नहीं हो रहा "
राजीव -"लेकिन पापा इंदौर इतना छोटा नहीं है और हम कैसे ढूंढेंगे "
अनिल -"इंदौर भले ही छोटा हो या बड़ा पर वो डील बहुत बड़ी होगी और इसका पता हम नहीं लगाएंगे बल्कि वो लगाएंगे जो इस काम के लिए बने हैं सुबह छः जब बजेंगे जब हमारे पास सिर्फ बड़ी डीलों की लिस्ट होगी "
इसके बाद इन्होंने कुछ देर और कुछ बातचीत की पर मयंक का मन उस बात से बहार नहीं आ रहा था जहां जोया बची थी या किडनैप हुई थी।
इसी सोच के साथ जाने क्यों पर मयंक का मन वहां ना लगा और वो बाकी सब को वहां छोड़कर बल्ली के घर से splendor उठाता हुआ साक्षी के घर की तरफ बढ़ गया ।
उसने बहार वाला गेट खोला तो आंटी को गार्डन में टहलते हुए पाया जो खुद मयंक के लोक आने से अंचभे में थी क्योंकि मयंक ने आज रात को नहीं आने का कह रखा था उसने सबसे पहले बाइक घर के पीछे गैराज में रखी और आंटी के पास लौट कर आया ।
"आंटी आप सोई नहीं अब तक एक बजने वाला है"...... मयंक ने आंटी के पास आते हुए कहा।
रोमा -"नींद नहीं आ रही मयंक"
"और ऐसा क्यूं भला"......... मयंक की नजर जब आंटी के चेहरे से हट कर शरीर पर पड़ी तो घर के बहार लगे उस पीले बल्ब की रोशनी में पाया की वो नाइटी पहने हुए थी और उनके बड़े बड़े दुग्ध कलश बहार आने को हो रहे थे साथ ही अंगूर के दाने साफ जाहिर थे जो बहार से ही खड़े प्रतीत हो रहे थे।
आंटी -"कभी कभी अपने बारे में हमें खुद नहीं पता होता शायद आज वैसा ही मेरे साथ भी है जो मुझे खुद नहीं मालूम की नींद क्यूं नहीं आ रही "
मयंक -"ऐसा भी भला कभी हुआ है जो हमें हमारे ही बारे में ना पता हो ...... हां बस कभी कभी सच्चाई हमारी सोच से मेल नहीं खाती तो हम उसको नकारने लगते हैं और इस कसमकश में फस जाते हैं की हमारी सोच सही है या जो हमारी अंतर आत्मा कह रही है वो "
रोमा -"उम्र से बड़ी बातें भी कर लेते हो ये मुझे आज पता चला "
मयंक -"शायद उम्र से बड़े लोगों को पसंद और उनके साथ समय बिताने का नतीजा है "...
रोमा -"अच्छा.....तुम्हें पता है मयंक उस दिन के बाद मेरे साथ भी यही होता रहा जो तुमने कुछ देर पहले कहा जब भी वो पल याद आता है तो वहीं कशमकश शुरु हो जाती है...."
"मै उसके के लिए आपसे माफ़ी मांग चुका हूं आंटी "........रोमा कुछ और कहती उससे पहले ही मयंक ने ये बात कह दी जैसे वो जानता हो बात किस ओर जा रही है......
"किस बात की माफी मांग रहे हो तुम उस ग़लती की जिसमें ग़लती मेरी थी चाहत मेरी थी उस पल को मैं नहीं भूल पा रही हूं जानते हो क्यूं क्योंकि उसके बाद वो एहसास दोबारा हुआ नहीं ".......रोमा ने ये बातें जिस तरह से मयंक की आंखों में आंखें डाल कर कहीं थी मयंक रोमा की मंशा को समझ चुका था पर ना चाहते हुए भी मयंक ये रोकना चाहता था जैसे उस दिन को ना दोहराने का प्रण कर चुका हो ।
पर रोमा बात कहती हुई मयंक के इतने पास आ गई थी की उसकी सांसे मयंक के चेहरे पर आने लगी थी ।
"आंटी हमें चलना चाहिए"...... मयंक ने दूसरी तरफ मुड़ते हुए कहा पर रोमा ने खुद उसको अपनी तरफ करते हुए उसके होंठों से अपने होंठ मिला दिए।
रोमा ने जिस तरह ये शुरू किया था मयंक समझ चुका था अब उसके हाथ में कुछ नहीं है उसने रोमा की कमर को पकड़ते हुए उसका साथ देना शुरू किया और रोमा ने भी अपनी एड़ियां उचकाते हुए अपनी खुशी जाहिर की ।
"हमें अंदर चलना चाहिए"...... मयंक ने रोमा को कंधे से हटाते हुए कहा और जब जगह देखी तो वो लोग बहार वाले गेट के सामने थे जहां से कोई भी बहार वाला देख सकता था चूंकि उस गेट की उंचाई मुश्किल से चार साढ़े चार फी
ट रही होगी ।
मयंक भी अंदर जाने लगा पर तब ही उसको याद आया बहार का दरवाजा खुला था और अनायास ही नजर सामने घर पर पड़ी तो वहां भी पीले बल्ब की रोशनी थी उसी रोशनी में उसकी आंखें सामने खड़ी आंखों से टकराईं जिसके तुरंत बाद ही वो आकृति अपने घर की तरफ जाने लगी मयंक को यकीन था उसने रोमा और मयंक को किस करते हुए देख लिया था।
Aisa nhi hai bade bhai

Thanks Parkash bhaiBahut hi badhiya update diya hai Hell Strom bhai.....
Nice and awesome update.....
Padosan jo hai usko jaane ke baad mja aayegaये पड़ोसन तो खबरी लगती है।
जैसा शक है, जोया शायद जिंदा है, और अगर जो है तो वो डबल क्रॉस कर रही है।
बाकी भाई अपडेट बड़े करो![]()

दिख रहा है सबAisa nhi hai bade bhai![]()
Nice update.....Update - 31
रात के करीब 12 बजे थे कि तब ही अनिल का फोन बजने लगा।
"हैलो"........अनिल ने फोन कान से लगाते हुए कहा।
"सर अभी अभी जोया का फोन चलू हुआ है और उस फोन से काॅल लगाया जा रहा है आप यहां आ जाएं ।"......... सामने से इतना कहने के साथ फोन कट गया जैसे ये फोन भी बहुत जल्दी में लगाया है।
जैसे ही सामने से अनिल ने ये सुना वो जल्दी से बिस्तर से खड़ा हुआ और अपना हुलिया ठीक करता हुआ लोवर टी-शर्ट में ही जिप्सी चालू करता हुआ घर से निकल चला ।
"क्या बात हुई और किस से"......... अनिल ने इस खंडर जैसी बिल्डिंग में आकर हेडफोन लगाए बैठे आदमी से पूछा।
"सर हुआ ये की जैसा आप ने हमसे कहा था दोनों एजेंट के फोन टेप करने है तो उसी वक्त से मैं कनेक्ट करने की कोशिश कर रहा था पर दोनों ही फोन थे जिस वजह से ना उनकी लोकेशन पता थी और ना ही उनके टेप कर सकते थे पर अभी कुछ देर पहले में जब ये सब बंद करके सोने जा रहा था तो सोचा आखरी बार और ट्राई करता हूं तो पहले तरुण का फोन चेक किया तो वहीं परिणाम था पर जैसे ही जोया के नंबर को टेप किया तो वह चालू था और तो और उससे किसी को फोन लगाया जा रहा था "........उस व्यक्ति की आंखें बड़ी मुश्किल से खुल रही थी पर उसने जिस तरह से अनिल को सब बता रहा था की वो अपनी ड्यूटी के लिए जज्बा रखता है।
"रिकोर्डिंग की"...... अनिल ने उस रेडियो जैसे उपकरण को देखते हुए सिर्फ इतना ही पूछा।
"जी सर"....... उस आदमी ने कहा इतना सुनते ही अनिल ने उसका कंधा थपथपाया और उसको सोने के लिए भेजता हुआ खुद उस कुर्सी पर बैठते हुए हेडफोन जैसे उपकरण को कान पर लगाता हुआ उस रेडियो जैसे उपकरण का एक खास बटन दबाया इसी के साथ वो रिकॉर्डिंग अनिल को सुनाई देने लगी।
(यहां जो आदमी जोया के फोन से बात कर रहा है उसको '1' और दूसरे को '2' लगाउंगा)
1 -"कैसे हो जनाब "
2-"सब खैरियत अपना बताएं"
"बस आपको इंतलआ करना था जो काम हम कल करने जा रहे हैं उससे हमारी काफी मदद हो जाने वाली है इसलिए कल की एक ग़लती हमारे मैं काम को टाल सकती है जो हमारे बोस को मंजूर नहीं होगा "
२ -"पर आपने आज इस नंबर से फोन क्यूं किया"
1 -"ये फोन उसका है जो लोगों के लिए इस दुनिया में अब मौजूद नहीं और हमारे फोन अब सुरक्षित नहीं है क्योंकि उनको हमारे मकसद के बारे में काफी खबर हो गई है कल अगर हमने काम अच्छे से किया फिर हमें काफी समय तक किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं होगी हम अपनी दहसत इस देश में फैला सकते हैं "
२-"बिल्कुल आप चिंता ना करें वैसे भी नोटों से काम खूब चला लिया हाहाहा "
इतना कहते ही सामने वाले ने फोन काट दिया और रिकोर्डिंग खत्म हो गई।
अनिल ने तुरंत बल्ली को फोन किया दो बार फोन ना उठने के बाद तीसरी बार में फोन उठा और उसको अपने आने की बताता हुआ अनिल उस खंडहर नुमा घर को बहार से ताला लगाता हुआ अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया जैसे अंदर रहने वाले उस व्यक्ति के बहार जाने का मन था ही नहीं ये अनिल जानता हो।
पर जैसे ही वो अपनी जिप्सी तक आया तो वहां राजीव और मयंक खड़े मिले।
"तुम दोनों यहां"........ अनिल उन दोनों को यहां देख हैरान था जो मयंक और राजीव ने उसके पूछने के अंदाज में देखा भी।
"अब चाचा आप आधी रात को इतनी हड़बड़ी में घर से निकलोगे तो पता तो चलना ही था और वैसे भी हम सो नहीं रहे थे I.G.I खेल रहे थे "....... मयंक ने कहा।
"फिर मेरे साथ ही आ जाते पीछा करने की क्या जरूरत थी अब जल्दी से इसको उस घर में रखो और मेरे साथ चलो "...... अनिल ने बाइक की तरफ इशारा करते हुए कहा।
कुछ देर में ही ये तीनों बल्ली के घर थे और अनिल ने जैसे ही सब कुछ बाकी सबको बताया तो मयंक ने कहा।
मयंक -"मतलब जोया जिंदा है?"
अनिल -"कहे नहीं सकते पर फोन वाले की बातें तो यही जाहिर करती है"
मयंक -"मतलब अवनी ने हमसे झूठ बोला है?"
राजीव -"यार बच्ची है वो उसको सच और झूठ का सही से अस्तित्व भी नहीं पता "
मयंक -"तो फिर ये एक साज़िश है क्यूंकि अगर जोया ब्लास्ट से पहले भागती तो तरुण उसको जाने नहीं देता और अगर कोई आदमी आया था जो जोया को ले गया तो अवनी ने हमें क्यूं नहीं बताया "
बल्ली -"बहनचोद ये चक्कर क्या है "
अनिल -"जोया के साथ क्या हुआ हम इसको बाद में सोच सकते हैं हमे उस बात पर ध्यान देना चाहिए जो उसने कहीं कल वो लोग कुछ कांड करेंगे जो हो ना हो पैसे से जुड़ा हुआ है तो हमें ये चेक करना होगा की कल शहर में कोई बड़ी डील या लेन-देन तो नहीं हो रहा "
राजीव -"लेकिन पापा इंदौर इतना छोटा नहीं है और हम कैसे ढूंढेंगे "
अनिल -"इंदौर भले ही छोटा हो या बड़ा पर वो डील बहुत बड़ी होगी और इसका पता हम नहीं लगाएंगे बल्कि वो लगाएंगे जो इस काम के लिए बने हैं सुबह छः जब बजेंगे जब हमारे पास सिर्फ बड़ी डीलों की लिस्ट होगी "
इसके बाद इन्होंने कुछ देर और कुछ बातचीत की पर मयंक का मन उस बात से बहार नहीं आ रहा था जहां जोया बची थी या किडनैप हुई थी।
इसी सोच के साथ जाने क्यों पर मयंक का मन वहां ना लगा और वो बाकी सब को वहां छोड़कर बल्ली के घर से splendor उठाता हुआ साक्षी के घर की तरफ बढ़ गया ।
उसने बहार वाला गेट खोला तो आंटी को गार्डन में टहलते हुए पाया जो खुद मयंक के लोक आने से अंचभे में थी क्योंकि मयंक ने आज रात को नहीं आने का कह रखा था उसने सबसे पहले बाइक घर के पीछे गैराज में रखी और आंटी के पास लौट कर आया ।
"आंटी आप सोई नहीं अब तक एक बजने वाला है"...... मयंक ने आंटी के पास आते हुए कहा।
रोमा -"नींद नहीं आ रही मयंक"
"और ऐसा क्यूं भला"......... मयंक की नजर जब आंटी के चेहरे से हट कर शरीर पर पड़ी तो घर के बहार लगे उस पीले बल्ब की रोशनी में पाया की वो नाइटी पहने हुए थी और उनके बड़े बड़े दुग्ध कलश बहार आने को हो रहे थे साथ ही अंगूर के दाने साफ जाहिर थे जो बहार से ही खड़े प्रतीत हो रहे थे।
आंटी -"कभी कभी अपने बारे में हमें खुद नहीं पता होता शायद आज वैसा ही मेरे साथ भी है जो मुझे खुद नहीं मालूम की नींद क्यूं नहीं आ रही "
मयंक -"ऐसा भी भला कभी हुआ है जो हमें हमारे ही बारे में ना पता हो ...... हां बस कभी कभी सच्चाई हमारी सोच से मेल नहीं खाती तो हम उसको नकारने लगते हैं और इस कसमकश में फस जाते हैं की हमारी सोच सही है या जो हमारी अंतर आत्मा कह रही है वो "
रोमा -"उम्र से बड़ी बातें भी कर लेते हो ये मुझे आज पता चला "
मयंक -"शायद उम्र से बड़े लोगों को पसंद और उनके साथ समय बिताने का नतीजा है "...
रोमा -"अच्छा.....तुम्हें पता है मयंक उस दिन के बाद मेरे साथ भी यही होता रहा जो तुमने कुछ देर पहले कहा जब भी वो पल याद आता है तो वहीं कशमकश शुरु हो जाती है...."
"मै उसके के लिए आपसे माफ़ी मांग चुका हूं आंटी "........रोमा कुछ और कहती उससे पहले ही मयंक ने ये बात कह दी जैसे वो जानता हो बात किस ओर जा रही है......
"किस बात की माफी मांग रहे हो तुम उस ग़लती की जिसमें ग़लती मेरी थी चाहत मेरी थी उस पल को मैं नहीं भूल पा रही हूं जानते हो क्यूं क्योंकि उसके बाद वो एहसास दोबारा हुआ नहीं ".......रोमा ने ये बातें जिस तरह से मयंक की आंखों में आंखें डाल कर कहीं थी मयंक रोमा की मंशा को समझ चुका था पर ना चाहते हुए भी मयंक ये रोकना चाहता था जैसे उस दिन को ना दोहराने का प्रण कर चुका हो ।
पर रोमा बात कहती हुई मयंक के इतने पास आ गई थी की उसकी सांसे मयंक के चेहरे पर आने लगी थी ।
"आंटी हमें चलना चाहिए"...... मयंक ने दूसरी तरफ मुड़ते हुए कहा पर रोमा ने खुद उसको अपनी तरफ करते हुए उसके होंठों से अपने होंठ मिला दिए।
रोमा ने जिस तरह ये शुरू किया था मयंक समझ चुका था अब उसके हाथ में कुछ नहीं है उसने रोमा की कमर को पकड़ते हुए उसका साथ देना शुरू किया और रोमा ने भी अपनी एड़ियां उचकाते हुए अपनी खुशी जाहिर की ।
"हमें अंदर चलना चाहिए"...... मयंक ने रोमा को कंधे से हटाते हुए कहा और जब जगह देखी तो वो लोग बहार वाले गेट के सामने थे जहां से कोई भी बहार वाला देख सकता था चूंकि उस गेट की उंचाई मुश्किल से चार साढ़े चार फी
ट रही होगी ।
मयंक भी अंदर जाने लगा पर तब ही उसको याद आया बहार का दरवाजा खुला था और अनायास ही नजर सामने घर पर पड़ी तो वहां भी पीले बल्ब की रोशनी थी उसी रोशनी में उसकी आंखें सामने खड़ी आंखों से टकराईं जिसके तुरंत बाद ही वो आकृति अपने घर की तरफ जाने लगी मयंक को यकीन था उसने रोमा और मयंक को किस करते हुए देख लिया था।