महिला के गलत होने पर सब पुरुष को यही सलाह देते है कि भूल जाओ, पर भूल जाना क्या इतना आसान होता है, और वो भी जब कि वो कभी खुद से शर्मिंदा भी नही हुई इस बात के उजागर होने पर, ऊपर से अपने बॉस को भी झूठ बोलने को बोला। मतलब साफ है कि वो चालक है, और उसके आंसू भी घड़ियाली हैं, जो बस अपनी गलती को दबाने के लिए हैं।
वैसे kamdev99008 जी एक बात आपको बताता हूं, आज कल जो जितना पढ़ा लिखा होता है वो एडल्ट्री के लिए उतना ही लालायित रहता है, और women are no exception here, even they have greater urge of this.
exactlywomen are no exception here, even they have greater urge of this.
Bestexactly
फेमिनिज़्म, पुरुषों से बराबरी और महिलाओं के सामाजिक व कानूनी विशेषाधिकार ने उन्हें महिला नहीं रहने दिया
समाज महिलाओं से इसीलिए बनता है क्योंकि पुरुष सामाजिक प्राणी नहीं है..... हमारे पूर्वज कहा करते थे कि घर स्त्री का होता है और वंश पुरुष का.... घर की मालकिन वो है और पुरुष अपना वंश चलाने के लिए स्त्री और उसके बच्चों का जीवनभर पालन-पोषण करता है, अपने जीवन की उपलब्धियां व पूर्वजों की भी उपलब्धियां उन्हें देता है
लेकिन पढ़ी-लिखी साथ ही फेमिनिस्ट महिलाओं की मनोवृत्ति पुरुषों से भी ज्यादा असामाजिक हो गयी है...... विशेष रूप से घर से बाहर दूसरे पुरुषों के संपर्क में रहने वाली कामकाजी महिलाओं की
वो अपनी स्वच्छंदता और अनैतिकता को पुरुष की स्वच्छंदता और अनैतिकता के बराबर या आगे तो ले जाना चाहती हैं ....... लेकिन पुरुषों की तरह अपनी गलतियों को स्वीकारना या सामाजिक अवमानना सहन करने को तैयार नहीं
और यही व्यवस्था के विनाश की शुरुआत है........ क्योंकि स्त्री शक्ति का स्वरूप है....... पुरुष की गलतियाँ केवल स्वयं उसका विनाश करती हैं, जबकि स्त्री की गलती सम्पूर्ण समाज का विनाश कर देती है.... शक्ति का प्रभाव

100% trueexactly
फेमिनिज़्म, पुरुषों से बराबरी और महिलाओं के सामाजिक व कानूनी विशेषाधिकार ने उन्हें महिला नहीं रहने दिया
समाज महिलाओं से इसीलिए बनता है क्योंकि पुरुष सामाजिक प्राणी नहीं है..... हमारे पूर्वज कहा करते थे कि घर स्त्री का होता है और वंश पुरुष का.... घर की मालकिन वो है और पुरुष अपना वंश चलाने के लिए स्त्री और उसके बच्चों का जीवनभर पालन-पोषण करता है, अपने जीवन की उपलब्धियां व पूर्वजों की भी उपलब्धियां उन्हें देता है
लेकिन पढ़ी-लिखी साथ ही फेमिनिस्ट महिलाओं की मनोवृत्ति पुरुषों से भी ज्यादा असामाजिक हो गयी है...... विशेष रूप से घर से बाहर दूसरे पुरुषों के संपर्क में रहने वाली कामकाजी महिलाओं की
वो अपनी स्वच्छंदता और अनैतिकता को पुरुष की स्वच्छंदता और अनैतिकता के बराबर या आगे तो ले जाना चाहती हैं ....... लेकिन पुरुषों की तरह अपनी गलतियों को स्वीकारना या सामाजिक अवमानना सहन करने को तैयार नहीं
और यही व्यवस्था के विनाश की शुरुआत है........ क्योंकि स्त्री शक्ति का स्वरूप है....... पुरुष की गलतियाँ केवल स्वयं उसका विनाश करती हैं, जबकि स्त्री की गलती सम्पूर्ण समाज का विनाश कर देती है.... शक्ति का प्रभाव
exactly
फेमिनिज़्म, पुरुषों से बराबरी और महिलाओं के सामाजिक व कानूनी विशेषाधिकार ने उन्हें महिला नहीं रहने दिया
समाज महिलाओं से इसीलिए बनता है क्योंकि पुरुष सामाजिक प्राणी नहीं है..... हमारे पूर्वज कहा करते थे कि घर स्त्री का होता है और वंश पुरुष का.... घर की मालकिन वो है और पुरुष अपना वंश चलाने के लिए स्त्री और उसके बच्चों का जीवनभर पालन-पोषण करता है, अपने जीवन की उपलब्धियां व पूर्वजों की भी उपलब्धियां उन्हें देता है
लेकिन पढ़ी-लिखी साथ ही फेमिनिस्ट महिलाओं की मनोवृत्ति पुरुषों से भी ज्यादा असामाजिक हो गयी है...... विशेष रूप से घर से बाहर दूसरे पुरुषों के संपर्क में रहने वाली कामकाजी महिलाओं की
वो अपनी स्वच्छंदता और अनैतिकता को पुरुष की स्वच्छंदता और अनैतिकता के बराबर या आगे तो ले जाना चाहती हैं ....... लेकिन पुरुषों की तरह अपनी गलतियों को स्वीकारना या सामाजिक अवमानना सहन करने को तैयार नहीं
और यही व्यवस्था के विनाश की शुरुआत है........ क्योंकि स्त्री शक्ति का स्वरूप है....... पुरुष की गलतियाँ केवल स्वयं उसका विनाश करती हैं, जबकि स्त्री की गलती सम्पूर्ण समाज का विनाश कर देती है.... शक्ति का प्रभाव
Dil ki baat kah di sir ji, ye yatharth Satya hai ki jisne banaya hai vahi vinash bhi karta hai yani ki Shakti se hi insaan bana hai aur vahi hum sabhi vinash ke taraf bhi le jayegi.exactly
फेमिनिज़्म, पुरुषों से बराबरी और महिलाओं के सामाजिक व कानूनी विशेषाधिकार ने उन्हें महिला नहीं रहने दिया
समाज महिलाओं से इसीलिए बनता है क्योंकि पुरुष सामाजिक प्राणी नहीं है..... हमारे पूर्वज कहा करते थे कि घर स्त्री का होता है और वंश पुरुष का.... घर की मालकिन वो है और पुरुष अपना वंश चलाने के लिए स्त्री और उसके बच्चों का जीवनभर पालन-पोषण करता है, अपने जीवन की उपलब्धियां व पूर्वजों की भी उपलब्धियां उन्हें देता है
लेकिन पढ़ी-लिखी साथ ही फेमिनिस्ट महिलाओं की मनोवृत्ति पुरुषों से भी ज्यादा असामाजिक हो गयी है...... विशेष रूप से घर से बाहर दूसरे पुरुषों के संपर्क में रहने वाली कामकाजी महिलाओं की
वो अपनी स्वच्छंदता और अनैतिकता को पुरुष की स्वच्छंदता और अनैतिकता के बराबर या आगे तो ले जाना चाहती हैं ....... लेकिन पुरुषों की तरह अपनी गलतियों को स्वीकारना या सामाजिक अवमानना सहन करने को तैयार नहीं
और यही व्यवस्था के विनाश की शुरुआत है........ क्योंकि स्त्री शक्ति का स्वरूप है....... पुरुष की गलतियाँ केवल स्वयं उसका विनाश करती हैं, जबकि स्त्री की गलती सम्पूर्ण समाज का विनाश कर देती है.... शक्ति का प्रभाव
पूर्णतया सत्य।exactly
फेमिनिज़्म, पुरुषों से बराबरी और महिलाओं के सामाजिक व कानूनी विशेषाधिकार ने उन्हें महिला नहीं रहने दिया
समाज महिलाओं से इसीलिए बनता है क्योंकि पुरुष सामाजिक प्राणी नहीं है..... हमारे पूर्वज कहा करते थे कि घर स्त्री का होता है और वंश पुरुष का.... घर की मालकिन वो है और पुरुष अपना वंश चलाने के लिए स्त्री और उसके बच्चों का जीवनभर पालन-पोषण करता है, अपने जीवन की उपलब्धियां व पूर्वजों की भी उपलब्धियां उन्हें देता है
लेकिन पढ़ी-लिखी साथ ही फेमिनिस्ट महिलाओं की मनोवृत्ति पुरुषों से भी ज्यादा असामाजिक हो गयी है...... विशेष रूप से घर से बाहर दूसरे पुरुषों के संपर्क में रहने वाली कामकाजी महिलाओं की
वो अपनी स्वच्छंदता और अनैतिकता को पुरुष की स्वच्छंदता और अनैतिकता के बराबर या आगे तो ले जाना चाहती हैं ....... लेकिन पुरुषों की तरह अपनी गलतियों को स्वीकारना या सामाजिक अवमानना सहन करने को तैयार नहीं
और यही व्यवस्था के विनाश की शुरुआत है........ क्योंकि स्त्री शक्ति का स्वरूप है....... पुरुष की गलतियाँ केवल स्वयं उसका विनाश करती हैं, जबकि स्त्री की गलती सम्पूर्ण समाज का विनाश कर देती है.... शक्ति का प्रभाव
exactly
फेमिनिज़्म, पुरुषों से बराबरी और महिलाओं के सामाजिक व कानूनी विशेषाधिकार ने उन्हें महिला नहीं रहने दिया
समाज महिलाओं से इसीलिए बनता है क्योंकि पुरुष सामाजिक प्राणी नहीं है..... हमारे पूर्वज कहा करते थे कि घर स्त्री का होता है और वंश पुरुष का.... घर की मालकिन वो है और पुरुष अपना वंश चलाने के लिए स्त्री और उसके बच्चों का जीवनभर पालन-पोषण करता है, अपने जीवन की उपलब्धियां व पूर्वजों की भी उपलब्धियां उन्हें देता है
लेकिन पढ़ी-लिखी साथ ही फेमिनिस्ट महिलाओं की मनोवृत्ति पुरुषों से भी ज्यादा असामाजिक हो गयी है...... विशेष रूप से घर से बाहर दूसरे पुरुषों के संपर्क में रहने वाली कामकाजी महिलाओं की
वो अपनी स्वच्छंदता और अनैतिकता को पुरुष की स्वच्छंदता और अनैतिकता के बराबर या आगे तो ले जाना चाहती हैं ....... लेकिन पुरुषों की तरह अपनी गलतियों को स्वीकारना या सामाजिक अवमानना सहन करने को तैयार नहीं
और यही व्यवस्था के विनाश की शुरुआत है........ क्योंकि स्त्री शक्ति का स्वरूप है....... पुरुष की गलतियाँ केवल स्वयं उसका विनाश करती हैं, जबकि स्त्री की गलती सम्पूर्ण समाज का विनाश कर देती है.... शक्ति का प्रभाव
21 साल की मेरठ की रहने वाली तापसी उपाध्याय अभी b.tech 3rd year की छात्रा है और उसने पानी पूरी व्यवसाय को चुना और एक नए तरीके से पेश किया।जहाँ आप पानीपुरी को अन्हाईजीनिक तरीके से लोगों को परोसते देख सकते हैं वहीं ये लड़की साफ सफाई का पूरा ध्यान रखती है। उसके दिल्ली के चार इलाकों में पानीपुरी के कटलेट लगते हैं और जिनका टर्नओवर 8 से 9 लाख प्रतिमाह है।100% true
पूर्णतया सत्य।
पर परिवार की मानसिकता भी एक महावपूर्ण कारण है इस मनोदशा का। ज्यादातर मां बाप लिबरलिज्म के नाम पर सब कुछ सही मानते हैं और बच्चों को भी नैतिकता से दूर ही रखते है, जो आगे उनके पतन का बहुत बड़ा कारण बनती है।
प्रिय लेखक जी मेरे लेख का आपकी कहानी से कोई लेना देना नही है। मै तो बस इस फोरम के पितामह भीष्म आदरणीय कामदेव जी के फैमिनिसम् पर की गयी टिप्पड़ी के लिए उपस्थिति दे रहा हूँ। क्योकि हमारे तात श्री (कामदेव जी) ने उस युग से लेकर आज के युग तक नारी का अपमान देख कर चुप्पी साधी रखी थी। लेकिन आज fminisim पर जो लेख लिखा है वो ठीक नहीं है है। पितामह भीष्म आदरणीय कामदेव जी नारीतत्व को
पत्नीतत्व और मातृतत्व से मापना बंद कीजिये। "नारी भी एक देह है, देहरी नही।"
Feminisim अर्थात नारीवाद पहुँचा ही कहाँ है जहाँ तक पहुँचना चाहिए था? उससे पहले ही औंधे मुँह गिर गया है। और अब तो हालात ऐसे है कि नारीवाद की बात भी करो तो लगता है कि गाली दे रहे है। छद्म नारीवादी घोषित होने में भी वक़्त नहीं लगता है। ख़ुद को इस छद्म के टैग से बचाने के लिए, नारियों ने ही नारीवाद से जैसे किनारा कर लिया है।
मुझे छद्म के इस टैग से डर नहीं लगता क्योंकि बचपन से गाँव मे रहने के कारण समस्याओं को बहुत क़रीब से देखा है ।
नारीवाद का सही अर्थ क्या है?
नारीवाद कहाँ तक पहुँचना चाहिए था?
वो मजदूर महिला जो आठ महीने की गर्भवती है फ़िर भी ईंटे ढो रही है सर पर, वहाँ तक तो जरूर पहुँचना चाहिए था।
वो बुजुर्ग महिला जो अकेली रहती है, जिसने जवानी निकाल दी अपने परिवार के भरण-पोषण में, फ़िर भी आज गाँव वालों के रहमो-करम पर जीवित है। वहाँ तक पहुँचना चाहिए था।
वो शहर में रहने वाली अकेला सास, जिसकी बहु-बेटे ने उसका अँगूठा लगवाकर उसे घर से निकाल दिया था। वहाँ तक पहुँचना चाहिए था।
वो गृहणी जो पूरा जीवन अपने परिवार को देती है और अंत मे सुनती है कि उसने जीवन मे किया ही क्या है? वहाँ तक पहुँचना चाहिए था।
वो असहाय लड़की, जिसे आठवीं या दसवीं के बाद ही स्कूल छोड़ देना होगा। क्योंकि उसके घरवालों को लगता है कि लड़कियों के लिए इतना पढ़ना काफ़ी है। वहाँ तक पहुँचना चाहिए था।
वो नाबालिग लड़की जिसका बलात्कार होने के बाद बलात्कारी से ही शादी करवा दी गई। वहाँ तक पहुँचना चाहिए था।
वो कम उम्र की लड़की जिसकी शादी उससे उम्र में दुगुने आदमी से सिर्फ़ इसलिए करा दी गई क्योंकि उसकी तीन बहने और भी है। वहाँ तक पहुँचना चाहिए था।
हमारे देश की लाखों गृहणी जो हुनर रखती थी और कुछ बड़ा करना चाहती थी, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों में ही फँसकर रह गई। वहाँ तक पहुँचना चाहिए था।
वो अधेड़ उम्र की महिला जिसे बीच सड़क पर गाली-गलौच करके पीटा जाता है फ़िर भी सहने की सलाह देता है ये समाज। वहाँ तक पहुँचना चाहिए था।
वो बन्दिशों में बंधी नारी, जो उड़ सकती थी लेकिन चारदीवारी के अंदर रहने को मजबूर है। वहाँ तक पहुँचना चाहिए था।
कहीं नहीं पहुँचा है नारीवाद।
ना बलात्कार रुके है, ना छेड़छाड़ रुकी है और ना ही शोषण से ही छुटकारा मिला है।
गाँव मे जाकर किसी भी महिला से पूछिए कि नारीवाद का अर्थ क्या है? जानते हो उनका जवाब क्या होगा?
"हमें क्या पता क्या बला है? हमें तो ये पता है कि हमारी जिंदगी बीत गई, किसी ने हमारे बारे में नहीं सोचा। भई, किसी को क्या दोष दे जब कभी हमें ही वक़्त नहीं मिला अपने बारे में सोचने का।"
ये जवाब होगा।
गाँव की बुजुर्ग महिलाओं से बात करने पर उनकी इच्छाओं का पता चलता है और उन इच्छाओं के बारे में बताते हुए उनकी आँखों की चमक और इस चमक के बाद मायूसी जो होती है, वही नारीवाद का असल अर्थ समझा सकती है।
दुरुपयोग के बारे में बहुत जवाब लिखें जा चुके है। दुरुपयोग जरूर हुआ है और इससे सबसे ज़्यादा दुःख और नुकसान नारी को ही हुआ है। मौका मिल गया समाज को बोलने का, इसी दुरूपयोग के मेहरबानी है। चंद आधुनिक लिबास में चंद आधुनिकता का दिखावा करने वाली इन नारियों का प्रतिशत असल संघर्षरत नारी की तुलना में कुछ भी नहीं है मग़र फ़िर भी छद्म का ये टैग असल पर ख़ूब भारी पड़ रहा है। मतलब साफ़ है, समाज वहीं है जहाँ नारीवाद से पहले था।
काश! दुरुपयोग करने वाली महिलाएँ इस बात को समझ सकती और जान सकती कि उन्होंने नारी जाति का कितना बड़ा नुकसान किया है।
ख़ैर, कभी ना ख़त्म होने वाली एक बहस और निरंतर जारी रहने वाला संघर्ष है नारीवाद।
21 साल की मेरठ की रहने वाली तापसी उपाध्याय अभी b.tech 3rd year की छात्रा है और उसने पानी पूरी व्यवसाय को चुना और एक नए तरीके से पेश किया।जहाँ आप पानीपुरी को अन्हाईजीनिक तरीके से लोगों को परोसते देख सकते हैं वहीं ये लड़की साफ सफाई का पूरा ध्यान रखती है। उसके दिल्ली के चार इलाकों में पानीपुरी के कटलेट लगते हैं और जिनका टर्नओवर 8 से 9 लाख प्रतिमाह है।
शायद इसे कहते हैं असली नारीवाद
यकीन मानिए असली नारिवाद को देखकर मुझे भी बहुत अच्छा लगता है।महिलाओं को हर क्षेत्र में आज काम करते देखना वाकई गर्व की अनुभूति कराता है,चाहे वो पानीपुरी का ठेला लगाना हो या दिल्ली की डीटीसी बसों में ड्राइवर बनकर बस चलाना जैसे काम ही क्यों न हों।
थोड़ा सूक्ष्म विषय है, तो शायद लंबा उत्तर हो आप खुद देखिए, ईश्वर ने स्त्री को पुरुष से श्रेष्ठ समझा है, इसलिये जब ईश्वर ने नया जीवन संसार में लाने की जिम्मेदारी दी, तो वो स्त्री को ही दी क्योंकि उन्हें पता था, की समर्पण और सरलता की जरूरत की जरूरत जीवन को लाने के लिए जरूरी है वो स्त्री में ही हो सकती है
आप नारी शक्ति को चार भागों में बाट सकते हैं
माँ आदि शक्ति : माँ आदिशक्ति स्त्री तत्व का सर्वोच्च बिंदु हैं, माता सत्त्व रजस और तमस गुणों से परे हैं, कोई भी स्त्री अपने सर्वोच्चता में पहुचकर आदिशक्ति ही बन जाएगी क्योंकि यह उसका मूल स्वरूप है, इस रूप में ईश्वरीय प्रेम, करुणा और अन्य दैविक गुणों का समावेश है
सात्विक स्त्री : इस तरह की स्त्रियों की चेतना बहुत विकसित होती है, आपने बहुत सी स्त्रियों के बारे में सुना होगा जो ज्ञान के मामले में पुरुषों से भी आगे थीं, यह अपने संवेगों से परे होती हैं , यह प्रेम और सत्यता की मूर्ति होती हैं, इनमे बस सात्विक गुणों का समावेश ही होता है
राजसिक स्त्री : ज्यादतर महिलाएं इसी श्रेणी की होती हैं, इनमे सात्विक और तामसिक दोनों गुण होते हैं
तामसिक स्त्री : इनमे वो स्त्री आती हैं, जिनमे तमस गुण का प्रभाव स्पष्ट होता है अहंकार, घृणा, गुस्सा, लालच आदि गुण इनमे प्रमुख होते हैं
नारीवाद का सही अर्थ क्या है ?
मैं नारिबाद का सम्पूर्ण समर्थन करता हूं, लेकिन इसके जहरीले रूप का नही
स्त्री की एक सहज प्रकर्ति होती है, आज का नारिबाद पुरुष बनने की होड़ जैसा लगता है, स्त्री अपनी प्राकृतिक स्वरूप में रहकर अगर समाज में अपना प्रतिनिधित्व देती है, तो यह बेहद खूबसूरत घटना होगी
नारीवाद स्त्री की सामाजिक सहभागिता की जरूरत है, लेकिन इस जरूरत को पूर्ण करने के लिए नारी को अपना स्वरूप बिगाड़कर पुरुष क्यों बनना है?
नारीबाद क्यों जरूरी है ?
पुरुष ने हमेशा नारी का शोषण किया है, हमको यह सिखाया जाता है कि हमारी संस्कृति कितनी महान है पर इसी संस्कृति में अपनी पत्नी को जुए में लगाने वाला युधिष्ठिर को धर्मराज की संज्ञा दी जाती है
इतिहास के किसी भी दौर में, नारी को स्वतंत्रता नही दी गयी, जितना शोषण नारी का हुआ है शायद ही किसी अन्य वर्ग का हुआ हो, नारी को पुरूष द्वारा संचालित करने की कोशिश की गई है, ईश्वर की एक कृति का गला घोंटा गया है, पितृसत्ता के नाम पर समाज के एक लिंग को उसकी आत्मा को मारने पर मजबूर कर दिया गया और इसकी घुटन में समझ सकता हू ( ध्यान की एक अवस्था में पहुचने के बाद, आप दूसरों के दुखों को आत्मसात करके उनकी पीड़ा का अनुभव कर सकते हैं)
तो नारीबाद उसी पितृसत्ता का उत्तर है, तलवार का जबाब तलवार से ही दिया जा सकता है, जब अधिकार मिलते नही, तो उन्हें छीनना पड़ता है
पितृसत्ता एक जहरीली सोच है, और इसकी जड़ें सक्ष्म स्तर तक बहुत गहरी है, लेकिन नारीबाद का प्रयोग उन्ही के साथ करना चाहिए जिनकी सोच में पितृसत्ता हो
तो जब तक पितृसत्ता रहे, नारीबाद रहना ही चाहिए![]()