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Thriller 100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)

nain11ster

Prime
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अध्याय 27 भाग:- 5




मै:- किमिने हो एक नंबर के.. दरवाजा तो लगा लिया करो कम से कम..



रवि:- वो हम दरवाजे से ही पूरे जोश में गए थे तो लगाने का मौका ही नहीं मिला.. एक राउंड खत्म करके दरवाजा ही लगाने आया था पहली फुरसत में.. छोड़ो भी गुस्सा.. और क्यों आयी थी वो बताओ..


मै:- नाह !!! किसी काम से भी आयी हूं मै, लेकिन अब तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाना..


रवि:- "फर्क ये नहीं पड़ता कि कौन अपनी निजी जिंदगी में कैसा है और क्या करता है.. फर्क इस बात से पड़ता है कि वो मेरे लिए कैसा है.. मेरे लिए अच्छा है तो अच्छे ही कहूंगी.. बाकी इस दुनिया मे अच्छे लोग है कि कितने जिसे अच्छा कह सकूं.." कुछ याद आया...


मै:- तुम्हारी आदत गई नहीं ना मेरी ही बातो को मेरे खिलाफ इस्तमाल करने की.. हम्मम ! सॉरी, मुझे तुम्हारी उस निजी बात पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए था.. डिस्को जाने का मन था लेकिन अब मूड ऑफ हो गया..


रवि ने फिर जिद पकड़ ली.. और हारकर मैंने भी हां कह दी.... एक बात जो उसने बीच मे बिल्कुल सही कहा था, "तुम्हे यदि मै गलत लगता तो तुम रुककर मुझे सुनती नहीं'.. जो की सही था...


खैर मै रवि के साथ डिस्को के लिए निकल गई.. रास्ते में मैंने जिज्ञासावश पूछ लिया... "ये बताओ की मंत्री की कितनी आइटम के साथ तुम सो चुके हो"..


रवि:- सभी.. पहले वो लेता है फिर मै.. या फिर मंत्री के जिस भी करीबी की इक्छा हो.. उस लड़की को उस हिसाब से पेमेंट मिल जाती है..


मै:- क्या पेमेंट होती है, किसी एक के साथ जाने की..


रवि:- सबकी अलग-अलग होती है... चमरी और परफॉर्मेंस के हिसाब से दाम तय होता है.. वैसे मंत्री के लिए जो बुलाई जाती है वो 20 हजार कम से कम लेती है.. सब हाई प्रोफ़ाइल कॉल गर्ल होती है.. कोई सामान्य जीवन में स्ट्रगलिंग मॉडल होती है तो कोई किसी ऑफिस की खूबसूरत एम्प्लोई…


मै:- वो कमा तो रहीं है फिर ये जिस्मफोशी का धंधा..


रवि:- वर्तमान समय में ये उनके लिए मज़े के साथ पैसे कमाने का जरिया है.. जिन्हे यहां के नाईट लाइफ की लत लगी है, फिर लाख रुपया महीने का कमाना, मानो उनके लिए 1000 रूपए महीना कमाकर खर्च चलाने जितना है..


मै:- है दिखावे की ज़िन्दगी ने सबको पागल बाना रखा है... अच्छा रवि एक बात बताओ.. मेरा क्या रेट होगा..


रवि अपना एक हाथ स्टेरिंग से हटाकर अपना माथा पीटते... "मै गलत थोड़े ना कहता हूं कि तुम पागल हो.. उमाशंकर यदि ये सब सुन लेता, तो खड़े-खड़े आत्महत्या कर लेता..


मै:- वो मासूम है तभी तो उसे मै मिली और तुम्हे मिलेगी कोई तुम्हारे जैसी.. बिल्कुल ओपन खयालात..


रवि:- कमाल का कॉम्प्लीमेंट था..


मै:- खुद 56 भोगी और दुल्हन की ख्वाइश घरेलू.. देख लेना मेरा श्राप है, तुम्हे तो 36 घर संभालने वाली लड़की मिलेगी.. जैसा तुम्हारा आवारा नेचर है..


रवि:- साला जिंदगी में कभी शादी ही नहीं करूंगा..


मै:- हां लेकिन अपनी छिछोडी हरकतों से बाज न आना... मुझे तो समझ में नहीं आ रहा की मै एक निर्लज, चमड़ी प्रेमी के साथ कर क्या रही हूं..


मै अपनी बात कहकर ख़ामोश हो गई, रवि भी ख़ामोश ही था.. अचानक ही हम दोनों जोड़ से हंसने लगे.. हंसते हुए रवि कहने लगा... "आवारा ही सेर्टीफाई कर दो.. वैसे तुमने अपना रेट पूछा था ना"..


मै:- कमीने अचानक से पीछे की बात कहां अभी उठा लाए..


रवि:- तुम्हे अपनी मार्केट वैल्यू जाननी थी ना..


मेरे हाथ में मेरा हैंडबैग था उसी से रवि को पिटती हुई.. "मेरी मार्केट वैल्यू लगा रहे, जो करोड़ यूं फेंककर आ गई थी"


मै हांफती हुई सीधी बैठी.. रवि मुझे छेड़ते हुए कहने लगा.. "20 से 30 हजार बन संवर कर, झल्ली मे 5 हजार"..


मै रवि को घूरती हुई... "चलती गाड़ी से फेंक दूंगी तुम्हे.. चुप हो जाओ"..


रवि:- क्यों अब जवाब दे रहा हूं तो मिर्ची क्यों लग रही, या फिर खुद की कीमत करोड़ों मे आकी थी..


मै खुद पर थोड़ा अतिट्यूड लाती... "मेरी तो वो भी कीमत है तुम्हारी तो ज़ीरो वैल्यू है रवि.. शून्य"..


रवि:- मुझे क्या करना वल्यू लेकर... मैंने अपनी कीमत थोड़े पूछी थी..


मै:- ओ ले ले.. जे अंगूर तो खट्टे हो गए... क्यों रवि बाबू.. सर जाओगे चौराहे पर, तब कोई हंटर वाला आकर गुलाम मजदूर ही बनाएगा..


रवि:- जी नहीं, फिर तुम भुल मे हो...


मै:- बाना लो कहानी.. मै सुन रही हूं..


रवि:- नहीं रे सच्ची, बंधुआ मजदूर नहीं.. कीमत सेक्स अपीज की ही लगेगी.. हां लेकिन वन टाइम कीमत..


मै:- अच्छा.. और क्या कीमत होगी तुम जैसे थरकियो की..


रवि:- 40 हजार से 50 हजार दिनार..


मै:- कुछ भी, खाड़ी के देश में मर्दों की कमी हो गई जो भाड़े पर मर्द ले जाएंगे.. वो भी उनके कंजर्वेटिव समाज में..


रवि:- बंद दरवाजे के पीछे कितनी खुली कहानी लिखी जाती है वो तुम कभी यहां से बाहर निकलेगी तब ना पता चलेगा... सुनो वैसे लड़को को वहां के सेख उठाते है.. वो लड़के और लड़कियों दोनो के शौकीन होते है.. अच्छा गबरू मिल जाए तो कमाल की कीमत मिलती है...


मै:- "यक्कक .. पैसे वाले कैसे-कैसे शौक पालते है.. आज की शाम ही घटिया हो गई.. रवि, कुछ ऐसी जगह चलो जहां मन थोड़ा बहल जाए.. लेकिन डिस्को नहीं..


डिस्को का प्लान कैंसल हो गया.. वहां से हम दोनों इंडिया गेट पहुंच गए.. जहां लोग अपने कला का प्रदर्शन कर रहे थे.. कोई म्यूज़िक बजाकर शानदार ग्रुप डांस कर रहे थे, तो कोई बेली डांस की प्रैक्टिस.. रात थोड़ी और गहरी हुई फिर भुरम-भुरम करते बाइकर्स पहुंच गए और वो सब अपने कला का प्रदर्शन करने लगे...


क्या नजारा था, मै तो खुश हो गई.. और इतनी ज्यादा खुश की मै रवि से धन्यवाद कहती हुई कहने लगी... "जितनी घिनौना अनुभव तुम्हारे कमरे से लेकर रास्ते तक में हुआ था.. उसे अब शांति मिल गई"..


रवि:- साथ डिनर करने चले क्या..


मै:- बिल्कुल...


हमने साथ में डिनर किए.. कुछ पुरानी और कुछ नई बातो के साथ, मै 2 बजे अपने फ्लैट पहुंच चुकी थी... अगली सुबह जब मै पहुंची तो मेरे पास एक पुरा कंक्रीट प्लान था जो कि इस दीवाली धमाल से लेकर न्यू ईयर तक मचाने वाले था..


मै मंत्री जी से ऑफिस में मिली, तभी कह दी "एक मीटिंग चाहिए दीवाली से लेकर न्यू ईयर नाईट हिलाने के लिए.. कल रात से ही दिमाग में घूम रहा है".. चूंकि सन्डे ऑफिस बंद थी, इसलिए मंत्री जी ने कह दिया कि किसी भी सोमवार को मीटिंग संभव नहीं है.. और मीटिंग में उमाशंकर का भी रहना जरूरी है.. तुम अपने हिसाब से मीटिंग प्लान कर लो..


मै कुछ नहीं कही और केवल हामी भर दी.. उसी शाम उमाशंकर का कॉल आ गया.. वो पूछने लगा कि अब तक मै उसे कॉल क्यों नहीं की..


मै, थोड़ा आश्चर्य से... "सुबह ही तो बाते हुई थी".


उमाशंकर:- नहीं मीटिंग के लिए कॉल क्यों नहीं की.. अब मुझे मेरे ही ऑफिस से पराया कर रही हो..


मै:- ये क्या उल्टा सीधा बोल रहे हो.. मीटिंग का प्रस्ताव देना मेरा काम है, उसमे कौन होगा कौन नहीं, वो तो सर डिसाइड करेंगे...


उमाशंकर:- हां तो उन्होंने बोला था ना मुझसे कॉर्डिनेट करके सोमवार छोड़कर मीटिंग फाइनल कर लेने, फिर कॉल क्यों नहीं की.. क्या मेरे बिना ही मीटिंग करने का इरादा है..


मै:- तुम्हे आज ये हुआ क्या है.. तुम इतने दिन बाद घर गए हो.. मै तुम्हारी छुट्टियां कैसे बर्बाद कर दूं.. इवेंट तो दिसंबर तक होते रहेंगे...


उमाशंकर:- हां जानता हूं, और ये भी की तुम ये मीटिंग मेरे आने के बाद ही करोगी, चाहे जब मै आ जाऊं छुट्टी से.. बस यही तो अखर रहा है..


मै:- हुंह !!! जिस बात पर खुशी होनी चाहिए वो अखर रहा है.. मुझे की.. तुमने मेरा दिल दुखा दिया.. बात मत करना हफ्ते भर...


उमाशंकर:- सुनो मेनका..


मै:- कितना चिल्ला रहे हो, लाइन पर ही हूं..


उमाशंकर:- जिंदगी में आज तक कभी कोई मेरे बारे में इतना सोचने वाला नहीं हुआ और वो भी बिना बताए कि तुम हर पल मेरे लिए कितना केयरिंग हो. मै गधा था जो तुम्हे कभी अपनी भावना ना दिखा सका ना जता सका.. मै परसो पहुंच रहा हूं..


मै:- आराम से उमा.. कोई जल्दी नहीं है.. मै हूं तुम्हारे साथ... और परसो लौटे तो मुझे बुरा लगेगा.. कम से कम रविवार तक रुको.. तब लगेगा की मैंने योजना पूरे सही वक्त पर बनाया, वरना दिल में कसक सी रहेगी की तुम्हारी छुट्टी बर्बाद कर दी.…


उमाशंकर मुस्कुराते हुए हामी भर दिया.. मै अगले एक हफ्ते तक कंक्रीट प्लान बनाती रही. अभी मै लाइब्रेरी के पास वाले फ्लैट में ही रुक रही थी. 22 सितंबर को भाभी पहुंच गई और वो मिलकर गांव के लिए निकल रही थी. दुर्गा पूजा शुरू होने वाला था, त्योहारों का सीजन आ रहा है.. इसलिए गांव जाना थोड़ा जरूरी हो गया था...


मै हामी भरती हुई भाभी के गले लग गई.. गले लगकर मै थोड़ी देर तक रोती ही रही. उन्होंने पहले मेरे आशु पोछे फिर अपने हाथ मेरे सर पर फेरती हुई कहने लगी मुझे ड्रॉप कर दो...


हम दोनों बात करते हुए चले जा रहे थे.. इसी बीच भाभी ने उमाशंकर के बारे में पूछ ली.. मैंने कह दिया की मार्च 2016 के बाद तो मै सीए फाइनल दूंगी, लेकिन उससे पहले मै अपने भाई-बहन के बीच उससे रिंग की अदला-बदली तो कर ही सकती हूं...


भाभी, मुझे देखकर हंसती हुई कहने लगी.. "तेरी खुशी वापस लौट रही है... मै बता नहीं सकती कितनी खुश हूं.. क्या करूं इन आशुओं का... जो गम मे भी छलकते है और खुशी मे भी.. ये मेरे जिद्दी आंसू. जब मै अपने घर विदा हो रही थी, तब नहीं छलके थे... लेकिन आज मै अपनी मां के दर्द को मेहसूस कर सकती हूं..."

"बेटी को पराया होते देख उनको कैसा मेहसूस हुआ होगा.. पत्थर दिल थी मै और शादी के दूसरे ही दिन एक मां... ये एहसास ही अलग था.. जानती है जब तूने अपने हाथो से हार पहनाया, ये कहकर की भाभी ये मेरा गिफ्ट है.. मै बता नहीं सकती की वो कैसे क्षण थे मेरे लिए... ज़िन्दगी में पहली बार किसी ने निह स्वार्थ भावना से तोहफा दिया था... तेरा वो प्यारा छोटा सा मासूम चेहरा, और जिंदगी में पहली बार मेहसूस करना की वाकई मे बिना स्वार्थ के भी एक दुनिया है..."

"तू जानती है तेरे लगभग सभी गिफ्ट मैंने संभाल के रखे है.. वो मुझे अपने जान से भी ज्यादा अजीज है... तू बस अपना ख्याल रख, बाकी कोई साथ खड़ा रहे की ना रहे. मै रूपा मिश्रा, जब तक जीवित हूं.. मै किसी की भी आंखें नोचकर बाहर निकालने में सक्षम हूं.. फिर चाहे वो किसी भी प्रोफाइल का क्यों ना हो.."


मै उनकी बात सुनकर कार आगे बढ़ा नहीं पाई, वहीं किनारे मे कहीं खड़ी करके भाभी से लिपटकर ना जाने कितनी देर तक रोती रही... भाभी ने मुझे पानी पिलाया, खुद भी शांत हुई और मुझे भी शांत करवाई.. मै उन्हे स्टेशन छोड़कर वापस आ गई...


29 सितंबर तक उमाशंकर लौट आया. जैसे ही मुझे ऑफिस से रिलीफ मिली, मै तो सीधा गई 3 दिन की छुट्टी पर और बोल दिया "बापू के जन्मदिवस पर मीटिंग रखेंगे... इस दीवाली शयाम प्रसाद शुक्ला की गूंज पूरे भारत मे होगी.. और साल के पहले दिन का जलसा ऑर्गनाइज होगा शयाम प्रसाद शुक्ल के नाम पर.. बस इस बार अनलिमिटेड एस्टीमेट होना चाहिए.."


मेरे जोश और उत्साह को देखकर मंत्री जी व्यंग करते हुए कहने लगे… "उमाशंकर तुम्हारी होने वाली बीवी मुझे कंगाल कर देगी..."


उमाशंकर:- मेरे भी शादी पर ग्रहण है सर.. इसके परिवारवाले कह रहे है सीए क्लियर होने के बाद..


मै:- दिल छोटा क्यों करते हो.. उन्हे जो करना है वो करेंगे लेकिन हम आपस में अंगूठी तो बदल ही सकते है..


उमाशंकर:- कब..


मै:- मेरा भाई मैक्स अपनी गर्लफ्रेंड के घर जाएगा, बंगलौर से 17 किलोमीटर है.. हम सब भाई बहन छुट्टी पर होंगे वहीं पर.. ऑफिस में एडवांस 23 दिसंबर से लेकर 5 जनवरी की छुट्टी की अर्जी डाल दो..


मंत्री जी:- तो फिर पागलपन कार्यक्रम का क्या होगा..


मै:- वाईफाई हमने जाकर लगवाया था क्या सर.. सब पैसे का कमाल था.. बंगलौर में आपकी पार्टी का कारपोरेटर बना, 1 बाय इलेक्शन जीत लिए, लेकिन हम गरीब मुलाजिम को कुछ नहीं..


मंत्री:- अरे बाप रे… अच्छा क्या चाहिए वो बताओ..


मै:- आपका आशीर्वाद और अपने दामाद को एक जन्नतेदार कार दो.. अच्छा लगेगा आपकी बेटी इनके साथ बाइक पर घूमे...

 

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अध्याय 27 भाग:- 6




मंत्री जी अपने पीए के कान में फिर से फुसफुसाए… पीए मुस्कुराते हुए कहने लगा.. "आपके पिताजी नाराज है, कह रहे है शादी तय भी नहीं हुई और बेटी होने वाले दामाद के साथ अकेले कार में घूमने जाए, वो पसंद नहीं"..


मै:- लेकिन पिताजी मेरे भाई बहन तो साथ में है ना..


मंत्री जी:- हां तो कार मै केवल 4 लोग आएंगे.. बस दिलवा देता हूं.. बड़ी सी फ़ैमिली पुरा सवार होकर जाएगी..


मै:- हूंह !!! कंजूस आदमी.. नहीं देना है तो बोल दो.. ये बस लेकर क्या ट्रैवल एजेंसी खोलुं..


मंत्री जी:- कार हर कोई देगा.. वो स्वार्थ हुआ.. पुरा परिवार नहीं आता उसमे.. हम जॉइंट फैमिली कल्चर वाले है.. और वो बस कोई ट्रैवल की बस नहीं है यूं समझो कि चलता फिरता घर ही है...


मै:- हां घूमी हूं उसमे भी.. लेकिन वो भी 3-4 लोगों से ज्यादा के लिए नहीं होता.. कुछ भी हां.. लगता है आपको कहीं से गिफ्ट मे बस मिला, इसलिए मुझे चिपका रहे हो...


मंत्री जी:- तू पॉलिटिक्स के लिए शुरू से मना क्यों कर रही है... स्ट्रॉन्ग बैकग्राउंड है और राजनेता वाले सारे गुण.. एक लाइन बोल दो तो उसकी पूरी भावना तुम बोलते ही समझ जाती हो… वो शानदार बस है.. 20 लक्जरी सीट कम बेड है... और तुम्हे पसंद आएगा...


मै:- हां और हमारी पूरी सैलरी घुस जाएगी उसके डीजल में..


पीए:- सर बताने की जरूरत नहीं है, मेनका के स्टाइल में ही समझा देता हूं. हर महीना बस अलोएंस के लिए, आने वाले इवेंट मे जो तुम्हारे हिस्से की ढाई करोड़ थे, मंत्री जी ने बढ़ाकर 3 करोड़ कर दिया... जिसका 2 करोड़ कल उसी ट्रस्ट में जमा हो जाएगा.. ट्रस्टी मैनेजमेंट के टूर और विकल एलोएंस के लिए.. अब हैप्पी..


मै:- टू हैप्पी.. अब मै जा रही हूं.. पूरे महीने अपने भाई बहन को देखने को तरस गई.. मैंने ऑफिस के टाइमिंग को शेड्यूल कर दिया है, और सर कुछ काम ऑफिस में कतई नहीं होनी चाहिए और ना ही घर में. उसकी डिटेल रघुवंशी सर (पीए) के पास है.. कोई प्राइवेट बेनामी ऑफिस लीजिए बिना खुद के लिंक का.. क्योंकि ऊपर की सीढ़ियों मे दोस्त से ज्यादा दुश्मन होंगे, जो बिल्कुल आपके साथ बैठे होंगे..


मै अपनी बात कहकर हड़बड़ी में वहां से निकली और सीधा पहुंच गई गौरी के मेडिकल कॉलेज.. गौरी और मैक्स तो नहीं मिले लेकिन मैक्स की प्यारी गुड़िया जैसी गर्लफ्रेंड मिल गई...


उसे देखकर मै मुस्कुराती हुई उसके पास पहुंची... दोनो बैठकर एक कप चाय.. सॉरी मै चाय और वो काफी पीते बातें करने लगे... वो मुझे फिर बताने लगी की कई साल पहले वो मुझे टीवी पर देखी थी, लेकिन पहली बार मिली तब याद नहीं आ रहा था कि कहां देखा है..


अनीता वही चोरी की घटना का जिक्र कर रही थी, जिसमे मुझे मीडिया ने घेर लिया था.. उससे बात करके अच्छे फील हो रहा था, काफी खुले दिल की थी. हां साथ में थोड़े खुले विचार थे बॉयफ्रेंड और लाइफ को लेकर.. खुले विचार मतलब सेक्स नहीं समझ लीजिएगा.. मतलब मैक्स उसे पसंद है और यदि मैक्स को अनीता और उसके कल्चर के साथ रहने मे कोई समस्या नहीं होगी, तब वो अपना लव परपोजल इसी कॉलेज के बीच ग्राउंड में देगी, वो भी उसके होटों को चूमकर..


कितना क्यूट था ना.. मै सोच भी लेती तो भी ऐसा नहीं कर पाती, लेकिन उसकी आंखों में वो उमंग नजर आती थी... इन सब मामलो में थोड़े ओपन खयालात थे.. उसके मासूम दिल की भावनाएं, जब उसे कोई दिल से भा जाए..


हम कैंटीन में बैठकर बात कर रहे थे तभी गौरी पहले पहुंचि, और पीछे से मैक्स सिगरेट जलाये.. मैं उसे देखी तो मेरी आंखें बड़ी हो गई और वो जल्दी से सिगरेट फेंककर मेरे पास पहुंचा...


मै बहुत ज्यादा गुस्से में थी और मेरा हाथ उठ गया... कैंटीन में उसे थप्पड़ मार दी. मैक्स थोड़ा झुंझला गया क्योंकि पास मे ही उसकी गर्लफ्रेंड थी.. हालांकि मैक्स ने कुछ नहीं कहा... गौरी बैठी हंस रही थी.. और मै... मैक्स से माफी मांगती... "सॉरी, मै थोड़े गुस्से में थी, तुझे सिगरेट पीते देख पता नहीं क्या हो गया.. भुल ही गई थी तू प्रोफेशनल कोर्स कर रहा है, और बड़ा हो गया है"..


मैक्स:- "मै तो केवल प्रोफेशनल कोर्स कर रहा हूं.. तुम तो सीए जैसे प्रोफेशनल कोर्स टॉपर थी. तुमने गलती भी नहीं की थी, तब भी मां ने भिड़ मे जंक्शन पर थप्पड़ मारा था. लेकिन तुम्हारे गुस्से में झुंझलाहट कम और जान बूझकर रूठने का ड्रामा ज्यादा था, जिसे देखकर सब हंस रहे थे..."

"जब थप्पड़ मारी तो दिल किया कि गला पकड़कर चिल्ला दूं और जो मन में आए बोल दूं.. फिर याद आया वो स्टेशन की घटना.. और अंदर सब शांत हो गया... सॉरी मै अगली बार से ख्याल रखूंगा.. "


मै:- मतलब सिगरेट इतना प्यारा है..


मैक्स:- बुरी लत है लेकिन बहुत ही कंट्रोल में है.. फिर भी कोशिश करूंगा कि पूरी तरह से छोड़ दूं..


मै:- ये हुई ना मैक्स वाली बात.. सॉरी, लेकिन फिर भी, यहां अनीता बैठी हुई थी, ऊपर से मासी और मेरे बीच का रिश्ता कुछ अनोखा है.. वो मेरी मां भी है और मेरी सहेली भी..


मैक्स:- मै भी नकुल हो सकता हूं.. लेकिन आपको कभी लगा ही नहीं की मेरे पास भी बैठना चाहिए..


मै:- तू मैक्स ही अच्छा है और साथ बैठने से ही प्यार रहेगा क्या.. मै अपने सभी भाई से बहुत प्यार करती हूं... और तू तो सबसे प्यारा है, क्योंकि सबसे छोटा है ना.. गौरी की तरह.. मै चलती हूं.. फ्री थी तो दोनो को देखने आ गई..


मै झटके से मुड़ी क्योंकि 22 दिसंबर के बाद से मैंने नकुल का चेहरा नहीं देखा था और ना ही 8 जनवरी के बाद से उसकी आवाज सुनी थी.. बोलने को तो कुछ भी बोल दूं लेकिन नकुल जैसा कोई नहीं था.. पूरी मेनका ही तो नकुल थी, 2 कहां थे हम. ऐसा लग रहा था जैसे अपने अस्तित्व खोकर जी रही हूं..


मुड़ते ही मेरे फिर आशु नहीं रुके कितने भी रोकने की कोशिश क्यों ना की. बहुत ढीट है ये आंसू.. पता नहीं क्यों मुझे प्राची की भी याद सी आने लगी थी.. सब कुछ सही ही तो था और बहुत प्यारा भी.. बस एक भुल मुझसे हुई जिसकी सजा सब भुगत रहे थे..


मै नकुल से तो कभी नाराज ही नहीं थी, क्योंकि हम दोनों को पता था शादी के बाद की उसकी जिम्मेदारी. उसे किसे पहले प्राथमिकता देनी थी और वो वही कर रहा था.. शायद वो भी आंसू बहता होगा, लेकिन मेरी तरह वो भी किसी को दिखा नहीं सकता.. और अब तो मै भी नहीं हूं उसके पास जो अपने हाथ से उसके आशु पोछ सकूं.. हां लेकिन अब उसके आशु पोछने वाली उसकी जीवन संगनी है...


शाम को तीनो ही पहुंच गए.. उनके आने का समय हो रहा था.. इसलिए मै भी अपना हुलिया ठीक करके कुछ कामों में लगी हुई थी... तीनो साथ आए. मैंने जैसे ही दरवाजा खोला गौरी बड़े ध्यान से मेरा चेहरा पढ़ने की कोशिश करने लगी. मै पीछे घूमकर किचेन की ओर चलती हुई पूछने लगी... "चाय या कॉफी"..


गौरी:- जा तू बैठ जा.. मुझे पता है किसे चाय चाहिए और किसे काफी..


मै:- नहीं रहने दे.. एक महीने नहीं थी तो पुरा किचेन का सामान खत्म है.. 2 घंटे का समय नहीं मिला जो सामान ले आती..


गौरी:- आज ही सोच रही थी लाने का.. तुम्हारा ऑफिस वर्क खत्म अब..


मै:- हां खत्म भी और 3 दिन की छुट्टी पर हूं.. क्या सब हुआ ये बताओ इस बीच... और कहीं घूमने चले क्या..


मैक्स:- दीदी सॉरी वो..


मै:- बस भाई, जाने दे उस बात को.. वैसे भी अनीता क्या सोचेगी.. इसकी दीदी पूरी पागल है, क्यों अनीता


अनीता:- नहीं मै कुछ और सोच रही.. गौरी आपको नाम से पुकारती है और मैक्स दीदी कहती है..


मै:- हिहिहिहिही... कहती नहीं कहता है.. और सिम्पल सी बात है, दोनो मुझसे छोटे है लेकिन ये गौरी कभी मानने को तैयार नहीं हुई..


अनीता:- ओह.. वैसे आज मुझे पता चला कि आप सीए कर रही, वरना अभी तक तो लग रहा था कि आप ऑफिस में क्लर्क हो..


मै:- मिस अनीता जी क्लर्क का जॉब, जॉब नहीं होता क्या.. और एक बात, मै अगर इस देश की प्रधानमंत्री होती ना तो हर ऑफिस के बाजार ये जरूरी कर देती की पहले अगरबत्ती क्लर्क के नाम पर दिखाओ, तब अंदर जाओ..


अनीता:- ऐसा क्यों..


मै:- क्योंकि हमारा ये इतना बड़ा देश पुरा का पूरा क्लर्क ही चला रहा है... उनके काम में कि गई देरी, यानी बैंक से लेकर रेलवे तक के काम काज मे देरी... कहने का अर्थ ये है कि क्लर्क के बिना देश ही नहीं चलेगा.. इसलिए हमेशा एक क्लर्क को इज्जत की नजर से देखना चाहिए..


अनीता:- काफी अनुभवी है..


मै:- जब मंत्री जी के ऑफिस का काम ली ना, तब एक क्लर्क की अहमियत पता चली मुझे.. खैर मै भी कहां लगी हूं.. और सुनाइए मिस..


अनीता:- और क्या मुझे एक ऑटोग्राफ दीजिए पहले.. आपके बारे में डिटेल आज ही बताया मैक्स ने.. सीधा बोलता है.. वो सीए करने के बाद भी आईएएस, आईपीएस दुनिया के तमाम एग्जाम निकाल सकती है..


मै:- हिहिहिहिहि, तमाम एग्जाम ही निकालकर पढ़ती रहूंगी तो पता चलेगा एक बेंच के एक किनारे मम्मी पढ़ रही है तो दूसरे किनारे बेटा और बेटी..


अनीता मेरी बात सुनकर हंसने लगी, वो अपनी हंसी रोकती हुई पूछने लगी... "वैसे कितने सारे बच्चे प्लान किए है"..


मै:- पता नहीं कितने बच्चे होंगे मेरे पास.. लेकिन बस यहां से जाकर वापस एक स्कूल खोलूंगी और सबके बच्चे को मै ही पढ़ाऊंगी.. ताकि अपने बच्चे को देखने के बहाने से ही सही सब आएंगे तो.. वैसे गौरी, अनु दीदी (गौरी की बड़ी बहन) तो काफी गुस्से में होगी ना.. उनका बेबी हुआ और मै झांकने तक नहीं गई।


गौरी:- ओह बताना ही भुल गई.. दीदी ने संदेश दिया है कि कबड्डी खेलने मत आना, जब भी आना 10 दिन की छुट्टी लेकर फुरसत मे आने.. अभी ना आने का कोई गुस्सा नहीं है लेकिन दरवाजे पर आकर कही ना की ये काम, वो काम तो गला घोंट दूंगी.. बता देना..


अजीब था जीवन का खेल. देखा जाए तो समय केवल जनवरी 2015 से सितंबर 2015 तक ही पहुंच था और इतने ही समय में कितना कुछ बदला लग रहा था.. मै अनु दीदी के बारे में ऐसी पूछी जैसे अब कभी लौटकर अपने गांव अपने सहर और अपने लोगों के बीच नहीं जाऊंगी।


हां शायद यही फीलिंग थी, जो अनु दीदी के विषय में ऐसा पूछी, वरना अब तक तो 10 दिन उनके पास रुकने का प्लान कर रही होती..


वक्त भी कैसे-कैसे मंज़र दिखाता है.. एक क्षण में ही सदियों कि दूरियां ले आता है.. 2 अक्टूबर के दिन एक गुप्त बैठक हुई.. जिसमे मैंने आने वाले 70 से 75 दिन यानी 17 से 22 दिसंबर तक बहुत ज्यादा काम से भरा हुआ घोषित कर दी...


2 काम का जिम्मा उठना था.. पहला भारत के हर सहर, गांव और पिछड़े इलाके मे, इस दीवाली बच्चो मे पटाखे और कपड़े वितरण करवाएंगे... दूसरा की कई ऐसे कलाकार है जो अपनी पहचान नहीं बना पाते और रोजमर्रा कि जिंदगी में जूझते हुए, अपने कला को छोड़कर कुछ भी काम शुरू करते है..


हम उन सब कलाकारों को काम देंगे.. जो जिस सहर के है उन्हे वहीं कला दिखाने का काम मिलेगा.. मंच हम उनको देंगे और प्रतिभा उनकी होगी... इसके लिए हम पहले 60 बड़े और मझौले सहर को पकड़ेंगे.. और इसकी लोकप्रियता को देखते हुए धीरे-धीरे विस्तार करेंगे..


पहले तो 60 की संख्या जो है, वो हर राज्य के लिए सुनिश्चित की जाए ताकि हमारे कला मंच हर राज्य मे होने चाहिए.. बाकी किसी राज्य के किस सहर मे मंच होगा वो हम आगे तय करेंगे..


एक नए कल्चर का सृजन करेंगे, जहां स्ट्रगलिंग हर कलाकार को मौका मिलेगा.. वो अपना रोजमर्रा के काम से फुरसत होकर अपनी कला लोगो तक पहुंचा सके.. वहां से आमदनी कुछ भी हो, लेकिन हम उन्हे हर महीने फिक्स सैलरी देंगे..

दोनो प्रोजेक्ट का एस्टीमेट खर्च 1500 करोड़ है.. जैसे ही कैलेंडर मे वर्ष बदलेगा.. रात के 12 बजे ये सारे कलाकार एक साथ अपने l-अपने सहर से रोड शो करेंगे. जिसमे वो बताएंगे की मंत्री जी ने भीख मांगकर जो पैसे इकट्ठा किए, उन पैसे से पहले कितने बच्चों के चेहरे पर खुशी लाए और उसके बाद उन कलाकारों के लिए अभी क्या किए है. मंत्री जी की भविष्य की क्या योजना है, और भविष्य में कला के क्षेत्र में उभरते कलाकारों को क्या सपोर्ट करेंगे. वो सब उस रोड शो के दौरान पता चलेगा..

इस बार भी हम सरप्राइज़ करेंगे.. किसी मीडिया को 1 जनवरी से पहले भनक तक नहीं लगने देंगे और 2016 के पहले दिन से लेकर सदा के लिए जब भी वो मायूस कलाकार अपनी प्रतिभा दिखाएंगे.. मंत्री शयाम प्रसाद शुक्ला का नाम हमेशा होता रहेगा...


भरे सभा को संबोधित करती हुई मैंने अपनी पूरी योजना रख दी. मंत्री जी का उत्साह बता रहा था कि वो कितने पॉजिटिव है इस प्रोजेक्ट के लिए.. उन्होंने देश भर में 60 मंच के बदले 80 मंच की व्यवस्था करने बोले, क्योंकि अकेले दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई इन सब जगहों मे कम से कम 3 से 5 मंच होने चाहिए, क्योंकि यहां फिल्म इंडस्ट्री है..


1000 करोड़ का पागलपन दिखाना था. मैंने सीधा 1500 करोड़ का एस्टीमेट बनाया. वहीं 1500 करोड़ की राशि को मंत्री जी ने बढ़ाकर 2000 करोड़ की कर दिए.. हम तबाड़तोड़ काम मे जुट गए..


11 नवंबर 2015 दीवाली की रात.. ऐसा लगा जैसे पूरे देश मे अलग ही खुशी का माहौल था... बच्चो के नए कपड़ों के साथ हो रही आतिशबाजी के अंत में धुएं से लिखा आ रहा था.. "अभी और भी सरप्राइज़ बाकी है, पहली जनवरी का इंतजार करें.. शयाम प्रसाद शुक्ला"…


बैंक टू बैक इतनी लोकप्रियता मंत्री जी बाना चुके थे की वो फूल ना समा रहे थे.. मीडिया तो 12 नवंबर से ही पीछा नहीं छोड़ रही थी लेकिन उन्होंने साफ कर दिया की 1 जनवरी का इंतजार करे...


सभी रिपोर्टर न्यूज की तलाश में ख़ाक छानने लगे की आखिर 1 जनवरी को होने क्या वाला है.. 20 दिसंबर तक मै पूरी योजना का काम समाप्त कर चुकी थी और इधर अनीता काफी उत्साह के साथ हम सबको अपने गांव ले जाने की तैयारी कर चुकी थी...


24 दिसंबर को जब मै दिल्ली छोड़ रही थी, गौरी के साथ बहुत दिन के बाद शॉपिंग पर थी... अनीता के लिए कुछ मैंने खरीदा तो कुछ गौरी ने.. छोटी सी खुशी जाहिर करती हुई गौरी कहने लगी... "पहले मै समझती थी गिफ्ट देना पैसों की बर्बादी है, लेकिन बाहर के लोगों को मदद करके खुश देखने वाली मै... ये समझ गई हूं कि खुशियां तो घर में भी बांटनी चाहिए. कभी कभी गिफ्ट देना और लेना महज पैसों की बर्बादी नहीं होती"…


कैसे जाहिर कर दूं कि गौरी की बातों ने कितना खुश किया था.. मै खिली ही रही थी पूरे दिन... 25 दिसंबर तक हम सब अनीता के गांव में थे. हमारे साथ उमाशंकर और उमाशंकर के एंगेजमेंट को अटेंड करने के लिए उसका एकमात्र दोस्त रवि भी पहुंचा था.


पहुंचते ही एक प्लास्टिक के थैली में सबका मोबाइल रखी और उसे पोटली बनाकर अनीता को दे दी हिफाजात से रखने.. सबको उनका मोबाइल सीधा 1 जनवरी को ही मिलने वाला था, तबतक बिना मोबाइल का जीवन भी देख लें… हालांकि मंत्री जी का ख्याल हम तीनों को ही आया था, इसलिए उमाशंकर ने पहले फोन करके उनसे पूछ लिया की 1 जनवरी के प्लान को एग्जिक्यूट करने में कोई समस्या तो नहीं लग रही...


उनका जवाब जब आया कि कोई समस्या नहीं है, हमसब यहां एन्जॉय करे और मंत्री जी, नूतन और श्रेष (मंत्री जी के ऑफिस के 2 भरोसेमंद लोग) के साथ यहां सब आराम से कर लेंगे.. बाकी पुरा काम तो खत्म करके ही गए थे, केवल कॉर्डिनेट ही तो करना था.. इतनी कहानी साफ होने के बाद फिर क्यों मै देती किसी को मोबाइल.. सब मोबाइल के बिना कुछ दिन जीकर देखे..


हमारे रुकने की कुछ इस प्रकार व्यवस्था थी... मै, मैक्स और गौरी एक गेस्ट हाउस में.. रवि और उमाशंकर एक गेस्ट हाउस में.. अनीता के परिवार का स्वागत और मिलने के व्यवहार को देखकर ही सबका दिल खुश हो गया था...


26 दिसंबर के शाम का वक्त था, हमारे उमाशंकर, मंदिर देखकर बावरे हो गए.. उन्होंने वहां के एक पुराने मंदिर के पुजारी से विनती की, क्या वो भगवान शिव की आराधना में यहां गा सकता है..


उन लोगो ने भी खुले दिल से स्वागत किया, कहने लगे भगवान के द्वार मे तो भक्तो को पूजा करने की मनाही नहीं होती, फिर वो तो एक मंदिर का पुजारी रह चुके है.. मै तो उत्सुकता से बैठ गई मंदिर मे, क्योंकि कई साल बाद मै छोटे पुजारी को सुनने वाली थी..


संस्कृत के स्लोक उच्चारण से आराधना शुरू हुई.. मै बैठ गई ढोलक लेकर, मैक्स और गौरी मंजीरा लेकर बैठ गए. रवि ताली की थाप दे रहा था और फिर जो ही समा बांधा वहां भगवान शिव के दरबार में शाम के वक्त.. छोटा सा लेकिन काफी कुशल तालुका था.. जहां डबल लेन सड़क के दोनो ओर 2 मंजिले मकान और हर मकान के पीछे बड़ा से बगीजा और 3 चार कुटिया जरूर मिल जाते..


छोटे पुजरि की आवाज में सच में जादू था. उनकी आवाज जहां तक गई, उन जगहों से लोग जुटना शुरू हो गए.. अनीता का खिला चेहरा देखने लायक था, जब वो हमारे बीच आकर बैठी.. वो अपने लोगो को इशारे मे बता रही थी कि ये है मेरे होने वाले कुटुम्ब..


27 दिसंबर, सुबह से ही उमाशंकर का मन आज कुछ ज्यादा ही छेड़ छाड़ का हो रहा था. मुझे देखकर चेहरे पर शरारती मुस्कान फैल जाती और जब भी मौका मिलता मुझे बाहों में भरने की नाकामयाब कोशिश करने में जुट जाते.. अलबत्ता आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था, शायद मोबाइल हाथ में ना होने के कारण उन्हे छेड़छाड़ करना ज्यादा रोचक लग रहा हो, किसे पता...

 

nain11ster

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अध्याय 27 भाग:- 7




जब मुझे लगा कि उमाशंकर की शैतानियां हद से ज्यादा बढ़ रही है, तब मैंने भी उन्हें तड़पाने का बीड़ा उठा ही लिया. गौरी को मैंने इशारे से अपने पास बुलाया और सुबह के नाश्ते के बाद बोल दी कि बिना बताए ही गायब होना है..


जैसा हमने तय किया था ठीक वैसा ही कि, बिना बताए हम खेतों के ओर निकल पड़े… मै जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, कहीं गुम सी होती जा रही थी, मानो अपने गांव आ चुकी हूं. एक साल हो चुका था, अपने गांव की उन पगडंडियों पर चले, जहां से निकलकर मै कहीं बाहर नहीं जाना चाहती थी...


"हम्मम !!! तो मेनका मिश्रा गुम हो गई"… गौरी ने मुझे टोका...


मै, गहरी सांस खींचकर उसे छोड़ती... "बहुत कुछ बदला बदला सा मेहसूस करती हूं, और ये बदलाव सुकून वाला नहीं है... l"


"अनीता और उसका परिवार मस्त है ना"… गौरी पूरे माहोल के नजरिए को ही बदलती हुई..


मै, अपना चेहरा किनारे करके, गौरी को को देखकर मुस्कुराई... "मेरी बहन काफी समझदार हो गई है.. हां मुझे अनीता और उसका परिवार बेहद पसंद आया. मैक्स ने एक बात सच कही थी उस दिन कैंटीन मे"..


गौरी:- क्या?


मै:- यही की कभी उसके साथ मै बैठकर बात नहीं कि..


गौरी:- वो होता ही कितना है घर पर.. जो तुम बैठकर बात करती..


मै:- यही तो मैक्स भी बताना चाह रहा था. मैंने हक ही कितना जताया, उसे रोककर, बिठाकर बात करने की..


इस बार गौरी पलटकर मुझे देखती... "अनकही भावनाएं कैसे समझ लेती हो.. हां मैक्स ने मुझसे से कई बार कहा है, मेनका दीदी का लगाव मुझसे उतना नहीं, वो उनके व्यवहार में दिखता है.."


मै:- हां उसने जो मेहसूस किया वही कहा.. फोन होता तो उसे बुला लेती, अंदर से बुरा लग रहा है.. एक भाई को मैंने नजरंदाज कर दिया...


"वैसे कितने भाई है आपके"… अनीता पीछे से अचानक बोल परी..


मै और गौरी पीछे पलटकर अनीता को देखने लगी, साथ ने मैक्स भी था.. और दोनो हाथ थामे मेरे पीछे चल रहे थे... "कब से छुपकर हमारी बातें सुन रहे हो"..


मैक्स:- शुरू से..


गौरी:- कहीं बैठकर बातें करते है ना...


हम चारो खेत में बने एक मचान पर चढ़ गए और अपने पाऊं लटकाकर बैठते हुए.… "मैक्स तुम्हे शर्म नहीं आयी, पीछे से ऐसे छिपकर बातें सुनते"…


मैक्स:- नहीं आयी तो.. कभी अपनी बात बताई हो.. यदि बताती तो हमे सुनना नहीं पड़ता...


मै:- अभी तो मै अनीता को सुनना पसंद करूंगी.. और एक सवाल भी है कि कैसे अनीता ने तुम्हे और तुमने अनीता को अप्रोच किया...


अनीता:- हमारी स्टोरी बहुत सिंपल है... मै क्लास अटेंड करने आयी थी और उसी वक्त मेरी नजर मैक्स पर गई. मैक्स मुझे अच्छा लगा और मै क्लास के बारे में पूछने के बहाने से बात करने चली गई..


मै:- अभी रुको, मैक्स अब तेरी बारी..


मैक्स:- अनीता बता तो रही है..


मै:- वो तो अपना बता रही है ना.. तू अपना बता..


गौरी:- वो क्या बतायेगा... मै बताती हूं मेनका..


मैक्स:- गौरी फिर मै सीक्रेट शेयर नहीं करूंगा..


मै:- अच्छा तू रहने दे गौरी मत बता, मेरा भाई ही बता देगा...


मैक्स:- मै कुछ नहीं बताने वाला... जबतक कि तुम एक सवाल का जवाब ना दे दो…


मै:- अच्छा पूछ क्या पुछ रहा है..


मैक्स:- बस एक सवाल आ रहा था मन में, अनीता के विषय में जानकर क्या मम्मी मुझसे नाराज होगी...


मै:- नहीं, वो इस बात से खुश रहेगी की तुमने शुरू से गौरी को सब बताया. मन में कहीं भी ऐसा नहीं था कि कुछ गलत कर रहे, तभी तो बताया... मौसी को समझना थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन उनके पास होने से खुशी ही मिलती है.. बाकी मासी के बारे में मै बोलने लगी तो शायद शाम ना हो जाए और तुम सब बोर..


मैक्स:- मै अपनी मां को इतना क्यों नहीं समझता जितनी आप समझती है..


मै:- क्योंकि मैं अपनी मां की बेटी हूं ना, इसलिए उन्हें जानती हुं… लेकिन इसका यह मतलब यह नहीं कि तुम उन्हे नहीं समझ पाते तो तुम प्यार नहीं करते या वो नहीं करती... बहुत प्यार करती है वो तुम दोनो से, इसलिए तो मेरे बुरे वक्त मे अपने साए को विश्वास के साथ छोड़कर गई. वरना मेरी मासी मेरे पास से तब तक नहीं हिलती जबतक वो सुनिश्चित नहीं कर लेती सब पहले जैसा हो गया...


गौरी:- बहुत हो गई पुरानी बातें, मैक्स अब बताओ, मेनका ने जो पूछा...


मैक्स:- नहीं मुझे शर्म आएगी..


मै:- अच्छा ठीक है तो गौरी को बताने दे..


मैक्स:- हम्मम ! ठीक है मै यहां से जाता हुं, तुम लोग आपस में बातें करो..


बेचारा शर्मा गया.. वैसे भी तीन लड़कियों कर बीच वो क्या करता लड़कियों की बात सुनकर.. वो चला गया और हम दोपहर तक वहीं बैठकर बातें करते रहे. अनीता को हम जितना जान रहे थे. हम अनीता को अपने मे से ही एक समझ रहे थे...


27 दिसंबर, रविवार के दोपहर 3 का वक्त. हम सबको अनीता के अभिभावक का आमंत्रण आया. हॉल के सभा में बैठकर बातचीत करने के लिए हम सबको बुलाया गया था.. लड़की के पिता स्वभाव से काफी शालीन और हंसमुख व्यक्ति थे, ज्यादातर बातचीत मे वो कन्नर या मलयालम ही इस्तमाल करते थे, लेकिन उनकी हिंदी भी उतनी ही अच्छी थी, जितनी हमारे क्षेत्र के लोगो की होती है..


हम तो बस उनका कल्चर ही देखने गए थे, और देखकर दिल खुश हो गया, क्योंकि मैक्स को देखने के लिए वहां उनके सब रिश्तेदार आए थे.. उससे बातचीत कर रहे थे.. मम्मी-पापा और परिवार के बारे में पूछ रहे थे..


मैक्स के ओर से मै ही सबसे बड़ी थी और मैंने उनके स्वागत और अभिवादन को देखते हुए, उनके पूरे परिवार के सामने अपनी दिल की बात रख दी.… "जब दिल मिल जाते है तो भाषा कोई मायने नहीं रखता. मै अपने भाई की शुक्रगुजार हूं कि आप जैसे प्यारे लोगों से हमे मिलने का मौका दिया.."


उनके स्वागत और हमे पूछने के ढंग से वाकई सब प्रभावित थे.. मैंने जैसे ही अपनी दिल की बात कही.. अनीता के पिताजी मुझे अपने पास बिठाकर कहने लगे... "मेरी बेटी इतने दूर के लड़के से मिलवायी... हमने सोचा बेटी को मायूसी से विदा करेंगे, लेकिन जब अनीता, मैक्स और उसके परिवार के बारे में कुछ दिन पहले बता रही थी, लगा की जैसा बोल रही है ठीक वैसा हो तो मेरी बेटी एक घर से निकलकर दूसरे घर जाएगी.."

"हमारे यहां जॉइंट फैमिली कल्चर होता है, इसलिए ज्यादातर शादी रिश्तेदारी मे ही होती है.. हमे डर होता की बाहर के परिवार मे कैसा माहौल होगा, कैसा कल्चर मिलेगा.. शादी के बाद बेटी को जब जी करे देख सकते है कि नहीं.. क्योंकि 2-4 शादियां हम देख चुके है अपने समाज के बाहर.. ऐसा लगा जैसे शादी नहीं हुई हो, बल्कि बेटी की बली चढ़ा दी.. हमारे खुशी के मौके पर वो नहीं आ सकती, उनकी खुशी में हिचकते हुए केवल एक दिन के लिए गए और लौट आए, ऐसे रिश्ते का क्या फायदा"…


काफी गहरी बात कह गए और पूरे दिल से.. मै गहरी श्वांस लेती हुई कहने लगी.. "आपने बिल्कुल सही परवरिश की है अपनी बेटी की.. क्योंकि उसने लड़के को हां कहने से पहले उसे खुद दिखाने लाई है कि उसका परिवार कैसा है.. और आपसे एक मौन स्वीकृति लेने आयी की पापा ये लड़का अपने परिवार लायक है कि नहीं.. वो ना तो आपसे पूछेगी और ना मैक्स से. बस दोनो को देखकर जब मेहसूस कर लेगी तब अपने दिल के अरमान जहीर करेगी..."


अनीता के पिता:- मुझे मैक्स और तुम्हारा परिवार पसंद आया.. आगे इन दोनों का फैसला है.. हमारे ओर से अभी से हां है..


मै:- मै भी अपने कविता मासी और सौरव मौसा जी की ओर से हां कह देती हूं.. हमे भी अनीता और उसका परिवार पसंद है..


अनीता के पिता:- नहीं ये तो उनका मत होगा ना..


मै:- मै भी तो उन्ही का मत हूं अंकल, अपनी मासी की लाडली और अनीता मुझे बेहद पसंद है. अगर उन्हे मेरे दिल की बात पता चल जाए तो सगुण लेकर चली आएगी.. लेकिन ये जल्दबाजी होगी.. क्योंकि दोनो समझदार है और हमे खुद बता देंगे की उन्हे एक दूसरे का कल्चर पसंद है, अब इस रिश्ते को आगे बढ़ा सकते है...


कुछ ज्यादा ही हम दोनों की लंबी बात खींच गई.. और इसी बीच अनीता अपने परिवार और रिश्तेदारों के बीच मैक्स को खड़ा करके पूछ ही दी.. "क्या वो अनीता को पसंद करता है, क्या उसका होकर रहना पसंद करेगा?"..


दोनो बीच हॉल में खड़े थे बिल्कुल आमने-सामने, तकरीबन आधे फिट की दूरी पर. अनीता नीचे से अपने हाथों से मैक्स का हाथ थामि हुई थी. दोनो एक दूसरे को देख रहे थे. अनीता का चेहरा पुरा खिला हुआ और होटों पर प्यारी सी मुस्कान थी, वहीं मैक्स थोड़ा असहज, और आश्चर्य के भाव उसके चेहरे पर थे...


मैक्स की तो आंखें बड़ी हो गई मै अंकल के पास से भागकर मैक्स के पास पहुंची.. मैक्स के दाएं गौरी और बाएं मै.. "हां बोल दे मैक्स, सोच क्या रहा है"..


मैक्स, सामने अनीता का हाथ थामे था, और मुंडी मेरी ओर घूमकर कहने लगा.. "ये तुम दोनो (मै और गौरी) से ज्यादा पागल है.. दिल तो उछल रहा है हां कहने के लिए, लेकिन कह दिया तो चूम लेगी"


गौरी:- हां बोल दे.. उसके सभी रिश्तेदार यहीं है, यहां कुछ नहीं करेगी..


मैक्स अपनी परेशान नज़रों से पहले मुझे देखा.. मैंने हां में सर हिला दिया.. फिर गौरी के ओर देखा, उसने भी हां में सर हिलाया.. मैक्स अब सामने देखा, परेशान नजरे और परेशान चेहरे के भाव को तुरंत बदलते, एक प्रेमी की इजहार वाली भावना और वैसा ही खिली सी मुस्कान अपने चेहरे पर लाते.. जोर से कह दिया... "हां बिल्कुल.. मै तुम्हारे साथ पूरी उम्र खुशी से रह लूंगा"…


उफ्फ ये नजारा.. अनीता ने अपने एरियों को ऊंचा की, गले में हाथ डालकर होंठ को स्पर्श करती अपना सर मैक्स के सीने से लगा ली, और उसके सभी रिश्तेदार पीछे से तालियां बजाने लगे...


दोनो सुकून से खड़े होकर वहां लगभग सभी को नजरअंदाज किए, कहीं गुम से हो चुके थे.. कुछ देर बाद जब दोनो अलग होकर, थोड़े शर्माए और थोड़े लज्जाए से अपने-अपने पक्ष के पास बैठे, सब हंस रहे थे...


जितनी देर में वो दोनो अलग हुए, हम अपने गेस्ट हाउस से अनीता के लिए गिफ्ट भी ले आयी थी... हम जब अपने हाथो से अनीता को अपने-अपने गिफ्ट देने लगे, तब अनीता और उसके परिवार की आखें बड़ी सी हो गई, उसके पापा पूछने लगे... "क्या ये सगुण है"..


गौरी हंसती हुई जवाब देने लगी... "नहीं वो तो बड़ों का काम है वो तय करेंगे. ये तो हमारी खुशी है. एक छोटी सी भेंट, हमारे जेनरेशन के सबसे छोटे सदस्य के उसकी जीवन संगिनी के लिए"…

"वाउ क्या पारिवारिक ड्रामा है, ऐसा लग रहा है जैसे मेनका मिश्रा जहां होगी सब सही ही होगा"… इसी खुशी के माहौल मे, एक अजीब ही दुर्गन्ध उमाशंकर की बातों से आ रही थी और उसके साथ आए 6 हाई प्रोफाइल शूटर, जो उमाशंकर की मंशा बयान कर रहे थे..


माहौल अजीब ही था, कुछ भी समझ से परे.. ऐसा दृश्य जिसमे लोगो को बस यही समझ में आया कि छोटे पुजारी, जो काफी शालीन है, इनपर खून सवार है.. कारन शायद मैक्स और उसके परिवार के बीच की कुछ पारिवारिक रंजिसें होंगी..


लेकिन जिस प्रकार के हाई प्रोफाइल शूटर्स थे, उन्होंने सबको ही डाराकर कंट्रोल कर रखा था.. मामला तो मैक्स और और गौरी को भी कुछ समझ में नहीं आया. वो दोनो भी उतने ही चकित और भयभीत थे, जितने कि अनीता और उसका परिवार.. बस उस माहौल मे डराने वालों से जो नहीं डरी और नजरे मिलाए खड़ी थी, वो थी मै, मेनका मिश्रा.…
 

SHADOW KING

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अध्याय 26 भाग:- 3


आज तक तो सबको बिना मांगे गिफ्ट दी थी, लेकिन इन्होंने तो सामने से मांग लिया था.. खैर.. फिलहाल गौरी व्यस्त थी उन्हे सुनने में.… और हर्ष ने मुझे कहा कि एक मरीज काफी ज्यादा सीरियस है अगर हमने कुछ नहीं किया तो उन्हे बहुत कस्ट उठना पर सकता है...


ये एक होटल था जिसमे 96 कमरे थे... 5 करोड़ मे डील तय हुई थी, जिसका पेमेंट मैंने एक साथ किया था.. यहां बहुत ज्यादा रेनोवेशन का काम नहीं करना परा था.. रिसेप्शन एरिया को पूरा खाली करवा दिया था, जिसमे एक बड़ा सा हॉल बन गया था, जहां एक साथ 200 लोग बैठ सकते थे.. लेट सकते थी.. रिसेप्शन के बगल मे 2 बड़े बड़े चैंबर थे जिसे हमने डॉक्टर के लिए छोड़ दिया था.. विजिटिंग डॉक्टर आएगा और उनका चेकअप करके जाएगा..


मै थोड़े चिंता के साथ हर्ष के चेंबर मे दाखिल हुई और जैसे ही अंदर पहुंची, हर्ष मुझे खींचकर दीवार से चिपकाकर, मेरे कमर में हाथ डालते..


"तुम्हे कष्ट दिखा मरीज का"..

"हिहीहिहिहिहिहि,… ओ, मेरा बेबी मरीज हो गया.. बताओ क्या सेवा करूं फिर"…

"बस कुछ देर साथ रहे वहीं इलाज है"… हर्ष गहरी श्वांस खिंचते, खुद को थोड़ा मेरे करीब करते हुए कहने लगा..

"इक्छा तो मेरी भी कुछ ऐसी ही है हर्ष बाबू, लेकिन अभी वक्त साथ नहीं दे रहा"… मै हर्ष के आखों में झांकती हुई कहने लगी…

"वक्त जितना मिले उतने मे ही खुशियां बटोर लेंगे, कोई हर्ज है क्या"…


हर्ष अपनी बात कहते हुए अपने चेहरे को बिल्कुल मेरे करीब ले आया.. हम दोनों की श्वांस टकरा रही थी.. मेरे शब्द मेरे हलख के नीचे कहीं दब गए.. आंखें बंद होते चली गई और होंठ सुखकर बेताब हो चले थे हर्ष के होंठ से मिलने के लिए...


फिर तो गहरी श्वांस, मै खुद ही अंदर खींचने लगी.. धड़कने थोड़ी सी बेकाबू थी और तभी हर्ष के होंठ ने जब मेरे होंठ को स्पर्श किया... मेरे सुकून ने जैसे मेरे होंठ को स्पर्श कर दिया हो...


बेखयाली मे मैंने अपने हाथ हर्ष के गले में डालकर उसके चुम्बन मे पूर्ण रूप से खोती, उसका पूरा साथ देने लगी.. होंठ से होंठ का वो जुड़ाव ऐसा था जिसका रोमांच अंदर रूह तक मेहसूस कर रही थी...


"बस-बस इतनी ही छूट है मेरे ओर से चलो अब दूर हटो"… गौरी दरवाजे से खड़ी होकर कहने लगी.. हालांकि जब बस-बस कही तभी मै झटके से हटी थी और अंदर से काफी अनकम्फर्टेबल मेहसूस हो रहा था...


डॉक्टर बाबू तो मुंह छुपाकर वहां से तुरंत ही खिसक लिए और मै गौरी को देखकर बस नजरे इधर-उधर किए जा रही थी... "चले मेनका या यही खड़ी होकर, दीवार और टेबल देखती रहोगी"…


मै:- वो सॉरी मै थोड़ा सा..


गौरी:- पागल कहीं की, मुझे भी एक्सप्लेन कर रही है.. जब ज्यादा दिन हो जाता है तो कभी-कभी ऐसे लोग प्यार जाहिर कर देते हैं.. चल अब..


मै, थोड़ा सा अफ़सोस करती उसके साथ चल दी.. थोड़ा सा गिल्ट भी फील हो रहा था.. मै खुद मे कंफरटेबल मेहसूस नहीं कर रही थी.. तब गौरी ने उन वृद्ध लोगो की बाद शुरू की जिनके अजीब-अजीब मांग थी.. उनकी बात आते ही मेरा ध्यान उन पर गया और मैंने बोल दिया.…


"सबकी डिमांड पूरी तो होनी चाहिए लेकिन मामला ये फसा है की 2 करोड़ के इंट्रेस्ट से अभी काम चल रहा है और हर महीने इनपर खर्च करने के लिए मात्र डेढ़ लाख ही ब्याज के पैसे आ रहे है... मेरा पहला टारगेट है की इनके लिए 5 करोड़ तो खाते में हो, ताकि 3 लाख 75 हजार मे से जो कुछ पैसे बचेंगे उनको इमरजेंसी मे इलाज के लिए रखा जाए.. कभी भी इमरजेंसी पर सकती है.. और फिर इनकी ये डिमांड... मुझे कुछ वक्त दे मै सोचती हुं कुछ"..


गौरी:- ज्यादा मत सोचो... समस्या दिमाग में है तो समाधान के उपाय भी सामने आ ही जाएंगे... मै पापा और जीजू से बात करके इनके चेहरे पर स्माइल की जिम्मेदारी उठाती हूं और तुम वो अकाउंट का काम देख लो..


मै:- जिद मत करना, बस उन्हे बता देना.. अपनी मर्जी से देने और जिद करके लेने मे बहुत अंतर है..


गौरी:- कौन सा पूरी ईमानदारी का पैसा है.. सोनार और बेईमान ना हो, ऐसा हो सकता है क्या?


मै:- बेशर्म, ऐसे बोलेगी अपने पापा और जीजू के बारे में..


गौरी:- मै क्या खुद भी कहते है.. इलेक्शन टाइम जो पेटी भर-भर कर ले जाते है, उसकी भरपाई कहां से होगी..


मै:- हिहिहिहिहिही... बस रे, बस भी कर और जाने दे उन्हे.. कुछ हो सके तो ठीक नहीं तो तू लोड मत ले ज्यादा, मै हूं ना.. थोड़ा वक्त दे सब सैटल कर दूंगी... बस तू ये अच्छे काम जारी रख.. एक दिन के पागलपन से जब 82 लोगों को जोड़ सकते है.. फिर तो पागलपन कोई अंत ही नहीं करना है अब

जब 1 रूपए की जरूरत होती है तो लोग डेढ़ रुपए कमाते हैं... जैसे जरूरत बढ़ेगी, कमाने का ख्याल भी बढ़ेगा.. अपने दम पर जितना कर सकते है करेंगे, हाथ ना फैलाएंगे..


गौरी:- हट यार.. मुझे अपनी स्टडी जारी रखनी चाहिए थी.. 4 रुपया कमाऊंगी तब तो 3 रुपया खर्च करूंगी.. कोई सजेशन..


मै:- कुछ भी कर लो पैसे तो बिजनेसमैन ही कमाते है.. बाकी तो ज्यादा पैसा यानी ज्यादा करप्शन करना होगा..


गौरी:- हां ये भी सही है.. लेकिन एक प्रोफेशनल मे पैसा भी है और इज्जत भी.. और करप्शन मतलब केवल टैक्स चोरी..


मै:- कौन सा..


गौरी:- डॉक्टर.. एक ऑपरेशन 20 हजार एक मरीज देखो 500 से 1000 रूपए.. दिन मे 40 मरीज और 2 ऑपरेशन मे मै 100 लोगों को तो खिला ही सकती हूं..


मै:- इसमें कंपिटेशन भी तो है.. और फिर एक काबिल डॉक्टर बनने मे कम से कम 8 से 10 साल, तब तो लोग जानेगे.. हर्ष को देख ले.. ये 8 साल हो गया लगभग लेकिन अब भी जूनियर डॉक्टर है...


गौरी:- 10 साल बाद ही सही, कम से कम एक विजन तो है.. मैंने अभी तय कर लिया है.. क्या तू मदद करेगी..


मै:- मदद .. पागल मै खुश हूं.. बेहद खुश..


गौरी:- ठीक है तो मै मेडिकल निकलूंगी और तुम्हारे पास जब फिर से 100 लोगों लायक इन्वेस्टमेंट हो जाए तो इस बार हमारे सहर मे पागलपन करने निकलेंगे..


मै:- तूने कह दिया मतलब दिमाग में सेट हो गया.. जल्द ही शुरू करते है पागलपन..


बात करते-करते हम पहुंच चुके थे गांव.. दूसरे टॉपिक के आने से मेरी अंदर की गिल्ट से ध्यान तो हट गया था लेकिन तय कर चुकी थी की जबतक यहां हूं नो फिजिकल टच.. ये बात हर्ष को भी पहली फुर्सत मे समझाना था..


सारी रस्में और रिवाजों के बीच आ गया 18th दिसंबर.. नकुल और प्राची की शादी का दिन.. कोई मतलब ही नहीं था कपड़ों का, क्योंकि ठंड की वजह से फैशन के नाम पर बहुत कुछ किया तो नहीं जा सकता था, लेकिन प्राची ने मेरी ड्रेस पहले ही भिजवा दी थी और उसके साथ सभी मैचिंग एसेसरीज... उस डिज़ाइनर लहंगा चुन्नी और उसके साथ ठंड के वक्त और हॉल के लिए जो तैयारी थी, मै देखकर मुस्कुराइए बिना नहीं रह सकी..


उन्हे पता था कि गौरी भी मेरे साथ है, इसलिए उन्होंने गौरी और साक्षी के लिए भी ड्रेस भेजी थी.. वो भी उतनी ही क्यूट और मस्त.. हालांकि ये ड्रेस सिर्फ घर पर दिखाने के लिए ही थी बाकी तो मै 3 बजे तक वहीं प्राची दीदी के पास ही पहुंच रही थी...


सारी विधि और सारी रश्मों के बीच एक छोटा सा वक्त आया जब मै और नकुल साथ बैठे थे.. बिस्तर किनारे अपने पाऊं लटकाए.. बाहर ढोल बज रही थी.. हंसी और खिल खिलहट की आवाज गूंज रही थी.. और अंदर हम दोनों बिल्कुल ख़ामोश...


मै गहरी श्वांस अंदर खिंचते…. "तुम्हे नई जीवन में प्रवेश की मुबारकबाद... दोनो मे यदि चुनने का मौका आया तो तुम्हे पता है क्या करना है..."


नकुल:- हम्मम !!! जनता हूं मै, लेकिन किसी और के साथ विवाह होता तो शायद चुनने का वक्त आता.. प्राची के साथ ना के बराबर परिस्थिति आएगी...


मै:- हम दोनों ने शादी के बाद के बदलाव को देखा है.. इसलिए दिल छोटा ना करना... जुबान से कुछ भी निकले, दिल से हमेशा साथ रहूंगी..


नकुल:- मै भी... बस तू अपना ख्याल रखना.. डेढ़ करोड़ दहेज वाले, तेरे उन बुड्ढों के अकाउंट मे दे दिया है..


मै, धीमे से घूमकर एक बार नकुल के चेहरे को देखकर वापस सामने देखती... "वो पैसे तेरे पास रहते तो तू ज्यादा अच्छा करता"…


नकुल:- चिंता मत कर.. कौन सा वो मेरी मेहनत का पैसा था या फिर मेहनत से कमाया आखरी पैसा था.. तू रोती अच्छी नहीं लगती..


मै:- और तू भी.. चल आंसू साफ कर.. तेरी शादी में नाचूंगी, ऐसी मेरी इक्छा है.. चलेगा 1,2 ठुमके लगाने..


नकुल:- मै इंतजार मे ही था.. मुझे लगा काम मे भुल गई होगी..


मै:- तुझे यकीन था की मै भुल सकती हूं..


नकुल:- बिल्कुल नहीं..


मै अपने हाथ से नकुल के आशु साफ करती.. "तो फिर चल चलते है..."


नकुल मेरा हाथ थामकर बाहर लाया.. हम दोनों को देखकर आशा भाभी अपनी जगह से उठकर आयी और मुस्कुराती हुई कहने लगी... "एक गाना बजाओ मेरे बच्चों के लिए"..


आशा भाभी का उत्साह देखकर हम दोनों का उतरा चेहरा खिल गया.. फिर तो आधे घंटे हम दोनों नाचे.. नाचते-नाचते पाऊं दुखने लगे थे, श्वांस चढ़ गई पर उत्साह कम नहीं हुआ.. एक पल आया जब मै और नकुल एक दूसरे को देख रहे थे... और मेरी आंसू छलक आए..


जैसे मेरी भावनाएं थी ठीक उसकी भी थी.. मेरी नम आखें कह रही थी.. "तू मुझसे दूर जा रहा है"… और उसकी नम आखें मुझे भरोसा दिला रही थी कि... "मै हमेशा साथ हूं"…


नकुल के मै गले लग गई और वो मेरे आशु साफ करते हुए कहने लगा.. "इतना इमोशनल क्यों है.. शादी मे रोता हुआ दूल्हा अच्छा नहीं लगता"..


इतने में गौरी ने हम दोनों के आंसू साफ करती... "मै हूं दोनो की मेंटोर.. हरी चटनी और लाल चटनी खाओ और सारे बिगड़े काम बनाओ.. चलो मुस्कुराओ वरना रोने वाली सेल्फी पोस्ट कर दूंगी"….


इतने में ही संगीता और मिथलेश भी पहुंचे और संगीता कहने लगी… "रेयर कलेक्शन, दूल्हे की रोती फोटो.. काफी लाइक्स मिलेंगे"…


मै:- नो.. डिलीट करो वो तस्वीर.. मेरे भाई की रोती हुई तस्वीर कहीं पोस्ट नहीं होगी..


संगीता:- उसके बदले मुझे क्या मिलेगा..


संगीता के इस डायलॉग पर तो वहां मौजूद सब लोग हंसने लगे.. पीछे से मां कहने लगी... "छोड़ना मत, बहुत सबसे मांगी है"…


मै:- क्या चाहिए..


संगीता:- जयमाला स्टेज पर मेरे साथ ठुमके लगाएंगी ना..


मै:- हिहिहीहिहिहिहि.. मै भी लगाऊंगी और मेरे साथ गौरी भी लगाएगी.. कोई शक..


गौरी:- हां बिल्कुल.. चलिए अब डिलीट कीजिए तस्वीर..


एक छोटे से इमोशनल और हंसी मज़ाक के सेशन के बाद हम तीनो... मै, गौरी और साक्षी पहुंची प्राची के घर.. वैसे तो बाहर बहुत ही ज्यादा चहलकदमी थी लेकिन घर के अंदर केवल कुछ करीबी लोग ही थे बाकियों को ठीक सामने के 5-6 घरों में ठहरने कि व्यवस्था थी..


हम तीनो सीधा पहुंचे प्राची के कमरे में जहां आंटी यानी प्राची की मम्मी, राजवीर अंकल और मेरे वो थोड़े से भावुक पल बिता रहे थे... "लगता है विदाई मे कैसे रोना है उसका ग्रुप रेहसल हो रहा है क्यों?"..


मै पीछे से कहती हुई अंदर प्रवेश की.. मेरी बात सुनकर तीनो रोते रोते हंस दी.. प्राची आयी और मेरे गले लग गई.. गले लगकर वो अपने आशु पोच्छती हुई कहने लगी... "तू कह तो ऐसे रही है जैसे तू नहीं रोई है.. पापा इसे डर है कि मै इसके लाडले को दूर ले जा रही.. इसलिए उसके साथ आधे घंटे रो कर आयी है"…


मै:- हो ये घर का भेदी कौन है जो अंदर की खबर दे गया...


उपासना आंटी, प्राची की मा… "और कौन देगा, जिसे दूर ले जा रही है उसी ने दिया होगा"…


मै:- नाह आंटी नकुल ने नहीं दिया है.. मै जानती हूं कि ये किस शरीफ की शरारत है..


हर्ष:- तुम्हे कैसे पता की नकुल ने नहीं किया..


प्राची:- मतलब अब यही नहीं जानेगी नकुल के बारे में.. कहीं दूर वो खड़ा होगा जहां से नकुल, मेनका को धुंधला दिखाई दे, तब भी ये समझ जाएगी की वो क्या कहना चाह रहे है। पूरी भिड़ भी होगी तो भी बिना कुछ कहे ये दो दोनो पूरी भिड़ के बारे में डिस्कस कर लेंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा...


साक्षी:- मेरी दीदी को रिटायर कर दो इस सर्विस से बुआ.. अब आप और नकुल भईया समझो.. मेरी दीदी अब मेरी हुई..


अरे छुटकी इतनी बड़ी हो गई.. उसको सुनकर तो हम सब हंसने लगे, तभी झट से गौरी बोल परी.. "और मै"..


साक्षी:- गौरी दीदी, आप तो बाएं ओर अब भी कब्जा जमाई हो, दाएं ओर नकुल भईया की जगह खाली है..


अरे बाप रे.. ये कुछ ज्यादा ही खतरनाक है.. मुझे आज भी याद है, लगभग यही उम्र मेरी भी रही होगी जब मेरे बड़े भैया महेश की शादी सोभा भाभी से हुई थी.. आज साक्षी की भी भाभी आ रही है.. पता ना मेरी साक्षी और उसकी भाभी की कैसी जमेगी.. मेरी भाभियां तो अपवाद केस है, जिन्होंने अन्य भाभी की तरह अपने ननद से रिश्ता नहीं बनाया...


मेरी प्यारी भतीजी ने संकेत दे दिए थे की वो अब प्यार, अपने लोग और पराए लोगों को समझने लगी थी.. अब यहां से मेरी जिम्मेदारी थी कि मै इसे समाज का कौन सा स्वरूप दिखाऊं, क्योंकि ये अपनी मां के बाद अब सबसे ज्यादा मेरी करीबी थी.. ऐसा कोई भी दिन नहीं बिता होगा जब साक्षी के डॉट 7 बजे शाम को मेरे पास कॉल ना आया हो...


मै अपनी सोच को विराम देती साक्षी के चेहरे पर प्यार से हाथ फेर और उसके गाल को चूमती.. "तू तो कनिका मिश्रा है, मेरी मां और अपनी दादी. बहरहाल लगता है दुल्हन की मां, बाबूजी और भाई को शादी में कोई काम नहीं इसलिए यहीं डेरा जमाए है.. और इस दुल्हन को तैयार होना है भी की नहीं...


तभी दरवाजे से 6 फिट हाइट बिल्कुल, भड़ा तंदरुस्त बदन, और प्रिसनलिटी ऐसी की दूर से ही देख लो तो कहने पर मजबूर हो जाओ की, ये औरत है या कोई रेसलर... पेश है नीरु मासी..


ये वही नीरु मासी है, मेरी मां की सबसे करीबी दोस्त, उन्हीं के गांव की और जिनके यहां राजवीर अंकल, उपासना आंटी को लाइन मारने जाते थे...


नीरू मासी आते ही कहने लगी.. "अरे, मेरा बेटा.. कैसी हो"…


प्राची दीदी... "अच्छी हूं मासी"..


नीरू मासी:- तुझ से कौन पूछ रहा है.. तू मेरे बारे में क्या जानती है बता.. मै क्या काम करती हूं..


प्राची दीदी जैसे ही गुम हुई सोचने मे, नीरू मासी चुटकी बजाती... "लौट आओ और मेरे बारे में जानना हो तो अपने होने वाले पति, और मेरे पोते नकुल से पूछ लेना"…


तभी उनकी नजर गौरी पर परी.. कुछ देर गौर से देखने के बाद... "तू तो कविता की बेटी है ना"..


गौरी:- हां मौसी..


नीरू:- तेरी मां का स्क्रू ठीक हुआ या अब भी पहले जैसा है..


प्राची दीदी:- मासी आप क्या नाराज हो हमसे..


नीरू मासी:- हां थोड़ी सी, लेकिन तुझसे नहीं तेरी मां से.. और तेरे बाप को तो कुछ कहने से रही.. वो तो यहां का शेर है..


बेचारी मेरी साक्षी... "नानी मुझे नहीं देखी क्या... सारा प्यार खाली वीडियो कॉल पर दिखाओगी क्या?"
nice update ..5 crore to hotel ke liye hi kharch ho gaye ..ab paise kamane ke liye sabse sahi rasta gauri ko doctor banna lagta hai ..
nakul aur menka dil se ek dusre ke saath hai isliye unka rona aur emotional hona sahi hai 🤩..aur nakul ne dahej ke 1.5 crore bhi menka ko de diye un budho ke liye 😍😍...
in dono ka rishta paise se kahi upar hai 😍..
par ye rone ki khabar prachi tak kisne pahuchayi 🤔🤔..
 

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अध्याय 26 भाग:- 4




नीरू मासी:- हां थोड़ी सी, लेकिन तुझसे नहीं तेरी मां से.. और तेरे बाप को तो कुछ कहने से रही.. वो तो यहां का शेर है..


बेचारी मेरी साक्षी... "नानी मुझे नहीं देखी क्या... सारा प्यार खाली वीडियो कॉल पर दिखाओगी क्या?"


नीरू मासी:- नहीं रे, सच पूछ तो यहां मै सिर्फ तेरे लिए आयी हूं.. जरा इनसे मिल लूं फिर वादे के मुताबिक तू मेरे साथ रहेगी.. मंजूर ना..


नीरू मासी ने जैसे ही कहा, साक्षी मेरे ओर देखने लगी.. मै मुस्कुराकर बस आखों से जैसे ही सहमति दी... "ये है जूनियर कनिका मिश्रा, आंखो से ही समझाने वाली... तेरी बुआ ने हां कह दिया अब तू जरा इंतजार कर मै अपने भाई से बात कर लूं, और इस नालायक उपासना से भी"…


उपासना आंटी:- नीरु दीदी मेरी ही बेटी की शादी है.. मुझे आज तो बख्श दो...


नीरू मासी हंसती हुई... "माफ करना अब ज्यादा हो जाएगा.. एक बार और माफी देर से पहुंचने के लिए.. मै अपनी बेटी की ही शादी में देर हो गई प्राची क्या सोचेगी कि एक तो मेरे पापा की मौसेरी बहन.. ऊपर से रोब झाड़कर आयी और कुछ घंटे रुककर चली गई"…


प्राची:- आप आ तो गई हो अपनी मर्जी से लेकिन अब आप थोड़े ना तय कर सकती है कि जाना कब है..


नीरू मासी:- हां तो कौन तय करेगा...


मै:- कनिका मिश्रा तय करेगी...


नीरू:- तेरी मां को बोल दी हूं रोकना मत, 8 महीने बाद रिटायर हो जाऊंगी, फिर मेरी सेकैंड लाइफ शुरू होगी.. घूमना और मिलना...


राजवीर अंकल:- दीदी चलो आपकी शिकायत हम दूर करते है...


वो सब निकल गए, लेकिन हर्ष वहीं पर खड़ा था... "अब क्या हम कपड़े उतारने लगेंगे तब अक्ल आएगा की यहां से जाना है"…


हर्ष:- ओह सॉरी.. वो उनकी पर्सनैलिटी देखकर सोचने लगा था कि इतनी लंबी औरत भी होती है क्या.. मुझसे भी एक इंच शायद लंबी लग रही थी...


प्राची:- आ बैठ भाई, गप्पे ही लड़ा लेते है..


हर्ष:- हां जा रहा हूं तुम ऐसे ताने तो ना दो...


प्राची:- चल-चल करिया मुझे सब पता है तू यहां क्यों रुकना चाहता है...


मै:- हां तो ठीक है ना.. हर्ष चलो, कुछ बात करनी थी..


हर्ष:- हम्मम ! चलो फिर..


मै हर्ष के साथ 4 कदम चलती हुई कहने लगी… "बेबी हम थोड़ा डिस्टेंस मेंटेन कर सकते है क्या? जबतक हम गांव में है"…


हर्ष:- इक्छा तो मेरी कतई ऐसी नहीं है, लेकिन उस दिन की घटना के बाद मै भी यही सोच रहा था... चिल मेमनी.. और स्माइल प्लीज… हां लेकिन तैयार होने के बाद एक सेल्फी मेरे साथ..


मै:- एक क्या पूरी फोन भर दूंगी.. खुश..


हर्ष:- बेहद खुश...


मै जबतक लौटी, नीरु मासी साक्षी को उसके कपड़े समेत ले गई थी और बोलकर गई की चिंता नहीं करने... हम 3 लोग थे वहां और मेरे पहुंचते ही दोनो मुझे घूरने लगी... "अब इसकी जरूरत है क्या.. कुछ छोटी-छोटी बातें होती है जो आपस की होती है"…


मेरी बात सुनकर दोनो ने अपने एक कदम मेरी ओर बढ़ा दिया.. "हां ठीक है उसे बस कहने गई थी थोड़ी डिस्टेंस मेंटेन कर ले.. अब मिल गई तसल्ली या बुला दूं हर्ष को ही"…


दोनो मुझे देखकर हंसने लगी.. साढ़े 4 बजे तक ब्यूटीशियन भी पहुंच गई थी... एक कमरे के अंदर दूसरा कमरा और अंदर जाकर वो लोग अपना काम करने लगी.. मै और गौरी वहां बैठकर बातें करने लगे...


5 बजे तक वहां कुछ अनजान चेहरों ने दरवाजे पर दस्तक दी, ना तो वो हमे जानती थी और ना मै उन्हे.. उनके पीछे कपिल खड़ा था.. सब को मै अंदर लेकर दरवाजा बंद कर दी.. एक छोटा से परिचय के बाद वो लोग आपस में बात करने लगे और मै गौरी के साथ बातें करने लगी..


उसके कुछ देर बाद ही अन्य ब्यूटीशियन भी वहां पहुंच गई.. वो जैसे ही वहां पहुंची दोनो लड़कियां पहले मै, पहले मै करती हुई वहां पहुंच गई.. उफ्फ क्या टषण था तैयार होने का... वो भी कपड़े पहनने मे जुट गई, और फिर ब्यूटीशियन उन्हे मेकअप करने लगी..


चेहरे पर तो मेकअप पोति ही, साथ ही साथ पेट और अपने सीने पर भी कमाल का मेकअप चढ़वाया था.. तभी उनमें से एक कहने लगी... "शालू आज तो तू एक दम बॉम्ब लग रही है, तुझे देखकर तो आज कोई ना कोई फट ही जाएगा"… "कम कमाल की तो तू भी नहीं लग रही सुप्रिया, लगता है होने वाले जीजाजी तुझे अपना नंबर आज दे ही देंगे"…. "मैंने सुना है जीजाजी की उम्र प्राची दीदी से कम है"… "अरे टीवी पर तो दोनो हम उम्र लग रहे थे..."…. "क्या जमाना आ गया है शालू आजकल लड़के अपनी उम्र छिपा रहे है"…


मै:- गौरी तुझे तैयार नहीं होना क्या?


तभी उनमें से एक लड़की, शालू... "तुम दोनो मे से उस बॉडीगार्ड कपिल की बेटी कौन है"


मै:- जी मै हूं दीदी..


शालू:- चुप कर, कहां से मै तुझे दीदी दिख रही हूं..


जैसी ही वो लड़की ये बात बोली, गौरी की हल्की हंसी निकल गई... उसके साथ वाली लड़की सुप्रिया... " तेरे साथ कौन है"…


मै:- ये भानु काकी की लड़की है गौरी..


सुप्रिया:- भानु कौन...


मै:- यहां जो उपासना चाची के घर में काम करती है...


सुप्रिया:- तुम दोनो ने तो बड़े महंगे कपड़े पहन रखे है.. कहीं चोरी वगैरह तो नहीं करती..


गौरी:- नहीं दीदी ये सब तो राजवीर चाचा ने दिए है...


शालू:- ओय हमे दीदी क्यों कहती है.. कहां से हम तुझे बड़ी लग रही..


गौरी:- छातियों से..


जैसे ही दोनो ने ये सुना हंसती हुई कहने लगी… "चुप कर बदमाश, ये फूफा ने भी अपने नौकरों को सर पर चढ़ा रखा है... अच्छा ये बता कैसी लग रही हूं मै.."


मै:- ये बात किसी लड़के से पूछती तो वो 4 दिन बाद होश मे आता.. हमे तो सुंदर लड़की ही दिख रही.. बाकी आपके रूप का विस्तृत विवरण तो कोई लड़का ही दे सकता है..


सुप्रिया:- स्मार्ट है तू.. मेरे यहां काम करेगी.. 1000 रुपया ज्यादा दूंगी..


गौरी:- दीदी काम क्या करना होगा..


शालू:- अरे दीदी मत बुला, मुझे शालू बुला और दोस्त समझ.. और उसे सुप्रिया बुला..


गौरी:- और शालू और सुप्रिया.. दोनो आज बिल्कुल कड़क दिख रही है...


गौरी की बात सुनकर तो मै भी हंसने लगी.. इतने में प्राची दीदी ब्रा में ही निकल आयी… उन्हे देखकर शालू कहने लगी.. "दीदी, सर के बाल छोड़कर सारे बाल हटवा दिए क्या, बिल्कुल चिकनी लग रही हो"…


प्राची:- तुझे भी करवाना है तो आ जा… वरना आराम से तैयार हो, मै तैयार होकर तुम दोनो से मिलती हूं.. और तुम दोनो (मै और गौरी) जो इस ख्याल मे हो की बैरत देर से आएगी.. तो सुन लो, बारात जलमासे पर लग गई है और 7 बजे दरवाजा लग जाएगा...


मै:- कोई बात नहीं है आप आराम से तैयार हो जाओ, हम भी तैयार हो लेते है...


मै चली गई वाशरूम और नहाकर बाहर निकली.. आकर अपना ड्रेस ली और तैयार होने लगी.. इतने में गौरी भी बाथरूम मे चली गई.. मै बाल ड्राई करने के बाद आराम से अपना लहंगा चोली निकालकर पहनी और एक बार आइने मे देखकर... "कमली (जान पहचान की पार्लर में काम करने वाली लड़की) ड्रेस फिट है"..


कमली:- प्राची दीदी ने मेरे सामने ही तो बुटीक वाली को बोली थी एक इंच ऊपर नीचे हुआ तो तुम्हारी दुकान को ऊपर नीचे कर दूंगी..


तभी वो दोनो चौंकती... "क्या इतनी महंगी ड्रेस इसे गिफ्ट मे मिली है"..


कमली, हमारे खेल मे सामिल होती.… "नहीं मैडम ये डिफेक्ट पीस था... मॉल मे कई दिनों से परा था तो बाबूजी ने इन्हे दिलवा दी"


शादी मे सब लाल रंग ही पहनकर आते, इसलिए मैंने अपने लिए कंट्रास्ट ब्लू लहंगा मगवाया था.. कमली की सीनियर जो खुद को नवसिखिया बताकर वहीं पीछे बैठी थी वो मेरे पास पहुंच गई और पीछे से चोली के धागे को मस्त स्टाइल से बांधने के बाद, वो मेरे आगे के 4 लेटो को कर्ली कर दी. बाल तो अब मैंने परमानेंट छोटे ही कर लिए थे, वो उसी बाल आरा तिरछा करके वो संवारने मे लग गई..


इतने में ही गौरी बाहर निकालकर आयी, और वो भी अपने बाल ड्राई करके अपनी ड्रेस पहन ली. जब हम दोनों पूरी तरह तैयार हो गई फिर मैंने प्राची का अलमारी खोलकर वहां से अपने जेवर के बॉक्स निकाले..


जैसे ही मैंने वो बॉक्स निकला, उन दोनों का मुंह खुला ही रह रह गया.. वो दोनो मुझे टोकती हुई पूछने लगी की मै क्या कर रही हूं.. तब मैंने भी बोल दिया, प्राची दीदी ने मुझे जाने से पहले अपने ये आर्टिफिशियल गहने देकर गई है.. चाहो तो तुम भी इस्तमाल कर सकती हो..


अंदर मेरे जेवर के कलेक्शन देखकर तो दिल उसका भी डोल गया लेकिन जब सुनी की सब आर्टिफिशियल है थी मुंह बनाकर कहने लगी… "नहीं तुम ही पहनो ये आर्टिफिशियल हम तो ओरिजनल गोल्ड से नीचे नहीं पहनते.."


खैर मैंने सबसे पहले गौरी को ही जेवर पहनना शुरू किया.. मैंने बहुत पहले मौसा जी से गौरी के लिए डायमंड सेट मंगवाए थे, लेकिन गौरी के गिफ्ट ना लेने की आदत ने मुझे देने नहीं दिया...


आज मै अपने हाथो से उसे पहना रही थी... दोनो हाथ में हीरे जड़े चूड़ियां, कान के बड़े-बड़े सोने के झुमके, जिसपर छोटे-छोटे हीरे लगे हुए थे.. ऐसे ही गले का भरी हार, जिसकी चेन तो गले से कुछ इंच नीचे थी लेकिन आगे का पुरा जड़ा हुआ सोना नीचे सीने तक आ रहा था और उसमें भी हीरे जरे हुए थे..


पूरे गहने पहनाकर जब मै गौरी को उसके हल्के मेकअप और कंट्रास्ट येलो लहंगा और रेड कॉम्बो चोली में उसे देखी तो बस मुंह से सिटी ही निकली थी...


उसके बाद मैंने भी उतने ही जेवर अपने ऊपर डाले.. और जब मै मुस्कुराती हुई पूछी.. कैसा लग रहा है, गौरी कुछ कहती उससे पहले ही उसके चेहरे के एक्सप्रेशन बता रहे थे कि कैसी लग रही हूं मै.. वो दोनो कजिन तो बस देखती ही रह गई और अंत में मुंह से यही निकला... "मांगे के कपड़े और गहने मे नौकर कहीं से दिख ही नहीं रही है"…


इतने में ही प्राची धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाती हम लोगों के नजदीक पहुंची.. ईशश क्या लग रही थी.. जब हम देखे तो देखते रह गए, फिर तो आज बेचारे मेरे भतीजे का क्या होता.. प्राची दीदी एक नजर उठाकर हम सबको देखी और शिकायती लहजे में बस इतना ही कही... "थोड़ा कम तैयार नहीं ही सकती थी"..


उनकी बात सुनकर मै और गौरी दोनो हंसने लगे.. मै उसके करीब जाकर उन्हें कहने लगी… पहले खुद को देख लेती फिर ये बात कहती, लेकिन कुछ तो कमी है... मै अपने गहने के बॉक्स से अपना वो सबसे प्यार 8 तोले का भारी सा हार निकाल ली..


मै पहले ही घर पर बता चुकी थी की मैंने इसे नकुल के पत्नी के लिए सोच रखा था. और जब मां ने सुना तो मेरे इस हार को मौसा के पास भिजवाकर कुछ रूबी और हीरे का काम ऊपर से करवाकर फिर परिवार की ओर से गिफ्ट किया था..


वो हार वाकई प्राची के ऊपर चार चांद लगा रहा था.. नजरे एक बार देखे तो बस गड़ जाए.. प्राची जब वो हार देखी तो अपनी बड़ी सी आखें किए... "ये तो तेरी फेवरेट है ना"


गौरी:- तो आप कौन सी फेवरेट नहीं हो..


इतने में ही वो दोनो कजिन टपक पड़ी.. "अरे बेवकूफ, जाहिल, गंवार नौकर कहीं के.. करोड़ों की ज्वेलरी पहनी है वो और उसे तुमने अपना वो घटिया सा आर्टिफिशियल हार पहना दिया..


कुछ देर पहले तो प्राची आश्चर्य से आंखें बड़ी की थी, लेकिन अब गुस्से से आखें बड़ी करती वो दोनो को देखने लगी.. इससे पहले कि मामला तुल पकड़ता, मै प्राची की कलाई पकड़कर कहने लगी.. "मै रहूंगी तो कपिल सिंह की बेटी ही ना और ये भानु काकी की बेटी.."


प्राची पुरा मामला भांप गई और कहने लगी... "जिसने इतनी सेवा की है उसका दिल तो रखूंगी ही ना.. मेनका अलमीरा का काम हो गया क्या?"


मै:- हां हो गया..


प्राची:- ठीक है फिर बॉक्स रखो अंदर और लॉक कर दो..


मै लॉक करके जैसे ही फ्री हुई तभी दरवाजे पर दस्तक हुई.. खोलकर देखी तो हर्ष था.. "दीदी तैयार हो गई क्या"


मै:- हां तैयार हो गई.. क्या हुआ सो बारात कहां पहुंची..


हर्ष:- दरवाजे से 20 कदम दूर है..


मै:- हर्ष सर प्लीज मुझे ले चलो ना.. मुझे नाचना है..


हर्ष मेरी इस विनती पर हंसते हुए कहने लगा… "एक शर्त पर वहां मुझे मत खींच लेना नाचने के लिए, मै लड़की का भाई हूं"…
nice update ..shalu aur supriya ki achchi khinchaai kar rahi hai menka aur gauri 🤣🤣🤣🤣..dono apne aap ko naukar ki betiya keh rahi hai 🤣🤣..kya hoga jab shalu ,supriya ko sach pata chalega aur tab unke expression ki selfie to leni hi chahiye 😁😁..
 

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अध्याय 26 भाग:- 5




प्राची:- ना ना तू तो खींच लेना.. खासकर तब जब नकुल नाचेंगे.. और दोनो के नाचने की तस्वीर चाहिए..


मै:- जैसा आप कहो.. चल गौरी..


सुप्रिया:- प्राची दीदी ये क्या बोल रही हो.. वो गांव की बारात है..


प्राची:- तो क्या हुआ अपने शौक भी ना पूरे करे क्या?


उन दोनों बहनों पर तो झटके पर झटका लग रहा हो जैसे. मै और गौरी जैसे ही जाने को हुए वो दोनो भी जाने को तैयार हो गई.. और यहां प्राची अकेली रह जाती.. मै हर्ष से बोली आंटी को भेज दो इधर, फिर हम चलते है और तबतक मै जरा फोटो-फोटो खेल लेती हूं...


हर्ष:- मेरे साथ चलो पहले, मै औरतों के बीच नहीं जाने वाला.. मम्मी को वहां से लेकर आओ फिर मै चलता हूं..


हां ये भी सही था मै हर्ष के साथ निकली लेकिन जैसे है एक कमरे से दूसरे कमरे के दरवाजे तक पहुंची.. हर्ष मुझे तेजी से अपने कमरे के अंदर खिंचते हुए.. "घबराने की जरूरत नहीं है.. लाइट का फोकस इस कमरे के चारो ओर ऐसा किया है कि 1 फिट दूर से देखा नहीं जा सकता"


मै:- अच्छा जी तो मेरे साथ क्लोज होने के लिए वो भी कमरे के अंदर... इतना बड़ा सेटअप लगाया गया है...


हर्ष:- तुम्हारे लिए नहीं तो क्या शैबा (हर्ष की जूनियर, ऑक्सफोर्ड मे) के लिए लगाऊंगा...


मै:- मुझे क्या पता, चलो हटो, बारात पहुंच जाएगी वरना..


हर्ष:- हुंह !! बारात का ख्याल है मेरा नहीं, ऊपर से तुम इतनी क्यूट और हॉट बनकर क्यों निकली हो.. जानती हो मेरा दिल क्या कर रहा है.. तुम्हारे कमर में हाथ डालकर कदम से कदम मिलाते हुए चलूं और सब लड़के मुझे देखकर जल जाए...


मै:- हर्ष प्लीज चलो ना प्लीज, डर के मारे मेरा कलेजा धक धक कर रहा है...


मेरी बात सुनकर हर्ष मेरे सीने पर अपने कान लगा दिया, मै उसे धक्का देती.. "अपने कान को क्या आला समझ रखा है.. अब चलते हो या मै पूरी शादी यहीं रुक जाऊं"..


मेरी बात सुनकर हर्ष मेरे सीने पर अपने कान लगा दिया, मै उसे धक्का देती.. "अपने कान को क्या आला समझ रखा है.. अब चलते हो या मै पूरी शादी यहीं रुक जाऊं .."


मै हर्ष को हरकाकर जैसे बाएं मुड़कर एक कदम ली, हर्ष ने मेरा हाथ पकड़कर ऐसे खींचा, मै सीधा उसके बाहों में.. उसकी ठंडी हथेली कमर के ठीक हल्का ऊपर थामे हुए थे, और दूसरा हाथ मेरे गर्दन के नीचे..


मेरा आधा बदन हर्ष से लगा हुआ था, और मै ना तो छुटने की कोशिश कर रही थी और ना ही रुकने की... मेरे भी तो साजन थे, भला मुझे कैसे ना प्यार आता... "हर्ष, चलो ना.. शादी का माहौल है"…


हर्ष मेरी बात सुनकर मुस्कुराया और आहिस्ते से अपने होंठ मेरे होंठ के ओर बढ़ा दिए... मध्यम सी श्वानसे चल रही थी और अंदर का गुदगुदा एहसास अपने जोड़ों पर.. मेरी पलकें बंद होती चली गई...


शुखे होंठ पर जीभ टकराकर गीला कर देते और फिर उसे खींचकर चूमने का एहसास ही एक उन्मोदक क्षण है, जो प्यार से लेकर व्यभिचार तक, हर कोई इजहार जताने के लिए होठों से ही शुरू करता है...


मुझे भी डूबना था लेकिन मै ही डूब गई तो फिर हर्ष को कौन संभालता.. मै अपने खुशी के पल से सर को कुछ इंच पीछे लेकर, लरजती आवाज में कहने लगी... "अब अगर यहां से नहीं गए तो चाहे आंधी आए या तूफान फिर मै इस कमरे से नहीं निकलूंगी"..


मै बोल ही रही थी और मेरे मोबाइल की घंटी बजने लगी, गौरी का कॉल था, हमे बता रही थी उपासना आंटी आ गई है... मै हर्ष के पूरे चेहरे पर एक बार हाथ फेरती हुई कहने लगी.. "चले डॉक्टर बाबू"…


प्यारी सी हंसी थी उसकी, हम दोनों बाहर आकर जैसे ही कमरे तक पहुंचे, प्राची मुझे अंदर बुलाकर धीमे से पूछ ली... "किस्स या स्मूच".. "धत बेशर्म, सच ही भाभी कहती है.. लड़की की जब शादी होती है, जुबान से लाज की द्वार हट जाती है"…


मै भी धीमे से कहती हुई वहां से तेजी से निकली.. बारात दरवाजे से 10 कदम की दूरी पर नाच रही थी और मै यहां क्या कर रही हूं... मै भी चली, गौरी मेरी चाल और खुशी को देखकर कहने लगी.. "अरे कहां पवन बसंती की तरह लहरा रही है"…


"जीजाजी तैयार हुए है ना.. पहले मै नचा लूं, फिर बाद में सारी उम्र तो प्राची दीदी ही नचाएगी"… मेरे पीछे साक्षी भी तेजी सी आयी, थोड़ी कंफ्यूज थी, मैंने धीमे से समझाते हुई चली.. "पीछे 2 लड़की के साथ हम नाटक कर रहे, साथ देना"..


साक्षी, प्यारा सा चेहरा बनाती, जरूर दीदी, हमेशा साथ हूं.. और हम दोनों आगे-आगे लहराते हुए, दरवाजे की भिड़ को किनारे करते हुए, आगे बढ़ने लगे. दरवाजा मैनेजमेंट पुरा कपिल का था, उसने हम तीनों को तो जाने दिया, लेकिन दोनो कजिन को दरवाजे पर ही रोकते, बारात में जाने से मना कर दिया... "कपिल भैया बहन की शादी में इतनी सजी है, मै अपनी जिम्मेदारी पर तो ले ही जा सकती हूं"..


मेरी तेज आवाज सुनकर उन्होंने दोनो का रास्ता छोड़ दिया. मै पहुंच चुकी थी और पुरा भिड़ खड़ा था बीच में हमारे भाईयो की टोली नाच रही थी और आगे आतिशबाजि.


मै बैंड वाले की गाड़ी से माईक उठाई और कहने लगी.. "चलो सब रास्ता दे दो जरा… सब नाच रहे और भतीजे को कार में छोड़ दिया"… मै पहुंच गई कार के दरवाजे पर, नकुल को बाहर निकली और हाथ पकड़ कर बीच मे लाई..


फिर बजा गाना और हमारा देशी ठुमका लगना.. मेरे साथ गौरी और साक्षी भी सामिल हुई.. मनीष भईया और महेश भईया.. साथ में मेरे तीसरे चौथे घर से भी भाईयो की टोली.. वरुण भईया, ऊपर से हमारे कुछ पिताजी के जेनरेशन के लोग भी तो थे जो नाचने का आंनद उठाते थे..


मै तो सबको घूरती और जो नहीं आते उन्हे इशारों ने कट्टी कर लेती, बेचारे हारकर आते ही.. सबसे ज्यादा मजा वैसे नकुल, गौरी, साक्षी और मनीष भईया के साथ ग्रुप डांस मे आया था... हम पांचों ने जब नाचना शुरू किया था तब लगभग पुरा गांव हूटिंग कर रहा था...


हम बारात के साथ बिल्कुल मुख्य द्वार तक पहुंच चुके थे और नकुल को सब कार में बैठने की हिदायत दे रहे थे.. मेरी नजर घूमकर उन दोनों कजिन शालू और सुप्रिया पर गई जिसके साथ हर्ष खड़ा था, मै चिल्लाकर बोली सब लोग जगह दे दो और कोई बीच मे नहीं कूदना.. जीजा के साथ नाचने साले और सलियो की टोली आयी है...


वो तीनो भी पहुंचे.. उफ्फ क्या ठुमके लगा रही थी दोनो बहन... शकीरा का डांस जैसे देखकर आयी हो.. अब मै क्या कहूंगी सबको किनारे होने, यहां तो हर कोई किनारे होकर उन्ही दोनो कजिन का डांस देख रहे थे, जो अपने होने वाले जीजा को बीच में लिए नाच रही थी और शादी को पूरा दिल से कैसे एन्जॉय करना कहते है, वो सीखा रही थी..


हां दोनो के व्यवहार में तो कहीं से भी कुछ ऐसा नहीं था जो कहा जा सके की अकडू और घमंडी है.. फिर बारी आयी जीजा साले की, हर्ष नकुल के गले लग गया.. दोनो कद कठी मे लगभग समान ही थे.. दोनो सांवले सलोने और द्वार पर जब मिले तो लगा ही नहीं की जीजा साला मिल रहे ऐसा लग रहा था 2 पुराने दोस्त मिल रहे थे...


कुछ देर बाद नकुल कार में चला गया और मेरी नजर राजवीर अंकल और कपिल पर थी.. दोनो के बेटी की शादी थी, ये लोग तो तैयारियों मे ही इतना व्यस्त रहते होंगे की नाचने का मौका कहां, ऊपर से थोड़ी प्रतिष्ठा भी होती है, जब तक कोई खींचे ना कैसे चले जाते.. तो वो खींचने का काम मैंने कर दिया...


इधर से होने वाले 2 समधी को और उधर से होने वाले 5 समधी को और फिर तो "पापा डांस" शुरू हो गया.. ईईईईईईई ये बड़े लोग.. बच्चे तो लोक लाज के चलते छुपाकर लिए थे. लेकिन ये लोग तो डांस मे ही शुरू हो गए.. गाना का मूड शराबियों वाला था और खाली आधा इंच कमर डुलाकर 1 पेग गटक रहे थे, जबकि बिहार में लगा था दारू पर प्रतिबंध और यहां थालियों में सर्व कि जा रहा था..


समधी मिलन का वक्त हो चला था इसलिए मै जितने लोगो के साथ गई, उतने लोगो के साथ वापस आ गई.. वापस जब पहुंची तो पूरी लेडीज मंडली ग्राउंड फ्लोर से पहले फ्लोर पर शिफ्ट कर गई थी, जहां ऊपर से वो लोग बाहर के डांस का लुफ़्त उठा रही थी..


मै उनके बीच जैसे ही पहुंची सबकी हूटिंग शुरू.. मै भी क्यों पीछे रहती, हर्ष को भी साथ खींच ली और दरवाजे से ही अमिताभ देखा ना है रे वाला हाथ का स्टाइल पोज से आगे बढ़ने लगी..


प्राची ने भी तुरंत वहां म्यूज़िक चला दिया.. हंगामे ही हंगामे और डांस ही डांस.. दोनो कजिन अंत में आकर कह ही दी... "तुम हो कौन और शुरू से कौन सा सस्पेंस बनाकर चल रही"…


गौरी ने फिर हंसते हुए सब कहानी जब बताई वो दोनो छोटा सा मुंह बनाती हुई कहने लगी... "अच्छा मज़ाक था, लेकिन हमारा पोपट हो गया.. वैसे इरादे नौकर जताने के तो तब भी ना थे लेकिन जो भी 1,2 बार निकला वो चिढ़ के कारन निकला था इसलिए दिल से माफी मांगती हूं"..


इतनी अच्छी बहने थी, माफी किस बात कि.. सब साथ में ही एन्जॉय करेंगे.. हां लेकिन आगे की कहानी में प्रैंक मेरे साथ हो गया, जयमाला स्टेज पर.. प्राची आंख दिखाती अपने ओर आने कहती और नकुल अपने ओर.. ये भी नहीं की इशारों में बुलाया, जोर से कह रहे थे.. इधर आओ..


अंत में हारकर मै ही बीच में बैठ गई... "दोनो चुपचाप जयमाला करो शादी करो, ये मुझे क्यों इधर आ, इधर आ कर रहे"… सहनाइयों और हंसी खुशी के बीच जयमाला की रश्म निभाई जा चुकी थी..


अब ना कोई इधर का रिश्ता ना कोई उधर का रिश्ता, जयमाला के बाद बचे कुछ खास लोग और अपने भाईयो के मंडली मे मै, गौरी और साक्षी बैठकर पुरा पंचायत कर रही थी... बीती शादियों के किस्से करने लगे... नकुल बेचारा ऐसा दूल्हा था जिसके कोई दोस्त नहीं होने की स्थिति में अपने मौसेरी बहन संगीता और जीजू के साथ एक किनारे बैठा था...


उसका चेहरा बता रहा था कि वो हमारे बीच आने के लिए मरा जा रहा है, लेकिन दुविधा थी वो आ नहीं सकता था.. वही फिर घूमते फिरते नीरू मासी भी पहुंच गई और मेरे भाइयों की बड़ी से महफिल ज्वाइन करती हुई कहने लगी.… "बाकी सारी लड़कियां अपने भाई को छोड़कर दुल्हन या लड़कियों के साथ शादी का आंनद ले रही है और तू अपने भाइयों को पकड़ कर बैठी है"..


तभी मनीष भईया खड़े होते हुए नीरू मौसी का हाथ पकड़कर कहने लगे.… "एक ओर पोता है दूसरे ओर भतीजी, फिर नाचना नहीं हुआ तो शर्म आनि चाहिए आपको.." नीरु मासी भी कहां पीछे हटने वाली थी.. उन्होंने मनीष भईया के है कमर ने हाथ डालकर खीच लिया... और हाथ से हाथ मिलाकर वो पार्टी डांस जो करते है उसे देशी स्टाइल में करने लगी...


"बिटवा, नाचती तो तेरी मासी कविता थी, वो यहां होती ना तो तुम जवानों की बोलती बंद हो जाती".. दोनो नाच भी रहे थे और पुरानी बातें.. और उनका विदेशी पार्टी डांस देशी स्टाइल में देखकर लोग हंस-हंस कर पागल हुए जा रहे थे.. कुछ देर नाचकर नीरू मासी हमारे बीच ही बैठी और पुराने दिनों के किससे शुरू हो गए..


पोल खोलने में तो ये मेरी मां से भी एक कदम आगे थी.. हां ये सच है कि हम पहली बार मिल रहे थे लेकिन मेरी मां और इनकी बात रोजाना होती थी... पहले लेटर बॉक्स के जरिए, जिसको मां ने बड़े प्यार से संजो कर रखा है और आज भी पढ़ती है...


याद रखने के लिए लेटर नंबर सिस्टम भी ईजाद किया था.. बाद में लैंडलाइन, फिर मोबाइल और जब से वीडियो कॉलिंग सुविधा हुई दोनो सखी को फिर एहसास ही नहीं हुआ की कहीं दूर बैठे है...


मेरी मां ने अपनी रिटायरमेंट योजना मुझे बता चुकी थी, मेरी शादी और नीरू मासी जब अपने ऑफिस से रिटायर होती, फिर इनके अपने है प्लान थे सेकंड लाइफ के.. पूरी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद एक और जिंदगी..


नीरू मासी ही कहती थी.. पुराने समय में बहुत कुछ जीना रह गया था, एक बार फिर से जीना शुरू करेंगे.. जिंदा इंसान है मेरी मां और नीरू मासी, जिनके शरीर भले थोड़े थक जाए उम्र की वजह से, लेकिन उत्साह कभी नहीं थका..


खैर महफिल सजी थी दूल्हा-दुल्हन भी मंडप मे बैठे थे, लेकिन तभी साक्षी का संदेश आया कि नकुल भईया सबको वहीं बुला रहे.. आप लोग यहां महफिल जमाए हो और वो वहां बेचारे अकेले.. अच्छा नहीं लग रहा..


मनीष भईया ने जवाब देते कहा कि बेटा उन्हे बोल चुपचाप शादी करे, दिमाग ना दौराए.. बिफर उठी मेरी लाडली और उंगली दिखाती हुई कहने लगी... "चुप चाप सब चलो वरना घर पर मेरा ड्रामा शुरू होगा"..


उसे सुनकर तो हम सब भी हसने लगे... मेरी भतीजी थी तो नकुल की वो पक्की चेली.. जबसे सोभा भाभी वापस लौटी थी, नकुल के देख रेख मे ही तो वो पल रही थी, उसके लिए तो आज अपने छोटे पापा को भी उंगली दिखाकर वार्निग दे दी.. घर की पहली संतान, हम सब की लाडली..


पूरी महफिल फिर मंडप के ही पास जमी.. छेड़छाड़ और हंसी मज़ाक के बीच पुरा विवाह का समापन हुआ.. विदाई और रोने की एक बहुप्रचित रश्म के बाद प्राची अपने ससुराल में थी और आगे के करक्रम की तैयारियां शुरू थी..


शादी के 3 दिन बाद मै दिल्ली वापस लौट रही थी, क्योंकि कॉलेज में कुछ सेमिनार और ऐनुअल फंक्शन्स का आयोजन होना था.. मेरी इक्छा तो नहीं थी अभी गांव से जाने की लेकिन मुझे आना परा...
nice update ..menka ne sabko nachaya😍😍😍..aur ye sharab bandi hai phir bhi sab pee rahe hai ( ye dabang logo ke liye sab jayaj hai 🤑🤑) .
waise shalu aur supriya buri nahi hai ti koi baat nahi ,,bas majak majak me unhone naukar ki beti bana daala ..
sabka dance mast tha 🤩..
sakshi ab menka ki tarah banne ke raah par hai kyunki wo bhi laadli hai aur shobha aur nakul ke saath rehti hai to unka asar hona hi hai 😁😁.
 

SHADOW KING

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अध्याय 27 भाग:- 1




18th दिसंबर की रात के मुलाकात के बाद मेरी हर्ष से कोई भी मुलाकात नहीं हुई थी, और 18 दिसंबर के बाद से संदेश भी आने बंद हो गए थे... 21 को दिल्ली जाने से पहले मै एक बार हर्ष से मिलना चाहती थी, इसलिए राजवीर अंकल और उपासना आंटी से मिलने मै पहुंच गई.…..


यहां जब आयी तो पता चला कि अंकल और आंटी ही नदारत थे, और प्राची अपने ससुराल में व्यस्त. मुझे समझ आ गया की हर्ष, अंकल-आंटी के साथ निकला है और उसके साथ भी वही सिचुएशन हुई है जो मेरे गांव आने पर होती है..


प्रायः ये होता है कि घर के अभिभावक की मन्नत होती है यदि बेटी की शादी अच्छे से हो गई, तब फलाने जगह माथा टेकने जाएंगे.. पैदल यात्रा करेंगे या अन्य कोई मन्नत.. शायद वही उतारने हर्ष के साथ निकले हो..


हालांकि ये भी अजीब था, क्योंकि शादी के चौथे दिन विदाई की रश्म होती है, और भी अन्य रस्में जिनमे मायका पक्ष का होना अनिवार्य होता है.. लेकिन यहां तो तीसरे दिन ही सब खाली.. मन में सवाल के साथ मै दिल्ली के लिए निकल गई.…


हर्ष की देखने की छोटी सी ख्वाइश थी लेकिन पूरी ना हो पाई.. इकोनॉमी फोरम पर यह मेरा लगातार दूसरा साल था जब कॉलेज के लिए मुझे ही चुना गया था... दिसंबर से लेकर शुरवाति जनवरी तक इतना टाइट शेड्यूल था कि मुझे श्वास लेने की भी फुरसत नहीं थी..


रोज ही लगभग मेरी नकुल और प्राची से बात हो रही थी, घुमा फिराकर मै हर्ष के बारे में पूछती और वो दोनों एक ही उत्तर देते... यूके गया है कोई कॉन्फ्रेंस मे.. लौटा नहीं है...


मै यहां दिल्ली में थी और नकुल, प्राची के साथ अपने सहर.. दोनो दिल्ली आने का नाम ही नहीं ले रहे थे और ना ही अब पहले जैसी बातें हो रही थी.. पर्दे के पीछे कुछ तो कहानी चल रही थी.. जिसका ज्ञान मुझे नहीं था..


1 जनवरी का कोई विश ना हुआ और ना ही 2 जनवरी तक मेरे पास किसी के कॉल आए. किसी का फोन से मतलब ना तो मेरे घर से और ना ही नकुल के घर से. नकुल का तो क्या ही कह दूं, 3 दिन से तो मुझे बस इतना ही कह रहा था कि अभी व्यस्त हूं, रखता हूं.…


8 जनवरी 2015, मै सभी सेमिनार और इकोनॉमी फोरम को अटेंड करने के बाद 3 दिन से फ्री बैठी हुई थी और सोच रही थी कि एक बार गांव जाकर मामला समझ तो लिया जाए कि वहां चल क्या रहा है..


मै सोच ही रही थी कि उधर से मां का फोन आ गया और बहुत ही कड़क लहजे में वो पूछ रही थी कि "क्या मेरे और हर्ष के बीच कोई प्रेम प्रसंग का मामला है".. मां के मुंह से यह सुनकर मेरे कलेजा कितनी जोड़ से धड़का होगा, वो मुझे भी पता नहीं... मै बिल्कुल ख़ामोश थी और जवाब ना पाकर वो फोन पर ही चिल्लाने लगी..


मै मौन स्वीकृति दे चुकी थी और मां रो रोकर चिल्ला रही थी. अंत में एक ही बात कही.. "गांव वापस लौटकर मत आना, तेरे लिए सब मर गए है.." उनके फोन रखते ही तुरंत एक के बाद एक सबके कॉल आने शुरू हो गए, और अंत में नकुल का कॉल आया....


"तुम उस फ्लैट में हो इसलिए हम दिल्ली नहीं आ पा रहे. इससे ज्यादा कोई बात नहीं हो पाएगी.. तुम बस वहां से कहीं भी चली जाओ"…


घर गया, रिश्तेदार गए और आखरी मे रिश्ता भी चला गया. मै गरीब हो गई लेकिन कैसे, ये मुझे दूर-दूर तक पता नहीं था.. क्या करना था वो मै बाद मे सोचती, पहले तो दिल में चुभन सी हो रही थी और मुझे ये घर छोड़ना था...


मै बुत बनी असहाय सी मेहसूस कर रही थी, घर की घंटी बजी और मै किसी तरह जब दरवाजा खोली तो सामने मौसा, मौसी, गौरी और मैक्स खड़े थे.. मै लड़खड़ाई मासी के ऊपर ही लगभग गिरी और सिसकती हुई किसी तरह कहने लगी.. "नकुल ने मुझे घर छोड़कर जाने के लिए बोल दिया"….


मुझे उसके बाद फिर होश नहीं... डबडबाती आखें ना जाने कितने दिनों की भोर और सांझ नहीं देख पाई.. कहां हूं कुछ समझ नहीं पाई। वहां मेरे पास मेरी प्यारी मां यानी की मेरी मासी थी.. आखों मे उनके आशु नहीं थे, मुस्कुराकर वो मेरे सर पर हाथ फेरती बस यही दिलासा दे रही थी, "मै हूं तू चिंता क्यों करती है..."


किन्तु हम दोनों ही जानते थी कि वो अंदर से कितनी दर्द मे थी... फिर पहुंचे मेरे दोनो भाई, और साथ में थी मेरी दोनो भाभी और सभी बच्चे.. मै क्या प्रतिक्रिया देती.. बस अपने आशु समेटकर तुरंत ही मुस्कुराती हुई साक्षी के गले लगकर उसे चूमती हुई पूछने लगी... "मेरा बेटा कैसा है"..


उसकी मासूम नजरें, मेरे चेहरे को देख रही थी.. वो बड़े ही ध्यान से मुझे देख रही थी, मानो पूछ रही हो, "दीदी क्या तुम रो रही हो?".. मै उससे नजरे मिलाने में असमर्थ हो चुकी थी और उसका खिला सा चेहरा पुरा ही उतर चुका था...


12 फरबरी, सब लोग जा रहे थे.. मासी जाते हुए मुझसे बस इतना ही कहकर गई... "जब लौटो तो मेरी बेटी मेनका को भी साथ लेकर लौटना. जबतक वो नहीं लौटेगी मेरे हलख से खाना का निवाला बड़ी मुश्किल से नीचे उतरेगा... मैक्स, गौरी, अपनी बहन मेनका के साथ ही लौटना".. मेरी पथराई आखें बस सबको जाते हुए देख रही थी... वहां मैक्स और गौरी के अलावा, मनीष भैया और रूपा भाभी रुके, जो मुझसे पूछ रहे थे "आगे क्या सोचा है?"


हर्ष, प्राची और नकुल के शादी के दूसरे दिन ही घर छोड़कर कहीं चला गया था... सबके लिए बस एक ही संदेश छोड़कर गया था…. "कुछ घुटन सी हो रही है कई दोनो से, मै ज़िन्दगी की तलाश में जा रहा हूं"…


एक हफ्ते पहले जब कुछ सामान्य हुई थी तब रूपा भाभी वह संदेश पढ़कर सुनायी थी... मेरे दिमाग के अंदर 1000 सवाल थे.. लेकिन केवल सवाल..


उधर राजवीर और उपासना सिंह पुत्र वियोग में थे. जैसे ही मेरी और हर्ष की कहानी सामने आयी, बिना कारन के ही हर्ष के घर छोड़ जाने का कारन बन गई... हां, संभवतः हर्ष के घर छोड़ जाने का कोई पुख्ता कारन ना मिल पाने पर हमारा मामला प्राची ने ही सबके सामने रखा होगा..


द्वेष ने मन में ऐसा खटास पैदा किया, राजवीर सिंह और पापा के बीच में विवाद बढ़ता ही चला गया.. फिर कहानी भी वही होती है, जिसकी लाठी उसकी भैंस.. ऊपर से प्रेम प्रसंग के किस्से मे फजीहत तो लड़की और लड़की के घरवालों को हो उठानी पड़ती है...


मेरी मां जब तक हिम्मत से डट सकती थी डटी, लेकिन पापा की बेइज्जती ने उनका भी हौसला तोड़ दिया शायद और 27 दिसंबर से चल रहे मसले मे, मां टूटकर 7 जनवरी को मुझे ही पूरे प्रसंग मे दोषी मानकर सबसे माफी मांगी, और कह दी, "लौटकर फिर वापस नहीं आना..."


इन सभी घटनाओं के पीछे का जवाब एक ही लड़का था, हर्ष.. वो भी अपने जाने से पहले एक बड़ा सा सवाल छोड़े जा चुका था, जिसका जवाब तो उससे मिलने के बाद ही पता चलता...


मै आधी फरबरी से लेकर आधे मार्च तक रूपा भाभी और मनीष भईया के साथ यूरोप के चक्कर काटती रही, लेकिन ये काम हमारे बूते का नहीं था... मार्च आखरी तक कुछ और भी ज्यादा सामान्य थी, क्योंकि जिस बात के लिए सबसे ज्यादा रोई थी, मेरी मां.. उन्होंने मुझे सामने से कॉल करके माफी मांगी और कहने लगी.. "ढूंढ कर लाओ उस हर्ष को कहीं से भी, तभी अब दिल को सुकून मिलेगा.? अगर कहीं मर गया हो तो उसकी लाश पता लगाना, लेकिन उसके छोड़े संदेश के पूरे जवाब के साथ लौटना..."


मन में अब हर्ष के लिए केवल घृणा ही बची थी, उससे ज्यादा कुछ नहीं... मार्च का महीना, इस वर्ष भी काफी सारे ऑडिट होने थे और मै अभी मात्र एक ट्रेनी थी, जिसका सर्टिफिकेट उसका सीए देता... और तब जाकर मै सीए फाइनल के एग्जाम में बैठती...


रजनीश भईया को थोड़ी कहानी पता थी और उन्होंने जनबरी मे ही कॉल करके कहा था.. तुम जो कर रही हो वो करती रहो… सेर्टिफाई करना तो मेरे हाथ में है.. निश्चिंत होकर काम पर लौटना...


32 हजार की सैलरी मेरी बराबर आ रही थी, लेकिन आर्थिक स्थिति अब पहले जैसे नहीं थी.. मनीष भईया जब मेरे अकाउंट्स मे अपनी शाविंग्स डालते, तो आज बहुत ही अजीब लग रहा था... ऐसा लग रहा था मै घूमकर फिर से अपने घर की चार दिवारी मे आ गई, जहां पूरी तरह से मै अपने पिता और भाइयों पर आश्रित थी..


मन में विद्रोह सा था, घर के अंदर अपने पापा का, अपने घर का काम तो कर देती थी, यहां तो मेरी भाभी और मेरा भाई अपना काम भी छोड़े है, मेरा भी काम कर रहे और उल्टा मुझे पाल भी रहे...


ये एक ऐसी फीलिंग थी जहां मै सोचने पर मजबूर हो गई थी क्या हासिल कर लिया घर छोड़कर, अंत में बदनामी और जिल्लत... मै कुछ वक्त खुद को अकेली देना चाहती थी, इसलिए कहीं किसी पार्क के ओर जा रही थी... सामने फिर से वहीं नेशनल लाइब्रेरी थी.. जहां कुछ महीने पहले एक संतुष्टि के भाव लेकर गई थी... आज सामने फिर से वही लाइब्रेरी थी.. और सबसे ज्यादा रुलाने वाली वही इंसान था, बस आज जब मै लाइब्रेरी से लौटूंगी तो वो नहीं होगा..


मै फिर से लाइब्रेरी मे थी, मुझे वो बाबा मिले जो उस शाम मिले थे… आज वो कुछ ज्यादा ही खुश थे.. मेरे चेहरे पर अजीब ही मुस्कान थी, कुछ यूं की मै नहीं तो कम से कम तुम तो खुश हो बाबा...


वो बाबा मुस्कुराए और पूरे हक से मेरा हाथ पकड़कर वही पास के पार्क में ले आए.. मुझे देखते हुए कहने लगे... "मै एक आत्मकथा सुनना पसंद करूंगा"…


मै उन्हे हैरानी से देख रही थी, मानो पूछने की कोशिश कर रही हूं "बाबा आप ऐसे क्यों बोल रहे".. लेकिन मै बस उन्हे एक बार देखकर सामने देखती हुई...


"मंजिल से तो कभी भटके नही, ना ही अपना कारवां गलत था"
"बस वक्त को कुछ और मंजूर था और हालात अपने बस में ना था"…


बाबा:- ज़िन्दगी के पन्ने पर हम एक-एक दिन, एक-एक पल लिखते हुए आगे बढ़ते है.. कभी उन पन्नों को शुरू से पलटने का वक्त मिले तो पलट देना चाहिए... हो सकता है जिन हालतों से हम अब हार मान रहे है, उन्हे झेलनी की गुत्थी जिंदगी के शुरवात किताब में हो, जिसकी तस्वीर दिमाग में धूमिल सी भी नहीं..


मै:- कभी दिल किया तो जरूर पलट दूंगी बाबा, लेकिन आपको देखकर हौसला मिला है मुस्कुराने का.. कोई हल्का-फुल्का कॉमेडी नॉवेल…


बाबा हंसते हुए वापस आ गए और पुराने कॉमिक्स थामा गए... "इस वक्त तुम्हे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है"..


मेरे हाथ में थी चाचा चौधरी, बिल्लो, और पिंकी.. दिन अच्छा कट रहा था, बीच मे ही मनीष भईया का कॉल आ गया और पूछने लगे की घर कब तक लौट रही हो.. मैंने उन्हे बताया कि मै नेशनल लाइब्रेरी मे हूं, देर हो जायेगी..


बहुत दिन के बाद मै बिल्कुल सामान्य रूप से और पहले जैसी टोन मे बात कर रही थी... कुछ देर और वो बुक पढ़ने के बाद जैसे ही मै निकलने लगी, बाबा मुझे रोकते हुए कहने लगे यहां आओ.. मै जब गई तो उनके बहुत से पुराने साथी वीडियो कॉन्फ्रेंस पर थे और उन सबको मिलवाने के लिए वो सब मुझे धन्यवाद कह रहे थे...


मै थोड़ी हैरान और चेहरे से मुस्कुराती... "आपको कैसे पता की ये मेरा किया है"…


बाबा:- बेटा हम अनुभवी लोग है... हमे कोई सामने से आकर बहला दे, तो इतना ही सोचते है, जानते हम सब कुछ है लेकिन तुम ही खुश रहो…


मै:- मै जब भी यहां आयी हूं कुछ अच्छा और संतुष्टि के भाव ही लेकर गई हूं... वरना ये दुनिया तो वही मानती है जो उन्हे सामने से दिखता है...


बाबा:- वो उनके लिए जो जीने के लिए जीते है, अब तो हम मरने के लिए जीते है, इसलिए पल-पल दिल खोलकर जीते है..


मै:- हिहीहिहिही... आपको तो योके पसंद थी फिर सेल्मा दादी की बात क्यों कर रहे है... (वही अज्ञेय जी द्वारा रचित 'अपने-अपने अजनबी" नॉवेल की चर्चा)


बाबा:- योके कभी गलत थी ही नहीं.. अपनी उम्र में वो अपनी जिंदगी और तजुर्बा के साथ जी रही थी, और तुम्हारी सेल्मा दादी भी तो पूर्व मे योके ही थी, हृदय परिवर्तन और सोचने की चेतना ने उसे बदला और जिंदगी के तजुर्बों ने उन्हे जीना सिखाया..


मै:- मुझे एक ही अफ़सोस है कि मै जिंदगी में आपसे पहले क्यों नहीं मिली.. आपकी उम्र में बहुत कम लोग जीवित रहते है...


बाबा:- तुम मुझसे मोह बस जुड़ रही हो और मै तुम्हे अपने जिंदगी का एक अधूरा हिस्सा समझ कर जुड़ रहा हूं...
shocking update ..ye harsh ne kya kar diya 😡😡 .ek sandesh chhoda aur kahi chala gaya ,,,kahi kisine tapka to nahi diya ,,,yaa kidnap 🤔🤔🤔..
aur sabne rishte tod diye menka se yaha tak ki nakul ne bhi ....lagta hai nakul ab biwi ka ho gaya hai puri tarah ,aur bhul gaya ki menka ne usko 20 lakh chori ke waqt kitna sambhala tha ..aur isne to bina kuch jaane rishta tod diya ..

lagta hai library aakar ab menka pehle jaisi ho jayegi aur apna dimaag istemaal karke pata laga legi ki harsh ke saath kya hua hai 🤔🤔🤔..
 

SHADOW KING

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अध्याय 27 भाग:- 2




मुझे बाबा से पूछना तो था कि बाबा कैसा अधूरा हिस्सा लेकिन उससे पहले ही सीढ़ियों से तेज कान में चिल्लाने की आवाज आयी, और मुड़कर देखी तो रवि मुझे आवाज लगा रहा था...


रवि को देखकर मै फीकी सी मुस्कान दी और बाबा को बोलते निकली "अभी हमारी कहानी अधूरी है... अगली बार पुरा सुनना चाहूंगी..." "तुम्हे यहां से हंसते वापस जाते देख दिल में सुकून सा होता है, आराम से आना और अगली बार हंसती हुई आना और हंसती हुई जाना"….


मै उन्हे सुनती हुई रवि के पास पहुंची... "तुमसे यहां मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी?"…


रवि:- तुम्हारा लाइब्रेरी प्रेम गया नहीं क्या?


मै:- तुम्हे नहीं लगता कि कुछ अच्छी आदतें जानी नहीं चाहिए.. वैसे भी मेरे जीवन में लाइब्रेरी का अहम हिस्सा रहा है, जब भी यहां होती हूं कुछ अच्छा ही होता है... जिंदगी में दोस्त की कमी सी खल रही थी, और तुम ने भी क्या सही वक्त पर आवाज दी है...


रवि:- सॉरी..


मै:- अब ये सॉरी क्यों?


रवि:- तुम्हारे साथ इतना कुछ हो गया और मुझे होश तक नहीं... होली मे गांव गया था तब पूरी कहानी पता चली..


मै थोड़ी मायूस होती... "प्लीज बहुत मुश्किल से उबर पाई हूं मै, मत कुरेदो, छोड़ दो"..


रवि:- छोड़ दिया, लेकिन ये बताओ मेनका मिश्रा को भूलने कि बीमारी कब से लग गई...


मै:- जब ये एहसास हो गया की कुछ लोग मुझे भी भुल सकते है, तबसे मैंने भी चीजों को भुलाना सीख लिया..


रवि:- तुम कहती हो बीती बातें याद मत दिलाओ, खुश भी दिख रही चेहरे से, फिर भी ये ऐसे उखड़ी-उखड़ी बातें..


मै:- जिंदगी में कुछ चीजें छोटे समय के लिए होती है रवि लेकिन असर बहुत गहरा और खतरनाक होता है... कितना भी छोड़ दो लेकिन उसका असर कुछ ना कुछ रह ही जाता है...


रवि:- आज रात डिस्को..


मै:- नहीं आज रात नहीं.. इनफैक्ट अब मुझे चलना चाहिए..


रवि:- तुमने पूछा नहीं की मै यहां कैसे पहुंचा..


मै:- सीरियसली ये सवाल मुझे करना चाहिए था क्या?


रवि:- क्या पता.. मेरी दोस्त मेनका होती तो पहले शुरू करती की मेरा पीछा कर रहे हो क्या?


मै:- अब भी वही मेनका हूं, वक्त के साथ हर किसी में थोड़ा बदलाव होता है, मुझमें भी हुआ है.. अब मैंने सोचना बंद कर दिया है.. अच्छा लगे तो ठीक वरना रास्ता बदल लो और हो सके तो उस ओर जाना ही छोड़ दो..


रवि:- बाप रे ये नई मेनका तो पुरानी से काफी खतरनाक हो गई... इतनी बातें तुम कब करती थी.. 4 लाइन के बाद तो मामला क्लोज करके चलते बनती थी..


मै:- हिहिहिहिहि.. आज बात बनाने का मन कर रहा है.. आज बहुत दिन के बाद कुछ अच्छा-अच्छा लग रहा है.. शायद तुम्हे समझने में काफी वक्त लगे.. लेकिन वादा करती हूं जिस दिन समझोगे, कहोगे मै भी कितना डफर हूं..


रवि:- वो तो मैं शुरू से हूं... यदि मै पुष्पा और अमृता से नहीं मिला होता तो शायद कहानी ही कुछ और होती..


मै:- रवि अब मै जा रही हूं... आज बहुत ज्यादा बात हो गई.. कल फ्री हो क्या?


रवि:- ओय उड़ती तितली, अभी तुम्हारे नए फ्लैट गया था वहां से यहां का पता मिला, तो भगा चला आया.. कल क्या अब रोज मिलना होगा.. खुद ही कही थी ना मार्च बाद हमारे मंत्री जी के ऑडिट का काम करोगी..


मै:- नहीं अभी मै कोई काम हाथ में नहीं लूंगी.. अब कोई काम नहीं...


रवि:- एक काम करो तुम जाओ घर मै भी चला.. बाकी मै भी देखता हूं कि कैसे काम नहीं करती..


मै:- तुम मुझे चैलेंज कर रहें हो क्या रवि?


रवि:- नहीं मै तुम्हे वापस तुम्हारी जिंदगी की ओर मोड़ रहा हूं...


मै कितनी बात बनाऊं एक ही दिन में.. अब ऊब सी रही थी रवि की बातों से.. मै चुपचाप निकल गई.. हां लेकिन लाइब्रेरी से लौटकर जैसे जिंदगी पटरी पर चल रही हो.. मै अपने अंदर योके को मेहसूस कर रही थी जो 3 महीने के कब्र में थी.. जर्मन सैनिक के साथ फंसी, और तो और पहाड़ से गिरकर भी खुद को बचाने में कामयाब रही थी.. योके.. मै जीती हूं क्योंकि मै जानती हूं कि जीती हूं..


लाइब्रेरी मानो मेरी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका हो.. रोज सुबह आना, बाबा के साथ बैठकर किताबो को और करीब से जानना... कितना अनुभव था उन्हे... बातों-बातों में एक गहरी बात याद दिला गए जो मां सिखाया करती थी...


"कभी-कभी छोड़ना ज्यादा अच्छा होता है, लगातार पीछे भागने से"… तब मतलब समझी भी थी और नहीं भी, लेकिन आज पुरा समझ गई थी... आधा अप्रैल यानी 15 अप्रैल 2015 तक मनीष भईया गांव वापस जा चुके थे, खुश थे क्योंकि मै हंस रही थी और लगातार हर्ष के पीछे दिमाग दौराने के बाद उसे छोड़ चुकी थी...


संभवतः नकुल और उसके पक्ष के बारे में सोचकर मैं उसे भी छोड़ चुकी थी.. मै अपनी मनोदशा किससे साझा करूं इसलिए मेरे पास शायद रवि था.. मै अपने अंदर हो रहे बदलाव और पूरी सोच साझा करती थी..


मेरे लिए वो भी बेचारा नियमित रूप से शाम को लाइब्रेरी आता.. मै जब आंख दिखाती तो छोटा सा मुंह बनाकर महाभारत पढ़ने बैठ जाता और जितना वो पढ़ता उतने मे हम सारी नीति डिस्कस करते थे..


दोस्ती तो रवि से थी, लेकिन एक बात जो उसकी आंखों में साफ झलकता था, वो है उसकी चाहत.. यही कारन था कि दिल्ली आने के बाद भी मै रवि से मिलने मे कभी रुचि नहीं रखती थी, जबकि मिलने की इक्छा तो बराबर हुआ करती थी... ऐसा नहीं है कि रवि नहीं समझता यह बात लेकिन कुछ बाते अनकही ही रहे तो ज्यादा अच्छा लगता है..


30 अप्रैल मै थी एक्सटर्नल और इंटरनल होम मिनिस्ट्री के दफ्तर में.. जहां केवल सिक्का चलता था उमाशंकर मिश्रा.. छोटे पुजारी. बाहर मिलो तो कितने सीधे और सरल, उनकी वाणी कर्ण रश घोले.. लेकिन ऑफिस में उनका अंदाज ठीक उलट था, कर्कास और बिल्कुल खड़ी बोली.. ना तो चेहरे पर मुस्कुराहट और ना ही गुस्सा.. एक गंभीर सा चेहरा जो सुबह 8 बजे आता था और रात के 11 बजे ऑफिस से जाता था..


जिस दिन नहीं आता, उस दिन भी 2 घंटे तो ड्यूटी करके ही जाता था.. एक्सटर्नल और इंटरनल अफेयर मिनिस्टर, श्याम प्रसाद शुक्ला जी के एक स्तम्भ.. उमाशंकर एक स्तंभ थे, तो रवि अग्रवाल दूसरा स्तंभ.. यूं तो क्लार्क था, लेकिन इस ऑफिस की कोई भी फाइल रवि अग्रवाल के नजरो के सामने से बिना स्कैन हुए, साइन नहीं किए जा सकते थे, और रवि जिस फाइल को मंजूरी दिया, उसको फिर कभी मंत्री जी देखते नहीं थे..


दोनो स्तंभों ने ऐसा ऑफिस के अंदर ताना-बाना बुना हुआ था कि श्याम प्रसाद शुक्ला जी अब तो नेक्स्ट स्टेप, वाणिज्य मंत्रालय की ओर तैयारी मे लगे थे.. कुछ कंक्रीट सा उन्हे मिल नहीं रहा था कि कैसे वो सिद्ध करे की वो वाणिज्य मंत्रालय के योग्य है, इसलिए कई सारे अर्थशास्त्री को बिठाकर वो दिन भर अर्थशास्त्र और देश दुनिया की तमाम अर्थशास्त्र नीति के अध्ययन में जुटे रहते....


मेरा यह पहला अवसर था जब मै किसी सेंट्रल मिनिस्ट्री के दफ्तर का काम काज देख रही थी.. बाहर से भले लगता हो सरकारी दफ्तरों में क्या काम होता होगा.. लेकिन यहां के दफ्तर में मेरे ख्याल से 16 घंटे काम होता था...


मै लगभग 2 घंटे बिना काम के बैठी रही. बॉडीगार्ड के काफिले के बीच चले आ रहे थे श्याम प्रसाद शुक्ला जी, आते ही ऑफिस में गए और उनके पीछे अपने उमाशंकर मिश्रा..


उन दोनों के साथ एक सरकारी पीए भी था जो अंदर चला.. 25-26 साल की एक मैरिड लड़की हाथो में फाइल लिए बाहर खड़ी थी और मंत्री जी से मिलने वाले कुछ लोग वेटिंग लौंग मे..


आधे घंटे बाद उमा शंकर ने दरवाजा खोला और उस लड़की को अंदर आने के लिए कहा गया... वो लड़की तकरीबन 15 मिनट बाद लौटी और वहां पास के एक बॉडीगार्ड से कुछ बात करके निकल गई... आप भी सोच रहे है ये सब मै क्या बता रही हूं...


सच कहूं तो मनहूस सी ये जगह मुझे लग रही थी.. इतना बोर तो मै तब भी नहीं हुई.. आगे तुलना करने को कुछ है है नहीं, जो मै किसी घटना का विवरण भी दे सकूं.. बस भाग जाने का मन कर रहा था...


मै बोरियत को इस कदर मेहसूस कर रही थी कि वहां बैठे स्टाफ के हेयर कट तक को नोटिस कर रही थी.. बहरहाल उस लड़की के निकलने के 2 मिनट बाद, रवि मंत्री जी के चेंबर मे गया और फिर एक चपरासी ने मुझे अंदर जाने के लिए कहा...


कुछ औपचारिक परिचय के बाद मंत्री शयम प्रसाद शुक्ला कहने लगे... "मै तुम्हे 1 साल से जानता हूं, जब तुम इकोनॉमिक्स फोरम में भाषण दे रही थी.. तुम पहली ऐसी वक्ता थी जिसे मै समझ सका था"…


मै:- "बहुत-बहुत धन्यवाद सर, लेकिन अगर आप मुझे अपने इस बोरिंग ऑफिस में काम ऑफर कर रहे है तो जवाब है ना.. इससे अच्छा मेरे गले में फांसी लगाकर लटका दीजिए..."

ध्यान से सुनिए, जब मै आयी.. ये छोटे पुजारी जो मुझे देखकर स्माइल दिया करते थे, वो एक नजर डालकर फिर ऐसे काम मे लग गया जैसे पहली बार देख रहा हो.. ये रवि मेरा दोस्त, मेरा करीबी.. 2 घंटे से बैठी हूं, पूछने तक नहीं आया... 42 स्टाफ, 8 बॉडीगार्ड, 6 सिक्योरिटी गार्ड, 8 कमांडो, 1 आईपीएस, 2 आईएएस इतने लोग है ऑफिस के फ्रंट में, जो आखों के सामने से गुजरे..

थर्ड कॉरिडोर के अंदर ऑफिस की एक आंटी, एक अंकल के साथ पेपर की फेका फेकी खेल रहे थे, उमाशंकर के अंदर जाते ही.. आपने अपने सभी स्टाफ को एक ही सैलून मे जाने की सलाह दी है, इसलिए सबके बाल एक जैसे कटे हुए है..

आप समझ सकते हो कि आपका ऑफिस कितना बोरिंग है, बहुत कुछ बताया नहीं है क्योंकि वो तो दाग धब्बे थे, की किन दीवार पर धूल के दाग है, पानी के दाग है.. बला बला बला..


मंत्री जी मुझे आश्चर्य से घूरते... "तुम वाकई कमाल की हो, रवि ने गलत नहीं कहा था तुम्हारे बारे में... ऑफिस में नहीं रखना है बल्कि तुम्हे निजी सलाहकार (पीए) बनाना है.."


मै:- नाह! मै 2 घंटे की बोरिंग ऑफिस मे, एक लड़की के लिपस्टिक को नोटिस नहीं करूंगी क्या... नहीं बनना मुझे आपका पीए..


मंत्री जी:- "तुम्हे मेरे साथ 24 घंटे रहकर निजी रूप से सहायता करे, वो पीए की जरूरत नहीं है... क्योंकि उसके लिए गवर्नमेंट अपॉइंट लोग है.. और मेरे टाइम शेड्यूल और इवेंट्स को उनसे बेहतर कोई मैनेज नहीं कर सकता.. लेकिन कुछ फाइल का मैनेजमेंट उनको नहीं दे सकते.. और ना ही कुछ मामलो मे उनकी सलाह सही होगी.."

"ना तो तुम्हे ऑफिस आना है ना ही मेरे साथ घूमना है.. मेरे घर रोज 2-3 घंटे आ जाओगी तो तुम्हे पुरा काम समझ में आ जाएगा.. शुरवात के कुछ दिन तुम्हे उमाशंकर बता देगा की क्या करना है, उसके बाद एक ऑफिस तुम्हारे जिम्मे...


मै:- लेकिन सर मै तो अभी पढ़ ही रही हूं.. सीए बनी भी नहीं...


मंत्री:- तुम पढ़ाई जारी रखो, मैंने मना थोड़े ना किया है... वैसे भी तुम्हारे गांव की मिट्टी में कुछ तो बात जरूर है, जो भी मिलता है, पहली मुलाकात मे भा जाता है... तुम मेरी बेटी हो और तुम जैसा सोच रही हो वैसा कुछ नहीं होगा..


मै:- सर मै पॉलिटीशियन के बीच ही पली बढ़ी हूं.. इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकती.. मै काम करूंगी लेकिन मुझे जब कभी भी लगेगा कि मेरे साथ कुछ ग़लत करने की कोशिश हो रही है, मै काम छोड़ दूंगी...


मंत्री जी:- मुझे मंजूर है...


पता नहीं क्यों लेकिन मै ना नहीं कह सकी.. शायद बीते दिनो की मेरी जरूरतों ने मुझे हां कहने पर मजबूर कर दिया हो.. हां एक बात ईमानदारी भरी थी, वो मंत्री ठरकी पुरा था लेकिन वो केवल और केवल पैसे लेकर आने वाली लड़कियों को बुलाता था.. अपने साथ काम करने वाले किसी भी महिला कर्मचारी या फिर उनसे मिलने आयी किसी भी महिला पर ना तो बुरी नजर डालता था और ना ही बाहर से आयी किसी भी महिला के जिस्म की नुमाइश के प्रलोभन में फंसता था...


कुल मिलाकर वो जिस जगह पर था उस जगह पर बने रहने के लिए अपनी सोच के साथ अग्रसर था... ईमानदार लोगों की उतनी ही कद्र भी करता था, श्याम प्रसाद शुक्ला.


काम करते हुए मुझे 3 महीने हो चुके थे, मई से जुलाई की अवधि मै पूरी कर चुकी थी.. ऐसे ही एक रात की बात थी, जब मै और रवि डिस्को गए हुए थे.. वहां किसी से मेरी छोटी सी बहस हो गई थी...


रात के तकरीबन 12.30 बज रहे होगे... रवि ने सीधा फोन लगाया था श्याम प्रसाद शुक्ला को और डॉट 5 मिनट में पूरी फोर्स उस डिस्को में थी... शुक्ला जी ने वापस फोन किया था रवि को जब वहां फोर्स पहुंची... "रवि बताओ क्या करना है, डिस्को को सील करवाना है क्या?"..


डिस्को का मालिक वो अरबपति आदमी, खुद आकर, सरकारी ऑफिस के एक स्टाफ से माफी मांगकर गया था.. ये होता है रेंज श्याम प्रसाद शुक्ला के ऑफिस स्टाफ का.. हां लेकिन उसके लिए पहले क्रेडिट भी बनानी पड़ती है... जो की रवि, उमाशंकर, नूतन, श्रेश, अरविंद और राजीव नाम के लोगों ने अपनी बनाई थी...


खैर, 3 माह की अवधि समाप्त होने के बाद मंत्री जी के घर पर ही हमारी एक कैजुअल मीटिंग थी.. जिसमे सभी विश्वसनीय स्टाफ के साथ, मुझे भी बुलाया गया था... शुक्ला जी सबके सामने बोल दिए... "यार बेईमानी तो बहुत की है, कुछ अच्छा करना चाहता हूं, जो वाकई मे दिल को सुकून देने वाला काम हो और मुझे पॉलिटिकल माइलेज भी उतना ही मिले..."


सब अपने अपने सुझाव दे रहे थे.. मै ख़ामोश सबको सुन रही थी... ये परियोजना, वो परियोजना.. जिसका जो हिसाब हुआ बोलते चला गया... अचानक ही शुक्ला जी मुझसे पूछ बैठे, "तुम क्यों ख़ामोश हो, कुछ बोल क्यों नहीं रही..?"


मै:- सबको सुन रही थी, अच्छा लग रहा था..


मंत्री:- अब हम सब तुम्हे सुनना चाहेंगे..


मै:- मेरे पास कुछ भी नहीं है ऐसा जो आपके काम का हो..


रवि:- मंत्री जी इसने अगर बोल दिया तो समझ लीजिए कि आप हम जिस प्वाइंट को कभी सपने में भी नहीं सोच सकते, वो ये कह देगी..


मै:- भगवान हूं ना मै रवि..
nice update ..harsh ko dhundna chhod diya aur minister ke saath kaam kar rahi hai menka 🤔🤔..
 

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अध्याय 27 भाग:- 3




मंत्री:- फिर भी हम तुम्हे सुनना चाहेंगे.. कुछ भी जो दिल में आ रहा हो..


मै, कुछ देर ख़ामोश रहने के बाद... "मेरी बहन है गौरी, मुझसे 1 साल छोटी है, लेकिन हम दोस्त की तरह है.. यहीं दिल्ली मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस कर रही है.. दिसंबर 2014 की बात है, हम दोनों ऐसे ही बात कर रहे थे, तब मै उससे कही की मेरे पास 7 करोड़ रुपया है जो किसी काम का नही, तू उसे ले ले और खर्च कर दे.."

"हो गया वो सुनी.. हमारी चर्चा आगे बढ़ी, उसने कहा चल कुछ पागलपन करते है.. मैंने हामी भर दी.. 2 बस किराए पर लिए.. सहर के 30 किलोमीटर के पश्चिमी सीमा से लेकर सहर होते हुए, 25 किलोमीटर उत्तर और पूर्व की सीमा तक बस को दौरा लिए.. 82 वृद्ध जो किसी मजबूरी बस भीख मांगने पर मजबूर थे, उन्हे बस में बिठाया.."

"गौरी ने इतना ही कहा, मेरा पागलपन खत्म अब तेरा शुरू होता है... पैसे इस तरह से खर्च कर की इनका अपना घर हो और घर की फिक्स इनकम हो.. मैंने 5 करोड़ मे 100 कमरे का होटल खरीदी.. 2 करोड़ बैंक मे टर्म डिपॉज़िट दिया, जिसका ब्याज हमे 18 लाख सालाना मिलता.. थोड़े कम थे, क्योंकि हमारा लक्ष्य 150 लोग थे और उनको देखने के लिए 4 कर्मचारी... 2 रेगुलर विजिटिंग डॉक्टर और मेडिकल इमरजेंसी के लिए पैसे।"

"सो उस 2 करोड़ के टर्म डिपॉज़िट को 5 करोड़ करवाया.. अब 3 लाख 75 हजार फिक्स इनकम है महीने का.. 2 लाख 70 हजार से 2 लाख 90 हजार महीने का खर्च है, बचे पैसे मेडिकल इमरजेंसी के लिए जमा हो जाता है.. ऑटोनोमस सिस्टम है, जिसने उन वृद्ध को किसी का आशा नहीं देखना पड़ता.. बस ये थी छोटी सी कहानी जिसमे मेरी बहन की ख्वाइश अच्छा करने की थी और मेरे पास पैसे थे..."


बड़े ध्यान से सब मेरी बात सुन रहे थे, जैसे ही मेरी बात समाप्त हुई, सभी एक साथ गहरी श्वांस लेते और छोड़ते, खुद को रिलैक्स किए. कुछ देर तक मेरे बात पर सोचने के बाद मंत्री जी... "मेरे पास पैसा है, क्या तुम्हारी बहन कुछ अच्छा कर सकती है क्या"..


मै:- ये तो वही बता सकती है.. मै क्या कह दूं..


मंत्री:- तुम दोनो बहन को पागलपन करने की पूरी छूट है.. 100 करोड़ की सहायता राशि मेरे ब्लैक फंड से.. बिना नजर मे आए, कर दो पागलपन... हर पागलपन के लिए मै तुम्हे और तुम्हारी बहन को 10 लाख मेहनताना दूंगा..


मै:- मुझे एक टीम चाहिए होगी और कुछ सुकून वाला इलाका... क्योंकि जहां हमारा फ्लैट है वहां मेरी भाभी है और मेरा छोटा भाई है.. ऐसे में वहां मीटिंग वगैरह करना अच्छा नहीं लगेगा..


मंत्री:- उमाशंकर, मेनका को कनौट प्लेस में एक सुरक्षित ऑफिस और तुम अपनी टीम को लेकर मेनका का काम देखो... और कुछ मेनका..


मै:- नहीं सर मीटिंग किसी ऑफिस में नहीं.. रवि या उमा मे से किसी के घर पर कर लेंगे...


मंत्री:- "तुम उमाशंकर से ही बात कर लो, आज से उमाशंकर को ऑफिस से निकालकर तुम्हारे हवाले किया.. गौरी अपनी इक्छा बताएगी, तुम पैसे और एस्टीमेट तैयार करके फाइल उमाशंकर को सौप देना और बाकी वो कर लेगा.."

"100 करोड़ पहली सहायता राशि है जो एक महीने में खर्च करने है वो भी तुम्हारे उस ऑटोनोमस सिस्टम के हिसाब से.. उसके बाद हम नेक्स्ट स्टेप लेंगे.. हां लेकिन 100 करोड़ का पॉलिटिकल माइलेज भी उतना ही मिलना चाहिए.."


मै:- उसकी गारंटी मै नहीं ले सकती की पॉलिटिकली आपको कितना फायदा हुआ.. हां वो सुकून की जो बात आपने की थी, गारंटीड है..


मंत्री:- हम्मम ! मै संतुष्ट मतलब वो पॉलिटिकल माइलेज के भी ऊपर हो गया मेनका.. तुम बेफिक्र होकर काम शुरू करो...


100 करोड़ का इन्वेस्टमेंट प्लान बना. गौरी का पागलपन तो देखने लायक था.. उसने आंख मूंदकर एक स्टेट चुना, जो की था कर्नाटक. और वहां के आधे राज्य में शुरू करवानी थी फ्री वाईफाई हाई स्पीड इंटरनेट सर्विस. गौरी ने प्लान दे दिया, उसके बाद शुरू हुई मीटिंग.. सर्विस प्रोवाइडर्स से बातचीत और 7 दिन मे सब फाइनल होकर काम शुरू हो चुका था.. 9 अगस्त 2015 को काम शुरू हुआ और 29 अगस्त तक काम खत्म करने की आखरी तारिख थी...


आधे स्टेट मे, वहां पूरी केवल लाइन बिछा. एमजी (मेनका-गौरी, एमजी) ट्रस्ट के नाम खुद का इंटरनेट सरवर खरीदा, फ्री-फाय इंटरनेट सर्विस शुरू हुई और हर डिस्ट्रिक्ट तालुका और पिछड़े से पिछड़े इलाके में फ्री वाईफाई प्रोवाइड करवाने का काम शुरू हो गया.. इस पूरे सिस्टम को ऑपरेट करने के लिए 60 से 70 लोगों को स्थाई रोजगार भी मिली, जिसकी सैलरी और वाईफाई मेंटेनेंस के साथ उसका सालाना खर्च, उसी ऑटोनोमस सिस्टम के जरिए जारी होना था जिसकी राशि 10 करोड़, वाईफाई सर्विस के नाम अकाउंट में पहले से जमा करा दी गई थी..


10 अगस्त से मै और उमाशंकर रोज उसी के घर पर मिला करते थे.. ऑफिस के बाहर उसका काफी क्यूट व्यवहार था. बिल्कुल किसी बच्चे की तरह, जो हंसता बोलता और नादानियां करता था... शायद मेरे वजह से वो भी कई सालों बाद अपना ये खाली समय देख रहा था.. क्योंकि 10 अगस्त से हम दोनों रोज उसके घर पर मिलते और केवल काम की रिपोर्ट लेने उसके अलावा हमारे पास कोई काम नहीं होता था, सिवाय बात करने के...


18 अगस्त आते-आते तो मै उसे छेड़ भी दिया करती थी, और उफ्फ वो उसका भोला सा चेहरा.. क्या मासूमियत थी.. 19 अगस्त की सुबह की बात है.. काम लगभग फाइनल हो रहा था... मै बैठी हुई थी और बंगलौर सिटी से वीडियो फुटेज देख रही थी, तभी एक हॉट लड़की पीछे से गुजरी..


मै उमाशंकर को देखती... "दिल्ली में भी ऐसे नजारे मिल जाते है, छोड़ दीजिए छोटे पुजारी, बंगलौर की लड़कियों को"…


उमाशंकर:- धत मेनका जी आप बहुत छेड़ती है..


मै:- अच्छा, मै छेड़ती हूं तो आप ही क्यूं छिड़ जाते हो..


उमाशंकर:- आप कभी नहीं बदल सकती है.. वही पहली मुलाकात वाली मेनका है..


मै:- ऐसा नहीं है उमाशंकर जी, बहुत से बदलाव आए है तब की मेनका और आज की मेनका मे.. तब मै सुंदर नहीं दिखती थी, मेरे बदन पर मांस नहीं चढ़ा था, तब आप मुझे अनदेखा करते थे.. लेकिन जैसे-जैसे मैं जवानी की दहलीज पर कदम रखते गई आप का झुकाव मेरी ओर बढ़ने लगा..


उमाशंकर:- कैसी बातें कर रही है आप.. हां ये सही है कि मै नजरे चुराता था, लेकिन वो इसलिए क्योंकि मेरा हृदय सदैव आपको देखकर ऐसे धड़कता था कि वो बेकाबू सा हो जाता था..


मै:- झूट है ये उमाशंकर जी... ऐसा था तो आपने कभी बताया क्यों नहीं..


उमाशंकर:- डरता था कि कहीं आप कुछ गलत ना सोच ले.. फिर ख्याल आया की क्यों ना आपकी पढ़ाई पूरी होने तक मै खुद को साबित कर सकूं, ताकि सीधा आपके घर जाकर आपका हाथ मांग सकूं..


मै:- हिहिहिहिहि... बहुत भोले है आप उमाशंकर जी.. खैर अब तो मेरे आखों से हर सपना ही समाप्त हो गया है..


उमाशंकर:- मेनका एक बार भरोसा करके देखिए, आपकी जिंदगी मै खुशियों से भर दूंगा...


उमाशंकर मेरे करीब आकर मेरा हाथ थामने की हिम्मत कर चुका था.. वो मेरी आंखों में झांकता अपनी बात कह गया.. शायद ये मेरा ही उकसाव था.. मै नजरें नीची करके केवल "सॉरी" कहीं और वहां से चली गई..


20 अगस्त की सुबह जब पहुंची तब घंटे भर मे अपना सारा काम निपटाने के बाद मै जैसे ही जाने को हुई, उमाशंकर मेरा हाथ थामकर रोकते हुए...


"या तो हां कह दीजिए या ना कह दीजिए, जलता है दिल आपको इतना पास देखकर, आपसे कुछ ना कह पाने की स्तिथि में. मानाकि आपके लेवल का नहीं हूं.. मात्र 60 हजार रुपया महीना कमाता हूं और जमीन के नाम पर बस नाना जी का एक छोटा सा घर है, लेकिन एक बार आप कह दीजिए की आपको किस लेवल का लड़का पसंद है, मै हर लेवल को मैच कर जाऊंगा"


मै:- उमाशंकर जी आपका लेवल मुझसे बहुत ऊंचा है और मै वो लेवल कभी मैच नहीं कर सकती... मेरा नाम पहले ही एक लड़के के साथ जोड़ा जा चुका है फिर आप समझ ही सकते है कि मै किसी के नजर ने कुंवारी नहीं अब..


उमाशंकर:- आप मुझे लोगों में क्यों सामिल कर रहे हो..


मै:- मै जानती हूं कि आप भिड़ मे गिनती लायक नहीं है.. मुझे अभी अपने हाल पर तो छोड़ ही सकते है.. और हां मेरे घर वाले राजी हो गए तो मेरे हां या ना कहने का कोई मतलब ही नहीं.. आप यहां वक्त गंवाने से अच्छा है कि उनसे बात क्यों नहीं कर लेते...


उमाशंकर:- मुझमें ऐसा क्या नहीं जो मै आपके दिल के करीब नहीं हो सकता...


बिल्कुल मासूम सा चेहरा बनाए वो मुझे ऐसे देख रहा हो, मानो सालों के अरमान एक साथ चेहरे की भावना से इजहार कर रहा हो.. मै कहीं खो सी गई उमाशंकर को देखकर.. इतनी मासूम सी अर्जी पर मै इतनी भी खुदगर्जी तो नहीं ही दिखा सकती थी.. मै आगे बढ़कर उसके होंठ को छूकर पीछे हटी...


"मैंने प्रेम वाश आपको नहीं चूमा, बस आप बहुत प्यारे लग रहे थे, और आपको चूमकर मैंने अपनी फीलिंग बताई है"…


मेरी हरकत और मेरी बात सुनकर उसका पूरा चेहरा खिल गया, जवाब में मै भी उमाशंकर को एक प्यारी सी मुस्कान देती चली... लड़के का चेहरा देखने लायक था.. मै दर्द से तो उलझी ही थी, कम से कम एक सच्ची चाहत को तो उसकी मंज़िल मिल जाती...


मै वापस आयी अपने घर.. मैक्स लेटकर अपनी किताब में उलझा हुआ था और गौरी किचेन मे थी.. मै दबे पाऊं मैक्स के कमरे में घुसी उसके कान में चिल्लाने के लिए, लेकिन अंदर पहुंचकर तो लड़के ने मुझे सरप्राइज़ कर दिया..


मै पीछे खड़ी होकर देख रही थी और सामने दूसरी स्क्रीन वाली ने शायद मुझे देख लिया हो, वो झट से स्क्रीन से गायब हो गई और मैक्स हड़बड़ा कर उठते हुए... "दीदी ये गलत है, तुमने मेरे प्राइवेसी मे सेंध मार दी"…


मै:- हिहिहिहि... कौन है बड़ी खूबसूरत थी.. और हॉट भी..


मैक्स:- अनीता नायर नाम है.. कर्नाटक से..


मै:- गर्लफ्रेंड है या कुछ सीरियस अफेयर..


मैक्स:- अफेयर तो सीरीयस ही होता है, हां बस आगे जाकर किसका माथा घूम जाए किसे पता.. इसलिए नथिंग सीरियस…


मै:- अच्छा हम दोनों (मै और गौरी) मे से कोई ये बात कहे तो..


मैक्स:- नहीं कर सकती ना..


मै:- यदि कहीं कर दे तो..


मैक्स:- नहीं कर सकती बस... और हमारा कोई सीरियस अफेयर नहीं है.. साथ पढ़ते है एक दूसरे को अच्छे लगे तो थोड़ा सा वक्त दे रहे है.. मै उसे अपनी फैमिली और कल्चर बता रहा था और वो अपनी बता रही थी.. यदि हम दोनों को सब कुछ पसंद आ गया तो फिर रिश्ते को आगे बढ़ाएंगे वरना.. खत्म..


मै:- ओह इसलिए वो इनरवियर में अपना कल्चर बता रही थी..


मैक्स मेरे सर पर एक हाथ मारते... "गंवार कहीं की वो शर्ट्स मे थी और ऊपर स्लीवलेस टॉप थी, इनरवियर तो अंदर था..


मै:- देख भाई इतने कम कपड़े वाली बहू लाएगा तो तेरे कपड़े का तो खर्च घट जाएगा, लेकिन मेरी मासी हार्ट पेशेंट जरूर हो जाएगी..


मैक्स:- धत तेरे की ये रिश्ता ही नहीं जमने वाला.. अच्छी लड़की हाथ से निकल गई..


मै:- इतने छोटे कपडे पहनती है, ओपन ख्याल की होगी.. 5-6 बॉयफ्रेंड तो होगी ही..


मैक्स:- नहीं उसका बस एक बॉयफ्रेंड था जिससे 1 साल पहले ब्रेकअप हो गया..


मै:- कारन..


"क्योंकि वो लड़का अमेरिका जाना चाहता था और अनीता का कहना था कि बहुत ज्यादा सैलरी का अंतर होगा तो 1 लाख रुपए का अंतर होगा, वो भी बहुत ज्यादा बोल गई. अमेरिका जाने से कोई बिल गेट्स नहीं बनने वाला.. ना ही अरबपति.. दिखावे में आकर भेड़ चाल चल दिए.. इसी बात पर बहस हो गई.. वो अपने ही देश के बारे में बुरा बुरा बोल रहा था और अनीता उसे एक चिपका कर चली आयी"… गौरी हमे ज्वाइन करती हुई बोली...


हमने अपने हाथो मे चाय के कप ले लिया, और बैठ गए बातें करने.. गौरी को मैक्स ने सब बता रखा था. अनीता के बारे में सुनकर तो अच्छा ही लगा हमे.. वो बैंगलोर से 18 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा टाउन है, चिक्काबियादराकल्लू, वहीं के किसान परिवार से है अनीता, जिसे सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर से शुरू से नफ़रत रही थी इसलिए मेडिकल की तैयारी की और डॉक्टर बनना एंबिशन है...


बातो ही बातो मे फिर हमने तय किया कि फिर चला जाए पहले अनीता का ही कल्चर समझ लिया जाए, लेकिन उसके घरवालों को पता चला कि प्रेम प्रसंग का मामला है तो कहीं हम लौटकर भी ना आने दे...


मैक्स हंसते हुए कहने लगा.. "वो बिहार का कोई सहर नहीं की बोले बॉयफ्रेंड है तो तलवार भाला चल जाए.. वो लोग एक्सेप्ट करते है लड़की की पसंद, और लड़का अच्छा लगे तो हां कह देते है"..


मै:- ओ भाई उड़ मत.. अभी बात केवल कल्चर समझने की हो रही है.... उसके बाद रिश्ता आगे बढ़ेगा. दोनो को लगेगा कि शादी कर सकते हो तब ना.. की पहले ही..


मैक्स:- दोनो बहने उसमे रुचि ले रही हो.. मतलब वो अच्छी ही होगी..


बातें तो होती ही रही.. इसी बीच रूपा भाभी भी पहुंच गई.. काफी थकी हुई लग रही थी... "क्या हो गया ऐसे बदहाली में कहां से आ रही हो"…


भाभी:- पता नहीं, तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही.. बहुत तेज दर्द उठा था पेट में, ऐसा की बर्दास्त से बाहर था.. मै तो सड़क के किनारे ही बैठ गई थी...


मैक्स:- चलो हॉस्पिटल चलते है..


भाभी:- 2-2 डॉक्टर घर में है और मै हॉस्पिटल जाऊं..


मैक्स:- पागल हो क्या.. अभी मै दूसरे और गौरी पहले ही साल मे है.. वैसे भी ये पथरी का दर्द लगता है.. चलो चलकर देख लेते है..


भाभी:- पथरी.. चल फिर कौन ये दर्द झेलते रहे. जल्दी से निकाल दो फिर.. मुझे तो दर्द से उल्टियां तक हो गई.. और ये कैसा सहर है, दर्द से मै छटपटा गई और सब केवल मुंह देखकर चले जाते..
nice update ..ye 100 crore ka plan samajh nahi aaya ki itne paise me free wifi kaise de rahe hai aur kaam karnewalo ka kharch 10 crore saalana 🤔🤔🤔..
mujhe laga umashankar koi middle age hoga par wo to ladka hai aur usne menka ko propose bhi kar diya 😂😂😂.
laga tha ravi ke saath set ho jayegi menka par uma se ho gayi ( abhi confirm nahi par menka ke gharwalo se baat ki jaaye to menka shadi karegi ,iska matlab wo bhi pasand karti hogi ) ..
ab karnatak jaane ka soch rahi hai menka aur waha ka culture dekhna hai ,,par ye rupa bhabhi ko kya ho gaya 🤔🤔🤔..
 

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waise ek baat samajh nahi aayi ki menka foreign se vapas aane ka jikr nahi tha ,,aur direct library to thoda confuse ho gaya tha waha ..
aur ye ab menka kis jagah par rehti hai ???..
 
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