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Romance भंवर (पूर्ण)

Chunmun

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Ab samajh aaya na Sanchi ko. Jab apsyu use ek aam ladki ek collage friend ki tarah milta hai na ki apne f.g ki tarah tab kaisa lag raha hai.
Lagta hai ab saja puri ho gai Sanchi ki qki ab use apne galti ka ehsas hai or wo is galti ko accept bhi kr li hai to apasyu ab use maaf kr apna lega.
Dekhte hai kya hota hai.
 

aman rathore

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Update:-13



अपस्यु:- तो तू करना क्या चाहता है?

आरव:- मुझे तू बैकअप देता जा। टारगेट मुझे मिल गया है, एलिमिनेटर कैसे करना है वो मैं समझ लूंगा।

अपस्यु:- ठीक है लेकिन याद रहे किसी भी सूरत में कोई कड़ी मत छोड़ना। क्योंकि उसके 3 डीलर मारे जाएंगे तो वो कारण का पता जरूर लगाएगा।

आरव:- तू बस देखता जा, ये मैं कैसे करता हूं।

अपस्यु:- ठीक है तो तू कल से ही काम शुरू कर देना।

आरव:- मैं तो काम शुरू ही कर दूंगा लेकिन क्या तू तैयार है। नहीं, मतलब अभी तू पूरी तरह से ठीक भी नहीं हुआ है। तेरी हड्डी जुड़ने में वक़्त है अभी, ऐसी हालत में तू यहां अकेले सब कैसे करेगा। ऊपर से बॉथरूम आने पर क्या करेगा।

अपस्यु:- चिंता मत कर कल बहुत कुछ सुधार अा जाएगा।

अगले दिन तकरीबन सुबह के 8 बजे अपस्यु ने एक बार पुनः वहीं प्रक्रिया शुरू कर दी। लगभग आधे घंटे तक चली प्रक्रिया और उसके बाद अपस्यु बेहोश परा सोता रहा। इधर आरव अपना सामान पैक करके, वहीं लगे कई तरह के अभ्यास करने वाले मशीनों पर अपना अभ्यास कर, सारी क्षमता दर्ज करने लगा। लगभग 3 बजे दिन में अपस्यु भी उठ चुका था। खुद में वो पहले से बेहतर तो मेहसूस कर रहा था लेकिन अभी भी पूरी तरह से ठीक होने में वक्त लगता, खासकर उसकी टूटी पसलियां और हाथ-पाऊं की हड्डियां जुड़ने में अभी वक़्त था।

दोनों भाई आगे कि रणनीति पर चर्चा कर रहे थे, तभी उनके फ्लैट की घंटी बजी। फ्लैट की घंटी बजते ही दोनों भाई चौक्कना हो गए। दोनों की नजर एक साथ बाहर लगे कैमरे की स्क्रीन पर गई…. "ले अा गई तेरा हाल पूछने। लगता है तेरी वाली बीमारी इसे भी लग गई। पहले तू इसके घर में झांकता था अब ये तेरे घर"

अपस्यु:- जा, जाकर दरवाजा खोल।

आरव हंसते हुए उसके सर पर एक हाथ मारा और जाकर दरवाजा खोलने चला गया।… "स्वागत है जी आप का हमारे छोटे से गरीब खाने में"

साची मुस्कुराती हुई अंदर प्रवेश की और जैसे ही सामने हॉल का नजारा देख… "ओह माय गॉड… ये तो किसी ट्रेनिंग वर्क शॉप जैसा लग रहा है"

आरव:- हा हा हा, अंदर भी आओगी या फिर यहीं खड़ा रहना है।

साची पूरे हॉल का जायजा लेती हुई अाकर सोफे पर बैठ गई… "तुम्हारे घर और रहन-सहन को देख कर तो ऐसा लगता है कि कोई मालदार आसामी हो"

अपस्यु:- आरव चाई ला दे बनाकर। और बताओ साची कैसे आना हुआ।

साची:- अभी मै यहां भांगड़ा करूंगी और तुम ढोल पीटना डफर। तुम्हे देखने आयु हूं और खबर भी लेने।

अपस्यु:- देख तो ली अब खबर भी लेलो।

आरव, किचेन से ही.. साची डंडे से इसकी खबर लेना।

साची:- खबर तो तुम्हारी ही लेने अाई हूं आरव, वेदांता से सीधा फ्लैट में शिफ्ट कर दिए।

आरव:- घूम फिर कर सबका निशाना मैं ही बनता हूं। लो चाय लो। दरअसल बात कुछ यूं हुई की मै गया तो वेदांता ही था लेकिन थोड़े से चेकअप के बाद उन्होंने कुछ दवा लिखी। कमीनो ने ₹40000 जमा भी करवा लिए और आधे घंटे बाद कहते है "नॉर्मल चोट है, 2 हफ्ते में ठीक हो जाएगा। इन्हे घर लेे जा सकते है"।

साची:- चोट नॉर्मल कैसे हो गई। कमाल है हॉस्पिटल बदलते ही पूरा ज़ख्म का रंग-रूप ही बदल गया।

अपस्यु:- सरकारी हस्पताल वाले थे ना वो लोग। कोई भी रिपोर्ट बना देते हैं साची।

अभी साची चाय पी ही रही थी कि उसके सामने से आरव बैग टांगें निकालने लगा। आरव को जाते देख साची ने पूछ लिया कि आखिर वो किधर जा रहा है। आरव को निकालने के लिए बोलकर अपस्यु साची से कहता है…

"अभी जो तुमने मालदार आसामी बोला था ना, उन मालदार आसामी को भी जीने के लिए माल की जरूरत पड़ती है वहीं लाने जा रहा है"

साची:- कोई फैक्ट्री या मिल होगा उसी का कलेक्शन लेने जा रहा होगा।

अपस्यु:- हा हा हा.. नहीं ऐसा कोई मिल या फैक्ट्री नहीं है हमारे पास और ना ही करोड़ों संजोया हुआ है। ये सब कुछ, जो तुम देख रही हो वो हमारे बाबा का संजोया हुआ है। ले-दे कर आय के नाम पर दार्जलिंग में चाय का एक बागान है जिससे हर 3 महीने में 1.5 से 2 लाख रुपए मिल जाते हैं। वहीं हिसाब करके पैसे लेने जा रहा है।

साची:- पैसे अकाउंट पर भी तो मंगवा सकते हो, ऐसे हालात में तुम्हे छोड़ कर जाने की क्या जरूरत है।

अपस्यु:- पैसे के नाम पर बस ₹200 रुपया बचा है। वहां जबतक हिसाब नहीं करेंगे तो पता चलेगा कि जहां 1.5 या 2 लाख आने है वहां ₹50000 से ही संतोष करना होगा।

साची:- पैसों की जरूरत थी तो मुझ से मांग लेते, कुछ समय बाद चला जाता वो।

अपस्यु:- लो अभी मांग लिए जरूरत तो है ही। फिलहाल ₹20000 दे दो। पैसे आते ही लौटा दूंगा।

साची:- ठीक है कल सुबह मै देदुंगी। वैसे मानना पड़ेगा, पैसों का सही इस्तमाल किया है।

अपस्यु:- इस्तमाल नहीं उपयोग।

साची:- मतलब,

अपस्यु:- मतलब "इस्तमाल" शब्द उर्दू से लिया गया है और ये हिंदी भाषा का मूल शब्द नहीं है। "उपयोग" मूल शब्द है।

साची:- आरव ने सही ही बताया था।

अपस्यु:- क्या?

साची:- यही की गुरु जी के पास बैठ जाओ और ज्ञान की प्राप्ति होते रहेगी।

अपस्यु:- नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। तुम साहित्य लेकर पढ़ रही थी तो मैं तुम्हारा ज्ञान बढ़ा रहा था।

साची:- अरे हां तुम उस दिन कैंटीन में इस बारे में कुछ बात कर रहे थे ना।

अपस्यु:- वो बात ऐसी है कि हम भी आप के ही सहपाठी हैं जी, और हमारा भी विषय साहित्य ही है।

साची:- ओह हो .. तभी हिंदी के ऊपर मुझे इतना लेक्चरर सुनाया जा रहा था।

अपस्यु, गहरी श्वास खींचते.. सुनाने को तो बहुत कुछ चाहता हूं..

कुछ पल के लिए दोनों के बीच की बातें थम गई और दोनों एक दूसरे को देखने लगते हैं। ये खामोशी जैसे अपने आप में ही एक शोर हो। साची अपने नजरें चुरा कर इधर-उधर देखने लगती है।

अपस्यु:- अब कॉलेज में कोई परेशानी तो नहीं।

साची:- नहीं, कोई परेशानी नहीं। थैंक यू सूूूूूूूू मच..... समस्या का समाधान हो गया। और हां मेरी मां ने भी तुम्हे खास तौर ओर धन्यवाद कहने को कहीं है।

अपस्यु:- स्वागत है जी आप का और आंटी को मेरे ओर से प्रणाम कहिएगा।

साची:- ठीक है अब मैं चलती हूं, रात को आऊंगी खाना लेकर।

अपस्यु, हसरत भरी नजरों से देखते बस "ठीक है" कहता है। दोनों की एक बार फिर नजरें मिलती है, कुछ पल की खामोशी और और फिर दोनों के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान। लेकिन इन पलों की शांति को भंग करने के लिए कॉल बेल बजने लगता है।

अपस्यु, अपने स्क्रीन पर एक बार फिर से देखते हुए… "साची मोबाइल वाला आया है, जरा डिलीवरी लेे लोगी क्या"..

साची:- तुमने कैसे ऐसी हालत में उसे जाने दिया..

अपस्यु:- तुम यहीं रुको मैं कुछ दिखता हूं।

अपस्यु ने पास पड़े रिमोट से ओपन का बटन प्रेस किया और दरवाजा खुल गया। कुछ ऐसी सेटिंग थी कि इधर दरवाजा खुला उधर हॉल के उस हिस्से में पर्दा डल जाता, जहां इनके सारे सामान परे हुए थे। वहीं परे माईक से अपस्यु उसे अंदर बुला कर डीलीवरी लेे लेता है।

उसके जाते ही साची, कमाल को व्यक्ति करने वाला अपना चेहरा बनती हुई.. "क्या बात है तुम्हारा फ्लैट तो पूरा डिजीटल ही है"। फिर उसके मोबाइल को ऑन करके अपना नंबर उसमे सेव करती हुई कहती है.. "कोई जरूरत हो तो कॉल कर लेना"… और वहां से चली जाती है।

अपस्यु गहरी सांसें लेता उसके बारे में ही सोचता रहा, कि तभी उसके फोन की घंटी बजने लगी। अपस्यु जैसे ही उठता है दूसरी ओर से… "इस बार अपंग कर के जिंदा छोड़ा है, मेरे पैसे नहीं लौटाए तो जान से जाएगा"..

अपस्यु:- तुम्हे कुछ भी करने की जरूरत नहीं, तुम्हे तुम्हारे 110 करोड़ मिल जाएंगे।

जमील:- 240 करोड़।

अपस्यु:- तेरे बाप ने भी कभी इतने पैसे देखे है क्या। 6 साल की राजनीति और 52 साल की उम्र तक तूने और भूषण ने मिलकर 110 करोड़ अंदर किए और तुझे अब डबल से भी ज्यादा चाहिए। देख ऐसी स्तिथि उत्पन्न मत कर की मैंने जो मन बनाया है उसे मैं बदल लूं।

जमील:- क्या त्रिवेणी शंकर को पता है कि तूने ही उसके बेटे को मारा और जिसे वो ढूंढ़ रहा है वो तू ही है। साला बित्ते भर का होकर सबको नचाए है। अब मेरी बात ध्यान से सुन 150 करोड़ उसके और 110 करोड़ हमारे। कुल 260 करोड़ में से मैं सिर्फ 240 करोड़ मांग रहा। बाकी तू अपने पास रख, साथ में प्रोटेक्सन भी दूंगा और आगे हम दोनों मिलकर धमाल करेंगे।

अपस्यु:- 200 करोड़ में डील फाइनल करते हैं लेकिन मेरी एक शर्त है। जितने कम राजदार उतनी ही सुरक्षा। 100 करोड़ मै तेरे इंटरनैशनल अकाउंट में ट्रांसफर मारता हूं। मुझे जब लगेगा की तुमने मेरा काम कर दिया तो बाकी के 100 करोड़ तुझे कैश मिल जाएंगे। जगह और समय मै दोनों बता दूंगा साथ में आगे के हर काम में 20% की भागीदारी भी। बोल मंजूर है।

जमील:- नहीं, हिस्सेदारी आधा-आधा.. बाकी सभी शर्तों पर सहमति।

अपस्यु:- नहीं 20-80

जमील:- ना तेरी ना मेरी, चल 40 पर दिल लॉक कर।

अपस्यु:- सब्जी का भाव तोल मोल कर रहा है क्या? तुझे मैंने एक तस्वीर भेजी है देख उसे पहले..

जमील ने होम मिनिस्टर के साथ अपस्यु की तस्वीर को देखते हुए… "अबे तू उधर कैसे पहुंच गया"..

अपस्यु:- ध्यान से सुन मेरी बात, मेरे अंदर दम है और मैं कहीं भी पहुंच सकता हूं। ना तो तू उस लेवल का नेता है और ना ही तू उनके जितना मुझे प्रोटेक्सन दे सकता है। मैं बस उसे इतना ही कहूं ना कि हर महीने 20 करोड़ बस मेरे काम पर पर्दे डालने और प्रोटेक्सन के लिए, तो तू सोच ले क्या होगा। अब बोल मंजूर है डील या फिर सब कैंसल करूं।

जमील:- तू देखने में बस बच्चा लगता है लेकिन है हमारा बाप। मुझे सभी शर्तें मंजूर है तू बस पैसे तैयार रख। मैं सारे काम निपटा कर तुझे फोन करता हूं।

अपस्यु:- ठीक है तेरे कॉल का इंतजार रहेगा।

इधर कॉल डिस्कनेक्ट होते ही अपस्यु ने आरव से संपर्क करने की कोशिश की। लेकिन मजाल है कि कॉल लग जाए। भाई साहब का फोन लगातार 1 घंटे से बीजी बीजी बीजी…
:superb: :good: amazing update hai nain11ster bhai,
sanchi aa hi gayi apasyu ka kushal kshem puchhne in dono ke pyaar ka maun izahar dono ki hi nazaron ne kar diya hai,
aur idhar iss jamil se bhi usne deal final kar liya hai,
Ab dekhte hain ki aage kya hota hai
 

aman rathore

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Update:-14



इधर कॉल डिस्कनेक्ट होते ही अपस्यु ने आरव से संपर्क करने की कोशिश की। लेकिन मजाल है कि कॉल लग जाए। भाई साहब का फोन लगातार 1 घंटे से बीजी बीजी बीजी…

आरव अपने घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही, रास्ते में परता हुआ उसके घर को देखते हुए एयरपोर्ट के ओर निकला। टैक्सी में बैठकर आरव लावणी के बारे में सोच कर मुस्कुराया और खुद से ही कहने लगा… "देखता हूं मेरी जानेमन क्या कर रही है".. फिर क्या था मिला दिया कॉल।

2 पूरी घंटी के बाद भी उसने कॉल नहीं उठाया। तीसरी घंटी में वो कॉल उठाती हुई पूछने लगी… "हां जी कौन"… उधर से आरव कहता है.. "जी हम आप के लवर बोल रहे हैं"।.. लवर का नाम सुनते ही वो हड़बड़ा गई, फोन हाथों से छूट कर नीचे गिरते-गिरते बचा। तभी बैकग्राउंड से आवाज़ अाई.. "किसका फोन है लावणी".. लावणी हड़बड़ाती हुई कहने लगी…. "सुषमा का फोन है मां".. और जल्दी से भागकर अपने कमरे में चली गई।

इधर आरव पीछे चल रही कहानी के मज़े ले रहा था… अपने कमरे में पहुंच कर लावणी फुसफुसाती हुई पूछने लगी… "तुम्हे मेरा नंबर कहां से मिला"

आरव:- बड़ा जल्दी समझ गई कि किसने कॉल किया है।

लावणी:- हद होती है किसी भी बात कि। पहले तुम ये बताओ कि मेरा नंबर कहां से मिला।

आरव:- किसी लड़की को लाइन मारने वाले लड़के के पास उसकी पूरी डिटेल होती है। तुम ना समझोगी, अभी बहुत कच्ची हो।

लावणी:- हां इसलिए दारू पीला कर पक्का बना रहे थे। तुम मिलो तो सही फिर बताती हूं।

आरव:- क्या बात है, मतलब काम निकल गया तो अब उल्टा हम ही दोषी हो गए.. क्यों?

लावणी:- तुम्हे तो में जूते से मारूंगी आरव, बस मौका नहीं मिल रहा। तुम्हारे वजह से कितना डर-डर कर जीना पड़ रहा है पता है। मेरी तो सोचते ही रूह कांप जाती है कि अगर इस कांड के बारे में पापा और मम्मी को पता चला तो मेरा क्या होगा।

आरव:- अरे इतना डरती क्यों हो। इस परिस्थिति से निकलने के लिए वहीं डोज बनेगा, 180ml पियो और शान से जियो।

लावणी:- ज्यादा बकवास की ना करो, मैं तुम्हारा मुंह तोड़ दूंगी आरव।

आरव:- इतना ही गुस्सा है तो बताओ कहां आना है निकाल लेना अपनी भड़ास।

लावणी:- ऊफ़ ओ !!! मुझे क्यों परेशान कर रहे हो। कोई काम है तो जल्दी बोलो, मां इधर ही नजर गड़ाए हुए हैं।

आरव:- चल झूठी। अभी तो अपनी मां से झूट बोलकर अपने कमरे में आई हो।

लावणी, चिढ़ती हुई कहने लगी… "देखो यदि मुझे परेशान किया ना तो मुझ से बुरा कोई ना होगा। चुपचाप फोन रख दो"।

आरव:- मुझ से इतनी ही चिढ़ है तो तुम्हारे पास भी लाल बटन है। इतनी बहस काहे कर रही हो। लेकिन… लेकिन… लेकिन … तुमने अगर अभी कॉल काटा तो एक बात याद रखना, जो बात मैं तुम्हे अभी बताने वाला हूं और तुम्हारे छोटे से रिक्वेस्ट पर उसे पूरा भी कर दूंगा। अगर तुमने कॉल डिस्कनेक्ट किया तो उसी काम के लिए तुम्हे पापड़ बेलने होंगे।

लावणी:- हो गई तुम्हारी बकवास खत्म.. बाय..

आरव हंसते हुए फोन को देखने लगा और खुद से ही कहने कहा… "लड़की में बहुत बदलाव अा गया है"। फिर गैलरी खोल कर कुछ तस्वीरें छांट ली। ये उसी दिन की तस्वीरें थी जिस दिन लावणी ने वोदका पिया था, और पीने के बाद आरव के गालों को चुमी थी।

इधर लावणी मोबाइल को हाथ में पकड़े बस इसी बात को सोच रही थी आखिर इसको मेरा नंबर कहां से मिला होगा। तभी एक के बाद एक व्हाट्स एप मैसेज आने शुरू हो गए। लावणी ने जब अपना एप खोला तो सबसे ऊपर में ही आरव के नाम से संदेश आने शुरू थे।… "इसका नंबर तो मेरे मोबाइल में भी सेव है"… फिर मैसेज ओपन की और सामने के स्क्रीन पर आए तस्वीरों को देखकर चौंकती हुई उसने वापस कॉल लगाया… "ये सब तस्वीरे तुम्हारे पास कैसे आए… कब खींची"

आरव:- ये डर भगाव दवा का असर था.. जब ये सरा कांड हो गया।

लावणी:- तुमने मेरे नशे का गलत फायदा उठाया..

आरव:- ओ मैडम जरा गौर से देखो, कौन किसको चूम रहा है। उल्टा जबरदस्ती तुमने मेरे साथ की और मुझे ही सुना रही हो।

मुद्दे पर वाद-विवाद होता रहा। कभी गुस्सा तो कभी मिन्नतें तो कभी ड्रामा ये सब बातों के दौरान चलता रहा। लेकिन आरव अपनी जिद पर अरा रहा… "तस्वीरें तभी डिलीट होंगी, जब वो फिर से होश में एक बार, ऐसे ही उसको चुम्मी देगी".. इसी बीच अपस्यु के कॉल भी उसे आते रहे लेकिन वो नजरअंदाज करता रहा।

लावणी से बात खत्म कर उसने सीधा फिर अपस्यु को कॉल मिलाया। अपस्यु ने अपने और जमील के बीच हुए बातचीत को बताते हुए पूछने लगा कि अब क्या करना चाहिए। आरव ने साफ कह दिया कि किसी के भी बातों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, योजना के अनुसार चलेंगे। यदि जमील ने काम कर दिया तो अच्छा वरना हम तो तयारी से निकले ही है।

आरव फ्लाइट बोर्ड करने निकल चुका था और इधर अपस्यु को थोड़ी चिंता भी सता रही थी। हालांकि विश्वास तो पूर्ण रूप से था किन्तु दिल नहीं मान रहा था कि आरव सब अकेले कैसे करेगा।

रात के लगभग 8 बजे की बात होगी, जब साची और लावणी उसके फ्लैट की बेल बजा रही थी। दरवाजा खुलते ही दोनों बहने अंदर अाई और फिर दरवाजा बंद। धीमी रौशनी पूरे हॉल में थी जो देखने पर ऐसा लग रहा था मानो लगभग अंधेरा ही है ये पूरी जगह।

साची, अपस्यु के पास बैठते ही सबसे पहले उसने ये अंधेरा कायम रहे की स्थिति के बारे में ही पूछी.. अपस्यु उसके बात पर हंसते हुए पूरे घर में उजाला कर दिया। पूरी रौशनी में जब लावणी ने उस हॉल को देखा तो वो भी साची की तरह ही दंग रह गई और जिज्ञासा वस चारो ओर घूमकर सब देखने लगी… "अपस्यु क्या मैं इन्हे छु कर देख सकती हूं"..

अपस्यु.. अरे वो कांच के नहीं है.. छु कर क्या मन हो तो 2-4 सामान पटक कर भी देखो, टूटेगा नहीं..

अपस्यु, लावणी के ओर मुड़ कर बात कर रहा था और साची अपस्यु को निहार रही थी। बात पूरी होने के बाद जैसे ही अपस्यु मुड़ा, साची अपनी नजरें चुराती हुई, अपने उंगली को बिस्तर पर गोल-गोल घुमती पूछने लगी.. "अभी तबीयत कैसी है तुम्हारी"

अपस्यु:- अभी कुछ घंटे पहले ही तो देखी थी, इतने समय में कितना सुधार होगा।

साची:- हां ये भी है…. (कुछ पल की खामोशी… और नजरों का मिलना और झुकना, फिर नजाकत के साथ कहना)… अब से हम दोस्त।

अपस्यु, साची के चेहरे को गौर से देखते हुए… "ये दिल में कुछ और, और दिखा कुछ और रहे हैं, मुझ से नहीं हो पाएगा"।

साची अपनी नजर चुराती हुई धीमे स्वर में बोली…. "खाना खा लो"

अपस्यु:- अभी भूख नहीं लगी है बाद में खा लूंगा…

साची:- अभी खाने में क्या परेशानी है…

अपस्यु, हंसते हुए:- इतनी जल्दी खाऊंगा तो रात को दोबारा भूख लग जाएगी।

साची:- थोड़ा एक्स्ट्रा खाना लाई हूं, बाद में भूख लगे तो खा लेना।

अपस्यु:- एक्स्ट्रा तो तब समझूंगा ना जब तुम मेरा डाइट जानती हो।

साची, मुस्कुराती हुई… अभी खाना खा लो, तो डाइट भी जान जाऊंगी।

अपस्यु, कुछ सोचते हुए कहने लगा… "नहीं तुम चली जाओ, मैं बाद में खा लूंगा"

साची उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करती हुई कहने लगी… "खा लो मैं यहीं हूं"।

फिर से अपस्यु का यही जवाब आया,"मैं बाद में खा लूंगा"। किंतु इस बार साची उसे आंख दिखाती हुई कहने लगी… "बस कोई बहस नहीं, चुपचाप खाओ"… अपस्यु बेड को हल्का फोल्ड करते हुए टेक लगाया, तबतक साची ने आलू के पराठे थाली में लगा दिए। थोड़ी परेशानी के साथ वो अपना हाथ आगे बढ़ा कर निवाला लेने कि कोशिश करने लगा।

साची को समझ में आ गया कि क्यों अपस्यु उसे जाने के लिए कहा। वो अपनी परेशानी जाहिर नहीं होने देना चाह रहा था। साची उसकी कलाई पकड़ कर निवाला अपने हाथो में ली और अपस्यु के मुंह की ओर बढ़ा दी। दोनों एक दूसरे का चेहरा बड़े प्यार से देख रहे थे, मानो नजरें कुछ कह रही हो । और साची बिना पलकें झपकाए, नजरों से नजरें मिलाए अपस्यु के ओर निवाला बढ़ाए जा रही थी।

खामोशी के कुछ पल थे और दोनों बड़े सुकून से एक दूसरे को देखे जा रहे थे, तभी गले की खराश की आवाज़ ने दोनों का ध्यान भंग किया। दोनों ने जब लावणी को देखा तो हड़बड़ा गए और जो वो कर रही थी उसे देखकर तो साची शर्मा कर भाग ही गई। दरअसल साची जब बिना पलकें झपकाए अपस्यु को निवाला बढ़ा रही थी तब निवाला मुंह के बदले नीचे गिर रहा था। लावणी ने जब ऐसा होते देखा तो वो नीचे थाली लगा कर वहीं बैठ गई।
:superb: :good: amazing update hai bhai,
ye love birds to pyar ki gahrai mein doobate chale ja rahe hain
 

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खामोशी के कुछ पल थे और दोनों बड़े सुकून से एक दूसरे को देखे जा रहे थे, तभी गले की खराश की आवाज़ ने दोनों का ध्यान भंग किया। दोनों ने जब लावणी को देखा तो हड़बड़ा गए और जो वो कर रही थी उसे देखकर तो साची शर्मा कर भाग ही गई। दरअसल साची जब बिना पलकें झपकाए अपस्यु को निवाला बढ़ा रही थी तब निवाला मुंह के बदले नीचे गिर रहा था। लावणी ने जब ऐसा होते देखा तो वो नीचे थाली लगा कर वहीं बैठ गई।

एक बार जो साची ने दौड़ लगाई फिर सीधा अपने कमने में जाकर रुकी। पीछे से लावणी भी पहुंची, कई बार उसके कमरे के दरवाजे को खटखटाई, आवाज़ भी दी किंतु साची समझती थी कि उसे लावणी के द्वारा छेड़ा जाना है इसलिए दरवाजे पर आकर सिर्फ इतना ही कही की आज दरवाजा नहीं खुलेगा।

काफी खुश लग रही थी और इसी खुशी को प्रत्यक्ष दर्शाती उसने सबसे पहले तो एक मधुर संगीत बजाया…

पल भर ठहर जाओ, दिल ये संभल जाए
कैसे तुम्हें रोका करूँ,
मेरी तरफ आता हर ग़म फिसल जाए
आँखों में तुम को भरूं, बिन बोले बातें तुमसे करूँ
गर तुम साथ हो, अगर तुम साथ हो..

फिर अपनी दोनों बाहें फैलाए गोल-गोल घुमाती वो बिस्तर पर जा गिरी। दोनों बाहें फैलाए, आखें खुली छत को निहारती, सासें मध्यम-मध्यम और अंदर एक खुशनुमा एहसास जिसमें वो अपस्यु के ख्यालों में डूबी रही। उसे याद करते-करते फिर दिल में मीठी चुभन का वो एहसास…. "उफ्फ !!! कितने प्यारे हो तुम"।

साची अपनी खुशी बांटना चाह रही थी और इसी क्रम में उसने अपना लैपटॉप खोला और एफबी में किसी को खुशी कि ढेर सारी स्माइली पोस्ट करके उसके संदेश वापस आने का इंतजार करने लगी।

तकरीबन 2 मिनट बाद… संदेश वापस आया…

_____________________________________________

Crazy boy:- Kya baat hai, itni jyada khushi. Feeling horney kya ???

Unknown girl (Sachi ki fake id name):- nope duffer, I think I am in love ???

Crazy boy:- Oh my god !!! Waise ladke se hi pyar hua na ??

Unknown girl :- ????

Crazy Boy:- ???

Unknown Girl:- ????

Crazy Boy :- Ok Solly to humari unknown madam ko kisi se pyar ho gaya hai

Unknown Girl:- Yassssssssssss Woohooooooo.. ☺☺☺ m very excited crazy boy..

Crazy Boy:- excited ho to X-chat karen kya (X-chat=sex chat)

Unknown Girl:- Huhhh !!! ???

Crazy Boy:- Ab kya hua ???

Unknown Girl:-Tumhare sath Q karun X-chat.

Crazy Boy:- Mere sath hi to karti thi tum X-chat. Bhul gayi kya.... "oh I am feeling horney, chalo kuch dhamal karte hain"

Unknown Girl:- Tab main relationship me nahi thi aur apni fantasy jine ke liye puri azad thi. Lekin ab main relation me hun.

Crazy Boy:- Hmmm !! Samjh gaya. Matlab tum mujhe bye-bye kahne aayi ho.

Unknown Girl:- kya main kewal X-chat hi tumhare sath karne aati thi aur bhi to baten hua karti thi..

Crazy Boy:- Kab ??? Upar ke chat dekh lo tum… jab bhi aayi ho bas itna hi… feeling horney.. feeling horney.. feeling horney… wo main hi to hun jisne har bar tumhare horney feeling ko apne typing ke dum par orgasms me badla hai.

Unknown Girl… Aukkat mat bhulo tum… virtual friend ho virtual friend ki tarah behave karo, jyada close hone ki jaroorat nahi hai.

Crazy Boy:- Anjaan hi sahi par 2 salon se lagatar hum jisse baat karte hain unke sath bounding ho hi jati hai. Sorry mujhe aaena dikhane ke liye. Tum ek raat aati aur 10 raten gayab ho jati, lekin main har raat tumhara jag kar intzar karta. Kewal is khyal se ki kahin main so gaya aur tum aa gayi, to jo ek mauka mila tha itne dino me, wo bhi hath se gaya aur na jane agla mauka kab mile. Thank you so much… Byeeeee..

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इधर उसने बाय कहा और उधर साची अपनी लैपी बंद करती हुई कहने लगी… "हुंह, बड़ा आया"… और फिर आराम से लेट कर, अपस्यु को याद करती, सात रंग के सपनों में खो गई।

जब से सुबह हुई, वो चहकती हुई इधर से उधर कर रही थी। कान बस अपनी मां के उस आवाज़ को सुनने के लिए तरस रहे थे जब अनुपमा उससे कहती की "बेटा उसे भी खाना देकर अा"…

इंतजार के बाद वो वक़्त भी अा ही गया जब अनुपमा उसे टिफिन देती हुई बोली… "जा उसे भी खाना दे अा"… अभी के लिए तो वो अपनी बाहर की उड़ान को अपने दिखावे के चादर तले ढक कर रखी थी, लेकिन जैसे ही वो अपार्टमेंट के लिफ्ट में पहुंची, बाहर से भी उतावली नजर आने लगी।

चहकती हुई वो अपस्यु के फ्लैट के ओर बढ़ रही थी, किंतु दरवाजे के निकट पहुंचने से पहले उसने एक बार फिर अपने अपने ऊपर एक दिखावा का चादर चढ़ाया और अपने हाव भाव को ठीक करती वो बेल बजाने लगी। दरवाजा खुला और साची अंदर।

दरवाजे के पास ही खड़ी होकर उसने एक पूरी नजर अपस्यु को देखा। उसका दिल किया की अभी उसके बगल में लेट कर उसे बाहों में भर लूं, लेकिन खुद के अंदर की झिझक और पहले अपस्यु के पहल के इंतजार ने उसके भावनाओ को बांधे रखा।

लेकिन वो होता है ना.. मन में किसी के लिए प्यार बसा हो या फिर नफरत चेहरे से समझ में आ ही जाती है, ठीक वही हो रहा था साची के साथ। लाख वो खुद के बंधे रखी थी किंतु उसके चेहरे की रौनक आज इतनी अलग थी कि अपस्यु दूर से ही उसे भांप गया।

एक बार फिर नजरों से नजरें मिलनी शुरू हुई लेकिन इस बार अपस्यु ने साची को यह कहकर जाने के लिए बोल दिया कि उसके कॉलेज जाने में देरी हो रही है। साची यूं तो जाना नहीं चाहती थी लेकिन रुक भी नहीं सकती थी। क्या कहती, तुम मुझे पसंद हो और मुझे तुम्हे छोड़ कर जाने का मन नहीं। दुविधा और विरोधाभास के साथ साची केवल ये सोच कर निकल गई की शाम को अाकर अच्छे से मिलूंगी।

साची के जाते ही अपस्यु, आरव से बात करना शुरू कर दिया। मामला ये था कि जब साची पहुंची उससे थोड़े समय पहले ही आरव ने कॉल लगाया था। अभी वो अपस्यु से उसके तबीयत की जानकारी लिया ही था कि साची अा गई जिस वजह से दोनों को बीच में ही बात रोकनी परी।

आरव:- कहे भगा दिया इतनी जल्दी बेचारी को..

अपस्यु:- कुत्ता कहीं का, तुझे जरा भी संस्कार नहीं। क्या तुझे पाया नहीं की, दूसरों की ना तो बातें सुनी जाती है और ना ही वो क्या कर रहे है उसे देखने में कोई रुचि होनी चाहिए। साला मनहूस कहीं का, मेरी खुशियों पर ग्रहण लगाए बैठा है। चुपचाप वहीं रुक और इंतजार कर, मैं किसी को कॉल करूंगा तो वो तुम्हारे पास 120 करोड़ पहुंचा देगा। फिर आगे क्या करना है वो मैं तुम्हे बाद ने बताऊंगा। चल अब फोन रख।

यदि बात करते-करते बातों में अचानक बदलाव अा जाए फिर चाहे बदलवा नफरत भड़ा हो या प्यार भड़ा, ये संकेत होता है कि कुछ गड़बड़ है। फिर उनके अपने डिकोडिंग के तरीके थे, जैसे कि अपस्यु का कहना .. "दूसरों की बातें सुनना और उनको देखने में रुचि दिखाना".. मतलब ये था कि कोई देख भी रहा है और सुन भी रहा है।

और बस संकेत को समझते ही आरव तुरंत ही कॉल डिस्कनेक्ट कर सीधा बाथरूम पहुंच गया और कानों में एयरपो्ट लगाकर अपस्यु को कॉल मिलाया और साथ ही अपना मैसेंजर खोल लिया….

अपस्यु:- 2 लोग तुझे देख और सुन रहे है।

आरव संदेश भेजते हुए… "ठीक है, लोकेशन बता"

अपस्यु:- एक तेरे लेफ्ट विंडो से 22 डिग्री नॉर्थ.. तकरीबन 400 मीटर की दूरी पर, पहाड़ पर बने एक झोपड़ी से नजर दिए है। दूसरा वेस्ट में, तकरीबन 500 मीटर की दूरी पर, एक हॉल्ट स्टेशन की छत से तुझ पर नजर बनाए है। दोनों के
स्नाइपर रायफल वैपन ड्रागुनोव एस वी डी 7.62।

आरव:- ठीक है होलोग्राम इमेज क्रिएट कर, बाकी मैं इनका बंदोबस्त करता हूं।

अपस्यु:- वैसे कौन सा वैपन तुझे वहां डिलीवर हुआ है?

आरव:- SVLK-14S “Twilight” .408 Cheytac और एक Glock 17 Pistol

अपस्यु:- ठीक है तू चकमा देकर बाहर निकल वहां से, लेकिन याद रखना की उस रिजॉर्ट के कुछ लोग उनके खबरी भी हो सकते है। बाकी मै पूरी नजर बनाए हुए हूं।

आरव:- ठीक है भाई, अब तू बस देखता जा…

अपस्यु वहां पर लगातार नजर बनाए हुए था। आरव के कहे अनुसार अपस्यु ने होलोग्राम इमेज क्रिएट कर सब सेट कर चुका था। आरव अपने साथ लाए रिफ्लेक्टर डिवाइस को वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) से कनेक्ट कर दिया। अब आरव का प्रतिबिंब पूरे कमरे में इधर से उधर भटक रहा था। इधर बाथरूम में ही आरव ने अपने हुलिया में थोड़ा बहुत बदलाव किया और रेंगते हुए दरवाजे से बाहर निकला।

आरव सबको चकमा दे कर बाहर आ चुका था। उसने किराए की कार को स्टार्ट किया और बड़े ही सावधानी से ठीक उस शूटर के लोकेशन के पीछे पहुंच गया जो पहाड़ पर बने एक झोपड़ी से उसपर नजर दिए हुए था… आरव अब घूमकर ठीक उसके झोपड़ी के पीछे पहुंच चुका था और फुर्ती दिखाते हुए पीछे से ही झोपड़ी के अंदर प्रवेश किया..

जबतक वो शूटर स्कोप से अपनी नजर हटा कर हरकत में आया, तबतक आरव की पिस्तौल उसके कनपटी पर लग चुकी थी। आरव ने उसे कुछ ना बोलने का इशारा कर, उसके जेब से फोन लिया और उस पर चल रहे कॉल को डिस्कनेक्ट कर दिया।

शूटर:- तुम्हे क्या लगता है उन्हें पता नहीं चला होगा। मैंने कोई आवाज़ नहीं की पर तुम जो ये तोड़ते-फोड़ते अंदर घुसे हो, क्या उसकी आवाज़ उन तक नहीं पहुंची होगी…

तभी सायलेंसर में दबी गोली चलने की आवाज और आरव हंसता हुआ… "जब जान पर बन आती है तो ऐसे ही कहानियां बनने लगते है। जब उनसब का नंबर भी अा ही रहा है, तो मुझे क्यों इस बात की फ़िक्र की उन्हे शक हुआ या नहीं हुआ। उन्हें पता चला या नहीं चला.. ट्रिगर दबाव खेल खल्लास, अब अगले का नंबर आने दो"
Wow bhai ye aarav to aaj full shikar karne ke mood mein hai,
aur apasyu yahin se uska maargdarshan kar raha hai
 

aman rathore

Enigma ke pankhe
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Update:-16


तभी सायलेंसर में दबी गोली चलने की आवाज और आरव हंसता हुआ… "जब जान पर बन आती है तो ऐसे ही कहानियां बनने लगते है। जब उनसब का नंबर भी अा ही रहा है, तो मुझे क्यों इस बात की फ़िक्र की उन्हे शक हुआ या नहीं हुआ। उन्हें पता चला या नहीं चला.. ट्रिगर दबाव खेल खल्लास, अब अगले का नंबर आने दो"

"अबे !!! पूरा कान सुन कर दिया। तू चाहता क्या है"… थोड़ा डर और गुस्से के बीच, निकली उस शूटर की आवाज़।

आरव:- आज मेरा मूड बहुत अच्छा है इसलिए तुझे मारने से पहले सोचा तुझ से कुछ बाते कर लूं। वैसे नाम क्या है तुम्हारा और शूटिंग में कौन से झंडे गाड़े है वो बता।

शूटर:- मेरा नाम वीरभद्र सिंह है, उदयपुर से हूं। मैंने शूटिंग में प्रशिक्षण लिया है और ये मेरा पहला काम था। लेकिन मैं अभी ये सोच कर परेशान हूं की तू वहां भी है और यहां भी, ये कैसे संभव हुआ।

आरव अपना पिस्तौल पीछे कमर में खोंसकर उसेके सिर पर एक हाथ मारते बोला… "अभी मैं बात करना चाह रहा हूं ना, तो मेरे बातों का बस जवाब दे। गोली मार दी हुई होती, तो साले सस्पेंस में ही मर जाता"

मौका अच्छा था, वीरभद्र ने जैसे ही देखा पिस्तौल उसने पीछे रख लिया, फुर्ती दिखाते उसने अपनी पिस्तौल निकाल ली और सर पर तानने की नाकाम कोशिश। जैसे ही वो अपना हाथ घुमाकर आगे के ओर लाया, आरव ट्रिगर में फंसे उंगली को हल्का ऊपर की ओर मोड़ दिया, दूसरे हाथ से एक धारदार खंजर उसके गले पर रखकर…

"अभी मैं अपना हाथ का दवाब थोड़ा और बढ़ा दूं, तो एक तरफ तेरी ट्रिगर दबाने वाली उंगली ऐसे टूट जाएगी की फिर तू नकारा हो जाएगा। और कहीं ये वाले हाथ का दवाब बढ़ा दिया तो तेरे आगे स्वर्गवासी का टाइटल लग जाएगा। जल्दी बता कौन सा ऑप्शन तुझे पसंद आया"

वीरभद्र:- इनमें से कोई नहीं। बात करते हैं ना।

आरव उसके हाथ से पिस्तौल लेकर इतने तेजी के साथ पिस्तौल के एक-एक पुर्जे को अलग किया कि वीरभद्र अपनी आंखें चौड़ी कर बस देखता ही रह गया। उसने अपने दोनो हाथ जोड़ कर उसे नमन करते हुए पूछा… "देखने में लड़के जितने और अंदर ऐसी क्षमता। आज से आप मेरे गुरु और मैं आप का चेला, प्रभु।

आरव:- अब जाकर तूने कुछ ऐसा कहा जो मेरे कानो को पसंद आया है। अब जरा जल्दी-जल्दी में बक की तुझे यहां किसने भेजा और तुझे कौन सा काम सौंपा गया था?

वीरभद्र:- मुझे और मेरे साथ एक और शूटर, जिसे मैं जानता नहीं, उसे विधायक भूषण जी ने भेजा है। मेरा काम बस आप के कमरे में नजर बनाए रखना था और पल-पल की खबर विधायक जी को देनी थी।

आरव:- पल-पल की खबर.. अबे ये बता तू पल-पल की खबर के लिए ये फोन लाइन हमेशा चालू रखेगा, तो तेरी फोन कि बैट्री ना डिस्चार्ज होगी। और क्या वो इतना फुर्सत में है कि पूरा दिन तुझे सुनता रहेगा।

वीरभद्र अपना फोन बाहर निकाला और साथ में बैग खोलकर बैट्री चार्ज करने की व्यवस्था दिखाते हुए कहने लगा.. "भाई 5 पॉवरबैंक अपने साथ लाया हूं और उधर विधायक चाचा थोड़े ना कान लगा कर सुन रहे हैं। वहां एक लड़का है जो हमेशा हमे सुनता रहता है। कोई इमरजेंसी वाली बात हो तो वो विधायक चाचा से बता देता है"।

आरव:- वह !! शाबाश !! क्या उम्दा टेक्नोलॉजी है। वैसे ये विधायक, चाचा कब से हो गए रे।

वीरभद्र:- वो मेरे दूर के रिश्तेदार हैं और उन्होंने ही मेरे प्रशिक्षण का पूरा खर्चा उठाया था।

आरव:- मदर*** हरामि.. मतलब तुझे शूटर बनाया उसने और कुछ पढ़ाई लिखाई भी करवाई है या नहीं।

वीरभद्र:- अरे पढ़ाई लिखाई करके क्या करेंगे गुरुदेव। अंत में तो पैसे ही कमाने है, और देखो, इस काम के लिए उन्होंने मुझे 1 लाख रुपए भी दिए है।

आरव:- हम पंछी एक ही वृक्ष के है बस डाल अलग-अलग। अच्छा सुन तुझे कभी ये नहीं लगा कि तू अपने ज़िन्दगी में कुछ अच्छा भी कर सकता था।

वीरभद्र:- मै इससे भी अच्छा क्या करता?

आरव:- साले पूरा गोबर ही हो। अबे 1 लाख के लिए यहां अा गया और मैंने तुझे गोली मार दी होती तो क्या वो 1 लाख अपने छाती पर लाद कर ले जाता। तुझे इतनी भी समझ नहीं की वो तुझे मारने के लिए यहां भेजा है।

वीरभद्र:- अपने को काम चाहिए बस, इतना नहीं सोचता। आपने धोका दिया वरना मेरे निशाने पर तो पहले आप ही थे। अब बताओ की कौन मरता और कौन मारता।

आरव:- बस बहुत हुआ.. तुझ से बात करूंगा तो मेरा भेजा फ्राई हो जाएगा। ये बता मेरे लिए काम करेगा।

वीरभद्र:- आप मुझे गद्दारी करने के लिए कह रहे है।

आरव:- मैंने गोली चलाई और तू मर गया यानी तेरी पिछली जिंदगी भी उसी के साथ मर गई। अब मैंने तुझे जिंदगी बक्शी तो इस हिसाब से तू किसका वफादार हुआ।

वीरभद्र:- हां ये तो मैंने सोचा ही नहीं। बिल्कुल गुरुदेव अब से मेरी वफादारी आपकी, जबतक की मैं मर ना जाऊं।

आरव:- फ़िक्र मत कर तुझे हम मरने नहीं देंगे। अच्छा ये बता तूने अबतक कोई मज़े किए हैं कि ना किए।

वीरभद्र:- कैसे मज़े..

आरव:- अरे वही छोड़े, लड़कियों के साथ मज़े..

वीरभद्र शर्माते हुए… जी नहीं गुरुदेव अब तक तो मैंने किसी को छुआ तक नहीं

आरव:- पहले तो तू ये गुरुदेव बुलाना बंद कर, मेरा नाम आरव है। और हां आज रात तू तैयार रहना..

वीरभद्र:- किसलिए गुरुदेव.. अरे माफ़ करना. किसलिए आरव.. किसी को मारना है क्या…

आरव:- नहीं रे भोले.. तुझे मज़े के लिए तैयार रहने कह रहा हूं। फिलहाल चल जरा उस दूसरे शूटर से भी हाय-हेल्लो कर आते हैं।

वहां से निकलने से पहले आरव ने वीरभद्र से कॉल लगवाया और बहाने बनवाते हुए कहलवा दिया कि, "बिल्कुल सुदूर इलाका है नेटवर्क आते जाते रहता है, अपने लोकेशन पर हूं और मेरे ठीक सामने टारगेट है"। फिर वहां से निकलकर वो लोग चढ़े उस हल्ट स्टेशन की छत पर।

ये वाला शूटर थोड़ा अनुभवी और ढिट भी था। तकरीबन 22 हत्याएं कर चुका था और जमील का खास पंटर था। आरव ने उसे 10 करोड़ के डील पर सेट किया और 5 करोड़ एडवांस में दे दिए। चूंकि इस शूटर पर यकीन नहीं किया जा सकता था इसलिए आरव ने चुपके से उसके गन में एक छोटा सा जीपीएस यंत्र और साथ में एक माइक्रोफोन चिपकाकर वीरभद्र के साथ वापस लौट आया।

रिजॉर्ट लौटकर वीरभद्र कुछ सोचते हुए आरव से कुछ पूछने कि कोशिश करता है लेकिन आरव उसे चुप रहने का इशारा कर अपने साथ लाए कुछ यंत्र बैग से निकालने लगा। बिल्कुल छोटे और मक्खी के अाकर का माइक्रो डिवाइस जो देखते ही देखते उड़ कर वहां से गायब हो गई और थोड़े देर बाद तकरीबन 50 से ऊपर वैसी ही मक्खियां वापस लौट आई जिसे आरव ने एक छोटे से बॉक्स में पैक करके चार्ज होने के लिए छोड़ दिया।

ये वही डिवाइस थे जो अपस्यु के वीपीएन से कनेक्ट था और पूरे चप्पे चप्पे पर वो इसी से नजर बनाए हुए था। आरव डिस्चार्ज हुए डिवाइस को चार्ज में लगा चुका था और उसकी जगह बैकअप डिवाइस छोड़ चुका था।

आरव:- हां भाई वीरे अब बताइए क्या पूछ रहे थे।

वीरभद्र:- भाई यही सब पूछने कि कोशिश कर रहा था कि आप कर क्या रहे हो।

आरव:- कुछ नहीं बस मक्खियां उड़ाने का शौक है वहीं पूरा कर रहा था। चल अब जरा तफरी कर आया जाए। और हां साथ में वो दूसरा बैग भी लेे लेना।

वीरभद्र:- इसमें क्या है आरव..

आरव:- कुछ और छोटे बड़े कीड़े, इन्हे जरा बाहर इनकी सही जगह छोड़ आऊं।

आरव वीरभद्र के साथ निकाल गया। इधर अपस्यु भी थोड़ा निश्चिंत मेहसूस करते हुए अपने बदन की जांच करके देखने लगा। पसलियां जुड़ना शुरू हो चुकी थी। हाथ की हड्डी भी लगभग जुड़ने को अाई थी। दिक्कत बस पाऊं की हड्डियों में था, शायद पाऊं की हड्डी जुड़ने में अभी कुछ दिन और लगने वाले थे।

लगभग सुबह के 11 बजे होंगे जब सभी न्यूज चैनल के ब्रेकिंग न्यूज में एक ही समाचार अा रहा था… "नागपुर के पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री त्रिवेणी शंकर का हार्ट अटैक से निधन, पूरे देश में सोक कि लहर"… अपस्यु इस खबर को देख कर मुस्कुराया… "वह रे पैसा तू कुछ भी करवा सकता है".. अपस्यु इस खबर पर मुस्कुरा ही रहा था कि तभी उसके फोन की घंटी बजने लगी… "मुझे उम्मीद ही थी इसकी"

अपस्यु, अपना कॉल उठाते… "जी सर मैंने खबर देख लिया, लेकिन अभी तक वन डाउन ही हुआ है, दूसरे की खबर कब सुना रहे"…

जमील:- दूसरा कोई राह चलता आदमी नहीं है, उदयपुर का सीटिंग एमएलए और राजस्थान का शिक्षा मंत्री है, थोड़ा वक़्त चाहिए होगा इसके लिए।

अपस्यु:- चलो ठीक है दिया वक़्त, लेकिन ये तो बताओ कि उस पूर्व केंद्रीय मंत्री को उड़ाया कैसे।

जमील:- देख छोटे ये धंधे के राज तो मैं अपनी बीवी को नहीं बताता इसलिए इसका जवाब मै नहीं दे सकता। बस तू काम होने से मतलब रख। जो जिस हैसियत का है, उसकी मौत उतने ही सन्नाटे में, बिना किसी शक के होगा।

अपस्यु:- चलो नहीं पूछता मैं धंधे कि बात लेकिन जल्दी से बचा काम कर दो और अपने पैसे लेकर जाओ।

जमील:- देख अब हम पार्टनर हो गए हैं तो एक दूसरे पर भरोसा करते आना चाहिए इसलिए मैं चाहता हूं कि तू वो बाकी के पैसे मुझे देदे।

अपस्यु:- हाम्म, ठीक है कुछ वक़्त दो मै इसपर सोच कर बताता हूं।

अपस्यु उससे बात ख़त्म कर जोर जोर हंसने लगा और फिर पूरी ताकत झोंक दी अपनी आवाज़ में….

व्यापार में फसे या गलत कारोबार में फसे
जहां घिरे वहीं फसे, फसे तो बस फंसते रहे
हर मोड़- मोड़, हर डगर- डगर

भंवर है ये भंवर- भंवर....​
:superb: :good: amazing update hai nain11ster bhai,
to ek wicket down ho gaya,
Aur agle ka bhi no. Lagne wala hai,
Iss bhanvar mein pata nahi aur kitne log utarne wale hain
 
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