Update:-26
उस गंदी बस्ती में प्रवेश करते ही चारों ओर अजीब सी बदबू और हर जगह कचरा फैला हुआ। अपस्यु और आरव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे उनका पैर जैसे स्थूल (भारी) परने लगे थे। एक-एक कदम आगे बढ़ाना मुश्किल हो रहा था।
जो बातें इस वक़्त आरव के दिमाग में चल रही थी वहीं बातें अपस्यु भी सोच रहा था। दोनों की आंखें डबडबाई सी थी बस आखों से आंसू छलकने बाकी थे। दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया हो। कुछ भी समझ पाना मुश्किल था। कुछ ही देर में दोनों भाई एक झोपड़ी के सामने थे। एक पुलिसवाले ने आवाज़ लगाई और दोनों मां बेटी दरवाजे पर खड़ी थी।
कुंजल तो उन दोनों को देख कर ही गुस्से में अंदर भाग गई, लेकिन उसकी मां यानी की दोनों भाई की आंटी नंदनी, बस एक झलक दोनों भाई को देखी और देखते ही पहचान गई। वो दोनो से लिपट कर ऐसे रोई, मानो वर्षों से ये आशु किसी के लिए बचा रखे हो। डबडबाई आखें तो दोनों भाई की थी लेकिन अपस्यु के आशु आखों में ही छलकते रहे और आरव फुटफुट कर रो रहा था।
उनलोगों को ऐसे देख पुलिसवालों को भी अपस्यु की बात समझ में अा गई थी। थानेदार ने अपस्यु के कंधे पर हाथ रखा और साथ चलने का इशारा किया। अपस्यु अपनी डबडबाई आखों को रुमाल से साफ करते हुए अपने आंटी से अलग हुआ। थोड़ी दूर चलने के बाद थानेदार ने अपस्यु को सरा मामला समझाते हुए हुए कहने लगा.…. "अपनी बहन में साथ अाकर अपनी रपट कैंसल करवाओ वरना शाम तक ये रिपोर्ट एसपी ऑफिस पहुंच जाएगी, फिर ज्यादा परेशानी होगी"।
अपस्यु उनके साथ कार तक आया और अपना डिक्की खोल कर कहने लगा… "सर आप का एहसान है मुझ पर। जितना आप की इक्छा हो उठा लीजिए।"… कार डिक्की में उस वक़्त कम से कम 30 लाख कैश थे। थानेदार को समझते देर नहीं लगी कि ये लड़का खुद इतनी आसानी से थाने क्यों आया। वो डिक्की बंद करते हुए सिर्फ इतना ही कहा.. "सिर्फ जुबान गंदी है लड़के, पर अपना दामन बिल्कुल साफ है। मैं नहीं जानता कि तुमलोग के परिवार के बीच क्या हुआ लेकिन इतना तो जरूर समझ में अा गया है कि तुम्हे अपने परिवार से कितना लगाव है"
जो आशु कहीं नहीं छलके वो थानेदार के सामने हाथ जोड़ कर अपने दोनो आखों से आंसू बहा रहा था। …. उसने अपना नंबर थानेदार साहब को दिया और वापस जुग्गी के ओर चल दिया।
लौट कर जब वो पहुंचा तब रास्ते में ही उसे कुंजल मिली जो बड़े गुस्से में कहीं जा रही थी। अपस्यु उसका रास्ता रोकते… "तुम्हारा गुस्सा जायज है, लेकिन बात करने से ही समस्या का समाधान होता है… भागने वाले हर वक़्त भागते ही रहते हैं।" …... "मैं कहीं भाग नहीं रही, अपने भतीजे के लिए ठंडा और नाश्ता का ऑर्डर मेरी मां ने दिया है उसे ही पूरा करने जा रही हूं।".. कुंजल फिर से गुस्से में अपनी प्रतिक्रिया दी।
जैसे 2 दोस्त गले में हाथ डाल कर साथ चलते हैं। ठीक वैसे ही अपस्यु, कुंजल के गले में हाथ डाल कर वापस घर के ओर ले जाने लगा। कुजल के आखों में आशु और गुस्सा दोनों थी, बस अंदर वो हिम्मत नहीं बची थी कोई विरोध कर सके। पूरी तरह टूट जाना जिसे कहते हैं वहीं स्थिति कुंजल की थी। जुबान से बस इतना ही निकल रहा था… "हमारा कोई नहीं, अपने ही अपनों को लुट लेते हैं, तुम सब बेईमान हो"…
अपस्यु उसके गले में हाथ डाले उसे कंधों का भी सहारा दे रहा था और दोनों वापस घर में लौटकर आए। अंदर आरव नीचे जमीन पर बैठा था और उसी के पास नंदनी रघुवंशी बैठकर, दोनों बातें कर रहे थे। अपस्यु ने कुंजल को जैसे ही छोड़ा वो बेसुध होकर रोते-रोते नीचे जमीन पर गिर गई।
नंदनी तुरंत उठकर अपनी बेटी के पास पहुंची और उसका सर अपने गोद में लेते हुए उसे चुप कराने लगी, लेकिन कुंजल के आशु थे कि वो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। तभी उस जुग्गी में अपस्यु की तेज आवाज गूंजी और वो जोर से चिल्लाकर कहने लगा…. "बस, बहुत हुआ, रोना बंद करो सब। पागलों की तरह कब से सब रोए जा रहे हैं। मुझे अभी बात करनी है, इसलिए सब बिल्कुल शांत।"
अचानक बदले माहौल को देखकर कुंजल उठकर बैठ गई। अपने आशु पोंछति …. "तुम चले ही क्यों नहीं जाते, सबकुछ भूलकर तो हम यहां जी रहे थे ना, फिर वो दर्द कुरेदने क्यों पहुंच गए?"
अपस्यु:- क्या दर्द तुम्हारे ही पास है, और दर्द है तो फासी लगा कर मर जाओ पर हर वक़्त दुख-दर्द के नाम पर सहानुभूति बटोरने की कोशिश न करो।
अपस्यु की बात सुनकर कुंजल लगभग शांत हो गई। नंदनी दोनों बच्चों के सर पर हाथ फेरती कहने लगी:- इनकी भी क्या गलती है कुंजल, बड़े लोगों के गलती का जिम्मेदार इन्हे क्यों ठहराना। लड़ाई तो उन दोनों भाइयों में हुई थी फिर तुमलोग क्यों आपस में लड़ रहे हो।
अपस्यु:- आंटी पहले मुझे आप ये बता दो कि कुंजल की तरह आप के मन में तो हमारे लिए बैर नहीं ना।
नंदनी की मुस्कान दर्द भड़ि थी, वो मुस्कुराती हुई कहने लगी… "पागल हो क्या? तुम्हारे मम्मी पापा से लाख बैर हो, बच्चों से कैसी बैर। तुम दोनों तो मेरे ही बेटे हो। 4 साल तक तुम दोनों को मैंने भी पाला है और अपने छाती से दूध भी पिलाई है। अपने बेटो के लिए कैसी बैर। और शायद तुम्हारे मम्मी-पापा को भी कुंजल से ऐसा ही लगवा होगा। हालांकि लगाव तो बड़ों में भी था बस कुछ गलतफहमी और थोड़ी लालच ने हमे अलग कर दिया।
अपस्यु:- जानती है, मां मुझ से जब भी मिलने आती थी तो एक ही बात कहती थी। तुझे मेरा नहीं नंदनी का बेटा होना चाहिए था। उनका मानना था कि आप कि समझदारी और सूझ-बुझ मुझ में अाई है। सुना था, लेकिन आज देख भी लिया। आप से मुझे बहुत कुछ सीखना है। लेकिन पहले मुझे ये बताइए दोनों भाई इतना प्यार करने वाले थे फिर आपस में गलतफहमी और लालच कैसे पैदा हो गई। क्योंकि हम दोनों में से किसी को पता नहीं कि झगड़े का मुद्दा क्या था और दोनों में इतनी भी क्या बैर की एक बार जो अलग हुए तो फिर कभी एक दूसरे की सुध तक ना ली।
नंदनी:- तुमलोग बहुत छोटे थे उस वक़्त और तुम तो यहां रहते भी नहीं थे सोनू। पहले सरा बिजनेस ज्वाइंट ही था तुम्हारे पापा का कारोबार फ्रांस में इनका कनाडा में। दोनों भाइयों में बिजनेस को लेकर कुछ मतभेद हो गया और ये चाहते थे कि दोनों अपने-अपने बिजनेस को अलग कर लें।
अपस्यु:- आंटी आप रोना बंद कीजिए और आगे बताइए।
नंदनी:- कुछ दिल के जख्म होते हैं जो आशुओं के रूप में छलक आते हैं। फिर उसके बाद तो हमारी दुनिया ही जैसे उजाड़ गईं। और एक के बाद एक घटनाएं होती चली गई।
आरव, अपने आंटी के आशु पोंछते….. "क्या हुआ आंटी, आप पूरी बात बताइए।"
कुंजल:- होना क्या था पूरी कंपनी तुम्हारे पापा ने हड़प लिया और जब मेरे पापा ने उनसे कॉन्टैक्ट करने की कोशिश की तो उन्होंने अपने ऑफिस से धक्के मारकर भगा दिया।
अपस्यु:- हैम्म ! इस वक़्त अंकल कहां है और मानस।
नंदनी:- कुंजल बेटा तू बाहर जाएगी क्या? 2 मिनट हमे कुछ बातें करनी है।
अपस्यु:- नहीं। कोई बीच का भेद नहीं। उसे भी जानने दीजिए ।
नंदनी:- नहीं बेटा। शायद वो बर्दास्त ना कर पाए।
अपस्यु:- वो उसे फैसला करने दीजिए। आप बस अपनी बात कहिए आंटी।