Motaland2468
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"पापा, कल गंगानगर जाना है" रात को जब हरीश खाना खा रहा था तो शामु पास बैठा बात कर रहा था।
"कोई काम है बेटा?" हरीश ने पूछा। जो वो कम ही पुछता है। क्यूकि शामु एक मेहनती लड़का है। सारी खेती संभाल रखी है। हरीश को तो समय ही नही मिलता दुकान से। पर कुछ दिन पहले ही शामु जाकर आया है इसीलिए पूछ रहा है हरीश।
"हां पापा, वो शेरा कुछ सामान लाने जा रहा है तो उसी के साथ जाना है"
"ठीक है चला जा। कार ले जाना, टायरो की अलाइनमेंट करवानी है"
शामु ने सोचा था अपनी बुलेट लेके जाएगा। पर ये और भी अच्छा हुआ। माया को धुप नही लगेगी ये सोचकर खुश हो गया।
"तो आप मोटरसाइकल ले जाना"
"ह्म्म्म, पैसे पड़े है अलमारी मे, कल लाया था, ले लेना"
"ठीक है पापा"
फिर हरीश उठ गया और कुल्ला करके बाहर चला गया। कभी कभी पड़ोसी महेंद्र के घर हुक्का पिने चला जाता है जब थकावट नही होती। सीता काम समेट रही थी। शामु अपने कमरे मे जाकर बैठ गया और मोबाइल चलाने लगा। कुछ देर में सीता ने सारा काम समेट लिया। हरीश भी वापस आ गया। सीता से थोड़ी बात की और सोने चला गया। सीता भी थोड़ी देर बाद कमरे में चली गई। कमरे की तरफ जाते हुए पता नहीं उसके अंतर मन में यह बात कैसे आई कि आज हरीश जल्दी नहीं सोएगा। आज वह कुछ बेचैन थी। कुछ अधूरा था जो उसके मन को चैन नहीं आने दे रहा था। पर कमरे में जाते ही उसकी उम्मीदें टूट गई। हरीश घोड़े बेचकर सो रहा था। सीता की आंखों से नींद कोसों दूर थी। वह भारी मन से बेड पर लेट गयी। नींद नहीं आ रही थी तो उसने सोचा क्यों ना मोबाइल के साथ दिमाग खपाया जाए। उसने मोबाइल उठाया और चलाने लगी। ना उसे कोई अनुभव था ना कोई खास रुचि थी पर समय काटने के लिए मोबाइल उठा लिया। जब कुछ खास करने को नहीं मिला तो उसने सोचा क्यों ना शामु को मेसेज किया जाए। क्या पता वह जाग रहा हो। तो उसने ऐसा ही किया
"सो गया?"
इस बार उसकी उम्मीद नहीं टूटी। शामु जाग रहा था। ओर ना ही उसने उत्तर देने मे कोई देरी की। क्योंकि आज से पहले कभी ऐसा हुआ भी नहीं था की इतनी रात को उसकी मां उससे बात करे।
"नही माँ, क्या हुआ?" शामु ने पूछा
"कुछ नही, नींद नही आ रही थी"
"पापा सो गए?"
"हां, खर्राण्टे बज रहे है उनके तो" सीता पहली बार इस तरह इमोजी का प्रयोग कर रही थी। शामु को अपनी माँ से इस तरह बात करना बहुत अच्छा लग रहा था।
"तो तुझे नींद आ जाती है क्या?"
" ईतने सालों में आदत हो जाती है"
"माँ, तेरे खर्राटे नहीं बजते क्या?"
"बदमाश, नहीं, नहीं बजते" सीता बहुत खुश थी कि कोई तो है जिसे उसकी कदृ है।
"मैं कैसे मान लूं?"
"मुझे तो लगता है तेरे बजते है"
" बिल्कुल भी नहीं माँ"
"अब मैं कैसे मानु बता?"
"आधी रात में मेरे कमरे में आकर सुन लेना बजे तो"
"ना बाबा ना मुझे तो डर लगता है रात को"
शामु को शरारत सूझी और उसने मजाक मे कहा
"तो फिर अपनी बहु से पूछ लेना"
इस बात से सीता की पीठ मे झुरझुरी हुई और साथ मे थोड़ी सी जलन का भाव भी आया जिसका भान सीता को नही हुआ, क्यूकि ये मजाक चल रहा था माँ बेटे के बीच मे।
" तु तो कह रहा था कि तू शादी ही नहीं करेगा"
"अब तुझे यकीन दिलाना है तो करनी तो पड़ेगी"
"ले, शादी कब हो और यकीन कब ये बता?"
शामु से रहा नही गया,थोड़ा हिम्मत करके बोला
"तो एक काम कर माँ, तू यही सो जा मेरे पास"
इस बात ने सीता को कंपकंपा दिया। जवान बेटा साथ मे सोने को कह रहा है। उसकी टांगे अपने आप ही आपस में रगड़ने लगी। गालों पर लाली आ गई और थोड़ा सा मुँह खुल गया, छाती तीव्र गति से ऊपर नीचे होने लग गयी। फिर भी उत्तर देना जरूरी था। सीता उनमे से नही थी जो मैदान छोड़ दे।
"अपनी बीवी को ही सुलाना अपने पास" इस बात पर शामु भी थोड़ा उत्तेजित हुआ। नाग ने फन उठाना शुरू कर दिया।
"लो माँ, खुद ही तो बोलती है शादी कब हो पता नही, फिर मत कहना मैने सबूत नही दिया"
सीता ने खुद को इस भावावेश से बाहर निकालने के लिए बात बदली
"मुझे नही चाहिये कोई सबूत, छोड़ ये सब, ये बता कल मेरे लिए क्या लेकर आएगा?"
"क्या चाहिए मेरी मां को?"
" मुझे नहीं पता अपनी पसंद से ले आना" नारी स्वभाव ने अपना स्थान ले लिया, और सीता एक नयी नवेली दुल्हन की तरह मांग करने लगी वो भी शर्माकर।
" अच्छा फिर सोचने दे"
"सोच सोच"
कुछ पल बाद शामु का मेसेज आया
"कुछ पहनने के लिए लादु?"
"क्या?"
शामु हिचकीचा रहा था, पर जवानी और उत्तेजना मे हिम्मत आ गयी
"घाघरा पहना है तूने कभी माँ?"
सीता के चेहरे पर मुस्कुराहट फैल गई। वह खुद को शामु द्वारा लाये गये घाघरा चोली में कल्पना कर रही थी। उसे पता था शामु ने सिर्फ घाघरा क्यू बोला और चोली क्यों नहीं , वह शर्मा रहा था। सीता उसकी शर्म ना बढ़ाकर सिर्फ इतना ही बोली
"ला देना, पर पहनने की उम्र गई मेरी"
" फिर क्या फायदा जब पहनना ही नहीं"
" बेटा समझा कर लोग क्या कहेंगे की देखो अब ये घाघरा चोली पहने घूम रही है, और तुझे लगता है तेरे पापा मुझे पहनने देंगे?"
सीता ने जब चोली शब्द लिखा तो शामु बहुत उत्तेजित हो गया। अब वह किसी भी हाल में सीता को मनाना चाहता था।
"पापा के सामने पहनने को कोन बोल रहा है?"
ये बात भी ठीक है। दुनिया के सामने ना सही घर मे तो पहन ही सकती है। अब जब बेटा इतना कह रहा है तो तू क्यू नखरे कर रही है। ये तो वेसे भी सारा दिन दुकान पर रहते है।
"तेरा सच मे मन है या एसे ही मेरा मन रखने की लिए बोल रहा है?" सीता ने आखिर बार पक्का करना चाहा।
"सच मे माँ, तू बहुर सुंदर लगेगी घाघरे चोली मे" इस बार कोई डर नही था। शामु को एहसास हो गया था कि उसकी माँ बुरा नही मानेगी। वेसे भी वह लगातार कल्पना कर रहा था कि वे दोनों अकेले है घर मे और सिता उसका लाया हुआ घाघर चोली पहने घर का काम कर रही है। उसके पके हुए आम अपनी छठा बिखेर रहे है।
बेटे द्वारा कहे गए शब्द सीता के कानो मे शहद घोल गए। वो बहुत कुछ कहना चाहती थी पर शायद कुछ रोके हुए था।
"सच मे?" सुंदर लगने की बात पर सीता ने पूछा।
"हां माँ, तेरे पास वो मोतियो वाली पायल है ना, वो भी पहन लेना उनके साथ, जब चलेगी का तो छन्न छन्न करेगी"
सीता फिदा ही हो गयी इस बात पर। अब केसे कोई रोक ले।
"तू ही पहना देना"
नाग देवता जाग चुके थे। उसे शांत करना जरुरी हो गया था। संयोग ही कहिये कि सीता को भी लगा कि अब सो जाना चाहिए।
"पहना दूंगा माँ, अपनी माँ को मैं अपने हाथो से पहनाऊँगा" क्या पहनाना होगा ये तो दोनों ही नही जानते थे अभी।
"मेरा बच्चा, अब सोजा, बहुत रात हो गयी है"
"ठीक है माँ, तू भी सोजा, बिना खर्राटे लिए"
"बदमाश"