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Thriller 100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)

nain11ster

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श्रावण मेला ।। भाग:-1







2 दिनो की लगातार छुट्टी के बाद मै वापस अपने किताब में खो गई, लेकिन इस बार मैंने किसी भी दिन नकुल को नजरंदाज नहीं किया. हर दिन मै उससे 2-3 बार तो मिल ही लिया करती थी. उसके साथ वक्त बिताना कितना आसान होता था. कभी वो मुझे चिढ़ाता तो कभी मै उसे और अक्सर ही हम दोनों मिलकर सबको चिढ़ाया करते थे...


लगभग 10 दिन बाद शावन की पहली सोमवार की ठीक एक रात पहले रवि का संदेश आया…. "बहुत दिनों से देखा नहीं है और बात भी नहीं की, एक बार शक्ल दिखाकर बात कर लो."


मैंने भी रिप्लाइ में अपनी एक पुरानी तस्वीर भेजते… "चेहरा देख लिए, अब 10 मिनट है तुम्हारे पास"..


रवि:- ऐसे नहीं आमने सामने फेस टू फेस..


मै:- क्यों, फिर तुम्हारी श्वांस अटकने लगी है क्या? देखो रवि अकेले में मुझे तुमसे डर ही लगेगा. मै प्रतियोगिता परीक्षा की तैयार कर रही हूं, और यहां लोग, बात करने का मतलब कुछ और ही निकाल लेते है… मै किसी स्कैम में फंसकर डायवर्ट नहीं होना चाहती..


रवि:- मै वादा करता हूं, तुम्हे जारा भी असुरक्षित मेहसूस नहीं होने दूंगा..


मै:- गांव में मै भी रहती हूं रवि.. शुरू शुरू मे लड़के दिखते बहुत सभ्य और संस्कारी जैसे है. लेकिन उनसे अकेले मिलने पर यदि वो कुछ गलत कर दे तो हम लड़कियां खुलकर विरोध भी नहीं कर सकती, ये बात तुम लड़को को भी पता होती है, इसलिए कुछ भी करने से पहले हिचक भी नहीं होती.. और एक बार तुम ऐसा कर भी चुके हो…


रवि:- मै तुम्हे पांचवीं क्लास से चाहता हूं, तुम्हारे 8th क्लास में पहुंचने तक मै 2 बात फेल होकर 8th में तुम्हारे साथ आ आ गया. मै तुम्हारे साथ गलत करने कि सोच भी नहीं सकता..


मै:- शायद 10 मिनट हो गए है… सॉरी रवि…


रवि:- इट्स ओके, कम से कम बात कर रही हो वहीं बहुत है… मैंने तुम्हारी तस्वीर डिलीट कर दी है….


उसके आखरी संदेश का जवाब देना मैंने जरूर नहीं समझा, लेकिन उसकी बातों से मै मुस्कुरा जरूर रही थी. 6 साल से मेरे पीछे रहा और मैंने कभी नोटिस भी नहीं किया, और ना ही उसने कभी जाहिर होने दिया. कुछ अच्छा जैसा मेहसूस हो रहा था, थोड़ा प्यारा और थोड़ा गुदगुदा सा एहसास. अच्छा ही था जीने में थोड़ा जायका मिल रहा था.


उफ्फ ये सावन का महीना और गांव की कच्ची-पक्की सड़क, छप-छप और किचोड़ों से भड़े परे. इसी के साथ 4 सोमवार का व्रत इस बार 5 शोमवार का था, ऊपर से 8 किलोमीटर दूर शिव जी विराजमान थे..


इस महीने की यही परेशानी रही है. कीचड़ और पानी से मन इतना किच-किच हो जाता की जी तो करता था कि एक महीना उसी गांव में रह जाऊं और चारो सोमवार समाप्त करके ही लौटू. सुबह से ही पुरा गांव मंदिर जाने को तैयार, हर किसी को भोला बाबा को जल जो ढारणा था.


वैसे इस महीने सोमवार की सुबह का आनंद ही कुछ और रहता है. मिश्रा टोला से तो जैसे रैली में गाडियां निकलती है… हमारे साइड से 6 घर और कम से कम 8 गाडियां, जो आगे जाकर फिर नहर के पास बसे 8 परिवार की गाड़ियां मिल जाती है.. वहां से भी कम से कम 12 गाडियां निकलती होगी.. 20 गाड़ियों का काफिला अपने आप में प्राउड टाइप फील करवा जाता है..


फिर तो ये काफिला गांव के सड़क से होते, कई अन्य टोला से गुजरते हुए मंदिर तक पहुंचता है. हां वो अलग बात है कि घर से तो चमचमाती गाडियां निकलती थी, किन्तु मंदिर पहुंचते-पहुंचते मिट्टी से सन जाते थे. 3-4 गांव के बीच का वो मंदिर था इसलिए मंदिर के पास बड़े से मैदान में श्रवानी मेला हर साल लगा रहता था…


मेले में तरह तरह झूले, कई सारी रंग बिरंगी दुकानें, आह वो ताजे जलेबी और सरसो के तेल में छने हुए कई तरह नमकीन.. देखकर ही मन प्रसन्न हो उठता. और गांव के जवान से लेकर बुड्ढों के आकर्षण का केंद्र वहां के रात का औरकेस्ट्रा. इस औरजेस्ट्रा की खास बात ये होती की मूंछ पर ताव दिए हर कंजूस अपनी तिजोरी खोल देता.


किसी ने 25000 दिए दान में तो कोई आगे बढ़ने के लिए 31000 चंदा दिया करता था. हर बार की तरह इस भी होड़ लगी हुई थी और सबसे ऊपर नाम था प्रवीण मिश्रा का.. प्रवीण मिश्रा उसी गिरीश के पिताजी थे, जिससे लगभग 2 लाख रुपए लूट ही लिए थे नीलेश और नंदू ने मिलकर, यदि मैंने टांग ना अड़ाया होता.


प्रवीण मिश्रा उस गांव के मुखिया और क्रिमिनल कहलाते थे. हालांकि मुखिया है तो आगे ज्यादा वर्णन कि तो जरूरत नहीं है, हां लेकिन पैसे और रुतबे में उस इलाके के ब्राह्मण परिवार में सबसे सुदृढ़ थे. बस हम उन्हे जानते मात्र थे, बाकी बहुत ज्यादा बातचीत नहीं थी इस परिवार से...


प्रवीण मिश्रा 2 लाख के दान के साथ पहले नंबर पर थे और दूसरे स्थान पर सदैव की तरह मुखिया चाचा, यानी कि ब्रह्मदेव मिश्रा 1 लाख 85 हजार के अनुदान के साथ और इसी के साथ सबसे आखरी नाम था माखन मिश्रा यानी कि नीलेश के पापा का जिसने 25000 का दान दिया था. इसके नीचे की राशि दान देने वालों का नाम नहीं लिखा रहता… पहले और आखिरी के बीच में 60 नाम लिखे थे..


ओह एक बात बताना ही भुल गई, केवल मिश्रा ही नहीं है इस गांव में और भी दूसरे कास्ट के लोग बसते है और हां कुछ को जबरन भी यहां पैसे देने पड़ते है. जैसे कि रवि के पापा, गंगा अग्रवाल, उसका फिक्स है जो पहले नंबर का दान देगा उसका 60% उन्हे दान देना ही है, वरना दुकान नहीं चलने देंगे.. सो उसका भी नाम था… इसी तरह पास के बाजार के कपड़ा व्यापारी कमलेश महासेठ उसे 50% का दान देना अनिवार्य था.


कुल मिलाकर 4 दिन के शो के लिए मेरे ख्याल से 25 लाख इन लोगों ने केवल नाम दर्ज वालों से इकट्ठा किया था और जो 25 हजार से कम वाले थे उनसे तो मेरे ख्याल से 10 लाख जमा कर लिए होंगे…


इन पूरे पैसों से 1 महीना के मेले का पूरा मैनेजमेंट चलता था. नो पुलिस, बल्कि अर्जी देकर सीआरपीएफ के जवान को बुलाया जाता था और दबी कुचली सी हालात में कुछ डरे हुए पुलिसवाले उसके पीछे खड़े होकर प्रबंधन का काम देखते थे..


बहरहाल अन्य साल की तरह इस साल का भी सबसे शानदार हाईलाइट वही औरकेस्ट्रा ही था और इस बार तो अदाओं से लुभाने आखरी दिन कुछ रसियन नृतकी भी आ रही थी.. आज पहली सोमवार को इस बार कीचड़ नहीं देखना परा। बल्कि भिसन गर्मी का सामना करना पड़ रहा था. सुबह के 8 बज रहे थे और ऐसा लग रहा था पसीने ने हालत खराब कर रखी है.. ओह वैसे आज मै साड़ी में थी और माते श्री की जिद पर मैंने ये पहना था…


आज से पहले मैंने कभी साड़ी नहीं पहनी थी, बस सावन आने वाला था और सोमवार का व्रत मै रखती हूं, इसलिए प्राची दी ने मेरे लिए सारी का पुरा सेट भिजवा दिया था. उनकी चॉइस वाकए कमाल की थी. मेरी बड़ी भाभी ने मुझे साड़ी पहनाया उसके बाद मै थोड़ा सा मेकअप करके जब आइना देखी तो खुद में शर्मा गई.


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साड़ी में अलग ही रूप खुलकर आ रहा था मानो अचानक मै बड़ी हो गई हूं. लग ही नहीं रही थी मै वहीं मेनका हूं. निकलने से पहले मैंने कुछ तस्वीरें अपनी ली और बाहर आ गई. लोगों की प्रतिक्रिया देखकर मै थोड़ा शरमा भी रही थी और चेहरे पर मुस्कान भी थी.


इसी क्रम में नकुल अचानक ही घर में आया. दरसअल मै पीछे मुड़ी हुई थी और वो चारो ओर देखकर मेनका दीदी, मेनका दीदी कर रहा था. उसकी बात सुनकर दोनो भाभियां हसने लगी और मै जब मुड़कर उसके सामने हुई तो वो मुझे देखकर चौंकते हुए कहने लगा… "मै तो बच्चा दिखने लगा इसके सामने".. उसकी बात सुनकर हम तीनों ही हसने लगे..


मै:- देख लिया हो तो वो काम भी बता दे जिसके लिए चिल्ला रहा था..


नकुल:- दादी, इसे सबके बीच में रखना आज तो पक्का इसे नजर लगने वाली है..


उसकी बात सुनकर मै मंद-मंद मुस्कुराने लगी. तभी छोटी भाभी टपक पड़ी… "पहली नजर कहीं तेरी ही ना कह जाए नकुल"..


मै:- आप लोग इतना छेड़ोग तो मै जा रही चेंज करने..


मां:- ना ना, कोई कुछ नहीं बोलेगा.. नकुल तू किस काम से आया था..


नकुल:- ओह हां ! मेनका दीदी वो तुम्हारी सहेली लता का कॉल मेरे पास आया था, उन्हें बात करनी थी आपसे और आपका नंबर बंद आ रहा था..


मै:- हां, चल हम साथ चलते है, ये लोग आते रहेंगे..


नकुल:- नाह ! तुम दादी के साथ ही आओ..


मै:- ऐसा क्या हो गया जो साथ नहीं ले जा रहा आज..


नकुल:- तुम्हे मेरे साथ देखकर लड़के जान बूझ कर आएंगे मेरे पास और उनकी हरकतें देखकर मेरा खून खौल जायेगा…


बड़ी भाभी:- और मेनका की जगह अपनी बीवी को ले जाता तब. उस वक़्त खून ठंडा करके निकलता क्या घर से..


"पागल हो गए है सब, जिसे जिसके साथ जाना है जाओ, मै बाहर ही खड़ा हूं"… नकुल अपनी बात कहते बाहर चला गया, मां और दोनो भाभियां उसे देखकर हसने लगी. मुझे लग गया इन हालातों में इनके पास रुकना खतरे से खाली नहीं क्योंकि इनका खरनाक वाला मज़ाक शुरू हो चुका था.


मै भी नकुल के पीछे ही आ गई और उसका हाथ पकड़कर कार तक ले गई… "तू चल मेरे साथ बाकी को आने दे. बहुत सी बात उन लोगों के सामने नहीं हो सकती"…


मै कार में बैठते ही…. "तूने किसी को मेरा परमानेंट नंबर तो नहीं दिया है ना"..


नकुल:- मै तुम्हारा दूसरा वाला नंबर किसी को ना दू, परमानेंट तो दूर की बात है..


मै:- अरे वो दूसरे नंबर को लगता है किसी ने बांट दिया था, मुझे वो सिम ही निकालकर फेकना पड़ गया.


नकुल:- जरूर तूने उस रवि को दिया होगा नंबर.…


मै:- हां दी तो थी.. सॉरी..


नकुल:- हां ठीक है मुंह मत लटकाओ, पहले लता से बात कर लो, और आइंदा संभल कर अपना नंबर देना…


हम धीरे-धीरे रॉ के साथ आगे बढ़ रहे थे. मै लता को अपने नए वाले दूसरे नंबर से कॉल लगा दी… वो भी तो गांव की ही थी. नया नंबर देखकर तो पहले 2-3 बार कॉल ही नहीं उठाई. जब मैंने अपना नाम मैसेज में भेजी, तब जाकर उसने कॉल उठाया और उठाते ही… "कहां हो, आजकल तो कॉलेज में तुम द्वितीय के चांद जैसा नजर आती हो"…




 

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श्रावण मेला ।। भाग:-2




हम धीरे-धीरे रॉ के साथ आगे बढ़ रहे थे. मै लता को अपने नए वाले दूसरे नंबर से कॉल लगा दी… वो भी तो गांव की ही थी. नया नंबर देखकर तो पहले 2-3 बार कॉल ही नहीं उठाई. जब मैंने अपना नाम मैसेज में भेजी, तब जाकर उसने कॉल उठाया और उठाते ही… "कहां हो, आजकल तो कॉलेज में तुम द्वितीय के चांद जैसा नजर आती हो"…


मै:- तुम्हारे ही गांव के रास्ते में हूं लता, पहुंच रही हूं…


लता:- हां मैंने भी यही जानने के लिए कॉल किया था, नीतू और मधु भी है अभी मेरे साथ..


मै:- हम्मम ! ठीक है मिलकर बात करती हूं…


मैंने कॉल रखा और दिमाग पर जोर डालने लगी. कुछ सोचती हुई नकुल से… "तूने रवि की जानकारी निकाली है ना"…


नकुल:- ये क्या पूछ रही है.. आज कल तुम कुछ अजीब सी बातें क्यों करने लगी हो.…


मै:- नकुल झूट मत बोल… ऐसा हो ही नहीं सकता कि मैंने तुझसे कहा हो की मेरी किसी लड़के से बातचीत हो रही है और वो मेरा दोस्त है, तो तू उसके बारे में जानकारी ना निकाले…


नकुल:- पागल, जासूसी किताब पढ़ रही है क्या आजकल?


मै:- नकुल अब बताएगा, या भाव खाएगा..


नकुल:- रवि को पहले से जनता हूं, बस थोड़ी सी डिटेल और कलेक्ट कर ली…


मै:- ऐसे मुंह लटका कर क्यों बोल रहा है… कुछ गलती हो गई क्या उससे बात करके? वो भी गांव का ही निकला क्या?


नकुल:- नहीं, वो बात नहीं है. उसका पूरा परिवार ही अलग है.. वहां 5 घर तो है वो लोग और इकलौता यही रवि है जो गांव में रह गया, वरना इसके परिवार के लोग अपने बच्चे को गांव में रखते ही नहीं है… रवि की एक छोटी बहन और उसका बड़ा भाई दोनो पटना मै है.. इसके चाचा के लड़के-लड़कियां भी सब पटना में है… देखा जाए तो ये लोग गांव और गांव के लोगो में रुचि ही नहीं रखते… दुकान इनकी इतनी बड़ी है कि 5 गांव में इनके ही परिवार का सप्लाई जाता है फिर भी बस रिश्ता दुकान तक ही कायम रहता है…


मै:- ओह ये बात है… और क्या पता किया..


नकुल:- रवि और उसका दोस्त पुनीत ये दोनो गांव में रहते है. पुनीत इसके यहां काम करने वाले एक पुराने स्टाफ का लड़का है.. दोनो दुकान के बाहर का थोड़ा बहुत काम देखते है और पुरा दिन दोनो रवि के रूम में रहते है. कुछ घंटे रवि अपने दोस्त के साथ चाचा के चाय नाश्ते की दुकान पर बैठता है और वापस फिर अपने कमरे में… इतना ही..


मै:- तभी उसके पास इतनी जानकारी रहती है, वहां के चारो ओर की..


नकुल:- ओह अब मै सब समझ गया… तुम्हारी सूचना का श्रोत वो रवि ही है ना..


मै:- किस्मत की बात है.. शायद वो ना होता तो बहुत कुछ समझ में ही नहीं आता.. खैर चल अब और एक बात मै कह देती हूं, अभी वहां चलकर यदि नीतू से मुलाकात हो तो अपना चेहरे की भावना बदलने मत देना… तुझे दुखी देखकर वो कामिनी खुश होना चाहती है, और ये मै होने नहीं से सकती…

कुछ ही देर में पूरा काफिला मंदिर में था. मै जैसे ही नकुल के साथ नीचे उतरी बहुत से लड़कों का ध्यान नकुल के ओर ही था. वो मुझे सीढ़ियों पर छोड़कर नीचे खड़ा हो गया. सुबह 7 से 10 महिलाओं के लिए यहां आरक्षित कर दिया गया था ताकि उन्हें पूजा करते वक़्त कोई परेशानी का सामना करना ना परे..


ऐसा नहीं था कि 10 के बाद कोई महिला पूजा करने जाए तो उसे अनदेखा कर दिया जाता था, बस कम से कम हंगामे के बीच ये सावन मेला समाप्त हो जाए उसका पूरा इंतजाम करके चलते थे…


मुझे आज पता नहीं क्यों अच्छा लग रहा था. खुद में लड़की होने वाली फीलिंग, जब लड़के पलट कर मुझे एक बार जरूर देखते और मेरी नजर बिना उनके ओर मुड़े, ये भांप लेती की वो लोग मुझे ही देख रहे है. आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था.


मंदिर के ऊपर जाते ही मुझे लता मधु और नीतू दिख गई. लेकिन मै उन तीनों को इशारे में इंतजार करने के लिए कही और खुद मंदिर जाकर पूजा करने लग गई. पूजा करके जब मै वापस लौटी तब वो तीनो सीढी के किनारे रेलिंग से टिककर खड़ी थी और मुझे आते देख इशारों में बुलाने लगी…


लता:- मेनका बात क्या है आज कल कॉलेज नहीं आ रही..


नीतू:- देह दशा देखकर समझ में नहीं आता कि आजकल मैडम का ध्यान कहां है. कितना भी पल्लू से क्यों ना छिपा ले, यौवन पर ये शरीर के हिसाब से आकर्षक निखार तो दिख ही रहा है… क्यों मेनका..


अपनी ही बात बोलकर, नीतू खुद ही जोर-जोर से हसने लगी. नीतू की बातों से उसके अंदर की जलन और गंदी मनसा की बू साफ छलक रही थी. जबकि हम चारो जब साथ खड़े थे, तब हर मनचलों का ध्यान एक टक नीतू पर ही बना होगा…


हम चारों में सबसे बड़े उरोज उसी के थे, जिसको वो काफी चालाकी से कुछ छिपा, तो कुछ दिखा भी रही थी. साड़ी उसके कमर से इतने नीचे पहनी हुई थी कि अपनी चिकनी और मस्तानी कमर से वो सबको लगभग लुभा ही रही थी. उपर से उसका मेकअप भी कम खतरनाक नहीं था, भले ही उसका रंग जरा सा मध्यम था लेकिन अपने यौवन का वो पूर्ण प्रदर्शन ऐसे कर रही थी कि लोग उसे ऊपर से लेकर नीचे तक देखे बिना नहीं रह पा रहे थे…


वैसे खुद कितनी बड़ी फ्रॉड है इसका पता तो वक़्त के हाथो में था कि कब इसका और इसके गैंग का पर्दा फाश करवा दे, लेकिन फिलहाल अभी वक़्त था एक करारा जवाब देने का, वरना मेरे जाते ही इसे हल्ला करते देर भी नहीं लगती की…… "देखी आज कल कहीं और ही गुल खिला रही है, तभी तो कुछ नहीं बोली. बड़ी ही शरीफ और मासूम बनती है"


मैंने भी पहले तो अप्रत्यक्ष रूप से ये बताया कि मैंने 11th में क्या क्या पढ़ा है और 12th का क्या-क्या पढ़ चुकी. फिर झटके में 11th का एक सवाल भी पूछ दी..


लता और मधु ने तो फिर भी बहुत कुछ बताया लेकिन नीतू मैडम चुप… फिर मैने बोलना शुरू किया..… "ऐसा है मेनका, ना मै तब नीतू थी जब क्लास में पहली बार आयी थी और ना ही मै आज नीतू हूं… देह दशा पर ध्यान देने की उनको जरूरत होती है, जिन्हे देह दशा दिखाने का शौक हो. मुझे अपने दिमाग को दिखाने का शौक है जिसमें तुम दूर-दूर कहीं नजर नहीं आओगी.. सो अपनी ये बकवास बातें उन दोस्तो के लिए बचा कर रखो, जो इमने रुचि लेती हो.


नीतू:- हुंह ! सच बात ऐसे ही कड़वी लगती है..


मै:- ही ही ही ही ही… वो तो तेरे अभी के चेहरे से और टेक्स्ट बुक के सवालों पर जब मुंह बनाए खड़ी थी उसी वक़्त समझ में आ गया था कि कितना कड़वा लग गया तुझे मेरी बात… क्या है ना नीतू अब हम सब है पढ़ने वाली और तुम मौज-मस्ती करने वाली, तुमने अपने सोच के हिसाब से मुझे देखा और मैंने तुम्हे अपने..


लता:- क्या बात कही है मेनका सोलह आने सच…


नीतू:- कहने का क्या मतलब है तेरा..


मधु:- ए नीतू तू इतना भड़क क्यों रही है… मेनका ने तो नहीं पूछा था कि तेरे कहने का क्या मतलब था, जबकि तू कितना घटिया बोल गई उसके बारे में. वही है जिसने तुम्हे छोड़ दिया और दोस्त समझकर बात मज़ाक में ले ली. यदि मुझसे कही होती ना तो मै चप्पल उतार कर मारती तुझे.. जा यहां से, बड़ी आयी गुस्सा दिखाने वाली..


ओ बेचारी का तो पोपट हो गया, और मेरे दिल को एक असीम सा सुख. मधु उसके जाते ही हम दोनों से पूछने लगी… "इतनी बड़ी फ्रॉड से तुम दोनो बात भी कैसे कर सकती हो. इसके साथ खड़े रहने में भी रिस्क है, आज कल इसी के किस्से तो पूरे गांव में मशहूर हो रहे"..


लता:- छोड़ ना हमे क्या, हमारे क्लास में है तो थोड़ा बात कर लेती हूं… वरना इसे कौन पूछता है…


मधु:- छोड़ उसे जाने दे, उसके साथ रहते तो वो साला ठरकी गिरीश और उसका पूरा चमचा हमे ही घूरता…


लता:- नहीं घूरता ना… एक मिश्रायन अपने साथ है और रिश्ते में उसकी बहन लगेगी… ही ही ही ही..


मधु:- ओह हां मै तो भुल ही गई थी… मेनका प्लीज हमारी बातो का बुरा मत मानना.. ही ही ही ही ही ही...

मै:- हां मार लो जूते भिगोकर. यहां खड़े रहकर ऐसे ही बात करते रहना है क्या या मेला भी घूमेंगे ?


मेरी बात सुनकर वो दोनो भी मेला घूमने के लिए 'हां हां' करने लगी.. हम तीनो ही साथ में मेला देखने के लिए निकल गए. हम तीनो को निशानेबाजी करनी थी, बंदूक से बलून फोड़ना था, लेकिन लाइन से लगी फुगगा फोड़ने की हर दुकान में आगे से इतने लड़के घेरे खड़े थे कि हमारी पास जाने की हिम्मत तक नहीं हो रही थी..


तभी मधु और लता ने उन लड़को की भीड़ में एक लड़के को आवाज़ दी… "ए मुकुंद इधर आ".. उस लड़के को देखकर ही मेरी हंसी निकलते-निकलते रह गई.. काफी छोटा था लेकिन पुरा दिल्ली रिटर्न..


दिल्ली रिटर्न हम अजीब से दिखने वाले लोगों को कहते है, जो गांव में खुद को मॉडल की तरह दिखाने की कोशिश करते है, मगर दिखते पुरा जोकर है. क्योंकि ऑन स्क्रीन ही किसी हीरो के खड़े लाल बाल अच्छे दिखते है रियल लाइफ में तो बस जोकर ही कह लीजिए...


मधु और लता उससे बात करके गन से फुग्गे फोड़ने के लिए जुगाड लगाने के लिए कहने लगी और वो अपने खड़े बाल खुजते हुए कहने लगा… "एक काम हो सकता है तुम दोनों किनारे वाला रायफल पकड़ लो, मै भिड़ और तुम्हारे बीच खड़ा हो जाता हूं…"


मधु:- हट तू किसी काम का नहीं है, वो देख आ गया हमारे काम का लड़का..


मधु इतना कहकर आवाज़ लगाने लगी… "रवि, रवि"… जैसे ही ये नाम मुझे सुनाई परी, मैं थोड़ा आश्चर्य करती देखने लगी. रवि पीछे से चला आ रहा था. "तुम इतनी भिड़ में उसे बुला रही हो, कोई कुछ अलग मतलब ना निकाल ले"… मै मधु को ऐतिहातन कहने लगी..


मधु:- हा हा हा हा हा.. पागल.. 60 के दशक में भी गांव में लोग अपने जानने वालों कि पुकार लेते थे, फिर ये तो मेरे साथ पढ़ता है. तू कौन से भ्रम में जी रही है मेनका…


इतना कहकर वो फिर से रवि को पुकारने लगी. बिल्कुल मतवाली चाल और इधर-उधर चारो ओर की दुकान को देखते हुए आ रहा था… "हां जी मधु जी, क्या मदद कर सकता हूं"


मधु:- रवि हम तीनो को शूटिंग करनी है…


रवि:- मेरे पास सस्ता डब्बा वाला फोन है मधु, इससे शूटिंग करना तो संभव नहीं है.


मधु:- भाव खा रहे हो..


रवि:- नहीं मज़ाक कर रहा था. रुको 2 मिनट मै अभी आया...


रवि जैसे ही दुकान के ओर बढ़ गया, मै लता और मधु को टोकते हुए कहने लगी... "ये भिड़ को कैसे हटाएगा?"..


लता:- हमे कहकर गया है ना 2 मिनट इंतजार करने, तो कर ले और मै क्या बोलूं की वो कर सकता है या नहीं, कुछ देर में अपने आप ही पता चल ज


रवि हम तीनो को वहीं रुकने बोलकर खुद वहां भिड़ में गया और सभी लड़को से कहने लगा… "2 मिनट में तुमलोग ये जगह खाली कर दो, ये शूटिंग सेंटर लेडीज के लिए आरक्षित किया गया है"..


भिड़ में से एक लड़का लगभग चिल्लाते हुए… "किसके बाप का मजाल है जो मुझे यहां से हिला सके"


रवि:- तू है कौन भाई, कभी देखा नहीं गांव में, कहीं बाहर से आया है…


वो लड़का हमारे क्षेत्र के विधायक असगर आलम का लड़का फेजान था, जो कुछ ज्यादा ही फ़ैल रहा था. फैले भी क्यों ना, एक तो विधायक का बेटा ऊपर से गिरीश का दोस्त, ऐसे मिजाज तो होना ही था. रवि क्या करता, यहां उलझता तो शायद बाद में परेशान करता.
 
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श्रावण मेला ।। भाग:-3






वो लड़का हमारे क्षेत्र के विधायक असगर आलम का लड़का फेजान था, जो कुछ ज्यादा ही फ़ैल रहा था. फैले भी क्यों ना, एक तो विधायक का बेटा ऊपर से गिरीश का दोस्त, ऐसे मिजाज तो होना ही था. रवि क्या करता, यहां उलझता तो शायद बाद में परेशान करता.


वो चुपचाप पीछे हट गया और उसके किनारे वाले दुकान के लड़को को हटाकर वहां बैनर लिखवा दिया कि ये लेडीज के लिए आरक्षित. जबतक बैनर लग रहा था, रवि हमारे पास आ गया… "थैंक्यू सो मच रवि, भिड़ ना होती तो तुम्हारे गले लग जाती"… मधु ने कहा..


रवि:- हां समझ गया तुम्हारी भावना, अब जाओ शूटिंग करती रहो…


मधु और लता बढ़ गई शूटिंग करने. मैं भी उनके साथ जाने लगी, तभी रवि मेरा हाथ पकड़ लिया. मैं जल्दी से अपने कदम पीछे ली… "हाथ छोड़ो रवि, तुममें अक्ल नाम कि चीज है कि नहीं"..


रवि:- मेरे साथ खड़ी रहो, मुझे बात करनी है..


मै:- ऐसे जबरदस्ती रोककर बात करोगे…


रवि:- तुम्हारे साथ तो हां, कर सकता हूं. वैसे भी तुमने ही मुझे सिखाया है कि लड़के, गांव की लड़की के साथ जबरदस्ती करे तो वो हल्ला नहीं करती.


मै:- होटल वाली घटना भुल गए क्या, पापा को कह दिया होता ना की मुझे ही वो पत्र दिया था, फिर देख लेते.


रवि:- अच्छा होता कह देती, तुम तो भाव खाती रहती हो, कम से कम तुम्हारे मम्मी-पापा तो अब तक हमारी दोस्ती को स्वीकृति दे चुके होते…


रवि की इस बात पर मेरी दबी सी हंसी निकल गई, मै अपनी गर्दन उसके ओर घुमाती…. "मिश्रा की लड़की को छेड़ने के लिए तुम्हारे अंदर इतनी हिम्मत आती कहां से है"..


रवि:- उसी मिश्रा की लड़की से, जो मेरे सपोर्ट में खड़ी रहेगी..


मै;- रवि तुम गलत ट्रैक पर हो, बात करने में कोई परहेज नही, लेकिन ये दोस्ती वैग्रह की उम्मीद मुझसे मत लगाओ…


रवि:- हां सही कही, वैसे भी तुमसे तो कभी दोस्ती वाली फीलिंग रही भी नहीं.. मै तो तुम्हे चाहता हूं.. चाहत हो तुम मेरी…


बहुत खतरनाक है ये लड़का, मै बता नहीं सकती थी कि उसकी बात सुनकर मेरा दिल कितने जोरों से धड़क रहा था. मुझे तंग करके मेरे पास ही खड़ा होकर मंद-मंद मुस्कुरा रहा था. जी तो किया अभी गला घोंटा दू. किसी तरह खुद पर काबू करती हुई मै लता और मधु से ही चलने के लिए कहने लगी…


लेकिन उन दोनों पर तो तुशानेबजी का भूत सवार था. दोनो ने चिल्लाकर बस इतना ही कहा, अभी बंदूक नहीं छोड़ सकती भिड़ ज्यादा है एक बार बंदूक हाथ से गई तो घंटो इंतजार करना पड़ेगा… कहना उसका भी सही था, जबसे वो दुकान आरक्षित हुआ था, लड़को की क्या भिड़ लगी रहेगी दूसरे फुग्गा फोड़ने वाले दुकानों में, वहां तो जैसे लड़कियों और भाभियों का हुजूम सा लग गया था..


रवि:- अपना सिम क्यों फेंक दी..


"मुझसे बात मत करो..".. इतना कहकर मै जाने लगी, तभी एक बार फिर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया, लेकिन इस बार मै रुकी नहीं मैंने अपने कदम बढ़ा लिए और रवि ने हाथ छोड़ दिया. जैसे ही उसने मेरा हाथ छोड़ा मै झटककर मंदिर के ओर जाने लगी.


तभी सामने से 8-10 लड़को का झुंड मेरे सामने से चला आ रहा था. रवि के चक्कर में मै तो भुल भी गई थी कि मैं कैसे तैयार होकर आयी थी, लेकिन वो लोग मुझे देखकर काफी ऊर्जावान नजर आ रहे थे. आपस में ही कुछ बात करते हुए हसने लगे. दूर थे तो मुझे उनकी बात सुनाई तो नहीं दी, लेकिन सबके चेहरे की प्रतिक्रिया पर कमीना जरूर लिखा हुआ था.


मै 2 दुकान के बीच में खड़ी होकर उनके जाने का इंतजार करने लगी. किन्तु कुत्ते की दुम कभी सीधा हो सकता है क्या? पूरा झुंड ही दोनो दुकान में ऐसे फ़ैल गया कि मेरे बाहर निकालने का रास्ता ही ब्लॉक हो गया. मै अपनी बेवकूफी पर खुद को ही 2 थप्पड़ मारने का सोच रही थी.


मुझे घेरे 5 सेकंड भी नही हुए थे और उनके आपस में ही अश्लील हरकतें और शब्दों के प्रयोग शुरू हो गए थे.. जैसे कि टेड्डी को हाथ में दबोचते हुए वो ग़लत इशारे और प्रयोग किए शब्द... "छोटी है पर इतनी ही मुलायम होगी".. "इस टेड्डी में छोटा अनार लगा दो तो वैसा ही कड़क होंगे"… दो अर्थ वाली बात जो उनके मुंह से निकल रही थी और मै वहां खड़े रहकर सब सुनने के लिए विवश थी...


मै गहरी श्वांस लेती बस मां के कही बात को सोचने लगी. अपनी मुट्ठी को बंद करके खुद में हिम्मत बांधी, और उनसे कहने लगी… "आप लोग रास्ता छोड़ेंगे मुझे जाना है"..


मैंने निडरता से खड़े होकर अपनी बात कही, लेकिन उन्होंने ऐसा जताया जैसे मेरी बात उनके कान तक पहुंची ही नहीं, आपस में ही किसी बात पर हंस रहे थे…. "तुमलोग ठीक से सुन नहीं रहे या तुम्हे सुनाने के लिए भोंपू लगवा दूं".. एक दुकानदार ने बड़े जोड़ से कहा..


"मदरचोद अपना काम कर वरना शाम के बाद तेरी दुकान दिखेगी नहीं"… सामने वही विधायक का बेटा था, जो उस दुकान के पास भी फ़ैल रहा था. शायद इस बार गलत बोल गया. उस दुकानदार ने तुरंत ही जोर से चिल्लाया.. "रवि इस विधायक के बेटे का मन कुछ ज्यादा ही बढ़ा हुआ है. सबको लेकर आ जा"..


फिर क्या था 8-10 दुकानदार और हर दुकान पर काम कर रहे 2-3 कर्मचारी. सब हाथो में डंडा लिए निकले और जो ही धुलाई शुरू की उनकी, फिर तो किसी तरह कमी नहीं हुई उनके स्वागत में… जैसे ही उनकी पिटाई शुरू हुई, रवि बीच से रास्ता बनाकर मेरा हाथ पकड़ा और वहां से निकालकर मुझे मंदिर के ओर ले जाने लगा.


पूरे रास्ते उसने कहीं मेरा हाथ नहीं छोड़ा, सीधा जहां मेरा पूरा परिवार था वहीं लेकर आ गया… सभी लोग मुझे ऐसे लेकर आते देख रवि को घेर लिए, और पापा गुस्से से पूछने लगे… "रवि कौन मदरचोद परेशान कर रहा था मेरी बेटी को"..


रवि:- दुकानदार के साथ बदतमीजी के लपेटे में लिया है, विधायक का बेटा है…


पापा:- तुम्हारा धन्यवाद रवि, वैसे भी हम सुबह से उस विधायक के बेटे और उसके आवारा दोस्तो को देख रहे थे.. माहौल गन्दा कर रखा था.. मनीष इतना मरो की अभी पंचायत लग जाए, फिर इसके बाप को हम पंचायत में देखेंगे…


मां:- हम अपने गांव के मेले में सुरक्षित नहीं तो फिर कहां सुरक्षित रहेंगे मिश्रा जी..


पापा:- ये बात तो उस प्रवीण को सोचनी चाहिए ना, जिसके सह पर इनको बढ़ावा मिल रहा है…


ऐसे छोटे झगड़े आम बात थे. मेले में होते रहते है. मेरी दिल को थोड़ा सुकून तब मिला, जब सब लोगो के बीच में मुझे नकुल नहीं मिला. मै बस यही सोच रही थी कि वो होता तो ना जाने क्या ही करता. मै सोच ही रही थी कि तभी रूपा भाभी कहने लगी… "हो गया वो उनका काम है करने दो, तुम क्यों अपना मुंह लटकाए हो"..


मै:- मुझे नकुल के साथ जाना चाहिए था, वो मेरे साथ होता तो इतनी बातें ही नहीं होती.


भाभी:- क्या पता इससे भी बड़ी बात हो जाती. तुम्हे रवि को थैंक्स कहना चाहिए..


मै, रवि के ओर देखती… "थैंक्स रवि, वो लता और मधु"..


रवि:- झगड़ा शुरू होने से पहले ही दुकान पर खड़ी सभी लेडीज को मैंने दूसरे ओर से निकलने के लिए बोल दिया था. तुम घबराओ मत, उसकी हरकत ही थी मार खाने वाली. बस गांव के किसी लेडीज का नाम ना उछले इसलिए हम दुकानदार मौका देख रहे थे.


मै:- तो क्या मेले में तुम्हारी भी दुकान है..


रूपा भाभी:- 1 लाख 20 हजार दिया है तो वसूल नहीं करेगा, एक लाइन से को 8 दुकान है फुग्गा फोड़ने वाला, इसकी ही तो है…


मै:- हां तभी उत्सुकता से एक पूरी दुकान लड़कियों के लिए आरक्षित कर दिया...


रूपा भाभी:- क्या सच में रवि..


रूपा भाभी के पूछने की उत्सुकता किसी बच्चे से कम नही थी, जिसे देखकर मै और रवि हसने लगे. हमे ऐसे हंसते देख रूपा भाभी कहने लगी... "मेला यानी मस्ती. मेला यानी बचपना.. ऐसे हंसो मत"..


रवि:- वो मधु और लता ने मुझसे कहा कि उन्हें शूटिंग करनी है. अब सभी दुकानों पर लड़को की भीड़ थी, तो मैंने सोचा एक को आरक्षित कर देता हूं..


रूपा भाभी:- फिर तो मै भी आती हूं थोड़ी देर से, इस बार कितनी इनामी राशि है..


रवि:- वो आपके लिए नहीं है भाभी, पिछली बार 20 हजार का नुकसान करवा चुकी हो आप.


रूपा भाभी:- इनाम बताओ बस..


"कौन से इनाम की बात चल रही है"… नकुल हमारे पास आते हुए पूछा..


रूपा भाभी:- बंदूक से फुग्गा फोड़ने वाला..


नकुल:- ये बेईमान बनिया, जान बूझकर बंदूक के पीन को और नली को टेढ़ी रखते है, ताकि सही निशाना ना लग पाए.. बेईमानी के पैसे से तो ये बिल्डिंग बाना लेते है…


रवि:- हम्मम ! आप लोग बातें कीजिए, मै जारा उधर देखकर आता हूं…


उसका उतरा चेहरा मै साफ देख सकती थी. उसका यूं मायूस होकर जाना मुझे अच्छा नहीं लगा. ऐसा लगा जैसे मेरे दिल में टीस उठी हो. मै समझ गई की नकुल को मेरी दोस्ती वाली पसंद नहीं आयी थी, इसलिए वो रवि सुना दिया.


इस बात के लिए मै नकुल को कुछ कह भी नहीं सकती थी. किसी बाहर वाले के लिए मै अपने भतीजे को क्यों सुनाऊं, बस यह सोचकर मैंने नकुल को कुछ नहीं कहा…. "नकुल चल मुझे घर ले चल, मेरा थोड़ा सर भारी लग रहा है"..


नकुल:- मेला नहीं घूमना क्या, चलो मेला घूमते है ना..


मै उसे देखकर फीकी मुसकाई और मेला देखने चली गई. मै फास्टिंग की हुई थी लेकिन फिर भी 1 बजे तक नकुल के साथ घूमती रही. उसका एक ही तो दोस्त था शशांक, वो भी बंगलौर चला गया था. मेरे वजह से फिर उसने किसी से ऐसी दोस्ती नहीं की जिसके साथ वो घूम सके, इसलिए उसके कहे का तो मै इनकार कभी कर ही नहीं सकती थी..


घूमने के दौरान मै 3 बार रवि के आस पास से गुजरी थी. वहीं मुस्कुराता चेहरा और एक जैसा हर किसी से बात करने का अंदाज. मेरे ख्याल से रवि के बात करने का अंदाज था ही इतना प्रभावी, की हर कोई उसे अपना करीबी समझता था. तभी तो भिड़ के बीच से वो मेरा हाथ पकड़ कर मेरे परिवार के पास पूर्ण विश्वास के साथ लाया और उसे देखकर मेरे पापा तुरंत समझ गए कि किसी ने मेरे साथ छेड़ छाड़ की है, वरना उसकी जगह कोई और होता तो ना जाने मेरे घरवाले क्या सोच बैठते..


फिर मेरे मन ने खुद से ही सवाल करना शुरू कर दिया… "क्या वाकई वो इतना अच्छा लड़का है?"… अब वो अच्छा था या बुरा, वो तो आने वाले वक़्त के हाथो में था, लेकिन जिस हिसाब से रवि मुझे अनदेखा कर रहा था, ये वक़्त मुझे सिर्फ इतना ही सीखा रहा था कि नकुल से शायद मुझे रवि से दोस्ती की बात नहीं करनी चाहिए थी. या फिर मै ही नकुल को समझा नहीं पाई.


मै घूम तो रही थी नकुल के साथ, लेकिन मेरे हर छोटे-बड़े ख्याल में रवि ही था. तभी नकुल की आवाज आयी… "दीदी कहां खोई हो, आओ लो ना ये आपकी फेवरेट आइसक्रीम"..


मै:- भुल्लकड़ आज सोमवार है, कल खाऊंगी..


नकुल:- धत तेरे की, तुम्हे पहले बताना था ना… चलो दीदी चलते है..


बस मै नकुल के देखकर मुस्कुराई और साथ घर लौट गए. काफी थकी थी इसलिए घर पहुंचते ही मैं दरवाजा लगाकर सो गई. पता नहीं कितनी देर तक सोई थी, लेकिन बहुत तेज किसी के दरवाजा खटखटाने से मेरी नींद खुल गई. घड़ी में देखी तो शाम के 5 बज गए थे. मै दरवाजा खोली सामने नकुल खड़ा था. और दरवाजे पर खड़े होकर रो रहा था.


उसे रोते देख मेरी आंखे बड़ी हो गई. उसका हाथ पकड़ कर बिस्तर पर बिठाई और अपने दोनो हाथ से आशु पूछती… "क्या हो गया, तू ये लड़कियों कि तरह रो क्यों रहा है? नीतू की याद आ रही क्या?"


नकुल:- पागल, उसका नाम लेना जरूरी है क्या.. मुझे माफ़ कर दे..


मै:- माफ तो तब करूंगी ना जब मुझे पता हो की तूने गलती क्या की है? पहले वो तो बताओ..

 

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श्रावण मेला ।। भाग:-4






नकुल:- मुझे रवि को ऐसे नहीं कहना चाहिए था. यहां आया तो पता चला कि मेले में तुम फंस गई थी, रवि तुम्हे निकाल कर लाया..


मै:- रवि नहीं होता तो कोई और होता, मुसीबत में फंसे लोगों को मदद मिल ही जाती है..


नकुल:- हां लेकिन जिसने मदद की उसे थैंक्स कहने के बदले बेइज्जत करना.. वो भी जिसने तुम्हारी मदद की.. तुम्हे बुरा लगा होगा, यही सोचकर मुझे रोना आ रहा है…


मै:- हां थोड़ा सा बुरा लगा था, इसलिए नहीं कि उसने मेरी मदद की उसके बदले तुमने उसे कुछ कह दिया. बल्कि मुझे वो दोस्ती वाली बात नहीं करनी चाहिए थी. तुम्हे अच्छा नहीं लगा होगा और यही वजह रही होगी कि तुमने रवि को गुस्से में कुछ कह दिया..


नकुल:- सॉरी मै खुद के स्वार्थ में थोड़ा अंधा हो गया था. मै ओपनली एक धोखेबाज गर्लफ्रेंड रख सकता हूं, जिसे हंसकर तुमने बस मुझे अकेले छोड़ दिया ताकि मै कंफर्टेबल फील करूं. और जहां तुम्हे मेरी जरूरत थी, इस बात के लिए की एक लड़के से दोस्ती हो रही है, बुरा है या अच्छा है, उससे बात करना चाहिए या नहीं वो मै तुम्हे बताता, तो मै पता नहीं कौन से गंवार ख्याल में खोया था.. मुझे अंदर से बहुत बुरा लग रहा है..


मै:- अब इतना भी बुरा फील मत कर, वरना मुझे अच्छा नहीं लगेगा.. वो कितना भी है तो बाहरवाला है और तू मेरा अपना.. चल अब अपना मूड ठीक कर और किचेन में मेरी मदद कर, सांझ ढलने वाली है और मुझे फलाहार भी करना है.. कुछ अपने लिए पका लू..


नकुल:- तुम आराम करो मै बाना देते हु..


मै:- रहने दे ज्यादा प्यार सेहत के लिए खतरा बन सकता है.. तू बस मेरे पास खड़ा रह, मुझे कंपनी मिल जाएगी… अब तू जरा बाहर निकल मै चेंज करूं..


नकुल:- रहने दे साड़ी में अच्छी लग रही है..


मै:- काम करने में नहीं बनेगा रे, अब जा भी..


नकुल के बाहर जाते ही मैंने फटाफट चेंज किया और बाहर चली आयी. जब जागी थी तब पुरा घर खाली था, लेकिन जैसे ही वापस दोबारा दरवाजा खोला तो घर के सभी लोग मौजूद थे. पापा और मेरे दोनो भईया काफी खुश थे और साथ में एक अजूबा भी था, रवि भी साथ आया था..


उसे देखकर मै मुस्कुराने लगी. अब मुझे देखना था कि नकुल ने जिस हिसाब से सबके बीच उसे बेइज्जत किया था, तो माफी क्या वैसे ही सबके बीच मांगता है. जो भी हो फिलहाल तो नकुल को मै कहीं जाने नहीं देने वाली थी, और जब मैंने उसे बोल दिया था कि किचेन में मेरे साथ चल तो वो वैसे भी कहीं नहीं जा सकता था, जबतक मेरे किचेन का काम खत्म नहीं हो जाता…


मै एक झलक सबको आंगन में देखते किचेन के ओर चल दी. मै जैसे ही किचेन में पहुंची… "बताओ दीदी क्या करना है"..


मै:- बैठकर बात कर बस, हां लेकिन पहले सबसे चाय पूछ ले. मै हम दोनों के लिए बाना रही हूं, उन्हें पीना होगा तो साथ में बाना देंगे..


नकुल वहीं किचेन से ही पूछा और मां ने 12 कप चाय बनाने के लिए बोल दिया. चाय के साथ मै अपने लिए कुछ पकाने भी डाल चुकी थी. मै और नकुल बातें भी कर रहे थे और मै किचेन में काम भी कर रही थी. चाय बन चुकी थी, मै अपना और नकुल की चाय वहीं रखकर नकुल को बाहर भेज दी चाय लेकर..


किन्तु ये मेरी मां भी ना चिल्लाकर मुझे ही बाहर बुलाने लगी. वैसे एक को बोला रवि मेरा दोस्त है तो लड़के ने उसे बेइज्जत कर दिया और ये मेरी मां.… "मेनका यहां तो देख तेरा दोस्त रवि आया है". शाबाश, यही बात मै कहती ना... "अपने दोस्त को घर लाई हूं, और वो लड़का है".. फिर तमाशा देखते. वो रवि तो हंस रहा होगा.


अब मां ने बुलाया था तो निकल कर आना ही परा. बुझे मन से फॉर्मेलिटी निभानी ही पड़ी. किन्तु आज मेरे घर में सबके खयालात मॉडर्न हो गए थे. नकुल भाई साहब कहने लगे आप सब बड़े बातें करो, हम दीदी के कमरे में जा रहे.


अब मै क्या कहती उस गधे को की एक लड़की और एक लड़के के कमरे में बहुत अंतर होता है. बचपन से साथ रहे है तो उसे ये बात कभी समझ में नहीं आयी लेकिन वो तो बाहरी था ना..


सूक्र है रवि ने खुद माना कर दिया, और वापस जाने के लिए इजाज़त मांगने लगा. नकुल उसे दरवाजे तक छोड़ने गया और वो सबसे नजरें बचाकर मुझे इशारों में कॉल करने के लिए कहने लगा. जो भी हो जाते-जाते अपनी अदा से मुझे मुस्कुराने पर मजबूर कर गया.


रात के 8 बज रहे थे. दिन भर की भूखी थी ऊपर से नकुल के साथ मेले में घूमी, पुरा शरीर थक के चूर हो गया था. मै सोना तो चाह रही थी लेकिन जाते-जाते रवि का वो इशारा मुझे सोने नहीं दे रहा था. कॉल करूं, ना करूं, करूं, ना करूं, सोचते सोचते अंत में मुस्कुराते हुए खुद से कही "कर ही लेती हूं"…


"हेल्लो मिस, मुझे लगा तुम कॉल नहीं करोगी"..
"तुम्हे कैसे पता ये मेरा नंबर है?"… मैंने अपने परमानेंट नंबर से उसे कॉल लगा दिया था...
"तुम्हारे ही कॉल के इंतजार में था"
"हम्मम ! सॉरी रवि नकुल थोड़ा मेरी बातों से चिढ़ा था, इसलिए तुम्हे उल्टा कह गया"..
"नकुल को तुम बहुत प्यार करती हो ना"..
"मेरे छोटे से संसार का बहुत बड़ा हिस्सा है वो."
"हां उसके आचरण में तुम्हारी छवि दिखती है. वैसे अपने छोटे से संसार का तुम मुझे छोटा हिस्सा भी बनाकर रखोगी तो मेरी खुशनसीबी होगी"..
"रवि प्लीज इस बारे में बात मत करो ना. मुझे नहीं पसंद"
"सॉरी, नहीं करता. तो बताओ किस बारे में बात करूं"
"तुमने पूछा था ना मेरा नंबर बंद क्यों आ रहा है उसी बारे में बात कर लेते है"..
"हां तुम्हे लोगो ने तंग किया होगा इसलिए वो नंबर बंद कर दी. फिर एक नया नंबर निकलवाई 42 लास्ट में है जिसके, लेकिन इस वक़्त तुम अपने प्रेमानेंट नंबर से मुझे कॉल कर रही हो. शायद मुझ पर यकीन हो चला है जो कि मेरे लिए बहुत बड़ी बात है"..


उसकी बात सुनकर ही मैंने कॉल डिस्कनेक्ट कर दिया. "इसके पास तो मेरे सारे नंबर है. क्या है ये, मै क्या समझूं इसे. भगवान कुछ तो रास्ता दिखाओ. क्या मै इसे कभी समझ सकती हूं. ऊं हूं हूं.. मै रवि के मामले में इतनी कंफ्यूज क्यूं हूं?"


इन्हीं सब ख्यालों में कब मुझे नींद आ गई पता ही नहीं चला. अगले शाम के 6 बजे दोनो भाभी तैयार होकर मेरे कमरे में आ गई… "ओह हो प्रियंका और ऐश्वरया एक साथ. बात क्या है दोनो बिल्कुल आज सजी संवरी, तूफानी लुक में."..


बड़ी भाभी:- नाना मै ऐश्वर्या कबसे होने लगी, सोभा ही ठीक हूं…


छोटी भाभी:- दीदी वो मेकअप किए में वैसी दिखती हैं, आप तो बिना मेकअप के बिजली गिराती हो.


बड़ी भाभी:- लच्छेदार बातें तो कोई तुझसे सीखे रूपा, लेकिन तू क्या यहां हमारी बात करने आयी है, उठा इस राजकुमारी को और चलते है मेला..


मै:- क्या ?


बड़ी भाभी:- मेला ही चलने कह रही हूं, लड़का देखने नहीं…


मै:- लड़का देखने आप दोनो ऐसे जाओगी तो पता चलेगा मुझे छोड़ आप दोनो को ना पसंद कर ले..


छोटी भाभी:- ए मेमनी ज्यादा बातें ना बना, चल उठ जल्दी, चलते है मेला..


मै:- ठीक है चलती हूं, वैसे नकुल कहां है..


छोटी भाभी:- पुरा परिवार ही सहर गया है किसी काम से, चल अब उठ जल्दी..


मै:- ठीक है 5 मिनट आप दोनो बाहर इंतजार करो मै कपड़े बदल लूं…


बड़ी भाभी:- सूट ही तो बदलने है, भुल गई बचपन में मै तुझे...


मै:- बस उलहाना देने और बचपन के किस्से सुनने की जरूरत नहीं है, जाओ मतलब जाओ बाहर…


छोटी भाभी:- चलो ना दीदी वरना आधा घंटा तो इसी बहस में लग जाएगा…


दोनो बाहर चली गई, मै भी फटाफट तैयार होने लगी. वो अलग बात थी कि कपड़े बदलकर मैंने 10 मिनट बाद ही दरवाजा खोल दिया था, लेकिन उसके बाद आराम से आधे घंटे तक तैयार होती रही…


हल्का अंधेरा सा हो गया था. दोनो भाभी निकलने से पहले अपने पतियों को कॉल लगाकर 8 बजे तक मेला पहुंच जाने का बोल चुकी थी, क्योंकि उसके बाद हमे वापस आना था. मेले में जैसे ही पहुंची, छोटी भाभी हमे लेकर सीधा रवि के दुकान पर पहुंच गई.


दिन क्या सांझ ढलने के बाद भी वहां फुग्गा फोड़ने वाले लड़कियों और भाभियों की कमी नहीं थी. उल्टा कल से लेकर आज में एक और परिवर्तन देखने को मिल गया. जहां पहले 1 दुकान आरक्षित किया गया था वहीं आज 2 दुकान आरक्षित था, ऊपर से भवरें कलियो और फुल पर मंडरा रहे थे.


छोटी भाभी ने मजाकिया अंदाज में वहां की लड़कियों और औरतों को ललकारा… "अरे वो बहुरियों और छोरियों, क्या ये आपस में निशानची बने हुए हो, जारा यहां के मर्दों और लौंडे में भी तो देख लो, हमसे जितने का दम रखते है कि नहीं"..


"भौजी इनका दम तो निहारने में ही निकल जाता है, हमारा मुकाबला क्या करेंगे".. मंदिर के पास वाली हमारी एक परिचित सोनी भाभी, छोटी भाभी के सुर में सुर मिलाकर कहने लगी…


"भौजी सावन में जो फगुआ के बुखार चाढल है, कहीं त उधर दी"… हमारे ही गांव के मुखिया चाचा के लड़के वरुण ने हसंते हुए जवाब दिया..


छोटी भाभी:- देवर जी खाली बतिया के वोट मांगने वाले काम ना है. यहां चितवन और थिरकन दोनो की परीक्षा होगी.. मंजूर जो हो तो आ जाओ मैदान में..


वरुण:- भौजी जो हारी तो छमिया नाच नचवाएंगे…


बड़ी भाभी:- आशा (वरुण की बहन) के साया ब्लाउस और साड़ी पहन कर लौंडा डांस के लिए तैयार हो जाओ देवर जी, जा रूपा इस बार इसकी बारी है… पिछली बार तो बच गया था…


सोनी भाभी:- कोई बात ना है दीदी, इस बार तो औरकेस्ट्रा का प्रोग्राम इसी के लोंडा नाच से शुरू करवाएंगे…


वहीं पुराना गांव के देवर भौजी की कहानी शुरू हो गई थी, और बाकी की लड़कियां मुक दर्शक, क्योंकि भौजी भरी सभा में सबसे ज्यादा गत नंनद का ही करती है और 1 भौजी के लिए कम से कम 3 ननद चाहिए, उसमे भी जबतक एक कोई ननद शादी शुदा नहीं होती तो भौजी के तुकबाजी से दूर ही रहती थी… और यहां तो एक ही जगह पर गांव की 10-12 भौजियां थी, फिर कौन उलझता… सब के सब वो जगह छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी, जिसमे से मै भी एक थी..


गांव के लड़कियों के झुंड के साथ मै भी चल पड़ी. कुछ हमारे आगे के टोले की लड़कियां थी तो कुछ पीछे की टोले की, और वहां हर कोई बस रुपा भाभी की ही चर्चा कर रही थी, कैसे पिछले साल उन्होंने निशानेबाजी की 20 हजार की शर्त जीती थी..


मेले के आखरी दिन आखरी प्रतिद्वंदी रवि और रूपा भाभी के बीच मुकाबला हुआ था, जिसमें रूपा भाभी ने रवि को हाराय था. फिर जब रवि की बात चली तो पहली बार मुझे नारी ईर्ष्या और जलन का अनुभव का भी ज्ञान हुआ..


दरअसल कुछ किशोरियों की बातों से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि रवि के लिए उनका आकर्षण कुछ ज्यादा ही गहरा है, उसमे से जो रवि का नाम लेकर सबसे ज्यादा चहक रही थी वो थी पुष्पा और अमृता. यूं तो दोनो नई नई शादी शुदा थी लेकिन दोनो के कहने के भाव और भावनाओ को वहां की हर लड़की एन्जॉय कर रही थी और ये दोनो भी अपने थोड़े बहुत बेशर्मी का पूर्ण परिचय दे रही थी..


खैर ये एक स्वाभाविक सी बात की शादी से पहले की लड़की की जुबान और शादी के बाद, दोनो में थोड़ा अंतर आ ही जाता है, और ऊपर से हंसी ठिठोली में तो ये आपस में कुछ ज्यादा ही बेशर्म हो जाती है.. फिर तो कभी-कभी किसी बात पर अपने भाई बहनों से भी ऐसे मज़ाक कर जाए कि बस खुद में शर्म से पानी पानी जैसे मेहसूस करने लगते है..

 
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श्रावण मेला ।। भाग:- 5






इसी बात कि चर्चा मै अब से थोड़ी देर पहले भी कर रही थी जिसमे कहा था कि 1 भाभी को संभालने के लिए कम से कम 3 नंनद की जरूरत होती है उसमे भी एक शादी शुदा होनी चाहिए. कारन ही वहीं थी, उनकी अति बेशर्मी की बात का बहुत कम हो कुंवारी लड़कियां जवाब देना पसंद करती है क्योंकि वो अपने भाई भतीजों के बीच रहती है..


बहरहाल मुद्दा यहां ना तो मेरी गांव कि कुछ दीदियों के बेशर्मी भरी भाषा का था और ना की उन किशोरियों का जो उनकी बात पर दांत निकालकर खी खी खी खी कर रही थी. मुद्दा तो था उनके द्वारा कहे गए शब्द और मेरे दिल की जलन का.. रवि के लिए उनकी ऐसी प्रतिक्रिया से मै ऐसी जली भूनी की भीड़ में मै सबसे पीछे हो गई और बस अंदर ही अंदर कुढ़ते उन्हें चार गालियां भी दे रही थी..


मेरी मनोदशा मुझे खुद भी पता नहीं थी. रवि जब सामने होता तो उससे डरती थी. जब मैसेज या फोन में बात करता तो उसे डांट देती थी, लेकिन जब वो नहीं होता तो उसकी हरकतों पर मै अनायास ही मुस्कुराने लगती थी.. अब ये भी होने लगा था, एक प्रकार की जलन कि भावना, वो लड़कियां रवि के बारे में ऐसा क्यों कह रही है..


खैर यह तो एक मन की बात थी जो मै कर गई, किन्तु उस वक़्त की मनोदशा तो केवल इत्ती सी थी कि उस कल्मुही का मै मुंह नोच लूं. मुझे अमृता और पुष्पा दीदी से ना जाने क्यों चिढ़ सी हो रही थी.. तभी मेरी हम उम्र एक लड़की जिससे मेरी अच्छी बात होती थी, दीप्ति मेरा हाथ हिलाती… "कहां गुम है मेनका, पुष्पा दीदी कब से पूछ रही है रवि तुम्हारे ही क्लास में पढ़ता है क्या?"..


मै:- हां पुष्पा दीदी वो मेरे ही क्लास में पढ़ता है..


पुष्पा:- उसका नंबर है क्या तुम्हारे पास, उसके साथ मेला देखने का मज़ा ही कुछ और होगा…


वापस से वहीं खी खी खी खी.. जिसे सुनकर मेरा दिमाग घूम गया. जली बुझी सी मै प्रतिक्रिया देती हुई कहने लगी… "दीदी मै कॉलेज ही कभी-कभी जाती हूं, वो तो उसके शॉप में गई थी तब मुझे पता चला था कि वो मेरे साथ पढ़ता है वरना मुझे तो पता भी नहीं था"..


अमृता:- तो एक काम कर मेनका अब से केवल एग्जाम देने चले जया करना, तेरे बदले मै क्लास अटेंड करूंगी…


मै:- जैसा आपको अच्छा लगे दीदी…


हम सब अपने कदम बढ़ाते हुए बात कर रहे थे, तभी कुछ लड़कियों ने झूला झूलने कि जिद करने लगे. वो 30-40 फिट का ऊंचा झूला, गोल घूमकर जब ऊपर जाता है तब तो कुछ समझ में नहीं आता, लेकिन मै कल्पना भी नहीं करना चाहती कि जब वो नीचे आता है तब उसका अनुभव कैसा होता है..


ऐसा लगता है ऊपर की श्वांस ऊपर, नीचे के श्वांस नीचे और प्राण हवा में कहीं अटक गए है. उसे झूलने के ख्याल से ही पूरे शरीर में कंपकंपी फैल गई. मै तो नहीं गई, लेकिन जो भी ऊपर झूलने गई उन्हें सत सत नमन इतनी हिम्मत करने के लिए, मुझसे तो ना हो पाएगा..


केवल मै अकेली नीचे खड़ी रह गई, बाकी सब के सब हिम्मत वाली निकली. मै खड़ी होकर झूले को ऊपर और नीचे जाते देखने में लगी हुई थी और तभी मेरे फोन की घंटी बजने लगी. जैसे ही स्क्रीन देखी मेरा कलेजा धक से रह गया और मै चारो ओर नजर घुमा कर देखने लगी की ये रवि मुझे कहां से कॉल कर रहा है.


ना वो मुझे कहीं दिखा और ना ही कॉल उठा पाई. उसे देखने का, सामने खड़े होकर बात करने का मन तो मेरा भी कर रहा था, किन्तु थोड़ी झिझक भी अंदर से थी. अतः मै वापस उसी के कॉल आने की प्रतीक्षा करने लगी. मै बार-बार अपने मोबाइल को देख रही थी और झूलती हुई लड़कियों को हाथ दिखाकर अपनी प्रतिक्रिया भी दे रही थी…


धीरे-धीरे झूला के घूमने की गति भी धीमी होने लगी थी, ना तो रवि दिखा और ना ही उसका कॉल आ रहा था. मुझे लगा अब मुझें ही कॉल कर लेना चाहिए, ये लोग झूलकर नीचे आ गई, फिर तो बात होने से भी रह गई. मै बड़ी सफाई से वहां से कुछ दूर हटी और रवि को कॉल लगा दी…


रवि:- हेल्लो मेनका..


मै:- क्या हेल्लो, तुम एक बार के बाद दोबारा कॉल नहीं कर सकते क्या? देर हो गई फोन उठाने में और कॉल कट गया तो दोबारा नहीं लगा सकते क्या? फोन रखो मुझे तुमसे बात ही नहीं करनी…


जैसे ही मै फोन रखकर झूले के ओर कदम बढ़ाई, मेरे कलाई को पर वहीं पकड़, दिल की धड़कन जैसे काबू में ही ना हो. बड़ी हिम्मत करके मै मुड़ गई, वहीं सांवला सलोना चेहरा, और चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान… उठती पलकें और बस एक बार उससे नजरे टकराई, और फिर मेरी नज़रों ने जैसे खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया हो की अब इसे देख पाने की हिम्मत मुझमें नहीं…


"क्यों तंग कर रहे हो, प्लीज हाथ छोड़ दो."… नजरे झुकाकर मै किसी तरह धीमे से कह पाई..


रवि:- हाथ छोड़ दिया तो फिर चली जाओगी और मुझे तुमसे बात करनी है..


मै:- रवि क्या तुम मेरी मजबूरी जरा भी नहीं समझते, जबकि गांव के विषय में मुझसे अच्छा तुम समझते हो…


रवि मेरी बात सुनकर मेरा हाथ छोड़ दिया… "तुम फोन पर बात बीच में ही छोड़कर चली जाती हो. सामने होती हो तो बात नहीं करती, कुछ मेरे भी अरमान है जो ना जाने कबसे दबे हुए है, उन्हें तुम सुनना नहीं पसंद करती. ठीक है जाओ तुम, शायद वाकई मै तुम्हे परेशान कर रहा था"..


"रवि सुनो तो.. रवि"… लगता है रूठकर चला गया. उसका हंसता चेहरा कितना प्यारा लगता है, लेकिन उतरा हुआ चेहरा जैसे दिल में टीस पैदा करता हो. मै कुछ सोचकर उस खाली जगह से वापस लड़कियों के झुंड के ओर बढ़ गई, जो झूले से उतरकर वापस मेला घूम रही थी.


लगभग आधे घंटे घूमकर जब हम वापस निशानेबाजी की जगह पर पहुंचे वहां काफी हूटिंग हो रही थी. ये हूटिंग कोई लड़के या मर्दों का झुंड नहीं कर रहा था बल्कि गांव की भाभियां कर रही थी. बेचारे हमारे गांव के मुखिया के बेटे वरुण भईया, शायद हार चुके थे. भौजियों के झुंड से एक भौजी उनके सर पर चुन्नी डालकर घूंघट निकाल रही थी और बाकी की भौजिया हूटिंग करने में लगी हुई थी…


"असहाय पुरुष"… उन्हें देखकर यही सोच थी. कौन कहता है कि पुरुष दबंग होते है. कोई यहां का नजारा देख ले फिर अपनी राय बनाए. वरुण भैया कम दबंग इंसान नहीं थे. नीलेश और उसकी गैंग तो पानी भरे इनके सामने. वो बेचारा भीगी बिल्ली की तरह औरतों के बीच अपनी दुर्गति बनते देख रहे थे…


खैर 7.30 बज गया था, औरतों की सभा वहां से टूटी और मै अपनी भाभियों के साथ मंदिर पर चली आयी. मेरी दोनो भाभियां वरुण के ऊपर हंस हंस कर पागल थी, उनका चेहरा देखने लायक था.. कुछ ही देर में मनीष भईया भी हम सबको लेने पहुंच गए…


रात के 11.30 बज रहे होंगे. पढ़ाई के लंबे सेशन के बाद मै उठ चुकी थी. मेरे होटों पर मुस्कान और अंदर दिल में थोड़ी हलचल थी. पढ़ाई से 1 घंटे का समय मैंने रवि को देने का फैसला किया था और बस यही सोचकर मै रोमांचित हुई जा रही थी…


मैंने छोटा सा उसे टेक्स्ट भेजा… "जाग रहे हो क्या"..


ऐसा लग रहा था मोबाइल से चिपका ही हुआ है, तुरंत ही जवाब भी आ गया.. "हां"..


"रवि तुम्हारा क्रेज तो गांव में बहुत है. कई लड़कियां तुम्हारी दीवानी है".. रवि को छेड़ते हुए मैंने लिखा..


"मुझे इस विषय में जानकारी नहीं, लेकिन तुम्हे यदि पता है कौन-कौन मुझ पर फिदा है तो 1,2 का नाम बता दो. उन्हीं के चक्कर काट लूंगा"…


"मार डालूंगी"… मैंने अपनी पहली प्रतिक्रिया लिख दी. लेकिन बाद में गलती का भी आभाष हो गया..


रवि कुछ आश्चर्य के भाव की इमोजी के साथ मुझसे "क्यों" पूछने लगा. उसके इस "क्यों" पर मैं मुस्कुरा दी.… "गलती हमे सुधारना आता है जनाब".. मै खुद से ही कहने लगी और बड़े प्यार से मैंने संदेश लिखकर भेज दिया… "अपने पढ़ाई पर ध्यान दो, और नकुल को देखा है ना मेरे साथ रहता है, इसलिए फालतू की बातो पर ध्यान नहीं देता. बस अब तुम भी सोच लो कि तुम्हे मेरे साथ रहना है या फालतू की बातों पर ध्यान देना है"…


हर कोई अपने आप में होशियार ही होता है किन्तु आप कितने पानी में है वो अकेले आप थोड़े ना तय कर सकते है, फिर मेरे सामने तो रवि था… तुरंत ही उसका प्रतिउत्तर भी आ गया…


"नकुल की बात मै नहीं करूंगा वरना कहीं चिढ़कर तुम फिर ना भाग जाओ. रही बात फालतू की बात पर ध्यान देने की तो मुझे बहुत से फालतू के बातो का ज्ञान तुम्ही ने दिया था.…. जैसे की गांव की लड़की जब मिलने अाए तो हिचको नहीं कुछ भी करने से.. कौन लड़की मेरे बारे में क्या कहती है ये उनका आपसी मामला था, उसकी जानकारी मुझे देना. मिस आइना दिखा या और दिखाऊं"..


मै:- बहस करनी है मुझसे तो बाय. तुमसे तो बात करने में भी डर लगने लगा है अब.. दिल की भावना व्यक्त कर दो तो तुम उसे ऐसे पेश करोगे..


मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या जवाब दूं, वैसे भी इतनी गहराई से कोई आपकी ही बात को पकड़कर जवाब देदे, फिर बचता ही क्या है. वाकई अंदर से काफी चिढ़ गई थी उसके जवाब से. वो अलग बात है कि उसके बाद वो मेरी भावना को समझकर फिर बात को बदल दिया और फिर वो मेरे बारे में बात करने लगा.


मै क्या बताऊं बाद में दिल में कैसी गुदगुदी सी हुई जब कल मेरी साड़ी और मेरे बारे में उसने कहना शुरू कर दिया. आह्हह लग रहा था अब तो मै केवल साड़ी में ही तैयार होकर निकलूं.


हालांकि उसकी तारीफ पर मैंने उल्टी ही तीखी प्रतिक्रिया दी और अपने हाल-ए-दिल को बयान नहीं किया. क्या पता मेरी खुशी से वो और ढीट हो जाता. 12.30 बजे का समय कब 2 हो गया मुझे पता भी नहीं चला. अंत में मैंने है उसे शुभ रात्रि कहा और उसी के ख्यालों में सो गई…


क्या बताऊं हाल-ए-दिल, शायद ना भी बताती तो भी मेरे चेहरे पर लिखा था. सुबह से मै खुद में मुस्कुरा रही थी, खुद में गुनगुना रही थी. कई तरह की बातो को सोचकर खुद ही शर्मा रही थी… दिल में कुछ-कुछ अरमान जगने लगे थे, लेकिन एक तो गांव का परिवेश ऊपर से मेरे खुद के अपने लक्ष्य जिससे मै भटक नहीं सकती थी…


मंगलवार के बाद मै दोबारा फिर मेला नहीं गई. मंगलवार की रात जब रवि से बात हुई थी, तभी मैंने रवि को भी माना कर दिया था कि मै उससे संपर्क किया करूंगी वो नहीं…


3 दिन अपने दबे अरमान और किताबो के साथ मैंने निकाल दिए. शनिवार का दिन था जब मै परेशान होकर नकुल को सुबह ही अपने पास बुलाई.. हालांकि मै परेशान तो कल रात से ही थी लेकिन नकुल को बुलाना उचित नहीं समझा..


मामला एक बार फिर वही था. कई अननोन नंबर से कॉल आ रहे थे और कॉल उठाओ तो बहुत ही गंदी भाषा का प्रयोग किया करते थे… नकुल को मैंने सारी बात बताई. तकरीबन 6 नंबर से कॉल आए थे..


वो वापस से मेरी ओर हैरानी से देखने लगा. हालांकि इस बार उसने मुझसे पूछा नहीं की क्या मैंने रवि को अपना नंबर दिया, लेकिन उसके चेहरे के भाव क्या मै ना समझ पाऊंगी…


मै:- रवि को मैंने अपना नया नंबर नहीं दिया है, बल्कि नए नंबर से मैंने केवल एक बाहरी लड़की को कॉल किया है बस, और वो है लता..


जैसी ही मैंने लता का नाम लिया, नकुल मुझे हैरानी से देखते… "लेकिन वो तो?".


मै:- हां वो मेरी सहेली है लेकिन तुम भुल रहे हो, तुम्हारी बिस्लखिया गर्लफ्रेंड भी उसके साथ थी.. मुझे यकीन है उस दिन लता को उसने ही कहा होगा मेरे बारे में पता करने.. और जब मैंने उसे नए नंबर से कॉल किया होगा तब नीतू ने ये नंबर लिया होगा.. लेकिन मुख्य सवाल ये है कि नीतू मुझे परेशान क्यों करना चाहती है?


नकुल:- अच्छा मज़ाक था, तुम्हे नहीं पता कि वो तुम्हे परेशान क्यों करना चाहती है… तुम उसके बारे में इतना कुछ जानने के बाद भी यह सवाल कर रही..


मै:- डफर.. हम क्या जानते है उसे कैसे पता होगा. उसके लिए तो तुम वो बेवकूफ हो जो जनता ही नहीं की उसके पैसे किसने चोरी किए और मै वो बेवकूफ हूं जो घर में रहती हूं, फिर ये नीतू मेरा नंबर बांटकर मुझे क्यों परेशान करना चाहती है..


नकुल:- इस हरामजादी की ऐसी की तैसी, इसे तो मै..


मै:- जाने दे नकुल इस मामले में पड़कर कुछ हासिल तो होना है नहीं, उल्टा हम परेशान होंगे....


नकुल:- हम्मम ! ठीक है जैसा तुम चाहो, केवल मुझे वो 6 नंबर दे दो जिनसे कॉल आए थे, उनका छोटा सा उपचार कर दूं ताकि अगली बार किसी को कॉल करने से पहले 10 बार सोच ले…


नकुल अपना काम छोड़कर उन 6 नंबर के पीछे जाने वाला था. कुछ देर समझाने के बाद वो भी मान गया कि वो उन लड़को के पीछे नहीं जाएगा. वो मान तो गया लेकिन मेरी सरदर्दी समाप्त नहीं हुई थी.. उसके उपाय भी बड़ा सामान्य सा था, मैंने एक बार और अपना नंबर बदल लिया और इस बार लता को खुद से कॉल करके बता दी कि कोई भी मेरा नंबर मांगे तो नकुल का नंबर पकड़ा देना..

 

Iron Man

Try and fail. But never give up trying
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श्रावण मेला ।। भाग:-1







2 दिनो की लगातार छुट्टी के बाद मै वापस अपने किताब में खो गई, लेकिन इस बार मैंने किसी भी दिन नकुल को नजरंदाज नहीं किया. हर दिन मै उससे 2-3 बार तो मिल ही लिया करती थी. उसके साथ वक्त बिताना कितना आसान होता था. कभी वो मुझे चिढ़ाता तो कभी मै उसे और अक्सर ही हम दोनों मिलकर सबको चिढ़ाया करते थे...


लगभग 10 दिन बाद शावन की पहली सोमवार की ठीक एक रात पहले रवि का संदेश आया…. "बहुत दिनों से देखा नहीं है और बात भी नहीं की, एक बार शक्ल दिखाकर बात कर लो."


मैंने भी रिप्लाइ में अपनी एक पुरानी तस्वीर भेजते… "चेहरा देख लिए, अब 10 मिनट है तुम्हारे पास"..


रवि:- ऐसे नहीं आमने सामने फेस टू फेस..


मै:- क्यों, फिर तुम्हारी श्वांस अटकने लगी है क्या? देखो रवि अकेले में मुझे तुमसे डर ही लगेगा. मै प्रतियोगिता परीक्षा की तैयार कर रही हूं, और यहां लोग, बात करने का मतलब कुछ और ही निकाल लेते है… मै किसी स्कैम में फंसकर डायवर्ट नहीं होना चाहती..


रवि:- मै वादा करता हूं, तुम्हे जारा भी असुरक्षित मेहसूस नहीं होने दूंगा..


मै:- गांव में मै भी रहती हूं रवि.. शुरू शुरू मे लड़के दिखते बहुत सभ्य और संस्कारी जैसे है. लेकिन उनसे अकेले मिलने पर यदि वो कुछ गलत कर दे तो हम लड़कियां खुलकर विरोध भी नहीं कर सकती, ये बात तुम लड़को को भी पता होती है, इसलिए कुछ भी करने से पहले हिचक भी नहीं होती.. और एक बार तुम ऐसा कर भी चुके हो…


रवि:- मै तुम्हे पांचवीं क्लास से चाहता हूं, तुम्हारे 8th क्लास में पहुंचने तक मै 2 बात फेल होकर 8th में तुम्हारे साथ आ आ गया. मै तुम्हारे साथ गलत करने कि सोच भी नहीं सकता..


मै:- शायद 10 मिनट हो गए है… सॉरी रवि…


रवि:- इट्स ओके, कम से कम बात कर रही हो वहीं बहुत है… मैंने तुम्हारी तस्वीर डिलीट कर दी है….


उसके आखरी संदेश का जवाब देना मैंने जरूर नहीं समझा, लेकिन उसकी बातों से मै मुस्कुरा जरूर रही थी. 6 साल से मेरे पीछे रहा और मैंने कभी नोटिस भी नहीं किया, और ना ही उसने कभी जाहिर होने दिया. कुछ अच्छा जैसा मेहसूस हो रहा था, थोड़ा प्यारा और थोड़ा गुदगुदा सा एहसास. अच्छा ही था जीने में थोड़ा जायका मिल रहा था.


उफ्फ ये सावन का महीना और गांव की कच्ची-पक्की सड़क, छप-छप और किचोड़ों से भड़े परे. इसी के साथ 4 सोमवार का व्रत इस बार 5 शोमवार का था, ऊपर से 8 किलोमीटर दूर शिव जी विराजमान थे..


इस महीने की यही परेशानी रही है. कीचड़ और पानी से मन इतना किच-किच हो जाता की जी तो करता था कि एक महीना उसी गांव में रह जाऊं और चारो सोमवार समाप्त करके ही लौटू. सुबह से ही पुरा गांव मंदिर जाने को तैयार, हर किसी को भोला बाबा को जल जो ढारणा था.


वैसे इस महीने सोमवार की सुबह का आनंद ही कुछ और रहता है. मिश्रा टोला से तो जैसे रैली में गाडियां निकलती है… हमारे साइड से 6 घर और कम से कम 8 गाडियां, जो आगे जाकर फिर नहर के पास बसे 8 परिवार की गाड़ियां मिल जाती है.. वहां से भी कम से कम 12 गाडियां निकलती होगी.. 20 गाड़ियों का काफिला अपने आप में प्राउड टाइप फील करवा जाता है..


फिर तो ये काफिला गांव के सड़क से होते, कई अन्य टोला से गुजरते हुए मंदिर तक पहुंचता है. हां वो अलग बात है कि घर से तो चमचमाती गाडियां निकलती थी, किन्तु मंदिर पहुंचते-पहुंचते मिट्टी से सन जाते थे. 3-4 गांव के बीच का वो मंदिर था इसलिए मंदिर के पास बड़े से मैदान में श्रवानी मेला हर साल लगा रहता था…


मेले में तरह तरह झूले, कई सारी रंग बिरंगी दुकानें, आह वो ताजे जलेबी और सरसो के तेल में छने हुए कई तरह नमकीन.. देखकर ही मन प्रसन्न हो उठता. और गांव के जवान से लेकर बुड्ढों के आकर्षण का केंद्र वहां के रात का औरकेस्ट्रा. इस औरजेस्ट्रा की खास बात ये होती की मूंछ पर ताव दिए हर कंजूस अपनी तिजोरी खोल देता.


किसी ने 25000 दिए दान में तो कोई आगे बढ़ने के लिए 31000 चंदा दिया करता था. हर बार की तरह इस भी होड़ लगी हुई थी और सबसे ऊपर नाम था प्रवीण मिश्रा का.. प्रवीण मिश्रा उसी गिरीश के पिताजी थे, जिससे लगभग 2 लाख रुपए लूट ही लिए थे नीलेश और नंदू ने मिलकर, यदि मैंने टांग ना अड़ाया होता.


प्रवीण मिश्रा उस गांव के मुखिया और क्रिमिनल कहलाते थे. हालांकि मुखिया है तो आगे ज्यादा वर्णन कि तो जरूरत नहीं है, हां लेकिन पैसे और रुतबे में उस इलाके के ब्राह्मण परिवार में सबसे सुदृढ़ थे. बस हम उन्हे जानते मात्र थे, बाकी बहुत ज्यादा बातचीत नहीं थी इस परिवार से...


प्रवीण मिश्रा 2 लाख के दान के साथ पहले नंबर पर थे और दूसरे स्थान पर सदैव की तरह मुखिया चाचा, यानी कि ब्रह्मदेव मिश्रा 1 लाख 85 हजार के अनुदान के साथ और इसी के साथ सबसे आखरी नाम था माखन मिश्रा यानी कि नीलेश के पापा का जिसने 25000 का दान दिया था. इसके नीचे की राशि दान देने वालों का नाम नहीं लिखा रहता… पहले और आखिरी के बीच में 60 नाम लिखे थे..


ओह एक बात बताना ही भुल गई, केवल मिश्रा ही नहीं है इस गांव में और भी दूसरे कास्ट के लोग बसते है और हां कुछ को जबरन भी यहां पैसे देने पड़ते है. जैसे कि रवि के पापा, गंगा अग्रवाल, उसका फिक्स है जो पहले नंबर का दान देगा उसका 60% उन्हे दान देना ही है, वरना दुकान नहीं चलने देंगे.. सो उसका भी नाम था… इसी तरह पास के बाजार के कपड़ा व्यापारी कमलेश महासेठ उसे 50% का दान देना अनिवार्य था.


कुल मिलाकर 4 दिन के शो के लिए मेरे ख्याल से 25 लाख इन लोगों ने केवल नाम दर्ज वालों से इकट्ठा किया था और जो 25 हजार से कम वाले थे उनसे तो मेरे ख्याल से 10 लाख जमा कर लिए होंगे…


इन पूरे पैसों से 1 महीना के मेले का पूरा मैनेजमेंट चलता था. नो पुलिस, बल्कि अर्जी देकर सीआरपीएफ के जवान को बुलाया जाता था और दबी कुचली सी हालात में कुछ डरे हुए पुलिसवाले उसके पीछे खड़े होकर प्रबंधन का काम देखते थे..


बहरहाल अन्य साल की तरह इस साल का भी सबसे शानदार हाईलाइट वही औरकेस्ट्रा ही था और इस बार तो अदाओं से लुभाने आखरी दिन कुछ रसियन नृतकी भी आ रही थी.. आज पहली सोमवार को इस बार कीचड़ नहीं देखना परा। बल्कि भिसन गर्मी का सामना करना पड़ रहा था. सुबह के 8 बज रहे थे और ऐसा लग रहा था पसीने ने हालत खराब कर रखी है.. ओह वैसे आज मै साड़ी में थी और माते श्री की जिद पर मैंने ये पहना था…


आज से पहले मैंने कभी साड़ी नहीं पहनी थी, बस सावन आने वाला था और सोमवार का व्रत मै रखती हूं, इसलिए प्राची दी ने मेरे लिए सारी का पुरा सेट भिजवा दिया था. उनकी चॉइस वाकए कमाल की थी. मेरी बड़ी भाभी ने मुझे साड़ी पहनाया उसके बाद मै थोड़ा सा मेकअप करके जब आइना देखी तो खुद में शर्मा गई.



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साड़ी में अलग ही रूप खुलकर आ रहा था मानो अचानक मै बड़ी हो गई हूं. लग ही नहीं रही थी मै वहीं मेनका हूं. निकलने से पहले मैंने कुछ तस्वीरें अपनी ली और बाहर आ गई. लोगों की प्रतिक्रिया देखकर मै थोड़ा शरमा भी रही थी और चेहरे पर मुस्कान भी थी.


इसी क्रम में नकुल अचानक ही घर में आया. दरसअल मै पीछे मुड़ी हुई थी और वो चारो ओर देखकर मेनका दीदी, मेनका दीदी कर रहा था. उसकी बात सुनकर दोनो भाभियां हसने लगी और मै जब मुड़कर उसके सामने हुई तो वो मुझे देखकर चौंकते हुए कहने लगा… "मै तो बच्चा दिखने लगा इसके सामने".. उसकी बात सुनकर हम तीनों ही हसने लगे..


मै:- देख लिया हो तो वो काम भी बता दे जिसके लिए चिल्ला रहा था..


नकुल:- दादी, इसे सबके बीच में रखना आज तो पक्का इसे नजर लगने वाली है..


उसकी बात सुनकर मै मंद-मंद मुस्कुराने लगी. तभी छोटी भाभी टपक पड़ी… "पहली नजर कहीं तेरी ही ना कह जाए नकुल"..


मै:- आप लोग इतना छेड़ोग तो मै जा रही चेंज करने..


मां:- ना ना, कोई कुछ नहीं बोलेगा.. नकुल तू किस काम से आया था..


नकुल:- ओह हां ! मेनका दीदी वो तुम्हारी सहेली लता का कॉल मेरे पास आया था, उन्हें बात करनी थी आपसे और आपका नंबर बंद आ रहा था..


मै:- हां, चल हम साथ चलते है, ये लोग आते रहेंगे..


नकुल:- नाह ! तुम दादी के साथ ही आओ..


मै:- ऐसा क्या हो गया जो साथ नहीं ले जा रहा आज..


नकुल:- तुम्हे मेरे साथ देखकर लड़के जान बूझ कर आएंगे मेरे पास और उनकी हरकतें देखकर मेरा खून खौल जायेगा…


बड़ी भाभी:- और मेनका की जगह अपनी बीवी को ले जाता तब. उस वक़्त खून ठंडा करके निकलता क्या घर से..


"पागल हो गए है सब, जिसे जिसके साथ जाना है जाओ, मै बाहर ही खड़ा हूं"… नकुल अपनी बात कहते बाहर चला गया, मां और दोनो भाभियां उसे देखकर हसने लगी. मुझे लग गया इन हालातों में इनके पास रुकना खतरे से खाली नहीं क्योंकि इनका खरनाक वाला मज़ाक शुरू हो चुका था.


मै भी नकुल के पीछे ही आ गई और उसका हाथ पकड़कर कार तक ले गई… "तू चल मेरे साथ बाकी को आने दे. बहुत सी बात उन लोगों के सामने नहीं हो सकती"…


मै कार में बैठते ही…. "तूने किसी को मेरा परमानेंट नंबर तो नहीं दिया है ना"..


नकुल:- मै तुम्हारा दूसरा वाला नंबर किसी को ना दू, परमानेंट तो दूर की बात है..


मै:- अरे वो दूसरे नंबर को लगता है किसी ने बांट दिया था, मुझे वो सिम ही निकालकर फेकना पड़ गया.


नकुल:- जरूर तूने उस रवि को दिया होगा नंबर.…


मै:- हां दी तो थी.. सॉरी..


नकुल:- हां ठीक है मुंह मत लटकाओ, पहले लता से बात कर लो, और आइंदा संभल कर अपना नंबर देना…


हम धीरे-धीरे रॉ के साथ आगे बढ़ रहे थे. मै लता को अपने नए वाले दूसरे नंबर से कॉल लगा दी… वो भी तो गांव की ही थी. नया नंबर देखकर तो पहले 2-3 बार कॉल ही नहीं उठाई. जब मैंने अपना नाम मैसेज में भेजी, तब जाकर उसने कॉल उठाया और उठाते ही… "कहां हो, आजकल तो कॉलेज में तुम द्वितीय के चांद जैसा नजर आती हो"…
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aman rathore

Enigma ke pankhe
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अध्याय:- 8 ।। पहला हिस्सा




मै अपनी ही सोच मे इस कदर डूबी रही की मुझे ख्याल ही नहीं रहा कि रवि भी मेरे पास ही खड़ा है. मेरे आखों के सामने वो चुटकी बजाते हुए पूछने लगा... "क्या हो गया मेनका, कहीं कुछ करने का गहरा ख्याल तो दिल में नहीं आ रहा"…


मै:- नहीं मुझे बस नकुल की चिंता हो रही है? तुम नहीं जानते मै कितना घबरा रही हूं? रवि क्या नकुल भी नीतू के साथ यहां लाइब्रेरी आता था?..


रवि से जब मै यह सवाल पूछ रही थी, मेरा दिल जोड़ से धड़क रहा था. मन में बेचैनी और व्याकुलता इस ख्याल से भी था कि कहीं नकुल इनका छिपा हुआ साथी तो नहीं. मै अपने सवाल करके बस रवि के ओर जिज्ञासा भरी नजरों से देख रही थी...


रवि:- मै उतना नहीं जानता, हां ये जरूर बता सकता हूं कि पिछले 10 दिनों से नकुल और नीतू में कोई बातचीत नहीं हुई और ये तीनों लड़के जो आज गए है उसके साथ 2 लड़के और आते है… उन पांचों ने नीतू का भरपूर मज़ा लिया है… इनके बीच की कहानी का पता नहीं, लेकिन जिस दिन से नकुल और नीतू बात बंद हुई है, नीलेश और नंदू ने जमकर भोगा है नीतू और उसके दोस्तों को वरना पहले जब कस्टमर आते थे तभी ये साथ नजर आते थे...


मै:- ठीक है अब तुम निकलो, मै जारा नकुल से मिलकर आती हूं..


रवि:- मेरा पूरा इस्तमाल कर ली और मुझे भगा रही... कुछ देर मेरे पास भी वक्त बिताओ ना...


रवि की बात सुनकर मै उसे आंखे दिखती.… "प्यार से बात क्या कर ली, तुम्हारी उम्मीदें ही बढ़ने लगी है रवि.. बिल्कुल साइलेंट होकर निकलो और हां तुम्हे जो नंबर दी हूं वो इरेगुलर नंबर है, फोन करके परेशान किया तो सिम फेक दूंगी और तुम्हे मार डालूंगी"…


रवि:- जी मिस जैसा आप कहें..


रवि जब उतरे मुंह के साथ गया बड़ा प्यारा लग रहा था. पता नहीं क्यों, लेकिन रवि अच्छा लग रहा था. रवि के साथ छोटी-छोटी 2-3 मुलाकात के बाद परिवार में ऐसा खोई की ये चैप्टर तो दिमाग में था ही नहीं, और जब रवि आज सामने आया तब भी उसे दिमाग में रखने लायक नहीं सोच पा रही थी, क्योंकि सामने जो कहानी चल रही थी, दिमाग उसमे पुरा उलझा हुआ था…


खैर नकुल से पहले मै यहीं कॉलेज में मिलने का सोची थी, लेकिन मामला नाजुक था इसलिए बात करने के लिए मैंने कॉलेज को सही जगह नहीं माना और घर वापस चली आयी. तकरीबन 2 बजे नकुल कॉलेज से लौटता था इसलिए मै भी 2 बजे के करीब नकुल के घर चली गई...


2 बजे से 4 बज गए लेकिन नकुल का कोई पता नहीं था. यूं तो मै नकुल की मां के साथ बात कर रही थी लेकिन मेरा ध्यान दरवाजे पर ही था.… "क्या हुआ मेनका बार-बार दरवाजे के ओर देख रही, नकुल का इंतजार कर रही है क्या?"


मै:- हां भाभी, 2 बजे आता था अभी तक नहीं आया... कितने दिन हो गए उससे ठीक से बात तक नहीं की मै...


नकुल की मां:- वो तो कॉलेज से सीधा तेरे भैया (नकुल के पापा) के पास गया होगा, उसे देर लग जाएगी आने मे. वैसे मुझे बताने से तो माना किया था लेकिन फिर भी बता दे रही हूं, नकुल तुमसे काफी नाराज चल रहा है.


दांत जीभ तले दबाते मै अपना चेहरा सिकोड़ती हुई भाभी से कहने लगी... "हां जानती हूं भाभी, तभी तो मनाने आयी हूं, लेकिन लगता है इंतजार करना होगा"..


नकुल की मां:- मेनका तू जा, जब वो आएगा तो मै कॉल कर दूंगी..


मैं भी "ठीक है भाभी" कहती हुई वहां से चली आयी. नकुल से पहले तो थोड़ी बहुत बात हो भी जाती थी, लेकिन महीने दिन मैंने उसपर जारा भी ध्यान नहीं दिया... यह बात रह-रह कर मेरे दिमाग में आ रही थी. मै अपनी बेवकूफी पर खुद से ही नाराज चल रही थी. महीने दिन कि घटना दिमाग में ही घूम रही थी, कैसे नकुल मेरे कमरे में आता था और मै बिना बात किए ही अपने लैपटॉप और किताबो में घुसी रहती थी..


नकुल के बारे में सोचकर पता नहीं क्यों मेरे आखों मे अपने आप ही आशु आ गए. मै अपने व्यवहार के लिए खुद मे ही शर्मिंदा हुई जा रही थी. रात को तकरीबन 8.30 बजे नकुल की मां ने मुझे बताया कि नकुल अभी पहुंचा है, यदि कहे तो भेज देती हूं. मै ही भाभी को माना कर दी और बोली कल कॉलेज में ही बात कर लूंगी.


रात भर पढ़ाई मे भी ध्यान नहीं लगा. सुबह उठकर बुझा सा चेहरा लिए मै नकुल के बारे में ही सोचती रही. फिर खुद ही अपने सर पर हाथ मारती खुद से ही कहने लगी.… "जो हो गया उसपर चिंता क्यों करना, नाराज ही तो है, माना लूंगी. थोड़ा डांटेगा तो सुन लूंगी"…


इसी ख्याल के साथ मै खिलखिलाती हुई तैयार हुई. सबसे पहले प्राची दीदी को कॉल लगाकर उनके जन्मदिन की उन्हें बधाई दी. कुछ देर बातचीत के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ काम है इसलिए वो दिन मे कॉल करेगी और मेरा पूरा वक्त वीडियो कॉल पर लेगी. मै भी मुस्कुराकर उनकी बात का अभिवादन की और कॉलेज के लिए निकल गई.


मै लगभग 2 क्लास बीतने के बाद, देर से तकरीबन 9.30 बजे सुबह कॉलेज मे थी. कॉलेज पहुंचकर मैंने तुरंत कॉल करके नकुल को बाहर बुलाया. वो मुझसे नाराज था, पिछेल एक महीने से मिली नहीं ना और ना ही थोड़ा भी वक़्त दिया इसलिए उसे अखर गया था.


देखा जाए तो हम दोनों एक ही जैसे थे.. परिवार को अपना मानने वाले.. बहुत से बातों में दिमाग तेज चलता था तो बहुत से बातों में हम केवल भोंदू थे.. अपने हिसाब से हर कोई समझदार ही होता है लेकिन उम्र और तजुर्बा भी कोई चीज होती है…


थोड़ी ही देर में नकुल बाहर आ चुका था.. मै उसे गौर से देख रही थी. बुझा सा उतरा चेहरा मानो घंटो बैठकर कहीं रोया है… भाई, दोस्त, बच्चा हमदर्द जो समझिए उसे.. वो था मेरे लिए नकुल, तो सवाभाविक सी बात है उसका उतरा चेहरा कैसे देख सकती थी…


"क्या हुआ, क्यों परेशान कर रही थी. और दिमाग क्या घास चरने गया था जो कल क्लास में आकर ऐसे मेरे पास बैठ गई, कोई उल्टा सीधा कमेंट कर देता तो"… नकुल काफी गुस्से में चिल्लाते हुए कहने लगा…


मै:- चल छोटी सी ड्राइव पर चलते है, यहां से घूमकर मंदिर और मंदिर से फिर यहां..


नकुल:- कॉलेज के बहाने अब तुम घूमने जाओगी, आज मेरे साथ ज रही. कल किसी और के साथ.. देखने में कुछ भी गलत नहीं लगता है.. लेकिन हम सही है ये सोचते-सोचते कब गलत हो जाता है पता भी नहीं चलता.…


मै:- तुम्हे शर्म आनी चाहिए नकुल, मै तुझसे मिलने आयी थी यहां… कोई और कहता ना ये बात तो मै उसका जुबान खींच लेती… रुला दिया मुझे पूरे कॉलेज के बीच में… और कुछ सुनाना बाकी रह गया है तो वो भी बोल दे.. चरित्र पर तो उंगली उठा ही चुका है...


मुझे सच में रोना आ गया उसकी बात पर.. मैंने आखों पर काला चस्मा डाला और वहां से सीधा अपनी कार के पास, जैसे ही मै दरवाजा खोल रही थी… "हट मै ड्राइव करता हुं, उधर बैठ"..


मै चुपचाप दूसरी ओर आकर बैठ गई.. नकुल ड्राइव करने लगा.. "सॉरी मेनका, वो मै जारा गुस्से में था"..


मै:- गुस्से में किसी के सामने कुछ भी कह दोगे. क्या कैह गए तुम, तुम्हे एहसास भी है..


मेरी बात सुनकर नकुल खुद को ही जोर-जोर से थप्पड़ मारने लगा... "पागल हो गया हूं मै. मेनका मार मुझे, तू मुझे मार. नहीं मारेगी तो मै खुद को ही मारने लगूंगा. इतनी घटिया बात मेरी जुबान से निकली भी कैसे. रुक ये जुबान ही काट देता हूं मै"...


नकुल की बात से मेरे आत्मा पर चोट तो लगी थी लेकिन उसकी हालत देखकर मै समझ चुकी थी कि ये अपने होश में ही नहीं है, फिर नकुल की बात दिल से भी लगाने की कोई जरूरत नहीं थी. हां लेकिन उसका पागलों जैसा व्यवहार मुझे सोचने पर विवश कर रहा था कि नकुल को हुआ क्या है. कोई भी बात जानने के लिए पहले तो नकुल को शांत करना जरूरी था इसलिए उसे खींचकर एक थप्पड़ मारती हुई कहने लगी.… "पागलपन शांत हुआ तो चुपचाप कार स्टार्ट कर और मुझे बता की इतनी घटिया बात मुझसे कर कैसे गया?"


नकुल:- कह तुम्हे रहा था मेनका, लेकिन भड़ास अपने ऊपर निकाल रहा था…क्योंकि पहले मुझे भी सब सही और जायज ही लगा था, लेकिन शायद यही मेरे कर्मो कि सजा है… तुमने जब कहा था ना कि मुझे कर्ज लेकर मोबाइल नहीं देना चाहिए, तभी मुझे संभल जाना चाहिए था…


मै:- कुत्ता कहीं का. इतने दिनों बाद आयी मिलने और एक ब्रेकअप के लिए मुझे 100 लड़के लड़कियों के बीच सुना दिया… डांट दिया मुझे … तेरी जगह कोई और होता ना तो मै जिंदगी में दोबारा कभी उसकी शक्ल नहीं देखती..


नकुल की बात सुनकर मै राहत की श्वांस ले रही थी. बच्चा है अभी पहला ब्रेकअप के कारण पगलाए है इसलिए मुझे उल्टा बोल दिया. कोई बात नहीं अपना ही बच्चा है मुझे गलत बोलने के बाद दिल से गिल्टी भी तो मेहसूस कर रहा था. पर शुक्र है कि उस नीतू ने अपना नंगा खेल जारी रखने के लिए नकुल से ब्रेकअप कर लिया. लेकिन नकुल ने जैसे ही मेरी बात का जवाब दिया, मेरा दिमाग झटके खा गया.…


नकुल:- मेरी भी शक्ल नहीं देखेगी..


मै:- क्या कहा तूने… ए पागल, बात क्या है बता मुझे… और पूरी बात बताओ..


नकुल:- तू मत सुन जाने दे.. बस एक बात कहूंगा.. कभी कुछ पता चले ना तो तू मुझे गलत मत समझना..


मै:- नकुल देख तू डारा रहा है मुझे… तुझे मेरी कसम है पूरी बात बता क्या हुआ है तेरे साथ…


जैसी ही मेरी बात नकुल ने सुनी, वो स्टेरिंग पर अपना सर रखकर रोने लगा. मैंने झटके से फुट ब्रेक मारा और हैंड ब्रेक खींच दिया.. पहिए आवाज़ करते हुए रुक गए. मेरी तो छाती पूरी ऊपर नीचे होने लगी… "मैंने पापा के 20 लाख रुपए चोरी करवा दिए, वो भी कर्ज लिया हुए पैसा"..

अनियंत्रित गाड़ी के झटके से मेरे उखड़ी श्वांस अब तक काबू मै नहीं आयी थी और कार रुकते ही ये बड़ा सा झटका नकुल ने मुझे दे दिया. नकुल बिना अपना सर ऊपर किए, चींखते हुए कहने लगा. मुझे लगा कि ये ब्रेकअप मे पगलाए है लेकिन उसकी परेशानी की वजह जानकर मै तो बिल्कुल दंग ही रह गई. अंबानी और टाटा बिरला का खानदान तो है नहीं की 20 लाख जाने पर उफ़ तो ना हो, यहां 500 रुपया गुम जाए तो पूरा दिन उसपर ही ध्यान रहता है, यहां तो बात 20 लाख रुपए की थी. नकुल की क्या बात थी, उसकी बात सुनकर तो मेरा दिमाग भी सुन पर गया था.


नकुल की हालत बयान कर रही थी कि वो इतना पागलों कि तरह परेशान क्यों है, फिर जैसे ही उसके बातो पर ध्यान गया... "मेरी भी शक्ल नहीं देखेगी"… मै बिल्कुल सदमे में चली गई.. "नकुल कहीं आत्महत्या की बात तो नहीं कर रहा था"…


मै:- भईया (नकुल के पापा) को कब देने है 20 लाख... नकुल.. नकुल..ल..ल..ल..ल"…


जब मै जोड़ से चिल्लाई तब जाकर वो अपना सर ऊपर किया… "एक जमीन की रजिस्ट्रेशन चल रही है, पापा का कॉल 12 बजे तक आ जाएगा"…


मैंने:- हां तो पागल क्यों बन रहा है चल उनको पहले पैसे देते है.... फिर बाद में सोचते है क्या करना है..


नकुल:- 20 लाख रुपए है मेनका, 20 हजार नहीं..


मै:- मै हूं ना.. चिंता क्यों करता है.. खुद की हालत ठीक कर और बैंक लेले गड़ी..


नकुल:- लेकिन मेनका..


मै:- कोई बात नहीं, पैसे बुरे वक़्त के लिए ही होते है… 20 लाख तुझसे कीमती नहीं है… और खबरदार जो कुछ उल्टा सीधा करने की सोच तो.. भईया (नकुल के पापा) कहां अभी सहर में है..


नकुल:- हां..


मैंने घर कॉल किया और मां से पूछने लगी क्या मै नकुल के साथ सहर चली जाऊं, वो भईया को पैसे देगा और मै उसके बाद कुछ सामान खरीद लूंगी.. मां ने माना नहीं किया और हां कह दी..
:superb: :good: amazing update hai nain bhai,
Behad hi shandaar aur lajawab update hai bhai,
ye nakul to kisi aur hi baat se itna pareshan hai,
Aur aakhir itne paise gum kaise gaye,
Ab dekhte hain ki aage kya hota hai
 

Aakash.

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Aap kaun sir pahle kabhi nahi dekha ... Oh aap wahi hai na jo bhanwar ko bich me chhod gaye the ... Kaise hain mode saar
Pahle kabhi nahi dekha to ab dekh lo sir... or aap bhanwar story ke writer hona... :lol:
 

Iron Man

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श्रावण मेला ।। भाग:-1







2 दिनो की लगातार छुट्टी के बाद मै वापस अपने किताब में खो गई, लेकिन इस बार मैंने किसी भी दिन नकुल को नजरंदाज नहीं किया. हर दिन मै उससे 2-3 बार तो मिल ही लिया करती थी. उसके साथ वक्त बिताना कितना आसान होता था. कभी वो मुझे चिढ़ाता तो कभी मै उसे और अक्सर ही हम दोनों मिलकर सबको चिढ़ाया करते थे...


लगभग 10 दिन बाद शावन की पहली सोमवार की ठीक एक रात पहले रवि का संदेश आया…. "बहुत दिनों से देखा नहीं है और बात भी नहीं की, एक बार शक्ल दिखाकर बात कर लो."


मैंने भी रिप्लाइ में अपनी एक पुरानी तस्वीर भेजते… "चेहरा देख लिए, अब 10 मिनट है तुम्हारे पास"..


रवि:- ऐसे नहीं आमने सामने फेस टू फेस..


मै:- क्यों, फिर तुम्हारी श्वांस अटकने लगी है क्या? देखो रवि अकेले में मुझे तुमसे डर ही लगेगा. मै प्रतियोगिता परीक्षा की तैयार कर रही हूं, और यहां लोग, बात करने का मतलब कुछ और ही निकाल लेते है… मै किसी स्कैम में फंसकर डायवर्ट नहीं होना चाहती..


रवि:- मै वादा करता हूं, तुम्हे जारा भी असुरक्षित मेहसूस नहीं होने दूंगा..


मै:- गांव में मै भी रहती हूं रवि.. शुरू शुरू मे लड़के दिखते बहुत सभ्य और संस्कारी जैसे है. लेकिन उनसे अकेले मिलने पर यदि वो कुछ गलत कर दे तो हम लड़कियां खुलकर विरोध भी नहीं कर सकती, ये बात तुम लड़को को भी पता होती है, इसलिए कुछ भी करने से पहले हिचक भी नहीं होती.. और एक बार तुम ऐसा कर भी चुके हो…


रवि:- मै तुम्हे पांचवीं क्लास से चाहता हूं, तुम्हारे 8th क्लास में पहुंचने तक मै 2 बात फेल होकर 8th में तुम्हारे साथ आ आ गया. मै तुम्हारे साथ गलत करने कि सोच भी नहीं सकता..


मै:- शायद 10 मिनट हो गए है… सॉरी रवि…


रवि:- इट्स ओके, कम से कम बात कर रही हो वहीं बहुत है… मैंने तुम्हारी तस्वीर डिलीट कर दी है….


उसके आखरी संदेश का जवाब देना मैंने जरूर नहीं समझा, लेकिन उसकी बातों से मै मुस्कुरा जरूर रही थी. 6 साल से मेरे पीछे रहा और मैंने कभी नोटिस भी नहीं किया, और ना ही उसने कभी जाहिर होने दिया. कुछ अच्छा जैसा मेहसूस हो रहा था, थोड़ा प्यारा और थोड़ा गुदगुदा सा एहसास. अच्छा ही था जीने में थोड़ा जायका मिल रहा था.


उफ्फ ये सावन का महीना और गांव की कच्ची-पक्की सड़क, छप-छप और किचोड़ों से भड़े परे. इसी के साथ 4 सोमवार का व्रत इस बार 5 शोमवार का था, ऊपर से 8 किलोमीटर दूर शिव जी विराजमान थे..


इस महीने की यही परेशानी रही है. कीचड़ और पानी से मन इतना किच-किच हो जाता की जी तो करता था कि एक महीना उसी गांव में रह जाऊं और चारो सोमवार समाप्त करके ही लौटू. सुबह से ही पुरा गांव मंदिर जाने को तैयार, हर किसी को भोला बाबा को जल जो ढारणा था.


वैसे इस महीने सोमवार की सुबह का आनंद ही कुछ और रहता है. मिश्रा टोला से तो जैसे रैली में गाडियां निकलती है… हमारे साइड से 6 घर और कम से कम 8 गाडियां, जो आगे जाकर फिर नहर के पास बसे 8 परिवार की गाड़ियां मिल जाती है.. वहां से भी कम से कम 12 गाडियां निकलती होगी.. 20 गाड़ियों का काफिला अपने आप में प्राउड टाइप फील करवा जाता है..


फिर तो ये काफिला गांव के सड़क से होते, कई अन्य टोला से गुजरते हुए मंदिर तक पहुंचता है. हां वो अलग बात है कि घर से तो चमचमाती गाडियां निकलती थी, किन्तु मंदिर पहुंचते-पहुंचते मिट्टी से सन जाते थे. 3-4 गांव के बीच का वो मंदिर था इसलिए मंदिर के पास बड़े से मैदान में श्रवानी मेला हर साल लगा रहता था…


मेले में तरह तरह झूले, कई सारी रंग बिरंगी दुकानें, आह वो ताजे जलेबी और सरसो के तेल में छने हुए कई तरह नमकीन.. देखकर ही मन प्रसन्न हो उठता. और गांव के जवान से लेकर बुड्ढों के आकर्षण का केंद्र वहां के रात का औरकेस्ट्रा. इस औरजेस्ट्रा की खास बात ये होती की मूंछ पर ताव दिए हर कंजूस अपनी तिजोरी खोल देता.


किसी ने 25000 दिए दान में तो कोई आगे बढ़ने के लिए 31000 चंदा दिया करता था. हर बार की तरह इस भी होड़ लगी हुई थी और सबसे ऊपर नाम था प्रवीण मिश्रा का.. प्रवीण मिश्रा उसी गिरीश के पिताजी थे, जिससे लगभग 2 लाख रुपए लूट ही लिए थे नीलेश और नंदू ने मिलकर, यदि मैंने टांग ना अड़ाया होता.


प्रवीण मिश्रा उस गांव के मुखिया और क्रिमिनल कहलाते थे. हालांकि मुखिया है तो आगे ज्यादा वर्णन कि तो जरूरत नहीं है, हां लेकिन पैसे और रुतबे में उस इलाके के ब्राह्मण परिवार में सबसे सुदृढ़ थे. बस हम उन्हे जानते मात्र थे, बाकी बहुत ज्यादा बातचीत नहीं थी इस परिवार से...


प्रवीण मिश्रा 2 लाख के दान के साथ पहले नंबर पर थे और दूसरे स्थान पर सदैव की तरह मुखिया चाचा, यानी कि ब्रह्मदेव मिश्रा 1 लाख 85 हजार के अनुदान के साथ और इसी के साथ सबसे आखरी नाम था माखन मिश्रा यानी कि नीलेश के पापा का जिसने 25000 का दान दिया था. इसके नीचे की राशि दान देने वालों का नाम नहीं लिखा रहता… पहले और आखिरी के बीच में 60 नाम लिखे थे..


ओह एक बात बताना ही भुल गई, केवल मिश्रा ही नहीं है इस गांव में और भी दूसरे कास्ट के लोग बसते है और हां कुछ को जबरन भी यहां पैसे देने पड़ते है. जैसे कि रवि के पापा, गंगा अग्रवाल, उसका फिक्स है जो पहले नंबर का दान देगा उसका 60% उन्हे दान देना ही है, वरना दुकान नहीं चलने देंगे.. सो उसका भी नाम था… इसी तरह पास के बाजार के कपड़ा व्यापारी कमलेश महासेठ उसे 50% का दान देना अनिवार्य था.


कुल मिलाकर 4 दिन के शो के लिए मेरे ख्याल से 25 लाख इन लोगों ने केवल नाम दर्ज वालों से इकट्ठा किया था और जो 25 हजार से कम वाले थे उनसे तो मेरे ख्याल से 10 लाख जमा कर लिए होंगे…


इन पूरे पैसों से 1 महीना के मेले का पूरा मैनेजमेंट चलता था. नो पुलिस, बल्कि अर्जी देकर सीआरपीएफ के जवान को बुलाया जाता था और दबी कुचली सी हालात में कुछ डरे हुए पुलिसवाले उसके पीछे खड़े होकर प्रबंधन का काम देखते थे..


बहरहाल अन्य साल की तरह इस साल का भी सबसे शानदार हाईलाइट वही औरकेस्ट्रा ही था और इस बार तो अदाओं से लुभाने आखरी दिन कुछ रसियन नृतकी भी आ रही थी.. आज पहली सोमवार को इस बार कीचड़ नहीं देखना परा। बल्कि भिसन गर्मी का सामना करना पड़ रहा था. सुबह के 8 बज रहे थे और ऐसा लग रहा था पसीने ने हालत खराब कर रखी है.. ओह वैसे आज मै साड़ी में थी और माते श्री की जिद पर मैंने ये पहना था…


आज से पहले मैंने कभी साड़ी नहीं पहनी थी, बस सावन आने वाला था और सोमवार का व्रत मै रखती हूं, इसलिए प्राची दी ने मेरे लिए सारी का पुरा सेट भिजवा दिया था. उनकी चॉइस वाकए कमाल की थी. मेरी बड़ी भाभी ने मुझे साड़ी पहनाया उसके बाद मै थोड़ा सा मेकअप करके जब आइना देखी तो खुद में शर्मा गई.



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साड़ी में अलग ही रूप खुलकर आ रहा था मानो अचानक मै बड़ी हो गई हूं. लग ही नहीं रही थी मै वहीं मेनका हूं. निकलने से पहले मैंने कुछ तस्वीरें अपनी ली और बाहर आ गई. लोगों की प्रतिक्रिया देखकर मै थोड़ा शरमा भी रही थी और चेहरे पर मुस्कान भी थी.


इसी क्रम में नकुल अचानक ही घर में आया. दरसअल मै पीछे मुड़ी हुई थी और वो चारो ओर देखकर मेनका दीदी, मेनका दीदी कर रहा था. उसकी बात सुनकर दोनो भाभियां हसने लगी और मै जब मुड़कर उसके सामने हुई तो वो मुझे देखकर चौंकते हुए कहने लगा… "मै तो बच्चा दिखने लगा इसके सामने".. उसकी बात सुनकर हम तीनों ही हसने लगे..


मै:- देख लिया हो तो वो काम भी बता दे जिसके लिए चिल्ला रहा था..


नकुल:- दादी, इसे सबके बीच में रखना आज तो पक्का इसे नजर लगने वाली है..


उसकी बात सुनकर मै मंद-मंद मुस्कुराने लगी. तभी छोटी भाभी टपक पड़ी… "पहली नजर कहीं तेरी ही ना कह जाए नकुल"..


मै:- आप लोग इतना छेड़ोग तो मै जा रही चेंज करने..


मां:- ना ना, कोई कुछ नहीं बोलेगा.. नकुल तू किस काम से आया था..


नकुल:- ओह हां ! मेनका दीदी वो तुम्हारी सहेली लता का कॉल मेरे पास आया था, उन्हें बात करनी थी आपसे और आपका नंबर बंद आ रहा था..


मै:- हां, चल हम साथ चलते है, ये लोग आते रहेंगे..


नकुल:- नाह ! तुम दादी के साथ ही आओ..


मै:- ऐसा क्या हो गया जो साथ नहीं ले जा रहा आज..


नकुल:- तुम्हे मेरे साथ देखकर लड़के जान बूझ कर आएंगे मेरे पास और उनकी हरकतें देखकर मेरा खून खौल जायेगा…


बड़ी भाभी:- और मेनका की जगह अपनी बीवी को ले जाता तब. उस वक़्त खून ठंडा करके निकलता क्या घर से..


"पागल हो गए है सब, जिसे जिसके साथ जाना है जाओ, मै बाहर ही खड़ा हूं"… नकुल अपनी बात कहते बाहर चला गया, मां और दोनो भाभियां उसे देखकर हसने लगी. मुझे लग गया इन हालातों में इनके पास रुकना खतरे से खाली नहीं क्योंकि इनका खरनाक वाला मज़ाक शुरू हो चुका था.


मै भी नकुल के पीछे ही आ गई और उसका हाथ पकड़कर कार तक ले गई… "तू चल मेरे साथ बाकी को आने दे. बहुत सी बात उन लोगों के सामने नहीं हो सकती"…


मै कार में बैठते ही…. "तूने किसी को मेरा परमानेंट नंबर तो नहीं दिया है ना"..


नकुल:- मै तुम्हारा दूसरा वाला नंबर किसी को ना दू, परमानेंट तो दूर की बात है..


मै:- अरे वो दूसरे नंबर को लगता है किसी ने बांट दिया था, मुझे वो सिम ही निकालकर फेकना पड़ गया.


नकुल:- जरूर तूने उस रवि को दिया होगा नंबर.…


मै:- हां दी तो थी.. सॉरी..


नकुल:- हां ठीक है मुंह मत लटकाओ, पहले लता से बात कर लो, और आइंदा संभल कर अपना नंबर देना…


हम धीरे-धीरे रॉ के साथ आगे बढ़ रहे थे. मै लता को अपने नए वाले दूसरे नंबर से कॉल लगा दी… वो भी तो गांव की ही थी. नया नंबर देखकर तो पहले 2-3 बार कॉल ही नहीं उठाई. जब मैंने अपना नाम मैसेज में भेजी, तब जाकर उसने कॉल उठाया और उठाते ही… "कहां हो, आजकल तो कॉलेज में तुम द्वितीय के चांद जैसा नजर आती हो"…
Behad hi shandar or jabardast update
Nilesh ki faimly kafi chalak hai daan karne me dushro ko aage kar deti hai . Ab lata kya khabar sunati hai .
 

aman rathore

Enigma ke pankhe
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अध्याय:- 8 ।। पहला हिस्सा




मै अपनी ही सोच मे इस कदर डूबी रही की मुझे ख्याल ही नहीं रहा कि रवि भी मेरे पास ही खड़ा है. मेरे आखों के सामने वो चुटकी बजाते हुए पूछने लगा... "क्या हो गया मेनका, कहीं कुछ करने का गहरा ख्याल तो दिल में नहीं आ रहा"…


मै:- नहीं मुझे बस नकुल की चिंता हो रही है? तुम नहीं जानते मै कितना घबरा रही हूं? रवि क्या नकुल भी नीतू के साथ यहां लाइब्रेरी आता था?..


रवि से जब मै यह सवाल पूछ रही थी, मेरा दिल जोड़ से धड़क रहा था. मन में बेचैनी और व्याकुलता इस ख्याल से भी था कि कहीं नकुल इनका छिपा हुआ साथी तो नहीं. मै अपने सवाल करके बस रवि के ओर जिज्ञासा भरी नजरों से देख रही थी...


रवि:- मै उतना नहीं जानता, हां ये जरूर बता सकता हूं कि पिछले 10 दिनों से नकुल और नीतू में कोई बातचीत नहीं हुई और ये तीनों लड़के जो आज गए है उसके साथ 2 लड़के और आते है… उन पांचों ने नीतू का भरपूर मज़ा लिया है… इनके बीच की कहानी का पता नहीं, लेकिन जिस दिन से नकुल और नीतू बात बंद हुई है, नीलेश और नंदू ने जमकर भोगा है नीतू और उसके दोस्तों को वरना पहले जब कस्टमर आते थे तभी ये साथ नजर आते थे...


मै:- ठीक है अब तुम निकलो, मै जारा नकुल से मिलकर आती हूं..


रवि:- मेरा पूरा इस्तमाल कर ली और मुझे भगा रही... कुछ देर मेरे पास भी वक्त बिताओ ना...


रवि की बात सुनकर मै उसे आंखे दिखती.… "प्यार से बात क्या कर ली, तुम्हारी उम्मीदें ही बढ़ने लगी है रवि.. बिल्कुल साइलेंट होकर निकलो और हां तुम्हे जो नंबर दी हूं वो इरेगुलर नंबर है, फोन करके परेशान किया तो सिम फेक दूंगी और तुम्हे मार डालूंगी"…


रवि:- जी मिस जैसा आप कहें..


रवि जब उतरे मुंह के साथ गया बड़ा प्यारा लग रहा था. पता नहीं क्यों, लेकिन रवि अच्छा लग रहा था. रवि के साथ छोटी-छोटी 2-3 मुलाकात के बाद परिवार में ऐसा खोई की ये चैप्टर तो दिमाग में था ही नहीं, और जब रवि आज सामने आया तब भी उसे दिमाग में रखने लायक नहीं सोच पा रही थी, क्योंकि सामने जो कहानी चल रही थी, दिमाग उसमे पुरा उलझा हुआ था…


खैर नकुल से पहले मै यहीं कॉलेज में मिलने का सोची थी, लेकिन मामला नाजुक था इसलिए बात करने के लिए मैंने कॉलेज को सही जगह नहीं माना और घर वापस चली आयी. तकरीबन 2 बजे नकुल कॉलेज से लौटता था इसलिए मै भी 2 बजे के करीब नकुल के घर चली गई...


2 बजे से 4 बज गए लेकिन नकुल का कोई पता नहीं था. यूं तो मै नकुल की मां के साथ बात कर रही थी लेकिन मेरा ध्यान दरवाजे पर ही था.… "क्या हुआ मेनका बार-बार दरवाजे के ओर देख रही, नकुल का इंतजार कर रही है क्या?"


मै:- हां भाभी, 2 बजे आता था अभी तक नहीं आया... कितने दिन हो गए उससे ठीक से बात तक नहीं की मै...


नकुल की मां:- वो तो कॉलेज से सीधा तेरे भैया (नकुल के पापा) के पास गया होगा, उसे देर लग जाएगी आने मे. वैसे मुझे बताने से तो माना किया था लेकिन फिर भी बता दे रही हूं, नकुल तुमसे काफी नाराज चल रहा है.


दांत जीभ तले दबाते मै अपना चेहरा सिकोड़ती हुई भाभी से कहने लगी... "हां जानती हूं भाभी, तभी तो मनाने आयी हूं, लेकिन लगता है इंतजार करना होगा"..


नकुल की मां:- मेनका तू जा, जब वो आएगा तो मै कॉल कर दूंगी..


मैं भी "ठीक है भाभी" कहती हुई वहां से चली आयी. नकुल से पहले तो थोड़ी बहुत बात हो भी जाती थी, लेकिन महीने दिन मैंने उसपर जारा भी ध्यान नहीं दिया... यह बात रह-रह कर मेरे दिमाग में आ रही थी. मै अपनी बेवकूफी पर खुद से ही नाराज चल रही थी. महीने दिन कि घटना दिमाग में ही घूम रही थी, कैसे नकुल मेरे कमरे में आता था और मै बिना बात किए ही अपने लैपटॉप और किताबो में घुसी रहती थी..


नकुल के बारे में सोचकर पता नहीं क्यों मेरे आखों मे अपने आप ही आशु आ गए. मै अपने व्यवहार के लिए खुद मे ही शर्मिंदा हुई जा रही थी. रात को तकरीबन 8.30 बजे नकुल की मां ने मुझे बताया कि नकुल अभी पहुंचा है, यदि कहे तो भेज देती हूं. मै ही भाभी को माना कर दी और बोली कल कॉलेज में ही बात कर लूंगी.


रात भर पढ़ाई मे भी ध्यान नहीं लगा. सुबह उठकर बुझा सा चेहरा लिए मै नकुल के बारे में ही सोचती रही. फिर खुद ही अपने सर पर हाथ मारती खुद से ही कहने लगी.… "जो हो गया उसपर चिंता क्यों करना, नाराज ही तो है, माना लूंगी. थोड़ा डांटेगा तो सुन लूंगी"…


इसी ख्याल के साथ मै खिलखिलाती हुई तैयार हुई. सबसे पहले प्राची दीदी को कॉल लगाकर उनके जन्मदिन की उन्हें बधाई दी. कुछ देर बातचीत के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ काम है इसलिए वो दिन मे कॉल करेगी और मेरा पूरा वक्त वीडियो कॉल पर लेगी. मै भी मुस्कुराकर उनकी बात का अभिवादन की और कॉलेज के लिए निकल गई.


मै लगभग 2 क्लास बीतने के बाद, देर से तकरीबन 9.30 बजे सुबह कॉलेज मे थी. कॉलेज पहुंचकर मैंने तुरंत कॉल करके नकुल को बाहर बुलाया. वो मुझसे नाराज था, पिछेल एक महीने से मिली नहीं ना और ना ही थोड़ा भी वक़्त दिया इसलिए उसे अखर गया था.


देखा जाए तो हम दोनों एक ही जैसे थे.. परिवार को अपना मानने वाले.. बहुत से बातों में दिमाग तेज चलता था तो बहुत से बातों में हम केवल भोंदू थे.. अपने हिसाब से हर कोई समझदार ही होता है लेकिन उम्र और तजुर्बा भी कोई चीज होती है…


थोड़ी ही देर में नकुल बाहर आ चुका था.. मै उसे गौर से देख रही थी. बुझा सा उतरा चेहरा मानो घंटो बैठकर कहीं रोया है… भाई, दोस्त, बच्चा हमदर्द जो समझिए उसे.. वो था मेरे लिए नकुल, तो सवाभाविक सी बात है उसका उतरा चेहरा कैसे देख सकती थी…


"क्या हुआ, क्यों परेशान कर रही थी. और दिमाग क्या घास चरने गया था जो कल क्लास में आकर ऐसे मेरे पास बैठ गई, कोई उल्टा सीधा कमेंट कर देता तो"… नकुल काफी गुस्से में चिल्लाते हुए कहने लगा…


मै:- चल छोटी सी ड्राइव पर चलते है, यहां से घूमकर मंदिर और मंदिर से फिर यहां..


नकुल:- कॉलेज के बहाने अब तुम घूमने जाओगी, आज मेरे साथ ज रही. कल किसी और के साथ.. देखने में कुछ भी गलत नहीं लगता है.. लेकिन हम सही है ये सोचते-सोचते कब गलत हो जाता है पता भी नहीं चलता.…


मै:- तुम्हे शर्म आनी चाहिए नकुल, मै तुझसे मिलने आयी थी यहां… कोई और कहता ना ये बात तो मै उसका जुबान खींच लेती… रुला दिया मुझे पूरे कॉलेज के बीच में… और कुछ सुनाना बाकी रह गया है तो वो भी बोल दे.. चरित्र पर तो उंगली उठा ही चुका है...


मुझे सच में रोना आ गया उसकी बात पर.. मैंने आखों पर काला चस्मा डाला और वहां से सीधा अपनी कार के पास, जैसे ही मै दरवाजा खोल रही थी… "हट मै ड्राइव करता हुं, उधर बैठ"..


मै चुपचाप दूसरी ओर आकर बैठ गई.. नकुल ड्राइव करने लगा.. "सॉरी मेनका, वो मै जारा गुस्से में था"..


मै:- गुस्से में किसी के सामने कुछ भी कह दोगे. क्या कैह गए तुम, तुम्हे एहसास भी है..


मेरी बात सुनकर नकुल खुद को ही जोर-जोर से थप्पड़ मारने लगा... "पागल हो गया हूं मै. मेनका मार मुझे, तू मुझे मार. नहीं मारेगी तो मै खुद को ही मारने लगूंगा. इतनी घटिया बात मेरी जुबान से निकली भी कैसे. रुक ये जुबान ही काट देता हूं मै"...


नकुल की बात से मेरे आत्मा पर चोट तो लगी थी लेकिन उसकी हालत देखकर मै समझ चुकी थी कि ये अपने होश में ही नहीं है, फिर नकुल की बात दिल से भी लगाने की कोई जरूरत नहीं थी. हां लेकिन उसका पागलों जैसा व्यवहार मुझे सोचने पर विवश कर रहा था कि नकुल को हुआ क्या है. कोई भी बात जानने के लिए पहले तो नकुल को शांत करना जरूरी था इसलिए उसे खींचकर एक थप्पड़ मारती हुई कहने लगी.… "पागलपन शांत हुआ तो चुपचाप कार स्टार्ट कर और मुझे बता की इतनी घटिया बात मुझसे कर कैसे गया?"


नकुल:- कह तुम्हे रहा था मेनका, लेकिन भड़ास अपने ऊपर निकाल रहा था…क्योंकि पहले मुझे भी सब सही और जायज ही लगा था, लेकिन शायद यही मेरे कर्मो कि सजा है… तुमने जब कहा था ना कि मुझे कर्ज लेकर मोबाइल नहीं देना चाहिए, तभी मुझे संभल जाना चाहिए था…


मै:- कुत्ता कहीं का. इतने दिनों बाद आयी मिलने और एक ब्रेकअप के लिए मुझे 100 लड़के लड़कियों के बीच सुना दिया… डांट दिया मुझे … तेरी जगह कोई और होता ना तो मै जिंदगी में दोबारा कभी उसकी शक्ल नहीं देखती..


नकुल की बात सुनकर मै राहत की श्वांस ले रही थी. बच्चा है अभी पहला ब्रेकअप के कारण पगलाए है इसलिए मुझे उल्टा बोल दिया. कोई बात नहीं अपना ही बच्चा है मुझे गलत बोलने के बाद दिल से गिल्टी भी तो मेहसूस कर रहा था. पर शुक्र है कि उस नीतू ने अपना नंगा खेल जारी रखने के लिए नकुल से ब्रेकअप कर लिया. लेकिन नकुल ने जैसे ही मेरी बात का जवाब दिया, मेरा दिमाग झटके खा गया.…


नकुल:- मेरी भी शक्ल नहीं देखेगी..


मै:- क्या कहा तूने… ए पागल, बात क्या है बता मुझे… और पूरी बात बताओ..


नकुल:- तू मत सुन जाने दे.. बस एक बात कहूंगा.. कभी कुछ पता चले ना तो तू मुझे गलत मत समझना..


मै:- नकुल देख तू डारा रहा है मुझे… तुझे मेरी कसम है पूरी बात बता क्या हुआ है तेरे साथ…


जैसी ही मेरी बात नकुल ने सुनी, वो स्टेरिंग पर अपना सर रखकर रोने लगा. मैंने झटके से फुट ब्रेक मारा और हैंड ब्रेक खींच दिया.. पहिए आवाज़ करते हुए रुक गए. मेरी तो छाती पूरी ऊपर नीचे होने लगी… "मैंने पापा के 20 लाख रुपए चोरी करवा दिए, वो भी कर्ज लिया हुए पैसा"..

अनियंत्रित गाड़ी के झटके से मेरे उखड़ी श्वांस अब तक काबू मै नहीं आयी थी और कार रुकते ही ये बड़ा सा झटका नकुल ने मुझे दे दिया. नकुल बिना अपना सर ऊपर किए, चींखते हुए कहने लगा. मुझे लगा कि ये ब्रेकअप मे पगलाए है लेकिन उसकी परेशानी की वजह जानकर मै तो बिल्कुल दंग ही रह गई. अंबानी और टाटा बिरला का खानदान तो है नहीं की 20 लाख जाने पर उफ़ तो ना हो, यहां 500 रुपया गुम जाए तो पूरा दिन उसपर ही ध्यान रहता है, यहां तो बात 20 लाख रुपए की थी. नकुल की क्या बात थी, उसकी बात सुनकर तो मेरा दिमाग भी सुन पर गया था.


नकुल की हालत बयान कर रही थी कि वो इतना पागलों कि तरह परेशान क्यों है, फिर जैसे ही उसके बातो पर ध्यान गया... "मेरी भी शक्ल नहीं देखेगी"… मै बिल्कुल सदमे में चली गई.. "नकुल कहीं आत्महत्या की बात तो नहीं कर रहा था"…


मै:- भईया (नकुल के पापा) को कब देने है 20 लाख... नकुल.. नकुल..ल..ल..ल..ल"…


जब मै जोड़ से चिल्लाई तब जाकर वो अपना सर ऊपर किया… "एक जमीन की रजिस्ट्रेशन चल रही है, पापा का कॉल 12 बजे तक आ जाएगा"…


मैंने:- हां तो पागल क्यों बन रहा है चल उनको पहले पैसे देते है.... फिर बाद में सोचते है क्या करना है..


नकुल:- 20 लाख रुपए है मेनका, 20 हजार नहीं..


मै:- मै हूं ना.. चिंता क्यों करता है.. खुद की हालत ठीक कर और बैंक लेले गड़ी..


नकुल:- लेकिन मेनका..


मै:- कोई बात नहीं, पैसे बुरे वक़्त के लिए ही होते है… 20 लाख तुझसे कीमती नहीं है… और खबरदार जो कुछ उल्टा सीधा करने की सोच तो.. भईया (नकुल के पापा) कहां अभी सहर में है..


नकुल:- हां..


मैंने घर कॉल किया और मां से पूछने लगी क्या मै नकुल के साथ सहर चली जाऊं, वो भईया को पैसे देगा और मै उसके बाद कुछ सामान खरीद लूंगी.. मां ने माना नहीं किया और हां कह दी..
:superb: :good: amazing update hai nain bhai,
Behad hi shandaar aur lajawab update hai bhai,
ye nakul to kisi aur hi baat se itna pareshan hai,
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