अध्याय:- 8 ।। पहला हिस्सा
मै अपनी ही सोच मे इस कदर डूबी रही की मुझे ख्याल ही नहीं रहा कि रवि भी मेरे पास ही खड़ा है. मेरे आखों के सामने वो चुटकी बजाते हुए पूछने लगा... "क्या हो गया मेनका, कहीं कुछ करने का गहरा ख्याल तो दिल में नहीं आ रहा"…
मै:- नहीं मुझे बस नकुल की चिंता हो रही है? तुम नहीं जानते मै कितना घबरा रही हूं? रवि क्या नकुल भी नीतू के साथ यहां लाइब्रेरी आता था?..
रवि से जब मै यह सवाल पूछ रही थी, मेरा दिल जोड़ से धड़क रहा था. मन में बेचैनी और व्याकुलता इस ख्याल से भी था कि कहीं नकुल इनका छिपा हुआ साथी तो नहीं. मै अपने सवाल करके बस रवि के ओर जिज्ञासा भरी नजरों से देख रही थी...
रवि:- मै उतना नहीं जानता, हां ये जरूर बता सकता हूं कि पिछले 10 दिनों से नकुल और नीतू में कोई बातचीत नहीं हुई और ये तीनों लड़के जो आज गए है उसके साथ 2 लड़के और आते है… उन पांचों ने नीतू का भरपूर मज़ा लिया है… इनके बीच की कहानी का पता नहीं, लेकिन जिस दिन से नकुल और नीतू बात बंद हुई है, नीलेश और नंदू ने जमकर भोगा है नीतू और उसके दोस्तों को वरना पहले जब कस्टमर आते थे तभी ये साथ नजर आते थे...
मै:- ठीक है अब तुम निकलो, मै जारा नकुल से मिलकर आती हूं..
रवि:- मेरा पूरा इस्तमाल कर ली और मुझे भगा रही... कुछ देर मेरे पास भी वक्त बिताओ ना...
रवि की बात सुनकर मै उसे आंखे दिखती.… "प्यार से बात क्या कर ली, तुम्हारी उम्मीदें ही बढ़ने लगी है रवि.. बिल्कुल साइलेंट होकर निकलो और हां तुम्हे जो नंबर दी हूं वो इरेगुलर नंबर है, फोन करके परेशान किया तो सिम फेक दूंगी और तुम्हे मार डालूंगी"…
रवि:- जी मिस जैसा आप कहें..
रवि जब उतरे मुंह के साथ गया बड़ा प्यारा लग रहा था. पता नहीं क्यों, लेकिन रवि अच्छा लग रहा था. रवि के साथ छोटी-छोटी 2-3 मुलाकात के बाद परिवार में ऐसा खोई की ये चैप्टर तो दिमाग में था ही नहीं, और जब रवि आज सामने आया तब भी उसे दिमाग में रखने लायक नहीं सोच पा रही थी, क्योंकि सामने जो कहानी चल रही थी, दिमाग उसमे पुरा उलझा हुआ था…
खैर नकुल से पहले मै यहीं कॉलेज में मिलने का सोची थी, लेकिन मामला नाजुक था इसलिए बात करने के लिए मैंने कॉलेज को सही जगह नहीं माना और घर वापस चली आयी. तकरीबन 2 बजे नकुल कॉलेज से लौटता था इसलिए मै भी 2 बजे के करीब नकुल के घर चली गई...
2 बजे से 4 बज गए लेकिन नकुल का कोई पता नहीं था. यूं तो मै नकुल की मां के साथ बात कर रही थी लेकिन मेरा ध्यान दरवाजे पर ही था.… "क्या हुआ मेनका बार-बार दरवाजे के ओर देख रही, नकुल का इंतजार कर रही है क्या?"
मै:- हां भाभी, 2 बजे आता था अभी तक नहीं आया... कितने दिन हो गए उससे ठीक से बात तक नहीं की मै...
नकुल की मां:- वो तो कॉलेज से सीधा तेरे भैया (नकुल के पापा) के पास गया होगा, उसे देर लग जाएगी आने मे. वैसे मुझे बताने से तो माना किया था लेकिन फिर भी बता दे रही हूं, नकुल तुमसे काफी नाराज चल रहा है.
दांत जीभ तले दबाते मै अपना चेहरा सिकोड़ती हुई भाभी से कहने लगी... "हां जानती हूं भाभी, तभी तो मनाने आयी हूं, लेकिन लगता है इंतजार करना होगा"..
नकुल की मां:- मेनका तू जा, जब वो आएगा तो मै कॉल कर दूंगी..
मैं भी "ठीक है भाभी" कहती हुई वहां से चली आयी. नकुल से पहले तो थोड़ी बहुत बात हो भी जाती थी, लेकिन महीने दिन मैंने उसपर जारा भी ध्यान नहीं दिया... यह बात रह-रह कर मेरे दिमाग में आ रही थी. मै अपनी बेवकूफी पर खुद से ही नाराज चल रही थी. महीने दिन कि घटना दिमाग में ही घूम रही थी, कैसे नकुल मेरे कमरे में आता था और मै बिना बात किए ही अपने लैपटॉप और किताबो में घुसी रहती थी..
नकुल के बारे में सोचकर पता नहीं क्यों मेरे आखों मे अपने आप ही आशु आ गए. मै अपने व्यवहार के लिए खुद मे ही शर्मिंदा हुई जा रही थी. रात को तकरीबन 8.30 बजे नकुल की मां ने मुझे बताया कि नकुल अभी पहुंचा है, यदि कहे तो भेज देती हूं. मै ही भाभी को माना कर दी और बोली कल कॉलेज में ही बात कर लूंगी.
रात भर पढ़ाई मे भी ध्यान नहीं लगा. सुबह उठकर बुझा सा चेहरा लिए मै नकुल के बारे में ही सोचती रही. फिर खुद ही अपने सर पर हाथ मारती खुद से ही कहने लगी.… "जो हो गया उसपर चिंता क्यों करना, नाराज ही तो है, माना लूंगी. थोड़ा डांटेगा तो सुन लूंगी"…
इसी ख्याल के साथ मै खिलखिलाती हुई तैयार हुई. सबसे पहले प्राची दीदी को कॉल लगाकर उनके जन्मदिन की उन्हें बधाई दी. कुछ देर बातचीत के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ काम है इसलिए वो दिन मे कॉल करेगी और मेरा पूरा वक्त वीडियो कॉल पर लेगी. मै भी मुस्कुराकर उनकी बात का अभिवादन की और कॉलेज के लिए निकल गई.
मै लगभग 2 क्लास बीतने के बाद, देर से तकरीबन 9.30 बजे सुबह कॉलेज मे थी. कॉलेज पहुंचकर मैंने तुरंत कॉल करके नकुल को बाहर बुलाया. वो मुझसे नाराज था, पिछेल एक महीने से मिली नहीं ना और ना ही थोड़ा भी वक़्त दिया इसलिए उसे अखर गया था.
देखा जाए तो हम दोनों एक ही जैसे थे.. परिवार को अपना मानने वाले.. बहुत से बातों में दिमाग तेज चलता था तो बहुत से बातों में हम केवल भोंदू थे.. अपने हिसाब से हर कोई समझदार ही होता है लेकिन उम्र और तजुर्बा भी कोई चीज होती है…
थोड़ी ही देर में नकुल बाहर आ चुका था.. मै उसे गौर से देख रही थी. बुझा सा उतरा चेहरा मानो घंटो बैठकर कहीं रोया है… भाई, दोस्त, बच्चा हमदर्द जो समझिए उसे.. वो था मेरे लिए नकुल, तो सवाभाविक सी बात है उसका उतरा चेहरा कैसे देख सकती थी…
"क्या हुआ, क्यों परेशान कर रही थी. और दिमाग क्या घास चरने गया था जो कल क्लास में आकर ऐसे मेरे पास बैठ गई, कोई उल्टा सीधा कमेंट कर देता तो"… नकुल काफी गुस्से में चिल्लाते हुए कहने लगा…
मै:- चल छोटी सी ड्राइव पर चलते है, यहां से घूमकर मंदिर और मंदिर से फिर यहां..
नकुल:- कॉलेज के बहाने अब तुम घूमने जाओगी, आज मेरे साथ ज रही. कल किसी और के साथ.. देखने में कुछ भी गलत नहीं लगता है.. लेकिन हम सही है ये सोचते-सोचते कब गलत हो जाता है पता भी नहीं चलता.…
मै:- तुम्हे शर्म आनी चाहिए नकुल, मै तुझसे मिलने आयी थी यहां… कोई और कहता ना ये बात तो मै उसका जुबान खींच लेती… रुला दिया मुझे पूरे कॉलेज के बीच में… और कुछ सुनाना बाकी रह गया है तो वो भी बोल दे.. चरित्र पर तो उंगली उठा ही चुका है...
मुझे सच में रोना आ गया उसकी बात पर.. मैंने आखों पर काला चस्मा डाला और वहां से सीधा अपनी कार के पास, जैसे ही मै दरवाजा खोल रही थी… "हट मै ड्राइव करता हुं, उधर बैठ"..
मै चुपचाप दूसरी ओर आकर बैठ गई.. नकुल ड्राइव करने लगा.. "सॉरी मेनका, वो मै जारा गुस्से में था"..
मै:- गुस्से में किसी के सामने कुछ भी कह दोगे. क्या कैह गए तुम, तुम्हे एहसास भी है..
मेरी बात सुनकर नकुल खुद को ही जोर-जोर से थप्पड़ मारने लगा... "पागल हो गया हूं मै. मेनका मार मुझे, तू मुझे मार. नहीं मारेगी तो मै खुद को ही मारने लगूंगा. इतनी घटिया बात मेरी जुबान से निकली भी कैसे. रुक ये जुबान ही काट देता हूं मै"...
नकुल की बात से मेरे आत्मा पर चोट तो लगी थी लेकिन उसकी हालत देखकर मै समझ चुकी थी कि ये अपने होश में ही नहीं है, फिर नकुल की बात दिल से भी लगाने की कोई जरूरत नहीं थी. हां लेकिन उसका पागलों जैसा व्यवहार मुझे सोचने पर विवश कर रहा था कि नकुल को हुआ क्या है. कोई भी बात जानने के लिए पहले तो नकुल को शांत करना जरूरी था इसलिए उसे खींचकर एक थप्पड़ मारती हुई कहने लगी.… "पागलपन शांत हुआ तो चुपचाप कार स्टार्ट कर और मुझे बता की इतनी घटिया बात मुझसे कर कैसे गया?"
नकुल:- कह तुम्हे रहा था मेनका, लेकिन भड़ास अपने ऊपर निकाल रहा था…क्योंकि पहले मुझे भी सब सही और जायज ही लगा था, लेकिन शायद यही मेरे कर्मो कि सजा है… तुमने जब कहा था ना कि मुझे कर्ज लेकर मोबाइल नहीं देना चाहिए, तभी मुझे संभल जाना चाहिए था…
मै:- कुत्ता कहीं का. इतने दिनों बाद आयी मिलने और एक ब्रेकअप के लिए मुझे 100 लड़के लड़कियों के बीच सुना दिया… डांट दिया मुझे … तेरी जगह कोई और होता ना तो मै जिंदगी में दोबारा कभी उसकी शक्ल नहीं देखती..
नकुल की बात सुनकर मै राहत की श्वांस ले रही थी. बच्चा है अभी पहला ब्रेकअप के कारण पगलाए है इसलिए मुझे उल्टा बोल दिया. कोई बात नहीं अपना ही बच्चा है मुझे गलत बोलने के बाद दिल से गिल्टी भी तो मेहसूस कर रहा था. पर शुक्र है कि उस नीतू ने अपना नंगा खेल जारी रखने के लिए नकुल से ब्रेकअप कर लिया. लेकिन नकुल ने जैसे ही मेरी बात का जवाब दिया, मेरा दिमाग झटके खा गया.…
नकुल:- मेरी भी शक्ल नहीं देखेगी..
मै:- क्या कहा तूने… ए पागल, बात क्या है बता मुझे… और पूरी बात बताओ..
नकुल:- तू मत सुन जाने दे.. बस एक बात कहूंगा.. कभी कुछ पता चले ना तो तू मुझे गलत मत समझना..
मै:- नकुल देख तू डारा रहा है मुझे… तुझे मेरी कसम है पूरी बात बता क्या हुआ है तेरे साथ…
जैसी ही मेरी बात नकुल ने सुनी, वो स्टेरिंग पर अपना सर रखकर रोने लगा. मैंने झटके से फुट ब्रेक मारा और हैंड ब्रेक खींच दिया.. पहिए आवाज़ करते हुए रुक गए. मेरी तो छाती पूरी ऊपर नीचे होने लगी… "मैंने पापा के 20 लाख रुपए चोरी करवा दिए, वो भी कर्ज लिया हुए पैसा"..
अनियंत्रित गाड़ी के झटके से मेरे उखड़ी श्वांस अब तक काबू मै नहीं आयी थी और कार रुकते ही ये बड़ा सा झटका नकुल ने मुझे दे दिया. नकुल बिना अपना सर ऊपर किए, चींखते हुए कहने लगा. मुझे लगा कि ये ब्रेकअप मे पगलाए है लेकिन उसकी परेशानी की वजह जानकर मै तो बिल्कुल दंग ही रह गई. अंबानी और टाटा बिरला का खानदान तो है नहीं की 20 लाख जाने पर उफ़ तो ना हो, यहां 500 रुपया गुम जाए तो पूरा दिन उसपर ही ध्यान रहता है, यहां तो बात 20 लाख रुपए की थी. नकुल की क्या बात थी, उसकी बात सुनकर तो मेरा दिमाग भी सुन पर गया था.
नकुल की हालत बयान कर रही थी कि वो इतना पागलों कि तरह परेशान क्यों है, फिर जैसे ही उसके बातो पर ध्यान गया... "मेरी भी शक्ल नहीं देखेगी"… मै बिल्कुल सदमे में चली गई.. "नकुल कहीं आत्महत्या की बात तो नहीं कर रहा था"…
मै:- भईया (नकुल के पापा) को कब देने है 20 लाख... नकुल.. नकुल..ल..ल..ल..ल"…
जब मै जोड़ से चिल्लाई तब जाकर वो अपना सर ऊपर किया… "एक जमीन की रजिस्ट्रेशन चल रही है, पापा का कॉल 12 बजे तक आ जाएगा"…
मैंने:- हां तो पागल क्यों बन रहा है चल उनको पहले पैसे देते है.... फिर बाद में सोचते है क्या करना है..
नकुल:- 20 लाख रुपए है मेनका, 20 हजार नहीं..
मै:- मै हूं ना.. चिंता क्यों करता है.. खुद की हालत ठीक कर और बैंक लेले गड़ी..
नकुल:- लेकिन मेनका..
मै:- कोई बात नहीं, पैसे बुरे वक़्त के लिए ही होते है… 20 लाख तुझसे कीमती नहीं है… और खबरदार जो कुछ उल्टा सीधा करने की सोच तो.. भईया (नकुल के पापा) कहां अभी सहर में है..
नकुल:- हां..
मैंने घर कॉल किया और मां से पूछने लगी क्या मै नकुल के साथ सहर चली जाऊं, वो भईया को पैसे देगा और मै उसके बाद कुछ सामान खरीद लूंगी.. मां ने माना नहीं किया और हां कह दी..

amazing update hai nain bhai,
Behad hi shandaar aur lajawab update hai bhai,
ye nakul to kisi aur hi baat se itna pareshan hai,
Aur aakhir itne paise gum kaise gaye,
Ab dekhte hain ki aage kya hota hai