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Thriller100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)
मै उस वृद्ध व्यक्ति के दिए पुस्तक को देखती हुई अपनी कार तक आयी.. सामने नकुल था, मै मुस्कुराती हुई उसके पास पहुंचती... "भाई चल एक छोटा सा काम करके आते है"..
मेरी बात सुनकर उसके मुरझाए से चेहरे पर भी मुस्कान आ गई... वो मेरे साथ चलते हुए दिन की बात मुझसे करने की कोशिश करने लगा, लेकिन मै उसे मना करती हुई कहने लगी... "अभी बहुत ज्यादा ही सुकून मे हूं, अभी नहीं, बाद में बात करे आराम से फ्लैट पहुंचकर"..
नकुल ने हामी भर दी और यहां लाइब्रेरी मे क्या हुआ वो पूछने लगा.. मै मुस्कुराती हुई नकुल से सारी बात कह गई.. और जब उसका चेहरा देखी तो वही संतुष्टि के भाव भी उसके चेहरे पर थे.. उसके भी दिल में यही ख्याल आया.. "इनके पुराने दोस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए भी यदि मुलाकात करवा दे, तो उनके चेहरे की खुशी देखने लायक होगी"…
मै भी हां में सर हिलाते हुई यही बात कही और सीधा पहुंच गई लियाकत अली के दिल्ली आवास मे.. 5 मिनट बाद हमे अंदर बुलाया गया... लियाकत अपनी बीवी और बच्चो के साथ वही अपने बड़े से हॉल में बैठा था... हमे जैसे ही देखा, वहां से सभी को एक साथ बाहर जाने बोलकर.…. "हम जैसे गरीब के यहां आयी हो, आज रास्ते कैसे भटक गई"…
मै:- क्या भईया ताने मार रहे हो.. छोड़ो आज भी रुकने नहीं आयी हूं..
लियाकत:- हां काम परे तभी आना..
मै:- और क्या बेइज्जती थोड़े ना करवानी है.. अब तक मंत्रिमंडल में सामिल नहीं हुए..
लियाकत:- तू ना मुझे पीछे से चाभी देकर गायब ही ना करवा देना.. कुछ है तो बताओ.. वरना जाने दे..
नकुल:- कुछ होगा तो आपको क्यों बताएं.. वरुण भईया को क्यों ना बताएं.. वैसे कुछ है तो दिमाग मे मेरे..
लियाकत:- चल फिर बताओ…
नकुल:- कोई फायदा नहीं बताकर.. आप उतावले बहुत होते हो.. यही कहूंगा अभी आराम से एक कार्यकाल तो पुरा करो.. और ... फिलहाल हमारा काम कर दो..
कुछ तो नकुल लियाकत को बातों-बातों मे ताने भी दे गया और अप्रत्यक्ष रूप से समझा भी गया.. लियाकत के बदले चेहरे के भाव को मै समझ सकती थी... फिर भी वो सिर्फ इतना ही कहा... "हां बताओ ना.."
मै, उन्हे उस वृद्ध के साथ ली गई एक तस्वीर को दिखाते... "ये आदमी नेशनल लाइब्रेरी में मिल जाएंगे.. कुछ वर्ष पहले जब ये लोग दिल्ली के किसी-किसी ऑफिस में कार्यरत थे, तब इनका पुरा ग्रुप हुआ करता था जो लाइब्रेरी आकर किताबों और रायटर्स पर ग्रुप डिस्कशन किया करते थे...."
"रिटायरमेंट के बाद इनका पुरा ग्रुप बिछड़ गया है... आप पता लगाओ, वो भी बिना इस वृद्ध व्यक्ति की जानकारी के... सबको एक साथ पहले दिल्ली बुलवाकर यहां मुलाकात करवा दो और बाद में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का इंतजाम कर दो.. एक मस्त रिपोर्टर को पीछे लगाओ, मस्त कवर स्टोरी तैयार करवाओ. उनके चेहरे पर मुस्कान ले आओ और लियाकत अली का नाम किसी अच्छे काम के लिए नेशनल टीवी पर भी चलवा दो..."
लियाकत:- 4 दिन बाद रविवार को तुम दोनो यदि उस लाइब्रेरी मे होने का वादा करो तो मै सबके चेहरे की मुस्कान, तुम दोनों को दिखा सकता हूं..
नकुल:- सठिया गए हो, हमे टीवी पर नहीं आना है..
लियाकत:- और मै किसे क्रेडिट दूंगा की किसके कहने पर ये कहानी की तलाश किए..
मै:- हमारे इलाके के सब इंस्पेक्टर नितिन, उसे बुला लो.. और कहानी संज्ञान मे देने का क्रेडिट उसे दे दो.. ईमानदार आदमी को प्रमोशन तो मिल जाएगा..
लियाकत:- आई हेट ईमानदार लोग.. तू सबको भगवान श्री कृष्ण नीति क्यों नहीं पढ़ाती.. उनको दिमाग दे की जिनसे लड़ ना सको, चुपचाप पैसे लेकर काम करते रहो और जब वक्त मिले तो अच्छाई छाती फाड़कर दिखा दे.. तबतक शांति से अपना काम करते रहे...
मै:- हिहिहिजिहि.. अरे हुआ क्या.. क्यों चिढ़े हो मासूम लोगो पर..
लियाकत:- यार मै और वरुण मिलकर कितने प्रोजेक्ट पास करवा रहे, अब काम हो रहा है तो धन भी कमा रहे.. दूसरो की तरह तो नहीं है जो 5 साल काम भी ना करवाए... अब 2-4 रुपया काम करवा के कमा क्या लिया, कुछ बेईमान ने कुछ ईमानदार लोगों के कान भर दिए है, अब वो लोग काम ही नहीं करने दे रहे क्षेत्र में..
नकुल:- पहले ही कहा है हमसे इन मामलों को दूर रखीए.. हमे नहीं इन्वॉल्व होना है..
लियाकत:- अरे दिल की भड़ास निकाल रहा हूं..
मै:- मामला हमारे बीच के लोगों का है क्या.. नकुल 2 मिनट शांत रह ना भाई..
लियाकत:- हां.. ईमानदार है तुम्हारा भतीजा नकुल, मेरे प्यारे अब्बा जान असगर आलम, तुम्हारे भैया वरुण मिश्रा.. बेईमान है डीएम ऑफिस का संदीप श्रीवास्तव, मेरे अब्बा के पुराने दो साथी, महरूफ और अब्बास.., मुखिया बख्तियार की आवारा बहू, नाजरी
मै:- संदीप को छोड़कर तो पूरा मुस्लिम बेल्ट का ही काम है.. फिर क्यों समस्या हो रही है...
लियाकत:- मस्जिद के मामले में फसा हूं..
मै:- अक्ल क्या घास चरने गई है.. आपको पॉलिटीशियन किसने बाना दिया... मोहल्ले की अतिक्रमित जमीन को तो कोई देखने नहीं आता है और आप मस्जिद के मसले मे उलझ रहे... मै क्या ही कह दूं..
लियाकत:- नेशनल हाईवे का बाईपास प्रोजेक्ट है एक कंप्लीट पैरेलल रास्ता निकलने के लिए... मेरे लिए जरूरी है करना.. बस वो दक्षिणी गांव जो है मेरे बाप का ससुराल वो नाटक किए है.. बीच मे 2 मुस्लिम बस्ती और भी तो थी.. मेरे कहे राजी हो गए... 40 किलोमीटर के 6 लेन का काम है.. और 500 मीटर के रास्ता वाले अरांगा डाले है... वो साला श्रीवास्तव का चक्कर है नाज़री से और उन्हीं दोनो ने सबके साथ मीटिंग करके पूरी प्रोजेक्ट मे कहते है 20% चाहिए..
बताओ सेंट्रल के प्रोजेक्ट में जहां हम कोई हिस्सा नहीं लेते किसी प्रोजेक्ट का.. बस ये मान ले कि हमने बड़े-बड़े कॉन्ट्रैक्टर का काम करवाया इसलिए 5 से 7 करोड़ का बांधा है, जबकि कोई भी प्रोजेक्ट 700 से 1200 करोड़ का होता है...
8 बड़े बड़े प्रोजेक्ट सहर मे करवाया, न्यूनतम पैसे लिए है सबसे और उनको लगता है एक प्रोजेक्ट में मेरा 20% हिस्सा है.. बताओ पागलों का कोई जवाब है... साले सब चोर नेता राहत राशि और जमीन पर कब्जा करके कमाने वाले, मै लगातार बड़े-बड़े काम करवाकर कुछ कमा रहा हूं तो इनको आंख लगता है...
मै:- अरे यार नकुल... लियाकत भईया सही तो कर रहे है... बड़े-बड़े प्रोजेक्ट होंगे तभी तो आम आदमी को भी रोजगार का साधन मिलेंगे...
नकुल:- ये है बेवकूफ... और मै नहीं कुछ बोलने वाला.. इसको बोलो पहले अपने टीम से उस मुश्ताक को हटाए पहले...
लियाकत:- लो ये फिर शुरू हो गया..
नकुल:- छठ मे मुझे मिला नहीं वरना वही खेत में उसके लिए कब्र खोदे हुए था... और मै ये आज घोषणा किए देता हूं... यदि मेरी नहीं माने ना, तो ये आपके राजनीतिक कैरियर का आखरी कार्यकाल होगा..
लियाकत:- नकुल तुम हर बात को पर्सनली लोगे तो कैसे होगा...
मै:- अब मै गांव में नहीं हूं तो कितनी बातें हो रही है..
नकुल:- कितनी बातें नहीं... बस एक ही बात हुई है.. उस मुश्ताक ने भड़काऊ भाषण दिया था और दंगे होते-होते रह गया था... तभी उसके बाद ये बाईपास प्रोजेक्ट आया है जहां 18 मंदिर और 3 मस्जिद बीच मे आ रहे है उस 40 किलोमीटर के रास्ते में… जिसमे से गांव का पुराना शिव मंदिर भी है रास्ते में.. इसलिए इनके अब्बा उनके दोस्त वो बख्तियार की बहू, संदीप सब खिलाफ हो गए है, तो ये बेवकूफों की तरह सोच रहे है कि इसके अपने लोग इसके खिलाफ है...
कोर्ट हस्तछेप इसलिए नहीं कर रही है क्योंकि ना इधर से गांव वाले राजी है उस पुराने शिव मंदिर को हटाने के लिए और ना ही बखितियार मुखिया की बहू तैयार है वो पुरानी मस्जिद को हटाने.. दोनो मे जिस इलाके के लोग तैयार हो गए, कोर्ट डेवलपमेंट के नाम पर हस्तछेप कर देगी.. फिर अगली बार आए ना वोट मांगने इनको पता चलेगा..
हम सब समझा रहे है मत परो इस मसले मे क्योंकि दंगा भड़काकर हाई लेवल ड्रामा इसी के कंधे पर रखकर खेला जा रहा है, तो दिमाग इनका काम ही नही कर रहा.. और उस मुश्ताक को तो बिहार भेजना मत.. दोनो पक्ष वाले उसे ही ढूंढ रहे है.. जिस दिन हाथ लगा वो चला जाएगा...
लियाकत:- यार कब सुधरोगे तुम लोग.. मंदिर-मस्जिद के नाम पर डेवलपमेंट नहीं होने दोगे क्या?
नकुल:- अभिनंदन लाल की बैठक में कम रहा करो... उसने जो ब्रेन वाश किया है ना, आपका पॉलिटिकल कैरियर चला जाएगा... चल मेनका, अभी उनका दिमाग नहीं काम कर रहा है... जाकर इमाम के पास झड़ फूंक करवाएगा अभी...
लियाकत की पत्नी जूही... "तुम सुनते क्यों नहीं सबकी.. हर कोई तो एक ही बात कह रहा है फिर भी अपनी जिद पर अरे हुए हो...
नकुल:- कुर्सी ऑफर हुई है ना इसलिए इनका दिमाग काम करना बंद कर दिया है... जब बचाने को कुछ नहीं बचेगा, तब अक्ल खुलेगी...
लियाकत:- बस भी करो तुम लोग... क्या बुराई है अगर 40 किलोमीटर का रास्ता बनवाकर मै मंत्री बन जाऊं तो...
जूही:- जब सांसद ही नहीं रहोगे तो मंत्री कैसे बनोगे..
लीयकट अपनी बीवी को एक थप्पड़ लगाते… "जिस बात का ज्ञान नहीं है उसमे बीच मे मत बोलो"…
मेनका:- सांसद सर ज्ञान तो हमे भी नहीं... चल भाई.. इन्हीं जैसे लोगों के लिए किसी ने कहा है कि विनाश काले विपरीत बुद्धि... जो अपने पिता की ना सुना वो हमारी क्या सुनेगा...
लियाकत:- मुश्ताक को दिया, प्रोजेक्ट भी छोड़ दूंगा.. तो क्या मुझे मंत्रीपद कोई दिलवाने का वादा करता है..
नकुल:- आप एक अच्छे पॉलिटीशियन तो है, लेकिन धैर्य की बहुत कमी है आपमें… पहले खुद मे साबित कर दो की एक सही राजनेता हो... पॉलिटिकल साइंस का विद्वान.. और एक पूर्व गृह मंत्री के चेले को मै ऐसा देखता हूं तो बस दया ही आता है.. पहले खुद मे समीक्षा करो.. फिर ये सरा जहां आपका है... हम भी आपके है और वो पुरा क्षेत्र जो एक होकर आपको जिताया है, वो भी आपका है...
पुरा क्षेत्र ये नहीं जानता था कि लियाकत आलम हमरे लिए काम करेगा की नहीं करेगा, क्योंकि पॉलिटीशियन मतलब नकारा, लड़ाने वाला हम इतने में ही संतोष किए हुए है... शॉर्ट टर्म भीख मे पाए लक्ष्य के लिए यदि अपनी पूरी शिक्षा और अनुभव भुल गए तो अफ़सोस के सिवा कुछ नहीं होगा...
हम चलते-चलते दरवाजे तक पहुंचे ही थे की लियाकत बोलने लगा... "जनवरी में बैठक करवाओ.. सभी खास लोगों की, वहां जो सबका निर्णय होगा वो मेरा निर्णय... मेरा ये लिखितनामा लेते जाओ"…
मै:- हिहिजिहिहिही… लियाकत भईया नकुल की ही केवल सलाह मान लो तो आपको किसी को कहना नहीं पड़ेगा और हर चाहत खुद आपके दरवाजे पर दस्तक देगी... एक बात याद रखना … जो घर हार गया वो दुनिया जीतकर भी कुछ हासिल नहीं कर सकता... जनवरी मीटिंग बहुत दूर है, इमेज सुधारनी होगी इसलिए मीटिंग के लिए बस तैयारी ही कर लो... लेकिन बख्तियार की बहु पर जो इल्ज़ाम लगाया है ना उसके लिए माफी मांग लेना..
नकुल:- अब कुछ बातें उनकी भी सही ही होंगी पागल, बस आवेश में कभी-कभी पागल होकर सब उल्टी कर देते हैं.. अब चल..
मै और नकुल वापस लौट आए.. आज एक ही दिन में कितने ड्रामे हो गए.. और कितनी नई चीजें सामने आ गई.. हाय रे जिंदगी... सालो के बाद कभी-कभी सरप्राइज़ की बारिश ही करवा देते हो...
हम जब वापस लौट रहे थे... "क्यों नकुल बाबू.. इतने लंबे मैटर मुझसे एक बार भी चर्चा तक नहीं... और मिश्रा खानदान वालों ने तुझे क्यों पोस्टर बनाया है ये पॉलिटिकल मुद्दे को विरोध करने के लिए.."
नकुल:- छोड़ जाने भी दे…
मै:- अब मै भी कह दू आजकल मेरे सवाल का जवाब नहीं देना चाहता..
नकुल:- ताने देने वाले टिपिकल लड़की के गुण.. डेवलपमेंट के नाम पर खेत का सीना चिड़कर बीचोबीच रास्ते निकाल रहे.… जबकि दक्षणी लाइन में सड़क की कोई जरूरत ही नहीं थी.. 6 लेन और 40 किलोमीटर का रास्ता इसका मैंने आकलन किया.. लगभग 200 बीघा से ऊपर के खेत प्रभावित होंगे... और रास्ता बनाने में लगभग 50 से 60 बीघा खेत की उपज ज़ीरो...
मंदिर मस्जिद का मसला ना भी होता तो भी मै आंख नहीं मूंद सकता था... इतने खेती के उपज मे कितनों को खिलाया जा सकता है इस बात का अंदाजा तो हो ही गया होगा..
मै:- तू बेस्ट है, लेकिन आज अच्छा नहीं किया तूने.. जान बूझकर रुलाया ना..
नकुल:- शुक्र है बात तो शुरू की, नहीं तो लगा रूठी बैठी है... तेरे से नही माफी मांगा लेकिन तेरे होने वाले के पाऊं मे गिरा था.. हां बस तेरे जाने का इंतजार था, वरना तुझे और बुरा लगता..
मै:- तू 2 मिनट साइड मै ले जाकर पुरा समझा तो दिया कर, करना क्या चाहता है...
नकुल:- उससे क्या होता.. फेक ड्रामा और फेक इमोशन से फेक रिजल्ट ही मिलता है... मै जो समझना चाहता था वो हर्ष के समझ में आ गया..
मै:- यदि तू शांत होकर मामला मेरे हाथ में दे दिया होता, तो भी रिजल्ट सेम ही होता... लेकिन पता नहीं तुझमें ये नए गुण कहां से आ गया... मुझे मेरा धर्यावन नकुल चाहिए समझा...
नकुल:- हम्मम ! समझ गया क्या हुआ है..
मै:- क्या हुआ है...
नकुल:- मैंने कुछ स्टेरॉइड्स लिए थे हो सकता है उसके साइड इफेक्ट्स हो..
मै, अब क्या रिएक्शन दू इसे सुनने के बाद.. मुझे कुछ समझ मे ही नहीं आ रहा था... "तुझ पर चिल्ला दूं, या तुझे समझाऊं.. क्या करूं कुछ समझ मे नहीं आ रहा.. कुछ समझ में आ जाए वही बता दे"…
नकुल, बड़े ही धीमे से बोला... "प्राची से बड़ा दिखना था"… मै पूरी बात सुन ली, लेकिन फिर भी उसे खींचकर एक थप्पड़ जर दी.. गाड़ी थोड़ी अनियंत्रित होकर नियंत्रित हुई.. और मै पूछने लगी… "ठीक से बोल, जो सुनाई दे"…
"सब सुनने के बाद भी नाटक कर रही"… नकुल बुदबुदाए और फिर से उसी गाल पर एक और झन्नाटेदार थप्पड़.. "ठीक से बोल ले"…
नकुल:- वो प्राची से उम्र में बड़ा दिखने के लिए लिया था.. बहुत ही नाम मात्र का डोज था, जो मैंने लिया था..
मै:- हर्ष से इस बात की तूने चर्चा की...
नकुल:- ओह हां मुझे उससे बात तो करनी चाहिए थी... कोई ना कर लूंगा... लेकिन एक बात बोलूं..
मै:- क्या?
नकुल:- जब से मैंने ये स्टेरॉइड्स लिया था उसके बाद से धर्या खोने की केवल 2 घटना हुई है... और दोनो ही केवल हर्ष के साथ, एक 2012 में वही सितंबर के समय में और एक आज... बस..
मै नकुल से गाड़ी साइड करवाई.. नकुल गाड़ी किनारे खड़ी करके अपने दोनो हाथो के बीच पहले ही पुरा चेहरा घुसेड़ लिया था.. और मेरे हाथ में उसके लंबे-लंबे बाल ही आए.. उसी को पकड़कर नचाती हुई, उसके पीठ पर मुक्के मारने लगी...
कुछ देर मारने के बाद खुद को शांत करती हुई... "चल अब गाड़ी चला... कुत्ता तुझे शर्म नहीं आती, अपनी बीवी को दिखाने के लिए मुझे रुला दिया.. तुझे सब पता है ना कि हर्ष हम तीनो जैसा नहीं है"…
नकुल:- और जब हम तीनो मे से कोई ना हो और किसी परिस्थिति में वो अनजानों के साथ आवेश मे आ गया फिर...
नकुल की बात सही थी, और मै समझ गई थी कि वो ये क्यों कर रहा था और हर्ष को क्या समझाया उसने.. मै नकुल से... "सॉरी भाई, ज्यादा जोड़ से तो नहीं लगी"..
चटाकककककककक की जोरदार आवाज आयी और मै अपने गाल को पकड़कर सहला रही थी... तभी नकुल कहने लगा... "तय कर ले कितने जोड़ का लगा था"…
मै:- पागल, तेरे हाथ और मेरे हाथ में अंतर है कि नहीं.. कहां मेरे नाज़ुक मुलायम मासूम से हाथ.. कहां तेरे खेत में काम किए मजदूर वाले हाथ... आंसू निकल रहे, दिखाई भी दिया तुझे...
नकुल:- मेनका मिश्रा कमजोर हो गई क्या? इतने मार से तो उसके उफ़ तक ना हो आज आशु आ गए..
मै:- आदत छूट गई ना मार खाने की... हिहिहिजिहिही
नकुल:- सुबह शाम मै प्रैक्टिस करवा दिया करूंगा..
मै:- सच मे सीरियसली बता.. खा मेरी कसम तू प्रेक्टिस करवाएगा...
नकुल:- हां लेकिन तब, जब हम साथ-साथ रहेंगे, अभी तो स्थाई नहीं नहीं हम में कौन कब कहां होगा...
मै:- हां ये सही रहेगा.. वैसे कुछ तय किया है.. शादी के बाद कहां रहेगा.. और प्राची दीदी कहां रहेगी...
नकुल:- मै सोच रहा हूं कंपनी का सरा ऑफिशियल काम अपने सहर ले जाऊं.. सरा काम ऑनलाइन होगा.. प्राची अगर 3 घंटे ऑफिस देख लेगी तो काम हो जाएगा... सोच रहा हूं शादी बाद सहर शिफ्ट कर जाए.. तू क्या कहती है..
मै:- नकुल इतने बड़े फैसले हम अकेले कैसे ले सकते है, मां-पिताजी के कुछ अरमानों पर तो पानी फेर ही दिए है.. कुछ तो उनकी मर्जी से हो..
नकुल:- अब समझ में आया कि लोग को क्यों कहते है, शादी बाद बदल जाते है.. मुद्दा ये नहीं रहता की उन्हे अपने घर के लोगो से प्यार नहीं रहता, लेकिन मेरी तरह वो लोग भी फैसला लेने से पहले अपने घर के लोगो को भुल जाते है और जब बात खुलती है तो यही छोटी सी बात बड़ी बन जाती है... बहुत सही है.. आगे के फैसले मै अपने घर के लोगों पर छोड़ता हूं... हां कुछ त्रुटी लगी तो समझाऊंगा बस, वो भी केवल 1 बार..
मै:- ये हुई ना बात...
हम दोनों बात करते हुए पहुंचे... मै जैसे ही पहुंची हर्ष मुझे मुस्कुराकर देख रहा था.. मै उसके पास जाकर उसके गले लग गई.. वो थोड़ा असहज मेहसूस कर रहा था... मै उसके सीने से लगी, हर्ष का चेहरे के ओर ऊपर देखती हुई... "थोड़ा प्यार जताने मे कोई बुराई नहीं.. और तुम्हारे गले लगने के लिए मै मरी जा रही थी"..
मेरी बात सुनकर हर्ष मेरे माथे को चूमते हुए, अपने हल्के हाथो से बाहों मे ले लिया.. नकुल और प्राची हम दोनों को देखकर मुस्कुरा रहे थे...
हम सब आराम से जोड़ियों मे आमने सामने सोफे पर बैठ गए... "तुम दोनो के केस में तो हो सकता है थोड़ा समझाने के बाद सब मान भी जाए... हमारे बारे में भी कुछ सोच लो"…. प्राची दीदी बोली
मै:- कमाल है पहले कोई बताएगा... सुबह के ड्रामे के बाद यहां हुआ क्या...
हर्ष:- तुम्हारे जाते ही नकुल सीधा मेरे पाऊं ने गिर गया और कहने लगा आराम से सुन लो फिर तुम्हारी मर्जी.. उसके बाद नकुल ने अपनी बात कह दी की आवेश में आकर हम अपने साथ-साथ दूसरे को भी बेइज्जत करते है... यह गलत है.. जब गुस्सा पर काबू करना आ जाएगा तो हमे यह भी खुद व खुद समझ में आ गई जाएगा की किस परिस्थिति को कैसे संभालना है..
मै:- ऑफ ओ.. ये नहीं रे बाबा... नकुल को जीजाजी मान लिए ना.. वो पूछ रही हूं..
सामने से नकुल और प्राची के हसने की आवाज आने लगी.. बेचारा हर्ष, आह क्या शर्माया सा चेहरा था... शर्माते हुए हर्ष ने कहा दिया... "हां मुझे कोई ऐतराज नहीं है.. इनफैक्ट नकुल बेस्ट है दीदी के लिए पर"…
प्राची:- पर हमारी उम्र के गैप के कारन सीधे बात नहीं कर सकते... हमारी कास्ट के कारन सामने से बात नहीं कर सकते.. सबसे अहम बात सामने से बात करने का कोई मतलब भी नहीं बनता है.. सो पूरे मुद्दे को देखते हुए हमारी शादी की बात आगे बढ़ाने के लिए क्या करना है, उसकी जिम्मेदारी मेरी बुआ सासू को है... क्यों बुआ सासू..
मै:- हिहिहिहिहिही... ठीक से जवान तो हो जाने देते उससे पहले ही सास बाना रहे बेशर्म लोग.. मैंने अपना एक जीजा खो दिया... शादी की डेट तो अप्रैल ही होगी ना..
प्राची:- दिसंबर में क्या बुराई है भाभी.. 3 साल से अफेयर है.. उब गई हूं छुप-छुप के मिलने से... प्लीज प्लीज प्लीज..
मै:- हम्मम ! बात तो सही है... अच्छा डेस्टिनेशन वेडिंग दिल्ली ही रखते है.. कोई ऐतराज..
प्राची:- मैं तो स्विटजरलैंड की प्लांनिंग कर रही थी..
मै:- 20 करोड़ का लगभग खर्च बैठेगा.. बैंक को ईएमआई भी देना पड़ता है दीदी.. वैसे भी 40 से 50 लाख के खर्च मे तो सभी उंगली करने वालो को खरीद लेंगे.. 3 से 5 करोड़ कैश तो राजवीर अंकल ने दहेज के लिए जमा कर रखा है.. बेचारे कंफ्यूज थे की अब अपनी बेटी की हैसियत के लिए दूल्हा कहां से आएगा...
प्राची दीदी मुझे घूरती... "पापा ने इतनी डिटेल तुझ से साझा की, जबकि मुझे बताया भी नहीं"…
मै:- अरे मै उनके साथ तब काम कर रही थी, भटकाव मत, कुछ सोच रही हूं मै... अच्छा एक बात बताओ दोनो (प्राची और नकुल).. मै जो कहूंगी वो आंख मूंदकर करोगे ना.. कोई उसमे सवाल जवाब तो नहीं करोगे...
तीनो ऐसे चौक गए जैसे उनकी आंखें बाहर आ जाएगी... "ऐसा क्या करने वाली है"…. लगभग सभी ने एक साथ ही पूछा..
मै:- शादी के लिए ही ड्रामे होंगे ना.. दोनो चाहते हो ना की शादी दोनो परिवार की मर्जी से हो..
नकुल:- लेकिन नेशनल न्यूज, कहीं कोई गड़बड़ हुई तो..
मै:- गड़बड़ी को भी 100 बार सोचना पर जाए गड़बड़ी के लिए... बस तुम दोनो अंत तक ये कहोगे की हम कैसे शादी कर सकते है.. हमारे बीच कोई भी मैच नहीं है.. हो सके तो झगड़ा भी कर लेना गांव वालों के सामने... लेकिन लेकिन लेकिन ओवर एक्टिंग मत करना..
दोनो झगड़ा करना, शादी से इंकार भी करना और अंत में यह कह देना.. मीडिया में इतना बड़ा अनाउंस के बाद मै पीछे हटी तो मै बर्बाद हो जाऊंगी और मेरे बर्बाद होने का गम नहीं लेकिन मेरे भरोसे जो 4500 लोग है वो अचानक से बर्बाद हो जाएंगे...
नकुल और प्राची क्या जवाब देते उससे पहले हर्ष ही कहने लगा... "सुनने ने एक्साइटिंग है... ऐसा लग रहा है जैसे कोई फिल्मी सीन चल रहा है..."
मै:- सिर्फ इतना अंतर है कि यहां बली चढ़ जाएगी...
नाज़ुक, आश्चर्य से मुझे देखते... "क्या?"
मै:- हां तो... सब कुछ सुरक्षित हो इसे सुनिश्चित करने के लिए केवल मुझे फॉलो करना होगा.. चलो सभा खत्म... दोनो बॉयज एक साथ बेड शेयर करेंगे, ताकि आपसी अंडरस्टैंडिंग बढ़ा सके..
नवंबर का आखरी हफ्ता... आखरी दिन 30 नवंबर 2014 रविवार के दिन गांव में एक आम सभा का आयोजन किया गया था. मुख्य आकर्षण का केंद्र... सांसद लियाकत आलम, सहरी क्षेत्र के विधायक असगर आलम, ग्रामीण क्षेत्र के विधायक वरुण मिश्रा, सभा अध्यक्ष डीएम मुक्ता देसाई और स्वतंत्र रूप से अनुमोदित राजवीर सिंह और रूपा मिश्रा..
रूपा भाभी वरुण भईया अपनी जिद की वजह से लेकर आए थे... वो चाहते थे कि इस सभा के 3 अध्यक्ष मे से एक वो भी हो...
चर्चा का विषय था.. 1) 6 लेन रोड प्रोजेक्ट, 2) लघु उद्योग और हैंड क्राफ्ट मैनेजमेंट 3) कृषि क्षेत्र में नए गुणवत्ता और प्रयोग...
सभा की सुरवत वरुण भईया ने कि.. मंच पर लियाकत आलम को बुलाया गया... पूरी सभा के बीच लियाकत ने सबसे पहले अपने आदमी मुश्ताक के लिए इतना ही कहा... "छोटा सा लड़का बहकावे मे आ गया था, उसका फैसला शांति कमिटी के अध्यक्ष मसरूफ चाचा और मुखिया मिश्रा चाचा (हमारे गांव के मुखिया चाचा) करेंगे.. फिलहाल वो भगा हुआ है...
रही बात उस प्रोजेक्ट की तो मै अगर घर हार गया तो दुनिया जीतकर क्या करूंगा… मेरे लिए मस्जिद इमान है तो मंदिर सजदा... और मै दोनो के दुआ और आशीर्वाद से ही यहां खड़ा हूं.. इसलिए मेरे जिंदा रहते तो वो प्रोजेक्ट नहीं होगा...
हां मै ये मानता हूं कि मुझे विकास की योजना दिखती है तो मै प्रोजेक्ट खींच लेता हूं, लेकिन हमारे बीच हमारे क्षेत्र का सबसे बड़ा गर्व है नकुल मिश्रा... जी हां सही सुने, रघुवीर मिश्रा के पुत्र नकुल मिश्रा, जिसे भारतीय शिक्षा प्रणाली ने 3 साल पहले 12th में रखा था.. वो लड़का जब दुनिया के सबसे बड़े यूनिवर्सिटी लंदन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी मे कदम रखा तो उसे एक हफ्ते में मास्टर डिग्री दे दिए.. और इस साल वो कृषि विज्ञान मे डाक्टर की डिग्री हासिल कर लिया..
हासिल क्या किया.. वो इतना अनुभवी और कमाल का लड़का है जिसे यूनिवर्सिटी खुद डिग्री देकर गई और साथ में अनुरोध भी किया है कि वहां साल में एक महीने ही सही आकार पढ़ाए... लेकिन आप सब का चहेता ने केवल इतना कहा कि सोचकर बताऊंगा अभी जिस गांव ने इस लायक बनाया उसे तो कुछ दे दूं..
वही नकुल मिश्रा आप सब की दूसरी सबसे चहेती बच्ची और अपनी बुआ मेनका मिश्रा के साथ मेरे घर पहुंचा था.. मुझे समझाया कि मंदिर और मस्जिद तो अपनी जगह है ये प्रोजेक्ट तो 250 बीघा खेत के उपज को प्रभावित करेगा और 100 बीघा खेती की जमीन बर्बाद..
इतनी जमीन की उपज कम करके इतनी आबादी वाले देश को भूख के आग में झोंक दूं क्या.. मरना मंजूर है लेकिन ये प्रोजेक्ट मंजूर नहीं..
पहला भाषण समाप्त हुआ, मै स्क्रीन को ही देख रही थी.. सब कुछ जैसा मैंने चाहा था वैसा ही हुआ.. फिर वरुण भईया ने हैंड क्राफ्ट और लघु उद्योग के लिए इस क्षेत्र की संचालक रूपा मिश्रा को आमंत्रित की..
रूपा भाभी मंच पर आते ही सबको हाथ जोड़कर नमस्कार करती हुई कहने लगी... "हमारी माटी ही वीरों कि है.. यहां की माटी ने पूरे समाज को दिया ही है कुछ लिया नहीं है... इस माटी से दूर होकर अपने अस्तित्व को शसक्त करने के साथ साथ पूरे क्षेत्र का नाम ऊंचा किया है, प्राची सिंह ने..
प्राची सिंह के लिए इतना ही कहूंगी, लोग जब ऊपर जाते है तो दोनो हाथ से पैसा बनाते है, लेकिन वो बेटी है जिसकी.. उनको परिचय की जरूरत नहीं.. श्रीमान राजवीर सिंह, जिन्होंने अपने जीवन काल में ना जाने कितने परिवार को रोजगार दी है..
उसी परंपरा को आगे बढ़ाती हुई उनकी बेटी प्राची सिंह हैंड क्राफ्ट के मार्केट को ना सिर्फ हमारे लिए खोली, बल्कि विदेश तक से वहां के कारीगर को बुलवाकर हमे अच्छी गुणवत्ता का कम सिखाया..
मसाले की पैकिंग, मर रहे हमारे यहां के हाथ के बने अचार, अदौरी, और अन्य चीजें को, घर-घर में पहुंचाने के लिए, लघु उद्योग स्थापित किए.. वो लोग हमारे हाथ का बना खाकर हमे ही दुआ देते है और जानते है कि ये सब सामान कहां बनता है, क्योंकि प्राची सिंह ने साफ लिखा है कि ये सब सामान किसने बनाया और वो केवल बेच रही है..
इसका मतलब समझते है.. आपका सामान कोई अमेरिका वाला खाकर, आपको जानता है ना कि केवल प्राची की कंपनी को.. ये तो हो गई नाम की बात.. इसके अलावा जबसे उसने बेचने का रास्ता खोला है, कुछ 2500 परिवार के गृहणी को पार्ट टाइम 1000 से 1200 रोज कमाने मिल रहा है..
इसका मतलब यह हुआ कि आपकी घर की औरत, अपना चूल्हा चौका करने के बाद जो चुगली करके झगड़ा करने में समय बर्बाद कार देती थी, उतने समय में वो 1000 से 1200 रोज का कमाई कर लेती है.. पुरषों की कमाई को तो जाने दीजिए.. इतना ही नहीं उनकी कंपनी ने लगभग देश भर में 8000 लोगो को रोजगार भी दिया है.. जानती हूं ये संख्या कम है लेकिन है तो सही..
अब सबसे खास बात के लिए मै अपने क्षेत्र की डीएम मैम को बुलाना चाहूंगी.. जो की रिश्ते में ननद हुई और आप भी इन्हे अपने गांव की बेटी ही समझिए... अब इसका मतलब यह नहीं कि हर दूसरे दिन डीएम आवास पहुंच जाओ धरना देने. उसके लिए वरुण मिश्रा और लियाकत अली का घर है.. असगर चाचा को भी जाने दो.. वो अब बूढ़े हो गए है.. इसलिए तो सहर दे दिया है, ताकि इनका ज्यादातर काम सरकारी बाबू कर दे और ये केवल साइन करते रहे...
ये दूसरी गोली भी निशाने पर थी.. रूपा भाभी गई सब कहकर... तीसरी गोली अभी चलने वाली है...
मुक्ता दीदी माईक पकड़ते ही... सभा को नमस्कार करके संबोधित की और फिर अपनी बात रखी..
"हमने ज्यादा समय नहीं रखा इस आम सभा का, इसलिए जल्द ही मै भी अपनी बात समाप्त करूंगा.. लेकिन उससे पहले एक छोटी सी घटना बताती हूं.... पुलिस जॉब एक ऐसा प्रोफेशनल होता है जहां लोग जान पहचान तो रखते लेकिन केवल इसलिए कि उनका चालान ना काटे, छोटे-छोटे गलती हो जाए तो पुलिस परेशान ना करे..
इस गांव के एक लड़के से मेरे पति की जान पहचान हुई.. वही घटना में जिसका जिक्र ना ही करे यहां तो बेहतर है.. क्योंकि इस गांव ने उस केस में सबसे ज्यादा जिल्लत उठाई है..
खैर वो दौड़ कुछ और था और उसी दौड़ में नकुल मिश्रा से अच्छी पहचान हुई थी मेरे हसबैंड की.. लोग भईया-भाभी बनाते है.. नकुल ने मेरे हसबैंड से कहा था मेरे पास बहुत भाई है, मेरे जीजा बनो.. क्योंकि मेरे पास केवल एक बहन है.. ये है नकुल मिश्रा.. जो ना तो मुझे जानता था ना कभी मिला, एक बार उसने बहन क्या बनाया मुझे यहां मेरा दूसरा मायका मिल गया..
डीएम के तौर पर मेरी ये तीसरी पोस्टिंग है और यहां काम करके जो मुझे सुख मिलता है वो कहीं नहीं.. खैर निजी बातें ज्यादा हो गई है.. अब वक्त है घोषणा का..
प्राची सिंह की मध्यस्था मे एक प्रोजेक्ट मेरे डीएम ऑफिस में पहुंचा है... 10 करोड़ वो अपने लोगों के लिए लगाना चाहती है, क्योंकि यहां के लोगो ने उसके कंपनी के नाम बनाने में अहम मदद की है.. यहां से लघु उद्योग और हैंड क्राफ्ट के कारन उसकी अलग पहचान है..
10 करोड़ वो अपनी ओर से दे रही है, यहां के लोगों के लिए लघु उद्योग और हैंड क्राफ्ट के प्रशिक्षण केंद्र खोलने के लिए. बाकी उन्होंने पहले यहां की सरकार से मदद मांगी है कि बाकी पैसा यहां की सरकार लगाए.. इस पूरे प्रोजेक्ट को मै निजी रूप से देखकर, पुरा एस्टीमेट तैयार करूंगी और फाइल यहां के ग्रामीण विधायक वरुण मिश्रा के पास ट्रांसफर होगी और उनके साथ गवर्नमेंट एप्रोवाल के साथ जल्द ही काम शुरू होगा...
इसी के साथ जो आखरी चर्चा का विषय है कृषि क्षेत्र में नए गुणवत्ता और प्रयोग.…
मै पुरा लाइव देख रही थी... आखरी प्वाइंट जब चर्चा के लिए आयी, उससे पहले ही आंनद जीजू का कॉल पहुंच चुका था.. वहां डीएम के साथ आए अधिकारी ने वहां लगे बड़े बड़े स्क्रीन पर न्यूज चैनल को चलाया और बड़े से बुफर में न्यूज सुनाई भी देने लगा...
एक क्लिप चली जिसमें प्राची दीदी और नकुल एक कमरे से निकलते देखे जा रहे है... मीडिया के कई सारे माईक और एक ही सवाल... "मैडम आप अपने ही कंपनी के वाइस चेयरमैन के साथ इस सस्ती सी जगह में क्यों आयी थी"…
प्राची दीदी बिल्कुल वैसे ही एंग्री एक्सप्रेशन देती... "देखिए आप पहले ढंग से सवाल पूछिए, आपकी बदतमीजी के लिए आपको मै कोर्ट में घसीट सकती हूं"…
तभी दूसरा रिपोर्ट... आप और आपका ये वाइस चेयरमैन बिहार उसी बहुचर्चित क्षेत्र से है ना जहां की लड़कियां जिस्म फरोशी के जरिए, सरकारी अधिकारियों को करप्ट करके, करोड़ों के टेंडर अपने मालिकों के नाम करवा लेते थे,.. सुना है महज 5 साल मे आपकी कंपनी ने 2 शॉपिंग मॉल से 128 शॉपिंग मॉल का सफर तय किया"…
तभी जैसा नकुल को बताया था मैंने.. चटककक्कक से एक जोरदार थप्पड़ ऐसा की उस रिपोर्टर को तो पक्का नानी याद आ गई होगी... उसके बाद तो नकुल रिपोर्ट्स को धक्का देकर किनारे करते हुए, वहां से प्राची दीदी का हाथ पकड़कर निकल गया..
अब बारी थी हुक्म के इक्के कि, जो की रिपोर्टर के एक छोटे से भाषण के बाद आता... शुरू हो गए अब रिपोर्टर्स... "Yours" शॉपिग मॉल के वाइस चेयरमैन ने कि रिपोर्टर के साथ बदतमीजी.. आइए जानते है पहले पुरा मामला...
फिर सामने फ़्लैश हो गया पूरे गांव का दोषी, मुश्ताक, जिसने दंगे भड़काने की कोशिश की थी... रिपोर्टर सभी माईक और कैमरा मुश्ताक के ओर करते.. जी आपने क्या देखा यहां...
मुश्ताक:- मै इन्हीं के क्षेत्र का एक गरीब किसान हूं जिसे झांसा देकर सहर काम करने बुलाया था.. आपने वो केस तो सुना ही होगा जिसमे 62 लोग फसे थे और 32 लोगों को फांसी हुई थी.. उस केस ने मुख्य सरगना 3 लोग थे, नीलेश मिश्रा, नंदू मिश्रा और गिरीश मिश्रा.. ये तीनों ही अभी जो थप्पड़ मारकर गया है नकुल मिश्रा, उसका चाचा था. और ये लोग एक गांव के नहीं बल्कि एक ही कॉलोनी के थे..
इनके लिए काम करने वाली जो लड़की थी नीतू, वो उसके गांव से थी और नकुल के साथ कॉलेज मे थी 11th में.. मै यहां आया तो मुझे शुरू से दाल मे कुछ काला लग रहा था.. 5 साल मे 128 मॉल और इतनी बड़ी कंपनी कैसे.. शायद आज सबको समझ में आ गया होगा...
फिर तो मीडिया सेंसेशन समझते ही है.. मसला न्यूज थी ब्रेकिंग ब्रेकिंग चल रहा था.. अब फोन आया प्राची दीदी के पास और उधर गांव की सभा में फोन माईक से कनेक्ट.… "ये कैसी न्यूज आ रही है"..
प्राची दीदी:- पापा ये सब किया धरा उस लियाकत आलम का है.. सुबह उसी के ऑफिस से फोन आया था कि दिल्ली में एक होटल बिक रही है.. यदि इंटरेस्टेड हो तो साइट विजिट के लिए आ जाइए.. वही ऑनर के साथ एक छोटी मीटिंग कर लेंगे.. वहां पहुंची तो मै और नकुल 1 घंटे तक उसके ऑनर के आने का इंतजार करते रहे..
कई बार लियाकत आलम के ऑफिस कॉल लगाई लेकिन वहां से कोई रेस्पॉन्स ही नहीं था.. एक तो पहले से दिमाग खराब था ऊपर से ये न्यूज़ वाले.. सबको मै कोर्ट मे घसीट लूंगी..
तभी बीच मे मुक्ता दीदी बोल परी... शांत हो जाओ और पहले ये बताओ कि कहां हो तुम दोनो..
प्राची दीदी:- फ्लैट पर हूं.. थोड़ी देर से वकील से ही डिस्कस करने जाऊंगी..
मुक्ता दीदी:- सुनो तुम दोनो वहीं रहो कहीं भी मत निकलो और हमारे फोन का इंतजार करो...
जैसे ही फोन डिस्कनेक्ट हुआ प्राची दीदी गहरी श्वांस लेती... और नकुल मेरे स्क्रीन पर टिकी निगाह का ध्यान तोड़ते पीछे से सर पर एक हाथ मारा. मै पीछे मुड़कर जैसे ही घुरी, प्राची दीदी पूछने लगी.… "अबे ओय मास्टर प्लानर, कंपनी, गांव और हमारी निजी इज्जत पूरी दाव पर लग गई है... देखना आत्महत्या ना करना पर जाए"…
मै:- दीदी चिल करो आप.. वैसे भी न्यू ईयर ईव आ रहा है.. सभी मॉल मे दुगने सामान मंगवा लो.. कल से ग्राहक टूटेंगे उधर...
नकुल:- तूने किस-किस को अपने प्लान मे सामिल किया है.. है मुक्ता दीदी तेरे सारे करामकांड मेरे नाम पर काहे चढ़ा रही थी…
मै:- अरे पहले पंचायत मे देखो क्या हो रहा है..
वहां का आलम यह था कि प्राची दीदी को सुनने के बाद सब लियाकत आलम को देख रहे थे और लियाकत केवल इतना ही कह रहा था कि.… "मै यहां हूं और ये मेरा किया नहीं है... चाहो तो नकुल को फोन करके पूछ लो. यदि उसे भी प्राची की तरह लग गया की ये सब मैंने किया है, तो किसी को सजा देने की जरूरत नहीं मै खुद अभी फांसी लगा लूंगा.."
लियाकत का पक्ष लेती हुई रूपा भाभी कहने लगी... "इसमें कोई 2 राई नहीं की लियाकत का ये सब नहीं किया है बल्कि गंदी राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है..
ये वही हरामजादा मुश्ताक है जिसने पहले हमे लड़ाने की कोशिश की.. फिर न जाने किसके कहे पर उसने लियाकत को एक ऐसा प्रोजेक्ट करने को कहा जिसमे लियाकत की राजनीतिक कैरियर बर्बाद है जाती..
और कोई इतना बड़ा बेवकूफ तो होगा नहीं की हमारे क्षेत्र के अभिमान को उसी दिन फसा दे, जिस दिन आम सभा की बैठक हो और यहां पर भिड़ के हाथो खुद अपने मौत की कहानी लिख दे.. कोई मेरी बात से नहीं सहमत हो तो अपना हाथ उठा दे...
असगर अली:- इसमें कोई दो राय नहीं कि रूपा की सभी बातें सोलह आने सच है.. कोई हमे और हमारे क्षेत्र की सभी गतिविधियों पर नजर दिए है और अपने राजनीतिक फायदे के लिए बहुत गंदी साजिश कर रहा है जिसका मोहरा वो मुश्ताक है..
वरुण मिश्रा:- और कौन होगा हमारे ही पार्टी का मुखिया अभिनंदन लाल है.. महादेव मिश्रा के जाने के बाद हमारे हाथ जैसे-जैसे मजबूत हुए है, उसी का कद नीचे गया है.. अब उसे अपनी सेंट्रल मिनिस्ट्री खतरे में लग रही है, क्योंकि इस वक्त पूरे बिहार का सबसे मजबूत सांसद लियाकत ही है.. कुर्सी जाने के डर से बौखलाया हुआ है, इसलिए हमे लड़वाकर और बदनाम करके, अपनी मजबूती साबित करेगा कैबिनेट मे..
राजवीर सिंह:- राजनीति में सब कर्म अपनी जगह, लेकिन उन पर हाथ नहीं देना चाहिए जिन्होंने उसे बनाया है.. लियाकत तैयारी करो अपनी मिनिस्ट्री की.. जिस पोस्ट से चिपके रहने के लिए ये गंदी साजिश रची है, उसे साफ करना है.. आज ही अपने सभी मुख्य लोगो की बैठक होगी..
मुक्ता दीदी... आप लोगो के बच्चे अच्छा करके मर जाएंगे, लेकिन आप सब कभी सुधर नहीं सकते.. चलती हूं मै..
राजवीर सिंह:- क्या हुआ बेटा..
मुक्ता दीदी:- "वहां मेरे भाई को बदनाम कर दिया पूरे देश के सामने.. यहां की एक बेटी पर कीचड उछाल दिया की जिस्म बेचकर पैसे कमाए है... और आप लोग सब साफ करने में लगे हो.. जाओ काट डालो सबको लेकिन क्या पूरे देश को समझा पाओगे की क्या हो गया आप लोगों के साथ.."
"ये है आई ए एस बिटिया.. अब बोलकर दिखाओ कोई"… सॉरी, इतने हॉट डिस्कशन को बताने के बदले मै मुक्ता दीदी की तारीफ कर गई.. लेकिन मै भी क्या करूं, आज तक कभी मुक्ता दीदी ने मुझे बोलने में जितने नहीं दी.. खैर आगे सुनिए वहां क्या हो रहा है...
रघुवीर भईया, नकुल के पापा... "सही कह रही हो मुक्ता, ये सब ऐसे ही है.. मेरी पत्नी के ओर से मै यहां कुछ कहने आया हूं.. उसने कहा है की राजनीतिक रंजिश मे आज जो 2 लोग बदनाम हो हुए है, वो दोनो मेरे बच्चे है.. इज्जत जहां गई है यदि वहीं से इज्जत वापस नहीं आयी, तो मै अपने बच्चो की कसम खाती हूं, कल सुबह तक आत्म दाह कर लूंगी और वो पूरी वीडियो रिकॉर्ड करके भेज देना न्यूज वालों के पास और कहना तुम्हारे न्यूज का नतीजा.."
हाय मेरी प्यारी आशा भाभी.. ये ओरिजिनल भावना थी.. हमने केवल रूपा भाभी को सेट किया था और उन्होंने मुक्ता दीदी को.. बाकी के पॉलिटिकल ड्रामे तो पहले से रचित थे जो वरुण भईया और रूपा भाभी कई दिनों से रच रही थी, जिसमे आप समझ ही चुके होंगे किसे लपेटना था.. वरुण भईया के ही पार्टी के मुखिया अभिनंदन लाल को... हां बस वो लियाकत नाटक कर रहा था, शायद पीछे से लंबी-लंबी बत्ती परी हो, तो भिग्गी बिल्ली बाना हुआ था आम सभा में.…
वरुण भईया:- मुक्ता दीदी ने बिल्कुल सही कहा है हम कितना भी बदला ले लें, लेकिन पूरे देश के सामने जो फजीहत हुई है उसे क्या सबके कान में बताएंगे की भाई ये कहानी है...
आशा भाभी (नकुल की मां) ने भी सही कहा है.. किसी मां के बच्चो को ऐसे बदनाम कर दोगे जो बिचारे तुम सब को ऊपर उठाने की कोशिश में लगे है तो फिर ऐसे समाज का ही क्या फायदा हुआ...
जाओ पूरे सहर मे आग लगा दो तो क्या उससे बदनामी का कलंक मिटेगा.. कुछ साल बाद फिर कोई अपने क्षेत्र से तरक्की करेगा.. उसके तरक्की का भी राज वही जिस्मफरोशी बताएंगे और हम तब भी ऐसे ही लोगों को मारने मे लगे रहेंगे..
क्या गलत तरीके के केवल हमारे समाज में ही कुछ लोगों ने पैसे कमाए है.. क्या दिल्ली, बम्बई मे ऐसे करप्शन नहीं होते. कहां उन प्रेस वालों की हिम्मत होती है पूरी दिल्ली को लपेट लो.. कह दे तो दिल्ली के सभी उद्योगपति जिस्मफरोशी के जरिए ही तरक्की कर रहे... मैडम आप बताओ क्या करे हम..
मुक्ता दीदी:- देखिए मेरा ये केवल सुझाव है, आखरी फैसला आपका.. थोड़ा ऊपर उठकर सोचिए.. क्या कहा अभी आशा भाभी ने.. "वहां मेरे दोनो बच्चे है. मै आग लगा लूंगी, यदि मेरे बच्चे को बदनाम किया गया तो.." दर्द उनको नकुल के लिए कम होगा, क्योंकि साधारण सी बात है हम लड़को के मामले में थोड़ा आंख मूंद लेते है, लेकिन प्राची भी उसके कलेजे का टुकड़ा ही होगी, तभी तो दर्द छलक आया..
मै बस प्रस्ताव दे रही हूं... नकुल एक जीनियस है, 7 साल का कोर्स वो 2 साल मे पुरा कर लिया है, इसक मतलब जानते है.. वो यहां बैठे हर किसी से ज्यादा दिमाग वाला है बस कभी वो अपनी बड़ाई के पीछे नहीं भगा और राजवीर जी आप भी उसके साथ रहे हो, आपकी क्या राय है नकुल के बारे में...
राजवीर सिंह:- दोनो भाई बहन (मै और नकुल).. मै उन दोनों को भाई बहन ही मानता हूं.. दोनो ही यहां बैठे किसी भी समझदार से 4-5 गुना ज्यादा समझदार होंगे.. मै आपके इशारे समझ गया हूं, लेकिन इसका कोई फायदा होगा क्या.. (इशारे हो चुके थे, प्राची और नकुल के शादी की) क्योंकि मीडिया तो इसे भी केवल एक गेम प्लान समझेगी.. उन्हे तो केवल बदनाम करना आता है..
मुक्ता दीदी:- आप बस सब फाइनल करके कोई नजदीकी डेट बताओ.. आज उनसे माफी नहीं मंगवाई तो मेरा नाम मुक्ता देसाई नहीं...
राजवीर अंकल, रघुवीर भईया को बुलाकर... "मुक्ता के सुझाव और जिस जगह इज्जत गई है, उसी जगह से इज्जत वापस लाने की चाह मे, मै पूरी पंचायत के सामने अपनी बेटी प्राची के लिए उनके बेटे नकुल से शादी का प्रस्ताव रखता हूं...
रघुवीर भाई:- राजवीर जी.. मै तो अपने क्षेत्र के लिए कुछ भी कर जाऊं लेकिन ये पंचायत..
मुखिया चाचा... पंचायत मे स्वेक्षा से इंटर कास्ट शादी का प्रस्ताव है... राजवीर सिंह जी की बड़ी सुपुत्री प्राची का विवाह, रघुवीर जी के एकमात्र सुपुत्र नकुल से तय करने का प्रस्ताव रखा गया है...
तभी पंचायत का एक व्यक्ति खड़ा होकर... "अब तो ले भागा शादी करने के बाद हम बाद में कबूल कर लेते है, फिर अपनी और अपने परिवार की मर्जी से इंटर कास्ट शादी में क्या समस्या है..."
दूसरा व्यक्ति... "शादी विवाह एक निजी अधिकार है, पंचायत को अब इन मामले में तभी हस्तछेप करना चाहिए जब मामला गैर कानूनी विवाह का हो.. मेरा ये मानना है..
फिर तो लगभग सब आगे पीछे चिल्लाते हुए .. दोनो बच्चो को बदनाम टीवी पर किया गया.. इसलिए दोनो को जैसे मर्जी हो अपनी बात रखने दो.. सच को बाहर लाने के लिए कुछ झूट बोलने परे, कुछ ड्रामा और नौटंकी करने परे तो ये पूरी पंचायत करेगी, क्योंकि उन दोनों ने कभी अपने क्षेत्र में मदद करने से पीछे नहीं हटे. आज हम उनके लिए पीछे नहीं हटेंगे... आप सबको जो करना है करो.. बस हमे क्या करना होगा वो बताओ... ताकि ये मीडिया वाले माफी मांग ले..
मुक्ता दीदी... ठीक है फिर आने वाले 15-20। दिन का कोई डेट तय करके बताइए...
18 दिसंबर की डेट फाइनल हुई फिर मुक्ता दीदी ने वहां मौजूद सभी पॉलिटीशियन को सिखाया की क्या कहना है.. बस मीडिया से बात करने में घबराए नहीं...
अब शुरू हुआ मीडिया से माफी मंगवाने की प्रक्रिया..... वैसे तो मीडिया से टेढ़ी चीज कोई नई.. बदनाम पुरा करेंगे क्योंकि लोग चिपके रहते है, लेकिन बात सफाई देने की होगी तो कवर ही नहीं करेंगे, क्योंकि मीडिया की बदनामी होगी, उनकी रिपोर्टिंग की बदनामी होगी..
हां लेकिन नकुल ने जिस रिपोर्टर को थप्पड़ मारा था, उसका प्रतिद्वंदी चैनल मुक्ता दीदी को सुनने के लिए तैयार हो गई.… मुक्ता दीदी से पहला ही सवाल किया गया.. "मैम आप शायद सब कलारीफिएक्शन दे दें, की "Yours" कंपनी के चेयरमैन और वाइस चेयरमैन क्लीन है, लेकिन मुझे आप यह बता दे कि यंगस्टर्स, जो की काफी ऊंचे पोस्ट पर काबिज है वो मीडिया पर हाथ उठाए... क्या ये गलत प्रैक्टिस नहीं है"…
मुक्ता दीदी:- बहुत ही ज्यादा गलत प्रैक्टिस है.. उम्मीद है आपके सवाल का मैंने जवाब दे दिया है.. अब एक सवाल मै भी आपके चैनल के माध्यम से आपसे और आपके तमाम व्यूअर से पूछना चाहूंगा.. क्या इजाज़त है..
रिपोर्टर:- येस मैम..
मुक्ता दीदी:- दो डूब कर प्यार करने वाले लवर्स, जिनकी शादी बस 18 दिन बाद होनी है.. उसकी होने वाली बीवी को नेशनल न्यूज चैनल पर कोई चरित्रहीन होने का सर्टिफिकेट दे रहा हो.. क्या ये सही प्रैक्टिस है... क्या सामने चल रही किसी घटना को बिना तह तक जाने ही किसी का चारित्रिक प्रमाण दे देना यह सही था..
रिपोर्टर:- हां हमने भी वो क्लिप देखा था... वाकई वो सवाल जिस रिपोर्टर ने उठाया था वो, सवाल पूछने का तरीका और लहजा दोनो पूर्ण रूप से गलत था, और मै समझ पा रही हूं कि क्यों हाथ उठ गया था..
मै अपने सभी मीडिया सहकर्मी के ओर से प्राची और नकुल से माफी चाहूंगी.. लेकिन उन्हे भी अपनी बात रखनी चाहिए थी, ना की मीडिया कर्मी पर हाथ उठाना चाहिए था...
उसके बाद तो जैसे ही फिर एक के बाद एक फैक्ट्स आए, यहां तक कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर और स्कॉलर तक आगे आकर नकुल के लिए 2 लाइन बोले...
जैसे ही ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की बात शुरू हुई फिर तो मीडिया का मसला नकुल ही था, जिसने झंडे गाड़े थे और किसी को पता भी नहीं... हर चैनल नकुल की जीवनी खंगलने लगा..
बाद में फिर प्राची और आईआईएम की चर्चा हुई और फिर मीडिया के सामने एक और केस स्टडी था.. प्राची, "Yours" कंपनी और कंपनी मैनेजमेंट जो अकेले प्राची देख रही थी और कैसे उसने लघु उद्योग से साथ-साथ हैंडक्राफ्ट के क्षेत्र में इतना अच्छा काम किया था..
परत दर परत खुलती गई और अंत में मीडिया को पूरा डिटेल दिया गया जहां बीएसएनएल के कॉल रिकॉर्ड तक सुनाया गया, जिसमे साफ सुना जा सकता था कि लैंड डील के लिए प्राची को होटल बुलाया जा रहा था..
उसके बाद वही प्वाइंट निकालकर आया... किसी क्षेत्र में जिस्मफरोशी और भ्रटाचार का मामला होता है तो क्या उस क्षेत्र से अच्छा करने वालों को मीडिया हर बार उसी कांड से क्यों जोड़ देती है..
फिर उदहारण पेश किए गए जिसमे एक ही घर के 4 लोगो के अलग-अलग काम को दिखाया गया था.. एक चोर तो दूसरा साधु... खैर पूरे दिन मीडिया में प्राची और नकुल ही छाए रहे.. सुबह जहां बदनाम हुए थे वहीं रात तक पूरे देश के सबसे बहुचर्चित और लोकप्रिय कपल बनकर दोनो उभरे थे...
मुक्ता दीदी का साक्षात्कार सुबह 10.30 बजे आया, जो की 10 मिनट का था... और उसके आने के बाद ही मीडिया ने पहली माफी मांगी थी... उसके बाद नकुल और ऑक्सफोर्ड ना केवल भारत बल्कि इंटरनेशनल मीडिया की न्यूज तक बन गई, क्योंकि इस उपलब्धि के बारे में किसी को पता तक नहीं था..
12 बजे तक तो गांव की अलग ही तस्वीर नजर आने लगी थी क्योंकि नकुल के लिए इंटरनेशनल स्कॉलर बोल रहे थे और इंडियन गर्वनमेंट के ओर से भी बयान जारी किया गया की नकुल के उसके अच्छे काम के लिए सम्मान दिया जाना चाहिए..
10 बजे तक जो गांव और पूरे क्षेत्र की धूमिल तस्वीर थी उसे अब तक बिल्कुल नए नजरिए के साथ पेश किया जा रहा था, जो की वाकई सबको गर्व का एहसास करवा रहा था.. और ये तभी मुमकिन हुआ था जब मुक्ता दीदी अपना पहला साक्षात्कार देकर मीडिया को प्राची और नकुल से अवगत करवाया...
पंचायत से लोग हटे नहीं थे 12 बजे के आस पास भी.. और यहां से हमारा पहला छोटा ड्रामा शुरू जब नकुल और प्राची ने अपने अपने अभिवावकों को फोन लगाकर शादी के विषय में पुरा हरका दिया और कह दिया की सब सच्चाई तो सामने आ जाती, फिर ये शादी का ड्रामा क्यों..
अब पूरे गांव वाले इनको समझाने मे जुटे थे और ये दोनो बस खफा से थे.. अंत में यह हुआ की कल ही सब गांव के लिए निकल आओ, आपस में बैठकर यही पर चर्चा कर लिया जाएगा... एक बजते-बजते तो दिल्ली में हमारा सेलिब्रेशन शुरू हो चुका था...
इस पूरे घटना की योजना 2 लोगों ने मिलकर बनाई थी, मेरे छोटे भैया मनीष कुमार मिश्रा और रूपा मिश्रा.. मै रूपा भाभी को पहले ही सब बता चुकी थी और अपनी इक्छा जाहिर कर चुकी थी...
उन दोनों ने 2 दिन बैठकर पूरे हंगामे की योजना बनाई और उसी वक्त लियाकत और वरुण भईया भी मीटिंग के लिए पहुंचे थे, जहां रूपा भाभी वरुण भईया की मेंटोर थी... वो तो किसी बड़े हंगामे की तलाश में तो पहले से ही थी और अब जाकर उनके हाथ सही चीज लगी थी..
वरुण भईया और लियाकत को अपने ही पार्टी के मुखिया को लपेटना था और रूपा भाभी को प्राची और नकुल को एक ऐसे सिचुएशन में डालना था जहां सारी विषमताओं को भूलकर गांव वाले खुद से कह दे, शादी करवा दो दोनो की...
फिर क्या था मनीष भईया और रूपा भाभी खेल गई पुरा... अभिनन्दन लाल के बारे में मीडिया में वही कहा गया जो यहां के पंचायत के चर्चा में था.. और शाम ढलते-ढलते बेचारे अभिनंदन लाल को पता भी नहीं चला कि कौन गेम खेल गया उसके साथ, क्योंकि बयानबाजी के बाद मुश्ताक को तुरंत अरेस्ट किया गया.. अरेस्ट करने के बाद बेल करवाया गया.. उसके बाद अभिनंदन लाल केवल ढूंढता रह गया मुश्ताक को लेकिन काहे मिले वो...
पूरी कहानी की इकलौती रचायता रूपा मिश्रा.. जिसके बारे में इतना ही कहा जाता है कि उसका साथ होना ही आपकी जीत सुनिश्चित कर जाता है... ऐसा नहीं है कि मै ये पहली घटना को लेकर बोल रही हूं, बल्कि 10-12 किस्से हो चुके है, और 15 साल की उम्र से अपने मामा के साथ पॉलिटिकल शिकार किया करती थी..
हालांकि मुझे भी बहुत बाद में उनके किस्सों के बारे में पता चला, और जब पता चला था तो दूसरों की तरह मेरे दिल में कसक सी उठी थी, ये यहां गांव में क्या कर रही है...
मेनका मिश्रा यानी की मै, आश्चर्य मे फसी दोनो को सुन रही थी.. दिल की तमन्ना तो मेरी भी थी कि यदि ये दोनों एक हो जाते तो सबसे ज्यादा खुशी मुझे होती.. किन्तु हर प्यार के बीच में एक लेकिन आ ही जाता है..
दोनो को पूरा सुनने के बाद... "नमन है दोनो को, प्यार अंधा होता है, सुनी थी.. देख रही हूं.. प्राची दीदी.."
प्राची दीदी:- क्या हमारी जिंदगी घूट जाएगी..
अरे यार एक दम ओरिजनल इमोशन और एक्सप्रेशन था.. मै आगे कुछ कह ही नहीं पाई... तभी नकुल अपना सर मेरे गोद में डालते… "मेनका, तू बस हमे गलत मत समझ प्लीज, वरना पता नहीं मेरा क्या होगा"..
नकुल का चेहरा मै साफ पढ़ सकती थी.. उसपर लिखा था कि वो कितने उम्मीद के साथ मुझे देख रहा है.. अब ये क्या मेरा गोद लवर्स पार्क बन गया.. प्राची दीदी भी सो गई.. मै लगभग चिल्लाती हुई.. "मैंने कोई गलत नहीं समझा.. लेकिन खुद को संभालो तो.. दरवाजा खोलकर मै अंदर आयी और दोनो सोफे पर ही.. मेरी जगह हर्ष होता तो"…
नकुल:- सॉरी थोड़ा मुश्किल आजकल हमारे लिए भी हो रहा है... हम खुलकर साथ रहना चाहते है लेकिन कभी-कभी लगता है कि यदि हमारी कहानी कहीं उलझ गई, तो इतने लोग उलझ जाएंगे की हमे आत्महत्या करनी होगी...
आत्महत्या.. सुनकर ही मेरी श्वांस अटक गई.. लेकिन नकुल की बात भी सही थी.. मेरे और हर्ष के केस में तो समझ में भी आता है कि दोनो में प्यार हो सकता है.. लेकिन प्राची और नकुल का सुनकर ही...
हां लेकिन मेरी नजरों में तो कुछ भी ग़लत नहीं था.. दोनो को देखकर मैंने कभी मैंने ही सोचा था कि दोनो एक ही जाए... और कहते है कि दिन मे एक बार आपके जुबान पर मां सरस्वती विराजमान रहती है.. जो बोला वो सच हो जाता है... ऐसा ही कुछ इनके साथ भी हुआ है क्या...
मै गहरी श्वांस लेती... "सब समझ जाए तो समझ जाए लेकिन हर्ष नहीं मानेगा... उसका क्या?"
प्राची:- सब कैसे मान लेंगे.. आसान है क्या?
मै:- ठीक है कोई आसान काम नहीं है, मै जा रही हूं..
दोनो (प्राची और नकुल) एक साथ... "अरे रुको रुको कहां जा रही हो"…
मै:- जब तुम दोनो को ही विश्वास नहीं तो मै क्यों फालतू में ओखल में अपना सर डालूं..
नकुल:- मुझे हम दोनों पर तो कभी यकीन ही नहीं था.. हम तो तुम्हारे भरोसे आगे बढ़े थे..
मै नकुल को एक थप्पड़ मारती... "कुत्ता कहीं का.. मुझसे बिना बताए आगे बढ़ गया और कहता है मेरे भरोसे.. याद है क्या कहा था तूने.. ये निजी मामला है"…
प्राची नकुल को आखें दिखाती… "तुमने मेरी बहन से ऐसा कहा था"…
मै:- ओ प्राची बहन जी.. आपने भी कहा था कुछ जरा याद दिलाना तो.. मेरे उन्होंने मना किया है अभी कुछ साल मज़े करेंगे.. अच्छा मज़ा लूट रहे हो कुछ सालों से दोनो.. मुझे तक भनक नहीं लगने दी.. ये बताओ सच बोलकर सब बात छिपा लेने की साजिश किसने की..
प्राची:- नकुल ने कि थी... पहले समझ मे नही आया लेकिन बाद में तीर निशाने पर लगता देख मै नकुल के सैतानी खोपड़ी को मान गई...
मै:- तुम दोनो को देखकर मेरे मुंह से एक ही शब्द निकालता है...
दोनो एक साथ... "क्या"
मै:- बेचारा हर्ष.. एक वादा करो नकुल..
नकुल:- हर्ष कुछ भी बोलेगा.. कितना भी बुरा ही क्यूं ना.. और भले ही पूरी सभा के बीच तुम दोनों को बेइज्जत कर दे… तुम दोनो उसे कुछ नहीं कहोगे ना मन में बैर पालोगे..
प्राची:- तू कबसे इतनी क्लोज हो गई उसके..
मै:- क्या किसी के क्लोज होना ही जानना होता है.. लव करके और बहुत ज्यादा क्लोज होकर एक दूसरे से शादी करते है ना लवर्स.. फिर जिनके बारे में पूरी जानकारी के बाद शादी करते है उनकी शादी क्यों टूट जाती है..
प्राची:- माफ करना, मै बस यूं ही बोल गई.. हम किसी भी परिस्थिति में हर्ष की किसी भी बात का बुरा नहीं मानेगी और जबतक वो मान नहीं जाता हम मनाते रहेंगे..
मै:- अच्छा ये बताओ इस खिचड़ी रिश्ते में तुम दोनो मुझसे कौन सा रिश्ता रखोगे.. मुझे तो जीजा चाहिए था.. कुमार सर की तरह.. तुमने चुन लिया नकुल को..
प्राची:- हां तो पूरी छेड़ छाड़ कर लेना तू नकुल के साथ मै नहीं रोकूंगी..
मै और नकुल लगभग एक साथ.. "क्या"??
प्राची:- हिहिहिहीहिहि.. जब तुम दोनो को ही पता है कि वो रिश्ता नहीं हो सकता तो चर्चा ही क्यों कर रहे..
मै:- चालू हो दोनो... मेरी एक फाइनल शर्त..
प्राची:- क्या??
मै:- डेस्टिनेशन वेडिंग होगी ताकि मै लड़के और लड़की दोनो ओर की रश्में निभा सकूं और एन्जॉय कर सकूं..
प्राची:- तू बस सबसे हां कहलवा दे.. फिर वो लियाकत वाले पूरे पैसे खर्च करके हम स्विटजरलैंड मे डेस्टिनेशन वेडिंग प्लान करेंगे... ये साले गांव वाले हमारी शादी भड़काने से ज्यादा हमारी शादी करवाने में विश्वास रखें ताकि..
मै:- और सबके पासपोर्ट… वीजा.. अगौरह वगैरह..
प्राची:- वो सब आराम से हो जाएगा.. यहां के इवेंट मैनेजर को रिक्रूट कर दूंगी.. वो सब संभाल लेगा..
मै:- ठीक है फिर आप दोनो डेस्टिनेशन वेडिंग की प्लांनिंग कर लो… लेकिन मै अपने अकाउंट से एक पैसा ना दूंगी.. एक चेयरमैन के साथ मालकिन, दूसरा मालिक.. इतना कमाते हो, फिर भी मेरे पैसा पर नजर..
नकुल:- कंजर कहीं की.. लोगों के एक तरफ का भाड़ा ही दे देना...
मै:- अनुमानित 350 से 400 लोग तो होंगे ही.. ऋतु को मिलाकर..
प्राची, नकुल को देखती... "क्या ऋतु को इन्वाइट करोगे"..
मै:- तो, उसकी शादी पर ये 6 महीने पहले जबलपुर भी गया था और संदेश क्या आया था नकुल के पास..
नकुल:- तू इधर ध्यान दे, एक ओर का भाड़ा देगी की नहीं..
प्राची:- ना ना मेनका.. पूरी बात बताओ, क्या संदेश भेजा था उसने...
नकुल:- अरे वो संदेश भेजी थी इसमें तुम्हे क्या करना... भावनाओ मे कुछ लिखी होगी..
प्राची:- हां तो मुझे वो भावना पता चलनी चाहिए थी.. क्यों पता नहीं चला मुझे...
मै:- शायद विश्वास ना रहा दीदी.. है तो लौंडा ही ऊपर से देश विदेश घूमाकर आपने पंख भी लगवा दिए है... जय श्री कृष्णा, जय श्री कृष्णा..
प्राची:- तू ही बता दे मेनका.. क्या था..
मै:- एक आखरी बार वही पुरानी यादें ताजा कर लेते है शादी से पहले...
ओ तेरी क्या झगड़े हुए थे... 2 दिन लग गए बेचारे मेरे नकुल को मनाने में... हां लेकिन देखकर मज़ा बहुत आता था.. दोनो को देखकर एक ही बात का ख्याल बार-बार आता... "बाकी सब तो राजी हो ही जाएंगे... हर्ष कैसे मानेगा... सब प्राची दीदी के ऊपर है कि वो कितना इमोशनल ड्रामे करती है हर्ष के पास"…
हमारी वहां की सभा टूटी.. हुआ ये था कि, मेरे कॉलेज के प्रोग्राम के कारन मै हर्ष के साथ दीवाली पर घर नहीं निकल सकी... और जब हर्ष के साथ जाने का प्लान कैंसल हुआ तो मै फ्लैट लौटी थी, जहां मैंने नकुल और प्राची को गलती से उस अवस्था में देख लिया था, जो मुझे नहीं देखना चाहिए था...
सभा टूटी और अगले 2-3 दिन तक विचार होते रहा.. मैंने बोल दिया दोनो को कि मामला पारिवारिक है और मै रिस्क लेना नहीं चाहूंगी, इसलिए तुम दोनो को मिलाने की जिम्मेदारी रूपा भाभी की होगी...
नकुल को कोई आपत्ती नहीं थी लेकिन प्राची दीदी एक बार हिचकिचाई की क्या रूपा भाभी से सब कहना सुरक्षित होगा... तब मैं कुछ नहीं बोली, नकुल ही कहने लगा.. वो रूपा मिश्रा है और हमे वो हक से अपना बच्चा मानती है
..
हम छठ पर गर्मजोशी के साथ गांव पहुंचे, साथ मे एक नई खुशी भी थी, मेरे दिल के 2 करीबी, और एक तो मेरा प्यारा नकुल जिसे दिल के करीबी ही कहना ग़लत होगा.. वो तो बस पुरा मै ही थी.. कहने का आशय है कि नकुल और मेनका 2 थोड़े ना है, मेनका का तो अस्तित्व है नकुल.. जो की अपने लिए ऐसा जीवन साथी चुना था, जो मेरे दिल के करीब थी.. अच्छी थी और सबसे बड़ी बात, वो मेरे नकुल को कभी मुझसे दूर नहीं करेगी, यदि तुलना करे की नकुल किसी और से शादी करता, तो पता ना वो कैसी होती..
बहरहाल मैंने रूपा भाभी से ना सिर्फ नकुल के बारे में बताई, बल्कि अपने और हर्ष के बारे में भी सब बोल गई... रूपा भाभी कही भी प्राची से मिली हूं, सुलझी है, मुझे पसंद है. लेकिन हर्ष का कोई आइडिया नहीं मुझे, पहले मुझे अच्छे से समझ लेने दे.. तभी मैंने उनसे कहा कि वो अनूप मिश्रा है, इतना ही समझो.. भाभी मुझे दबोचकर गले लगाती कहने लगी, फिर तो तेरी शादी मै जल्दी करवाऊंगी.. बिना जाने ही हर्ष मुझे पसंद आ गया..
काफी धमाल से भरा रहा इस बार का छठ जहां मै और रूपा भाभी पूरे सिध्दत से नकुल को छेड़ रहे थे और वो बेचारा अपनी इज्जत बचाए भाग रहा था...
खैर, छठ के तुरंत बाद जब मै वापसी की तो नकुल को घर पर रहने की हिदायत देकर लौटी थी... प्राची दीदी भी मेरे साथ ही आ गई और मुरझाई नजरो से ऐसे देखी मानो कह रही हो मेरे नकुल को भी साथ ले लेती.. वो तो अपनी भावना दिखा भी रही थी, लेकिन मै क्या कह देती की वो हर्ष को क्यों साथ ना लाई…
रूपा भाभी के कहे अनुसार वो उधर का सारा बैकग्राउंड तैयार कर रही थी, जैसे ही कोई काम की घटना उनके हाथ लगेगी एक बड़ा ड्रामा होगा.. फिर एक घटना का जिक्र करती कहने लगी थी...
"हालांकि एक बड़ा सा ड्रामा तो चल रहा है लियाकत आलम का.. और उसी के साथ मै (रूपए भाभी) प्राची और नकुल के केस को लिंक कर रही हूं... क्योंकि यहां यदि ये दोनो लिंक हुए, तो नकुल और प्राची की शादी तो सेट ही है साथ ही साथ जिसके पंख कतरने निकली हूं उसका तो मै ये साल खत्म होने से पहले पंख कतरकर ही मानुगी, तू बस अपने होनेवाले दूल्हे को समझा ले की नकुल को जीजाजी मान ले.. तू क्या जानती नहीं की तेरे पापा जैसे लोग कितने अरि होते है जिद्दी..."..
रूपा भाभी ने मामला तो नहीं बताया, लेकिन पंख कतरने की बात से मै समझ चुकी थी की कोई हाई लेवल पॉलिटिकल ड्रामे मे वरुण भईया पूरी तरह इन्वॉल्व है, और रूपा भाभी निकल चुकी है पॉलिटिकल शिकार पर.. छोटा मुर्गा के लिए तो वो नहीं निकल सकती है वो मै जानती हूं.. वरुण मिश्रा के निशाने पर जरूर कोई मगरमच्छ है, तभी रूपा भाभी सामिल है...
खैर मुझे की करना था परिणाम के बाद तो सब कुछ सामने आ ही जायेगा.. बाकी उन्होंने सारी बातें समझा दी थी.. इधर प्राची दीदी भी जब तक छठ मे हर्ष के साथ रही, कुछ-कुछ इमोशनल अत्याचार करती रही, जताती रही की वो आजकल खुश नहीं...
हमे दिल्ली आए 3 दिन हो गए थे, हर्ष भी एक दिन पहले लौट आया था और मै हर्ष से ही मिलने सुबह-सुबह गई हुई थी... मै जब पहुंची तो देखकर आश्चर्य हर्ष पहली बार छत को देखकर कुछ सोच रहा था.… "क्या हुआ डॉक्टर साहब, क्या सोच रहे है"…
हर्ष:- यही की दीदी की शादी की बात इस बार घर पर हुई, वो लड़के से मिलने के लिए राजी भी हुई, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि उनके मन में कुछ चल रहा है...
मै, गहरी श्वांस लेती... "यदि मेरे शादी कि बात चले किसी और के साथ तो मेरी भावना कैसी होगी"…
हर्ष, थोड़ा गंभीर होकर मुझे अपने बाहों में जकड़ते... "ये सवाल ही मन में कतुहल पैदा करता है.."
मै थोड़ा किनारे होकर, मुस्कुराती हुई हर्ष को देखते.… "मेरे चेहरे पर कन्सन्ट्रेट करो, खुद को शांत पाओगे.. बाकी जब वक्त आएगा तो मेरा नकुल है ना, वो सब अकेले देख लेगा"…
nice update ..nakul aur prachi ne mana liya menka ko ki wo kuch kare aur dono ki shadi ho jaaye ..
aur menka ne rupa bhabhi ko sab bata diya aur harsh aur uske baare me bhi .
par lagta hai menka ne apne baare me prachi ko nahi bataya ..
aur ye rupa bhabhi kiska shikar karne nikli hai ..
waise 5 saal badi hai prachi to kya hua ,,abhishek ,sachin ka example de deneka aur sab maan jayenge ..
मेनका मिश्रा यानी की मै, आश्चर्य मे फसी दोनो को सुन रही थी.. दिल की तमन्ना तो मेरी भी थी कि यदि ये दोनों एक हो जाते तो सबसे ज्यादा खुशी मुझे होती.. किन्तु हर प्यार के बीच में एक लेकिन आ ही जाता है..
दोनो को पूरा सुनने के बाद... "नमन है दोनो को, प्यार अंधा होता है, सुनी थी.. देख रही हूं.. प्राची दीदी.."
प्राची दीदी:- क्या हमारी जिंदगी घूट जाएगी..
अरे यार एक दम ओरिजनल इमोशन और एक्सप्रेशन था.. मै आगे कुछ कह ही नहीं पाई... तभी नकुल अपना सर मेरे गोद में डालते… "मेनका, तू बस हमे गलत मत समझ प्लीज, वरना पता नहीं मेरा क्या होगा"..
नकुल का चेहरा मै साफ पढ़ सकती थी.. उसपर लिखा था कि वो कितने उम्मीद के साथ मुझे देख रहा है.. अब ये क्या मेरा गोद लवर्स पार्क बन गया.. प्राची दीदी भी सो गई.. मै लगभग चिल्लाती हुई.. "मैंने कोई गलत नहीं समझा.. लेकिन खुद को संभालो तो.. दरवाजा खोलकर मै अंदर आयी और दोनो सोफे पर ही.. मेरी जगह हर्ष होता तो"…
नकुल:- सॉरी थोड़ा मुश्किल आजकल हमारे लिए भी हो रहा है... हम खुलकर साथ रहना चाहते है लेकिन कभी-कभी लगता है कि यदि हमारी कहानी कहीं उलझ गई, तो इतने लोग उलझ जाएंगे की हमे आत्महत्या करनी होगी...
आत्महत्या.. सुनकर ही मेरी श्वांस अटक गई.. लेकिन नकुल की बात भी सही थी.. मेरे और हर्ष के केस में तो समझ में भी आता है कि दोनो में प्यार हो सकता है.. लेकिन प्राची और नकुल का सुनकर ही...
हां लेकिन मेरी नजरों में तो कुछ भी ग़लत नहीं था.. दोनो को देखकर मैंने कभी मैंने ही सोचा था कि दोनो एक ही जाए... और कहते है कि दिन मे एक बार आपके जुबान पर मां सरस्वती विराजमान रहती है.. जो बोला वो सच हो जाता है... ऐसा ही कुछ इनके साथ भी हुआ है क्या...
मै गहरी श्वांस लेती... "सब समझ जाए तो समझ जाए लेकिन हर्ष नहीं मानेगा... उसका क्या?"
प्राची:- सब कैसे मान लेंगे.. आसान है क्या?
मै:- ठीक है कोई आसान काम नहीं है, मै जा रही हूं..
दोनो (प्राची और नकुल) एक साथ... "अरे रुको रुको कहां जा रही हो"…
मै:- जब तुम दोनो को ही विश्वास नहीं तो मै क्यों फालतू में ओखल में अपना सर डालूं..
नकुल:- मुझे हम दोनों पर तो कभी यकीन ही नहीं था.. हम तो तुम्हारे भरोसे आगे बढ़े थे..
मै नकुल को एक थप्पड़ मारती... "कुत्ता कहीं का.. मुझसे बिना बताए आगे बढ़ गया और कहता है मेरे भरोसे.. याद है क्या कहा था तूने.. ये निजी मामला है"…
प्राची नकुल को आखें दिखाती… "तुमने मेरी बहन से ऐसा कहा था"…
मै:- ओ प्राची बहन जी.. आपने भी कहा था कुछ जरा याद दिलाना तो.. मेरे उन्होंने मना किया है अभी कुछ साल मज़े करेंगे.. अच्छा मज़ा लूट रहे हो कुछ सालों से दोनो.. मुझे तक भनक नहीं लगने दी.. ये बताओ सच बोलकर सब बात छिपा लेने की साजिश किसने की..
प्राची:- नकुल ने कि थी... पहले समझ मे नही आया लेकिन बाद में तीर निशाने पर लगता देख मै नकुल के सैतानी खोपड़ी को मान गई...
मै:- तुम दोनो को देखकर मेरे मुंह से एक ही शब्द निकालता है...
दोनो एक साथ... "क्या"
मै:- बेचारा हर्ष.. एक वादा करो नकुल..
नकुल:- हर्ष कुछ भी बोलेगा.. कितना भी बुरा ही क्यूं ना.. और भले ही पूरी सभा के बीच तुम दोनों को बेइज्जत कर दे… तुम दोनो उसे कुछ नहीं कहोगे ना मन में बैर पालोगे..
प्राची:- तू कबसे इतनी क्लोज हो गई उसके..
मै:- क्या किसी के क्लोज होना ही जानना होता है.. लव करके और बहुत ज्यादा क्लोज होकर एक दूसरे से शादी करते है ना लवर्स.. फिर जिनके बारे में पूरी जानकारी के बाद शादी करते है उनकी शादी क्यों टूट जाती है..
प्राची:- माफ करना, मै बस यूं ही बोल गई.. हम किसी भी परिस्थिति में हर्ष की किसी भी बात का बुरा नहीं मानेगी और जबतक वो मान नहीं जाता हम मनाते रहेंगे..
मै:- अच्छा ये बताओ इस खिचड़ी रिश्ते में तुम दोनो मुझसे कौन सा रिश्ता रखोगे.. मुझे तो जीजा चाहिए था.. कुमार सर की तरह.. तुमने चुन लिया नकुल को..
प्राची:- हां तो पूरी छेड़ छाड़ कर लेना तू नकुल के साथ मै नहीं रोकूंगी..
मै और नकुल लगभग एक साथ.. "क्या"??
प्राची:- हिहिहिहीहिहि.. जब तुम दोनो को ही पता है कि वो रिश्ता नहीं हो सकता तो चर्चा ही क्यों कर रहे..
मै:- चालू हो दोनो... मेरी एक फाइनल शर्त..
प्राची:- क्या??
मै:- डेस्टिनेशन वेडिंग होगी ताकि मै लड़के और लड़की दोनो ओर की रश्में निभा सकूं और एन्जॉय कर सकूं..
प्राची:- तू बस सबसे हां कहलवा दे.. फिर वो लियाकत वाले पूरे पैसे खर्च करके हम स्विटजरलैंड मे डेस्टिनेशन वेडिंग प्लान करेंगे... ये साले गांव वाले हमारी शादी भड़काने से ज्यादा हमारी शादी करवाने में विश्वास रखें ताकि..
मै:- और सबके पासपोर्ट… वीजा.. अगौरह वगैरह..
प्राची:- वो सब आराम से हो जाएगा.. यहां के इवेंट मैनेजर को रिक्रूट कर दूंगी.. वो सब संभाल लेगा..
मै:- ठीक है फिर आप दोनो डेस्टिनेशन वेडिंग की प्लांनिंग कर लो… लेकिन मै अपने अकाउंट से एक पैसा ना दूंगी.. एक चेयरमैन के साथ मालकिन, दूसरा मालिक.. इतना कमाते हो, फिर भी मेरे पैसा पर नजर..
नकुल:- कंजर कहीं की.. लोगों के एक तरफ का भाड़ा ही दे देना...
मै:- अनुमानित 350 से 400 लोग तो होंगे ही.. ऋतु को मिलाकर..
प्राची, नकुल को देखती... "क्या ऋतु को इन्वाइट करोगे"..
मै:- तो, उसकी शादी पर ये 6 महीने पहले जबलपुर भी गया था और संदेश क्या आया था नकुल के पास..
नकुल:- तू इधर ध्यान दे, एक ओर का भाड़ा देगी की नहीं..
प्राची:- ना ना मेनका.. पूरी बात बताओ, क्या संदेश भेजा था उसने...
नकुल:- अरे वो संदेश भेजी थी इसमें तुम्हे क्या करना... भावनाओ मे कुछ लिखी होगी..
प्राची:- हां तो मुझे वो भावना पता चलनी चाहिए थी.. क्यों पता नहीं चला मुझे...
मै:- शायद विश्वास ना रहा दीदी.. है तो लौंडा ही ऊपर से देश विदेश घूमाकर आपने पंख भी लगवा दिए है... जय श्री कृष्णा, जय श्री कृष्णा..
प्राची:- तू ही बता दे मेनका.. क्या था..
मै:- एक आखरी बार वही पुरानी यादें ताजा कर लेते है शादी से पहले...
ओ तेरी क्या झगड़े हुए थे... 2 दिन लग गए बेचारे मेरे नकुल को मनाने में... हां लेकिन देखकर मज़ा बहुत आता था.. दोनो को देखकर एक ही बात का ख्याल बार-बार आता... "बाकी सब तो राजी हो ही जाएंगे... हर्ष कैसे मानेगा... सब प्राची दीदी के ऊपर है कि वो कितना इमोशनल ड्रामे करती है हर्ष के पास"…
हमारी वहां की सभा टूटी.. हुआ ये था कि, मेरे कॉलेज के प्रोग्राम के कारन मै हर्ष के साथ दीवाली पर घर नहीं निकल सकी... और जब हर्ष के साथ जाने का प्लान कैंसल हुआ तो मै फ्लैट लौटी थी, जहां मैंने नकुल और प्राची को गलती से उस अवस्था में देख लिया था, जो मुझे नहीं देखना चाहिए था...
सभा टूटी और अगले 2-3 दिन तक विचार होते रहा.. मैंने बोल दिया दोनो को कि मामला पारिवारिक है और मै रिस्क लेना नहीं चाहूंगी, इसलिए तुम दोनो को मिलाने की जिम्मेदारी रूपा भाभी की होगी...
नकुल को कोई आपत्ती नहीं थी लेकिन प्राची दीदी एक बार हिचकिचाई की क्या रूपा भाभी से सब कहना सुरक्षित होगा... तब मैं कुछ नहीं बोली, नकुल ही कहने लगा.. वो रूपा मिश्रा है और हमे वो हक से अपना बच्चा मानती है
..
हम छठ पर गर्मजोशी के साथ गांव पहुंचे, साथ मे एक नई खुशी भी थी, मेरे दिल के 2 करीबी, और एक तो मेरा प्यारा नकुल जिसे दिल के करीबी ही कहना ग़लत होगा.. वो तो बस पुरा मै ही थी.. कहने का आशय है कि नकुल और मेनका 2 थोड़े ना है, मेनका का तो अस्तित्व है नकुल.. जो की अपने लिए ऐसा जीवन साथी चुना था, जो मेरे दिल के करीब थी.. अच्छी थी और सबसे बड़ी बात, वो मेरे नकुल को कभी मुझसे दूर नहीं करेगी, यदि तुलना करे की नकुल किसी और से शादी करता, तो पता ना वो कैसी होती..
बहरहाल मैंने रूपा भाभी से ना सिर्फ नकुल के बारे में बताई, बल्कि अपने और हर्ष के बारे में भी सब बोल गई... रूपा भाभी कही भी प्राची से मिली हूं, सुलझी है, मुझे पसंद है. लेकिन हर्ष का कोई आइडिया नहीं मुझे, पहले मुझे अच्छे से समझ लेने दे.. तभी मैंने उनसे कहा कि वो अनूप मिश्रा है, इतना ही समझो.. भाभी मुझे दबोचकर गले लगाती कहने लगी, फिर तो तेरी शादी मै जल्दी करवाऊंगी.. बिना जाने ही हर्ष मुझे पसंद आ गया..
काफी धमाल से भरा रहा इस बार का छठ जहां मै और रूपा भाभी पूरे सिध्दत से नकुल को छेड़ रहे थे और वो बेचारा अपनी इज्जत बचाए भाग रहा था...
खैर, छठ के तुरंत बाद जब मै वापसी की तो नकुल को घर पर रहने की हिदायत देकर लौटी थी... प्राची दीदी भी मेरे साथ ही आ गई और मुरझाई नजरो से ऐसे देखी मानो कह रही हो मेरे नकुल को भी साथ ले लेती.. वो तो अपनी भावना दिखा भी रही थी, लेकिन मै क्या कह देती की वो हर्ष को क्यों साथ ना लाई…
रूपा भाभी के कहे अनुसार वो उधर का सारा बैकग्राउंड तैयार कर रही थी, जैसे ही कोई काम की घटना उनके हाथ लगेगी एक बड़ा ड्रामा होगा.. फिर एक घटना का जिक्र करती कहने लगी थी...
"हालांकि एक बड़ा सा ड्रामा तो चल रहा है लियाकत आलम का.. और उसी के साथ मै (रूपए भाभी) प्राची और नकुल के केस को लिंक कर रही हूं... क्योंकि यहां यदि ये दोनो लिंक हुए, तो नकुल और प्राची की शादी तो सेट ही है साथ ही साथ जिसके पंख कतरने निकली हूं उसका तो मै ये साल खत्म होने से पहले पंख कतरकर ही मानुगी, तू बस अपने होनेवाले दूल्हे को समझा ले की नकुल को जीजाजी मान ले.. तू क्या जानती नहीं की तेरे पापा जैसे लोग कितने अरि होते है जिद्दी..."..
रूपा भाभी ने मामला तो नहीं बताया, लेकिन पंख कतरने की बात से मै समझ चुकी थी की कोई हाई लेवल पॉलिटिकल ड्रामे मे वरुण भईया पूरी तरह इन्वॉल्व है, और रूपा भाभी निकल चुकी है पॉलिटिकल शिकार पर.. छोटा मुर्गा के लिए तो वो नहीं निकल सकती है वो मै जानती हूं.. वरुण मिश्रा के निशाने पर जरूर कोई मगरमच्छ है, तभी रूपा भाभी सामिल है...
खैर मुझे की करना था परिणाम के बाद तो सब कुछ सामने आ ही जायेगा.. बाकी उन्होंने सारी बातें समझा दी थी.. इधर प्राची दीदी भी जब तक छठ मे हर्ष के साथ रही, कुछ-कुछ इमोशनल अत्याचार करती रही, जताती रही की वो आजकल खुश नहीं...
हमे दिल्ली आए 3 दिन हो गए थे, हर्ष भी एक दिन पहले लौट आया था और मै हर्ष से ही मिलने सुबह-सुबह गई हुई थी... मै जब पहुंची तो देखकर आश्चर्य हर्ष पहली बार छत को देखकर कुछ सोच रहा था.… "क्या हुआ डॉक्टर साहब, क्या सोच रहे है"…
हर्ष:- यही की दीदी की शादी की बात इस बार घर पर हुई, वो लड़के से मिलने के लिए राजी भी हुई, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि उनके मन में कुछ चल रहा है...
मै, गहरी श्वांस लेती... "यदि मेरे शादी कि बात चले किसी और के साथ तो मेरी भावना कैसी होगी"…
हर्ष, थोड़ा गंभीर होकर मुझे अपने बाहों में जकड़ते... "ये सवाल ही मन में कतुहल पैदा करता है.."
मै थोड़ा किनारे होकर, मुस्कुराती हुई हर्ष को देखते.… "मेरे चेहरे पर कन्सन्ट्रेट करो, खुद को शांत पाओगे.. बाकी जब वक्त आएगा तो मेरा नकुल है ना, वो सब अकेले देख लेगा"…
हर्ष:- नकुल अच्छा है यार मेरी ही गलती थी जो मैंने पहली मुलाकात में मिस बिहेव किया था.. जानती भी हो वो इस वर्ष डॉक्टर नकुल मिश्रा हो जाएगा.. वो भी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से.. जिस कोर्स को करने में लोगों की 5-7 साल लग जाते है.. उसने महज 12th पास होने के बाद 2 साल मे कर लिया.. सच मे वो जिनियस है..
मै:- हां मुझे भी छठ मे बताया, और हो जाएगा नहीं हो गया है वो डॉक्टर नकुल मिश्रा.. नवंबर में ही वो गया था यूके फाइनल देने.. 6 दिन वहीं रहा था.. यूनिवर्सिटी से उसने रिक्वेस्ट की थी उसका रिजल्ट आउट ना करे.. 1970 से ये ब्रांच है ऑक्सफोर्ड मे, उसमे अब तक उसके सबसे हाई-स्कोर नकुल के थे ..
2012 में जब पहली बार नकुल वहां गया था तभी उसे पीएचडी भी क्लियर कर देते.. वो कोर्स मे एक फॉरेस्ट मैनेजमेंट था, जिसमे उसे स्कोर करने के लिए 2 साल का वक्त दिया गया था, वो भी उसकी एबिलिटी को देखते हुए.. क्योंकि इस पूरे सब्जेक्ट मे उसका ज्ञान निल था... बाकी एग्रीकल्चर साइंस में तो वो 2012 में ही डॉक्टर की डिग्री ले लेता...
हर्ष:- हाहाहाहा.. बात कहां थी और हम कहां बात करने लगे.. बस नकुल की बात शुरू हो फिर तो मै भी कहीं गायब हो जाता हूं..
मै:- सो सॉरी हर्ष.. हां तो अब बताओ, कैसी होगी मेरी भावना, और यदि प्राची दीदी के साथ मेरे जैसा केस हुआ तो वो क्या करेगी?
हर्ष:- मै हूं ना उसके साथ.. वो मुझसे बात करेगी मै पापा से बात करूंगा.. सब कुछ पसंद आ गया तो हर्ज ही क्या है..
मै:- ऐसी बात है तो तुम ही हमारे बारे में प्राची दीदी को बता दो.. तुम विश्वास के साथ ही बताओगे.. लेकिन क्या प्राची दीदी के बात मात्र कर लेने से बात बन जाएगी..
हर्ष:- यार अब क्या कह दूं मै.. हां और ना दोनो तो तुम ही बता रही हो..
मै:- हर्ष तुम्हे याद है मै छत से गिरी थी और गौरी से हमने कुछ प्राइवेट बात की थी..
हर्ष:- हां याद है मुझे...
मै:- उसकी गलत वीडियो दिखाकर 12 लड़कों ने उसे ब्लैकमेल किया था.. जिसमे से उसे मजबूरन 3 के साथ जाना परा था.. 9 लोग और भी कतार में थे..
हर्ष, चौंकते हुए... "व्हाट, इतनी बड़ी बात थी और वो लगातार घूट रही थी"…
मै:- तुमने सुना, थोड़ा आश्चर्य हुआ कल भुल जाओगे... जिसके साथ होता है उसकी आत्मा तक टूट जाती है.. और ऐसे परिस्थिति में जानते हो हम लड़कियां क्यों फंसती है..
हर्ष:- क्यों ?
मै:- "क्योंकि हमारे पिता दहेज के लिए पैसा जमा करते है.. पढ़ाई के नाम पर जमीन बेच देते है, ताकि समाज में स्टेटस रहे की मैंने तो अपने बेटी को अच्छी शिक्षा दी है.. संस्कार दिए है.. मां भी एक सच्चे दोस्त की तरह हर बात सिखाती है क्या करना चाहिए और क्या नहीं.."
"लेकिन जानते हो जब कभी ऐसी बात होती है कि कोई भुल किसी लड़की से हो या जबरदस्ती किसी ने किया हो, तो उस लड़की को अपने घर के लोगों पर ही यकीन नहीं होता की उसके घरवाले उसका साथ देंगे की नहीं.."
"हमारे रूढ़िवाद समाज में लड़के इसलिए सफल ज्यादा होते है क्योंकि उनको यकीन होता है की वो गलत करके भी आएंगे तो उसके घरवाले संभाल लेंगे.. साला हम लड़कियों को तो दूसरे की गलती सजा भी भुगतनी पर जाती है.. विश्वास ही नहीं होता की अपना बाप, भाई, मां रिश्तेदार सब अंत तक साथ देंगे."
"सिर्फ बात करने से क्या होगा हर्ष... बात तो खुद प्राची दीदी भी कर सकती है.. तुम पर यकीन नहीं था इसलिए प्राची दीदी ने तुम्हे कुछ नहीं बताया, यकीन होता की अंत तक साथ दोगे तो जरूर बताती..."
हर्ष:- और तुम्हे तो बताई ही होगी..
मै, हर्ष को गुस्से में घूरती और अपने दांत पिस्ती हुई कहने लगी... "सामाजिक ज्ञान पुरा लुल ही है क्या तुम्हारा..."
हर्ष:- तुम ऐसे क्यों कह रही हो..
मै:- मै उनके लिए गौर हूं, ऊपर से गांव की रहने वाली.. तुम यूके से पढ़े हो ओपन समाज को देखे हो.. जब उन्हे अपने भाई पर भरोसा नहीं, तो मुझ पर घंटा करेंगी..
हर्ष:- नकुल के लिए तुम्हारा विश्वास इसलिए है क्योंकि वो तुम्हारे बहुत क्लोज है.. और हां वो तुम्हारा साथ अंत तक भी देगा लेकिन यही नकुल नहीं होता तो तुम्हारा ये विश्वास भी नहीं रहता मेनका.. जो बात हम परिवार वालों को नहीं बता सकते उसी के लिए अपने करीबी रिलेशन और करीबी दोस्त होते है...
मै:- "पहली बात तो ये की तुमने सही कहा है, लेकिन बात ऐसी है हर्ष बाबू हमारे केस में नय्या की खेवेया जो है वो है रूपा भाभी, और उन्हे हमारे बारे में सब पता है.. अब बोलो.."
"एक और बात.. किसी भी परिवार में ऐसा बहुत ही विलुप्त तरीके से देखा जाता है जहां भाभी से कोई अहम बात साझा किया हो किसी ननद ने.. क्योंकि भाभियां ऐसी प्रजाति होती है कि अपने ससुराल पक्ष के विक प्वाइंट को तो उंगली पर गिनती की तरह याद रखती है.."
"वैसे इतना भी नहीं समझना होता तुम्हे भाभी के विषय में.. जब मैंने ये बात कही ना की मैंने अपनी भाभी को बताई है, तभी तुम्हे चौंककर पूछना चाहिए था... "क्या भाभी को.. तुम्हे और कोई नहीं मिला भरोसे वाला..!!!" लेकिन यहां मुझे एक्सप्लेन करना पर रहा है कि भाभी को बताना कितना खतरनाक होता है.. क्योंकि बात घूम फिरकर वहीं आ जाती है... तुम्हारा सामाजिक ज्ञान ही लुल है...
हर्ष:- बस करो ताने मारना.. मै तुम्हारे बिना कैसे दिन गुजरूंगा, सोचकर ही मरने जैसा दिल करता है, फिर तो मेरी दीदी घूट ही जाएगी.. ऊपर से तुमने सही कहा कि मै तो खुलकर अपने घर में बता भी दूंगा, लेकिन वो कैसी दुविधा में है जो मुझे तक बता नहीं पा रही... बताओ मेनका मुझे क्या करना चाहिए...
मै:- कपड़े उतारते वक्त पूछते हो बताओ मेनका बताओ... और हिम्मत हो तो दूसरी लड़की का पल्लू खींचकर तो दिखाओ..
हर्ष:- अब ये क्या बकवास है..
मै:- बकवास नहीं जवाब है... विश्वास है तभी तो तुम्हारी हिम्मत हुई आगे बढ़ने की.. बस सब विश्वास का खेल है.. जैसे 8 महीने में तुम सोशल हो गए हो ये तुम्हे आकर बताना नहीं परा था बुद्धू...
हर्ष:- समझाने के लिए कुछ ढंग के एग्जाम्पल भी तो दे सकती हो...
मै:- मेरी क्लास बाद मे लेना, पहले जाओ विश्वास जगाओ वरना गलत जीजाजी घर में आ जाएंगे..
पता ना कितना स्लो है मेरे साजन.. 10 दिन लग गया उसे विश्वास जगाने मे... प्राची दीदी जब पूरी तरह से सुनिश्चित हुई फिर फाइनल एडवाइस के लिए मेरे पास ही पहुंची.. "क्या करूं बताऊं कि नहीं.. मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही"..
अब मै क्या कह देती.. मैंने उनसे कहा दिया... "होल्ड कर लो जब विश्वास नहीं हो रहा तो, और एक इंडायेक्ट एप्रोच लो.. देखो क्या होता है"..
प्राची दीदी ने यही सही समझा. ये हमारे सामाजिक संरचना का ही असर था कि एक सक्सेसफुल बिजनेस वूमेन अपने परिवार से अपने सबसे बड़ी चाहत को बताने मे हिचक रही थी...
शायद ये भी एक यूनिवर्सल बात है कि भाईयो से अपनी लव लाइफ बताने में हर बहन की फट जाती है.. मै खुद नकुल से अपने और हर्ष के विषय में बताने से कई बार हिचक चुकी हूं.. बस यही प्रार्थना करती हूं कि कहीं से भी पता चले, बस मुझे बताने की जरूरत न पड़े…
बहरहाल उनकी बातें जब शुरू हो, लेकिन मै और हर्ष तो आज की सुबह ही सैर-सपाटे के लिए निकले थे.. सहर मे एक बड़े नामचीन जादूगर का शो चल रहा था और उसी को हम देखने गए हुए थे...
मै जादूगरी का शो एन्जॉय कर रही थी और मेरे पड़ोस में बैठे साइंटिस्ट हर्ष, गूगल और यूट्यूब खोलकर मेरे मजे की बैंड बजाने मे लगे हुए थे... 15 मिनट में जब उसने मुझे पूरी तरह से पका डाला तब मैंने उसका बाल पकड़े और चेहरा अपनी करीब लेकर होंठ से होंठ लगा दिए..
होंठ से होंठ लगते ही हर्ष की पहले आखें बड़ी हुई और बाद में वो खोता चला गया... "आउच" करती मै हर्ष से अलग हुई उसे घूरती हुई... "किस्स का मतलब सीधा हाथ छाती पर ही क्यों जाता है"…
हर्ष अपनी बत्तीसी दिखाते... "सॉरी, मै जरा एक्साइटमेंट मे भुल ही गया था कि कहां हूं"…
मै:- हम्मम ! ध्यान रखा करो हर्ष, अब मुझे शो देखने दो..
मै जैसे ही आगे ध्यान लगाई, हर्ष मेरा कांधा हिलाते.. "तुमने किस्स करते वक्त मेरा मोबाइल ले लिया ना"..
मै हर्ष को आखें दिखाती… "पागल हो गए हो क्या, मै क्यों लूंगी तुम्हारा फोन... चुपचाप मुझे शो देखने दो"…
"अरे यार मेरा फोन किधर चला गया.. बैग दिखाना अपना जरा"… हर्ष वापस से टोकते हुए कहा..
मैंने बिना ध्यान भटकाए सामने देखती रही... और तिरछी नजरो से बीच-बीच में हर्ष को भी देख रही थी.. बेचारा कभी इधर तो कभी उधर.. अपना फोन वो चारो ओर ढूंढ रहा था...
इसी बीच 1 घंटे का शो खत्म हो हुआ और हम बाहर आ गए... "मेनका मेरा फोन कहीं मिल नहीं रहा"…
मै, हर्ष को सुनती गई और जैसे ही कार में पहुंची... अपनी तिजोरी से उसके 4 इंच के छोटू स्मार्ट फोन को निकालकर उसके हाथ में थमा दी.. और वो मुंह फाड़कर देखता ही रह गया... जैसे ही उसने फोन हाथ मे लिया...
"आज तो मेरा फोन भी गरम हो गया है"… "धत पागल"…
मै हर्ष से नजरे चुराकर सामने देख रही थी और हर्ष मुझे छेड़ते हुए कहने लगा... "आज कल की लड़कियां भी ब्रा के अंदर माल छिपाने का काम करती है"…
मै:- हर्ष चुपचाप गाड़ी चलाओगे...
हर्ष:- मै एक बार हाथ डालकर देखूं क्या अंदर तिजोरी की कितनी कैपेसिटी है..
मै हर्ष का गला दबाती उसके ऊपर ही आयी थी कि तभी हमारी गाड़ी के कांच का सिसा नॉक हुआ.. बाहर देखी तो.. "अब यही सरप्राइज़ होना बाकी था"… हर्ष जबतक कांच नीचे करता... "येस प्लीज"..
रवि:- क्या मुझे लिफ्ट मिल सकती है..
हर्ष:- नहीं सॉरी..
मै:- आ जाइए सर.. इतनी तकल्लुफ क्यों कर रहे है..
हर्ष, चेहरे से थोड़ी असहजता जाहिर करते... "तुम जानती हो क्या मेनका"..
मै:- रवि तुम पीछे बैठो.. और हर्ष ये है रवि सर, दिल्ली सचिवालय में नौकरी करते है...
रवि, पीछे बैठते... "इनका परिचय तो करवाई ही नहीं.. बॉयफ्रेंड है या क्लास फेलो…"
हर्ष कुछ कहने को हुआ लेकिन मै धीमे से उसकी ओर देखकर जाहिर कर दी की तुम रुक जाओ मै बात करती हूं.... "दिल्ली आ गए लेकिन सोच अब भी वहीं की है.. इंटेंशन गलत हो की ना हो, पर कंफर्मेशन पहले चाहिए.. हर्ष सिंह है प्राची दीदी का भाई.. यहां दिल्ली ऐम्स मे जूनियर डॉक्टर है"…
रवि:- अरे ये हमारे सहर के बाहुबली राजवीर सिंह के सुपुत्र है.. कैसे है डॉक्टर साहब..
हर्ष:- मेरे पिताजी का अच्छा इंट्रो था.. खैर कहां ड्रॉप करना है...
रवि:- जहां मर्जी हो वहां ड्रॉप कर दीजिए मर्जी है जी आपकी...
मै:- चलो फिर हमारे साथ फ्लैट, मेहमान नवाजी भी स्वीकार कर लेना..
रवि:- हमारे साथ मतलब तुम दोनो..
रवि के इस ताने पर मै पीछे मुड़कर उसे घूरती... "ये कुछ ज्यादा नहीं हो रहा... या सोचकर बैठो है की सर तुड़वाना है..."
रवि:- ना ना सॉरी, मुझे माफ़ करो.. सीरियसली लेकिन ये साल, साल भर बिल्कुल गायब और यूं अचानक से कभी कभार टकरा जाना...
मै:- शुक्र करो मै अकेली नहीं.. हर्ष एक काम कर सकते हो, हम दोनों को यहीं ड्रॉप कर दो, मै फ्लैट चली जाऊंगा.. साथ में कुछ पुराने हिसाब किताब भी हो जाएंगे..
हर्ष ने हमे वही रास्ते पर ड्रॉप किया और चलते बना.. जैसे ही वो निकला मै रवि को घूरती... "अंदर ये क्या नाटक हो रहा था"…
रवि:- सो सॉरी, कम से कम इसी बहाने साथ तो हुई..
मै:- साथ होने का क्या मतलब है, रिजल्ट जब आया तो कितना कॉल किया था मैंने तुम्हे, लेकिन सर आज कल बाबू हो गए है ना..
रवि:- बाबू नहीं … बस सीए के चक्कर मे पीस गया.. मेरे 1 पेपर निकले और मुझे पता था तुम किताब को छोड़कर उठी होगी तो कॉल जरूर करोगी इसलिए..
मै:- इसलिए मुझे ब्लैक लिस्ट कर रखा था.. छी बेशर्म कहीं के...
रवि:- सॉरी मिस वैसे एक बात सच सच बताओ, वो क्या है थोड़ा जलियस टाइप फीलिंग आ रही.. सच मे तुम दोनो के बीच कुछ नहीं चल रहा..
मै:- काश कुछ चलने लायक वक्त मिलता रवि.. बस सीए एक बार क्लियर हो जाए फिर मै चली गांव.. वहीं से सब करूंगी.. बोर हो गई यहां.. ऐसा लगता है जैसे ज़िन्दगी अकाउंट और फाइल्स मे उलझ गई..
रवि:- हां मै समझ सकता हूं.. वैसे किस सीए के अंदर काम कर रही..
nice update ..menka ne sahi kaha harsh ka samajik gyan lull hai ..
ye samajhane ke liye kitna batana pada usko ..
aur ab ravi mil gaya raste me ..par usko harsh aur apna sach nahi bata rahi hai ..
menka kaaafi bold ho gayi hai ,show dekhte huye kiss kar liya harsh ko ..
aur ab kitni safai se harsh ka rishta chhipa rahi hai ravi se ...
मै:- महान सीए रजनीश कुमार, जोडू के गुलाम मुझे कंपनी के साथ साथ अपने सहर के तमाम व्यापारियों का भी ऑडिट करवाता है और हां गंगा अग्रवाल (रवि के पापा) की भी फाइल है मेरे पास बच्चू...
रवि:- ओ तेरी तभी मै कहुं इस साल टैक्स मे कुछ रियायत क्यों मिल गई... काम तो सीए मेनका मिश्रा देख रही थी.. वैसे जब लाइफ से बोर हो ही गई हो तो छोटा सा मेरा काम भी देख लो.. अन-ऑफिशियली..
मै:- कैसे काम..
रवि:- 1,2 मंत्रियों के ब्लैक का हिसाब को व्हाइट मे कनेवर्ट करना है...
मै:- ओय, मुझे अनैतिक काम करने कहते शर्म नहीं आती और पिछली बार क्या कहे थे.. मै ख़ाव खुजाओ वाले डिपार्टमेंट मे नहीं हूं..
रवि:- मेरा डिपार्टमेंट सच मै खाव खुजाओ नहीं है.. हां पर ऊपर बैठे लोग.…
मै:- अरे छोटा पुजारी वाले डिपार्टमेंट में हो.. वो एक्सटर्नल इंटरनल एफैर मिनिस्ट्री..
रवि:- जी हां अब समझी..
मै:- वाह, मतलब खुद का दामन साफ रखो और मुझसे गैर कानूनी काम करवाओ...
रवि:- वरुण मिश्रा और लियाकत अली की भी फाइल तो तुम्हारे पास ही होगी ना..
मै:- ब्लैकमेलर.. अच्छा ठीक है मै कुछ महीने व्यस्त रहूंगी.. क्योंकि नवंबर लगभग खत्म है और फाइनेंशियल ईयर क्लोज होने मे भी ज्यादा वक्त नहीं तो क्यों ना हम इसपर मार्च के बाद डिस्कस करे.. और एक बात अब मै फोन नहीं करूंगी.. समझे..
रवि:- जी बिल्कुल समझ गया.. और सॉरी हां, अभी बस थोड़ा सा टीज कर रहा था..
मै:- जानती हूं बाबा तभी तो आ गई साथ.. वरना तुम तो मुझे जानते ही हो.. चलो मेरा फ्लैट आ गया.. आओ चाय पर बैठकर गप्पे मारते हैं..
रवि:- सॉरी मिस अभी काम से निकला हूं... किसी दिन आराम से बैठकर चाय पियेंगे...
रवि मुझे ड्रॉप करके वापस चला गया... जब वो जा रहा था मै उसे ही देख रही थी और मन मे बस यही ख्याल आ रहा था.… "वक्त वक्त की बात है"….
"बाहर क्या कर रही थी, और ये रवि था ना"… पीछे से नकुल ने मुझे टोका... नकुल को देखते ही मै मुस्कुराती हुई उसके गले लग गई... "मूहरत के लिए डेट फिक्स कर ले, दूसरो को मनाने का सरा काम हो गया है, बस एक बार हर्ष को शीशे में उतारना है"….
नकुल:- मेनका मेरी बात का यह जवाब है.. या मै ये मान लूं की अब मेरे सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं..
मै:- धत पागल, ये कैसी बातें कर रहा है... हां वो रवि ही था... मै, हर्ष के साथ मैजिक शो देखने गई थी, वहां मिल गया.. तो हर्ष को बोली चले जाने और रवि से बात करती हुई यहां तक चली आयी.. उसे तो ऊपर साथ आने भी बोली लेकिन वो चला गया.. अब मेरा भतीजा हैप्पी"..
नकुल प्यारी सी मुस्कान देते.. "वेरी हैप्पी... अब छोड़ जाने भी दे क्या होने वाला है... 2-3 दिन सिर्फ हम दोनों"
मै:- क्या हुआ, प्राची दीदी से झगड़ा हुआ है क्या?
नकुल:- नहीं.. ऐसा कुछ भी नहीं.. बस 2-3 दिन केवल सिर्फ हम दोनों.. जानता हूं तेरे मन में क्या सवाल है उन सब पर विराम लगा दे... सब कुछ नोर्मल है..
मै:- ओह समझ गई…
नकुल:- क्या?
मै:- कुत्ता जोडू का गुलाम.. होने वाली बीवी ने बोला पता नहीं कैसे मै हर्ष को हैंडल करूंगी और तभी तुमने तिक्रम लगा दिया होगा की 2-3 दिन उसी के पास क्यों नहीं रुकती, पुरा वक्त मिलेगा...
नकुल:- इतना डीप एनालिसिस की वजह..
मै:- ओ प्राची दीदी बाहर आ जाओ.. जानती हूं सुन रही हो...
नकुल:- अब ये ज्यादा हो गया..
मै:- हिहिहिहि ठीक है तुम सही मै गलत... जा रही हूं मुझे नहीं चाहिए तेरे अभी के 3 दिन...
प्राची दीदी तभी ताली बजाती हुई वहां प्रगट हो गई... "सही कहे थे बेबी… मेनका को सोचना नहीं परता चीजों को एनालिसिस करने में.. सारी बातें ये ऑटो कनेक्ट कर लेती है... वैसे मेनका सच बता.. तुमने एग्जैक्टली इतना सोचा कैसे"
मै:- "हफ्ते बाद लवर नकुल गांव से पहुंच रहा है, जिसके बिना प्राची को एक पल रहने की इक्छा ना हो और लौटने के बाद भी वो लवर नकुल 3 दिन के लिए बिल्कुल खाली है, मतलब प्राची कोई बहुत ही अहम काम कर रही, जिसे टाला नहीं जा सकता और वहां लवर नकुल को भी नहीं साथ रखा जा सकता... सिम्पल लॉजिक है.. जवाब में हर्ष नाम निकल आएगा..."
"बाकी आप यहां मेरी बात सुन रही वो तो नकुल की ओवर एक्टिंग से पता चल गया था, जब उसने बेवकूफी के साथ टोका की अब मै समझ लू जवाब देना नहीं चाहती.... ये अप्राकृतिक स्वभाव था नकुल का जो दर्शा रहा था कि वो किसी को दिखाना चाह रहा है कि कितना हक है मुझ पर.. सही कही ना भतीजे..."
प्राची दीदी:- मुझे 3 दिन का समय बकवास आइडिया लगता है.. मै अभी ही हर्ष को बुला चुकी हूं.. अब जो भी होगा हम चारो के बीच ही होगा.. मेनका सब संभाल लेगी..
खैर कुछ ही देर में सभा बैठने वाली थी और बस बॉम्ब फोड़ना बाकी रह गया था... जैसे ही हर्ष पहुंचा नकुल को वहां देखकर व्यंग करते हुए... "मुझ टेक्स्ट बुक रट्टूमल को जिनियस और सुपर जिनियस के बीच बुला ली दीदी"..
हर्ष के मुंह से नकुल के लिए निकले व्यंग सुनकर प्राची दीदी मायूसी से मेरी ओर ऐसे देखी मानो कहने की कोशिश कर रही हो... "ये क्या है यार".. लेकिन बेचारी की विडंबना, कुछ कह भी नहीं पाई..
तभी हर्ष, प्राची दीदी के करीब बैठकर... "दीदी तुम जानती नहीं मै और मेनका पिछले एक साल से प्यार करते है..."
बस, बस, बस इसी की कमी थी.. नकुल को मै आंख दिखाकर बस पीछे खड़ी रहने कही और चुपचाप सुनने.. इधर हर्ष ने जैसे ही अचानक हमारे रिश्ते के बारे में बताया, प्राची दीदी ठीक वैसे ही खुश हुई जैसे श्रावण के पहली बरसात के बाद मेंढक खिल जाते है..
सच मे हर्ष भी ना.. क्या ही कह सकती हूं.. बस इतना की बहुत प्यार है.. बिल्कुल सरल और साधारण तरीके से सोचने वाला.. हां बहुत से ऐसे लोग को बेवकूफ जरूर कहते है, लेकिन कोई ना मुझे हर्ष की इन्हीं बेवकूफियों से तो और भी ज्यादा प्यार बढ़ जाता है... पता नहीं क्या सोचकर आते ही बॉम्ब फोड़ दिया, जबकि इस तरह के बात का तो माहौल भी नहीं बना था..
माफ कीजिएगा.. आज कल दिल और दिमाग में बस हर्ष ही छाया हुआ है.. मै अपने जीवन में पापा के बाद ये दूसरे इंसान से मिल रही थी, जो इतना मासूम है.. बिल्कुल उन्हीं की कार्बन कॉपी है... इसलिए जब भी हर्ष को देखती हूं मेरा चेहरा खिल सा जाता है, और फिर सब बातें भूलकर बस उसी की बात करने लग जाती हूं... सामने ध्यान देते हैं, सुनती हूं आगे, हमारे बारे में बताकर क्या समझाना चाह रहा था...
हर्ष मासूमियत से हमारे बारे में बताकर एक छोटा सा विराम लिया.. प्राची दीदी का खिला सा चेहरा और उनकी बदलती नजर जो इस वक्त हम दोनों (मुझे और नकुल) को देख रही थी, उनके अंदर की हंसी और दिल की भावना की अभिव्यक्ति किए का रही थी कि... "अब तो बिल्कुल भी चिंता नहीं"…
मैंने इशारे मे नकुल को बड़े ही कड़े लहजे में हिदायत दे चुकी थी की जहां है वहीं खड़ा रहे, बिना कुछ बोले... हर्ष एक छोटे से विराम के बाद अपनी कहानी आगे बढ़ानी शुरू किया...
"दीदी केवल यदि आपको ऐसा लगता है कि आपने ही किसी से दिल लगाया है और मुझसे बताने मे हिचकिचा रही है तो मै भी बता दूं कि मैंने भी आपकी मुंहबोली बहन से दिल लगा लिया है"….
नकुल:- तो क्या प्राची अब तुम्हे जीजाजी कहे या मेनका को भाभी...
"हिहिहीहिहिहिही.…हिहिहीहिहिहिही" मेरी और प्राची दीदी की हंसी छूट गई, नकुल भी हंस रहा था लेकिन उसने ऊपर से जाहिर नहीं होने दिया.. हर्ष पलट कर जैसे ही नकुल को घुरा मैंने हर्ष का ध्यान अपनी ओर खींचा... "हूं.. हूं.."
हर्ष, पूरी तरह उलझकर झुंझलाते हुए... "बात को भटकाव मत... मै बस इतना कहना चाह रहा हूं कि मुझे नकुल और तुम्हारे सामने इतना कहने की हिम्मत सिर्फ विश्वास के वजह से हुआ है... चूंकि मेनका को पूर्ण विश्वास है कि नकुल अंत तक उसका साथ देगा, और मुझे तुम पर पूरा यकीन है"…
हर्ष की बात सुनते हुए मै नकुल के बांह मे हाथ डालकर उसके कांधे से अपने सर को टिका दी.. नकुल अपने दूसरे हाथ से मेरे गाल पर धीमे से थप्पड़ मारते, कान में कहने लगा... "तुझे कोई और नहीं मिला था, जो इस रट्टू तोते को पकड़ ली"..
मै, बिल्कुल फुसफुसाते.… "प्यारा है ना"…
"हां, बहुत ज्यादा.. कनिका मिश्रा और अनूप मिश्रा की जोड़ी दिख रही है"……
"थैंक्स भाई.. तुझे पसंद आया"….…
"हम चाहकर भी इससे अच्छा लड़का और इससे अच्छा परिवार नहीं ढूंढ सकते थे.. बस अब एक ही चिंता है.. एक ही परिवार में 2 शादी के लिए 2 बार ड्रामे करने होंगे"
नकुल की बात सुनकर मै उसके बांह को और भी ज्यादा भींचती... "तू साथ खड़ा है तो फिर मुझे क्या फिक्र.. बस तुझसे कैसे बताऊं, यही चिंता मे रहती थी"…
"बस मै भी इसी चिंता मे था अपने बारे में कैसे बताऊं... तूने जब मुस्कुराकर सहमति दी फिर सारी चिंता खत्म हो गई"…
"ओ रे बाबा... तुम दोनो बुआ भतीजे ने तो आपस में चर्चा खत्म करके मैटर भी क्लोज कर ही लिया होगा"… प्राची दीदी हम दोनों को घूरती हुई कहने लगी...
नकुल:- चुलबुली हम तो तुम दोनो की बातें ही सुन रहे है.. अब दोनो कुछ बोल नहीं रहे तो इस बीच मै और दीदी समय का सदुपयोग कर रहे थे..
हर्ष:- चुलबुली अच्छा निक नेम है.. लेकिन ये दीदी (प्राची) से ज्यादा मेनका पर सूट करता है..
नकुल:- हां तो तू भी अपनी गर्लफ्रेड के लिए चुलबुली कॉपी मार ले.. तू अपनी बहन मुझसे सेट करवा दे और मै अपनी बहन तुझसे...
अरे बाप रे… मै हंसते हंसते पागल हो गई... "इट्स क्रेजी क्रेजी फीलिंग"… ये डायलॉग भी उसी साउथ की हिंदी डबड मूवी का था, जिसे हर्ष ने मुझे सजेस्ट किया था और मैंने नकुल को...
मै हंस हंसकर पागल हुई जा रही थी.. हर्ष भी अब मामला समझ चुका था, उसका चेहरा देखने लायक था.. और प्राची दीदी तो नकुल को ऐसे घुर रही थी मानो खा ही जाएगी.. हर्ष घुर तो रहा था लेकिन उसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे.. जब कुछ ना हो बोलने के लिए तब एक ही काम होता है... हर्ष आकर नकुल का कॉलर पकड़ लिया...
इस बार नकुल मेरे ओर घुरा, अभी हंस रही थी लेकिन अगले ही पल मेरा चेहरा उतर गया.. मै अपनी नजर नकुल से हटाकर हर्ष पर ले गई और उसे हटने के लिए कहने लगी.... लेकिन हमारे इशारों की भाषा उतनी कारगर नहीं थी जो हर्ष समझता...
नकुल ने पीछे हटने के लिए कह दिया था.. अब आगे भगवान मालिक.. लेकिन मै हर्ष को बेइज्जत होते या मार खाते नहीं देख सकती थी... अगले ही पल नकुल ने हर्ष का हाथ झटक कर ऐसे धक्का दिया की वो पीछे के ओर असंतुलित होकर पुरा झटका खाया.. हर्ष पुरा अनियंत्रित था, तभी अगले ही पल नकुल ने हाथ बढ़ा कर उसके गीरेवान को पकड़कर अपनी ओर खींचा और एक थप्पड़ लगा दिया...
मेरे आखों में आशु पहले से आ गए थे.. लेकिन थप्पड़ पड़ने के बाद दोनो (नकुल और हर्ष) मेरी ओर देखे और मै मायूस होकर उस घर से अपने कदम बढ़ा दी.. नकुल को मेरे सामने हर्ष को बेइज्जत नहीं करनी चाहिए थी.. लेकिन क्या करती हर्ष में भी तो तमीज नहीं ही थी, जो उसने प्राची दीदी के सामने उसका गीरेवां पकड़ लिया..
कुछ भी हो नकुल तो समझदार था, उसे मेरे सामने ऐसा नहीं करना चाहिए था.. मै समझा देती हर्ष को.. वो मेरी बात सुनता, जरूर सुनता... नकुल के रवैए से मै पूरी तरह आहत थी, लेकिन बात फिर वही हो जाती है.. हर्ष अब भी एक बाहर वाला था और मै किसी बाहर वाले के लिए नकुल से कुछ कह भी नहीं सकती थी..
मै अपनी कार स्टार्ट की और बस चल दी.. अंदर, दिल में बहुत है बुरा लगा था, मेरे आशु ही नहीं रुक रहे थे.. मेरे ना चाहते हुए भी लगातार निकल रहे थे... मै कहां जा रही थी मुझे खुद पता नहीं था, बस रोती जा रही थी और कार ड्राइव करती जा रही थी...
romanchak update ..ravi menka ko keh raha hai ki kuch mantriyo ka paisa black se white karna hai ,matlab dono ko bharpur maal milega ..
menka ke yaha charo jama huye aur harsh ne apne pyar ke baare me bata diya aur jab nakul ne kaha to uska gireban pakad liya ..aisa hi hota hai ham kisi ladki se pyar kare to sahi hai par hamari behan se koi kare to ekdam galat ,hamari behan ki shadi pariwar ki marji se hi honi chahiye aur ye maansikta ka harsh hai ...
menka ko bura laga ki harsh ko dhakka diya par kya usko prachi ke feelings nahi saamjh aaye ..wo bhi to nakul se pyar karti hai aur shadi karna chahti hai ..
last ki lines menka ka pyar harsh ke liye aur nakul ke liye ,,,ab nakul se jyada harsh pyara ho gaya hai na ..
harsh ko samjha deti to uthkar side karna tha usko ..
एक सिग्नल पर मेरी कार रुकी और मै बस ख्यलो में गुम थी.. आशु अब भी रुक नहीं रहे थे, हां लेकिन पीछे के हॉर्न की आवाज ने मेरा ध्यान तोड़ा था.. नजर जब इधर उधर हुई तो मुझे नेशनल लाइब्रेरी दिख गई..
मेरे हर तन्हा पल का साथी, जिसके बारे में मेरी मां कनिका मिश्रा से मुझे ज्ञान मिला था कि... "जब ज़िन्दगी में सब कुछ नीरस लगे, तो किताब पलट लेना चाहिए.. क्योंकि यदि पढ़ने मे रुचि है, फिर नीरस जिंदगी में स्वाद आ जाता है.. फिर वास्तविक जीवन जीने का भी अपना ही प्यारा नजरिया होता है..."
नेशनल लाइब्रेरी मे मैं जैसे ही घुसी.. बस मां की उस प्रचलित पुस्तक का ख्याल मन में था, जब मां कहा करती थी... "कभी वक्त मिले तो 'अज्ञेय' द्वारा रचित 'अपने-अपने अजनबी' उपन्यास जरूर पढ़ना"..
मै अपने आशु पोंछकर उपन्यास का नाम बोली और वहां के लाइब्रेरियन ने बता दिया कि वो पुस्तक कहां मिलेगी.. मेरे हाथ में जैसे ही वो पुस्तक आयी, पुस्तक को एक टेबल पर रखकर बाहर गई और अपनी मां को कॉल लगा दी...
मां:- राम राम मेरी सीए बिटिया..
मै:- मां, नकुल से थोड़ी बातचीत है गई, मुझे रोना आ रहा था..
मां:- बेटा रोना आ रहा था या रो रही है..
मै, थोड़ी सिसकती हुई... "हां रो ही रही हूं"..
मां:- हम्मम ! तू रुक मै उसकी खबर अभी लेती हुं..
मै:- हो गया मां, आप तो ऐसे ड्रामा नहीं करो ना.. मै सब समझती हूं, कोई पूछने तक नहीं आएगा की क्या हुआ गया हमारे बीच...
मां:- हां तो तू भी तो अपनी मां को इसलिए तो फोन नहीं कि होगी की मै तेरे और नकुल के बीच मध्यस्था करूं.. फिर जब तुझे किसी से अभी मिलना ही नहीं तो, वक्त बता दे कब तक नहीं मिलना पसंद करेगी.. और पता बता दे कहां है.. फोन बंद कर और कहानी खत्म..
मै:- मां मै नेशनल लाइब्रेरी में हूं, और मेरे पास है..
मै आगे बोलती उससे पहले ही मां उत्सुकता मे कहने लगी.... "और तुम्हारे हाथ में है योके और सेल्मा कि अभूत्वूर्व कहानी.. 'अपने-अपने अजनबी'"
मां से 2 लाइन बात करके ही मेरे आशु गायब थे, अब तो उनकी उत्सुकता मेहसूस करके मेरे चेहरे पर मुस्कान भी आ गई... "नहीं मां वो तो याद भी नहीं था मुझे, मेरे पास तो 'रोबिना शर्मा' की पुस्तक है... "दि मोंक हु सोल्ड हिज फर्रारी (The Monk Who Sold His Farrari)"
मां थोड़ी मायूस आवाज में... "ओह वो नोवेल पढ़ रही है.. कितनी बार बेचारे उस वकील की फर्रारी बिकवाकर हिमालय पर भेजेगी... आध्यात्म से अच्छा था एक बार दर्शनशास्र पढ़ लेती..."
मै:- ये तो जबरदस्ती हुई ना..
मां:- नानी कहीं की.. एक बार बस 3 पन्ने पलट ले, अच्छा ना लगे तो वकील साहब कहां भागे जा रहे है.. दिल्ली से लेकर गांव तक हर जगह तो मिल ही जायेंगे...
मै:- अच्छा ठीक है देखती हूं, यहां अगर ओरिजनल कॉपी मिली तो पढ़ लूंगी..
मां:- ओरिजनल कॉपी मिले तो एक मेरे लिए भी खरीद लेना...
मै:- यहां तो होगी ही मां.. ना भी हुई तो आज जबतक उसे ढूंढकर ले ना लूं आपके लिए, मेरा दिन नहीं खत्म होगा..
मां:- ठीक है बेटा.. अच्छा नकुल का कॉल आएगा तो बोल दूंगी की 4 बजे तक मिल ले तुझसे..
मै:- नहीं आज कोई मिलना नहीं होगा.. उसे बस बता देना की मै कहां हूं... बाहर वो बैठकर रास्ता तक सकता है लेकिन मुझे ना तो टोके और ना ही अंदर आकर अपनी शक्ल दिखाए, वरना मै गांव चली आऊंगी.. दोबारा से मै क्लियर बता दूं कि अगर वो परेशान किया तो मै गांव आ जाऊंगी...
मै अपनी बात समाप्त कर सीधा फोन को कि स्विच ऑफ और चली अंदर.. पन्ने पलटते शुरू किए.. हिंदी साहित्य में मै पहली बार 2 विदेशी किरदार से मिल रही थी.. योके और सेल्मा..
लिखने वाले ने क्या रचना की थी.. 2 पत्रों के बीच वैचारिक मतभेद, एक युवती योके, मजबूत, सेल्फ डिपेंडेंट और खतरों से खेलने वाली, लेकिन मृत्यु के भय से जीती है.. पात्र योके कि मृत्यु भय को दिखाने की, लेखक अज्ञेय जी के लेखनी कि अद्भुत कला.… जबकि इस पात्र को पढ़ेंगे तो दूर-दूर तक कहीं से ना लगे की मृत्यु का भय है... वहीं एक वृद्ध कैंसर पेशेंट सेल्मा, हर पल जिंदगी के मज़ा उठाती...
शुरवात मे ही दोनो एक कॉटेज मे थे और पुरा कॉटेज ही बर्फ के नीचे दब गया.. दिसंबर के शुरवात मे यह घटना हुई थी और दोनो (योके और सेल्मा) जानते थे कि बर्फ की ये चादर मार्च के बाद ही हटनी है...
योके और सेल्मा, 2 बिल्कुल अजनबी.. योके अपनी मर्जी से खतरों से खेलने के लिए बर्फ के पहाड़ पर चढ़ी थी, और कॉटेज देखकर उसे विश्वास था कि बर्फ के महीनों में इन कॉटेज मे कोई नहीं मिल सकता, जबकि उसका ये आकलन गलत हो गया.. योके को यहां मिल गई सेल्मा और साथ में बर्फ के नीचे दबे कॉटेज मे योके को अनुभव हुआ जिंदा कब्र मे दफ़न होना...
2 फसे अजनबी और दोनो की अलग-अलग विचारधारा... एक बार जब पढ़ना शुरू की फिर जिज्ञासा इतनी तीव्र हो गई आगे पढ़ने की, मै तो पूरा पढ़कर ही उठी...
मै जब पुस्तक को बंद कर रही थी, गहरी श्वांस लेती बस योके और सेल्मा के बातचीत के दौरान कहे एक पंक्ति दिमाग में घूम रहा था...
"मृत्यु एक झूठ है जो जीवन का खंडन है... और मै जीती हूं क्योंकि मै जानती हूं कि जीती हूं। कभी ऐसा होगा कि मै जीती नहीं रहूंगी... लेकिन जब नहीं रहूंगी तब जानने वाला भी कौन रहेगा, कि मै जीवित हूं, कि मै मर चुकी हूं ? मौत दूसरों की ही हो सकती है, जिसका होना ना होना, दोनो ही हम मान सकते है या जान सकते है… लेकिन अपनी मृत्यु का क्या मतलब है? वह केवल दूसरों को देखकर लगाया गया अनुमान है- कि दूसरे के साथ ऐसा हुआ इसलिए हमारे साथ भी होगा।"
उफ्फ योके के इस कहे शब्द मे एक वास्तविक विचारधारा मिलती है, जो मृत्यु के बाद जीवन की कतई कल्पना नहीं करती.... बस यही लिखने का अंदाज बहुत प्यारा था... मृत्यु के बाद की चीजों मानने और मृत्यु एक अंत है उसके बाद कुछ नहीं, ऐसे सोचने वालो के विचार को बिना भेद भाव के प्रस्तुत किया गया था .. बाकी किताब पढ़ने के बाद अपने-अपने मत है..
बहरहाल लाइब्रेरी वालों ने वो पुस्तक तो मुझे नहीं बेची लेकिन मुझे पता जरूर बता दिया कि कहां से वो पुस्तक मिल जाएगी... फिर जिज्ञासावश मैंने उनसे कुछ और हिंदी साहित्य के उपन्यास के बारे में पूछ ली, की वो मुझे कहां मिल सकती है... लगभग 18 उपन्यास थे और कुछ तो 1880-90 में लिखे गए थे...
वहां का पुराना लाइब्रेरियन मुझे नजर उठकर देखते हुए... "कुछ के तो नाम मै भी भुल गया था, धन्यवाद याद दिलाने के लिए... ये पुस्तकालय का नंबर है (लैंडलाइन नंबर देते).. शाम 7 बजे के बाद मै बिल्कुल फ्री रहता हूं. मुझे अच्छा लगेगा यदि तुम किसी उपन्यास के बारे में मुझसे चर्चा करना चाहो... पहले कुछ लोग थे, जो पढ़ने के बाद घंटो बहस किया करते थे.. यहीं से हम लेखकों को चिट्ठी भी भेजा करते थे"…
"ये जो पुस्तक है अज्ञेय जी की अजनबी.. इस पुस्तक पर यहां घंटो बैठकर बहस होती थी.... मै पर्सनली योके को सपोर्ट करता था... हां बस एक छोटी विडंबना थी, वहां आकर फंस जाता था और मेरे दोस्त बाजी मार ले जाया करते थे"…
मै फिर आराम से बैठ गई.. फिर उन्होंने बहुत से उपन्यास के बारे में बताया... कैसे हर उपन्यास के ऊपर चर्चा होती, लोगो का आवेश में आ जाना.. कहानी के किरदारों के नाम से चिढाना… उन्ही चर्चा के बीच कभी-कभी किसी उपन्यासकार का वहां आ जाना और फिर पत्रों को लेकर उनसे ही तीखी बहस कर लेना...
बात का दौर ऐसा चला था कि वो वृद्ध व्यक्ति 3 बार मुझे चाय पिला चुका था... मै जब वहां से निकली तो वृद्ध व्यक्ति मुझे साथ छोड़ने आया और जैसे ही जाने के लिए मै आगे बढ़ी उन्होंने 2 मिनट रुकने के लिए बोल दिया..
वापस जब आए तो उनके झुर्री परे चेहरे पर फैली मुस्कान को मै पहली बार अनुभव कर रही थी... उनके भावो से तो यही पता चल रहा था कि अब इनके पास बैठकर कोई इनके मित्र चर्चा करने नहीं आते...
जिंदगी की भी अजीब सी पहेली रहती है... उस वृद्ध व्यक्ति को देखकर बस यही सवाल मन में आया कि बैठकर यहां चर्चा करने वाले उनके दोस्त कहां गए...
मै अपने ख्यालों में थी, ठीक उसी वक्त वो वृद्ध व्यक्ति मेरे करीब पहुंचे और मुझे ख्यालों से बाहर निकालते हुए कहने लगे... "मेरी ओर से ये छोटी सी भेंट.. ये पहले संस्करण की छपी पुस्तक है, संभाल कर रखना और पढ़ना"…
उन्होंने 'मैथिली सरण गुप्त' जी की एक प्रचलित पुस्तक 'यशोधरा' को मेरे हाथ में देते हुए कहने लगे... मै अपनी खुशी बयां नहीं कर सकती.. मेरे लिए तो ये अनमोल भेंट थी.. एक पुस्तक प्रेमी की पूरी भावनाएं छिपी हुई था.. ना जाने कितने सालों से यह पुस्तक उनके जीवन का हिस्सा रहा हो, आज भेंट स्वरूप मुझे दे रहे थे..
मै:- बाबा आप यहां अकेले रहते है..
बाबा:- तुम क्या अकेली थी, जब यहां आयी..
उनकी बात सुनकर मेरा हंसता हुए चेहरा ने जैसे खुद व खुद और खुलकर मुस्कुराते हुए उनके कहे शब्दो का अभिवादन करते मुख के भाव से ही जवाब दे दिए… "बिल्कुल नहीं"..
वो भी मेरी भावना पढ़ते हुए कहने लगे... "जब हम सब दिल्ली में काम करते थे, तब यहां प्रत्येक रविवार इन्हीं सीढ़ियों पर और पास के पार्क में हमारी बैठक होती थी.. लोग धीरे-धीरे पहले बहू बेटों पर आश्रित हुए और बाद ने रिटायर होकर कहां गए कोई खबर नहीं.."
"आज की टेक्नोलॉजी हमारे पास तब होती तो आज हम सब दूर होकर भी साथ होते.. लेकिन कौन कहां है मुझे ये तक पता नहीं.. और ना ही कोई दोबारा इस पुस्तकालय तक लौटा... कोई दोस्ती नहीं थी, कोई रिश्ता नहीं था.. बस यहां किताबों ने हमे जोड़ा था.. शायद उनकी पुस्तकों से रुचि समाप्त हो गई हो या असहाय जीवन ने मौका ना दिया हो वापस आने का, कौन जाने... मै खुश हूं.. क्योंकि मेरे बच्चे ने मुझे मेरी रिटायरमेंट गिफ्ट की थी, वो भी मेरे बिना कोई इक्छा जाहिर किए..."…
कभी कभी कुछ लोगों की मुलाकात कितनी कशिश वाली होती है... उन्हे देखकर कुछ सुकून सा अनुभव होता है.. इस वृद्ध व्यक्ति को देखकर यही मेहसूस कर रही थी कि ये तो बिल्कुल कहानी की पात्र सेल्मा है जो पूर्ण रूप से जीवित है और जीवन के हर पल का आंनद उठा रहे...
nice update ...maa ko phone kiya aur bataya ki library me hai to maa ne sahi pehechana ki wo kaunsi kitaab padh rahi hogi ..
nakul se baat nahi karna chahti ..
us budhe aadmi ke saath achchi baatchit huyi aur usne menka ko ek kitaab bhi di ..
yoke aur selma ke baare me padhkar achcha laga ..aur wo kuch lines bhi mast thi .. par kya ye sach hai ,kitaab ka naam aur writer ka ??? apne apne ajnabi ...yaa bas ek soch ?? jaise kahani me writer likh deta hai ..
मै उस वृद्ध व्यक्ति के दिए पुस्तक को देखती हुई अपनी कार तक आयी.. सामने नकुल था, मै मुस्कुराती हुई उसके पास पहुंचती... "भाई चल एक छोटा सा काम करके आते है"..
मेरी बात सुनकर उसके मुरझाए से चेहरे पर भी मुस्कान आ गई... वो मेरे साथ चलते हुए दिन की बात मुझसे करने की कोशिश करने लगा, लेकिन मै उसे मना करती हुई कहने लगी... "अभी बहुत ज्यादा ही सुकून मे हूं, अभी नहीं, बाद में बात करे आराम से फ्लैट पहुंचकर"..
नकुल ने हामी भर दी और यहां लाइब्रेरी मे क्या हुआ वो पूछने लगा.. मै मुस्कुराती हुई नकुल से सारी बात कह गई.. और जब उसका चेहरा देखी तो वही संतुष्टि के भाव भी उसके चेहरे पर थे.. उसके भी दिल में यही ख्याल आया.. "इनके पुराने दोस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए भी यदि मुलाकात करवा दे, तो उनके चेहरे की खुशी देखने लायक होगी"…
मै भी हां में सर हिलाते हुई यही बात कही और सीधा पहुंच गई लियाकत अली के दिल्ली आवास मे.. 5 मिनट बाद हमे अंदर बुलाया गया... लियाकत अपनी बीवी और बच्चो के साथ वही अपने बड़े से हॉल में बैठा था... हमे जैसे ही देखा, वहां से सभी को एक साथ बाहर जाने बोलकर.…. "हम जैसे गरीब के यहां आयी हो, आज रास्ते कैसे भटक गई"…
मै:- क्या भईया ताने मार रहे हो.. छोड़ो आज भी रुकने नहीं आयी हूं..
लियाकत:- हां काम परे तभी आना..
मै:- और क्या बेइज्जती थोड़े ना करवानी है.. अब तक मंत्रिमंडल में सामिल नहीं हुए..
लियाकत:- तू ना मुझे पीछे से चाभी देकर गायब ही ना करवा देना.. कुछ है तो बताओ.. वरना जाने दे..
नकुल:- कुछ होगा तो आपको क्यों बताएं.. वरुण भईया को क्यों ना बताएं.. वैसे कुछ है तो दिमाग मे मेरे..
लियाकत:- चल फिर बताओ…
नकुल:- कोई फायदा नहीं बताकर.. आप उतावले बहुत होते हो.. यही कहूंगा अभी आराम से एक कार्यकाल तो पुरा करो.. और ... फिलहाल हमारा काम कर दो..
कुछ तो नकुल लियाकत को बातों-बातों मे ताने भी दे गया और अप्रत्यक्ष रूप से समझा भी गया.. लियाकत के बदले चेहरे के भाव को मै समझ सकती थी... फिर भी वो सिर्फ इतना ही कहा... "हां बताओ ना.."
मै, उन्हे उस वृद्ध के साथ ली गई एक तस्वीर को दिखाते... "ये आदमी नेशनल लाइब्रेरी में मिल जाएंगे.. कुछ वर्ष पहले जब ये लोग दिल्ली के किसी-किसी ऑफिस में कार्यरत थे, तब इनका पुरा ग्रुप हुआ करता था जो लाइब्रेरी आकर किताबों और रायटर्स पर ग्रुप डिस्कशन किया करते थे...."
"रिटायरमेंट के बाद इनका पुरा ग्रुप बिछड़ गया है... आप पता लगाओ, वो भी बिना इस वृद्ध व्यक्ति की जानकारी के... सबको एक साथ पहले दिल्ली बुलवाकर यहां मुलाकात करवा दो और बाद में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का इंतजाम कर दो.. एक मस्त रिपोर्टर को पीछे लगाओ, मस्त कवर स्टोरी तैयार करवाओ. उनके चेहरे पर मुस्कान ले आओ और लियाकत अली का नाम किसी अच्छे काम के लिए नेशनल टीवी पर भी चलवा दो..."
लियाकत:- 4 दिन बाद रविवार को तुम दोनो यदि उस लाइब्रेरी मे होने का वादा करो तो मै सबके चेहरे की मुस्कान, तुम दोनों को दिखा सकता हूं..
नकुल:- सठिया गए हो, हमे टीवी पर नहीं आना है..
लियाकत:- और मै किसे क्रेडिट दूंगा की किसके कहने पर ये कहानी की तलाश किए..
मै:- हमारे इलाके के सब इंस्पेक्टर नितिन, उसे बुला लो.. और कहानी संज्ञान मे देने का क्रेडिट उसे दे दो.. ईमानदार आदमी को प्रमोशन तो मिल जाएगा..
लियाकत:- आई हेट ईमानदार लोग.. तू सबको भगवान श्री कृष्ण नीति क्यों नहीं पढ़ाती.. उनको दिमाग दे की जिनसे लड़ ना सको, चुपचाप पैसे लेकर काम करते रहो और जब वक्त मिले तो अच्छाई छाती फाड़कर दिखा दे.. तबतक शांति से अपना काम करते रहे...
मै:- हिहिहिजिहि.. अरे हुआ क्या.. क्यों चिढ़े हो मासूम लोगो पर..
लियाकत:- यार मै और वरुण मिलकर कितने प्रोजेक्ट पास करवा रहे, अब काम हो रहा है तो धन भी कमा रहे.. दूसरो की तरह तो नहीं है जो 5 साल काम भी ना करवाए... अब 2-4 रुपया काम करवा के कमा क्या लिया, कुछ बेईमान ने कुछ ईमानदार लोगों के कान भर दिए है, अब वो लोग काम ही नहीं करने दे रहे क्षेत्र में..
नकुल:- पहले ही कहा है हमसे इन मामलों को दूर रखीए.. हमे नहीं इन्वॉल्व होना है..
लियाकत:- अरे दिल की भड़ास निकाल रहा हूं..
मै:- मामला हमारे बीच के लोगों का है क्या.. नकुल 2 मिनट शांत रह ना भाई..
लियाकत:- हां.. ईमानदार है तुम्हारा भतीजा नकुल, मेरे प्यारे अब्बा जान असगर आलम, तुम्हारे भैया वरुण मिश्रा.. बेईमान है डीएम ऑफिस का संदीप श्रीवास्तव, मेरे अब्बा के पुराने दो साथी, महरूफ और अब्बास.., मुखिया बख्तियार की आवारा बहू, नाजरी
मै:- संदीप को छोड़कर तो पूरा मुस्लिम बेल्ट का ही काम है.. फिर क्यों समस्या हो रही है...
लियाकत:- मस्जिद के मामले में फसा हूं..
मै:- अक्ल क्या घास चरने गई है.. आपको पॉलिटीशियन किसने बाना दिया... मोहल्ले की अतिक्रमित जमीन को तो कोई देखने नहीं आता है और आप मस्जिद के मसले मे उलझ रहे... मै क्या ही कह दूं..
लियाकत:- नेशनल हाईवे का बाईपास प्रोजेक्ट है एक कंप्लीट पैरेलल रास्ता निकलने के लिए... मेरे लिए जरूरी है करना.. बस वो दक्षिणी गांव जो है मेरे बाप का ससुराल वो नाटक किए है.. बीच मे 2 मुस्लिम बस्ती और भी तो थी.. मेरे कहे राजी हो गए... 40 किलोमीटर के 6 लेन का काम है.. और 500 मीटर के रास्ता वाले अरांगा डाले है... वो साला श्रीवास्तव का चक्कर है नाज़री से और उन्हीं दोनो ने सबके साथ मीटिंग करके पूरी प्रोजेक्ट मे कहते है 20% चाहिए..
बताओ सेंट्रल के प्रोजेक्ट में जहां हम कोई हिस्सा नहीं लेते किसी प्रोजेक्ट का.. बस ये मान ले कि हमने बड़े-बड़े कॉन्ट्रैक्टर का काम करवाया इसलिए 5 से 7 करोड़ का बांधा है, जबकि कोई भी प्रोजेक्ट 700 से 1200 करोड़ का होता है...
8 बड़े बड़े प्रोजेक्ट सहर मे करवाया, न्यूनतम पैसे लिए है सबसे और उनको लगता है एक प्रोजेक्ट में मेरा 20% हिस्सा है.. बताओ पागलों का कोई जवाब है... साले सब चोर नेता राहत राशि और जमीन पर कब्जा करके कमाने वाले, मै लगातार बड़े-बड़े काम करवाकर कुछ कमा रहा हूं तो इनको आंख लगता है...
मै:- अरे यार नकुल... लियाकत भईया सही तो कर रहे है... बड़े-बड़े प्रोजेक्ट होंगे तभी तो आम आदमी को भी रोजगार का साधन मिलेंगे...
नकुल:- ये है बेवकूफ... और मै नहीं कुछ बोलने वाला.. इसको बोलो पहले अपने टीम से उस मुश्ताक को हटाए पहले...
लियाकत:- लो ये फिर शुरू हो गया..
नकुल:- छठ मे मुझे मिला नहीं वरना वही खेत में उसके लिए कब्र खोदे हुए था... और मै ये आज घोषणा किए देता हूं... यदि मेरी नहीं माने ना, तो ये आपके राजनीतिक कैरियर का आखरी कार्यकाल होगा..
लियाकत:- नकुल तुम हर बात को पर्सनली लोगे तो कैसे होगा...
मै:- अब मै गांव में नहीं हूं तो कितनी बातें हो रही है..
नकुल:- कितनी बातें नहीं... बस एक ही बात हुई है.. उस मुश्ताक ने भड़काऊ भाषण दिया था और दंगे होते-होते रह गया था... तभी उसके बाद ये बाईपास प्रोजेक्ट आया है जहां 18 मंदिर और 3 मस्जिद बीच मे आ रहे है उस 40 किलोमीटर के रास्ते में… जिसमे से गांव का पुराना शिव मंदिर भी है रास्ते में.. इसलिए इनके अब्बा उनके दोस्त वो बख्तियार की बहू, संदीप सब खिलाफ हो गए है, तो ये बेवकूफों की तरह सोच रहे है कि इसके अपने लोग इसके खिलाफ है...
कोर्ट हस्तछेप इसलिए नहीं कर रही है क्योंकि ना इधर से गांव वाले राजी है उस पुराने शिव मंदिर को हटाने के लिए और ना ही बखितियार मुखिया की बहू तैयार है वो पुरानी मस्जिद को हटाने.. दोनो मे जिस इलाके के लोग तैयार हो गए, कोर्ट डेवलपमेंट के नाम पर हस्तछेप कर देगी.. फिर अगली बार आए ना वोट मांगने इनको पता चलेगा..
हम सब समझा रहे है मत परो इस मसले मे क्योंकि दंगा भड़काकर हाई लेवल ड्रामा इसी के कंधे पर रखकर खेला जा रहा है, तो दिमाग इनका काम ही नही कर रहा.. और उस मुश्ताक को तो बिहार भेजना मत.. दोनो पक्ष वाले उसे ही ढूंढ रहे है.. जिस दिन हाथ लगा वो चला जाएगा...
लियाकत:- यार कब सुधरोगे तुम लोग.. मंदिर-मस्जिद के नाम पर डेवलपमेंट नहीं होने दोगे क्या?
नकुल:- अभिनंदन लाल की बैठक में कम रहा करो... उसने जो ब्रेन वाश किया है ना, आपका पॉलिटिकल कैरियर चला जाएगा... चल मेनका, अभी उनका दिमाग नहीं काम कर रहा है... जाकर इमाम के पास झड़ फूंक करवाएगा अभी...
लियाकत की पत्नी जूही... "तुम सुनते क्यों नहीं सबकी.. हर कोई तो एक ही बात कह रहा है फिर भी अपनी जिद पर अरे हुए हो...
नकुल:- कुर्सी ऑफर हुई है ना इसलिए इनका दिमाग काम करना बंद कर दिया है... जब बचाने को कुछ नहीं बचेगा, तब अक्ल खुलेगी...
लियाकत:- बस भी करो तुम लोग... क्या बुराई है अगर 40 किलोमीटर का रास्ता बनवाकर मै मंत्री बन जाऊं तो...
जूही:- जब सांसद ही नहीं रहोगे तो मंत्री कैसे बनोगे..
लीयकट अपनी बीवी को एक थप्पड़ लगाते… "जिस बात का ज्ञान नहीं है उसमे बीच मे मत बोलो"…
मेनका:- सांसद सर ज्ञान तो हमे भी नहीं... चल भाई.. इन्हीं जैसे लोगों के लिए किसी ने कहा है कि विनाश काले विपरीत बुद्धि... जो अपने पिता की ना सुना वो हमारी क्या सुनेगा...
लियाकत:- मुश्ताक को दिया, प्रोजेक्ट भी छोड़ दूंगा.. तो क्या मुझे मंत्रीपद कोई दिलवाने का वादा करता है..
नकुल:- आप एक अच्छे पॉलिटीशियन तो है, लेकिन धैर्य की बहुत कमी है आपमें… पहले खुद मे साबित कर दो की एक सही राजनेता हो... पॉलिटिकल साइंस का विद्वान.. और एक पूर्व गृह मंत्री के चेले को मै ऐसा देखता हूं तो बस दया ही आता है.. पहले खुद मे समीक्षा करो.. फिर ये सरा जहां आपका है... हम भी आपके है और वो पुरा क्षेत्र जो एक होकर आपको जिताया है, वो भी आपका है...
पुरा क्षेत्र ये नहीं जानता था कि लियाकत आलम हमरे लिए काम करेगा की नहीं करेगा, क्योंकि पॉलिटीशियन मतलब नकारा, लड़ाने वाला हम इतने में ही संतोष किए हुए है... शॉर्ट टर्म भीख मे पाए लक्ष्य के लिए यदि अपनी पूरी शिक्षा और अनुभव भुल गए तो अफ़सोस के सिवा कुछ नहीं होगा...
हम चलते-चलते दरवाजे तक पहुंचे ही थे की लियाकत बोलने लगा... "जनवरी में बैठक करवाओ.. सभी खास लोगों की, वहां जो सबका निर्णय होगा वो मेरा निर्णय... मेरा ये लिखितनामा लेते जाओ"…
मै:- हिहिजिहिहिही… लियाकत भईया नकुल की ही केवल सलाह मान लो तो आपको किसी को कहना नहीं पड़ेगा और हर चाहत खुद आपके दरवाजे पर दस्तक देगी... एक बात याद रखना … जो घर हार गया वो दुनिया जीतकर भी कुछ हासिल नहीं कर सकता... जनवरी मीटिंग बहुत दूर है, इमेज सुधारनी होगी इसलिए मीटिंग के लिए बस तैयारी ही कर लो... लेकिन बख्तियार की बहु पर जो इल्ज़ाम लगाया है ना उसके लिए माफी मांग लेना..
नकुल:- अब कुछ बातें उनकी भी सही ही होंगी पागल, बस आवेश में कभी-कभी पागल होकर सब उल्टी कर देते हैं.. अब चल..
मै और नकुल वापस लौट आए.. आज एक ही दिन में कितने ड्रामे हो गए.. और कितनी नई चीजें सामने आ गई.. हाय रे जिंदगी... सालो के बाद कभी-कभी सरप्राइज़ की बारिश ही करवा देते हो...
हम जब वापस लौट रहे थे... "क्यों नकुल बाबू.. इतने लंबे मैटर मुझसे एक बार भी चर्चा तक नहीं... और मिश्रा खानदान वालों ने तुझे क्यों पोस्टर बनाया है ये पॉलिटिकल मुद्दे को विरोध करने के लिए.."
नकुल:- छोड़ जाने भी दे…
मै:- अब मै भी कह दू आजकल मेरे सवाल का जवाब नहीं देना चाहता..
नकुल:- ताने देने वाले टिपिकल लड़की के गुण.. डेवलपमेंट के नाम पर खेत का सीना चिड़कर बीचोबीच रास्ते निकाल रहे.… जबकि दक्षणी लाइन में सड़क की कोई जरूरत ही नहीं थी.. 6 लेन और 40 किलोमीटर का रास्ता इसका मैंने आकलन किया.. लगभग 200 बीघा से ऊपर के खेत प्रभावित होंगे... और रास्ता बनाने में लगभग 50 से 60 बीघा खेत की उपज ज़ीरो...
मंदिर मस्जिद का मसला ना भी होता तो भी मै आंख नहीं मूंद सकता था... इतने खेती के उपज मे कितनों को खिलाया जा सकता है इस बात का अंदाजा तो हो ही गया होगा..
मै:- तू बेस्ट है, लेकिन आज अच्छा नहीं किया तूने.. जान बूझकर रुलाया ना..
नकुल:- शुक्र है बात तो शुरू की, नहीं तो लगा रूठी बैठी है... तेरे से नही माफी मांगा लेकिन तेरे होने वाले के पाऊं मे गिरा था.. हां बस तेरे जाने का इंतजार था, वरना तुझे और बुरा लगता..
मै:- तू 2 मिनट साइड मै ले जाकर पुरा समझा तो दिया कर, करना क्या चाहता है...
nice update ..menka aur nakul ne sahi faisla kiya us budhe vyakti ko sab dosto se jodne ke liye .
waise ye liyakat ko jitna samajhaya hai usse lagta hai menka aur nakul ko politics me hona chahiye ..
nakul ne maafi maangi harsh se ...bahut sahi kiya ..rishto me jyada waqt ke liye narajgi nahi rakhni chahiye ..