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Thriller 100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)

nain11ster

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अध्याय 24 भाग:- 1




वर्तमान समय..


मेनका मिश्रा यानी की मै, आश्चर्य मे फसी दोनो को सुन रही थी.. दिल की तमन्ना तो मेरी भी थी कि यदि ये दोनों एक हो जाते तो सबसे ज्यादा खुशी मुझे होती.. किन्तु हर प्यार के बीच में एक लेकिन आ ही जाता है..


दोनो को पूरा सुनने के बाद... "नमन है दोनो को, प्यार अंधा होता है, सुनी थी.. देख रही हूं.. प्राची दीदी.."


प्राची दीदी:- क्या हमारी जिंदगी घूट जाएगी..


अरे यार एक दम ओरिजनल इमोशन और एक्सप्रेशन था.. मै आगे कुछ कह ही नहीं पाई... तभी नकुल अपना सर मेरे गोद में डालते… "मेनका, तू बस हमे गलत मत समझ प्लीज, वरना पता नहीं मेरा क्या होगा"..


नकुल का चेहरा मै साफ पढ़ सकती थी.. उसपर लिखा था कि वो कितने उम्मीद के साथ मुझे देख रहा है.. अब ये क्या मेरा गोद लवर्स पार्क बन गया.. प्राची दीदी भी सो गई.. मै लगभग चिल्लाती हुई.. "मैंने कोई गलत नहीं समझा.. लेकिन खुद को संभालो तो.. दरवाजा खोलकर मै अंदर आयी और दोनो सोफे पर ही.. मेरी जगह हर्ष होता तो"…


नकुल:- सॉरी थोड़ा मुश्किल आजकल हमारे लिए भी हो रहा है... हम खुलकर साथ रहना चाहते है लेकिन कभी-कभी लगता है कि यदि हमारी कहानी कहीं उलझ गई, तो इतने लोग उलझ जाएंगे की हमे आत्महत्या करनी होगी...


आत्महत्या.. सुनकर ही मेरी श्वांस अटक गई.. लेकिन नकुल की बात भी सही थी.. मेरे और हर्ष के केस में तो समझ में भी आता है कि दोनो में प्यार हो सकता है.. लेकिन प्राची और नकुल का सुनकर ही...


हां लेकिन मेरी नजरों में तो कुछ भी ग़लत नहीं था.. दोनो को देखकर मैंने कभी मैंने ही सोचा था कि दोनो एक ही जाए... और कहते है कि दिन मे एक बार आपके जुबान पर मां सरस्वती विराजमान रहती है.. जो बोला वो सच हो जाता है... ऐसा ही कुछ इनके साथ भी हुआ है क्या...


मै गहरी श्वांस लेती... "सब समझ जाए तो समझ जाए लेकिन हर्ष नहीं मानेगा... उसका क्या?"


प्राची:- सब कैसे मान लेंगे.. आसान है क्या?


मै:- ठीक है कोई आसान काम नहीं है, मै जा रही हूं..


दोनो (प्राची और नकुल) एक साथ... "अरे रुको रुको कहां जा रही हो"…


मै:- जब तुम दोनो को ही विश्वास नहीं तो मै क्यों फालतू में ओखल में अपना सर डालूं..


नकुल:- मुझे हम दोनों पर तो कभी यकीन ही नहीं था.. हम तो तुम्हारे भरोसे आगे बढ़े थे..


मै नकुल को एक थप्पड़ मारती... "कुत्ता कहीं का.. मुझसे बिना बताए आगे बढ़ गया और कहता है मेरे भरोसे.. याद है क्या कहा था तूने.. ये निजी मामला है"…


प्राची नकुल को आखें दिखाती… "तुमने मेरी बहन से ऐसा कहा था"…


मै:- ओ प्राची बहन जी.. आपने भी कहा था कुछ जरा याद दिलाना तो.. मेरे उन्होंने मना किया है अभी कुछ साल मज़े करेंगे.. अच्छा मज़ा लूट रहे हो कुछ सालों से दोनो.. मुझे तक भनक नहीं लगने दी.. ये बताओ सच बोलकर सब बात छिपा लेने की साजिश किसने की..


प्राची:- नकुल ने कि थी... पहले समझ मे नही आया लेकिन बाद में तीर निशाने पर लगता देख मै नकुल के सैतानी खोपड़ी को मान गई...


मै:- तुम दोनो को देखकर मेरे मुंह से एक ही शब्द निकालता है...


दोनो एक साथ... "क्या"


मै:- बेचारा हर्ष.. एक वादा करो नकुल..


नकुल:- हर्ष कुछ भी बोलेगा.. कितना भी बुरा ही क्यूं ना.. और भले ही पूरी सभा के बीच तुम दोनों को बेइज्जत कर दे… तुम दोनो उसे कुछ नहीं कहोगे ना मन में बैर पालोगे..


प्राची:- तू कबसे इतनी क्लोज हो गई उसके..


मै:- क्या किसी के क्लोज होना ही जानना होता है.. लव करके और बहुत ज्यादा क्लोज होकर एक दूसरे से शादी करते है ना लवर्स.. फिर जिनके बारे में पूरी जानकारी के बाद शादी करते है उनकी शादी क्यों टूट जाती है..


प्राची:- माफ करना, मै बस यूं ही बोल गई.. हम किसी भी परिस्थिति में हर्ष की किसी भी बात का बुरा नहीं मानेगी और जबतक वो मान नहीं जाता हम मनाते रहेंगे..


मै:- अच्छा ये बताओ इस खिचड़ी रिश्ते में तुम दोनो मुझसे कौन सा रिश्ता रखोगे.. मुझे तो जीजा चाहिए था.. कुमार सर की तरह.. तुमने चुन लिया नकुल को..


प्राची:- हां तो पूरी छेड़ छाड़ कर लेना तू नकुल के साथ मै नहीं रोकूंगी..


मै और नकुल लगभग एक साथ.. "क्या"??


प्राची:- हिहिहिहीहिहि.. जब तुम दोनो को ही पता है कि वो रिश्ता नहीं हो सकता तो चर्चा ही क्यों कर रहे..


मै:- चालू हो दोनो... मेरी एक फाइनल शर्त..


प्राची:- क्या??


मै:- डेस्टिनेशन वेडिंग होगी ताकि मै लड़के और लड़की दोनो ओर की रश्में निभा सकूं और एन्जॉय कर सकूं..


प्राची:- तू बस सबसे हां कहलवा दे.. फिर वो लियाकत वाले पूरे पैसे खर्च करके हम स्विटजरलैंड मे डेस्टिनेशन वेडिंग प्लान करेंगे... ये साले गांव वाले हमारी शादी भड़काने से ज्यादा हमारी शादी करवाने में विश्वास रखें ताकि..


मै:- और सबके पासपोर्ट… वीजा.. अगौरह वगैरह..


प्राची:- वो सब आराम से हो जाएगा.. यहां के इवेंट मैनेजर को रिक्रूट कर दूंगी.. वो सब संभाल लेगा..


मै:- ठीक है फिर आप दोनो डेस्टिनेशन वेडिंग की प्लांनिंग कर लो… लेकिन मै अपने अकाउंट से एक पैसा ना दूंगी.. एक चेयरमैन के साथ मालकिन, दूसरा मालिक.. इतना कमाते हो, फिर भी मेरे पैसा पर नजर..


नकुल:- कंजर कहीं की.. लोगों के एक तरफ का भाड़ा ही दे देना...


मै:- अनुमानित 350 से 400 लोग तो होंगे ही.. ऋतु को मिलाकर..


प्राची, नकुल को देखती... "क्या ऋतु को इन्वाइट करोगे"..


मै:- तो, उसकी शादी पर ये 6 महीने पहले जबलपुर भी गया था और संदेश क्या आया था नकुल के पास..


नकुल:- तू इधर ध्यान दे, एक ओर का भाड़ा देगी की नहीं..


प्राची:- ना ना मेनका.. पूरी बात बताओ, क्या संदेश भेजा था उसने...


नकुल:- अरे वो संदेश भेजी थी इसमें तुम्हे क्या करना... भावनाओ मे कुछ लिखी होगी..


प्राची:- हां तो मुझे वो भावना पता चलनी चाहिए थी.. क्यों पता नहीं चला मुझे...


मै:- शायद विश्वास ना रहा दीदी.. है तो लौंडा ही ऊपर से देश विदेश घूमाकर आपने पंख भी लगवा दिए है... जय श्री कृष्णा, जय श्री कृष्णा..


प्राची:- तू ही बता दे मेनका.. क्या था..


मै:- एक आखरी बार वही पुरानी यादें ताजा कर लेते है शादी से पहले...


ओ तेरी क्या झगड़े हुए थे... 2 दिन लग गए बेचारे मेरे नकुल को मनाने में... हां लेकिन देखकर मज़ा बहुत आता था.. दोनो को देखकर एक ही बात का ख्याल बार-बार आता... "बाकी सब तो राजी हो ही जाएंगे... हर्ष कैसे मानेगा... सब प्राची दीदी के ऊपर है कि वो कितना इमोशनल ड्रामे करती है हर्ष के पास"…


हमारी वहां की सभा टूटी.. हुआ ये था कि, मेरे कॉलेज के प्रोग्राम के कारन मै हर्ष के साथ दीवाली पर घर नहीं निकल सकी... और जब हर्ष के साथ जाने का प्लान कैंसल हुआ तो मै फ्लैट लौटी थी, जहां मैंने नकुल और प्राची को गलती से उस अवस्था में देख लिया था, जो मुझे नहीं देखना चाहिए था...


सभा टूटी और अगले 2-3 दिन तक विचार होते रहा.. मैंने बोल दिया दोनो को कि मामला पारिवारिक है और मै रिस्क लेना नहीं चाहूंगी, इसलिए तुम दोनो को मिलाने की जिम्मेदारी रूपा भाभी की होगी...


नकुल को कोई आपत्ती नहीं थी लेकिन प्राची दीदी एक बार हिचकिचाई की क्या रूपा भाभी से सब कहना सुरक्षित होगा... तब मैं कुछ नहीं बोली, नकुल ही कहने लगा.. वो रूपा मिश्रा है और हमे वो हक से अपना बच्चा मानती है
..


हम छठ पर गर्मजोशी के साथ गांव पहुंचे, साथ मे एक नई खुशी भी थी, मेरे दिल के 2 करीबी, और एक तो मेरा प्यारा नकुल जिसे दिल के करीबी ही कहना ग़लत होगा.. वो तो बस पुरा मै ही थी.. कहने का आशय है कि नकुल और मेनका 2 थोड़े ना है, मेनका का तो अस्तित्व है नकुल.. जो की अपने लिए ऐसा जीवन साथी चुना था, जो मेरे दिल के करीब थी.. अच्छी थी और सबसे बड़ी बात, वो मेरे नकुल को कभी मुझसे दूर नहीं करेगी, यदि तुलना करे की नकुल किसी और से शादी करता, तो पता ना वो कैसी होती..


बहरहाल मैंने रूपा भाभी से ना सिर्फ नकुल के बारे में बताई, बल्कि अपने और हर्ष के बारे में भी सब बोल गई... रूपा भाभी कही भी प्राची से मिली हूं, सुलझी है, मुझे पसंद है. लेकिन हर्ष का कोई आइडिया नहीं मुझे, पहले मुझे अच्छे से समझ लेने दे.. तभी मैंने उनसे कहा कि वो अनूप मिश्रा है, इतना ही समझो.. भाभी मुझे दबोचकर गले लगाती कहने लगी, फिर तो तेरी शादी मै जल्दी करवाऊंगी.. बिना जाने ही हर्ष मुझे पसंद आ गया..


काफी धमाल से भरा रहा इस बार का छठ जहां मै और रूपा भाभी पूरे सिध्दत से नकुल को छेड़ रहे थे और वो बेचारा अपनी इज्जत बचाए भाग रहा था...


खैर, छठ के तुरंत बाद जब मै वापसी की तो नकुल को घर पर रहने की हिदायत देकर लौटी थी... प्राची दीदी भी मेरे साथ ही आ गई और मुरझाई नजरो से ऐसे देखी मानो कह रही हो मेरे नकुल को भी साथ ले लेती.. वो तो अपनी भावना दिखा भी रही थी, लेकिन मै क्या कह देती की वो हर्ष को क्यों साथ ना लाई…


रूपा भाभी के कहे अनुसार वो उधर का सारा बैकग्राउंड तैयार कर रही थी, जैसे ही कोई काम की घटना उनके हाथ लगेगी एक बड़ा ड्रामा होगा.. फिर एक घटना का जिक्र करती कहने लगी थी...

"हालांकि एक बड़ा सा ड्रामा तो चल रहा है लियाकत आलम का.. और उसी के साथ मै (रूपए भाभी) प्राची और नकुल के केस को लिंक कर रही हूं... क्योंकि यहां यदि ये दोनो लिंक हुए, तो नकुल और प्राची की शादी तो सेट ही है साथ ही साथ जिसके पंख कतरने निकली हूं उसका तो मै ये साल खत्म होने से पहले पंख कतरकर ही मानुगी, तू बस अपने होनेवाले दूल्हे को समझा ले की नकुल को जीजाजी मान ले.. तू क्या जानती नहीं की तेरे पापा जैसे लोग कितने अरि होते है जिद्दी..."..


रूपा भाभी ने मामला तो नहीं बताया, लेकिन पंख कतरने की बात से मै समझ चुकी थी की कोई हाई लेवल पॉलिटिकल ड्रामे मे वरुण भईया पूरी तरह इन्वॉल्व है, और रूपा भाभी निकल चुकी है पॉलिटिकल शिकार पर.. छोटा मुर्गा के लिए तो वो नहीं निकल सकती है वो मै जानती हूं.. वरुण मिश्रा के निशाने पर जरूर कोई मगरमच्छ है, तभी रूपा भाभी सामिल है...


खैर मुझे की करना था परिणाम के बाद तो सब कुछ सामने आ ही जायेगा.. बाकी उन्होंने सारी बातें समझा दी थी.. इधर प्राची दीदी भी जब तक छठ मे हर्ष के साथ रही, कुछ-कुछ इमोशनल अत्याचार करती रही, जताती रही की वो आजकल खुश नहीं...


हमे दिल्ली आए 3 दिन हो गए थे, हर्ष भी एक दिन पहले लौट आया था और मै हर्ष से ही मिलने सुबह-सुबह गई हुई थी... मै जब पहुंची तो देखकर आश्चर्य हर्ष पहली बार छत को देखकर कुछ सोच रहा था.… "क्या हुआ डॉक्टर साहब, क्या सोच रहे है"…


हर्ष:- यही की दीदी की शादी की बात इस बार घर पर हुई, वो लड़के से मिलने के लिए राजी भी हुई, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लग रहा है कि उनके मन में कुछ चल रहा है...


मै, गहरी श्वांस लेती... "यदि मेरे शादी कि बात चले किसी और के साथ तो मेरी भावना कैसी होगी"…


हर्ष, थोड़ा गंभीर होकर मुझे अपने बाहों में जकड़ते... "ये सवाल ही मन में कतुहल पैदा करता है.."


मै थोड़ा किनारे होकर, मुस्कुराती हुई हर्ष को देखते.… "मेरे चेहरे पर कन्सन्ट्रेट करो, खुद को शांत पाओगे.. बाकी जब वक्त आएगा तो मेरा नकुल है ना, वो सब अकेले देख लेगा"…
 
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nain11ster

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अध्याय 24 भाग:- 2




हर्ष:- नकुल अच्छा है यार मेरी ही गलती थी जो मैंने पहली मुलाकात में मिस बिहेव किया था.. जानती भी हो वो इस वर्ष डॉक्टर नकुल मिश्रा हो जाएगा.. वो भी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से.. जिस कोर्स को करने में लोगों की 5-7 साल लग जाते है.. उसने महज 12th पास होने के बाद 2 साल मे कर लिया.. सच मे वो जिनियस है..


मै:- हां मुझे भी छठ मे बताया, और हो जाएगा नहीं हो गया है वो डॉक्टर नकुल मिश्रा.. नवंबर में ही वो गया था यूके फाइनल देने.. 6 दिन वहीं रहा था.. यूनिवर्सिटी से उसने रिक्वेस्ट की थी उसका रिजल्ट आउट ना करे.. 1970 से ये ब्रांच है ऑक्सफोर्ड मे, उसमे अब तक उसके सबसे हाई-स्कोर नकुल के थे ..


2012 में जब पहली बार नकुल वहां गया था तभी उसे पीएचडी भी क्लियर कर देते.. वो कोर्स मे एक फॉरेस्ट मैनेजमेंट था, जिसमे उसे स्कोर करने के लिए 2 साल का वक्त दिया गया था, वो भी उसकी एबिलिटी को देखते हुए.. क्योंकि इस पूरे सब्जेक्ट मे उसका ज्ञान निल था... बाकी एग्रीकल्चर साइंस में तो वो 2012 में ही डॉक्टर की डिग्री ले लेता...


हर्ष:- हाहाहाहा.. बात कहां थी और हम कहां बात करने लगे.. बस नकुल की बात शुरू हो फिर तो मै भी कहीं गायब हो जाता हूं..



मै:- सो सॉरी हर्ष.. हां तो अब बताओ, कैसी होगी मेरी भावना, और यदि प्राची दीदी के साथ मेरे जैसा केस हुआ तो वो क्या करेगी?


हर्ष:- मै हूं ना उसके साथ.. वो मुझसे बात करेगी मै पापा से बात करूंगा.. सब कुछ पसंद आ गया तो हर्ज ही क्या है..


मै:- ऐसी बात है तो तुम ही हमारे बारे में प्राची दीदी को बता दो.. तुम विश्वास के साथ ही बताओगे.. लेकिन क्या प्राची दीदी के बात मात्र कर लेने से बात बन जाएगी..


हर्ष:- यार अब क्या कह दूं मै.. हां और ना दोनो तो तुम ही बता रही हो..


मै:- हर्ष तुम्हे याद है मै छत से गिरी थी और गौरी से हमने कुछ प्राइवेट बात की थी..


हर्ष:- हां याद है मुझे...


मै:- उसकी गलत वीडियो दिखाकर 12 लड़कों ने उसे ब्लैकमेल किया था.. जिसमे से उसे मजबूरन 3 के साथ जाना परा था.. 9 लोग और भी कतार में थे..


हर्ष, चौंकते हुए... "व्हाट, इतनी बड़ी बात थी और वो लगातार घूट रही थी"…


मै:- तुमने सुना, थोड़ा आश्चर्य हुआ कल भुल जाओगे... जिसके साथ होता है उसकी आत्मा तक टूट जाती है.. और ऐसे परिस्थिति में जानते हो हम लड़कियां क्यों फंसती है..


हर्ष:- क्यों ?


मै:- "क्योंकि हमारे पिता दहेज के लिए पैसा जमा करते है.. पढ़ाई के नाम पर जमीन बेच देते है, ताकि समाज में स्टेटस रहे की मैंने तो अपने बेटी को अच्छी शिक्षा दी है.. संस्कार दिए है.. मां भी एक सच्चे दोस्त की तरह हर बात सिखाती है क्या करना चाहिए और क्या नहीं.."

"लेकिन जानते हो जब कभी ऐसी बात होती है कि कोई भुल किसी लड़की से हो या जबरदस्ती किसी ने किया हो, तो उस लड़की को अपने घर के लोगों पर ही यकीन नहीं होता की उसके घरवाले उसका साथ देंगे की नहीं.."

"हमारे रूढ़िवाद समाज में लड़के इसलिए सफल ज्यादा होते है क्योंकि उनको यकीन होता है की वो गलत करके भी आएंगे तो उसके घरवाले संभाल लेंगे.. साला हम लड़कियों को तो दूसरे की गलती सजा भी भुगतनी पर जाती है.. विश्वास ही नहीं होता की अपना बाप, भाई, मां रिश्तेदार सब अंत तक साथ देंगे."

"सिर्फ बात करने से क्या होगा हर्ष... बात तो खुद प्राची दीदी भी कर सकती है.. तुम पर यकीन नहीं था इसलिए प्राची दीदी ने तुम्हे कुछ नहीं बताया, यकीन होता की अंत तक साथ दोगे तो जरूर बताती..."


हर्ष:- और तुम्हे तो बताई ही होगी..


मै, हर्ष को गुस्से में घूरती और अपने दांत पिस्ती हुई कहने लगी... "सामाजिक ज्ञान पुरा लुल ही है क्या तुम्हारा..."


हर्ष:- तुम ऐसे क्यों कह रही हो..


मै:- मै उनके लिए गौर हूं, ऊपर से गांव की रहने वाली.. तुम यूके से पढ़े हो ओपन समाज को देखे हो.. जब उन्हे अपने भाई पर भरोसा नहीं, तो मुझ पर घंटा करेंगी..


हर्ष:- नकुल के लिए तुम्हारा विश्वास इसलिए है क्योंकि वो तुम्हारे बहुत क्लोज है.. और हां वो तुम्हारा साथ अंत तक भी देगा लेकिन यही नकुल नहीं होता तो तुम्हारा ये विश्वास भी नहीं रहता मेनका.. जो बात हम परिवार वालों को नहीं बता सकते उसी के लिए अपने करीबी रिलेशन और करीबी दोस्त होते है...


मै:- "पहली बात तो ये की तुमने सही कहा है, लेकिन बात ऐसी है हर्ष बाबू हमारे केस में नय्या की खेवेया जो है वो है रूपा भाभी, और उन्हे हमारे बारे में सब पता है.. अब बोलो.."

"एक और बात.. किसी भी परिवार में ऐसा बहुत ही विलुप्त तरीके से देखा जाता है जहां भाभी से कोई अहम बात साझा किया हो किसी ननद ने.. क्योंकि भाभियां ऐसी प्रजाति होती है कि अपने ससुराल पक्ष के विक प्वाइंट को तो उंगली पर गिनती की तरह याद रखती है.."

"वैसे इतना भी नहीं समझना होता तुम्हे भाभी के विषय में.. जब मैंने ये बात कही ना की मैंने अपनी भाभी को बताई है, तभी तुम्हे चौंककर पूछना चाहिए था... "क्या भाभी को.. तुम्हे और कोई नहीं मिला भरोसे वाला..!!!" लेकिन यहां मुझे एक्सप्लेन करना पर रहा है कि भाभी को बताना कितना खतरनाक होता है.. क्योंकि बात घूम फिरकर वहीं आ जाती है... तुम्हारा सामाजिक ज्ञान ही लुल है...


हर्ष:- बस करो ताने मारना.. मै तुम्हारे बिना कैसे दिन गुजरूंगा, सोचकर ही मरने जैसा दिल करता है, फिर तो मेरी दीदी घूट ही जाएगी.. ऊपर से तुमने सही कहा कि मै तो खुलकर अपने घर में बता भी दूंगा, लेकिन वो कैसी दुविधा में है जो मुझे तक बता नहीं पा रही... बताओ मेनका मुझे क्या करना चाहिए...


मै:- कपड़े उतारते वक्त पूछते हो बताओ मेनका बताओ... और हिम्मत हो तो दूसरी लड़की का पल्लू खींचकर तो दिखाओ..


हर्ष:- अब ये क्या बकवास है..


मै:- बकवास नहीं जवाब है... विश्वास है तभी तो तुम्हारी हिम्मत हुई आगे बढ़ने की.. बस सब विश्वास का खेल है.. जैसे 8 महीने में तुम सोशल हो गए हो ये तुम्हे आकर बताना नहीं परा था बुद्धू...


हर्ष:- समझाने के लिए कुछ ढंग के एग्जाम्पल भी तो दे सकती हो...


मै:- मेरी क्लास बाद मे लेना, पहले जाओ विश्वास जगाओ वरना गलत जीजाजी घर में आ जाएंगे..


पता ना कितना स्लो है मेरे साजन.. 10 दिन लग गया उसे विश्वास जगाने मे... प्राची दीदी जब पूरी तरह से सुनिश्चित हुई फिर फाइनल एडवाइस के लिए मेरे पास ही पहुंची.. "क्या करूं बताऊं कि नहीं.. मेरी तो हिम्मत ही नहीं हो रही"..


अब मै क्या कह देती.. मैंने उनसे कहा दिया... "होल्ड कर लो जब विश्वास नहीं हो रहा तो, और एक इंडायेक्ट एप्रोच लो.. देखो क्या होता है"..


प्राची दीदी ने यही सही समझा. ये हमारे सामाजिक संरचना का ही असर था कि एक सक्सेसफुल बिजनेस वूमेन अपने परिवार से अपने सबसे बड़ी चाहत को बताने मे हिचक रही थी...


शायद ये भी एक यूनिवर्सल बात है कि भाईयो से अपनी लव लाइफ बताने में हर बहन की फट जाती है.. मै खुद नकुल से अपने और हर्ष के विषय में बताने से कई बार हिचक चुकी हूं.. बस यही प्रार्थना करती हूं कि कहीं से भी पता चले, बस मुझे बताने की जरूरत न पड़े…


बहरहाल उनकी बातें जब शुरू हो, लेकिन मै और हर्ष तो आज की सुबह ही सैर-सपाटे के लिए निकले थे.. सहर मे एक बड़े नामचीन जादूगर का शो चल रहा था और उसी को हम देखने गए हुए थे...


मै जादूगरी का शो एन्जॉय कर रही थी और मेरे पड़ोस में बैठे साइंटिस्ट हर्ष, गूगल और यूट्यूब खोलकर मेरे मजे की बैंड बजाने मे लगे हुए थे... 15 मिनट में जब उसने मुझे पूरी तरह से पका डाला तब मैंने उसका बाल पकड़े और चेहरा अपनी करीब लेकर होंठ से होंठ लगा दिए..


होंठ से होंठ लगते ही हर्ष की पहले आखें बड़ी हुई और बाद में वो खोता चला गया... "आउच" करती मै हर्ष से अलग हुई उसे घूरती हुई... "किस्स का मतलब सीधा हाथ छाती पर ही क्यों जाता है"…


हर्ष अपनी बत्तीसी दिखाते... "सॉरी, मै जरा एक्साइटमेंट मे भुल ही गया था कि कहां हूं"…


मै:- हम्मम ! ध्यान रखा करो हर्ष, अब मुझे शो देखने दो..


मै जैसे ही आगे ध्यान लगाई, हर्ष मेरा कांधा हिलाते.. "तुमने किस्स करते वक्त मेरा मोबाइल ले लिया ना"..


मै हर्ष को आखें दिखाती… "पागल हो गए हो क्या, मै क्यों लूंगी तुम्हारा फोन... चुपचाप मुझे शो देखने दो"…


"अरे यार मेरा फोन किधर चला गया.. बैग दिखाना अपना जरा"… हर्ष वापस से टोकते हुए कहा..


मैंने बिना ध्यान भटकाए सामने देखती रही... और तिरछी नजरो से बीच-बीच में हर्ष को भी देख रही थी.. बेचारा कभी इधर तो कभी उधर.. अपना फोन वो चारो ओर ढूंढ रहा था...


इसी बीच 1 घंटे का शो खत्म हो हुआ और हम बाहर आ गए... "मेनका मेरा फोन कहीं मिल नहीं रहा"…


मै, हर्ष को सुनती गई और जैसे ही कार में पहुंची... अपनी तिजोरी से उसके 4 इंच के छोटू स्मार्ट फोन को निकालकर उसके हाथ में थमा दी.. और वो मुंह फाड़कर देखता ही रह गया... जैसे ही उसने फोन हाथ मे लिया...


"आज तो मेरा फोन भी गरम हो गया है"… "धत पागल"…


मै हर्ष से नजरे चुराकर सामने देख रही थी और हर्ष मुझे छेड़ते हुए कहने लगा... "आज कल की लड़कियां भी ब्रा के अंदर माल छिपाने का काम करती है"…


मै:- हर्ष चुपचाप गाड़ी चलाओगे...


हर्ष:- मै एक बार हाथ डालकर देखूं क्या अंदर तिजोरी की कितनी कैपेसिटी है..


मै हर्ष का गला दबाती उसके ऊपर ही आयी थी कि तभी हमारी गाड़ी के कांच का सिसा नॉक हुआ.. बाहर देखी तो.. "अब यही सरप्राइज़ होना बाकी था"… हर्ष जबतक कांच नीचे करता... "येस प्लीज"..


रवि:- क्या मुझे लिफ्ट मिल सकती है..


हर्ष:- नहीं सॉरी..


मै:- आ जाइए सर.. इतनी तकल्लुफ क्यों कर रहे है..


हर्ष, चेहरे से थोड़ी असहजता जाहिर करते... "तुम जानती हो क्या मेनका"..


मै:- रवि तुम पीछे बैठो.. और हर्ष ये है रवि सर, दिल्ली सचिवालय में नौकरी करते है...


रवि, पीछे बैठते... "इनका परिचय तो करवाई ही नहीं.. बॉयफ्रेंड है या क्लास फेलो…"


हर्ष कुछ कहने को हुआ लेकिन मै धीमे से उसकी ओर देखकर जाहिर कर दी की तुम रुक जाओ मै बात करती हूं.... "दिल्ली आ गए लेकिन सोच अब भी वहीं की है.. इंटेंशन गलत हो की ना हो, पर कंफर्मेशन पहले चाहिए.. हर्ष सिंह है प्राची दीदी का भाई.. यहां दिल्ली ऐम्स मे जूनियर डॉक्टर है"…


रवि:- अरे ये हमारे सहर के बाहुबली राजवीर सिंह के सुपुत्र है.. कैसे है डॉक्टर साहब..


हर्ष:- मेरे पिताजी का अच्छा इंट्रो था.. खैर कहां ड्रॉप करना है...


रवि:- जहां मर्जी हो वहां ड्रॉप कर दीजिए मर्जी है जी आपकी...


मै:- चलो फिर हमारे साथ फ्लैट, मेहमान नवाजी भी स्वीकार कर लेना..


रवि:- हमारे साथ मतलब तुम दोनो..


रवि के इस ताने पर मै पीछे मुड़कर उसे घूरती... "ये कुछ ज्यादा नहीं हो रहा... या सोचकर बैठो है की सर तुड़वाना है..."


रवि:- ना ना सॉरी, मुझे माफ़ करो.. सीरियसली लेकिन ये साल, साल भर बिल्कुल गायब और यूं अचानक से कभी कभार टकरा जाना...


मै:- शुक्र करो मै अकेली नहीं.. हर्ष एक काम कर सकते हो, हम दोनों को यहीं ड्रॉप कर दो, मै फ्लैट चली जाऊंगा.. साथ में कुछ पुराने हिसाब किताब भी हो जाएंगे..


रवि:- डॉक्टर साहब बिल्कुल नहीं, मै यही उतारता हूं, तुम दोनो जाओ..


मै:- अब तो फाइनल है, हर्ष कार रोक दो..


हर्ष ने हमे वही रास्ते पर ड्रॉप किया और चलते बना.. जैसे ही वो निकला मै रवि को घूरती... "अंदर ये क्या नाटक हो रहा था"…


रवि:- सो सॉरी, कम से कम इसी बहाने साथ तो हुई..


मै:- साथ होने का क्या मतलब है, रिजल्ट जब आया तो कितना कॉल किया था मैंने तुम्हे, लेकिन सर आज कल बाबू हो गए है ना..


रवि:- बाबू नहीं … बस सीए के चक्कर मे पीस गया.. मेरे 1 पेपर निकले और मुझे पता था तुम किताब को छोड़कर उठी होगी तो कॉल जरूर करोगी इसलिए..


मै:- इसलिए मुझे ब्लैक लिस्ट कर रखा था.. छी बेशर्म कहीं के...


रवि:- सॉरी मिस वैसे एक बात सच सच बताओ, वो क्या है थोड़ा जलियस टाइप फीलिंग आ रही.. सच मे तुम दोनो के बीच कुछ नहीं चल रहा..


मै:- काश कुछ चलने लायक वक्त मिलता रवि.. बस सीए एक बार क्लियर हो जाए फिर मै चली गांव.. वहीं से सब करूंगी.. बोर हो गई यहां.. ऐसा लगता है जैसे ज़िन्दगी अकाउंट और फाइल्स मे उलझ गई..


रवि:- हां मै समझ सकता हूं.. वैसे किस सीए के अंदर काम कर रही..
 

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अध्याय 24 भाग:- 3




मै:- महान सीए रजनीश कुमार, जोडू के गुलाम मुझे कंपनी के साथ साथ अपने सहर के तमाम व्यापारियों का भी ऑडिट करवाता है और हां गंगा अग्रवाल (रवि के पापा) की भी फाइल है मेरे पास बच्चू...


रवि:- ओ तेरी तभी मै कहुं इस साल टैक्स मे कुछ रियायत क्यों मिल गई... काम तो सीए मेनका मिश्रा देख रही थी.. वैसे जब लाइफ से बोर हो ही गई हो तो छोटा सा मेरा काम भी देख लो.. अन-ऑफिशियली..


मै:- कैसे काम..


रवि:- 1,2 मंत्रियों के ब्लैक का हिसाब को व्हाइट मे कनेवर्ट करना है...


मै:- ओय, मुझे अनैतिक काम करने कहते शर्म नहीं आती और पिछली बार क्या कहे थे.. मै ख़ाव खुजाओ वाले डिपार्टमेंट मे नहीं हूं..


रवि:- मेरा डिपार्टमेंट सच मै खाव खुजाओ नहीं है.. हां पर ऊपर बैठे लोग.…


मै:- अरे छोटा पुजारी वाले डिपार्टमेंट में हो.. वो एक्सटर्नल इंटरनल एफैर मिनिस्ट्री..


रवि:- जी हां अब समझी..


मै:- वाह, मतलब खुद का दामन साफ रखो और मुझसे गैर कानूनी काम करवाओ...


रवि:- वरुण मिश्रा और लियाकत अली की भी फाइल तो तुम्हारे पास ही होगी ना..


मै:- ब्लैकमेलर.. अच्छा ठीक है मै कुछ महीने व्यस्त रहूंगी.. क्योंकि नवंबर लगभग खत्म है और फाइनेंशियल ईयर क्लोज होने मे भी ज्यादा वक्त नहीं तो क्यों ना हम इसपर मार्च के बाद डिस्कस करे.. और एक बात अब मै फोन नहीं करूंगी.. समझे..


रवि:- जी बिल्कुल समझ गया.. और सॉरी हां, अभी बस थोड़ा सा टीज कर रहा था..


मै:- जानती हूं बाबा तभी तो आ गई साथ.. वरना तुम तो मुझे जानते ही हो.. चलो मेरा फ्लैट आ गया.. आओ चाय पर बैठकर गप्पे मारते हैं..


रवि:- सॉरी मिस अभी काम से निकला हूं... किसी दिन आराम से बैठकर चाय पियेंगे...


रवि मुझे ड्रॉप करके वापस चला गया... जब वो जा रहा था मै उसे ही देख रही थी और मन मे बस यही ख्याल आ रहा था.… "वक्त वक्त की बात है"….


"बाहर क्या कर रही थी, और ये रवि था ना"… पीछे से नकुल ने मुझे टोका... नकुल को देखते ही मै मुस्कुराती हुई उसके गले लग गई... "मूहरत के लिए डेट फिक्स कर ले, दूसरो को मनाने का सरा काम हो गया है, बस एक बार हर्ष को शीशे में उतारना है"….


नकुल:- मेनका मेरी बात का यह जवाब है.. या मै ये मान लूं की अब मेरे सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं..


मै:- धत पागल, ये कैसी बातें कर रहा है... हां वो रवि ही था... मै, हर्ष के साथ मैजिक शो देखने गई थी, वहां मिल गया.. तो हर्ष को बोली चले जाने और रवि से बात करती हुई यहां तक चली आयी.. उसे तो ऊपर साथ आने भी बोली लेकिन वो चला गया.. अब मेरा भतीजा हैप्पी"..


नकुल प्यारी सी मुस्कान देते.. "वेरी हैप्पी... अब छोड़ जाने भी दे क्या होने वाला है... 2-3 दिन सिर्फ हम दोनों"


मै:- क्या हुआ, प्राची दीदी से झगड़ा हुआ है क्या?


नकुल:- नहीं.. ऐसा कुछ भी नहीं.. बस 2-3 दिन केवल सिर्फ हम दोनों.. जानता हूं तेरे मन में क्या सवाल है उन सब पर विराम लगा दे... सब कुछ नोर्मल है..


मै:- ओह समझ गई…


नकुल:- क्या?


मै:- कुत्ता जोडू का गुलाम.. होने वाली बीवी ने बोला पता नहीं कैसे मै हर्ष को हैंडल करूंगी और तभी तुमने तिक्रम लगा दिया होगा की 2-3 दिन उसी के पास क्यों नहीं रुकती, पुरा वक्त मिलेगा...


नकुल:- इतना डीप एनालिसिस की वजह..


मै:- ओ प्राची दीदी बाहर आ जाओ.. जानती हूं सुन रही हो...


नकुल:- अब ये ज्यादा हो गया..


मै:- हिहिहिहि ठीक है तुम सही मै गलत... जा रही हूं मुझे नहीं चाहिए तेरे अभी के 3 दिन...


प्राची दीदी तभी ताली बजाती हुई वहां प्रगट हो गई... "सही कहे थे बेबी… मेनका को सोचना नहीं परता चीजों को एनालिसिस करने में.. सारी बातें ये ऑटो कनेक्ट कर लेती है... वैसे मेनका सच बता.. तुमने एग्जैक्टली इतना सोचा कैसे"


मै:- "हफ्ते बाद लवर नकुल गांव से पहुंच रहा है, जिसके बिना प्राची को एक पल रहने की इक्छा ना हो और लौटने के बाद भी वो लवर नकुल 3 दिन के लिए बिल्कुल खाली है, मतलब प्राची कोई बहुत ही अहम काम कर रही, जिसे टाला नहीं जा सकता और वहां लवर नकुल को भी नहीं साथ रखा जा सकता... सिम्पल लॉजिक है.. जवाब में हर्ष नाम निकल आएगा..."

"बाकी आप यहां मेरी बात सुन रही वो तो नकुल की ओवर एक्टिंग से पता चल गया था, जब उसने बेवकूफी के साथ टोका की अब मै समझ लू जवाब देना नहीं चाहती.... ये अप्राकृतिक स्वभाव था नकुल का जो दर्शा रहा था कि वो किसी को दिखाना चाह रहा है कि कितना हक है मुझ पर.. सही कही ना भतीजे..."


प्राची दीदी:- मुझे 3 दिन का समय बकवास आइडिया लगता है.. मै अभी ही हर्ष को बुला चुकी हूं.. अब जो भी होगा हम चारो के बीच ही होगा.. मेनका सब संभाल लेगी..


खैर कुछ ही देर में सभा बैठने वाली थी और बस बॉम्ब फोड़ना बाकी रह गया था... जैसे ही हर्ष पहुंचा नकुल को वहां देखकर व्यंग करते हुए... "मुझ टेक्स्ट बुक रट्टूमल को जिनियस और सुपर जिनियस के बीच बुला ली दीदी"..


हर्ष के मुंह से नकुल के लिए निकले व्यंग सुनकर प्राची दीदी मायूसी से मेरी ओर ऐसे देखी मानो कहने की कोशिश कर रही हो... "ये क्या है यार".. लेकिन बेचारी की विडंबना, कुछ कह भी नहीं पाई..


तभी हर्ष, प्राची दीदी के करीब बैठकर... "दीदी तुम जानती नहीं मै और मेनका पिछले एक साल से प्यार करते है..."


बस, बस, बस इसी की कमी थी.. नकुल को मै आंख दिखाकर बस पीछे खड़ी रहने कही और चुपचाप सुनने.. इधर हर्ष ने जैसे ही अचानक हमारे रिश्ते के बारे में बताया, प्राची दीदी ठीक वैसे ही खुश हुई जैसे श्रावण के पहली बरसात के बाद मेंढक खिल जाते है..


सच मे हर्ष भी ना.. क्या ही कह सकती हूं.. बस इतना की बहुत प्यार है.. बिल्कुल सरल और साधारण तरीके से सोचने वाला.. हां बहुत से ऐसे लोग को बेवकूफ जरूर कहते है, लेकिन कोई ना मुझे हर्ष की इन्हीं बेवकूफियों से तो और भी ज्यादा प्यार बढ़ जाता है... पता नहीं क्या सोचकर आते ही बॉम्ब फोड़ दिया, जबकि इस तरह के बात का तो माहौल भी नहीं बना था..


माफ कीजिएगा.. आज कल दिल और दिमाग में बस हर्ष ही छाया हुआ है.. मै अपने जीवन में पापा के बाद ये दूसरे इंसान से मिल रही थी, जो इतना मासूम है.. बिल्कुल उन्हीं की कार्बन कॉपी है... इसलिए जब भी हर्ष को देखती हूं मेरा चेहरा खिल सा जाता है, और फिर सब बातें भूलकर बस उसी की बात करने लग जाती हूं... सामने ध्यान देते हैं, सुनती हूं आगे, हमारे बारे में बताकर क्या समझाना चाह रहा था...


हर्ष मासूमियत से हमारे बारे में बताकर एक छोटा सा विराम लिया.. प्राची दीदी का खिला सा चेहरा और उनकी बदलती नजर जो इस वक्त हम दोनों (मुझे और नकुल) को देख रही थी, उनके अंदर की हंसी और दिल की भावना की अभिव्यक्ति किए का रही थी कि... "अब तो बिल्कुल भी चिंता नहीं"…


मैंने इशारे मे नकुल को बड़े ही कड़े लहजे में हिदायत दे चुकी थी की जहां है वहीं खड़ा रहे, बिना कुछ बोले... हर्ष एक छोटे से विराम के बाद अपनी कहानी आगे बढ़ानी शुरू किया...


"दीदी केवल यदि आपको ऐसा लगता है कि आपने ही किसी से दिल लगाया है और मुझसे बताने मे हिचकिचा रही है तो मै भी बता दूं कि मैंने भी आपकी मुंहबोली बहन से दिल लगा लिया है"….


नकुल:- तो क्या प्राची अब तुम्हे जीजाजी कहे या मेनका को भाभी...


"हिहिहीहिहिहिही.…हिहिहीहिहिहिही" मेरी और प्राची दीदी की हंसी छूट गई, नकुल भी हंस रहा था लेकिन उसने ऊपर से जाहिर नहीं होने दिया.. हर्ष पलट कर जैसे ही नकुल को घुरा मैंने हर्ष का ध्यान अपनी ओर खींचा... "हूं.. हूं.."


हर्ष, पूरी तरह उलझकर झुंझलाते हुए... "बात को भटकाव मत... मै बस इतना कहना चाह रहा हूं कि मुझे नकुल और तुम्हारे सामने इतना कहने की हिम्मत सिर्फ विश्वास के वजह से हुआ है... चूंकि मेनका को पूर्ण विश्वास है कि नकुल अंत तक उसका साथ देगा, और मुझे तुम पर पूरा यकीन है"…


हर्ष की बात सुनते हुए मै नकुल के बांह मे हाथ डालकर उसके कांधे से अपने सर को टिका दी.. नकुल अपने दूसरे हाथ से मेरे गाल पर धीमे से थप्पड़ मारते, कान में कहने लगा... "तुझे कोई और नहीं मिला था, जो इस रट्टू तोते को पकड़ ली"..


मै, बिल्कुल फुसफुसाते.… "प्यारा है ना"…


"हां, बहुत ज्यादा.. कनिका मिश्रा और अनूप मिश्रा की जोड़ी दिख रही है"……


"थैंक्स भाई.. तुझे पसंद आया"….…


"हम चाहकर भी इससे अच्छा लड़का और इससे अच्छा परिवार नहीं ढूंढ सकते थे.. बस अब एक ही चिंता है.. एक ही परिवार में 2 शादी के लिए 2 बार ड्रामे करने होंगे"


नकुल की बात सुनकर मै उसके बांह को और भी ज्यादा भींचती... "तू साथ खड़ा है तो फिर मुझे क्या फिक्र.. बस तुझसे कैसे बताऊं, यही चिंता मे रहती थी"…


"बस मै भी इसी चिंता मे था अपने बारे में कैसे बताऊं... तूने जब मुस्कुराकर सहमति दी फिर सारी चिंता खत्म हो गई"…


"ओ रे बाबा... तुम दोनो बुआ भतीजे ने तो आपस में चर्चा खत्म करके मैटर भी क्लोज कर ही लिया होगा"… प्राची दीदी हम दोनों को घूरती हुई कहने लगी...


नकुल:- चुलबुली हम तो तुम दोनो की बातें ही सुन रहे है.. अब दोनो कुछ बोल नहीं रहे तो इस बीच मै और दीदी समय का सदुपयोग कर रहे थे..


हर्ष:- चुलबुली अच्छा निक नेम है.. लेकिन ये दीदी (प्राची) से ज्यादा मेनका पर सूट करता है..


नकुल:- हां तो तू भी अपनी गर्लफ्रेड के लिए चुलबुली कॉपी मार ले.. तू अपनी बहन मुझसे सेट करवा दे और मै अपनी बहन तुझसे...


अरे बाप रे… मै हंसते हंसते पागल हो गई... "इट्स क्रेजी क्रेजी फीलिंग"… ये डायलॉग भी उसी साउथ की हिंदी डबड मूवी का था, जिसे हर्ष ने मुझे सजेस्ट किया था और मैंने नकुल को...


मै हंस हंसकर पागल हुई जा रही थी.. हर्ष भी अब मामला समझ चुका था, उसका चेहरा देखने लायक था.. और प्राची दीदी तो नकुल को ऐसे घुर रही थी मानो खा ही जाएगी.. हर्ष घुर तो रहा था लेकिन उसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे.. जब कुछ ना हो बोलने के लिए तब एक ही काम होता है... हर्ष आकर नकुल का कॉलर पकड़ लिया...


इस बार नकुल मेरे ओर घुरा, अभी हंस रही थी लेकिन अगले ही पल मेरा चेहरा उतर गया.. मै अपनी नजर नकुल से हटाकर हर्ष पर ले गई और उसे हटने के लिए कहने लगी.... लेकिन हमारे इशारों की भाषा उतनी कारगर नहीं थी जो हर्ष समझता...


नकुल ने पीछे हटने के लिए कह दिया था.. अब आगे भगवान मालिक.. लेकिन मै हर्ष को बेइज्जत होते या मार खाते नहीं देख सकती थी... अगले ही पल नकुल ने हर्ष का हाथ झटक कर ऐसे धक्का दिया की वो पीछे के ओर असंतुलित होकर पुरा झटका खाया.. हर्ष पुरा अनियंत्रित था, तभी अगले ही पल नकुल ने हाथ बढ़ा कर उसके गीरेवान को पकड़कर अपनी ओर खींचा और एक थप्पड़ लगा दिया...


मेरे आखों में आशु पहले से आ गए थे.. लेकिन थप्पड़ पड़ने के बाद दोनो (नकुल और हर्ष) मेरी ओर देखे और मै मायूस होकर उस घर से अपने कदम बढ़ा दी.. नकुल को मेरे सामने हर्ष को बेइज्जत नहीं करनी चाहिए थी.. लेकिन क्या करती हर्ष में भी तो तमीज नहीं ही थी, जो उसने प्राची दीदी के सामने उसका गीरेवां पकड़ लिया..


कुछ भी हो नकुल तो समझदार था, उसे मेरे सामने ऐसा नहीं करना चाहिए था.. मै समझा देती हर्ष को.. वो मेरी बात सुनता, जरूर सुनता... नकुल के रवैए से मै पूरी तरह आहत थी, लेकिन बात फिर वही हो जाती है.. हर्ष अब भी एक बाहर वाला था और मै किसी बाहर वाले के लिए नकुल से कुछ कह भी नहीं सकती थी..


मै अपनी कार स्टार्ट की और बस चल दी.. अंदर, दिल में बहुत है बुरा लगा था, मेरे आशु ही नहीं रुक रहे थे.. मेरे ना चाहते हुए भी लगातार निकल रहे थे... मै कहां जा रही थी मुझे खुद पता नहीं था, बस रोती जा रही थी और कार ड्राइव करती जा रही थी...
 

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अध्याय 24 भाग:- 4




एक सिग्नल पर मेरी कार रुकी और मै बस ख्यलो में गुम थी.. आशु अब भी रुक नहीं रहे थे, हां लेकिन पीछे के हॉर्न की आवाज ने मेरा ध्यान तोड़ा था.. नजर जब इधर उधर हुई तो मुझे नेशनल लाइब्रेरी दिख गई..


मेरे हर तन्हा पल का साथी, जिसके बारे में मेरी मां कनिका मिश्रा से मुझे ज्ञान मिला था कि... "जब ज़िन्दगी में सब कुछ नीरस लगे, तो किताब पलट लेना चाहिए.. क्योंकि यदि पढ़ने मे रुचि है, फिर नीरस जिंदगी में स्वाद आ जाता है.. फिर वास्तविक जीवन जीने का भी अपना ही प्यारा नजरिया होता है..."


नेशनल लाइब्रेरी मे मैं जैसे ही घुसी.. बस मां की उस प्रचलित पुस्तक का ख्याल मन में था, जब मां कहा करती थी... "कभी वक्त मिले तो 'अज्ञेय' द्वारा रचित 'अपने-अपने अजनबी' उपन्यास जरूर पढ़ना"..


मै अपने आशु पोंछकर उपन्यास का नाम बोली और वहां के लाइब्रेरियन ने बता दिया कि वो पुस्तक कहां मिलेगी.. मेरे हाथ में जैसे ही वो पुस्तक आयी, पुस्तक को एक टेबल पर रखकर बाहर गई और अपनी मां को कॉल लगा दी...


मां:- राम राम मेरी सीए बिटिया..


मै:- मां, नकुल से थोड़ी बातचीत है गई, मुझे रोना आ रहा था..


मां:- बेटा रोना आ रहा था या रो रही है..


मै, थोड़ी सिसकती हुई... "हां रो ही रही हूं"..


मां:- हम्मम ! तू रुक मै उसकी खबर अभी लेती हुं..


मै:- हो गया मां, आप तो ऐसे ड्रामा नहीं करो ना.. मै सब समझती हूं, कोई पूछने तक नहीं आएगा की क्या हुआ गया हमारे बीच...


मां:- हां तो तू भी तो अपनी मां को इसलिए तो फोन नहीं कि होगी की मै तेरे और नकुल के बीच मध्यस्था करूं.. फिर जब तुझे किसी से अभी मिलना ही नहीं तो, वक्त बता दे कब तक नहीं मिलना पसंद करेगी.. और पता बता दे कहां है.. फोन बंद कर और कहानी खत्म..


मै:- मां मै नेशनल लाइब्रेरी में हूं, और मेरे पास है..


मै आगे बोलती उससे पहले ही मां उत्सुकता मे कहने लगी.... "और तुम्हारे हाथ में है योके और सेल्मा कि अभूत्वूर्व कहानी.. 'अपने-अपने अजनबी'"


मां से 2 लाइन बात करके ही मेरे आशु गायब थे, अब तो उनकी उत्सुकता मेहसूस करके मेरे चेहरे पर मुस्कान भी आ गई... "नहीं मां वो तो याद भी नहीं था मुझे, मेरे पास तो 'रोबिना शर्मा' की पुस्तक है... "दि मोंक हु सोल्ड हिज फर्रारी (The Monk Who Sold His Farrari)"


मां थोड़ी मायूस आवाज में... "ओह वो नोवेल पढ़ रही है.. कितनी बार बेचारे उस वकील की फर्रारी बिकवाकर हिमालय पर भेजेगी... आध्यात्म से अच्छा था एक बार दर्शनशास्र पढ़ लेती..."


मै:- ये तो जबरदस्ती हुई ना..


मां:- नानी कहीं की.. एक बार बस 3 पन्ने पलट ले, अच्छा ना लगे तो वकील साहब कहां भागे जा रहे है.. दिल्ली से लेकर गांव तक हर जगह तो मिल ही जायेंगे...


मै:- अच्छा ठीक है देखती हूं, यहां अगर ओरिजनल कॉपी मिली तो पढ़ लूंगी..


मां:- ओरिजनल कॉपी मिले तो एक मेरे लिए भी खरीद लेना...


मै:- यहां तो होगी ही मां.. ना भी हुई तो आज जबतक उसे ढूंढकर ले ना लूं आपके लिए, मेरा दिन नहीं खत्म होगा..


मां:- ठीक है बेटा.. अच्छा नकुल का कॉल आएगा तो बोल दूंगी की 4 बजे तक मिल ले तुझसे..


मै:- नहीं आज कोई मिलना नहीं होगा.. उसे बस बता देना की मै कहां हूं... बाहर वो बैठकर रास्ता तक सकता है लेकिन मुझे ना तो टोके और ना ही अंदर आकर अपनी शक्ल दिखाए, वरना मै गांव चली आऊंगी.. दोबारा से मै क्लियर बता दूं कि अगर वो परेशान किया तो मै गांव आ जाऊंगी...


मै अपनी बात समाप्त कर सीधा फोन को कि स्विच ऑफ और चली अंदर.. पन्ने पलटते शुरू किए.. हिंदी साहित्य में मै पहली बार 2 विदेशी किरदार से मिल रही थी.. योके और सेल्मा..


लिखने वाले ने क्या रचना की थी.. 2 पत्रों के बीच वैचारिक मतभेद, एक युवती योके, मजबूत, सेल्फ डिपेंडेंट और खतरों से खेलने वाली, लेकिन मृत्यु के भय से जीती है.. पात्र योके कि मृत्यु भय को दिखाने की, लेखक अज्ञेय जी के लेखनी कि अद्भुत कला.… जबकि इस पात्र को पढ़ेंगे तो दूर-दूर तक कहीं से ना लगे की मृत्यु का भय है... वहीं एक वृद्ध कैंसर पेशेंट सेल्मा, हर पल जिंदगी के मज़ा उठाती...


शुरवात मे ही दोनो एक कॉटेज मे थे और पुरा कॉटेज ही बर्फ के नीचे दब गया.. दिसंबर के शुरवात मे यह घटना हुई थी और दोनो (योके और सेल्मा) जानते थे कि बर्फ की ये चादर मार्च के बाद ही हटनी है...


योके और सेल्मा, 2 बिल्कुल अजनबी.. योके अपनी मर्जी से खतरों से खेलने के लिए बर्फ के पहाड़ पर चढ़ी थी, और कॉटेज देखकर उसे विश्वास था कि बर्फ के महीनों में इन कॉटेज मे कोई नहीं मिल सकता, जबकि उसका ये आकलन गलत हो गया.. योके को यहां मिल गई सेल्मा और साथ में बर्फ के नीचे दबे कॉटेज मे योके को अनुभव हुआ जिंदा कब्र मे दफ़न होना...


2 फसे अजनबी और दोनो की अलग-अलग विचारधारा... एक बार जब पढ़ना शुरू की फिर जिज्ञासा इतनी तीव्र हो गई आगे पढ़ने की, मै तो पूरा पढ़कर ही उठी...


मै जब पुस्तक को बंद कर रही थी, गहरी श्वांस लेती बस योके और सेल्मा के बातचीत के दौरान कहे एक पंक्ति दिमाग में घूम रहा था...


"मृत्यु एक झूठ है जो जीवन का खंडन है... और मै जीती हूं क्योंकि मै जानती हूं कि जीती हूं। कभी ऐसा होगा कि मै जीती नहीं रहूंगी... लेकिन जब नहीं रहूंगी तब जानने वाला भी कौन रहेगा, कि मै जीवित हूं, कि मै मर चुकी हूं ? मौत दूसरों की ही हो सकती है, जिसका होना ना होना, दोनो ही हम मान सकते है या जान सकते है… लेकिन अपनी मृत्यु का क्या मतलब है? वह केवल दूसरों को देखकर लगाया गया अनुमान है- कि दूसरे के साथ ऐसा हुआ इसलिए हमारे साथ भी होगा।"



उफ्फ योके के इस कहे शब्द मे एक वास्तविक विचारधारा मिलती है, जो मृत्यु के बाद जीवन की कतई कल्पना नहीं करती.... बस यही लिखने का अंदाज बहुत प्यारा था... मृत्यु के बाद की चीजों मानने और मृत्यु एक अंत है उसके बाद कुछ नहीं, ऐसे सोचने वालो के विचार को बिना भेद भाव के प्रस्तुत किया गया था .. बाकी किताब पढ़ने के बाद अपने-अपने मत है..


बहरहाल लाइब्रेरी वालों ने वो पुस्तक तो मुझे नहीं बेची लेकिन मुझे पता जरूर बता दिया कि कहां से वो पुस्तक मिल जाएगी... फिर जिज्ञासावश मैंने उनसे कुछ और हिंदी साहित्य के उपन्यास के बारे में पूछ ली, की वो मुझे कहां मिल सकती है... लगभग 18 उपन्यास थे और कुछ तो 1880-90 में लिखे गए थे...


वहां का पुराना लाइब्रेरियन मुझे नजर उठकर देखते हुए... "कुछ के तो नाम मै भी भुल गया था, धन्यवाद याद दिलाने के लिए... ये पुस्तकालय का नंबर है (लैंडलाइन नंबर देते).. शाम 7 बजे के बाद मै बिल्कुल फ्री रहता हूं. मुझे अच्छा लगेगा यदि तुम किसी उपन्यास के बारे में मुझसे चर्चा करना चाहो... पहले कुछ लोग थे, जो पढ़ने के बाद घंटो बहस किया करते थे.. यहीं से हम लेखकों को चिट्ठी भी भेजा करते थे"…

"ये जो पुस्तक है अज्ञेय जी की अजनबी.. इस पुस्तक पर यहां घंटो बैठकर बहस होती थी.... मै पर्सनली योके को सपोर्ट करता था... हां बस एक छोटी विडंबना थी, वहां आकर फंस जाता था और मेरे दोस्त बाजी मार ले जाया करते थे"…


मै फिर आराम से बैठ गई.. फिर उन्होंने बहुत से उपन्यास के बारे में बताया... कैसे हर उपन्यास के ऊपर चर्चा होती, लोगो का आवेश में आ जाना.. कहानी के किरदारों के नाम से चिढाना… उन्ही चर्चा के बीच कभी-कभी किसी उपन्यासकार का वहां आ जाना और फिर पत्रों को लेकर उनसे ही तीखी बहस कर लेना...


बात का दौर ऐसा चला था कि वो वृद्ध व्यक्ति 3 बार मुझे चाय पिला चुका था... मै जब वहां से निकली तो वृद्ध व्यक्ति मुझे साथ छोड़ने आया और जैसे ही जाने के लिए मै आगे बढ़ी उन्होंने 2 मिनट रुकने के लिए बोल दिया..


वापस जब आए तो उनके झुर्री परे चेहरे पर फैली मुस्कान को मै पहली बार अनुभव कर रही थी... उनके भावो से तो यही पता चल रहा था कि अब इनके पास बैठकर कोई इनके मित्र चर्चा करने नहीं आते...


जिंदगी की भी अजीब सी पहेली रहती है... उस वृद्ध व्यक्ति को देखकर बस यही सवाल मन में आया कि बैठकर यहां चर्चा करने वाले उनके दोस्त कहां गए...


मै अपने ख्यालों में थी, ठीक उसी वक्त वो वृद्ध व्यक्ति मेरे करीब पहुंचे और मुझे ख्यालों से बाहर निकालते हुए कहने लगे... "मेरी ओर से ये छोटी सी भेंट.. ये पहले संस्करण की छपी पुस्तक है, संभाल कर रखना और पढ़ना"…


उन्होंने 'मैथिली सरण गुप्त' जी की एक प्रचलित पुस्तक 'यशोधरा' को मेरे हाथ में देते हुए कहने लगे... मै अपनी खुशी बयां नहीं कर सकती.. मेरे लिए तो ये अनमोल भेंट थी.. एक पुस्तक प्रेमी की पूरी भावनाएं छिपी हुई था.. ना जाने कितने सालों से यह पुस्तक उनके जीवन का हिस्सा रहा हो, आज भेंट स्वरूप मुझे दे रहे थे..


मै:- बाबा आप यहां अकेले रहते है..


बाबा:- तुम क्या अकेली थी, जब यहां आयी..


उनकी बात सुनकर मेरा हंसता हुए चेहरा ने जैसे खुद व खुद और खुलकर मुस्कुराते हुए उनके कहे शब्दो का अभिवादन करते मुख के भाव से ही जवाब दे दिए… "बिल्कुल नहीं"..


वो भी मेरी भावना पढ़ते हुए कहने लगे... "जब हम सब दिल्ली में काम करते थे, तब यहां प्रत्येक रविवार इन्हीं सीढ़ियों पर और पास के पार्क में हमारी बैठक होती थी.. लोग धीरे-धीरे पहले बहू बेटों पर आश्रित हुए और बाद ने रिटायर होकर कहां गए कोई खबर नहीं.."

"आज की टेक्नोलॉजी हमारे पास तब होती तो आज हम सब दूर होकर भी साथ होते.. लेकिन कौन कहां है मुझे ये तक पता नहीं.. और ना ही कोई दोबारा इस पुस्तकालय तक लौटा... कोई दोस्ती नहीं थी, कोई रिश्ता नहीं था.. बस यहां किताबों ने हमे जोड़ा था.. शायद उनकी पुस्तकों से रुचि समाप्त हो गई हो या असहाय जीवन ने मौका ना दिया हो वापस आने का, कौन जाने... मै खुश हूं.. क्योंकि मेरे बच्चे ने मुझे मेरी रिटायरमेंट गिफ्ट की थी, वो भी मेरे बिना कोई इक्छा जाहिर किए..."…


कभी कभी कुछ लोगों की मुलाकात कितनी कशिश वाली होती है... उन्हे देखकर कुछ सुकून सा अनुभव होता है.. इस वृद्ध व्यक्ति को देखकर यही मेहसूस कर रही थी कि ये तो बिल्कुल कहानी की पात्र सेल्मा है जो पूर्ण रूप से जीवित है और जीवन के हर पल का आंनद उठा रहे...
 

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:lol: :lol:
Pehli goli chalao phir baat karo
menka toh phir se cha gayi..
yaar yeh yeh padosi wale unki toh aisi ki taisi :bat:
Chahe koi mar bhi jaaye phir bhi dekhne tak nahi aayenge..
Ohh toh woh watchman hi culprit nikla.. are usko rakha kisne waha duty pe.. :mad:
Uski toh aisi ki taisi..
aur ye media inko toh bas rai ka pahad banane se matlab hai..
Matlab ab yahan Delhi mein bhi training suru are bechari padhegi kab woh..
Khair let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill :applause: :applause:
:D sab traning ka asar hai .. kumar sahab ki traning .. aur kya kah sakte hai.. menka ko dikhti hai turant amal me lati hai ...

Bade sahron ke chhote chhote dil wale padosi :D.. haan koi baat aag ki tarah failani ho.. usme jaroor aage rahenge :yo:

Hoga to kewal padhai hi..u bus dekhte jaeye
 

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nice update ...menka ne income tax ka matter ekdam sahi tarike se handle kiya aur sab kaam jaldi pura kiya 🤩..
rajveer uncle ne menka ko sahi tarah se motivate kiya ...
aur ab dono ko award bhi mil gaya aur menka self defence ki training bhi le rahi hai 😍..

Tax chori aur tax return wali to padhai hi padhne gayi hai .. isliye to sab kaam jaldi ho gaya .. baki use self defence nahi balki.. others offence traning mili hai Leon babu .. warns menka pahle goli kyon chalati :D
 
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nice update ..jeetne ke liye liyakat aur varun dono hi menka ke top hone ki baat istemal karna chahte the ..
waise ab menka delhi aa gayi hai aur ghar chhodte waqt kaafi emotional scene chala ..
weapon rakhne ka matlab ab samajh aaya ki jinko saja huyi hai unka pariwar menka ya nakul se badlaa lene ki soch sakta hai to dono ko taiyar rehna hoga musibat ko handle karne ke liye ..
Haan ek poster girl bankar pesh karenge.. lekin kewal menka ka top karna election nahi jitwane wala... Chunavi muttod me se ek tha wo

ACP kumar aanand south ki movie jyada dekhte hain :D.. isliye badla badla chilla raha
 
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majedar update ..choro ki to hawa nikal di menka ne 🤣🤣🤣..
aur un choro ko chhodkar us watchmen shambhu ko pakadwake sahi kiya ,jaha roji roti milti hai wahi pe bure kaam karwa raha tha ..

waise media ko sahi se handle kiya menka ne sab jhooth bolkar ..
aur ab s.i. se training legi menka ..
Ye upri malai ne sabko bigad rakha hai Leon bhai fir wo watchman to chhota mulajim hai :yo: ..

Media ka kya hai ji.. unhe to aap bhi handel kar le.. par dikkat to ye hai ki ye media aati hi nahi :(
 
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I blame harshit1890 saheb and Ankitarani mam... inki stories padhke ab bas psychological thrill mystery story series hi pasand hai mujhe... :D
Kabhi mann mein khyaal aaye jaane kaise soch lete hai yeh dono itni khatarnak aur superb story line... tab Alexa bolti hai
Alexa =jaise nain saheb ne soch lete hai ishq, risk ki story line :D
......
Mere liye to ab bhi ye 100 encounter hi thrlling hai :D
 

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nice update ..ye 2nd holi bhi ho gayi aur isme menka ne kuch jyada nahi kiya ..par prachi peekar full tunn ho gayi thi 😁😁..ye 18 takila shot pikar 🤔🤔 itna to bahut jyada hoga .
par ye physical stock kya hota hai ???? ..
aur ye menka par chillayi kyu prachi ?? ..
waise ab sab london jaa rahe hai dekhte hai waha kya hota hai ..
Are Leon bhai wo us raat mai bhi 2,-3 peg kiye huye tha to piyakkad dikhane ke liye dikha diya 17, 18 .. wo to shukr kijiye ki pahle maine jo diye the wo the 100,150 peg pi gayi :D

Physical stock kaise samjha dun .. 10 lollypop aapne kharide .. ab yaad rakhne ke liye aapne apne mobile me feed kar kiya... 10 lolly pop..

Ek din baad aapne 2 lollypop kha kiye.. date dala aur likh liya 2 lollypop minus .. bache 8 ..

Fir aapka man hua ki ek baar jakar gin lun 8 hai ki nahi.. yahi jo jakar dekhkar ginti karna hota hai wo physical stock
 
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