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Incest माँ और बेटे ने घर बसाया(सच्ची घटनाओं पर आधारित)

Esac

Maa ka diwana
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Ye to mr/mrs patel ki story hai bas image's add kardi hai bro bohot pehle padi thi ye iska end bhi bohot achha h lekin tune ye story complete nahi ki galat baat h
Koi baat nahi bhai apko achhi Lage toh aap padh sakte ho, maine apne hisab se likhi hai. Aur main apni life set karne me laga hua tha isi wajah se main site par nahi aaya.
 
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Esac

Maa ka diwana
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Update 33



माँ और मैं एक-दूसरे के बेहद करीब थे। इतनी करीब कि स्टेशन के उस शोर-शराबे और अनाउंसमेंट के बीच भी हम शायद एक-दूसरे की धड़कनें महसूस कर पा रहे थे। पर इस नजदीकी के बावजूद, हमारे बीच एक अनकही सी दूरी थी—एक हिचकिचाहट।
कुछ देर की उस भारी खामोशी को तोड़ते हुए मैंने माँ की तरफ देखा और बस इतना ही पूछ पाया, "पानी पियोगी?"
उन्होंने बस एक पल के लिए मेरी आँखों में झाँका, फिर फौरन अपनी नज़रें फेर लीं। उन्होंने बिना कुछ बोले बस धीरे से गर्दन हिलाकर 'हाँ' कह दिया। वह कोशिश कर रही थी—कोशिश उस पुराने रिश्ते को पीछे छोड़ने की, मेरी ज़िंदगी में मेरी बीवी की जगह खुद को फिट करने की और इस नए रिश्ते में सहज होने की।
वहीं दूसरी तरफ, मैं भी खुद को समझा रहा था। मैं अपने मन को तैयार कर रहा था कि अब माँ को उसी हक और उसी नज़र से देखूँ जो एक बीवी का होता है।

मैं उठा और सामने वाले स्टाल से पानी की एक बोतल ले आया। ढक्कन खोलकर मैंने बोतल माँ की तरफ बढ़ाई, पर उन्होंने लेने में थोड़ी झिझक दिखाई। शायद बोतल पूरी भरी हुई थी और उन्हें डर था कि पीते वक्त पानी छलक कर उनके कपड़ों पर न गिर जाए। उनकी इस छोटी सी उलझन को देख कर मेरे चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गई। मैंने बोतल वापस ली, खुद एक घूँट पानी पिया और फिर उन्हें थमा दी।
माँ ने मेरी तरफ देखा, एक हल्की सी स्माइल दी और बिना किसी हिचकिचाहट के उसी बोतल से पानी पीने लगी। अहमदाबाद वाले हमारे घर में मैंने बचपन से देखा था कि कोई किसी का 'जूठा' पानी नहीं पीता, पर आज माँ ने वह सारी दीवारें गिरा दी थीं। मेरे जूठे पानी को पी लेना शायद उनका मुझे अपनाने का एक मौन तरीका था।

उनके गले का मंगलसूत्र, मांग में सजा वो गहरा सिंदूर और हाथों की मेहंदी—वह बिल्कुल एक नई दुल्हन की तरह शर्मा रही थी। उनके इस बदलाव को मैं अपने दिल की गहराई से महसूस कर रहा था। मेरा मन बस यही कह रहा था कि अब इस दिल में उनके सिवा किसी और के लिए कोई जगह नहीं बची।


IMG-20260115-143702

मैं थोड़ा नर्वस था, इसलिए बार-बार अपनी जगह से उठकर इधर-उधर टहलने लगता। शायद मैं खुद को 'नॉर्मल' दिखाने की कोशिश कर रहा था ताकि उन्हें असहज महसूस न हो। लेकिन हर बार जब मैं वापस आता, तो देखता कि माँ बस मेरा ही इंतज़ार कर रही है। मुझे देखते ही वह अपनी पलकें झुका लेती और उनके होंठों पर वह जानी-पहचानी शर्मिली मुस्कान आ जाती।

उनकी उस मुस्कुराहट में एक अजीब सा सुकून था। हैरानी होती थी यह देखकर कि महज़ कुछ पलों के लिए भी अगर मैं उनकी नज़रों से ओझल होता, तो उनकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी और इंतज़ार साफ दिखने लगता था। शायद वह अब हर पल मुझे अपने पास ही चाहती थी।

तभी ट्रेन का वक्त हो गया। प्लेटफ़ॉर्म पर अचानक भीड़ और शोर बढ़ने लगा। हम दोनों खड़े हुए, मैं सामान उठाने के लिए किसी कुली को ढूंढने लगा। जैसे ही मैंने कुली तलाशने के लिए दो कदम आगे बढ़ाए, पीछे से एक बेहद धीमी और रेशमी सी आवाज़ आई— "सुनिए ना..."

उस एक पुकार ने मेरे दिल में जैसे खुशियों का कोई सैलाब ला दिया। मैं ठिठक कर पीछे मुड़ा। माँ बस चुपचाप अपनी गहरी आँखों से मुझे देख रही थी। मैं वापस उनके पास आया और बिना कुछ बोले बस इशारों में पूछा कि क्या बात है।
उन्होंने मेरी नजरों से अपनी नज़रें मिलाई और बहुत धीरे से बोली, "आप बस मेरे पास रहिए।"

इतना कहकर उन्होंने नज़रें झुका लीं और धीरे से मेरा हाथ थामकर मेरे और करीब आ गई। अपनी झुकी हुई पलकों के साथ उन्होंने बिल्कुल फुसफुसाते हुए कहा, "मुझे डर लगता है..."


IMG-20260115-144921

उन्होंने अपना सिर धीरे से मेरे कंधे से टिका दिया। उस पल मेरे अंदर जैसे प्यार का कोई दरिया बह निकला। मैं बिल्कुल निशब्द खड़ा था, बस उनके उस स्पर्श और भरोसे को महसूस कर रहा था। उस भीड़भाड़ वाले स्टेशन पर, मुझे लगा जैसे वक्त थम गया हो। फिर कुली मिला और हम अपना सामान लेकर आगे की तरफ बढ़ गए।

माँ दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गई और ट्रेन में चढ़ने की तैयारी करने लगी। मैं फौरन उनके पास पहुँचा ताकि उन्हें चढ़ने में मदद कर सकूँ। मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र के साथ माँ बिल्कुल वैसी ही लग रही थी जैसे कोई नई नवेली दुल्हन हो, जिसकी अभी-अभी शादी हुई हो।

मैंने उनकी तरफ देखते हुए, दिल में ढेर सारा प्यार और चेहरे पर मुस्कान लिए अपना बायाँ हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया। उन्होंने मेरी तरफ देखा और उनके चेहरे पर एक खूबसूरत सी स्माइल तैर गई। उनकी आँखों में वही चमक और प्यार था जो एक नई शादीशुदा लड़की की आँखों में अपने पति के लिए होता है। वह थोड़ा शर्माईं, उनकी मुस्कुराहट और गहरी हुई, और फिर नज़रें झुकाकर उन्होंने अपना मेहंदी वाला दायाँ हाथ मेरे हाथ में थमा दिया।

फिर अपने दूसरे हाथ से साड़ी को थोड़ा ऊपर की तरफ संभालते हुए वह ट्रेन में ऊपर चढ़ने लगीं। उन्होंने मीडियम हील वाली स्लिपर पहनी हुई थी। जैसे ही वह चढ़ने के लिए बढ़ीं, साड़ी के नीचे से उनके मेहंदी लगे पैरों का कुछ हिस्सा मुझे नज़र आया।



Picsart 26 01 15 14 56 39 437

गोरी गोरी और गोल मुलायम स्किन वाला पैर, उसमे पहनी हुई पायल उनके सुन्दर गुलाबी ऐड़ी को ओर भी खूबसूरत और सेक्सी बना रही है. उसकी एक झलक देख कर ही मेरे अंदर अचानक हवस आ गई. अचानक मेरे शरीर में खून दौडने लगा और मेरे लन्ड के अंदर जाकर भरने लगा. माँ के नरम हाथों के स्पर्श को महसुस करने लगा. उनके मेंहदी लगे हुए सेक्सी पैर और नयी दुल्हन की तरह शर्माना इस सब के कारण मेरे अंदर एक तूफ़ान चलने लगा और मेरा लौड़ा अचानक उछल के सख्त होने लगा.


images (9)

मैं बस अपनी भावनाओं को मन ही मन काबू करते हुए उन्हें ऊपर चढ़ने में पूरी मदद करने लगा। जैसे ही वह ट्रेन के अंदर चढ़ीं, उन्होंने अपनी नज़रें उठाकर सीधे मेरी तरफ देखा।


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उन आँखों में मेरे लिए जो प्यार और वफादारी थी, मुझ पर उनकी जो निर्भरता थी और एक मुकम्मल समर्पण का जो अहसास था, वह सब देख कर मैं निशब्द रह गया। मेरे प्रति उनकी वह फिक्र और उनके दिल में छिपी बेपनाह चाहत को महसूस कर उस पल प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े-खड़े मेरा दिल जैसे पूरी तरह पिघलने लगा।
Maaf karna ye update kafi waqt baad post Kiya hai. Life me kuch is tarah uljha diya hai ki chahh kar bhi site nahi chala pata. Fir ye Update post Kiya hai aaj, hope you guys will like it ❣️❣️
 

parkas

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माँ और मैं एक-दूसरे के बेहद करीब थे। इतनी करीब कि स्टेशन के उस शोर-शराबे और अनाउंसमेंट के बीच भी हम शायद एक-दूसरे की धड़कनें महसूस कर पा रहे थे। पर इस नजदीकी के बावजूद, हमारे बीच एक अनकही सी दूरी थी—एक हिचकिचाहट।
कुछ देर की उस भारी खामोशी को तोड़ते हुए मैंने माँ की तरफ देखा और बस इतना ही पूछ पाया, "पानी पियोगी?"
उन्होंने बस एक पल के लिए मेरी आँखों में झाँका, फिर फौरन अपनी नज़रें फेर लीं। उन्होंने बिना कुछ बोले बस धीरे से गर्दन हिलाकर 'हाँ' कह दिया। वह कोशिश कर रही थी—कोशिश उस पुराने रिश्ते को पीछे छोड़ने की, मेरी ज़िंदगी में मेरी बीवी की जगह खुद को फिट करने की और इस नए रिश्ते में सहज होने की।
वहीं दूसरी तरफ, मैं भी खुद को समझा रहा था। मैं अपने मन को तैयार कर रहा था कि अब माँ को उसी हक और उसी नज़र से देखूँ जो एक बीवी का होता है।

मैं उठा और सामने वाले स्टाल से पानी की एक बोतल ले आया। ढक्कन खोलकर मैंने बोतल माँ की तरफ बढ़ाई, पर उन्होंने लेने में थोड़ी झिझक दिखाई। शायद बोतल पूरी भरी हुई थी और उन्हें डर था कि पीते वक्त पानी छलक कर उनके कपड़ों पर न गिर जाए। उनकी इस छोटी सी उलझन को देख कर मेरे चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गई। मैंने बोतल वापस ली, खुद एक घूँट पानी पिया और फिर उन्हें थमा दी।
माँ ने मेरी तरफ देखा, एक हल्की सी स्माइल दी और बिना किसी हिचकिचाहट के उसी बोतल से पानी पीने लगी। अहमदाबाद वाले हमारे घर में मैंने बचपन से देखा था कि कोई किसी का 'जूठा' पानी नहीं पीता, पर आज माँ ने वह सारी दीवारें गिरा दी थीं। मेरे जूठे पानी को पी लेना शायद उनका मुझे अपनाने का एक मौन तरीका था।

उनके गले का मंगलसूत्र, मांग में सजा वो गहरा सिंदूर और हाथों की मेहंदी—वह बिल्कुल एक नई दुल्हन की तरह शर्मा रही थी। उनके इस बदलाव को मैं अपने दिल की गहराई से महसूस कर रहा था। मेरा मन बस यही कह रहा था कि अब इस दिल में उनके सिवा किसी और के लिए कोई जगह नहीं बची।


IMG-20260115-143702

मैं थोड़ा नर्वस था, इसलिए बार-बार अपनी जगह से उठकर इधर-उधर टहलने लगता। शायद मैं खुद को 'नॉर्मल' दिखाने की कोशिश कर रहा था ताकि उन्हें असहज महसूस न हो। लेकिन हर बार जब मैं वापस आता, तो देखता कि माँ बस मेरा ही इंतज़ार कर रही है। मुझे देखते ही वह अपनी पलकें झुका लेती और उनके होंठों पर वह जानी-पहचानी शर्मिली मुस्कान आ जाती।

उनकी उस मुस्कुराहट में एक अजीब सा सुकून था। हैरानी होती थी यह देखकर कि महज़ कुछ पलों के लिए भी अगर मैं उनकी नज़रों से ओझल होता, तो उनकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी और इंतज़ार साफ दिखने लगता था। शायद वह अब हर पल मुझे अपने पास ही चाहती थी।

तभी ट्रेन का वक्त हो गया। प्लेटफ़ॉर्म पर अचानक भीड़ और शोर बढ़ने लगा। हम दोनों खड़े हुए, मैं सामान उठाने के लिए किसी कुली को ढूंढने लगा। जैसे ही मैंने कुली तलाशने के लिए दो कदम आगे बढ़ाए, पीछे से एक बेहद धीमी और रेशमी सी आवाज़ आई— "सुनिए ना..."

उस एक पुकार ने मेरे दिल में जैसे खुशियों का कोई सैलाब ला दिया। मैं ठिठक कर पीछे मुड़ा। माँ बस चुपचाप अपनी गहरी आँखों से मुझे देख रही थी। मैं वापस उनके पास आया और बिना कुछ बोले बस इशारों में पूछा कि क्या बात है।
उन्होंने मेरी नजरों से अपनी नज़रें मिलाई और बहुत धीरे से बोली, "आप बस मेरे पास रहिए।"

इतना कहकर उन्होंने नज़रें झुका लीं और धीरे से मेरा हाथ थामकर मेरे और करीब आ गई। अपनी झुकी हुई पलकों के साथ उन्होंने बिल्कुल फुसफुसाते हुए कहा, "मुझे डर लगता है..."


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उन्होंने अपना सिर धीरे से मेरे कंधे से टिका दिया। उस पल मेरे अंदर जैसे प्यार का कोई दरिया बह निकला। मैं बिल्कुल निशब्द खड़ा था, बस उनके उस स्पर्श और भरोसे को महसूस कर रहा था। उस भीड़भाड़ वाले स्टेशन पर, मुझे लगा जैसे वक्त थम गया हो। फिर कुली मिला और हम अपना सामान लेकर आगे की तरफ बढ़ गए।

माँ दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गई और ट्रेन में चढ़ने की तैयारी करने लगी। मैं फौरन उनके पास पहुँचा ताकि उन्हें चढ़ने में मदद कर सकूँ। मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र के साथ माँ बिल्कुल वैसी ही लग रही थी जैसे कोई नई नवेली दुल्हन हो, जिसकी अभी-अभी शादी हुई हो।

मैंने उनकी तरफ देखते हुए, दिल में ढेर सारा प्यार और चेहरे पर मुस्कान लिए अपना बायाँ हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया। उन्होंने मेरी तरफ देखा और उनके चेहरे पर एक खूबसूरत सी स्माइल तैर गई। उनकी आँखों में वही चमक और प्यार था जो एक नई शादीशुदा लड़की की आँखों में अपने पति के लिए होता है। वह थोड़ा शर्माईं, उनकी मुस्कुराहट और गहरी हुई, और फिर नज़रें झुकाकर उन्होंने अपना मेहंदी वाला दायाँ हाथ मेरे हाथ में थमा दिया।

फिर अपने दूसरे हाथ से साड़ी को थोड़ा ऊपर की तरफ संभालते हुए वह ट्रेन में ऊपर चढ़ने लगीं। उन्होंने मीडियम हील वाली स्लिपर पहनी हुई थी। जैसे ही वह चढ़ने के लिए बढ़ीं, साड़ी के नीचे से उनके मेहंदी लगे पैरों का कुछ हिस्सा मुझे नज़र आया।



Picsart 26 01 15 14 56 39 437

गोरी गोरी और गोल मुलायम स्किन वाला पैर, उसमे पहनी हुई पायल उनके सुन्दर गुलाबी ऐड़ी को ओर भी खूबसूरत और सेक्सी बना रही है. उसकी एक झलक देख कर ही मेरे अंदर अचानक हवस आ गई. अचानक मेरे शरीर में खून दौडने लगा और मेरे लन्ड के अंदर जाकर भरने लगा. माँ के नरम हाथों के स्पर्श को महसुस करने लगा. उनके मेंहदी लगे हुए सेक्सी पैर और नयी दुल्हन की तरह शर्माना इस सब के कारण मेरे अंदर एक तूफ़ान चलने लगा और मेरा लौड़ा अचानक उछल के सख्त होने लगा.


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मैं बस अपनी भावनाओं को मन ही मन काबू करते हुए उन्हें ऊपर चढ़ने में पूरी मदद करने लगा। जैसे ही वह ट्रेन के अंदर चढ़ीं, उन्होंने अपनी नज़रें उठाकर सीधे मेरी तरफ देखा।


a15c51b319362ba867dd70b3b3c70b1e

उन आँखों में मेरे लिए जो प्यार और वफादारी थी, मुझ पर उनकी जो निर्भरता थी और एक मुकम्मल समर्पण का जो अहसास था, वह सब देख कर मैं निशब्द रह गया। मेरे प्रति उनकी वह फिक्र और उनके दिल में छिपी बेपनाह चाहत को महसूस कर उस पल प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े-खड़े मेरा दिल जैसे पूरी तरह पिघलने लगा।
Bahut hi badhiya update diya hai Esac bhai....
Nice and beautiful update....
 
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yanky_13111

DO NOT use any nude pictures in your Avatar
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Maaf karna ye update kafi waqt baad post Kiya hai. Life me kuch is tarah uljha diya hai ki chahh kar bhi site nahi chala pata. Fir ye Update post Kiya hai aaj, hope you guys will like it ❣️❣️
Definitely I liked your wonderful update...Phir se late update mat kijiyega....Ab regular basis pa update de dijiyega...
 
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Esac

Maa ka diwana
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Update 35


मुझे अंदर ही अंदर यह महसूस हुआ कि मैं वाकई बहुत खुशनसीब हूँ। मुझे पत्नी के रूप में ऐसी लड़की मिली जो बचपन से आज तक मुझे इतना प्यार करती आई है और आज भी उनके दिल में वही शिद्दत है। मैं जानता हूँ कि वह ज़िंदगी भर मुझे इसी तरह टूटकर चाहेगी। मेरी सिंगल पैरेंट होने की वजह से शायद इसीलिए उन्होंने मुझे हमेशा सबसे ज्यादा प्यार दिया। उनके दिल में हमेशा मेरा ही बसेरा रहा और उनके सारे सुख-दुःख बस मेरे ही इर्द-गिर्द घूमते थे। आज नसीब हमें ज़िंदगी के उस मोड़ पर ले आया है, जहाँ हम सगे माँ - बेटा होने के बावजूद दुनिया के सबसे मज़बूत और खूबसूरत बंधन में बंध गए हैं।


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माँ - बेटे के उस अटूट रिश्ते से तो हम पहले ही जुड़े थे, लेकिन आज इस नए बंधन ने हम दोनों को और भी ज्यादा मजबूती से एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया है। माँ के लिए मेरे मन में जो प्यार था, उसमें अब एक पति का समर्पण भी जुड़ गया था और मैंने अपने दिल के सारे अहसास निचोड़कर उनके नाम कर दिया। उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी में जमा किया हुआ सारा प्यार अपने नए पति के लिए लुटा दिया। अपने 'बेटे' के लिए जो मोहब्बत थी, उसमें पत्नी वाला हक़ मिलाकर उन्होंने अपना दिल पूरी तरह मेरे सामने खोलकर रख दिया था।

उन्होंने खुद को, अपने तन-मन और अपनी रूह को पूरी तरह अपने बेटे, अपने पति के पास सरेंडर कर दिया था। उनके सामने खड़े होकर उसकी आँखों में देखते हुए मैं यह सब कुछ गहराई से महसूस कर रहा था। उस भीड़ भरे स्टेशन और ट्रेन के शोर-शराबे के बीच, हम बस कुछ पल यूँ ही नज़रें मिलाकर एक-दूसरे से दिल की हज़ारों बातें कह रहे थे।

जब हम ट्रेन में चढ़े थे, तो कंपार्टमेंट मुसाफिरों से खचाखच भरा था। लोग जल्दी-जल्दी अपना डिनर निपटाकर सो गए। मेरा और माँ का बर्थ ऊपर-नीचे था। मैं ऊपर जाकर लेट गया और माँ नीचे चादर ओढ़कर सो गई। शादी के बाद एक पति-पत्नी की पहली रात, जो एक साथ एक ही छत के नीचे गुज़रनी चाहिए थी, वह ट्रेन के इन अलग-अलग बर्थ पर गुज़र रही थी। शायद ही किसी के साथ ऐसा होता होगा, पर हमारे साथ तो खैर बहुत कुछ ऐसा हो रहा था जो आम नहीं था।

मैंने एक बार ऊपर से झुककर नीचे माँ को देखा। वह मुड़कर मेरी ही बर्थ की तरफ देखते हुए लेटी थी। जैसे ही हमारी नज़रें मिलीं, उनके होंठों पर एक कोमल सी मुस्कान तैर गई। मैं बस उन्हें एकटक देखता रहा। उन्होंने अपनी चादर को थोड़ा और गले तक खींच लिया, जैसे उस गर्माहट में खुद को समेटना चाह रही हो, और फिर अपनी आँखें मूंद लीं।

थोड़ी देर बाद जब उन्होंने दोबारा आँखें खोलीं, तो हमारी नज़रें फिर से उलझ गईं। माथे पर वह लाल बिंदी और होंठों की वह प्यारी सी मुस्कुराहट—शादी के इस रूप ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया था। वह बिल्कुल उस अल्हड़ और कुंवारी लड़की जैसी लग रही थी जिसकी अभी-अभी शादी हुई हो और जो अपने पति को पहली बार एक अलग हक़ से देख रही हो। फिर उन्होंने अपना चेहरा दाईं तरफ घुमा लिया और आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगी।

अगली सुबह जब हमारी नींद खुली, तो पिछले स्टेशन पर कुछ मुसाफिर पहले ही उतर चुके थे। इस वजह से कोच अब थोड़ा खाली और शांत लग रहा था। हमारे सामने वाली बर्थ पर बस एक अधेड़ उम्र के अंकल बैठे थे। तभी ट्रेन में चाय वाला आया, जो गरम पानी का फ्लास्क, चीनी के पैकेट, मिल्क पाउडर और टी-बैग्स दे गया।

मैंने जैसे ही चाय बनाना शुरू किया, माँ ने धीरे से टोकते हुए कहा, "लाइए, मुझे दीजिए। मैं बनाती हूँ।" और वह चाय बनाने लगी। मेरी पत्नी बनने के बाद भी, उनके व्यवहार में वही पुरानी फिक्र और ममता थी जो वह बचपन से मुझे देती आई थी। मैंने भी मन ही मन खुद से वादा किया कि पति बनने के बाद भी उनके लिए मेरा सम्मान और केयर कभी कम नहीं होगी।

हम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बस एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे। यह वह पहली सुबह थी जो हर जोड़े की ज़िंदगी में सिर्फ एक बार आती है—शादी के ठीक अगले दिन की पहली सुबह। हम उन बेशकीमती पलों को अपने दिल में कैद कर रहे थे। हमारे सामने बैठे अंकल ने हमसे परिचय किया और जब उन्हें पता चला कि हम नई-नई शादी करके मेरी जॉब वाली जगह जा रहे हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हमारी जोड़ी बहुत खूबसूरत है।

बातों-बातों में उन्होंने पूछ लिया, "लव मैरिज है या अरेंज्ड?"

यह सवाल सुनते ही माँ और मैं कुछ पलों के लिए खामोश हो गए। उन्हें कैसे समझाते कि हमारा रिश्ता क्या है? मैंने तुरंत बात संभालते हुए कहा, "अरेंज्ड मैरिज है।"

मेरी बात सुनकर वह व्यक्ति बोले, "बहुत कम लोगों में अरेंज्ड मैरिज के बाद इतना प्यार झलकता है, जितना आप दोनों को देखकर लग रहा है।"

मैं और माँ एक-दूसरे को देखने लगे। मन ही मन हमने सोचा कि इन्हें क्या पता कि नसीब के किन फेरों ने हमें आज यहाँ लाकर खड़ा किया है। हम एक ऐसा जोड़ा थे, जैसा शायद ही दुनिया में कहीं और मिले। हमारे बीच जो प्यार था, वह दुनिया के किसी भी बंधन से कहीं ज़्यादा गहरा और मज़बूत था।

कुछ घंटों के सफर के बाद हम मुंबई पहुँच गए—यह वही शहर है जिसे अब से हम अपना घर कहेंगे और यहीं अपनी एक नई दुनिया बसाएंगे। जैसे ही ट्रेन रुकी, मैं और माँ प्लेटफॉर्म पर उतरे। मैंने माँ को उतरने में मदद करने के लिए हाथ बढ़ाया, उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ा और नीचे उतर आई।



IMG 20260119 194747

उतरने के बाद माँ के चेहरे पर वह मुस्कुराहट बरकरार थी, पर अचानक कुछ याद करके उन्होंने मेरे हाथ पर अपनी ग्रिप ढीली कर दी। वह थोड़ा शर्माई और मेरा हाथ छोड़कर अपना हाथ पीछे खींच लिया। फिर वह नज़रें घुमाकर प्लेटफॉर्म की दूसरी तरफ देखने लगी। मैं अब भी उन्हें ही देख रहा था; माँ आज बहुत खुश लग रही थी। उनके होंठों पर जो मुस्कान सजी थी, उसे ताउम्र देखने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ।

हमने टैक्सी में अपना लगेज लोड किया और अपने घर की तरफ निकल पड़े—वह घर जो आज से 'हमारा' होने वाला था। प्लेटफॉर्म पर माँ ने जो मेरा हाथ छोड़ा, उनके बाद उन्होंने फिर मेरा हाथ नहीं पकड़ा। मेरा दिल चाह रहा था कि वह मेरा बाज़ू पकड़कर मेरे एकदम करीब होकर चले, पर वह पास होकर भी मेरे स्पर्श से दूर रह रही थी। शायद उनके मन में भी मेरे जैसी ही कोई बेचैनी और अनुभूति हो रही होगी। मेरे ही जैसा एक तूफ़ान उनके अंदर भी उठा होगा। एक ऐसा अद्भुत सुख, जो न मैंने कभी पाया और जिसे पाकर भी वह ज़िंदगी में कभी उसका ठीक से आनंद नहीं ले पाई थी—उस सुख को पाने के लिए शायद उनका मन भी तरस रहा होगा। और शायद इसीलिए, वह खुद को काबू में रखने के लिए मुझसे थोड़ी दूरी बनाकर रख रही थी।

टैक्सी की पिछली सीट पर माँ खिड़की के पास बैठकर बाहर की तरफ देख रही थी। वह इस नई जगह और नई ज़िंदगी में खुद को ढालते हुए, इस नए रिश्ते को अपने दिल में और भी मजबूती से बसा रही थी। रास्ते भर मैं उन्हें बताता रहा कि हमें कितनी दूर जाना है, मार्केट किस तरफ है और मेरा ऑफिस किधर पड़ता है। वह बस बीच-बीच में एक मुस्कुराहट के साथ मेरी तरफ देखती और फिर बाहर की तरफ नज़रें घुमा लेती।


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खिड़की की तरफ उनका बायाँ हाथ उनकी गोद में रखा था और दाहिना हाथ मेरे और उनके बीच की खाली सीट पर। मेरा मन बुरी तरह मचल रहा था कि बस उनका वह हाथ अपने हाथ में ले लूँ। बातों-बातों में मन में यह ख्याल तो सौ बार आया, पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। हम अब पति-पत्नी थे, पर फिर भी अंदर एक अजीब सा संकोच काम कर रहा था। इतने सालों तक जिस औरत को मैंने सिर्फ एक माँ की नज़र से देखा और छुआ, आज उसे अपनी पत्नी के रूप में देख तो रहा था, मगर छूने में एक झिझक आड़े आ रही थी। शायद उनके अंदर भी अपने बेटे को अब पति के रूप में अपनाने और छूने में वैसी ही शर्म होगी।

अब मुझे एहसास हो रहा था कि पिछले 6 सालों से कल्पनाओं में उनके साथ मिलन के जो सपने मैंने देखे थे, हकीकत की ज़मीन पर आकर उन्हें पूरा करना इतना सहज और आसान नहीं था। माँ जितनी बार मेरी तरफ देखती, मेरे सीने के अंदर एक अजीब सी झनझनाहट होने लगती। खिड़की से आती हवा की वजह से जब वह मेरी तरफ देखती, तो उनकी सुंदर आँखें थोड़ी भिंच सी जातीं। फिर भी उनके चेहरे की मुस्कान और आँखों में एक गहरा प्यार साफ़ झलक रहा था।

मैंने मन ही मन थोड़ी हिम्मत जुटाई और सामने की तरफ देखते हुए अपना बायाँ हाथ बढ़ाकर उनके दाहिने हाथ पर रख दिया। मेरी उंगलियाँ बस उनकी उंगलियों को छू भर रही थीं। तभी माँ ने बाहर देखते हुए अपना हाथ थोड़ा अपनी ओर खींच लिया। मैंने हार नहीं मानी और दोबारा हाथ बढ़ाकर उनकी उंगलियाँ पकड़ लीं। अब उन्होंने हाथ हटाया तो नहीं, पर उंगलियों को मुट्ठी की तरह भींच लिया, जैसे मेरे स्पर्श से दूर भागना चाह रही हों। मेरे मन में एक ज़िद सी आ गई कि हमारे बीच पति-पत्नी बनने के बाद यह जो संकोच की दीवार है, वह अभी खत्म हो जाए।

मैंने अपना हाथ उनके हाथ पर मजबूती से टिका दिया और अपनी ग्रिप में उनका हाथ थाम लिया। उन्होंने धीरे से हाथ छुड़ाने की कोशिश तो की, पर खींचकर ले नहीं गईं। मैंने उनकी तरफ मुड़कर देखा। वह अब भी होंठों पर मुस्कान लिए बाहर देख रही थीं। मैंने धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ उनकी उंगलियों में फँसाकर (intertwine करके) उन्हें थाम लिया। तभी उन्होंने मेरी तरफ देखा। उनके चेहरे पर शर्म, एक्साइटमेंट और चाहत का एक मिला-जुला भाव था। उन्होंने आँखों ही आँखों में इशारा करते हुए मुझे ड्राइवर की तरफ देखने को कहा।


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फिर एक बनावटी गुस्से वाला चेहरा बनाया, जैसे वह कहना चाहती हों— "यह क्या कर रहे हैं आप? आगे ड्राइवर बैठा है, मिरर में देख रहा होगा। छोड़िए, मुझे शर्म आ रही है।"

उनका इस तरह शर्माना मुझे और भी मज़ा देने लगा। मैंने उनका हाथ छोड़ा तो नहीं, बल्कि अपनी ग्रिप और मज़बूत करते हुए उनकी उंगलियों को अपनी मुट्ठी में और कस लिया। माँ ने तुरंत अपनी नज़रें घुमा लीं और बाहर की तरफ देखने लगी। मेरे चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी और मैं बस उन्हें ही निहारे जा रहा था। फिर मैंने उनका हाथ वैसे ही पकड़े रखा और अपनी नज़रें सामने की तरफ घुमा लीं।

तभी मुझे महसूस हुआ कि माँ अपनी मुट्ठी धीरे-धीरे खोल रही है और अपनी उंगलियों से मेरी उंगलियों को थाम रही है। मैंने नीचे हाथों की तरफ देखा—हमारी उंगलियाँ एक-दूसरे में पूरी तरह उलझी हुई (intertwined) थीं और हम दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ रखा था। मैंने उनकी तरफ देखा, तो वह बाहर देखते हुए भी समझ गईं कि मेरी नज़रें उन पर ही हैं। वह और भी ज़्यादा शर्मा गईं और अपनी हंसी को होंठों के बीच दबाने की कोशिश करने लगीं। उन्होंने अपने बाएं हाथ की कोहनी खिड़की पर टिकाई और एक उंगली को मोड़कर बार-बार अपने होंठों को छूने लगीं।


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मैं समझ गया था कि माँ के अंदर की वह झिझक अब खत्म हो रही है और वह अपने बेटे के साथ इस नए रिश्ते में धीरे-धीरे खुद को खोल रही है। एक पत्नी होने का एहसास उनके चेहरे पर साफ़ था और उनके दिल की सारी खुशी झलक रही थी। मेरा मन किसी बच्चे की तरह खुशी से झूम उठा। टैक्सी में हम दोनों अलग-अलग तरफ देख रहे थे, लेकिन एक-दूसरे का हाथ पकड़कर हम जैसे बिना कुछ कहे वादा कर रहे थे कि ज़िंदगी की किसी भी परिस्थिति में यह साथ कभी नहीं छूटेगा।


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माँ की ऐसी अदाएं मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं। मैं जितनी बार उन्हें देख रहा था, बस यही दुआ कर रहा था कि यह पल, यह एहसास कभी खत्म न हो। हवा के झोंकों के साथ उनके बाल उड़कर मेरे चेहरे को छू रहे थे। मेरे गाल, नाक और आँखों पर उनके बालों का वह हल्का सा स्पर्श मुझे एक रूहानी खुशी दे रहा था। उनकी वो धीमी हंसी और उनके मोतियों से चमकते दांत उनकी हंसी को और लुभावना बना रहे थे। मेरा मन कर रहा था कि बस उन्हें अपनी बाँहों में भर लूँ और जी भर कर प्यार करूँ। माँ और मैं एकांत में एक दूसरे को अपना बना कर पाने की चाहत में अंदर ही अंदर उबलने लगे.

पर मेरे मन में उठी एक छोटी सी फ़िक्र ने अचानक उस पूरी ख़ुशी को फीका कर दिया। रात में भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था, जैसे दिल पर किसी ने बोझ रख दिया हो। माँ ने शायद मेरी आँखों में उस बेचैनी को पढ़ लिया था। उनकी उस वक्त की खामोश नज़रों में एक गहरा दिलासा था, जैसे कह रही हो— "अब आप अकेले क्यों दुखी होते हैं? आज से तो हर सुख और हर दुख हमारा साझा है। हम मिलकर ज़िंदगी के सफर को आसान बनाएंगे और इसे खुशियों से भर देंगे। मैं हूँ न आपके पास, हमेशा के लिए।"



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उनकी आँखों की वो तसल्ली पढ़कर तब तो मेरा मन संभल गया था, पर इस वक्त वही पुरानी चिंता फिर से सर उठाने लगी। नाना-नानी की कोशिशों और तकदीर के खेल ने हमें शास्त्र के अनुसार पति-पत्नी तो बना दिया था। माँ भी एक पत्नी के रूप में खुद को ढालकर एक सुनहरी ज़िंदगी के सपने देख रही थी। पर क्या मैं उनकी उम्मीदों पर खरा उतर पाऊँगा? मुझे यकीन है कि माँ एक आदर्श पत्नी साबित होगी, पर क्या मैं एक आदर्श पति बन पाऊँगा? एक औरत के दिल में अपने जीवनसाथी को लेकर जितने अरमान और ख़्वाब होते हैं, क्या मैं उन सबको मुकम्मल कर पाऊँगा?

यही वो सवाल थे जो रह-रहकर मेरे दिल में चुभ रहे थे। मैं जानता हूँ कि मैं माँ को दुनिया में सबसे ज़्यादा चाहता हूँ और ताउम्र चाहूँगा। उसके सिवा मेरी नज़रों में कोई और लड़की कभी आएगी ही नहीं। वह मेरी ज़िंदगी का एकमात्र सच है। हमारी उम्र के फासले को तो हम हर तरीके से पाट लेंगे, पर जब एक पति-पत्नी की सामान्य ज़िंदगी के बारे में सोचता हूँ, तो वही मायूसी फिर से घेर लेती है।

मैं जानता हूं उनके साथ मेरा हर पति पत्नी की तरह शारीरिक संपर्क होने वाला है। हम माँ बेटे के रिश्ते को दिल में रख कर एक पति पत्नी की तरह जिएंगे। वह भी जानती है शादी के बाद उनका बेटा अब एक पति के अधिकारो से उनके तन और मन को प्यार करेगा और वह इसके लिए जरूर खुदको तैयार भी की होंगी।

लेकिन मैं जब अपने लोड़े के बारे में सोचता हूं तो एक डर मन में पैदा होता है। मेरा लोड़ा नॉर्मल से थोड़ा बड़ा और मोटा तो है ही, पर जब वो उत्तेजना से खड़ा होता है, तब उसका कैप एक दम बड़े से बॉल जैसा बन जाता है।


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क्या मैं, माँ के साथ ठीक तरह से शारीरिक सम्बन्ध बना पाउँगा?? क्या मैं उनको बिना दर्द दिए वो प्यार कर पाउँगा जो हर पत्नी अपने पति से चाहती है? क्या मैं उन्हें पूर्ण संतुष्टि दे पाऊंगा?

मैं उनसे बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ। उनके सिवा किसी और के साथ मिलन की कल्पना न मैंने कभी की है, और न कभी करूँगा। मेरा बस एक ही अरमान है—उन्हें हर मुमकिन खुशी देना और दुनिया का सारा सुकून उनके कदमों में लाकर रख देना।
 
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Maa ka diwana
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