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Koi baat nahi bhai apko achhi Lage toh aap padh sakte ho, maine apne hisab se likhi hai. Aur main apni life set karne me laga hua tha isi wajah se main site par nahi aaya.Ye to mr/mrs patel ki story hai bas image's add kardi hai bro bohot pehle padi thi ye iska end bhi bohot achha h lekin tune ye story complete nahi ki galat baat h
Maaf karna ye update kafi waqt baad post Kiya hai. Life me kuch is tarah uljha diya hai ki chahh kar bhi site nahi chala pata. Fir ye Update post Kiya hai aaj, hope you guys will like itUpdate 33
माँ और मैं एक-दूसरे के बेहद करीब थे। इतनी करीब कि स्टेशन के उस शोर-शराबे और अनाउंसमेंट के बीच भी हम शायद एक-दूसरे की धड़कनें महसूस कर पा रहे थे। पर इस नजदीकी के बावजूद, हमारे बीच एक अनकही सी दूरी थी—एक हिचकिचाहट।
कुछ देर की उस भारी खामोशी को तोड़ते हुए मैंने माँ की तरफ देखा और बस इतना ही पूछ पाया, "पानी पियोगी?"
उन्होंने बस एक पल के लिए मेरी आँखों में झाँका, फिर फौरन अपनी नज़रें फेर लीं। उन्होंने बिना कुछ बोले बस धीरे से गर्दन हिलाकर 'हाँ' कह दिया। वह कोशिश कर रही थी—कोशिश उस पुराने रिश्ते को पीछे छोड़ने की, मेरी ज़िंदगी में मेरी बीवी की जगह खुद को फिट करने की और इस नए रिश्ते में सहज होने की।
वहीं दूसरी तरफ, मैं भी खुद को समझा रहा था। मैं अपने मन को तैयार कर रहा था कि अब माँ को उसी हक और उसी नज़र से देखूँ जो एक बीवी का होता है।
मैं उठा और सामने वाले स्टाल से पानी की एक बोतल ले आया। ढक्कन खोलकर मैंने बोतल माँ की तरफ बढ़ाई, पर उन्होंने लेने में थोड़ी झिझक दिखाई। शायद बोतल पूरी भरी हुई थी और उन्हें डर था कि पीते वक्त पानी छलक कर उनके कपड़ों पर न गिर जाए। उनकी इस छोटी सी उलझन को देख कर मेरे चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गई। मैंने बोतल वापस ली, खुद एक घूँट पानी पिया और फिर उन्हें थमा दी।
माँ ने मेरी तरफ देखा, एक हल्की सी स्माइल दी और बिना किसी हिचकिचाहट के उसी बोतल से पानी पीने लगी। अहमदाबाद वाले हमारे घर में मैंने बचपन से देखा था कि कोई किसी का 'जूठा' पानी नहीं पीता, पर आज माँ ने वह सारी दीवारें गिरा दी थीं। मेरे जूठे पानी को पी लेना शायद उनका मुझे अपनाने का एक मौन तरीका था।
उनके गले का मंगलसूत्र, मांग में सजा वो गहरा सिंदूर और हाथों की मेहंदी—वह बिल्कुल एक नई दुल्हन की तरह शर्मा रही थी। उनके इस बदलाव को मैं अपने दिल की गहराई से महसूस कर रहा था। मेरा मन बस यही कह रहा था कि अब इस दिल में उनके सिवा किसी और के लिए कोई जगह नहीं बची।
मैं थोड़ा नर्वस था, इसलिए बार-बार अपनी जगह से उठकर इधर-उधर टहलने लगता। शायद मैं खुद को 'नॉर्मल' दिखाने की कोशिश कर रहा था ताकि उन्हें असहज महसूस न हो। लेकिन हर बार जब मैं वापस आता, तो देखता कि माँ बस मेरा ही इंतज़ार कर रही है। मुझे देखते ही वह अपनी पलकें झुका लेती और उनके होंठों पर वह जानी-पहचानी शर्मिली मुस्कान आ जाती।
उनकी उस मुस्कुराहट में एक अजीब सा सुकून था। हैरानी होती थी यह देखकर कि महज़ कुछ पलों के लिए भी अगर मैं उनकी नज़रों से ओझल होता, तो उनकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी और इंतज़ार साफ दिखने लगता था। शायद वह अब हर पल मुझे अपने पास ही चाहती थी।
तभी ट्रेन का वक्त हो गया। प्लेटफ़ॉर्म पर अचानक भीड़ और शोर बढ़ने लगा। हम दोनों खड़े हुए, मैं सामान उठाने के लिए किसी कुली को ढूंढने लगा। जैसे ही मैंने कुली तलाशने के लिए दो कदम आगे बढ़ाए, पीछे से एक बेहद धीमी और रेशमी सी आवाज़ आई— "सुनिए ना..."
उस एक पुकार ने मेरे दिल में जैसे खुशियों का कोई सैलाब ला दिया। मैं ठिठक कर पीछे मुड़ा। माँ बस चुपचाप अपनी गहरी आँखों से मुझे देख रही थी। मैं वापस उनके पास आया और बिना कुछ बोले बस इशारों में पूछा कि क्या बात है।
उन्होंने मेरी नजरों से अपनी नज़रें मिलाई और बहुत धीरे से बोली, "आप बस मेरे पास रहिए।"
इतना कहकर उन्होंने नज़रें झुका लीं और धीरे से मेरा हाथ थामकर मेरे और करीब आ गई। अपनी झुकी हुई पलकों के साथ उन्होंने बिल्कुल फुसफुसाते हुए कहा, "मुझे डर लगता है..."
उन्होंने अपना सिर धीरे से मेरे कंधे से टिका दिया। उस पल मेरे अंदर जैसे प्यार का कोई दरिया बह निकला। मैं बिल्कुल निशब्द खड़ा था, बस उनके उस स्पर्श और भरोसे को महसूस कर रहा था। उस भीड़भाड़ वाले स्टेशन पर, मुझे लगा जैसे वक्त थम गया हो। फिर कुली मिला और हम अपना सामान लेकर आगे की तरफ बढ़ गए।
माँ दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गई और ट्रेन में चढ़ने की तैयारी करने लगी। मैं फौरन उनके पास पहुँचा ताकि उन्हें चढ़ने में मदद कर सकूँ। मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र के साथ माँ बिल्कुल वैसी ही लग रही थी जैसे कोई नई नवेली दुल्हन हो, जिसकी अभी-अभी शादी हुई हो।
मैंने उनकी तरफ देखते हुए, दिल में ढेर सारा प्यार और चेहरे पर मुस्कान लिए अपना बायाँ हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया। उन्होंने मेरी तरफ देखा और उनके चेहरे पर एक खूबसूरत सी स्माइल तैर गई। उनकी आँखों में वही चमक और प्यार था जो एक नई शादीशुदा लड़की की आँखों में अपने पति के लिए होता है। वह थोड़ा शर्माईं, उनकी मुस्कुराहट और गहरी हुई, और फिर नज़रें झुकाकर उन्होंने अपना मेहंदी वाला दायाँ हाथ मेरे हाथ में थमा दिया।
फिर अपने दूसरे हाथ से साड़ी को थोड़ा ऊपर की तरफ संभालते हुए वह ट्रेन में ऊपर चढ़ने लगीं। उन्होंने मीडियम हील वाली स्लिपर पहनी हुई थी। जैसे ही वह चढ़ने के लिए बढ़ीं, साड़ी के नीचे से उनके मेहंदी लगे पैरों का कुछ हिस्सा मुझे नज़र आया।
गोरी गोरी और गोल मुलायम स्किन वाला पैर, उसमे पहनी हुई पायल उनके सुन्दर गुलाबी ऐड़ी को ओर भी खूबसूरत और सेक्सी बना रही है. उसकी एक झलक देख कर ही मेरे अंदर अचानक हवस आ गई. अचानक मेरे शरीर में खून दौडने लगा और मेरे लन्ड के अंदर जाकर भरने लगा. माँ के नरम हाथों के स्पर्श को महसुस करने लगा. उनके मेंहदी लगे हुए सेक्सी पैर और नयी दुल्हन की तरह शर्माना इस सब के कारण मेरे अंदर एक तूफ़ान चलने लगा और मेरा लौड़ा अचानक उछल के सख्त होने लगा.
मैं बस अपनी भावनाओं को मन ही मन काबू करते हुए उन्हें ऊपर चढ़ने में पूरी मदद करने लगा। जैसे ही वह ट्रेन के अंदर चढ़ीं, उन्होंने अपनी नज़रें उठाकर सीधे मेरी तरफ देखा।
उन आँखों में मेरे लिए जो प्यार और वफादारी थी, मुझ पर उनकी जो निर्भरता थी और एक मुकम्मल समर्पण का जो अहसास था, वह सब देख कर मैं निशब्द रह गया। मेरे प्रति उनकी वह फिक्र और उनके दिल में छिपी बेपनाह चाहत को महसूस कर उस पल प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े-खड़े मेरा दिल जैसे पूरी तरह पिघलने लगा।
Thanks alotAbsolutely wonderful and beautiful story
Bahut hi badhiya update diya hai Esac bhai....Update 33
माँ और मैं एक-दूसरे के बेहद करीब थे। इतनी करीब कि स्टेशन के उस शोर-शराबे और अनाउंसमेंट के बीच भी हम शायद एक-दूसरे की धड़कनें महसूस कर पा रहे थे। पर इस नजदीकी के बावजूद, हमारे बीच एक अनकही सी दूरी थी—एक हिचकिचाहट।
कुछ देर की उस भारी खामोशी को तोड़ते हुए मैंने माँ की तरफ देखा और बस इतना ही पूछ पाया, "पानी पियोगी?"
उन्होंने बस एक पल के लिए मेरी आँखों में झाँका, फिर फौरन अपनी नज़रें फेर लीं। उन्होंने बिना कुछ बोले बस धीरे से गर्दन हिलाकर 'हाँ' कह दिया। वह कोशिश कर रही थी—कोशिश उस पुराने रिश्ते को पीछे छोड़ने की, मेरी ज़िंदगी में मेरी बीवी की जगह खुद को फिट करने की और इस नए रिश्ते में सहज होने की।
वहीं दूसरी तरफ, मैं भी खुद को समझा रहा था। मैं अपने मन को तैयार कर रहा था कि अब माँ को उसी हक और उसी नज़र से देखूँ जो एक बीवी का होता है।
मैं उठा और सामने वाले स्टाल से पानी की एक बोतल ले आया। ढक्कन खोलकर मैंने बोतल माँ की तरफ बढ़ाई, पर उन्होंने लेने में थोड़ी झिझक दिखाई। शायद बोतल पूरी भरी हुई थी और उन्हें डर था कि पीते वक्त पानी छलक कर उनके कपड़ों पर न गिर जाए। उनकी इस छोटी सी उलझन को देख कर मेरे चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गई। मैंने बोतल वापस ली, खुद एक घूँट पानी पिया और फिर उन्हें थमा दी।
माँ ने मेरी तरफ देखा, एक हल्की सी स्माइल दी और बिना किसी हिचकिचाहट के उसी बोतल से पानी पीने लगी। अहमदाबाद वाले हमारे घर में मैंने बचपन से देखा था कि कोई किसी का 'जूठा' पानी नहीं पीता, पर आज माँ ने वह सारी दीवारें गिरा दी थीं। मेरे जूठे पानी को पी लेना शायद उनका मुझे अपनाने का एक मौन तरीका था।
उनके गले का मंगलसूत्र, मांग में सजा वो गहरा सिंदूर और हाथों की मेहंदी—वह बिल्कुल एक नई दुल्हन की तरह शर्मा रही थी। उनके इस बदलाव को मैं अपने दिल की गहराई से महसूस कर रहा था। मेरा मन बस यही कह रहा था कि अब इस दिल में उनके सिवा किसी और के लिए कोई जगह नहीं बची।
मैं थोड़ा नर्वस था, इसलिए बार-बार अपनी जगह से उठकर इधर-उधर टहलने लगता। शायद मैं खुद को 'नॉर्मल' दिखाने की कोशिश कर रहा था ताकि उन्हें असहज महसूस न हो। लेकिन हर बार जब मैं वापस आता, तो देखता कि माँ बस मेरा ही इंतज़ार कर रही है। मुझे देखते ही वह अपनी पलकें झुका लेती और उनके होंठों पर वह जानी-पहचानी शर्मिली मुस्कान आ जाती।
उनकी उस मुस्कुराहट में एक अजीब सा सुकून था। हैरानी होती थी यह देखकर कि महज़ कुछ पलों के लिए भी अगर मैं उनकी नज़रों से ओझल होता, तो उनकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी और इंतज़ार साफ दिखने लगता था। शायद वह अब हर पल मुझे अपने पास ही चाहती थी।
तभी ट्रेन का वक्त हो गया। प्लेटफ़ॉर्म पर अचानक भीड़ और शोर बढ़ने लगा। हम दोनों खड़े हुए, मैं सामान उठाने के लिए किसी कुली को ढूंढने लगा। जैसे ही मैंने कुली तलाशने के लिए दो कदम आगे बढ़ाए, पीछे से एक बेहद धीमी और रेशमी सी आवाज़ आई— "सुनिए ना..."
उस एक पुकार ने मेरे दिल में जैसे खुशियों का कोई सैलाब ला दिया। मैं ठिठक कर पीछे मुड़ा। माँ बस चुपचाप अपनी गहरी आँखों से मुझे देख रही थी। मैं वापस उनके पास आया और बिना कुछ बोले बस इशारों में पूछा कि क्या बात है।
उन्होंने मेरी नजरों से अपनी नज़रें मिलाई और बहुत धीरे से बोली, "आप बस मेरे पास रहिए।"
इतना कहकर उन्होंने नज़रें झुका लीं और धीरे से मेरा हाथ थामकर मेरे और करीब आ गई। अपनी झुकी हुई पलकों के साथ उन्होंने बिल्कुल फुसफुसाते हुए कहा, "मुझे डर लगता है..."
उन्होंने अपना सिर धीरे से मेरे कंधे से टिका दिया। उस पल मेरे अंदर जैसे प्यार का कोई दरिया बह निकला। मैं बिल्कुल निशब्द खड़ा था, बस उनके उस स्पर्श और भरोसे को महसूस कर रहा था। उस भीड़भाड़ वाले स्टेशन पर, मुझे लगा जैसे वक्त थम गया हो। फिर कुली मिला और हम अपना सामान लेकर आगे की तरफ बढ़ गए।
माँ दरवाजे के पास आकर खड़ी हो गई और ट्रेन में चढ़ने की तैयारी करने लगी। मैं फौरन उनके पास पहुँचा ताकि उन्हें चढ़ने में मदद कर सकूँ। मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र के साथ माँ बिल्कुल वैसी ही लग रही थी जैसे कोई नई नवेली दुल्हन हो, जिसकी अभी-अभी शादी हुई हो।
मैंने उनकी तरफ देखते हुए, दिल में ढेर सारा प्यार और चेहरे पर मुस्कान लिए अपना बायाँ हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया। उन्होंने मेरी तरफ देखा और उनके चेहरे पर एक खूबसूरत सी स्माइल तैर गई। उनकी आँखों में वही चमक और प्यार था जो एक नई शादीशुदा लड़की की आँखों में अपने पति के लिए होता है। वह थोड़ा शर्माईं, उनकी मुस्कुराहट और गहरी हुई, और फिर नज़रें झुकाकर उन्होंने अपना मेहंदी वाला दायाँ हाथ मेरे हाथ में थमा दिया।
फिर अपने दूसरे हाथ से साड़ी को थोड़ा ऊपर की तरफ संभालते हुए वह ट्रेन में ऊपर चढ़ने लगीं। उन्होंने मीडियम हील वाली स्लिपर पहनी हुई थी। जैसे ही वह चढ़ने के लिए बढ़ीं, साड़ी के नीचे से उनके मेहंदी लगे पैरों का कुछ हिस्सा मुझे नज़र आया।
गोरी गोरी और गोल मुलायम स्किन वाला पैर, उसमे पहनी हुई पायल उनके सुन्दर गुलाबी ऐड़ी को ओर भी खूबसूरत और सेक्सी बना रही है. उसकी एक झलक देख कर ही मेरे अंदर अचानक हवस आ गई. अचानक मेरे शरीर में खून दौडने लगा और मेरे लन्ड के अंदर जाकर भरने लगा. माँ के नरम हाथों के स्पर्श को महसुस करने लगा. उनके मेंहदी लगे हुए सेक्सी पैर और नयी दुल्हन की तरह शर्माना इस सब के कारण मेरे अंदर एक तूफ़ान चलने लगा और मेरा लौड़ा अचानक उछल के सख्त होने लगा.
मैं बस अपनी भावनाओं को मन ही मन काबू करते हुए उन्हें ऊपर चढ़ने में पूरी मदद करने लगा। जैसे ही वह ट्रेन के अंदर चढ़ीं, उन्होंने अपनी नज़रें उठाकर सीधे मेरी तरफ देखा।
उन आँखों में मेरे लिए जो प्यार और वफादारी थी, मुझ पर उनकी जो निर्भरता थी और एक मुकम्मल समर्पण का जो अहसास था, वह सब देख कर मैं निशब्द रह गया। मेरे प्रति उनकी वह फिक्र और उनके दिल में छिपी बेपनाह चाहत को महसूस कर उस पल प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े-खड़े मेरा दिल जैसे पूरी तरह पिघलने लगा।
Thanks brotherBahut hi badhiya update diya hai Esac bhai....
Nice and beautiful update....
Definitely I liked your wonderful update...Phir se late update mat kijiyega....Ab regular basis pa update de dijiyega...Maaf karna ye update kafi waqt baad post Kiya hai. Life me kuch is tarah uljha diya hai ki chahh kar bhi site nahi chala pata. Fir ye Update post Kiya hai aaj, hope you guys will like it![]()








Esac ju itne Din baadkidhar Gayab the man?
Ye hi jawab hai brotherMaaf karna ye update kafi waqt baad post Kiya hai. Life me kuch is tarah uljha diya hai ki chahh kar bhi site nahi chala pata. Fir ye Update post Kiya hai aaj, hope you guys will like it![]()