Update:-18(C)
हेलीकॉप्टर सीधा उदयपुर के किसी एक होटल के हेलीपैड पर उतरी। आरव की लाश के साथ दोनों बाहर अा गए और हेलीकॉप्टर पुनः उड़ चली। उस जगह पर पहले से कुछ लोग इंतजार कर रहे थे। वो लोग जमील और पैसों के बैग के साथ लेकर निकल गए और वीरभद्र को लाश ठिकाने लगा कर घर लौट जाने के लिए बोल दिया।
वीरभद्र, आरव को हिलाते हुए कहा.. उठ जाओ भाईजी। आरव उठकर जल्दी से अपना एयरपोड कान में लगाया.. और कान में लगाते ही अपस्यु ने उसे जो सुनाया। मामला ये नहीं था कि आरव ने अपस्यु से बात नहीं की, बल्कि उसने सारी डिवाइस पैक कर के बैग में रख दिया और अपस्यु कुछ भी देख नहीं पा रहा था।
आरव ने सबसे पहले सभी वाचिंग डिवाइस को सक्रिय किया और कपड़े बदलने लगा। एक एयरपोड अपने कान में डाला और दूसरा वीरभद्र को दे दिया। अब तीनों एक ही लाइन पर कनेक्ट थे।
अपस्यु:- आरव कितना अम्मिनेशन है तुम्हारे पास।
आरव:- 4 मैग्जीन पिस्तौल के और 12 मैग्जीन स्नाइपर के।
अपस्यु:- ठीक है, अपनी स्नाइपर वीरभद्र को देदो और तुम पिस्तौल और खंजर से लैस हो जाओ। वीरे तुम्हे मैं जहां बताऊंगा वहां जाकर पोजीशन लेे लेना और आरव को बैकअप देना। आरव तुम छिपो ऊपर कोई अा रहा है।
आरव पानी टंकी के पीछे तुरंत ही छिप गया। ऊपर 2 लोग आए और वीरभद्र से लाश के बारे में पूछने लगे। वीरभद्र ने उन्हें बोल दिया कि लाश ठिकाने लगा दिया है, किंतु उन्हें देखना था कि आखिर लाश कहां ठिकाने लगाए है। वीरभद्र ने छत के नीचे इशारा करते हुए बताया कि लाश यहां है।
दोनों अपने कदम बढ़ाते हुए आगे बढ़े फिर कुछ सोच कर वापस चले गए और जाते-जाते वीरभद्र को अपने घर वापस लौटने के लिए बोल गए। उनके जाते ही आरव बाहर निकला। अपस्यु उन्हें रास्ता बताता गया और वो दोनों उसी के इशारे पर चलते-चलते एक खंडहर हो चुके किले के पास पहुंचे, जो किसी वीराने में थी।
अपस्यु चारो ओर का जायजा लेने के बाद वीरभद्र को दक्षिण दिशा से उस खंडहर के ऊपर चढ़ने का रास्ता बताया और आरव को पश्चिम के ओर से बाहर निकालने वाले रास्ते के पास की दीवार के पीछे जाकर छिपने के लिए बोल दिया।
थोड़े ही देर में दोनो अपनी अपनी जगह लेे चुके थे। इधर अंदर मुन्ना की लाश नीचे परी हुई थी और वहां पूरे 20 लोग थे, जिसमे जमील और भूषण भी था। अपस्यु दोनों को अपना पोजिशन होल्ड करने और आरव को स्मोक बॉम्ब निकाल कर तैयार रहने के लिए कहा।
अपस्यु अंदर के माहौल को थोड़ा नजदीक से समझने की कोशिश करने लगा। कुछ ही देर में उनकी आवाज़ भी आनी शुरू हो गई जिसे तीनों सुन सकते थे।
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अंदर भूषण कह रहा था… "जमील कैसे कैसे गद्दार तूने पाल रखे थे, ये तो सारा पैसा लेकर हमे ही टपकाने चला था"
जमील:- क्या वो वीरभद्र भी इसके साथ मिला होगा?
भूषण:-पता नहीं, लेकिन यदि मिला होगा तो उसे भी इसी के पास पहुंचा देंगे। आज से मुन्ना की जगह इस रफीक को देदे। आखिर इसी ने तो सारी सच्चाई बताई है और हां साथ में 2 करोड़ भी दे देना इनका इनाम।
जमील:- नेता जी । इसे साथ रखने में खतरा है। साला पूरा एडा है, ये सीधा मारना जानता है सफाई से काम करना नहीं।
भूषण:- तो काम सिखाओ इसे। आखिर इसने अपनी वफादारी दिखाई है। सबको ऊपर बढ़ने का हक है।
जमील:- जैसा कहो नेता जी, चलो रे पंटर लोग अपना अपना हिस्सा लेकर जाओ।
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अपस्यु:- आरव अभी वक़्त है, वीरभद्र के शूट करते ही 5 स्मोक बॉम्ब, 4 बॉम्ब चारो कोने और एक बीच में। वीरभद्र सरप्राइज देने का टाइम अा गया, लगभग 30 मीटर की दूरी पर है दोनों। पहली गोली भूषण और दूसरी गोली जमील… कोई चूक ना हो और बिना समय लिए दोनों को गोली मारना।… मेरे गिनती खत्म होते ही दोनों एक साथ.. 3… 2… 1… अभी।
वीरभद्र ने बिना समय लिए पहली गोली चला दी, और सीधे जाकर लगी भूषण के सीने में… भूषण और जमील बात कर ही रहे थे और इसी बीच भूषण को गोली सीधा उसके सीने में लगी। इससे पहले की जमील को कुछ समझ आता 3 सेकंड के अंतर में दूसरी गोली और जमील के सिर में एक छेद बनाती गोली जमीन में।
वहां मौजूद लोग, इससे पहले कि यहां-वहां देखकर गोली चलाने वाले को ढूंढते, वहां धुआं ही धुआं हो गया था। कुछ समझ में ना आने की स्तिथि में वो लोग अंधाधुन फायरिंग करने लगे। आरव बाहर ही खड़ा था और अंदर की फायरिंग खत्म होने का इंतजार कर रहा था।
इधर वीरभद्र को दिशा मिल रहा था और वो धुएं के अंदर ही एक-एक करके टपकना शुरू कर चुका था। 20 में से 8 लोग मारे जा चुके थे। रफीक बचे लोगों को दीवार कि आड़ में छिपने के लिए जोर से चिल्लाया। …"मादर*** तू जो कोई भी है आज बचके ना जा पायेगा"…
"बचना तो तुझे है, फालतू में इनलोगो के चक्कर में तू भी मारा जाएगा"… आरव जोर से ठहाके लगाकर कहने लगा और जब उसकी आवाज़ बंद हुई उसी के चंद पलों के अंदर, एक दर्दनाक चिंख़ निकली और उसके एक आदमी का गला आरव ने रेत दिया।
उसकी चीख सुनकर एक पंटर बावरा हो कर चिल्लाते हुए उसी ओर भागा जिस ओर से चिल्लाने कि आवाज़ अा रही थी। जैसे ही वो अपने आवरण (कवर) से बाहर आया, अपस्यु ने दिशा बताया और वीरभद्र ने उसकी चीख को मौत की सिसकियों में बदल दिया।
धुवां जब तक छंटा तब उस जगह पर केवल रफीक और उसका 2 साथी बचा था जो दीवार कि आड़ लिए अपनी जान बचा रहा था। आरव उस जगह के बिल्कुल मध्य में खड़ा होकर ललकारने लगा…. "क्या हुआ बे बच्चे, मूत तो ना निकल गई"..
रफीक:- साला इतना ही बड़ा मर्द है तो…. (इतना कहते वक़्त उसने अपने एक आदमी को इशारों में दीवार से छिपकर ही थोड़ा आगे जाकर बाहर निकालने वाले रास्ते तक पहुंचने का इशारा किया)… अपने उस स्निपर को ….
अभी इतना ही कह रहा था कि इशारा मिलने पर जो आदमी रेंगता हुआ बाहर निकालने वाले रास्ते के ओर जा रहा था उसका हाथ थोड़ा दिखा और वीरभद्र ने ऐसी गोली मेरी की वो चिल्लाने लगा।
आरव:- देख बेटा ये तो चीटिंग है। या तो तू बात कर ले या यहां से भाग ले।
रफीक:- अच्छा सुन मेरे पास तेरे लिए एक बंपर ऑफर है।
आरव जहां था वहीं बैठते हुए….. "ठीक है बोल मैं सुन रहा हूं"
रफीक:- यहां पर बहुत सारे डॉलर परे हुए हैं। तूने ज्यादा से ज्यादा कितने की सुपारी ली होगी, 10 करोड़ की। यहां पर 100 करोड़ से भी ऊपर है। पूरा तेरा बस उसमे से कुछ मुझे देदेना।
आरव:- चल ठीक है डील मंजूर। तू और बचा हुए तेरा एक साथी, बिना हथियार के बाहर अा..…
रफीक:- ना मैं नहीं आऊंगा कहीं तेरा शूटर ने मुझे गोली मार दी तो।
आरव:- फिर क्या करे रफीक बेटा, तू ही बता दे।
रफीक:- तू ही अा जा मेरे पास, देख हमदोनो ने अपने हथियार तेरे ओर फेंक दिए।
आरव हंसते हुए "चल ठीक है कहा"… और क़दमों की थाप धीरे-धीरे रफीक के ओर बढ़ने लगी। जैसे ही रफीक को लगा कि आरव दीवार के किनारे पर पहुंच चुका है वो और उसका आदमी, अपना गन ताने बाहर आया.. और तभी गोली चली। एक ही सेकंड के अंदर, रफीक और उसका साथी ढेर। दरअसल जो आगे जा रहा था वो वीरभद्र था और आरव पीछे खड़ा बस उनके बाहर निकालने का इंतजार कर रहा था।
आरव टूट कर जैसे चुड़ हो चुका था। उसने वीरभद्र को सबकी गिनती करने बोल दिया और साथ में यह भी की किसी में अगर जान बाकी है तो बेजान कर दे। आरव जहां था वहीं पहले लड़खड़ा कर बैठ गया। उसकी हालत ऐसी थी मानो अंदर कोई जान ना बचा हो। फिर धीरे-धीरे उसका बदन बेजान सा हो कर जमीन पर गिर गया।
दोनों बाहें फैलाए उसने अपनी आंखें मूंद ली और आशुओं की एक धारा चेहरे पर एक रेखा बनाती, धीरे-धीरे टपकने लगी। शायद जो इस वक़्त आरव मेहसूस कर रहा था वहीं अपस्यु भी। वो भी अपने बिस्तर पर लेटा-लेटा अपनी आखें मुंदे बस आशुओं की एक धारा बहा रहा था।