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Continued....
निधि को टू-पीस ब्रा पैंटी में देखने के बाद से दीपक की आंखों के सामने सिर्फ उसका ही चित्र उभर आता था। उसकी अधनंगी देह को याद करते हुए जटका मारने की श्रृंखला जारी रखते हुए वह थक चुका था। जितनी भी कोशिश करता, उसके मन में मिटने न देने वाली छाप छोड़कर अपनी छाप जमा चुकी निधि की अधनंगता हर पल उसे उसके नाम पर जटका मारने के लिए प्रेरित करती रहती थी। इसके साथ ही निधि की प्रकृति प्रदत्त सौंदर्य की खान जैसी सफेद गोल कूल्हों को पूरी तरह नंगे देखने वाले वे दोनों घटिया व्यक्तित्व वाले बूढ़े इस लोक की यात्रा समाप्त करके चले गए थे और उनका अंतिम संस्कार पूरा हो चुका था। निधि ने अनजाने में ही अपने घर की लड़कियों को काम की दृष्टि से देखने वाले उन दोनों बूढ़ों को भी मुक्ति दे दी थी।
मैसूर सिल्क कारखाने में लाखों रुपये की साड़ियां...रेशमी धोती...वल्ली खरीदकर लॉज लौटे तो......
निकिता......आंटी, ये क्या है इतने सारे बैग? आप सब शॉपिंग गए थे क्या?
प्रीति......हमारे साथ तुम सबके लिए आने वाले गौरी उत्सव के लिए मैसूर सिल्क साड़ियां लाए हैं। साड़ी पहनोगी ना?
नमिता......आंटी, दीदी को साड़ी पहनना बहुत पसंद है, लेकिन मुझे पहनना भी नहीं आता।
रश्मि.....हां मम्मा, मुझे भी साड़ी पहनना नहीं आता।
नीतु.....हम इसीलिए हैं ना मम्मा, तुम सबको साड़ी पहनना सिखा देंगे, ठीक है?
नयन.......आंटी, पहले बेंगलुरु में निधि दीदी और निकिता दीदी ही शॉपिंग गई थीं, अब यहां भी आप हमें छोड़कर चले गए। हमें कोई शॉपिंग पर नहीं ले जाता।
हरीश......नाराज मत हो, कल शाम को ही तुम सबको शॉपिंग ले जाने की जिम्मेदारी मेरी है। तू क्यों उदास है?
सुरेश.....और क्या अप्पा, मेरे भैय्या को कोई पूछता ही नहीं। सारी लड़कियों के लिए ही, हम दोनों के लिए एक-दो पैंट और दो शर्ट ला दिए तो काम खत्म।
रेवंत हंसते हुए......सुरेश, कल तुम्हारे अप्पा इन्हें अपने साथ ले जाएं, मैं, तू और गिरीश चलेंगे।
सुरेश खुश होकर......ओके मामा।
नीतु.....निधि—दृष्टि दिखाई नहीं दे रही।
रश्मि.....मम्मा, दीदी और दृष्टि दोनों सो रही हैं।
प्रीति....तुम सब जाकर रेस्ट करो, शाम को के.आर.एस.।
शाम को सब विश्वप्रसिद्ध वृंदावन गार्डन्स घूमने गए और वहां के अद्भुत दृश्यों को आंखें भरकर निहार रहे थे। निशा सबसे ज्यादा शोर मचाती हुई फुल मस्ती में थी तो दंपति बेटी की खुशी देखकर खुद भी खुश हो रहे थे। वहां से मैसूर लौटकर एक सुप्रसिद्ध रेस्तरां में घुसे तो......
दृष्टि.....दीदी, पहले चाट्स मंगवाएं?
निधि....मुझे इन चाट्स के बारे में कुछ पता नहीं, कुछ नाम सुन रखे हैं बस, लेकिन अब तक खाए नहीं।
सुरेश.....दीदी, मुझे पता है मसालापुरी...पानीपुरी, मुझे तो मसालापुरी ही मंगवा दो।
नयन......बंदर, सिर्फ मसालापुरी ही पता है क्या? कितनी वैरायटी की चाट्स होती हैं, पता है?
सुरेश.....मुझे वो सब नहीं पता, मैंने तो सिर्फ मसालापुरी....पानीपुरी ही खाई हैं।
बड़ी बेटी और छोटे बेटे की बात सुनकर नीतु की आंखों से दो बूंद आंसू निकल आए, तुरंत पोंछ लिए, फिर भी हरीश ने पत्नी के आंसू नोटिस करके भी चुप रहा।
प्रीति......अब हर तरह की चाट्स एक-एक करके मंगवाते हैं, सब टेस्ट करके जिसे जो पसंद आए वही उसे मंगवाएंगे। हमारे गांव में ये सब मिलता है, कहां मिलता है मैं दिखा दूंगी, ओके।
बच्चे सब चाट्स चखते हुए अपनी पसंद वाली बार-बार मंगवा रहे थे। मम्मा की गोद में बैठी निशा अपनी आंखों को जो पसंद आता सिर्फ वही मम्मा से खिलाती रही, कोई और चीज सामने रखने पर मुंह इधर-उधर घुमाकर मना कर देती।
रूम में बेटी को सुलाकर उसके पास बैठी पत्नी के गाल सहलाते हुए......
हरीश......रेस्तरां में तेरी आंखों से आंसू क्यों आए थे?
नीतु पति की तरफ देखकर......आपने सुना नहीं? निधि छोटी उम्र से ही आश्रम के जीवन में रही, इसलिए उसे इन चाट्स के बारे में पता नहीं। लेकिन सुरेश हमारे साथ रहते हुए भी हमने उसे कभी कोई नई तरह का नाश्ता-खाने की चीजें नहीं खिलाईं। उसने कहा “मैंने तो सिर्फ मसालापुरी ही खाई है, बाकी के बारे में कुछ नहीं पता” तो मुझे कितना दुख हुआ, पता है?
हरीश......हां, पैसे में हम आराम से थे फिर भी बच्चों के लिए कुछ नहीं किया। लेकिन आगे ऐसा नहीं होगा। जीवन में वे जो इच्छा करें वही करें। उनका चुना रास्ता सही है या गलत, सिर्फ इतना ध्यान रखें और उनका सहारा बनकर खड़े रहें। अब चिंता छोड़कर सो जा, पुरानी बातें सोच-सोचकर दुखी मत हो।
नीतु......आप भी सो जाओ, कल तुम्हारी यह चिन्नू हम सबको खूब सर्कस करवाएगी।
अगले दिन नाश्ता करके सब चिड़ियाघर गए तो अप्पा की बाहों में बैठी निशा भैय्या-दीदियों के साथ शैतानी करती हुई हंस रही थी। पहले एक्वेरियम के अंदर कई रंग-बिरंगी मछलियां देखकर बहुत हैरान हुई निशा अप्पा से अपनी-अपनी सवाल पूछती हुई कुतूहल से उन्हें देख रही थी।
गिरीश....मम्मा, क्या हम घर में भी एक एक्वेरियम लाकर रख सकते हैं?
दृष्टि.....हां आंटी, छोटा ही सही, एक ले आएं, मुझे भी बहुत इच्छा है।
नीतु......ठीक है, तुम्हें जो पसंद हो वही ले लेना, लेकिन सफाई भी तुम्हें ही करनी होगी।
रश्मि.....ओके मम्मा, हम सब मिलकर करेंगे।
एक्वेरियम देखकर वहां से आगे कई तरह के पक्षी देखने के बाद पांच मोरों वाले जगह पर आकर रुके। कोई वन अधिकारी अपने दोनों बड़े बच्चों को मोरों के पास खड़ा करके फोटो खींच रहा था तो निशा अप्पा के गाल सहलाते हुए......
निशा....पप्पा, मैं वहां जाऊंगी....कहकर मोर की तरफ उंगली दिखाई।
हरीश....नहीं कंद, वहां नहीं जाना, यहां जानवरों को छूना मना है, गलती से अंकल डांटेंगे।
निशा सिर हिलाते हुए......मैं जाऊंगी पप्पा, मुझे डांटेंगे....
हरीश.....हां कंद, नहीं जाना, यहीं से देख।
अप्पा की बात से निशा उदास हो गई लेकिन मोरों को देखकर “आ...आ..” कहकर बुला रही थी, जिसे उनके बगल में खड़े दंपति ने नोटिस किया।
महिला.....तू भी मोर के पास जाना चाहती है पुट्टी? तेरा नाम क्या है?
निशा उनकी तरफ मुड़कर हां नहीं कहकर सिर हिलाई और मोर की तरफ उंगली दिखाते हुए......मैं नहीं जाऊंगी, मुझे डांटेंगे.... कहने पर उस महिला के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
पुरुष......आ पुट्टी, मैं तुझे ले चलता हूं।
हरीश......सर, बेवजह आपको परेशानी, चिड़ियाघर के अंदर किसी भी जानवर के पास जाना मना है। इसे कोई भी जानवर-पक्षी दिख जाए तो उनके पास जाना चाहती है।
वह व्यक्ति हंसते हुए......सर, आपने तो अपने दोनों बच्चों को मोर के पास ले जा रखा है।
हरीश......सर, वे वन अधिकारी लगते हैं।
व्यक्ति......मेरा नाम प्रवीण है, मैं भी इसी वन विभाग में उच्च अधिकारी हूं। चिंता मत करो, आ पुट्टी, हम चलते हैं।
निशा अप्पा की तरफ देखी, उसने हां कहा तो उस व्यक्ति का हाथ पकड़कर मोरों की तरफ कदम बढ़ाया। थोड़ी दूर खड़ी नीतु पति के पास आई और क्या कहा तो हरीश की जगह......
महिला......तुम्हारी बेटी बहुत प्यारी है मम्मा, चिंता मत करो, मेरे पति भी वन अधिकारी हैं, तुम्हारी बेटी को मोरों के पास ले जा रहे हैं। मेरा नाम वैष्णवी है।
नीतु.....नमस्ते मैडम, मैं नीतु, मेरे पति हरीश सरकारी हाईस्कूल में अध्यापक हैं। यह छोटी बेटी निशा, पता नहीं क्यों, इसे जानवर-पक्षी दिख जाएं तो कोई आकर्षण सा हो जाता है। घर में भी कुत्ता...तोता...गौरैया और कुछ बंदर ही इसके फ्रेंड्स हैं, सबको साथ मिलाकर ही यह खेलती है।
निधि पास आकर......मम्मा, देखो चिन्नू मोरों को अपना फ्रेंड बना रही है।
वन अधिकारी प्रवीण के साथ मोरों के पास गई निशा उनके गले सहलाते हुए अपनी भाषा में बातें कर रही थी तो मोरों को भी उसकी बात समझ आ गई हो जैसे चोंच से हल्के से निशा के हाथ को छूकर अपना परिचय दे रहे थे। पांचों मोर निशा को घेरकर अपने पंख फैलाकर अपनी खुशी जताते हुए नाचने लगे तो खुश होकर निशा ताली बजाती हुई खुद भी मोरों के साथ नाचने लगी। गिरीश...रश्मि...निकिता और रेवंत अपने-अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर रहे थे तो चिड़ियाघर देखने आए लोग समूह बनाकर मोरों का नृत्य देखने जुट गए। सब इस दुर्लभ दृश्य को मोबाइल में कैद कर रहे थे। आसपास नाचते मोरों को देखती निशा की खुशी का ठिकाना न रहा, मम्मा-अप्पा को बुला-बुलाकर मोर दिखाती हुई कूद रही थी। पांच-छह मिनट नाचने के बाद मोरों ने निशा के हाथ पर चोंच से हल्के से छुआ तो उनके गले सहलाकर टाटा करके निशा दौड़कर मम्मा के कंधे पर चढ़ गई।
नीतु.......चिन्नू, मजा आया कंद?
निशा फुल खुशी में.....मम्मा, तोता.....कहकर दोनों हाथ फैलाकर मोर के पंखों जैसे हिलाती हुई खुद भी नाचने लगी।
हरीश.....बहुत थैंक्स सर, मेरी बेटी के चेहरे पर इतनी खुशी लाने के आप ही कारण हैं।
प्रवीण......सर, मैं भी बांदीपुर...नागरहोल आदि जंगलों में सेवा कर चुका हूं, लेकिन आपकी बेटी को देखकर पांचों मोरों ने जिस तरह प्रतिक्रिया दी, बहुत आश्चर्य हुआ। शायद आपकी बेटी में कोई दैवी शक्ति है।
नीतु......सर, पता नहीं, लेकिन कोई भी जानवर हो या पक्षी, इसके साथ बहुत जल्दी दोस्ती और घुल-मिल जाते हैं।
प्रवीण.....बहुत खुशी मैडम, आज चिड़ियाघर देखने आए तो मुझे एक अविस्मरणीय अनुभव मिला।
वहां से आगे शेर...बाघ...हाथी और अन्य जानवरों को भी निशा अपनी भाषा में बुला-बुलाकर उनका ध्यान अपनी तरफ खींच रही थी तो प्रवीण और वैष्णवी दंपति हैरान हो रहे थे।
रेवंत.....प्रवीण सर, यहां के जानवरों को हम गोद ले सकते हैं क्या, पूछा था कैसे सर?
प्रवीण.....एक साल तक उनके खाने और देखभाल का खर्च उठाकर आप भी जानवरों को गोद ले सकते हैं। चलिए ऑफिस में यहां के अधिकारियों से आपका परिचय करा देता हूं।
शाम को गेट बंद होने तक चिड़ियाघर में रहे, कुछ जानवरों को बच्चों के नाम पर गोद लेने के लिए पैसे जमा करके बाहर आए तो प्रीति आंटी की बाहों में बैठी निशा अपनी खुशी को अपने अंदाज में बयान कर रही थी।
वैष्णवी......नीतु, आप सबसे परिचय हुआ हमें बहुत खुशी हुई। आप बेंगलुरु आएं तो जरूर हमारे घर आना।
प्रवीण.....हां मिस्टर हरीश, जरूर आइएगा।
हरीश.....आएंगे सर, आप भी कामाक्षीपुर में हमारे घर अतिथि बनकर आएं तो खुशी होगी।
उनसे विदा लेने से पहले फोन नंबर लेकर निशा को प्यार किया दंपति और वहां से चले गए। निशा दोनों को चुंबन देकर टाटा बोली और भैय्या-दीदियों ने चिड़ियाघर के अंदर लिए फोटो-वीडियो देखती हुई फुल खुश हो रही थी। होटल जाकर फ्रेश होने के बाद सब मैसूर पैलेस घूमकर शॉपिंग के लिए निकल पड़े।
निधि को टू-पीस ब्रा पैंटी में देखने के बाद से दीपक की आंखों के सामने सिर्फ उसका ही चित्र उभर आता था। उसकी अधनंगी देह को याद करते हुए जटका मारने की श्रृंखला जारी रखते हुए वह थक चुका था। जितनी भी कोशिश करता, उसके मन में मिटने न देने वाली छाप छोड़कर अपनी छाप जमा चुकी निधि की अधनंगता हर पल उसे उसके नाम पर जटका मारने के लिए प्रेरित करती रहती थी। इसके साथ ही निधि की प्रकृति प्रदत्त सौंदर्य की खान जैसी सफेद गोल कूल्हों को पूरी तरह नंगे देखने वाले वे दोनों घटिया व्यक्तित्व वाले बूढ़े इस लोक की यात्रा समाप्त करके चले गए थे और उनका अंतिम संस्कार पूरा हो चुका था। निधि ने अनजाने में ही अपने घर की लड़कियों को काम की दृष्टि से देखने वाले उन दोनों बूढ़ों को भी मुक्ति दे दी थी।
मैसूर सिल्क कारखाने में लाखों रुपये की साड़ियां...रेशमी धोती...वल्ली खरीदकर लॉज लौटे तो......
निकिता......आंटी, ये क्या है इतने सारे बैग? आप सब शॉपिंग गए थे क्या?
प्रीति......हमारे साथ तुम सबके लिए आने वाले गौरी उत्सव के लिए मैसूर सिल्क साड़ियां लाए हैं। साड़ी पहनोगी ना?
नमिता......आंटी, दीदी को साड़ी पहनना बहुत पसंद है, लेकिन मुझे पहनना भी नहीं आता।
रश्मि.....हां मम्मा, मुझे भी साड़ी पहनना नहीं आता।
नीतु.....हम इसीलिए हैं ना मम्मा, तुम सबको साड़ी पहनना सिखा देंगे, ठीक है?
नयन.......आंटी, पहले बेंगलुरु में निधि दीदी और निकिता दीदी ही शॉपिंग गई थीं, अब यहां भी आप हमें छोड़कर चले गए। हमें कोई शॉपिंग पर नहीं ले जाता।
हरीश......नाराज मत हो, कल शाम को ही तुम सबको शॉपिंग ले जाने की जिम्मेदारी मेरी है। तू क्यों उदास है?
सुरेश.....और क्या अप्पा, मेरे भैय्या को कोई पूछता ही नहीं। सारी लड़कियों के लिए ही, हम दोनों के लिए एक-दो पैंट और दो शर्ट ला दिए तो काम खत्म।
रेवंत हंसते हुए......सुरेश, कल तुम्हारे अप्पा इन्हें अपने साथ ले जाएं, मैं, तू और गिरीश चलेंगे।
सुरेश खुश होकर......ओके मामा।
नीतु.....निधि—दृष्टि दिखाई नहीं दे रही।
रश्मि.....मम्मा, दीदी और दृष्टि दोनों सो रही हैं।
प्रीति....तुम सब जाकर रेस्ट करो, शाम को के.आर.एस.।
शाम को सब विश्वप्रसिद्ध वृंदावन गार्डन्स घूमने गए और वहां के अद्भुत दृश्यों को आंखें भरकर निहार रहे थे। निशा सबसे ज्यादा शोर मचाती हुई फुल मस्ती में थी तो दंपति बेटी की खुशी देखकर खुद भी खुश हो रहे थे। वहां से मैसूर लौटकर एक सुप्रसिद्ध रेस्तरां में घुसे तो......
दृष्टि.....दीदी, पहले चाट्स मंगवाएं?
निधि....मुझे इन चाट्स के बारे में कुछ पता नहीं, कुछ नाम सुन रखे हैं बस, लेकिन अब तक खाए नहीं।
सुरेश.....दीदी, मुझे पता है मसालापुरी...पानीपुरी, मुझे तो मसालापुरी ही मंगवा दो।
नयन......बंदर, सिर्फ मसालापुरी ही पता है क्या? कितनी वैरायटी की चाट्स होती हैं, पता है?
सुरेश.....मुझे वो सब नहीं पता, मैंने तो सिर्फ मसालापुरी....पानीपुरी ही खाई हैं।
बड़ी बेटी और छोटे बेटे की बात सुनकर नीतु की आंखों से दो बूंद आंसू निकल आए, तुरंत पोंछ लिए, फिर भी हरीश ने पत्नी के आंसू नोटिस करके भी चुप रहा।
प्रीति......अब हर तरह की चाट्स एक-एक करके मंगवाते हैं, सब टेस्ट करके जिसे जो पसंद आए वही उसे मंगवाएंगे। हमारे गांव में ये सब मिलता है, कहां मिलता है मैं दिखा दूंगी, ओके।
बच्चे सब चाट्स चखते हुए अपनी पसंद वाली बार-बार मंगवा रहे थे। मम्मा की गोद में बैठी निशा अपनी आंखों को जो पसंद आता सिर्फ वही मम्मा से खिलाती रही, कोई और चीज सामने रखने पर मुंह इधर-उधर घुमाकर मना कर देती।
रूम में बेटी को सुलाकर उसके पास बैठी पत्नी के गाल सहलाते हुए......
हरीश......रेस्तरां में तेरी आंखों से आंसू क्यों आए थे?
नीतु पति की तरफ देखकर......आपने सुना नहीं? निधि छोटी उम्र से ही आश्रम के जीवन में रही, इसलिए उसे इन चाट्स के बारे में पता नहीं। लेकिन सुरेश हमारे साथ रहते हुए भी हमने उसे कभी कोई नई तरह का नाश्ता-खाने की चीजें नहीं खिलाईं। उसने कहा “मैंने तो सिर्फ मसालापुरी ही खाई है, बाकी के बारे में कुछ नहीं पता” तो मुझे कितना दुख हुआ, पता है?
हरीश......हां, पैसे में हम आराम से थे फिर भी बच्चों के लिए कुछ नहीं किया। लेकिन आगे ऐसा नहीं होगा। जीवन में वे जो इच्छा करें वही करें। उनका चुना रास्ता सही है या गलत, सिर्फ इतना ध्यान रखें और उनका सहारा बनकर खड़े रहें। अब चिंता छोड़कर सो जा, पुरानी बातें सोच-सोचकर दुखी मत हो।
नीतु......आप भी सो जाओ, कल तुम्हारी यह चिन्नू हम सबको खूब सर्कस करवाएगी।
अगले दिन नाश्ता करके सब चिड़ियाघर गए तो अप्पा की बाहों में बैठी निशा भैय्या-दीदियों के साथ शैतानी करती हुई हंस रही थी। पहले एक्वेरियम के अंदर कई रंग-बिरंगी मछलियां देखकर बहुत हैरान हुई निशा अप्पा से अपनी-अपनी सवाल पूछती हुई कुतूहल से उन्हें देख रही थी।
गिरीश....मम्मा, क्या हम घर में भी एक एक्वेरियम लाकर रख सकते हैं?
दृष्टि.....हां आंटी, छोटा ही सही, एक ले आएं, मुझे भी बहुत इच्छा है।
नीतु......ठीक है, तुम्हें जो पसंद हो वही ले लेना, लेकिन सफाई भी तुम्हें ही करनी होगी।
रश्मि.....ओके मम्मा, हम सब मिलकर करेंगे।
एक्वेरियम देखकर वहां से आगे कई तरह के पक्षी देखने के बाद पांच मोरों वाले जगह पर आकर रुके। कोई वन अधिकारी अपने दोनों बड़े बच्चों को मोरों के पास खड़ा करके फोटो खींच रहा था तो निशा अप्पा के गाल सहलाते हुए......
निशा....पप्पा, मैं वहां जाऊंगी....कहकर मोर की तरफ उंगली दिखाई।
हरीश....नहीं कंद, वहां नहीं जाना, यहां जानवरों को छूना मना है, गलती से अंकल डांटेंगे।
निशा सिर हिलाते हुए......मैं जाऊंगी पप्पा, मुझे डांटेंगे....
हरीश.....हां कंद, नहीं जाना, यहीं से देख।
अप्पा की बात से निशा उदास हो गई लेकिन मोरों को देखकर “आ...आ..” कहकर बुला रही थी, जिसे उनके बगल में खड़े दंपति ने नोटिस किया।
महिला.....तू भी मोर के पास जाना चाहती है पुट्टी? तेरा नाम क्या है?
निशा उनकी तरफ मुड़कर हां नहीं कहकर सिर हिलाई और मोर की तरफ उंगली दिखाते हुए......मैं नहीं जाऊंगी, मुझे डांटेंगे.... कहने पर उस महिला के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
पुरुष......आ पुट्टी, मैं तुझे ले चलता हूं।
हरीश......सर, बेवजह आपको परेशानी, चिड़ियाघर के अंदर किसी भी जानवर के पास जाना मना है। इसे कोई भी जानवर-पक्षी दिख जाए तो उनके पास जाना चाहती है।
वह व्यक्ति हंसते हुए......सर, आपने तो अपने दोनों बच्चों को मोर के पास ले जा रखा है।
हरीश......सर, वे वन अधिकारी लगते हैं।
व्यक्ति......मेरा नाम प्रवीण है, मैं भी इसी वन विभाग में उच्च अधिकारी हूं। चिंता मत करो, आ पुट्टी, हम चलते हैं।
निशा अप्पा की तरफ देखी, उसने हां कहा तो उस व्यक्ति का हाथ पकड़कर मोरों की तरफ कदम बढ़ाया। थोड़ी दूर खड़ी नीतु पति के पास आई और क्या कहा तो हरीश की जगह......
महिला......तुम्हारी बेटी बहुत प्यारी है मम्मा, चिंता मत करो, मेरे पति भी वन अधिकारी हैं, तुम्हारी बेटी को मोरों के पास ले जा रहे हैं। मेरा नाम वैष्णवी है।
नीतु.....नमस्ते मैडम, मैं नीतु, मेरे पति हरीश सरकारी हाईस्कूल में अध्यापक हैं। यह छोटी बेटी निशा, पता नहीं क्यों, इसे जानवर-पक्षी दिख जाएं तो कोई आकर्षण सा हो जाता है। घर में भी कुत्ता...तोता...गौरैया और कुछ बंदर ही इसके फ्रेंड्स हैं, सबको साथ मिलाकर ही यह खेलती है।
निधि पास आकर......मम्मा, देखो चिन्नू मोरों को अपना फ्रेंड बना रही है।
वन अधिकारी प्रवीण के साथ मोरों के पास गई निशा उनके गले सहलाते हुए अपनी भाषा में बातें कर रही थी तो मोरों को भी उसकी बात समझ आ गई हो जैसे चोंच से हल्के से निशा के हाथ को छूकर अपना परिचय दे रहे थे। पांचों मोर निशा को घेरकर अपने पंख फैलाकर अपनी खुशी जताते हुए नाचने लगे तो खुश होकर निशा ताली बजाती हुई खुद भी मोरों के साथ नाचने लगी। गिरीश...रश्मि...निकिता और रेवंत अपने-अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर रहे थे तो चिड़ियाघर देखने आए लोग समूह बनाकर मोरों का नृत्य देखने जुट गए। सब इस दुर्लभ दृश्य को मोबाइल में कैद कर रहे थे। आसपास नाचते मोरों को देखती निशा की खुशी का ठिकाना न रहा, मम्मा-अप्पा को बुला-बुलाकर मोर दिखाती हुई कूद रही थी। पांच-छह मिनट नाचने के बाद मोरों ने निशा के हाथ पर चोंच से हल्के से छुआ तो उनके गले सहलाकर टाटा करके निशा दौड़कर मम्मा के कंधे पर चढ़ गई।
नीतु.......चिन्नू, मजा आया कंद?
निशा फुल खुशी में.....मम्मा, तोता.....कहकर दोनों हाथ फैलाकर मोर के पंखों जैसे हिलाती हुई खुद भी नाचने लगी।
हरीश.....बहुत थैंक्स सर, मेरी बेटी के चेहरे पर इतनी खुशी लाने के आप ही कारण हैं।
प्रवीण......सर, मैं भी बांदीपुर...नागरहोल आदि जंगलों में सेवा कर चुका हूं, लेकिन आपकी बेटी को देखकर पांचों मोरों ने जिस तरह प्रतिक्रिया दी, बहुत आश्चर्य हुआ। शायद आपकी बेटी में कोई दैवी शक्ति है।
नीतु......सर, पता नहीं, लेकिन कोई भी जानवर हो या पक्षी, इसके साथ बहुत जल्दी दोस्ती और घुल-मिल जाते हैं।
प्रवीण.....बहुत खुशी मैडम, आज चिड़ियाघर देखने आए तो मुझे एक अविस्मरणीय अनुभव मिला।
वहां से आगे शेर...बाघ...हाथी और अन्य जानवरों को भी निशा अपनी भाषा में बुला-बुलाकर उनका ध्यान अपनी तरफ खींच रही थी तो प्रवीण और वैष्णवी दंपति हैरान हो रहे थे।
रेवंत.....प्रवीण सर, यहां के जानवरों को हम गोद ले सकते हैं क्या, पूछा था कैसे सर?
प्रवीण.....एक साल तक उनके खाने और देखभाल का खर्च उठाकर आप भी जानवरों को गोद ले सकते हैं। चलिए ऑफिस में यहां के अधिकारियों से आपका परिचय करा देता हूं।
शाम को गेट बंद होने तक चिड़ियाघर में रहे, कुछ जानवरों को बच्चों के नाम पर गोद लेने के लिए पैसे जमा करके बाहर आए तो प्रीति आंटी की बाहों में बैठी निशा अपनी खुशी को अपने अंदाज में बयान कर रही थी।
वैष्णवी......नीतु, आप सबसे परिचय हुआ हमें बहुत खुशी हुई। आप बेंगलुरु आएं तो जरूर हमारे घर आना।
प्रवीण.....हां मिस्टर हरीश, जरूर आइएगा।
हरीश.....आएंगे सर, आप भी कामाक्षीपुर में हमारे घर अतिथि बनकर आएं तो खुशी होगी।
उनसे विदा लेने से पहले फोन नंबर लेकर निशा को प्यार किया दंपति और वहां से चले गए। निशा दोनों को चुंबन देकर टाटा बोली और भैय्या-दीदियों ने चिड़ियाघर के अंदर लिए फोटो-वीडियो देखती हुई फुल खुश हो रही थी। होटल जाकर फ्रेश होने के बाद सब मैसूर पैलेस घूमकर शॉपिंग के लिए निकल पड़े।