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Fantasy देवत्व - एक संघर्ष गाथा

jaggi57

Abhinav
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Itni achchi story kaafi samay se band padi thi...................Kaafi samay baad is thread par update aaya he................umeed he aage chalkar updates regular rahenge

Keep posting Bhai
बहुत-बहुत धन्यवाद भाई , साथ देने के लिए
हां कुछ कारणों से कहानी का लेखन बंद कर दिया था , अब प्रयत्न करूंगा कि यह कहानी सुचारू रूप से चलती रहे, धन्यवाद 🙏🌹🌹
 
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jaggi57

Abhinav
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fantastic update bhai

very nice update bhai

very nice update bhai

fantastic update bhai

fantastic update bhai

Awesome update bhai

Very nice update bhai
Thankuu soo much , Ashish bhai for your vauable support & comments 🙏🌹🌹
 
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jaggi57

Abhinav
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Update - 13

आकाशवाणी द्वारा उन्हें पता चल गया था के यह बालक उन सब का पुत्र है देवराज इंद्र ने उस बालक को इशारे से अपनी और बुलाया, देवराज इंद्र का इशारा पाते ही वह बालक धीरे-धीरे उनकी और पहुंचा और देवराज इंद्र के चरणों में प्रणाम किया।


अपने चरणों में प्रणाम करते हुए उस बालक को देखकर देवराज ने स्नेह से अपना हाथ उसके सिर पर रखा एक बालक के सिर पर हाथ रखते ही देवराज इंद्र के नेत्रों के आगे उस बालक की उत्पत्ति के संपूर्ण रहस्य उजागर हो गए।

अब आगे -------

देवराज का स्नेह से भरा हुआ अपने मस्तक पर स्पर्श पाकर वह बालक अभिभूत हो गया सभी देवताओं को आदर पूर्वक प्रणाम करते हुए वह बालक बोला

बालक - आप सभी के चरणों में मेरा प्रणाम हैं। आकाशवाणी द्वारा मुझे इतना तो ज्ञात हो गया कि मेरी उत्पत्ति आप सभी से हुई है , इसलिए आप सभी मेरे लिए पिता समान हुए परंतु अभी भी मैं अपने जीवन के लक्ष्य से अनभिज्ञ हूं और मेरा कोई नाम भी नहीं है। इसलिए आप सभी से प्रार्थना है कि कृपया करके मेरे जीवन की उत्पत्ति के रहस्य भेरे प्रति उजागर करें।

इस बालक की मधुर वाणी सुनकर सभी देवता प्रसन्न हुए देवराज इंद्र से बोले

देवराज - हे पुत्र ! तुम्हारी बात यह दर्शाती है फिर तुम अद्भुत गुणों से संपन्न हो हमें बड़ी प्रसन्नता है कि तुममे अपने जीवन के लक्ष्य को जानने की उत्सुकता है ,और मेरे गजराज को जिस प्रकार से तुमने अपने वश मे किया वह तुम्हारे बल बुद्धि और विवेक को दर्शाता है। तुम वास्तव मे अद्भूत हो ।

इसके पश्चात देवराज ने अनलासुर की तपस्या से लेकर यहां आने का कारण सब कुछ उस बालक से कह सुनाया और कहां

देवराज -- पुत्र तुम्हारा निर्माण हम सभी देवताओं की उर्जा से हुआ है , इसलिए तुम हम सभी के पुत्र हुए ।
तुमने प्रकट होते ही मेरे गजराज ऐरावत को वश में किया जिसे मेरे सिवा कोई नहीं कर सकता इसलिए आज से तुम्हारा नाम होगा-----

--- गजेन्द्र।

सभी देवताओं की सम्मिलित ऊर्जा के द्वारा उसका जन्म और देवराज द्वारा अपने दिए गए नाम " गजेंद्र " को सुनकर बालक सभी के आगे नतमस्तक हो गया उसने देवराज इंद्र के चरणों में प्रणाम किया , देवराज ने भी स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसे आशीर्वाद दिया।

बालक -- स्वयं देवराज द्वारा मेरा नामकरण , यह मेरे लिए अत्यन्त गौरव की बात हैं ।
मै आपके दिये हुए इस नाम को स्वीकार करता हू।
आप सभी मेरे जन्म दाता हो इसलिए मेरे लिए पिता तुल्य हो , मेरे द्वारा पूर्व में की गई धृष्टता के लिए मैं आपसे क्षमा मांगता हूं ।

संसार के प्रत्येक घटनाक्रम के पीछे कोई ना कोई उद्देश्य अथवा कारण तो होता ही है ऐसी परिस्थिति में आप सभी देवताओं की ऊर्जा द्वारा मेरा निर्माण किसी न किसी उद्देश्य की ओर इंगित करता है, मेरे लिए क्या आज्ञा है कृपया मुझे बताएं।

देवराज -- पुत्र मुझे प्रसन्नता हुई है देख कर कि तुममें बुद्धि , बल और ज्ञान के साथ-साथ अपने कर्म के प्रति सजगता भी है।

इस समय संसार में अनलासुर नाम का असुर भयंकर उत्पात मचाए हुए हैं । ब्रह्मा जी के वरदान के कारण ना तो हम देवता और ना ही त्रिदेव मे से कोई उसका वध कर सकता है । उसका वध करके संसार में शांति स्थापित करने के लिए ही तुम्हारा जन्म हुआ है।

देवराज इंद्र के मुख से अपने जीवन का उद्देश्य जानने के पश्चात गजेंद्र को बड़ा आश्चर्य हुआ

गजेंद्र -- ईश्वर ने मुझे ऐसे महान कार्य के लिए चुना है यह मेरे लिए परम गौरव की बात है परंतु मैं अभी युद्ध कला आदि और शक्तियों के प्रयोग से अनभिज्ञ हूं , कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिए। जिससे मैं अपने कार्य में सफल हो सकूं।

देवराज -- इसके लिए तुम्हें तनिक भी चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है वत्स , तुम्हें आगे आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करना हम सब का कार्य है।

तुममें पहले से ही हम सब देवताओं की शक्तियां समाहित है , तुम्हें बस ध्यान योग के द्वारा अपने भीतर उन शक्तियों को खोजना है , तत्पश्चात उनके उपयोग करने की कला का अभ्यास करना होगा जो हम सभी देवता मिलकर करायेंगे।

उसके पश्चात गजेन्द्र का देव गुरु बृहस्पति द्वारा ध्यान योग की शिक्षा और देवराज तथा अन्य देवताओ द्वारा अस्त्र - शस्त्र व शक्तियों के प्रयोग का अभ्यास शुरू हो गया।

देखते ही देखते गजेंद्र इन सब में पारंगत हो गया और उसने बहुत शीघ्र ही अपने भीतर की शक्तियों को अपने नियंत्रण में करना सिख लिया । शस्त्रों के साथ-साथ शक्तियों के प्रयोग की कला भी उसने बड़ी शीघ्रता के साथ सीख ली थी ।

जितनी शीघ्रता से वह सारी विद्याये सीख रहा था उतनी ही शीघ्रता से उसका शरीर भी बदल रहा था 5 हफ्ते के कम समय में ही अब वह 18 साल के , एक बलिष्ठ युवा की भांति लग रहा था। कम समय मे वह पुर्ण रुप से एक योद्धा बन गया था । जिसे देखकर सभी देवता भी बहुत प्रसन्न थे ।

गजेंद्र को पूर्ण रूप से एक योद्धा के रूप में तैयार हुआ देखकर देवराज को विश्वास हो गया कि अब स्वर्ग उनसे ज्यादा दूर नहीं है उन्हें शीघ्र ही अनलासुर पर विजय प्राप्त करने की योजना पर कार्य करना होगा।



ऐसे ही एक दिन जब सभी देवता विश्राम कर रहे थे और गजेंद्र युद्ध अभ्यास कर रहा था । तभी वहां की भूमि में कंपन होने लगा जैसे कोई भूकंप आया हो और वहां उसे किसी की भयंकर गर्जना सुनाई दी।

उस भयंकर गर्जना को सुनकर गजेंद्र ने देवताओं के चारों ओर सुरक्षा कवच का निर्माण कर दिया जिससे उनके विश्राम में कोई व्यवधान ना हो और स्वयं आने वाले अज्ञात शत्रु का सामना करने के लिए सज्ज हो गया।

अभी कुछ ही क्षण हुए थे के उसने देखा एक विशाल दैत्याकार दानव जिसके तीन नेत्र धधकती हुई ज्वालामुखी के समान प्रतीत हो रहे थे , विशाल भुजाएं एवं विशाल शरीर के कारण वह बहुत ही भयावह दिख रहा था वह बारंबार अपने गिरिकंदरा जैसा विशाल मुंह खोलकर भयंकर गर्जना कर रहा था , उसके हाथ में एक विशाल तेज पूर्ण शूल था।

अपनी और बढ़ रहे अद्भुत विशाल दानव को देखकर गजेंद्र को बड़ा भारी विस्मय हुआ।
उस दानव की जैसी दृष्टि गजेंद्र एवं विश्राम करते हुए सभी देवताओं पर पड़ी तो वहीं रुक गया और अपने नेत्र फाड़ कर गजेंद्र को घूरने लगा और वाह ---वाह --- भोजन ,,,,भोजन ,,,इतना सारा भोजन आज तो मै भरपेट खाऊंगा।

अपनी ओर इस प्रकार घूरते हुए देखकर गजेंद्र भी पूर्ण सावधान हो गया और उस दानव के यहां आने का अभिप्राय जानने के लिए बोला---
गजेंद्र - कौन हो तुम अपने विशाल शरीर और अपनी भयंकर गर्जना के द्वारा क्यों यहां के वन्य प्रदेश को तहस-नहस कर रहे हो अपना परिचय दो और हमें देखकर इस प्रकार भोजन भोजन कहकर क्यों चिल्ला रहे हो।

दानव - हे बालक मैं एक ब्रह्मराक्षस हूं और यह समय मेरे भोजन का है । मैं भूखा हूं प्रकृति ने ही यह निर्धारित किया है कि मेरे भोजन काल में जो भी जिव मेरे सामने उपस्थित होगा वह मेरा आहार होगा ।
आज मैं बहुत प्रसन्न हूं क्योंकि आज तुम और यहां विश्राम कर रहे यह सब मेरा आहार बनेंगे आज मुझे पर्याप्त मात्रा में भोजन प्राप्त हो जाएगा मैं तृप्त हो जाऊंगा इसलिए अब मेरा आहार बनने के लिए तैयार हो जाओ।

गजेंद्र - रुको ! जिस प्रकृति की तुम बात कर रहे हो वह प्रकृति बिना कारण ऐसे किसी की हत्या करने का अधिकार किसी को भी नहीं देती इसलिए सीधे-सीधे यहां से चले जाओ अन्यथा भयंकर परिणाम के लिए तैयार रहो, खाने के लिए प्रकृति ने फल कन्द मूल और भी बहुत सी वस्तुओ की व्यवस्था की है , उन्हे खाकर अपनी क्षुधा शांत करो।

ब्रह्मराक्षस - वाह बहुत अच्छे ! तुम रोकोगे मुझे , है तुममें इतना सामर्थ्य ! चलो पहले यही करके देख लेते हैं । मैं तुम्हें पूर्ण अवसर देता हूं अपनी तथा इन लोगों की रक्षा का मेरे लिए भी मनोरंजन हो जाएगा तत्पश्चात तुम सबको तो मेरा आहार बनना ही है । हा हा हा हा -------

गजेंद्र - तुम इस प्रकार नहीं मानोगे तो यह लो परिणाम के लिए तैयार हो जाओ-----

इतना कहकर गजेंद्र ने अपने दोनों हाथ हवा में लहरा कर अपनी उर्जा से एक गोला बनाकर उस ब्रह्मराक्षस पर प्रहार किया जिसे उस ब्रह्मराक्षस ने बड़ी सहजता के साथ किसी गेंद की भांती अपने हाथ में पकड़ लिया और वापस गजेंद्र की और फेंक दिया । अपनी ओर आते हुए अपनी उर्जा के पिंड को देखकर गजेंद्र ने अपना बांया हाथ हवा में लहरा कर उस तेज को वापस अपने भीतर समा लिया।

इस प्रकार इतनी आसानी से शक्ति को रोककर और वापस प्रहार करना देखकर गजेंद्र को ये आभास हो गया कि यह कोई साधारण दानव नहीं है।

गजेंद्र - ( मन में ) यह कोई साधारण दानव नहीं है , मुझे अपनी पूर्ण शक्ति से इस पर वार करना पड़ेगा।
इस बार उसने अग्नि तत्व की उर्जा से एक बड़ा सा अग्नि पिंड बनाकर उस ब्रह्मराक्षस की ओर प्रहार किया परंतु देखते ही देखते उस प्रचंड अग्नि पिंड को उस ब्रह्मराक्षस ने अपने विशाल मुख में समा लिया।

गजेंद्र ने अग्नि तत्व का प्रयोग करते हुए बड़े-बड़े आग के गोलो से प्रहार किया, वायु तत्व का प्रयोग करते हुए बड़े बवंडर अर्थात चक्रवात से भी प्रहार किया, आकाश तत्व की आकाशीय ऊर्जा का भीषण विद्युत प्रहार भी किया , पृथ्वी तत्व से बड़े-बड़े पत्थरों से प्रहार किया, परंतु उस ब्रह्मराक्षस पर सभी व्यर्थ रहा।
गजेंद्र ने क्रमशः वायु तत्व और जल तत्व ऊर्जा से प्रहार किया परंतु वह भी उस ब्रह्मराक्षस के आगे निष्क्रिय हो गया।

ब्रह्मराक्षस - बस इतना ही बल है तुम्हें बच्चे ! तुम्हारा हो गया हो तो अब मैं अपना कार्य करूं, वैसे भी मुझे बहुत भूख लगी है , मुझसे और प्रतिक्षा नही हो रही।

गजेंद्र - अभी कहां ! अभी तो यह शुरुआत है ,
इतना कहकर गजेंद्र ने पंचतत्व की ऊर्जा को अपनी हथेली में एकत्रित किया और अपना दायां हाथ भूमि पर रखकर ब्रह्मराक्षस की ओर देखने लगा और देखते ही देखते भूमि से विशाल तथा मजबूत लताएं निकलकर ब्रह्मराक्षस को जकड़ने लगी । भूमि से निकलती हुई उन बेलो ने ब्रह्मराक्षस को पूरी तरह से जकड़ लिया ।

अब गजेंद्र ने अपनी आंतरिक मारक उर्जा का संचार उन बेलों में कर दिया जिससे वह बेले और मोटी होकर जकड़ने लगी उन बेलो में भयंकर विद्युत प्रभाव होने लगा।
और साथ ही साथ उन बेलो से मोटे मोटे कांटे भी प्रगट होने लगे जो उस ब्रह्मराक्षस के विशाल शरीर के भीतर प्रवेश करने का प्रयत्न करने लगे। उन बेलो के भयंकर मारक विद्युत प्रवाह और कांटो का ब्रह्मराक्षस पर कोई असर ना होता हुआ देखकर गजेंद्र आश्चर्यचकित हुआ ।

गजेंद्र के इतने भयंकर प्रहार जिनका सामना शायद देवता भी ना कर पाए , उन भयंकर प्रहारों से ब्रह्मराक्षस के शरीर पर एक खरोच तक नहीं आई थी, वह ब्रह्मराक्षस गजेंद्र के प्रत्येक प्रहार का प्रतिकार करते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई पिता अपने पुत्र से खेल रहा हो।

ब्रह्मराक्षस - वाह अद्भुत ! मानना पड़ेगा तुम्हें तुम्हारी यह कला तो बड़ी अद्भुत है परंतु तुम्हारे यह सब खेल मुझ पर कोई असर नहीं करने वाले

गजेंद्र - बंध तो तुम चुके ही हो ब्रह्मराक्षस ! अब यदि यहां से जाने का वचन देते हो तो मैं तुम्हें मुक्त कर सकता हूं अन्यथा मुझे तुम पर अपने शास्त्रों का प्रयोग करना पड़ेगा ।

ब्रह्मराक्षस - बच्चे ! तुम्हारे ये घास फूस मुझे बांध नहीं सकते , मैं तो अब तक बस तुम्हारा खेल देख रहा था । इतना कहते ही ब्रह्मराक्षस के शूल से भयंकर अग्नि की लपटें निकलने लगी और उस अग्नि में वह सारी बेले जों ब्रह्मराक्षस को जकड़ी हुई थी सब भस्म हो गई ।

अब ब्रह्मराक्षस ने भी अपनी उर्जा से प्रहार करना शुरू कर दिया गजेंद्र ने उस प्रहार से बचने के लिए अपने दोनों हाथ आगे करके एक रक्षा कवच का निर्माण किया परंतु फिर भी ब्रह्मराक्षस की उर्जा के प्रभाव से वह पीछे कुछ दूर तक घसीटते हुआ चला गया ।

अब दोनों ओर से ऊर्जा के प्रहार होने लगे , गजेंद्र ने देवताओं से प्राप्त शस्त्रों का भी प्रयोग किया जीसे उस ब्रह्मराक्षस ने अपने शूल से बड़ी ही सरलता के साथ रोक दिया ।

अब तक के युद्ध में गजेंद्र इतना तो जान गया था कि यह कोई साधारण ब्रह्मराक्षस नही यह कोई दिव्य पुरुष है , जो उसकी परीक्षा लेने के लिए आया हुआ है । क्योंकि अब तक के युद्ध में वह इतना तो जान गया था के ब्रह्मराक्षस ने उस पर अब तक कोई भी प्राणघातक वार नहीं किया था, जैसे मानो वह ब्रह्मराक्षस उसके साथ खेल रहा हो ।

गजेंद्र का मन भी न जाने क्यों उस ब्रह्मराक्षस के व्यक्तित्व की ओर बारंबार आकर्षित हो रहा था ।

उसके हर वार में गजेंद्र को न जाने क्यों स्नेह की अनुभूति हो रही थी । सारी परिस्थितियां समझ कर गजेंद्र युद्ध छोड़कर दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

ब्रह्मराक्षस - क्या बात है बच्चे ! इस प्रकार बीच युद्ध में समर्पण क्यों कर रहे हो , तुम्हारी वीरता देखकर मैं तुम्हें एक और अवसर देता हूं , इस बार मैं कोई वार नहीं करूंगा और ना ही तुम्हारे किसी वार को रोकूंगा ।

गजेंद्र - क्षमा कीजिए ! मैं अब और युद्ध नहीं करूंगा , क्योंकि मैं जान गया हूं के आप कोई ब्रह्मराक्षस नहीं हो । ब्रह्मराक्षस के भेष में छुपे हुए कोई दिव्य पुरुष हो ।

ब्रह्मराक्षस - मैं कोई दिव्य पुरुष नहीं मैं तो अपनी क्षुधा से व्याकुल एक ब्रह्मराक्षस हूं जो भोजन के खोज में यहां तक आया हूं । मैं तुम्हारी वीरता देखकर बड़ा ही प्रसन्न हो इसीलिए मैं तुम्हें नहीं यह विश्राम कर रहे हैं देवताओं को खाऊंगा तुम जा सकते हो ।

गजेंद्र - नहीं मैं इस प्रकार आपको इन विश्राम कर रहे देवताओं का भक्षण नहीं करने दूंगा यदि आप खाना ही चाहते हैं तो मुझे खा ले ।

ब्रह्मराक्षस - हे बालक सोच लो कि तुम क्या कह रहे हो क्योंकि यहां मुझे किसी ना किसी को तो खाना ही पड़ेगा यही प्रकृति का नियम है जो मेरे लिए निर्धारित हुआ है ।

गजेंद्र - मैं सत्य कह रहा हूं मैं अपने आपको आपके अर्पण कर रहा हूं आप मुझे खाकर अपनी क्षुधा को शांत कर लीजिए।
मै अपने आप को आपके प्रति समर्पित करता हूं ।

गजेंद्र के इतना कहते हैं वहां एक दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ और देखते ही देखते हैं उस ब्रह्मराक्षस का शरीर भूतों के नाथ भगवान भोलेनाथ में परिवर्तित हो गया ।
भाल चंद्रमा , जटा में गंगा , तन पर भस्म , बाघ अंबर पहने , हाथ में त्रिशूल धारण किए । गजेंद्र की ओर देखकर मंद मंद मुस्कुराने लगे ।
सारे देवता भी जागृत अवस्था में आकर भोलेनाथ के आगे दोनों हाथ जोड़कर नतमस्तक हो गए ।

आज के लिए इतना ही -------- अगला भाग जल्द ही
आप सभी पाठकों से निवेदन है कि आप अपनी प्रतिक्रिया एवं अपने सुझाव अवश्य दें धन्यवाद
आपका मित्र

अभिनव
 

Ajju Landwalia

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Update - 13

आकाशवाणी द्वारा उन्हें पता चल गया था के यह बालक उन सब का पुत्र है देवराज इंद्र ने उस बालक को इशारे से अपनी और बुलाया, देवराज इंद्र का इशारा पाते ही वह बालक धीरे-धीरे उनकी और पहुंचा और देवराज इंद्र के चरणों में प्रणाम किया।

अपने चरणों में प्रणाम करते हुए उस बालक को देखकर देवराज ने स्नेह से अपना हाथ उसके सिर पर रखा एक बालक के सिर पर हाथ रखते ही देवराज इंद्र के नेत्रों के आगे उस बालक की उत्पत्ति के संपूर्ण रहस्य उजागर हो गए।

अब आगे -------


देवराज का स्नेह से भरा हुआ अपने मस्तक पर स्पर्श पाकर वह बालक अभिभूत हो गया सभी देवताओं को आदर पूर्वक प्रणाम करते हुए वह बालक बोला

बालक - आप सभी के चरणों में मेरा प्रणाम हैं। आकाशवाणी द्वारा मुझे इतना तो ज्ञात हो गया कि मेरी उत्पत्ति आप सभी से हुई है , इसलिए आप सभी मेरे लिए पिता समान हुए परंतु अभी भी मैं अपने जीवन के लक्ष्य से अनभिज्ञ हूं और मेरा कोई नाम भी नहीं है। इसलिए आप सभी से प्रार्थना है कि कृपया करके मेरे जीवन की उत्पत्ति के रहस्य भेरे प्रति उजागर करें।

इस बालक की मधुर वाणी सुनकर सभी देवता प्रसन्न हुए देवराज इंद्र से बोले

देवराज - हे पुत्र ! तुम्हारी बात यह दर्शाती है फिर तुम अद्भुत गुणों से संपन्न हो हमें बड़ी प्रसन्नता है कि तुममे अपने जीवन के लक्ष्य को जानने की उत्सुकता है ,और मेरे गजराज को जिस प्रकार से तुमने अपने वश मे किया वह तुम्हारे बल बुद्धि और विवेक को दर्शाता है। तुम वास्तव मे अद्भूत हो ।

इसके पश्चात देवराज ने अनलासुर की तपस्या से लेकर यहां आने का कारण सब कुछ उस बालक से कह सुनाया और कहां

देवराज -- पुत्र तुम्हारा निर्माण हम सभी देवताओं की उर्जा से हुआ है , इसलिए तुम हम सभी के पुत्र हुए ।

तुमने प्रकट होते ही मेरे गजराज ऐरावत को वश में किया जिसे मेरे सिवा कोई नहीं कर सकता इसलिए आज से तुम्हारा नाम होगा-----

--- गजेन्द्र।


सभी देवताओं की सम्मिलित ऊर्जा के द्वारा उसका जन्म और देवराज द्वारा अपने दिए गए नाम " गजेंद्र " को सुनकर बालक सभी के आगे नतमस्तक हो गया उसने देवराज इंद्र के चरणों में प्रणाम किया , देवराज ने भी स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए उसे आशीर्वाद दिया।

बालक -- स्वयं देवराज द्वारा मेरा नामकरण , यह मेरे लिए अत्यन्त गौरव की बात हैं ।
मै आपके दिये हुए इस नाम को स्वीकार करता हू।
आप सभी मेरे जन्म दाता हो इसलिए मेरे लिए पिता तुल्य हो , मेरे द्वारा पूर्व में की गई धृष्टता के लिए मैं आपसे क्षमा मांगता हूं ।


संसार के प्रत्येक घटनाक्रम के पीछे कोई ना कोई उद्देश्य अथवा कारण तो होता ही है ऐसी परिस्थिति में आप सभी देवताओं की ऊर्जा द्वारा मेरा निर्माण किसी न किसी उद्देश्य की ओर इंगित करता है, मेरे लिए क्या आज्ञा है कृपया मुझे बताएं।

देवराज -- पुत्र मुझे प्रसन्नता हुई है देख कर कि तुममें बुद्धि , बल और ज्ञान के साथ-साथ अपने कर्म के प्रति सजगता भी है।

इस समय संसार में अनलासुर नाम का असुर भयंकर उत्पात मचाए हुए हैं । ब्रह्मा जी के वरदान के कारण ना तो हम देवता और ना ही त्रिदेव मे से कोई उसका वध कर सकता है । उसका वध करके संसार में शांति स्थापित करने के लिए ही तुम्हारा जन्म हुआ है।

देवराज इंद्र के मुख से अपने जीवन का उद्देश्य जानने के पश्चात गजेंद्र को बड़ा आश्चर्य हुआ

गजेंद्र -- ईश्वर ने मुझे ऐसे महान कार्य के लिए चुना है यह मेरे लिए परम गौरव की बात है परंतु मैं अभी युद्ध कला आदि और शक्तियों के प्रयोग से अनभिज्ञ हूं , कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिए। जिससे मैं अपने कार्य में सफल हो सकूं।

देवराज -- इसके लिए तुम्हें तनिक भी चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है वत्स , तुम्हें आगे आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करना हम सब का कार्य है।

तुममें पहले से ही हम सब देवताओं की शक्तियां समाहित है , तुम्हें बस ध्यान योग के द्वारा अपने भीतर उन शक्तियों को खोजना है , तत्पश्चात उनके उपयोग करने की कला का अभ्यास करना होगा जो हम सभी देवता मिलकर करायेंगे।

उसके पश्चात गजेन्द्र का देव गुरु बृहस्पति द्वारा ध्यान योग की शिक्षा और देवराज तथा अन्य देवताओ द्वारा अस्त्र - शस्त्र व शक्तियों के प्रयोग का अभ्यास शुरू हो गया।


देखते ही देखते गजेंद्र इन सब में पारंगत हो गया और उसने बहुत शीघ्र ही अपने भीतर की शक्तियों को अपने नियंत्रण में करना सिख लिया । शस्त्रों के साथ-साथ शक्तियों के प्रयोग की कला भी उसने बड़ी शीघ्रता के साथ सीख ली थी ।

जितनी शीघ्रता से वह सारी विद्याये सीख रहा था उतनी ही शीघ्रता से उसका शरीर भी बदल रहा था 5 हफ्ते के कम समय में ही अब वह 18 साल के , एक बलिष्ठ युवा की भांति लग रहा था। कम समय मे वह पुर्ण रुप से एक योद्धा बन गया था । जिसे देखकर सभी देवता भी बहुत प्रसन्न थे ।

गजेंद्र को पूर्ण रूप से एक योद्धा के रूप में तैयार हुआ देखकर देवराज को विश्वास हो गया कि अब स्वर्ग उनसे ज्यादा दूर नहीं है उन्हें शीघ्र ही अनलासुर पर विजय प्राप्त करने की योजना पर कार्य करना होगा।



ऐसे ही एक दिन जब सभी देवता विश्राम कर रहे थे और गजेंद्र युद्ध अभ्यास कर रहा था । तभी वहां की भूमि में कंपन होने लगा जैसे कोई भूकंप आया हो और वहां उसे किसी की भयंकर गर्जना सुनाई दी।

उस भयंकर गर्जना को सुनकर गजेंद्र ने देवताओं के चारों ओर सुरक्षा कवच का निर्माण कर दिया जिससे उनके विश्राम में कोई व्यवधान ना हो और स्वयं आने वाले अज्ञात शत्रु का सामना करने के लिए सज्ज हो गया।

अभी कुछ ही क्षण हुए थे के उसने देखा एक विशाल दैत्याकार दानव जिसके तीन नेत्र धधकती हुई ज्वालामुखी के समान प्रतीत हो रहे थे , विशाल भुजाएं एवं विशाल शरीर के कारण वह बहुत ही भयावह दिख रहा था वह बारंबार अपने गिरिकंदरा जैसा विशाल मुंह खोलकर भयंकर गर्जना कर रहा था , उसके हाथ में एक विशाल तेज पूर्ण शूल था।

अपनी और बढ़ रहे अद्भुत विशाल दानव को देखकर गजेंद्र को बड़ा भारी विस्मय हुआ।
उस दानव की जैसी दृष्टि गजेंद्र एवं विश्राम करते हुए सभी देवताओं पर पड़ी तो वहीं रुक गया और अपने नेत्र फाड़ कर गजेंद्र को घूरने लगा और वाह ---वाह --- भोजन ,,,,भोजन ,,,इतना सारा भोजन आज तो मै भरपेट खाऊंगा।

अपनी ओर इस प्रकार घूरते हुए देखकर गजेंद्र भी पूर्ण सावधान हो गया और उस दानव के यहां आने का अभिप्राय जानने के लिए बोला---
गजेंद्र - कौन हो तुम अपने विशाल शरीर और अपनी भयंकर गर्जना के द्वारा क्यों यहां के वन्य प्रदेश को तहस-नहस कर रहे हो अपना परिचय दो और हमें देखकर इस प्रकार भोजन भोजन कहकर क्यों चिल्ला रहे हो।

दानव - हे बालक मैं एक ब्रह्मराक्षस हूं और यह समय मेरे भोजन का है । मैं भूखा हूं प्रकृति ने ही यह निर्धारित किया है कि मेरे भोजन काल में जो भी जिव मेरे सामने उपस्थित होगा वह मेरा आहार होगा ।
आज मैं बहुत प्रसन्न हूं क्योंकि आज तुम और यहां विश्राम कर रहे यह सब मेरा आहार बनेंगे आज मुझे पर्याप्त मात्रा में भोजन प्राप्त हो जाएगा मैं तृप्त हो जाऊंगा इसलिए अब मेरा आहार बनने के लिए तैयार हो जाओ।


गजेंद्र - रुको ! जिस प्रकृति की तुम बात कर रहे हो वह प्रकृति बिना कारण ऐसे किसी की हत्या करने का अधिकार किसी को भी नहीं देती इसलिए सीधे-सीधे यहां से चले जाओ अन्यथा भयंकर परिणाम के लिए तैयार रहो, खाने के लिए प्रकृति ने फल कन्द मूल और भी बहुत सी वस्तुओ की व्यवस्था की है , उन्हे खाकर अपनी क्षुधा शांत करो।

ब्रह्मराक्षस - वाह बहुत अच्छे ! तुम रोकोगे मुझे , है तुममें इतना सामर्थ्य ! चलो पहले यही करके देख लेते हैं । मैं तुम्हें पूर्ण अवसर देता हूं अपनी तथा इन लोगों की रक्षा का मेरे लिए भी मनोरंजन हो जाएगा तत्पश्चात तुम सबको तो मेरा आहार बनना ही है । हा हा हा हा -------


गजेंद्र - तुम इस प्रकार नहीं मानोगे तो यह लो परिणाम के लिए तैयार हो जाओ-----

इतना कहकर गजेंद्र ने अपने दोनों हाथ हवा में लहरा कर अपनी उर्जा से एक गोला बनाकर उस ब्रह्मराक्षस पर प्रहार किया जिसे उस ब्रह्मराक्षस ने बड़ी सहजता के साथ किसी गेंद की भांती अपने हाथ में पकड़ लिया और वापस गजेंद्र की और फेंक दिया । अपनी ओर आते हुए अपनी उर्जा के पिंड को देखकर गजेंद्र ने अपना बांया हाथ हवा में लहरा कर उस तेज को वापस अपने भीतर समा लिया।

इस प्रकार इतनी आसानी से शक्ति को रोककर और वापस प्रहार करना देखकर गजेंद्र को ये आभास हो गया कि यह कोई साधारण दानव नहीं है।

गजेंद्र - ( मन में ) यह कोई साधारण दानव नहीं है , मुझे अपनी पूर्ण शक्ति से इस पर वार करना पड़ेगा।
इस बार उसने अग्नि तत्व की उर्जा से एक बड़ा सा अग्नि पिंड बनाकर उस ब्रह्मराक्षस की ओर प्रहार किया परंतु देखते ही देखते उस प्रचंड अग्नि पिंड को उस ब्रह्मराक्षस ने अपने विशाल मुख में समा लिया।

गजेंद्र ने अग्नि तत्व का प्रयोग करते हुए बड़े-बड़े आग के गोलो से प्रहार किया, वायु तत्व का प्रयोग करते हुए बड़े बवंडर अर्थात चक्रवात से भी प्रहार किया, आकाश तत्व की आकाशीय ऊर्जा का भीषण विद्युत प्रहार भी किया , पृथ्वी तत्व से बड़े-बड़े पत्थरों से प्रहार किया, परंतु उस ब्रह्मराक्षस पर सभी व्यर्थ रहा।
गजेंद्र ने क्रमशः वायु तत्व और जल तत्व ऊर्जा से प्रहार किया परंतु वह भी उस ब्रह्मराक्षस के आगे निष्क्रिय हो गया।

ब्रह्मराक्षस - बस इतना ही बल है तुम्हें बच्चे ! तुम्हारा हो गया हो तो अब मैं अपना कार्य करूं, वैसे भी मुझे बहुत भूख लगी है , मुझसे और प्रतिक्षा नही हो रही।

गजेंद्र - अभी कहां ! अभी तो यह शुरुआत है ,
इतना कहकर गजेंद्र ने पंचतत्व की ऊर्जा को अपनी हथेली में एकत्रित किया और अपना दायां हाथ भूमि पर रखकर ब्रह्मराक्षस की ओर देखने लगा और देखते ही देखते भूमि से विशाल तथा मजबूत लताएं निकलकर ब्रह्मराक्षस को जकड़ने लगी । भूमि से निकलती हुई उन बेलो ने ब्रह्मराक्षस को पूरी तरह से जकड़ लिया ।

अब गजेंद्र ने अपनी आंतरिक मारक उर्जा का संचार उन बेलों में कर दिया जिससे वह बेले और मोटी होकर जकड़ने लगी उन बेलो में भयंकर विद्युत प्रभाव होने लगा।
और साथ ही साथ उन बेलो से मोटे मोटे कांटे भी प्रगट होने लगे जो उस ब्रह्मराक्षस के विशाल शरीर के भीतर प्रवेश करने का प्रयत्न करने लगे। उन बेलो के भयंकर मारक विद्युत प्रवाह और कांटो का ब्रह्मराक्षस पर कोई असर ना होता हुआ देखकर गजेंद्र आश्चर्यचकित हुआ ।

गजेंद्र के इतने भयंकर प्रहार जिनका सामना शायद देवता भी ना कर पाए , उन भयंकर प्रहारों से ब्रह्मराक्षस के शरीर पर एक खरोच तक नहीं आई थी, वह ब्रह्मराक्षस गजेंद्र के प्रत्येक प्रहार का प्रतिकार करते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई पिता अपने पुत्र से खेल रहा हो।

ब्रह्मराक्षस - वाह अद्भुत ! मानना पड़ेगा तुम्हें तुम्हारी यह कला तो बड़ी अद्भुत है परंतु तुम्हारे यह सब खेल मुझ पर कोई असर नहीं करने वाले

गजेंद्र - बंध तो तुम चुके ही हो ब्रह्मराक्षस ! अब यदि यहां से जाने का वचन देते हो तो मैं तुम्हें मुक्त कर सकता हूं अन्यथा मुझे तुम पर अपने शास्त्रों का प्रयोग करना पड़ेगा ।

ब्रह्मराक्षस - बच्चे ! तुम्हारे ये घास फूस मुझे बांध नहीं सकते , मैं तो अब तक बस तुम्हारा खेल देख रहा था । इतना कहते ही ब्रह्मराक्षस के शूल से भयंकर अग्नि की लपटें निकलने लगी और उस अग्नि में वह सारी बेले जों ब्रह्मराक्षस को जकड़ी हुई थी सब भस्म हो गई ।

अब ब्रह्मराक्षस ने भी अपनी उर्जा से प्रहार करना शुरू कर दिया गजेंद्र ने उस प्रहार से बचने के लिए अपने दोनों हाथ आगे करके एक रक्षा कवच का निर्माण किया परंतु फिर भी ब्रह्मराक्षस की उर्जा के प्रभाव से वह पीछे कुछ दूर तक घसीटते हुआ चला गया ।

अब दोनों ओर से ऊर्जा के प्रहार होने लगे , गजेंद्र ने देवताओं से प्राप्त शस्त्रों का भी प्रयोग किया जीसे उस ब्रह्मराक्षस ने अपने शूल से बड़ी ही सरलता के साथ रोक दिया ।

अब तक के युद्ध में गजेंद्र इतना तो जान गया था कि यह कोई साधारण ब्रह्मराक्षस नही यह कोई दिव्य पुरुष है , जो उसकी परीक्षा लेने के लिए आया हुआ है । क्योंकि अब तक के युद्ध में वह इतना तो जान गया था के ब्रह्मराक्षस ने उस पर अब तक कोई भी प्राणघातक वार नहीं किया था, जैसे मानो वह ब्रह्मराक्षस उसके साथ खेल रहा हो ।

गजेंद्र का मन भी न जाने क्यों उस ब्रह्मराक्षस के व्यक्तित्व की ओर बारंबार आकर्षित हो रहा था ।

उसके हर वार में गजेंद्र को न जाने क्यों स्नेह की अनुभूति हो रही थी । सारी परिस्थितियां समझ कर गजेंद्र युद्ध छोड़कर दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

ब्रह्मराक्षस - क्या बात है बच्चे ! इस प्रकार बीच युद्ध में समर्पण क्यों कर रहे हो , तुम्हारी वीरता देखकर मैं तुम्हें एक और अवसर देता हूं , इस बार मैं कोई वार नहीं करूंगा और ना ही तुम्हारे किसी वार को रोकूंगा ।

गजेंद्र - क्षमा कीजिए ! मैं अब और युद्ध नहीं करूंगा , क्योंकि मैं जान गया हूं के आप कोई ब्रह्मराक्षस नहीं हो । ब्रह्मराक्षस के भेष में छुपे हुए कोई दिव्य पुरुष हो ।

ब्रह्मराक्षस - मैं कोई दिव्य पुरुष नहीं मैं तो अपनी क्षुधा से व्याकुल एक ब्रह्मराक्षस हूं जो भोजन के खोज में यहां तक आया हूं । मैं तुम्हारी वीरता देखकर बड़ा ही प्रसन्न हो इसीलिए मैं तुम्हें नहीं यह विश्राम कर रहे हैं देवताओं को खाऊंगा तुम जा सकते हो ।

गजेंद्र - नहीं मैं इस प्रकार आपको इन विश्राम कर रहे देवताओं का भक्षण नहीं करने दूंगा यदि आप खाना ही चाहते हैं तो मुझे खा ले ।

ब्रह्मराक्षस - हे बालक सोच लो कि तुम क्या कह रहे हो क्योंकि यहां मुझे किसी ना किसी को तो खाना ही पड़ेगा यही प्रकृति का नियम है जो मेरे लिए निर्धारित हुआ है ।

गजेंद्र - मैं सत्य कह रहा हूं मैं अपने आपको आपके अर्पण कर रहा हूं आप मुझे खाकर अपनी क्षुधा को शांत कर लीजिए।
मै अपने आप को आपके प्रति समर्पित करता हूं ।


गजेंद्र के इतना कहते हैं वहां एक दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ और देखते ही देखते हैं उस ब्रह्मराक्षस का शरीर भूतों के नाथ भगवान भोलेनाथ में परिवर्तित हो गया ।
भाल चंद्रमा , जटा में गंगा , तन पर भस्म , बाघ अंबर पहने , हाथ में त्रिशूल धारण किए । गजेंद्र की ओर देखकर मंद मंद मुस्कुराने लगे ।
सारे देवता भी जागृत अवस्था में आकर भोलेनाथ के आगे दोनों हाथ जोड़कर नतमस्तक हो गए ।


आज के लिए इतना ही -------- अगला भाग जल्द ही
आप सभी पाठकों से निवेदन है कि आप अपनी प्रतिक्रिया एवं अपने सुझाव अवश्य दें धन्यवाद
आपका मित्र

अभिनव

Bahut hi shandar update he jaggi57 Bhai,

Gajender ki praiksha lene swayam mahadev aaye he..............kya adhbhud update likhe aapne

Keep posting Bhai
 
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बहुत-बहुत धन्यवाद Ajju भाई आपके साथ के लिए ऐसे ही साथ बनाए रखें 🙏🌹🌹🌹
 
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Update 14

अब तक आपने देखा की देवताओं द्वारा गजेन्द्र का प्रशिक्षण पूर्ण हुआ और ब्रह्मराक्षस के रूप में भगवान भोले नाथ गजेन्द्र की परीक्षा लेने आए और उसमें व सफल हुआ

अब आगे ----------

साक्षात भोलेनाथ को अपने सम्मुख पाकर गजेंद्र अत्यंत आनंदित हुआ, उसके नेत्रों से आनंद अश्रु कि अवीचल धारा बहने लगी ।
गजेंद्र ने अपने दोनों हाथ जोड़कर तथा भूमि पर लेटकर भगवान भोलेनाथ को साष्टांग दंडवत किया।

भोलेनाथ के उसे परम मनोहर रूप को देखकर गजेंद्र का अंग - अंग पुलकित हो गया था , नेत्रों से आनंद अश्रु बह रहे थे ।

तब तक देवता भी जो भगवान भोलेनाथ की माया से मोहित होकर गहरी नींद में सोए हुए थे वह सब जाग गए अपने सम्मुख भगवान भोलेनाथ को और गजेंद्र को दंडवत करता हुआ देखकर सभी देवता भी अपने हाथ जोड़कर भोलेनाथ के सनमुख नतमस्तक हो गए।

भोलेनाथ - उठो पुत्र गजेंद्र मैं तुम्हारे युद्ध कौशल और दूसरों के प्राण बचाने के लिए अपने प्राणों को भी न्योछावर करने को तत्पर रहने वाली तुम्हारी प्रवृत्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूं।

भोलेनाथ की अमृतमय वाणी सुनकर गजेन्द्र दोनो हाथ जोडकर उठ खडा हुआ

गजेन्द्र - क्षमा करें भगवन् ! मै आपको पहचान नही सका , मुझसे अनजाने मे जो आपके प्रती जो अपराध हुआ हैं उसके लिए मुझे क्षमा करिए , यह आपकी करूणा ही है जो मुझ जैसे अबोध बालक पर स्वयं कृपा करने आए,

मै आज धन्य हो गया हू जो स्वयं देवो के भी देव कल के भी काल साक्षात् मेरे सन्मुख खडे है । आज्ञा किजिए प्रभु मेरे लिए क्या आदेश है।

भोलेनाथ - पुत्र गजेंद्र तुममें वीरता के साथ-साथ विनम्रता भी निहित है यह देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूं देवताओं ने तुम्हारा अच्छी तरह प्रशिक्षण किया है । अब समय आ गया है तुम्हें अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने का, परंतु उसके पहले तुम्हें अपनी संपूर्णता को प्राप्त करना होगा। अभी तुम्हें बहुत कुछ देखना है बहुत कुछ सीखना है और सबल बनाना है अपने अनुभवों को बढ़ाना है क्योंकि आगे तुम्हारे अनुभव ही तुम्हारी सहायता करेंगे ।

गजेंद्र - प्रभु मुझे पूर्णता प्राप्त करने के लिए क्या करना होगा । संपूर्णता किसे कहते हैं मुझे तो यह भी ज्ञात नहीं है।
प्रभु आप किस प्रकार की संपुर्णता के बारे मे कह रहे है , मेरी अनभिज्ञता को दूर करने की कृपा करें।

भोलेनाथ - पुत्र प्रकृति के द्वारा और देवताओं के द्वारा तुम्हें शक्तियां तो प्राप्त हो गई , परंतु उन शक्तियों के मुख्य स्रोत तक तुम तबतक नहीं पहुंच सकते जब तक तुम अपने पूर्णत्व को प्राप्त ना कर लो ।

पुरुष सर्वथा प्रकृति के बिना अधूरा है इसलिए हम त्रिदेव भी अपनी अपनी शक्तियों के बिना अधूरे हैं ।

प्रकृति का वह रूप नारी तत्व के रूप में है , जब तक पुरुष को स्त्री का साथ नहीं प्राप्त होता तब तक वह अधूरा है

इसीलिए तुम्हें नियति द्वारा चुनी गई अपनी शक्ति को प्राप्त करना होगा, जो ज्ञान , विज्ञान और बल की प्रतीक होगी ।

उसके पश्चात भोलेनाथ ने अपने त्रिशूल से एक दिव्य शुल प्रकट करके गजेंद्र को दिया

भोलेनाथ - पुत्र गजेंद्र ! यह शुल मेरी ओर से तुम्हें उपहार है यह शुल तुम्हारी शक्तियों से जुड़ा रहेगा, परंतु ध्यान रहे इसका प्रयोग तभी करना जब तुम्हारे आगे और कोई रास्ता ना हो अब तुम यहां से दक्षिण दिशा की ओर अपनी यात्रा प्रारंभ करो इतना कहकर भगवान भोलेनाथ वहां से अंतर्धान हो गए।

भगवान भोलेनाथ के जाने के पश्चात गजेंद्र ने देवताओं को प्रणाम कर अपनी यात्रा पर जाने की अनुमति मांगी ।

देवराज इंद्र - पुत्र तुम्हारी यह यात्रा बड़ी कठिन और लंबी होने वाली है इसीलिए तुम मेरे वाहन एरावत को अपने साथ ले जाओ, जिससे तुम शीघ्राति शीघ्र अपने कार्य को संपन्न कर सकोगे , बिना किसी वाहन के यह यात्रा अति दुष्कर है।

गजेंद्र - धन्यवाद देवराज ! आपका इतना कहना ही मेरे लिए पर्याप्त है , परंतु यह अग्रिम यात्रा मेरी पूर्णता की है , प्रत्येक देवता का वाहन उनकी आत्मा के साथ जुड़ा हुआ होता है इसलिए एरावत भी आपकी आत्मा के साथ जुड़ा हुआ है यह यात्रा मेरी पूर्णता की है इसलिए इसमें मुझे अकेला ही जाना होगा और रही वाहन की बात तो उसका चयन भी मुझे ही करना होगा।

देवराज - पुत्र ध्यान रहे इस भूखंड में कई ऐसी जगहे है जो अत्यंत रहस्यमयी तथा मायावी है उनसे सावधान रहना ( अपने हाथ से एक अंगूठी निकाल कर गजेंद्र की और बढ़ाते हुए ) यह लो इसे सदैव अपने साथ रखना यह तुम्हें उन मायावी प्रदेशों में सहायक होगी हम सब देवों का आशिर्वाद सदा तुम्हारे साथ रहेगा , यशस्वी भव ।

गजेंद्र ने देवराज से अंगूठी लेकर धारण कर ली और सभी देवताओं को प्रणाम कर अपनी यात्रा की ओर निकल पड़ा ।

एक अंजाना सफर जहां बहुत कुछ होने वाला था और प्राप्त भी होने वाला था , गजेंद्र अब तक अपने जन्म स्थान के दायरे से कभी बाहर गया ही नहीं था ।

।आज चारों ओर प्रकृति की सुंदरता को देखते हुए पूर्ण आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ रहा था , उसे कुछ पता नहीं था कि वह लक्ष्य कहां कैसे प्राप्त होगा , परंतु उसे महादेव की वाणी पर संपूर्ण विश्वास था ।

यदि महादेव ने दक्षिण दिशा की ओर जाने को कहा है तो अवश्य ही दक्षिण दिशा की ओर ही उसे उसका लक्ष्य प्राप्त होगा।

चलते चलते गजेंद्र एक सुंदर सरोवर के निकट पहुंच जहां के वृक्ष सुंदर रसीले फलों से शोभायमान हो रहे थे, कुछ ही देर में सूर्यास्त भी होने वाला था तो गजेंद्र ने रात्रि में वही विश्राम करने का निर्णय किया ।

दिन भर चलते रहने के कारण गजेंद्र को भूख - प्यास भी बहुत लगी थी उन रसीले फलों को देखकर भूख और तेज हो गई थी, आश्चर्य की बात यह थी के आज तक कभी भी गजेंद्र को ना तो भूख और ना ही प्यास से कभी व्याकुल हुआ था , परंतु इस वन्य प्रदेश में प्रवेश करते ही न जाने क्यों उसकी भूख और प्यास बढ़ गई थी और साथ ही साथ थकान भी हो रही थी ।

कई घंटे युद्ध अभ्यास करने के पश्चात भी वह आज तक वह कभी थक नहीं था और इस वन्य प्रदेश में प्रवेश करने से पूर्व ना तो उसे थकान का और ना ही भूख और प्यास का भास हुआ था ।

गजेंद्र ने एक नजर सूर्य देव को देखा उसके अस्त होने में अभी कुछ समय शेष था तो उसने विचार किया कि पहले मैं स्नान कर लूं उसके पश्चात संध्या वंदन करके भरपेट फलों का आनंद लूंगा।

इक नजर उन फलो को देखते हुए ना जाने क्यूँ उन फलों से आने वाली सुगंध उसे बार बार आकर्षित कर रही थी परंतु अपने मन को नियंत्रण में करके ईक गहरी श्वास छोडकर उसने पहले स्नान करने का निश्चय किया।

स्नान करने के लिए गजेंद्र सरोवर के जल के भीतर उतर गया ।उसे सरोवर का जल अत्यंत शीतल था उसने सोचा थोड़ी देर स्नान करने से उसकी शरीर की सारी थकान दूर हो जाएगी परंतु आश्चर्य की बात यह थी क्या ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था जल की शीतलता का अनुभव केवल उसके बाहरी शरीर पर हो रहा था भीतर से तो उसे मानो ऐसा लग रहा था कि वह जल में नहीं जल के बाहर ही है।

सारी बातों को नजर नजरअंदाज करते हुए गजेंद्र ने स्नान संपूर्ण किया और सरोवर के बाहर आकर अपने वस्त्र पहन लिए।
वही के वृक्षों से उसने कुछ पत्ते तोड़कर एक द्रोण ( डोना ) बनाया तथा उसमें सरोवर का जल भरकर संध्या वंदन करने बैठ गया।
जल से आचमन करके अपने इष्ट का ध्यान करने लगा , परंतु वहां के फलों से आती हुई सुगंध और तीव्र हो गई थी और उसे सुगंध से साथ ही साथ उसकी भूख भी तीव्र हो गई थी उसके कारण वह ध्यान नहीं कर पा रहा था।
जैसे तैसे संध्या वंदन संपूर्ण करके उठा और सबसे पहले अपनी प्यास बुझाने के लिए सरोवर का जल डोने में भरकर पीने लगा , परंतु यहां भी कुछ अजीब सा हुआ वह जल पी तो रहा था परंतु उसे जल पीने का भास नहीं हो रहा था ।

जल पीने के पश्चात उसने वहां के फलदार वृक्षों से खाने के लिए कुछ फल एकत्रित कर लिए और सरोवर के निकट ही एक विशाल वृक्ष के नीचे साफ जगह देखकर उन फलों लेकर बैठ गया । गजेंद्र ने उन फलों में से एक फल खाने के लिए उठाया और मुंह तक ले गया ,
परंतु तभी इस वन्य प्रदेश में प्रवेश करने से लेकर अब तक की सारी घटनाएं उसके मन में प्रकट होने लगी ।

उसका अंतर्मन कह रहा था के उन फलों को मत खाओ परंतु अत्यंत भूख ने उसे पीड़ित कर रखा था इसलिए बहिरमन कह रहा था कि पहले फलों को खालो , बाद में देखा जाएगा जो होगा देवताओं की शक्ति इतना समर्थ होकर भी इन फलों से भयभीत होना उचित नहीं है और इस निर्जन वन में मेरा कोई भी अहित नहीं कर सकता , इसलिए उन फलों को खा लेना ही ठीक रहेगा ।

बहुत देर तक अंतर्मन और बाहर मन की उठा-पटक में बहुत समय व्यतीत हो गया , अंततः उसने विवेक से काम लेना का विचार किया ।
और उन फलों को एक तरफ रखकर वृक्ष का सहारा लेकर विश्राम करने लगा ।

उन फलों से निकलती हुई सुगंध उसे बारंबार अपनी ओर आकर्षित कर रही थी । परंतु वह बराबर अपने आपको रोके हुए था , उन फलों के खाने से ।

ऐसे ही कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात उसे कुछ दूरी पर किसी के आने की आहट सुनाई दी उसमें जब उसे ओर देखा तो पाया कि एक वृद्ध व्यक्ति जो अत्यंत जीर्ण अवस्था में , हाथ में एक डंडा पकड़े धीरे-धीरे उसी की ओर आ रहा था । उसकी कमर टेडी थी और शरीर से भी वह काफी दुर्बल लग रहा था चलते चलते अचानक

वह वृद्ध गजेंद्र से कुछ दूरी पर पगडंडी पर ठोकर लगने से गिर पडा ।

वृद्ध को गिरते हुए देखकर गजेंद्र तुरंत दौड़कर वहां पहुंचा और उस वृद्ध को सहारा देकर उठाकर बिठाया

गजेंद्र - बाबा आपको कहीं चोट तो नहीं लगी , इस अवस्था में इस निर्जन वन में इस समय आप कहां जा रहे हो अभी थोड़ी देर में रात्रि भी होने वाली है, आपसे तो चला भी नहीं जा रहा हैं ।

वृद्ध - बेटा अब क्या करें , बुढ़ापा इसी को तो कहते है और साथ में यह टेढ़ी कमर चलते चलते शरीर में मानो जान ही नहीं बची इसलिए गिर पड़ा।

गजेंद्र - परंतु बाबा इस समय आप कहां जा रहे हो और वह भी निर्जन प्रदेश से जहां न कोई जीव दिखाई पड़ता है ना ही कोई मनुष्य

वृद्ध - बेटा मैं पास के ही गांव में रहता हूं मैं एक वैद्य हूं और यहां वन में कुछ वनस्पतियां ढूंढने आया था ।

देखते ही देखते समय कैसा व्यतीत हुआ कुछ पता ही नहीं चला दिन भर के परिश्रम के और शरीर की इस अवस्था के कारण मुझ में अब और आगे जाने की शक्ति नहीं बची ।
वह तो अच्छा हुआ के तुम मुझे मिल गए नहीं तो मैं अकेला बूढ़ा इस वन में क्या करता ।

अभी तो रात्रि भी होने वाली है तो अपने गांव तक कैसे जाता अब तुम मिल गए हो तो रात्रि में यही विश्राम करके प्रातः अपने गांव की ओर निकलूंगा ।

वैसे बेटा मुझे भूख और प्यास भी बहुत लगी है क्या तुम्हारे पास कुछ खाने के लिए है

गजेंद्र - ज्यादा तो कुछ नहीं बाबा परंतु इस वन के वृक्षों के फल तोड़ कर रखे हैं लिए चलते हैं उसे विशाल वृक्ष के नीचे बैठकर आप फलों का आनंद लेना तब तक मैं आपके लिए सरवर से जल लेकर आता हूं

गजेंद्र उसे वृद्धि को सहारा देते हुए वृक्ष के नीचे तक ले आया और वहाँ बैठाकर जो फल एकत्रित किए थे वह फल उसे वृद्ध के सामने रख दिए ।

वृद्ध - बेटा तुम कौन हो यहां आस-पास के इलाके में मैंने पहले तो तुम्हें कभी नहीं देखा इस वन में तुम क्या कर रहे हो कहां से आए हो?

गजेंद्र - बाबा मैं बस एक मुसाफिर हूं जो अपने किसी लक्ष्य की खोज में निकला हूं मैं कौन हूं कहां से आया हूं यह सब बातें छोड़ दो , आप यह फल खाओ तब तक मैं आपके लिए सरोवर से जल लेकर आता हूं ।

इतना कहकर वह सरोवर में जल लेने के लिए चला गया जब जल लेकर वापस आया तो देखा क्यों सूरत ने एक भी फल नहीं खाया है ।

गजेंद्र - क्या बात है बाबा आप तो कह रहे थे कि आपको बहुत भूख लगी है आपने अब तक एक भी फल नहीं खाया ।

वृद्ध - पुत्र तुमने मेरी सहायता की और मेरे लिए ईतने रसीले फल खाने को दिए , परंतु तुमने अभी तक अपना परिचय नहीं दिया और तुम्हारे चेहरे से भी , यह प्रतीत होता है कि तुम्हें भी बहुत भूख लगी है , तो मैं अकेले कैसे खा लेता ।

पहले तुम अपना परिचय दो कि तुम कौन हो और यहां क्या करने आए हो उसके बाद हम दोनों साथ में मिलकर खाते हैं , क्योंकि शास्त्र कहता है किसी अपरिचित के हाथों कुछ नहीं खाना चाहिए ।

गजेंद्र - बाबा मेरा नाम गजेंद्र है और मैं एक बड़े उद्देश्य के लिए अपने लक्ष्य को खोज रहा हूं इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं बता सकता ।

वृद्ध - चलो कोई बात नहीं तुमने अपना नाम तो बताया कुछ फल गजेंद्र की ओर बढ़ते हुए यह लो तुम भी खाओ

गजेंद्र को फल देकर उस वृद्ध ने एक पल उठाया और खाने लगा और गजेंद्र बड़े ध्यान से उसे वृद्ध का निरीक्षण करने लगा क्योंकि उन फलों को लेकर उसके मन में एक शंका सी थी ।
जब उसने वृद्धि को फल खाते हुए देखा तो स्वयं भी एक फल उठाकर अपने मुख में रखकर खाने लगा जैसे ही फल उसने मुख में रखा उसका शरीर शिथिल पड़ने लगा नेत्र बंद होने लगे और एक मुर्छा सी आने लगी ,
पूर्ण रूप से मूर्छा में जाने से पहले उसने उस वृद्ध को अपने अधखुले नेत्रों से देखा ।

वह वृद्ध गजेंद्र को मूर्छित होता हुआ देखकर जोर-जोर से हंसने लगा अब उसकी टेढ़ी कमर भी सीधी हो गई थी और उसका रूप भी परिवर्तित हो गया अब वहाँ कोई वृद्ध नहीं था ।
उसका रूप बड़ा भयावह था लगभग 8 फुट जितना कद , लाल नेत्र , बड़ी-बड़ी मूंछे , बलिष्ठ भुजाएं बड़ा सा मुख मानव जैसे साक्षात यमराज ही हो ।
वहां उसकी भयानक हंसी गूंजने लगी थी हा हा हा हा हा हा

देखते ही देखते वहां लगभग 10 के करीब सैनिक भेष में और लोग आ गए उनकी भी कद काठी अच्छी खासी थी , हाथों में भाले लिए हुए वह सब गजेंद्र को ही घूर रहे थे ।

विशालकाय व्यक्ति - सैनिकों से इस प्रकार देखते ही रहोगे बांध दो इसे अपने आप को बड़ा चतुर समझ रहा था , आ गया ना मेरी कैद में हा हा हा हा
जल्दी-जल्दी बांधो कर ले चलो इस हमारे कारागृह में वहां जब यातनाएं मिलेगी तो अपना परिचय क्या अपने सात जन्मो का भी सब कुछ बता देगा ।

उन सैनिकों ने गजेंद्र को लोहे की जंजीरों में बांध दिया।

आज के लिए इतना ही --------
अगला अध्याय शीघ्र ही----------
स्वस्थ रहिए प्रसन्न रहिए
और कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें

धन्यवाद - आपका मित्र अभिनव 🙏🌹
 

Ajju Landwalia

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Update 14

अब तक आपने देखा की देवताओं द्वारा गजेन्द्र का प्रशिक्षण पूर्ण हुआ और ब्रह्मराक्षस के रूप में भगवान भोले नाथ गजेन्द्र की परीक्षा लेने आए और उसमें व सफल हुआ

अब आगे ----------


साक्षात भोलेनाथ को अपने सम्मुख पाकर गजेंद्र अत्यंत आनंदित हुआ, उसके नेत्रों से आनंद अश्रु कि अवीचल धारा बहने लगी ।
गजेंद्र ने अपने दोनों हाथ जोड़कर तथा भूमि पर लेटकर भगवान भोलेनाथ को साष्टांग दंडवत किया।


भोलेनाथ के उसे परम मनोहर रूप को देखकर गजेंद्र का अंग - अंग पुलकित हो गया था , नेत्रों से आनंद अश्रु बह रहे थे ।

तब तक देवता भी जो भगवान भोलेनाथ की माया से मोहित होकर गहरी नींद में सोए हुए थे वह सब जाग गए अपने सम्मुख भगवान भोलेनाथ को और गजेंद्र को दंडवत करता हुआ देखकर सभी देवता भी अपने हाथ जोड़कर भोलेनाथ के सनमुख नतमस्तक हो गए।


भोलेनाथ - उठो पुत्र गजेंद्र मैं तुम्हारे युद्ध कौशल और दूसरों के प्राण बचाने के लिए अपने प्राणों को भी न्योछावर करने को तत्पर रहने वाली तुम्हारी प्रवृत्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूं।

भोलेनाथ की अमृतमय वाणी सुनकर गजेन्द्र दोनो हाथ जोडकर उठ खडा हुआ

गजेन्द्र - क्षमा करें भगवन् ! मै आपको पहचान नही सका , मुझसे अनजाने मे जो आपके प्रती जो अपराध हुआ हैं उसके लिए मुझे क्षमा करिए , यह आपकी करूणा ही है जो मुझ जैसे अबोध बालक पर स्वयं कृपा करने आए,

मै आज धन्य हो गया हू जो स्वयं देवो के भी देव कल के भी काल साक्षात् मेरे सन्मुख खडे है । आज्ञा किजिए प्रभु मेरे लिए क्या आदेश है।


भोलेनाथ - पुत्र गजेंद्र तुममें वीरता के साथ-साथ विनम्रता भी निहित है यह देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूं देवताओं ने तुम्हारा अच्छी तरह प्रशिक्षण किया है । अब समय आ गया है तुम्हें अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने का, परंतु उसके पहले तुम्हें अपनी संपूर्णता को प्राप्त करना होगा। अभी तुम्हें बहुत कुछ देखना है बहुत कुछ सीखना है और सबल बनाना है अपने अनुभवों को बढ़ाना है क्योंकि आगे तुम्हारे अनुभव ही तुम्हारी सहायता करेंगे ।

गजेंद्र - प्रभु मुझे पूर्णता प्राप्त करने के लिए क्या करना होगा । संपूर्णता किसे कहते हैं मुझे तो यह भी ज्ञात नहीं है।
प्रभु आप किस प्रकार की संपुर्णता के बारे मे कह रहे है , मेरी अनभिज्ञता को दूर करने की कृपा करें।


भोलेनाथ - पुत्र प्रकृति के द्वारा और देवताओं के द्वारा तुम्हें शक्तियां तो प्राप्त हो गई , परंतु उन शक्तियों के मुख्य स्रोत तक तुम तबतक नहीं पहुंच सकते जब तक तुम अपने पूर्णत्व को प्राप्त ना कर लो ।

पुरुष सर्वथा प्रकृति के बिना अधूरा है इसलिए हम त्रिदेव भी अपनी अपनी शक्तियों के बिना अधूरे हैं ।

प्रकृति का वह रूप नारी तत्व के रूप में है , जब तक पुरुष को स्त्री का साथ नहीं प्राप्त होता तब तक वह अधूरा है


इसीलिए तुम्हें नियति द्वारा चुनी गई अपनी शक्ति को प्राप्त करना होगा, जो ज्ञान , विज्ञान और बल की प्रतीक होगी ।

उसके पश्चात भोलेनाथ ने अपने त्रिशूल से एक दिव्य शुल प्रकट करके गजेंद्र को दिया

भोलेनाथ - पुत्र गजेंद्र ! यह शुल मेरी ओर से तुम्हें उपहार है यह शुल तुम्हारी शक्तियों से जुड़ा रहेगा, परंतु ध्यान रहे इसका प्रयोग तभी करना जब तुम्हारे आगे और कोई रास्ता ना हो अब तुम यहां से दक्षिण दिशा की ओर अपनी यात्रा प्रारंभ करो इतना कहकर भगवान भोलेनाथ वहां से अंतर्धान हो गए।

भगवान भोलेनाथ के जाने के पश्चात गजेंद्र ने देवताओं को प्रणाम कर अपनी यात्रा पर जाने की अनुमति मांगी ।

देवराज इंद्र - पुत्र तुम्हारी यह यात्रा बड़ी कठिन और लंबी होने वाली है इसीलिए तुम मेरे वाहन एरावत को अपने साथ ले जाओ, जिससे तुम शीघ्राति शीघ्र अपने कार्य को संपन्न कर सकोगे , बिना किसी वाहन के यह यात्रा अति दुष्कर है।

गजेंद्र - धन्यवाद देवराज ! आपका इतना कहना ही मेरे लिए पर्याप्त है , परंतु यह अग्रिम यात्रा मेरी पूर्णता की है , प्रत्येक देवता का वाहन उनकी आत्मा के साथ जुड़ा हुआ होता है इसलिए एरावत भी आपकी आत्मा के साथ जुड़ा हुआ है यह यात्रा मेरी पूर्णता की है इसलिए इसमें मुझे अकेला ही जाना होगा और रही वाहन की बात तो उसका चयन भी मुझे ही करना होगा।

देवराज - पुत्र ध्यान रहे इस भूखंड में कई ऐसी जगहे है जो अत्यंत रहस्यमयी तथा मायावी है उनसे सावधान रहना ( अपने हाथ से एक अंगूठी निकाल कर गजेंद्र की और बढ़ाते हुए ) यह लो इसे सदैव अपने साथ रखना यह तुम्हें उन मायावी प्रदेशों में सहायक होगी हम सब देवों का आशिर्वाद सदा तुम्हारे साथ रहेगा , यशस्वी भव ।

गजेंद्र ने देवराज से अंगूठी लेकर धारण कर ली और सभी देवताओं को प्रणाम कर अपनी यात्रा की ओर निकल पड़ा ।

एक अंजाना सफर जहां बहुत कुछ होने वाला था और प्राप्त भी होने वाला था , गजेंद्र अब तक अपने जन्म स्थान के दायरे से कभी बाहर गया ही नहीं था ।


।आज चारों ओर प्रकृति की सुंदरता को देखते हुए पूर्ण आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ रहा था , उसे कुछ पता नहीं था कि वह लक्ष्य कहां कैसे प्राप्त होगा , परंतु उसे महादेव की वाणी पर संपूर्ण विश्वास था ।

यदि महादेव ने दक्षिण दिशा की ओर जाने को कहा है तो अवश्य ही दक्षिण दिशा की ओर ही उसे उसका लक्ष्य प्राप्त होगा।

चलते चलते गजेंद्र एक सुंदर सरोवर के निकट पहुंच जहां के वृक्ष सुंदर रसीले फलों से शोभायमान हो रहे थे, कुछ ही देर में सूर्यास्त भी होने वाला था तो गजेंद्र ने रात्रि में वही विश्राम करने का निर्णय किया ।

दिन भर चलते रहने के कारण गजेंद्र को भूख - प्यास भी बहुत लगी थी उन रसीले फलों को देखकर भूख और तेज हो गई थी, आश्चर्य की बात यह थी के आज तक कभी भी गजेंद्र को ना तो भूख और ना ही प्यास से कभी व्याकुल हुआ था , परंतु इस वन्य प्रदेश में प्रवेश करते ही न जाने क्यों उसकी भूख और प्यास बढ़ गई थी और साथ ही साथ थकान भी हो रही थी ।

कई घंटे युद्ध अभ्यास करने के पश्चात भी वह आज तक वह कभी थक नहीं था और इस वन्य प्रदेश में प्रवेश करने से पूर्व ना तो उसे थकान का और ना ही भूख और प्यास का भास हुआ था ।


गजेंद्र ने एक नजर सूर्य देव को देखा उसके अस्त होने में अभी कुछ समय शेष था तो उसने विचार किया कि पहले मैं स्नान कर लूं उसके पश्चात संध्या वंदन करके भरपेट फलों का आनंद लूंगा।

इक नजर उन फलो को देखते हुए ना जाने क्यूँ उन फलों से आने वाली सुगंध उसे बार बार आकर्षित कर रही थी परंतु अपने मन को नियंत्रण में करके ईक गहरी श्वास छोडकर उसने पहले स्नान करने का निश्चय किया।


स्नान करने के लिए गजेंद्र सरोवर के जल के भीतर उतर गया ।उसे सरोवर का जल अत्यंत शीतल था उसने सोचा थोड़ी देर स्नान करने से उसकी शरीर की सारी थकान दूर हो जाएगी परंतु आश्चर्य की बात यह थी क्या ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था जल की शीतलता का अनुभव केवल उसके बाहरी शरीर पर हो रहा था भीतर से तो उसे मानो ऐसा लग रहा था कि वह जल में नहीं जल के बाहर ही है।

सारी बातों को नजर नजरअंदाज करते हुए गजेंद्र ने स्नान संपूर्ण किया और सरोवर के बाहर आकर अपने वस्त्र पहन लिए।
वही के वृक्षों से उसने कुछ पत्ते तोड़कर एक द्रोण ( डोना ) बनाया तथा उसमें सरोवर का जल भरकर संध्या वंदन करने बैठ गया।
जल से आचमन करके अपने इष्ट का ध्यान करने लगा , परंतु वहां के फलों से आती हुई सुगंध और तीव्र हो गई थी और उसे सुगंध से साथ ही साथ उसकी भूख भी तीव्र हो गई थी उसके कारण वह ध्यान नहीं कर पा रहा था।
जैसे तैसे संध्या वंदन संपूर्ण करके उठा और सबसे पहले अपनी प्यास बुझाने के लिए सरोवर का जल डोने में भरकर पीने लगा , परंतु यहां भी कुछ अजीब सा हुआ वह जल पी तो रहा था परंतु उसे जल पीने का भास नहीं हो रहा था ।

जल पीने के पश्चात उसने वहां के फलदार वृक्षों से खाने के लिए कुछ फल एकत्रित कर लिए और सरोवर के निकट ही एक विशाल वृक्ष के नीचे साफ जगह देखकर उन फलों लेकर बैठ गया । गजेंद्र ने उन फलों में से एक फल खाने के लिए उठाया और मुंह तक ले गया ,
परंतु तभी इस वन्य प्रदेश में प्रवेश करने से लेकर अब तक की सारी घटनाएं उसके मन में प्रकट होने लगी ।

उसका अंतर्मन कह रहा था के उन फलों को मत खाओ परंतु अत्यंत भूख ने उसे पीड़ित कर रखा था इसलिए बहिरमन कह रहा था कि पहले फलों को खालो , बाद में देखा जाएगा जो होगा देवताओं की शक्ति इतना समर्थ होकर भी इन फलों से भयभीत होना उचित नहीं है और इस निर्जन वन में मेरा कोई भी अहित नहीं कर सकता , इसलिए उन फलों को खा लेना ही ठीक रहेगा ।


बहुत देर तक अंतर्मन और बाहर मन की उठा-पटक में बहुत समय व्यतीत हो गया , अंततः उसने विवेक से काम लेना का विचार किया ।
और उन फलों को एक तरफ रखकर वृक्ष का सहारा लेकर विश्राम करने लगा ।


उन फलों से निकलती हुई सुगंध उसे बारंबार अपनी ओर आकर्षित कर रही थी । परंतु वह बराबर अपने आपको रोके हुए था , उन फलों के खाने से ।

ऐसे ही कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात उसे कुछ दूरी पर किसी के आने की आहट सुनाई दी उसमें जब उसे ओर देखा तो पाया कि एक वृद्ध व्यक्ति जो अत्यंत जीर्ण अवस्था में , हाथ में एक डंडा पकड़े धीरे-धीरे उसी की ओर आ रहा था । उसकी कमर टेडी थी और शरीर से भी वह काफी दुर्बल लग रहा था चलते चलते अचानक


वह वृद्ध गजेंद्र से कुछ दूरी पर पगडंडी पर ठोकर लगने से गिर पडा ।

वृद्ध को गिरते हुए देखकर गजेंद्र तुरंत दौड़कर वहां पहुंचा और उस वृद्ध को सहारा देकर उठाकर बिठाया


गजेंद्र - बाबा आपको कहीं चोट तो नहीं लगी , इस अवस्था में इस निर्जन वन में इस समय आप कहां जा रहे हो अभी थोड़ी देर में रात्रि भी होने वाली है, आपसे तो चला भी नहीं जा रहा हैं ।

वृद्ध - बेटा अब क्या करें , बुढ़ापा इसी को तो कहते है और साथ में यह टेढ़ी कमर चलते चलते शरीर में मानो जान ही नहीं बची इसलिए गिर पड़ा।


गजेंद्र - परंतु बाबा इस समय आप कहां जा रहे हो और वह भी निर्जन प्रदेश से जहां न कोई जीव दिखाई पड़ता है ना ही कोई मनुष्य

वृद्ध - बेटा मैं पास के ही गांव में रहता हूं मैं एक वैद्य हूं और यहां वन में कुछ वनस्पतियां ढूंढने आया था ।

देखते ही देखते समय कैसा व्यतीत हुआ कुछ पता ही नहीं चला दिन भर के परिश्रम के और शरीर की इस अवस्था के कारण मुझ में अब और आगे जाने की शक्ति नहीं बची ।
वह तो अच्छा हुआ के तुम मुझे मिल गए नहीं तो मैं अकेला बूढ़ा इस वन में क्या करता ।

अभी तो रात्रि भी होने वाली है तो अपने गांव तक कैसे जाता अब तुम मिल गए हो तो रात्रि में यही विश्राम करके प्रातः अपने गांव की ओर निकलूंगा ।


वैसे बेटा मुझे भूख और प्यास भी बहुत लगी है क्या तुम्हारे पास कुछ खाने के लिए है

गजेंद्र - ज्यादा तो कुछ नहीं बाबा परंतु इस वन के वृक्षों के फल तोड़ कर रखे हैं लिए चलते हैं उसे विशाल वृक्ष के नीचे बैठकर आप फलों का आनंद लेना तब तक मैं आपके लिए सरवर से जल लेकर आता हूं

गजेंद्र उसे वृद्धि को सहारा देते हुए वृक्ष के नीचे तक ले आया और वहाँ बैठाकर जो फल एकत्रित किए थे वह फल उसे वृद्ध के सामने रख दिए ।

वृद्ध - बेटा तुम कौन हो यहां आस-पास के इलाके में मैंने पहले तो तुम्हें कभी नहीं देखा इस वन में तुम क्या कर रहे हो कहां से आए हो?

गजेंद्र - बाबा मैं बस एक मुसाफिर हूं जो अपने किसी लक्ष्य की खोज में निकला हूं मैं कौन हूं कहां से आया हूं यह सब बातें छोड़ दो , आप यह फल खाओ तब तक मैं आपके लिए सरोवर से जल लेकर आता हूं ।

इतना कहकर वह सरोवर में जल लेने के लिए चला गया जब जल लेकर वापस आया तो देखा क्यों सूरत ने एक भी फल नहीं खाया है ।

गजेंद्र - क्या बात है बाबा आप तो कह रहे थे कि आपको बहुत भूख लगी है आपने अब तक एक भी फल नहीं खाया ।

वृद्ध - पुत्र तुमने मेरी सहायता की और मेरे लिए ईतने रसीले फल खाने को दिए , परंतु तुमने अभी तक अपना परिचय नहीं दिया और तुम्हारे चेहरे से भी , यह प्रतीत होता है कि तुम्हें भी बहुत भूख लगी है , तो मैं अकेले कैसे खा लेता ।

पहले तुम अपना परिचय दो कि तुम कौन हो और यहां क्या करने आए हो उसके बाद हम दोनों साथ में मिलकर खाते हैं , क्योंकि शास्त्र कहता है किसी अपरिचित के हाथों कुछ नहीं खाना चाहिए ।

गजेंद्र - बाबा मेरा नाम गजेंद्र है और मैं एक बड़े उद्देश्य के लिए अपने लक्ष्य को खोज रहा हूं इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं बता सकता ।

वृद्ध - चलो कोई बात नहीं तुमने अपना नाम तो बताया कुछ फल गजेंद्र की ओर बढ़ते हुए यह लो तुम भी खाओ

गजेंद्र को फल देकर उस वृद्ध ने एक पल उठाया और खाने लगा और गजेंद्र बड़े ध्यान से उसे वृद्ध का निरीक्षण करने लगा क्योंकि उन फलों को लेकर उसके मन में एक शंका सी थी ।
जब उसने वृद्धि को फल खाते हुए देखा तो स्वयं भी एक फल उठाकर अपने मुख में रखकर खाने लगा जैसे ही फल उसने मुख में रखा उसका शरीर शिथिल पड़ने लगा नेत्र बंद होने लगे और एक मुर्छा सी आने लगी ,

पूर्ण रूप से मूर्छा में जाने से पहले उसने उस वृद्ध को अपने अधखुले नेत्रों से देखा ।

वह वृद्ध गजेंद्र को मूर्छित होता हुआ देखकर जोर-जोर से हंसने लगा अब उसकी टेढ़ी कमर भी सीधी हो गई थी और उसका रूप भी परिवर्तित हो गया अब वहाँ कोई वृद्ध नहीं था ।
उसका रूप बड़ा भयावह था लगभग 8 फुट जितना कद , लाल नेत्र , बड़ी-बड़ी मूंछे , बलिष्ठ भुजाएं बड़ा सा मुख मानव जैसे साक्षात यमराज ही हो ।

वहां उसकी भयानक हंसी गूंजने लगी थी हा हा हा हा हा हा

देखते ही देखते वहां लगभग 10 के करीब सैनिक भेष में और लोग आ गए उनकी भी कद काठी अच्छी खासी थी , हाथों में भाले लिए हुए वह सब गजेंद्र को ही घूर रहे थे ।


विशालकाय व्यक्ति - सैनिकों से इस प्रकार देखते ही रहोगे बांध दो इसे अपने आप को बड़ा चतुर समझ रहा था , आ गया ना मेरी कैद में हा हा हा हा
जल्दी-जल्दी बांधो कर ले चलो इस हमारे कारागृह में वहां जब यातनाएं मिलेगी तो अपना परिचय क्या अपने सात जन्मो का भी सब कुछ बता देगा ।

उन सैनिकों ने गजेंद्र को लोहे की जंजीरों में बांध दिया।

आज के लिए इतना ही --------
अगला अध्याय शीघ्र ही----------

स्वस्थ रहिए प्रसन्न रहिए
और कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें

धन्यवाद - आपका मित्र अभिनव 🙏🌹

Behad shandar update he jaggi57 Bhai,

Gajender ne kaafi samay tak vivek se kaam liya, lekin uski ek galti ne use bandi bana diya................khair jisne bhi gajender ko bandi banaya he.........vo bhi kuch kam mayavi nahi he...........lekin gajender ko jayada der tak koi bhi kaid me nahi rakh sakta.............

Ho sakta he gajender ko uski sangini bhi yahi par mile........

Agli update ki pratiksha rahegi Bhai
 
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sunoanuj

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Bahut hi behtarin updates… kadi dino baad updates aane shuru hue lekin bahut hi behtarin updates… gaiab Mitr …👏🏻👏🏻👏🏻👏🏻
 

jaggi57

Abhinav
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अध्याय - 15

अब तक आपने देखा कि गजेंद्र अपनी मंजिल की तलाश में एक मायावी वन में पहुंचा । वहां एक वृद्ध से उसकी भेंट हुई उसे वन के फलों को उसने उसे वृद्ध को दिया और स्वयं भी खाया उन फलों को खाते ही वह बेहोश हो गया और उसे वृद्ध में उसे बंदी बना लिया ।
अब आगे ----------

अब ना तो वहां कोई सरोवर था ना ही कोई फलदार वृक्ष उस सरोवर की जगह वहां एक सुखा रेतीला मैदान था ।

उस के ठीक विपरीत दिशा में एक पत्थर से बना हुआ चौड़ा रास्ता था यह स्थान यक्षो का निवास स्थान था और वह पथरिली सड़क यक्षों के नगर को जा रही थी और वह वृद्ध भी एक यक्ष था जिसे अपने नगर की सीमा की रक्षा करने के लिए तैनात किया हुआ था ।

उस यक्ष का नाम विरुपाक्ष था वह उस नगर की एक छोटी सी टुकड़ी का सेनानायक था उसका काम था नगर की सीमा की सुरक्षा करना और यदि कोई उसे सीमा के भीतर प्रवेश करता है तो उसे पकड़ कर बंदी बनाकर राजा के सम्मुख प्रस्तुत करना ।

उन सैनिकों ने गजेंद्र को लोहे की जंजीरों से बांध दिया और उठा कर ले जाने के लिए आगे बढ़े और गजेंद्र को उठाने का प्रयत्न करने लगे , परंतु आश्चर्य की बात यह थी की उनसे गजेंद्र को हिलाया तक ना गया ।

चार सैनिक गजेंद्र को उठाने का प्रयास करने लगे परंतु गजेंद्र तस से मस नहीं हो रहा था । विरुपाक्ष सब देखकर आवाक रह गया ।

विरुपाक्ष - क्या कर रहे हो तुम सब तुमसे एक अदना सा मानव नहीं उठाया जा रहा , जल्दी उठाओ इसे कई वर्षों बाद आज हमारे हाथ एक मानव लगा है , हमारे महाराज इसे देखकर अति प्रसन्न होंगे और तुमसे यह उठाया नहीं जा रहा।

अपने सेनानायक के ऐसा कहने पर दसों के दसों सैनिक गजेंद्र को उठाने में लग गए , परंतु वह सभी मिलकर भी गजेंद्र को तनीक भी हिला नहीं पाए ।

विरुपाक्ष - आश्चर्य की बात है कि तुम सब मिलकर भी इसे नहीं उठा पा रहे हो , लगता है तुम्हारा सारा बल समाप्त हो गया ।

एक सैनिक - क्षमा करें सेनानायक जी ! हम अपना पूरा प्रयास कर रहे हैं , अपना पूरा बल लगाकर भी हम इसे नहीं उठा पा रहे हैं । न जाने यह कैसी माया हैं लगता है के यह जैसा दिख रहा है वैसा है नही , ऐसा लग रहा है के हम सब किसी पर्वत को उठाने का प्रयास कर रहे हैं , अवश्य ही यह कोई मायावी है ।

विरुपाक्ष - हटो तुम सब ! लगता है अब मुझे ही इसे उठाना पड़ेगा ।

इतना कह कर उसने गजेंद्र की ओर अपने कदम बढ़ाए के तभी एक आवाज हुई और उसने देखा के दसों के दसों सैनिक हवा में उड़ते हुए दूर जाकर गिरे ।

एक क्षण में यह क्या हो गया यह सोचते हुए वह अपने सैनिकों की तरफ देखने लगा जो मिट्टी में पड़े कराह रहे थे । फिर उसने जब मुड़कर गजेंद्र की ओर देखा तो उसके के आश्चर्य की सीमा नहीं रही गजेंद्र खड़ा उसी की और देखकर मन्द मन्द मुस्कुरा रहा था ।
गजेंद्र को इस प्रकार खड़े देखकर वह बड़ा आश्चर्यचकित हुआ

गजेंद्र - हंसते हुए - ऐसे घूर-घूर कर क्या देख रहे हो । यह सोच रहे हो कि तुम्हारी माया कैसे भी विफल हो गई ।

विरुपाक्ष - देख रहा हूं कि तुम मूर्छा से कैसे बाहर आए और उन फलों का असर इतने शिघ्र कैसे समाप्त हो गया ।

गजेन्द्र - असर तो तब होता जब मैं उन फलों को खाता मैंने तो बस खाने का अभिनय किया था क्योंकि सब तुम मुझे तुम पर देखते ही हो गया था ।

विरुपाक्ष - असंभव इतनी सुदृढ़ माया का तुम्हें कैसे पता चला , जरूर तूम कोई मायावी हो या फिर मनुष्य के भेष में छुपे हो हुए कोई असुर ।

गजेंद्र - संदेह तो मुझे तभी हो गया था जब मैने इस मायावी वन्य प्रदेश में प्रवेश किया । शीतल जल से भरे हुए सरोवर और रसीले फलों से लदे हुए वृक्ष और सुगंधित फूलो के पौधे , इतना सब कुछ होने पर भी इस वन में एक भी वन्य जीव या पक्षी नहीं दिखा , जो कि असंभव बात थी , जब मै जल के भीतर गया तो उसी क्षण मुझे तूम्हारी माया का पता चल गया था ।

मुझे पता तो चल गया था यहां जो कुछ भी दिख रहा है वह सब मायावी है , परंतु मुझे प्रतीक्षा थी इस माया के रचयिता की जो तुमने आकर पूरी कर दी ।

जब मैंने तुम्हें वृद्ध के भेष में देखा तभी मैं पहचान गया कि इस सारी माया के पीछे तुम ही हो बस मैं तुम्हे और तुम्हारा उद्देश्य जानने के लिए अब तक रुका हुआ था ।

विरुपक्षा - हममम्म , जितना मैंने सोचा था तुम उससे भी कई अधिक चतुर निकले उद्देश्य तो मेरा स्पष्ट है कि मैं तुम्हें बंदी बनाकर अपने राजा के सम्मुख ले जाऊं ।

गजेंद्र - तुम अभी भी यह सोच रहे हो के मुझे बंदी बना सकोगे । अभी भी समय है मैं तुम्हें एक अवसर देता हूं अपना परिचय बताओ तुम कौन हो और यह कौन सी जगह है ।
तुमने यह कहा था के बहुत दिनों के बाद एक मानव हाथ लगा है मानव को देखकर राजा बड़े प्रसन्न होंगे , इस सब का तात्पर्य क्या है सब कुछ बताओ ।

विरुपाक्ष - तुम कौन होते हो मुझे अवसर देने वाले , मत भूलो कि अभी भी तुम मेरी कैद में हो और जंजीरों में जकड़े हुए हो ।
( फिर सैनिकों की तरफ देखते हुए जो अब तक खड़े हो चुके थे )
देख क्या रहे हो पकड़ो इसे मत भूलो कि तुम सब यक्ष हो और यक्षों की शक्ति के आगे एक अकेला क्या कर पाएगा अपनी शक्ति को जागृत करो

विरुपाक्ष के इतना कहते हैं वह दसों के दसों सैनिक यक्ष के रूप में परिवर्तित हो गए थे उनकी आंखें लाल रंग की रोशनी से चमकने लगी थी सभी बड़े भयानक प्रतीत हो रहे थे यदि कोई साधारण व्यक्ति देख भी ले तो अपने प्राण त्याग दे , वो दसो के दसो यक्ष गजेंद्र की ओर दौड़ पड़े ।

सही कहा है किसी ने विनाश काले विपरीत बुद्धि । जंजीरों में बंधे होने के पश्चात भी गजेंद्र की एक झटके से वे दस के दस सैनिक दूर जाकर गिरे थे , फिर भी उन्हें समझ नहीं आया कि सामने खड़ा व्यक्ति कोई साधारण नहीं ।

जब तक वह यक्ष गजेंद्र तक पहुंच पाए तब तक गजेंद्र ने अपने शरीर को एक झटका दिया और देखते ही देखते पल भर में वह मजबूत लोहे की जंजीरें टूट टूट कर धरती पर गिर पड़ी । वो सब चारो ओर से घेरकर उसकी ओर बढ़ रहे थे ।

गजेंद्र ने अपने सामने से आ रहे तीन यक्षों को देखा और हवा में उछाल कर अपने पैर का और दोनों हाथों का प्रयोग करते हुए उन तीनों पर एक साथ प्रहार किया बीच वाले के सीने पर अपने पैर के साथ और अगल-बगल वाले दो के चेहरे पर अपने पंजों के साथ वार किया और देखते ही देखते हैं वह तीनों भूमि पर धराशायी हो गए ।

वह तीनों ही अब भूमि पर से उठने के अवस्था में नहीं थे तीनों के तीनों बेहोश हो गए । यह सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि किसी को कुछ भी समझ में नहीं आया । गजेंद्र कब जंजीरों से मुक्त हुआ और कब उन तीन सैनिकों पर प्रहार किया बाकी सैनिक और विरुपाक्ष को पता ही नहीं चला ।

अपने सामने अपने तीन साथियों का यह हाल देखकर बाकी सैनिक समय की गंभीरता को समझ गए थे , वो सब क्रोध से भर गए थे । गजेंद्र उन तीनों को धराशाई करके खड़ा हो विरुपाक्ष की ओर देखकर मुस्कुरा रहा था की तभी बाकी सैनिकों ने उसके पीछे से और दोनो ओर से एक साथ प्रहार किया ।

उनका शरीर गजेंद्र के शरीर से काफी बड़ा था । उनमे से पहले चारों ने गजेंद्र के ऊपर छलांग लगाई , उनके वार को गजेंद्र समझ गया था , और वह भूमि पर अपना एक घुटना टिका कर बैठ गया , चारों के चारों सैनिक उसके ऊपर जाकर गिरे बाकी तीनों ने देखा , के उनका शत्रु उनके चार साथियों के नीचे दब गया है तो बाकी तीन भी कूद पड़े और उसके ऊपर लेट गए वो सातों के सातों गजेंद्र को भूमि पर मसलकर अपना क्रोध निकालना चाहते थे ।

विरुपाक्ष चुपचाप खड़ा उन्हें देख रहा था मानो वह अपने शत्रु के बल का निरीक्षण कर रहा हो जब उसने देखा उसके सैनिकों ने गजेंद्र को अपने नीचे दबा लिया है तब ------

विरुपाक्ष - अरे अरे ! बस करो ! ध्यान रहे हमें ईसे जीवित पकड़ना है ।

अभी उसने इतना कहा ही था कि के तभी वह सभी सैनिक जोर से चीख पड़े और देखते ही देखते वो सातो के सातो तो दूर उछलकर गिर पड़े उन सबकी अवस्था ऐसी हो गई थी वह अब भूमि पर से हील भी नहीं पा रहे थे ।

गजेंद्र उसकी और देखकर मुस्कुरा रहा था जैसे यह सब उसके लिए एक खेल हो अपने सैनिकों की ऐसी दशा देखकर विरुपाक्ष तंत्र क्रोध में भर गया

गजेंद्र - तुम्हारे पास अभी भी समय है संभल जाओ जो कुछ मैंने पूछा है वह सीधे-सीधे बता दो अन्यथा परिणाम भयंकर होंगे , अपने सैनिकों की हालत तो तुम देख ही चुके हो ।

वीरूपाक्ष - इन सैनिकों को परास्त कर तुम यह समझ रहे हो कि मेरा सामना कर लोगे , इनकी तूलना तूम मुझसे कर रहे हो , मैं विरुपाक्ष हूं विरुपाक्ष ! अब तक तो मैं केवल तुम्हें परख रहा था ।

इतना कहकर वह गजेंद्र की ओर अपनी तलवार उठाकर बड़े वेग के साथ चल पड़ा परंतु गजेंद्र भी अपनी जगह से तनिक भी नहीं हिला ।
विरुपाक्ष ने अपनी तलवार का भरपूर प्रहार गजेंद्र की सर की ओर किया , तब तक गजेंद्र ने भी अपनी तलवार प्रकट कर ली थी तीव्र गति के साथ विरुपाक्ष के किए हुए प्रहार को उसने अपने तलवार पर रोक दिया और कलाई को घुमाते हुए उसके हाथ को एक जोर का झटका देते हुए अपने पैर से उसके सीने पर एक जोरदार प्रहार किया उसके प्रभाव से विरुपाक्ष उड़ता हुआ पीछे की ओर गिर पडा ।

उसे तनिक भी इस प्रकार के वार की आशा नहीं थी परंतु वह भी कुछ कम नहीं था नीचे गिरते ही वह तुरंत छलांग लगाकर खड़ा हो गया - वह वह क्या बात है अति सुंदर ।

इतना का कर वह पुनः गजेंद्र की ओर बढ़ा अबकी बार गजेंद्र भी अपनी तलवार के साथ उसकी और बढा , दोनों की तलवारे है आपस में टकराई , तलवारबाजी में दोनों में से कोई भी किसी से काम नहीं था ।

गजेंद्र ने अपनी तलवार का सीधा प्रहार उसके पेट की ओर किया तो वीरूपाक्ष ने भी अपनी तलवार से उस प्रहार को रोक कर और साथ ही साथ घूमा कर एक झटका दिया और अपने कंधे से एक जोरदार प्रहार गजेंद्र के सीने पर किया जिसके प्रभाव से गजेंद्र चार कदम दूर तक पीछे की ओर चला गया ।

तुरंत संभलकर गजेंद्र हवा में उछला और कलाबाजिया खाता हुआ अपनी तलवार का भरपूर वर विरुपाक्ष पर किया अपने सिर की तरफ वार होता हुआ देखकर उसने उस वार को अपनी तलवार पर रोक लिया और तुरंत वहां से हट गया परंतु गजेंद्र का प्रहार इतनी जोरदार था की विरुपाक्ष की तलवार दूर से टक्कर भूमि पर गिर गई ।

गजेंद्र - अभी भी लड़ने की इच्छा है या अपनी हार मानते हो ।

विरुपाक्ष - मुझे निशस्त्र करके तुम क्या समझते हो तुम जीत गए , तुमसे लड़ने के लिए मुझे किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं है अपना प्रहार करो ।

गजेंद्र - यदि तुम अभी भी लड़ना चाहते हो तो यही सही ।

अपने प्रतिद्वंद्वी को निशस्त्र देखकर उसने भी अपनी तलवार त्याग दी , अब दोनों योद्धा मल्ल युद्ध में अपने दांव पेच एक दूसरे पर प्रयोग करने लगे ।

गजेंद्र ने अपनी मुष्ठी का प्रहार उसके सीने की ओर किया तो विरुपाक्ष में भी बड़ी फुर्ती के साथ गजेंद्र का हाथ पकड़ कर घुमा दिया और उसके पीछे चला गया अभी वह उसे कमर से पकड़ कर ऊपर उठाने ही वाला था के गजेंद्र ने अपना हाथ पीछे ले जाकर विरुपाक्ष की गर्दन को पीछे से पकड़ा और धोबीपछाड देते हुए आगे की ओर उछाल दिया ।
इसके प्रभाव से विरुपाक्ष भूमि पर गिर पड़ा परंतु बड़ी फुर्ती के साथ तुरंत संभाल कर खड़ा हो गया ।

अब दोनों फिर मतवाले हाथी की तरह एक दूसरे से भिड़ गए दोनों पंजों में पंजे फंसाए एक दूसरे पर अपना जोर आजमा रहे थे और एक दूसरे पर अपना दांव चला रहे थे ।

ऐसे ही एक दांव में विरुपाक्ष ने गजेंद्र को कमर से पड़कर ऊपर की ओर उठाया इससे पहले कि वह उसे भूमि पर पटकता गजेंद्र हवा में कलाबाजिया खाता हुआ संभाल कर नीचे आ गया और बड़ी फुर्ती के साथ विरुपाक्ष उठाकर भूमि पर पटक दिया अब तक के युद्ध में विरुपाक्ष समझ गया था यहां बल का प्रयोग करके कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला है ।

सूर्य नारायण भी अस्तांचल की ओर चल पड़े थे , अभी अंधेरा होना शुरू हो गया था इसलिए गजेंद्र भी जल्द से जल्द इस युद्ध को समाप्त करना चाहता था ।

यहां भूमि पर पड़े पड़े ही विरुपाक्ष में जब गजेंद्र को अपनी ओर आता हुआ देखा तो उसने अपनी पूरी ऊर्जा एकत्रित करके गजेंद्र पर प्रहार किया इस प्रहार के लिए गजेंद्र सज्ज नहीं था अचानक ऊर्जा प्रहार के टकराने से गजेंद्र पीछे की ओर भूमि पर गिर पड़ा ।

प्रहार इतना जोरदार था के अगर गजेंद्र के सिवा कोई और होता तो वह उस प्रहार के प्रभाव से भस्म हो गया होता ।

वह प्रहार एक यक्ष की संपूर्ण ऊर्जा का था जिसका प्रभाव गजेंद्र के शरीर पर भी हुआ उसके सीने पर हल्के से घाव का निशान बन गया और साथ ही साथ पीड़ा भी होने लगी थी ।
अपनी पीड़ा को वश में करके गजेंद्र तुरंत उठ खड़ा हुआ तब तक विरुपाक्ष भी खड़ा हो गया था अपने इतनी घातक प्रहार से गजेंद्र को कुछ ना होता हुआ देखकर वह बड़ा आश्चर्यचकित हो गया ।

अब उसने अपना अंतिम प्रयास यक्षास्त्र का प्रयोग करने का निश्चय किया ।
उसने अपने दोनों हाथ फैलाये और देखते ही देखते आकाश से प्रचंड ऊर्जा उसके हाथों में समाने लगी जिसने एक अस्त्र का रूप धारण कर लिया विरुपाक्ष ने उस अस्त्र को अपनी पूर्ण शक्ति लगाकर गजेंद्र की ओर प्रहार किया तीव्र गति से धधकता हुआ , प्रचंड उर्जा से चमकते हुए उस अस्त्र को जब गजेंद्र ने अपनी ओर आता हुआ देखा ।

तो उसने तुरंत महादेव द्वारा दिए गए शूल का आह्वान किया और उस शूल पर उस अस्त्र को रोक दिया शूल से टकराते ही एक भयंकर ध्वनी के साथ वह अस्त्र शांत हो गया और उसकी सारी ऊर्जा उस शूल में समा गई ।

अपने प्रचंड अस्त्र को इस प्रकार विफल होता हुआ देखकर और उसकी ऊर्जा गजेंद्र के शूल में समाते हुए देखकर विरुपाक्ष ने अब हार मान ली, वह जान गया के साने खडा व्यक्ति कोई साधारण नही है , क्योंकी उसके चलाए हुए अस्त्र को निश्क्रिय केवल महादेव या उनके अंशभूत ही शांत कर सकते है ,और उसकी शक्ति सोख सकते हैं , इसीलिए वह हाथ जोड़कर अपने घुटने टेक कर भूमि पर बैठ गया ।

आज के लिए इतना ही ------
अगला अध्याय शीघ्र ही --------

सभी पाठकों से अनुरोध है इस कहानी पर अपने प्रतिक्रिया अवश्य दें ,धन्यवाद 🙏🌹🌹
स्वस्थ रहे प्रसन्न रहे ,


आपका मित्र - अभिनव
 

Ajju Landwalia

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अध्याय - 15

अब तक आपने देखा कि गजेंद्र अपनी मंजिल की तलाश में एक मायावी वन में पहुंचा । वहां एक वृद्ध से उसकी भेंट हुई उसे वन के फलों को उसने उसे वृद्ध को दिया और स्वयं भी खाया उन फलों को खाते ही वह बेहोश हो गया और उसे वृद्ध में उसे बंदी बना लिया ।
अब आगे ----------

अब ना तो वहां कोई सरोवर था ना ही कोई फलदार वृक्ष उस सरोवर की जगह वहां एक सुखा रेतीला मैदान था ।

उस के ठीक विपरीत दिशा में एक पत्थर से बना हुआ चौड़ा रास्ता था यह स्थान यक्षो का निवास स्थान था और वह पथरिली सड़क यक्षों के नगर को जा रही थी और वह वृद्ध भी एक यक्ष था जिसे अपने नगर की सीमा की रक्षा करने के लिए तैनात किया हुआ था ।

उस यक्ष का नाम विरुपाक्ष था वह उस नगर की एक छोटी सी टुकड़ी का सेनानायक था उसका काम था नगर की सीमा की सुरक्षा करना और यदि कोई उसे सीमा के भीतर प्रवेश करता है तो उसे पकड़ कर बंदी बनाकर राजा के सम्मुख प्रस्तुत करना ।

उन सैनिकों ने गजेंद्र को लोहे की जंजीरों से बांध दिया और उठा कर ले जाने के लिए आगे बढ़े और गजेंद्र को उठाने का प्रयत्न करने लगे , परंतु आश्चर्य की बात यह थी की उनसे गजेंद्र को हिलाया तक ना गया ।

चार सैनिक गजेंद्र को उठाने का प्रयास करने लगे परंतु गजेंद्र तस से मस नहीं हो रहा था । विरुपाक्ष सब देखकर आवाक रह गया ।


विरुपाक्ष - क्या कर रहे हो तुम सब तुमसे एक अदना सा मानव नहीं उठाया जा रहा , जल्दी उठाओ इसे कई वर्षों बाद आज हमारे हाथ एक मानव लगा है , हमारे महाराज इसे देखकर अति प्रसन्न होंगे और तुमसे यह उठाया नहीं जा रहा।

अपने सेनानायक के ऐसा कहने पर दसों के दसों सैनिक गजेंद्र को उठाने में लग गए , परंतु वह सभी मिलकर भी गजेंद्र को तनीक भी हिला नहीं पाए ।

विरुपाक्ष - आश्चर्य की बात है कि तुम सब मिलकर भी इसे नहीं उठा पा रहे हो , लगता है तुम्हारा सारा बल समाप्त हो गया ।

एक सैनिक - क्षमा करें सेनानायक जी ! हम अपना पूरा प्रयास कर रहे हैं , अपना पूरा बल लगाकर भी हम इसे नहीं उठा पा रहे हैं । न जाने यह कैसी माया हैं लगता है के यह जैसा दिख रहा है वैसा है नही , ऐसा लग रहा है के हम सब किसी पर्वत को उठाने का प्रयास कर रहे हैं , अवश्य ही यह कोई मायावी है ।

विरुपाक्ष - हटो तुम सब ! लगता है अब मुझे ही इसे उठाना पड़ेगा ।

इतना कह कर उसने गजेंद्र की ओर अपने कदम बढ़ाए के तभी एक आवाज हुई और उसने देखा के दसों के दसों सैनिक हवा में उड़ते हुए दूर जाकर गिरे ।


एक क्षण में यह क्या हो गया यह सोचते हुए वह अपने सैनिकों की तरफ देखने लगा जो मिट्टी में पड़े कराह रहे थे । फिर उसने जब मुड़कर गजेंद्र की ओर देखा तो उसके के आश्चर्य की सीमा नहीं रही गजेंद्र खड़ा उसी की और देखकर मन्द मन्द मुस्कुरा रहा था ।
गजेंद्र को इस प्रकार खड़े देखकर वह बड़ा आश्चर्यचकित हुआ


गजेंद्र - हंसते हुए - ऐसे घूर-घूर कर क्या देख रहे हो । यह सोच रहे हो कि तुम्हारी माया कैसे भी विफल हो गई ।

विरुपाक्ष - देख रहा हूं कि तुम मूर्छा से कैसे बाहर आए और उन फलों का असर इतने शिघ्र कैसे समाप्त हो गया ।

गजेन्द्र - असर तो तब होता जब मैं उन फलों को खाता मैंने तो बस खाने का अभिनय किया था क्योंकि सब तुम मुझे तुम पर देखते ही हो गया था ।

विरुपाक्ष - असंभव इतनी सुदृढ़ माया का तुम्हें कैसे पता चला , जरूर तूम कोई मायावी हो या फिर मनुष्य के भेष में छुपे हो हुए कोई असुर ।

गजेंद्र - संदेह तो मुझे तभी हो गया था जब मैने इस मायावी वन्य प्रदेश में प्रवेश किया । शीतल जल से भरे हुए सरोवर और रसीले फलों से लदे हुए वृक्ष और सुगंधित फूलो के पौधे , इतना सब कुछ होने पर भी इस वन में एक भी वन्य जीव या पक्षी नहीं दिखा , जो कि असंभव बात थी , जब मै जल के भीतर गया तो उसी क्षण मुझे तूम्हारी माया का पता चल गया था ।

मुझे पता तो चल गया था यहां जो कुछ भी दिख रहा है वह सब मायावी है , परंतु मुझे प्रतीक्षा थी इस माया के रचयिता की जो तुमने आकर पूरी कर दी ।

जब मैंने तुम्हें वृद्ध के भेष में देखा तभी मैं पहचान गया कि इस सारी माया के पीछे तुम ही हो बस मैं तुम्हे और तुम्हारा उद्देश्य जानने के लिए अब तक रुका हुआ था ।


विरुपक्षा - हममम्म , जितना मैंने सोचा था तुम उससे भी कई अधिक चतुर निकले उद्देश्य तो मेरा स्पष्ट है कि मैं तुम्हें बंदी बनाकर अपने राजा के सम्मुख ले जाऊं ।

गजेंद्र - तुम अभी भी यह सोच रहे हो के मुझे बंदी बना सकोगे । अभी भी समय है मैं तुम्हें एक अवसर देता हूं अपना परिचय बताओ तुम कौन हो और यह कौन सी जगह है ।
तुमने यह कहा था के बहुत दिनों के बाद एक मानव हाथ लगा है मानव को देखकर राजा बड़े प्रसन्न होंगे , इस सब का तात्पर्य क्या है सब कुछ बताओ ।


विरुपाक्ष - तुम कौन होते हो मुझे अवसर देने वाले , मत भूलो कि अभी भी तुम मेरी कैद में हो और जंजीरों में जकड़े हुए हो ।
( फिर सैनिकों की तरफ देखते हुए जो अब तक खड़े हो चुके थे )
देख क्या रहे हो पकड़ो इसे मत भूलो कि तुम सब यक्ष हो और यक्षों की शक्ति के आगे एक अकेला क्या कर पाएगा अपनी शक्ति को जागृत करो


विरुपाक्ष के इतना कहते हैं वह दसों के दसों सैनिक यक्ष के रूप में परिवर्तित हो गए थे उनकी आंखें लाल रंग की रोशनी से चमकने लगी थी सभी बड़े भयानक प्रतीत हो रहे थे यदि कोई साधारण व्यक्ति देख भी ले तो अपने प्राण त्याग दे , वो दसो के दसो यक्ष गजेंद्र की ओर दौड़ पड़े ।

सही कहा है किसी ने विनाश काले विपरीत बुद्धि । जंजीरों में बंधे होने के पश्चात भी गजेंद्र की एक झटके से वे दस के दस सैनिक दूर जाकर गिरे थे , फिर भी उन्हें समझ नहीं आया कि सामने खड़ा व्यक्ति कोई साधारण नहीं ।

जब तक वह यक्ष गजेंद्र तक पहुंच पाए तब तक गजेंद्र ने अपने शरीर को एक झटका दिया और देखते ही देखते पल भर में वह मजबूत लोहे की जंजीरें टूट टूट कर धरती पर गिर पड़ी । वो सब चारो ओर से घेरकर उसकी ओर बढ़ रहे थे ।

गजेंद्र ने अपने सामने से आ रहे तीन यक्षों को देखा और हवा में उछाल कर अपने पैर का और दोनों हाथों का प्रयोग करते हुए उन तीनों पर एक साथ प्रहार किया बीच वाले के सीने पर अपने पैर के साथ और अगल-बगल वाले दो के चेहरे पर अपने पंजों के साथ वार किया और देखते ही देखते हैं वह तीनों भूमि पर धराशायी हो गए ।

वह तीनों ही अब भूमि पर से उठने के अवस्था में नहीं थे तीनों के तीनों बेहोश हो गए । यह सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि किसी को कुछ भी समझ में नहीं आया । गजेंद्र कब जंजीरों से मुक्त हुआ और कब उन तीन सैनिकों पर प्रहार किया बाकी सैनिक और विरुपाक्ष को पता ही नहीं चला ।


अपने सामने अपने तीन साथियों का यह हाल देखकर बाकी सैनिक समय की गंभीरता को समझ गए थे , वो सब क्रोध से भर गए थे । गजेंद्र उन तीनों को धराशाई करके खड़ा हो विरुपाक्ष की ओर देखकर मुस्कुरा रहा था की तभी बाकी सैनिकों ने उसके पीछे से और दोनो ओर से एक साथ प्रहार किया ।

उनका शरीर गजेंद्र के शरीर से काफी बड़ा था । उनमे से पहले चारों ने गजेंद्र के ऊपर छलांग लगाई , उनके वार को गजेंद्र समझ गया था , और वह भूमि पर अपना एक घुटना टिका कर बैठ गया , चारों के चारों सैनिक उसके ऊपर जाकर गिरे बाकी तीनों ने देखा , के उनका शत्रु उनके चार साथियों के नीचे दब गया है तो बाकी तीन भी कूद पड़े और उसके ऊपर लेट गए वो सातों के सातों गजेंद्र को भूमि पर मसलकर अपना क्रोध निकालना चाहते थे ।


विरुपाक्ष चुपचाप खड़ा उन्हें देख रहा था मानो वह अपने शत्रु के बल का निरीक्षण कर रहा हो जब उसने देखा उसके सैनिकों ने गजेंद्र को अपने नीचे दबा लिया है तब ------

विरुपाक्ष - अरे अरे ! बस करो ! ध्यान रहे हमें ईसे जीवित पकड़ना है ।

अभी उसने इतना कहा ही था कि के तभी वह सभी सैनिक जोर से चीख पड़े और देखते ही देखते वो सातो के सातो तो दूर उछलकर गिर पड़े उन सबकी अवस्था ऐसी हो गई थी वह अब भूमि पर से हील भी नहीं पा रहे थे ।


गजेंद्र उसकी और देखकर मुस्कुरा रहा था जैसे यह सब उसके लिए एक खेल हो अपने सैनिकों की ऐसी दशा देखकर विरुपाक्ष तंत्र क्रोध में भर गया

गजेंद्र - तुम्हारे पास अभी भी समय है संभल जाओ जो कुछ मैंने पूछा है वह सीधे-सीधे बता दो अन्यथा परिणाम भयंकर होंगे , अपने सैनिकों की हालत तो तुम देख ही चुके हो ।

वीरूपाक्ष - इन सैनिकों को परास्त कर तुम यह समझ रहे हो कि मेरा सामना कर लोगे , इनकी तूलना तूम मुझसे कर रहे हो , मैं विरुपाक्ष हूं विरुपाक्ष ! अब तक तो मैं केवल तुम्हें परख रहा था ।

इतना कहकर वह गजेंद्र की ओर अपनी तलवार उठाकर बड़े वेग के साथ चल पड़ा परंतु गजेंद्र भी अपनी जगह से तनिक भी नहीं हिला ।
विरुपाक्ष ने अपनी तलवार का भरपूर प्रहार गजेंद्र की सर की ओर किया , तब तक गजेंद्र ने भी अपनी तलवार प्रकट कर ली थी तीव्र गति के साथ विरुपाक्ष के किए हुए प्रहार को उसने अपने तलवार पर रोक दिया और कलाई को घुमाते हुए उसके हाथ को एक जोर का झटका देते हुए अपने पैर से उसके सीने पर एक जोरदार प्रहार किया उसके प्रभाव से विरुपाक्ष उड़ता हुआ पीछे की ओर गिर पडा ।

उसे तनिक भी इस प्रकार के वार की आशा नहीं थी परंतु वह भी कुछ कम नहीं था नीचे गिरते ही वह तुरंत छलांग लगाकर खड़ा हो गया - वह वह क्या बात है अति सुंदर ।

इतना का कर वह पुनः गजेंद्र की ओर बढ़ा अबकी बार गजेंद्र भी अपनी तलवार के साथ उसकी और बढा , दोनों की तलवारे है आपस में टकराई , तलवारबाजी में दोनों में से कोई भी किसी से काम नहीं था ।

गजेंद्र ने अपनी तलवार का सीधा प्रहार उसके पेट की ओर किया तो वीरूपाक्ष ने भी अपनी तलवार से उस प्रहार को रोक कर और साथ ही साथ घूमा कर एक झटका दिया और अपने कंधे से एक जोरदार प्रहार गजेंद्र के सीने पर किया जिसके प्रभाव से गजेंद्र चार कदम दूर तक पीछे की ओर चला गया ।

तुरंत संभलकर गजेंद्र हवा में उछला और कलाबाजिया खाता हुआ अपनी तलवार का भरपूर वर विरुपाक्ष पर किया अपने सिर की तरफ वार होता हुआ देखकर उसने उस वार को अपनी तलवार पर रोक लिया और तुरंत वहां से हट गया परंतु गजेंद्र का प्रहार इतनी जोरदार था की विरुपाक्ष की तलवार दूर से टक्कर भूमि पर गिर गई ।

गजेंद्र - अभी भी लड़ने की इच्छा है या अपनी हार मानते हो ।

विरुपाक्ष - मुझे निशस्त्र करके तुम क्या समझते हो तुम जीत गए , तुमसे लड़ने के लिए मुझे किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं है अपना प्रहार करो ।

गजेंद्र - यदि तुम अभी भी लड़ना चाहते हो तो यही सही ।

अपने प्रतिद्वंद्वी को निशस्त्र देखकर उसने भी अपनी तलवार त्याग दी , अब दोनों योद्धा मल्ल युद्ध में अपने दांव पेच एक दूसरे पर प्रयोग करने लगे ।

गजेंद्र ने अपनी मुष्ठी का प्रहार उसके सीने की ओर किया तो विरुपाक्ष में भी बड़ी फुर्ती के साथ गजेंद्र का हाथ पकड़ कर घुमा दिया और उसके पीछे चला गया अभी वह उसे कमर से पकड़ कर ऊपर उठाने ही वाला था के गजेंद्र ने अपना हाथ पीछे ले जाकर विरुपाक्ष की गर्दन को पीछे से पकड़ा और धोबीपछाड देते हुए आगे की ओर उछाल दिया ।
इसके प्रभाव से विरुपाक्ष भूमि पर गिर पड़ा परंतु बड़ी फुर्ती के साथ तुरंत संभाल कर खड़ा हो गया ।

अब दोनों फिर मतवाले हाथी की तरह एक दूसरे से भिड़ गए दोनों पंजों में पंजे फंसाए एक दूसरे पर अपना जोर आजमा रहे थे और एक दूसरे पर अपना दांव चला रहे थे ।

ऐसे ही एक दांव में विरुपाक्ष ने गजेंद्र को कमर से पड़कर ऊपर की ओर उठाया इससे पहले कि वह उसे भूमि पर पटकता गजेंद्र हवा में कलाबाजिया खाता हुआ संभाल कर नीचे आ गया और बड़ी फुर्ती के साथ विरुपाक्ष उठाकर भूमि पर पटक दिया अब तक के युद्ध में विरुपाक्ष समझ गया था यहां बल का प्रयोग करके कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला है ।

सूर्य नारायण भी अस्तांचल की ओर चल पड़े थे , अभी अंधेरा होना शुरू हो गया था इसलिए गजेंद्र भी जल्द से जल्द इस युद्ध को समाप्त करना चाहता था ।

यहां भूमि पर पड़े पड़े ही विरुपाक्ष में जब गजेंद्र को अपनी ओर आता हुआ देखा तो उसने अपनी पूरी ऊर्जा एकत्रित करके गजेंद्र पर प्रहार किया इस प्रहार के लिए गजेंद्र सज्ज नहीं था अचानक ऊर्जा प्रहार के टकराने से गजेंद्र पीछे की ओर भूमि पर गिर पड़ा ।

प्रहार इतना जोरदार था के अगर गजेंद्र के सिवा कोई और होता तो वह उस प्रहार के प्रभाव से भस्म हो गया होता ।

वह प्रहार एक यक्ष की संपूर्ण ऊर्जा का था जिसका प्रभाव गजेंद्र के शरीर पर भी हुआ उसके सीने पर हल्के से घाव का निशान बन गया और साथ ही साथ पीड़ा भी होने लगी थी ।
अपनी पीड़ा को वश में करके गजेंद्र तुरंत उठ खड़ा हुआ तब तक विरुपाक्ष भी खड़ा हो गया था अपने इतनी घातक प्रहार से गजेंद्र को कुछ ना होता हुआ देखकर वह बड़ा आश्चर्यचकित हो गया ।


अब उसने अपना अंतिम प्रयास यक्षास्त्र का प्रयोग करने का निश्चय किया ।
उसने अपने दोनों हाथ फैलाये और देखते ही देखते आकाश से प्रचंड ऊर्जा उसके हाथों में समाने लगी जिसने एक अस्त्र का रूप धारण कर लिया विरुपाक्ष ने उस अस्त्र को अपनी पूर्ण शक्ति लगाकर गजेंद्र की ओर प्रहार किया तीव्र गति से धधकता हुआ , प्रचंड उर्जा से चमकते हुए उस अस्त्र को जब गजेंद्र ने अपनी ओर आता हुआ देखा ।


तो उसने तुरंत महादेव द्वारा दिए गए शूल का आह्वान किया और उस शूल पर उस अस्त्र को रोक दिया शूल से टकराते ही एक भयंकर ध्वनी के साथ वह अस्त्र शांत हो गया और उसकी सारी ऊर्जा उस शूल में समा गई ।

अपने प्रचंड अस्त्र को इस प्रकार विफल होता हुआ देखकर और उसकी ऊर्जा गजेंद्र के शूल में समाते हुए देखकर विरुपाक्ष ने अब हार मान ली, वह जान गया के साने खडा व्यक्ति कोई साधारण नही है , क्योंकी उसके चलाए हुए अस्त्र को निश्क्रिय केवल महादेव या उनके अंशभूत ही शांत कर सकते है ,और उसकी शक्ति सोख सकते हैं , इसीलिए वह हाथ जोड़कर अपने घुटने टेक कर भूमि पर बैठ गया ।


आज के लिए इतना ही ------
अगला अध्याय शीघ्र ही --------

सभी पाठकों से अनुरोध है इस कहानी पर अपने प्रतिक्रिया अवश्य दें ,धन्यवाद 🙏🌹🌹

स्वस्थ रहे प्रसन्न रहे ,

आपका मित्र - अभिनव

Adhbhud update he jaggi57 Abhinav Bhai,

Gajender aur Virupaksh ke yudh ka bahut hi sunder chitran kiya he aapne................kaafi dino baad koi dev lok apar aadharit kahani padhne ko mili he.........

Gazab ka likha rahe ho aap Bhai.............Keep posting
 
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