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Erotica जोरू का गुलाम उर्फ़ जे के जी

komaalrani

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जोरू का गुलाम भाग २६१ पृष्ठ १६४७

मिसेज मोइत्रा की बेटियां घर में,
मिसेज मोइत्रा क्लब में, ---मस्ती नॉनस्टॉप


एक सुपर डुपर १०, हजार शब्दों का अपडेट पोस्टेड

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मिसेज मोइत्रा और उनके रसगुल्ले

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मिसेज मोइत्रा की दोनों बेटियों की बुलबुलों में आग लगी हुयी थी,


लेकिन उनसे ज्यादा मिसेज मोइत्रा गर्मायी हुईं थी, और बस यही सोच रही थीं, ये स्साला लौंडा, अगर आज पट जाए और किसी तरह रात में उनके पास रुक जाए तो बस, मिसेज मोइत्रा का १६ साल का उपवास आज ख़त्म हो जाए। कोमल ने तो बोला ही है की वो अपनी दोनों छोटी बहनों को शाम को पार्टी के बाद अपने साथ ले जायेगी, मंजू तो अभी चली जायेगी और २४ घंटे बाद कल दोपहर को लौटेगी, फिर तो, अगर ये सीधे से नहीं मानेगा तो मिसेज मोइत्रा ने तय कर लिया था उसका रेप कर देंगी। ललचाता तो है ही उनके जोबन पे वो, अपनी दोनों सालियों को छोड़ के सास के चक्कर में पड़ा रहता है, तो ले ले न जोबन का रस, बस यही है की कुछ ज्यादा ही शर्मीला है तो भले आज जबरदस्त जबरदस्ती करनी पड़े, बिना उसे पेले वो छोड़ेंगी नहीं।


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और गाजर की खीर भी पी गया , तो असर तो उसका होगा ही, आज तक मंजू की कोई बात गलत नहीं हुई है।

चार साड़ियां मिसेज मोइत्रा बदल चुकी थीं और अंत में आलमोस्ट ट्रांसपेरेंट आग लगाने वाली एक रेड शिफॉन की साडी उन्होंने निकाली, उनके भरे बदन पे, गोर रंग पे खूब फबती थी और साथ का एक मैचिंग लो कट का ब्लाउज भी , और उसे कूल्हे के नीचे से बाँधा , उन्हें मालूम था उनकी गहरी नाभि का मर्दो पर क्या असर पड़ता है, गोरा चिकना पेट, चौड़े कूल्हे, और गहरी नाभी, किसी का भी ईमान डोल जाता,


वो शीशे से अपनी बेटियों की छेड़खानी देख रही थीं।



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दोनों एकदम अपने जीजू की तरह बुद्धू हैं। मिसेज मोइत्रा ने शीशे में अपनी बेटियों को देखते हुए सोचा, 'अगर उन की जगह वो होती और उनका कोई जीजू ऐसा हैंडसम होता तो अब तक कब का शीशे में उतार चुकी होतीं "

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खीर कब की ख़त्म हो चुकी थी, और छुटकी अब अपने जीजू को अपने हाथ से पानी पिला रही थी, और वो बार बार जिद कर रहे थे अपने हाथ से पानी पीने को, बड़ी ने छुटकी को कुछ इशारा किया और छीना झपटी में पानी 'सीधे वहीँ ' गिरा जहाँ खूंटा तना था, और एकम भीग गया।

अब तो दोनों दुष्टों को मौका मिल गया, " अरे जीजू इत्ते जोर से आ रही थी तो वाशरूम चले जाते " बड़ी बोली

" अरे मैं बाहर से खड़ी खड़ी सु सु सु सु बोल भी देती, आप कहते तो " छुटकी ने चिढ़ाया।

मिसेज मोइत्रा तो शीशे में देख रही थीं लेकिन मंजू साफ़ साफ़ देख रही थी और उसने जोर से दोनों लड़कियों को चिढ़ाया, " जब वो पानी गिरायेगा न सफ़ेद वाला तो पता चलेगा, पेट फूलने लगेगा , गाभिन हो जाओगी "

" अरे आप भी न, हिम्मत है क्या इनकी ? फिर आप पहले की बात बोल रही हैं, अब दवा आती है, पहले खाओ, बाद में खाओ, कोई पेट वेट नहीं फूलता, "


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छुटकी वहीँ से कपडे से उनके पैंट को रगड़ते बोली, और मिसेज मोइत्रा का अब लगा की उनकी बेटियां बड़ी हो गयी हैं। और वो ये भी देख रही थी, पानी सुखाना एक बहाना था, असल में वो जीजू के तन्नाए खूंटे का मज़ा ले रही थी।

लेकिन मिसेज मोइत्रा का दिमाग शरारत का कारखाना था और अब मंजू की सोहबत में दिन रात बस एक ही बात घूमती थी, एयर मुस्कराते हुए उन्होंने दोनों बेटियों को गुहार लगाई,

" तुम दोनों कैसी सालिया हों, बेचारे मेरे दामाद का ख्याल ही नहीं रखती, पहले तो खुद पानी गिराया, फिर उसे चिढ़ा रही हो। अरे कहीं जुकाम हो गया, बीमार पड़ गया, गीला हो के तो , ऐसे गीली गीली पेंट पहने , उतार दो न "

अबकी बड़ी बेटी मैदान में आ गयी, " आपकी सास का हुकुम है सुन लिया न, और आप हम दोनों को ही बोलते हैं न , चलिए पैंट उतार दीजिये चुपचाप, सूख जायेगी तो पहन लीजियेगा "

मिसेज मोइत्रा से सर पीट लिया, ये लड़कियां मेरी कब बड़ी होंगी, ऐसा मौका छोड़ रही है। दामाद तो बुद्धू है ही, लड़कियां भी। उन्होंने वहीँ से हड़काया, " तुम दोनों किस मर्ज की दवा हो, अरे दो दो सालियाँ होते हुए दामाद अपने हाथ का इस्तेमाल करे "

लेकिन छुटकी माँ का इशारा मिलने के पहले ही बेल्ट खोल के फेंक चुकी थी और अब तो माँ की आज्ञा, दोनों बेटीयों ने मिल के उन की पैंट खींच के वहीँ फेंक दिया जहाँ थोड़ी देर पहले, मंजू ने दोनों लड़कियों की पैंटी उतार के फेंकी थी,



" क्या जीजू, कल की लौंडियों की तरह शर्मा रहे हैं, पैंट के नीचे कुछ नहीं पहना है क्या " शरारत से उनकी आँख में झांकते हुए छोटी बोली

" अरे, नहीं पहना है तो क्या हुआ, बड़ी दीदी दीदी करती हो। तेरी दीदी रोज देखती हैं, प्यार दुलार करती हैं आज दीदी की छोटी बहने भी देख लेंगी, ऐसा क्या है " मंजू ने दोनों लड़कियों को छेड़ा।

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लेकिन दोनों टीनेजर्स देख नहीं पायीं, शेर अभी भी परदे में था, पर देख तो चुकी ही थीं, बीसो बार पिक्स में, वीडियो में, दीदी उनकी रोज भेजती थीं, एक बार तो लाइव भी दिखाया था, व्हाट्सऐप वीडियो काल पे, और अभी भी अंदाज साफ़ लग रहा था। शेर एक बक्सर शार्ट में था आलमोस्ट ट्रांसपेरेंट और खूंटा एकदम तना हुआ तो मोटाई लम्बाई, कड़ेपन का पूरा अंदाजा लग रहा था।

और तभी मिसेज मोइत्रा बाहर निकल कर आ गयीं, जहान उनकी दर्जा नौ वाली दोनों लड़कियां जिन्हे उन्होंने अबतक लड़कों की नजर से बचाकर पाला था, अपने जीजू के साथ खड़ी थीं।



और मिसेज मोइत्रा को देखकर जब उन्होंने खड़े होने की कोशिश की तो मिसेज मोइत्रा ने धप से धक्का देकर उन्हें बैठा दिया और सीधे उनके सामने खड़ी हो गयीं,


बेचारे उनकी ऊपर की सांस ऊपर नीचे की नीचे, जैसे लग रहा था पहली बार मिसेज मोइत्रा को पहली बार देख रहे हों, क्या रूप रंग, क्या जोबन।


उनके एमआइएलएफ वाले सारे वेट ड्रीम्स बचपन से लेकर आज तक के जैसे साकार हो गए हों, मूर्त होकर मिसेज मोइत्रा में समा गए हों, लाल रंग की करीब करीब पारदर्शक साड़ी आग की लपट बनी मिसेज मोइत्रा के शोले ऐसी देह को बस एक पतली लकीर से लपेटे हुए थी, खूब भरे भरे जोबन, कड़े कड़े गदराये छोटी सी चोली में समां नहीं रहे थे। खूब भरी भरीगोरी मांसल देह, लेकिन कमर पर एक छटांक भी एक्स्ट्रा फैट नहीं और सोने की पतली सी तगड़ी, नाभि के ठीक नीचे, और नाभि भी कितनी गहरी और गोरी, चौड़े कूल्हे, और साड़ी कूल्हे से भी खूब नीचे बाँधी,
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बस यही, यही,



किसी तरह उन्होंने थूक गटका, बात मन की मन में रह गयी, और मिसेज मोइत्रा का आँचल छलका, जैसे रणभूमि में किसी ने तलवार निकाल ली हो, पल भर के लिए डिजाइनर चोली उनके सामने थी, ऐसी कटिंग की कड़ाव, उभार, गोराई सब छलक के बिखर गयी, वो आँचल ठीक करने के बहाने मुड़ी। एकदम नंगी गोरी चिकनी पीठ, पान के पत्ते की तरह और पीठ पर गहरी नाली, कामुक स्त्रियों की सबसे बड़ी पहचान, चोली बस अंगुल भर की गुलाबी रस्सी से जैसे बंधी हो,



मिसेज मोइत्रा भी समझ गयीं की जादू चल गया और बस अब ये स्साला किसी तरह रात को रुक जाए ने तो आज तो इस चिकने को अच्छी तरह से निचोड़ के ही रहेंगी, कोमल ने बहुत पिक्स दिखायीं हैं आज उन का मौका रहेगा। बस स्साला किसी तरह रात में उनके हत्थे चढ़ जाए तो गाजर की खीर का पूरा असर होगा।

चेहरा उनका तमतमाया, खूंटा जो पहले ही खड़ा था मिसेज मोइत्रा की बेटियों की शरारत से अब तो एकदम शार्ट को फाड़ रहा था,

और किचन से देख के दोनों उनकी सालिया मुस्करा रही थीं, अब मैदान उन्होंने माँ के हवाले कर दिया था।

मिसेज मोइत्रा ने उनकी ओर हाथ बढ़ाया और वो व्ही हाथ पकड़ के खड़े हो गए और मिसेज मोइत्रा अपने दामाद से एकदम चिपक के खड़ी होगयीं, और अपनी देह अपने दामाद के देह से देह रगड़ते चिढ़ाते फुसफुसाते बोलीं, " कुछ हुआ क्या, मुन्ना "



उस मत्स्यगंधा की गंध पूरी तरह उनके देह में रच बस गयी थी, जैसे किसी ने मूठ मार दी हो, जवाब ठीक ९० डिग्री खड़े उनके बालिश्त भर के खूंटे ने दिए और मिसेज मोइत्रा पर मंजू की बातों का असर था, " बेटियों से लाज अब ख़तम , उन दोनों के सामने ही खूंटा पकड़ लेना, और ऊपर से नहीं, चड्ढी में हाथ डाल के, और एक बार कस के दबाओगी न, पकड़ के मुठियाओगी, तो स्साली तुझे भी असली ताकत अपने दामाद की मालूम होगी और उसे भी तेरा मन पता चल जाएगा, फिर सब हिचक ख़तम और मजा शुरू। और अपनी इन लड़कियों के डरती लजाती रह जाओगी और ये जाती हुयी जवानी कब चली जायेगी पता नहीं चलेगा, "

और मिसेज मोइत्रा ने भट्ठी में हाथ डाल दिया।

उन्हें लगा उन्होंने अंगारे को पकड़ लिया है, हाथ जल गया है, और ये नहीं की पहली बार उन्होंने पकड़ा होगा, बोर्डिंग में ही, अपनी इन दोनों बेटियों से थोड़ी ही बड़ी रही होंगीं, दर्जा बारह पास करने के पहले दर्जन भर से ज्यादा, लेकिन कोई दूर दराज तक भी ऐसा कड़क, मोटा गरम नहीं था, और पिछले सोलह साल से कभी कभार मिस्टर मोइत्रा के केंचुए के अलावा,

उनसे नहीं रहा गया, और मिसेज मोइत्रा ने हल्के से दबाया। मंजू सही कह रही थी, लोहे का रॉड झूठ है। एक बार ये अंदर ठोंक दे, सोलह साल के इन्तजार का फल वसूल हो जाएगा, हलके हलके उन्होंने मुठियाना शुरू कर दिया, सुपाड़े पर ऊँगली लगा के देखा, एकदम खुला गुस्साया,

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और उसी समय बाहर हार्न बजा, दरवाजा खुला, और कोमल अंदर, उनकी दोनों बेटियां लहक के अपनी दी के पास चिपक गयीं,

मिसेज मोइत्रा ने देखा, मुस्कुरायीं, और अभी भी हाथ शॉर्ट से बाहर नहीं निकाला।



वो उस तिलिस्म से बाहर आ गए थे, और कोमल ने चिढ़ाया, " लगी रहिये "



" एकदम, बेटी से पहले दामाद पर सास का हक होता है " हँसते हुए मिसेज मोइत्रा बोलीं और अपने मन की फरमाइश, रात भर के लिए दामाद को बेटी से मांगने की, करने वाली थीं की कोमल ने उन्हें चुप करा दिया।

" एकदम और उस से पहले छोटी बहनों का " कुछ प्यार दुलार से कुछ लेस्बो फील से उन दोनों छोटी बंगालिनों के चिकने गाल सहलाते हुए वो बोलीं, और मिसेज मोइत्रा ने अपनी मन की बात कहने की कोशिश की, लेकिन उनकी मुंह बोली बेटी ने बात काट दी और अपनी बात सुना दी,

" एक बात अभी से आप से कह रही हूँ, शाम को क्लब से लौटते थोड़ी देर हो जायेगी, और उसके बाद मैं अपनी दोनों बहनों को अपने साथ ले जाउंगी मस्त पार्टी होगी और कल से वहीँ से तीज प्रिंसेज के लिए हम तीनो बहने "

लेकिन उनकी बात छुटकी ने काट दी, अपने जीजू को आँखों से चिढ़ाते हुए

" लेकिन दी जीजू को मत ले चलिएगा पार्टी में, वो वहां भी फिजिक्स के इक्वेशन पूछेंगे, आज दिन भर तो बायोलॉजी पढ़ाएंगे ही "

" एकदम नहीं गर्ल्स ओनली पार्टी होगी " कोमल ने अपनी बहन की बात मान ली और मिसेज मोइत्रा को आगे का काम पकड़ा दिया, " और ये दामाद आपका, आपके हवाले, खूब सेवा करवाइयेगा। आप ने कहा था मंजू भी नहीं है तो घर का सब काम, और जो भी काम हो "

अब मंजू भी मैदान में आ गई। किचेन समेटते बोली,

" मैं कल बारह बजे आउंगी, तब तक अपने इस साले दामाद से झाडू, पोंछा, नाश्ता खाना सब बनवा लीजिएगा। झाड़ता बहुत अच्छा है ये। "

और अगला इंस्ट्रक्शन इन्हे मिला, " शाम को लौटने में देर हो जायेगी तो मेरी दोनों बहनो का पूरा ख्याल रखियेगा और इन दोनों की सब बात मानियेगा और रात में अपने सास की "

और फिर दोनों की निगाह घडी पर पड़ी -१० -४८

" जल्द निकलिए, आप के पहुँचने का टाइम १० बजकर ५५ है , आप की वेलकम पार्टी इन्तजार कर रही होगी और आर आप जानती हैं ११ बजे के बाद पहुँचने वालियों के लिए क्या पनिशमेंट रखा गया है। " हंसती हुयी कोमल मिसेज मोइत्रा का हाथ पकड़ के खींचती हुयी ले गयी।

इतनी देर से दोनों टीनेजर्स भी अपनी दी से बिन बोले आँखों से यही गुहार लगा रही थी, " दी जल्दी से मम्मी को ले जाइये "

पीछे पीछे मंजू भी निकल गयी और बोलती गयी, दरवाजा अंदर से ठीक से बंद कर लो, और बाहर के गेट में भी ताला लगा लो, तुम लोगो की दी और मम्मी तो शाम को सात बजे से पहले आएँगी नहीं।

जीजा और जवानी की कुण्डी खड़काती दोनों जुड़वा सालिया एक ही बात सोच रही थीं, " पूरे ८ घंटे हैं "

घड़ी बता रही थी कि अभी १० बजकर ५० मिनट हो गए हैं।
Kya mast jaal buna hai Komal ne apne mard ko Rasgullon ka swaad dilane ke liye.
 
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Accident (or, How My Laptop Nearly Had a Heart Attack… and Took Mine Along)
Call it an accident, a mishap, or a full-blown digital disaster—but it was serious.
An accident, by definition, is something unexpected that throws your life off balance. This one didn’t just throw me off—it practically body-slammed me and then sat on my chest for good measure.
It all began innocently enough.
I was “hunting” for some perfectly respectable—okay fine, slightly questionable—pictures to decorate my stories. Just a casual stroll through the wild jungles of cyberspace. You know how it is—one click leads to another, curiosity leads to “research,” and suddenly you’re deep into… artistic exploration.
Nothing illegal, mind you. Strictly 18+, probably AI-generated, and absolutely “for creative purposes only.”
Then I saw them—those irresistible, “creamy,” mouth-watering images practically begging to be saved.
And like any responsible writer, I tried to save a few.
That’s when my laptop decided to ruin my life.
Suddenly, a terrifying message exploded onto the screen:

“YOU HAVE BEEN WATCHING FORBIDDEN CONTENT. YOUR COMPUTER HAS BEEN LOCKED.”
Locked?!
Excuse me—I was conducting research.
Below that, in smaller but equally threatening text, came the grand finale:
Pay ₹29,000… or else.
Or else what? Would they come home and judge my browsing history personally?
The screen froze. Full screen. No escape. My laptop had officially entered drama mode.
Now, I’m not new to such cinematic threats. I’d seen this type of “You are doomed” performance before. So I confidently used my secret weapon:
Force Shutdown.
Press. Hold. Press harder. Keep holding.
The screen went black.
Victory!
I leaned back, proud of myself. Crisis handled. Nation saved.
But wait…
When I tried restarting it, the laptop behaved like a stubborn child refusing to go to school. I pleaded. I coaxed. I mentally negotiated.
Nothing.
Then I noticed something horrifying—the side light was still on.
Meaning… it never actually shut down.
Even worse—when I unplugged it, the charging light still stayed on.
At this point, I was no longer dealing with a laptop. This was clearly a supernatural entity.
I rushed to a repair shop.
The technician, without even blinking, said,
“Bhai, force shutdown kar do. Ek minute nahi, 2–3 minute dabake rakho.”
Ah yes. Because clearly, my problem was insufficient thumb pressure.
We tried. Me. Him. Probably half the shop. Multiple thumbs were sacrificed in the process.
Nothing.
Then came holidays. Shops closed. Advice from ten different “experts,” each more confusing than the last. Meanwhile, my laptop lay there like a patient in ICU, refusing to respond.
Finally, I took it to a proper “laptop surgeon.”
He examined it seriously and delivered the verdict:
“Reformat kar dete hain.”
My soul left my body.
All my stories—finished ones, half-written ones, future ideas, secret masterpieces—everything was on the desktop.
Reformatting meant… extinction.
I immediately rejected the idea like a politician rejects responsibility.
The next day, I got a message:
“Motherboard aur CPU mein problem hai. Repair karenge, lekin C drive ki guarantee nahi hai.”
Translation: We might fix your laptop… but your stories? May God be with them.
I had no choice but to agree. I was also advised to back everything up to another drive—if anything survived.
Days passed.
Then finally, the message arrived:
“Aap aake check kar lo.”
I walked in like a man going to check his exam results.
Hands slightly trembling, I entered the password.
The screen opened.
And there they were—my stories!
Alive. Breathing. Slightly shaken, but alive.
At that moment, I felt like a parent whose lost child had just been found at a crowded fair.
The whole episode took weeks. Since I do all my work on my laptop, everything—including my writing—came to a dramatic halt.
But now, the patient has recovered.
The stories have been rescued, updated, and are ready to return.
And I?
Well… I’ve learned two things:

  1. Always back up your data.
  2. And maybe… be careful while doing “research” in the wild corners of the internet.

 

komaalrani

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मिसेज मोइत्रा का स्वागत


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इतना जबरदस्त स्वागत तो जब मिसेज मोइत्रा की तूती बोलती थी, जब उनके इशारे के बिना चपरासी से लेकर, डिपार्टमेंट हेड की पोस्टिंग, ट्रांसफर नहीं होता था, सब मलाईदार डिपार्टमेंट उनके मर्द के पास था और सब कमाने वाली डेस्क पर मिसेज मोइत्रा की और उनकी बेटियों की जूती उठाने वालियों, चमचियों के मर्दो के पास थी, और एक इशारे में उन्होंने निधि के बाप को काला पानी भिजवा दिया था, और चार दिन बाद आधी रात में निधि का सामान टाउनशिप के घर से निकाल के, टाउनशिप के बाहर, क्लब की सेक्रेटरी भी वही थीं, प्रेजिडेंट भी, फिर भी ऐसा स्वागत,...आज तक कभी भी नहीं हुआ



वो सोच भी नहीं सकती थीं, जिस दिन इस क्लब में इलेक्शन हारी थीं, घंटे भर में उनके मरद का ट्रांसफर आर्डर भी हुआ स्पेयर भी कर दिए गए, कि कभी वो इस क्लब में लौटेंगी और लौटेंगी तो कोई सीधे मुंह बात करेगी, पर आज तो,

ठीक १० बजकर ५५ पर उनकी गाडी क्लब के पोर्च में पहुंची, ड्राइव करने वाली खुद क्लब कि सेक्रेटरी, और उनका दरवाजा खोला, क्लब कि ज्वाइंट सेक्रेटरी सुजाता ने एकदम झुक कर के,

लेकिन उनका मन हुलस गया अपनी चमचियों को देखकर, सिर्फ उनका राज नहीं लौटा था, उनकी चमचियों का भी, लौट आया था। उनकी तीनो फेवरिट चमचियाँ, जिनका मन उनके इलेक्शन हारते ही सूख गया था, सबसे आगे थीं,


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उनके पसंद की ऑरेंज कलर की साड़ी पहने, एक के हाथ में चांदी की आरती की थाली थी, दूसरे के हाथ में लाल गुलाब की माला, ( वो भी उनका फेवरिट ) और तीसरी माथे पर लगाने के लिए हल्दी कुमकुम।

उनके साथ ही मिसेज साहनी और बाकी डिपार्टमेंट हेड्स की पत्नियां और उनके पीछे क्लब की आफिस बियरर सब बच्ची पार्टी वालियां , हाथ जोड़े, इन्तजार करती। पूरा पोर्टिको भरा हुआ था।

कितनी मालाएं पड़ीं उनके गले में।

वैसे तो वेलकम कमेटी में तीन लेडीज थीं, चमची नंबर दो सुनयना, सीनियर माधुरी और हम लोगों की गोल की बेला।

माधुरी, एक सीनियर, करीब ३५ साल की, और मजाक में सीधे देह के स्तर पर उतरने वाली, दो बच्चे थे, दोनों बोर्डिंग में,


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और बेला,करीब २५ साल की। उम्र के हिसाब से तो वो बच्ची पार्टी में भी बड़ी थीं, बच्ची पार्टी में वो लेडीज जिनके बच्चे नहीं थे, और २५-२६ से ज्यादा नहीं।

तो बेला थी तो बच्ची पार्टी में लेकिन सीनियर के भी कान काटती थीं और इस वेलकम कमेटी के जिम्मे एक मजेदार काम था,


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मिसेज मोइत्रा ने साफ़ साफ कहा था " लेकिन वैसलीन क्रीम कडुआ तेल लगा के मत आना , ... "

चमची नंबर दो ने हड़का के बोला, " आने दीजिए न , जो करना हो कर लें , ... मैं हूँ न वेलकम कमिटी में , सारी छिनारों का पेटीकोट उठा उठा के आते ही चेक करुँगी ,.. जरा भी गीला चिकना दिखा तो वहीं सूखे कपड़े से ,...एकदम सुखा के ही अंदर घुसने दूंगी , अरे जब तक चरचराए परपराए न , चीख पुकार न मचें, ... क्या मज़ा ,... "

खूब जोर से हो हो हुआ , ड्रेस कोड था, सिर्फ साडी ब्लाउज पेटीकोट, और अगर कोई लहंगा पहन के आएगा, लहंगा चोली, चुनरी।


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मतलब साफ़ था कोई ढक्कन ना नीचे ना ऊपर और ये वेलकम कमेटी चेक भी करती, छू के दबा के सहला के।



लेकिन असली खेल दूसरा था, चमची नंबर २ ने कहा था, अगर कोई नीचे तेल, चिकनाई, क्रीम कुछ लगा के आया तो, जरा भी गीला चिकना दिखा तो वहीं सूखे कपड़े से ,...एकदम सुखा के ही अंदर घुसने दूंगी ,



और ये वेलकम कमेटी वालों को मस्ती करने का अच्छा मौका मिल गया था।

मिसेज मोइत्रा ने चमची नंबर दो से पूछा, क्यों कोई तेल चिकनाई लगा के तो नहीं आया, जवाब बेला ने हंस क़े दिया,

" नहीं, मैडम, मैंने खुद चेक किया। खुद दो दो ऊँगली डाल क़े, लेकिन भरी कुप्पी वाली २२ थी, २७ में, आपके अवार्ड स्कीम का बड़ा फायदा हुआ टाउनशिप क़े मर्दो का "



पिछली बार जो ऑरेंज जूस में ऑरेंज वोदका मिला क़े पिलाई गयी थी, मिसेज मोइत्रा को तो उनकी सब झिझक पिछवाड़े घुस गयी थी और उन्होंने ही कहा था,

" सबकी कुप्पी चेक होगी, और जिसकी जिसकी कुप्पी भरी होगी, उसके लिए लेडीज क्लब की ओर से स्पेशल अवार्ड "
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तो मिसेज मोइत्रा ने कोमल की ओर इशारा करके माधुरी से कहा,


" अरे कैसी वेलकम कमेटी हो तुम, कोमलिया की कुप्पी तो जरूरी चेक कर, ...कहीं तेल लगा क़े तो नहीं आयी है "
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और तभी उनकी निगाह लीला पर पड़ी, ,

लीला ३२-३४ की थीं, लेकिन आजकल उनके मर्द ट्रेनिंग पर थे, पिछले पंद्रह दिन से बाहर। तो जिनके मर्द बाहर थे, उनकी कुप्पी भरना मुश्किल था। लेकिन लीला का एक देवर था, इंटर में गया था इस साल, मूंछे हलकी हलकी आ रही थी, और सिर्फ वो नहीं टाउनशिप की सब औरतें उस बेचारे को छेड़ती थीं, अब देवर तो देवर और जैसे साली की उमर नहीं देखी जातीं, सिर्फ रिश्ता देखा जाता है बस वही हाल देवर का है।
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और जब पिछली बार कुप्पी और मलाई की बात हो रही थी तो उन्हें, उनका देवर का नाम ले ले क़े सब लेडीज ने खूब छेड़ा था

और मिसेज मोइत्रा की निगाह पड़ते ही लीला जोर से मुस्करायीं और सब लेडीज सवाल भी समझ गयीं और जवाब भी लेकिन बेला ने खुल क़े बोल दिया

" अरे मैडम, लीला मैडम ( सीनियर लेडीज को हम बच्ची पार्टी वाले मैडम जोड़ क़े कहते थे लेकिन आज से वो सब बदल जाना था ) की कुप्पी बजबजा रही थी, जबरदस्त मलाई भरवा क़े लायी थीं ये। "

" सीखों सीखो " हंस क़े मिसेज मोइत्रा बोलीं और लीला को गले लगा लिया और कान में ऐसे बोलीं की सब को सुनाई दे,

" अरे मिल बाँट क़े खाओ, देवर तो पूरे लेडीज क्लब का है "



जोर का ठहाका लगा।

तो

मिसेज मोइत्रा और कोमल दोनों की जांच हुयी और मिसेज मोइत्रा की ऊपर ऊपर से मिसेज भसीन से नहीं रहा गया, उन्होंने बेला को इशारा किया और बेला और माधुरी ने मिल क़े मिसेज मोइत्रा का पेटीकोट पलट दिया, और सब लेडीज की सिसकी निकल गयी।


इतनी टाइट तो बच्ची पार्टी वालियों की नहीं होगी, और होती भी कैसे उनके मरद रोज बिना नागा चोदते हैं और मिसेज मोइत्रा क़े बिल में जमाने से सींक भी नहीं गयी थी और अब वो टाइट अगेन भी लगा रही थीं और केगेल कसरते भी करती थीं।

एकदम गुलाबी, एक झांट भी नहीं, पावरोटी से भी फूली बुर। हल्की हलकी गीली।
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वेलकम क़े साथ साथ मिठाई भी खिलाई जा रही थी, नत्था क़े भांग वाले गुलाब जामुन और एक कैटरिंग की होस्टेस साथ में एक प्लेट में लेकर चल रही थी, पर मिसेज मोइत्रा क़े मुंह में सीधे चमची नंबर एक ने डाला और डबल भांग पड़ी थी उसमे।



चमची नंबर तीन ने ऑरेंज जूस का टेट्रा पैक पेश किया, एकदम सीलबंद और सील उन्हीं के सामने खुली। कहने की बात नहीं कि उसमें पहले से इंजेक्शन से आधे से ज्यादा ऑरेंज वोडका मिला दिया गया था।



मिसेज मोइत्रा दो सिप ले चुकी थीं, तभी जैसे कोई गेट क्रैश कर रहा हो, हांफते, भागते दौड़ते कोई गेट एक अंदर घुसा और सीधे वेलकम डेस्क पे।



सबकी निगाह घड़ी पर पड़ी।



११ बजने में अभी भी १ मिनट और बीस सेकंड बाकी थे।

अन्नी थी, बेबी ऑफ़ बच्ची पार्टी,... अभी भी टीनेजर। ठीक १८ साल की उम्र में शादी हुयी थी छह महीने पहले इंग्लैण्ड में और चार महीने पहले उसके हबी भी ने ये कम्पनी ज्वाइन की थी, और वह भी टाउनशिप की सब भाभियों का चहेता देवर,


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बच गयी, हमारी अन्नी,



११ बजे क़े बाद आनेवाली क़े लिए सजा पहले से अनाउन्स थी, पहुँचते ही उसकी गांड मारी जायेगी, वहीँ मेंहदी वालियों क़े सामने, वो भी सूखी।



अभी भी एक मिनट और बीस सेकेण्ड बाकी थे,



लेकिन गलती तो हुयी थी, तय हुआ था की सभी मेंबर मिसेज मोइत्रा क़े पहले आ जाएंगे, इसलिए मिसेज मोइत्रा को लेकर मैं १० बजाकर ५५ पर आयी, पर,

अन्नी कश्मीर से थी, लगती भी कश्मीर की कली थी, गाल कश्मीर क़े दहकते सेब, और चोली में भी काबुली अनार, और भोली इतनी की कई बार डबल मीनिंग वाले मजाक उसे खोल क़े समझाने पड़ते, पिछली मीटिंग में जब एक सीनियर ने बच्ची पार्टी वालियों को चिढ़ाते हुए कहा था कि,

" ये बच्ची पार्टी वालियां आएँगी तो बुर वाली होकर लेकिन जाएंगी भोंसड़ी वालियां बनकर "



इसी अन्नी क़े मुंह से निकल गया था, " कैसे " और वो जमकर हंसी का गोला छूटा, फिर सीनिअर्स में से लीला बोली, अपनी मुट्ठी दिखाते, " ऐसे, बुर में जायेगी ये मुट्ठी और निकलेगी तो भोंसड़ा बना क़े "



और फिर हंसी, और अबकी कई सीनियर पार्टी वालियों ने अन्नी पर निशान लगा दिया, " इस कली कि तो मैं ही फाड़ूंगी, हारेंगी तो है ही बच्ची पार्टी वालियां "



और जब बेबी ऑफ़ बच्ची पार्टी लेट आयी, बेचारी हांफती कांपती मिसेज मोइत्रा से बोली,

" सॉरी मैडम, वो, ये आज वर्क फ्रॉम होम पे थे, और, मैंने मेसेज कर दिया था, पर तब भी बस थोड़ा सा, …"

मिसेज मोइत्रा ने उसकी बात अनुसनी कर क़े कहा, " इसकी कुप्पी मैं चेक करुँगी "

बस वही खड़े खड़े चमची नंबर एक ने पीछे से अन्नी का हाथ पकड़ा, और वेलकम कमेटी कि माधुरी ने एक ओर से लहंगा पकड़ा और बेला ने दूसरी साइड से, लहंगा पलट गया,

बुर एकदम बजबजा रही थी, मलाई अभी भी बह रही थी।




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और जाँघों पर भी लसलसी, हलकी गीली मलाई चिपकी हुई थी, दो चार लकीरें तो बहकर घुटनों तक पहुँच गई थीं। वहां कोई भी अनुचुदी नहीं थीं, और सब समझ गयी कि दो बार की मलाई है ये और अभी ताजा ताजा चुदी है बेचारी,



सब मुस्करा रही थीं, बेचारी हमारी बेबी की हालत देखकर,

" साफ़ भी नहीं कर पायी मैं लेट हो रहा था "


दुखी मुंह बना क़े अन्नी बोली, लेकिन उसकी बात पर मिसेज मोइत्रा कुछ बोलतीं, की पीछे से चमची नंबर १ बोली,

लगता है पीछे भी खुदाई हुयी है, दो चार बूँद मलाई दिख रही है पहले की है क्या "

" निहराओ इसको, फैलाओ चूतड़ पूरा कस क़े " मिसेज मोइत्रा क़े यहाँ देर नहीं होती थी, उन्होंने तुरंत फैसला दिया, और अमल भी पहले क़े जमाने की तरह तुरंत हुआ।


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तीनो चमचियों ने पकड़ क़े अन्नी को निहुरा दिया, और सीनियर्स में सीनयर, मिसेज कौर और मिसेज यादव ने कस क़े दोनों चूतड़ फैला दिए,

भरभरा क़े बीज गांड में से लहकते हुए छलक क़े बहने लगा, क्या कोई ऐनल क्रीमपाई वाली ब्ल्यू फिल्म होगी,
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और मिसेज मोइत्रा ने घटना स्थल का जबरदस्त मुआयना किया, तबतक मिसेज भसीन बोलीं, " लगता है सुबह आज तू बच गयी थी जो, "

" अरे मैडम सुबह कौन मर्द छोड़ता है, स्साले लगता है सुबह उठते ही इसलिए हैं की उठ क़े चढ़ जाएँ "

हमारी बच्ची पार्टी की सुजाता बोली और बच्ची पार्टी ही की रंजना ने अपना किस्सा मिसेज मोइत्रा को सुनाया,


" ,मैडम मेरा वाला तो पहले दिन से ही बेड टी अपने हाथ से बना क़े पिलाता है, बनाता भी बहुत अच्छा है लेकिन बेड टी की कीमत सुबह सुबह एडवांस में ले लेता है "



अब खूब जोर का ठहाका लगा, और मिसेज मोइत्रा अन्नी को सीधा करती बोलीं, " घर घर की कहानी "

अन्नी समझ गयी वो बच गयी, और अपना दुखड़ा सुनाती बोली, " मैडम, मैं तो दस बजे ही आ जाती, इनसे तो मैं बस ये कहने गयी थी की चोली की स्ट्रिंग ठीक से नहीं बंध रही है, प्लीज बाँध दीजिये, वो लैपटॉप पे लगे हुए थे,

" पर बजाय बान्धने क़े उसने खोल दिया न " बच्ची पार्टी की ही साजिदा बोली, उसका मर्द भी एक मिनट नहीं छोड़ता था,
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" हाँ तब भी बस एक क्विकी कह क़े, बस १० बजकर बीस पे मैं फ्री हो गयी थी, पर जैसे ही मुड़े वो बोला,

" अरे यार तेरी पीफिरछे वाली सहेली बुरा मान जायेगी, " और जब तक मैं कुछ कहूं वहीँ पलंग पे निहुरा क़े पिछवाड़े भी,...


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और आप तो जानती है की पिछवाड़े क़े बाद आस टू माउथ तो, और फिर वो दुबारा फनफना गया तो फिर क्विकी क़े नाम पे, अपनी कसम धरा दी, तो थर्ड टाइम भी और "



मुस्कराते हुए खिसियानी आवाज में वो बोली, और मिसेज मोइत्रा ने सजा अनाउंस कर दी,

" सब दोष तेरी चोली का है, तो ये तेरी चूनरी जब्त, चोली छिपाने की कोई जरूरत नहीं। चुनरी कमर में बाँध ले, "

उसने चैन की सांस ली, और कमर में बाँध ली और उसके ३२ डी डी साइज की कश्मीरी सेब चोली फाड़ रहे थे।

लेडीज क्लब में टीनेजर भी अकेली वही थी और ३२ साइज वाली भी, बाकी हम सब बच्ची पार्टी वालियां ३४ क़े आसपास और सीनियर्स ३४ -३६ क़े बीच।


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ज्यादातर लेडीज का ब्यूटी पालर का काम ख़त्म हो गया था, और सब मेंहदी वालियों क़े साथ थीं, मिसेज मोइत्रा क़े लिए लोरियल और लक्मे वाली हेड हाँथ बांधे खड़ी थी, दोनों ने एक एक बूथ मैडम क़े लिए खाली रखा हुआ था, मैडम ने लक्मे चुना तो लोरिएल वाली का मुंह थोड़ा उतर गया, पर मैंने उससे कहा,

" जाने क़े पहले शाम को आप मैडम का जबरदस्त ब्राइडल मेकअप कर दीजियेगा, फर्स्ट नाइट क़े पहले वाला "

और मिसेज मोइत्रा की आँखे चमक गयी, समझ तो वो गयी थीं, लेकिन मैंने कान में साफ़ साफ़ बोल दिया, " बेचारा आप का दमाद आपका दिन भर इन्तजार करेगा, मेकअप कर क़े नहीं जाइएगा तो बिगाड़ेगा कैसे "

" तु भी न "

कहकर नयी दुल्हन की तरह शर्माती हुयी वो लक्मे क़े बूथ में घुस गयीं और मैं बगल में ही जो लॉरियल का बूथ खाली था उसमे। सुजाता खुद एक बार वेलकम ड्रिंक लेकर उनके पास पहुँच गयी,



साढ़े ११ बजे तक उनका मेकअप चला और एक साथ लक्मे वालियों ने तीन तीन लड़कियों को लगा रखा था, एक हेयर अरेंजमेंट कर रही थी, दूसरी पेडिक्योर और तीसरी मैनीक्योर, बॉडी वैक्सिंग पहले हो चुकी थी और सुजाता ने मेकअप वाली को बोल दिया था, फुल बॉडी वैक्सिंग मतलब ब्राजीलियन, बस थोड़ा सा छोड़ देंगे, रेख आती मर्दो की तरह प्रेम गली क़े ऊपर नेम बोर्ड की तरह और उसके अलावा एक बाल भी नहीं, अगवाड़ा पिछवाड़ा सब

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और वहीँ से लेडीज क्लब की सरप्राइज पॅकेज अवार्ड भी मैडम ने घोषित कर दिया,

जो अवार्ड साढ़े दस क़े पहले आने वालों क़े लिए था, ६ महीने का फ्री मेकअप वही जिसकी जिसकी कुप्पी में मलाई थी उसके लिए भी और अन्नी क़े लिए पूरे साल भर का फ्री मेकअप।
Excellent update Komal ji.
 
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So sorry to hear about your accident...infact I was thinking that you had taken a break since I did not see you/your posts for a very long time.
Glad that things are ok and you have recovered. Pls take care and stay safe!!

komaalrani
It was to my lappy, but as bad as i was incapacitated I have posted it in detail and repeating it again,



Accident (or, How My Laptop Nearly Had a Heart Attack… and Took Mine Along)
Call it an accident, a mishap, or a full-blown digital disaster—but it was serious.
An accident, by definition, is something unexpected that throws your life off balance. This one didn’t just throw me off—it practically body-slammed me and then sat on my chest for good measure.
It all began innocently enough.
I was “hunting” for some perfectly respectable—okay fine, slightly questionable—pictures to decorate my stories. Just a casual stroll through the wild jungles of cyberspace. You know how it is—one click leads to another, curiosity leads to “research,” and suddenly you’re deep into… artistic exploration.
Nothing illegal, mind you. Strictly 18+, probably AI-generated, and absolutely “for creative purposes only.”
Then I saw them—those irresistible, “creamy,” mouth-watering images practically begging to be saved.
And like any responsible writer, I tried to save a few.
That’s when my laptop decided to ruin my life.
Suddenly, a terrifying message exploded onto the screen:
“YOU HAVE BEEN WATCHING FORBIDDEN CONTENT. YOUR COMPUTER HAS BEEN LOCKED.”
Locked?!
Excuse me—I was conducting research.
Below that, in smaller but equally threatening text, came the grand finale:
Pay ₹29,000… or else.
Or else what? Would they come home and judge my browsing history personally?
The screen froze. Full screen. No escape. My laptop had officially entered drama mode.
Now, I’m not new to such cinematic threats. I’d seen this type of “You are doomed” performance before. So I confidently used my secret weapon:
Force Shutdown.
Press. Hold. Press harder. Keep holding.
The screen went black.
Victory!
I leaned back, proud of myself. Crisis handled. Nation saved.
But wait…
When I tried restarting it, the laptop behaved like a stubborn child refusing to go to school. I pleaded. I coaxed. I mentally negotiated.
Nothing.
Then I noticed something horrifying—the side light was still on.
Meaning… it never actually shut down.
Even worse—when I unplugged it, the charging light still stayed on.
At this point, I was no longer dealing with a laptop. This was clearly a supernatural entity.
I rushed to a repair shop.
The technician, without even blinking, said,
“Bhai, force shutdown kar do. Ek minute nahi, 2–3 minute dabake rakho.”
Ah yes. Because clearly, my problem was insufficient thumb pressure.
We tried. Me. Him. Probably half the shop. Multiple thumbs were sacrificed in the process.
Nothing.
Then came holidays. Shops closed. Advice from ten different “experts,” each more confusing than the last. Meanwhile, my laptop lay there like a patient in ICU, refusing to respond.
Finally, I took it to a proper “laptop surgeon.”
He examined it seriously and delivered the verdict:
“Reformat kar dete hain.”
My soul left my body.
All my stories—finished ones, half-written ones, future ideas, secret masterpieces—everything was on the desktop.
Reformatting meant… extinction.
I immediately rejected the idea like a politician rejects responsibility.
The next day, I got a message:
“Motherboard aur CPU mein problem hai. Repair karenge, lekin C drive ki guarantee nahi hai.”
Translation: We might fix your laptop… but your stories? May God be with them.
I had no choice but to agree. I was also advised to back everything up to another drive—if anything survived.
Days passed.
Then finally, the message arrived:
“Aap aake check kar lo.”
I walked in like a man going to check his exam results.
Hands slightly trembling, I entered the password.
The screen opened.
And there they were—my stories!
Alive. Breathing. Slightly shaken, but alive.
At that moment, I felt like a parent whose lost child had just been found at a crowded fair.
The whole episode took weeks. Since I do all my work on my laptop, everything—including my writing—came to a dramatic halt.
But now, the patient has recovered.
The stories have been rescued, updated, and are ready to return.
And I?
Well… I’ve learned two things:

  1. Always back up your data.
  2. And maybe… be careful while doing “research” in the wild corners of the internet.

 
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Kya aaj mil jaiga
What started as a harmless “research session” in the wild world of cyberspace—looking for perfectly respectable (okay, slightly questionable) images for my stories—quickly turned into a full-blown digital nightmare when my screen screamed, “YOU HAVE BEEN WATCHING FORBIDDEN CONTENT. YOUR COMPUTER HAS BEEN LOCKED,” along with a ₹29,000 demand, as if I were some international criminal instead of a struggling writer;

confident from past experience, I heroically attempted a force shutdown, only to discover my laptop had other plans—it refused to restart, its lights stayed eerily on even when unplugged, and after multiple thumb-powered shutdown attempts, unhelpful advice, holiday delays, and a near-fatal suggestion to “reformat” (which would have wiped out all my stories, drafts, and brilliant ideas),

I finally surrendered it to a “laptop surgeon,” who warned my precious C drive might not survive; days later, with the suspense of a movie climax, I entered my password—and there they were, my stories, alive and mostly intact—leaving me wiser, slightly traumatized, and firmly convinced of two things: always back up your data, and never underestimate the dangers of “creative research.”





That caused the delay


{your browser has been blocked due to repeated visits to pornographic sites containing materials prohibited by the laws of India namely pornography promoting paedophilia, violence and homosexuality.”
This was the flashing msg
 
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कोमल जी, आपकी लेखनी का यह अंदाज़ पढ़कर बस एक ही शब्द निकलता है— 'लाजवाब'। आपने जिस तरह से 'जोरू का गुलाम' के इस भाग में उत्तेजना, बनारसी ठसक और जज़्बातों का ताना-बाना बुना है, वह किसी मंझे हुए फिल्म डायरेक्टर के विज़न जैसा महसूस होता है।

एक पाठक के तौर पर, आपकी राइटिंग स्किल्स की इन बारीकियों ने दिल जीत लिया

कोमल जी, आपकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि आप किरदारों को समाज के बनाए 'फिल्टर' में नहीं बांधतीं। अन्नी का वह कश्मीर की कली वाला भोलापन और उसके साथ हुई 'सुबह की खुदाई' का बेबाक वर्णन... यह दिखाता है कि आप औरतों की आपस की बातचीत को कितनी गहराई और सच्चाई से समझती हैं। क्लब में 'कुप्पी चेक' करने का वह माहौल और मिसेज मोइत्रा का वह रौबदार लेकिन अंदर से प्यासा व्यक्तित्व—सुपर्ब ।

एक तरफ क्लब में भांग वाले गुलाब जामुन, ऑरेंज वोदका और कामसूत्र वाली मेहंदी का वो 'सॉफ्ट और ग्लैमरस' नशा है, तो दूसरी तरफ घर के बंद कमरे में उन दो जुड़वां बहनों (बड़ी और छुटकी) का वह 'खतरनाक' खेल। आपने जिस तरह से उन नौवीं क्लास की लड़कियों की 'कच्ची उम्र' की शैतानी और उनके 'जीजू' की मजबूर हालत को लिखा है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है।

मंजू का किरदार आपकी लेखनी की जान है। वह जिस तरह से 'प्रैक्टिकल क्लास' लेती है, महुए की दारू और सरसों के तेल का नुस्खा बताती है, वह कहानी को एक अलग ही 'देसी थ्रिलर' का रंग दे देता है। "झिल्ली फटने पर सफ़ेद चादर पर खून के धब्बे"—इस तरह की छोटी-छोटी डिटेलिंग हैट्स ऑफ

कोमल जी, आपकी कलम में वो 'मिठास' भी है जो अन्नी के गालों पर दिखती है और वो 'तीखापन' भी जो महुए की धार में है। आप जिस तरह से 'मर्यादा' की चूड़ियाँ तोड़कर 'वासना' के घुंघरू बांधती हैं, वह आपकी लेखनी का जादू है। आपने साबित कर दिया कि एक औरत की दबी हुई ख्वाहिशें जब शब्द बनती हैं, तो वो आग लगा देती हैं

अब जब 'जीजू' के हाथ खुल चुके हैं और दोनों 'कबूतरियां' निहत्थी हैं, तो अगले 7 घंटों में जो तबाही मचने वाली है, उसका इंतज़ार करना मुश्किल हो रहा है। उधर मिसेज मोइत्रा 'ब्राजीलियन वैक्स' और 'स्ट्राबेरी फ्लेवर' के साथ तैयार हैं... भाई, आपने तो हर तरफ से घेराबंदी कर दी है!

आपकी ये 'स्वाति की बूंदें' हमारे जैसे पाठकों की प्यास बुझाने के लिए काफी नहीं हैं, हमें तो अब इस 'फागुन' की बारिश में पूरा भीगना है।

आप बस लिखती रहिये, हम आपकी लेखनी के मुरीद हैं!

(अगला अपडेट—हाथ खुलने के बाद वाला—जल्द दीजियेगा!)
अब आप का कमेंट आ गया तो वेट करना नाइंसाफी होगी अगली पोस्ट में ही मिस मोइत्रा और मिसेज मोइत्रा जो अभी तक मिस कर रही थीं वो सब

और एक सुपर मेगा अपडेट में , इतने इन्तजार के सूद सहित
 
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