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Erotica जोरू का गुलाम उर्फ़ जे के जी

komaalrani

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जोरू का गुलाम।

भाग २५९ तीज पार्टी का दिन -निधि पृष्ठ १६२९

१२,००० शब्दों से ज्यादा बड़ा सुपर मेगा अपडेट पोस्टेड

कृपया पढ़ें, लाइक करें और कमेंट जरूर करें
 
Last edited:

komaalrani

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रात के नौ बजे भी फ़ूड ट्रक...
लगता है रात के अंतरंग क्षणों को भी....
Thanks so much for such detailed and pointed comments. story has almost become a thriller
 

komaalrani

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कहीं जेठानी अपने किसी रिश्तेदार के साथ मिलकर बदला तो नहीं उतार रही...
अरे नहीं यह एक बड़ा कारपोरेट संकट है और कोई कम्पनी, इनकी कंपनी को एक्वायर करना चाहती थी और जेठानी को अपने यारों से ही फुर्सत नहीं है। दिया है न उनका ख्याल रखने के लिए
 

komaalrani

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चूहे बिल्ली का खेल चालू...
कारपोरेट गेम में बिना शेयर मार्केट के खेल के बात आगे बढ़ती नहीं और ये कहानी अब कुछ हिस्सों में कारपोरेट फाएंसियल थ्रिलर है और मेरे ख्याल से अडल्ट विधा में और इस फोरम में कम कहानियां फाएंसियल थ्रिलर की थीम पर हैं, इसलिए पाठकों से विशेष अनुरोध है, की प्लीज हर भाग पर साथ दें और कमेंट जरूर करें
 

komaalrani

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गुड्डी तो सबसे बड़ी जासूस निकली...
गुड्डी हर चीज में नंबर १ है, आखिर ननद किसकी है
 

komaalrani

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Bhut shandaar
बहुत बहुत आभार, इस कहानी के साथ ही बाकी कहानियों से भी आप शुरू से जुड़े हैं और हिम्मत भी बढ़ाते हैं, और जब इस कहानी में इतना फास्ट टर्न आया है, मैं पहली बार फाएंसियल थ्रिलर की कोशिश कर रहीं हूँ आप का साथ बहुत हौसला बढ़ाता है।
 

komaalrani

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komaalrani जी, आपने तो इस अपडेट में 'घर-घर की कहानी' को 'बग-बग की कहानी' बना दिया!

सच कहूं तो ये पार्ट पढ़कर ऐसा लगा जैसे "मिशन इम्पॉसिबल" का देसी भारतीय वर्जन देख लिया हो, बस टॉम क्रूज़ की जगह एक "ठरकी" (जिसे आपने बड़े प्यार से महा-ठरकी बनाया) और उसकी धूर्त बीवी हैं, जो "चोरों के घर में मोर" बनकर छा गए!

वो फोन-नुमा बग डिटेक्टर तो जैसे घर की लक्ष्मण रेखा बन गया! सीरियल वालों की तरह "कौन बनेगा कीड़ा पकड़ने वाला" का गेम खेलते हुए:

"पंखे के पीछे कैमरा? स्विचबोर्ड में माइक? भाई, ये तो हमारे बचपन के 'आँख-मिचौनी' से भी आगे निकल गया!"
500 मीटर की ट्रांसमिशन रेंज पता चलते ही समझ आया—"ये जासूसी अब स्थानीय नहीं, सेटेलाइट लेवल की हो गई है!"

और फिर, "सिर्फ गाजर बेचने वाला ठेला" और डबल मीनिंग डायलॉग का कॉम्बो तो हिट हो गया! गुड्डी और गीता का "साइज़ चेक" करना: "भैया, लम्बाई-मोटाई देखूंगी! ठेले वाले का छूट देकर भी निप्पल्स पर नजर रखना.. ये डिस्काउंट नहीं, डिस्ट्रक्शन था! 😂 और फिर वो "नीचे वाला मुंह" वाली लाइन... "भाभी जी, आपकी साली ने तो सीधे गेम सेट-मैच कर दिया!"

फिर आया वो शावर वाला सीन: जहां बातें नहीं, "काम" हुआ! आपने "प्राइवेसी" की बात करनी थी, लेकिन "34C vs बाबू के बाबू" का मैच छिड़ गया! "शावर में कैमरा लगा है? कोई बात नहीं, लाइव स्ट्रीमिंग करते हैं!" "मुंह से बोल नहीं सकते? तो मुंह से कुछ और कर लो!" वाला सीन... "भाई, ये 'कीड़े' वाले अब तक सपने देख रहे होंगे!"

और अंत में फूड ट्रक वाला ट्विस्ट.. इडली-डोसा बेचने वाला ट्रक जो असल में स्पाई सेंटर निकला! और वो चिमनी वाला सेटेलाइट डिश... अब तो पता चला कि 'धुआंधार' एंटरटेनमेंट का मतलब क्या होता है!


और एक बात... जब चोर आपके घर में मोर बन जाए, तो उसे नाचने दो.. पर अपना डांस स्टेप भी तैयार रखो! कीड़े वालों को लगा वो "स्मार्ट" हैं, लेकिन आपके हीरो-हीरोइन ने "स्मार्टफोन से भी स्मार्ट" मूव चल दी!

टेंशन + मस्ती + जासूसी + गर्मागर्मी का बेहतरीन कॉम्बो था। अब इंतज़ार है अगले अपडेट का.. जहाँ शायद गाजर वाले का असली इरादा और सुजाता की नई स्कीम के बारे में पता चले! 😉

अगली बार शावर में बात करने से पहले काम शुरू करने का टाइमर सेट कर देना.. वरना फिर से मुख्य मुद्दा छूट जाएगा! 😂
आप ऐसे सक्षम लेखक और समीक्षक की उपस्थिति ही किसी भी लेखक को प्रसन्न कर सकती है, और वह अगर मेरे जैसी हो, किसी नयी विधा में सहम कर कदम रख रही हो, तो आप ऐसे लोगों की हुंकार भी हिम्मत बढाने के लिए काफी होती है और इतनी विस्तृत पॉजिटव समीक्षा, आभार के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।

यह कहानी इरोटिका तो है और रहेगी, लेकिन अब साथ साथ कारपोरेट गेम्स और फाएंसियल थ्रिलर और सस्पेंस भी रहेगा, कई बार मुझे लगता है की कहानी में कहानी होना कहानी के लिए जरूरी होता है पर, विशेष रूप में इस फोरम में अडल्ट के साथ किसी विशेष विधा, जैसे इन्सेस्ट से जुड़ कर वही डॉमिनेट करने लगता है और कई बार पाठकों का समर्थन भी उस प्रवृत्ति को बल देता है,

पर मेरी तीनो कहानियों में मोड़ थोड़ा उस मान्य परम्परा से हट कर है इसलिए आप ऐसे विज्ञ पाठकों का समर्थन बहुत मायने रखता है।

आभार, नमन

Thanks Thank You GIF by 大姚Dayao
 

komaalrani

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komaalrani

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ऐसे फंदे से नजरों को धोखा देना आसान...
और विरोधी .. मुँह ताकते रह जाएंगे...
कई बार कुछ पाठकों को इस कहानी के हीरो से बड़ी शिकायते थें और वो उन्हें हीरो का दर्जा देने से ही इंकार कर रहे थे इस और आने वाले भाग में हीरो के नए पक्ष से पाठक रूबरू होंगे।
 

komaalrani

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सत्ता के गलियारों में फेरा....
सत्ता के गलियारों में असली शक्ति कहाँ है और कहाँ फैसले होते हैं, कैसे डील होती है, ये भाग उससे पाठकों को रूबरू कराने की कोशिश है , आप को अच्छा लगा बहुत आभार
 

vakharia

Supreme
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आप ऐसे सक्षम लेखक और समीक्षक की उपस्थिति ही किसी भी लेखक को प्रसन्न कर सकती है, और वह अगर मेरे जैसी हो, किसी नयी विधा में सहम कर कदम रख रही हो, तो आप ऐसे लोगों की हुंकार भी हिम्मत बढाने के लिए काफी होती है और इतनी विस्तृत पॉजिटव समीक्षा, आभार के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।

यह कहानी इरोटिका तो है और रहेगी, लेकिन अब साथ साथ कारपोरेट गेम्स और फाएंसियल थ्रिलर और सस्पेंस भी रहेगा, कई बार मुझे लगता है की कहानी में कहानी होना कहानी के लिए जरूरी होता है पर, विशेष रूप में इस फोरम में अडल्ट के साथ किसी विशेष विधा, जैसे इन्सेस्ट से जुड़ कर वही डॉमिनेट करने लगता है और कई बार पाठकों का समर्थन भी उस प्रवृत्ति को बल देता है,

पर मेरी तीनो कहानियों में मोड़ थोड़ा उस मान्य परम्परा से हट कर है इसलिए आप ऐसे विज्ञ पाठकों का समर्थन बहुत मायने रखता है।

आभार, नमन

Thanks Thank You GIF by 大姚Dayao

komaalrani जी

आपके शब्दों ने मुझे सचमुच अभिभूत कर दिया—इतना कि आभार व्यक्त करने के लिए शब्द ढूँढ़ते हुए मैं भी आपकी तरह ही "सहम कर कदम रख रहा हूँ"! 😊

आपने जिस साहस और सजगता से नई विधाओं—कारपोरेट गेम्स, फाइनेंशियल थ्रिलर, सस्पेंस—को अपनी कहानियों में समेटने का प्रयोग किया है, वह वाकई प्रशंसनीय है। और हाँ, आपका यह विचार बिल्कुल सटीक है कि "कहानी में कहानी" होना ही उसे बहुआयामी बनाता है। परंतु जैसा आपने कहा, पाठकों की अपेक्षाएँ कभी-कभी हमें एक खास ढर्रे में धकेल देती हैं। यहाँ तक कि जब हम "अडल्ट" विधा में लिखते हैं, तो इन्सेस्ट जैसे टैबू विषयों का आकर्षण (या दबाव?) इतना प्रबल होता है कि कहानी का मूल स्वर ही गौण हो जाता है। आपका इस मान्य परंपरा से हटकर मोड़ लेना न केवल ताज़गी भरा है, बल्कि इस विधा को गंभीरता से लेने वाले पाठकों के लिए एक उम्मीद भी।

मैं आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि पाठकों का समर्थन किसी प्रवृत्ति को बल देता है.. और शायद यही कारण है कि हम कभी-कभी उसी जाल में फँस जाते हैं। पर आप जैसी लेखिका जो इस जाल को काटकर नए प्रयोग करते हैं, वे न केवल अपनी कल्पना को, बल्कि पाठकों की रुचियों को भी विस्तार देते हैं। आपका यह साहसिक विचलन मुझे विशेष रूप से प्रभावित करता रहा है।

और हाँ, आपके "हुंकार" (या इस मामले में, इतने उदार शब्दों) ने मेरा हौसला बढ़ाया है.. क्योंकि एक समीक्षक या पाठक के रूप में, जब कोई लेखक हमारे विचारों को इतनी गहराई से समझता है, तो यह एक दुर्लभ आनंद देता है। मैं तो बस इतना कहूँगा: आपकी लेखनी और आपका आत्मविश्वास दोनों ही संक्रामक हैं!

आपके आभार के लिए मेरे पास भी शब्द नहीं (क्योंकि आपने तो मुझे "विज्ञ पाठक" जैसे खिताब से नवाज़ दिया.. अब मैं अपनी नाक इतनी ऊँची करके घूमूँगा कि दरवाज़े से निकलना मुश्किल हो जाए! 😂)। परंतु सच कहूँ, तो ऐसे संवाद और सृजनात्मक आदान-प्रदान ही तो लेखन की सच्ची उपलब्धि हैं।

सादर

वखारिया
 
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