खंड :- 01अ
लोग कहते हैं कि नेकी का बदला नेक और बदी का बदला बद से मिलता. है मगर नहीं, देखो, आज मैं किसी नेक और पतिव्रता स्त्री के साथ बदी करने जा रहा हूं। अगर मैं अपना काम पूरा कर सका तो कल ही राजा का दीवान हो जाऊँगा। फिर कौन कह सकेगा कि बदी करने वाला सुख नहीं भोग सकता या अच्छे आदमियों को दुःख नहीं मिलता ? बस मुझे अपना कलेजा मजबूत कर रखना चाहिये, कहीं ऐसा न हो कि उसकी खूबसूरती और मीठी-मीठी बातें मेरी हिम्मत.. (रुक कर) देखता है की उसके तरफ कोई आ तो नही रहा है !
रात आधी से ज्यादे जा चुकी है। एक तो अंधेरी रात, दूसरे चारों तरफ से घिर आने वाली काली-काली घटा ने मानो पृथ्वी पर स्याह रंग की चादर बिछा दी है। चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है। तेज हवा के झपेटों से कांपते हुए पत्तों की खड़खड़ाहट के सिवाय और किसी तरह की आवाज़ कानों में नहीं पड़ती।
एक बाग के अन्दर अंगूर की टट्टियों में अपने को छिपाये हुए एक आदमी ऊपर लिखी बातें धीरे-धीरे बुदबुदा रहा है। इस आदमी का रंग-रूप कैसा है, इसका कहना इस समय बहुत ही कठिन है, क्योंकि एक तो उसे अंधेरी रात ने अच्छी तरह छिपा रक्खा है, दूसरे उससे अपने को काले कपड़ों से ढक लिया है, तीसरे अंगूर की घनी पत्तियों ने उसके साथ उसके ऐबों पर भी इस समय पर्दा डाल रक्खा है। जो हो, आगे चल कर तो इसकी अवस्था किसी तरह छिपी न रहेगी, मगर इस समय तो यह बाग के बीचोबीच वाले एक सब्ज बंगले की तरफ देख-देख कर दांत पीस रहा है।
सामने एक बंगला सुन्दर लताओं से ढका हुआ है और इसके बीचोबीच में जलने वाले एक रोशनी में साफ दिख रहा था की इस बंगले के एक कमरे में एक मर्द और एक औरत आपस में कुछ बातें और इशारे कर रहे हैं। यह बंगला बहुत छोटा था, दस-बारह आदमियों से ज्यादे इसमें नहीं बैठ सकते थे। इसकी बनावट अठपहली थी, बैठने के लिए कुर्सीनुमा आठ चबूतरे बने हुए थे, ऊपर बांस की छावनी जिस पर घनी लता चढ़ी हुई थी। बंगले के बीचोबीच एक मोढ़े पर मोमी शमादान (लैंप) जल रहा था। एक तरफ चबूतरे पर ऊनी चिनियांपोत की बनारसी साड़ी पहिरे एक हसीन औरत बैठी हुई थी, जिसकी अवस्था अठारह वर्ष से ज्यादे की न होगी। उसकी खूबसूरती और नजाकत की जहाँ तक तारीफ की जाये थोड़ी है। मगर इस समय उसकी बड़ी-बड़ी रसीली आंखों से गिरे हुए मोती-सरीखे आँसू की बूंदें उसके गुलाबी गालों को तर कर रही थीं। उसकी दोनों नाजुक कलाइयों में स्याह चूड़ियाँ, छन्द और जड़ाऊ कड़े पड़े हुए थे, बाएँ हाथ से कमर बन्द और दाहिने हाथ से उस हसीन नौजवान की कलाई पकड़े सिसक-सिसक कर रो रही है, और उसके सामने खड़ा शख्स हसरत-भरी निगाहों से उसके चेहरे की तरफ देखे जा रहा था और अंदाजा लगाने पर मालूम हो रहा था कि वह कहीं जाना चाहता है, मगर लाचार है, किसी तरह उन नाजुक हाथों से अपना पल्ला छुड़ा कर भाग नहीं सकता था। उस नौजवान की अवस्था पच्चीस वर्ष से ज्यादे की न होगी, खूबसूरती के अतिरिक्त उसके चेहरे से बहादुरी और दिलेरी भी झलक रही थी। उसके मजबूत और गठीले बदन पर चुस्त बेशकीमती पोशाक बहुत ही भली मालूम होती थी।
औरत : नहीं, मैं जाने न दूँगी।
मर्द : प्यारी ! देखो, तुम मुझे मत रोको, नहीं तो लोग ताना मारेंगे और कहेंगे कि बीरसिह डर गया और एक जालिम डाकू की गिरफ्तारी के लिए जाने से जी चुरा गया। महाराज की आँखों से भी मैं गिर जाऊँगा और मुझ पर नाकामयाबी का एक धब्बा लग जाएगा।
औरत : वह तो ठीक है, मगर क्या लोग यह न कहेंगे कि तारा ने अपने पति को जान-बूझ कर मौत के हवाले कर दिया?
बीर० : (अफसोस भरे स्वर में)! तुम एक वीर-पत्नी होकर ऐसा कहती हो?
तारा : नहीं, नहीं, मैं यह नहीं चाहती कि आपके वीरत्व में धब्बा लगे, बल्कि आपकी बहादुरी की तारीफ लोगों के मुंह से सुन कर मैं प्रसन्न होना चाहती हूँ, मगर अफसोस! आप उन बातों को फिर भी भूले जाते हैं, जिनका जिक्र मैं कई दफे कर चुकी हूँ और जिनके सबब से मैं डरती हूँ और चाहती हूँ कि आप अपने साथ मुझे भी ले चल कर इस अन्यायी राजा के हाथ से मेरा धर्म बचावें। इसमें कोई शक नहीं कि उस दुष्ट की नीयत खराब हो रही है और यह भी सबब है कि वह आपको एक ऐसे डाकू के मुकाबले में भेज रहा है जो कभी सामने होकर नहीं लड़ता बल्कि छिप कर लोगों की जान लिया करता है।
बीर० : (कुछ देर तक सोच कर) जहाँ तक मैं समझता हूँ, जब तक तुम्हारे पिता सुजनसिह मौजूद हैं, तुम पर किसी तरह का जुल्म नहीं हो सकता।
तारा : आपका कहना ठीक है, और मुझे अपने पिता पर बहुत-कुछ भरोसा है, मगर जब उस ‘कटोरा-भर खून’ की तरफ ध्यान देती हूँ, जिसे मैंने अपने पिता के हाथ में देखा था तब उनकी तरफ से भी नाउम्मीद हो जाती हूँ और सिवाय इसके कोई दूसरी बात नहीं सूझती कि जहाँ आप रहें मैं आपके साथ रहूँ और जो कुछ आप पर बीते उसमें आधे की हिस्सेदार बनूँ।
बीर० : तुम्हारी बातें मेरे दिल में छप जाती हैं और मैं भी यही चाहता हूँ कि यदि महाराज की आज्ञा न भी हो तो भी तुम्हें अपने साथ लेता चलूँ, मगर उन लोगों के तानों से शर्माता और डरता हूँ, जो सिर हिला कर कहेंगे कि ‘लो साहब, बीरसिह जोरू को साथ लेकर लड़ने गये हैं!
तारा : ठीक है, इन्हीं बातों को सोच कर आप मुझ पर ध्यान नहीं देते और मुझे मेरे उस बाप के हवाले किये जाते हैं, जिसके हाथ में उस दिन खून से भरा हुआ चाँदी का कटोरा.. (यह कहते हुए तारा का शरीर एक बार कांप जाता है) हाय हाय! जब वह बात याद आती है, कलेजा काँप उठता है, बेचारी कैसी खूबसूरत.. ओफ ! !
बीर० : ओफ! बड़ा ही गजब है, वह खून तो कभी भूलने वाला नहीं—मगर अब हो भी तो क्या हो ? तुम्हारे पिता लाचार थे, किसी तरह इनकार नहीं कर सकते थे ! (कुछ सोच कर) हाँ खूब याद आया, अच्छा सुनो, एक तरकीब सूझी है।
यह कह कर बीरसिंह तारा के पास बैठ गए और धीरे-धीरे बातें करने लगे।
उधर अंगूर की टट्टियों में छिपा हुआ वह आदमी, जिसके बारे में हम इस बयान के शुरू में लिख आए हैं, इन्हीं दोनों की तरफ एकटक देख रहा था। यकायक पत्तों की खड़खड़ाहट और पैर की आहट ने उसे चौंका दिया। वह होशियार हो गया और पीछे फिर कर देखने लगा, एक आदमी को अपने पास आते देख धीरे-से बोला, “कौन है, सुजनसिह?” इसके जवाब में “हाँ” की आवाज आई और सुजनसिह उस आदमी के पास जाकर धीरे-से बोला, “भाई रामदास, अगर तुम मुझे यहाँ से चले जाने की आज्ञा दे देते तो मैं जन्म-भर तुम्हारा अहसान मानता!”
रामदास : कभी नहीं, कभी भी नहीं !
सुजन० : तो क्या मुझे मेरे अपने ही हाथो से अपनी लड़की तारा का खून करना पड़ेगा?
रामदास : बेशक, अगर वह मंजूर न करेगी तो।
सुजन० : नहीं नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है! अभी से मेरा हाथ काँप रहा है और उसके हाथ से कटार गिरी पड़ती है।
रामदास : तुम्हें ऐसा करना होगा!
सुजन० : मेरे हाथों की ताकत तो अभी से जा चुकी है, मैं कुछ न कर सकूँगा।
रामदास : तो क्या वह ‘कटोरा-भर खून” वाली बात मुझे याद दिलानी पड़ेगी?
सुजन० : (रामदास की बाते सुनकर कांप जाता है) ओफ! गजब है!! (रामदास के पैरों पर गिर कर) बस-बस, माफ करो, अब फिर उसका नाम न लो। मैं करूँगा और बेशक वही करूँगा जो तुम कहोगे। अगर मंजूर न करे तो अपने हाथ से अपनी लड़की तारा को मारने के लिए मैं तैयार हूँ, मगर अब उस बात का नाम न लो! हाय, लाचारी इसे कहते हैं!!
रामदास : अच्छा, अब हम लोगों को यहाँ से निकल कर फाटक की तरफ चलना चाहिए।
सुजन० : जो हुक्म।
राम० : मगर नही, क्या जाने ये लोग फटक की तरफ न जाए जाये। तभी उसका ध्यान बंगले को तरफ जाता है और फिर वह कहता है देखो, वे दोनों उठ रहे है। मैं बीरसिह के पीछे जाऊँगा और तारा तुम्हारे हवाले की जाती है।
आगे की कहानी अगले खंड में......