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Romance अमरबेल एक प्रेमकहानी

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rajeshs

Rajeshwari singh
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भाग-1

गाँव में घुसते ही एक इमली का पेड़ पड़ता था. उस पेड़ के पास से गुजरने वालो को अक्सर एक लड़की उस इमली के पेड़ के नीचे खड़ी, बैठी. या काम करती दिखाई पड़ती थी. नाम था कोमल. कोमल दिखने में मोहल्ले की अन्य लड़कियों से खूबसूरत थी.

लम्बाई भी औसत थी. उम्र कोई अठारह के आस पास. भरा हुआ बदन. कजरारी आँखें. कजरारी इतनी कि कभी कभी लगता था कि काजल की पूरी डिबिया आँखों में लगा डाली है.
कोमल को सजने सवरने का बहुत शौक था. कभी कभी सजने में घंटों लगा देती थी. पीछे से उसकी बड़ी बहन देवी चिल्लाती, “क्या आज ही सब सिंगार कर डालोगी राजकुमारी जी."


कोमल कुछ न बोलती बस अपना सुंगार करने में लगी रहती थी. और सच कहा जाय तो कोमल के सजने सवरने का ही परिणाम था कि वह मोहल्ले की सबसे खूबसूरत लडकी थी. नाक लम्बी और पतली थी. जिसमे गोल नथुनी सोने पे सुहागा लगती थी. पतले गोरे कान जिनमे सोने के सादा कुंडल किसी भी सुन्दरी को लजाने के लिए काफी थे.


ऐसा नही कि कोमल बहुत ज्यादा सुन्दर थी लेकिन गाँव में अपनी उम्र की लड़कियों में बह अधिक सुंदर थी. सबसे हंसकर बातें करना तो जैसे उसकी खुराक थी. जब तक सारे मोहल्ले के घरों में जाकर उनके चौका चूल्हे का हाल न जान लेती उसे चैन न पड़ता था.


ये छोटा सा गाँव था भी बहुत प्यारा, मुश्किल से पच्चीस घर थे इस प्यारे से गाँव में कोमल का मोहल्ला तो सिर्फ चंद घरों से घिरा था. सारे घरों के लोग एकदूसरे से एक परिवार की तरह जुड़े हुए थे. फिर इस गाँव की लडकी कोमल ही पीछे क्यों रहती? वो भी मोहल्ले में अपनी प्यार मोहब्बत लुटाती फिरती थी.


कोमल पास के ही एक गाँव के इंटर कॉलेज में पढने जाती थी. उसकी बड़ी बहन देवी भी उसी के साथ उसी की क्लास में पढ़ती थी. दोनों बहन होने के साथ साथ सहेलियां भी थी. वो सहेलियां जो एक दूसरे से अपने मन की बात कह सुन लेती हैं. दोनों को एक दूसरे के गुण और कमियां मालुम थीं.


होली हो, दिवाली हो या कोई आम दिन. कोमल की मौज मस्ती मोहल्ले वालो के साथ रोज चालू रहती थी.अगर कोमल एक दिन के लिए भी कहीं चली जाती तो मोहल्ले को लगता कि उनके मोहल्ले से कुछ तो गायब है.


इसी मोहल्ले में एक शांत लडका छोटू भी रहता था. उम्र 18 साल के आस पास रही होगी. कोमल से उसका कोई लेना देना नही था लेकिन वो कोमल के प्रशंसकों में से एक था. वो कोमल के घर से मट्ठा ले कर आता था और कोमल उसके नल से पानी. छोटू के घर का नल मोहल्ले के लिए सरकारी नल की तरह था. कोमल भी इस बात का फायदा उठाती थी. छोटू और कोमल में जमकर बातें होती थी. पढाई से लेकर शादियों की दावतों तक.

कोमल अपनी इमली के पेड़ से छोटू के लिए इमली तोड़ कर दे दिया करती थी और बदले में उससे हरी मेहँदी के पत्ते तोड़कर लाने को कहती.


छोटू अपने स्कूल से आते वक्त कोमल के लिए मेहँदी के हरे पत्ते तोड़ कर ले आता था.
कोमल मुस्कुरा कर कहती, "तू ही है छोटू मोहल्ले में जो मेरा हर काम कर देता है." छोटू अपनी तारीफ सुन फूला न समाता फिर कोमल से पूछता, “कोमल क्या में इमली के पत्ते तोड़कर खा लूं?"

कोमल कहती, “हाँ हाँ क्यों नही? तेरे लिए कोई मना नही है.” इमली की तरह इमली के हरे पत्ते भी खट्टे होते हैं. जो खाने में बहुत खट्टे और अच्छे लगते हैं.


छोटू रोज़ स्कूल जाते वक्त कोमल से इमली के पत्ते लेकर जाता था और स्कूल में दोस्तों के साथ बैठकर खाता. यही सिलसिला सालों साल चलता रहा. कोमल इमली के पत्ते छोटू को देती और अपने लिए मेहँदी के पत्तो का बन्दोवस्त करवाती. लेकिन समय एक जैसा तो नही रहता और वही हुआ. इमली का मौसम खत्म हुआ. कोमल और छोटू का मिलना भी कम हो गया.


अब कभी कभार ही दोनों की मुलाक़ात होती थी. कोमल आज कल किसी अलग हवा में जी रही थी. जिसकी भनक किसी को नही थी लेकिन एक दिन वो भी आया जब कोमल अपने आप को किसी में खो बैठी और वो खोना ऐसा कि जिसके लिये वह अपनी जान हथेली पर लिए घूम रही थी.


___ गाँव में एक दूधिया आता था. वो कोमल के घर से भी दूध लेकर जाता था. कोमल उसके साथ बहुत मजाकें करती. कभी कभी उसके घर वाले उसे डांट भी देते लेकिन कोमल किसी के कहने से कब मानी थी जो आज मानती. दुधिया भी कोमल की ही उम्न का था. नाम था राज. उसका गाँव कोमल के स्कूल वाले रास्ते में ही पड़ता था.


धीरे धीरे दोनों एक दूसरे से घुलने मिलने लगे और फिर पता नही कब दोनों एक दूसरे को अपना दिल दे बैठे. ये बात खुद उन दोनों प्रेमियों को भी पता न चली. कोमल और राज ने अभी तक एक दूसरे से इश्क का इजहार भी न किया था.


बस बातें करते रहते. एक दूसरे को चिढाते, नये नये चुटकुले सुनाते. समय बीतता जा रहा था. इधर कोमल और राज का मौन इश्क अपने चरम पर था. उनके इश्क की आग उनके दिलों को जलाकर राख किये दे रही थी. मानो कह रही हो कि या तो इजहार करो नही तो तुम्हारे दिल के साथ साथ तुम्हे भी जलाकर राख कर दूंगी.


कोमल जब भैंस का दूध दुहने बैठती उस वक्त दूधिया राज बैठा बैठा उसके मोहक रूप के दर्शन करता रहता था. बीच बीच में कोमल भी उसे देखती रहती. कभी कभार भोंह के इशारे से पूंछती, "क्यों क्या हुआ ऐसे क्यों देख रहे हो?" और उसके रंग में रंगा दूधिया राज भी सर हिलाकर इशारों में कहता, "कुछ भी तो नही."


दोनों इश्क कलंदरों को पता था कि वो एक दूसरे को क्यों देखते हैं? लेकिन फिर भी पूछते थे. कारण था कोई भी पहले इजहार करने की हिम्मत न कर पा रहा था. जब भी उन में से कोई दूसरे की तरफ देखता और जब दूसरा पूछता तो तो उसमे मिलने वाला आनंद इजहारे इश्क के विचार से ज्यादा अच्छा लगता था.


इसलिए लोगों ने कहा है की छुप छुप के इश्क करने का मजा ही कुछ और होता है और वही आनंद ये दोनों प्रेमी प्राप्त किये जा रहे थे. लेकिन इश्क सिर्फ चुप रहकर देखना भर तो नहीं है. उसका और भी तो रूप है. जिसको पाने के लिए ये लोग भी लालयित थे. कोमल और उसकी बहन दोनों जब कॉलेज जातीं तो राज रास्ते में उन दोनों का इन्तजार करता रहता था. जैसे ही ये दोनों उसे दिखाई देतीं वो उठकर दोनों के साथ चलने लगता फिर अपना गाँव आने तक इनके साथ चलता रहता था.


एक दो दिन का तो कुछ नही लेकिन जब रोज़ ऐसा होने लगा तो कोमल की बड़ी बहन देवी उससे बोल पड़ी, "क्यों री कोमल ये राज दूधिया रोज अपने साथ ही क्यों जाता है?

कोमल अनजान बनते हुए बोली, “मुझे क्या पता?"

देवी उसे कुरेदते हुए बोली, “तो ठीक है. आज इसकी शिकायत पापा से किये देती हूँ. एक दिन में लाइन पर आ जाएगा."

कोमल हडबडा कर बोली, “अरे नही नही शिकायत की क्या जरूरत है? उसने हम से कोई गलत हरकत तो की ही नही न. फिर पापा से कहने की क्या जरूरत है."

देवी तंज करते हुए बोली, “अच्छा मेरी भोली बहन, जब कोई हरकत करेगा तभी कहोगी उससे पहले नही. जब कुछ हरकत कर ही देगा तब कहने का क्या फायदा? आज में इसकी शिकायत करके ही रहूँगी."


कोमल के दिल में राज का वास था. उसे राज के खिलाफ कुछ भी बर्दाश्त नहीं होना स्वभाविक था. वह तुनक कर बोली, "ठीक है कह देना पर में तुमसे न बोलूंगी. भूल जाना कि तुम्हारी कोई बहन भी थी."


देवी हैरत भरे स्वर में बोली, "अरे अरे पागल हो गयी हो क्या? ये राज क्या तुम्हारा फूफा लगता है जो इसकी शिकायत न करने दोगी और ये हो क्या गया है तुम्हे? उस राज की इतनी तरफदारी क्यों कर रही हो?"


कोमल अपने कहे पर हडबडा उठी. उसने इश्क के नशे में जो बात देवी से कह दी थी उसका अंदाज़ा उसे बात कहने के बाद हुआ. फिर सम्हलते हुए बोली, "देखो देवी मेरी बहन में तो सिर्फ ये कह रही थी क्यों किसी बेचारे सीधे साधे लडके को परेशान किया जाय?"


देवी को कोमल पर अब शक हो रहा था. सोच रही थी हो न हो ये राज इसी की राज़ी से हमारे साथ आता जाता है. कोमल के राज को सीधा साधा कहने पर वह तुनककर बोली, “अच्छा अब ये सीधा साधा लड़का कब से हो गया? कहीं कोई और बात तो नहीं कोमल रानी? बता देना नही तो तुम्हारी खैर नही."


कोमल तो पहले ही राज नाम की चासनी में पकी जलेबी थी.
ऊपर से देवी की तीखी बाते उसे और ज्यादा कुरकुरी किये जा रही थी लेकिन कोमल कितनी ही मुंहलवार थी परन्तु अपनी बड़ी बहन के सामने अपने इश्क को कबूल करना उसके लिए बहुत मुश्किल था.
 
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ये वो इश्क था जो अभी उसने अपने मुंह से अपने चाहने वाले को बोला भी नहीं था और न ही उसके आशिक ने उससे बोला था. फिर अपनी बहन को क्या बताये?
लेकिन बहन को उसके सवाल का जबाब देना भी तो जरूरी था. क्योंकि चुप रहने का मतलब अक्सर हाँ माना जाता है. यह सोच कोमल अपनी बहन देवी से बोली, "अरे कैसी बातें करती हो देवी बहन? कोई बात होती तो तुम्हे न बताती? आजतक तुमसे कोई बात छिपाई है भला मैने?"


देवी को शक तो था लेकिन अपनी बहन कोमल पर भरोसा भी था. उसका दिमाग उलझन में तो था लेकिन कोमल से राज ने कुछ कहा भी तो न था. कैसे कहती कि तुम दोनों के बीच में कुछ चक्कर चल रहा है?


सब कुछ ऐसा ही चलता रहा. राज रोज उन्हें मिलता और बातें करता हुआ उनके साथ अपने गाँव की शुरुआत तक जाता. अब देवी भी राज से बाते करती थी. कोमल को ये बात अच्छी लगी. सोचती थी चलो देवी अब राज की शिकायत पापा से न करेगी.


लेकिन कोमल और राज का मौन इश्क अपनी चरम सीमा को पार करता जा रहा था. कभी कभी तो राज के मन में आता कि वो कोमल से देवी के सामने ही अपने इश्क का इजहार कर डाले. किन्तु उसे डर भी लगता था कि कहीं उसका उतावलापन कोमल और उसके मिलन में बाधा न बन जाए?


इधर यही हाल कोमल का भी था. उसके भी मन में आता था कि देवी को सब कुछ बता डाले कि वो राज पर अपना दिल हार बैठी है लेकिन उसे भी डर था कि देवी कहीं पापा से जाकर न बोल दे? दैय्या रे दैय्या फिर तो मुसीबत हो जाएगी,
 

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Update- 2

लेकिन कभी तो ऐसा होना ही था. एक दिन देवी बीमार पड़ गयी. घरवालों ने उस दिन स्कूल जाने से मना कर दिया लेकिन कोमल का तो घर में मन ही नही लगता था. उसका मन तो उस राज से जा लगा था. उसे आज से अच्छा मौका न लगा. सोचा देवी न जायेगी तो आज रास्ते में सिर्फ वो और राज होंगे.


घर वालों के काफी मना करने के बाबजूद कोमल घर से स्कूल के लिए चल दी. घर से बाहर कदम पड़ते ही कोमल का मन बारिश में मोर जैसा हो गया. आज कोयल को बसन्त और चकोर को चाँद से मिलने की तमन्ना थी.


आज सुबह कोमल ने घर से चलते वक्त खाना भी नही खाया था. आज तो वो राज के दर्शन से भूख को तृप्त करने वाली थी फिर खाना भला कौन कमबख्त खाए?


उधर राज रास्ते में आकर बैठ गया. आज सुबह से राज को भी न जाने क्यूँ ऐसा लग रहा था कि कुछ अच्छा होने वाला है? सुबह जल्दी उठा. खुशबु वाले साबुन से नहाया और बाल कंघी कर सीधा उसी जगह आ बैठा जहाँ से रोज उसकी महबूब कोमल गुजरती थी. जिधर उसके दिल को सुकून मिलता था. जहाँ जाए बिना उसका दिल थामे न थमता था.


कोमल के पैर हवा में चल रहे थे. उसे लगता था कि जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी वो उस जगह पहुंच जाए जहाँ राज बैठा उसकी राह देख रहा है. वो इतनी तेज चल रही थी कि आज अगर देवी उसके साथ होती तो वो उसे काफी पीछे छोड़ आगे निकल जाती. सांस फूल रही थी लेकिन इस पगली को तो अपनी मंजिल पर जाकर रुकना था.


फिर वो वक्त भी आ पहुंचा जब उसे राज कुछ दूर पर खड़ा दिखाई दिया. राज आज कोमल को अकेली आते देख अंदर तक कंपकपा गया. दिल में हलचल हो गयी थी. परन्तु आनंद की भी सीमा न रही. जल्दी जल्दी पेंट की पिछली जेब से छोटा सा कंघा निकाल बाल ठीक कर लिए. मुंह रुमाल से पोंछ लिया. थोडा सा रुमाल दांतों पर भी घिस लिया लेकिन उसे अपनी आँखों पर भरोसा न होता था. सोचता था देवी भी उसके साथ पीछे पीछे आ रही होगी.


कोमल ने राज को देखा और राज ने उसे. दोनों की आँखे मिली जिनमे एकदूसरे को कुछ बताने और कुछ पूछने की अधीरता साफ़ दिखाई देती थी. जैसे ही दोनों करीब आये दोनों की हिम्मत न हुई कि एक दूसरे से कुछ बोल सकें. राज को यह जानने की जल्दी थी कि आज उसके साथ देवी आई है या नहीं?


कोमल ने थोडा रुककर अपनी सांसो पर काबू किया जो तेज चलकर आने की वजह से फूल रही थी. लेकिन तब तक राज अपनी अधीरता खो कोमल से पूंछ बैठा, “आज तुम्हारी...बहन नही आई." राज ये सवाल पूछते वक्त काँप रहा था. आज से पहले उसे कोमल के सामने इतना डर कभी भी महसूस न हुआ था जबकि रोजाना कोमल से खूब बातें किया करता था.


कोमल सांसो पर काबू पा चुकी थी लेकिन राज के साथ अकेले खड़े होने के कारण आज उसे भी अपने आप का होश न रहा. राज के सवाल के जबाब में बस उसने ना में सर हिला कर बताया कि आज सचमुच में देवी नहीं आई है. ओह मेरे भगवान! कितनी मोहक बात कोमल ने कह डाली. जैसे राज को सारे जहाँ का सुख दे दिया था.


इतना सुनना था कि राज के दिल की धडकने किसी मशीन की तरह चलने लगीं. उसे लगा कि अगर उसके दिल ने धडकना कम न किया तो उसका दिल फट जाएगा. कोमल का दिल भी राज के दिल की तरह बिना बात धडके जा रहा था. दोनों काफी देर से चुप चाप खड़े थे. कोई किसी से न बोलता था.
 
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सारे दिन बडबड करने वाली कोमल भी आज अपने मुंह से एक शब्द न बोल सकी थी. और वो राज? राज को तो जैसे सांप सूंघ गया था. हद तो ये थी कि दोनों एक दूसरे से नजरें तक न मिला पा रहे थे. बस चोरी चोरी एक दूसरे को देखते थे. कभी एक तो कभी दोनों.
कोमल चाहती थी कि पहले राज बोले और राज चाहता था कि पहले कोमल बोले. लेकिन दोनों के दिमाग में ये बात न आ रही थी कि बोले तो बोले क्या? घर से तो राज भी न जाने क्या क्या सोच के निकला था कि आज ये बोलूँगा आज वो बोलूँगा. और ये चंचल मतवाली कोमल ये तो हवा में उडती आई थी. रास्ते भर सोचती आ रही थी कि आज राज बोला तो ठीक नही तो वो खुद बोल देगी कि मुझे तुमसे प्यार हो गया है.


लेकिन अब क्या हुआ? अब तो दोनों के दोनों चुप खड़े थे. दोनों की हिम्मत जबाब दिए जा रही थी. दोनों के हाथ पैर कांप रहे थे. दोनों की हथेलियाँ पसीज रही थी. दोनों ही अपने होंठ चबा रहे. कुछ कहने की जद्दोजहद का महान नमूना पेश हो रहा था.


ये हो क्या रहा था? दोनों को ऐसे ही खड़े थे. कीमती समय बर्बाद हुआ जा रहा था. इसकी दोनों को चिंता भी थी. कोमल के स्कूल का टाइम भी लेट हो रहा था लेकिन उसे जरा भी परवाह नही थी. उसे तो परवाह थी राज के बोलने की. उससे कुछ कहने की.


लेकिन बिल्ली के गले में पहले घंटी कौन बांधे? कोमल लाज के मारे जमीन में नजरें गढाए खड़ी थी और वो बातूल राज? वो तो कोमल से भी ज्यादा शरमा रहा था. किन्तु अब कोमल को ज्यादा देर चुप रहना अच्छा न लग रहा था तो वो खुद ही बोल पड़ी, “ऐ दूधिया(राज). तुम रोज हमारे पीछे क्यों लगे रहते हो? किसी दिन देवी ने पापा से तुम्हारी शिकायत कर दी तो?"

ये बात कहने में कोमल ने अपना पूरा जोर लगा दिया था. दिल की धडकनें तो किसी इंजिन की तरह चल रही थी. वो तो राज का नाम तक न ले सकी थी. इसीलिए तो उसे दूधिया कहकर सम्बोधित किया था.


लेकिन राज को कोमल के मुंह से अपने नाम की जगह दूधिया सुनना भी उतना ही अच्छा लगा जितना कि वो राज को नाम से उसे पुकारती. राज ने जब कोमल का ये सवाल सुना तो उसकी की हिम्मत बढ़ गयी. अपने दिल की धडकनों को थामते हुए लजाकर बोला, “देवी ही शिकायत करेगी तुम न करोगी?"

कोमल हडवडा गयी. बोली, “हाँ हाँ में भी करूंगी." लेकिन कोमल के मन में राज की शिकायत का तो खयाल तक नहीं था. ये बात तो राज भी जानता था और कोमल भी.


राज जानबूझकर अंजान बन कोमल से बोला, "ठीक है तो कल से में यहाँ न आया करूंगा और तुम कहोगी तो तुमसे बात भी न किया करूँगा.” राज ने ये बात कोमल का मन जाने के लिए बोली थी और हुआ भी वही.


कोमल तडप कर बोली, "नही नही. मेरा वो मतलब नही था. अगर तुम कोई गलत बात न करोगे तो तुम्हारी शिकायत न करूंगी. तुम साथ साथ जाते हो तो रास्ता बड़े आराम से गुजर जाता है." कोमल एक सांस में बोल गयी. लेकिन हाय रे दैय्या! ये क्या कह गयी? जो नही कहना था वही कह गयी. वाह री राज की दीवानी कोमल!


राज अब खुलने लगा था. उसे कोमल की बातों से थोडा सहारा मिला था. बोला, “तो तुम्हे अच्छा लगता है...ये जो में..तुम्हारे साथ आता जाता हूँ.” राज बात कहने में हिचक रहा था लेकिन दिल अपनी हमदम के इश्क में घुलता जा रहा था. जैसे रवडी में चीनी. जैसे रसगुल्ला में चासनी .जैसे दही में वडा और जैसे कड़ी में पकोड़ा.


कोमल ने शरमा कर चेहरा ऊपर उठाया. राज पहले से ही उसकी तरफ देख रहा था. दोनों की नजरें मिली. राज दूधिया की सादा आँखे कोमल की काली समंदरी कजरारी आँखों से जा लगी. राज तृप्ति पा उठा. उसे लगा कि आज उसने जीवन की सबसे खूबसूरत चीज को देख लिया हो. जैसे किसी गहरी प्यास में पानी मिल गया हो.


राज को उसकी बात का जबाब मिल चुका था. कोमल की नजरों ने राज को ये बता दिया था कि उसका रोजाना कोमल के साथ आना जाना अच्छा लगता है. बतलाना भी अच्छा लगता है. प्रेम कहानी आगे बढ़ने लगी थी. दोनों धीरे धीरे एकदूसरे को समझते जा रहे थे.


लेकिन अब क्या बात की जाय? तभी राज को सूझा कि कोमल आज स्कूल जायेगी कि नही? उसे बात करने का मुद्दा मिल गया था. बोला, “आज तुम स्कूल नही जाओगी?" राज का मन होता था कि कोमल को बोल दे कि तुम आज स्कूल न जाओ. यही मेरी नजरों के सामने बैठी रहो. में तुम्हे तुम्हे देखता रहूँ और तुम मुझे देखती रहो.


कोमल सोचती हुई बोली, “आज लेट हो गयी हूँ. मन नही करता स्कूल जाने का, अब लौट कर घर को भी नहीं जा सकती, घर के लोग पूंछेगे की पढने क्यों नही गयी आज?" कोमल स्कूल के लिए ज्यादा लेट नही हुई थी लेकिन उसका मन राज से अलग होने को नहीं करता था इसीलिए उसने ये बात बोली. सोचती थी ये राज क्या कहेगा?
कोमल ने स्कूल न जाने की बात कह जैसे राज के मुंह की बात छीन ली थी. वह हिम्मत कर बोला, "हां तो क्यों जाती घर लौट कर? जब तक स्कूल की छुट्टी का समय नहीं होता तब तक यहीं रुक जाओ, में यहाँ तुम्हारे साथ बैठा रहूँगा."


कोमल राज के मन की बात जान चुकी थी लेकिन वो और ज्यादा राज से बात करना चाहती थी. वो अपने दिल के दिलवर को और ज्यादा पहचानना चाहती थी इसलिए बोली, “यहाँ तुम्हारे साथ मुझे किसी ने देख लिया तो न जाने लोग क्या क्या बात सोचेंगे? और मेरे घर ये बात पहुंची तो मेरी खैर नही.


राज ने जब अपनी कोमल के मुंह से उसका डर जाना सुना तो तडप उठा. वो कैसे अपनी जान को मुसीबत में देख सकता था? बोला, “अगर तुम बुरा न मानो तो मेरे पास एक जगह है जहाँ कोई आता जाता ही नही. अगर तुम चाहो तो छुट्टी होने के समय तक वहां...बैठ सकती हो?"

राज ये बात कहने में इतना सकुचा रहा था. जैसे कोई बुरी बात कह रहा हो? जैसे कोमल कहीं बुरा न मान जाए. कोमल को ये बात अच्छी तो लगी परन्तु कुछ बोली नही. उसने अपना किताबों का बस्ता (बैग) उठा आगे को बढ़ना शुरू कर दिया. राज समझ गया कि कोमल उसके साथ चलने को तैयार है.


लेकिन राज आगे न बढ़ पाया. वो तो उस चंचल कोमल को देख रहा था जिसकी चाल किसी नवयौवना हिरनी की तरह थी. कोमल की ये शोख अदाएं ही तो राज के दिल को लूट बैठी थी. कोमल ने महसूस किया कि राज उसके पीछे नही आ रहा है. उसने मुड कर देखा.

राज खड़ा खड़ा उसे एकटक देखे जा रहा था. मुंह पर हल्की मुस्कान थी जो लज्जा की चिकनाई से युक्त थी लेकिन कोमल को ये शरारत लगी. ऐसी शरारत जो मीठी मीठी चुभन देती है.जो चिढाती तो है लेकिन प्यार से.


कोमल उसी प्यार से चिढती हुई बोली, “तुम नही आओगे? न आओ तो मुझे वो जगह बता दो में अकेली ही चली जाउंगी.” कोमल ने अकेले जाने की बात राज का धैर्य परखने के लिए कही थी और हुआ भी वही.


राज का धैर्य जबाब दे गया. वो हड्वड़ा कर बोला, "हाँ हाँ चलता हूँ." और अपनी साईकिल को उठा कोमल के पीछे चल दिया.

कोमल राज की इस हड्वड़ा पर मुस्कुरा उठी. ये चंचल लडकी उस शरमाये हुए आशिक को छेड़ने का पूरा आनंद उठा रही थी. कोमल बलखाती हुई आगे आगे चल रही थी और राज साईकिल लिए कोमल के पीछे पीछे. राज अपनी नजरों को कोमल के रूप से मुक्त न कर पा रहा था. कभी कभी तो कोमल की तरफ देखने के कारण उसकी साईकिल गिरने को होती थी लेकिन वो आशिक ही क्या जो दर्द और कष्ट न सहे? जो मुश्किल न झेले. जो जमाने की फटकर न खाए. जो दो चार दिन भूखा न रहे. जो घर वालों से लात घूसों से न पिटे और जो पागलों की तरह दुःख भरे नग्मे न सुने. ये सोच थी आशिक दूधिया राज की. वाह रे राज!


फिर कोमल को ध्यान आया कि वो बिना राज के रास्ता बताये जा कहाँ रही है? उसे तो पता ही नहीं था कि राज कौन सी जगह की कह रहा था? और राज! राज को तो सुध ही नही थी कि वो कोमल के साथ कौन सी जगह जा रहा था? न ये फिकर कि वो रास्ता यही है जिसपे वो कोमल को ले जाना चाहता था? आखिर ये हो क्या रहा था?


कोमल फिर रुकी गयी. मुड़कर राज की तरफ देखा. वो पगला दूधिया राज तो पहले से ही उसको देख रहा था. कोमल के एकदम मुडकर देखने पर हड्वड़ा गया. कोमल अब राज के सामने पहले से अधिक खुल गयी थी. तीखी नजरें और होठों पर मुस्कान लिए बोली, “अब कितनी दूर और जाना है?"
__ राज फिर हड्बड़ा उठा. इधर उधर रास्ते को देखा. वो लोग सचमुच में गलत रास्ते पर आ गये थे और ये गलती थी राज की, वह कोमल के पीछे पीछे चलता रहा और एक बार भी ये न कहा कि हम गलत रास्ते पर जा रहे हैं. फिर सर खुजलाते हुए डर कर एक आम के पेड़ की तरफ इशारा करता हुआ बोला, "हम गलत रास्ते पर आ गये. हमें तो उस तरफ जाना था जिधर वो आम का पेड़ खड़ा है."


कोमल ने प्यार भरे अंदाज से माथा पीटते हुए कहा, "दैय्या रे दैय्या! तो फिर तुम इतनी देर से मेरे पीछे चलते हुए क्या कर रहे थे जो तुम्हे रास्ते की ही खबर नही रही?"

राज इस बात का क्या जबाब देता? क्या वो कोमल से ये कहता कि में तुम्हारे इश्क के समंदर में गोता लगा रहा था? क्या वो ये कहता कि मैं तुम्हारे हुश्न और मतवाली चाल के चंगुल में फस गया था? ये बात कोमल भी जानती थी कि राज क्यों रास्ता भूल गया था? माना कि राज की गलती थी कि उसने रास्ता नही बताया लेकिन कोमल भी तो राज से पूंछ सकती थी कि उसे जाना कहाँ है?


ये पगली पूंछती कहाँ से? ये तो खुद मोहब्बत के ख़्वाबों के शहर में घूम रही थी. सुध वुध तो ये दोनों ही गंवा चुके थे लेकिन कबूले कौन? फिर वही बात. बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? अब दोनों उस आम के पेड़ की तरफ चले जा रहे थे. जहाँ उन्हें कोई देख न पाए. जहाँ वो अपने इश्क का सजदा कर सकें. जहाँ वो अपनी साँसें थाम एक दूसरे को देख सकें और जहाँ वो अपनी मोहब्बत के जुर्म को कुबूल कर सकें.


आम के पेड़ के नीचे आ दोनों के कदम रुक गये. कोमल अभी आम के पेड़ को निहार रही थी. राज ने एक झटके में साईकिल उसके स्टैंड पर खड़ी कर दी. राज को हड्बड़ाहट ज्यादा थी और होती भी क्यों न? ये उसका पहला ऐसा इश्क था जिसका वो इजहार करने जा रहा था. और कोमल! कोमल भी तो पहली बार ही किसी के प्यार में पड़ी थी. उसका कौन सा प्यार करने का कारोवार था?


राज ने जल्दी से अपने बाल संबारे, मुंह पर हाथ फिराया. कमीज का कॉलर ठीक किया और चुपचाप खड़ा हो कोमल के पवित्र रूप के दर्शन करने लगा लेकिन तभी कोमल ने मुड़कर उसकी तरफ देखा. इस बार राज ने अपनी नजरें कोमल की नजरों से अलग न की. दोनों की नजरें ऐसे मिली जैसे सूरज की किरन और ओंस भरी धरती. सूरज की हल्की गर्म किरणें जमीन पर पड़ी ओस की बूंदों पर पड उन्हें गर्म करने लगी.


दोनों की साँसे किस लय में चल रहीं थी ये किसी को पता नही था. टकटकी लगाये दोनों की आखें अपने हमदम की आँखों की गहराइयाँ माप रहीं थी लेकिन जितना मापती गहराई उतनी बढती जाती थी. शायद इसीलिये दुनियां का कोई भी आशिक अपने महबूब की आँखों की गहराई न जान सका था.


लेकिन आँखे भी तो आँखे होती है. किसी भी चीज को कितनी देर देखे? ज्यादा देर तक पलकें न झपकाने के कारण दोनों की आँखों में आंसू आ गये. दोनों ने एक साथ अपनी नजरें एक दूसरे से हटा लीं. दोनों इधर उधर देखने लगे. समय कभी किसी के लिए नही रुका इसलिए आज भी भागा ही जा रहा था. दोनों के पैरों में सबकुछ जल्दी करने की गुगगुदी होती थी. लेकिन इश्क और हवस में अंतर होता है. जो इस समय इन दोनों दिलदारों के बीच दिखाई दे रहा था.
आज एक अलग घड़ी थी इन दोनों प्यार के जीवों के लिए. जिसे ये पूरी तरह से महसूस कर रहे थे. दिलों की धडकनों में होने वाली सुरसुरी उन्हें कुछ नया होने का आभास करा रहीं थी और अजीब बात तो ये थी कि दोनों के पास घड़ी भी नही थी. समय का पता कैसे चले? कैसे इश्क कबूल करने की जल्दी हो?

अन्य दिन तो राज भी घड़ी पहनता था लेकिन आज बो जल्दी जल्दी में अपनी घड़ी पहनना भूल गया था. घड़ी राज के लिए सबसे जरूरी चीजों में से एक थी. जब वो दूध लेने कोमल के गाँव जाता था तो घड़ी से ही तो पता चलता था कि किसकी भैंसिया कब दूही जानी है? अगर थोडा सा भी लेट हुए तो भैंस वाला दूध में पानी मिला देता था और फिर राज डेयरी मालिक की फटकार सुननी पडती थी.


लेकिन आज उसे घड़ी की एक और अहमियत पता चली कि अगर इश्क करो तो घड़ी जरूर पहनो, नही तो समय का पता ही नही चलता और आप उस दिन का इश्की लेक्चर मिस कर देते हैं. ये ऐसा लेक्चर होता है जिसका एक एक अक्षर आपके लिए बहुत ज़रूरी होता है. अगर आप इश्क के कलमा पढने वाले है तो.


कोमल ने राज की तरफ फिर से देखा और शुरुआत करती हुई बोली, “अब खड़े ही रहने का इरादा है? कहो तो बैठ जाऊं? मेरी टाँगे तो दर्द कर रही है." इतना कह कोमल बैठ गयी

लेकिन राज ने सुना कि कोमल के पैरों में दर्द हो रहा है तो एकदम से बोला, "कहों तो तुम्हारे पैर दबा दूँ?" ये कहने के बाद राज खुद ही झेंप गया. सोचा दैय्या रे दैय्या! ये क्या कह गया?


कोमल का माथा ठनक गया और हंसी भी छूट गयी. बोली, “आज बाबले हो गये हो क्या? अरे हम तो कह रहे थे कि खड़े खड़े पैर में दर्द हो रहा है ये कोई वैसा दर्द थोड़े ही है. और हो भी रहा होता तो क्या तुमसे पैर दबाने को कहती? बुद्धू कहीं के."

कोमल की प्यार भरी फटकार सुन राज का मन इश्क के रंग से रंग उठा. डालडा पिघल कर मक्खन हो गयी. सादा पानी मीठा शरवत वन गया.


कोमल आम के पेड़ के नीचे बैठी थी और राज उससे थोड़ी दूर पर खड़ा था. कोमल ने राज की तरफ देखा और बोली, “अब खड़े रहकर क्या कर रहे हो? आकर बैठ जाओ और कुछ बताओ या सुनाओ. घर पर दूध लेने आते थे तब तो बड़ी लम्बी लम्बी बाते करते थे. फिर आज क्या मौन व्रत रखा है?"


राज पहले से बहुत बातूल था. कोमल की प्यार भरी चुटकियां उसे उस बातूलपन की तरफ धकेलती जा रहीं थी. अब बह भी खुलता जा रहा था. बोला, “नही ऐसी कोई बात नही. सोचता हूँ क्या बोलूं? अच्छा चलो ये बताओ तुम आज स्कूल क्यों नही गयीं? अगर चाहती तो जा भी सकतीं थी.


कोमल ने मन ही मन में सोचा वाह रे राज दूधिया! मुझसे पूछता है की स्कूल क्यों नही गयीं और खुद के मन में था कि में आज स्कूल जाऊं ही नहीं, यह सोच वह बोली, "अच्छा और तुम ये रोज रोज मेरे साथ यहाँ से गाँव के बाहर तक आते जाते हो ये सब किस लिए करते हो?" सवाल से महा सवाल टकरा दिया. वाह री मतवाली कोमल!


कोमल के सवाल ने राज को निरुत्तर कर दिया था. जबकि राज जानता था कि कोमल स्कूल क्यों नही गयी और कोमल भी ये जानती थी कि राज उसके आगे पीछे क्यों घूमता है? फिर ये सवाल क्यों? इन सब शुरूआती आशिक लोगो की ये सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि इन्हें ये पता नहीं होता कि ये कर क्या रहे हैं? सब करते भी जाते है. यही तो हो रहा था इन दोनों इश्क कलंदरों के बीच में.

राज डरते डरते कंपकपाती टांगों से चलते हुए कोमल की बगल में जा बैठा और हाथ में घास का तिनका ले जमीन पर उसे घुमाने लगा. बगल में बैठे राज को दूर से कोमल ने महसूस किया. वह अंदर तक एक अनजाने रंग में रंग गयी. पेड़ के नीचे बैठे इन अनबोले आशिकों को सावन के महीने में चलने वाली सुगन्धित वायु का स्पर्श हो रहा था. आज हवा भी ऐसी थी कि कभी राज की तरफ से कोमल की तरफ बहती तो कभी कोमल की तरफ से राज की तरफ बहती थी.


पता नहीं कि ये हवा ही थी जो इधर से उधर वह रही थी या कोई इश्क की अनजानी वयार जो दोनों को एक दूसरे की बदन की खुशबु का आनंद दिलवाए जा रही थी? कोमल के बदन से उठती सुंगधित खुसबू राज को स्वर्ग का आनंद दिए जा रही थी. राज के बदन की मर्दाना खुश्बू कोमल को पागल किये जा रही थी.


दरअसल हवा में कोई खुसबू थी ही नही. ये तो इन आशिकों का बहम था. और हो भी क्यों न? जब आप किसी को इतनी शिद्दत से चाहते हैं तो उसकी हर एक बात आपको निराली लगती है. उसके बदबू भरे पसीने में आपको खुसबू आती है. उसकी मामूली अदायें आपका दिल लूट लेती हैं. और ये ही आभास चंचल कोमल और वाबले दूधिया राज के साथ हो रहा था, अब गाँव में तो उस समय डियोडेरेंट नही थे तो खुसबू कहाँ से आई? ये तो इन दोनों के इश्किया पागलपन की सुगंध थी.


लेकिन आग और फूस एक साथ ज्यादा देर तक अलग नहीं रहते. आग पहले फूस को जलाती है और फिर खुद भी बुंझ जाती है. यही तो होना था इन दोनों का. अब ये तो पता नही कि आग कौन था और फूस कौन. लेकिन थे दोनों ही कुछ न कुछ. कोमल ने राज की तरफ देखा. राज ने कोमल की तरफ.कोई कुछ न बोला. फिर कोमल बोल पड़ी, “क्या देख रहे हो?"

राज का फिर वही जबाब था, “कुछ भी तो नही."

फिर कोमल को पता नही क्या सूझा. बोली, “अगर कल से में स्कूल न आऊं? तुम्हे कहीं मिलूं भी नहीं तो क्या करोगे?" कोमल ने ये बात राज को टटोलने के लिए कही थी लेकिन इस बात ने राज के दिल पर तलवार की धार की तरह वार किया.

वो तिलमिला कर रह गया. उसका मन तो करता था कि बात कहते वक्त ही कोमल को चुप कर दे लेकिन न कर सका और प्यार के आवेश में आ बोला, "पहले तो तुम्हें ढून्ढूगा और अगर न मिलीं तो जहर खा मर जाऊँगा. लेकिन तुम जाओगी कहाँ?"


कोमल राज के मुंह से एकदम ऐसे अंदाज़ से की गयी बात पर हैरान थी लेकिन उसे अंदर से अपने होने बाले प्रेमी पर गर्व भी था जो उसके लिए अपनी जान देने के लिए तैयार था. एक लड़की को अपने आशिक से और क्या चाहिए? चंचल कोमल अभी राज को और तैस में लाना चाह रही थी. बोली, "तुम क्यों जान दे दोगे? मुझसे रिश्ता ही क्या है तुम्हारा? दूध लेने ही तो आते हो मेरे घर फिर ये जीने मरने की बाते किसलिए?"


कोमल मन में खुश थी. उसे राज से प्यार भरी चुटकी लेने में बड़ा मजा आ रहा था लेकिन राज तो उन बातों को गम्भीरता से लेता जा रहा था. बोला, “में कौन लगता हूँ तुम्हारा ये तुम पूंछ रही हो? अगर एक लडकी एक अकेले लडके के साथ सूनसान जगह पर बैठी है तो वो कौन होगी उसकी? ये अपने आप से पूंछ लो."


कोमल को राज से इस उत्तर की उम्मीद नहीं थी. वो सकपका गयी लेकिन फिर सम्हलते हुए बोली, “हमारा होगा क्या? क्या हम ऐसे ही मिलते रहेंगे? क्या हमारा कोई भविष्य नही?"

राज ने कोमल के मुंह से हम' शब्द का जिक्र सुना तो उसे यकीन हो गया कि जो मेरे अंदर है वो इस पगली कोमल के अंदर भी है. कोमल को अपने भविष्य को लेकर जो चिंता थी वो राज को भी थी. राज बोल पड़ा, “अभी शुरुआत होने से पहले हमे ऐसा नही सोचना चाहिए. पहले शुरुआत तो होने दो."


कोमल फिर से मजाक के मूड में थी. बोली, “अभी और कुछ करना है शुरुआत करने के लिए? ये जो साथ बैठकर बातें कर रहे हैं क्या ये शुरुआत नही है?"

राज कोमल की बात सुन झेंप गया. उसे समझ नही आता था कि कब कोमल मजाक करती है और कव गम्भीर होती है. लेकिन अब राज भी कोमल की तरह चुलबुला होना चाहता था. जैसे वो रोज उसके घर दूध लेने जाता था तब जो मजाकें वो कोमल के साथ करता था आज फिर से वही मजाकें करना चाहता था. चेहरे पर शरारती मुश्कान लिए बोला, "मेरे एक दोस्त ने जब एक लडकी के साथ ये शुरुआत की थी तो एक बच्चे का बाप बन गया था. तो उस हिसाब से तो हमारी शुरुआत कुछ भी नही."
कोमल बुरी तरह शरमा गयी. उसका गोरा मुखड़ा इस मजाक से पके हुए सेव की तरह लाल हो गया. चेहरे पर शर्मीली मुस्कान थी. फिर नीचे नजरें कर बोली, “छि: चुप रहो. वैसे तो बोल नही रहे थे और बोले भी तो ये बेहूदा बातें. कुछ और नहीं बोल सकते थे?"


राज की हंसी छूट गयी. उसे कोमल का इस तरह शर्माना बड़ा अच्छा लगा लेकिन फिर हंसी रोकते हुए बोला, "अच्छा में तो बुरी बातें करता हूँ तो तुम्ही कोई अच्छी बात बताओ?"

कोमल क्या बोलती जो उसके के दिल में था उसे बोलने के लिए बहुत हिम्मत की जरूरत थी. जो अभी कोमल के पास नही थी. फिर भी कुछ तो बोलना ही था. कोमल फिर से उस रंगरेज़ राज के इश्क में रंगती हुई बोली, “तुम क्या क्या कर सकते हो मेरे लिए?" कोमल ने सवाल तो कर दिया लेकिन उसको ये अपना सवाल बहुत बेहूदा लगा.


राज फिर तैस में आ गया बोला, “तुम जो कहो, कहो तो अपने प्राण निकाल कर तुम...."

कोमल का फूल जैसा कोमल हाथ राज के होंठो से जा लगा. राज आगे न बोल पाया. उसने अपनी आँखें बंद कर ली. कोमल के हाथ का पहला स्पर्श अपने होंठो पर पा राज ऐसा मदहोश हो गया जैसे उसने सारे जहां की मदिरा अपने मुंह से लगा ली हो. वो इस कदर इस नशे में खो गया मानो कब से बो इस मदिरा का पान कर रहा हो.


लेकिन ये मदहोशी! ये मदिरा पान? ये मादक स्पर्श कितनी देर तक चल सकता था? कोमल ने अपना हाथ राज के होंठो से हटा लिया. राज का ध्यान भंग हो गया. उसका सारा नशा एक पल में ऐसे उतर गया. मानो उसने कोई नशा किया ही न था. उसका मन करता था कि कोमल का हाथ, वो हाथ जिससे राज को सारे जहाँ का आनन्द मिला. उसे फिर से अपने होंठो पे लगा ले.

हे ईश्वर! कितनी तपिश थी? कितना अनदेखा सौन्दर्य था? कितनी मदहोशी थी? कितना अपार आनंद था और कितनी कोमलता थी इस चंचल शोख लडकी के हाथ के स्पर्स में? राज के मन में इस वक्त बस यही बात चल रही थी लेकिन कोमल के एकदम हाथ हटा लेने से सब कुछ खत्म हो गया था.


राज तडप कर कुछ बोलता उससे पहले कोमल लरजते स्वर में बोली, "एक बात सुन लो राज. हमारे सामने दोबारा मरने मारने की बातें न करना. बताये देते हैं हां."


राज कोमल के मदभरे जादू में पूरी तरह सरावोर था. कोमल की प्यार से भरी चिंतित डांट पर माफ़ी मांगता हुआ बोला, "माफ़ करना कोमल हमे नही पता था कि हमारी ये बात तुमको इतनी बुरी लग जायेगी. लेकिन तुमने हमारे मुंह से अपना हाथ क्यों हटा लिया?" राज ने जब ये हाथ हटाने वाली बात बोली तब उसका लहजा बहुत नशीला था.


बराबर में बैठी चंचल शोख कोमल भी कब पीछे रहती. वो भी राज के इश्क के नशे में डूबती हुई बोली, "तुम्हें इतना अच्छा लगता हमारा हाथ. कहो तो फिर से रख दे तुम्हारे मुंह पर?" ये बात कहते वक्त कोमल की आँखों में एक अजीब सा नशा था जिसको नाम देना इस इश्क की बेइज्जती होगी.


वो चंचल कोमल के इश्क में पगला हुआ दूधिया राज? उसे लगा कि कोमल ने उसके जनम जनम की मुराद पूरी करने की बात कह दी है. वो कंपकपाते लहजे में बोला, “हाँ..रख दोगी तो एहसान होगा तुम्हारा मेरे ऊपर. तुम इस के बदले जो कहोगी वो करू...." राज बात पूरी करता उससे पहले फिर वही फूलों के समान कोमल मुलायम. मदभरा स्पर्श वाला कोमल का हाथ राज के होठों पर ठीक उसी जगह आ लगा जहाँ पहले लगा था.


ओह मेरे राम! ये आनंद, ये सुकून, ये शीतलता, ये खुशबु और ये मिठास. क्या यही प्यार है? क्या यही मोहब्बत है? क्या यही इश्क है? राज को आज सारा जहाँ भी कोई दे तो उसे इस स्पर्स के लिए ठुकरा दे, उसका मन, उसका तन, उसका दिल किसी ऐसे रस से भर गया था जिसका स्वाद सारे जहाँ की धन दौलत और खुशियों से ज्यादा कीमती था. राज के मुताबिक कहें तो उसकी कोई कीमत ही नही थी. सरल शब्दों में वो बेशकीमती लेकिन न खरीदी जा सकने वाली वस्तु था. किन्तु क्या अभी तक ऐसा हुआ है कि किसी वस्तु में आग लगी हो और वो एक जगह ही जलती रही हो? आग का काम तो चारो तरफ फैलना ही होता है और वही होने वाला था इन दोनों प्रेमियों के बीच. राज तो अलग दुनियां में खोया ही हुआ था लेकिन कोमल भी राज के मर्दाना खुरदरे होठों की छुअन से मादक हो उठी थी. उसके शरीर के एक एक रोम में प्यार की अग्नि दस्तक दे चुकी थी. कोमल को होश न रहा की वो है कहाँ?


राज ने उसी मस्त मदिर स्पर्स के नशे में कोमल के दूसरे हाथ को अपने हाथ में ले लिया. कोमल ने राज के मुंह से अपना दूसरा हाथ हटा उसी के हाथों में दे दिया. अब कोमल के दोनों हाथ राज के हाथों में थे. देखकर ऐसा लगता था मानो दोनों का स्वयंवर हो रहा हो. ऐसा स्वयंवर जिसका साक्षी वो आम का पेड़ था. वो आम का पेड़ जिसके पत्तों और लकड़ी को इन दोनों आत्माओं के धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है. जिसकी लकड़ी और पत्तों से इन दोनों आत्माओं के इष्ट देवों की पूजा होती है. खुले आकाश के नीचे वो पवित्र आम का पेड़. उस पेड़ के नीचे ये दो आत्माओं का मिलन. ये सावन का महीना. पेड़ों के बौरो की मंद मंद खुशबू, हल्की मद्दम खुसबूदार हवा और ये मादक पंक्षियों का कलरव. क्या मोहब्ब्ती माहौल था. अगर कोई कलाकार इस माहौल को देखे. महसूस करे. समझे तो इसे दुनिया का सबसे उत्तम स्थान. समय और माहौल कह डाले.
 
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Rajeshwari singh
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राज के मन में कोमल को और ज्यादा पाने की लालसा जाग उठी. उसने कोमल को गले से लगा लिया. उसके नाजुक से बदन को अपने मजबूत हाथों में कस लिया. फिर कोमल ही कहाँ पीछे रहती? उसके हाथो की जकडन भी राज के चारो तरफ लिपट गयी. ये जो पवित्र मिलन था. ये जो दो नदियों का संगम था. ये जो एक स्त्री और एक पुरुष था. वो इस जगह को. इस आम के पवित्र पेड़ को. इस सावन के मनभावने मौसम को और अधिक अमर किये जा रहा था. जिसका वर्णन कोई शायद ही कर सकता था. इसका आनंद या तो वो पगला आशिक राज दूध वाला जानता था या वो चंचल. शोख. मतवाली. पगली कोमल. या फिर ये सजीव पवित्र आम का पेड़ या फिर ये सावन का मादक पवित्र महीना. या फिर ये अतुल्य भारत की भूमि जिसपर ये दोनों आत्माएं अपना मिलन किये जा रहीं थीं.


फिर वो होना शुरू हो गया जिसकी कल्पना इन दोनों जीवों को तो क्या किसी को भी नही हो सकती. पहला प्यार. पहली मुलाक़ात. वो मुलाक़ात जिसमे प्यार का इजहार होना था लेकिन इतना कुछ होने जा रहा था. जो एक पति पत्नी के बीच होता है. न कोमल ने राज को रोका. न राज ने रुकने का प्रयास किया. जब राज उसको अपने आगोश में लेने की कोशिश किये जा रहा था तब कोमल ने मदभरी आँखों से राज की भूखी आँखों में देखते हुए कहा था, "कोई आ गया तो?"


कोमल के इस सवाल ने राज के सामने खुद का आत्म समर्पण का करने का संकेत दे दिया था. राज भी कोमल के हुस्न की खुश्बू में पागल था. फुसफुसाते हुए कोमल के कान में बोला, "यहाँ आज तक कोई नही आया तो अब क्यों आएगा? आज यहाँ हम तुम हैं फिर और किसी की गुंजाइश ही कहाँ बचती है?"


कोमल पूरी तरह से निश्चिन्त हो राज राग में मस्त हो गयी. दरअसल उस आम के पेड़ के नीचे सिर्फ आशिकों का ही डेरा रहता था. कुछ दिन पहले यहाँ एक प्रेमी जोड़े ने फांसी लगा अपनी जान दे दी थी. तब से यहाँ कोई आने की हिम्मत नही करता था लेकिन राज तो आज कोमल के इश्क में पागल था, उसे किसी भी चीज से डर न लग रहा था. इसी कारण वो कोमल को ले इस पेड़ के नीचे आ गया. जब से उस प्रेमी जोड़े ने यहाँ आत्महत्या की. अपने प्यार का गला घोंटा तब से यहाँ कोई भी प्यार का पंक्षी भी आने की हिम्मत न करता था. सोचते थे कि वहां जो जाएगा वो कभी भी चैन की जिन्दगी नही जी पायेगा. सुनने में आया था कि वो प्रेमी जोड़ा मरने से पहले ये श्राप दे गया था कि इस पेड़ के नीचे से गुजरेगा उसका जीवन बर्बाद हो जाएगा,


लेकिन राज ने आज इस श्राप को न माना. भगवान करे राज और कोमल के साथ ऐसा न हो. इन लोगों का उस आत्महत्या में क्या दोष था? ये तो खुद प्रेम के पुजारी थे लेकिन ये तो बाद में देखा जाएगा कि इन्हे श्राप लगा कि नही अभी तो इनकी शुरुआत थी. राज उस मतवाली चंचल कोमल में समा गया और वो कोमल उस पगले राज में.


दोनों ने मोहब्बत का दायरा पार कर दिया. दोनों ने वो जुर्म कर दिया जिसकी इश्क में लेशमात्र भी जगह नही थी. दोनों ने शादी से पहले के नियम को तोड़ दिया. दोनों ने समाज के बनाये बंधन को ध्वस्त कर दिया. दोनों वो कर बैठे जो नहीं करना था. ये वो हो चुका था जो समाज की नजरों में पाप था. कलंक था, गैर जरूरी था.


लेकिन अब हो गया तो हो गया. चाहे वो पुन्य हो या पाप. धर्म हो या अधर्म, जरूरी हो या गैर जरूरी. शायद प्यार के पक्षी समाज के दायरे को मानते ही नहीं है. पहचानते ही नहीं है. गठानते ही नहीं हैं.


फिर थोड़ी देर में दोनों को होश आया. फिर से अपने आप को संवारा. दोनों को अच्छा भी लग रहा था और गलत भी. कोमल को अपने भविष्य को लेकर चिंता थी और राज को भी. कोमल उदास हो राज से बोली, “क्या तुम जिन्दगी भर मेरा साथ दोगे?"

राज की आँखे मर्द होने के बावजूद गीली थीं. बोला, “मरते दम तक, जब तक राज में सांस है तब तक वो सिर्फ कोमल के लिए ही जियेगा."


कोमल उसी उदास अंदाज में बोली, “भूल तो नहीं जाओगे आपना वादा? मुकर तो नही जाओगे मुझे वादा करके? बीच भवर में नैय्या तो न छोड़ दोगे? अभी जैसे हो वैसे ही रहोगे? कहीं खायी हुई कसम तो न तोड़ दोगे?" कोमल इश्क में शायद शायराना हो गयी थी.


राज भी शायराना हो बोला, “अगर ऐसा हुआ तो समझ लेना वो राज ही नहीं होगा. जो तुमसे किया वादा भूल जाए. वादे से मुकर जाए. तुम्हे बीच राह में छोड़ जाए. जैसा अभी है वैसा न रहे. खायी हुई कसम तोड़ दे. वो राज नहीं कोई बहरूपिया राज के वेश में तुम्हारे सामने होगा. जो ऐसा पाप कर दे. राज अपना मुंह तुम्हारे सामने न दिखायेगा. जिस दिन राज ऐसा राज हो जाएगा."


शायर राज ने शायरा कोमल के सवाल का जबाब उसी अंदाज में दिया जिस अंदाज़ में कोमल ने पूंछा था. यही तो होता है दिलों का मेल. प्यार का खेल. इश्क की रेल. सामने वाला जैसा हो बैसे बन जाना. एक दूसरे के दिल को भा जाना. यही तो होता है किसी के इश्क में फना हो जाना. किसी का हो जाना. किसी को अपना कर लेना. यही तो है इश्क का सजदा. किसी के दर्दे-ए-दिल पर मरहम लगाना. किसी को अपने दिल का दर्द बताना. बड़े मियां यही तो होता है प्यार का असली नजराना. कोमल अभी कुछ कहने वाली थी कि उसका नजर अपने कॉलेज के बच्चों पर पड़ी जो काफी दूर एक रास्ते पर जा रहे थे. कोमल का दिल धकधका उठा. उसे पता चल चुका था कि उसके कॉलेज की छुट्टी हो गयी है. एकदम से राज से बोली, “राज अब मुझे चलना होगा. मेरे स्कूल की छुट्टी हो गयी है. घर टाइम से पहुंचना बहुत जरूरी है." ___

राज को जैसे किसी ने तलवार की धार से चीर दिया, जैसे किसी ने उसके सीने में भाला घोंप दिया. कोमल के जाने वाली बात सुनकर उसे ऐसा ही लगा. तडपकर कोमल की तरफ देख बोला, "क्या तुम और थोड़ी देर रुक नही सकती? अभी तो आयीं और अभी चल दीं? भला ऐसा भी कोई करता है? तुम बड़ी जालिम हो कोमल. जाओ में तुमसे नाराज़ हूँ.

कोमल तडपकर बोली, “भला कौन मुआं जाना चाहता है? मेरा दिल तो करता है कि दिन रात तुम्हारी आँखों के सामने बैठी तुम्हे निहारती रहूँ. तुम्हारी बाहों में अपने आप को समेटे रहूँ लेकिन आज जाउंगी तभी तो फिर आउंगी. जालिम में नहीं जालिम तो समय है जो आज ऐसे भाग रहा है कि जैसे हमसे इसकी कोई दुश्मनी हो. तुम नाराज ना होओ राज. में तुम्हारी थी तुम्हारी रहूँगी. मुझे तुमसे अलग कोई नही कर सकता? न ये समय. न ये घर वाले."


राज को अपनी राधा कोमल के मुख से प्यार भरे शब्द ऐसे लगे जैसे प्यासे को पानी. बो कोमल की प्यार भरी नर्म बातों में ऐसे घुल गया जैसे नमक में पानी और दिल को हाथों से थाम बोला, "मुझे माफ़ करना कोमल. मैने तो तुम्हारे जाने की वजह से ऐसा कह दिया, तुम्हारा जाना मुझे उदास किये जा रहा है. पता नही कल तक का समय जब तुम फिर से स्कूल आओगी कैसे कटेगा? ये कमबख्त रात कैसे कटेगी? जब अभी यह हालत है तो रात कैसी होगी? ऐसा लगता कि तुम्हारे विना में मर ही न जा...."

कोमल की आँखे भर आयीं. ____ राज का मुंह अपने कोमल हाथ से बंद कर रोते हुए बोली, “मैं कहे देती हूँ राज हमारे सामने मरने मारने की बातें न करना. तुम्हें हमारी कसम. तुम हमे अपना मानते हो तो आइंदा ऐसी बात न कहना. तुम्हारी ऐसी बातों से हमारी जान निकल जाती है. कभी सोचा है तुम न रहे तो हमारा क्या होगा? हम तो जीते जी मर जायेगे."


कोमल कुछ और कहती उससे पहले राज का प्रायश्चित भरा स्वर उभरा. बोला, “बस कोमल बस आगे कुछ न कहो. आज के बाद हम ध्यान रखूगा की तुम्हारे सामने ऐसी कोई बात न कहूँ और कह भी दूतो तुम मुझे अपना अपराधी मान क्षमा कर देना."

इतना कह राज कोमल से फिर से लिपट गया. कोमल भी उससे किसी बेल की तरह लिपट गयी. दोनों फिर हिल्की भर भर कर रोये. आंसूओं की नदियाँ दोनों की आँखों से उफान ले रहीं थी. दोनों का भावुक मिलन बहती हवा को सर्द कर गया. सावन के महीने को सर्दी का एह्साह करा गया. आम का पवित्र पेड़ भी शायद भावुक हो गया था. पक्षियों के स्वरों में भी नमी आ गयी जो पेड़ों पर बैठे चहचहा रहे थे. ये मिलन का बिछोड़ा होता ही ऐसा था लेकिन कहा जाता है की मिलन के बाद बिछोड़ा और बिछोड़े के बाद मिलन होता ही होता है. ये बात वो पागल दिल कैसे समझे क्योंकि दिल के दिमाग तो नही होता न.


लेकिन समय का ध्यान कर कोमल ने राज को अपने से अलग किया और बोली, “मुझे अब जाना चाहिए नही तो घर में माँ पापा आफत खड़ी कर देंगे. चलो तुम भी घर पहुँचो तुम्हारे घर वाले भी तुम्हारी राह देख रहे होंगे. और अपना ध्यान रखा करो इतनी भी लापरवाही ठीक नही होती. तुम अकेले नही हो. किसी और को भी तुम्हारी जरूरत है."


राज कोमल की प्यार भरी फिकर की बात सुन कहीं खो सा गया. सच ही तो कहती थी कोमल. अब राज के साथ कोमल को भी तो उसकी जरूरत थी. अब वो उसकी जन्म जन्म की साथी थी. फिर राज की फिकर करना तो उसका हक था. राज के बारे में वो न सोचेगी तो कौन सोचेगा? राज का होश इस सोच में कहीं गुम था.


राज होश में आता हुआ बोला, “चलो तुम्हे साईकिल से तुम्हारे गाँव तक छोड़ आता हूँ."

कोमल बोली, “नही नही. किसी ने देख लिया तो मेरी मुश्किल और बढ़ जायेगी? तुम रहने दो में चली जाउंगी."

राज समझाते हुए बोला, “कैसी बातें करती हो? मुझे तो चैन नहीं पड़ेगा अगर तुम अकेली पैदल जाओगी तो. ऐसा करता हूँ तुम्हे ये रास्ता पार कर तुम्हारे गाँव की शुरुआत तक छोड़ आता हूँ फिर तुम वहां से अकेली चली जाना."


कोमल को ये विचार बुरा न लगा. उसका भी दिल कर रहा था कि राज उसे छोड़ने जाए. इस बहाने से थोड़ी देर और दोनों साथ साथ रह सकेंगे. बोली, “ठीक है पर जल्दी चलो कहीं देर न हो जाए."

राज कोमल की चिंता को समझ रहा था. उसने झटपट से साईकिल उस तरफ घुमा दी जिधर कोमल का गाँव था. जिधर वो रोज़ भैंस का दूध लेने जाता था. जिधर के गाँव की लडकी कोमल से उसे इश्क हो गया था.


राज ने साईकिल रास्ते पर की फिर कोमल को बिठाया और साईकिल को हवा से बातें करवा दीं. आज उसके बदन में अकूत ताकत आ गयी थी. आज उसकी महवूवा कोमल उसके साथ उसकी साईकिल पर बैठी थी. जिसके सामने अपनी साईकिल चलाने की प्रतिभा का प्रदर्शन दिखाना उसे ताकत दिए जा रहा था.


राज साईकिल चला रहा था. कोमल पीछे की सीट पर बैठी थी. कोमल ने पीछे से राज की कमर को अपने हाथ से पकड़ रखा था. राज को कोमल की ऐसी पकड़न से ऐसा महसूस होता था मानो कोमल उसकी बीबी हो और वो उसे उसके मायके छोड़ने जा रहा हो. या कहीं मेला दिखाने ले जा रहा हो. या फिर सिनेमा में लगी कोई फिल्म दिखाने!


राज को कोमल का एक एक स्पर्श हर बार एक नई अनुभूति दे रहा था. जैसे चीनी उबले पानी में पड़े तो चाय और ठंडे में पड़े तो शरवत बना देती है इसी प्रकार कोमल की हरेक छुअन राज को एक नया रूप देती थी. राज इस मिलने वाली तरुणाई का बखूबी
आनंद ले रहा था.

आज रास्ता पता ही नहीं चला. कोमल के गाँव की शुरूआती सडक आ पहुंची. राज ने साईकिल के ब्रेक लगा दिए. कोमल साईकिल से उतरी. राज ने साईकिल को खड़ा किया. कोमल जाने लगी लेकिन उसने देखा कि राज की आँखों में उसके लिए कुछ निवेदन है जिसे कोमल ही समझ सकती थी. वो फिर से मुड़ी और आकर राज से ऐसे लिपट गयी. जैसे चन्दन के पेड़ से सांप. जैसे नीम के पेड़ से गिलोय. जैसे भूसे की बुर्जी से लौकी तोरई की बेल.


दोनों ने एक दूसरे को अपनी बाहों में कस लिया. ऐसे जैसे कि फिर न मिलेंगे. ये उनके मन का मिलन था जो संकेत दे रहा था कि अब दोनों बिछड़ने वाले हैं. किसी के रास्ते पर आने की आशंका से दोनों अलग हो गये. भीगी आँखों से कोमल अपने गाँव की तरफ चल दी. राज वहीं खड़ा उसे देख रहा था. उसका दिल उस जाती हुई कोमल को देख फटने को होता था लेकिन कल फिर मिलने की तमन्ना उसे फटने से रोक रही थी.


किसी अपने को जाते हुए देखना बहुत दुखद होता है और वो अगर अपना दिल से अपना हो तो दर्द थोडा ज्यादा होता है. आते हुए जितनी खुशी होती है जाते हुए उससे कहीं ज्यादा दुःख होता है. ये हमेशा से होता था. आज भी हो रहा था और आगे भी होता रहेगा लेकिन दुःख और सुख का ये संगम कभी नही थमेगा.


कोमल मुड मुड कर राज को देख रही थी. राज भीगी आँखों से उसे जाते हुए देख रहा था. फिर दोनों एक दूसरे की आँखों से ओझल हो गये. जैसे सुबह होने पर चाँद और तारे और रात होने पर सूरज, दोनों उदास मन ले अपने अपने घर चल दिए जो आज पहली बार उन्हें नीरस लगने बाला था.


कोमल की आँखे अभी तक भीगी हुई थी लेकिन गाँव की शुरुआत में इमली के पेड़ से पहले छोटू मिल गया. कोमल का मन उसे देख थोडा हल्का हुआ. उसे देख बोली, “अरे आज तो साथ साथ छुट्टी हुई हमारी तुम्हारी?” छोटू बोला, “मेरी तो उसी टाइम पर हुई लेकिन तुम आज लेट हो गयीं."


कोमल हड्वड़ा कर बोली, “क्या सच में में लेट हो गयी?"

छोटू उसे समझाता हुआ बोला, "इतना भी नही, बस कोई पन्द्रह बीस मिनट मुश्किल से.

कोमल उससे बोली, “चलो फिर तो जल्दी घर पहुंचें." छोटू ने स्वीक्रति में सर हिला दिया और कोमल की चाल से चाल मिला चल पड़ा.


गाँव में घुसते ही कोमल की माँ कंडे(उपले) थापती मिल गयी. कोमल को देख बोली, “आज लेट कैसे हो गयी री छबिलिया? तेरे पापा गुस्सा हो रहे थे."

कोमल हड्वड़ा कर बोली, "अरे मम्मी स्कूल से तो में कब की आ गयी. इस छोटू की बातों में लेट हो गयी. येन जाने कहाँ कहाँ की बातें सुनाता रहा."


छोटू कुछ कहने वाला था कि कोमल ने उसकी तरफ देख अपनी काली कजरारी आँखे मिचमिचा दी. छोटू चुप हो गया. उसे पता था कि कोमल झूट बोल रही है लेकिन बच्चों में एकदूसरे को बचाने का बड़ा शौक होता है और वही आज छोटू ने किया.


कोमल की माँ बोली, “चल ठीक है. अब घर पहुंच जल्दी." कोमल घर चल दी.

छोटू ने थोडा आगे आकर कोमल से पूछा, "तुमने झूट क्यों बोला कि मेरी वजह से लेट हुईं थी?"

कोमल छोटू को मक्खन लगाती हुई बोली, "छोटू किसी से कहना मत कि मैंने झूट बोला. तुझे इस बार ज्यादा इमली खिलाऊँगी. लेट तो में स्कूल से आते में हो गयी थी. अब मम्मी को बताती तो वो मुझपर चिल्लाती.तू ये मत पूछना कि क्यों लेट हो गयी थी? ये बात में तुझे फिर कभी बताऊंगी."


छोटू कोमल की बात पर हाँ हाँ करता रहा. फिर दोनों अपने अपने घर को चले गये, कोमल से ज्यादा किसी ने कुछ कहा नही
लेकिन कोमल को घर में रहना बहुत नीरस लग रहा था. उसका मन तो फिर उसी रास्ते पर जाने को करता था जहाँ रोज राज उसका इन्तजार करता था. उसका मन तो उस जगह जाने को कर रहा था जहाँ आज पूरा दिन बिताया था. आज के जैसी उदासी. ये नीरसता, इतनी उबासी कोमल ने आज तक नहीं देखी थी.


ये वैसा ही गम था. वैसी ही नीरसता थी. जैसे वन में किसी हिरनी का साथी कहीं चला जाय. फिर उस हिरनी को हरी से हरी घास. मीठा से मीठा पानी. मधुर से मधुर फल अच्छा नहीं लगता. वो अपनी साथी हिरन के वियोग में दिन रात भूखी प्यासी रहकर काटती सोचती है जब वो आएगा तो मिलकर खायेगें और कभी कभी तो इस वियोग में उस हिरनी के प्राण तक चले जाते हैं लेकिन वो हूक नही जाती जो उसे अपने साथी के बिछुड़ने से मिली थी. ये जो इश्क की इबादत है वो इन्सान हो या जानवर सबको बराबर तपाती है. तभी उसपर अपनी मेहरवानी दिखाती है. जो तप गया सो पार और न तप पाया सो डूब जाता है.


कोमल ने थोडा सा खाना खाया. वो भी माँ और बहन के बार बार कहने पर. कोमल की भूख तो जैसे खत्म ही हो गयी थी. रात हुई तो सभी को दूध दिया जा रहा था. जो गाँव की परम्परा है. कोमल अपने पापा को दूध देकर आयी. थोड़ी देर बाद पापा की कर्कश आवाज आई, "क्यों री छबिलिया. इस दूध में क्या डाला है? क्या चीनी की जगह नमक डाल लायी है?

कोमल को होश आया. उसने पापा के पास से दूध ला चखकर देखा. दूध बहुत नमकीन था क्योंकि कोमल ने चीनी की जगह नमक डाल दिया था. वो अपने दिमाग में सिर्फ राज को लिए बैठी थी इसलिए ये भूल गयी कि दूध में नमक डाला या चीनी. और करती भी क्या दोनों का रंग सफ़ेद ही तो होता है. आँखे तो राज के स्वाद में थी फिर चीनी और नमक में कौन अंतर करे?


कोमल की माँ ने जब ये सुना तो बोली, "ये छोरी तो पागल हो गयी है पता नही इसका दिमाग कहाँ रहता है? क्या अपने सास ससुर को भी ऐसे ही चीनी की जगह नमक खिलाया करेगी?"

अब माँ को कौन बताये कि कोमल की आँखों पर राज के इश्क की पट्टी बंधी है और दिमाग पर उसकी यादों का ताला. बेचारी माँ क्या समझे ये इश्क विश्क के चक्कर? उसे तो चौका चूल्हे से लेकर गोबर थापने से ही फुर्सत नही.और माँ ही क्या सारा घर कोमल के इस कारनामे से बेखबर था. किसी से इश्क होना क्या कोई तेल साबुन का इश्तिहार है जिसके पोस्टर सडकों पर लगाये जाएँ? ये तो हद पार होने पर अपने आप मालुम पड जाता है.
इश्क होने का पता करना वैसा ही है जैसे किसी बच्चे को बड़े होते न जान पाना.जैसे ये जानना कि मर्दो की दाढ़ी और सर के बाल कब बढ़ते है? या पेड़ कब बड़े होते हैं? जैसे गर्भ में शिशु के जीवन कब आता है? जैसे नाखून कब बढ़ते हैं? कहने का मतलब किसी ने किसी का इश्क शुरू होते न जान पाया है. सच में ये है भी बड़ी अदभुत अनुभूति. जिसका न आदि है न अंत. तभी तो भगवान भी मोहब्बत में खुद का मौजूद होना बताते हैं. कोमल भी तो यही कर रही थी.
 
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गाँव में घुसते ही एक इमली का पेड़ पड़ता था. उस पेड़ के पास से गुजरने वालो को अक्सर एक लड़की उस इमली के पेड़ के नीचे खड़ी, बैठी. या काम करती दिखाई पड़ती थी. नाम था कोमल. कोमल दिखने में मोहल्ले की अन्य लड़कियों से खूबसूरत थी.

लम्बाई भी औसत थी. उम्र कोई अठारह के आस पास. भरा हुआ बदन. कजरारी आँखें. कजरारी इतनी कि कभी कभी लगता था कि काजल की पूरी डिबिया आँखों में लगा डाली है.
कोमल को सजने सवरने का बहुत शौक था. कभी कभी सजने में घंटों लगा देती थी. पीछे से उसकी बड़ी बहन देवी चिल्लाती, “क्या आज ही सब सिंगार कर डालोगी राजकुमारी जी."


कोमल कुछ न बोलती बस अपना सुंगार करने में लगी रहती थी. और सच कहा जाय तो कोमल के सजने सवरने का ही परिणाम था कि वह मोहल्ले की सबसे खूबसूरत लडकी थी. नाक लम्बी और पतली थी. जिसमे गोल नथुनी सोने पे सुहागा लगती थी. पतले गोरे कान जिनमे सोने के सादा कुंडल किसी भी सुन्दरी को लजाने के लिए काफी थे.


ऐसा नही कि कोमल बहुत ज्यादा सुन्दर थी लेकिन गाँव में अपनी उम्र की लड़कियों में बह अधिक सुंदर थी. सबसे हंसकर बातें करना तो जैसे उसकी खुराक थी. जब तक सारे मोहल्ले के घरों में जाकर उनके चौका चूल्हे का हाल न जान लेती उसे चैन न पड़ता था.


ये छोटा सा गाँव था भी बहुत प्यारा, मुश्किल से पच्चीस घर थे इस प्यारे से गाँव में कोमल का मोहल्ला तो सिर्फ चंद घरों से घिरा था. सारे घरों के लोग एकदूसरे से एक परिवार की तरह जुड़े हुए थे. फिर इस गाँव की लडकी कोमल ही पीछे क्यों रहती? वो भी मोहल्ले में अपनी प्यार मोहब्बत लुटाती फिरती थी.


कोमल पास के ही एक गाँव के इंटर कॉलेज में पढने जाती थी. उसकी बड़ी बहन देवी भी उसी के साथ उसी की क्लास में पढ़ती थी. दोनों बहन होने के साथ साथ सहेलियां भी थी. वो सहेलियां जो एक दूसरे से अपने मन की बात कह सुन लेती हैं. दोनों को एक दूसरे के गुण और कमियां मालुम थीं.


होली हो, दिवाली हो या कोई आम दिन. कोमल की मौज मस्ती मोहल्ले वालो के साथ रोज चालू रहती थी.अगर कोमल एक दिन के लिए भी कहीं चली जाती तो मोहल्ले को लगता कि उनके मोहल्ले से कुछ तो गायब है.


इसी मोहल्ले में एक शांत लडका छोटू भी रहता था. उम्र 18 साल के आस पास रही होगी. कोमल से उसका कोई लेना देना नही था लेकिन वो कोमल के प्रशंसकों में से एक था. वो कोमल के घर से मट्ठा ले कर आता था और कोमल उसके नल से पानी. छोटू के घर का नल मोहल्ले के लिए सरकारी नल की तरह था. कोमल भी इस बात का फायदा उठाती थी. छोटू और कोमल में जमकर बातें होती थी. पढाई से लेकर शादियों की दावतों तक.

कोमल अपनी इमली के पेड़ से छोटू के लिए इमली तोड़ कर दे दिया करती थी और बदले में उससे हरी मेहँदी के पत्ते तोड़कर लाने को कहती.


छोटू अपने स्कूल से आते वक्त कोमल के लिए मेहँदी के हरे पत्ते तोड़ कर ले आता था.
कोमल मुस्कुरा कर कहती, "तू ही है छोटू मोहल्ले में जो मेरा हर काम कर देता है." छोटू अपनी तारीफ सुन फूला न समाता फिर कोमल से पूछता, “कोमल क्या में इमली के पत्ते तोड़कर खा लूं?"

कोमल कहती, “हाँ हाँ क्यों नही? तेरे लिए कोई मना नही है.” इमली की तरह इमली के हरे पत्ते भी खट्टे होते हैं. जो खाने में बहुत खट्टे और अच्छे लगते हैं.


छोटू रोज़ स्कूल जाते वक्त कोमल से इमली के पत्ते लेकर जाता था और स्कूल में दोस्तों के साथ बैठकर खाता. यही सिलसिला सालों साल चलता रहा. कोमल इमली के पत्ते छोटू को देती और अपने लिए मेहँदी के पत्तो का बन्दोवस्त करवाती. लेकिन समय एक जैसा तो नही रहता और वही हुआ. इमली का मौसम खत्म हुआ. कोमल और छोटू का मिलना भी कम हो गया.


अब कभी कभार ही दोनों की मुलाक़ात होती थी. कोमल आज कल किसी अलग हवा में जी रही थी. जिसकी भनक किसी को नही थी लेकिन एक दिन वो भी आया जब कोमल अपने आप को किसी में खो बैठी और वो खोना ऐसा कि जिसके लिये वह अपनी जान हथेली पर लिए घूम रही थी.


___ गाँव में एक दूधिया आता था. वो कोमल के घर से भी दूध लेकर जाता था. कोमल उसके साथ बहुत मजाकें करती. कभी कभी उसके घर वाले उसे डांट भी देते लेकिन कोमल किसी के कहने से कब मानी थी जो आज मानती. दुधिया भी कोमल की ही उम्न का था. नाम था राज. उसका गाँव कोमल के स्कूल वाले रास्ते में ही पड़ता था.


धीरे धीरे दोनों एक दूसरे से घुलने मिलने लगे और फिर पता नही कब दोनों एक दूसरे को अपना दिल दे बैठे. ये बात खुद उन दोनों प्रेमियों को भी पता न चली. कोमल और राज ने अभी तक एक दूसरे से इश्क का इजहार भी न किया था.


बस बातें करते रहते. एक दूसरे को चिढाते, नये नये चुटकुले सुनाते. समय बीतता जा रहा था. इधर कोमल और राज का मौन इश्क अपने चरम पर था. उनके इश्क की आग उनके दिलों को जलाकर राख किये दे रही थी. मानो कह रही हो कि या तो इजहार करो नही तो तुम्हारे दिल के साथ साथ तुम्हे भी जलाकर राख कर दूंगी.


कोमल जब भैंस का दूध दुहने बैठती उस वक्त दूधिया राज बैठा बैठा उसके मोहक रूप के दर्शन करता रहता था. बीच बीच में कोमल भी उसे देखती रहती. कभी कभार भोंह के इशारे से पूंछती, "क्यों क्या हुआ ऐसे क्यों देख रहे हो?" और उसके रंग में रंगा दूधिया राज भी सर हिलाकर इशारों में कहता, "कुछ भी तो नही."


दोनों इश्क कलंदरों को पता था कि वो एक दूसरे को क्यों देखते हैं? लेकिन फिर भी पूछते थे. कारण था कोई भी पहले इजहार करने की हिम्मत न कर पा रहा था. जब भी उन में से कोई दूसरे की तरफ देखता और जब दूसरा पूछता तो तो उसमे मिलने वाला आनंद इजहारे इश्क के विचार से ज्यादा अच्छा लगता था.


इसलिए लोगों ने कहा है की छुप छुप के इश्क करने का मजा ही कुछ और होता है और वही आनंद ये दोनों प्रेमी प्राप्त किये जा रहे थे. लेकिन इश्क सिर्फ चुप रहकर देखना भर तो नहीं है. उसका और भी तो रूप है. जिसको पाने के लिए ये लोग भी लालयित थे. कोमल और उसकी बहन दोनों जब कॉलेज जातीं तो राज रास्ते में उन दोनों का इन्तजार करता रहता था. जैसे ही ये दोनों उसे दिखाई देतीं वो उठकर दोनों के साथ चलने लगता फिर अपना गाँव आने तक इनके साथ चलता रहता था.


एक दो दिन का तो कुछ नही लेकिन जब रोज़ ऐसा होने लगा तो कोमल की बड़ी बहन देवी उससे बोल पड़ी, "क्यों री कोमल ये राज दूधिया रोज अपने साथ ही क्यों जाता है?

कोमल अनजान बनते हुए बोली, “मुझे क्या पता?"

देवी उसे कुरेदते हुए बोली, “तो ठीक है. आज इसकी शिकायत पापा से किये देती हूँ. एक दिन में लाइन पर आ जाएगा."

कोमल हडबडा कर बोली, “अरे नही नही शिकायत की क्या जरूरत है? उसने हम से कोई गलत हरकत तो की ही नही न. फिर पापा से कहने की क्या जरूरत है."

देवी तंज करते हुए बोली, “अच्छा मेरी भोली बहन, जब कोई हरकत करेगा तभी कहोगी उससे पहले नही. जब कुछ हरकत कर ही देगा तब कहने का क्या फायदा? आज में इसकी शिकायत करके ही रहूँगी."


कोमल के दिल में राज का वास था. उसे राज के खिलाफ कुछ भी बर्दाश्त नहीं होना स्वभाविक था. वह तुनक कर बोली, "ठीक है कह देना पर में तुमसे न बोलूंगी. भूल जाना कि तुम्हारी कोई बहन भी थी."


देवी हैरत भरे स्वर में बोली, "अरे अरे पागल हो गयी हो क्या? ये राज क्या तुम्हारा फूफा लगता है जो इसकी शिकायत न करने दोगी और ये हो क्या गया है तुम्हे? उस राज की इतनी तरफदारी क्यों कर रही हो?"


कोमल अपने कहे पर हडबडा उठी. उसने इश्क के नशे में जो बात देवी से कह दी थी उसका अंदाज़ा उसे बात कहने के बाद हुआ. फिर सम्हलते हुए बोली, "देखो देवी मेरी बहन में तो सिर्फ ये कह रही थी क्यों किसी बेचारे सीधे साधे लडके को परेशान किया जाय?"


देवी को कोमल पर अब शक हो रहा था. सोच रही थी हो न हो ये राज इसी की राज़ी से हमारे साथ आता जाता है. कोमल के राज को सीधा साधा कहने पर वह तुनककर बोली, “अच्छा अब ये सीधा साधा लड़का कब से हो गया? कहीं कोई और बात तो नहीं कोमल रानी? बता देना नही तो तुम्हारी खैर नही."


कोमल तो पहले ही राज नाम की चासनी में पकी जलेबी थी.
ऊपर से देवी की तीखी बाते उसे और ज्यादा कुरकुरी किये जा रही थी लेकिन कोमल कितनी ही मुंहलवार थी परन्तु अपनी बड़ी बहन के सामने अपने इश्क को कबूल करना उसके लिए बहुत मुश्किल था.
Congratulations 🎊 tumhari pahli story ke liye :goteam:
 
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गाँव में घुसते ही एक इमली का पेड़ पड़ता था. उस पेड़ के पास से गुजरने वालो को अक्सर एक लड़की उस इमली के पेड़ के नीचे खड़ी, बैठी. या काम करती दिखाई पड़ती थी. नाम था कोमल. कोमल दिखने में मोहल्ले की अन्य लड़कियों से खूबसूरत थी.

लम्बाई भी औसत थी. उम्र कोई अठारह के आस पास. भरा हुआ बदन. कजरारी आँखें. कजरारी इतनी कि कभी कभी लगता था कि काजल की पूरी डिबिया आँखों में लगा डाली है.
कोमल को सजने सवरने का बहुत शौक था. कभी कभी सजने में घंटों लगा देती थी. पीछे से उसकी बड़ी बहन देवी चिल्लाती, “क्या आज ही सब सिंगार कर डालोगी राजकुमारी जी."


कोमल कुछ न बोलती बस अपना सुंगार करने में लगी रहती थी. और सच कहा जाय तो कोमल के सजने सवरने का ही परिणाम था कि वह मोहल्ले की सबसे खूबसूरत लडकी थी. नाक लम्बी और पतली थी. जिसमे गोल नथुनी सोने पे सुहागा लगती थी. पतले गोरे कान जिनमे सोने के सादा कुंडल किसी भी सुन्दरी को लजाने के लिए काफी थे.


ऐसा नही कि कोमल बहुत ज्यादा सुन्दर थी लेकिन गाँव में अपनी उम्र की लड़कियों में बह अधिक सुंदर थी. सबसे हंसकर बातें करना तो जैसे उसकी खुराक थी. जब तक सारे मोहल्ले के घरों में जाकर उनके चौका चूल्हे का हाल न जान लेती उसे चैन न पड़ता था.


ये छोटा सा गाँव था भी बहुत प्यारा, मुश्किल से पच्चीस घर थे इस प्यारे से गाँव में कोमल का मोहल्ला तो सिर्फ चंद घरों से घिरा था. सारे घरों के लोग एकदूसरे से एक परिवार की तरह जुड़े हुए थे. फिर इस गाँव की लडकी कोमल ही पीछे क्यों रहती? वो भी मोहल्ले में अपनी प्यार मोहब्बत लुटाती फिरती थी.


कोमल पास के ही एक गाँव के इंटर कॉलेज में पढने जाती थी. उसकी बड़ी बहन देवी भी उसी के साथ उसी की क्लास में पढ़ती थी. दोनों बहन होने के साथ साथ सहेलियां भी थी. वो सहेलियां जो एक दूसरे से अपने मन की बात कह सुन लेती हैं. दोनों को एक दूसरे के गुण और कमियां मालुम थीं.


होली हो, दिवाली हो या कोई आम दिन. कोमल की मौज मस्ती मोहल्ले वालो के साथ रोज चालू रहती थी.अगर कोमल एक दिन के लिए भी कहीं चली जाती तो मोहल्ले को लगता कि उनके मोहल्ले से कुछ तो गायब है.


इसी मोहल्ले में एक शांत लडका छोटू भी रहता था. उम्र 18 साल के आस पास रही होगी. कोमल से उसका कोई लेना देना नही था लेकिन वो कोमल के प्रशंसकों में से एक था. वो कोमल के घर से मट्ठा ले कर आता था और कोमल उसके नल से पानी. छोटू के घर का नल मोहल्ले के लिए सरकारी नल की तरह था. कोमल भी इस बात का फायदा उठाती थी. छोटू और कोमल में जमकर बातें होती थी. पढाई से लेकर शादियों की दावतों तक.

कोमल अपनी इमली के पेड़ से छोटू के लिए इमली तोड़ कर दे दिया करती थी और बदले में उससे हरी मेहँदी के पत्ते तोड़कर लाने को कहती.


छोटू अपने स्कूल से आते वक्त कोमल के लिए मेहँदी के हरे पत्ते तोड़ कर ले आता था.
कोमल मुस्कुरा कर कहती, "तू ही है छोटू मोहल्ले में जो मेरा हर काम कर देता है." छोटू अपनी तारीफ सुन फूला न समाता फिर कोमल से पूछता, “कोमल क्या में इमली के पत्ते तोड़कर खा लूं?"

कोमल कहती, “हाँ हाँ क्यों नही? तेरे लिए कोई मना नही है.” इमली की तरह इमली के हरे पत्ते भी खट्टे होते हैं. जो खाने में बहुत खट्टे और अच्छे लगते हैं.


छोटू रोज़ स्कूल जाते वक्त कोमल से इमली के पत्ते लेकर जाता था और स्कूल में दोस्तों के साथ बैठकर खाता. यही सिलसिला सालों साल चलता रहा. कोमल इमली के पत्ते छोटू को देती और अपने लिए मेहँदी के पत्तो का बन्दोवस्त करवाती. लेकिन समय एक जैसा तो नही रहता और वही हुआ. इमली का मौसम खत्म हुआ. कोमल और छोटू का मिलना भी कम हो गया.


अब कभी कभार ही दोनों की मुलाक़ात होती थी. कोमल आज कल किसी अलग हवा में जी रही थी. जिसकी भनक किसी को नही थी लेकिन एक दिन वो भी आया जब कोमल अपने आप को किसी में खो बैठी और वो खोना ऐसा कि जिसके लिये वह अपनी जान हथेली पर लिए घूम रही थी.


___ गाँव में एक दूधिया आता था. वो कोमल के घर से भी दूध लेकर जाता था. कोमल उसके साथ बहुत मजाकें करती. कभी कभी उसके घर वाले उसे डांट भी देते लेकिन कोमल किसी के कहने से कब मानी थी जो आज मानती. दुधिया भी कोमल की ही उम्न का था. नाम था राज. उसका गाँव कोमल के स्कूल वाले रास्ते में ही पड़ता था.


धीरे धीरे दोनों एक दूसरे से घुलने मिलने लगे और फिर पता नही कब दोनों एक दूसरे को अपना दिल दे बैठे. ये बात खुद उन दोनों प्रेमियों को भी पता न चली. कोमल और राज ने अभी तक एक दूसरे से इश्क का इजहार भी न किया था.


बस बातें करते रहते. एक दूसरे को चिढाते, नये नये चुटकुले सुनाते. समय बीतता जा रहा था. इधर कोमल और राज का मौन इश्क अपने चरम पर था. उनके इश्क की आग उनके दिलों को जलाकर राख किये दे रही थी. मानो कह रही हो कि या तो इजहार करो नही तो तुम्हारे दिल के साथ साथ तुम्हे भी जलाकर राख कर दूंगी.


कोमल जब भैंस का दूध दुहने बैठती उस वक्त दूधिया राज बैठा बैठा उसके मोहक रूप के दर्शन करता रहता था. बीच बीच में कोमल भी उसे देखती रहती. कभी कभार भोंह के इशारे से पूंछती, "क्यों क्या हुआ ऐसे क्यों देख रहे हो?" और उसके रंग में रंगा दूधिया राज भी सर हिलाकर इशारों में कहता, "कुछ भी तो नही."


दोनों इश्क कलंदरों को पता था कि वो एक दूसरे को क्यों देखते हैं? लेकिन फिर भी पूछते थे. कारण था कोई भी पहले इजहार करने की हिम्मत न कर पा रहा था. जब भी उन में से कोई दूसरे की तरफ देखता और जब दूसरा पूछता तो तो उसमे मिलने वाला आनंद इजहारे इश्क के विचार से ज्यादा अच्छा लगता था.


इसलिए लोगों ने कहा है की छुप छुप के इश्क करने का मजा ही कुछ और होता है और वही आनंद ये दोनों प्रेमी प्राप्त किये जा रहे थे. लेकिन इश्क सिर्फ चुप रहकर देखना भर तो नहीं है. उसका और भी तो रूप है. जिसको पाने के लिए ये लोग भी लालयित थे. कोमल और उसकी बहन दोनों जब कॉलेज जातीं तो राज रास्ते में उन दोनों का इन्तजार करता रहता था. जैसे ही ये दोनों उसे दिखाई देतीं वो उठकर दोनों के साथ चलने लगता फिर अपना गाँव आने तक इनके साथ चलता रहता था.


एक दो दिन का तो कुछ नही लेकिन जब रोज़ ऐसा होने लगा तो कोमल की बड़ी बहन देवी उससे बोल पड़ी, "क्यों री कोमल ये राज दूधिया रोज अपने साथ ही क्यों जाता है?

कोमल अनजान बनते हुए बोली, “मुझे क्या पता?"

देवी उसे कुरेदते हुए बोली, “तो ठीक है. आज इसकी शिकायत पापा से किये देती हूँ. एक दिन में लाइन पर आ जाएगा."

कोमल हडबडा कर बोली, “अरे नही नही शिकायत की क्या जरूरत है? उसने हम से कोई गलत हरकत तो की ही नही न. फिर पापा से कहने की क्या जरूरत है."

देवी तंज करते हुए बोली, “अच्छा मेरी भोली बहन, जब कोई हरकत करेगा तभी कहोगी उससे पहले नही. जब कुछ हरकत कर ही देगा तब कहने का क्या फायदा? आज में इसकी शिकायत करके ही रहूँगी."


कोमल के दिल में राज का वास था. उसे राज के खिलाफ कुछ भी बर्दाश्त नहीं होना स्वभाविक था. वह तुनक कर बोली, "ठीक है कह देना पर में तुमसे न बोलूंगी. भूल जाना कि तुम्हारी कोई बहन भी थी."


देवी हैरत भरे स्वर में बोली, "अरे अरे पागल हो गयी हो क्या? ये राज क्या तुम्हारा फूफा लगता है जो इसकी शिकायत न करने दोगी और ये हो क्या गया है तुम्हे? उस राज की इतनी तरफदारी क्यों कर रही हो?"


कोमल अपने कहे पर हडबडा उठी. उसने इश्क के नशे में जो बात देवी से कह दी थी उसका अंदाज़ा उसे बात कहने के बाद हुआ. फिर सम्हलते हुए बोली, "देखो देवी मेरी बहन में तो सिर्फ ये कह रही थी क्यों किसी बेचारे सीधे साधे लडके को परेशान किया जाय?"


देवी को कोमल पर अब शक हो रहा था. सोच रही थी हो न हो ये राज इसी की राज़ी से हमारे साथ आता जाता है. कोमल के राज को सीधा साधा कहने पर वह तुनककर बोली, “अच्छा अब ये सीधा साधा लड़का कब से हो गया? कहीं कोई और बात तो नहीं कोमल रानी? बता देना नही तो तुम्हारी खैर नही."


कोमल तो पहले ही राज नाम की चासनी में पकी जलेबी थी.
ऊपर से देवी की तीखी बाते उसे और ज्यादा कुरकुरी किये जा रही थी लेकिन कोमल कितनी ही मुंहलवार थी परन्तु अपनी बड़ी बहन के सामने अपने इश्क को कबूल करना उसके लिए बहुत मुश्किल था.
Good update 👍 👌🏻
 
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ये वो इश्क था जो अभी उसने अपने मुंह से अपने चाहने वाले को बोला भी नहीं था और न ही उसके आशिक ने उससे बोला था. फिर अपनी बहन को क्या बताये?
लेकिन बहन को उसके सवाल का जबाब देना भी तो जरूरी था. क्योंकि चुप रहने का मतलब अक्सर हाँ माना जाता है. यह सोच कोमल अपनी बहन देवी से बोली, "अरे कैसी बातें करती हो देवी बहन? कोई बात होती तो तुम्हे न बताती? आजतक तुमसे कोई बात छिपाई है भला मैने?"


देवी को शक तो था लेकिन अपनी बहन कोमल पर भरोसा भी था. उसका दिमाग उलझन में तो था लेकिन कोमल से राज ने कुछ कहा भी तो न था. कैसे कहती कि तुम दोनों के बीच में कुछ चक्कर चल रहा है?


सब कुछ ऐसा ही चलता रहा. राज रोज उन्हें मिलता और बातें करता हुआ उनके साथ अपने गाँव की शुरुआत तक जाता. अब देवी भी राज से बाते करती थी. कोमल को ये बात अच्छी लगी. सोचती थी चलो देवी अब राज की शिकायत पापा से न करेगी.


लेकिन कोमल और राज का मौन इश्क अपनी चरम सीमा को पार करता जा रहा था. कभी कभी तो राज के मन में आता कि वो कोमल से देवी के सामने ही अपने इश्क का इजहार कर डाले. किन्तु उसे डर भी लगता था कि कहीं उसका उतावलापन कोमल और उसके मिलन में बाधा न बन जाए?


इधर यही हाल कोमल का भी था. उसके भी मन में आता था कि देवी को सब कुछ बता डाले कि वो राज पर अपना दिल हार बैठी है लेकिन उसे भी डर था कि देवी कहीं पापा से जाकर न बोल दे? दैय्या रे दैय्या फिर तो मुसीबत हो जाएगी,
Nice update 👌🏻👌🏻
 
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