• If you are trying to reset your account password then don't forget to check spam folder in your mailbox. Also Mark it as "not spam" or you won't be able to click on the link.

Thriller शतरंज की चाल

parkas

Well-Known Member
33,032
70,591
303
# अपडेट ५

अब तक आपने पढ़ा -

और फिर दूसरा मैच शुरू हुआ और पहले 5 पॉइंट मैने आसानी से बनाए। फिर मेरी नजर समर के पीछे टेनिस कोर्ट पर पड़ी और....

अब आगे -

समर के पीछे टेनिस कोर्ट पर मुझे वही दिखाई दी, एक स्पोर्ट्स t shirt और half pant में टेनिस खेलती हुई नेहा वर्मा। मेरा ध्यान फिर एक बार भटक चुका था, बार बार मेरी नजरें उधर ही पहुंच जाती और ये मैच मैं 21-5 से बुरी तरह हार गया।

"क्यों जीएम साहब, क्या हो गया आपको?"

"कुछ नहीं।" ये बोल कर मैने एक बार फिर से अपना ध्यान अपने मैच पर लगाया और इस बार मैच 21-19 से मैने जीता।

"वाकई भाई डबल्स आपने ही जिताया था।" ये बोल कर समर ने मेरा कंधा थपथपाया। मैने मुस्कुराते हुए टेनिस कोर्ट में देखा। वो नहीं दिखी, शायद चली है थी।

फिर हम लोग बार में आ गए और समर ने दोनों के लिए ड्रिंक ऑर्डर कर दिया। हम पीते हुए बात कर रहे थे कि फिर से मेरी नजर नेहा पर पड़ी, अब वो ट्रैक सूट में थी, शायद कपड़े चेंज करने गई होगी। साथ में कोई और लड़की भी थी, जिसे मैं नहीं जानता था। वो दोनों दूसरी ओर बैठ गई, नेहा की पीठ मेरी ओर थी, और वो शायद मुझे नहीं देख पाई थी।

थोड़ी देर बाद समर ने कहा कि वो जा रहा है, मेरी ड्रिंक अभी बची थी तो मैने बोला कि बस इसे खत्म करके मैं भी निकलूंगा।

उसके जाने के कुछ समय बाद ही मुझे एक आवाज आई, "excuse me सर, what a pleasent surprice, आप यहां पर?"

ये नेहा थी। मैं उसे देख कर थोड़ा आश्चर्य में आ गया क्योंकि समर के जाने से पहले ही उन दोनो ने अपना टेबल छोड़ दिया था, और अभी नेहा अकेली ही थी। उसके पास एक बैग था जो उस समय नहीं था जब वो यहां बैठी थी।

"अरे नेहा जी, कैसी हो आप, और यहां?"

"वो सर actually मुझे टेनिस और गोल्फ का बहुत शौक है, और यहां 15 दिन पहले जब ज्वाइनिंग के लिए आई थी तो HR में किसी ने मुझे इस क्लब के बारे में बताया, अभी लास्ट विक ही ज्वाइन किया, पर आपको पहली बार देखा यहां?"

"मैं समय मिलने पर ही आता हूं यहां, आज ऑफिस से जल्दी छुट्टी मिली कई महीनों बाद तो चल आया यहां। वैसे शायद आप अभी किसी के साथ थी न?"

"अरे वो अर्चना थी, मेरी टेनिस पार्टनर, यहीं क्लब में ही मुलाकात हुई थी उससे। मैं भी वापस जा रही थी, अपना बैग ले कर लाकर रूम में जब आ रही थी तब आप पर नजर पड़ी। तो मिलने चली आई।"

"ओह अच्छा किया। वैसे आप कहां रहती हैं?"

"अशोक नगर में एक फ्लैट दिलवाया है ऑफिस से ही।"

"अच्छी जगह है वो तो, वैसे आप वापस कैसे जाएंगी?"

"कोई ऑटो देखती हूं सर।"

"अरे मैं छोड़ देता हूं, आपका फ्लैट मेरे घर के रास्ते में ही पड़ता है।"

नेहा कुछ सोच कर, "ok... चलिए चलते हैं फिर।"

मेरी ड्रिंक भी लगभग खत्म ही थी, हम दोनो पार्किंग एरिया में आ गए। अपनी कार के पास हम पहुंचे ही थे कि तभी

"अरे जीएम साहब, आज लगता है आपकी सेवाएं लेनी पड़ेंगी।"

समर मेरी ओर आते हुए बोला, और नेहा को देख कर कुछ आश्चर्य में आ गया।

"क्या हुआ भाई आपकी सरकारी गाड़ी को, जो मेरी सेवाएं लेने की जरूरत पड़ गई?" मैने पूछा।

"यार स्टार्ट नहीं हो रही, पता नहीं क्यों?" उसने नेहा की ओर देखते हुए कहा, "वैसे अगर प्रॉब्लम हो तो मैं मैनेज कर लेता हूं।"

"नहीं भाई क्या प्रॉब्लम होगी। वैसे इनसे मिलो, नेहा वर्मा, मेरे कंपनी में अभी एक हफ्ते पहले ही ज्वाइन किया है, क्लब में मिल गई और घर भी इनका मेरे रास्ते में ही है तो सोचा इनको भी ड्रॉप कर दूं। आजा तुझे भी ड्रॉप कर देता हूं।"

ये बोल कर मैने कार का लॉक खोला, और समर मेरे साथ आगे आ कर बैठ गया, नेहा पीछे बैठ गई।

"चलो भाई जल्दी से घर छोड़ दो, मैं किसी को भेज कर गाड़ी भी दिखवा लेता हूं।"

वो पीछे मुड़ कर, "हेलो नेहा जी, मैं समर सिंह, मनीष का दोस्त। वैसे पहले मुझे लगा कि शायद मैं गलत समय पर आ गया लिफ्ट मांगने।" ये बोल कर वो हंसने लगा।

"अरे नहीं भाई, बस साथ में काम करती हैं ये, अभी तुम्हारे जाने के बाद ही मिला इनसे, इनका घर में मेरे रास्ते में ही है तो सोचा ड्रॉप कर दूं।"

"मतलब आज जीएम साहब टैक्सी ड्राइवर बने हैं।"

ये सुन कर हम सब हंस दिए।

ऐसे ही बातें करते करते हम समर के घर के पास पहुंच गए, उसने गाड़ी अपनी सोसाइटी के बाहर ही रुकवा दी।

"नेहा जी आगे आ जाइए, वरना ये सचमुच में ड्राइवर लगेगा।"

ये बोल कर वो अपनी बिल्डिंग में चला गया। और नेहा आगे आ कर बैठ गई।

"तो सर, क्लब में आप क्या खेलते हैं?"

"स्विमिंग और बैडमिंटन, वैसे नेहा जी पहले तो हम दोनों हमउम्र हैं, तो ऑफिस के बाहर कम से कम मुझे सर मत बोलो।"

"फिर क्या बोलूं?" उसने मुझसे ही उल्टा सवाल

"जो एक दोस्त दूसरे को बोलता है। हम ऑफिस के बाहर दोस्त तो हो सकते हैं न नेहा जी?"

"बिलकुल मनीष जी।" ये बोल कर वो मुस्कुरा दी।


क्या दिलकश मुस्कान थी उसकी..

"अच्छा वैसे आप गोल्फ खेलते हैं क्या?" उसने मुझसे पूछा

"नहीं।"

"आप खेलिए, आपकी हाइट पर वो बहुत सूट करेगा आपको।"

"पर मुझे आता नहीं खेलना।"

"मैं सीखा दूंगी, बदले में आप मुझे स्विमिंग सीखा दीजिए।"

मैं उसके साथ रहना चाहते था, भला ऐसा मौका जो खुद उसने दिया कैसे हाथ से जाने देता। मैने भी हां कर दी।

ऐसे ही बातों बातों में उसका घर आ गया।

"तो कल सुबह साढ़े छः बजे गोल्फ क्लब में मैं आपका इंतजार करूंगी, आइएगा जरूर।"

ये बोल कर वो अपने घर चली गई। मैं भी अपने फ्लैट पर आ गया, आज का दिन बड़ा ही खुशगवार गया था।

सुबह नेहा से दुबारा मिलने की खुशी में मैं बहुत ही जल्दी तैयार हो कर 6 बजे ही क्लब पहुंच गया, फिर मुझे अपनी बेवकूफी का ध्यान आया और मैं क्लब से आगे गाड़ी लगा कर थोड़ा इंतजार किया और फिर समय पर वहां पहुंच गया, गाड़ी पार्क करते करते नेहा भी ऑटो से उतरती दिखी, आज भी उसने एक ट्रैक सूट पहना था ऊपर तो जैकेट थी, लेकिन स्किन फिट लेगिन में उसकी सुडौल जांघें प्रदर्शित हो रही थी। उसके हाथ में एक बैग था।

हम दोनो पीछे बने गोल्फ कोर्स में पहुंच गए, और वो मुझसे कह कर गोल्फ कोर्स की बिल्डिंग में चली गई, मैं पहले ही एक रनिंग पैजामा और पोलो टीशर्ट में था। कुछ देर बाद वो बाहर आई, उसके हाथ में एक केडी बैग था जिसमें कई तरह के गोल्फ क्लब थे। और इस समय वो वही लेगिन और ऊपर एक जिम टीशर्ट में थी, जो उसके शरीर की बनावट को पूरी तरह से दिखा रहे थे। उसे देख कर मेरा मुंह कुछ देर खुला ही रह गया। लेकिन उसके पास आने के पहले ही मैने अपने को सम्हाल लिया।

हम कोर्स के अंदर पहुंचे जहां पहले उसने मुझे अलग अलग तरह के क्लब्स (गोल्फ खेलने वाली छड़ी) के बारे में समझाया। उसे समझने से ज्यादा ध्यान मेरा नेहा पर था। फिर उसके बाद शॉट मारने के लिए क्या पोजीशन लेनी है वो भी बताया। मैने पोज ले कर शॉट लेने गया तो कई बार मेरे पास आ कर वो मेरे पोस्चर को सही कर रही थी, जिसके कारण वो मेरे शरीर के कई हिस्सों को छूती थी, और मेरे मन में सितार बज उठते थे।

कोई २ घंटे के बाद मैं कुछ सही शॉट्स लगने लगा। नेहा मेरी प्रोग्रेस से काफी खुश थी।

"वाह मनीष जी! आपने तो पहले दिन के हिसाब से अच्छा सीख लिया।"

"थैंक्यू नेहा जी, सब आपके सीखने का कमाल है।"मैने कहा, "वैसे एक बात बोलूं? जब हम ऑफिस के बाहर दोस्त बन गए हैं तो ये जी वाली फॉर्मेलिटी क्यों?"

"हां ये बात तो है, लेकिन आप भी तो मुझे जी बोलते हैं।"

"ओह अच्छा आज से सिर्फ नेहा, और मैं मनीष।"

"लेकिन ऑफिस में मनीष सीनियर और नेहा जूनियर।"

"हां ये भी ठीक है।"

इसके बाद हम लोग वापस लौट गए, मैने ही उसे उसके घर ड्रॉप किया और अपने घर आ कर ऑफिस के लिए तैयार हो कर ऑफिस चला गया। वैसे तो सर ने मुझे आज की छुट्टी दे रखी थी, लेकिन कुछ करने को था नहीं इसीलिए ऑफिस आ गया।

आज का दिन भी ऐसा ही बीता, लेकिन शाम में सर ने एक मीटिंग के लिए बुला लिया और उसके कारण आज शाम में क्लब नहीं जा पाया। लेकिन सुबह समय से उठ कर आज मैं सीधा नेहा के घर चला गया, बाहर से उसे कॉल किया और दोनो लोग गोल्फ कोर्स पहुंच गए।

कल के जैसा आज भी हमने २ घंटे तक प्रैक्टिस की। उसके बाद हम वापस आने लगे। नेहा ने कहा, "मुझे स्विमिंग कब सिखा रहे हैं?"

"क्लब में तो कोच है, उससे क्यों नहीं सीख रही तुम?"

"कुछ बेसिक उसने सिखा दी है, लेकिन जब आपके जैसा US का यूनिवर्सिटी चैंपियन है तो किसी और से क्यों सीखूं?"

"अच्छा! वैसे कितना सीखा है क्लब में?" मैने मुस्कुराते हुए पूछा?

"बिना सपोर्ट के पुल में तैर लेती हूं अब तो।"

"एक हफ्ते के हिसाब से अच्छी प्रोग्रेस है। अच्छा आज संडे है, कोई खास प्रोग्राम तो नहीं है तुम्हारा?"

"नहीं तो, वैसे भी अभी किसी को जानती भी नहीं यहां कि कोई ऐसा प्रोग्राम बनेगा।"

"तो चलो फिर आज से ही तुम्हारी क्लास शुरू करते हैं।"

ये बोल कर मैने कार को शहर से बाहर की ओर एक बीच की तरफ ले गया। ये एक अच्छा बीच था, जहां बहुत ही कम लोग आते थे, लेकिन यहां समुद्र का नजारा शानदार था, और स्विमिंग के लिए बहुत ही मुफीद जगह थी ये। ये एक पत्थरों की दिवाल के पास बना हुआ बीच था। सड़क से नीचे की ओर पत्थरों से होते हुए इस तक पहुंचा जा सकता था।

मैने कार को ऊपर सड़क के पास लगाया और उसका और अपना बैग लेकर नेहा के साथ नीचे उतरा, जैसा सोचा था, वहां अभी 4 6 लोग ही थे, हम दोनो उन लोगों से थोड़ी दूर पर जा कर अपना बैग रख दिया।

"स्विमिंग के लिए कॉस्ट्यूम तो लाई हो न?"

"हां, अभी चेंज करती हूं।" ये बोल कर वो अपने बैग से एक टॉवेल और कुछ कपड़े निकल कर एक बड़े पत्थर के पीछे चली गई। मैं भी टॉवेल ले कर एक पत्थर के पीछे जा कर अपना स्विमिंग अंडरवियर और एक वेस्ट पहन ली।

जब मैं बाहर आया तब तक नही भी आ चुकी थी। उसने जो पहना था उसे स्विमिंग कॉस्ट्यूम कहना सही नहीं होगा। उसने एक हॉट पैंट जैसा कुछ पहना था जो उसके टखने से थोड़ा ऊपर तक था, और एक स्पोर्ट्स ब्रा जो आधे पेट को ढके हुए थी। हम दोनो समुद्र में उतर गए।

"तुमने क्या सीखा वो बताओ।"

वो थोड़ा सा ब्रेस्ट स्ट्रोक पोजीशन में तैरने की कोशिश करने लगी। मैने उसके पेट पर थोड़ा सपोर्ट दे कर उसकी मदद की। डिसबैलेंस होने पर वो मुझे कस कर पकड़ लेती, कई बार हमारा पूरा शरीर एक दूसरे के संपर्क में आया। ये कुछ क्षणों का आलिंगन, छुवन मुझे एक अलग ही अहसास दिल रही थी। मेरे होशो हवास कई बार उड़ जा रहे थे। हम लोग करीब एक घंटे तक हम वहां रहे, उसके बाद थोड़ी भीड़ सी भी होने लगी, और नेहा भी थक सी गई थी, तो हम वापस आ गए। पहले मैने अपने कपड़े बदले और फिर उसको बोल कर मैं ऊपर कार को मोड़ने लगा। जब तक मैने कार को मोड़ा, तब तक नेहा भी ऊपर आ चुकी थी।

सुनहरी धूप में उसके गीले खुले बाल, और उससे चेहरे पर पड़ी हुई नमकीन पानी की बूंदों ने एक ऐसी कशिश को जगाया कि मेरी नजरें ही नहीं हट पा रही थी उसके ऊपर से। वो कब आ कर कार में बैठ गई, मुझे पता ही नहीं चला।

"ओ हेलो!!" चुटकी बजते हुए उसने मेरी तंद्रा तोड़ी।

"कहां खो गए जनाब? चलें अब बहुत भूख लग गई है।"

"ओह हां, सॉरी! ऑफिस के एक काम की याद आ गई, वही सोचने लगा था।" मैने बहाना मारते हुए कहा।

फिर हम एक रेस्टुरेंट में चले गए, वहां दोनों ने नाश्ता किया और फिर मैं उसे ड्रॉप करके अपने घर आ गया। आज बहुत थकान हो गई थी तो दिन भर तो सोते हुए ही बीता। शाम को मैं एक बार फिर क्लब चला गया। लेकिन आज वो नहीं आई थी।

अगले दिन से फिर वही रूटीन चालू हो गया। अब चूंकि अगले हफ्ते सबको निकलना था तो सब अपनी तैयारी में जुट गए। सारे टीम वाले कोई न कोई सवाल ले कर मेरे पास आते और मैं उनको उसके बारे में समझने लगता था। शनिवार को फिर से मेरी गोल्फ की ट्रेनिंग और नेहा की स्विमिंग की ट्रेनिंग हुई। शनिवार को मैं अपने केबिन में बैठा टूर की आखिरी तैयारियों में व्यस्त था, अभी टिकट्स और रिजर्वेशन की डिटेल नहीं आई थी। मैने करण से इंटरकॉम पर उसके बारे पूछा तो उसने बताया कि शाम तक सारी चीजें मिल जाएंगी। तभी मेरा केबिन का दरवाजा बजा और मैने "कम इन" बोल कर एक फाइल देखने लगा उधर से एक लड़की की हेलो की आवाज आई और मैने बेध्यानी में उसे नेहा समझ कर, "हां नेहा बोलो।"

"अरे पहले देख तो लो कौन बोल रहा है, या नेहा के सपने अभी से आने लगे जनाब?" ये शिविका थी। मैंने थोड़ा एम्बरेस हो कहा, "सॉरी शिविका, असल में मैं उसका ही का वेट कर रहा था।"

"अरे मैं तो मजाक कर रही थी यार, तुम्हारे ही डिपार्टमेंट में है, कोई बात नहीं।"

"वैसे कुछ काम था क्या?"

"वो कुछ इश्यू है प्रेजेंटेशन का, उसी के लिए मिलना था।"

"लाई, अभी तो फ्री ही हूं।"

उसने अपना इश्यू बताया और मैं उसे कुछ देर समझाया। वो क्लियर होने के बाद हम ऐसे ही बातें करने लगे।

"तो जनाब को अब मंडे से तो मजे हैं आपके?" वो फिर से मजाक के मूड में थी, और मेरी टांग खींच रही थी।

"काम करने जा रहे हैं हम शिविका।"

"अरे काम करो न, किसने मना किया है? वैसे ठंड का मौसम और sexy and hot लड़की साथ में!! है न डेडली कॉम्बिनेशन?"

"तुम जाओ यार, जब देखो टांग खींचती हो।" मैने थोड़ी नाराजगी दिखाते हुए कहा।

और वो खिलखिलाती हुई चली गई।

शाम को करण ने एक एनवेलप मुझे दिया, "इसमें सारे टिकट्स और होटल बुकिंग के डिटेल हैं। सुबह 7:30 की फ्लाइट है आपकी लखनऊ की। नेहा को कंपनी की कार पिकअप कर लेगी, आप टाइम से पहुंच जाइएगा।" ये बोल कर वो चला गया।

करण मध्य प्रदेश से था, बहुत ही मेहनती और तेज दिमाग का। वो यहां कोई 5 साल से काम कर रहा था, और 2 साल पहले ही बैंकिंग डिवीजन में आया, पहले वो रियल एस्टेट देखता था।


एनवेलप बैग में रख कर मैं घर चला गया। सुबह ड्राइवर आ गया था, और 6:30 पर मैं एयरपोर्ट के लिए निकल गया, नेहा को भी कॉल करके कंफर्म कर लिया की वो भी निकल गई है या नहीं।

रास्ते में मैने एनवेलप खोल कर टिकट्स निकलीं। उसमें सबसे ऊपर लखनऊ की ही टिकट थी। बुकिंग में नाम दिखा रहा था

Mr. Manish Mittal, age 27, male
Mrs. Neha Verma, age 29, female

ये देख कर मुझे लगा कि कोई गड़बड़ है क्या? फिर मैने सारी टिकट और बुकिंग चेक की, सबमें Mrs. Neha Verma ही था।

मैने करण को कॉल किया, "जी सर, कोई दिक्कत है क्या?"

"ये नेहा का नाम गलत प्रिंट हुआ है शायद? सब जगह Mrs. नेहा वर्मा है।"


"जी सही तो है सर वो।"...
Bahut hi badhiya update diya hai Riky007 bhai....
Nice and beautiful update....
 

Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
22,647
45,594
259

Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
22,647
45,594
259
Awesome update
Neha जितनीतेजी से मनीष के साथ घनिष्ठता बढ़ा गई उससे लगने लगा है शतरंज की चाल शुरू हो गई है
लग तो रहा है कुछ ऐसा ही, लेकिन मोहरा कौन है? क्या नेहा या मनीष, या दोनों या फिर कोई और??
 

Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
22,647
45,594
259

Rekha rani

Well-Known Member
2,551
10,854
159
लग तो रहा है कुछ ऐसा ही, लेकिन मोहरा कौन है? क्या नेहा या मनीष, या दोनों या फिर कोई और??
मोहरा तो नेहा लग रही है जो मनीष जैसे वजीर को फसाने के लिए सामने लाई गई हो
 

Riky007

उड़ते पंछी का ठिकाना, मेरा न कोई जहां...
22,647
45,594
259
मोहरा तो नेहा लग रही है जो मनीष जैसे वजीर को फसाने के लिए सामने लाई गई हो
पर प्रेम जाल में फंसा कर क्या ही करवा लेंगे?
 

Ufaq saba

Bye
1,110
2,355
144
#अपडेट १

किस्मत भी अजब अजब खेल खेलती है, किसी को रंक से राजा बना देती है तो किसी को राजा से रंक, किसी को सब कुछ मिल कर भी कुछ नही मिलता तो किसी को कुछ न मिल कर भी सब हासिल हो जाता है। कभी उतार कभी चढ़ाव, कभी खाली हाथ तो खजाने के ऊपर ही बैठा देती है। कभी प्यार तकरार, तो कभी प्यार के नाम पर सिर्फ छलावा।

खैर, अभी तो जिंदगी ने मुझे वो सब सूद समेत ही वापस दिया है जो शायद कभी मेरा रहा हो।

मैं मनीष, या मोनू, आज देश की जानी मानी कंपनी के एजीएम में बैठा हूं, और इस कंपनी, LN Group of Companies के मालिक श्री रजत मित्तल को एनाउंसर ने डायस पर बुलाया है, कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट और कुछ जरूरी उद्घोषणा के लिए।

एनाउंसर, "अब मैं अपने चेयरमैन, श्री रजत मित्तल जी को इस डायस पर बुलाना चाहूंगी, ताकि वो इस वर्ष की आर्थिक रिपोर्ट आपके सामने रखे, तालियों से स्वागत करिए, श्री रजत मित्तल जी का।"

पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है और रजत मित्तल डायस पर आ कर कंपनी के आर्थिक रिपोर्ट को सामने रखने लगते हैं, "इस वर्ष कंपनी ने 4567 करोड़ का टर्नओवर किया है, और पिछले साल के प्रॉफिट को 15% से बढ़ते हुए हमने इस बार शुद्ध 112 करोड़ का मुनाफा कमाया है, जिसे हम अपने कर्मचारियों और शेयरहोल्डर्स में पिछले साल की ही तरह बांटेगे, लेकिन इस बार सबको 15% की अतिरिक्त कमाई भी होगी।"

हॉल फिर से एक बार तालियों से गूंज उठता है। मैं जो अभी शायद इन आंकड़ों की बाजीगरी को नही समझता था, इसीलिए बस मुस्कुराते हुए अपने सामने मौजूद रजत जी को ही देखे जा रहा था।

एक बार फिर से उनकी आवाज आती है, "ये थी हमारी कंपनी की वार्षिक आर्थिक रिपोर्ट, और अब एक जरूरी उद्घोषणा भी करना चाहता हूं। मुझे आप सबको ये बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि श्री मनीष मित्तल, मेरे पुत्र, अब से इस कंपनी के नए vice president होंगे, और साथ ही साथ, ग्रुप के नए खुले बैंकिंग डिवीजन को हेड भी वही करेंगे।" ये बोलते हुए उन्होंने मेरी ओर इशारा किया, और मैं भी मुस्कुराते हुए उठ कर सबका अभिवादन करने लगा। लोग मेरे पास आ कर बधाइयां देने लगे और हाथ मिलाने लगे। ये सब मेरे लिए एकदम नया और अनोखा था। मैं सबका अभिवादन स्वीकार ही कर रहा था, तभी मेरे कंधे पर एक हाथ आया, "बेटा नई जिम्मेदारी अच्छे से निभाना, चलो खाना खाते हैं।"

मैने पीछे मुड़ कर, रजत मित्तल को गले से लगाया और उनको थैंक्यू बोला, फिर हम सबने मिल कर खाना खाया।

खाने के बाद हाल से बाहर निकलते समय में रजत मित्तल के पीछे पीछे ही चल रहा था, सामने पोर्च में उनकी मर्सिडीज खड़ी थी, उनके पहुंचते ही ड्राइवर ने पीछे का गेट खोला, और रजत जी ने पीछे मुड़ कर मुझे कहा, "बेटे क्या आज घर चलोगे साथ में, या आराम करोगे?"

मैं,"सर, आज आप जाएं, वैसे भी कई दिन के बाद आज आराम करने का मौका मिला है, मैं फिर किसी दिन चलता हूं आपके साथ।"

ये सुन कर उन्होंने फिर से मुझे गले लगाया, और अपनी कार में बैठ कर चले गए। और उसके ठीक पीछे मेरी कार आई, और उसमे बैठ कर मैं भी घर चला गया।

अब आप सोच रहे होंगे कि कैसा नालायक बेटा हूं मैं जो अपने पिता को सर बोल रहा हूं और उनके साथ घर क्यों नही गया?

तो आपको बता दूं रजत जी मेरे पिता नही हैं....

First of all :congrats: nayi story ke liye .
Acha laga pahla update
 

manu@84

Well-Known Member
9,007
12,479
174
#अपडेट ३

अब तक आपने पढ़ा -

वहीं उन्होंने मेरा नाम मोनू से मनीष मित्तल करवा दिया, और सरकारी दस्तावेज में मेरे पिता भी वही बन गए। मैने भी उनके इस अहसान को माना और अपने आपको पूरी तरह से पढ़ाई में झोंक दिया।

तभी एक झटका लगने से मैं अतीत से बाहर आ गया। मेरी गाड़ी मेरे अपार्टमेंट में आ चुकी थी....

अब आगे -

मैं गाड़ी से निकल कर, ऊपर अपने फ्लैट में चला गया। वहां अपनी आदत अनुसार पहले मैंने शावर लिया और बाहर आ कर किचन में चाय बना कर टीवी चला दिया।

थोड़ी देर न्यूज सुनने के बाद मैंने अपना फोन उठा कर खाने का ऑर्डर कर दिया और बाहर आ कर बालकनी में बैठ कर शहर के नजारे को देखने लगा। मन धीरे धीरे फिर से यादों में खो गया।

पुणे के स्कूल में दसवीं में ही मैंने राज्य में टॉप 5 में अपना नाम दर्ज करवा लिया था। मित्तल साहब, जिन्हे अब मैं सर बोलने लगा था, मेरी इस उपलब्धि से बहुत खुश थे। आगे मैने उनके ही कहने पर मैथ और फिजिक्स से 12वीं की, और उसी साल मेहनत से, और सर के भरोसे मैं इंजीनियरिंग करने यूएस चला गया। अगले 5 साल भी मैने अपने को पढ़ाई में पूरी तरह से झोंक दिया, मेरे दिमाग में बस मित्तल सर की हर कसौटी पर खरा उतरने का जुनून था। इन सारे दिनों में मेरा पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई में था, कोई दोस्त नही बनाया मैने अपनी जिंदगी में, ना लड़का न लड़की, हां खेल में थोड़ा अच्छा था, खास कर बैडमिंटन और स्विमिंग में, तो लोगों से जान पहचान बनी रहती थी।

इंजीनियरिंग में मैने मित्तल सर के कहने पर आईटी ली हुई थी। वहां जाने के बाद भी हर महीने एक तयशुदा रकम मेरे खाते में हर महीने बराबर आती रही। लेकिन यहां मुझे स्कॉलरशिप मिलने लगी थी, इसी कारण मैने उस रकम को ज्यादातर छुआ ही नही।

पढ़ाई खत्म करने के बाद में वापस भारत आ गया। अब LN group का हेडक्वार्टर भारत के पश्चिमी तट पर स्थित वापी में जा चुका था, और दिल्ली वाले ऑफिस को नॉर्थ डिवीजन का डिविजनल ऑफिस बना दिया गया था। सर भी अपनी पूरी फैमिली के साथ वहीं शिफ्ट हो गए थे। मैं भारत में सीधे दिल्ली उतरा और कुछ समय वहां बिता कर मित्तल साहब से मिलने वापी पहुंच गया।

वहां पहुंचते ही मित्तल साहब ने मुझे इस फ्लैट में शिफ्ट करवा दिया। और मुझसे मिलने आए।

"तो बेटे, अब तो पढ़ाई खत्म। आगे क्या इरादा है तुम्हारा?"

"सर, अब बस आपके साथ रह कर आपके साथ ही आगे बढ़ना है, आपके ही सपनों को पूरा करना है।"

"बहुत अच्छा, चलो फिर कल से ऑफिस ज्वॉइन करना फिर।"

मित्तल सर कम बोलने वाले व्यक्ति थे, ज्यादातर वो काम की ही बातें करते थे। औसत कद के सांवले रंग के शरीर से चुस्त व्यक्ति थे वो, नजर पर चढ़ा चश्मा उनको एक अच्छे बिजनेसमैन जैसा ही दिखाता था।

मैने पूछा, " सर, एक बात पूछना चाहता हूं।"

"पूछो।"

"आपका कोई ऐसा सपना जो अभी न पूरा हुआ हो, में उसे पूरा करना चाहता हूं।"

मित्तल साहब मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखने लगे।

"मेरा एक सपना है की मैं एक ऐसी बैंक बनाऊं जो पूरी दुनिया में यूनिक हो!"

"मगर आप तो पहले से बैंकिंग में हैं न?"

"हां, लेकिन वो एक रेगुलर बैंक है, मुझे कुछ ऐसा चाहिए जिसे देख लोग सालों तक याद करें कि ये रजत मित्तल की देन है।"

फिर कुछ देर हम दोनो इस मुद्दे पर बात करते रहे, और कुछ बातें मुझे समझ आई।मैने उनके इस सपने पर कई दिन तक विचार किया और फिर मुझे कुछ समझ आने लगा, मैं कुछ दिनों तक उसकी रूप रेखा पर काम किया और एक ब्लूप्रिंट जैसा बना कर मित्तल सर को दिखाया।

ब्लूप्रिंट देखते ही उनके चेहरे पर एक खुशी की लहर दौड़ गई और उन्होंने मुझे तुरंत अपने गले से लगा लिया।

"मनीष, कुछ ऐसे ही बैंक का सपना मैने देखा था।"

"उम्मीद है ये आपको पसंद आया।"

"बिलकुल, और मैं ये भी चाहता हूं कि इस पर तुम काम भी शुरू कर दो।"

फिर उन्होंने मुझे जो भी चाहिए था, उसका इंतजाम करके दे दिया और मैं जी जान से उसकी साकार करने में जुट गया। 2 साल की मेहनत के बाद मैने और मेरी टीम ने एक ऐसी बैंक ब्रांच को खड़ा कर दिया जो लगभग फुल्ली ऑटोमेटेड थी।

एंट्री गेट से ही बायोमैट्रिक सिस्टम लगा था, और अंदर जाते ही पैसे जमा करने और निकलने की अलग अलग मशीनें थी, जिनमे ग्राहक का बायोमेट्रिक कार्ड ही काम आता, लोन लेने के लिए भी पूरा ऑटोमेटेड सिस्टम था जिसमे ग्राहक के सारे डॉक्यूमेंट्स अकाउंट खोलते समय ले लेते और बाकी कामों के लिए भी कोई पर्सनल इंट्रैक्शन नही होता, जो भी होना था वो बस अकाउंट खोलते समय होता, जिसके लिए बैंक के बाहर ही एक छोटा सा ऑफिस था, जिसमे 3 4 स्टाफ बैठने की जगह थी। और वहीं पर बायोमैट्रिक कार्ड देने के बाद ही ग्राहक अंदर जा कर सारा काम खुद से करते थे। अंदर बस कुछ सहायता और साफ सफाई के लिए स्टाफ थे।

अपनी समय का सबसे एडवांस सिक्योरिटी सिस्टम से युक्त ब्रांच थी वो, बिना बायोमैट्रिक के किसी का भी न सिर्फ अंदर जाना, बल्कि बाहर निकलना भी संभव नहीं था। अंदर का भी पूरा सिस्टम हाई टेक सिक्योरिटी था और जरा भी गड़बड़ी की आशंका के लिए अलार्म बटन कई जगह लगे हुए थे। और उनके बजते ही पुलिस 10 मिनिट में ही वहां पहुंच जाती।

मित्तल साहब सारा इंतजाम देख कर बहुत खुश हुए, और इसकी खूबियां के बल पर वापी शहर के कई बड़े व्यापारी अपना बड़ा अकाउंट वहां खोलने के लिए राजी हो गया। जल्दी ही वो ब्रांच न सिर्फ वापी, बल्कि देश की लीड ब्रांच में शामिल हो गई। और इसी उपलब्धि के कारण मुझे न सिर्फ वाइस प्रेसिडेंट बनाया गया, बल्कि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में भी जगह मिल गई। और ग्रुप के बैंकिंग का GM भी बन गया।

तभी डोर बेल की आवाज से मैं वापस वर्तमान में आ गया, और गेट खोल कर देखा तो मेरा खाना आ चुका था।

खाना खा कर, मैं सो गया। अगले दिन अपने समय से उठ कर दिनचर्या के काम निपटा कर में ऑफिस चला गया।

अपने केबिन में बैठे अभी कुछ ही देर हुई थी कि इंटरकॉम बजा।

"हेलो?"

"हां, मनीष, अभी कुछ देर में मीटिंग है तैयार रहना।" ये मित्तल सर थे।

"जी सर, कितनी देर में आना है?"

"मीटिंग 1 घंटे में शुरू करेंगे, लेकिन तुम एक बार मेरे पास 15 मिनिट पहले आ जाना।"

"जी, आता हूं।"

मेरे इतना बोलते ही उन्होंने फोन रख दिया, वो वैसे भी बस काम भर ही बात करते थे। कुछ देर बाद मैं उठ कर उनके केबिन की ओर चल दिया। 5 फ्लोर की इस बिल्डिंग में मेरा केबिन टॉप फ्लोर पर था, जिसमे बैंकिंग और रियल एस्टेट डिवीजन के GM बैठते थे। मित्तल साहब का 3rd फ्लोर पर था, और उसी फ्लोर पर मीटिंग रूम भी था।

मै उनके केबिन के बाहर पहुंच कर दरवाजे को खटखटाया, "कम इन"

ये सुन कर मैं दरवाजा खोल कर अंदर गया। सर अपने डेस्क के पीछे बैठे कोई फाइल देख रहे थे, मुझे देखते ही उन्होंने आंख से बैठने का इशारा किया। मैं उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। 2 मिनिट के बाद उन्होंने वो फाइल अपने सामने से हटा कर रखी, और मुझे देख कर बोले, "ये मीटिंग मैने ऑटोमेटेड ब्रांच के लिए बुलाई है, तो तुम एक बार उसकी प्रेजेंटेशन भी इसमें दिखा देना। अब जाओ मैं आता हूं।"

मैं वहां से उठ कर मीटिंग रूम में जा कर बैठ गया, वहां पर लगभग सारे लोग आ चुके थे। मैं अपनी सीट पर जा कर बैठ गया।
मेरी सीट के बगल में मेरा असिस्टेंट और बैंकिंग का एजीएम कारण बैठा था, वो 28 29 साल का एक मेहनती और तेज दिमाग का इंसान था। मेरे LN group को ज्वाइन करने से पहले से ही वो यहां पर काम कर रहा था। मेरे सामने सर की इकलौती बेटी और रियल एस्टेट की GM, प्रिया बैठी थी। वो एक दरमायन कद की 27 साल के करीब तीखे नैन नक्श वाली लड़की थी, अपने पिता की तरह ही वो भी स्वभाव की अच्छी थी, और मुझसे हमेशा अच्छे से ही पेश आई थी अब तक।
उसके दाएं तरफ रजत मित्तल के बड़े भाई, और LN group के MD महेश मित्तल बैठे थे। मेरी बाएं ओर शिविका मित्तल, महेश मित्तल की बेटी और फाइनेंस की GM बैठी थी, वो भी प्रिया की तरह ही दिखती थी, बस उसका रंग प्रिया से ज्यादा साफ था। मित्तल परिवार के सारे बच्चों में वो सबसे ज्यादा चुलबुली थी, उसकी चेहरे पर हमेशा मुस्कान बनी रहती थी, मेरे साथ वो हमेशा एक दोस्त के जैसा व्यवहार करती, और कई बार मजाक भी करती रहती थी। उसके बगल में श्रेयन मित्तल, महेश जी का बेटा, जो केमिकल और टेक्सटाइल का GM था और हम सब में सबसे बड़ा, व्यवहार में वो भी अपने पापा और चाचा जैसा था, पर पता नही क्यों मुझसे थोड़ा खींचा खींचा रहता था।

कु
छ देर बाद दरवाजा खुला और जो भी अंदर आया उसे देख कर मेरे दिल में एक हलचल सी होने लगी....
Update -3

मनीष भाई साहब अतीत से बाहर निकल कर घर आये और शावर लेकर फ्रेश हुए। "" जबकि उन्हे स्पा मे जाकर फ्रेश होना चाहिए था.. पैसे भी ज्यादा खर्चा नही होता हैं, 3500/- मे 15 मिनिट का शावर और १ घंटे की मसाज 😁😜

खैर भाई साहब ने पढ़ लिख कर बिजनेस भी संभाल लिया अपने जैविक पिता के सपने को भी पूरा किया। अब तो दो दो लड़किया भी ऑफिस में है, इसकी बहन के मजे ही मजे है😂😁

महेश का लोंडे श्रेयन की झांट सुलग रही है इसलिए रूखा रूखा व्यवहार कर रहा है, पर उसका टेंशन ना लो, और उसकी बहन पर फोकस करो। 😁😜
 

Rekha rani

Well-Known Member
2,551
10,854
159
पर प्रेम जाल में फंसा कर क्या ही करवा लेंगे?
वही तो पढेंगे आगे क्या क्या करती है और करवाती है,
 

Ufaq saba

Bye
1,110
2,355
144
#अपडेट २


अब तक आपने पढ़ा -


अब आप सोच रहे होंगे कि कैसा नालायक बेटा हूं मैं जो अपने पिता को सर बोल रहा हूं और उनके साथ घर क्यों नही गया?


तो आपको बता दूं रजत जी मेरे पिता नही हैं....



अब आगे -


हां वो मुझे जन्म देने वाले पिता नही हैं, लेकिन पिता से कम भी नहीं हैं, ये नाम मनीष मित्तल भी उन्ही का दिया है, वरना जब से मैंने होश सम्हाल है, खुद को इस दुनिया में अकेला ही पाया है।


मुझे पता भी नही कि मेरे माता पिता कौन थे, कैसे थे। मैं उनकी ही औलाद था या नाजायज था, या उनकी किसी दुर्घटना में मौत हो गई।


होश आते ही मैंने खुद को दिल्ली की सड़कों पर भटकता पाया, पेट भरने के लिए कभी भीख मांगता, कभी कुछ छोटे मोटे काम, जैसे जूता पॉलिश करना, गाड़ी साफ करना, करते हुए गुजारा करने लगा। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो मुझे नई दिल्ली स्टेशन के पास एक ढाबे में काम मिल गया। वो ढाबा एक सरदार जी का था, जो उस वक्त करीब पैंतीस साल के होंगे, बड़े ही जिंदादिल इंसान और स्वभाव के बहुत ही अच्छे। उन्होंने पहले तो मुझे टेबल साफ करना का काम दिया, और बाद में मुझे पढ़ने के लिए भी उकसाया।


मुझे पढ़ाई बड़ी अच्छी लगने लगी, मैने कुछ ही साल में क्लास 5 तक की पढ़ाई पढ़ ली। पढ़ाई के साथ साथ मुझे नई चीजें सीखना का भी शौक था।


एक दिन स्टेशन के पास सौंदर्यीकरण के कारण सरदार जी को ढाबे की जगह खाली करने का आदेश आ गया, सरदार जी ने अपने ढाबे को राजेंद्र नगर में शिफ्ट कर दिया, और कई पुराने लोगों को भी वहीं काम पर बुला लिया, उनमें से मैं भी एक था, वो मुझे बहुत मानने लगे थे।


वहां ढाबे के पास ही जॉली की इलेक्ट्रॉनिक रिपेयरिंग की दुकान थी, वो समय था जब भारत में मोबाइल आया ही था, और हैप्पी भैया भी मोबाइल रिपेयरिंग का काम सीख कर अपनी दुकान में वो भी करने लगे थे। सरदार जी और मेरी उनसे बहुत बनने लगी। मैं तो अक्सर खाली समय में उनकी दुकान पर बैठा चीजों को रिपेयर होते देखता रहता था। कभी कभी हैप्पी भैया मुझे भी कुछ छोटी चीजों को रिपेयर करने देते थे।


एक दिन जब मैं उनकी दुकान पर बैठा था तो दुकान में 3 4 आदमी आए, उनमें से एक को छोड़ कर बाकी दुकान के बाहर रुक गए।


उनको देखते ही जॉली भैया अपनी सीट छोड़ कर खड़े हो गए, "अरे मित्तल साहब, नमस्ते। आइए आइए, बोलिए यहां आने की जहमत क्यों उठाई आपने, मुझे बुलवा लिया होता।"


जॉली भैया के इस तरह बोलते देख मैं समझ गया कि ये कोई बड़ी हस्ती हैं, और बाहर खड़े लोग उनके बॉडीगार्ड या मातहत हैं।


मित्तल साहब, "अरे जॉली बात ही कुछ ऐसी है, तुमको बुलाता तो आने जाने में समय बरबाद होता, इसीलिए खुद आ गया। अभी कुछ दिन पहले अमेरिका से आया हूं,वहां ये लेटेस्ट मॉडल का फोन लिया था, लेकिन आज सुबह से ये ऑन भी नही हो रहा। जरा देखो इसको, बहुत सारे जरूरी कॉन्टेक्ट इसी फोन में हैं।"



जॉली भैया तुरंत उस फोन को खोल कर देखने लगते हैं, कोई 15 20 मिनट के बाद, "मित्तल साहब ये तो कुछ समझ नही आ रहा मुझे, और ये फोन तो इतना लेटेस्ट है कि इसे फिलहाल तो अपने देश में कोई बना भी न पाए।"


मित्तल साहब जो ये सुन कर थोड़ा परेशान हो गए, "एक बार सही से कोशिश तो करो भाई, बहुत जरूरी है इस फोन का सही होना, वरना एक बहुत बड़ा कॉन्ट्रैक्ट हाथ से चला जायेगा।"


जॉली भैया फिर से कोशिश में लग जाते हैं, और फिर 10 मिनिट के बाद, "नही समझ आ रहा मित्तल साहब।"


ये सुन कर वो व्यक्ति थोड़ा निराश दिखने लगा।


तभी पता नही मुझे क्या हुआ, "जॉली भैया, एक बार मैं कोशिश करूं?"


मित्तल साहब ने सवालिया नजरें से जॉली को देखा।


जॉली, "अरे मोनू, आज तक तूने किसी फोन को हाथ भी नही लगाया, और ये तो इतना लेटेस्ट है कि मुझे भी नही समझ आ रहा, तू कैसे करेगा ये?"


"एक बार कोशिश तो करने दो मुझे भैया।"


जॉली भैया बड़े पसोपेश में पड़ गए


मित्तल साहब मेरे पास आ कर मेरी आंखो में झांकते हुए बोले, "क्या तुम कर लोगे।"


पता नही किस शक्ति के वशीभूत हो कर मैने भी वैसे ही उनकी आंखों में देखते हुए जवाब दिया, "मुझे लगता है कि मैं इसको सही कर सकता हूं।"


"जॉली, एक बार इसे कोशिश करने दो।"


"पर मित्तल साहब?"


"जॉली फोन तो वैसे भी अब शायद ही बने यहां, एक बार इसको दो तो।"


जॉली भैया अपनी सीट छोड़ कर खड़े हो गए और मुझे इशारा किया। मैं उनकी सीट पर जा कर बैठ गया, जहां वो फोन रखा था। मैने उसे खोला और गौर से उसे देखने लगा। मित्तल साहब और जॉली भैया बाहर जा कर बैठ गए और कुछ बातें करने लगे।


मैं उस फोन को गौर से देख रहा था और समझने की कोशिश कर रहा था, पता नही मैने किस भावना में बह कर मित्तल साहब की आंखों में झांकते हुए फोन को सही करने की बात कर दी थी, अब मेरी हालत खराब हो रही थी।


खैर कुछ समय बाद मुझे लगा की कुछ है जो शायद टूटा है, वो एक बहुत ही महीन सा तार था जो बैटरी के कनेक्शन को मेन यूनिट से जोड़ रहा था, पतली वाली चिमटी से उसे निकलने पर वो टूटा ही मिला मुझे, और मैने एक और तार से वैसे ही महीन सा तार निकल कर लगा दिया, और फोन को वापस से पैक करके धड़कते दिल से ऑन का स्विच दबा दिया। कुछ सेकंड बाद फोन में लाइट आने लगी और वो ऑन हो गया।


आवाज सुनते ही जॉली भैया और मित्तल जी अंदर आए, और आते ही जॉली भैया ने मुझे गले लगा लिया, मित्तल जी फोन के ऑन होने से बहुत खुश थे।


जॉली, "कैसे किया तूने?"


मैने फिर सारी बात बताई, जिसे सुन कर मित्तल साहब के चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते रहे। सारी बात सुन कर मित्तल साहब ने अपना कार्ड मुझे देते हुए कहा, "बेटा ये मेरा कार्ड रखो, और अभी मैं किसी काम से मुंबई जा रहा हूं, 2 3 दिन के बाद लौटूंगा, तुम आ कर मुझसे जरूर से मिलना।"


इसके बाद वो बाहर निकल गए। जॉली भैया बहुत खुश थे और उन्होंने ये बात तुरंत ही सरदार जी को बताई। ये सुन कर सरदार जी भी खुश हो कर मेरी पीठ थपथपाने लगे।


खैर उसके बाद में ढाबे के काम में व्यस्त हो गया और मित्तल साहब के कार्ड के बारे में लगभग भूल ही गया।


6 7 दिन बाद दोपहर के बाद मैं ढाबे की सफाई कर रहा था, तभी एक ड्राइवर की वर्दी में ढाबे पर आया और मुझे सामने देख मुझसे पूछा, "ये मोनू कहां मिलेगा?"


"बोलिए, में ही मोनू हूं।"


"चलो, तुम्हे साहब ने बुलाया है।"


"कौन साहब?"


"मित्तल साहब का ड्राइवर हूं मैं, उन्होंने ही मुझे तुम्हे लाने भेजा है।"


तब तक सरदार जी भी पास आ चुके थे और मित्तल साहब का नाम सुनते ही मुझसे बोले, "जा पुत्तर, मिल कर आ मित्तल साहब से।"


मैं ड्राइवर के साथ निकल गया, वो एक बहुत ही बड़ी गाड़ी में आया था, जो दिल्ली जैसे शहर में ही बहुत कम दिखती थी। कोई एक घंटे बाद ड्राइवर ने गाड़ी एक इमारत के अंदर ले जा कर लगाई, और मुझे ले कर गाड़ी से बाहर आ कर लिफ्ट से इमारत के सबसे ऊपर वाली मंजिल पर ले गया।


वहां पहुंच कर ड्राइवर ने सामने काउंटर पर बैठी लड़की से कुछ बात की और उस लड़की ने उसे इशारे से अंदर जाने को कहा। ड्राइवर मुझे ले कर एक दरवाजे के पास ले गया और दरवाजे को खटखटाने लगा, अंदर से "आ जाओ" की आवाज आई, और ड्राइवर ने दरवाजा खोल कर मुझे अंदर जाने का इशारा किया।


अंदर जाते ही मैंने देखा, ये एक बहुत ही बड़ा और शानदार ऑफिस था, और सामने मित्तल साहब अपनी डेस्क के पीछे बैठे कोई फाइल पढ़ रहे थे। वो कमरा बहुत ही बड़ा था, इतना बड़ा की कई लोग का पूरा घर ही उतने में आ जाय।


मित्तल साहब ने मुझे देख कर साइड में रखे सोफे पर बैठने का इशारा किया, और फिर से फाइल पढ़ने लगे। मैं चुपचाप जा कर उस सोफे पर बैठने गया, और धड़कते दिल से चारों ओर देखने लगा। मुझे समझ नही आ रहा था कि आखिर इतने बड़े आदमी को मुझमें इतनी दिलचस्पी क्यों है कि मुझे लेने अपनी कार तक को भेज दिया। कोई पांच मिनट बाद मित्तल साहब अपनी कुर्सी से उठा कर मेरे सामने वाले सोफे पर आ कर बैठ गए।


"कैसे हो मोनू?"


"जी अच्छा हूं।" मैने अटकते हुए कहा।


"मैने तुमको उस दिन ही कहा था कि आ कर मुझसे मिलना, कर तुम आए नही?"


मैं निरूतर था, इसीलिए मैंने अपनी गर्दन झुका ली।


"समझ सकता हूं कि तुम सोच रहे होगे आखिर एक मामूली से तार को जोड़ कर तुमने ऐसा क्या कर दिया कि मुझ जैसा आदमी तुमको अपनी गाड़ी भेज कर अपने पास क्यों बुलाया है?"


मैं आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगा।


" देखो मोनू, तुमने मेरा फोन बनाया, ये कोई बड़ी बात नहीं थी। उसकी खराबी शायद जॉली भी एक बार और देख कर समझा जाता। मगर जिस कॉन्फिडेंस से तुमने मेरे आंखो में आंखे डाल कर बोला कि तुमको लगता है कि तुम इस फोन को बना सकते हो, मुझे वो बहुत ही अच्छा लगा। तुम्हारी इस बात से पता लगता है कि तुम कोई साधारण लड़के नही हो, और जॉली ने भी मुझे बताया कि तुम्हारा दिमाग बहुत तेज है, और तुम्हारा पढ़ने लिखने में भी बहुत मन लगता है। इसीलिए, बस मैं तुम्हे आगे पढ़ना चाहता हूं।"


"पर मैं तो पढ़ ही रहा हूं अभी।"


"वो कोई पढ़ाई है भला, मैं चाहता हूं की तुम अपना ध्यान बस पढ़ने में लगाओ, और बस पढ़ो, और एक काबिल इंसान बनो।"


मैं आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगा।


"देखो मोनू, मैं बस अच्छे लोगों की मदद करना चाहता हूं, मुझे लगता है कि तुम कुछ बन गए तो तुम इस समाज, इस देख के बहुत काम आ सकते हो, शायद मेरे भी।"


मैं अभी भी आंखे फाड़े उन्हें ही देखे जा रहा था। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई मुझसे ऐसी बातें भी कर सकता है।


"ऐसा नहीं है कि तुम पहले हो जिसके साथ मैं ऐसा कर रहा हूं, मैने कई बच्चों को शिक्षा दिलाई है, हां तुम मुझे उनसे अलग लगे, इसीलिए मैंने खुद तुम्हे यहां बुलवा कर तुमसे बात कर रहा हूं। और मैं ये भी नही कह रहा कि तुम अभी ही कोई फैसला लो। अभी तुम वापस जाओ, और आराम से 2 3 दिन सोच विचार करके अपना फैसला लो। बस अपने भले की ही सोचना।"


ये बोल कर उन्होंने अपने सामने रखे फोन को उठा कर ड्राइवर को अंदर बुलाया। ड्राइवर के आते ही उन्होंने ड्राइवर को मुझे वापस छोड़ने को कहा। और मैं ड्राइवर के साथ वापस आ गया। रास्ते भर में पसोपेश में था कि क्या करूं और क्या नहीं। ऐसा नहीं था की मित्तल साहब मुझे कोई गलत आदमी लगे, लेकिन सब कुछ पीछे छोड़ कर मुझ जैसे बच्चे का ऐसा फैसला लेना...


खैर ये सब सोचते सोचते मैं ढाबे पर वापस पहुंच चुका था, शाम ढल चुकी थी, और ढाबा ग्राहकों से भरा हुआ था। पहुंचते ही मैं अपने काम में लग गया, और सरदार जी भी व्यस्त थे तो उन्होंने भी मुझे नही टोका। देर रात तक फ्री हो कर मैं सोने चला गया, और सुबह जब उठा तो सरदार जी अपने घर से वापस आ चुके थे।


उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुलवाया, मैं अंदर गया तो उन्होंने मुझे कुर्सी पर बैठा कर मित्तल साहब से हुई मुलाकात के बारे में पूछा। मैने उन्हे सारी बात बताने लगा, जिसे सुन कर सरदार जी के आंखों की चमक बढ़ती चली गई।


"बेटा किस्मत किसी किसी को ही ऐसा मौका देती है, ज्यादा सोच मत, मित्तल साहब के साथ लग जा, जिंदगी बन जायेगी तेरी।"


" पर दार जी, आपके सात इतने दिन से रह रहा हूं, आप मुझे पढ़ने देते ही हैं, फिर?"


"बेटा, मित्तल साहब जो शिक्षा तुम्हे दे सकते हैं, वो तो शायद मैं खुद के बच्चों भी न दिलवा पाऊं, इसीलिए ज्यादा सोच मत, बस भगवान का भरोसा कर चला जा।"


मैं अभी भी पसोपेश में था। कुछ देर बाद जॉली भैया भी आ गए और सारी बात जानने के बाद वो भी मुझे मित्तल साहब के प्रस्ताव को मानने के लिए बोलने लगे।


अगले दिन मैं, सरदारजी और जॉली भैया, मित्तल साहब के ऑफिस में बैठे थे, उन दोनो ने कई तरीके की बात की मित्तल साहब से, और आखिरी में मुझे मित्तल साहब के ऑफिस में छोड़ कर दोनो वहां से चले गए।


मित्तल साहब मुझे ले कर एक बोर्डिंग स्कूल में ले गए, को LN Group का ही कोई चैरिटेबल स्कूल था, वहां मेरी बाकी बची 4 5 साल की पढ़ाई को एक साल में ही पूरा करवा दिया गया। फिर एक साल बाद मित्तल साहब मुझे ले कर पुणे गए, और एक दूसरे बोर्डिंग स्कूल में मेरा एडमिशन सीधे 10वीं में करवा दिया गया, ये स्कूल वही था जहां मित्तल साहब के घर के बच्चे भी पढ़ते थे। वहीं उन्होंने मेरा नाम मोनू से मनीष मित्तल करवा दिया, और सरकारी दस्तावेज में मेरे पिता भी वही बन गए। मैने भी उनके इस अहसान को माना और अपने आपको पूरी तरह से पढ़ाई में झोंक दिया।



तभी एक झटका लगने से मैं अतीत से बाहर आ गया। मेरी गाड़ी मेरे अपार्टमेंट में आ चुकी थी....
Awesome update mujhe lag raha tha rajat mitta asli baap hai Manish ka magar Aisa nahi hai ..Manish ne jis tarha ka confidence dikhaya rajat mittal ke samne Kabile tarif tha .. mujhe Rajat mittal ke beta beti ke bare mai janne ki excitement hai wo kis tarha ka nature rakhte hai Manish ke parti .
 
Top