ननद मेरी, चम्पे का फूल
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ननद मेरी एकदम मेरी नकल,... मैं अपनी सास की चिढ़ाती भी थी
" लगता है कभी हमारे बाऊ जी आये थे इधर, वरना हमारी और आपकी बेटी की शकल एकदम मिलती कैसे है "
कभी वो प्यार दुलार से मुझे पकड़ के दबा लेती,... और नम आँखों से कहतीं,
" पागल है तू अरे मेरी असली बेटी तो तू ही है, हरदम रहेगी मेरे पास। बाकी सब तो नीम की चिरैया हैं, आज यहाँ कल उड़ के कहीं और अपना घोंसला बनाने लगेंगी, तिनके तिनके जोड़ कर"
लेकिन थीं तो मेरी सास ही. वो छोड़ दें मैं उन्हें छेड़ने का मौका नहीं छोड़ने वाली थी. मैंने चिढ़ाया,
" फिर तो आपका बेटा पक्का बहन चोद है,... "
" वो अकेला थोड़े ही होगा और न पहला, अरे इस गाँव के सब मरद, बहनचोद पहले हैं,... " सास मेरी हंस के जवाब देतीं ,
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और बात उनकी सही थी, बात ये थी की पहले दिन से मेरी और मेरे सास की दोस्ती पक्की हो गयी थी, आखिर हम दोनों ही तो इस गाँव की बहू थे,... उनका डोला बाइस चौबीस साल पहले उतरा था, मेरा साल भर हुए लेकिन थे तो हम दोनों ही बहू हैं और इस गाँव की लड़कियां हमारी ननदें।
तो आज उनका बेटा असली बहनचोद बनने जा रहा, वो भी मेरे सामने। और पक्का बहनचोद, एकदम खुल्ल्म खुल्ला वाला, सिर्फ एक दिन के बाद मैं थोड़ी छोड़ने वाली थी अपनी ननद को अपने मरद के नीचे लिटा के,...
लेकिन मैं भी न बात कहाँ से शुरू करती हूँ कहाँ पहुंचा देती हूँ इसलिए तो ऐसी कहानियों को न कोई पढता है न कमेंट करता है,
बात हो रही थी ननद के रूप की जोबन की,... मैंने कहा था न एकदम मेरी नक़ल, लम्बाई में एकदम मेरे बराबर, ५-५ से आधा सूत कम, वो भी मैं भी,...
उमर में मुझसे डेढ़ दो साल बरस बड़ी थीं, ... शादी हमारी शादी के दो साल पहले हो गयी थी,
गोरी चम्पई भी मेरी तरह, और जोबन भी एकदम चोली फाड़, थे तो ३४ के लेकिन २८ की कमर पर अच्छे खासे बड़े लगते थे और चोली भी एकदम टाइट पहनती थीं,...
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बस फरक दो था, एक तो वो हंसती थी तो गाल में जबरदस्त गड्ढे पड़ते थे, ... सगाई में आयी थीं तो माँ ने ये गाल का गड्ढा देखकर बोला,
" छिनार क निशानी "
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और दूसरा फरक था तिल. मेरी ठुड्डी पर एक जबरदस्त तिल था और ननद के गाल पर. लेकिन गौने आने के तीन चार महीने बाद हम ननद भौजाई एक मेले में गए, गुदना गुद रहा था। उन्होंने एकदम मेरे तिल की तरह अपनी ठुड्डी पर गुदवा लिया,... और मैं काहें पीछे रहती तो मैंने भी उनके गाल की तरह अपने गाल ओर ठीक उसी जगह, उतना ही बड़ा।
बहुत मजा आया मेले में, और मेले में क्या पूरे सावन में,
सावन में सब लड़कियां अपने मायके जाती हैं, तो मेरी ननद भी आने वाली थीं, और मेरी सास मेरे पीछे पड़ी थीं की मैं मायके जाऊं, और मैंने साफ़ मना कर दिया सास से
" मैं नहीं जाउंगी, मेरी ननद आएँगी, "
मेरी सास कभी हँसे कभी गुस्सा हों, कहने लगी,
" मैं भी न तेरी सकल सूरत देख के ले आयी, थोड़ा सर पर ठक ठक कर के देख लेती अंदर कुछ दिमाग विमाग भी है की नहीं। सब बहुये, मायके जाने के नाम पे बिना सास से बोले सामान बाँध के बैठी रहती हैं और ये लड़की है, चार महीने हो गए, गौने आये, आज तक मायके जाने की बात नहीं और सास बोल भी रही हैं तो साफ़ मना कर रही है, वो भी सावन में "
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उस समय, घर में खाली सास ही थीं,
जेठानी मेरी तो,... एक पैर उनका बंबई में, जेठ जी तो बंबई में ही रहते थे, कुछ काम धंधा था, मेरी शादी और गौने में आये थे, उसके बाद एक दो दिन के लिए एक दो बार, तो जेठानी पंद्रह बीस दिन के लिए जेठ जी के पास गयी थीं साथ में मेरी छोटी ननद भी, तो बस मैं सास और ये,
और मैंने भी सास को साफ़ साफ़ समझाया,
" देखिये मायके में एक तो ज्यादा झूला उला होता नहीं, बहुत हुआ तो बरामदे में एक रस्सी टांग के, यहाँ बाग़ में खुले में झूला झूलने का मजा वो भी ननदों के साथ,
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दूसरे हम सुने हैं की गाँव में मेला, और शहर में कौन मेला, और तीज की तो बात मत करियेगा, हमारे यहां भादो की तीज होती है, अपने बेटे को बोल दीजियेगा, तीज के एक दिन पहले मुझे ले जायँ और अगले दिन वापस ले आएं, बस वो भी आप इतना कह रही हैं नहीं तो क्या ससुराल में तीज नहीं कर सकते ?
लेकिन मेरी सास भी एकदम पीछे पड़ी थीं, पहला सावन, अंत में मैंने उन्हें बोल ही दिया,
" आप बार बार कह रही थीं न सावन में मायके जाने को, कितने साल हो गए आपको इनके मामा के यहाँ गए, तो हो आइये और पन्दरह दिन के पहले लौटीं न तो दरवाजा नहीं खुलेगा, बस मेरी ननद के आने के अगले दिन, और अपने बेटे को भी साथ ले जाइयेगा, आप इनके मामा के साथ झूला झुलियेगा और ये अपनी ममेरी बहनो के साथ, मेरी ननदो के साथ, साथ जाइये साथ आइये, तब तक हम ननद भौजाई यहाँ "
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एक दिन मजाक मजाक में है मैंने असली कारण भी बता दिया,
" देखिये हमारी जेठानी जी आ जाये, दो चार दिन बंबई की थकान मिटा लें, फिर देखा जाएगा, आपको अकेली छोड़ के मैं नहीं जाने वली धक्का देके भी भेजेंगी तो भी नहीं, आपके सर में दर्द होगा तो तेल कौन लगाएगा, फिर मैं मायके में, और लौटी तो देखा की मेरी सास को कोई उठा ले गया, तो दूसरी सास कहाँ से लाऊंगी, आठ दस रूपया देके भी मंगल वाली बजार में नहीं मिलेंगी "
ये तो सच ही है. अब भाभियाँ अपनी छिनार नांदिया की नथ नहीं उतारेगी तो कौन उतरेगा. और वो भी भौजी के भाइयो से. पर उसके भैया को भी क्यों छोड़ना साजन हो या देवर चढ़ेंगे अपनी बहेनिया पे. अरे ये तो भौजी का दिया हुआ आशीर्वाद होता है. छिनार नंदियाओ के लिए. सदा फाड़वाती रहो. अपने और भौजी के भाइयो के खुटे पर दोनों टांगे फैलाकार कुढ़ती रहो. जिला टॉप बनो.भाग ८४ -इन्सेस्ट कथा - ननद के भैया बने उनके सैंया
मेरी ननद, मेरा मरद
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जिस दिन भौजाई गौने उतरती है और उसकी नजर अपनी ननद पर पड़ती है, वो मन ही मन अपने भाई का टांका उससे भिड़वाने का सोचने लगती है,
कैसे ननद के ऊपर अपने भाई को चढ़ाये, चाहे कुंवारी हो या बियहता, बस उस भौजाई के मन में एक ही शकल बार बार घूमती है, की ननदिया लेटी है टाँगे ऊपर किये, जाँघे फैलाये और उसका भाई गपागप, गपागप, ननद रानी की ओखली में अपना मूसल चला रहा है,
पर गौने की रात में जब भौजाई की फटती है,
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रात भर ननद का भाई उसके ऊपर चढ़ता है, सुबह तक जाँघे फटी पड़ी रहती हैं, जमींन पर पैर नहीं रखा जाता, दो ननदें टांग कर बिस्तर से उठा कर ले जाती है, दीवार के सहारे से चलना पड़ता है तभी भी बार बार चिल्ख उठती है, और नंदों के झुरमुट में वैसी ननदें भी जिनकी झांटे भी ठीक से नहीं आयी होती, पूछती हैं,
" भौजी केतना मोट था, बहुत दर्द हुआ का,"
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और गाँव देहात में तो कई बार दो चार बरजोर तगड़ी ननद मिल के औचक भौजी का दोनों हाथ पीछे से पकड़ लेती हैं, छुड़ाने का तो दूर, भौजाई हिल नहीं पाती, घूंघट ऊपर से, फिर बाकी सब ननदें धीरे धीरे आराम से भौजी का लहंगा ऊपर सरकाती जाती हैं, और जहाँ जांघ तक पहुंचा तो एक झटके में कमर तक, और दो चार ननदें तैयार रहती हैं पहले से, कमर पे उसे पकड़ने को,
और बुलबुल दिख जाती है, रात भर का धक्का खा खा के एकदम लाल, और बजबजाती मलाई, अभी भी बूँद बूँद रिसती,
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जेठानियाँ, और सास लोग, जहाँ ये सब शुरू हुआ खुद सरक लेती हैं, दरवाजा उठँगा देती है हाँ काम करने वाली जो रिश्ते में ननद ही लगती है, कुँवारी, ब्याहता वो सब जरूर और सब को उकसाती है, अरे ऊपर वाल मुंह तो सास जेठानी देखती हैं, ननदें तो नीचे वाला ही देखती हैं,
फिर छेड़ने वाले सवाल जवाब, "भैया ने कितनी बार किया, देख यार एकदम लाल हो गया है बुलबुल का मुंह बहुत जोर के धक्के पड़े होंगे"
और फिर नयी नयी भौजाई के मन में यही आता है, कोई कोई तो ननद को चिढ़ाते अपनी जेठानी से बोल भी देती हैं
" दीदी आज रात को इन्ही को भेज दीजिये अपने देवर के पास, पता चला जाएगा, धक्का कितनी जोर का पड़ता है, मोटा कितना है "
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और उसी समय से भौजाई सोचती है किसी दिन मौका पड़ने पे इसके भैया को इसके ऊपर न चढ़ाया तो,
तो बस मैंने भी सोच रखा था गौने के अगले ही दिन, ननद पे इनके भैया को चढाने की बात, ज़रा इनको भी पता चल जाए,
और अब वो मौका आ गया था।
हम तीनों की, मेरी चमेलिया और गुलबिया की चाल चल गयी, ननद रानी हदस गयी. समझ नहीं पायीं तीन तीन भौजाई की चाल,.. खुद ही उन्होंने कबूल कर लिया , मैं कुछ भी कहूं उन्हें कबूल होगा, लेकिन दो दो मुट्ठी से बचा लूँ,
यही तो मैं चाहती थी और सबके सामने उनसे कबूल करा लिया,... मेरे मरद के साथ, मेरे सामने,... और सिर्फ आज नहीं, जब भी मैं कहूं, जहाँ कहूं जिसके सामने, खुद टांग फैलाएंगी, चूसेंगी और उनके खूंटे पर चढ़ेंगी, ... अगवाड़ा पिछवाड़ा,... सब और एक बार नहीं तीन तिरबाचा भरवाया। चमेलिया गुलबिया तो गवाह थीं ही, दूबे भाभी भी सुन रही थीं।
बस. रात में तो हम तीनो को ही घर में रहना था, मैं मेरी ननद और मेरा मरद
कब्बडी के बाद सास सब गाँव के बाहर चली जाती थीं वहीँ से, और चौबीस घंटे के बाद लौटती थीं. अगले दिन जब देवर ननद भौजाई की होली होती थी तो कोई ननद, देवर, की महतारी गाँव में नहीं होती थी, तो सास को मेरे होना नहीं था,... और इनको भी रात में लौटना था, खाना हम सब को घर में, इसलिए मैंने ननद को बोल रखा था की वो पूड़ी बखीर बना के रखेंगी। तो जब मैं कमल की माई से मिल के लौटी तो ननद मेरी नहा धो के खाना बना के एकदम तैयार, और घर में घुसते ही मैंने उन्हें अँकवार में भर लिया।
मैंने तो अँकवार में ही भरा था ननदिया को, उन्होंने जबरदस्त चुम्मा ले लिया। सीधे जीभ मेरे मुंह में छल कब्बड्डी खेलने लगी. एकदम उसके भैया वाला स्वाद। मैंने सीधे साड़ी पे हाथ मारा और जोबन पकड़ के दबाने लगी,.... खूब कड़े कड़े, एकदम मुट्ठी में भरने लायक,.. और सोचने लगी ननद के बारे में, सास के बारे में, सावन में जब सिर्फ मैं और ननद थे और क्या मस्ती हम ननद भौजाई ने की