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Hello Hello !! .... My reader log kaafi time hogaya kaafi saare personal reasons ki wajah so i guess ab wapas aajana chahiye 

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Probably aaj aajayegawaiting for the next update....
Update do jaldiProbably aaj aajayega

Tumhara aaj kal gaya bhaiProbably aaj aajayega

Update -: 45
"तुम ऐसा वर्ताव क्यूं कर रही हो साक्षी?"........रात का समय था करीब ग्यारह बज रहे थे जब मयंक ने साक्षी को ऊपर छत पर आते देखा था जिसके बाद वह भी ऊपर छत पर ही आ गया।
मयंक -"साक्षी में क्या करूं मैं खुद मजबूर हूं जो तुम चाहती हो शायद वो मुमकिन नहीं है".......... साक्षी से पहले सवाल पर कोई जबाब ना पाकर मयंक ने एक बार फिर बात करने की कोशिश की।
लेकिन फिर भी कोई जबाब ना आया जिसके बाद एक सांस छोडकर वो जैसे ही जाने के लिए मुडा तो एक दम से साक्षी ने उसके हाथ पर हाथ रख दिया जैसे कहना चाहती हो की जाओ मत।
मयंक -"मुझे अपने पास रखना चाहती हो फिर बात क्यूं नहीं कर रही ?......... मयंक की इस बात को सुनकर साक्षी ने चहरा घुमाकर मयंक की आंखों में देखा और जैसे ही मयंक ने भी उन आंखों में देखा तो वहां कुछ गीलापन भी था आंसुओं के रुप में।
साक्षी -"मुझे ये बताने की जरूरत है कि मैं ऐसा बर्ताव क्यूं कर रही हूं?"
मयंक -"तुम्हें पता है जब इन कुछ दिनों के लिए तुम मुझसे दूर हुई थी तो पहली बार अपने परिवार के अलावा किसी याद मुझे आई और वो तुम थी "
साक्षी -"हमें याद किसी की तब ही आती है जब हम उस शख्स से प्यार करते हों "
मयंक -"बेशक मैं प्यार करता हूं पर उस तरह का नहीं जो तुम करने लगी हो मैं तुम्हें अपने जीवन में दोस्त का दर्जा देता हूं और शायद उससे बढ़कर कुछ नहीं है "
साक्षी -"पर मुझे वो नहीं चाहिए जो तुम देना चाहते हो मुझे वो चाहिए जो मेरा दिल कहता है मैं सच्चा प्यार करने लगी हूं और वही तुमसे चाहती और कुछ नहीं "
मयंक -"वैसे हमारी हालत में ज्यादा फर्क नहीं है साक्षी हम दोनों ही एक नाव पर सवार है "
साक्षी -"क्या कहना चाहते हो....साफ साफ कहो "
मयंक -"जैसे तुम मुझे प्यार करती हो और मैं नहीं वैसे ही मैं भी किसी को प्यार करता हूं पर वो नहीं "
मयंक के इतना कहते ही वहां एक शांति छा गई ......और साक्षी कुछ देर कुछ नहीं बोली फिर खुद ही नीचे चली गई।
साक्षी को दुखी देखकर मयंक को खुद पर गुस्सा आ रहा था पर वो इस मामले में कुछ नहीं कर सकता था ।
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"फिर क्या सोचा तूने मेरे आइडिया के बारे में?"........ मयंक ने राजीव की बाइक पर बैठते हुए पूछा राजीव मयंक के यहां उसको लेने आया था जबकि साक्षी आज काफी दिनों बाद इफ्तिका के घर चली गई थी।
राजीव -"सोचना क्या है हम तो फकीर आदमी हैं झोला उठाएंगे और चल देंगें जहां तू कहेगा "
मयंक -"ठीक है फिर हो जा तैयार गांव जाने वाले हैं हम सब "
राजीव -"हम सब का क्या मतलब है वे तू और मैं ही तो हैं"
मयंक -"नहीं वे जब से इफ्तिका के दादा को अपने गांव का पता लगा है की मैं और तू वहां से हैं उन्होंने कहा है की इफ्तिका को और उनको भी घूमना हैं उधर एक बार और जब मैंने इन छुट्टियों का बताया तो उन्होंने ही गांव का आइडिया दिया और फिर हमें पहाडगढ भी तो जाना है और मैंने सोचा है साक्षी को भी लेते चलेंगे "
"मैं भी अपनी माशूकाओं को ले चलूं क्या "....... राजीव ने एक कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहा।
मयंक -"भोसडीके माशूकाओं का क्या मतलब है कितनी है तेरी"
राजीव -"देख भाई अपने को प्यार होता नहीं और प्यार नहीं चाहे कितनी भी हो सकती है"
"तेरा भी सही है बहनचो"....... मयंक ने एक तंज भरी मुस्कान के साथ कहा जो शायद नाम के लिए ही मुस्कान थी ।
राजीव -"ले भाई पहुंच गये मंजिल पर"
राजीव ने एक पोहे वाले की दुकान के सामने बाइक रोकते हुए कहा जो बामुश्किल दस फुट चोडी होगी पर उस पर मौजूद भीड बता रही थी की दुकान नहीं चीज अच्छी होनी चाहिए इस दो रोड वाली दुकान के सामने वाली तरफ भीड थी पर उसको नजर अंदाज करते हुए दोनों बगल से गई में घुसकर दुकान की दूसरी तरफ पहुंच गये जहां एक लडका बैठा प्याज, नींबू और टमाटर काट रहा था
"पोहा चाहिए तो सामने वाली तरफ जाओ यहां नहीं मिलेंगे"......उस लडके ने बिना दोनों को देखे ही कह दिया
"ठीक है भाई फिर चल मयंक "...... राजीव ने भी हस्ते हुए कहा।
पर राजीव की आवाज सुनते ही वो लडका तुरंत इनकी तरफ देखा और जल्दी से खडा हुआ ...
"भईया वो मैं आपको देखा नहीं ना इसलिए.....आप रुको मैं अभी पोहा लेकर आता हूं यहां बैठो "......उस लडके से हंसते हुए कहा।
और इतना कहने के साथ ही वो लडका अंदर से ही सामने की तरफ गया और दोनों के लिए पोहे की प्लेट बनाने लगा।
मयंक -"साले ये गरीब लोग पर कब से दादागिरी दिखाने लगा तू?"
राजीव -"ओ भाई वैसा कुछ नहीं है जैसा तू सोच रहा है वो मेरे डर से नहीं गया बल्कि मैं उसको भाई ही मानता हूं इसलिए गया है "
"हुआ ये था कि जब मैं यहां इंदौर में आया ही था की एक बार एक लडके के साथ यहां वो सामने देख जलेबी वाले के यहां आना हुआ तो कुछ लोग इसी लडके की मां को खींच कर ले जा रहे थे जिनसे इसके बाप ने कर्जा लिया था अब बाप तो शराब की वजह से बिस्तर में आ गया यही दुकान देखता है और एक काम करने वाला भी रखवा दिया मैंने वैसे दुकान अच्छी चलती है इसकी पर बाप की दवाईयां सब कमाई खा जाती है तो उस दिन मैंने उन लोगों से इनको बचाया और उन लोगों के रुपये भी दे दिए पर इसने कहा की ये रुपये लौटाएगा और उस समय जब इसने ये बात बोली थी तो इसकी उन आंखों को देखकर मैं मान गया रुपये वापिस लेने को बस मैंने कहे दिया रोज दस भूखे बच्चों को सुबह का नाश्ता करा दिया करे जिस दिन मेरे रुपये चुक जाए तो बंद करदे तब से ही बडा भाई मानता है मुझे पर आज यहां इसलिए नहीं लाया की इस पर रुपये है मेरे बल्कि इसलिए लाया हूं क्योंकि इसके जैसे पोहे बहुत कम लोग बनाते हैं इंदौर में "....... राजीव ने पूरी बात बताते हुए कहा।
"इस बार आप बहुत दिनों बाद आए हो भईया...... धीरे धीरे आपका आना कम होता जा रहा है".......उस लडके ने शिकायत भरे लहजे में कहा और यहां वो जलेबी भी साथ लाया था सामने से जो सही मेल थी ।
इस बात का जबाब राजीव ने दिया फिर लडके से बात करते हुए दोनों ने नाश्ता किया।
"नहीं ये मैं नहीं ले सकता भईया"......नाशता करने के बाद जैसे ही मयंक ने रुपये दिये तो लडके ने मना कर दिया।
मयंक -"अरे भाई ये थोडी दे रहा है रुपए मैं लेकर आया था इसको मतलब आज का नाश्ता मेरी तरफ से था तो मुझसे तो रुपये लेने बनते हैं या नहीं"
इस तर्क को सुनकर वो लडका भी कुछ नहीं बोला जिसके बाद ये दोनों यहां से निकले पर उससे पहले मयंक ने दो जगह जलेबी पैक कराई एक चाची अवनी और दीदी की लिए और दूसरी साक्षी और रोमा के लिए। राजीव ने मयंक को घर छोडा और शाम तक सब डिसाइड करने का बोलकर चला गया।
"ये लो आंटी गर्मा गर्म जलेबी"....... मयंक ने अंदर आकर रोमा को जलेबी पकड़ाते हुए कहा।
जिसके बाद रोमा किचन की तरफ चली गई बर्तन लाने और एक प्लेट में साक्षी के लिए भी ले आई जिसको उससे लेते हुए मयंक खुद उसके कमरे की तरफ बड गया ।
"तो क्या सोचा तुमने साक्षी"....... मयंक ने साक्षी के सामने बैठते हुए पूछा जो किताब पढ़ने में व्यस्त मालुम पड रही थी।
मयंक -"ये जलेबियां तो खा लो इनका क्या कसूर है और अभी तो दोस्त बनने में ही फायदा है क्योंकि मैं जा रहा हूं गांव कल क्योंकि छुट्टी हो चुकी हैं कोचिंग की तो अगर साथ चलना है फिर तो गुस्सा नहीं चल सकता "
"साक्षी देखो मैं तुम्हारी जैसी दोस्त नहीं खोना चाहता "......जब मयंक ने सब करके अपना लिया
तो फिर सिरियस होते हुए अपने मन की बात कही ।
साक्षी -"मैं बस इतना ही कह सकती हूं की मैं तुम्हें इस फैसले पर जोर नहीं दूंगी बाकी मेरे लिए तुम क्या हो "
मयंक -"पर इस तरह भी तुम दुखी ही रहोगी जो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा "
इस बार साक्षी ने कुछ नहीं कहा बस प्लेट में रखी जलेबियों में से एक को उठा लिया।
Tumhara aaj kal gaya bhai![]()
Hell Strom hellu mere bhoi update![]()
Aadhe se jayada likh liya hai bhai logHell Strom bhai next update kab tak aayega?
......aajkal exam ki wajah se dosto ke saath hota hoon to akele mein likhne ka time kam milta hai 