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Hello Hello !! .... My reader log kaafi time hogaya kaafi saare personal reasons ki wajah so i guess ab wapas aajana chahiye 

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Nice update....अध्याय 18
अनिल के कहे मुताबिक बल्ली ने दो आदमी रघु के यहां भेज दिए थे। पर तब ही बल्ली का एक आदमी उसके पास आया।
"बल्ली भईया ".......
"हां परम बोल "......जब उस आदमी ने बल्ली को पीछे से बुलाया तो बल्ली ने उससे मुखातिब होते हुए कहा।
"आप से एक बात कहनी थी".......
बल्ली -"हां सुन रहा हूं बता"
परम -"भाई मैने सुना है कि आपने अभी रघु के यहां अपने आदमी भेजे हैं।"
बल्ली -"हां सही सुना है आज शाम तक खतम करते हैं इस रघु को"
परम-"तो भाई अपने आदमियों को भेजने की जरूरत है ही नहीं मेरा एक दोस्त उसके साथ ही काम करता है उससे लेते हैं ना सारी जानकारी.....अब आप तो किसी नये को काम पर रखते नहीं वरना वो अपने साथ ही होता .....पर अब काम आएगा बस आप उसको जिंदा छोड देना "........परम ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
बल्ली -"अगर हमारे काम आएगा तो क्यूं मारेंगे.....लगाओ फोंन मैं बात करता हूं उससे "
उसके बाद परम ने उस आदमी से बात की सब उसको बताया और वो आदमी बल्ली को अच्छे से जानता था तो अपनी जान बचाने के लिए एकपल की देर भी ना लगी। फिर बल्ली ने उससे बात की....
आदमी -"बल्ली भईया आपको रापचिक खबर बोलता मैं ......देखो इधर फेक्ट्री पर आज सुबह ही उस्मानी ने अपने लोग भेज दिए थे क्योंकि ये उस्मानी और रघु कुछ बहुत बडा करने वाले थे उस एहलावत के साथ सीधा उसके घर पर हमला करने की सोची थी और उस लड़के का भी पता चल गया रघु को वो उसको भी अस्पताल में मारने के वास्ते लोग भेज चुका है ......तो हम फेक्ट्री पर रघु को नहीं मार सकते पर अभी एक घंटे में रघु किसी से पेमेंट लेने ****** जाएगा आप उसको उधर पकडो और जल्द से जल्द उस लडके को बचाने के वास्ते जाओ ..."
अब तक बल्ली फोन काट चुका था और अपनी रिवॉल्वर उठाकर जीप की तरफ भागा उसके साथ परम भी भागा बल्ली को भागता देख और दो लोग भी जीप में बैठ गए थे बल्ली के साथ जीप में जब परम गाडी चला रहा था...... बल्ली ने फोन उठाया और अनिल को लगाया पर घंटी जाती रही लेकिन फोन नहीं उठा
"बहनचोद!....अगर आज मयंक के साथ कुछ हुआ तो इस उस्मानी को और रघु की मां चोद दूंगा....एक तो ये अनिल भी फोन नहीं उठा रहा ".......... बल्ली ने गुस्से से कहा पर तब ही उसके फोन की घंटी बजी और फोन अनिल का ही बल्ली ने जल्दी से फोन उठाया और उसको सब बता दिया .....
"सुन बल्ली तू मयंक को छोड उस मादरचोद को पकड वैसे भी तुझे ******** पहुंचते पहुंचते 45 मिनट तो लग ही जाने हैं और मयंक के यहां मैं जाता हूं ठीक है "........सब सुनने के बाद अनिल ने बल्ली को समझाते हुए कहा।
और इतना सुनते ही बल्ली ने गाडी को ****** के रास्ते पर मुडवा लिया और वहां अनिल भी निकल चुका था मयंक को बचाने....वहीं शाम होने की वजह से मयंक और राजीव अस्पताल के पीछे बने बगीचे में घूमने आ गये थे और इस बगीचे से लगकर ही एक छोटा जगंल शुरू होता था जिसको पार करते ही इंदौर से लगा एक गांव था ।
उधर एक टवेरा गाडी अस्पताल के सामने आकर रुक चुकी थी। जिसमें बैठे लोग मरीज तो कतई ना थे।.......
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अभी मयंक और राजीव बगीचे में आए ही थे की राजीव ने मयंक से अपने प्यासे होने का जिक्र किया और चल दिया पानी की तरफ
वहीं मयंक का फोन बजा और उसने नंबर देखा तो तुरंत फोन उठाया और बात करने लगा ये वही शक्स है जिससे मयंक ने उस रात भी बात की थी जब नर्स नहीं मिली थी।
अब तक राजीव को गये हुए वक्त हुआ था और वो लोट रहा था तो अब उसके हाथ में दो आइसक्रीम कप थे और जैसे ही वो बगीचे में जाने लिए बनी सीढ़ियों पर आया तो सबसे नीचे वाली सीढ़ी पर मयंक बैठा था जो बात कर रहा था राजीव उसको आवाज़ देने ही वाला था की उसके कानों में मयंक की आवाज पडी।
"देखो जिद नहीं करते ना प्लीज अभी टाइम है मैंने सबसे चुपा कर आपको वहां भेजा है ना तो कैसे अपने पास बुला लूं......और आपको पता है आपके बारे में तो मैंने राजीव को भी नहीं बताया है.... हां वही राजीव जिसकी मैंने आपको फोटो दिखाई थी ... कुछ टाइम और फिर मेरे पास ही तो रहोगी ना आप .....ओक्के चलो बाए राजीव आ गया तो हमारा सीक्रेट खुल जाएगा।".......
और इतना कहते ही मयंक ने फोन काट दिया और सीढ़ियों से खडा हुआ और जैसे ही खडा हुआ उसको अपने पीछे किसी के खड़े होने का एहसास हुआ मुड कर देखा तो राजीव खडा था।
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बड़ी ही अनोखी गंध थी इस समय इस जगह जो अक्सर श्मशान में या उसके आसपास पाई जाती थी..... वैसे ही गंध अभी इस NH3 पर फैली हुई थी और ये हिस्सा वही था जहां कुछ देर पहले कल्लू और और उसके आदमी विष्णु को पकड़ने आए थे ।
अब इस जगह कल्लू को छोड कर बाकी उसके 9 साथी सडक के किनारे जल रहे थे । .......आप लोग भी सोच रहे होंगे ये क्या हो गया टेंशन ना लो ऐसे नहीं निवटाऊंगा चलो फिर चलते हैं आधे घंटे पीछे.......
विष्णु के तरफ का दरवाजा खुला और वो बहार आया साधारण से कुछ ज्यादा लंबाई और चौड़ाई घनी काली मूंछ और डाढी ये व्यक्ति कुछ ज्यादा ही खूंखार मालुम पडता था पर सिर्फ कुछ लोगों के लिए जैसे अभी इन दस नहीं.... नहीं.......9 लोगों के लिए क्योंकि वो कल्लू को जानता था और उसको मारने का कोई इरादा नहीं था ।
जैसे ही वो गाड़ी से उतरा और उसने उन लोगों को देखा तो एक लंबी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई सबसे पहले तो उसने अपनी आंखों पर लगे उस किले चश्मे को निकाला और उसको अपने ड्राइवर को पकडा दिया उसके बाद उसने अपने सफेद कुर्ते को थोडा ऊपर उठाया कमर पर बंधे उस बेल्ट को निकाला जिसमें रिवाल्वर रहती है वो भी निकाल कर ड्राइवर को पकडाया एक बार तो वो लोग विष्णु के पास रिवाल्वर को देख घबराए पर फिर शांत हो गये जब उसने उसको अपने पास ना रखा तो।
कल्लू और विष्णु एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे और कल्लू को विष्णु के मुंह पर सजी वो मुस्कुराहट बहुत भयभीत कर रही थी जो एक पल के लिए भी कम नहीं हुई थी।
विष्णु उन सभी लोगों की तरफ बडा जिसको देख वो लोग भी सोच में थे की आखिर कैसा आदमी है जो दस लोगों को देख भी भयभीत नहीं हो रहा था । जब वो लोग इस छोटे सदमे से उभरे तब तक विष्णु उनसे बस दो कदम दूर था । ये बिल्कुल वैसा सीन था मानो पहले किसी शेर की पूंछ पर पांव रखा हो और जब एहसास हुआ तो घबराने के अलावा कुछ बचा नहीं क्योंकि वो सब भी जानते हैं कि वो जिंदा बचने वाले नहीं हैं
ये शीन प्रकिया में ही था कि तब ही एक चूतिए को चुल हुई जिसके हाथ में एक मोटा सा बांस था। वो बिष्णु की तरफ भागा और उस आदमी को अपने तरफ आता देख एक दम से विष्णु के तेवर बदल गये और जैसे ही उस आदमी का हाथ बांस चलाने घूमा तो विष्णु का हाथ भी चला जो सीधा उस आदमी के हाथ में पडा और उस आदमी के मुंह से भयंकर चीख निकली उसका हाथ लटक गया और लाख कोशिश की उसने उठाने की पर वो हाथ दुबारा उठा ही नहीं और वो आदमी जब जब हाथ उठाने की कोशिश करता विष्णु उसके नाक और माथे के बीच में मुक्का मारता बिचारा वो आदमी हाथ उठाने की कोशिश दो बार ही कर सका क्योंकि दो मुक्के उसके होश भागाने के लिए काफी थे।
"चटाक्कककक ".......वो आदमी नीचे गिरा ही था कि एक और आ गया जिसको विष्णु ने कुछ करने का मोका तक नहीं बल्कि खुद आगे बड कर एक भयंकर थप्पड़ उसके गाल पर दिया पर विष्णु का हाथ इतना बडा था की उसके हाथ का असर उस आदमी के गालों के साथ साथ कानों को भी सुन्न कर चुका था बिचारा एक थप्पड़ से उभर पाता उससे पहले तीन और थप्पड़ उसके पड चुके थे जब विष्णु के हाथ पर उस आदमी का खून लगा जो उसके कां से निकल रहा था तब थप्पड़ रोके और एक लात सीधे उसके छाती में पडी जिससे वो आदमी तीन फुट पीछे जा गिरा।
अब दो आदमी एक साथ आए जिसमें एक के हाथ में तलवार थी वहीं आगे था और जैसे ही उसने तलवार घुमाई विष्णु नीचे झुका और आगे बढ़ते हुए दूसरे की छाती में लात दी और जैसे ही पहले वाली की तरफ घूमा तो तलवार सीधे उसके पेट को निशाना बनाते हुए आई जिसको हड़बड़ाहट में विष्णु ने हाथ ही पकड लिया तलवार तो रुक गई पर विष्णु का पूरा हाथ कट गया अब विष्णु को गुस्सा आया और झटके के साथ उस तलवार को खींचा और तलवार विष्णु के हाथ में आते ही चली और उस आदमी की गर्दन एक तरफ को लटक गई।
"भोसडीके जब चलानी आती नहीं तो लाते क्यूं हो ......जय हो भवानी मा* की "...... पहले तो लात से उस अधकटी गर्दन वाली लाश को पांव से हटाया और तलवार को माथे से लगाते हुए उन बचे आदमियों की तरफ बढा उसके बाद बस तलवार चली और किसी की आंतें बहार आई तो किसी की नसें एक की तो गर्दन ही उसके धड से अलग हो चुकी थी और उसके धड से खून ऐसे निकल रहा था मानो फब्बरा पानी को ऊपर तक उछाल देता है।
जब विष्णु रुका तो उसका सफेद कुर्ते कहीं से भी सफेद नहीं लग रहा था जगह जगह खून यहां तक उसके चेहरे पर भी खून लगा था जो मंजर को हद से ज्यादा खौफनाक बना रहा था। जब विष्णु को कल्लू का ध्यान आया और उसको आसपास देखा तो रोड किनारे बीहड में भागता हुआ पाया ।
"अरे कलुआ सुनतो !!!"...... कल्लू को रोकने के उद्देश्य से विष्णु चिल्लाया जिसपर वो रुका और विष्णु की तरफ घूमा और ये देखते ही विष्णु एक बार फिर मुस्कुराया
"आज बड़े भाई के पैर ना छुऐ तने .....यो अच्छे लक्षण कोंणया छोरे"......ये बोलते हुए विष्णु कल्लू की तरफ बडा तो वो भी पीछे हो गया (अपने शुरुआती दिन बिष्णु ने राजस्थान में बिताए थे। तो कभी कभी वो बोली भी वैसी ही रखता था)
"दूर रहो भाईसा मेरे पास ना आओ वहां से बोलो जो बोलना है".... कल्लू ने पीछे होते हुए बोला।
"बेटा तूने भाईसा नहीं बोला होता तो आज जिंदा ना जाता .....जा .जा द्ददा को रा*-रा* कहना मेरा "....... मुस्कुराते हुए विष्णु ने कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बडा तब ही एक गाडी वहां आ चुकी थी जो विष्णु के ड्राइवर ने बुलाई थी ।
अभी आए आदमियों को मरे हुए आदमियों का सफाया करने का कहते हुए विष्णु ने अपने कपड़े बदले मुंह धोया और एक बार फिर अपनी एंबेसडर ग्रेंड में बैठ कर अपनी मंजिल कि ओर बड चला जो राजस्थान का एक शहर ही था।
विष्णु के आदमियों ने पहले लाशों को सडक किनारे उगे उन सूखे पौधों में फेंका और पौधों समेत जला दिया सडक पर डले खून को छुपाने के लिए कुछ तसले मिट्टी उस जगह पर डाली और वो लोग भी लौट गये ......
अगर विष्णु इन लाशों को ठिकाने ना लगबाता फिर भी राहगीर इन लाशों को नजरंदाज कर आगे बढ़ने वाले थे क्योंकि 1910 से 2010 तक इस जगह का खौफ इतना था की लोग पेट्रोल से ज्यादा अपनी जान कीमती समझते थे और इन शहरों ना होकर बाइपास के द्वारा राजस्थान या यूपी से जाना पसंद करते थे।.....
Agla update shayad aapki aankhon mein aanshu naamak paani laane waala hai....
अध्याय - 05
"भाई मुझे लग रहा है की कल से तुझे अकेला आना पडेगा".... मैंने राजीव के साथ कोचिंग में घुसते हुए कहा ...घर से निकलने के बाद हम बात करते करते हुए आए थे जिसमें राजीव ने बताया था की उनके टेलीफोन पर पापा का फोन आया था और उन्होंने मुझे फोन लेनी की सलाह दी है और भी बहुत बाते हुई और बात खत्म होने के बाद कोचिंग में घुसते हुए यह बात मैंने कही।
राजीव-"क्यूं भाई ऐसा क्यूं भला ? "
मयंक - "वो आंटी ने कहा है कि अंकल की कोई बाइक रखी है उसको यूस करना है मुझे और .....तुझे पता है?... वो कल वाली लडकी वो अंकल की ही लडकी है और उसका नाम साक्षी है तो अब चूंकि मैं उधर से ही आता हूं तो क्या पता आंटी उसको मेरे साथ ही भेजा करें।"
राजीव - "क्या !.....वो अंकल की लडकी है।"...... मैंने अपनी गर्दन हां में हिला दी।
मयंक -"टेंशन मत ले कुछ करुंगा.... मैं उस चुड़ैल के साथ नहीं आ सकता वैसे भी।"
अब तक हम क्लास में आ चुके थे और आज हम 10 मिनट पहले ही आ गए मैं और राजीव एक टेबल पर बैठे अभी हमें क्लास में बैठे हुए कुछ ही समय हुआ होगा की मेरी नजर गेट की तरफ गई एक बहुत ही खूबसूरत लडकी कुर्ते और जीन्स में अंदर आई और और जिस चीज की वजह से मेरी आंखें उस जम गई थी वो थी उसकी आंखें जिनका रंग नीला था और उसकी नथुनी (nose pin) उसके चहरे की हया को और बढ़ा रही थी।
और तब ही उसके पीछे से आई साक्षी और जो मैं प्यार की नदी में गोते खा रहा था एक दम से रेगिस्तान में पहुंच गया।.... यहां तक भी ठीक था पर साक्षी ने उस लडकी के कन्धे पर हाथ रखा और दोनों ही हमारी तरफ आने लगी ..... वैसे तो मुझे क्या ही मतलब था दोनों से पर पता नहीं क्यूं साक्षी सीधे मेरे सामने आकर रुकी मैंने नही उठाई अपनी गर्दन ऊपर मुझे पता था अभी बोलने लगेगी घूर क्यूं रहा है अब बन्दा करे भी तो क्या ....
"ये लो ....मम्मी ने दिया था ...घर से तो ऐसे भाग कर आए जैसे कोई पकड लेता तुम्हें ".......मेरे सामने लंच बॉक्स रखते हुए साक्षी ने कहा।
मयंक - "मैं क्यूं भागुंगा भला ....वो तो बस याद नहीं रहा ये ".... मैंने लंचबॉक्स बैग में रखते हुए कहा।
साक्षी - "हां वो तो अब भी दिख रहा है....फट्टू ! "
उसकी इस बात पर वो लडकी मुस्कुराई और मेरा दोस्त तो ऐसे हसा मानो रावण हो .....वो लडकी इतनी खूबसूरत लग रही थी की मैं तो बस उसको ही देख रहा था फिर एक दम से मेरी बाईं जांग पर ऐसा एहसास हुआ मानो कोई नुकीली चीज चुभी हो।
मैंने ने देखा तो राजीव नोंच रहा था और जब मैंने गुस्से से उसको देखा तो उसने सामने देखने का इशारा किया मैंने सामने देखा तो एक बार फिर साक्षी और और उसकी गुस्से वाली आंखें जब लडकी की तरफ देखा तो वो दूसरी तरफ देख कर हस रही थी।
"हेलो साक्षी..... राजीव"...... राजीव ने हाथ आगे बढ़ाते हुए साक्षी से कहा।
साक्षी -"हेलो राजीव.... तुम अनिल अंकल के लडके हो ना ?"
राजीव ने मुस्कुराते हुए हां में गर्दन हिलाई।
राजीव ने उस लडकी तरफ भी हाथ बढ़ाया और उसने भी हाथ बढ़ाते हुए अपना नाम बताया "इफ्तिका मिर्जा".....
अभी मैं भी अपना परिचय देने की सोच ही रहा था की टीचर आ गए
और हम सड भी सतर्क हो कर बैठ गए वो दोनों भी भी हमारे आगे वाली टेवल पर ही बैठ गईं।
.....................
क्लासेस खत्म करके हम लोग सीधे मोबाइल की दुकान पर पहुंचे वहां से नोकिया 6600 लिया सिम को चालू होने में लगभग तीन दिन लग जाने थे परन्तु हमारे पिताजी ने मुझे घर पर ही एक रिलाइंस कि जीएसएम सिम पकडा दी थी फिर भी मैंने एक न्यू सिम खरीद ली और सीधे घर पहुंचे साक्षी इफ्तिका की स्कूटी से उसके साथ चली गई .....जब हम पहुंचे तो आंटी ने पानी दिया और उसके बाद मैंने राजीव से गैराज में चलने को कहा .... वैसे में भी काफी उत्साहित था क्योंकि अपने घर पर भी मैं हमेशा अपनी बाइक को चमका कर रखता था और वैसे भी एक लडके का सच्चा प्यार किसी ने पाया है तो वो गाड़ियां और मोटर बाइक्स ही हैं।
गार्डन से होते हुए जब हम पीछे पहुंचे तो पीछे टीन सेड लगा हुआ था और वहां काफी जगह थी उधर ही एक ओर अंकल की बाईक खडी थी हालांकि की वो कबर से ढकी हुई थी फिर भी मैंने उसको देखते ही पहचान लिया और इसका कारण था यही बाइक मेरे पास थी और मेरी पर्सनल फेवरेट राॅयल इनफील्ड......जब मैंने उस पर से कपडा उठाया तो मेरी खुशी दुगनी हो गई क्योंकि मेरे सामने एक विनटेज ब्यूटी खडी थी।....मेरी बाइक 2000 माॅडल थी जबकी अंकल वाली बाइक थी 1989 माॅडल और मेरा ऐसा मानना है वाइन और राॅयल इनफील्ड दोनो एक जैसी है जितनी पुरानी उतनी ही दमदार।......
मैंने पहले उसको चेक किया सब कुछ एक दम सही था और यह पता चलते ही राजीव भी अपने घर हो लिया क्योंकि राजीव को लाने का मुख्य कारण यही था की अगर बाइक खराब हुई तो मैं अकले थोडी खींचने वाला था उसको मिस्त्री के यहां तक.....
राजीव के जाने के अगले 1:30 घंटे तक मैंने वहीं लगे नल और पाइप की सहायता से उस बाइक को चमका दिया और उसका मैरून रंग चमकने लगा।..... मैंने अपने कपड़े भी चेंज नहीं किये थे और इस वजह से मेरी सर्ट भी गंदी हो गई थी खैर बाइक को रखने के बाद में अंदर आया तो आंटी किसी से बात कर रही थी तो मैं सीधे अपने कमरे में गया एक लोवर और टी-शर्ट पहनी पर वो 44 साइज की टीसर्ट मेरे कंधों और चेस्ट पर बहुत टाईट आ रही थी और इस वजह से मुझे यह भी याद आया की मुझे कपड़े भी लेने हैं.....
मैं अपनी सर्ट लेकर नीचे आया तो आंटी लिविंग एरिया में कही नहीं थी मुझे लगा शायद बहार होंगी या रुम में होंगी तो मैं नजर अंदाज करते हुए सीधे बाथरूम ऐरिया में चल दिया जो की नीचे वाले फ्लोर पर एक काॅमन ऐरिया था कपडा धोने और नाहने के लिए।
(ladkiyon se jayada bike ka description dene ke liye sorry)
Katai jeher update Hell bhaiUpdate -06
जैसे ही मैं बाथरूम के पास पहुंचा तो देखा गेट हलका खुला है और अंदर आंटी है..... मैंने अंदर देखा तो आंटी अपनी ब्रा पहन रही थी और उनके स्तन नंगे थे एक पल के लिए तो लगा जैसे क्या देख लिया यह पहली बार था की मैं किसी को ऐसी हालत में देख रहा था मेरे शरीर में अजीब सी एक लहर दौड गई और मेरी नजर जब थोडा नीचे गई तो मेरा लंड लोवर को फाड देगा ऐसा लग रहा था पेटीकोट में आंटी की गांड इतनी कामुक लग रही थी ....की शायद उसको बिना कपड़े के देखता वो भी कम लगती.....उनके नितम्ब इतने उन्नत आकार में थे कि मेरा दिल रेलगाड़ी के जैसे दौड़ने लगा।
अब तक आंटी ब्रा पहन चुकी थी और साडी पहने लगी थी। मैंने वहां से हटना ठीक समझा और वापस लिविंग एरिया में आ गया। कुछ देर बाद आंटी आईं और पता नहीं क्यूं मैं उनसे नजर नहीं मिला पा रहा था ऐसा लग रहा था जैसे मैंने अगर आंटी को देखा तो आंटी को पता चल जाएगा की मैं उनको अभी कुछ देर पहले देख रहा था।
फिर यूं ही थोडा बहुत बातचीत हुई और जब शाम हुई तो साक्षी भी घर आ गई। और रात तक अंकल भी लौट आए थे दूसरी सिटी से जिकी वजह मुझे पता चली की वीकेंड पर वो घर आ जाया करते थे और अगले दिन वापस चले जाया करते थे वैसे तो अंकल को सुबह ही घर आ जाना था पर शायद वो कुछ काम में फस गए इसलिए इस शहर में तो लौट आए पर घर शाम तक आ सके थे।
"मयंक जरा ये सामान ले आओगे "..... आंटी ने सामान की लिस्ट मुझे पकडाते हुए कहा।......
मयंक.......हां जरुर आंटी ....पर वो...वो मैने दुकान नहीं देखी
आंटी...... ठीक है तो ये चले जाएंगे तुम्हारे साथ....इस बहाने तुम शहर को पहचान लोगे।
"पापा को रहने दो मम्मी .... मैं चली जाती हूं इसी बहाने बाइक पर थोडा घूम लूंगी पापा के साथ कब बैठी थी याद भी नहीं"...... साक्षी ने खड़े होते हुए कहा।
आंटी...... ठीक है बेटा ।
मयंक......पर आंटी बाइक की क्या जरूरत है थोडा ही सामान है घूमते हुए ले आएंगे।
साक्षी........हेलो! मिस्टर मार्केट यहां से 7 km दूर है।
मयंक......हां तो क्या हुआ?
"हाहहाआ ..... बेटा ये बस सुबह ही अपने शरीर को कष्ट पहुंचा सकती फिर पूरे दिन हिल्ती भी नहीं है.... मैं तो ये सोच रही हूं ये बाजार जाने तैयार कैसे हुई और वैसे भी सामान का वजन भी होगा और दूर भी है तो बाइक ले जाओ।"
मयंक गर्दन हां में हिलाता हुआ बाइक निकालने चला गया पर साक्षी अब अपनी मां को झूठे गुस्से से देख रही थी । रोमा जी ने भी किचन में जाते जाते एक प्यार से थप्पड़ उसके सर पर जड दिया ।
साक्षी भी बाहर निकली तो मयंक बाइक बहार निकाल चुका था।और उसका ही इंतजार कर रहा था ।
"तुम क्या गूंगे हो कुछ बोलते क्यूं नहीं....या मुझसे ही बात नहीं करते सिर्फ"...... मयंक ने चौराहे से गाडी मैंन रोड की तरफ मोडी तो साक्षी ने सवाल किया
मयंक......"ऐसा नहीं है साक्षी जी".....आज पहली बार मैंने साक्षी का नाम पहली बार लिया था।
साक्षी.......फिर कैसा है बताओ जरा... कहीं पहले दिन वाली डांट की वजह से तो नहीं डर रहे टेंशन मत लो मारुंगी नहीं तुम्हें हाह्हाह।
मयंक.... नहीं! मैं क्यूं डरुंगा भला ।
साक्षी....... तुम्हारे घर पर कौन कौन है।
मयंक......मां,पापा, मैं और दादी ।
साक्षी.....वैसे कितनी गर्लफ्रेंड है तुम्हारी?....और सच सच बताना ।
मयंक....... मैं झूठ क्यों बोलुंगा एक भी गर्लफ्रेंड नहीं है मेरी तो।
साक्षी.......तुम झूठ बोल रहे हो राइट!
मयंक...... नहीं मैं तो सच ही कह रहा हूं....आपका कोई बाॅयफ्रेड है?
साक्षी.......मेरा कोई बाॅयफ्रेड नहीं है क्यूं पूछ रहे हो।
मयंक......अब देखिए साक्षी जी जब आप इतनी सुंदर है फिर भी आपका कोई बाॅयफ्रेड नहीं है फिर मेरी गर्लफ्रेंड होना तो ना मुमकिन है।
साक्षी...... पहले तो ये जी कहना बंद करो तारीफ भी अच्छी नही लगती
मयंक.....पर मैं आपकी तारीफ थोडे ही कर रहा था वो तो बस आपको समझाने के लिए कहा था।
साक्षी ने इस बात पर कुछ नहीं कहा एक मोड लेते ही अब तक दोनो आ चुके थे मार्केट......वहीं साक्षी ने दो सामान का नाम बताते हुए मयंक को एक दूसरी दुकान की तरफ इशारा किया जो 7-8 दुकान दूर थी साक्षी से और खुद भी एक बडी सी दुकान में गुस गई
जब साक्षी दुकान में भीतर जा रही थी तो एक 28 साल के आसपास का लडका दुकान में पहले ही खडा था और वो बिल्कुल रास्ते में खडा था । जब साक्षी भीतर जाने लगी फिर भी वो साइड से नहीं हुआ बल्कि और ज्यादा फैल कर खडा हो गया और उसके मुंह से हल्की शराब की बदबू भी आ रही थी । जो कि साक्षी को दूर से ही पता णल गया क्योंकि जो व्यक्ति शराब को छूता तक ना हो या कभी शराबी को देखा ना हो तो वह जल्दी जान लेता है शराबी को ।
साक्षी.......जरा साइड हो जाइए भाईसाहब मुझे अंदर जाने दीजिए।
आदमी......"निकल जाओ भला मैंने कौंन सा तुम्हारे हाथ पकड रखे हैं पर आप कहें तो पकब जरूर सकता हुं।" .......उस लडके ने अपनी बत्तीसी दिखाते हुए कहा।
साक्षी...... क्यूं थप्पड़ खाने बाले काम कर रहे हो शांति से हट जाओ
दुकानदार......"अरे सही तो कह रही है बेटी.... तुम थोडा रास्ते से हटो भाई ऐसे खडे हो जाओगे तो प्राब्लम तो होगी ही।".... दुकानदार ने बीच में आते हुए कहा ।
आदमी....तू अपना धंधा देख मेरे बीच में ना आ नहीं तो कुछ देर में तू भी इसके साथ नं्ग्गा हो जाए्ग्......
जब तक उस आदमी की बात पूरी होती उससे पहले ही साक्षी ने एक जोर दार तमाचा उसके गाल पर रशीद कर दिया।
और उस आदमी ने गुस्से देखा और जैसे ही साक्षी की तरफ अपना हाथ घुमाया तो बीच में ही उसका हाथ रुक गया ।
और उसने जब देखा तो उससे एक हाथ उंचा एक लडका उसको पकडे हुए था।
मयंक..... भाईसाहब लडकी पर हाथ क्यूं उठा रहे हो....अगर उसकी कोई गल्ती है तो वो माफी मांग लेगी और अगर आपकी है तो फिर आप तैयार हो जाओ मांफी मांगने के लिए।
"साले तू है कौन और हमारे बीच में क्यूं आ रहा है इसने पहले मुझ पर हाथ उठाया ... मैंने सिर्फ इतना ही तो कहा था की इसको नंगा करूंगा और अगर ज्यादा हमदर्दी हो रही है तो इसकी मां..."
"चट्ट्टटाक्क््क".....एक जोर दार थप्पड़ उस आदमी के गालों पर पडा ।
मयंक..... "फिर तो गल्ती आपकी ही थी ..... चुपचाप यहां से निकल लो नहीं तो आप थक जाओगे मार खाते खाते मैं नहीं थकु़ंगा मारते मारते "
मयंक ने उस आदमी को खडा करते हुए कहा उसके मुंह से खून निकलने लगा था अबतक और वो भी अपने मुंह पर हाथ रखता हुआ दुकान से बहार आया।
मयंक...."साक्षी जी यह सामान उस दुकान पर नहीं मिला और कोई दुकान है तो वहीं चलते हैं जब तक आप वो लिस्ट अंकल को दे दीजिए।"
साक्षी ने भी शांति से अपनी गर्दन हिलाई और उस पर्चे को दुकान दार को दिया उसके बाद दोनों बहार आए और जैसे ही मयंक की नजर उस दिशा में गई जिस ओर वो आदमी गया था तो उसने देखा की रोड पर एक टाटा सूमो खडी है और वो आदमी उस गाड़ी के ड्राइवर से कुछ कह रहा है जिसके बाद पीछे के गेट खुले और उसमें से आदमी निकल कर उसकी चोट देखने लगे।
"साक्षी जी हम जिस दुकान पर जा रहे हैं वो कितनी दूर है वैसे".. मयंक ने स्थिति को समझते हुए पूछा।
साक्षी....इसके पीछे वाली गली में ही है।
मयंक.... ठीक है तो आप ले आओ मैं यहां खडा रहता हूं बाइक भी यही खडी और सामान भी देख लुंगा कहीं खराब रख दिया दुकान वाले ने तो।
साक्षी ने एक बारी घूर कर देखा मयंक को "अभी तो ऐसे बचा रहा था जैसे बहुत परवाह हो और अब थोडा साथ भी नहीं चला जा रहा"
मन में साक्षी ने मयंक से कहा पर बिना कुछ कहे आगे बड गई।
जब मयंक ने देख लिया की साक्षी जा चुकी है तो वो भी उन आदमियों की तरफ चल दिया जो खुद उस दुकान वाली गली में आ चुके थे मैंने से ।
"भाई सहाब मैंने तो सोचा था आप समझ जाओगे पर आप तो बड़े बेशर्म मालुम पडते हो जो अब अपने भाइयों को भी मार खाने ले आए "..... मयंक ने उस पहले वाले आदमी को देखते हुए कहा।
"वो तो अभी पता चल जाएगा कौन मार खाएगा और कौन देगा ".....उन सब में से जो सबसे बडा दिख रहा था उसने आगे आते हुए कहा।
मयंक...."हम्ममम कह तो सही रहे हो आप अभी पता चल जाएगा"
मयंक ने अपनी कमर से एक छोटी सी पिस्टल निकाली जिसे पाॅकेट पिस्टल भी कहा जाता है जिसे देखकर वो आदमी जो आगे आया था रुक गया
"अरे आप रुक क्यों गए टेंशन मत लो इसका इस्तेमाल नहीं करूंगा मैंने तो पापा से मना भी की थी देने के लिए पर वो माने नही फिर मैंने भी ले ही ली क्योंकि मैंने भी पाॅकेट पिस्टल पहली बार देखी थी ना इसलिए... वैसे भी मैं खुद सोच रहा था की यहां आए इतने दिन हो गए लेकिन मेरी मार देनी प्रेकटिस नहीं हुई सच कह रहा हूं बड़े भाई अपने शहर में होता तो अब तक तो तीन चार बार हाथ खुल गए होते "
आदमी...."तुम क्या समझते हो की इससे डरा लोगे अभी पुलिस को बुलाया तो तुम और यह अवैध बंदूक दोनो थाने में जाओगे "
मयंक....."बुलाओ बुलाओ मैं तो देख लुंगा पर आपका यह भाई तो जाएगा ही जाएगा लडकी को छेड़ने के मामले में हाहाह"
अब उन सब आदमियों ने एक साथ उस मार खाए हुए व्यक्ति को देखा।
1st आदमी...."साले तू तो कह रहा था की तुझसे लडाई हुई तू तो तो खुद लडकी छेड रहा था इसलिए मार पडी "
2nd आदमी......"देख भाई हम तेरे दोस्त है पर गलत चीज में साथ नहीं देंगे ".....और मयंक की तरफ हाथ जोडते हुए..."भाई माफ करना गलती हमारी है हमें झगडे की वजह पूछनी चाहिए थी "
और सब ने उस नशेड़ी को दो चार बातें सुनाई और वापस ले गए उसको। मयंक ने भी उस दुकान की तरफ रुक किया ।
"मुझे बंदूक नहीं निकालनी थी ....कम से कम मार देने का मौका तो मिलता अब पता नहीं वो लोग नौटंकी कर रहे थे या सच में उनको पता नहीं था की उनके साथी ने लडकी को परेशान किया "... मयंक ने सामान लेते हुए अपने आप से कहा।
"चलें"..... मयंक के कानों में जानी पहचानी आवाज पड़ी तो देखा साक्षी सामान ले आई थी तो उसने भी बाइक स्टार्ट की और वापस चल दिया।
पर इस बार साक्षी ने एक शब्द भी नहीं कहा था पूरे रास्ते भर और मयंक तो कहता ही क्या वो मौत से फ्लर्ट कर सकता है पर लडकी से बात करने में फट ती है।
अध्याय 18
अनिल के कहे मुताबिक बल्ली ने दो आदमी रघु के यहां भेज दिए थे। पर तब ही बल्ली का एक आदमी उसके पास आया।
"बल्ली भईया ".......
"हां परम बोल "......जब उस आदमी ने बल्ली को पीछे से बुलाया तो बल्ली ने उससे मुखातिब होते हुए कहा।
"आप से एक बात कहनी थी".......
बल्ली -"हां सुन रहा हूं बता"
परम -"भाई मैने सुना है कि आपने अभी रघु के यहां अपने आदमी भेजे हैं।"
बल्ली -"हां सही सुना है आज शाम तक खतम करते हैं इस रघु को"
परम-"तो भाई अपने आदमियों को भेजने की जरूरत है ही नहीं मेरा एक दोस्त उसके साथ ही काम करता है उससे लेते हैं ना सारी जानकारी.....अब आप तो किसी नये को काम पर रखते नहीं वरना वो अपने साथ ही होता .....पर अब काम आएगा बस आप उसको जिंदा छोड देना "........परम ने हाथ जोड़ते हुए कहा।
बल्ली -"अगर हमारे काम आएगा तो क्यूं मारेंगे.....लगाओ फोंन मैं बात करता हूं उससे "
उसके बाद परम ने उस आदमी से बात की सब उसको बताया और वो आदमी बल्ली को अच्छे से जानता था तो अपनी जान बचाने के लिए एकपल की देर भी ना लगी। फिर बल्ली ने उससे बात की....
आदमी -"बल्ली भईया आपको रापचिक खबर बोलता मैं ......देखो इधर फेक्ट्री पर आज सुबह ही उस्मानी ने अपने लोग भेज दिए थे क्योंकि ये उस्मानी और रघु कुछ बहुत बडा करने वाले थे उस एहलावत के साथ सीधा उसके घर पर हमला करने की सोची थी और उस लड़के का भी पता चल गया रघु को वो उसको भी अस्पताल में मारने के वास्ते लोग भेज चुका है ......तो हम फेक्ट्री पर रघु को नहीं मार सकते पर अभी एक घंटे में रघु किसी से पेमेंट लेने ****** जाएगा आप उसको उधर पकडो और जल्द से जल्द उस लडके को बचाने के वास्ते जाओ ..."
अब तक बल्ली फोन काट चुका था और अपनी रिवॉल्वर उठाकर जीप की तरफ भागा उसके साथ परम भी भागा बल्ली को भागता देख और दो लोग भी जीप में बैठ गए थे बल्ली के साथ जीप में जब परम गाडी चला रहा था...... बल्ली ने फोन उठाया और अनिल को लगाया पर घंटी जाती रही लेकिन फोन नहीं उठा
"बहनचोद!....अगर आज मयंक के साथ कुछ हुआ तो इस उस्मानी को और रघु की मां चोद दूंगा....एक तो ये अनिल भी फोन नहीं उठा रहा ".......... बल्ली ने गुस्से से कहा पर तब ही उसके फोन की घंटी बजी और फोन अनिल का ही बल्ली ने जल्दी से फोन उठाया और उसको सब बता दिया .....
"सुन बल्ली तू मयंक को छोड उस मादरचोद को पकड वैसे भी तुझे ******** पहुंचते पहुंचते 45 मिनट तो लग ही जाने हैं और मयंक के यहां मैं जाता हूं ठीक है "........सब सुनने के बाद अनिल ने बल्ली को समझाते हुए कहा।
और इतना सुनते ही बल्ली ने गाडी को ****** के रास्ते पर मुडवा लिया और वहां अनिल भी निकल चुका था मयंक को बचाने....वहीं शाम होने की वजह से मयंक और राजीव अस्पताल के पीछे बने बगीचे में घूमने आ गये थे और इस बगीचे से लगकर ही एक छोटा जगंल शुरू होता था जिसको पार करते ही इंदौर से लगा एक गांव था ।
उधर एक टवेरा गाडी अस्पताल के सामने आकर रुक चुकी थी। जिसमें बैठे लोग मरीज तो कतई ना थे।.......
************
अभी मयंक और राजीव बगीचे में आए ही थे की राजीव ने मयंक से अपने प्यासे होने का जिक्र किया और चल दिया पानी की तरफ
वहीं मयंक का फोन बजा और उसने नंबर देखा तो तुरंत फोन उठाया और बात करने लगा ये वही शक्स है जिससे मयंक ने उस रात भी बात की थी जब नर्स नहीं मिली थी।
अब तक राजीव को गये हुए वक्त हुआ था और वो लोट रहा था तो अब उसके हाथ में दो आइसक्रीम कप थे और जैसे ही वो बगीचे में जाने लिए बनी सीढ़ियों पर आया तो सबसे नीचे वाली सीढ़ी पर मयंक बैठा था जो बात कर रहा था राजीव उसको आवाज़ देने ही वाला था की उसके कानों में मयंक की आवाज पडी।
"देखो जिद नहीं करते ना प्लीज अभी टाइम है मैंने सबसे चुपा कर आपको वहां भेजा है ना तो कैसे अपने पास बुला लूं......और आपको पता है आपके बारे में तो मैंने राजीव को भी नहीं बताया है.... हां वही राजीव जिसकी मैंने आपको फोटो दिखाई थी ... कुछ टाइम और फिर मेरे पास ही तो रहोगी ना आप .....ओक्के चलो बाए राजीव आ गया तो हमारा सीक्रेट खुल जाएगा।".......
और इतना कहते ही मयंक ने फोन काट दिया और सीढ़ियों से खडा हुआ और जैसे ही खडा हुआ उसको अपने पीछे किसी के खड़े होने का एहसास हुआ मुड कर देखा तो राजीव खडा था।
*************
बड़ी ही अनोखी गंध थी इस समय इस जगह जो अक्सर श्मशान में या उसके आसपास पाई जाती थी..... वैसे ही गंध अभी इस NH3 पर फैली हुई थी और ये हिस्सा वही था जहां कुछ देर पहले कल्लू और और उसके आदमी विष्णु को पकड़ने आए थे ।
अब इस जगह कल्लू को छोड कर बाकी उसके 9 साथी सडक के किनारे जल रहे थे । .......आप लोग भी सोच रहे होंगे ये क्या हो गया टेंशन ना लो ऐसे नहीं निवटाऊंगा चलो फिर चलते हैं आधे घंटे पीछे.......
विष्णु के तरफ का दरवाजा खुला और वो बहार आया साधारण से कुछ ज्यादा लंबाई और चौड़ाई घनी काली मूंछ और डाढी ये व्यक्ति कुछ ज्यादा ही खूंखार मालुम पडता था पर सिर्फ कुछ लोगों के लिए जैसे अभी इन दस नहीं.... नहीं.......9 लोगों के लिए क्योंकि वो कल्लू को जानता था और उसको मारने का कोई इरादा नहीं था ।
जैसे ही वो गाड़ी से उतरा और उसने उन लोगों को देखा तो एक लंबी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई सबसे पहले तो उसने अपनी आंखों पर लगे उस किले चश्मे को निकाला और उसको अपने ड्राइवर को पकडा दिया उसके बाद उसने अपने सफेद कुर्ते को थोडा ऊपर उठाया कमर पर बंधे उस बेल्ट को निकाला जिसमें रिवाल्वर रहती है वो भी निकाल कर ड्राइवर को पकडाया एक बार तो वो लोग विष्णु के पास रिवाल्वर को देख घबराए पर फिर शांत हो गये जब उसने उसको अपने पास ना रखा तो।
कल्लू और विष्णु एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे और कल्लू को विष्णु के मुंह पर सजी वो मुस्कुराहट बहुत भयभीत कर रही थी जो एक पल के लिए भी कम नहीं हुई थी।
विष्णु उन सभी लोगों की तरफ बडा जिसको देख वो लोग भी सोच में थे की आखिर कैसा आदमी है जो दस लोगों को देख भी भयभीत नहीं हो रहा था । जब वो लोग इस छोटे सदमे से उभरे तब तक विष्णु उनसे बस दो कदम दूर था । ये बिल्कुल वैसा सीन था मानो पहले किसी शेर की पूंछ पर पांव रखा हो और जब एहसास हुआ तो घबराने के अलावा कुछ बचा नहीं क्योंकि वो सब भी जानते हैं कि वो जिंदा बचने वाले नहीं हैं
ये शीन प्रकिया में ही था कि तब ही एक चूतिए को चुल हुई जिसके हाथ में एक मोटा सा बांस था। वो बिष्णु की तरफ भागा और उस आदमी को अपने तरफ आता देख एक दम से विष्णु के तेवर बदल गये और जैसे ही उस आदमी का हाथ बांस चलाने घूमा तो विष्णु का हाथ भी चला जो सीधा उस आदमी के हाथ में पडा और उस आदमी के मुंह से भयंकर चीख निकली उसका हाथ लटक गया और लाख कोशिश की उसने उठाने की पर वो हाथ दुबारा उठा ही नहीं और वो आदमी जब जब हाथ उठाने की कोशिश करता विष्णु उसके नाक और माथे के बीच में मुक्का मारता बिचारा वो आदमी हाथ उठाने की कोशिश दो बार ही कर सका क्योंकि दो मुक्के उसके होश भागाने के लिए काफी थे।
"चटाक्कककक ".......वो आदमी नीचे गिरा ही था कि एक और आ गया जिसको विष्णु ने कुछ करने का मोका तक नहीं बल्कि खुद आगे बड कर एक भयंकर थप्पड़ उसके गाल पर दिया पर विष्णु का हाथ इतना बडा था की उसके हाथ का असर उस आदमी के गालों के साथ साथ कानों को भी सुन्न कर चुका था बिचारा एक थप्पड़ से उभर पाता उससे पहले तीन और थप्पड़ उसके पड चुके थे जब विष्णु के हाथ पर उस आदमी का खून लगा जो उसके कां से निकल रहा था तब थप्पड़ रोके और एक लात सीधे उसके छाती में पडी जिससे वो आदमी तीन फुट पीछे जा गिरा।
अब दो आदमी एक साथ आए जिसमें एक के हाथ में तलवार थी वहीं आगे था और जैसे ही उसने तलवार घुमाई विष्णु नीचे झुका और आगे बढ़ते हुए दूसरे की छाती में लात दी और जैसे ही पहले वाली की तरफ घूमा तो तलवार सीधे उसके पेट को निशाना बनाते हुए आई जिसको हड़बड़ाहट में विष्णु ने हाथ ही पकड लिया तलवार तो रुक गई पर विष्णु का पूरा हाथ कट गया अब विष्णु को गुस्सा आया और झटके के साथ उस तलवार को खींचा और तलवार विष्णु के हाथ में आते ही चली और उस आदमी की गर्दन एक तरफ को लटक गई।
"भोसडीके जब चलानी आती नहीं तो लाते क्यूं हो ......जय हो भवानी मा* की "...... पहले तो लात से उस अधकटी गर्दन वाली लाश को पांव से हटाया और तलवार को माथे से लगाते हुए उन बचे आदमियों की तरफ बढा उसके बाद बस तलवार चली और किसी की आंतें बहार आई तो किसी की नसें एक की तो गर्दन ही उसके धड से अलग हो चुकी थी और उसके धड से खून ऐसे निकल रहा था मानो फब्बरा पानी को ऊपर तक उछाल देता है।
जब विष्णु रुका तो उसका सफेद कुर्ते कहीं से भी सफेद नहीं लग रहा था जगह जगह खून यहां तक उसके चेहरे पर भी खून लगा था जो मंजर को हद से ज्यादा खौफनाक बना रहा था। जब विष्णु को कल्लू का ध्यान आया और उसको आसपास देखा तो रोड किनारे बीहड में भागता हुआ पाया ।
"अरे कलुआ सुनतो !!!"...... कल्लू को रोकने के उद्देश्य से विष्णु चिल्लाया जिसपर वो रुका और विष्णु की तरफ घूमा और ये देखते ही विष्णु एक बार फिर मुस्कुराया
"आज बड़े भाई के पैर ना छुऐ तने .....यो अच्छे लक्षण कोंणया छोरे"......ये बोलते हुए विष्णु कल्लू की तरफ बडा तो वो भी पीछे हो गया (अपने शुरुआती दिन बिष्णु ने राजस्थान में बिताए थे। तो कभी कभी वो बोली भी वैसी ही रखता था)
"दूर रहो भाईसा मेरे पास ना आओ वहां से बोलो जो बोलना है".... कल्लू ने पीछे होते हुए बोला।
"बेटा तूने भाईसा नहीं बोला होता तो आज जिंदा ना जाता .....जा .जा द्ददा को रा*-रा* कहना मेरा "....... मुस्कुराते हुए विष्णु ने कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बडा तब ही एक गाडी वहां आ चुकी थी जो विष्णु के ड्राइवर ने बुलाई थी ।
अभी आए आदमियों को मरे हुए आदमियों का सफाया करने का कहते हुए विष्णु ने अपने कपड़े बदले मुंह धोया और एक बार फिर अपनी एंबेसडर ग्रेंड में बैठ कर अपनी मंजिल कि ओर बड चला जो राजस्थान का एक शहर ही था।
विष्णु के आदमियों ने पहले लाशों को सडक किनारे उगे उन सूखे पौधों में फेंका और पौधों समेत जला दिया सडक पर डले खून को छुपाने के लिए कुछ तसले मिट्टी उस जगह पर डाली और वो लोग भी लौट गये ......
अगर विष्णु इन लाशों को ठिकाने ना लगबाता फिर भी राहगीर इन लाशों को नजरंदाज कर आगे बढ़ने वाले थे क्योंकि 1910 से 2010 तक इस जगह का खौफ इतना था की लोग पेट्रोल से ज्यादा अपनी जान कीमती समझते थे और इन शहरों ना होकर बाइपास के द्वारा राजस्थान या यूपी से जाना पसंद करते थे।.....
Agla update shayad aapki aankhon mein aanshu naamak paani laane waala hai....
Aisa lag raha he jaise bhojpuri blue film chal rahi hoअध्याय - 08
मयंक ने अंदर जाके देखा तो आंटी किचन में एक स्टूल पर चडी हुई थी और जब मैंने उनसे पूछा कि क्या हुआ तो उन्होंने कहा -
"मयंक अच्छा हुआ की तुम आ गए देखो तुम्हारे बिल्कुल पीछे एक बडा सा चूहा है "
और आंटी का इतना ही कहना था की एक बडा चूहा मेरे बगल से निकलता हुआ सीधे आंटी के स्टूल के पास पहुंचा और आंटी एक दम से हड़बड़ा गई जिससे उनका स्टूल बुरी तरह से हिला तब ही मयंक ने आगे बढ़ते हुए उनको पकडा पर जब तक उनका पैर मुड चुका था जहां आंटी को बहुत बुरा दर्द हो रहा था वहीं मयंक तो बिल्कुल भी इस दुनिया में नहीं था क्योंकि आंटी के बड़े बड़े स्तन उसकी छाती में गडे हुए थे और मयंक का लंड उनके स्पर्श से ही खडा होने लगा था।
जब आंटी की आह्हह की आवाज मयंक के कानों में गई तब उसे होश आया उसने आंटी को नीचे उतारा पर जैसे ही आंटी का पैर नीचे लगा तो उनको बहुत भयंकर दर्द हुआ तो मयंक ने उनको गोदी में उठाना ही ठीक समझा और जैसे ही रोमा को यह एहसास हुआ की वो मयंक की गोद में है और उसका एक हाथ उसकी गांड और दूसरा पीठ पर है उसकी दोनों टांगों के बीच एक झुरझुरी सी उठ गई उसको सुबह का वो दृश्य याद आ गया जब उसने मयंक का लंड देखा था वो यह सोच रही थी की उसको मयंक ने ऐसे उठा लिया था जैसे कोई मोम की मूर्ति हो .....अभी रोमा सोच ही थही थी तब तक वो अपने बिस्तर तक पहुंच चुकी थी।
"आंटी आपका पैर तो थोडा थोडा सूज रहा है"...... मयंक ने पैर की तरफ इशारा करते हुए कहा।
"लगता है मुडने की वजह से सूजन आ रही है बेटा ....... जरा ड्राॅवर में बाम रखा होगा वो देदो मैं लगा देती हूं "
"आंटी मुझे लगता है कडवे तेल की मालिश ज्यादा आराम पहुंचाएगी ......आप जरा रुको मैं अभी गरम करके लाता हूं।"
**************
"आंटी आप बाॅडी को ढीला छोड़ दो और खासकर अपने इस पैर को "....... मयंक ने बायां पैर अपने हाथ में लेते हुए कहा।
"ठीक है....पर मयंक आराम से करना बहुत दर्द हो रहा है "
"जी आंटी "
मयंक ने जैसे ही उस पैर को घुटने से मोडा तो साड़ी थोडी ऊपर को उठ गई और उनकी मांसल पिंडलियों पर मयंक की नजर पड़ी पर नजर अंदाज करते हुए उसने तेल पैर पर गिराते हुए एंकल की मालिश शुरू करदी वहीं रोमा को मयंक के उन सख्त हाथों का अहसास हो रहा था ।
धीरे धीरे मयंक ने अपने हाथों को थोडा ऊपर ले जाना शुरू किया वहीं अपनी पिंडलियों पर मयंक के हाथों का अहसास होते ही रोमा को भी गर्मी चढ़ने लगी वो खुद हैरान थी की वो इतनी जल्दी उत्तेजित क्यूं हो रही है (जब हम किसी व्यक्ति से ज्यादा प्यार करते हैं या किसी से ज्यादा आकर्षित हो जाते हैं तो यही होता है उसके छूने मात्र से ही कामुक विचार आने लगते हैं ऐसा ही रोमा के साथ हो रहा था वैसे तो मयंक से प्रभावित थी ही लेकिन जबसे उसने उसका उभार देखा था तब से ही मन के किसी कोने में वो उसका एहसास पाना चाहती थी)
"आंटी उस पैर की भी कर देता हूं "......कुछ देर एक पैर की मालिश करने के बाद मयंक ने रोमा से पूछा मयंक का हाल भी कुछ ऐसा ही था उसने आज तक किसी औरत के शरीर को महसूस नहीं किया था राजीव ने बहुत बार उसको ब्लू फिल्म देखने के लिए पूछा पर वो हर बार इंकार कर देता था आज पहली बार किसी औरत को छूना उसको बहुत उत्तेजित कर रहा था पर वो अपने चहरे पर उत्तेजना के भाव कदापि नहीं आने दे रहा और तो और उसका लंड भी ऐसे खडा था मानो लोवर से बहार ही आ जाएगा।
"नहीं मयंक लेकिन....व्व..वो मेरे"....
"बोलिए आंटी कहीं और भी लगी थी क्या .....आप बता दीजिए मैं उधर भी मालिश कर देता हूं।".....
"हां मेरी कमर से थोडा नीचे....."......रोमा ने पूरी हिम्मत जोडकर कहा हुआ यह था की मयंक के आने से पहले रोमा ने जब वह चूहा देखा तो हड़बड़ाहट में वो पीछे हुई और उसकी कमर का नीचे वाला हिस्सा किचन की स्लेव जो की मार्वल की थी उसमें लगा जिससे उधर भी दर्द हो रहा था हालांकि की उसने सोचा था की मयंक से सिर्फ पैर की मालिश ही कराएगी पर मयंक ने जिस तरह से पैर की मालिश की थी उससे उसे बहुत आराम मिला था और फिर कुछ मदहोशी भी चढने लगी थी उसको ।
"हां .... ठीक है आंटी तो आप हिचकिचा क्यूं रही है लाइए करे देता हूं बताइए जरा कहां है दर्द और पेट के बल लेट जाइए।"
रोमा ने भी कुछ नहीं कहा और पेट के बल लेट गई पर जब मयंक ने रोमा को उलटा लेटा हुआ देखा तो उसके लंड ने झटका सा मारा रोमा की गांड इतनी कामुक लग रही थी की मयंक की नजर ही नहीं हट रही थी तब ही उसने देखा की रोमा का हाथ पीछे आया और उसने साड़ी को नीचे किया जिसको देख कर तो मयंक भी पागल हो गया वो हिस्सा बहुत गोरा था और साडी नीचे हो जाने की वजह से उसकी चर्बी जो थी वो ऊपर को आने लगी क्योंकि पेटीकोट पहले से ही टाइट बधां था और जोर लगा कर जब रोमा ने उसको नीचे किया तो फस गया ।
"यहां लगी है मयंक"......इस अवाज से मयंक को होश आया और तब उसने देखा की रोमा ने हाथ बिल्कुल गांड पर रखा हुआ था
"आंटी पर यहां मालिश कैसे होगी आपको साडी निकालनी पड़ेगी"
"रुको ...." ,,,,, कुछ देर सोचने के बाद रोमा खडी हुई और उसने अपनी साड़ी को निकाल दिया .....और अपने पेटीकोट को थोडा ढीला करते हुए एक बार फिर उसी तरह लेट गई।
मयंक को तो होश ही नहीं रहा था कल जिन नितम्बों को उसने दूर से देखा था आज उनको ही वो छूने वाला था उसने एक लम्बी सांस छोडी और तेल की कटोरी लेते हुए रोमख के पास आया वहीं रोमा भी भीतर एक अलग रोमांच से भरी हुई थी
मयंक ने तेल उस जगह पर डाला और जैसे ही उसने उस जगह पर हाथ लगाया उसकी नशों मे एक अलग सा एहसास दौडने लगा ।
वहीं रोमा को अपने शरीर पर आशीष के अलावा पहली बार किसी और का एहसास हुआ था उत्तेजना के चलते उसकी तो हल्की चीख निकल गई जो उसने बडी मुश्किल से दबाई
मयंक ने अपना काम चालू कर दिया धीरे धीरे उन नितम्बों को सहलाने लगा और साथ ही साथ अपने हाथ को कमर पर भी चलाने लगा।
"आंटी ऐसे बैठ कर मालिश सही नहीं होगी मैं अपके पैरों के बीच में बैठता हूं और वहां से हाथ सही चल पाएंगें"
"हम्म"......बस इतनी ही आवाज रोमा के मूंह से निकली और उसने अपनी टांगें छोडी कर लीं
अब मयंक के लिए दृश्य और कामुक हो चला था वो घुटनों के बल बैठ गया और रोमा की मालिश करने लगा अब उसने अपने हाथ पूरी पीठ पर चलाना शुरू कर दिए थे।और इसका एहसास होते रोमा ने बिना कुछ कहे अपने बिलाउज को आगे से खोल दिया और इसी के साथ मयंक का हाथ पूरी पीठ पर चलने लगा और रोमा जो की बहुत ज्यादा गरम हो चुकी थी उसकी सिसकारियां भी अपने रुक नहीं रही थी मयंक के हाथ पीठ से होते हुए उसके चूचों तक पहुंच रहे....रोमा के स्तन इतने बड़े थे की आधे उल्टा लेटने की वजह से बगल से निकल आए थे।
मयंक भी पूरे जोश में आ चुका था उसके हाथ चूतड़ों से होते हुए कंधों तक जाने लगे थे और जैसे ही वो ऊपर तक मालिश के लिए आगे होता तो उसका लंड रोमा की गांड में दबता और रोमा भी इसको बहुत इंजोए कर रही थी उसको मयंक के लंड के साइज का अंदाजा हो चुका था वो इतनी ज्यादा उत्तेजित हो गई थी की जब मयंक नीचे की तरफ होता तो वो भी अपनी गांड को थोडा ऊपर कर देती ताकी लंड का एहसास पूरा हो सके ।
मयंक का लंड जब रोमा की गांड से लगता तो उसको ऐसा लगता मानो उसका लंड किसी गरम चीज से टच हुआ हो । और तब ही एक पल ऐसा आया की रोमा का शरीर अकडने लगा और उसके पांव खींचने लगे उसकी सिसकियां भी जोर पकडने लगी और एक आह्हह के साथ ही उसका शरीर डीला पढ गया वहीं जब मयंक ने यह नजारा देखा तो उसको समझ नहीं आया पर रोमा की यह तडपन ने उसकी आग में घी काम किया अब उसके हाथ गांड से और नीचे आने लगे और जांघों का स्पर्श उसको बहुत अच्छा लग रहा था ।
"आंटी आप सीधा लेट जाइए आगे से भी कंधे रह गए हैं ".....रोमा शांत हो चुकी थी पर उसने भी अब लंड लेने का मन बना लिया था ....वो भी चुपचाप सीधी हो गई।
और अब मयंक के सामने रोमा के दूध थे जिन्मे थोडा सा ढीलापन जरूर था पर वो भी जैसे उन्हें और सुंदर बना रहा था और जब मयंक की नजर और नीचे गई तो देखा आगे से रोमा का पेटीकोट पूरा भीग चुका था उसने अपने लोवर को उतारा और इस बार रोमा की टांगों को खुद चोडा किया और अपने आप को इतना आगे कर लिया की असके घुटने रोमा की चूत से लग गए और जब इस बार मयंक कंधों की मालिश के लिए आगे बढा तो उसका हाथ उन चूचियों से होते हुए गया जिनके चूचक भी मयंक के हाथ के साथ घिसे और मयंक के पूरे झुकते ही उसका घुटना एक तरह से चूत में ही घुस गया जब उसकी आंखें रोमा के चेहरे पर पडी तो रोमा के चेहरे के भाव देखकर उसके लंड से भी एक बूंद पानी(प्री कम) की निकल आई।
और यहां रोमा का सबर का बांध टूट गया और इस बार जैसे ही मयंक नीचे की तरफ गया तो रोमा ने मयंक का सर पकड कर अपने चूचों से लगा दिया ।
"चूसो इन्हें".....रोमा इतना ही कहे सकी और सुनते ही मयंक ने भी उंन दूग्ध कलशों को पीना शुरू कर दिया ।
"आह्हाआहहहह "........ जैसे ही मयंक ने रोमा के एक चूचक को काटा तो रोमा के शरीर में झुरझुरी दौड गई रोमा को जाने कितने दिन बाद ऐसा एहसास मिल रहा था क्योंकि की ऐसा प्यार करना तो आशीष कब का छोड चुका था..... भले ही रोमा की चूत ने कुछ देर पहले ही बहुत पानी छोडा था पर एक बार फिर उसकी चूत रिसने लगी थी। उसने मयंक का हाथ पकड कर अपने दूसरे चूचे पर रख लिया और खुद उसके हाथ को दबाने का इशारा किया मयंक ने भी किसी छोटे बच्चे की तरह दूसरे चूचे को दबाना शुरू कर दिया
"कपड़े उतारो मयंक"........ मयंक ने रोमा के दोनों चूचों को लाल कर दिया था दबा दबा कर और चूस चूस कर जब उन में दर्द होने लगा तो तो उसने मयंक को कहा।
और कुछ ही पल में दोनो बिल्कुल नंगे हो चुके थे।.....और पहली बार रोमा ने मयंक के नंगे लंड को देखा तो उसकी आंखों में उस लंड के लिए हवस साफ दिख रही थी यहां मयंक ने जब देखा तो पाया की रोमा की नजर उसके लंड पर ही थी इस वक्त मयंक एक नई रोमा को देख रहा था जो बिल्कुल भी ऐसी नहीं थी जिसे वो जानता था ।
रोमा ने आगे आते हुए लंड को पकडा जैसे उसकी लंबाई और चौड़ाई नाप रही हो और अगले ही पल लंड को मुंह में भर लिया जैसे ही उसने लंड के टोपे पर जीभ घुमाई तो मयंक के मूंह से भी एक सिसकी निकल गई और लंड को अच्छे से चूसने के बाद मयंक के सामने लेट गई और मयंक को अपने पास खींचा और अपनी चूत चूसने का इशारा किया पहले तो मयंक को अजीब लगा पास जाते हुए पर अब तक जितना मजा उसको आया था वो उसके लिए सबसे अलग था।
मयंक ने जैसे ही अपनी जीभ चूत से लगाई रोमा ने उसके सर पर जोर डालते हुए उसको और पास कर लिया और जोर जोर से उसकी सिसकियां निकलने लगी। ...... कुछ ही देर में मयंक खुद ही वहां से हट गया और इस बार उसने रोमा की गर्दन को चूमा जिससे रोमा सातवे आसमान पर पहुंच गई।
उसने खुद अपना हाथ नीचे से ले जाते हुए मयंक का लंड पकडा और अपनी चूत के मूंह पर रख लिया जैसे ही मयंक का लंड चूत से लगा उसके लंड को ऐसा लगा मानो उसके लिंग को किसी गरम चीज से लगा दिया हो पर उसने गर्दन चूसना बंद नहीं किया।
"मयंक इ्सृ्सस््ससस अब अपने लिंग को अंदर डालो आह्हह "
मयंक ने भी अपनी कमर पर जोर देते हुए आगे की तरफ जोर लगाया तो उसका सुपाडा चूत में चला गया और मयंक को जिस आंनद का एहसास हुआ वो उसके लिए ऐसा था मानो वो स्वर्ग में हो उसने एक धीमा ढक्का दिया और उसका लंड आधा अंदर चला गया अब मयंक को ऐसा लग रहा था था मानो उसके लिंग के चारों तरफ टेप लगा दिया हो ।
और वहीं रोमा के मूंह से भी जोर दार चीख निकल गई उसने मयंक के मूंह को पकडा और अपने होंठ उसके होंठों से लगा दिये वहीं मयंक का सवर टूट गया उसने लंड थोडा पीछे खींच ते हुए दमदार ढक्का लगा दिया ऐसा होते ही रोमा ने मयंक का होंठ काट लिया और अपने नाखून उसकी पीठ में गाड दिए।
लेकिन बच्चेदानी से टकराने के बाद भी मयंक का लंड 2,3 cm बहार था जब मयंक की आंखे खुली तो उसने देखा रोमा की आंखों से आंसू निकल रहे थे रोमा ने अपना मुंह अलग करते हुए कहा....
"मयंक मेरे दूध चूसो आह्हह् काटना नहीं और इतना बडा भी भला किसी का होता है रुको थोडी देर बिल्कुल भी हिलना मत आह्हह "
मयंक ने भी वैसा ही किया कुछ देर में जब रोमा थोडी शांत हुई और उसने खुद कमर उचकाई तब जाकर मयंक ने अपने लंड को बहार खीचा उसके साथ ही रोम की सितकार उसके कानों में पडी अभी मुंह खुला ही था रोमा का तब ही मयंक ने फिर लंड अंदर डाल दिया और धीरे धीरे अपने लंड को अंदर बाहर करने लगा कुछ देर ऐसे ही मयंक करता रहा उसको यह बहुत ही आंनद पहुंचा रहा था वहीं रोमा भी बहुत मजा ले रही थी
"रुको मयंक......और अब जोर जोर से अंदर बहार करना "......रोमा ने पोजिशन की और घोडी बनते हुए बिस्तर के किनारे पर आ गई मयंक भी नीचे खड़े हो गया और एक बार फिर रोमा ने लंड को छेद पर सेट किया पर इस बार मयंक ने अपना लंड एक बार में ही पूरा उतार दिया चूंकि लंड और चूत दोनों ही गीले थे तो ज्यादा मुश्किल नहीं हुई।
"आह्हह इश््शश पूरा एक बार में नहीं डालना था .....जानवर हो पूरे तुम मयंक श्श्ससस््स कोई कुंवारी लडकी तुम्हारे नीचे आ गई तो मर ही जाएगी।"
"आंटी आपने ही तो कहा था "
और वहीं रोमा ने खुद अपनी गांड पीछे कर दी जैसे कह रही हो बात मत करो बस चोदते रहो और मयंक ने भी बोलना बंद करते हुए अपना काम जारी रखा ।
"आह्हाआहहहह मयंक इश्स््सस ऐसे ही चोदते रहो "..... मयंक का लंड किसी रौड की तरह अऔदर बहार होने लगा और 15 मिनट तक उस कमरे में सिसकयां और थपथप की आवाजें ही गूजती रही रोमा का शरीर अब तक दो बार अकड चुका था और आज वो अपने जीवन का सबसे रोमाचक मिलन कर रही थी वही मयंक भी आखरी ढक्के लगाते हुए चरमोत्कर्ष को पहुंचे गया उसको लगा जैसे उसके शरीर का पूरा खून लंड में आ गया और आखरी कुछ डक्के इतने जोर दार थे की रोमा की हड्डियां भी हिल गई और मयंक का वीर्य भी रोमा की चूत में भरता चला गया मयंक आंनद में जैसे ही रोमा के ऊपर गिरा तभी ..
"ट्रिन ट्रिन "..... लिविंग एरिया में रखे फोन की घंटी बजने लगी ।

Ek aur gajab ki kahani![]()
MitrKatai jeher update Hell bhai
Updates thode casual he par majedar he jarur
......welcome to the story 
Aisa lag raha he jaise bhojpuri blue film chal rahi ho![]()

मोडे बहुत तगडे है....बस देखत जाऊ अबे बहुत कछु हैबहुत ही रोमांचक अपडेट भाई फिल्मी दृश्य और खतरनाक खून खराबा मजा आ गया पढ़ कर !! बोल चाल भी मजेदार है जामें बौत बढ़िया लिख रहो है लल्लू ऐसें ई लिखत रह मजो आय रओ ए !! बाकी जि मौडा तगड़े लग रए एं
अध्याय - 09
जैसे ही घंटी की आवाज कानों में पड़ी तो रोमा और मयंक एक दम से अलग हुए मयंक कमरे के बाथरूम में ही साफ करने चला गया वहीं रोमा ने भी साडी की जगह गाउन पहना और जल्दी से आकर फोन उठाया .....
"मम्मी वो जरा मयंक को बोलो मेरे रुम में स्टडी टेबल पर एक पैकेट रखा है वो जरा मुझे इफ्तिका के घर दे जाए ..... बहुत जरूरत है उसकी प्लीज और जल्दी पहुंचाना ...... थैंक्स! "
और इतना कहते ही साक्षी ने बिना जबाब सुने फोन काट दिया।
"किसका फोन था आंटी"....... मयंक ने कमरे से बहार आते हुए कहा उसको थोडा अजीब लग रहा था क्योंकि अब हवस उतर चुकी थी .....ये तृश्णा बहुत ही भयानक चीज है जब तक सर पर रहती है विवेक का नाश कर देती है कुछ समझ नहीं आता और जो सर से उतरी तो इतना पश्चाताप छोड जाती है की लोग खुदकुशी तक कर लेते हैं।
अब कुछ देर पहले तक जो रोमा मयंक के छूने मात्र से उत्तेजित हुए जा रही थी और संभोग के लिए भी राजी हो गई वही अब हवस उतरते ही मयंक से आंख मिलाने से झिझक रही थी। जाने उसके मन में क्या था और अब जाने क्या सोच रही थी पर जो भी था आगे जाकर मयंक के लिए क्या साबित होता है देखने लायक होगा।
"व्व वो साक्षी के कमरे में स्टडी टेबल पर एक पैकेट रखा है जो तुमको उसे देकर आना है......म्म मैं बाथरूम में जा रही हूं"
"क्या चूतिया समझ रखा है इसलिए आया हूं की तुम्हारी बेटी का ड्राइवर हूं या वो बात बात पर गुस्सा होगी तो उसको मनाऊंगा अजी घंटा ना तो मैं कुछ देने जा रहा ना उसको मना रहा एक तो इज्जत देकर भुगतो ऊपर से काम करो ".........
मयंक ने आंख खोली तो सामने कोई नहीं था रोमा नहाने जा चुकी थी उसने मन ही मन कहा ......"चल मयंक दे आ सामान वैसे ये टेलेंट बहुत सही है तेरा किसी को आवाज सुनाई भी नहीं पडती और तेरी गुस्सा भी बहार नहीं आती "
"डुग डुग डुग "आवाज करती बाइक एक बार फिर इफ्तिका के घर की ओर चल दी ।
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"यार इफ्तिका कितनी सुन्दर हैं "
"मरेगा भोस*के"
"उसकी आंखें देखी है नीली रंग की कितनी प्यारी हैं "
"अबकी बार में नहीं संभाल ने वाला "
"और उसका चेहरा मुस्कुराते हुए कितना प्यारा लगता है कोई इतना सुंदर कैसे हो सकता है "
"वैसे एक बात बता ये आज फिगर को छोडकर चेहरे और आंखों की बात कैसे कर रहा है तू"
"तुझे क्या मजाक लग रहा है सच्चा प्यार हो गया है मुझे इफ्तिका से और लडके जिससे प्यार करते हैं उसके लिए हवस नहीं होती"
"वो तो साक्षी के लिए भी नहीं आई उससे भी प्यार हो गया क्य
"पागल है क्या वो डराना बंद करे तब तो कुछ सोचूं ..... वैसे पागल से याद आया साक्षी के लिए गिफ्ट लेना है कम से कम उसको अच्छा लगेगा "
"ओए चूतिये तेरा नाम दिल है तो खून पंप करने का काम कर और मैं दिमाग हूं मुझे पता है की जब गुस्से वाली कोई बात की ही नहीं तो मनाए क्यूं कुछ नहीं लेना है चुप चाप रहे बिल्कुल "
"ठीक है भाई तेरी मर्जी मेरी तो वैसे भी तू सुनता ही कहां है "
"चल चल सेन्टी होना बंद कर आ गया तेरी माशुका का घर देख ले जाकर और इस बार तू टूटे तो मेरे पास मत आना "
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(आप सोच रहे होंगे की ये दो लोग कौन हैं ये और कोई नहीं एक लडके के दिल और दिमाग है जिसमें दिल की बाते ओरेंज कलर में है और ऊपर लिखी बातें मयंक बाइक चलाते हुए सोच रहा था जहां उसके दिल और दिमाग एक दूसरे के मजे ले रहे थे और अक्सर आपको इनकी बातें सुनने को मिलती रहेंगी धन्यवाद)
दरवाजा खोलकर मयंक अंदर गया तो इफ्तिका के घर में भी गार्डन था साक्षी के घर की तरह उसे पार करते हुए वो गेट पर पहुंचा अभी वो डोरबेल बजाने ही वाला था की उसके दिल में घंटी बजी वो भी ऐसी की उसका दिल और दिमाग दोनों हिल गए। क्योंकि ऊंगली डोरबेल को टच होती उससे पहले ही दरवाजा खुला और इफ्तिका का हसता हुआ चहरा सामने आया अभी वो पीछे की तरफ ही देख रही थी जैसे वो बहार जाने के लिए आई हो और पीछे से किसी ने कुछ कहा था जिसे सुनकर उसे हंसी आ गई। जैसे ही इफ्तिका का चहरा सामने घूमा और मयंक को सामने देखकर वो एक दम से हड़बड़ा गई।
"आ् आप यहां क्क कैसे आए "..... इफ्तिका ने खुद को शांत करते हुए कहा।
"पैरों से आया "...... मयंक ने मुस्कुराते हुए कहा।
"अरे न् नहीं....मेरा वो मतलब नहीं था".....उसने जीभ दांतों में दबाते हुए कहा।
"फिर क्या मतलब था आपका"..... मयंक ने कहा।
"थैंक्स इसके लिए.....अब तुम जा सकते हो ".....अभी इफ्तिका कुछ कहती तब ही साक्षी ने उसके पीछे से आते हुए मयंक के हाथ से पैकेट लिया और कहा।
("इसीलिए ये लडकी मुझे शुरू से पसंद नहीं है".... साक्षी को बीच में आता देख मयंक के दिल ने जोर से चिल्ला कर कहा।)
"ऐसे कैसे जा सकतें हैं ये .....अभी इससे पहले भी बहार से लौट गए थे"....... साक्षी की बात सुनते ही इफ्तिका ने जल्दी से कहा।
जल्दी बाजी में वो ये बोल तो गई पर अब साक्षी उसको घूर रही थी।
इकरा - "अरे! .....मयंक आओ अंदर आओ ये दोनो तो तुमको दरबाजे पर ही खडा रखेंगी "
इफ्तिका - "देखिए ना आपा ये साक्षी इन्हें बहार से ही जाने के लिए कह रही है।"
इफ्तिका ने मेरे साथ अंदर जाते हुए कहा।
इकरा ने मुझे पानी लाकर दिया अभी इकरा ने गहरे नीले रंग का सलवार और सुर्ख लाल रंग की कमीज पहन रखी थी और उसकी कमीज़ उसके बदन से बिल्कुल चिपकी हुई थी मानो बदन का हिस्सा हो और जैसे ही वो पानी देने के लिए झुकी तो मेरी नजर सीधे उसके स्तनों पर पडी उसके पारदर्शी दुपट्टे में से भी उसके उन्नत शिखर दिख रहे थे पर मैंने फोरन अपनी नजर वहां से हटाई क्या पता अभी इकरा का हाथ सीधे मेरे गालों पर अपनी छाप छोड़ देता .... फिर कुछ देर वहां बैठा नहीं नही गर्दन झुकाए बैठा रहा पर इफ्तिका पर नजर अपने आप ही चली जाती थी और मैंने देखा इफ्तिका बहार और घर बिल्कुल अलग थी फिर वहां से चलने के लिए उठा और सीधे राजीव के घर पहुंचा।
"प्रणाम ताई जी.... राजीव किधर है".... मैंने राजीव की मम्मी के पैर छूते हुए कहा जबाब ने ताई जी ने मुस्कुराते हुए कमरे की तरफ इशारा किया।
और जैसे ही मैं अंदर आकर उसका नाम पुकारने वाला था तभी मैंने देखा राजीव की नजर कम्प्यूटर की स्क्रीन पर जमी थी मैं कमरे में आ गया पर उसको एहसास तक ना हुआ। मैंने ने भी पहले चुपके से कम्प्यूटर पर नजर डाली तो देखा भाईसाहब ईमेल के पेज को बार बार रिफ्रेश मारे जा रहा है जैसे अभी किसी का मेसेज आने वाला हो मैं हल्के हल्के आगे गया और अपनी हाथ को 180° में घुमाया और सर पर खींचकर तमाचा मारा राजीव ऐसे हडबडाया मानो उसका बजूद हिल गया हो जैसे पृथ्वी पर भूकंप आया हो उस बिचारे की हालत देख कर मेरी भी हसी छूट गई।
"लग गई क्या "..... मैंने हसते हुए कहा
"साले तू कब आया .....और तूने मारा कायको लग गई बह*चो".....मेरे बोलने पर उसको एहसास हुआ की उसके अलावा कोई और भी है कमरे में पर उसकी यह बात तो सही थी उसके लग गई क्योंकि मैंने इतनी जोर से मारा था की मेरे हाथ में भी चींटियां रेंग रही थी।
राजीव ने गाली देते ही मुझे पकड कर बेड पर फेंका और मेरी गर्दन दबाने लगा। अनिल अंकल का घर और मेरे घर में मुझे कोई भेदभाव आज तक महसूस नहीं हुआ था यही दो जगह थी जहां मेरा असली व्यक्तित्व लोगों के सामने हुआ करता था।
"मर गया तो अकेला रह जाएगा साले "..... मैंने हंसते हुए कहा।
मयंक - "चल बकचोदी छोड और खडा हो कपड़े लेकर आते हैं"
राजीव -"किसके लिए"
मयंक -"किसी के लिए भी आऐं तो भी दोनो के हो जाएंगे ".....ऐसा मैंने इसलिए कहा था क्योंकि हम दोनों की कदकाठी समान थी बस लंबाई में थोडा अंतर था जहां राजीव की 5'11 थी वहीं मेरी 6'2 लंबाई थी।
राजीव -"फिर साले लाने की जरूरत ही नहीं है अलमारी भरी हुई है जितने चाहिए जो चाहिए लेले ।"
"हाओ चल ....पतो है कितेक बडो दानवीर है तू".... मैंने अपनी मातृभाषा में कहा
"कहां जा रहे हो दोनों".....अभी हम बहार निकल ही रहे थे की यह जानी-पहचानी आवाज मेरे कानों में पड़ी और राजीव इस आवाज को सुनकर गोली की स्पीड से बहार निकल लिया मैं मुस्कुराते हुए पीछे घूमा।
"प्रणाम दीदी "..... मैं जैसे ही राजीव की बड़ी बहन यानी मेरी बड़ी बहन के पैर छूने झुका तो वो पीछे हो गई और पीठ पर अपने पंजे की छाप छोड़ते हुए बोली
सिया (राजीव की बड़ी बहन) -"तुझे कितनी बार कहा है पैर मत छूआ कर बुड्ढी नहीं हूं मैं बस दो साल ही तो बडी हूं तुझसे और राजीव से "....
"मना किया है तब ही तो छूता हूं दीदी ".....और बिना जबाब सुने मैं भी बहार की तरफ हो लिया क्योंकि मेरा अभी मार खाने का कतई
मन नहीं था।
मैं बहार आया तो राजीव बाइक पर बैठा हुआ था उसने वहीं से चा
बी घुमाने वाले इशारे में चाबी मांगी मैंने भी गेट ने बहार आते हुए उसकी तरफ फेक और फिर क्या था राजीव ने गाडी स्टार्ट की और मैं पीछे बैठा और चल दिए मार्केट की ओर ......
अध्याय 10
मैं बहार आया तो राजीव बाइक पर बैठा हुआ था उसने वहीं से चाबी घुमाने वाले इशारे में चाबी मांगी मैंने भी गेट ने बहार आते हुए उसकी तरफ फेक और फिर क्या था राजीव ने गाडी स्टार्ट की और मैं पीछे बैठा और चल दिए मार्केट की ओर
......
"तू खुद भी पिटेगा और मुझे भी पिट बाएगा"....बाइक पर पीछे बैठे हुए मैंने राजीव से कहा ।
"अब क्या कर दिया मैंने भाई"....
"सामने देख कर गाडी चला यह अपनी गर्दन लडकी को देखने के चक्कर में पूरी मोड देता है साले हरामी "..... मैंने ने हस्ते हुए कहा
"भाई अब देखने में भी प्राब्लम है क्या "..... राजीव इतना कह कर अपनी बत्तीसी दिखाने लगा।
खेर हम लोग मार्केट आए और एक दुकान में घुस गए । जो जो कपडे सही लगे मैंने सिलेक्ट किए और कपड़े लेकर हम एब बहार आए तो मैंने राजीव से कहा।
मयंक - "औए राजीव वो देख यह जो आदमी अपनी बाइक के पीछे बाइक पर बैठा है ना यह मेरा इफ्तिका के घर से ही पीछा कर रहा है और जब मैंने तेरे घर के पास गाडी रोकी तब फोटो भी निकाली थी इसने ।
राजीव - "पक्की बात है चूतिये या मजे ले रहा है "
मयंक -"तू क्या बहनचो कोई लुगाई है मेरी जो ऐसा मजाक करूंगा कभी तो सीरियस हो जाया कर हरामी"
राजीव -"भाई देख सीरियस बीरियस पता नहीं तू कहे तो अभी पकड लेते हैं इसे क्या दिक्कत है "....और राजीव उसकी तरफ जाने लगा।
मयंक -"रुक ऐसे नहीं यहां से आगे चलते हैं थोडा ऐसी जगह जहां थोडा कम लोग हो देख इतना तो पक्का है अगर ये मेरे ऊपर निगरानी रख रहा है तो भागेगा अगर हम इसके पास गए और भीड में बच भी जाएगा आगे चल थोडा ऐसी रोड पर लेना जहां मोड हो बस फिर मारते हैं इसकी गांड वैसे भी बहुत टेम हो लिया हाहहा ".... मैंने अंगड़ाई लेते हुए कहा।
राजीव -"चला यहां बाजार से निकल ते ही कोर्ट रोड के लिए मोड है और आज है संडे तो खाली ही होगी वो जगह वहीं करते हैं इसका इंतजाम ।...... राजीव ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहा।
फिर हम लोग बैठे गाडी पर चल दिए एक तो आदमी इतना बडा चूतिया 2 स्ट्रोक (Rx 100) पर हमारा पीछा कर रहा था अगर कोई ध्यान ना भी दे तो भी ध्यान चला जाता उस पर हम थोडा आगे बढ़े होंगे की उसकी बाइक चालू होने की आवाज आई। 3 , 4 मिनट में हम उस मोड पर पहुंचे और वो हमारे पीछे ही था मुश्किल से 100m दूर होगा हम से पर मेरा ध्यान उस पर गया तो मार्केट के बाद उस बाइक पर एक की जगह तीन थे। खेर हमने सोचा वैसा ही था दोपहर का समय था और धूप भी जवर थी और उस रोड के मोड से आगे तक कोई नहीं था ।
कोर्ट रोड पर मुडते ही ही मैंने राजीव का कंधा दबाते हुए उसको बाइक रोकने का इशारा किया उसने बाइक खडी की जब तक मैं मोड पर पहुंचा और राजीव भी गाडी खडी करके मेरी तरफ आने लगा और नये कपड़े के बैग उसके हाथ में थे जब तक उनकी गाडी की आवाज भी पास आती हुई सुनाई दी और जैसे ही उनकी गाडी हमारा पीछा करते हुए इस रोड पर आई पर सामने मुझे देखते हुए उसने एक दम से गाडी रोक दी ।
मेरी और उस आदमी की नजर मिली तो वो चूतिया हसने लगा मैं उसके पास जाने लगा जब तक वो तीनों भी बाइक से उतरे और जैसे ही मैं उनके पास पहुंचा।
मयंक - "अंकल आप काफी देर से मेरा पीछा कर रहे हैं कुछ चाहिए क्या".... मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
(आदमी 1- ड्राइवर, आदमी2 और आदमी 3- जो उसके पीछे बैठे थे)
आदमी 3 - "जो चाहिए तू उसको तो उस मिर्जा के यहां छोड आया"
मयंक -"मैं समझा नहीं जरा अच्छे से बताओ "
आदमी 1 - "तू दो दिन से एहलावत के घर रह रहा है ना?...क्या लगता है उसका तू"
राजीव -"बेटा ही मान लो हमको उनका"...... राजीव ने मेरे पास आते हुए कहा
मयंक - "औए चूतिये ये एहलावत कौन है "... मैंने राजीव को देखते हुए कहा।
राजीव -"क्या आदमी हैं तो साले जिनके घर रह रहा है उनको नहीं जानता ये चूतिए आशीष अंकल की बात कर रहे उनका पूरा नाम है आशीष एहलावत "
"बताओ बहनचो पूरा नाम पता चलने से पहले चुदाई कर ली "... मैंने मन में कहा।
आदमी 3 -"मतलब अगर हम तुम दोनों को पड लें तो वो आएगा ना बचाने "
मयंक - "लगता तो है..... तुझे क्या लगता है राजीव"..... मैंने राजीव का रुख करते हुए कहा।
राजीव - "आएंगे जरूर आएंगे सही आदमी है वो "... राजीव ने आंख बंद करके हां में सर हिलाते हुए कहा।
आदमी 2 - "हेलो ....गाडी लेके कोर्ट रोड्डडडडडड.... चट्टटटाक"
मैं राजीव की तरफ देख रहा था तब ही इस आदमी की आवाज कानों में गई मैं समझ गया यह अपने और लोगों को बुला रहा है हमको पकड़ने के लिए उसकी बात पूरी होती उससे पहले ही मैंने एक तपड्ड दिया उसके गाल पर ।
आदमी 1-"ओए साले हिम्मत कैसे हुई मारने की चुपचाप खडे रहो नहीं तो अभी यह पेट में होगा तेरे "....उसने एक चाकू निकाला और उसकी तरफ इशारा करते हुए कहा। उसकी देखा देखी में तीसरे ने भी चाकू निकाला और वो दूसरा जिसमें मैंने मारा था वो अपने होंठ जिससे खून निकलने लगा था उसको साफ करते हुए मुझे घूरने लगा और उसने भी अपना मुडने वाला चाकू निकाल लिया।
राजीव - "अरे सालों कुछ हमारी तो शर्म करते!....चाकू लेकर किडनैप करने आए हो ".... राजीव ने उनकी तरफ बढ़ते हुए कहा।
इतने में वो दूसरा आदमी मेरी तरफ आया जैसे मुझसे बदला लेगा और पास आते हुए उसने मेरे पेट की तरफ निशाना लगाते हुए सीधा चाकू चलाया मैं आपनी जगह से थोडा दांई तरफ घूमा और अपने सीधे का मुक्का पूरी ताकत से उसकी बाईं आंख में दिया पूरे माहौल में उसकी भयानक चीख गूंजी वो बौखला गया आंख पकड़ते हुए नीचे घुटनों पर गिरा तब ही मैने अपने पैर को मोड़ते हुए अपना घुटना सीधे उसकी नाक में दिया और एक पतली सी खून की धार वहां से फूट पडी और वो चित्त जमीन पर गिर गया ।
वहीं राजीव उस पहले आदमी की तरफ बढा और वो भी राजीव की तरफ आया जैसे ही वो राजीव पर हमला करने को हुआ राजीव एक दम से दौडा और अपने पंजों पर जोर देते हुए उचका वहीं दांए हाथ का मुक्का सीधे उसकी गर्दन पर दिया
"आह्हहहहहह ....ओह्हह लग गई लग गई"..... मुक्का देने के बाद राजीव जोर से चिल्लाया और अपने हाथ को हवा में लहराने लगा जैसे उसके रग गई हो उसकी चीख सुनकर मैं उसकी तरफ मुडा जैसे ही मैंने उसको घूर कर देखा तो वो अपने दांत दिखाने लगा।
"मयंक्कककककक !".....एक दम से चीखा पर जब तक तीसरे ने चाकू मुझ पर चला दिया मैंने हटने की पूरी कोशिश की फिर भी चाकू मेरी पीठ में कंधे के पास गुस गया भयंकर दर्द की लहर मेरे शरीर में दौड गई और राजीव का चहरा गुस्से से लाल हो गया वो तीसरे की तरफ दौडा पर वो तीनों अपनी बाइक की तरफ मैंने भी खडे होने की कोशिश की पर दायां हाथ जैसे ही जमीन पर रखा खडा होने के लिए में एक बार फिर गिर गया क्योंकि दांई तरफ ही चाकू घुसा था ।
राजीव उन तक पहुंचता तब तक वो बाइक पर थे और राजीव ने पता नहीं कमर से बंदूक निकाली वो बस चलाने वाला था की तब ही मैने चिल्लाकर उसको बुलाया क्योंकि अगर बंदूक चलती तो दिक्कत होनी थी।
"भाग गये भोसडी के ....तू जिंदा है क्या साले या मर गया ".... राजीव ने पास आकर बंदूक कमर में लगाते हुए कहा।
"कब निकाली बंदूक आह्हह".... मैंने ने राजीव के सहारे खड़े होते हुए पूछा।(क्योंकि वो मेरी ही बंदूक थी जो उसने उसके घर में जब मुझे बिस्तर पर गिराया था तब निकाल ली थी मुझे पता भी चल गया था पर मैंने बस कहा नहीं उससे क्यूं नहीं कहा इसका कारण आगे पता चलेगा)
राजीव -"अपना तो ऐसा ही है कांड कर देते हैं किसी को पता भी नहीं चलता....तेरे ज्यादा लगी तो नहीं"....बाइक की तरफ बढ़ते हुए उसने बोला
मयंक -"कृपा है आपकी ...जनाब आपकी बकचोदी यूं ही चलती रही तो ज्यादा दिन ना बचने वाला में "........और इस बात पर वो ऐसे हसा जैसे दुनिया जीत ली हो । और गाड़ी चल पडी किसी डॉक्टर की तलाश में.......
अध्याय - 11
"ध्यान से जाना भाई "..... राजीव ने अपने घर के सामने उतरते हुए कहा ..
चोट पर पट्टी करवांने के बाद सीधे में राजीव को छोडने आया था हालांकि मुझे गाडी चलाने में दिक्कत हो रही थी पर जब से रेसलिंग शुरू की थी ऐसे दर्द झेलना सीख गया था क्योंकि अक्सर चोट लगती रहती थी.......खैर मैंने सोचा साक्षी को भी ले चलता हूं इसलिए इफ्तिका के घर की तरफ चला दिया वैसे भी साक्षी को लाना तो बहाना था मैं तो इसलिए जा रहा था कि इफ्तिका को नजर देख लुंगा ......
मैं मिर्जा निवास पर पहुंचा और अंदर गया और डोरबेल बजाई तो एक बार फिर इफ्तिका मेरे सामने थी पता नहीं क्यूं उसको देख कर दिल को एक अलग शुकून मिलता है उसके चेहरे की कसिश ही मेरे दिल की खलिश मिटा सकती थी ऐसा मेरा दिल कहता था ...जाने क्यों पर ऐसा लगता था की मैं इफ्तिका को जानता हूं फिर दिमाग गाली देकर मेरे सारे ख्यालों को खारिज कर देता ....तो जब से इफ्तिका को देखा था मेरे शांत नदी रुपी जिंदगी में ये इफ्तिका मिर्जा रुपी लहर उठने लगी थी .....(मेरी जिंदगी कितनी शांत रही है ये भी एक राज है)
खैर साक्षी मेरे साथ चलने को तैयार हो गई वैसे तो इफ्तिका ने उसको रोकने की बहुत कोशिश की ये तक बोला की अभी हमारा। काम आधा ही हुआ है (उनके काम की मुझे कतई जानकारी नहीं थी) पर साक्षी ने कहा कि उसको जाना है और चुपचाप मेरे पीछे बाइक पर बैठ गई अब दिक्कत ये हुई की मेरी टी शर्ट बाजू में बहुत कसी हुई थी और पट्टी मेरे कंधे से पीठ को ढकती हुई बाजू तक बंधी थी मैंने उसको ऐसे बंध वाया था की पट्टी बहार ना आए पर हाथ के बार बार हिलने से शायद वो थोडी बहार निकल आई और साक्षी ने उसको देख लिया।
"ये पट्टी क्यूं बांधी है..... कैसे लगी ".....आज पहली बार साक्षी ने बिना गुस्से के बिना नखरे के बिना चिढ के मुझसे बात की थी।
"नहीं तो मेरे तो पट्टी नहीं बंधी तुमको कहां दिख रही है".... मैंने अपनी बाजू चेक करते हुए कहा
"आगे क्या देख रहे हो पट्टी पीछे से निकली है ....लगता है तुम किसी को दिखाना नहीं चाहते थे ......ये छोडो लगी कैसे ये बताओ?".....अब मैं क्या कहता उससे जब उसने पट्टी को ही देख लिया था।
"कुछ नहीं वो तो ऐसे ही बंधी है लगी बगी नहीं है हाहा ".... मैंने झूठी हंसी हंसते हुए कहा।
"आहहहह"..... जैसे ही मैंने झूठ बोला साक्षी ने एक मुक्का ठीक चाकू वाली जगह पर दिया और मेरे ऐसी दर्द की लहर दौडी अगर साक्षी की जगह कोई और होता तो खाल उतार देता मारते मारते दर्द की वजह से बाइक भी थोडी लड़खड़ाते लड़खड़ाते बची
"साॅरी-साॅरी सच में मयंक मेरा तुम्हे दर्द देने का कोई इन्टेंशन नहीं था प्लीज़ मुझे माफ करदो .....".....गुस्सा तो मुझे बहुत आई थी पर साक्षी की रुआंसी सी आवाज सुनकर मैंने कुछ कहा नहीं उसके बाद उसने दो बार और कुछ कहा जो मैंने अनसुना कर दिया क्योंकि मुझे गुस्सा बहुत ज्यादा आ रहा था और मैं गुस्से में अक्सर शांत ही रहता हूं क्योंकि फिर मुझे भी नहीं पता मैं क्या बन जाता हूं।
घर पहुंच कर मैंने गाडी गैरेज में रखी और शांति से अपने कमरे में चला गया मैंने ने जाते जाते एक बार जरूर साक्षी को देखा था जो थोडी दुखी जरूर लगी फिर ज्यादा कुछ हुआ नहीं शाम को मैं घूमने चला गया जब लौटकर आया तो मेरी नजर आंटी के सामने वाले घर पर पड़ी तो एक औरत दिखाई दी .......उस ऐरिया में सारे घर लगभग एक जैसे ही थी जिनकी बहार वाली दिवाल कंधे के उचांई जितनी थी और फिर गार्डन फिर घर का द्वार तो मुझे उनका चेहरा ही दिखाई दिया दुपट्टा उनके माथे तक था और शायद वो पौधों में पानी दे रही थी इसलिए उनका ध्यान नीचे की तरफ था चेहरा तो मैं देख नहीं पाया और नाहीं उनका ध्यान मुझ पर पडा था ।
जब मैं अंदर आया तो खाने का वक्त हो चुका था तो मैं लिविंग एरिया में ही बैठ गया और टीवी देखने लगा फिर खाने का बुलावा आया तो फिर साक्षी भी कमरे से बहार आई अभी भी वो दुखी ही लग रही थी पर मैं अब शांत हो चुका था खाने की टेबल पर हम बैठ गये आंटी और साक्षी दोनों ही शांत शांत बैठी थी दोनों की वजह अलग थी एक भी आंख भी ऊपर नहीं उठा रहा था फिर शायद आंटी अपने लिए पानी का ग्लास लेने किचन की तरफ गई तब ही ...
"साॅरी "....यह आवाज मेरे कानों में पडी और मैंने नजर घुमा कर साक्षी को देखा वो मेरे ही दांई ओर बैठी थी और उसने अपना सर ऊपर भी नहीं उठाया था नीचे देखते देखते ही बोली रही थी
"इट्स ओके ".... मैंने खाते हुए जवाब दिया तो साक्षी ने नजर उठाकर मुझे देखा मुझे तो समझ नही आता उसका वैसे तो कभी सीधे मुंह बात नहीं करती और अब जब मैंने उसको तीन चार घंटे नजर अंदाज किया तो इतनी बार साॅरी बोल चुकी थी।
"ऐसे नहीं जब तुम मुझे ये बताओगे की कैसे लगी तब ही मैं मानूगी की तुमने माफ कर दिया"....उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
"ठीक है फिर मत मानो ".... इतना सुनते ही एक बार फिर उसका मुक्का मेरे कंधे की तरफ आया पर शायद उसको याद आ गया की मेरे लगी हुई है इसलिए उसका हाथ हवा में ही रुक गया तब तक आंटी आ गई तो फिर उसने कुछ नहीं कहा और हम सब ने शांति से खाना खाया और मैं कमरे आ गया अपना काम करने के बाद जब मैं सोने के लिए जाने लगा तो
मेरा ध्यान दिन वाली घटनाओं पर गया कि आखिर वो लोग आशीष अंकल तक क्यूं पहुंचना चाहते हैं और उससे भी बुरी बात ये थी की इसके लिए उन्होंने साक्षी को जरिया बनाया था जो बिल्कुल अच्छा नहीं था ।
तब ही मेरे दिमाग में अंकल की पहले दिन वाली बात आई की उन्होंने और अनिल अंकल ने साथ ट्रेनिंग की है इसका मतलब वो भी डिविजनल फोरेस्ट ओफिसर (DFO) हैं तो यह मामला हो ना ह़ो उनकी प्रोफेशनल लाइफ से जुडा था। और शायद आज वो लोग अंकल को फसाने में कामयाब भी हो जाते क्योंकि वो आदमी और लोगों को बुला रहा इसका मतलब तैयारी उन लोगों की पूरी थी और अब तो उन्होंने मुझे और राजीव को भी देख लिया है ।
पता नहीं साला ये जिंदगी कब शांति से कटेगी इन सब चोचलों में ना पड़ूं इसलिए घर छोडकर यहां आ गया यहां अभी ठीक से तीन दिन नहीं बीते जब तक यहां भी वही लडाई खून खराबा होना शुरू हो गया...... हालांकि मुझे इससे कतई घबराहट नहीं हो रही थी क्योंकि ये सब छोटी मोटी चीजों से बहुत ऊपर की चीजें में बचपन से ही देखता आ रहा था ।
ये सब ख्याल आते आते मुझे नींद भी आ गई.....
अगले दिन सुबह उठकर मैंने अपने नियम अनुसार कम किया और रनिंग के बाद घर आया आज सिम के चालू होने का दिन था इसलिए मैंने अपने फोन मे सिम डाला तो नेटवर्क आ गये थे फोन स्टार्ट करने के बाद में नहाने चला गया नहाकर मैं अपने कपड़े पहन ही रहा था की मेरे फोन की घंटी बजी और फोन की स्क्रीन देखे बिना मैने एक्साइटेड होकर फोन उठा लिया और जैसे ही सामने से आवाज मेरे कानों में आई मेरी सारी एक्साइटमेंट ने खुदकुशी करली ।
"कैसे हो ".....सामने से मेरे पिता की आवाज आई।
"जी ठीक हूं पापा "
पापा - "पढाई अच्छी चल रही है"
"जी"
पापा - "अच्छी बात है सेहत का ध्यान रखा करो"
"जी"
पापा - "मैं एक नंबर भेज रहा हूं कोई भी दिक्कत हो तो बेझिझक इस पर फोन लगाना मदद मिल जाएगी "
"जी"
पापा - "ठीक है ख्याल रखना मनी आर्डर भेज दिया है दो दिन में पहुंच जाएगा "
"जी"
पापा -"पूछो क्या पूछना है".....पापा ने हस्ते हुए कहा
मयंक -"आपको मेरा नंबर कैसे पता चला और अभी तो चालू किए हुए ही 20 मिनट हुए हैं?"
पापा -"बाप हूं मैं".....और फोन कट गया।
और फोन कटते ही मैंने एक लम्बी सांस छोडी पापा आसपास हो ना हो फिर भी आसपास ही होते हैं ऐसा लगता है की मैं मुजरिम हूं और मेरे पिताजी जेलर जिसके पास त्रिलोक दृष्टि है कहीं भी जाऊं बच नहीं ...... मुझे लगता है पापा को मेरी चोट का पता चल गया इसलिए सेहत का ख्याल रखने बोल रहे थे।
"हम्मममम हम्ममम"......गला साफ करने की आवाज मेरे कानों में पड़ी तो सामने देखा साक्षी मेरे सामने ही खड़ी थी मैंने साक्षी को देखा और फिर अपने आप को देखा अभी तो जीन्स का बटन भी नहीं लगा था एक्साइटेड था ना और ऊपर तो एक धागा भी नहीं था। मैं अपनी सोच में इतना गुम था की गेट खुलने का और साक्षी के आने का पता भी नहीं चला।
मैंने हड़बड़ाहट में पहनी जीन्स का बटन लगाया और साक्षी की तरफ घूमा और जैसे ही मैंने उसके तरफ देखा उसने झट से आंखें नीचे करली
"बोलो भी कुछ यहां क्या कर रही हो "......जब एक मिनट तक वो कुछ नहीं बोली तो हारकर मैंने ही पूछा।
"स्ट्रिप (पट्टी) चेंज करने आईं हूं...... मुझे पता था ये भीग गई होगी नहाते वक्त इसलिए"
मयंक -"इट्स फाइन मैं क्लिनिक पर चेंज करवा लुंगा".... मैंने अपनी पट्टी पर हाथ रखा तो गीली थी हालांकि नहाते वक्त मैंने कोशिश की थी की वोना भीगे पर हमेशा कोशिश सफल नहीं होती।
"तो आज ऐसे ही कोचिंग जाओगे मतलब".....हल्का हस्ते हुए साक्षी ने कहा
मैं समझ गया की वो इसलिए ऐसा कह रही थी क्योंकि ऊपर मैंने कुछ नहीं पहना था अब उसको कैसे बताता टी शर्ट उतारते वक्त कितनी बार चीख़ते चीख़ते रुका था पहनूं कैसे हाथ हिलाते ही भयानक दर्द जो होता है और ज्यादा करता तो टाकां खुलना तय था ।
"बैठो चुपचाप "...... मुझे सोच में गुम देखकर उसने मुझे बिस्तर पर बैठाते हुए कहा।
"नहीं नहीं रहने दो मैं मेनेज कर लुंगा "मैंने कहा
"तू चूतिया है भोस*के समझ नहीं आ रही तू कपड़े पहन नहीं सकता मैनेज क्या करेगा"...(मेरे दिमाग ने मुझसे चीख़ते हुए कहा)
उसके बाद मैंने पट्टी खुलने तक कुछ नहीं कहा हाथ हिलाते हुए दर्द तो हो रहा था और साक्षी मेरे चेहरे के भाव पढ रही थी।
"ये तो किसी नुकीली चीज का निशान है काफी गेहरा है निशान ...चा च्च चाकू हां ये चाकू का ही निशाना है"...... पट्टी हटते ही उसने घाव को ध्यान से देखते हुए कहा।
"प्लीज़ फोकस ओन स्ट्रिप पर ध्यान दो आहह"..... देखते देखते उसने टच किया तो मैंने कहा
उसने मुझे घूर कर देखा और शांति से पट्टी की और फिर टी शर्ट ना पहनने की सलह दी तो मैंने अपने नये कपड़े का बैग सामने रख दिया उसने उसमें से चेक शर्ट निकाली और पहनने में मदद भी की उसके बाद हम नास्ता करने आ गये आज भी आंटी का विहेवीयर सेम ही था। खैर फिर वही कोचिंग और सब कुछ नार्मल ही रहा और ज्यादा बकचोदी ना करते हुए मैंने भी उस रात सोना ही मुनासिब समझा क्योंकि दर्द बना हुआ था कतई कम नहीं हुआ था।
पेनकिलर मैं खाता नहीं तो डॉक्टर की दवाई ज्यों की त्यों रखी थी वैसे भी मैं बेनडेज के लिए गया था वही इसी रात एक जगह कुछ और ही होने वाला था
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*******, मध्यप्रदेश
यह म.प्र. का ऐसा इलाका था जो एक ओर से उत्तरप्रदेश और एक ओर से राजस्थान से अपनी सीमा सांझा करता था पर फिर भी तीनों से अलग था बिल्कुल अलग इसी क्षेत्र में तीन नदियां भी बहती है जो की 40 kms के इलाके में ही है...... जिसमें से सबसे बडी नदी के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम रखा गया और इसी बीयावन बीहड में एक छोटा सा गांव है जहां अक्सर ऐसे लोग जो की कानून के मारे जैसे की रुपय ना होने की वजह से दोषी सावित हो गये और पुलिस उनके पीछे है या बिना बात की सजा नहीं भुगतना चाहते वो सब आ जाते हैं तो एक तरह से ये ढेरा ही है...... चूंकि इस ढेरे के तीन ओर तक कई kms तक बीहड है और चौथी ओर 1.5 km पर नदी बहती है
इस इलाके में रोज की तरह इस रात भी महफ़िल लगी हुई थी। तब ही एक आदमी यहां इस महफिल में आता है हांफता हुआ और सीधे आकर एक आदमी से मुखातिब होते हैं और वो आदमी भरी महफिल से हवा की गती से उठता है और एक कच्चे मकान की तरफ बड चलता है।.......
"का हेगो रे तोए ....ऐसे काहे हांफ रहो है"......जब अपने घर में किसी के आने का एहसास होता है तो ये आदमी बिस्तर से उठता है तो अपने सामने दो आदमी को पाता है जिसमें से एक बुरी तरह से हांफ रहा था और दूसरा वही था जो अपने भरे जाम को छोड यहां दौडा आया था .....
"दद्दा वा(उस) विष्णु(मयंक के पिताजी ) के मोडा(बेटा) को पतो चलगो "...... हांफते हुए आदमी ने कहा ।
दद्दा - "सांची (सच) कह रहा है ना .....अगर बात गंत (गलत) निकली तो दुनाली ते माथे के चिथड़े उडाए देंगो"......इस समय इस व्यक्ति की आंखों जो आक्रोश था वो ऐसा था की अगर ये बहार निकल कर महफिल में पहुंच जाता तो इतने आदमियों में से एक भी चूं तक ना करते
आदमी -"सांची कह रहूं दद्दा "
"कहां घुसो बैठो है विष्णु को मोडा ".......अपने दांत पीसते हुए इस अधेड उम्र के व्यक्ति ने सिर्फ इतना ही कहा ....
"इंदौर"......उस आदमी ने हकलाते हुए कहा और ये वही शहर है जहां मयंक अपनी पढ़ाई के लिए गया है।
अध्याय - 12
"प्रणाम दद्दा .... आज मेरी याद कैसे आ गई"
(अब मैं लोकल भाषा को भी हिन्दी में ही लिखुगां क्योंकि कुछ लोगों को प्राॅबलम होती है)
दद्दा -"प्रणाम ठीक है तुझसे काम था मुझे"
"हुकुम करो दद्दा "
दद्दा -"विष्णु को तो जानता ही है तू ?"
"हां जानता हूं दद्दा अच्छी तरह से जानता हूं उसको.....और उससे भी अच्छे से जानता हूं उसके लडके को जिसकी वजह से मुझे यहां उज्जैन में रहना पड रहा है।".....
दद्दा -"अच्छा अगर मैं विष्णु के लडके को तेरे यहां भेज दूं तो क्या करेगा उसका ?"
"दद्दा उसके टुकड़े करके अपने पालतू कुत्तों को खिलाऊंगा".....इस आदमी ने अपने बगल से खडे एक जर्मन प्रजाति के कुत्ते जो बुलेनबीसर नाम से जाना जाता है उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा।
दद्दा -"तो फिर तैयार रख अपने कुत्तों को और तू भी तैयार हो जा क्योंकि वो विष्णु का लडका तुजसे 50 kms दूर है "
"क्या !"....वो आदमी कुर्सी से खडा हो गया।
दद्दा - "हां...इन्दौर में रह रहा है वो अब उसको ढूंढना है तुझे उसके साथ जो भी करना है तू करना अपना बदला लेना .....पर पहले मैं विष्णु को बुलाऊंगा उसके लडके के बहाने उसके बाद विष्णु मेरा और वो लडका तेरा "
"पर दद्दा उसको पहचानुंगा कैसे मैं उसको जानता नहीं और ना उसको मैंने देखा कभी ".....
दद्दा -"बहनचोद अब ये भी मैं करूंगा ......अगर पता होता की इंदौर में कहां है वो तो अब तक इंदौर होता मैं "
"ठीक है मैं लगवाता हूं पता उसका "
दद्दा -"पता लगते ही पहला फोन मेरे पास आना चाहिए नहीं तो फिर फोन में करूंगा तेरी लाश को ठिकाने लगवाने के लिए "
"जज्ज... ज..जी दद्दा प्रणाम "......फोन कटने के बाद इस आदमी ने एक लंबी सांस छोडी और फिर एक नंबर डायल किया ।
"हेलो ..... हां मैं बात कर रहा हूं एक काम करना है!".......
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"एक बात पूछूं तुझसे मयंक "..... राजीव ने मेरी तरफ घूमते हुए कहा।
"नहीं "..... मैंने अपना चहरा अपने हाथ के पंजे पर रखकर हाथ टेबल पर टिका लिया पर आंखें इफ्तिका को देख रहीं थी जो इस वक्त अपनी नोटबुक में बड़े धयान से टीचर की बात को लिख रही थी ।
राजीव -"तुझे इफ्तिका पसंद है ना ?"
मयंक -"बहुत ज्यादा पसंद है "
"हरामी साले..... बकचोदी मत कर" मैंने एक मुक्का राजीव की जांग में देते हुए कहा क्योंकि की जैसे ही मैंने अपना मुंह बोलने के लिए खोला तो उसने एक कागज का टुकडा मेरे मुंह में गुसा दिया।
और फिर मैंने उसकी बकचोदी को माफ किया और फिर से एक बार इफ्तिका पर फोकस किया पर तब ही साक्षी की पेनी नजर मुझसे मिली और मैंने उसको इगनोर किया और अपना पूरा ध्यान इफ्तिका पर केंद्रित किया उसके हल्के गुलाबी होंठ इतने लाजबाब थे क्या ही कहूं।
"चूतिये तू कुछ कह भी नहीं सकता ....अब सुन मैं बताता हूं कैसे करते हैं तारीफ".....मेरे दिल ने मुझसे कहा...
"मेरे होंठों के करीब हैं होंठ तेरे ,
ऐसे में शराफत का सवाल कहां
करने दे जी भरके गुस्ताखियां
कि अब इजाज़त का सवाल कहां....!!"
"कहां से लाता है इतनी बकवास शायरी चुप चाप रहे "..... मैंने अपने दिल से कहा
"ये शायरी बकवास लग रही तभी तो अब तक कोई लडकी नहीं मिली तुझे "......दिल ने अपनी दलील दी।
अभी मैं और मेरा दिल बात कर ही रहे थे की एक बार फिर मेरी नजर साक्षी से मिली और इस बार उसने आंखों से पूछा क्या है मैंने भी अपना सर दांए बांए घुमाकर बता दिया कुछ नहीं तो अब की बार साक्षी ने मुझे सामने देखने के लिए इशारा किया और घूर कर मुझे देखने लगी ।
राजीव - "क्या है साले अभी तो तुझे कोचिंग चालू किए हफ्ता नहीं हुआ और तेरा ध्यान पढ़ाई से हट भी गया पूरी क्लास में तूने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया है "
मयंक - "अपनी बात मत कर चूतिए.... ये वाला चैप्टर मैंने कल रात को ही निपटा दिया "
राजीव -"दुश्मन ना करे दोस्त ने वो काम किया है ".....उसने गाते हुए कहा।
मयंक -"चुप हो जा बेसुरे अगर मेम ने सुन लिया ना तो दोनों बहार जाएंगे और अब कोई नौटंकी नहीं और मुझे डिस्टर्ब मत कर चुपचाप पढ मैंने पहले पढ़ा है तूने नहीं इसलिए ध्यान दे क्लास में "
"बेटा आप दोनों खडे हो जाएं ".....अभी राजीव कुछ कहने ही वाला था तब तक ये आवाज हम दोनों के कानों में पडी और हमने मेम की तरफ देखा ।
"खडे हो जाओ एक बार में कम सुनते हो क्या"....एक बार फिर मैडम ने हमारे तरफ देखते हुए कहा और मैं खडा होकर माफी मांगने ही वाला था और शायद मैं माफी मांग लेता तो मैटर खतम हो जाता और हम दोनों बैठ जाते पर तब ही राजीव के भीतर का चूतिया जग गया ।
और राजीव ने एक खींच कर थप्पड़ अपने सामने बैठे लडके में मारा थप्पड़ इतनी जोर का था की पूरी क्लास में आवाज गूंज गई मैडम मुंह फाडे हमें देख रही थी। वो लडका अपने सर हाथ फेरते हुए खडा हुआ और घूम कर उसने राजीव को घूरा और कहा...
"थप्पड़ क्यूं मारा पागल है क्या ".....
राजीव -"मैडम कब से बुला रहीं हैं समझ नहीं आता एक बार में"
तब ही उसके बगल वाला यानी की मेरे सामने वाला फुर्ती से खडा हुआ और बोला ।
"मारा कैसे वे तूने .... चट्ट्टटाक्क््क ".......
"ऐसे "....उसने जैसे ही राजीव की तरफ ऊंगली की मैंने उसके गाल को लाल करते हुए उसको बताया (यहां पहले वाले को 'पहला' और दूसरे लडके को 'दूसरा' लिखुंगा )
मैडम -"जस्ट शट अप फोर ओफ यू".....मैडम ने लगभग चीखते हुए कहा वो दोनों मुझे और राजीव को ऐसे घूर रहे थे जैसे खा जाएंगे पर शायद उनको हमारे थप्पड़ खाकर पता चल गया था की उन्होंने 'चूं' की भी आवाज निकाली तो उनका गाल एक बार फिर लाल होगा । तब तक मैडम हमारे पास चल कर आ चुकी थी ।
"आप दोनो अपना चेहरा दिखाओ".....मैडम ने उन दोनों लडको को कहा।
फिर मैडम ने गहन जांच की दोनों की पहले वाले के तो सर में टपली पडी थी वो भी राजीव ने हल्के हाथ से मारी थी तो ज्यादा नहीं लगी पर दूसरे वाले का होंठ फट गया था थोडा सा... तो वहां से हल्का हल्का खून निकल रहा था जैसे ही मैडम ने खून देखा उन्होंने मेरी तरफ देखा और जैसे ही मैडम ने मुझको देखा मैंने नीचे देखा ।
मैडम -"हेलो नीचे क्या देख रहे हो इधर देखो इधर ....नाम क्या है तुम्हारा "
मैं चुप रहा और शांति से नीचे देखता रहा जैसे कोई शर्मीला बालक होता है बिल्कुल उस तरह ।
मैडम-"मैंने पूछा नाम क्या है तुम्हारा"
राजीव -"मेम इसका नाम मयंक है"
"और तुम्हारा वकील है ना "....मैडम ने राजीव को घूरा और राजीव ने गर्दन ना में हिला दी।
"फिर उसकी वकिलात क्यूं कर रहे हो ....वो गूंगा तो है नहीं अभी आवाज भी सुनी थी उसकी "
"मेम मेरा नाम मयंक शर्मा है"..... मैंने बीच में रोकते हुए कहा क्योंकि अगर मैं नहीं बोलता तो मैडम राजीव को सुना ती ।
"और तुम्हारा नाम क्या है वकील साहब"....मैडम ने मेरा नाम सुनकर राजीव से पूछा।
"मेम इसका नाम राजीव गहलोत है"... मुझे लगा अगर राजीव अपना नाम बताता तो मैडम फिर मजा लेती इसलिए मैंने जल्दबाजी में बोल दिया ।
"लगता है तुम दोनों पागल हो जब एक का नाम पूछा तो दूसरे ने बताया और दूसरे से पूछा तो पहले ने ये क्या लगा रखा है.....खैर छोडो तो मिस्टर मयंक और राजीव आप दोनों क्लास से बहार निकल जाओ और इन दोनों से माफी भी मांगो".....मैडम ने वापस अपनी जगह पर जाते हुए कहा
"अजी लं* मेरा " ..... जैसे ही मेडम ने माफी मांगने की कहा मेरा दिमाग जोर से चीखा।
"भोसडीके तू ही मांग साॅरी "..... मैंने राजीव से कहा और जल्दी जल्दी क्लास से बहार आ गया।
तब ही मुझे राजीव की आवाज आई जो की उन दोनों से माफी मांग रहा था मेरा दिल इतना खुश हुआ बता नहीं सकता तब ही मुझे मैडम की आवाज आई जो की उन दोनों लडको से कह रही थी।
"अब राजीव और मयंक ने माफी मांग ली है तो तुम दोनों भी उनको माफ कर दो इसलिए मुझे लगता है मयंक को भी अंदर बुला लेना चाहिए और राजीव तुम अपनी जगह पर बैठ जाओ"
दूसरा लडका -"मेम लेकिन मयंक ने साॅरी नहीं बोला है अभी तक सिर्फ राजीव ने ही कहा था "..... मैं आवाज से पहचान गया की ये वही वाला है जिसको लाल किया था मैंने....... मैंने मन ही मन सोच लिया था इसकी तो गांड तोडनी है बहनचोद एक ने सॉरी बोल दिया वो कम है तू बहार मिल साले अभी अपुन सोच ही रहा था की मैडम की आवाज आई
"मयंक कम इंनफ्रंट ओफ मी ".....
मैं भी दरवाजा पर आ गया दीवार की ओट से निकल कर
मैडम - "आपको माफी मांगने को बोला गया था आपने क्यूं नहीं मांगी ".... मेडम की बात सुनकर मैंने उस लडके को घूरा और आंखों से दमकाया ।
"मेम रहने दीजिए मुझे माफी नहीं चाहिए आप इसको अंदर बुला लीजिए"......दूसरे लडके अपने गाल पर हाथ फेरते हुए कहा।
"फाइन सो मुझे लगता है मयंक माफी मांगने के मूड में नहीं है तो अब उसको क्लास में लाने का मेरा मूड भी जब बनेगा जब वो हेड आफिस से एप्लिकेशन लेकर आयेगा क्लास में आने के लिए"...
ये जियोग्राफी वाली मैडम तो अपने सब्जेक्ट की तरह ही टेडी निकली कोई बात नहीं माफी नहीं मागने वाला चाहे कुछ भी हो जाए । फिर मैडम का लेक्चर खत्म हुआ मैडम बहार निकली और बोली।
"अब तुम जा सकते हो पर मेरा लेक्चर अटेंड करना है तो ऐप्लिकेशन ले आना आफिस से " मैं कुछ बोला नहीं उन्होंने 10 सेकेंड मुझे देखा जब मैं कुछ नहीं बोला तो वो चली गई। और उनके जाते ही मैं क्लास में घुसा और गुस्से में उस लडके की तरफ जा रहा था पर बीच में ही इफ्तिका से नजर टकरा गई फिर मैंने सोचा छोडो यार दुनिया प्यार के लिए ही तो बनी है क्यूं मार पीट करना और चुपचाप अपनी जगह पर बैठ गया।
"मुझे लगता है आपको उससे माफी मांगनी चाहिए थी।"...... कोचिंग से बहार निकलने के बाद इफ्तिका ने मुझसे कहा।
अब देखो वैसे तो मैं इफ्तिका को पसंद करने लगा था पर इतना भी नहीं की उसके लिए किसी चूतिये से माफी मांगता इसलिए मैंने कहा
"ठीक है कल मैं मैडम से माफी मांग लुंगा "....
साक्षी -"माफी लडके से मांगनी है मैडम से नहीं "...
"रहने दो साक्षी ऐसा नहीं होगा हाहा".... राजीव ने बीच में आते हुए कहा और उसकी बात सुनकर मैं भी मुस्कुरा दिया ।
उसके बाद मैं और बाकी सब घर की तरफ चल पड़े आज मैंने सोच लिया था आंटी से बात करके ही रहुंगा।
Story me ab ek ek kirdar saamne aa rahe heTo ab daav pench lagane shuru hue he , shaah maag ke khel me pyade marte rahenge, akhir rajao ka ego bhi to satisfy karna heUpdate no. - 15
"आह्हह््ह".....एक दम से मेरे सर में दर्द हुआ तो आंखें खुली मेरी पर तभी बहनचो जैसे पूरी जमीन एक बार फिर हिली और मेरा मुंह हवा में उठा और फिर टकरा गया....फिर मैंने जरा ध्यान दिया अपने आसपास तो मुझे महसूस हुआ कि की मैं चल रहा हूं सॉरी उड रहा हूं
"भोसडीके तू गाडी में है"....मेरी बकचोद सोच को गरीयाते हुए मेरे दिमाग ने कहा।
एक बार फिर मैंने अपने आस पास देखा तब समझ आया मैं ओमनी गाडी में था और मेरे सामने दो जानवर टाइप आदमी थे और एक मेरे बगल में बैठा था जिसको मैने पेला था । और आगे वो दोनों पुराने वाले चूतिए थे बस वो दोनो खबरी और वो पतला वाला जिसका सर पोल में दिया था वो दोनों नहीं थे और एक और सांड टाइप आदमी नहीं था शायद वो उन दोनों के पास था ।
मैंने अपने हाथ हिलाने की कोशिश की तो हिल गये मतलब मेरे हाथ बंधे नहीं थे पर सर में अभी भी ऐसा लग रहा था जैसे हथोडे पड रहे हों भयंकर वाला दर्द था मैं समझ गया था की ये लोग साक्षी को नहीं पकड पाए थे तो मुझे ही ले जा रहे थे अपने बॉस के पास मेरी नजर बहार पडी तो देखा अभी हम उस ही सुनसान रोड पर थे जिसका नाम मैंने साक्षी से पूछा था।
अब देखो वैसे तो मुझे चुपचाप डला रहना चाहिए था क्योंकि मैं अपने शरीर के दर्द से समझ गया था की इन्होने बेहोस होने के बाद भी मारा है मुझे तो मेरा दिमाग सटक चुका था कैसे लोग हैं बहनचो पीछे से मारते हैं....
(तो साले तूने भी उस खबरी को पीछे से मारा था ....मेरे मन में एक अवाज आई...
"लेकिन मैं अकेला भी तो था ".... मैंने खुद को ही समझाया और और....
और क्या सीधा हुआ एकदम से जिस सीट पर बैठा था उसपर दोनों हाथ टिकाए और शरीर को उछाल ते हुए दोनों लातें सखमने वाले के मुंह में दी उसके बहुत जोर से लगी थी क्योंकि गाडी का कांच टूटा और उसका सर बहार की तरफ लटक गया मैंने बिना मोका देते हुए अपने बगल से अधमरे गुंडे के मुंह में कोहनी दी अपना सर सीट पर टिका कर गाडी की छत की तरफ मुंह करे सो रहा था तो कोहनी सीधे नाक और होंठ में पडी और उसकी छीख निकली तभी वो जो बंदा एक और था ना सामने वाला वो सांड जैसे मुझसे टकराया और उसकी टक्कर से मेरा शरीर गाडी की बाॅडी से टकराया और मेरे फिर उस कंधे में लग गई और इस बार मुझे इतना गुस्सा आया की मेरी नसें फटने को हो गई।
मैंने अपने सीधे हाथ को उसकी गर्दन में फंदे जैसे फसाया और उसका सर एक बार दिया गाडी की बाॅडी में फिर दूसरी बार तीसरी बार चौथी बार और बस देता ही गया जब तक उसका सर नहीं फट गया जब उसके सर से खून के फब्बरा निकला तब छोडा मैंने उसको पर तब ही आगे वाले का हाथ पीछे को घूमा और उसके हाथ में बंदूक थी जैसे ही उसने निशाना मुझ पर लगाया मैंने उसके हाथ पर छलांग लगाई उसके हाथ को पकडा और अपनी तरफ खींचा और खींचता हुआ पीछे होता गया जब तक वो भी सीट के ऊपर से पीछे की तरफ नही आ गया जहां मैं बैठा था पहले तो उके हाथ को मोडा जब उसके हाथ से बंदूक छूटी तो सीधा मुक्का उसके मुंह में जडा और वो मरीयल सा एक मैं ही खून डाल गया पता नहीं मर गया या बेहोश हो गया ।
जब मेरा ध्यान ड्राइवर वाली सीट पर गया तो उधर कोई था ही नहीं
"अॉटोपायलेट है ये गाडी "...... मैंने खुद से कहा लगता है मेरे दिमाग में ज्यादा चोट लगी है।
पर तब ही मेरा ध्यान गाडी की स्पीड पर गया और लोग को यकीन नहीं होगा गाडी की स्पीड...गाडी की स्पीड लंड बराबर थी मतलब गाडी जगह पर थी तब ही मेरे दिमाग ने एक बहुत मुश्किल सवाल किया कि ये सब किस तरफ इशारा कर रहे हैं।
"अबे लोडूं गाडी छोडकर ड्राइवर भाग गया "....मेरे दिमाग ने मुझे कहा।
और दिमाग की बात सुनते ही मैं जल्दी से बहार निकला और जैसे ही सुनसान रोड पर नजर डाली तो वो तीसरा चूतिया भयंकर तरीके से भाग रहा था मतलब हुसैन बोल्ट टाइप अभी मैं सोचा की इसको पकडता हूं फिर सोचा गांड मराये ये मेरे दर्द हो रहा था बुरा वाला काश मैं अपनी पटाके वाली बंदूक लाया होता तो ये चूतिया बिछ गया होता और ऐसे ही मैंने अपनी उंगलियों से बंदूक बनाकर एक आंख बंदकर उस पर निशाना लगाया और अपने मुंह से ही गोली चलाने की आवाज निकाली और ऐक्टिंग की पर बहनचो वो आदमी मर गया ....एक पल के लिए तो मैं भी चोंक गया ये क्या हुआ हाथ से गोली कैसे निकली ...
"हैलो मिस्टर कुछ हेल्प चाहिए क्या ".....मेरे पीछे से आवाज आई।
"मिस्टर नही भगवान बोल भोसडीके हाथ से गोली चलाई है मैने वो देख सामने वो 100m आगे मरा डला है "....मैने बिना पीछे मुडे ही कहा फिर जब तसल्ली हुई की मर गया मादरचोद तब पीछे घूमा।
और पीछे देखा तो एक आदमी अपनी पिस्तौल से साइलेंसर खोल रहा था और मुस्कुरा रहा था मेरी तरफ और जैसे ही मेरी और उसकी आंखें मिलीं तो उसने अपनी बंदूक की तरफ इशारा किया जैसे बता रहा हो तू चूतिया है भगवान नहीं और गोली मैंने चलाई थी तूने नहीं फिर जब मैंने सही से देखा तो उसके पीछे अंधेरे में एक जीप खडी थी जिसमें तीन और लोग थे वो आदमी धीमी चाल चलते हुए आया मेरे पास और मेरे कंधे पर हाथ रखा ।
"बल्ली नाम है मेरा और जो विष्णु भाईया ने नंबर दिया है मेरा है....... मतलब जिस नंबर पर तुमने sms किया था मदद का वो मैं ही हूं अब तुम जाके जीप में बैठो मैं जरा इनको निपटा दूं और मुझे सहारा देते हुए जीप में बिठाया और एक आदमी से इस उस ओमनी को लास के पास ले जाने को कहा फिर मैं तो टेक लगा कर जीप की सीट पर पसर गया आंखें बंद करली कुछ ही देर बाद
"धांए .. धांए........... धांए..धांए ".....चार गोली चली में समझ गया की बाकी चार भी स्वर्ग सिधार गए फिर मैंने सोचा उसको साइलेंसर लगा के क्यूं मारा पर मेरे दिमाग ने मना कर दिया की वो नहीं बताऐगा क्योंकि वो थका हुआ है इसलिए मैं उससे कुछ नहीं सोचा ।
"धम्मममममाकक्क्कक".....अभी मैंने कुछ ना सोचने का सोचा ही था की एक भयंकर धमाके की आवाज आई और मैं उचक के सीधा बैठा तो वो चारों जीप की तरफ आ रहे थे और लो ओमनी जल रही थी भयंकर तरीके से.....
उसके बाद मैं बस आंख बंद करके लेट गया जीप चालू होने की आवाज आई और आगे बड गई.....
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50 मिनट पहले (ये वो टाइम है जब मैं और साक्षी फालुदा खा रहे थे)
"ट्रिन ट्रिन"..... आशीष जो अभी अपने सरकारी घर जहां वो सोता था दफ्तर से आने के बाद वहां घुसा ही था की उसके फोन की घंटी बजी ।
"हेलो कौन"..... आशीष ने फोन जेब से निकाला और काॅल चालू करते हुए पूछा।
"आशीष अहलावत जी से बात हो रही है"...... सामने से आवाज आई।
आशीष -"जी उसी से बात हो रही है "
"मेरा नाम सैफ उस्मानी हैं "....
आशीष -"तो आखिरकार आपने हमें फोन कर ही लिया अच्छा है नहीं तो मैं खुद आ रहा था आपसे मिलने "
"मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है बरखुरदार आपकी तरह बस इतना कहना था की मेरा माल छोड दो नहीं तो यूं ही परेशानी बुला रहे हो अपने जीवन में "
आशीष -"मैं भी यही कह रहा था आपसे आप अपना पूरा गैरकानूनी माल हमारे हवाले कर दे और आपकी इज्जत का ख्याल रखते हुए आपकी सजा कम करवा दुंगा"
"अभी आपको महीना भर हुआ है नीमच में आए इसलिए शायद आप मुझसे वाकिभ नहीं है वरना ऐसे बात नहीं कर रहे होते"...
आशीष -"अगर मैं फिर भी ना कहुं तो "
"तो फिर एक हाथ से हमारा सामान हमको देना और दूसरे से अपनी बेटी ले जाना जो कुछ ही देर में हमारे कब्जे में होगी".....और सामने से फोन कट गया।
सैफ की आखरी बात सुनते ही आशीष के तो जैसे हाथ पांव फूल गये उसने हड़बड़ाहट में रोमा को फोन किया .....
"हैलो रोमा"...... सामने से फोन उठते ही आशीष ने कहा
"क्या हुआ आपको ऐसे गबराए हुए क्यूं हो आप क्या हो गया सब ठीक है ना ".....अपने पती की घबराहट को महसूस करते हुए रोमा ने भी चिंता से कहा।
"रोमा साक्षी किधर है".....
रोमा -"वो तो मयंक के साथ बाजार तक गई आपको क्या हुआ।"
"फोन लगाओ मयंक को दोनों बच्चों को ख
तरा है जल्दी"
रोमा -"पर हुआ क्या ये तो बताए "
"मां|||||"......अभी रोमा और आशीष बात कर ही रहे थे की साक्षी ने घर के भीतर घुसते हुए रोमा को पुकारा....
