अध्याय 27 भाग:- 1
18th दिसंबर की रात के मुलाकात के बाद मेरी हर्ष से कोई भी मुलाकात नहीं हुई थी, और 18 दिसंबर के बाद से संदेश भी आने बंद हो गए थे... 21 को दिल्ली जाने से पहले मै एक बार हर्ष से मिलना चाहती थी, इसलिए राजवीर अंकल और उपासना आंटी से मिलने मै पहुंच गई.…..
यहां जब आयी तो पता चला कि अंकल और आंटी ही नदारत थे, और प्राची अपने ससुराल में व्यस्त. मुझे समझ आ गया की हर्ष, अंकल-आंटी के साथ निकला है और उसके साथ भी वही सिचुएशन हुई है जो मेरे गांव आने पर होती है..
प्रायः ये होता है कि घर के अभिभावक की मन्नत होती है यदि बेटी की शादी अच्छे से हो गई, तब फलाने जगह माथा टेकने जाएंगे.. पैदल यात्रा करेंगे या अन्य कोई मन्नत.. शायद वही उतारने हर्ष के साथ निकले हो..
हालांकि ये भी अजीब था, क्योंकि शादी के चौथे दिन विदाई की रश्म होती है, और भी अन्य रस्में जिनमे मायका पक्ष का होना अनिवार्य होता है.. लेकिन यहां तो तीसरे दिन ही सब खाली.. मन में सवाल के साथ मै दिल्ली के लिए निकल गई.…
हर्ष की देखने की छोटी सी ख्वाइश थी लेकिन पूरी ना हो पाई.. इकोनॉमी फोरम पर यह मेरा लगातार दूसरा साल था जब कॉलेज के लिए मुझे ही चुना गया था... दिसंबर से लेकर शुरवाति जनवरी तक इतना टाइट शेड्यूल था कि मुझे श्वास लेने की भी फुरसत नहीं थी..
रोज ही लगभग मेरी नकुल और प्राची से बात हो रही थी, घुमा फिराकर मै हर्ष के बारे में पूछती और वो दोनों एक ही उत्तर देते... यूके गया है कोई कॉन्फ्रेंस मे.. लौटा नहीं है...
मै यहां दिल्ली में थी और नकुल, प्राची के साथ अपने सहर.. दोनो दिल्ली आने का नाम ही नहीं ले रहे थे और ना ही अब पहले जैसी बातें हो रही थी.. पर्दे के पीछे कुछ तो कहानी चल रही थी.. जिसका ज्ञान मुझे नहीं था..
1 जनवरी का कोई विश ना हुआ और ना ही 2 जनवरी तक मेरे पास किसी के कॉल आए. किसी का फोन से मतलब ना तो मेरे घर से और ना ही नकुल के घर से. नकुल का तो क्या ही कह दूं, 3 दिन से तो मुझे बस इतना ही कह रहा था कि अभी व्यस्त हूं, रखता हूं.…
8 जनवरी 2015, मै सभी सेमिनार और इकोनॉमी फोरम को अटेंड करने के बाद 3 दिन से फ्री बैठी हुई थी और सोच रही थी कि एक बार गांव जाकर मामला समझ तो लिया जाए कि वहां चल क्या रहा है..
मै सोच ही रही थी कि उधर से मां का फोन आ गया और बहुत ही कड़क लहजे में वो पूछ रही थी कि "क्या मेरे और हर्ष के बीच कोई प्रेम प्रसंग का मामला है".. मां के मुंह से यह सुनकर मेरे कलेजा कितनी जोड़ से धड़का होगा, वो मुझे भी पता नहीं... मै बिल्कुल ख़ामोश थी और जवाब ना पाकर वो फोन पर ही चिल्लाने लगी..
मै मौन स्वीकृति दे चुकी थी और मां रो रोकर चिल्ला रही थी. अंत में एक ही बात कही.. "गांव वापस लौटकर मत आना, तेरे लिए सब मर गए है.." उनके फोन रखते ही तुरंत एक के बाद एक सबके कॉल आने शुरू हो गए, और अंत में नकुल का कॉल आया....
"तुम उस फ्लैट में हो इसलिए हम दिल्ली नहीं आ पा रहे. इससे ज्यादा कोई बात नहीं हो पाएगी.. तुम बस वहां से कहीं भी चली जाओ"…
घर गया, रिश्तेदार गए और आखरी मे रिश्ता भी चला गया. मै गरीब हो गई लेकिन कैसे, ये मुझे दूर-दूर तक पता नहीं था.. क्या करना था वो मै बाद मे सोचती, पहले तो दिल में चुभन सी हो रही थी और मुझे ये घर छोड़ना था...
मै बुत बनी असहाय सी मेहसूस कर रही थी, घर की घंटी बजी और मै किसी तरह जब दरवाजा खोली तो सामने मौसा, मौसी, गौरी और मैक्स खड़े थे.. मै लड़खड़ाई मासी के ऊपर ही लगभग गिरी और सिसकती हुई किसी तरह कहने लगी.. "नकुल ने मुझे घर छोड़कर जाने के लिए बोल दिया"….
मुझे उसके बाद फिर होश नहीं... डबडबाती आखें ना जाने कितने दिनों की भोर और सांझ नहीं देख पाई.. कहां हूं कुछ समझ नहीं पाई। वहां मेरे पास मेरी प्यारी मां यानी की मेरी मासी थी.. आखों मे उनके आशु नहीं थे, मुस्कुराकर वो मेरे सर पर हाथ फेरती बस यही दिलासा दे रही थी, "मै हूं तू चिंता क्यों करती है..."
किन्तु हम दोनों ही जानते थी कि वो अंदर से कितनी दर्द मे थी... फिर पहुंचे मेरे दोनो भाई, और साथ में थी मेरी दोनो भाभी और सभी बच्चे.. मै क्या प्रतिक्रिया देती.. बस अपने आशु समेटकर तुरंत ही मुस्कुराती हुई साक्षी के गले लगकर उसे चूमती हुई पूछने लगी... "मेरा बेटा कैसा है"..
उसकी मासूम नजरें, मेरे चेहरे को देख रही थी.. वो बड़े ही ध्यान से मुझे देख रही थी, मानो पूछ रही हो, "दीदी क्या तुम रो रही हो?".. मै उससे नजरे मिलाने में असमर्थ हो चुकी थी और उसका खिला सा चेहरा पुरा ही उतर चुका था...
12 फरबरी, सब लोग जा रहे थे.. मासी जाते हुए मुझसे बस इतना ही कहकर गई... "जब लौटो तो मेरी बेटी मेनका को भी साथ लेकर लौटना. जबतक वो नहीं लौटेगी मेरे हलख से खाना का निवाला बड़ी मुश्किल से नीचे उतरेगा... मैक्स, गौरी, अपनी बहन मेनका के साथ ही लौटना".. मेरी पथराई आखें बस सबको जाते हुए देख रही थी... वहां मैक्स और गौरी के अलावा, मनीष भैया और रूपा भाभी रुके, जो मुझसे पूछ रहे थे "आगे क्या सोचा है?"
हर्ष, प्राची और नकुल के शादी के दूसरे दिन ही घर छोड़कर कहीं चला गया था... सबके लिए बस एक ही संदेश छोड़कर गया था…. "कुछ घुटन सी हो रही है कई दोनो से, मै ज़िन्दगी की तलाश में जा रहा हूं"…
एक हफ्ते पहले जब कुछ सामान्य हुई थी तब रूपा भाभी वह संदेश पढ़कर सुनायी थी... मेरे दिमाग के अंदर 1000 सवाल थे.. लेकिन केवल सवाल..
उधर राजवीर और उपासना सिंह पुत्र वियोग में थे. जैसे ही मेरी और हर्ष की कहानी सामने आयी, बिना कारन के ही हर्ष के घर छोड़ जाने का कारन बन गई... हां, संभवतः हर्ष के घर छोड़ जाने का कोई पुख्ता कारन ना मिल पाने पर हमारा मामला प्राची ने ही सबके सामने रखा होगा..
द्वेष ने मन में ऐसा खटास पैदा किया, राजवीर सिंह और पापा के बीच में विवाद बढ़ता ही चला गया.. फिर कहानी भी वही होती है, जिसकी लाठी उसकी भैंस.. ऊपर से प्रेम प्रसंग के किस्से मे फजीहत तो लड़की और लड़की के घरवालों को हो उठानी पड़ती है...
मेरी मां जब तक हिम्मत से डट सकती थी डटी, लेकिन पापा की बेइज्जती ने उनका भी हौसला तोड़ दिया शायद और 27 दिसंबर से चल रहे मसले मे, मां टूटकर 7 जनवरी को मुझे ही पूरे प्रसंग मे दोषी मानकर सबसे माफी मांगी, और कह दी, "लौटकर फिर वापस नहीं आना..."
इन सभी घटनाओं के पीछे का जवाब एक ही लड़का था, हर्ष.. वो भी अपने जाने से पहले एक बड़ा सा सवाल छोड़े जा चुका था, जिसका जवाब तो उससे मिलने के बाद ही पता चलता...
मै आधी फरबरी से लेकर आधे मार्च तक रूपा भाभी और मनीष भईया के साथ यूरोप के चक्कर काटती रही, लेकिन ये काम हमारे बूते का नहीं था... मार्च आखरी तक कुछ और भी ज्यादा सामान्य थी, क्योंकि जिस बात के लिए सबसे ज्यादा रोई थी, मेरी मां.. उन्होंने मुझे सामने से कॉल करके माफी मांगी और कहने लगी.. "ढूंढ कर लाओ उस हर्ष को कहीं से भी, तभी अब दिल को सुकून मिलेगा.? अगर कहीं मर गया हो तो उसकी लाश पता लगाना, लेकिन उसके छोड़े संदेश के पूरे जवाब के साथ लौटना..."
मन में अब हर्ष के लिए केवल घृणा ही बची थी, उससे ज्यादा कुछ नहीं... मार्च का महीना, इस वर्ष भी काफी सारे ऑडिट होने थे और मै अभी मात्र एक ट्रेनी थी, जिसका सर्टिफिकेट उसका सीए देता... और तब जाकर मै सीए फाइनल के एग्जाम में बैठती...
रजनीश भईया को थोड़ी कहानी पता थी और उन्होंने जनबरी मे ही कॉल करके कहा था.. तुम जो कर रही हो वो करती रहो… सेर्टिफाई करना तो मेरे हाथ में है.. निश्चिंत होकर काम पर लौटना...
32 हजार की सैलरी मेरी बराबर आ रही थी, लेकिन आर्थिक स्थिति अब पहले जैसे नहीं थी.. मनीष भईया जब मेरे अकाउंट्स मे अपनी शाविंग्स डालते, तो आज बहुत ही अजीब लग रहा था... ऐसा लग रहा था मै घूमकर फिर से अपने घर की चार दिवारी मे आ गई, जहां पूरी तरह से मै अपने पिता और भाइयों पर आश्रित थी..
मन में विद्रोह सा था, घर के अंदर अपने पापा का, अपने घर का काम तो कर देती थी, यहां तो मेरी भाभी और मेरा भाई अपना काम भी छोड़े है, मेरा भी काम कर रहे और उल्टा मुझे पाल भी रहे...
ये एक ऐसी फीलिंग थी जहां मै सोचने पर मजबूर हो गई थी क्या हासिल कर लिया घर छोड़कर, अंत में बदनामी और जिल्लत... मै कुछ वक्त खुद को अकेली देना चाहती थी, इसलिए कहीं किसी पार्क के ओर जा रही थी... सामने फिर से वहीं नेशनल लाइब्रेरी थी.. जहां कुछ महीने पहले एक संतुष्टि के भाव लेकर गई थी... आज सामने फिर से वही लाइब्रेरी थी.. और सबसे ज्यादा रुलाने वाली वही इंसान था, बस आज जब मै लाइब्रेरी से लौटूंगी तो वो नहीं होगा..
मै फिर से लाइब्रेरी मे थी, मुझे वो बाबा मिले जो उस शाम मिले थे… आज वो कुछ ज्यादा ही खुश थे.. मेरे चेहरे पर अजीब ही मुस्कान थी, कुछ यूं की मै नहीं तो कम से कम तुम तो खुश हो बाबा...
वो बाबा मुस्कुराए और पूरे हक से मेरा हाथ पकड़कर वही पास के पार्क में ले आए.. मुझे देखते हुए कहने लगे... "मै एक आत्मकथा सुनना पसंद करूंगा"…
मै उन्हे हैरानी से देख रही थी, मानो पूछने की कोशिश कर रही हूं "बाबा आप ऐसे क्यों बोल रहे".. लेकिन मै बस उन्हे एक बार देखकर सामने देखती हुई...
"मंजिल से तो कभी भटके नही, ना ही अपना कारवां गलत था"
"बस वक्त को कुछ और मंजूर था और हालात अपने बस में ना था"…
बाबा:- ज़िन्दगी के पन्ने पर हम एक-एक दिन, एक-एक पल लिखते हुए आगे बढ़ते है.. कभी उन पन्नों को शुरू से पलटने का वक्त मिले तो पलट देना चाहिए... हो सकता है जिन हालतों से हम अब हार मान रहे है, उन्हे झेलनी की गुत्थी जिंदगी के शुरवात किताब में हो, जिसकी तस्वीर दिमाग में धूमिल सी भी नहीं..
मै:- कभी दिल किया तो जरूर पलट दूंगी बाबा, लेकिन आपको देखकर हौसला मिला है मुस्कुराने का.. कोई हल्का-फुल्का कॉमेडी नॉवेल…
बाबा हंसते हुए वापस आ गए और पुराने कॉमिक्स थामा गए... "इस वक्त तुम्हे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है"..
मेरे हाथ में थी चाचा चौधरी, बिल्लो, और पिंकी.. दिन अच्छा कट रहा था, बीच मे ही मनीष भईया का कॉल आ गया और पूछने लगे की घर कब तक लौट रही हो.. मैंने उन्हे बताया कि मै नेशनल लाइब्रेरी मे हूं, देर हो जायेगी..
बहुत दिन के बाद मै बिल्कुल सामान्य रूप से और पहले जैसी टोन मे बात कर रही थी... कुछ देर और वो बुक पढ़ने के बाद जैसे ही मै निकलने लगी, बाबा मुझे रोकते हुए कहने लगे यहां आओ.. मै जब गई तो उनके बहुत से पुराने साथी वीडियो कॉन्फ्रेंस पर थे और उन सबको मिलवाने के लिए वो सब मुझे धन्यवाद कह रहे थे...
मै थोड़ी हैरान और चेहरे से मुस्कुराती... "आपको कैसे पता की ये मेरा किया है"…
बाबा:- बेटा हम अनुभवी लोग है... हमे कोई सामने से आकर बहला दे, तो इतना ही सोचते है, जानते हम सब कुछ है लेकिन तुम ही खुश रहो…
मै:- मै जब भी यहां आयी हूं कुछ अच्छा और संतुष्टि के भाव ही लेकर गई हूं... वरना ये दुनिया तो वही मानती है जो उन्हे सामने से दिखता है...
बाबा:- वो उनके लिए जो जीने के लिए जीते है, अब तो हम मरने के लिए जीते है, इसलिए पल-पल दिल खोलकर जीते है..
मै:- हिहीहिहिही... आपको तो योके पसंद थी फिर सेल्मा दादी की बात क्यों कर रहे है... (वही अज्ञेय जी द्वारा रचित 'अपने-अपने अजनबी" नॉवेल की चर्चा)
बाबा:- योके कभी गलत थी ही नहीं.. अपनी उम्र में वो अपनी जिंदगी और तजुर्बा के साथ जी रही थी, और तुम्हारी सेल्मा दादी भी तो पूर्व मे योके ही थी, हृदय परिवर्तन और सोचने की चेतना ने उसे बदला और जिंदगी के तजुर्बों ने उन्हे जीना सिखाया..
मै:- मुझे एक ही अफ़सोस है कि मै जिंदगी में आपसे पहले क्यों नहीं मिली.. आपकी उम्र में बहुत कम लोग जीवित रहते है...
बाबा:- तुम मुझसे मोह बस जुड़ रही हो और मै तुम्हे अपने जिंदगी का एक अधूरा हिस्सा समझ कर जुड़ रहा हूं...
isliye kehte hai.. waqt ek jaisa nahi hota... kabhi khushiya hi khushiya, dosti, apno ka pyar, paise sauharat, ijjat aapki jholi mein aa gire toh kabhi dukh, dard, gam, vishvasghat...
Par inse na dar kar ya na haar maanke samashyao se samna kar, inse jujhke aage badhe apni manjil ki aurr.... aur akhir mein joh aapko fal milta hai anmol hota hai...
Khair..... yeh ho kya raha hai

maana ki harsh dhokhebaz, dagabaaz, kutta, kamina, bhagoda, kayar hai par iski saza menka ko kyun?

aur menka.... aur jaa ishq ladane aade gere nathu khere se... us badjaat ke mohabbat mein gir aaj yeh gat bana li hai khud ki ....
are bhool jao ushe aur aage badho jindagi mein...

aur kabhi samne woh kamina aaye toh eent se eent baja dena uski...
aur yeh menka ke gharwale even uski maa aur woh nakul... Kam se kam inlogo se yeh ummid na thi... khaskar nakul se..

in sab ki bhi aisi ki taisi
Yeh sab ush hawas ki pujaran, tharki, kamini, dhokhebaz, dagabaaz Prachi ki wajah se ho raha... Jarur ushi ne kuch kiya hoga... meri maane toh menka pehle ushe hi sabak sikhaye... aisi saza de ushe ki saat puste yaad rakhe

us tharki Prachi ki toh aisi ki taisi

saara mood kharab kar diya is tharki Prachi ne...
Khair let's see what happens next
Menka ko us library wale uncle ki baatein maan ke khud apni raah tay kar leni chahiye....
Brilliant update with awesome writing skill