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Thriller 100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)

Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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अध्याय 27 भाग:- 1




18th दिसंबर की रात के मुलाकात के बाद मेरी हर्ष से कोई भी मुलाकात नहीं हुई थी, और 18 दिसंबर के बाद से संदेश भी आने बंद हो गए थे... 21 को दिल्ली जाने से पहले मै एक बार हर्ष से मिलना चाहती थी, इसलिए राजवीर अंकल और उपासना आंटी से मिलने मै पहुंच गई.…..


यहां जब आयी तो पता चला कि अंकल और आंटी ही नदारत थे, और प्राची अपने ससुराल में व्यस्त. मुझे समझ आ गया की हर्ष, अंकल-आंटी के साथ निकला है और उसके साथ भी वही सिचुएशन हुई है जो मेरे गांव आने पर होती है..


प्रायः ये होता है कि घर के अभिभावक की मन्नत होती है यदि बेटी की शादी अच्छे से हो गई, तब फलाने जगह माथा टेकने जाएंगे.. पैदल यात्रा करेंगे या अन्य कोई मन्नत.. शायद वही उतारने हर्ष के साथ निकले हो..


हालांकि ये भी अजीब था, क्योंकि शादी के चौथे दिन विदाई की रश्म होती है, और भी अन्य रस्में जिनमे मायका पक्ष का होना अनिवार्य होता है.. लेकिन यहां तो तीसरे दिन ही सब खाली.. मन में सवाल के साथ मै दिल्ली के लिए निकल गई.…


हर्ष की देखने की छोटी सी ख्वाइश थी लेकिन पूरी ना हो पाई.. इकोनॉमी फोरम पर यह मेरा लगातार दूसरा साल था जब कॉलेज के लिए मुझे ही चुना गया था... दिसंबर से लेकर शुरवाति जनवरी तक इतना टाइट शेड्यूल था कि मुझे श्वास लेने की भी फुरसत नहीं थी..


रोज ही लगभग मेरी नकुल और प्राची से बात हो रही थी, घुमा फिराकर मै हर्ष के बारे में पूछती और वो दोनों एक ही उत्तर देते... यूके गया है कोई कॉन्फ्रेंस मे.. लौटा नहीं है...


मै यहां दिल्ली में थी और नकुल, प्राची के साथ अपने सहर.. दोनो दिल्ली आने का नाम ही नहीं ले रहे थे और ना ही अब पहले जैसी बातें हो रही थी.. पर्दे के पीछे कुछ तो कहानी चल रही थी.. जिसका ज्ञान मुझे नहीं था..


1 जनवरी का कोई विश ना हुआ और ना ही 2 जनवरी तक मेरे पास किसी के कॉल आए. किसी का फोन से मतलब ना तो मेरे घर से और ना ही नकुल के घर से. नकुल का तो क्या ही कह दूं, 3 दिन से तो मुझे बस इतना ही कह रहा था कि अभी व्यस्त हूं, रखता हूं.…


8 जनवरी 2015, मै सभी सेमिनार और इकोनॉमी फोरम को अटेंड करने के बाद 3 दिन से फ्री बैठी हुई थी और सोच रही थी कि एक बार गांव जाकर मामला समझ तो लिया जाए कि वहां चल क्या रहा है..


मै सोच ही रही थी कि उधर से मां का फोन आ गया और बहुत ही कड़क लहजे में वो पूछ रही थी कि "क्या मेरे और हर्ष के बीच कोई प्रेम प्रसंग का मामला है".. मां के मुंह से यह सुनकर मेरे कलेजा कितनी जोड़ से धड़का होगा, वो मुझे भी पता नहीं... मै बिल्कुल ख़ामोश थी और जवाब ना पाकर वो फोन पर ही चिल्लाने लगी..


मै मौन स्वीकृति दे चुकी थी और मां रो रोकर चिल्ला रही थी. अंत में एक ही बात कही.. "गांव वापस लौटकर मत आना, तेरे लिए सब मर गए है.." उनके फोन रखते ही तुरंत एक के बाद एक सबके कॉल आने शुरू हो गए, और अंत में नकुल का कॉल आया....


"तुम उस फ्लैट में हो इसलिए हम दिल्ली नहीं आ पा रहे. इससे ज्यादा कोई बात नहीं हो पाएगी.. तुम बस वहां से कहीं भी चली जाओ"…


घर गया, रिश्तेदार गए और आखरी मे रिश्ता भी चला गया. मै गरीब हो गई लेकिन कैसे, ये मुझे दूर-दूर तक पता नहीं था.. क्या करना था वो मै बाद मे सोचती, पहले तो दिल में चुभन सी हो रही थी और मुझे ये घर छोड़ना था...


मै बुत बनी असहाय सी मेहसूस कर रही थी, घर की घंटी बजी और मै किसी तरह जब दरवाजा खोली तो सामने मौसा, मौसी, गौरी और मैक्स खड़े थे.. मै लड़खड़ाई मासी के ऊपर ही लगभग गिरी और सिसकती हुई किसी तरह कहने लगी.. "नकुल ने मुझे घर छोड़कर जाने के लिए बोल दिया"….


मुझे उसके बाद फिर होश नहीं... डबडबाती आखें ना जाने कितने दिनों की भोर और सांझ नहीं देख पाई.. कहां हूं कुछ समझ नहीं पाई। वहां मेरे पास मेरी प्यारी मां यानी की मेरी मासी थी.. आखों मे उनके आशु नहीं थे, मुस्कुराकर वो मेरे सर पर हाथ फेरती बस यही दिलासा दे रही थी, "मै हूं तू चिंता क्यों करती है..."


किन्तु हम दोनों ही जानते थी कि वो अंदर से कितनी दर्द मे थी... फिर पहुंचे मेरे दोनो भाई, और साथ में थी मेरी दोनो भाभी और सभी बच्चे.. मै क्या प्रतिक्रिया देती.. बस अपने आशु समेटकर तुरंत ही मुस्कुराती हुई साक्षी के गले लगकर उसे चूमती हुई पूछने लगी... "मेरा बेटा कैसा है"..


उसकी मासूम नजरें, मेरे चेहरे को देख रही थी.. वो बड़े ही ध्यान से मुझे देख रही थी, मानो पूछ रही हो, "दीदी क्या तुम रो रही हो?".. मै उससे नजरे मिलाने में असमर्थ हो चुकी थी और उसका खिला सा चेहरा पुरा ही उतर चुका था...


12 फरबरी, सब लोग जा रहे थे.. मासी जाते हुए मुझसे बस इतना ही कहकर गई... "जब लौटो तो मेरी बेटी मेनका को भी साथ लेकर लौटना. जबतक वो नहीं लौटेगी मेरे हलख से खाना का निवाला बड़ी मुश्किल से नीचे उतरेगा... मैक्स, गौरी, अपनी बहन मेनका के साथ ही लौटना".. मेरी पथराई आखें बस सबको जाते हुए देख रही थी... वहां मैक्स और गौरी के अलावा, मनीष भैया और रूपा भाभी रुके, जो मुझसे पूछ रहे थे "आगे क्या सोचा है?"


हर्ष, प्राची और नकुल के शादी के दूसरे दिन ही घर छोड़कर कहीं चला गया था... सबके लिए बस एक ही संदेश छोड़कर गया था…. "कुछ घुटन सी हो रही है कई दोनो से, मै ज़िन्दगी की तलाश में जा रहा हूं"…


एक हफ्ते पहले जब कुछ सामान्य हुई थी तब रूपा भाभी वह संदेश पढ़कर सुनायी थी... मेरे दिमाग के अंदर 1000 सवाल थे.. लेकिन केवल सवाल..


उधर राजवीर और उपासना सिंह पुत्र वियोग में थे. जैसे ही मेरी और हर्ष की कहानी सामने आयी, बिना कारन के ही हर्ष के घर छोड़ जाने का कारन बन गई... हां, संभवतः हर्ष के घर छोड़ जाने का कोई पुख्ता कारन ना मिल पाने पर हमारा मामला प्राची ने ही सबके सामने रखा होगा..


द्वेष ने मन में ऐसा खटास पैदा किया, राजवीर सिंह और पापा के बीच में विवाद बढ़ता ही चला गया.. फिर कहानी भी वही होती है, जिसकी लाठी उसकी भैंस.. ऊपर से प्रेम प्रसंग के किस्से मे फजीहत तो लड़की और लड़की के घरवालों को हो उठानी पड़ती है...


मेरी मां जब तक हिम्मत से डट सकती थी डटी, लेकिन पापा की बेइज्जती ने उनका भी हौसला तोड़ दिया शायद और 27 दिसंबर से चल रहे मसले मे, मां टूटकर 7 जनवरी को मुझे ही पूरे प्रसंग मे दोषी मानकर सबसे माफी मांगी, और कह दी, "लौटकर फिर वापस नहीं आना..."


इन सभी घटनाओं के पीछे का जवाब एक ही लड़का था, हर्ष.. वो भी अपने जाने से पहले एक बड़ा सा सवाल छोड़े जा चुका था, जिसका जवाब तो उससे मिलने के बाद ही पता चलता...


मै आधी फरबरी से लेकर आधे मार्च तक रूपा भाभी और मनीष भईया के साथ यूरोप के चक्कर काटती रही, लेकिन ये काम हमारे बूते का नहीं था... मार्च आखरी तक कुछ और भी ज्यादा सामान्य थी, क्योंकि जिस बात के लिए सबसे ज्यादा रोई थी, मेरी मां.. उन्होंने मुझे सामने से कॉल करके माफी मांगी और कहने लगी.. "ढूंढ कर लाओ उस हर्ष को कहीं से भी, तभी अब दिल को सुकून मिलेगा.? अगर कहीं मर गया हो तो उसकी लाश पता लगाना, लेकिन उसके छोड़े संदेश के पूरे जवाब के साथ लौटना..."


मन में अब हर्ष के लिए केवल घृणा ही बची थी, उससे ज्यादा कुछ नहीं... मार्च का महीना, इस वर्ष भी काफी सारे ऑडिट होने थे और मै अभी मात्र एक ट्रेनी थी, जिसका सर्टिफिकेट उसका सीए देता... और तब जाकर मै सीए फाइनल के एग्जाम में बैठती...


रजनीश भईया को थोड़ी कहानी पता थी और उन्होंने जनबरी मे ही कॉल करके कहा था.. तुम जो कर रही हो वो करती रहो… सेर्टिफाई करना तो मेरे हाथ में है.. निश्चिंत होकर काम पर लौटना...


32 हजार की सैलरी मेरी बराबर आ रही थी, लेकिन आर्थिक स्थिति अब पहले जैसे नहीं थी.. मनीष भईया जब मेरे अकाउंट्स मे अपनी शाविंग्स डालते, तो आज बहुत ही अजीब लग रहा था... ऐसा लग रहा था मै घूमकर फिर से अपने घर की चार दिवारी मे आ गई, जहां पूरी तरह से मै अपने पिता और भाइयों पर आश्रित थी..


मन में विद्रोह सा था, घर के अंदर अपने पापा का, अपने घर का काम तो कर देती थी, यहां तो मेरी भाभी और मेरा भाई अपना काम भी छोड़े है, मेरा भी काम कर रहे और उल्टा मुझे पाल भी रहे...


ये एक ऐसी फीलिंग थी जहां मै सोचने पर मजबूर हो गई थी क्या हासिल कर लिया घर छोड़कर, अंत में बदनामी और जिल्लत... मै कुछ वक्त खुद को अकेली देना चाहती थी, इसलिए कहीं किसी पार्क के ओर जा रही थी... सामने फिर से वहीं नेशनल लाइब्रेरी थी.. जहां कुछ महीने पहले एक संतुष्टि के भाव लेकर गई थी... आज सामने फिर से वही लाइब्रेरी थी.. और सबसे ज्यादा रुलाने वाली वही इंसान था, बस आज जब मै लाइब्रेरी से लौटूंगी तो वो नहीं होगा..


मै फिर से लाइब्रेरी मे थी, मुझे वो बाबा मिले जो उस शाम मिले थे… आज वो कुछ ज्यादा ही खुश थे.. मेरे चेहरे पर अजीब ही मुस्कान थी, कुछ यूं की मै नहीं तो कम से कम तुम तो खुश हो बाबा...


वो बाबा मुस्कुराए और पूरे हक से मेरा हाथ पकड़कर वही पास के पार्क में ले आए.. मुझे देखते हुए कहने लगे... "मै एक आत्मकथा सुनना पसंद करूंगा"…


मै उन्हे हैरानी से देख रही थी, मानो पूछने की कोशिश कर रही हूं "बाबा आप ऐसे क्यों बोल रहे".. लेकिन मै बस उन्हे एक बार देखकर सामने देखती हुई...


"मंजिल से तो कभी भटके नही, ना ही अपना कारवां गलत था"
"बस वक्त को कुछ और मंजूर था और हालात अपने बस में ना था"…


बाबा:- ज़िन्दगी के पन्ने पर हम एक-एक दिन, एक-एक पल लिखते हुए आगे बढ़ते है.. कभी उन पन्नों को शुरू से पलटने का वक्त मिले तो पलट देना चाहिए... हो सकता है जिन हालतों से हम अब हार मान रहे है, उन्हे झेलनी की गुत्थी जिंदगी के शुरवात किताब में हो, जिसकी तस्वीर दिमाग में धूमिल सी भी नहीं..


मै:- कभी दिल किया तो जरूर पलट दूंगी बाबा, लेकिन आपको देखकर हौसला मिला है मुस्कुराने का.. कोई हल्का-फुल्का कॉमेडी नॉवेल…


बाबा हंसते हुए वापस आ गए और पुराने कॉमिक्स थामा गए... "इस वक्त तुम्हे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है"..


मेरे हाथ में थी चाचा चौधरी, बिल्लो, और पिंकी.. दिन अच्छा कट रहा था, बीच मे ही मनीष भईया का कॉल आ गया और पूछने लगे की घर कब तक लौट रही हो.. मैंने उन्हे बताया कि मै नेशनल लाइब्रेरी मे हूं, देर हो जायेगी..


बहुत दिन के बाद मै बिल्कुल सामान्य रूप से और पहले जैसी टोन मे बात कर रही थी... कुछ देर और वो बुक पढ़ने के बाद जैसे ही मै निकलने लगी, बाबा मुझे रोकते हुए कहने लगे यहां आओ.. मै जब गई तो उनके बहुत से पुराने साथी वीडियो कॉन्फ्रेंस पर थे और उन सबको मिलवाने के लिए वो सब मुझे धन्यवाद कह रहे थे...


मै थोड़ी हैरान और चेहरे से मुस्कुराती... "आपको कैसे पता की ये मेरा किया है"…


बाबा:- बेटा हम अनुभवी लोग है... हमे कोई सामने से आकर बहला दे, तो इतना ही सोचते है, जानते हम सब कुछ है लेकिन तुम ही खुश रहो…


मै:- मै जब भी यहां आयी हूं कुछ अच्छा और संतुष्टि के भाव ही लेकर गई हूं... वरना ये दुनिया तो वही मानती है जो उन्हे सामने से दिखता है...


बाबा:- वो उनके लिए जो जीने के लिए जीते है, अब तो हम मरने के लिए जीते है, इसलिए पल-पल दिल खोलकर जीते है..


मै:- हिहीहिहिही... आपको तो योके पसंद थी फिर सेल्मा दादी की बात क्यों कर रहे है... (वही अज्ञेय जी द्वारा रचित 'अपने-अपने अजनबी" नॉवेल की चर्चा)


बाबा:- योके कभी गलत थी ही नहीं.. अपनी उम्र में वो अपनी जिंदगी और तजुर्बा के साथ जी रही थी, और तुम्हारी सेल्मा दादी भी तो पूर्व मे योके ही थी, हृदय परिवर्तन और सोचने की चेतना ने उसे बदला और जिंदगी के तजुर्बों ने उन्हे जीना सिखाया..


मै:- मुझे एक ही अफ़सोस है कि मै जिंदगी में आपसे पहले क्यों नहीं मिली.. आपकी उम्र में बहुत कम लोग जीवित रहते है...


बाबा:- तुम मुझसे मोह बस जुड़ रही हो और मै तुम्हे अपने जिंदगी का एक अधूरा हिस्सा समझ कर जुड़ रहा हूं...

isliye kehte hai.. waqt ek jaisa nahi hota... kabhi khushiya hi khushiya, dosti, apno ka pyar, paise sauharat, ijjat aapki jholi mein aa gire toh kabhi dukh, dard, gam, vishvasghat...
Par inse na dar kar ya na haar maanke samashyao se samna kar, inse jujhke aage badhe apni manjil ki aurr.... aur akhir mein joh aapko fal milta hai anmol hota hai...
Khair..... yeh ho kya raha hai :mad:
maana ki harsh dhokhebaz, dagabaaz, kutta, kamina, bhagoda, kayar hai par iski saza menka ko kyun? :mad:
aur menka.... aur jaa ishq ladane aade gere nathu khere se... us badjaat ke mohabbat mein gir aaj yeh gat bana li hai khud ki ....
are bhool jao ushe aur aage badho jindagi mein... :check:
aur kabhi samne woh kamina aaye toh eent se eent baja dena uski... :nutkick:
aur yeh menka ke gharwale even uski maa aur woh nakul... Kam se kam inlogo se yeh ummid na thi... khaskar nakul se.. :mad:
in sab ki bhi aisi ki taisi :nutkick:
Yeh sab ush hawas ki pujaran, tharki, kamini, dhokhebaz, dagabaaz Prachi ki wajah se ho raha... Jarur ushi ne kuch kiya hoga... meri maane toh menka pehle ushe hi sabak sikhaye... aisi saza de ushe ki saat puste yaad rakhe :bat:
us tharki Prachi ki toh aisi ki taisi :mad:
saara mood kharab kar diya is tharki Prachi ne...
Khair let's see what happens next
Menka ko us library wale uncle ki baatein maan ke khud apni raah tay kar leni chahiye....
Brilliant update with awesome writing skill
 
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SHADOW KING

Supreme
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समापन और निष्कर्ष:- पहला पक्ष







"वाउ क्या पारिवारिक ड्रामा है, ऐसा लग रहा है जैसे मेनका मिश्रा जहां होगी सब सही ही होगा"… इसी खुशी के माहौल मे, एक अजीब ही दुर्गन्ध उमाशंकर की बातों से आ रही थी और उसके साथ आए 6 हाई प्रोफाइल शूटर, जो उमाशंकर की मंशा बयान कर रहे थे..


सबके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे सिवाय मेरे.. उस माहौल में क्या हो रहा था किसी को इल्म नहीं.. सब बस भयभीत होकर उमाशंकर को सुन रहे थे.. मै समझती थी कि वहां क्या होने वाला है... इसने तब नहीं छोड़ा था, अब क्या छोड़ेगा.. बस इसकी कमजोरी मेरे हाथ में थी..


मै अपने बैग से अपनी हैंडगन निकाली और बिना किसी दूसरे सोच के खुद पर ही गन रखती... "उमाशंकर, जिसके लिए इतना खेल रचे हो, वही इस बार चली जाएगी. फिर मै ना रहूंगी तो तुम लाशों का खेल खेलते रहना. सबको जाने दो, मै चलती हूं"..


रवि:- यकीन मत कर उमा, बहुत खतरनाक है ये... इसे लगता है सब कुछ इसके हिसाब से हो रहा है.. हमारा फोन रखकर ब्लैंक कर देगी... इसका मुख्य स्तंभ राजवीर सिंह और.. इसका मुखिया चाचा इनको तो कबका लपेट लिया हमने इसे पता ही नहीं... साला वरुण मिश्रा बच गया... किसी ने बताया कि नहीं मेनका को, दुश्मनी की पहली लाश अनूप मिश्रा की ही गिरी थी... अरे यार, मेनका को कुछ पता ही नहीं... आई वान्ना क्राय (I Wanna Cry).. उन्नं हूं हूं...


उमाशंकर:- अब तुम्हारा कोई मोह नहीं रह गया मेनका, तुम वो नहीं रही जिसकी चाहत थी कभी...


"मेरे पापा को क्यों मार दिया, क्या बिगाड़ा था उन्होंने तुम्हारा"… मै बिलखती हुई चिनखकर पूछने लगी..


"मेरा क्या बिगड़ेंगे.. वो तो लियाकत आलम चाहता था कि उसके क्षेत्र में केवल उसका नाम रहे, उसके ऊपर कोई नहीं... हमने तो बस उसे सपोर्ट किया था.. वो क्या है ना उसे लगता था उसके क्षेत्र में उसकी कोई सुनता ही नहीं. और अभिनंदन लाल के जाने के बाद, उसे पुरा बिहार ही खाली सा दिखने लगा था. बस 2 ही कांटे बचे थे.. एक वरुण मिश्रा, जो था तो विधानसभा में, लेकिन क्षेत्र में रूतवा कहीं ऊंचा था. दूसरा वो राजवीर सिंह, हर मामले में टांग अड़ाने वाला"…. रवि ने लगभग कहानी बताई...


"तुम्हे क्या लगता है, तुम दूसरो का शिकार करोगे तो दूसरे तुम्हे छोड़ देंगे.. हमे बस 2 लोगो के मारने के ऑर्डर है, गौरी और मेनका. मेनका गन ड्रॉप कर दो और चलो, वरना जिद का मतलब तुम समझती हो"… उमाशंकर ने चेताया...


मै अपनी गन जैसे ही उन्हे देने लगी मेरी नजर मैक्स पर गई... मैक्स की आंखों में पागलपन दिख रहा था... मै फिर से चिल्लाई… "कुछ सोचना भी नहीं मैक्स.. वरना वो सबको मारते हुए चला जाएगा"


मैक्स:- मेरे रहते तुम्हे ऐसे कैसे ले जाएंगे....


तभी गौरी उसे खींचकर एक थप्पड़ मारती... "फिल्म चल रही है क्या.. क्यों उनकी गिनती बढ़ना चाहते हो... यही रुक जाओ"


हम जब वहां से निकल रहे थे, अनीता मैक्स का हाथ थामि हुई थी. और मैक्स अपने घुटनों पर बैठा बस रो ही रहा था... मै अनीता को देखकर मुस्कुराई और बस भावनाओ में व्यक्त करती चली... "मेरे भाई का ख्याल रखना"…


पीछे मै और गौरी बैठी हुई थी. हम चारो ओर से शूटर से घिरे थे, आगे रवि और उमाशंकर बैठा हुआ था... मै हंसती हुई पूछने लगी... "अरे मारने ही ले जा रहे हो, तो कम से कम सारी राज की बात तो बता दो.."..


उमाशंकर:- ख़ामोश हो जाओ मेनका, बस ख़ामोश.. तुमने कभी जाहिर होने दिया कि तुम्हारे पिता की मौत हो गई.. तुम तो दिल्ली से लौटकर गांव भी नहीं गई..


मै:- मेरे पिता एक दुनिया से दूसरी दुनिया में गए.. जहां गए सुकून से होंगे... मुझे भी दूसरी दुनिया जाना है.. मुझे भी सुकून दे दो.. बस जाने से पहले सारी बातें तो बता दो..


उमाशंकर:- तुम्हे सुकून चाहिए तो सुनो.. महादेव मिश्रा मेरा बाप था.. जिसने मुझे सबसे छिपाकर अपने नजरो के सामने पाला था.. जब उस इलाके में काले शाए मंडरा रहे थे, तब मैंने और रवि ने ही उस हर्ष को उठवाया था... लियाकत तो अपने वर्चस्व और श्याम प्रसाद शुक्ला के सपोर्ट का प्रस्ताव लेकर पहुंचा था और हमने हर्ष के बदले उसे उसका मनचाहा गिफ्ट, यानी कि उस इलाके से राजवीर सिंह और वरुण मिश्रा की पूरी कहानी खत्म करने का वादा किया भी और निभाया भी...


मै, चिल्लाती हुई... "फिर मेरे पापा ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था... कब मारा उन्हे तुम लोगो ने..."


रवि:- लालची हरामजादी, तू तो उस नीतू से भी ज्यादा गिरी हुई... वो तो जिस्म बेचकर फसाती थी और तू अपने दिमाग से लोगो को फसाकर ऐसा उलझाती है कि वो समझ ही ना पाए कि मेनका मिश्रा कितनी बड़ी नागीन है..


मै:- मेरे पापा को क्यों मारा...


रवि:- ज्यादा आंखो में खून मत उतारो.. तेरी भाभी जब दिल्ली से गई तो उसने कुछ नहीं बताया कि तेरा बाप गायब हो गया है..


मै:- तुम्हारा दिन है इसलिए बोल लो मै सुन रही, मै सरेंडर कर रही हूं...


उमाशंकर:- हां तो सुन कमिनी, तेरे हर्ष को उठाना पहली चाल थी, जहां लियाकत ने राजवीर सिंह को अपने पीछे आने का न्योता दिया था.. लेकिन वो मोटा बुद्धि पहले सोचता रहा कि तेरे प्यार के टर्चर के कारन वो भगा है... साले देहाती..

अब वो दुश्मनी तेरे ही परिवार से कर बैठा तो हम क्या कर सकते है... मिश्रा वर्सेस राजवीर सिंह... वैसे राजवीर सिंह भी बेटे के गायब होने का गम कितना सहता. बीतते वक्त के साथ उसे यकीन हो गया कि मिश्रा खानदान ने बेटी के प्रेमी को गायब करवा दिया...

दो बारे खानदान उस इलाके में टकरा रहे थे, हमे तो मज़ा आ रहा था.. और 9 महीने के दुश्मनी के बाद सितंबर के आखरी में राजवीर सिंह को जैसे ही मौका मिला, पहले उसने तेरे बाप को डशा और फिर मिश्रा संयुक्त समाज ने राजवीर सिंह को गायब कर दिया.. लास्ट ईयर दिसंबर का फेंका पासा से आपस की दुश्मनी ने, सितंबर आते-आते काम कर दिया. लियाकत और मंत्री जी को तो हाथ भी गंदे नहीं करने पड़े..

अब बच गया था वरुण मिश्रा और उसका बाप। तो राजवीर सिंह के नाम पर लियाकत ने दुश्मनी निकाल ली.. सिंपल.. जिसे जो चाहिए था वो मिला..


मै:- और तुम दोनो को क्या मिला..


उमाशंकर:- सेल्फ सेटिसफेक्शन… रवि को तुमने ही भेजा था ना पुष्पा को अपने झांसे में फसाने. उसके बाद तुम्हे वो गलत लगने लगा.. जब रवि मुझसे खुल चुका था तभी कह दिया था, मेनका मिश्रा धूर्त और लालच की परिभाषा है. वो अपने पैसों कि चाहत और अंदर छिपे जहर को जाहिर नहीं होने देगी.. पहले नहीं माना था, लेकिन मैंने जिस मंत्री के काले पैसा का 1 रुपया स्वीकार नहीं किया, उससे तू करोड़ों ऐंठ रही थी.. घृणा सी हो गई थी खुद से कि मेरी इतनी गिरी सी चाहत..

सिर्फ तेरे लिए उस हर्ष को उठाया था, ताकि मेरा रास्ता साफ हो जाए. मेरा दिल नहीं माना कि एक लड़की की चाहत में किसी अच्छे लड़के को मार डालूं. तब रवि ने कहा..

"मानकी तेरा बाप तेरे लिए कभी अच्छा नहीं रहा, लेकिन मरने से पहले तुझे ऐसी जगह तो पहुंचा दिया ना, जहां तू कईयों का भला कर रहा है. उसी पिता का कर्ज उतार दे. इसे मार नहीं सकता तो क्या हुआ.… इस हर्ष की लवर और बाप ने तेरे बाप को केवल मरने पर मजबूर नही किया, बल्कि ऐसा काम किया कि सब उसका नाम सुनकर थूकते है.. तू भी हर्ष को उसी जिल्लत में डाल दे.. और मेनका के ओर अपना रुख कर.. लेकिन अब भी कहूंगा उस शातिर से बचकर ही रहना"

मैंने हंसकर रवि से कहा था, साले ठरकी अब वो तेरी भाभी होगी क्योंकि 100 अच्छा काम करके 1 गलती तो कर ही सकता हूं.. तू अब उसके खिलाफ जहर घोलने बंद कर...

कथा का सार सिर्फ इतना है कि, हर्ष तो सारी घटनाओं से बिल्कुल अनजान और अच्छा लड़का था. लेकिन मै भी क्या कर सकता हूं... यही मान लेते है कि मै भी अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी अच्छे लड़के को गायब कर सकता हूं, जिसका कतई अफ़सोस नहीं...


मै:- हीहिहिहिहिहिहिही… ओह तो कोई लड़की महादेव मिश्रा के टर्चर 9 महीने से ऊपर झेल गई, और जो बच्चा पैदा हुआ वो तुम थे.. तुम्हे तो महादेव मिश्रा से नफरत होनी चाहिए थी.. तुम्हारी मां की जिल्लत का बदला लिया उमा, मुझे तो थैंक्स कहना चाहिए था...


मै जैसे ही अपनी बात बोली, गौरी भी हसने लगी.. तभी गन के पिछले सिरे से मुझे और गौरी को उनलोगों ने मारा.. बेचारी मेरी गौरी, उसके नाक और मुंह से खून निकलने लगा... खून तो मेरा भी निकला पर दर्द नहीं हो रहा था. हां लेकिन गौरी दर्द में होते हुए भी जाहिर नहीं होने दी..


मैंने इशारे में पूछा, दर्द तो नहीं हो रहा.. मेरी बात पर गौरी हंसती हुई कहने लगी.. "एक दर्द झेल चुकी अब दर्द तो होता है, पर असर नहीं करता"…


रवि:- इन्हे तड़पाओ मत यार.. इस मेनका के जैसे कर्म रहे हो, लेकिन कभी मैंने चाहा था, आसान मौत देंगे..


उमाशंकर:- मेरे बाप की इज्जत उछाल दी थी.. अभी मेरा मज़ाक बना रही है. जब भी इसके कर्मो पर गौर करता हूं, अंदर से आग लग जाती है. जबतक इसकी इज्जत नहीं उछलेगी, मुझे सुकून नहीं मिलेगा.. इसे सिसकते देखना ही अब मेरी ख्वाइश है...


मै:- ओह तो जंगल ले जा रहे, मेरा चिर हरण करोगे, मुझे नोचोगे.. और फिर तब मारोगे... भुल क्यों जाती हूं, तुम तो महादेव मिश्रा के बेटे हो ना...


उमाशंकर:- साउथ में हो तो क्या यहां तुम्हे रजनीकांत आएगा बचाने, जो इतने विश्वास से अट्टहास कर रही.. तुम तो उसी दिन पिक्चर मे आ गई थी जिस दिन तुमने नीलेश के मैटर में लियाकत को खींचा, उससे मीटिंग की.. और उसे विश्वास में लेकर खेल रच गई..

और तब से ही लियाकत तुम्हारे साथ खेल रहा है.. वो जैसा जैसा चाहता गया, तुम और तुम्हारी भाभी उसके लिए रास्ता बनाती चली गई.. बस एक बात मेरे समझ से परे है, इतनी सी होकर इतने बड़े-बड़े काम कैसे कर लेती हो...


मै:- क्योंकि मै पागल हूं... हिहिहीहिहिहिहिही….


रवि:- ये सच में पागल है उमाशंकर.. छोड़ ये इज्जत विज्जत.. वो बदला तो तूने ले लिया ना.. मेनका को तूने अधूरा बताया ऊपर, जरा पूरी बात तो बता हर्ष के बारे में...


उमाशंकर:- हाहाहाहाहाहा.. मतलब जाने से पहले पर्दा उठा दूं.. तो सुन कुतिया.. जिस दिन तू टांग फैलाकर उस हर्ष के नीचे लेटी ना, तभी तू नजर से गिर गई थी..


मै:- मैंने तो तुम्हे बता दिया था बेबी की मै कुंवारी नहीं..


उमाशंकर, पीछे मुड़कर थोड़ा झल्लाते हुए मेरे होंठ को पकड़कर अपने अंगूठे से जोड़ से खिंचते.….."तब लगा तू अच्छी है, प्यार में सब कुछ सौंप दी... दिमाग में यह थोड़े ना आया था कि तू राजवीर के अरबों की दौलत के बारे में भी सोच सकती है.. तुझ जैसी गिरी लड़की शायद ही इतिहास में कहीं दर्ज हो.. आज तेरे ही लालच के कारन तेरी बहन गौरी भी मरेगी, जिसे मरना नहीं चाहिए.. लेकिन एमजी ट्रस्ट की मालकिन है ना.. क्या ही कह दूं तुझे, की तूने ट्रस्ट के जरिए जो अकाउंट पर जमा करोड़ों के गमन का प्लान किया था, इस चक्कर में आज तेरी बहन भी जाएगी... मज़े कर, तेरे वजह से एक और अच्छी जान निकलेगी.. हमारे हाथा में होता तो गौरी को बचा लें जाते, लेकिन कहानी फिर वही होगी...

ये लड़की भी मरी, मै और रवि भी मरे और 100 लोग जिसका भाला हम वहां रहकर कर सकते थे वो भी सपना चला गया... इसलिए गौरी तुम्हारे लिए सॉरी, दिल से सॉरी.. वादा रहा एमजी ट्रस्ट के बैनर तले मै 2000 वृद्ध को पलूंगा. तुम्हारी और भी कोई ख्वाइश हो तो जरूर बता दो..

गौरी गहरी श्वांस छोड़ती.…. "तुम अच्छे हो छोटे पुजारी जी, और कौन किस गलती की सजा भुगता मुझे उससे कोई सरोकार नहीं. मर भी रही हूं तो अच्छी उम्मीद के साथ.. मरने का गम नहीं, और ना ही इस बात का गम है कि अपनी बहन के कारन मर रही..

रवि:- उमाशंकर की तारीफ गौरी जैसी खूबसूरत लड़की कर दे कतई बर्दास्त नहीं… गौरी ये इतना भी अच्छा नहीं है.. मेनका के प्यार में साला इतना पागल है कि इसके घर ऑफिस, दिल्ली की हर वो जगह जहां मेनका होगी,, लाइव इसकी नजरो के सामने रहती है...

साला प्यार में देवदास, जब अपनी चाहत को हर्ष के साथ घापाघप करते लाइव देख रहा था तब कहने लगा खून कर दूंगा मै इस हर्ष का... हां लेकिन बेचारा कुछ कर नहीं सकता था, क्योंकि मंत्री जी का ऑर्डर था. लड़की के हर वो चीज कलेक्ट करके, सेव करके रखो जिससे ब्लैकमेल कर सके.. उनके बैकअप प्लान का हिस्सा...

जानती हो क्या कह रहा रहा था, मेनका ने गलत किया है. यदि हर्ष के साथ मेनका की शादी हुई तो ये वीडियो दिखाकर मै उसके साथ मुंह काला करूंगा, और फिर सब वीडियो वायरल कर दूंगा.. हाहाहाहाहा.. साला पागल सेक्स करने को मुंह काला करना कहता है... वैसे ये आवेश मे केवल मेरे सामने बोलता भर था, लेकिन इससे होता कुछ नहीं था.. दिल से जो चाहा था..


उमाशंकर:- चुप हो जा रवि, क्यों इज्जत ले रहा है...


रवि, बिल्कुल गुस्से से उमा को देखते... "मै इज्जत ले रहा हूं, या तुझ जैसे मासूम की कभी कदर नहीं होगी इस मेनका को वो बता रहा हूं.. बताने दे की तूने इसकी चाहत मे उन लड़कियों को हाथ नहीं लगाया, जो तेरी झोली में थी, फिर भी तू कहता रहा की प्यार, दिल, शरीर, मन, सब मेनका का है..

इसकी सराफत बता दू. हर्ष को लेकर पुरा समझाने के बाद, जिस दिन नकुल की शादी थी, उस दिन अपने ऑफिस से शादी को लाइव देखकर, वहां के खुश माहौल को देखकर भाई का दिल पिघल गया... आखरी वक्त में कहता है मुझसे "दोस्त वो लियाकत और श्याम प्रसाद अपनी दुश्मनी तो निकाल ही लेंगे, उस हर्ष में मै खुद को देखता हूं"…

"पागल साला चाहत में इतना अंधा हो गया कि इसे हर्ष की मासूमियत तो दिखी, लेकिन इसे मेनका में महादेव मिश्रा नहीं नजर आया.. तब इसे मैंने बाहर भेज दिया और रच दिया पुरा खेल... हर किसी को अपने प्रियजनों के किए की कीमत चुकानी पड़ती है, गलत के साथ तो इंसाफ होता ही है लेकिन गलती करने वाले के साथ, उसके अच्छे लोग भी पिस्ते है ये शायद मेनका मिश्रा भुल गई.."

"मेनका मिश्रा नीतू के परिवार और उसके छोटे भाई-बहन को भुल गई, जिस मासूम को गांव वालों ने निकाला था.. नीतू के बाप को भुल गई, जो सरहद से ड्यूटी करके लौटा और उसका पूरा परिवार गायब था और जिन बातों का उसे इल्म नहीं, उन बातों के लिए उसे बेइज्जत किया गया... साबित क्या करना चाहते थे लोग, बॉर्डर पर नौकरी मत करो क्योंकि तुम्हारी आगे की दशा भी यही होगी.."

"वो पूनम का परिवार जो अपनी बेटी के किए के सदमे में था... हर वो लड़की जिसकी इज्जत भरी महफ़िल में उछली.. मेनका मिश्रा ने कभी उनके परिवार की हालात से सीख नहीं ली, की परिवार के किसी एक के दामन के दाग को पूरा परिवार अपनी कीमत देकर भी नहीं धो सकता... क्योंकि मेनका मिश्रा वो जिनियस है जिसे अपना दामन साफ रखने आता है.. काफी कॉन्फिडेंस में जीने वाली लड़की, जिसे ओवर कॉन्फिडेंस ने कब घेरा पता ही नहीं चला..

प्राची के शादी में ही देर रात इसी के नाक के नीचे से सुप्रिया को पहले पहुंचा दिया उसी कमरे में जिस कमरे मे हर्ष अरमान सजाए था.. बेचारे हर्ष को जब समझ में आया कि उसने तुम्हारे धोके में किसी और पर हाथ डाल दिया, तब वो अफ़सोस कर रहा था और सुप्रिया रोती हुई भागी की उसकी इज्जत लुटने की कोशिश हो रही है.. सब शादी में व्यस्त और सुप्रिया का पीछा करने आया हर्ष को हमने गायब कर दिया...


उमाशंकर:- हां लेकिन एक बात जिसका तुम्हे अंदाजा भी नहीं होगा... इस बार हमारे इलाके से गायब होने वाला लड़का, वाकई गायब हुआ है.. जिसे तुम अब तक मरा हुआ समझ रही थी... उसे हमने सेख के यहां बेच दिया... तेरे मरने से पहले शौकीन शेख और तेरे हर्ष की वीडियो दिखाऊंगा... अभी तू देख ले, बाकी 1 जनवरी को वीडियो वायरल करवा दूंगा...


मै:- हिहिहिहिहिहि.. उमा बेबी तुम इतने सरल जो की जुबान से ठीक से गंदे शब्द भी नहीं निकलते.. मुझसे इतनी नफ़रत के बाद भी अंत मे तू तड़क कर रहे... यार इतने अच्छे क्यों हो… बावड़ा उमा शंकर मिश्रा, हिहिहिहिहि.. वो शेख तो 2 दिन पहले गया, और हर्ष को जहां होना चाहिए, पहुंच चुका है... ओह फोन नहीं लाया ना.. वरना हर्ष की वीडियो वायरल होती या शेख के मौत की खबर वो भी देख लेते.…


उमाशंकर:- अच्छी स्टोरी है हमने विश्वास कर लिया..


गौरी:- पागल हो तुम सभी.. अच्छा चलो ये किस्सा खत्म करते है.. हो तो गया कितना अंदर लोगे.. आ तो गए है वीराने मे...


रवि:- रोक दे भाई यहां गाड़ी, दोनो की इक्छा पूरी हो जाने दे...


हमे खींचकर गाड़ी से बाहर निकाला गया... रवि के इशारे पर सबने अपने गन पर शयलेंसर लगा लिया और हम दोनों बहने थे गन प्वाइंट पर... "अरे रुको, वो वीडियो तो दिखा दो, जिसका जिक्र कर रहे थे"..


उमाशंकर खींचकर मुझे एक थप्पड़ मारते... "कमिनी तेरा प्यार दिल से जाता क्यों नहीं... जी कर रहा है कपड़े फाड़ कर सबके सामने तुझे नंगा कर दूं. जिस्म में इतने जख्म दूं कि सिसकती हुई अपनी मौत की भीख मांग ले... किन्तु इस दिल का क्या करूं जो कहता है, अपनी ही चाहत के साथ ऐसा करोगे.. इतने अपशब्द और घिनौनापन मैंने अपने अंदर कभी मेहसूस नहीं किया..... खुद को इतना पत्थर तो बाना ही चुका हूं कि तुम्हे मारता देख सकूं.. खत्म करो दोनो को...


रवि अपना मुंह मोड़ते.. "मुझसे देखा नहीं जाएगा.. मार दो"..


4-5 बुलेट साउंड और चिरियों के उड़ने की आवाज... क्षण भर के बाद कतूहल माहौल में बिल्कुल शांति थी.…..
romanchak update ...to saara khel uma ka tha jo mahadev mishra ka beta hai ,,aur liyakat apna dabdaba banana chahta tha ..isliye sab planning uma ne ki thi aur pehla shikar harsh bana ...
uske baad pariwarik dushmani aur menka ke baap ko maar daala rajveer ne aur uske baad mishra pariwar ne rajveer ko ..
bhale 2 logo me kitna bhi pyar kyu naa ho ek chhoti si galatfehmi aur sab barbaad yahi hua rajveer aur mishra pariwar ke saath ..

ye mantri shyam bhi mila hua tha sabse ,aur ham isko sharif samajh rahe the ..
par menka ke baare me sahi kaha ravi ne ki wo naagin hai ,,,menka ne apna socha par neetu ke pariwar ka nahi jisko gayab kar diya gaya ..

par lagta hai ab bhi menka ke paas koi back up hai uski baato se yahi lagta hai 🤔🤔🤔..
 

Naina

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अध्याय 27 भाग:- 2




मुझे बाबा से पूछना तो था कि बाबा कैसा अधूरा हिस्सा लेकिन उससे पहले ही सीढ़ियों से तेज कान में चिल्लाने की आवाज आयी, और मुड़कर देखी तो रवि मुझे आवाज लगा रहा था...


रवि को देखकर मै फीकी सी मुस्कान दी और बाबा को बोलते निकली "अभी हमारी कहानी अधूरी है... अगली बार पुरा सुनना चाहूंगी..." "तुम्हे यहां से हंसते वापस जाते देख दिल में सुकून सा होता है, आराम से आना और अगली बार हंसती हुई आना और हंसती हुई जाना"….


मै उन्हे सुनती हुई रवि के पास पहुंची... "तुमसे यहां मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी?"…


रवि:- तुम्हारा लाइब्रेरी प्रेम गया नहीं क्या?


मै:- तुम्हे नहीं लगता कि कुछ अच्छी आदतें जानी नहीं चाहिए.. वैसे भी मेरे जीवन में लाइब्रेरी का अहम हिस्सा रहा है, जब भी यहां होती हूं कुछ अच्छा ही होता है... जिंदगी में दोस्त की कमी सी खल रही थी, और तुम ने भी क्या सही वक्त पर आवाज दी है...


रवि:- सॉरी..


मै:- अब ये सॉरी क्यों?


रवि:- तुम्हारे साथ इतना कुछ हो गया और मुझे होश तक नहीं... होली मे गांव गया था तब पूरी कहानी पता चली..


मै थोड़ी मायूस होती... "प्लीज बहुत मुश्किल से उबर पाई हूं मै, मत कुरेदो, छोड़ दो"..


रवि:- छोड़ दिया, लेकिन ये बताओ मेनका मिश्रा को भूलने कि बीमारी कब से लग गई...


मै:- जब ये एहसास हो गया की कुछ लोग मुझे भी भुल सकते है, तबसे मैंने भी चीजों को भुलाना सीख लिया..


रवि:- तुम कहती हो बीती बातें याद मत दिलाओ, खुश भी दिख रही चेहरे से, फिर भी ये ऐसे उखड़ी-उखड़ी बातें..


मै:- जिंदगी में कुछ चीजें छोटे समय के लिए होती है रवि लेकिन असर बहुत गहरा और खतरनाक होता है... कितना भी छोड़ दो लेकिन उसका असर कुछ ना कुछ रह ही जाता है...


रवि:- आज रात डिस्को..


मै:- नहीं आज रात नहीं.. इनफैक्ट अब मुझे चलना चाहिए..


रवि:- तुमने पूछा नहीं की मै यहां कैसे पहुंचा..


मै:- सीरियसली ये सवाल मुझे करना चाहिए था क्या?


रवि:- क्या पता.. मेरी दोस्त मेनका होती तो पहले शुरू करती की मेरा पीछा कर रहे हो क्या?


मै:- अब भी वही मेनका हूं, वक्त के साथ हर किसी में थोड़ा बदलाव होता है, मुझमें भी हुआ है.. अब मैंने सोचना बंद कर दिया है.. अच्छा लगे तो ठीक वरना रास्ता बदल लो और हो सके तो उस ओर जाना ही छोड़ दो..


रवि:- बाप रे ये नई मेनका तो पुरानी से काफी खतरनाक हो गई... इतनी बातें तुम कब करती थी.. 4 लाइन के बाद तो मामला क्लोज करके चलते बनती थी..


मै:- हिहिहिहिहि.. आज बात बनाने का मन कर रहा है.. आज बहुत दिन के बाद कुछ अच्छा-अच्छा लग रहा है.. शायद तुम्हे समझने में काफी वक्त लगे.. लेकिन वादा करती हूं जिस दिन समझोगे, कहोगे मै भी कितना डफर हूं..


रवि:- वो तो मैं शुरू से हूं... यदि मै पुष्पा और अमृता से नहीं मिला होता तो शायद कहानी ही कुछ और होती..


मै:- रवि अब मै जा रही हूं... आज बहुत ज्यादा बात हो गई.. कल फ्री हो क्या?


रवि:- ओय उड़ती तितली, अभी तुम्हारे नए फ्लैट गया था वहां से यहां का पता मिला, तो भगा चला आया.. कल क्या अब रोज मिलना होगा.. खुद ही कही थी ना मार्च बाद हमारे मंत्री जी के ऑडिट का काम करोगी..


मै:- नहीं अभी मै कोई काम हाथ में नहीं लूंगी.. अब कोई काम नहीं...


रवि:- एक काम करो तुम जाओ घर मै भी चला.. बाकी मै भी देखता हूं कि कैसे काम नहीं करती..


मै:- तुम मुझे चैलेंज कर रहें हो क्या रवि?


रवि:- नहीं मै तुम्हे वापस तुम्हारी जिंदगी की ओर मोड़ रहा हूं...


मै कितनी बात बनाऊं एक ही दिन में.. अब ऊब सी रही थी रवि की बातों से.. मै चुपचाप निकल गई.. हां लेकिन लाइब्रेरी से लौटकर जैसे जिंदगी पटरी पर चल रही हो.. मै अपने अंदर योके को मेहसूस कर रही थी जो 3 महीने के कब्र में थी.. जर्मन सैनिक के साथ फंसी, और तो और पहाड़ से गिरकर भी खुद को बचाने में कामयाब रही थी.. योके.. मै जीती हूं क्योंकि मै जानती हूं कि जीती हूं..


लाइब्रेरी मानो मेरी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका हो.. रोज सुबह आना, बाबा के साथ बैठकर किताबो को और करीब से जानना... कितना अनुभव था उन्हे... बातों-बातों में एक गहरी बात याद दिला गए जो मां सिखाया करती थी...


"कभी-कभी छोड़ना ज्यादा अच्छा होता है, लगातार पीछे भागने से"… तब मतलब समझी भी थी और नहीं भी, लेकिन आज पुरा समझ गई थी... आधा अप्रैल यानी 15 अप्रैल 2015 तक मनीष भईया गांव वापस जा चुके थे, खुश थे क्योंकि मै हंस रही थी और लगातार हर्ष के पीछे दिमाग दौराने के बाद उसे छोड़ चुकी थी...


संभवतः नकुल और उसके पक्ष के बारे में सोचकर मैं उसे भी छोड़ चुकी थी.. मै अपनी मनोदशा किससे साझा करूं इसलिए मेरे पास शायद रवि था.. मै अपने अंदर हो रहे बदलाव और पूरी सोच साझा करती थी..


मेरे लिए वो भी बेचारा नियमित रूप से शाम को लाइब्रेरी आता.. मै जब आंख दिखाती तो छोटा सा मुंह बनाकर महाभारत पढ़ने बैठ जाता और जितना वो पढ़ता उतने मे हम सारी नीति डिस्कस करते थे..


दोस्ती तो रवि से थी, लेकिन एक बात जो उसकी आंखों में साफ झलकता था, वो है उसकी चाहत.. यही कारन था कि दिल्ली आने के बाद भी मै रवि से मिलने मे कभी रुचि नहीं रखती थी, जबकि मिलने की इक्छा तो बराबर हुआ करती थी... ऐसा नहीं है कि रवि नहीं समझता यह बात लेकिन कुछ बाते अनकही ही रहे तो ज्यादा अच्छा लगता है..


30 अप्रैल मै थी एक्सटर्नल और इंटरनल होम मिनिस्ट्री के दफ्तर में.. जहां केवल सिक्का चलता था उमाशंकर मिश्रा.. छोटे पुजारी. बाहर मिलो तो कितने सीधे और सरल, उनकी वाणी कर्ण रश घोले.. लेकिन ऑफिस में उनका अंदाज ठीक उलट था, कर्कास और बिल्कुल खड़ी बोली.. ना तो चेहरे पर मुस्कुराहट और ना ही गुस्सा.. एक गंभीर सा चेहरा जो सुबह 8 बजे आता था और रात के 11 बजे ऑफिस से जाता था..


जिस दिन नहीं आता, उस दिन भी 2 घंटे तो ड्यूटी करके ही जाता था.. एक्सटर्नल और इंटरनल अफेयर मिनिस्टर, श्याम प्रसाद शुक्ला जी के एक स्तम्भ.. उमाशंकर एक स्तंभ थे, तो रवि अग्रवाल दूसरा स्तंभ.. यूं तो क्लार्क था, लेकिन इस ऑफिस की कोई भी फाइल रवि अग्रवाल के नजरो के सामने से बिना स्कैन हुए, साइन नहीं किए जा सकते थे, और रवि जिस फाइल को मंजूरी दिया, उसको फिर कभी मंत्री जी देखते नहीं थे..


दोनो स्तंभों ने ऐसा ऑफिस के अंदर ताना-बाना बुना हुआ था कि श्याम प्रसाद शुक्ला जी अब तो नेक्स्ट स्टेप, वाणिज्य मंत्रालय की ओर तैयारी मे लगे थे.. कुछ कंक्रीट सा उन्हे मिल नहीं रहा था कि कैसे वो सिद्ध करे की वो वाणिज्य मंत्रालय के योग्य है, इसलिए कई सारे अर्थशास्त्री को बिठाकर वो दिन भर अर्थशास्त्र और देश दुनिया की तमाम अर्थशास्त्र नीति के अध्ययन में जुटे रहते....


मेरा यह पहला अवसर था जब मै किसी सेंट्रल मिनिस्ट्री के दफ्तर का काम काज देख रही थी.. बाहर से भले लगता हो सरकारी दफ्तरों में क्या काम होता होगा.. लेकिन यहां के दफ्तर में मेरे ख्याल से 16 घंटे काम होता था...


मै लगभग 2 घंटे बिना काम के बैठी रही. बॉडीगार्ड के काफिले के बीच चले आ रहे थे श्याम प्रसाद शुक्ला जी, आते ही ऑफिस में गए और उनके पीछे अपने उमाशंकर मिश्रा..


उन दोनों के साथ एक सरकारी पीए भी था जो अंदर चला.. 25-26 साल की एक मैरिड लड़की हाथो में फाइल लिए बाहर खड़ी थी और मंत्री जी से मिलने वाले कुछ लोग वेटिंग लौंग मे..


आधे घंटे बाद उमा शंकर ने दरवाजा खोला और उस लड़की को अंदर आने के लिए कहा गया... वो लड़की तकरीबन 15 मिनट बाद लौटी और वहां पास के एक बॉडीगार्ड से कुछ बात करके निकल गई... आप भी सोच रहे है ये सब मै क्या बता रही हूं...


सच कहूं तो मनहूस सी ये जगह मुझे लग रही थी.. इतना बोर तो मै तब भी नहीं हुई.. आगे तुलना करने को कुछ है है नहीं, जो मै किसी घटना का विवरण भी दे सकूं.. बस भाग जाने का मन कर रहा था...


मै बोरियत को इस कदर मेहसूस कर रही थी कि वहां बैठे स्टाफ के हेयर कट तक को नोटिस कर रही थी.. बहरहाल उस लड़की के निकलने के 2 मिनट बाद, रवि मंत्री जी के चेंबर मे गया और फिर एक चपरासी ने मुझे अंदर जाने के लिए कहा...


कुछ औपचारिक परिचय के बाद मंत्री शयम प्रसाद शुक्ला कहने लगे... "मै तुम्हे 1 साल से जानता हूं, जब तुम इकोनॉमिक्स फोरम में भाषण दे रही थी.. तुम पहली ऐसी वक्ता थी जिसे मै समझ सका था"…


मै:- "बहुत-बहुत धन्यवाद सर, लेकिन अगर आप मुझे अपने इस बोरिंग ऑफिस में काम ऑफर कर रहे है तो जवाब है ना.. इससे अच्छा मेरे गले में फांसी लगाकर लटका दीजिए..."

ध्यान से सुनिए, जब मै आयी.. ये छोटे पुजारी जो मुझे देखकर स्माइल दिया करते थे, वो एक नजर डालकर फिर ऐसे काम मे लग गया जैसे पहली बार देख रहा हो.. ये रवि मेरा दोस्त, मेरा करीबी.. 2 घंटे से बैठी हूं, पूछने तक नहीं आया... 42 स्टाफ, 8 बॉडीगार्ड, 6 सिक्योरिटी गार्ड, 8 कमांडो, 1 आईपीएस, 2 आईएएस इतने लोग है ऑफिस के फ्रंट में, जो आखों के सामने से गुजरे..

थर्ड कॉरिडोर के अंदर ऑफिस की एक आंटी, एक अंकल के साथ पेपर की फेका फेकी खेल रहे थे, उमाशंकर के अंदर जाते ही.. आपने अपने सभी स्टाफ को एक ही सैलून मे जाने की सलाह दी है, इसलिए सबके बाल एक जैसे कटे हुए है..

आप समझ सकते हो कि आपका ऑफिस कितना बोरिंग है, बहुत कुछ बताया नहीं है क्योंकि वो तो दाग धब्बे थे, की किन दीवार पर धूल के दाग है, पानी के दाग है.. बला बला बला..


मंत्री जी मुझे आश्चर्य से घूरते... "तुम वाकई कमाल की हो, रवि ने गलत नहीं कहा था तुम्हारे बारे में... ऑफिस में नहीं रखना है बल्कि तुम्हे निजी सलाहकार (पीए) बनाना है.."


मै:- नाह! मै 2 घंटे की बोरिंग ऑफिस मे, एक लड़की के लिपस्टिक को नोटिस नहीं करूंगी क्या... नहीं बनना मुझे आपका पीए..


मंत्री जी:- "तुम्हे मेरे साथ 24 घंटे रहकर निजी रूप से सहायता करे, वो पीए की जरूरत नहीं है... क्योंकि उसके लिए गवर्नमेंट अपॉइंट लोग है.. और मेरे टाइम शेड्यूल और इवेंट्स को उनसे बेहतर कोई मैनेज नहीं कर सकता.. लेकिन कुछ फाइल का मैनेजमेंट उनको नहीं दे सकते.. और ना ही कुछ मामलो मे उनकी सलाह सही होगी.."

"ना तो तुम्हे ऑफिस आना है ना ही मेरे साथ घूमना है.. मेरे घर रोज 2-3 घंटे आ जाओगी तो तुम्हे पुरा काम समझ में आ जाएगा.. शुरवात के कुछ दिन तुम्हे उमाशंकर बता देगा की क्या करना है, उसके बाद एक ऑफिस तुम्हारे जिम्मे...


मै:- लेकिन सर मै तो अभी पढ़ ही रही हूं.. सीए बनी भी नहीं...


मंत्री:- तुम पढ़ाई जारी रखो, मैंने मना थोड़े ना किया है... वैसे भी तुम्हारे गांव की मिट्टी में कुछ तो बात जरूर है, जो भी मिलता है, पहली मुलाकात मे भा जाता है... तुम मेरी बेटी हो और तुम जैसा सोच रही हो वैसा कुछ नहीं होगा..


मै:- सर मै पॉलिटीशियन के बीच ही पली बढ़ी हूं.. इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकती.. मै काम करूंगी लेकिन मुझे जब कभी भी लगेगा कि मेरे साथ कुछ ग़लत करने की कोशिश हो रही है, मै काम छोड़ दूंगी...


मंत्री जी:- मुझे मंजूर है...


पता नहीं क्यों लेकिन मै ना नहीं कह सकी.. शायद बीते दिनो की मेरी जरूरतों ने मुझे हां कहने पर मजबूर कर दिया हो.. हां एक बात ईमानदारी भरी थी, वो मंत्री ठरकी पुरा था लेकिन वो केवल और केवल पैसे लेकर आने वाली लड़कियों को बुलाता था.. अपने साथ काम करने वाले किसी भी महिला कर्मचारी या फिर उनसे मिलने आयी किसी भी महिला पर ना तो बुरी नजर डालता था और ना ही बाहर से आयी किसी भी महिला के जिस्म की नुमाइश के प्रलोभन में फंसता था...


कुल मिलाकर वो जिस जगह पर था उस जगह पर बने रहने के लिए अपनी सोच के साथ अग्रसर था... ईमानदार लोगों की उतनी ही कद्र भी करता था, श्याम प्रसाद शुक्ला.


काम करते हुए मुझे 3 महीने हो चुके थे, मई से जुलाई की अवधि मै पूरी कर चुकी थी.. ऐसे ही एक रात की बात थी, जब मै और रवि डिस्को गए हुए थे.. वहां किसी से मेरी छोटी सी बहस हो गई थी...


रात के तकरीबन 12.30 बज रहे होगे... रवि ने सीधा फोन लगाया था श्याम प्रसाद शुक्ला को और डॉट 5 मिनट में पूरी फोर्स उस डिस्को में थी... शुक्ला जी ने वापस फोन किया था रवि को जब वहां फोर्स पहुंची... "रवि बताओ क्या करना है, डिस्को को सील करवाना है क्या?"..


डिस्को का मालिक वो अरबपति आदमी, खुद आकर, सरकारी ऑफिस के एक स्टाफ से माफी मांगकर गया था.. ये होता है रेंज श्याम प्रसाद शुक्ला के ऑफिस स्टाफ का.. हां लेकिन उसके लिए पहले क्रेडिट भी बनानी पड़ती है... जो की रवि, उमाशंकर, नूतन, श्रेश, अरविंद और राजीव नाम के लोगों ने अपनी बनाई थी...


खैर, 3 माह की अवधि समाप्त होने के बाद मंत्री जी के घर पर ही हमारी एक कैजुअल मीटिंग थी.. जिसमे सभी विश्वसनीय स्टाफ के साथ, मुझे भी बुलाया गया था... शुक्ला जी सबके सामने बोल दिए... "यार बेईमानी तो बहुत की है, कुछ अच्छा करना चाहता हूं, जो वाकई मे दिल को सुकून देने वाला काम हो और मुझे पॉलिटिकल माइलेज भी उतना ही मिले..."


सब अपने अपने सुझाव दे रहे थे.. मै ख़ामोश सबको सुन रही थी... ये परियोजना, वो परियोजना.. जिसका जो हिसाब हुआ बोलते चला गया... अचानक ही शुक्ला जी मुझसे पूछ बैठे, "तुम क्यों ख़ामोश हो, कुछ बोल क्यों नहीं रही..?"


मै:- सबको सुन रही थी, अच्छा लग रहा था..


मंत्री:- अब हम सब तुम्हे सुनना चाहेंगे..


मै:- मेरे पास कुछ भी नहीं है ऐसा जो आपके काम का हो..


रवि:- मंत्री जी इसने अगर बोल दिया तो समझ लीजिए कि आप हम जिस प्वाइंट को कभी सपने में भी नहीं सोच सकते, वो ये कह देगी..


मै:- भगवान हूं ना मै रवि..
So nayi raah, new job, naye log...
Haan in mein se kuch jaan pehchaan ke hai par pata nahi kyun... yun achanak se ravi ka yun aana uski jindagi mein... kuch gadbar lag rahi hai... kuch toh hai nazar nahi aa rahi hai... aur yun mehervan hona mantri ka yeh bhi sochne wali baat hai...
Khair let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill :applause: :applause:
 
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अध्याय 27 भाग:- 3




मंत्री:- फिर भी हम तुम्हे सुनना चाहेंगे.. कुछ भी जो दिल में आ रहा हो..


मै, कुछ देर ख़ामोश रहने के बाद... "मेरी बहन है गौरी, मुझसे 1 साल छोटी है, लेकिन हम दोस्त की तरह है.. यहीं दिल्ली मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस कर रही है.. दिसंबर 2014 की बात है, हम दोनों ऐसे ही बात कर रहे थे, तब मै उससे कही की मेरे पास 7 करोड़ रुपया है जो किसी काम का नही, तू उसे ले ले और खर्च कर दे.."

"हो गया वो सुनी.. हमारी चर्चा आगे बढ़ी, उसने कहा चल कुछ पागलपन करते है.. मैंने हामी भर दी.. 2 बस किराए पर लिए.. सहर के 30 किलोमीटर के पश्चिमी सीमा से लेकर सहर होते हुए, 25 किलोमीटर उत्तर और पूर्व की सीमा तक बस को दौरा लिए.. 82 वृद्ध जो किसी मजबूरी बस भीख मांगने पर मजबूर थे, उन्हे बस में बिठाया.."

"गौरी ने इतना ही कहा, मेरा पागलपन खत्म अब तेरा शुरू होता है... पैसे इस तरह से खर्च कर की इनका अपना घर हो और घर की फिक्स इनकम हो.. मैंने 5 करोड़ मे 100 कमरे का होटल खरीदी.. 2 करोड़ बैंक मे टर्म डिपॉज़िट दिया, जिसका ब्याज हमे 18 लाख सालाना मिलता.. थोड़े कम थे, क्योंकि हमारा लक्ष्य 150 लोग थे और उनको देखने के लिए 4 कर्मचारी... 2 रेगुलर विजिटिंग डॉक्टर और मेडिकल इमरजेंसी के लिए पैसे।"

"सो उस 2 करोड़ के टर्म डिपॉज़िट को 5 करोड़ करवाया.. अब 3 लाख 75 हजार फिक्स इनकम है महीने का.. 2 लाख 70 हजार से 2 लाख 90 हजार महीने का खर्च है, बचे पैसे मेडिकल इमरजेंसी के लिए जमा हो जाता है.. ऑटोनोमस सिस्टम है, जिसने उन वृद्ध को किसी का आशा नहीं देखना पड़ता.. बस ये थी छोटी सी कहानी जिसमे मेरी बहन की ख्वाइश अच्छा करने की थी और मेरे पास पैसे थे..."


बड़े ध्यान से सब मेरी बात सुन रहे थे, जैसे ही मेरी बात समाप्त हुई, सभी एक साथ गहरी श्वांस लेते और छोड़ते, खुद को रिलैक्स किए. कुछ देर तक मेरे बात पर सोचने के बाद मंत्री जी... "मेरे पास पैसा है, क्या तुम्हारी बहन कुछ अच्छा कर सकती है क्या"..


मै:- ये तो वही बता सकती है.. मै क्या कह दूं..


मंत्री:- तुम दोनो बहन को पागलपन करने की पूरी छूट है.. 100 करोड़ की सहायता राशि मेरे ब्लैक फंड से.. बिना नजर मे आए, कर दो पागलपन... हर पागलपन के लिए मै तुम्हे और तुम्हारी बहन को 10 लाख मेहनताना दूंगा..


मै:- मुझे एक टीम चाहिए होगी और कुछ सुकून वाला इलाका... क्योंकि जहां हमारा फ्लैट है वहां मेरी भाभी है और मेरा छोटा भाई है.. ऐसे में वहां मीटिंग वगैरह करना अच्छा नहीं लगेगा..


मंत्री:- उमाशंकर, मेनका को कनौट प्लेस में एक सुरक्षित ऑफिस और तुम अपनी टीम को लेकर मेनका का काम देखो... और कुछ मेनका..


मै:- नहीं सर मीटिंग किसी ऑफिस में नहीं.. रवि या उमा मे से किसी के घर पर कर लेंगे...


मंत्री:- "तुम उमाशंकर से ही बात कर लो, आज से उमाशंकर को ऑफिस से निकालकर तुम्हारे हवाले किया.. गौरी अपनी इक्छा बताएगी, तुम पैसे और एस्टीमेट तैयार करके फाइल उमाशंकर को सौप देना और बाकी वो कर लेगा.."

"100 करोड़ पहली सहायता राशि है जो एक महीने में खर्च करने है वो भी तुम्हारे उस ऑटोनोमस सिस्टम के हिसाब से.. उसके बाद हम नेक्स्ट स्टेप लेंगे.. हां लेकिन 100 करोड़ का पॉलिटिकल माइलेज भी उतना ही मिलना चाहिए.."


मै:- उसकी गारंटी मै नहीं ले सकती की पॉलिटिकली आपको कितना फायदा हुआ.. हां वो सुकून की जो बात आपने की थी, गारंटीड है..


मंत्री:- हम्मम ! मै संतुष्ट मतलब वो पॉलिटिकल माइलेज के भी ऊपर हो गया मेनका.. तुम बेफिक्र होकर काम शुरू करो...


100 करोड़ का इन्वेस्टमेंट प्लान बना. गौरी का पागलपन तो देखने लायक था.. उसने आंख मूंदकर एक स्टेट चुना, जो की था कर्नाटक. और वहां के आधे राज्य में शुरू करवानी थी फ्री वाईफाई हाई स्पीड इंटरनेट सर्विस. गौरी ने प्लान दे दिया, उसके बाद शुरू हुई मीटिंग.. सर्विस प्रोवाइडर्स से बातचीत और 7 दिन मे सब फाइनल होकर काम शुरू हो चुका था.. 9 अगस्त 2015 को काम शुरू हुआ और 29 अगस्त तक काम खत्म करने की आखरी तारिख थी...


आधे स्टेट मे, वहां पूरी केवल लाइन बिछा. एमजी (मेनका-गौरी, एमजी) ट्रस्ट के नाम खुद का इंटरनेट सरवर खरीदा, फ्री-फाय इंटरनेट सर्विस शुरू हुई और हर डिस्ट्रिक्ट तालुका और पिछड़े से पिछड़े इलाके में फ्री वाईफाई प्रोवाइड करवाने का काम शुरू हो गया.. इस पूरे सिस्टम को ऑपरेट करने के लिए 60 से 70 लोगों को स्थाई रोजगार भी मिली, जिसकी सैलरी और वाईफाई मेंटेनेंस के साथ उसका सालाना खर्च, उसी ऑटोनोमस सिस्टम के जरिए जारी होना था जिसकी राशि 10 करोड़, वाईफाई सर्विस के नाम अकाउंट में पहले से जमा करा दी गई थी..


10 अगस्त से मै और उमाशंकर रोज उसी के घर पर मिला करते थे.. ऑफिस के बाहर उसका काफी क्यूट व्यवहार था. बिल्कुल किसी बच्चे की तरह, जो हंसता बोलता और नादानियां करता था... शायद मेरे वजह से वो भी कई सालों बाद अपना ये खाली समय देख रहा था.. क्योंकि 10 अगस्त से हम दोनों रोज उसके घर पर मिलते और केवल काम की रिपोर्ट लेने उसके अलावा हमारे पास कोई काम नहीं होता था, सिवाय बात करने के...


18 अगस्त आते-आते तो मै उसे छेड़ भी दिया करती थी, और उफ्फ वो उसका भोला सा चेहरा.. क्या मासूमियत थी.. 19 अगस्त की सुबह की बात है.. काम लगभग फाइनल हो रहा था... मै बैठी हुई थी और बंगलौर सिटी से वीडियो फुटेज देख रही थी, तभी एक हॉट लड़की पीछे से गुजरी..


मै उमाशंकर को देखती... "दिल्ली में भी ऐसे नजारे मिल जाते है, छोड़ दीजिए छोटे पुजारी, बंगलौर की लड़कियों को"…


उमाशंकर:- धत मेनका जी आप बहुत छेड़ती है..


मै:- अच्छा, मै छेड़ती हूं तो आप ही क्यूं छिड़ जाते हो..


उमाशंकर:- आप कभी नहीं बदल सकती है.. वही पहली मुलाकात वाली मेनका है..


मै:- ऐसा नहीं है उमाशंकर जी, बहुत से बदलाव आए है तब की मेनका और आज की मेनका मे.. तब मै सुंदर नहीं दिखती थी, मेरे बदन पर मांस नहीं चढ़ा था, तब आप मुझे अनदेखा करते थे.. लेकिन जैसे-जैसे मैं जवानी की दहलीज पर कदम रखते गई आप का झुकाव मेरी ओर बढ़ने लगा..


उमाशंकर:- कैसी बातें कर रही है आप.. हां ये सही है कि मै नजरे चुराता था, लेकिन वो इसलिए क्योंकि मेरा हृदय सदैव आपको देखकर ऐसे धड़कता था कि वो बेकाबू सा हो जाता था..


मै:- झूट है ये उमाशंकर जी... ऐसा था तो आपने कभी बताया क्यों नहीं..


उमाशंकर:- डरता था कि कहीं आप कुछ गलत ना सोच ले.. फिर ख्याल आया की क्यों ना आपकी पढ़ाई पूरी होने तक मै खुद को साबित कर सकूं, ताकि सीधा आपके घर जाकर आपका हाथ मांग सकूं..


मै:- हिहिहिहिहि... बहुत भोले है आप उमाशंकर जी.. खैर अब तो मेरे आखों से हर सपना ही समाप्त हो गया है..


उमाशंकर:- मेनका एक बार भरोसा करके देखिए, आपकी जिंदगी मै खुशियों से भर दूंगा...


उमाशंकर मेरे करीब आकर मेरा हाथ थामने की हिम्मत कर चुका था.. वो मेरी आंखों में झांकता अपनी बात कह गया.. शायद ये मेरा ही उकसाव था.. मै नजरें नीची करके केवल "सॉरी" कहीं और वहां से चली गई..


20 अगस्त की सुबह जब पहुंची तब घंटे भर मे अपना सारा काम निपटाने के बाद मै जैसे ही जाने को हुई, उमाशंकर मेरा हाथ थामकर रोकते हुए...


"या तो हां कह दीजिए या ना कह दीजिए, जलता है दिल आपको इतना पास देखकर, आपसे कुछ ना कह पाने की स्तिथि में. मानाकि आपके लेवल का नहीं हूं.. मात्र 60 हजार रुपया महीना कमाता हूं और जमीन के नाम पर बस नाना जी का एक छोटा सा घर है, लेकिन एक बार आप कह दीजिए की आपको किस लेवल का लड़का पसंद है, मै हर लेवल को मैच कर जाऊंगा"


मै:- उमाशंकर जी आपका लेवल मुझसे बहुत ऊंचा है और मै वो लेवल कभी मैच नहीं कर सकती... मेरा नाम पहले ही एक लड़के के साथ जोड़ा जा चुका है फिर आप समझ ही सकते है कि मै किसी के नजर ने कुंवारी नहीं अब..


उमाशंकर:- आप मुझे लोगों में क्यों सामिल कर रहे हो..


मै:- मै जानती हूं कि आप भिड़ मे गिनती लायक नहीं है.. मुझे अभी अपने हाल पर तो छोड़ ही सकते है.. और हां मेरे घर वाले राजी हो गए तो मेरे हां या ना कहने का कोई मतलब ही नहीं.. आप यहां वक्त गंवाने से अच्छा है कि उनसे बात क्यों नहीं कर लेते...


उमाशंकर:- मुझमें ऐसा क्या नहीं जो मै आपके दिल के करीब नहीं हो सकता...


बिल्कुल मासूम सा चेहरा बनाए वो मुझे ऐसे देख रहा हो, मानो सालों के अरमान एक साथ चेहरे की भावना से इजहार कर रहा हो.. मै कहीं खो सी गई उमाशंकर को देखकर.. इतनी मासूम सी अर्जी पर मै इतनी भी खुदगर्जी तो नहीं ही दिखा सकती थी.. मै आगे बढ़कर उसके होंठ को छूकर पीछे हटी...


"मैंने प्रेम वाश आपको नहीं चूमा, बस आप बहुत प्यारे लग रहे थे, और आपको चूमकर मैंने अपनी फीलिंग बताई है"…


मेरी हरकत और मेरी बात सुनकर उसका पूरा चेहरा खिल गया, जवाब में मै भी उमाशंकर को एक प्यारी सी मुस्कान देती चली... लड़के का चेहरा देखने लायक था.. मै दर्द से तो उलझी ही थी, कम से कम एक सच्ची चाहत को तो उसकी मंज़िल मिल जाती...


मै वापस आयी अपने घर.. मैक्स लेटकर अपनी किताब में उलझा हुआ था और गौरी किचेन मे थी.. मै दबे पाऊं मैक्स के कमरे में घुसी उसके कान में चिल्लाने के लिए, लेकिन अंदर पहुंचकर तो लड़के ने मुझे सरप्राइज़ कर दिया..


मै पीछे खड़ी होकर देख रही थी और सामने दूसरी स्क्रीन वाली ने शायद मुझे देख लिया हो, वो झट से स्क्रीन से गायब हो गई और मैक्स हड़बड़ा कर उठते हुए... "दीदी ये गलत है, तुमने मेरे प्राइवेसी मे सेंध मार दी"…


मै:- हिहिहिहि... कौन है बड़ी खूबसूरत थी.. और हॉट भी..


मैक्स:- अनीता नायर नाम है.. कर्नाटक से..


मै:- गर्लफ्रेंड है या कुछ सीरियस अफेयर..


मैक्स:- अफेयर तो सीरीयस ही होता है, हां बस आगे जाकर किसका माथा घूम जाए किसे पता.. इसलिए नथिंग सीरियस…


मै:- अच्छा हम दोनों (मै और गौरी) मे से कोई ये बात कहे तो..


मैक्स:- नहीं कर सकती ना..


मै:- यदि कहीं कर दे तो..


मैक्स:- नहीं कर सकती बस... और हमारा कोई सीरियस अफेयर नहीं है.. साथ पढ़ते है एक दूसरे को अच्छे लगे तो थोड़ा सा वक्त दे रहे है.. मै उसे अपनी फैमिली और कल्चर बता रहा था और वो अपनी बता रही थी.. यदि हम दोनों को सब कुछ पसंद आ गया तो फिर रिश्ते को आगे बढ़ाएंगे वरना.. खत्म..


मै:- ओह इसलिए वो इनरवियर में अपना कल्चर बता रही थी..


मैक्स मेरे सर पर एक हाथ मारते... "गंवार कहीं की वो शर्ट्स मे थी और ऊपर स्लीवलेस टॉप थी, इनरवियर तो अंदर था..


मै:- देख भाई इतने कम कपड़े वाली बहू लाएगा तो तेरे कपड़े का तो खर्च घट जाएगा, लेकिन मेरी मासी हार्ट पेशेंट जरूर हो जाएगी..


मैक्स:- धत तेरे की ये रिश्ता ही नहीं जमने वाला.. अच्छी लड़की हाथ से निकल गई..


मै:- इतने छोटे कपडे पहनती है, ओपन ख्याल की होगी.. 5-6 बॉयफ्रेंड तो होगी ही..


मैक्स:- नहीं उसका बस एक बॉयफ्रेंड था जिससे 1 साल पहले ब्रेकअप हो गया..


मै:- कारन..


"क्योंकि वो लड़का अमेरिका जाना चाहता था और अनीता का कहना था कि बहुत ज्यादा सैलरी का अंतर होगा तो 1 लाख रुपए का अंतर होगा, वो भी बहुत ज्यादा बोल गई. अमेरिका जाने से कोई बिल गेट्स नहीं बनने वाला.. ना ही अरबपति.. दिखावे में आकर भेड़ चाल चल दिए.. इसी बात पर बहस हो गई.. वो अपने ही देश के बारे में बुरा बुरा बोल रहा था और अनीता उसे एक चिपका कर चली आयी"… गौरी हमे ज्वाइन करती हुई बोली...


हमने अपने हाथो मे चाय के कप ले लिया, और बैठ गए बातें करने.. गौरी को मैक्स ने सब बता रखा था. अनीता के बारे में सुनकर तो अच्छा ही लगा हमे.. वो बैंगलोर से 18 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा टाउन है, चिक्काबियादराकल्लू, वहीं के किसान परिवार से है अनीता, जिसे सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर से शुरू से नफ़रत रही थी इसलिए मेडिकल की तैयारी की और डॉक्टर बनना एंबिशन है...


बातो ही बातो मे फिर हमने तय किया कि फिर चला जाए पहले अनीता का ही कल्चर समझ लिया जाए, लेकिन उसके घरवालों को पता चला कि प्रेम प्रसंग का मामला है तो कहीं हम लौटकर भी ना आने दे...


मैक्स हंसते हुए कहने लगा.. "वो बिहार का कोई सहर नहीं की बोले बॉयफ्रेंड है तो तलवार भाला चल जाए.. वो लोग एक्सेप्ट करते है लड़की की पसंद, और लड़का अच्छा लगे तो हां कह देते है"..


मै:- ओ भाई उड़ मत.. अभी बात केवल कल्चर समझने की हो रही है.... उसके बाद रिश्ता आगे बढ़ेगा. दोनो को लगेगा कि शादी कर सकते हो तब ना.. की पहले ही..


मैक्स:- दोनो बहने उसमे रुचि ले रही हो.. मतलब वो अच्छी ही होगी..


बातें तो होती ही रही.. इसी बीच रूपा भाभी भी पहुंच गई.. काफी थकी हुई लग रही थी... "क्या हो गया ऐसे बदहाली में कहां से आ रही हो"…


भाभी:- पता नहीं, तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही.. बहुत तेज दर्द उठा था पेट में, ऐसा की बर्दास्त से बाहर था.. मै तो सड़क के किनारे ही बैठ गई थी...


मैक्स:- चलो हॉस्पिटल चलते है..


भाभी:- 2-2 डॉक्टर घर में है और मै हॉस्पिटल जाऊं..


मैक्स:- पागल हो क्या.. अभी मै दूसरे और गौरी पहले ही साल मे है.. वैसे भी ये पथरी का दर्द लगता है.. चलो चलकर देख लेते है..


भाभी:- पथरी.. चल फिर कौन ये दर्द झेलते रहे. जल्दी से निकाल दो फिर.. मुझे तो दर्द से उल्टियां तक हो गई.. और ये कैसा सहर है, दर्द से मै छटपटा गई और सब केवल मुंह देखकर चले जाते..
waise gouri ki soch pagalpan nahi balki ushe samaaj seva garib, dukhi jaruratmando panah dena unka khayal rakhna hai...
Oh so ek aur Aashiq menka ki jindegi mein dastak de raha hai aur yeh kya menka ne bhi ushe apna liya...
are dhett teri ki... pehle enquiry toh kar leti pagli :doh:
baad mein phir se pachtana na pare....
roopa bhabhi.... are yaar isko bhi abhi yeh hona tha... jaldi se check up kar treatment le le... kyunki iski nanad urf beti menka ko phir se prem rog lagi hai... Agar iske chalte phir se fanshi ya dukhi huyi toh roopa bhabhi ki jarurat hogi ishe..
Khair let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill :applause: :applause:
 
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Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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अध्याय 27 भाग:- 4




हम सब तुरंत ही हॉस्पिटल पहुंच गए. मैक्स ने सही अंदाज लगाया था, भाभी को गाल ब्लैडर मे 10 मम के 3 पत्थर थे.. मैक्स ने पहले ही समझा दिया था कि यदि पथरी हुई तो वो कहेंगे पहले 6 महीने ट्रीटमेंट लेने, लेकिन सीधा कहना ऑपरेशन ही करना गई।


हमने भी वही कहा.. बहुत बढ़िया सुविधा थी यहां. सुबह ऑपरेशन किया और शाम तक डिस्चार्ज. हमने तो किसी को बताया तक नहीं की भाभी के पथरी का ऑपरेशन है.. इधर वाईफाई का सरा काम के प्रोग्रेस को चेक कैसे करना है उमाशंकर तो समझ ही गया था, इसलिए मैंने कह दिया था कि एक हफ्ते बाद ही मिलूंगी...


हफ्ते दिन के लिए मैक्स और गौरी ने भी अपने सभी कार्यक्रम न्यूनतम कर दिए.. ऑपरेशन के तीसरे दिन था जब मैक्स हमे सरप्राइज़ करते अनीता को अपने साथ ले आया.. हाय उसे कर्ली बाल.. कितनी प्यारी लग रही थी...


रंग थोड़ा मध्यम था, लेकिन चेहरा की बनावट और चेहरे से छलकता उसका नूर, उसे अति खूबसूरत से भी ऊपर की श्रेणी में लेकर चला जाता है... गौरी के साथ ही पढ़ रही थी अनीता, मैक्स से एक साल जूनियर...


ओह अब याद आया तो बता दूं कि मैंने ही गौरी को सजेस्ट की थी... "जो मेहनत तैयारी मे लगाओगी, वो एमबीबीएस के किताबों में लगा देना, जहां समझ में ना आए मैक्स है.. उससे हर बात डिटेल मे समझ लेना.. फिर जुगाड टेक्नोलॉजी और हमारे कुछ पॉलिटिकल एप्रोच के बाद गौरी का अप्रैल में मेडिकल कॉलेज में दाखिला हो गया.."


हम सब बातें करने बैठ गए. वो हम सब को ऑब्जर्ब कर रही थी और हम उसे. तकरीबन 3 घंटे वो हमारे पास रुकी थी, इन 3 घंटे में हमे कहीं से लगा ही नहीं की हमारे बीच कल्चर का कोई गैप है.. बस उसकी हिंदी को छोड़कर..


अनीता को हिंदी बोलने में काफी असहजता होती थी, इसलिए वो हिंदी के साथ इंगलिश का भी प्रयोग कर लिया करती थी, और उसके हिंदी का प्यारा उच्चारण, मस्त था..


अनीता जाते-जाते आखिर कह ही गई, तुमने जैसा बताया उससे कहीं ज्यादा प्यारे तुम्हारे रिलेटिव्स है, और जहां रिलेटिव्स के बीच प्यार हो, उनकी फैमिली तो मिलनसार होगी ही. मुझे पसंद आया तुम्हारा कल्चर और फैमिली.. तुम कब आ रहे हो मैक्स..


मैक्स:- न्यू ईयर तुम्हारे यहां, तब छुट्टियां भी होगी और कोई एग्जाम भी नहीं होगा..


लो जी भाभी के ऑपरेशन और हमारे मैक्स भईया ने अपनी डेट भी फिक्स कर ली... लड़की तो मुझे और गौरी को भी दिल से पसंद थी, बस मुझे जरा अपनी मासी को समझना होगा कि थोड़ा तो मेरी खातिर सुधर जाओ...


एक हफ्ते की छुट्टी समाप्त हो चुकी थी और उसी के साथ लगभग काम पूरा.. 98 करोड़ 56 लाख लगे थे प्रोजेक्ट मे, बाकी का पैसा मैंने ट्रांसफर करवा दिया... 1 सितंबर के दिन मीडिया मे आकर हमारे होम मिनिस्टर जी ने भाषण दिया, और शुरवात..


"जो सहर आईटी फील्ड का हब है केवल वहीं नहीं, बल्कि आधे कर्नाटक में हमने फ्री वाईफाई सर्विस शुरू करवा दी है, वो भी एक वक्त मे 8 करोड़ यूजर कैपेसिटी के साथ, 18 एमबीपीएस की स्पीड मे.."


फिर उन्होंने अपने लंबे चौड़े भाषण में उनकी निह स्वार्थ सेवा भावना के काम जारी रखने का वादा किया.. उन्होंने यहां तक कह दिया कि नेता पहले वादा करके, कई साल बहाने बनाने के बाद नींद से नहीं जागते. किन्तु हमारा नारा है, पहले कर दो फिर बताओ की आपके लिए यह सब खुशियों का इंतजाम हमने किया है..


महीने के पहली तारीख को ही मंत्री जी ने ऐसा बॉम्ब फोड़ा था कि पुरा असेम्बली हिला हुआ था, उसी दिन शाम को आयकर विभाग वालों का छापा भी पड़ गया.. मंत्री जी के पास फाइल पहले से तैयार थी. कितना धन उन्होंने अपने जमा पूंजी से लगाई उसकी डिटेल, गुप्त दान के जरिए कितना पैसा आया और किन-किन उद्योगपियों ने मदद की सबका लेखा जोखा मिल गया..


अन्तिम सवाल उनका, इस पूरे फ्री सर्विस का मालिकाना हक किसके पास है.. तब उन्होंने एमजी ट्रस्ट के पेपर को थमाते हुए कहने लगे...


"अपने देश के छोटे से गांव की 2 बहने है जो पहले से अच्छा काम कर रही है, उन्ही एमजी ट्रस्ट को दिया गया है.. ये लोग 122 वृद्ध के रहने खाने और मेडिकल की सुविधा, बिना किसी से आर्थिक लाभ लिए पहले ही कर चुके है.."


आयकर वाले जब सवाल-जवाब कर रहे थे तब मंत्री जी ने पुरा लाइव आकर अपना साक्षात्कार दिया था.. 1 सितम्बर को मंत्री जी ने हिलाया और अपने भाषण के अंतिम चरण मे यह भी कह डाले,


"मै अपनी पार्टी और पार्टी मुखिया का शुक्रगुजार हूं, जिन्होंने हमेशा मुझे कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करते रहे... फ्री सर्विस शुरू करना एक बात होती है, लेकिन उसे जारी रखने के लिए जो आर्थिक तंगी साल दर साल झेलनी पड़ती है, इसलिए कोई चाहकर भी मुफ्त सेवा लगातार दे नहीं पता.. लेकिन वाणिज्य मेरा पसंदीदा विषय रहा है और हमने ऑटोनोमस सैलरी जेनरेट सिस्टम से आने वाले सालों में होने वाले खर्च का जरिया निकाल लिया है.. इसी के साथ वादा रहा की आने वाले समय में आपको मंत्री शयाम सुन्दर शुक्ला का सरप्राइज़ मिलता रहेगा"…


1 सितंबर को मंत्री शायम सुन्दर शुक्ला छाए रहे, जिसमे उन्होंने अपनी सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से जता दिए की उन्हे क्या चाहिए... वहीं 2 से 5 सितंबर तक खुश हुई जानता, पुरा देश के मीडिया के सामने खड़ा होकर कहने लगे, सरकार को श्याम प्रसाद शुक्ला सीखना चाहिए... कैसे मुफ्त सेवाएं दे और साल दर साल उसका मैंटेनेस होता रहे...


6 सितंबर 2015 को श्याम प्रसाद शुक्ला ने एक छोटा सा एनालिसिस मीटिंग रखा, जिसमे उसके सभी खास लोग सम्मिलित थे.. मंत्री जी आते ही तालियों से मेरा स्वागत किये.. बोलते वक्त जो उत्साह था, वो देखते बनता था..


सभी बातों पर चर्चा होने के बाद, शायम प्रसाद शुक्ला ने मुझे कहा... अगले पागलपन के लिए आवंटित राशि 1000 करोड़.. और इस बार पूरे पागलपन करने के 5 करोड़ तुम दोनों बहन को मेहनताना...


मै, आश्चर्य से उन्हे देखती... "सर इन पैसों का हिसाब देना पड़ता है... ऐसे ही नहीं उठाकर खर्च कर सकते है... ब्लैक मनी जमा करना बेहद आसान है, लेकिन उसे अपने ही देश में खर्च करना उतना ही मुश्किल..."


मंत्री:- तो फिर क्या करना चाहिए..


मै:- सितंबर चल रहा है, मै पहले पैसों का लेखा जोखा आराम से प्लान करूंगी. आने वाले महीना यानी फेस्टिवल सीजन. इस दीवाली मे इन पैसों से पूरे देश मे पटाखे जलाएंगे.. तब तक आप भी आराम कीजिए और मै तो वैसे भी आराम करूंगी..


मंत्री:- क्यों ?


मै:- क्योंकि आपके चहेते उमाशंकर जी मेरा हाथ मांगने जा रहे है, मेरे गांव..


जैसे ही ये बात मै बोली, मंत्री जी और बाकी के सारे स्टाफ बिल्कुल खुश हो गए.. वो अपने पीए के कान में कुछ बोले और पीए एक फ्लैट के पेपर और चाभी मेरे पास रखते.… "तुम दोनो का संयुक्त गिफ्ट..."


मै उस गिफ्ट को वापस करते... "मुझे नेशनल लाइब्रेरी के पास फ्लैट दो सर, मै कनॉट प्लेस में घर लेकर अपनी बेटी को मॉडल नहीं बनना चाहती और ना ही अपने बेटे को लाल बाल वाला जोकर..."

"नेशनल लाइब्रेरी के पास घर होना ही अपने आप में सुकून है.. और हां सभी कर्मचारी को आपने 3 बीएचके गिफ्ट किया है, और यहां हम दोनों का मिलाकर सिर्फ 1, 3 बीएचके... ये मेरे साथ नाइंसाफी क्यूं.."


श्याम प्रसाद शुक्ला ने अपने पीए से बोलकर कल ही मेरे पसंद की जगह पर 2 फ्लैट रजिस्ट्रेशन करवाने का आदेश देकर वहां का सभा स्थगित कर दिया और रवि उमा शंकर का गला दबोचते... "चल पार्टी दे पुजारी"…


मै रवि को आंख दिखती... "खबरदार जो मेरे सामने इनसे दिल्लगी की"..


रवि:- ऊप्स !!! मेनका मिश्रा फॉर्म मे लौटती..


मै:- नहीं किसी के सच्चे प्यार को मेहसूस करती...


रवि:- तुम मेरी रूड दोस्त.. और ये मेरा प्यारा सा दोस्त.. तुमसे कहना बेकार है.. उमाशंकर पार्टी दे..


मै:- जहां बोलोगे वहां मै पार्टी दे दूंगी लेकिन आज नहीं.. उमाशंकर जी को गांव से लौट आने दो...


वहीं से मै सबको अलविदा कहकर, उमाशंकर का हाथ थामि और हज़रत निज़ामद्दीन के ओर निकल गई.. रास्ते में हम दोनों एक दूसरे को ही देख रहे थे... "पिछले 2 हफ्तों में मेरी ज़िन्दगी तुमने पूरी बदल दी.. मुझे अब भी यकीन नहीं की तुम मेरे साथ हो"…


मै:- उमाशंकर जी शायद दिल में वो जज्बात नहीं जो किसी के लिए हुआ करते थे, लेकिन आप जब साथ होते हो, तो वो जज्बात भी याद नहीं आते.. किसी को तो उसकी सच्ची मोहब्बत मिले... आप बस अपने चेहरे पर ऐसे ही प्यारी मुस्कान बनाए रखना, मै ये खिला सा चेहरा देखकर जी लूंगी...


उमाशंकर:- तुम साथ हो तो मेरा गला काटकर नीचे गिर आए, तब भी मै मुस्कुराता ही रहूंगा..


मै:- प्यार जताने के लिए मरने से तुलना करना जरूरी है क्या, आपको तो अंत तक मेरे साथ रहना है..


बातों के दौरान हम जंक्शन पहुंच चुके थे.. मै पलटकर जैसे ही दरवाजा खोलने लगी, उमाशंकर ने मेरे हाथ को थाम लिया... हम दोनों की नजरे मिल रही थी, और मै उसके मासूम से चेहरे की अर्जी और दिल की भावना पढ़ सकती थी.. मै अपनी पलकें झुकाती हुई... "मै लड़की हूं उमाशंकर जी और अपनी मां की बेटी. गांव में पली बढ़ी.. हर बार मुझे आगे बढ़ने मे झिझक होगी"…


मेरी बात सुनकर उमा शंकर मुस्कुराकर मेरी ओर बढ़ा और मेरे ऊपर आकर मेरे चेहरे को देखने लगा। उसकी नजर पड़ते ही मेरी पलकें झुक गई.. वो कुछ पल मुझे निहारने के बाद, आहिस्ते से अपने होंठ से मेरे होंठ को स्पर्श करते हुए कार का दरवाजा खोला... "तुम पीछे मत आओ, वरना मै जा नहीं पाऊंगा"…


मै उसकी बात पर मौन रहकर बस "हां" में सर हिला दी.. और वो मेरी नजरो से ओझल होता गया.. उमाशंकर ओझल होता जा रहा था और मेरी आंखें डबडबा रही थी.. ना चाहते हुए भी कुछ यादें ताज़ा हो ही जाती है... और जब भी ऐसा होता, मै खुद को रोने से रोक नहीं पाती.. मुझे पता है, हर्ष जहां भी होगा, मुझे रुलाकर चैन से नहीं होगा...


2 दिन बाद उमाशंकर का कॉल आया, वो बता रहा था कि आज के सुबह 11 से पहले का अच्छा महुरत है, सुबह ही शादी का प्रस्ताव लेकर जाऊंगा... मैंने उन्हे बेस्ट ऑफ लक कही और कह दी की कोई समस्या हो तो मुझे कॉल कर लीजिएगा, घबराएं नहीं..


उमाशंकर भी कमाल की चीज थे, बोले "दुनिया में सिर्फ तुम ही मुझे घबराने पर मजबूर कर देती हो, बाकी कोई डारा नहीं सकता".. फोन रखने से पहले मैंने उन्हे बता दिया कि दोनो फ्लैट मिल गए है, और मेरे पसंदीदा लोकेशन पर मिले.... मंत्री जी काफी दिलदार निकले.. एक फ्लोर पर ससुराल तो दूसरे फ्लोर पर मायका बाना दिया.. मायका थोड़ा गरीब है क्योंकि बेटी का रिश्ता अपने से बड़े खानदान मे होगा ना इसलिए... मायका 2 बीएचके और ससुराल 3000 सक्वेयर फिट का डुप्लेक्स फ्लैट..


मंत्री जी की भावना सुनकर उमाशंकर हंसते हुए कहने लगा, कभी-कभी तो ये ओवर कर देते है.. फिर उन्हे बताया कि "मै खाली थी इसलिए आपके हिस्से की सुबह 8 से रात के 11 की ड्यूटी मैंने संभाल ली है.. आप अपने पूरे परिवार और रिश्तेदारों से सुकून से मिलिए, यहां के ऑफिस से आपको फोन नहीं जाएगा..."


मैंने जैसे ही यह साझा किया था, उमाशंकर झटका खा गया.. क्योंकि उसे भी पता था कि मै कितनी नफ़रत करती थी उस बोरिंग ऑफिस से.. कई बार उमाशंकर से, तो कई बार रवि से और अंत में मंत्री जी से भी तीखी बहस हो चुकी थी... वो लोग मुझे 5 घंटे के लिए ऑफिस मे आने की जिद करते रहे, और मै अपने हाथ सीधा खड़ा कर देती, आज 15 घंटे की ड्यूटी मे थी...


खैर मै जिस काम के लिए गई थी उसे धीरे-धीरे शुड्यूल कर रही थी.... हां इस चक्कर में ऑफिस के अंदर मंत्री जी और रवि के ताने जरूर झेल लेती.… "कहते रह गए नहीं आयी, आज होने वाले पति के लिए बिना पगार के काम कर रही..."


उनकी बात सुनकर मै मुस्कुराती हुई केवल इतना ही कहती, "पति के लिए नहीं करूंगी तो किसके लिए करूंगी.."


उमाशंकर की बात जब मंत्री जी से हुई और उन्होंने भी जब उमाशंकर को बोल दिया कि मेनका को ऑफिस में ही रहने दो और तुम परमानेंट छुट्टी पर जा सकते हो.. वो हंसते हुए फिर बोल दिए, "बहुत सालों बाद चिंतामुक्त लग रहा हूं.. मैं अक्टूबर मे ही मिलूंगा..."


शादी की बात करने गए मामले में, उमाशंकर अपनी मां के साथ मेरे शादी के प्रस्ताव के लिए पहुंचे थे.. जिसे मेरी मां ने शहर्ष स्वीकार करती हुई कह दी.. "शादी तो बिटिया की हम उसके सीए रिजल्ट बाद ही करेंगे, उसके बाद ही हम इस रिश्ते की बात को आगे बढ़ाएंगे"... मां को सुनने के बाद उमाशंकर, मां से कहने लगे.. 'मेनका ने पहले ही सब कुछ बता दिया था, बस आप सबकी हामी की दरकार थी.." हमारी शादी लगभग तय ही थी...


उधर उमाशंकर ने शादी की बात कर ली.. कई सालों बाद सुकून की छुट्टी पर थे और अपने परिवार के साथ वक्त बिता रहे थे.. लेकिन मै यहां... उफ्फ.… होने वाले पति का ऑफिस बहुत ज्यादा से भी कई गुना ज्यादा बोरिंग था.

2 हफ्ते में मै पूरी ऊब चुकी थी.. पिछले एक हफ्ते से तो इतनी हिम्मत नहीं बचती कि घर पहुंच पाऊं. पास मे ही 5 मिनट की दूरी पर लाइब्रेरी वाला फ्लैट था, वहीं जाकर सो जाती.. खा पीकर 12 बजे सोती और फिर सुबह 7 बजे उठकर ऑफिस के लिए तैयार होना...


मै तो अचंभे मे थी कि ये उमाशंकर इंसान ही है ना.. खैर 2 हफ्ते बीत चुके थे, शनिवार की शाम थी और कल रविवार को मै घोड़े बेचकर सोना चाहती थी..


ऑफिस से निकली तो थोड़ी मस्ती के मूड में थी.. मै साढ़े 11 बजे तक रवि के दरवाजे पर दस्तक दे रही थी. 2 बार बेल बजाई कोई रेस्पॉन्स ही नहीं.. मै निराश होकर जाने लगी तभी देखी तो फ्लैट का दरवाजा खुला हुआ था..


मै सोची शायद बाथरूम में है, इसलिए रेस्पॉन्स नहीं आया, और मै दरवाजा खोलकर अंदर गई. हॉल से आगे बढ़ी ही थी उसके बेडरूम की ओर, तभी अंदर के कमरे से अलग प्रकार की तेज आवाज आयी..


"कमीना कहीं का"…. मेरे लिए रुकना यहां उचित नहीं था इसलिए मै जाने लगी. मै मुड़ती उससे पहले ही वो पागल नंगे ही मतवाली चाल मे बाहर आया और अंदर तेजी से भागते हुए... "रुकना, जाना मत"..


मै गुस्से में वहां रुकी. 2 मिनट बाद एक 32-33 साल की औरत, लैगी टॉप मे वहां से मुंह छिपाकर तेजी से भागी.. उसके 2 मिनट बाद रवि जैसे ही आया, मेरे हाथ में मोबाइल था मै वही खींचकर दे मारी..


सुकून मिला निशाना सही लगा था, उसका नाक, और नाक से खून निकल आया.. "तुमने मुझे रोका क्यों है, मै जा रही हूं"..


रवि:- हर कोई अपनी सेक्स लाइफ जीता है पागल, मै कौन सा सड़को पर कुछ कर रहा था.. नाक तोड़ दी..


मै:- तुम्हारे साथ मेरी इज्जत को खतरा है, इसलिए जा रही थी.. गुड बाय..


रवि:- पागल अब मुझे गड़े मुर्दे उखाड़ने पर मजबूर मत करो.. एक तो नाक तोड़ दी, दूसरे किसी के घर के बेडरूम की बात को लेकर इतनी खफा हो.. तुम्हे तो उस बेचारी के दर्द का पता ही नहीं.. बेचारी का पति 4 साल से सऊदी में रहता है..
yeh joh nayi baatein aur chije ho rahi hai menka ki life mein yeh aane wale tufan ka sandesha hai.. Kyunki ki
Pehli baat nain11ster ke stories mein agar hero bahot der baad aaye aur lage ki woh bas hero ka kirdaar bas naam bhar ke liye nibha raha hai toh samajh jaana chahiye kuch toh gadbar hai... joh dikh raha hai woh hai nahi...
waise kuch naye kirdaar bhi aaye jaise woh anita lekin woh side character hai...
dusri baat ek boring si life-style tab aati hai pramukh kirdaar ke liye jab bahot badi ghatna ghat chuki ho... jo ki ghat chuki hai menka ki life mein.... lekin yahan ek twist yeh bhi hai ki pehle wala kand totally clear nahi hua hai puri tarike se jaise writer sahab ki baaki stories dekhne ko milti hai... yaani ki sabse badi kand abhi ghatne ko baaki hai....

Khair... let's see what happens next
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Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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अध्याय 27 भाग:- 5




मै:- किमिने हो एक नंबर के.. दरवाजा तो लगा लिया करो कम से कम..



रवि:- वो हम दरवाजे से ही पूरे जोश में गए थे तो लगाने का मौका ही नहीं मिला.. एक राउंड खत्म करके दरवाजा ही लगाने आया था पहली फुरसत में.. छोड़ो भी गुस्सा.. और क्यों आयी थी वो बताओ..


मै:- नाह !!! किसी काम से भी आयी हूं मै, लेकिन अब तुम्हारे साथ कहीं नहीं जाना..


रवि:- "फर्क ये नहीं पड़ता कि कौन अपनी निजी जिंदगी में कैसा है और क्या करता है.. फर्क इस बात से पड़ता है कि वो मेरे लिए कैसा है.. मेरे लिए अच्छा है तो अच्छे ही कहूंगी.. बाकी इस दुनिया मे अच्छे लोग है कि कितने जिसे अच्छा कह सकूं.." कुछ याद आया...


मै:- तुम्हारी आदत गई नहीं ना मेरी ही बातो को मेरे खिलाफ इस्तमाल करने की.. हम्मम ! सॉरी, मुझे तुम्हारी उस निजी बात पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए था.. डिस्को जाने का मन था लेकिन अब मूड ऑफ हो गया..


रवि ने फिर जिद पकड़ ली.. और हारकर मैंने भी हां कह दी.... एक बात जो उसने बीच मे बिल्कुल सही कहा था, "तुम्हे यदि मै गलत लगता तो तुम रुककर मुझे सुनती नहीं'.. जो की सही था...


खैर मै रवि के साथ डिस्को के लिए निकल गई.. रास्ते में मैंने जिज्ञासावश पूछ लिया... "ये बताओ की मंत्री की कितनी आइटम के साथ तुम सो चुके हो"..


रवि:- सभी.. पहले वो लेता है फिर मै.. या फिर मंत्री के जिस भी करीबी की इक्छा हो.. उस लड़की को उस हिसाब से पेमेंट मिल जाती है..


मै:- क्या पेमेंट होती है, किसी एक के साथ जाने की..


रवि:- सबकी अलग-अलग होती है... चमरी और परफॉर्मेंस के हिसाब से दाम तय होता है.. वैसे मंत्री के लिए जो बुलाई जाती है वो 20 हजार कम से कम लेती है.. सब हाई प्रोफ़ाइल कॉल गर्ल होती है.. कोई सामान्य जीवन में स्ट्रगलिंग मॉडल होती है तो कोई किसी ऑफिस की खूबसूरत एम्प्लोई…


मै:- वो कमा तो रहीं है फिर ये जिस्मफोशी का धंधा..


रवि:- वर्तमान समय में ये उनके लिए मज़े के साथ पैसे कमाने का जरिया है.. जिन्हे यहां के नाईट लाइफ की लत लगी है, फिर लाख रुपया महीने का कमाना, मानो उनके लिए 1000 रूपए महीना कमाकर खर्च चलाने जितना है..


मै:- है दिखावे की ज़िन्दगी ने सबको पागल बाना रखा है... अच्छा रवि एक बात बताओ.. मेरा क्या रेट होगा..


रवि अपना एक हाथ स्टेरिंग से हटाकर अपना माथा पीटते... "मै गलत थोड़े ना कहता हूं कि तुम पागल हो.. उमाशंकर यदि ये सब सुन लेता, तो खड़े-खड़े आत्महत्या कर लेता..


मै:- वो मासूम है तभी तो उसे मै मिली और तुम्हे मिलेगी कोई तुम्हारे जैसी.. बिल्कुल ओपन खयालात..


रवि:- कमाल का कॉम्प्लीमेंट था..


मै:- खुद 56 भोगी और दुल्हन की ख्वाइश घरेलू.. देख लेना मेरा श्राप है, तुम्हे तो 36 घर संभालने वाली लड़की मिलेगी.. जैसा तुम्हारा आवारा नेचर है..


रवि:- साला जिंदगी में कभी शादी ही नहीं करूंगा..


मै:- हां लेकिन अपनी छिछोडी हरकतों से बाज न आना... मुझे तो समझ में नहीं आ रहा की मै एक निर्लज, चमड़ी प्रेमी के साथ कर क्या रही हूं..


मै अपनी बात कहकर ख़ामोश हो गई, रवि भी ख़ामोश ही था.. अचानक ही हम दोनों जोड़ से हंसने लगे.. हंसते हुए रवि कहने लगा... "आवारा ही सेर्टीफाई कर दो.. वैसे तुमने अपना रेट पूछा था ना"..


मै:- कमीने अचानक से पीछे की बात कहां अभी उठा लाए..


रवि:- तुम्हे अपनी मार्केट वैल्यू जाननी थी ना..


मेरे हाथ में मेरा हैंडबैग था उसी से रवि को पिटती हुई.. "मेरी मार्केट वैल्यू लगा रहे, जो करोड़ यूं फेंककर आ गई थी"


मै हांफती हुई सीधी बैठी.. रवि मुझे छेड़ते हुए कहने लगा.. "20 से 30 हजार बन संवर कर, झल्ली मे 5 हजार"..


मै रवि को घूरती हुई... "चलती गाड़ी से फेंक दूंगी तुम्हे.. चुप हो जाओ"..


रवि:- क्यों अब जवाब दे रहा हूं तो मिर्ची क्यों लग रही, या फिर खुद की कीमत करोड़ों मे आकी थी..


मै खुद पर थोड़ा अतिट्यूड लाती... "मेरी तो वो भी कीमत है तुम्हारी तो ज़ीरो वैल्यू है रवि.. शून्य"..


रवि:- मुझे क्या करना वल्यू लेकर... मैंने अपनी कीमत थोड़े पूछी थी..


मै:- ओ ले ले.. जे अंगूर तो खट्टे हो गए... क्यों रवि बाबू.. सर जाओगे चौराहे पर, तब कोई हंटर वाला आकर गुलाम मजदूर ही बनाएगा..


रवि:- जी नहीं, फिर तुम भुल मे हो...


मै:- बाना लो कहानी.. मै सुन रही हूं..


रवि:- नहीं रे सच्ची, बंधुआ मजदूर नहीं.. कीमत सेक्स अपीज की ही लगेगी.. हां लेकिन वन टाइम कीमत..


मै:- अच्छा.. और क्या कीमत होगी तुम जैसे थरकियो की..


रवि:- 40 हजार से 50 हजार दिनार..


मै:- कुछ भी, खाड़ी के देश में मर्दों की कमी हो गई जो भाड़े पर मर्द ले जाएंगे.. वो भी उनके कंजर्वेटिव समाज में..


रवि:- बंद दरवाजे के पीछे कितनी खुली कहानी लिखी जाती है वो तुम कभी यहां से बाहर निकलेगी तब ना पता चलेगा... सुनो वैसे लड़को को वहां के सेख उठाते है.. वो लड़के और लड़कियों दोनो के शौकीन होते है.. अच्छा गबरू मिल जाए तो कमाल की कीमत मिलती है...


मै:- "यक्कक .. पैसे वाले कैसे-कैसे शौक पालते है.. आज की शाम ही घटिया हो गई.. रवि, कुछ ऐसी जगह चलो जहां मन थोड़ा बहल जाए.. लेकिन डिस्को नहीं..


डिस्को का प्लान कैंसल हो गया.. वहां से हम दोनों इंडिया गेट पहुंच गए.. जहां लोग अपने कला का प्रदर्शन कर रहे थे.. कोई म्यूज़िक बजाकर शानदार ग्रुप डांस कर रहे थे, तो कोई बेली डांस की प्रैक्टिस.. रात थोड़ी और गहरी हुई फिर भुरम-भुरम करते बाइकर्स पहुंच गए और वो सब अपने कला का प्रदर्शन करने लगे...


क्या नजारा था, मै तो खुश हो गई.. और इतनी ज्यादा खुश की मै रवि से धन्यवाद कहती हुई कहने लगी... "जितनी घिनौना अनुभव तुम्हारे कमरे से लेकर रास्ते तक में हुआ था.. उसे अब शांति मिल गई"..


रवि:- साथ डिनर करने चले क्या..


मै:- बिल्कुल...


हमने साथ में डिनर किए.. कुछ पुरानी और कुछ नई बातो के साथ, मै 2 बजे अपने फ्लैट पहुंच चुकी थी... अगली सुबह जब मै पहुंची तो मेरे पास एक पुरा कंक्रीट प्लान था जो कि इस दीवाली धमाल से लेकर न्यू ईयर तक मचाने वाले था..


मै मंत्री जी से ऑफिस में मिली, तभी कह दी "एक मीटिंग चाहिए दीवाली से लेकर न्यू ईयर नाईट हिलाने के लिए.. कल रात से ही दिमाग में घूम रहा है".. चूंकि सन्डे ऑफिस बंद थी, इसलिए मंत्री जी ने कह दिया कि किसी भी सोमवार को मीटिंग संभव नहीं है.. और मीटिंग में उमाशंकर का भी रहना जरूरी है.. तुम अपने हिसाब से मीटिंग प्लान कर लो..


मै कुछ नहीं कही और केवल हामी भर दी.. उसी शाम उमाशंकर का कॉल आ गया.. वो पूछने लगा कि अब तक मै उसे कॉल क्यों नहीं की..


मै, थोड़ा आश्चर्य से... "सुबह ही तो बाते हुई थी".


उमाशंकर:- नहीं मीटिंग के लिए कॉल क्यों नहीं की.. अब मुझे मेरे ही ऑफिस से पराया कर रही हो..


मै:- ये क्या उल्टा सीधा बोल रहे हो.. मीटिंग का प्रस्ताव देना मेरा काम है, उसमे कौन होगा कौन नहीं, वो तो सर डिसाइड करेंगे...


उमाशंकर:- हां तो उन्होंने बोला था ना मुझसे कॉर्डिनेट करके सोमवार छोड़कर मीटिंग फाइनल कर लेने, फिर कॉल क्यों नहीं की.. क्या मेरे बिना ही मीटिंग करने का इरादा है..


मै:- तुम्हे आज ये हुआ क्या है.. तुम इतने दिन बाद घर गए हो.. मै तुम्हारी छुट्टियां कैसे बर्बाद कर दूं.. इवेंट तो दिसंबर तक होते रहेंगे...


उमाशंकर:- हां जानता हूं, और ये भी की तुम ये मीटिंग मेरे आने के बाद ही करोगी, चाहे जब मै आ जाऊं छुट्टी से.. बस यही तो अखर रहा है..


मै:- हुंह !!! जिस बात पर खुशी होनी चाहिए वो अखर रहा है.. मुझे की.. तुमने मेरा दिल दुखा दिया.. बात मत करना हफ्ते भर...


उमाशंकर:- सुनो मेनका..


मै:- कितना चिल्ला रहे हो, लाइन पर ही हूं..


उमाशंकर:- जिंदगी में आज तक कभी कोई मेरे बारे में इतना सोचने वाला नहीं हुआ और वो भी बिना बताए कि तुम हर पल मेरे लिए कितना केयरिंग हो. मै गधा था जो तुम्हे कभी अपनी भावना ना दिखा सका ना जता सका.. मै परसो पहुंच रहा हूं..


मै:- आराम से उमा.. कोई जल्दी नहीं है.. मै हूं तुम्हारे साथ... और परसो लौटे तो मुझे बुरा लगेगा.. कम से कम रविवार तक रुको.. तब लगेगा की मैंने योजना पूरे सही वक्त पर बनाया, वरना दिल में कसक सी रहेगी की तुम्हारी छुट्टी बर्बाद कर दी.…


उमाशंकर मुस्कुराते हुए हामी भर दिया.. मै अगले एक हफ्ते तक कंक्रीट प्लान बनाती रही. अभी मै लाइब्रेरी के पास वाले फ्लैट में ही रुक रही थी. 22 सितंबर को भाभी पहुंच गई और वो मिलकर गांव के लिए निकल रही थी. दुर्गा पूजा शुरू होने वाला था, त्योहारों का सीजन आ रहा है.. इसलिए गांव जाना थोड़ा जरूरी हो गया था...


मै हामी भरती हुई भाभी के गले लग गई.. गले लगकर मै थोड़ी देर तक रोती ही रही. उन्होंने पहले मेरे आशु पोछे फिर अपने हाथ मेरे सर पर फेरती हुई कहने लगी मुझे ड्रॉप कर दो...


हम दोनों बात करते हुए चले जा रहे थे.. इसी बीच भाभी ने उमाशंकर के बारे में पूछ ली.. मैंने कह दिया की मार्च 2016 के बाद तो मै सीए फाइनल दूंगी, लेकिन उससे पहले मै अपने भाई-बहन के बीच उससे रिंग की अदला-बदली तो कर ही सकती हूं...


भाभी, मुझे देखकर हंसती हुई कहने लगी.. "तेरी खुशी वापस लौट रही है... मै बता नहीं सकती कितनी खुश हूं.. क्या करूं इन आशुओं का... जो गम मे भी छलकते है और खुशी मे भी.. ये मेरे जिद्दी आंसू. जब मै अपने घर विदा हो रही थी, तब नहीं छलके थे... लेकिन आज मै अपनी मां के दर्द को मेहसूस कर सकती हूं..."

"बेटी को पराया होते देख उनको कैसा मेहसूस हुआ होगा.. पत्थर दिल थी मै और शादी के दूसरे ही दिन एक मां... ये एहसास ही अलग था.. जानती है जब तूने अपने हाथो से हार पहनाया, ये कहकर की भाभी ये मेरा गिफ्ट है.. मै बता नहीं सकती की वो कैसे क्षण थे मेरे लिए... ज़िन्दगी में पहली बार किसी ने निह स्वार्थ भावना से तोहफा दिया था... तेरा वो प्यारा छोटा सा मासूम चेहरा, और जिंदगी में पहली बार मेहसूस करना की वाकई मे बिना स्वार्थ के भी एक दुनिया है..."

"तू जानती है तेरे लगभग सभी गिफ्ट मैंने संभाल के रखे है.. वो मुझे अपने जान से भी ज्यादा अजीज है... तू बस अपना ख्याल रख, बाकी कोई साथ खड़ा रहे की ना रहे. मै रूपा मिश्रा, जब तक जीवित हूं.. मै किसी की भी आंखें नोचकर बाहर निकालने में सक्षम हूं.. फिर चाहे वो किसी भी प्रोफाइल का क्यों ना हो.."


मै उनकी बात सुनकर कार आगे बढ़ा नहीं पाई, वहीं किनारे मे कहीं खड़ी करके भाभी से लिपटकर ना जाने कितनी देर तक रोती रही... भाभी ने मुझे पानी पिलाया, खुद भी शांत हुई और मुझे भी शांत करवाई.. मै उन्हे स्टेशन छोड़कर वापस आ गई...


29 सितंबर तक उमाशंकर लौट आया. जैसे ही मुझे ऑफिस से रिलीफ मिली, मै तो सीधा गई 3 दिन की छुट्टी पर और बोल दिया "बापू के जन्मदिवस पर मीटिंग रखेंगे... इस दीवाली शयाम प्रसाद शुक्ला की गूंज पूरे भारत मे होगी.. और साल के पहले दिन का जलसा ऑर्गनाइज होगा शयाम प्रसाद शुक्ल के नाम पर.. बस इस बार अनलिमिटेड एस्टीमेट होना चाहिए.."


मेरे जोश और उत्साह को देखकर मंत्री जी व्यंग करते हुए कहने लगे… "उमाशंकर तुम्हारी होने वाली बीवी मुझे कंगाल कर देगी..."


उमाशंकर:- मेरे भी शादी पर ग्रहण है सर.. इसके परिवारवाले कह रहे है सीए क्लियर होने के बाद..


मै:- दिल छोटा क्यों करते हो.. उन्हे जो करना है वो करेंगे लेकिन हम आपस में अंगूठी तो बदल ही सकते है..


उमाशंकर:- कब..


मै:- मेरा भाई मैक्स अपनी गर्लफ्रेंड के घर जाएगा, बंगलौर से 17 किलोमीटर है.. हम सब भाई बहन छुट्टी पर होंगे वहीं पर.. ऑफिस में एडवांस 23 दिसंबर से लेकर 5 जनवरी की छुट्टी की अर्जी डाल दो..


मंत्री जी:- तो फिर पागलपन कार्यक्रम का क्या होगा..


मै:- वाईफाई हमने जाकर लगवाया था क्या सर.. सब पैसे का कमाल था.. बंगलौर में आपकी पार्टी का कारपोरेटर बना, 1 बाय इलेक्शन जीत लिए, लेकिन हम गरीब मुलाजिम को कुछ नहीं..


मंत्री:- अरे बाप रे… अच्छा क्या चाहिए वो बताओ..


मै:- आपका आशीर्वाद और अपने दामाद को एक जन्नतेदार कार दो.. अच्छा लगेगा आपकी बेटी इनके साथ बाइक पर घूमे...
ek baat to tay hai chaahe duniya idhar ki udhar hi jaaye par roopa bhabhi kabhi menka ko akeli nahi chhodegi... Agar musibat aayi toh pehle woh jaake samne kadi ho jayegi..
CA banne ki baad shaadi par rings badal lenge... lekin bangalore mein hi kyun, apne gaon apne ghar mein kyun nahi... aur ab jab shaadi tay ho gayi hai, menka apne ghar bhi jaa sakti hai... yaa phir jidd ke chalte nahi jaa rahi hai... kya abhi bhi manmutav hai apni maa se ..
waise share mind ki hai menka .. chupi huyi baaton ko bhi catch kar leti hai...
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समापन और निष्कर्ष:- दूसरा पक्ष





4-5 बुलेट साउंड और चिरियों के उड़ने की आवाज... और कुछ पल खामोशी के बाद मेरी अट्टहास भरी हंसी.… उमाशंकर का तो चेहरा पहले से ही आश्चर्य में था, लेकिन रवि ने जब मेरी हंसी सुनी तो वो पीछे मुड़कर देखने लगा...


"आप जो दृश्य देख रहे है वो कल्पनाओं से परे है... हिहिहिहिहिही... ऐसे दृश्य और नजारे केवल फिल्मों में देखे जाते है... जिनका वास्तविक जीवन से कहीं दूर-दूर तक का नाता नहीं... हिहिहिहिही"….


चारो ओर केवल मेरी ही हंसी की गूंज.. अट्टहास से परिपूर्ण.. अपने एक साल के प्रतिशोध की और अपने परिवार से जो दूर हुई उसकी... मै नहीं चाहती थी कि आगे का दृश्य गौरी देखे, क्योंकि भयभीत तो मेरी बहन तभी हो गई थी जब वो मेरी पागलों वाली हंसी सुनी...


रवि और उमाशंकर इसलिए पागल हुए जा रहे थे क्योंकि उनके जो 6 शूटर थे, वो उनके नहीं रहे... और मै अपनी बहन को अपने पास नहीं रखना चाहती था... इसलिए कुछ दूर और जंगल में उन दोनों को लेकर गई... दोनो के हाथ और पाऊं में वही लोकल एनेस्थीसिया का इंजेक्शन दिया जो आजकल डॉक्टर ऑपरेशन में इस्तमाल करते है... जिस अंग मे लगा, 5-6 घंटे के लिए सुन्न…


मैंने उन शूटर्स को कह दिया, मेरी बहन को बंगलौर लेकर जाओ जहां सब पहुंच रहे है.. आखरी वक्त में उन दोनों से थोड़ी बातचीत कर लूं... वो लोग गौरी को लेकर चले गए और मेरे सामने 2 असहाय लोग जमीन पर लेटे परे थे...

"हिहिहिहि... यकीन हुआ कहानी पर, या अब भी यकीन नहीं... चलो कुछ बातें हो जाए. इस प्यारे से क्षण मे हम एक दूसरे से कहानी सुनते है"..


मै जैसे ही उनके नजदीक पहुंची उनके चेहरे पर डर साफ देखा जा सकता था... मेरी फिर से हंसी निकल गई... "क्यों मेरे होने वाले पतिदेव क्या हुआ"… कहते हुए मैंने उमाशंकर होंठ चूम लिए... "नाह !!! तुम्हारे किस्स में वो चाहत ही नहीं बची उमा.. जारा मै अपने पुराने आशिक़ से मिल लूं"….


"द द देखो.. मेनका.. म म मैंने.."… घबराई सी आवाज में रवि बोला


"हिहिहिहिहिहि... हिहिहिहिहिहीहिही.. ह.. ह… हां तुमने".. हकलाई सी प्रतिउत्तर देती, मैंने उमा के हाथ के नब्ज काट दिए... "रवि, मुंह क्यों मोड़ लिए.. बकड़े को कटते हुए नहीं देखा है क्या, ऐसे ही खून की भिनी-भीनी खुशबू आती है"…


"नहीं, नहीं, नहीं.. रोको इसे.. रोको"… उमाशंकर चिल्लाया..


"चुप कर यार... कोई दर्द नहीं हो रहा होगा... बस मरने के डर से क्यों चिल्ला रहा है.. तेरे बदन को तो सुकून मिल रहा होगा. जब तेरा ये गरम खून धीरे-धीरे बाहर निकलेगा.. बिना दर्द के... हिहिहिहि.. बिना दर्द के तेरे प्राण निकलेंगे उमा"…


"नहीं, प्लीज.. नहीं मुझे माफ़ कर दो.. प्लीज़.. प्लीज.. प्लीज़…"



"बौखला क्यों रहे हो छोटे पुजारी, दया दिखाई थी तुमने, जब मेरी बहन का मुंह तोड़ दिया था.. अरमान लिए मेरा भाई मैक्स मुझसे कहा था, मैंने आजतक उसे नजरअंदाज किया.. कितना चुभ गई थी ये बात मुझे.. मैंने अपने एक भाई को नजरंदाज किया... कुछ घंटे रुक नहीं सकते थे, जो उसकी खुशियों के बीच ये सब ड्रामे कर दिए... मुझे बताओ कि किस गलती के लिए माफी मांग रहे.. माफी दिल से मांगोगे तो शायद मै माफ कर दूं"…


उमाशंकर:- प्लीज़ ये खून रोक दो.. बताता हूं.. अपनी सब गलती बताता हूं... मै बचपन से तुम्हे चाहता था, लेकिन कभी कह नहीं पाया... बाद में तुमने मेरे पिता महादेव मिश्रा को भरे सभा में…


"चुप हो जाओ.. बोर हो गई उमा.. ये गलती बता रहे हो या अपनी आत्मकथा... बचपन की चाहत, हवसी पिता की मोहब्बत, चुप हो जाओ. मेरे रवि की सुनते है, उसके पास जरूर कुछ होगा कहने के लिए... मेरा इंफॉर्मेशन सोर्स.. जब भी बोला है, कुछ काम की ही बात बोला है... रवि बेटा.. तुम्हे कुछ कहना है...".. मै अपने हाथ की चाकू रवि के हाथ की नब्ज पर फिराती हुई पूछने लगी...


"प्लीज, मेरा सारा खून बह जाएगा"… एक बार फिर उमाशंकर मिन्नत करते हुए कहने लगा... मै उमाशंकर के हाथ को उसके कमर पर रखती, उसपर कॉटन और बैंडेज बांधती.. "उमा बेबी.. अब शांत रहना वरना ये शोर मुझे पागल बनाती है, रवि तुम कुछ ऐसा सुनाओ जिसे सुनकर मै पिघल जाऊं"…


"तुम पिक्चर मे उसी दिन आ गई थी जब तुमने लियाकत के साथ बैठकर मीटिंग की थी.. और तुमने कहा था कि तुम्हे नीलेश को कमजोर करना है... वहीं से वो अपना पॉलिटकल एजेंडा खेल गया... वो भी तुम्हारी तरह पागल है"….


"हिहिहिहिहीहिहिही.. मेरी तरह पागल है.. लेकिन तुम क्यों चिल्लाकर ये बात कह रहे हो.. मेरे हाथ थोड़े ना स्वार्थ के खून से रंगे है.. मैंने तो बस लियाकत के अरमानों को हवा दे गई थी.. तुम्हारा शुक्रिया तुम ना होते तो उससे मीटिंग भी नहीं होती... आगे"…


"आगे क्या तुम्हे पता नहीं... किसी को जाहिर नहीं होने दिया कि महदेव मिश्रा को तुमने सुलाया. जैसे आज तक किसी को पता नहीं है कि मात्र तुम्हारे भतीजे नकुल के साथ छोटे से मारपीट कि वजह से तुमने 46 लाश गिरवा दी थी, जिसमे लियाकत का भाई भी था"…….



"ओह ये मेरी उपलब्धियां है क्या.. शुक्रिया सुनकर सुकून मिला.. हां कुछ महादेव मिश्रा के बारे में कह रहे थे"..

"लियाकत ने जब देख लिया कि तुम क्या करिश्में कर सकती हो, तब से वो तुम पर नजर दिए हुए था.. वो देख चुका था कि मात्र एक नकुल के मामले में तुमने 78 लाश गिरवा दी थी.. तुम्हे जब लगे कि खतरा है, फिर दया तुम्हारे दिल में नहीं रहता... बस यही पॉलिटिकल किस्सा लियाकत के दिमाग में घूम रहा था.. लेकिन उसे कोई हड़बड़ी नहीं थी अपने प्लान को एक्जीक्यूट करने की"

"तुम्हारे नजर मे बने रहने के लिए उसने वरुण मिश्रा को पूरा सपोर्ट किया.. कुछ साल इंतजार करने के बाद फिर लियाकत ने अपना काम करना शुरू किया और इस बार निशाने पर था अभिनंदन लाल... क्योंकि उसे बिहार का किंग बनना था और सेंट्रल में अपनी पॉवर साबित करनी थी.. मुझे नहीं लगता कि इसके आगे का तुम्हे बताना पड़ेगा, क्योंकि हम दोनों को पता है कि अभिनंदन लाल का किस्सा समाप्त होने और उसके बाद क्या हुआ..."

"जनता हूं कि मरने वाला हूं, लेकिन सुकून में हूं.. दया की उम्मीद तो मेनका मिश्रा से करना ही बेईमानी है, लेकिन मै सुकून से मरने वाला हूं, जानती हो क्यों... क्योंकि तुम्हारे सब कुछ पाने की चाहत में तुम अपनी हर प्यारी चीज खोने वाली हो... मै तो सुकून से मर जाऊंगा, लेकिन तुम्हारा जीना मरने से ज्यादा भयानक होगा... क्योंकि उस जीवन में तुम्हारा वो प्यारा पैसा नहीं होगा, जिसकी तुम्हे चाहत है... वो तुम्हारा प्यारा परिवार नहीं होगा, जिसकी तुम्हे चाहत है.. आने वाले वक्त में तुम जो कुछ भी देखने वाली हो मेनका वो केवल तुम्हारे किए के परिणाम होंगे... जो रात में भयावाह ख्वाब तो दिन में अकेलेपन कि मार लेकर आएगा.. तुम मुझ जैसी सुकून मौत नहीं मारोगे, क्योंकि तुम्हे तो सिसक-सिसक कर कई मौत मरने है.."

"ये बात तो तुम समझ ही चुकी हो की तुम्हारे पीछे 2 भूत पर चुके है... शयाम प्रसाद शुक्ला, जो 1 जनवरी बाद अब वाणिज्य मंत्री नहीं बल्कि तुम्हारे फेके पासे से वो सीधा बनेगा सेंट्रल होम मिनिस्टर... और दूसरा वो लियाकत, जो श्याम प्रसाद शुक्ला के साथ ही, स्वतंत्र राज्य प्रभार मंत्री से सीधा एक्सटर्नल और इंटरनल अफेयर मिनिस्टर बनेगा... तुम और तुम्हारा जो भी पागल दिमाग सोचता था कि यहां उनके बीच रहकर उसे जड़ से मिटा देगी, ये खबर तो हम सबको लग चुकी थी. बस मंत्री जी को इंतजार था तो अपने एजेंडे के पुरा होने का.. जो तुमने कर दिया... अब तुम बेबस होकर अपना सब कुछ खोते हुए देखोगी, लेकिन उन दोनों के एक बाल भी उखाड़ने का दम नहीं होगा.. बस बेबस खड़ी तमाशा देखोगी...

क्योंकि सपथ ग्रहण करते ही शयाम प्रसाद शुक्ला सबसे पहले तुम्हारी ताकत तोड़ेगा, जिनकी मदद से तुम कुछ भी करने का हौसला रखती हो.. कुमार आंनद, मुक्ता देसाई, वरुण मिश्रा, रूपा मिश्रा, मनीष मिश्रा, सौरव झा (मेनका के मौसा) मनोज झा (सौरव झा का दामाद) सब है लिस्ट में…

और अंत में तुम्हारा सबसे सेफ और जिनियस ब्रेन, जिसे तुम हर परिस्थिति में पर्दे के पीछे ही रखती हो, और कभी किसी मामले मै हाईलाइट नहीं होने दी. यहां तक कि कसम भी दिलवा चुकी की टॉपर आकर या खुद की क्षमता कहीं दिखाकर कभी किसी की नजर मे मत आना.. जिस अकेले के दम पर तुम पूरी दुनिया जितने का हौसला रखती हो, नकुल मिश्रा.… उसके साथ उसकी पत्नी प्राची मिश्रा और उसकी कुल संपत्ति जो तुम्हारे हौसले की रीढ़ की हड्डी है.. वो सब चला जाएगा.. बहुत शौक है ना तुम्हे पॉलिटीशियन से उलझने का, इस बार गलत राजनेता से पंगे ले चुकी.. मै तो मर जाऊंगा, लेकिन जिंदगी भर तुम अकेली दर्द के साथ जिंदा बच जाओगी.."



"हिहिहिहिहिहि... हिजहिहिहिही.… हिहिहिहिहिहिहीही.. मै जीती हूं क्योंकि मै जानती हूं कि मै जीवित हूं.… बच्चा कहीं का... जा दोनो सस्पेंस ही मर जा... सोचता रह यहां हो क्या रहा है, क्योंकि पर्दे के पूछे का खिलाड़ी तो साल भर से सक्रिय रूप से खेल रहा है.. नर्क में मिलते है दोस्त, क्योंकि हम जैसों के लिए तो ऊपर वाले ने वही जगह फिक्स की होगी"…


उमाशंकर की कलाई तो पहले से कटी हुई थी, उसके धीमी चल रही खून को मैंने तेजी से बहने का जरिया दे दिया.. साथ ही साथ रवि के नब्ज को भी काट चुकी थी... उसका खून भी जमीन पर बहता जा रहा था.. जैसे-जैसे उसका खून जमीन पर बह रहा था... मै सुकून में थी.. दोनो की बेबस चींख उस शांत से माहौल को चीर रही थी.. साला झूठा रवि, मै तो सुकून कि मौत दे रही थी, फिर भी ना जाने किस भय से चिल्ला रहा था...


यह भी आश्चर्य ही था.. क्योंकि संभावतः दोनो को तो दर्द बिल्कुल भी नहीं हो रहा होगा. किन्तु मृत्यु को सोचकर उसके भय की कल्पना करना ही मौत होता है.. योके की वही लाइनें याद आ गई... "मृत्यु मात्र एक कल्पना है जो दूसरो को देखकर करते है" मै भी केवल वही कल्पना कर रही थी.


जब वहां से चलने लगी तब दोनो में प्राण बचे हुए थे.. दोनो से मै इतना ही कहती चली.….. "मै अपने निजी स्वार्थ के लिए लोगो को मारती हूं, लेकिन उसका फायदा पूरे समाज को अपने आप ही हो जाता है... जिंदगी में बस तुम दोनो ऐसे हो, जिसके मारने का अफ़सोस है. क्योंकि तुम दोनो बेईमान के साथ रहकर भी अच्छा काम करते थे.. लोगो कि मदद ही किए.. लेकिन मै भी क्या कर सकती हूं... यही मान लेते है कि मै भी अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी अच्छे इंसान का खून बहा सकती हूं, जिसका कतई अफ़सोस नहीं... हिहिहिहिहिही"


उस जंगल से मै अपने हाथ साफ करके कुछ दूर वापस लौट आयी.. बस कुछ दूर आगे जाकर एक मेढ़ पर बैठ गई... कुछ सुकून सा मेहसूस हो रहा था.. ऐसा लग रहा था जैसे एक साल बाद मै नींद से जागी हूं..


बोझिल सी थकी नजरें थी, जिनमें आंसू तो नहीं थे लेकिन इंतजार था... कहीं ओझल नजरो के पार एक धुंधली सी तस्वीर साफ होती जा रही थी.. और जैसे-जैसे वो तस्वीर साफ हो रही थी, मेरे चेहरे पर मुस्कान तैरती जा रही थी..


मै अपनी जगह से उठकर खड़ी हुई और बड़ी ही तेजी के साथ मेरा अस्तित्व मुझे गले से लगाते एहसास करवाने लगा कि अब सब ठीक है.. मै अपने नकुल से पूरे 1 साल और कुछ दिन बाद मिल रही थी.. नकुल कुछ देर तक मुझे खुद में समेटे रहा फिर मुझसे अलग होते... "तुम लोग उन दोनों की लाश को ठिकाने लगा दो"…


नकुल अपने साथ लाए शूटर्स से कहने लगा और वो लोगो चल दिए अपना काम करने. नकुल वहीं मेरे पास बैठा और मै नकुल के कंधे से सर को टिकाए... "पुरा मर्द की तरह गबरू दिखने लगा है.. ऐसा क्या खिलाने लगी है प्राची"..


नकुल:- रोज सुबह शाम तेरा डर.. मेनका जब लौटेगी तो क्या कहेगी.. क्यों उसे रुलाओगे..


मै:- और तुझे क्या लगता है...


नकुल, गहरी श्वांस खींचकर छोड़ते... "बहुत ढीट है ये आंसू, सब कुछ समझने के बाद भी निकल आते है"…


मै:- मेरा पोता आया... प्यारा सा..


नकुल:- उसकी बुआ जब आने वाली होगी तो उसका पोता भी आ जाएगा...


मै:- मै नहीं चाहती मेरी बेटी भी पागल हो.. उसमे गौरी की परछाई होनी चाहिए और उसे नकुल जैसा भाई मिले.. हां लेकिन वो मेरे नकुल की तरह धैर्यवान ना हो, क्योंकि मेरे नकुल को तो यह डर सताता था कि मै आवेश में आ गया तब मेरी बुआ का क्या होगा..


नकुल:- वो तो अब भी डर सताता है, जब तक जिंदा हूं, तब तक डर सताता रहेगा... तेरी फिक्र ना हो तो किसकी होगी.. जैसे तुझे सबकी रहती है... रूपा भाभी ने तुम्हारे लिए बिल्कुल सही कहा था... गलत के साथ गलत करना कोई गलत नहीं, और मेरी बेटी को यह बहुत सफाई से करना आता है...


मै:- ये उनका प्यार बोलता था, वरना 2 ऐसे लोग को अपने हाथ से मारकर आ रही हूं, जिसने मंत्रालय मे रहकर दोनो हाथो से लोगो कि मदद ही कि थी.. ड्राई होनेस्ट की परिभाषा थे रवि और उमाशंकर... जबकि उसके ऑफिस में सब करप्ट थे...


नकुल:- तुझे अफ़सोस हो रहा है क्या?


मै:- नहीं.. दूसरे के पॉलिटिकल एजेंडे मे दोनों ने मुझ पर नजर नहीं डाली थी, बल्कि उस भोले इंसान को दर्द दिए जिसकी प्रजाति शायद आज कल मिलना बहुत कम हो गयी है.. ऊपर से हर्ष के लिए तो मै किसी भी बाधा को पार कर जाती..


नकुल:- अगस्त तक तो मरा ही हुआ था हर्ष हमारे लिए.... अच्छे लोगो पर भगवान भी सहाय होते है...


मै:- हिहिहिहीहिहिहि…. हम गायब होते तो फिर कभी ना मिलते..


नकुल:- हाहाहाहाहा.. हां ये तो सही है.. ऊपर से भगवान देखते होंगे तो यही कहते होंगे... ये मैंने कैसी मैनुफैक्चरिंग डिफेक्ट पीस को भेज दिया.. और भेजा भी तो दोनो को आस पास कैसे भेज दिया..


"हीहिहिहिहिहिहि… हिहिहिहिहिहि... बस भाई रुक जा.. और नहीं".. मै किसी तरह हंसी काबू करती हुई बोली..


नकुल:- कमीने साले हमसे खेल रहे थे.... सोच रहे थे हमे किसी बात की भनक नहीं होगी..


मै:- तेरी शादी थी और मै अपने भाइयों के बीच थी, तभी ये हर्ष को ले जा भी सके, वरना मै जिस जगह पर हूं वहां से मेरी चाहत को उठा ले जाना, नामुमकिन...


नकुल:- तू मान की ना मान, रूपा चाची की पूरी गलती थी.. उन्हे अभिनंदन लाल के साथ बैठक कर लेनी चाहिए थी..


मै:- भाभी नहीं करती उसके साथ बैठक, क्योंकि भाभी को अपने भाई अनुज के मौत का बदला लेना था..


नकुल:- ये कहानी कब शुरू हुई..


मै:- "जबसे महादेव मिश्रा की सच्चाई सामने आयी थी.. रूपा भाभी भांप गई थी कि कमसिन लड़की को रेप करने की मानसिक रोग अनुज में कहां से आया था.. अनुज अक्सर महादेव मिश्रा और सुंदरलाल कि गुप्त सभा मे बैठा रहता था... जैसे नीलेश करप्ट हुआ था, वैसे ही अनुज.. दोनो में अंतर इतना था कि नीलेश को लड़कियां मिल जाती थी और अनुज की दरिंदगी उसके आस पास की कमसिन लड़कियों को भुगतनी पड़ी थी..."

"रूपा भाभी बहुत दिन से विचलित थी इस सवाल के लिए कि आखिर ऐसी मानसिक विकृति अनुज में आयी कहां से.. कई महीनों तक उन्हे जवाब ही नहीं मिला.. महादेव मिश्रा का केस सामने आने के बाद तो रूपा भाभी केवल और केवल बौखलाई ही थी... लेकिन हांथ बंधे हुए थे.. वरुण भैया इधर पॉवर में पहुंचे और उधर रूपा भाभी ने अपने हाथ खोल दिए…"


नकुल:- हां और उसी की लपटें हम तक पाहुंची थी..


मै नकुल के सर पर एक हाथ मारती... "भगवान ने तुझे या मुझे कभी ऐसे सिचुएशन में डाला, जिसमे हम मारने वाले को यह कहकर आए की जो हुआ वो सही हुआ और इसमें तुम्हारी गलती नहीं थी.. तेरी क्या हालत होगी या मेरी क्या हालत होगी"..


नकुल:- हम्मम !!!


मै एक थप्पड़ जोड़ से लगाती… "ये मुंह बंद करके गले से आवाज निकालना तुझे किसने सिखाया. सीधा-सीधा बोल ना"…


नकुल:- मारने वाले से बदला ना के पाना इससे बड़ी कौन सी सजा होगी.. हां अब मै रूपा चाची की मनोदशा समझ सकता हूं... क्यों वो बौखलाई थी अभिनंदन लाल और उसके कुछ चमचो पर, जो महादेव मिश्रा के करीबी थे..


मै:- उनकी घुटन वाजिब थी, उनका बदला भी जायज था. बस रूपा भाभी भी दाव उसी लियाकत के साथ खेल गई, जिसके साथ मै खेली थी.. और 2 मामलो मे लियाकत बहुत कुछ भांप गया... गलती हम दोनों (मै और रूपा भाभी) की ही थी. एक नेता को उसकी औकात से ज्यादा कि उड़ान हमारे निजी स्वार्थ के कारन मिली थी. कुछ नतीजे तो हमे भुगतने ही थे.. वैसे ये फिल्मी सेटअप रूपा भाभी का था, जिसमे राजवीर अंकल और मेरे पापा को ही गायब घोषित कर दिए...


नकुल:- "नहीं, आंनद जीजू का था... वो, रूपा चाची, और मैंने गुप्त मुलाकात की थी सितंबर मे, जब तुमने यह साफ कर दिया था कि उमाशंकर और रवि ने तुमसे बदला लेने के लिए हर्ष को मारा नहीं है, बल्कि गुलाम बना कर बेच दिया है..."

"आंनद जीजू ने इतना ही कहा था कि लियाकत और शयाम प्रसाद शुक्ला अभी मेनका के साथ अपनी राजनीति की नई उड़ान भर रहे है. थोड़ा ध्यान भटका है, थोड़ा ध्यान और भटकाने कि जरूरत है... उसी के तहत पहले अनूप दादा (मेरे पापा) के गायब होने की खबर आयी, जिसका पुरा इल्ज़ाम पापा जी (राजवीर सिंह) पर गया, और अक्टूबर मे पापा जी (राजवीर सिंह) को गायब किया गया... दोनो को श्रीलंका के रास्ते मॉरीशस भेज दिया गया... और वहां आराम से इंतजार करने कहा गया..."

"इस खेल से सीधा असर ये देखने मिला की उन लोगों ने हर जगह से धीरे-धीरे अपने लोग समेटना शुरू कर चुके थे... कई ऑफिसर के तबादले और तरक्की दोनो मिल रहे थे.. महीनों से बैठे बेरोजगार अचानक से अपनी जगह छोड़ना शुरू कर चुके थे. हां लेकिन इस बात का अंदाजा नहीं था कि जाते-जाते मुखिया चाचा और वरुण भैया को लपेटते चले जाएंगे.."


मै:- वरुण भैया कैसे है...


नकुल:- शक्त जान है, 3 गोली लगने के बाद भी बच गए... 36 दिन बाद वो जब कुछ बोलने की हालात में हुए तो पहले रूपा चाची को ही बुलाए, और कहने लगे... "सब कुछ चला जाए तो गम नहीं, लेकिन बाप की मौत का बदला नहीं लिया तो बेटा किस काम का.. उन्होंने तो मुख अग्नि तक का हक छीन लिया... भाभी मुझे केवल बदला चाहिए.." अपनी पूरी संपत्ति, और पुरा अकाउंट उसी दिन उन्होंने रूपा चाची के हाथ में शोंप दिया और कह दिए, हॉस्पिटल से डिस्चार्ज मिलने तक सबको लिटा दो…


मै:- फिर लिटा दिए दोनो को.…


नकुल:- न्यूज नहीं देखी क्या? देश सोक के लहर मे डूबा हुआ है... बड़े-बड़े बैनर के साथ ब्रेकिंग न्यूज चल रहा है, "अचेत अवस्था में मंत्री शयाम प्रसाद को दिल्ली ऐम्स लाया गया.. बताया जाता है कि मैसिव हार्ट अटैक था और रास्ते में ही दम तोड़ दिए.. पोस्टपार्टम के बाद लाश परिजनों को सौंपी.. राजघाट में होगा अंतिम संस्कार"… और छोटी सी खबर में यह भी दिखाया जा रहा है कि लियाकत आलम अपने पिता के साथ सफर करते हुए एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए, मौके पर ही मौत.."

मै:- बेचारे श्याम प्रसाद शुक्ला जी... अब 1 जनवरी को श्याम प्रसाद जी की रूह को शांति मिल जाएगी...


नकुल:- हां और दूसरी दुनिया में भगवान करे उसे प्रधान कि कुर्सी मिले..


मै:- बस एक परेशानी वहां ना हो..


नकुल:- क्या ???


मै:- वहां भी उनसे कहीं 2 ऑब्सेसिव कंपल्सिव पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (Obsessive Compulsive Personality Disorder) वाले लोग ना मिल जाए...


नकुल:- हाहाहाहाहाहा... छोड़ जाने दे क्या ही कर सकते है... जुनून के साथ काम खत्म करने को भी यदि लोग बीमारी कहते है तो ये अच्छी बीमारी है...


मै:- जो बीमार होंगे वो, हम तो पूरी तरह से फिट है... हिहिहिहिहि.… वैसे भी आज के समय में हर दूसरा आदमी जनून के साथ ही काम करता है...


नकुल:- प्यार भी तो तूने जुनून के साथ ही किया है... मिलने नहीं जाएगी हर्ष से...


नकुल की बात पर मै अपनी पलकें झपकाकर हर्ष का चेहरा अपने जेहन में उतारती…. "अपनापन तो रवि के साथ भी था, थोड़ा दिलफेंक था लेकिन एक दोस्त था.. अच्छा आदमी.. मुझसे नफ़रत थी तो मुझसे बदला लेता, मुझे टर्चेर करता मै उफ्फ नहीं करती... दिव्यांश (संगीता की शादी में टकराया एक लड़का) ने भी तो बदतमीजी ही हदें पार की थी, मुझे कोई रोष नहीं था... लेकिन मुझ जैसी लड़की के लिए उसने एक मासूम को लपेटा"..


"चटकककककककककक, तुझ जैसी लड़की का क्या मतलब है हां"…. नकुल मुझे थप्पड़ मारते हुए घूरने लगा..


मै:- मुझ जैसी मतलब मेनिया रोगी.. जिसने सोच लिया कि इसे मारना है तो मरना ही होगा, फिर उसे ब्रह्मा भी नहीं रोक सकता... जुनून ऐसा सर चढ़ता है कि...


नकुल:- बस बंद कर ये सब बातें... ऐसा सोचता हूं तो खुद में आत्मग्लानि होती है.. क्योंकि इन सबकी शुरवात मै ही हूं ऐसा लगता है...


मै, नकुल का हाथ थामती… "मां अन्नपूर्णा का आशीर्वाद जिन हाथों में हो, उसे मानसिक यातनाएं दी, उसे रुलाया.. तेरे लिए तो मै कुछ भी कर जाऊं... लाखों करोड़ों लोगों के भाला सोचने वाले के लिए यदि हजारों का भी खून बहाना परे तो मेरे दिमाग में दूसरी सोच नहीं आ सकती.. मेरी सोच बहुत साफ है.… वैसे भी शुरवात कहीं और से हुई थी.."


नकुल:- वो तो बचपन था, तब की बात काउंट नहीं की जा सकती ना.. काउंटिंग तो तबसे होगी ना जब सबने हमे परिपक्व मान लिया था..


मै:- हिहिहिहिहिही….. तुझे और मुझे तीसरी कक्षा से कक्षा से घर के लोग दादा दादी की उपाधि दिए है, भुल गया क्या...


नकुल:- भुल भी जा उस डॉक्टर के केस को, उसे मै नहीं मानता.. वैसे सारी घटनाओं को देखते हुए मेरा एक सवाल है...

मै:- जी सर पूछिए.…


नकुल:- कभी मै गलत हुआ तो..


मै:- तू गलत हो ही नहीं सकता...


नकुल:- यदि हुआ तो..


मै:- तो क्या, मै कौन सा पाप और पुणय का फैसला करने निकली हूं. तू तो मेरी दुनिया है...


नकुल:- फिर भी, कहीं यदि ऐसी गलती, जिसकी सजा मौत से भी कम लगे...


मै:- तू तो मेरा ही अस्तित्व है.. और अस्तित्व के बिना जीवन कैसा... बस इतना ही...


नकुल:- अच्छा तू मर गई तो फिर मेरा क्या होगा???


मै:- जब ऐसा सोचता, तब तू वो सवाल करता ही नहीं जो मुझमें ये जुनून पैदा कर दे की मै ही क्यों जिंदा हूं...


नकुल:- पागल कहीं की...


मै:- सो तो हूं... छोड़ हटा ये सब... रूपा भाभी खुश तो है ना... उन्होंने कुछ कहा तुझ से कि नहीं..


नकुल:- आते वक्त बोली थी कि घुटन से भरी एक दौर का अंत हुआ, वरना एक जिल्लत लेकर कैसे जीती की मेरे बदले की आग ने सब बिगाड़ दिया था.… अब सब ठीक है...


मै:- सब कैसे ठीक है.. मेरे भाई मैक्स के प्यारे से जीवन में ग्रहण दिख रहा है... बहुत ही मासूमियत से उसने मुझसे कहा था, मै उसके साथ बैठकर कभी बात नहीं करती. आज जब उसके चंद खुशियों में शरीक थी, तब ये साले कमीने आ गए...

नकुल अपनी आंखें छोटी करते मुझे घूरते हुए पूछने लगा.… "और ये साले कमीने इतने परफेक्ट टाइम पर आए कैसे.. जबकि तेरे दिल्ली आने के पहले दिन से तुझ पर नजर रखे है और इस साल अप्रैल के बाद से तो तुम्हे इनके हर बात की जानकारी हो चुकी थी.. 8 महीने के खेल मे इन्होंने आज कैसे पकड़ लिया"

मै:- 10 दिन पहले मैंने ही तो हिंट किया था कि मै भुत की तरह लगी हूं इनके पीछे.. और आज सुबह मैंने इन्हे जता दिया, बिना यह जताए की मै जता रही हूं... एक मौका है या तो मुझे मारकर खुद बच जाओ, वरना मै तो तुम्हे मारूंगी ही..


नकुल:- यू मीन बराबरी का मुकाबला..


मै:- नाह !!! दिल से गीला मिटाना... जब वो मुझे मारने से पहले नहीं सोच सकते, फिर मेरे हाथ क्यों कांपे.. फिर मैं इस आग में क्यों जलूं की 2 अच्छे लोग का खून से मेरे हाथ रंगे है... ये सेल्फ सेटिस्फेक्शन के लिए था... वैस अच्छे दिलजले लोगो कि अच्छी बातें सुनने में क्या मज़ा आता है...


नकुल:- क्यों क्या हुआ सो, किडनैप करने के बाद कुछ बोल रहे थे क्या??


मै:- हिहिहिहिहिही, बोल भी रहे थे और नफ़रत से भड़ास भी निकाल रहे थे.. अफ़सोस उसकी सिट्यूएशन में कोई और होता तो गाली ही गाली बोलता.. लेकिन बड़ी मुश्किल से कभी-कभी मुंह से गंदगी निकल रहा था...


नकुल:- हाहाहाहाहाहा, बेचारे ये अच्छे लोग... छोड़ जाने दे... अब सब ठीक है और रूपा भाभी ने खुशी जाहिर की है कि इतने बड़े काम को अंजाम देने के बाद भी कोई खास कीमत नहीं चुकानी परी..


मै:- तुम लोग आपस की दुश्मनी दिखाकर सब एक दूसरे को प्रोटेक्ट कर लिए और वो बेचारे मुखिया चाचा बली चढ़ गए, कहते हो कोई कीमत नहीं चुकानी परी...


नकुल:- बूढे हो गए थे.. 15-20 साल कम जिए और क्या...


मै:- पागल कहीं का... चल अब मैक्स के पास.. मै नहीं जानती कि तू क्या करेगा पर मैक्स को उसकी खुशी मिलनी चाहिए.. और वो अनीता कितनी प्यारी है.. मिला है क्या..


हम दोनों उठकर चलने लगे, और हमारे पीछे धीरे धीरे गाड़ी बढ़ रही थी...


नकुल:- इतनी तारीफ कर रही है, मतलब वाकई प्यारी होगी..


"हां लेकिन ये पॉलिटिकल दुश्मनी मे कहीं वो रिश्ता ना तोड़ दे"…

"ऐसे कैसे तोड़ देंगे, गन प्वाइंट पर किसी और ने रखा, उसकी सजा मैक्स को क्यों"…

"नकुल तू नाटक मत कर ज्यादा.. तुझे भी पता है, सभी रिश्तेदारों के बीच कोई गन लेकर आ जाए तो कैसा लगेगा"…

"पागल मेनका मिश्रा.. वो साउथ के लोग है, यहां तो बाप की दुश्मनी पोते के पर पर पोते तक निकालते है, मूवी नहीं देखती क्या"..

चटककक की थाप्पड़ की आवाज और नकुल ने गाल पकड़ लिया... "भतीजे, फिल्मों से इंस्पिरेशन लेगा तो यही हाल होगा.. गाल लाल"…

"तुम पागल हो मेनका"…

"हिहिहिहिहिहीहि… सो तो मै हूं मेरे भाई.."

"हाहाहाहाहाहाहाहा.… हिहीहिहिहिहिहिही"… "हाहाहाहाहाहाहाहा.… हिहीहिहिहिहिहिही"… "हाहाहाहाहाहाहाहा.… हिहीहिहिहिहिहिही"…


वादियों में हम दोनों की हंसी गूंज रही थी और कुछ-कुछ बातें करते हम चलने लगे... पीछे से आ रही कार मे बैठने से पहले, मै सुकून से नजर भर नकुल को देखी और गहरी श्वास लेती अपनी आंखें घिमे से बंद कर लि…. मेरे दिमाग में बस तीन चेहरे घूम रहे थे.. मेरा अस्तित्व नकुल, मेरी प्यारी बहन गौरी और मेरा प्यार हर्ष...
100 encounter ki jagah 27 encounter. Chaliye best of luck
 

Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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अध्याय 27 भाग:- 6




मंत्री जी अपने पीए के कान में फिर से फुसफुसाए… पीए मुस्कुराते हुए कहने लगा.. "आपके पिताजी नाराज है, कह रहे है शादी तय भी नहीं हुई और बेटी होने वाले दामाद के साथ अकेले कार में घूमने जाए, वो पसंद नहीं"..


मै:- लेकिन पिताजी मेरे भाई बहन तो साथ में है ना..


मंत्री जी:- हां तो कार मै केवल 4 लोग आएंगे.. बस दिलवा देता हूं.. बड़ी सी फ़ैमिली पुरा सवार होकर जाएगी..


मै:- हूंह !!! कंजूस आदमी.. नहीं देना है तो बोल दो.. ये बस लेकर क्या ट्रैवल एजेंसी खोलुं..


मंत्री जी:- कार हर कोई देगा.. वो स्वार्थ हुआ.. पुरा परिवार नहीं आता उसमे.. हम जॉइंट फैमिली कल्चर वाले है.. और वो बस कोई ट्रैवल की बस नहीं है यूं समझो कि चलता फिरता घर ही है...


मै:- हां घूमी हूं उसमे भी.. लेकिन वो भी 3-4 लोगों से ज्यादा के लिए नहीं होता.. कुछ भी हां.. लगता है आपको कहीं से गिफ्ट मे बस मिला, इसलिए मुझे चिपका रहे हो...


मंत्री जी:- तू पॉलिटिक्स के लिए शुरू से मना क्यों कर रही है... स्ट्रॉन्ग बैकग्राउंड है और राजनेता वाले सारे गुण.. एक लाइन बोल दो तो उसकी पूरी भावना तुम बोलते ही समझ जाती हो… वो शानदार बस है.. 20 लक्जरी सीट कम बेड है... और तुम्हे पसंद आएगा...


मै:- हां और हमारी पूरी सैलरी घुस जाएगी उसके डीजल में..


पीए:- सर बताने की जरूरत नहीं है, मेनका के स्टाइल में ही समझा देता हूं. हर महीना बस अलोएंस के लिए, आने वाले इवेंट मे जो तुम्हारे हिस्से की ढाई करोड़ थे, मंत्री जी ने बढ़ाकर 3 करोड़ कर दिया... जिसका 2 करोड़ कल उसी ट्रस्ट में जमा हो जाएगा.. ट्रस्टी मैनेजमेंट के टूर और विकल एलोएंस के लिए.. अब हैप्पी..


मै:- टू हैप्पी.. अब मै जा रही हूं.. पूरे महीने अपने भाई बहन को देखने को तरस गई.. मैंने ऑफिस के टाइमिंग को शेड्यूल कर दिया है, और सर कुछ काम ऑफिस में कतई नहीं होनी चाहिए और ना ही घर में. उसकी डिटेल रघुवंशी सर (पीए) के पास है.. कोई प्राइवेट बेनामी ऑफिस लीजिए बिना खुद के लिंक का.. क्योंकि ऊपर की सीढ़ियों मे दोस्त से ज्यादा दुश्मन होंगे, जो बिल्कुल आपके साथ बैठे होंगे..


मै अपनी बात कहकर हड़बड़ी में वहां से निकली और सीधा पहुंच गई गौरी के मेडिकल कॉलेज.. गौरी और मैक्स तो नहीं मिले लेकिन मैक्स की प्यारी गुड़िया जैसी गर्लफ्रेंड मिल गई...


उसे देखकर मै मुस्कुराती हुई उसके पास पहुंची... दोनो बैठकर एक कप चाय.. सॉरी मै चाय और वो काफी पीते बातें करने लगे... वो मुझे फिर बताने लगी की कई साल पहले वो मुझे टीवी पर देखी थी, लेकिन पहली बार मिली तब याद नहीं आ रहा था कि कहां देखा है..


अनीता वही चोरी की घटना का जिक्र कर रही थी, जिसमे मुझे मीडिया ने घेर लिया था.. उससे बात करके अच्छे फील हो रहा था, काफी खुले दिल की थी. हां साथ में थोड़े खुले विचार थे बॉयफ्रेंड और लाइफ को लेकर.. खुले विचार मतलब सेक्स नहीं समझ लीजिएगा.. मतलब मैक्स उसे पसंद है और यदि मैक्स को अनीता और उसके कल्चर के साथ रहने मे कोई समस्या नहीं होगी, तब वो अपना लव परपोजल इसी कॉलेज के बीच ग्राउंड में देगी, वो भी उसके होटों को चूमकर..


कितना क्यूट था ना.. मै सोच भी लेती तो भी ऐसा नहीं कर पाती, लेकिन उसकी आंखों में वो उमंग नजर आती थी... इन सब मामलो में थोड़े ओपन खयालात थे.. उसके मासूम दिल की भावनाएं, जब उसे कोई दिल से भा जाए..


हम कैंटीन में बैठकर बात कर रहे थे तभी गौरी पहले पहुंचि, और पीछे से मैक्स सिगरेट जलाये.. मैं उसे देखी तो मेरी आंखें बड़ी हो गई और वो जल्दी से सिगरेट फेंककर मेरे पास पहुंचा...


मै बहुत ज्यादा गुस्से में थी और मेरा हाथ उठ गया... कैंटीन में उसे थप्पड़ मार दी. मैक्स थोड़ा झुंझला गया क्योंकि पास मे ही उसकी गर्लफ्रेंड थी.. हालांकि मैक्स ने कुछ नहीं कहा... गौरी बैठी हंस रही थी.. और मै... मैक्स से माफी मांगती... "सॉरी, मै थोड़े गुस्से में थी, तुझे सिगरेट पीते देख पता नहीं क्या हो गया.. भुल ही गई थी तू प्रोफेशनल कोर्स कर रहा है, और बड़ा हो गया है"..


मैक्स:- "मै तो केवल प्रोफेशनल कोर्स कर रहा हूं.. तुम तो सीए जैसे प्रोफेशनल कोर्स टॉपर थी. तुमने गलती भी नहीं की थी, तब भी मां ने भिड़ मे जंक्शन पर थप्पड़ मारा था. लेकिन तुम्हारे गुस्से में झुंझलाहट कम और जान बूझकर रूठने का ड्रामा ज्यादा था, जिसे देखकर सब हंस रहे थे..."

"जब थप्पड़ मारी तो दिल किया कि गला पकड़कर चिल्ला दूं और जो मन में आए बोल दूं.. फिर याद आया वो स्टेशन की घटना.. और अंदर सब शांत हो गया... सॉरी मै अगली बार से ख्याल रखूंगा.. "


मै:- मतलब सिगरेट इतना प्यारा है..


मैक्स:- बुरी लत है लेकिन बहुत ही कंट्रोल में है.. फिर भी कोशिश करूंगा कि पूरी तरह से छोड़ दूं..


मै:- ये हुई ना मैक्स वाली बात.. सॉरी, लेकिन फिर भी, यहां अनीता बैठी हुई थी, ऊपर से मासी और मेरे बीच का रिश्ता कुछ अनोखा है.. वो मेरी मां भी है और मेरी सहेली भी..


मैक्स:- मै भी नकुल हो सकता हूं.. लेकिन आपको कभी लगा ही नहीं की मेरे पास भी बैठना चाहिए..


मै:- तू मैक्स ही अच्छा है और साथ बैठने से ही प्यार रहेगा क्या.. मै अपने सभी भाई से बहुत प्यार करती हूं... और तू तो सबसे प्यारा है, क्योंकि सबसे छोटा है ना.. गौरी की तरह.. मै चलती हूं.. फ्री थी तो दोनो को देखने आ गई..


मै झटके से मुड़ी क्योंकि 22 दिसंबर के बाद से मैंने नकुल का चेहरा नहीं देखा था और ना ही 8 जनवरी के बाद से उसकी आवाज सुनी थी.. बोलने को तो कुछ भी बोल दूं लेकिन नकुल जैसा कोई नहीं था.. पूरी मेनका ही तो नकुल थी, 2 कहां थे हम. ऐसा लग रहा था जैसे अपने अस्तित्व खोकर जी रही हूं..


मुड़ते ही मेरे फिर आशु नहीं रुके कितने भी रोकने की कोशिश क्यों ना की. बहुत ढीट है ये आंसू.. पता नहीं क्यों मुझे प्राची की भी याद सी आने लगी थी.. सब कुछ सही ही तो था और बहुत प्यारा भी.. बस एक भुल मुझसे हुई जिसकी सजा सब भुगत रहे थे..


मै नकुल से तो कभी नाराज ही नहीं थी, क्योंकि हम दोनों को पता था शादी के बाद की उसकी जिम्मेदारी. उसे किसे पहले प्राथमिकता देनी थी और वो वही कर रहा था.. शायद वो भी आंसू बहता होगा, लेकिन मेरी तरह वो भी किसी को दिखा नहीं सकता.. और अब तो मै भी नहीं हूं उसके पास जो अपने हाथ से उसके आशु पोछ सकूं.. हां लेकिन अब उसके आशु पोछने वाली उसकी जीवन संगनी है...


शाम को तीनो ही पहुंच गए.. उनके आने का समय हो रहा था.. इसलिए मै भी अपना हुलिया ठीक करके कुछ कामों में लगी हुई थी... तीनो साथ आए. मैंने जैसे ही दरवाजा खोला गौरी बड़े ध्यान से मेरा चेहरा पढ़ने की कोशिश करने लगी. मै पीछे घूमकर किचेन की ओर चलती हुई पूछने लगी... "चाय या कॉफी"..


गौरी:- जा तू बैठ जा.. मुझे पता है किसे चाय चाहिए और किसे काफी..


मै:- नहीं रहने दे.. एक महीने नहीं थी तो पुरा किचेन का सामान खत्म है.. 2 घंटे का समय नहीं मिला जो सामान ले आती..


गौरी:- आज ही सोच रही थी लाने का.. तुम्हारा ऑफिस वर्क खत्म अब..


मै:- हां खत्म भी और 3 दिन की छुट्टी पर हूं.. क्या सब हुआ ये बताओ इस बीच... और कहीं घूमने चले क्या..


मैक्स:- दीदी सॉरी वो..


मै:- बस भाई, जाने दे उस बात को.. वैसे भी अनीता क्या सोचेगी.. इसकी दीदी पूरी पागल है, क्यों अनीता


अनीता:- नहीं मै कुछ और सोच रही.. गौरी आपको नाम से पुकारती है और मैक्स दीदी कहती है..


मै:- हिहिहिहिही... कहती नहीं कहता है.. और सिम्पल सी बात है, दोनो मुझसे छोटे है लेकिन ये गौरी कभी मानने को तैयार नहीं हुई..


अनीता:- ओह.. वैसे आज मुझे पता चला कि आप सीए कर रही, वरना अभी तक तो लग रहा था कि आप ऑफिस में क्लर्क हो..


मै:- मिस अनीता जी क्लर्क का जॉब, जॉब नहीं होता क्या.. और एक बात, मै अगर इस देश की प्रधानमंत्री होती ना तो हर ऑफिस के बाजार ये जरूरी कर देती की पहले अगरबत्ती क्लर्क के नाम पर दिखाओ, तब अंदर जाओ..


अनीता:- ऐसा क्यों..


मै:- क्योंकि हमारा ये इतना बड़ा देश पुरा का पूरा क्लर्क ही चला रहा है... उनके काम में कि गई देरी, यानी बैंक से लेकर रेलवे तक के काम काज मे देरी... कहने का अर्थ ये है कि क्लर्क के बिना देश ही नहीं चलेगा.. इसलिए हमेशा एक क्लर्क को इज्जत की नजर से देखना चाहिए..


अनीता:- काफी अनुभवी है..


मै:- जब मंत्री जी के ऑफिस का काम ली ना, तब एक क्लर्क की अहमियत पता चली मुझे.. खैर मै भी कहां लगी हूं.. और सुनाइए मिस..


अनीता:- और क्या मुझे एक ऑटोग्राफ दीजिए पहले.. आपके बारे में डिटेल आज ही बताया मैक्स ने.. सीधा बोलता है.. वो सीए करने के बाद भी आईएएस, आईपीएस दुनिया के तमाम एग्जाम निकाल सकती है..


मै:- हिहिहिहिहि, तमाम एग्जाम ही निकालकर पढ़ती रहूंगी तो पता चलेगा एक बेंच के एक किनारे मम्मी पढ़ रही है तो दूसरे किनारे बेटा और बेटी..


अनीता मेरी बात सुनकर हंसने लगी, वो अपनी हंसी रोकती हुई पूछने लगी... "वैसे कितने सारे बच्चे प्लान किए है"..


मै:- पता नहीं कितने बच्चे होंगे मेरे पास.. लेकिन बस यहां से जाकर वापस एक स्कूल खोलूंगी और सबके बच्चे को मै ही पढ़ाऊंगी.. ताकि अपने बच्चे को देखने के बहाने से ही सही सब आएंगे तो.. वैसे गौरी, अनु दीदी (गौरी की बड़ी बहन) तो काफी गुस्से में होगी ना.. उनका बेबी हुआ और मै झांकने तक नहीं गई।


गौरी:- ओह बताना ही भुल गई.. दीदी ने संदेश दिया है कि कबड्डी खेलने मत आना, जब भी आना 10 दिन की छुट्टी लेकर फुरसत मे आने.. अभी ना आने का कोई गुस्सा नहीं है लेकिन दरवाजे पर आकर कही ना की ये काम, वो काम तो गला घोंट दूंगी.. बता देना..


अजीब था जीवन का खेल. देखा जाए तो समय केवल जनवरी 2015 से सितंबर 2015 तक ही पहुंच था और इतने ही समय में कितना कुछ बदला लग रहा था.. मै अनु दीदी के बारे में ऐसी पूछी जैसे अब कभी लौटकर अपने गांव अपने सहर और अपने लोगों के बीच नहीं जाऊंगी।


हां शायद यही फीलिंग थी, जो अनु दीदी के विषय में ऐसा पूछी, वरना अब तक तो 10 दिन उनके पास रुकने का प्लान कर रही होती..


वक्त भी कैसे-कैसे मंज़र दिखाता है.. एक क्षण में ही सदियों कि दूरियां ले आता है.. 2 अक्टूबर के दिन एक गुप्त बैठक हुई.. जिसमे मैंने आने वाले 70 से 75 दिन यानी 17 से 22 दिसंबर तक बहुत ज्यादा काम से भरा हुआ घोषित कर दी...


2 काम का जिम्मा उठना था.. पहला भारत के हर सहर, गांव और पिछड़े इलाके मे, इस दीवाली बच्चो मे पटाखे और कपड़े वितरण करवाएंगे... दूसरा की कई ऐसे कलाकार है जो अपनी पहचान नहीं बना पाते और रोजमर्रा कि जिंदगी में जूझते हुए, अपने कला को छोड़कर कुछ भी काम शुरू करते है..


हम उन सब कलाकारों को काम देंगे.. जो जिस सहर के है उन्हे वहीं कला दिखाने का काम मिलेगा.. मंच हम उनको देंगे और प्रतिभा उनकी होगी... इसके लिए हम पहले 60 बड़े और मझौले सहर को पकड़ेंगे.. और इसकी लोकप्रियता को देखते हुए धीरे-धीरे विस्तार करेंगे..


पहले तो 60 की संख्या जो है, वो हर राज्य के लिए सुनिश्चित की जाए ताकि हमारे कला मंच हर राज्य मे होने चाहिए.. बाकी किसी राज्य के किस सहर मे मंच होगा वो हम आगे तय करेंगे..


एक नए कल्चर का सृजन करेंगे, जहां स्ट्रगलिंग हर कलाकार को मौका मिलेगा.. वो अपना रोजमर्रा के काम से फुरसत होकर अपनी कला लोगो तक पहुंचा सके.. वहां से आमदनी कुछ भी हो, लेकिन हम उन्हे हर महीने फिक्स सैलरी देंगे..

दोनो प्रोजेक्ट का एस्टीमेट खर्च 1500 करोड़ है.. जैसे ही कैलेंडर मे वर्ष बदलेगा.. रात के 12 बजे ये सारे कलाकार एक साथ अपने l-अपने सहर से रोड शो करेंगे. जिसमे वो बताएंगे की मंत्री जी ने भीख मांगकर जो पैसे इकट्ठा किए, उन पैसे से पहले कितने बच्चों के चेहरे पर खुशी लाए और उसके बाद उन कलाकारों के लिए अभी क्या किए है. मंत्री जी की भविष्य की क्या योजना है, और भविष्य में कला के क्षेत्र में उभरते कलाकारों को क्या सपोर्ट करेंगे. वो सब उस रोड शो के दौरान पता चलेगा..

इस बार भी हम सरप्राइज़ करेंगे.. किसी मीडिया को 1 जनवरी से पहले भनक तक नहीं लगने देंगे और 2016 के पहले दिन से लेकर सदा के लिए जब भी वो मायूस कलाकार अपनी प्रतिभा दिखाएंगे.. मंत्री शयाम प्रसाद शुक्ला का नाम हमेशा होता रहेगा...


भरे सभा को संबोधित करती हुई मैंने अपनी पूरी योजना रख दी. मंत्री जी का उत्साह बता रहा था कि वो कितने पॉजिटिव है इस प्रोजेक्ट के लिए.. उन्होंने देश भर में 60 मंच के बदले 80 मंच की व्यवस्था करने बोले, क्योंकि अकेले दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई इन सब जगहों मे कम से कम 3 से 5 मंच होने चाहिए, क्योंकि यहां फिल्म इंडस्ट्री है..


1000 करोड़ का पागलपन दिखाना था. मैंने सीधा 1500 करोड़ का एस्टीमेट बनाया. वहीं 1500 करोड़ की राशि को मंत्री जी ने बढ़ाकर 2000 करोड़ की कर दिए.. हम तबाड़तोड़ काम मे जुट गए..


11 नवंबर 2015 दीवाली की रात.. ऐसा लगा जैसे पूरे देश मे अलग ही खुशी का माहौल था... बच्चो के नए कपड़ों के साथ हो रही आतिशबाजी के अंत में धुएं से लिखा आ रहा था.. "अभी और भी सरप्राइज़ बाकी है, पहली जनवरी का इंतजार करें.. शयाम प्रसाद शुक्ला"…


बैंक टू बैक इतनी लोकप्रियता मंत्री जी बाना चुके थे की वो फूल ना समा रहे थे.. मीडिया तो 12 नवंबर से ही पीछा नहीं छोड़ रही थी लेकिन उन्होंने साफ कर दिया की 1 जनवरी का इंतजार करे...


सभी रिपोर्टर न्यूज की तलाश में ख़ाक छानने लगे की आखिर 1 जनवरी को होने क्या वाला है.. 20 दिसंबर तक मै पूरी योजना का काम समाप्त कर चुकी थी और इधर अनीता काफी उत्साह के साथ हम सबको अपने गांव ले जाने की तैयारी कर चुकी थी...


24 दिसंबर को जब मै दिल्ली छोड़ रही थी, गौरी के साथ बहुत दिन के बाद शॉपिंग पर थी... अनीता के लिए कुछ मैंने खरीदा तो कुछ गौरी ने.. छोटी सी खुशी जाहिर करती हुई गौरी कहने लगी... "पहले मै समझती थी गिफ्ट देना पैसों की बर्बादी है, लेकिन बाहर के लोगों को मदद करके खुश देखने वाली मै... ये समझ गई हूं कि खुशियां तो घर में भी बांटनी चाहिए. कभी कभी गिफ्ट देना और लेना महज पैसों की बर्बादी नहीं होती"…


कैसे जाहिर कर दूं कि गौरी की बातों ने कितना खुश किया था.. मै खिली ही रही थी पूरे दिन... 25 दिसंबर तक हम सब अनीता के गांव में थे. हमारे साथ उमाशंकर और उमाशंकर के एंगेजमेंट को अटेंड करने के लिए उसका एकमात्र दोस्त रवि भी पहुंचा था.


पहुंचते ही एक प्लास्टिक के थैली में सबका मोबाइल रखी और उसे पोटली बनाकर अनीता को दे दी हिफाजात से रखने.. सबको उनका मोबाइल सीधा 1 जनवरी को ही मिलने वाला था, तबतक बिना मोबाइल का जीवन भी देख लें… हालांकि मंत्री जी का ख्याल हम तीनों को ही आया था, इसलिए उमाशंकर ने पहले फोन करके उनसे पूछ लिया की 1 जनवरी के प्लान को एग्जिक्यूट करने में कोई समस्या तो नहीं लग रही...


उनका जवाब जब आया कि कोई समस्या नहीं है, हमसब यहां एन्जॉय करे और मंत्री जी, नूतन और श्रेष (मंत्री जी के ऑफिस के 2 भरोसेमंद लोग) के साथ यहां सब आराम से कर लेंगे.. बाकी पुरा काम तो खत्म करके ही गए थे, केवल कॉर्डिनेट ही तो करना था.. इतनी कहानी साफ होने के बाद फिर क्यों मै देती किसी को मोबाइल.. सब मोबाइल के बिना कुछ दिन जीकर देखे..


हमारे रुकने की कुछ इस प्रकार व्यवस्था थी... मै, मैक्स और गौरी एक गेस्ट हाउस में.. रवि और उमाशंकर एक गेस्ट हाउस में.. अनीता के परिवार का स्वागत और मिलने के व्यवहार को देखकर ही सबका दिल खुश हो गया था...


26 दिसंबर के शाम का वक्त था, हमारे उमाशंकर, मंदिर देखकर बावरे हो गए.. उन्होंने वहां के एक पुराने मंदिर के पुजारी से विनती की, क्या वो भगवान शिव की आराधना में यहां गा सकता है..


उन लोगो ने भी खुले दिल से स्वागत किया, कहने लगे भगवान के द्वार मे तो भक्तो को पूजा करने की मनाही नहीं होती, फिर वो तो एक मंदिर का पुजारी रह चुके है.. मै तो उत्सुकता से बैठ गई मंदिर मे, क्योंकि कई साल बाद मै छोटे पुजारी को सुनने वाली थी..


संस्कृत के स्लोक उच्चारण से आराधना शुरू हुई.. मै बैठ गई ढोलक लेकर, मैक्स और गौरी मंजीरा लेकर बैठ गए. रवि ताली की थाप दे रहा था और फिर जो ही समा बांधा वहां भगवान शिव के दरबार में शाम के वक्त.. छोटा सा लेकिन काफी कुशल तालुका था.. जहां डबल लेन सड़क के दोनो ओर 2 मंजिले मकान और हर मकान के पीछे बड़ा से बगीजा और 3 चार कुटिया जरूर मिल जाते..


छोटे पुजरि की आवाज में सच में जादू था. उनकी आवाज जहां तक गई, उन जगहों से लोग जुटना शुरू हो गए.. अनीता का खिला चेहरा देखने लायक था, जब वो हमारे बीच आकर बैठी.. वो अपने लोगो को इशारे मे बता रही थी कि ये है मेरे होने वाले कुटुम्ब..


27 दिसंबर, सुबह से ही उमाशंकर का मन आज कुछ ज्यादा ही छेड़ छाड़ का हो रहा था. मुझे देखकर चेहरे पर शरारती मुस्कान फैल जाती और जब भी मौका मिलता मुझे बाहों में भरने की नाकामयाब कोशिश करने में जुट जाते.. अलबत्ता आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था, शायद मोबाइल हाथ में ना होने के कारण उन्हे छेड़छाड़ करना ज्यादा रोचक लग रहा हो, किसे पता...
jindgi joh apne ya joh log aapke paas hai sabki apni ek alag alag hi mahattva hoti hai... waise toh keh dete hai bhai hoke bhi pita jaisa farj nibhaya ya didi hoke maa jaisi ya phir dost hoke bhi bhai ya behen se bhi badhkar hai... lekin yeh "JAISE" hai, par hai nahi... thik waise nakul jaisa koi ban bhi jaye menka ke liye lekin woh nakul nahi hoga... uski kami khalegi hi menka ko... aur aaj uska jikar hone par rona aaya of course royegi akhir parchayi hai nakul..
well Diwali sab ke liye khushiya leke aayi...
bhai bahano ko ek side rakhte hai.. lekin yeh joh menka gharwalo( mata - pita) ko chhod baaki ke kirdaaro ko zyada importance de rahe yeh kuch thik nahi lag raha...
chaahe kuch bhi ho jaaye mata pita se kaisi narazgi.. are do baatein suna denge.. sun lo..
Par yun ghar na jana... abhiman karne ki bhi hadd hoti hai...
Khair ab sabki apni marji
Let's see what happens next
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Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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अध्याय 27 भाग:- 7




जब मुझे लगा कि उमाशंकर की शैतानियां हद से ज्यादा बढ़ रही है, तब मैंने भी उन्हें तड़पाने का बीड़ा उठा ही लिया. गौरी को मैंने इशारे से अपने पास बुलाया और सुबह के नाश्ते के बाद बोल दी कि बिना बताए ही गायब होना है..


जैसा हमने तय किया था ठीक वैसा ही कि, बिना बताए हम खेतों के ओर निकल पड़े… मै जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, कहीं गुम सी होती जा रही थी, मानो अपने गांव आ चुकी हूं. एक साल हो चुका था, अपने गांव की उन पगडंडियों पर चले, जहां से निकलकर मै कहीं बाहर नहीं जाना चाहती थी...


"हम्मम !!! तो मेनका मिश्रा गुम हो गई"… गौरी ने मुझे टोका...


मै, गहरी सांस खींचकर उसे छोड़ती... "बहुत कुछ बदला बदला सा मेहसूस करती हूं, और ये बदलाव सुकून वाला नहीं है... l"


"अनीता और उसका परिवार मस्त है ना"… गौरी पूरे माहोल के नजरिए को ही बदलती हुई..


मै, अपना चेहरा किनारे करके, गौरी को को देखकर मुस्कुराई... "मेरी बहन काफी समझदार हो गई है.. हां मुझे अनीता और उसका परिवार बेहद पसंद आया. मैक्स ने एक बात सच कही थी उस दिन कैंटीन मे"..


गौरी:- क्या?


मै:- यही की कभी उसके साथ मै बैठकर बात नहीं कि..


गौरी:- वो होता ही कितना है घर पर.. जो तुम बैठकर बात करती..


मै:- यही तो मैक्स भी बताना चाह रहा था. मैंने हक ही कितना जताया, उसे रोककर, बिठाकर बात करने की..


इस बार गौरी पलटकर मुझे देखती... "अनकही भावनाएं कैसे समझ लेती हो.. हां मैक्स ने मुझसे से कई बार कहा है, मेनका दीदी का लगाव मुझसे उतना नहीं, वो उनके व्यवहार में दिखता है.."


मै:- हां उसने जो मेहसूस किया वही कहा.. फोन होता तो उसे बुला लेती, अंदर से बुरा लग रहा है.. एक भाई को मैंने नजरंदाज कर दिया...


"वैसे कितने भाई है आपके"… अनीता पीछे से अचानक बोल परी..


मै और गौरी पीछे पलटकर अनीता को देखने लगी, साथ ने मैक्स भी था.. और दोनो हाथ थामे मेरे पीछे चल रहे थे... "कब से छुपकर हमारी बातें सुन रहे हो"..


मैक्स:- शुरू से..


गौरी:- कहीं बैठकर बातें करते है ना...


हम चारो खेत में बने एक मचान पर चढ़ गए और अपने पाऊं लटकाकर बैठते हुए.… "मैक्स तुम्हे शर्म नहीं आयी, पीछे से ऐसे छिपकर बातें सुनते"…


मैक्स:- नहीं आयी तो.. कभी अपनी बात बताई हो.. यदि बताती तो हमे सुनना नहीं पड़ता...


मै:- अभी तो मै अनीता को सुनना पसंद करूंगी.. और एक सवाल भी है कि कैसे अनीता ने तुम्हे और तुमने अनीता को अप्रोच किया...


अनीता:- हमारी स्टोरी बहुत सिंपल है... मै क्लास अटेंड करने आयी थी और उसी वक्त मेरी नजर मैक्स पर गई. मैक्स मुझे अच्छा लगा और मै क्लास के बारे में पूछने के बहाने से बात करने चली गई..


मै:- अभी रुको, मैक्स अब तेरी बारी..


मैक्स:- अनीता बता तो रही है..


मै:- वो तो अपना बता रही है ना.. तू अपना बता..


गौरी:- वो क्या बतायेगा... मै बताती हूं मेनका..


मैक्स:- गौरी फिर मै सीक्रेट शेयर नहीं करूंगा..


मै:- अच्छा तू रहने दे गौरी मत बता, मेरा भाई ही बता देगा...


मैक्स:- मै कुछ नहीं बताने वाला... जबतक कि तुम एक सवाल का जवाब ना दे दो…


मै:- अच्छा पूछ क्या पुछ रहा है..


मैक्स:- बस एक सवाल आ रहा था मन में, अनीता के विषय में जानकर क्या मम्मी मुझसे नाराज होगी...


मै:- नहीं, वो इस बात से खुश रहेगी की तुमने शुरू से गौरी को सब बताया. मन में कहीं भी ऐसा नहीं था कि कुछ गलत कर रहे, तभी तो बताया... मौसी को समझना थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन उनके पास होने से खुशी ही मिलती है.. बाकी मासी के बारे में मै बोलने लगी तो शायद शाम ना हो जाए और तुम सब बोर..


मैक्स:- मै अपनी मां को इतना क्यों नहीं समझता जितनी आप समझती है..


मै:- क्योंकि मैं अपनी मां की बेटी हूं ना, इसलिए उन्हें जानती हुं… लेकिन इसका यह मतलब यह नहीं कि तुम उन्हे नहीं समझ पाते तो तुम प्यार नहीं करते या वो नहीं करती... बहुत प्यार करती है वो तुम दोनो से, इसलिए तो मेरे बुरे वक्त मे अपने साए को विश्वास के साथ छोड़कर गई. वरना मेरी मासी मेरे पास से तब तक नहीं हिलती जबतक वो सुनिश्चित नहीं कर लेती सब पहले जैसा हो गया...


गौरी:- बहुत हो गई पुरानी बातें, मैक्स अब बताओ, मेनका ने जो पूछा...


मैक्स:- नहीं मुझे शर्म आएगी..


मै:- अच्छा ठीक है तो गौरी को बताने दे..


मैक्स:- हम्मम ! ठीक है मै यहां से जाता हुं, तुम लोग आपस में बातें करो..


बेचारा शर्मा गया.. वैसे भी तीन लड़कियों कर बीच वो क्या करता लड़कियों की बात सुनकर.. वो चला गया और हम दोपहर तक वहीं बैठकर बातें करते रहे. अनीता को हम जितना जान रहे थे. हम अनीता को अपने मे से ही एक समझ रहे थे...


27 दिसंबर, रविवार के दोपहर 3 का वक्त. हम सबको अनीता के अभिभावक का आमंत्रण आया. हॉल के सभा में बैठकर बातचीत करने के लिए हम सबको बुलाया गया था.. लड़की के पिता स्वभाव से काफी शालीन और हंसमुख व्यक्ति थे, ज्यादातर बातचीत मे वो कन्नर या मलयालम ही इस्तमाल करते थे, लेकिन उनकी हिंदी भी उतनी ही अच्छी थी, जितनी हमारे क्षेत्र के लोगो की होती है..


हम तो बस उनका कल्चर ही देखने गए थे, और देखकर दिल खुश हो गया, क्योंकि मैक्स को देखने के लिए वहां उनके सब रिश्तेदार आए थे.. उससे बातचीत कर रहे थे.. मम्मी-पापा और परिवार के बारे में पूछ रहे थे..


मैक्स के ओर से मै ही सबसे बड़ी थी और मैंने उनके स्वागत और अभिवादन को देखते हुए, उनके पूरे परिवार के सामने अपनी दिल की बात रख दी.… "जब दिल मिल जाते है तो भाषा कोई मायने नहीं रखता. मै अपने भाई की शुक्रगुजार हूं कि आप जैसे प्यारे लोगों से हमे मिलने का मौका दिया.."


उनके स्वागत और हमे पूछने के ढंग से वाकई सब प्रभावित थे.. मैंने जैसे ही अपनी दिल की बात कही.. अनीता के पिताजी मुझे अपने पास बिठाकर कहने लगे... "मेरी बेटी इतने दूर के लड़के से मिलवायी... हमने सोचा बेटी को मायूसी से विदा करेंगे, लेकिन जब अनीता, मैक्स और उसके परिवार के बारे में कुछ दिन पहले बता रही थी, लगा की जैसा बोल रही है ठीक वैसा हो तो मेरी बेटी एक घर से निकलकर दूसरे घर जाएगी.."

"हमारे यहां जॉइंट फैमिली कल्चर होता है, इसलिए ज्यादातर शादी रिश्तेदारी मे ही होती है.. हमे डर होता की बाहर के परिवार मे कैसा माहौल होगा, कैसा कल्चर मिलेगा.. शादी के बाद बेटी को जब जी करे देख सकते है कि नहीं.. क्योंकि 2-4 शादियां हम देख चुके है अपने समाज के बाहर.. ऐसा लगा जैसे शादी नहीं हुई हो, बल्कि बेटी की बली चढ़ा दी.. हमारे खुशी के मौके पर वो नहीं आ सकती, उनकी खुशी में हिचकते हुए केवल एक दिन के लिए गए और लौट आए, ऐसे रिश्ते का क्या फायदा"…


काफी गहरी बात कह गए और पूरे दिल से.. मै गहरी श्वांस लेती हुई कहने लगी.. "आपने बिल्कुल सही परवरिश की है अपनी बेटी की.. क्योंकि उसने लड़के को हां कहने से पहले उसे खुद दिखाने लाई है कि उसका परिवार कैसा है.. और आपसे एक मौन स्वीकृति लेने आयी की पापा ये लड़का अपने परिवार लायक है कि नहीं.. वो ना तो आपसे पूछेगी और ना मैक्स से. बस दोनो को देखकर जब मेहसूस कर लेगी तब अपने दिल के अरमान जहीर करेगी..."


अनीता के पिता:- मुझे मैक्स और तुम्हारा परिवार पसंद आया.. आगे इन दोनों का फैसला है.. हमारे ओर से अभी से हां है..


मै:- मै भी अपने कविता मासी और सौरव मौसा जी की ओर से हां कह देती हूं.. हमे भी अनीता और उसका परिवार पसंद है..


अनीता के पिता:- नहीं ये तो उनका मत होगा ना..


मै:- मै भी तो उन्ही का मत हूं अंकल, अपनी मासी की लाडली और अनीता मुझे बेहद पसंद है. अगर उन्हे मेरे दिल की बात पता चल जाए तो सगुण लेकर चली आएगी.. लेकिन ये जल्दबाजी होगी.. क्योंकि दोनो समझदार है और हमे खुद बता देंगे की उन्हे एक दूसरे का कल्चर पसंद है, अब इस रिश्ते को आगे बढ़ा सकते है...


कुछ ज्यादा ही हम दोनों की लंबी बात खींच गई.. और इसी बीच अनीता अपने परिवार और रिश्तेदारों के बीच मैक्स को खड़ा करके पूछ ही दी.. "क्या वो अनीता को पसंद करता है, क्या उसका होकर रहना पसंद करेगा?"..


दोनो बीच हॉल में खड़े थे बिल्कुल आमने-सामने, तकरीबन आधे फिट की दूरी पर. अनीता नीचे से अपने हाथों से मैक्स का हाथ थामि हुई थी. दोनो एक दूसरे को देख रहे थे. अनीता का चेहरा पुरा खिला हुआ और होटों पर प्यारी सी मुस्कान थी, वहीं मैक्स थोड़ा असहज, और आश्चर्य के भाव उसके चेहरे पर थे...


मैक्स की तो आंखें बड़ी हो गई मै अंकल के पास से भागकर मैक्स के पास पहुंची.. मैक्स के दाएं गौरी और बाएं मै.. "हां बोल दे मैक्स, सोच क्या रहा है"..


मैक्स, सामने अनीता का हाथ थामे था, और मुंडी मेरी ओर घूमकर कहने लगा.. "ये तुम दोनो (मै और गौरी) से ज्यादा पागल है.. दिल तो उछल रहा है हां कहने के लिए, लेकिन कह दिया तो चूम लेगी"


गौरी:- हां बोल दे.. उसके सभी रिश्तेदार यहीं है, यहां कुछ नहीं करेगी..


मैक्स अपनी परेशान नज़रों से पहले मुझे देखा.. मैंने हां में सर हिला दिया.. फिर गौरी के ओर देखा, उसने भी हां में सर हिलाया.. मैक्स अब सामने देखा, परेशान नजरे और परेशान चेहरे के भाव को तुरंत बदलते, एक प्रेमी की इजहार वाली भावना और वैसा ही खिली सी मुस्कान अपने चेहरे पर लाते.. जोर से कह दिया... "हां बिल्कुल.. मै तुम्हारे साथ पूरी उम्र खुशी से रह लूंगा"…


उफ्फ ये नजारा.. अनीता ने अपने एरियों को ऊंचा की, गले में हाथ डालकर होंठ को स्पर्श करती अपना सर मैक्स के सीने से लगा ली, और उसके सभी रिश्तेदार पीछे से तालियां बजाने लगे...


दोनो सुकून से खड़े होकर वहां लगभग सभी को नजरअंदाज किए, कहीं गुम से हो चुके थे.. कुछ देर बाद जब दोनो अलग होकर, थोड़े शर्माए और थोड़े लज्जाए से अपने-अपने पक्ष के पास बैठे, सब हंस रहे थे...


जितनी देर में वो दोनो अलग हुए, हम अपने गेस्ट हाउस से अनीता के लिए गिफ्ट भी ले आयी थी... हम जब अपने हाथो से अनीता को अपने-अपने गिफ्ट देने लगे, तब अनीता और उसके परिवार की आखें बड़ी सी हो गई, उसके पापा पूछने लगे... "क्या ये सगुण है"..


गौरी हंसती हुई जवाब देने लगी... "नहीं वो तो बड़ों का काम है वो तय करेंगे. ये तो हमारी खुशी है. एक छोटी सी भेंट, हमारे जेनरेशन के सबसे छोटे सदस्य के उसकी जीवन संगिनी के लिए"…

"वाउ क्या पारिवारिक ड्रामा है, ऐसा लग रहा है जैसे मेनका मिश्रा जहां होगी सब सही ही होगा"… इसी खुशी के माहौल मे, एक अजीब ही दुर्गन्ध उमाशंकर की बातों से आ रही थी और उसके साथ आए 6 हाई प्रोफाइल शूटर, जो उमाशंकर की मंशा बयान कर रहे थे..


माहौल अजीब ही था, कुछ भी समझ से परे.. ऐसा दृश्य जिसमे लोगो को बस यही समझ में आया कि छोटे पुजारी, जो काफी शालीन है, इनपर खून सवार है.. कारन शायद मैक्स और उसके परिवार के बीच की कुछ पारिवारिक रंजिसें होंगी..


लेकिन जिस प्रकार के हाई प्रोफाइल शूटर्स थे, उन्होंने सबको ही डाराकर कंट्रोल कर रखा था.. मामला तो मैक्स और और गौरी को भी कुछ समझ में नहीं आया. वो दोनो भी उतने ही चकित और भयभीत थे, जितने कि अनीता और उसका परिवार.. बस उस माहौल मे डराने वालों से जो नहीं डरी और नजरे मिलाए खड़ी थी, वो थी मै, मेनका मिश्रा.…
matlab ek aur dagabaaz dhokhebaz..
yeh dekho is uma ne dikha di apni jaat... are ispe toh tab shaq hai jab yeh story pe entry maari... toh joh kaand hone wala tha, uskawaqt aa hi gaya...
Par kyun? Kya dusmani ho gayi..? shaadi karne wala tha na? kahi ravi sang ghumna firna ko leke? ya phir aisa toh nahi menka ke gaon ka koi masla ho? uma kisko maarne aaya hai menka ko ya uske bhai bahano ko...
Khair let's see what happens next
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