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Thriller100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)
मै:- बुद्धू.. मतलब मै तुम्हारे साथ सोशल हो गई उसके बाद क्या...
हर्ष:- वही तो समझ में नहीं आया, तुम ऐसा पूछ क्यों रही हो...
मै:- अब जब पूछ ही ली तो जवाब भी दे ही दीजिए..
हर्ष:- डफु (डफर का छोटा नाम) सोशल होना तो पूरी उम्र का प्रोसेस है.. ये एक ऐसा काम है जिसके लिए मैंने पूरे उम्र का टाइम शेड्यूल किया है...
मै:- बातें बहुत प्यारी करने लग गए हो...
हर्ष:- ऐसे मैसेज मत करो जिसका रिप्लाइ मे मुझे सोचना परे.. मै चाहता हूं तुमसे सारी उम्र दिल खोल के बिना सोचे हर बात कह दूं... कभी दिल में ये ख्याल ना आए की तुमसे बात करने के लिए सोचना परे..
मै:- अच्छा बचू और इसकी आड़ मे तुम मुझे ब्रेकअप भी कह दो.. खुद फ्री बर्ड भी बन जाओ.. और समझदारी दिखाना तो पूरे मेरे हिस्से में आए...
हर्ष:- हाहाहाहाहा... नहीं समझदारी के साथ गुस्सा भी दिखा लेना.. थप्पड़ भी लगा देना...
मै:- भाई को थप्पड़ मरो तो प्यार होता है.. लेकिन तुम्हे थप्पड़ मारूंगी तो बेइज्जती होगी...
हर्ष:- अकेले मे उतार लेना इज्जत कौन देखने आएगा..
मै:- फालतू की बकवास ना करो इतनी रात में.. अच्छा सुनो, ये सारे टेक्स्ट डिलीट कर देना..
हर्ष:- सो तो मै कर लूंगा लेकिन टेक्स्ट थोड़ा बोरिंग नहीं हो रहा... टाइप करते करते कलाई दुखने लगी...
मै:- हां देख रही हूं... मेरे लिए थोड़ा कष्ट भी नहीं उठा सकते...
हर्ष:- मुझे अपने कष्ट की चिंता नहीं... बस तुम्हारा ख्याल आता है तो दिल कांप जाता है...
मै:- पागल, ऐसा क्या हो गया जो तुम्हारा दिल कांप गया था...
हर्ष:- ट्रेन में हम साथ थे और कितनी जल्दी तुम दोनो बुआ भतीजे ने उस खडूस प्रोफेसर को भी अपने परिवार का हिस्सा बना लिया... मुझे लगा मेरा होने या न होने से तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ेगा... लेकिन तुम्हारे ना होने से...
मै:- तुम ऐसी बातें करोगे तो मै जा रही हूं... कल तो दिमाग कितना सही चल रहा था... कितना सही कहे थे कुछ समय मिलता है, उसमे तड़प दिखाऊं या चाहत... अब क्या हो गया है...
हर्ष:- क्योंकि पहले मुझे ही लगा था कि केवल मै तड़पा हूं.. लेकिन तुम्हारा 8 महीने का खुद को बंद कर लेना, उस कहानी को बयान कर गया, जहां मुझे एहसास हुआ कि तुम्हे मेरा ख्याल ना आए और खुद को मुझसे दूर रख सको, इसके लिए 8 मंथ घर से निकली ही नहीं...
मै:- पागल हो क्या... मै बस अपने सेलेब्स को कंप्लीट कर रही थी... क्यों घर में रहकर तुम्हारी याद नहीं आती, या किसी बाबा का ताबीज बांधे थी घर के द्वार पर..
हर्ष:- मै वर्मा सर और रजनीश भैया से मिला था... उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा मेनका की तो सीए फाइनल तक कि तैयारी हो चुकी है... इंस्टीट्यूट वाले अभी उसका सीए फाइनल एग्जाम ले, तो एक साथ पूरे पेपर निकाल ले..
मै:- ये उनका केवल प्यार बोल रहा है..
हर्ष:- बात इतनी भी साधारण नहीं... कल जब तुमने कहा ना की मेरा इंतजार बेकार है.. तब से सोच रहा था.. फिर मैंने उस दिन कि कहानी को तुम्हारे नजरिए से सोचा.. पता चला तुमने तो कभी ब्रेकअप जैसा ना तो मुझसे कहा और ना ही तुम्हारे अंदर के इमोशन ने कभी ब्रेकअप जैसा जाहिर किया.. तुम तो बस मुझे सोचने का समय दे रही थी. चीजों को खुद से समझने का, ना की दूसरों की तरह बैठकर क्या करना चाहिए और क्या नहीं उस पर लेक्चर...
मै:- इतना लंबा टाइप कर रहे हो मुझे उबासी आ रही है.. मै सोने जा रही, कल बात करूंगी.. मै टेक्स्ट डिलीट कर रही हूं.. कल आराम से फोन पर समझा देना...
हर्ष:- अपनी जिंदगी में मुझे संजोए रखने का शुक्रिया... इतने लोगों में मै भी तुम्हारे लिए खास हूं.. साला ये फीलिंग ही कुछ और है... सोचता हूं कि कैसे मुझे खुद से सब कुछ समझने के लिए.. और खुद को मुझसे दूर रखने के लिए बिना किसी से बात किए तुमने 8 महीने निकाल दिए, तो मेरे आशु ही नहीं रुकते.. सो जाओ.. कल बात करेंगे.. लेकिन इसपर नहीं...
कुछ अनकही बातें जिस विषय में मै अपने आप से भी चर्चा करना उचित नहीं समझी, उसे हर्ष ने भांप लिया... हां ये सही है कि यदि मै सबसे बात करती रही और हर्ष के ख्याल आते रहे तो मै खुद को रोक नहीं पाती... उससे बात कर लेती और पिघलकर सब कुछ कह देती, की बुद्धू तुम्हारा कमरे से बाहर करना केवल बुरा लगा था... वरना तुमने जिंदगी में अपनी मां और किताबों के अलावा जिंदगी को जाना ही कितना है...
सोते हुए आज खिला सा चेहरा था, क्योंकि कुछ महीनों से लगता था कि सबकी चाहत एक ओर और हर्ष की चाहत एक ओर... रात की इस बेला में मेहसूस हो रहा था, मुझे भी कोई सच्चे दिल से चाहने वाला मिल गया है"….
आह अब तो वक्त की कमी सी पड़ने लगी थी... अब दिल हर्ष से ज्यादा बात करने को कर रहा था और घर के लोगों पर तो कभी-कभी चिढ़ सी हो जाती, जब मुझे पकड़ के ही रखे रहते..... लेकिन ये अनुभव भी प्यारा था...
"इट्स क्रेजी क्रेजी फीलिंग"… मुझे साउथ की मूवी ज्यादा पसंद नहीं, लेकिन हर्ष के कहने पर मैंने देखी... अच्छी प्यारी रोमांटिक मूवी थी.. आज कल उसका ही सोंग मेरे दिमाग के बैकग्राउंड में चलते रहता... "इट्स क्रेजी क्रेजी फीलिंग"..
कभी रजाई के अंदर दुबक कर 2 बजे तक बातें होती रहती तो कभी सबसे आंख बचाकर दिन में चोरी छिपे.. आशा भाभी के पास का केस मुझे याद था.. यहां यदि कोई खुद को होशियार समझती है तो उससे भी ज्यादा होशियार कोई और भी होता है... ये बात ध्यान रखने की ज्यादा जरूरत थी..
किसी को शक ना हो इसलिए बड़े ही एतिहात से हर्ष से बात करना पड़ता था... अब क्या करे.. खुद को तो समझा लेती थी, मेनका ज्यादा लगाव अच्छा नहीं फसेगी.. लेकिन जब हर्ष की याद आती तो दिल में अजब ही हलचल सी मचने लगती थी... फिर मेरी सब समझदारी कहां गायब होती पता भी नहीं चलता...
आह ये रिस्क वाला इश्क करने में भी अपना ही मज़ा था.. डर और उत्सुकता के बीच मै जीवन के नए रंग का पुरा अनुभव उठा रही थी... महीना दिन बीत चुके थे.. अब तो हमारे बीच लगभग हर प्रकार की बातें भी होने लगी थी.. लेकिन मै सेक्सी बातों से थोड़ा सा परहेज ही करती, क्योंकि अंदर से कुछ कुछ होने लगता था.… लेकिन क्या करूं सुनने में मज़ा भी आता था इसलिए पुरा मज़ा लेने के बाद हर्ष को डांट दिया करती थी...
इस नोक झोंक के खेल मे मै एक बार हर्ष से नाराज चल रहा थी और हमारे बीच पिछले 8 घंटे में ना तो कोई भी टेक्स्ट हुआ था और ना ही कोई बात... हारकर हर्ष ने ही संदेश भेजा, जिसे मैंने नोटिफिकेशन से पढ़कर उसके हाल-ए-दिल तो समझ गई लेकिन मैंने कोई जवाब नहीं दिया...
नाराजगी के 8 से 16 घंटे के बीच हर्ष ने टेक्स्ट कर करके मेरा मोबाइल टेक्स्ट से भर दिया.. फिर भी इग्नोर किया.. उसने कॉल किए तो फोन को साइलेंट करके मैंने अपने बैग मे डाल लिया... हां वो अलग बात है कि हर बार जब मेरे नज़रों के सामने स्क्रीन की लाइट फ़्लैश हुई थी.. दिल जोड़ से धड़कते हुए बगावत पर उतर आता...
16 से 24 घंटे के बीच 112 मिस कॉल.. हालांकि कॉल तो मैंने जानबूझकर मिस किया था, हर्ष ने तो पूरी बात करने की कोशिश की थी... लगभग 28 घंटे हो चुके थे... बहुत तड़पी भी थी और तड़पायी भी थी, अभी वक्त हो चला था बेसब्र दिल को सुकून देने का...
लेकिन आज तो सितम का दिन था, जो ये घर के लोग कर रहे थे.. मुझे हर्ष से बात करनी थी और कोई मुझे अकेला ही नहीं छोड़ता.… मायूस होकर मै फोन को देखती हुई कहती.. "सॉरी जानू, अभी कॉल या टेक्स्ट का जवाब नहीं दे सकती"…
हल्का अंधेरा हो रहा था.. मां ने छत पर कपड़े लाने भेजी.. थोड़ा सा वक्त था तो मैंने हर्ष को कॉल लगा लिया… उसने कॉल नहीं उठाया... 2 बार, 3 बार की.. कोई प्रतिक्रिया नहीं"…
खुद को ही 2 थप्पड़ मारने का मन किया... "अटिट्यूड दिखाने वाली कम अक्ल.. ठीक कर रहा रहा हर्ष तेरे साथ"…
मै रेलिंग पर मायूस बैठ गई.. फोन रेलिंग पर रख दी और हर्ष का फोन जल्दी आ जाए, ऐसी प्राथना करने लगी… लगता है भगवान ने सुन ली और मैंने उत्सुकता से जैसे ही फोन उठाया, तभी पीछे से मां ने मेनका कहा और मै पूरी तरह से चौंक गई.…. "आआआआआआआआ".. और तेज चीख के साथ मै छत से नीचे गिर गई...
मै चिल्लाई, फिर पीछे से मां चिल्लाती हुई बेहोश होकर वहीं छत पर धराम से गिर गई... नीचे भाभी को लगा कि छत पर कुछ हुआ, वो भागती हुई छत पर आयी और मां को बेहोश देखकर वो भी चिल्लाई... मेरा तो दर्द से ऐसा बुरा हाल था कि पता नहीं कहां कितना नुकसान हुआ था...
कर्रहते हुए मै बेहोश हो चुकी थी... आंख खुली तो मै हॉस्पिटल में थी.. जागते ही मै व्याकुलता से मां को ढूंढने लगी... सुकून मिला जब उन्हे नजरो के सामने देखी... मेरी हालत देखकर पापा हंसते हुए कहने लगे... "खुद कहां से टूटी-फूटी है उसका ख्याल नहीं, लेकिन आंख खुलते ही मां को ढूंढ रही"…
फिर मैंने अपनी हालत का जायजा लिया... सर में 6 टांके आए थे और मेरे प्यारे लंबे घने बाल, दाएं ओर से बिल्कुल बीच से छिल दिए गए थे… दाए ओर से सर फूटा था, दाएं कंधे की बोन डीस्लोकेट हो गई थी और दाएं पाऊं मे लकड़ी के कोने लगने सीधे लंबे लाइन बनाकर पुरा चिरा हुआ था जिसमें 16 टांके आए थे.. पाऊं की हड्डी सलामत थी...
कुल मिलाकर मै दो, ढाई महीने के लिए बुक हो गई थी और सबसे ज्यादा अफ़सोस मुझे मेरे बालों का ही थी.. इतना आरा तिरछा सर फूटा था कि पुरा बाल ही दान करना पड़ेगा ऐसा मुझे समझ में आ रहा था.. 36 घंटे से बेहोश थी और अंत में पता चला, मेरे प्यार जताने का मशीन यानी की मोबाइल पूरी तरह से बेकार हो चुका था...
रात के 1 बजे के आसपास नींद खुली थी, इसलिए वहां केवल पापा और मम्मी ही थे... मां अब भी रो रही थी.. वो खुद को कोस रही थी कि पीछे से क्यों उन्होंने आवाज दिया जो ये सारा कांड हो गया...
मै इशारों मे उन्हे अपने करीब बुलाई और बाएं हाथ से उनके आशु साफ करके मुस्कुराती हुई कहने लगी… "मां दर्द बहुत हो रहा है लेकिन वो तो बर्दास्त हो जाता है.. आपका ये रोना बर्दास्त नहीं होगा... गलती मेरी थी, रेलिंग पर मै बैठी थी"…
मां फिर से रोने लगी... "बहुत दर्द हो रहा है क्या.. मिश्रा जी जाकर डॉक्टर को बुलाए ना"…
पापा उठकर डॉक्टर को बुलाने गए और जब डॉक्टर मेरे आखों के सामने आया, मेरी आखें बड़ी हो गई... "हर्ष तुम यहां"…
हर्ष:- श्रीमान राजवीर सिंह का फोन आया था.. मै नर्स कम डॉक्टर हूं... अंकल आपकी लड़की है बहुत हिम्मत वाली, बहुत दर्द बर्दास्त करती है...
हर्ष इंजेक्शन तैयार कर रहा था और मै अब भी बड़ी-बड़ी आखें किए उसे देख रही थी, तभी उसने मेरा ध्यान तोड़ते कहा... "करवट लेटो"..
मै:- नहीं.. बांह में ही इंजेक्शन दे दो..
हर्ष:- देखिए, एक ही बांह बचा हुआ है, उसमे कितना इंजेक्शन देते रहेंगे... आप प्लीज मुझे मेरा काम करने दीजिए...
दर्द मे थी, लेकिन घूरती नज़रों से धमकाना भी कम नहीं किया था... "तुम्हे बाद मे देखती हूं हर्ष के बच्चे"..
मै बाएं घूमकर करवट लेट गई और हर्ष मुझे बाएं कूल्हे मे इन्हे इंजेक्शन लगाकर वहां से जाने लगा... "हर्ष बेटा वो जो एक्सरे के बाद कंधे का इलाज शुरू करते.. तो वो भी कर ही लेते ना..."
हर्ष:- आप और आपकी तरह मेनका की चिंता करने वाले लोग, बहुत ज्यादा ही परेशान रहते है... आप आराम से रहिए, कल सुबह सारा काम खत्म करके दिन तक मेनका को लेकर चलेंगे घर... चलिए स्माइल कीजिए...
पापा:- तुम्हारा धंधा नहीं चलने वाला हर्ष.. डॉक्टर ज्यादा से ज्यादा एडमिट रखते है, और तुम मरीज को जल्द से जल्द घर भेज रहे...
nice update ..harsh se pyar ki baate kar rahi thi aur maa aa gayi isliye darr kar girr gayi shayad ..waise itne taanke lag gaye phir bhi theek hai menka ..
पापा:- तुम्हारा धंधा नहीं चलने वाला हर्ष.. डॉक्टर ज्यादा से ज्यादा एडमिट रखते है, और तुम मरीज को जल्द से जल्द घर भेज रहे...
हर्ष:- अंकल जब यहां नहीं था तब मुझे पता नहीं था यहां के बारे में... अब जब हूं तो काफी सीनियर्स डॉक्टर के बीच एक ही चर्चा होती है.… जितने आबादी है उस हिसाब से हमारे पास इतने डॉक्टर्स नहीं.. उसपर से भी हॉस्पिटल का बेड केवल बिल बढ़ाने के लिए रखे... मेरे ख्याल से जिनका जमीर मर गया होगा वही करेगा... वरना कोई नहीं करेगा.. मैंने मेनका को नींद का इंजेक्शन दे दीया है... आप लोग भी आराम कीजिए...
अगले दिन जैसे ही मै अपने सहर वाले मकान में पहुंची... मेरे अपनों की भीड़ देखकर दिल खुश हो गया.. आस पास आपके चाहने वाले लोग हो तो ये जहां हसीन हो जाता है...
हर्ष भी कुछ समय तक यहां रुक गया था, जबतक कि मेरे पाऊं और सर के जख्म रिकवर नहीं जो जाते... 1, 2 दिन बाद पता चला कि मुझे जहां एडमिट करवाया गया था वो अंडर कंस्ट्रक्शन हॉस्पिटल थी, जो हर्ष बनवा रहा था... सहर की उसी परती जमीन पर जिसका कभी सौदा हुआ था...
अगले 4-5 दिनों तक मिलने वालों का हुजूम लगा ही रहा, इसी बीच मासी भी सपरिवार जब आकर जा रही थी, तब मैंने गौरी को अपने पास रोक ली… यूं तो मेरे लिए मेरी दोनो भाभी, और मां थी, लेकिन पता नहीं क्यों गौरी का खींचा हुआ चेहरा देखकर उसे खुद से दूर करने का मन ही नहीं किया...
दिन बीत रहे थे, और मै तेजी से रिकवर हो रही थी. सभी लोग मुझे जी भर के देख चुके थे.. मेरा प्यारा हर्ष... मेरी सेवा में लगा हुआ रहता... यूं तो वो मुझे जाहिर होने नहीं देता की वो मुझे देखकर अंदर से कैसा मेहसूस कर रहा है, लेकिन अंदर से वो कुछ टूटा-टूटा सा है, मेहसूस करवा जाता था... मै मुस्कुराती हुई उसे दिन रात यही जताती रहती की मै खुश हूं...
15 दिन हो चुके थे... पाऊं और सर की ड्रेसिंग हो गई, टांके काट दिए गए और उसी के साथ मै अपने सर के बाल को देखते हुए रो रही थी... मै बता नहीं सकती मेरे बाल की ऐसी हालत देखकर मेरे अंदर क्या बीत रही थी.…
नकुल और गौरी मुझ पर व्यंग करते हुए कहने लगे... "बाल ही तो है, नया फैशन करने का मौका मिला है और तुम रो रही"…
मै:- ऊ हूं हूं.. मेरे प्यारे बाल...
गौरी:- चुप करो... अभी किसी अच्छे ब्यूटीशियन को बुलाकर बालों मेकओवर करवाती हूं...
मै:- मेरा गला काट दे इससे अच्छा.. लेकिन मेरे बाल मत कटवाओ...
नकुल:- गनीमत है कि अभी कंधे सही नहीं हुए.. वरना चमाट खाती… गौरी ने सही कहा... और अब बस हमारा फैसला हो गया... कोई सवाल..
मै:- मै टूटी-फूटी हूं तो ऐसे डाटोगे...
हर्ष:- मै चलता हूं...
मै:- मुझ बेसहारा को सहारा देने के बदले तुम भी छोड़ चले... एक तो मै बच्ची.. ऊपर से मेरे देखभाल को भी बच्चे छोड़ गए... मुझसे कोई प्रेम नहीं करता. सब 4 दिन आगे पीछे करके मुझे यहां सहर मे छोड़ गए...
नकुल:- ओवर एक्टिंग बंद करो... डॉक्टर बाबू एक काम कर दोगे छोटा सा, किसी ब्यूटी पार्लर से पकड़कर किसी बाल बनाने वाली को ले आओगे..
हर्ष, नकुल को देखकर ऐसे घुरा मानो कच्चा चाबा जाएगा... मेरी और गौरी की तो हंसी ही निकल गई... "नकुल, कोई बात नहीं है"..
नकुल:- क्या?
मै:- वही जो तू हर्ष के सामने नहीं कहना चाहता...
नकुल:- हम्मम ! तो तुम्हे पता चल गया... मुझे बात शुरू करने में कोई परेशानी नहीं है लेकिन बात हमारी नहीं है...
मै:- सबको जबरदस्ती काम पर भगा रहा है तो मुझे समझ में नहीं आएगा की तू यहां पर खाली माहौल क्यों चाहता है... और गौरी भी कम्फ़र्टेबल ही है हर्ष के पास..
गौरी, हैरानी से हम दोनों को देखती... "ये कभी-कभी तुम दोनो जो इशारों में लाखों बातें बात कर जाते हो… मुझे भी तो बता दिया करो...
मै:- मासी जब गांव में थी तभी उनका खोया चेहरा मैंने पढ़ा था... उन्होंने कहा था कि वो तेरे लिए थोड़ा परेशान है.. वो तुम्हे लगातार किसी परेशानी मे देख रही है लेकिन जब भी वो तुमसे बात करती तुम बस बहाने ही बना देती है...
गौरी:- मां भी ना पागल हो गई है मेनका... उनको और कोई काम नहीं है...
मै:- तुमने मुझे यूरोप टूर पर कहा था कि मैं जब समस्या मे रहूंगी तो तुम मेरे साथ रहोगी.. आज मेरी बहन किसी गहरी चिंता मे है.. और मै समझ ना पाऊं…
नकुल:- गौरी जो भी समस्या हो तुम मेनका को बता दो.… मै जा रहा हूं मेनका के लिए किसी सैलून वाली को पकड़ कर लाने...
हर्ष:- मैंने सुना है कि तुम बहुत समझदार हो गौरी... मै भी ना चाहते हुए भी नकुल के साथ जा रहा हूं.. लौट कर आऊं तो मेनका को समस्या पता हो और मुझे यकीन है कि मेनका और नकुल दोनो मिलकर उसका हल निकाल ही लेंगे...
मै:- दोनो भागो यहां से... हमेशा सौतन की तरह दोनो का झगड़ते हो और ताने देते रहते हो... ना चाहते हुए भी नकुल के साथ जाना पर रहा… ये तो हद ही हो गई...
नकुल:- मैंने कुछ नहीं कहा.. ये हड्डी विभाग ही उड़ रहा है.. लगता है राजवीर अंकल ने एक बेटी मांगी थी... ऊपर वाले ने मैनुफैक्चरिंग डिफेक्ट करवा दिया... गुण तो सब छोड़ियों वाले है बस मर्द बना दिया...
मै इरिटेट होकर चिल्लाती हुई... "यदि अभी नहीं गए यहां से तो मै ही उठकर जा रही हूं..."
मेरे चिल्लाते ही दोनो भाग निकले.. उनके जाते ही... "गौरी किसी लड़के का भी मैटर हो और समस्या सेक्स, लव मे चीटिंग, इन सब के संदर्व मे भी हो, तो भी खुलकर कहो...
मैंने जैसे ही अपनी बात पूरी की वो मेरे सीने पर अपना सर रखकर ख़ामोश बस आंसू बहाने लगी... हम दोनों ही ख़ामोश थे... मै अपना बायां हाथ उसकी पीठ पर फेरती हुई उसे दिलासा देने लगी कि वो खुद को कभी अकेली ना समझे..
2 महीने पहले.…
गौरी और मैक्स एक अपवाद ट्विंस थे... दोनो ही पढ़ने में काफी होशियार और उतने ही रिजर्व रहने वाले... दोनो के पहनावे भी लगभग एक जैसे... बस अंतर इतने था कि मैक्स कभी घर पर नहीं टिकता और गौरी कभी बाहर नहीं निकलती थी...
रिजर्व रहने का असर गौरी के पहनावे पर भी काफी परा था.. लगभग वो टॉमबॉय लुक में ही रहती थी और कहीं भी निकालना हो तो बस 5 मिनट में तैयार होकर बाहर...
वो तो यूरोप टूर के बाद, मेरे कहने पर गौरी मे कुछ बदलाव आ चुका था... वो थी ही इतनी सुंदर की, अब तो हल्के से मेकअप के बाद उसे जो देखे उसकी नजर गौरी के प्यारे से मुखरे पर ठहर जाए... वैसे तो वो टॉमबॉय के पूरे आउटफिट मे ही हमेशा रहती थी, लेकिन उसके बॉडी पर्सनैलिटी को काफी जचती थी...
2 महीने पहले नवंबर की बात है.. एक दिन दिल्ली पब्लिक स्कूल के कुछ छात्राएं गौरी के घर पहुंच गई और गौरी को अपने साथ सोनपुर मेला चलने के लिए कहने लगी...
गौरी को घूमने मे जरा भी रुचि नहीं थी, लेकिन गौरी की मां ने जब सुनिश्चित कर लिया कि गौरी की कुछ दोस्त अपने अभिभावक के साथ सोनपुर मेले में जा रही है, तब उनके जिद के कारन गौरी सोनपुर मेला जाने के लिए हामी भर दी..
सोनपुर मेला ना जाने कितने सदी से बिहार का मुख्य आकर्षण केंद्र बना रहा है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से सैलानी आते हैं... गौरी के क्लास के कुछ अन्य दोस्त भी अलग-अलग ग्रुप मे सोनपुर मेला देखने पहुंचे हुए थे… उन्हीं सब मे से एक लड़का था अभय, जिसे गौरी थोड़ी खुलकर बात किया करती थी...
मेले में घूमते हुए गौरी को अभय मिल गया, जिसके साथ वो कुछ-कुछ बातें करती हुई मेले का लुफ्त उठा रही थी... गौरी जिनके साथ घूमने आयी थी वो लोग भी साथ में ही, आगे पीछे होकर मेला घूम रहे थे...
इसी बीच हाथी का एक झुंड पागल सा हो गया और वो बेड़ियां तोड़कर भिड़ मे भाग निकला... उस पागल हाथी को भागते देख लोग तीतर बितर होकर इधर-उधर भागने लगे.. गौरी और अभय भी भाग रहे थे...
दोनो भागते हुए काफी दूर निकल आए और जान बचाने के लिए एक छोटी सी झोपड़ी मे घुस गए, जो भूषा स्टोर करने के लिए बनाई गई थी..
उस स्टोर रूम मे बड़ी मुश्किल से खड़े रहने की जगह बन पाई थी और बाहर हाथियों के चंघार साफ सुनी जा सकती थी... भागने के कारन दोनो के दिल की धड़कन काफी बढ़ी हुई थी.. और जगह इतनी कम थी कि अभय ये ठीक पीछे खड़ी गौरी के श्वांस, अभय के गर्दन पर टकरा रहे थे...
थोड़ी देर दोनो की श्वांस सामान्य करने मे लगी, लेकिन बाहर अब भी नहीं जा सकते थे क्योंकि 10 फुट से भी कम की दूरी पर हाथी घूम रहे थे... अभय के गर्दन पर अब भी गौरी की गर्म श्वांस टकरा रही थी, जो उसके साथ एक लड़की ने होने का एहसास दिला रही थी...
अभय पीछे मुड़कर गौरी के ठीक सामने हो गया... दोनो के बीच फासले ना के बराबर थे, ऊपर से जब अभय घूमकर सामने हुआ तो दोनो की नजरे बिल्कुल ठहर सी गई थी.. श्वांस धीरे-धीरे असंतुलित होने लगे और दोनो की नजारे एक दूसरे पर ऐसे ठहरे की होंठ प्यासे हो गए...
बिल्कुल नई चढ़ी जवानी पर कामुकता ने ऐसा असर किया की गौरी थोड़ी बहक सी गई और धीरे-धीरे अपने आखें बंद करके, अपने चेहरे को थोड़ा ऊपर कर ली…
अभय बिना देर किए किशोरावस्था कि उस मुलायम होटों को अपने होटों के बीच रखकर चूमने लगा, जो गुलाब सी कोमल और मक्खन की तरह रसीली थी... एक बार जब होंठ से होंठ जुड़े फिर तो पूरे बदन में सनसनी फ़ैल गई..
जवानी का जोश ही कुछ ऐसा था कि फिर होश का कहां कोई काम... अभय गौरी के होंठ चूमते हुए, नीचे से उसके टॉप मे हाथ डालकर, उसके विकसित हो रहे स्तन को मसलने लगा और गौरी तेज तेज श्वांस लेती अपने स्तन पर अभय के हाथो को मेहसूस करती, उसे बेहताशा चूमने लगी…
दोनो इतने उत्तेजित हो चुके थे कि अभय अपना हाथ नीचे ले गया और उसके लैगी के इलास्टिक को फैलाकर उसके पैन्टी के अंदर हाथ डाल दिया और गौरी के योनि को उंगलियों से फैलाकर उसे उंगली से घिसने लगा…
किसी लड़के का हाथ अपने योनि के ऊपर पाकर, गौरी इतनी उत्तेजित हो गई की वो अपनी अपने हाथ से अभय के पीठ को मुठ्ठी में दबोचती, तेज तेज श्वास के साथ लंबी-लंबी सिसकारियां लेने लगी थी...
छोटी सी योनि के खुली पतली सी लकीर के अंदर जब अभय धीरे-धीरे उंगली डालना शुरू किया, गौरी उत्तेजना मे छटपटाती हुई अभय के कंधे को काटने के लगी.. चूत में उंगली डालते-डालते अभय का लंड इतना कड़ा हो गया कि पैंट से बाहर आने को उछलने लगा..
अभय ने गौरी को उल्टा घुमा दिया, जिससे उसकी पीठ अभय के ओर हो गई.… और खुद नीचे बैठकर उसके लैगी को पैंटी समेत नीचे कर दिया... पीछे का सफेद और कोमल नितम्बों नजारा देखकर अभय की आखों मे चमक और लंड में सुरसुराहट होने लगी...
वो खड़ा होकर उसकी चूत को अपने 2 उंगली से आगे पीछे रुब करते अपने पैंट को नीचे किया... गौरी पूरी तरह उत्तेजित होने वाले रोमांच को पहले ही मेहसूस करके अपनी थोड़ी सी टांग को खोलकर अपनी कमर पीछे की ओर निकाल दी..
"अभय.. आराम से.. मेरा पहली बार है"… इतने देर में गौरी ने अपने होंठ से बस चंद शब्द निकालकर गहरी श्वांस लेने लगी… अभय धीरे-धीरे योनि पर लिंग को आगे पीछे घिसने लगा...
योनि पर लिंग घिसते हुए अभय धीरे से योनि के छेद मे लंड डालते हुए, उसपर हल्का दवाब बनाने लगा.. चूत गीली थी फिर भी उसके दीवार से पूरे टाईट होकर लंड धीरे-धीरे अन्दर घुसते जा रहा था... "प्लीज रुक जाओ... फीलिंग पेन अभय"..
गौरी से जब बर्दास्त नहीं हुआ तब अभय को टोकती वो अपने मुंह में हाथ की डालकर दांत काटती हुई दर्द को बर्दास्त करने की कोशिश करने लगी... अभय अपने दोनो हाथ गौरी के टॉप मे डालकर उसके छोटे छोटे स्तन को मुट्ठी में पुरा भरकर दबाने लगा और अपने जीभ कान के नीचे फेरने लगा..
कुछ ही देर में दर्द उत्तेजना मे बदल गया और गौरी की श्वास वापस से तेज होने लगी.. होटों से धीमी-धीमी सिसकारी निकालने लगी, और गौरी की कमर हिलने लगी. अभय अपने लंड को धीरे-धीरे वापस चूत में उतारना शुरू कर दिया..
गौरी दर्द और उत्तेजना के बीच सिसकती रही और अभय अपना पूरा लिंग डालकर धीरे-धीरे धक्के लगाने लगा.. अभय के दोनो हाथ आगे से उसके छोटे छोटे स्तन को इतने प्यार से सहला रहे थे कि उसके निप्पल पूरे इरेक्ट होकर उत्तेजना की लहर बरसा रही थी और कुछ ही देर में योनि तेज-तेज धक्के की मांग करती कमर हिलने लगी..
गौरी पुरी उत्तेजना मे अभय के लिंग को योनि में मेहसूस करने लगी और अभय भी अब खुलकर तेज-तेज धक्के मार रहा था.. थोड़ी ही देर में दोनो अपने चरम पर थे.. और तेज आवाज के साथ दोनो ने झरना शुरू कर दिया..
nice update ..to gauri isliye naaraj rehti hai kyunki usne abhay ke saath sex kar liya ..par lagta nahi ki sirf sex karne se hi usko koi problem huyi hai koi aur baat hai ..
गौरी को जब होश आया तो अपनी स्थिति देखकर थोड़ी शर्मिंदा थी.. थोड़ा अफ़सोस हुआ कि उसके कदम कैसे बहक गए. लेकिन गौरी इसे उत्तेजना में हुई एक गलती समझकर अपने कपड़े को ठीक करती... "अभय जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था, प्लीज इसे एक एक्सिडेंट से ज्यादा कुछ मत समझना और आगे मुझसे कभी कोई उम्मीद मत रखना"…
गौरी अपनी बात कहकर वहां से निकल गई.. खेत से हाथी जा चुके थी लेकिन गौरी के अंदर अफ़सोस पुरा भरा हुए था... 4-5 दिन लगे उसे खुद को सामान्य करने में, लेकिन छठे दिन गौरी के व्हाट्स एप पर एक क्लीप पहुंची...
चेहरा तो ब्लर था लेकिन वो सेक्स वीडियो क्लिप किसकी थी गौरी जानती थी... वीडियो क्लिप को देखकर वो परेशान हो गई और साथ में कई सारे सवाल... अगले दिन पूरे गुस्से में वो अभय से मिलने पहुंची और पहुंचते ही एक थप्पड़ लगा दी...
अभय उसके थप्पड़ का जवाब थप्पड़ से देते हुए कहने लगा... "कितना वक्त लगेगा इस वीडियो को पोर्न साइट पर अपलोड करने में..."
गौरी उसकी बात सुनकर ख़ामोश हो गई.. फिर अभय अपनी बात जारी रखते हुए कहने लगा... "सुसाइड की सोचना मत, क्योंकि तुम्हारे वीडियो वायरल तुम्हारे मरने के बाद भी कर दूंगा, फिर पीछे से तेरे घरवाले चुल्लू भर पानी में डूब मरेंगे. कूतिया क्या बोली थी कोइ उम्मीद मत रखना.. काश ये ना बोलती और कहती मज़ा आया, तो सिर्फ 2 लोग तुझ से मज़े लेते. लेकिन तेरा ब्लर वीडियो क्लिप अब 12 लोग के पास है, मेरे एक पूरे व्हाट्स ऐप ग्रुप में.. अब सब तुझ से मज़े लेंगे... वो क्या है ना तूने ना नूकुर किया और मुझे कुछ करने की कोशिश की तो तुझे पता भी नहीं चलेगा की किसने तेरी वीडियो वायरल कर दी... जा घर जा अब 12 लोगों से सुहागरात मानने की तैयारी नकर.. वरना कहीं का नहीं छोडूंगा"…
छोटी सी भुल की बहुत बड़ी सजा मिलने जा रही थी.. कितना भी बचने की गौरी ने कोशिश की लेकिन अब तक उसे 3 लोग भोग चुके थे और 9 अपनी बारी के इंतजार ने थे, उससे पहले ही यहां मेनका के साथ कांड हो गया था... और उसे यहां आना परा था..
गौरी जब गिड़गिड़ाती हुई कहने लगी की मेरी बहन को ठीक हो जाने दो बदले में तुम 12 सब एक साथ आ जाना मै नहीं रोकूंगी.. पर अभी मेरी बहन ने मुझे रोक लिया है.. प्लीज… तब उन्होंने एक हफ्ते का वक्त दिया था.. उसके बाद वो नहीं रुकेंगे और यदि ना नुकुर की तो वीडियो वायरल हो जाएगी...
अब भला इतने तनाव को गौरी की मां कैसे ना मेहसूस करती... हां गौरी बहुत रिजर्व रहती थी, लेकिन मेनका कैसे नहीं समझती, जिसके दिल के बहुत करीब थी गौरी.. मेनका ने जब मासी को सुना था, तब लगा कि किसी बात से रूठी होगी, लेकिन मेनका ने जब गौरी को सामने से देखा तभी उसके दिल ने कहा था कि गौरी बहुत बुरे दौर से गुजर रही है... बस इन 15 दिनों में कभी अकेले में बात करने का मौका नहीं मिला...
तत्काल समय...
मै अपना बायां हाथ उसके पीठ पर फेरती हुई उसे तसल्ली दे रही थी... गौरी ने अपनी आपबीती कहना शुरू किया... और उधर मेरे रौंगटे खड़े हो गए. गौरी कबसे ना जाने ये बात मुझसे बताने की सोच रही थी, लेकिन हमेशा हर बार यह सोचकर अपने कदम रोक ली कि.… "क्या कह दूं मै मेनका से.. कौन था ये अभय जिसके साथ मै एक भूसे के गोदाम में सेक्स कर गई..."
अभी गौरी ने जिंदगी ही कितना जिया था, और इतनी कम उम्र में जिस दौर से वो गुजरी है, ना जाने कितना वक्त लगे उसे सदमे से उबरने में.... मै उसके आंसू पोछती... "गौरी, बस मुझे 7 दिन दे बहन... और जरा नकुल को बोल यहां आने"…
गौरी फिर से अपने आशु बहाती, वो "ना" में सर हिलाने लगी.. मै उसकी दिल की व्यथा समझ रही थी लेकिन मै केवल नकुल पर ही विश्वास कर सकती थी... "गौरी, मेरी स्वीटी, क्यों इतना परेशान हो रही है... तुम्हे नकुल पर भरोसा नहीं क्या?"…
गौरी, बिल्कुल रूवासी आवाज में… "मै कैसे उससे उससे नजरें मिला पाऊंगी मेनका... घूट रही हूं मै"…
मै:- कभी-कभी हम बहुत ही ज्यादा सोच लेते है, जबकि असल में परिस्थिति उतनी भयावह भी नहीं होती... एक शर्मिंदगी जो अंदर होती हैं उसमे पीस जाते है.. नकुल से नजरे मिलाने मे तुझे कोई शर्मिंदगी मेहसूस नहीं होगी और ये मै आंख मूंदकर नकुल के लिए कह सकती हूं... वैसे भी ना तो मैंने उसे कुछ बताया था, और ना ही मौसी ने, ऊपर से तेरी भावनाओ को समझना सब से बस की बात नहीं. फिर भी नकुल कुछ तो गलत होने जैसा जरूर भांप गया होगा तभी तो सबको बाहर भेजकर वो तुमसे बात करना चाहता था... इसीलिए अपनी सोच को विराम दो और क्या अब मुझे 7 दिन दिन का वक्त मिलेगा...
गौरी:- मेनका तुम क्या करने वाली हो...
मै:- महादेव के भक्त को पीछे लगा रही हूं.. वो रौद्र तांडव करेगा और क्या? बस मुझे तू इतना बता दे कि तेरे इस जिल्लत का तू कैसे बदला लेना चाहेगी…
गौरी:- मुझे नहीं पता बस कुछ ऐसा करना की मेरी जलती आत्मा को सुकून मिले…
मै:- समस्या अपनी बहन को बता दी, चल अब समाधान के लिए अपने भाई को बुला.…
गौरी ने नकुल को कॉल करके अकेले आने कही.. ऐसा लगा जैसे कहीं आसपास था वो.. कुछ ही देर में पहुंच गया... मैंने उससे सिर्फ इतना ही बताई की गौरी से छोटी सी भुल हो गई और उस वीडियो की भुल की वजह से वो 2 महीने से 12 लोगों के बीच फंसकर रह गई है... पुरा हिसाब-किताब ले आओ उनसे...
नकुल, गौरी का हाथ थामते... "गलती इंसान से ही होती है लेकिन जब तू अकेली ही घुटती रहेगी, फिर यहां हम सबके होने का क्या मतलब है.. ले आ जहर फिर और पिला दे हम सब को"…
गौरी नकुल से लिपटकर रोती हुई.… "अंदर बहुत शर्मिंदगी मेहसूस हो रही है नकुल..."
नकुल:- चल आंसू पोछ ले.. 7 दिन के अंदर हम इस टूटी को लेकर कहीं घूमने निकलेंगे... अब जरा काम कर ले... उम्मीद है कि तुम्हारे पास 12 लोगों की डिटेल तो नहीं होगी..
गौरी:- नहीं मात्र 3 को ही जान पाई हूं..
नकुल:- उन तीनो की डिटेल दे..
गौरी ने अभय और उसके 2 साथियों की पूरी डिटेल दे दी... फिर नकुल ने लियाकत को कॉल करके उसके कुछ पागल लोगों को भेजने बोला जो आंख मूंदकर केवल ऑर्डर फॉलो करे…
महज 4 दिनों में वो सभी 12 लड़को को पुलिस पीटते और घसिटते हुए ले जा रही थी… हुआ ये कि पहले 2 दिन में 12 लड़कों का पता लगाकर उनकी छानबीन की गई फिर..
फिर सभी 12 लड़कों को अलग-अलग लड़कियों का कॉल आया और सभी 12 लड़कों के फोन प्राइवेसी के नाम पर बाहर रखवाकर उन्हे एक खूबसूरत लड़की के इंतजार मे होटल के कमरे में बिठा दिया गया था... उधर वो सभी 12 लड़के अपनी कामुक तमन्ना पूरी करने के लिए अरमान सजाए होटल के बिस्तर पर इंतजार करते रहे और इधर हर किसी के घर में 2 लोग चोरी से घुस गए...
नकुल ने उन चोरों को खास काम से भेजा था.. जिसके पहले हिस्से में उन चोरों ने हर लड़के के लैपटॉप को एसेस किया और बहुत सारे अपातिजनक एडिटेड फोटो लैपटॉप मे लोड कर दिया था...
दूसरा काम यह किया गया कि उन एडिटेड फोटो को उन 12 अलग-अलग मोबाइल में लोड करके जान पहचान की लड़की के मोबाइल पर ट्रांसफर कर दिया गया, जिसमे लिखा था यदि फोटो वायरल नहीं करवानी तो फलाना होटल रात के 10 बजे आ जाओ... वरना किसी को मुंह दिखने के काबिल नहीं रहोगे...
आखरी काम... बाहर से 12 फेक एफबी आईडी क्रिएट की गई थी.. और अभय के फेक अकाउंट को उसके लैपटॉप से लॉगिन करके एक पेज बनाया गया... "बिहार विधानसभा असेम्बली की रासलीला"..
इस पेज पर 12 अलग-अलग फेक अकाउंट से कई आपत्तिजनक फोटो पोस्ट किए गए... और नीचे लिख दिया गया... "सबकी रास लीला यहीं रिलीज होगी"…
रात के 11 बजे तक यह काम खत्म करके सभी लोग लौट आए... नकुल ने ना तो किसी को वार्निग दिलवाई और ना ही सामने आकर हाथ पाऊं तुड़वाया... सभी 12 लड़को को उनके रोग के अनुसार उपचार करके 12 बजे तक अपने सहर के लिए वापस लौट आया...
नकुल ने काम खत्म करके मुझे पहले ही फोन कर दिया और कहा आज रात देर से सोना... जैसे ही नकुल का संदेश मिला, मै गौरी को अपने पास बिठाए थी... साढ़े 11.30 के करीब वो सभी लड़के लोकल न्यूज मे थे और 12 बजे रात तक मे तो नेशनल न्यूज मे थे...
मै:- कैसा लग रहा है अब गौरी...
गौरी, मेरी ओर मुड़कर मेरे गले लगती... "मेरा गला बांध कर बस किसी तरह से श्वांस लेने के लिए छोड़ दिया था... अभी सब खुला खुला लग रहा है... लेकिन मेनका वो मेरा वीडियो"..
मै:- "चिंता क्यों करती है.. नकुल ने उनके मोबाइल और लैपटॉप से सारी वीडियो डिलीट कर दी है, साथ ही साथ उसने इतने फेक फोटो और वीडियो अपलोड करने के बाद शेयर कर दिया है उनके मोबाइल और लैपटॉप से, की पुलिस मोबाइल के हर नंबर की जांच करेंगे.. एक चेन ऑर्डर मे चलेगा और सबके मोबाइल से फोटो और वीडियो डिलीट हो जाएंगे..."
"वैसे नकुल बता रहा था कि उन लड़कों ने कोई भी वीडियो भेजी नहीं थी, हां लेकिन उनके मोबाइल और लैपटॉप मे परे थे, जिन्हे वो डिलीट कर चुका है... चिंता मत कर नकुल अधूरा कुछ भी नहीं करता..."
गौरी:- मुझे अपनी फीलिंग जताने के लिए शब्द नहीं मिल रहे है... जी करता है बस गले लगकर रोती रहूं...
मै:- ये रोना वोना छोड़ दे और जल्दी से फाइनल एग्जाम देकर मेरे पास आ जा...
गौरी:- मन नहीं कर रहा इस बार 12th का एग्जाम देने का...
मै:- पागल ऐसे अगर जिंदगी चलती तब तो हो गया.. हां आसान नहीं होता इतना बड़ा हादसा भूलना, लेकिन जबतक हम ध्यान कहीं और लगाएंगे नहीं.. वो करवी यादें जहन से दूर कैसे जाएगी...
गौरी:- सो जाओ रात ज्यादा हो गई है...
मै, धीरे-धीरे गौरी के सर पर हाथ फेरती उससे बातें करने लगी... जिल्लत अब भी उसके अंदर समाया था जिसको सामान्य होने मे वक्त लगता... बातों के दौरान उसने कह दिया की आज के बाद किसी लड़के को अपने करीब आने नहीं दूंगी...
मै उसे समझाती हुई कहने लगी... "एक धोके से पुरा समाज खराब नहीं होता, बस वक्त बुरा होता है और कुछ अपनी गलतियां... ये कहना मुश्किल होगा कि ज्यादा धोखेबाज कौन है क्योंकि मुझे तो लड़कों से ज्यादा लड़कियों ने डारा रखा है"…
गौरी:- कैसे मेनका...
मै:- एक गलती तुझ से हुई... और उस गलती के कारन कुछ गलत मनसा वाले मानसिक रोगी ने तुम्हे इस्तमाल करने की सोची... तुम गलत होता सहती रही लेकिन कुछ बोल नहीं पाई क्यों?
मेरी बात सुनकर गौरी ख़ामोश हो गई... मै उसके सर पर हाथ फेरती मुस्कुराती हुई कहने लगी… "डर तो यही था ना कि शर्मिंदगी सी मेहसूस होगी... क्योंकि हमे हमारी मां ने आत्मसम्मान बचाने से ज्यादा, समाज के नियम बचाने की सिख ज्यादा दी है... ये लड़के इतने भी गलत कभी नहीं हो सकते, यदि हम लड़कियों को यह विश्वास हो की मै लडूंगी और मेरी मां मेरा साथ देगी..."
"मै यह नहीं कहती की हर मां ऐसा करती है लेकिन ज्यादातर तो उसी कैटिगरी की है... अब इसमें बहुत सी टेक्निकल बातें है जैसे कि मां भी पूरे समाज और रिश्तेदारों का सामना करती है, इसलिए उन्हे भी अंदर से बहुत से डर सताते है.. परन्तु जरूरत है एक अपग्रेड की.. मांओं के ब्रेन अपग्रेड की.. ताकि उन्हें यह अंतर करना आए जाए की चरित्रहीनता क्या होती है और हो गई भुल के लिए आत्मसम्मान बचना क्या होता है..."
गौरी मेरी ओर देखकर मुस्कुराती हुई कहने लगी... "बदलाव तो पहले से शुरू है मेनका, बस समाज के बहुत से हिस्से में लोग बदलना नहीं चाहते... मै अपनी बेटी को हर साल 3 महीने तुम्हारे पास ही छोडूंगी.. ताकि उसको अपनी मां मे यह विश्वास जाग सके, जो हम अपनी मां मे ढूंढ रही"…
मै:- तब वो मेनका मिश्रा के रोल में रहेगी और मै कविता झा (मेरी मासी और गौरी की मां) के रोल में... हिहिहिहिहीहिही…
ज़िन्दगी भी कभी कभी हमे अजीब से कस-म-कस मे ला खड़ी करती है... हम जिनसे प्यार करते है और जिनके भरोसे हमे कुछ भी करने का हौसला मिलता है... कुछ बातों में फिर भरोसा नहीं रहता की वो लोग साथ देंगे... अजीब ही विडंबना है जीवन के...
nice update ..to gauri ko abhay blackmail kar raha tha aur apne kuch dosto ke saath sex karne ko bhi kehta tha ..isliye gauri pareshan thi ..
par nakul ne bahut saste me sabko chhod diya ..laga tha ki kuch bhayanak saja dega nakul ..par sirf police se pitwaya ..
abhay ko to itne aasani se nahi jaane dena tha ...
koi baat nahi jo hua sahi hi hua ..
मेरे दिए सरप्राइज़ से, खुशी से सबका चेहरा खिल गया था.. उन्हे देखकर मै भी मुस्कुराती हुई अपने 1 अप्रैल यानी कल की तैयारी करने लगी... इसी बीच मेरे ऑफिस के दरवाजे पर दस्तक हुई और प्राची दीदी नकुल के साथ दरवाजे से ही कहने लगी… "मे आई कम इन मैम"…
"ओ माय गॉड रे"… दोनो कोट पैंट और बॉस के कॉस्ट्यूम मे तो बिल्कुल नज़रों मे उतर रहे थे... पहली बार दोनो को मैंने ऐसे गेटअप मे देखा था... या शायद पहले भी ऐसे गेटअप लिए हो, मैंने ध्यान नहीं दिया था...
मै:- क्या बात है आज तो दोनो ही चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के गेटअप में दिख रहे... कहीं से मीटिंग लेकर आ रहे हो क्या...
प्राची दीदी:- माफ करना मैंने तुम्हे बताया नहीं... सभी पार्टनर्स के बीच ऐनुअल मीटिंग रखी है आज... मुझे मौका नहीं मिला कंपनी के प्रोफिट के प्रेजेंटेशन बनाने का.. क्या तुम वो कर दोगी...
मै:- 19 साल की लड़की, और कंपनी के लेखा जोखा का प्रेजेंटेशन देगी... दीदी मुझे देखकर तो सब हूटिंग करने लगेंगे.. कहेंगे मंच पर किसे खड़ा कर दिया... ऊपर से इतने लोगों को देखकर, मेरी तो बोलती ही बंद हो जाएगी..
मामला यह नहीं था कि मुझसे भिड़ देखकर बोला नहीं जाएगा... मै तो बस अपने हर्ष से मिलना चाहती थी.. और यही वजह थी कि मै कहीं जाना नहीं चाहती थी..
नकुल:- मेनका तुमसे सब हो जाएगा... प्लीज ना मत कहो..
मै:- मुझे भूख लगी है और कुछ घर का खाना चाहिए.. मै 15 दिनों से बाहर का खाकर बोर हो गई हूं... इसलिए बताओ की कितने बजे से प्रेजेंटेशन है... ताकि घर जाकर भर पेट खाकर मै आराम से अपना प्रेजेंटेशन दे सकूं..
मेरी बात सुनकर एक ओर से नकुल और दूसरे ओर से प्राची दीदी आकर मेरे गाल से गाल चिपकाती "स्माइल प्लीज... हम अभी साथ मे निकलेंगे".. निष्ठुर लोगग.. बच्ची की जान ही लेने पर तुले थे.. सोच रही थी आज ब्यूटीपार्लर का काम निपटाकर कल सुबह-सुबह हर्ष से मिलने चली जाती, अब देखना होगा कब वक्त मिलता है..
बहरहाल 5 सितारा होटल के कॉन्फ्रेंस हॉल में मीटिंग थी.. सो हम सब वहां चले गए... मेरा आधे घंटे का प्रेजेंटेशन था वो देकर मै उस बोरिंग मीटिंग हॉल से बाहर निकल आयी.. मै बाहर निकालकर होटल की रिसेप्शन एरिया में जैसे ही आकर बैठी, सामने स्पा सैलो का मस्त तस्वीर लगा हुआ था..
मैंने भी सोचा जबतक मीटिंग ओवर होगी तबतक मै भी जाकर अपनी मीटिंग की तैयारी कर लूं. हेयर स्पा, बॉडी वैक्स फलाना, डिमकना, मकाना और फेशियल करवाकर मै बाहर निकली... बिल मेरे पास आया और मेरी आखें फटी की फटी रह गई... कमीनो ने 52000 का बिल थामा दिया, वो भी 30% डिस्काउंट करने के बाद..
मां कसम खुद को ही गाली देकर 4 थप्पड़ मारने का मन कर रहा था... 52000 हजार मे तो कितना प्यारा गले का हार आ जाता.. महंगी मंहगी 4-5 ड्रेस आ जाती.. कमीनो ने बच्ची लूट लिए.. हाथ टूट मे, अपने प्यार से दूर होकर, पूरे महिने का काम करी थी, तो वो बेशर्म सीए जोडू का गुलाम मुझे 32000 हजार रुपया स्टीफेन दिया था और कमीनो ने लगभग मेरी 2 महीने की सैलरी, महज 2 घंटे में चट कर दिया वो भी मात्र हफ्ते भर की खूबसूरती के लिए…
तकरीबन 8 बजे मीटिंग खत्म हुई और दोनो (प्राची दीदी और नकुल) बाहर निकले.. मै गहरे सदमे में थी, और गुमसुम बस बिल को ही देख रही थी... "क्या हुआ तुझे ????"… प्राची दीदी मेरे पूरे हुलिए का जायजा लेती हुई कहने लगी.
शायद उन्हे लगा कि मै घर से अच्छे से मेकअप करके तैयार होकर आयी और यहां किसी ने मुझे छेड़ दिया.. नकुल भी इसी सोच के साथ मुझसे पूछने लगा... "किसने परेशान किया"… मै उन दोनों के हाथ में बिल थामती... "लूट लिया मुझे होटल वालों ने".. और लगभग मै रो ही परी थी..
मेरे मेहनत के पैसे उड़ गए.. अंदर से रोना आ रहा था... ना कोई सामान अर्जित की और ना ही किसी के चेहरे पर खुशी की मुस्कान दे पाई उन पैसों से.… बस किसी अमीर की तिजोरी को भर दिया.. वो बिल देखकर दोनो ही हंसने लगे...
वो हंस रहे थे और मेरा कलेजा जल रहा था... मै नाराज होकर वहां से उठकर चली गई... घर आकर मैंने अपना बैग पटक दिया और सीधा जाकर बिस्तर पर... रह, रहकर एक ही बात ख्याल आता रहा... "क्या किया मैंने अपने 52000 हजार रुपयों का... इससे अच्छा तो मै दान कर देती"… मुझे पुरा एक दिन लगा अपनी इस गलती को पचाने में. इसमें कोई शक नहीं की यहां मै बेवकूफ थी, क्यूंकि पांच सितारा होटल में मुझे पहले चार्ज देख लेने चाहिए थे....
2 अप्रैल सुबह के वक्त मै गुनगुनाती हुई तैयार हो रही थी.. किसी से मिलने की तरप आज से पहले कभी इतनी नहीं हुई... लेकिन मै ऐसे ही थोड़े ना जा सकती थी... 15 दिनों का गुस्सा था हर्ष का.. पिघलाने के लिए कुछ तो रूप से रिझाना ही था, ताकि चाह कर भी वो पुरा गुस्सा दिखा ना सके...
शांति वार्ता के लिए जा रही थी, इसलिए मैंने उजले रंग का एक प्रिंटेड गाउन चुना. बदन से चिपकी वो प्रिंटेड गाउन देखने में काफी खूबसूरत और आकर्षित लग रही थी.. वैसे मेरे हाथ और पाऊं इतने सफेद कभी नजर नहीं आए थे, जबसे उन 5 सितारा सैलून वालों ने वैक्स नहीं किया था.. ये तो अलग ही चमक रहे थे.. आज तो नेल पेंट लगाने का अपना ही मजा था..
बड़े प्यार से मैंने रेड स्टोन के 2 बड़े झुमके अपने कानो मे डाली.. हाई हील्स पहन ली और गले में हार डालकर मै मेकअप करने बैठ गई... पूरी मेकअप करके मै आइने मे खुद को निहारने लगी तो खुद ही शर्मा गई... मै अपने हर्ष से मिलने और उसपर बिजली गिराने के लिए, पूरी तरह तैयार हो चुकी थी...
मैंने अपने चेहरे पर स्काफ डाला और चुपचाप निकल गई.. सुबह 7 बजे के वक्त दिल्ली का ट्रैफिक काफी खाली सा था. मै सायं-सायं गाड़ी भागाती हुई जा रही थी... तकरीबन 8 बजे के करीब, मै हाथो में फुल लिए हर्ष के दरवाजे पर खड़ी थी... मैंने एक बार बेल बजाई और हर्ष दरवाजा खोलकर, दरवाजा बंद करते सीधा मेरे मुंह पर मार दिया...
"अरे बाप रे, 52 हजार भी गवाए, सुबह उठकर तैयार होने की मेहनत भी की... और ये दरवाजा मुह पर मारकर भाग गया... कौन साला कहता है कि लड़के अपनी गर्लफ्रेंड के आगे पीछे करते है.. मेरी किस्मत में तो शक्त लौंडा आ गया"…
मै भी लगातार बेल बजाती रह गई... झुंझलाकर उसने फिर दरवाजा खोला... "जितना मैंने इंतजार किया है ना, उस इंतजार का कुछ मज़ा तुम भी लो"…
"अरे हर्ष, बेबी… सोना… सुनो तो.. हर्ष, हर्ष, हर्ष… साला खडूस, हुंह !!!"… भाग गया वापस से दरवाजा बंद करके... मै फिर से लगातार बेल बजाती रही.. 5 मिनट.. 10 मिनट.. 15 मिनट... "छोड़ा कुछ ज्यादा ही भड़का हुआ लागे से"… मै वापस से बेल बजाती रही... आधा घंटे बाद वो दरवाजा खोला...
हर्ष ने जैसे ही दरवाजा खोला... "हुंह ! ऐसे तो कोई दुश्मन को भी दरवाजे पर खड़ा नहीं करता है हर्ष"…
हर्ष:- आ जाओ, अंदर आ जाओ...
मै जैसे ही अंदर पहुंची, हर्ष दरवाजे के बाहर जाते... "रूम पुरा व्यवस्थित कर देना, मै एक ऑपरेशन से लौटकर, तुमसे मिलता हूं"…
मै:- ओय डॉक्टर बाबू, ऑपरेशन मेजर है माइनर...
हर्ष:- ऐम्स मे कुछ भी माइनर होता है क्या.. मै जबतक आ रहा हूं तुम थोड़ा काम करके टाइम पास ही कर लो..
गया हर्ष मुझे काम थामा कर... आधे घंटे तक मै चेयर पर बैठी हुई सोचती रही की क्या करूं.. फिर सोची वही कर देती हूं, जो कहकर गया है... पु
पुरा कमरा तो जैसे अस्त व्यस्त था... 1 बीएचके का फ्लैट पुरा का पूरा कबाड़खाना... मैंने धीरे-धीरे काम समेटना शुरू कर दिया.. काम के दौरान ध्यान ही नहीं रहा कि व्हाइट ड्रेस में हूं... और ना ही इसके कमरे में कोई आइना था... बस किताबें ही किताबें और कुछ नहीं...
एक लेपटॉप रखा हुआ था वो रखना ना रखना बराबर.. खराब परा हुआ था... गौर से देखा तो ये वही लेपटॉप थी, जिसे मैंने यूके मे हर्ष के स्टडी रूम मे देखा था.. ये लड़के भी ना, कभी नहीं सुधर सकते... दारू की बॉटल ऐसे ही लूढ़की हुई थी. ये जान बूझकर तो घर गन्दा नहीं रखे हुए था, मुझसे साफ करवाने के लिए...
पता नहीं मुझे कितनी देर हो गए उसका रूम साफ करते हुए... साढ़े 8 बजे सुबह का निकला वो 2 बजे तक पहुंचा.. आकर ये भी ना हुआ कि बैठकर बात कर ले.. नाह !! सीधा बाथरूम मे घुस गया, और आते ही किचेन मे घुस गया... मै भी उसके पीछे-पीछे गई और उसे आराम से बैठने बोलकर कह दी, "मै खाना निकाल रही तुम बैठो"..
लेकिन मुस्कुराते हुए कहने लगा.. "साथ मिलकर खाएंगे, तो टेबल पर भी साथ खाना लगाते है, चलो आ जाओ"... हम बैठ गए खाने। खाने के दौरान हमारी छोटी छोटी बातें चलती रही... खाकर जब उठे, हर्ष मेरा हाथ पकड़कर सोफे पर बिठाया... और खुद मेरे गोद में लेटकर... "अब बताओ, तुम्हे मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए"..
मै उसके चेहरे पर प्यार से हाथ फेरती हुई उसे मेहसूस करती... "बस ख़ामोश रहो, और मुझे मेहसूस करने दो"…
हर्ष:- अकेले तुम्हे ही मेहसूस करना है क्या... वैसे एक बात कहूं...
मै, अपनी आखें हर्ष पर टिकाती... "क्या"..
हर्ष:- कोई इतना क्यूट कैसे हो सकती है... सुबह जब तुम्हे देखा तब दरवाजा बंद करके यही दीवाल से चिपककर इतना ही ख्याल आता रहा... कितनी प्यारी लग रही है.. समेत लूं अपनी बाहों में...
मै:- रहने भी दो अब अकडू कहीं के.. तुमसे मिलने के ख्याल से 52000 केवल ब्यूटीपार्लर मे खर्च कर दिए.. एक रात नींद नहीं आयी.. एक पुरा दिन खुद को समझाने में चला गया.… और तुमने दरवाजा मुंह कर मारकर, यहां आधे घंटे इंतजार करवा दिया...
हर्ष:- वो भी तो प्यार ही था.. 3 महीने से मिलने की तड़प थी और तुम्हे मौका मिला तो बस घुमा दी मुझे...
मै:- छोड़ो भी अब तो वो वक्त चला गया ना... अभी तो मै हूं ना, पूरी की पूरी तुम्हारे पास, बताओ क्या प्लान है...
हर्ष, थोड़ा मायूस सा चेहरा बनाते.… "प्लान क्या होगा, 2 ऑपरेशन और है जो होने है.."
मै:- लोग कितने कष्ट मे है ना हर्ष, अच्छा लगता है जब तुम सेवा भावना से काम करते हो.... तुम्हे देखकर समझ में आता है कि लोग ऐम्स पर इतना भरोसा क्यों करते है..
हर्ष:- कमाल है मेनका, मै तुम्हे जितना समझने की कोशिश करता हूं, तुम उससे ज्यादा मुझे सरप्राइज़ कर जाती हो…
मै:- ओह हो, मतलब यहां झूठा ऑपरेशन का बहाना बनाकर मुझे चिढ़ाने की कोशिश हां..
हर्ष:- हाहाहाहा, ऑपरेशन तो वाकई मे है लेकिन जितने भी ऑपरेशन है उनमें जूनियर डॉक्टर्स को नहीं लेंगे.. इसलिए छुट्टी मिल गई है... इतनी दूर क्यों हो पास आओ ना..
"अच्छा, पास आ गई तो क्या करोगे बताओ".. मैंने हल्की हंसी के साथ शारारत भरे अंदाज में पूछ लिया...
हर्ष:- बस तुमसे लिपटने का दिल कर रहा है...
मै:- ईशशशशशशशश ! शर्मा गई मै.. चेहरा लाल पर गया मेरा... हीहिहिहिहिहिही
हर्ष:- निष्ठुर शर्म तो नहीं आती होगी ना, इतनी दूर रहकर एक भोले भाके लड़के को परेशान करने में...
मै:- भोले तो कहीं से भी नहीं हो हर्ष.. हां भाला जरूर हो.. जो किसी दिन मेरी जान ले लेगा..
हर्ष:- ऐसे भाले से जान नहीं जाती डफर.. मज़ा आता है..
मै, उसकी बात पर कुछ देर सोचने लगी... "कमिने हर्ष के बच्चे"..
हर्ष:- पागल भाला पहके चलेगा, बाद में हर्ष का बच्चा आएगा... कहो तो प्रेक्टिकल करके दिखाऊं क्या..
मै:- सर आप पोस्ट ग्रेजुएशन पास करके प्रैक्टिकल कर रहे है... मै अभी ग्रेजुएशन मे हूं और मुझे अभी थेओरी ही पढ़नी है.. जब प्रेक्टिकल का वक्त आएगा तब कर लेंगे.. फिलहाल उठो ना आलसी..
हर्ष को मै उठने बोली और वो फर्से मेरे गोद में ले, मेरे हाथ की अपने बाल के ऊपर रखा दिया.. मै धीरे-धीरे उसके सर पर हाथ फेरती... "हर्ष..."
"हुंह ! इस नाम से पुकारा जाना मुझे अच्छा नहीं लगता"… मै थोड़ा गुस्सा दिखती हुई उसके बाल को पकड़कर खींच दि..
"अच्छा ठीक है बताओ, क्या कहकर पुकारूं.. जो तुम्हे अच्छा लगे"…
"रहने दो ये निक नेम खेलना, और मुझे बताओ ना.. तुम नकुल से इतना झगड़ा क्यों करते हो"…
"वो मुझे पसंद नहीं करता... हमेशा मुझे नीचे दिखता है... अरे यार उसका होने वाला फूफा हूं, कुछ तो इज्जत कर ले मेरी... और एक तुम हो, उससे तो आज तक कभी कुछ कही नहीं होगी, की वो मुझे चिढ़ाता क्यों है"…
"हिहीहिहिहिहिही… मै अपने लाडले से क्यों सवाल जवाब करूं. वो मेरे करीब किसी भी बाहरी लड़के को देखकर ऐसे ही चिढ़ा रहता है... तुम्हे तो फिर भी कुछ नहीं कहा.. रवि को तो उसने भरे मेले में रुला ही दिया था"…
हर्ष:- ये रवि कौन है..
मै:- जिसके करीब आने लगी थी.. पर बीच में ही सब खत्म हो गया...
हर्ष:- क्या बात कर रही हो.. तुम्हारा कोई एक्स भी है..
"नहीं एक्स जैसा कुछ भी नहीं है... बस वो.. सॉरी".. पता नहीं कैसे रवि की बात निकल आयी, और मै हर्ष से सब सच कह गई.. बाद में जब एहसास हुआ कि शायद गलत कह गई, फिर मै कुछ बोलने की स्तिथि में भी नहीं थी...
"चलो शुक्र है बीच में ही पत्ता कट गया, वरना तुम्हारे दिल में चाहत जगाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती... वैसे भी आज तक कभी मुझे ज्योमेट्री समझ में नहीं आयी... लव ट्रैंगल मे तो फस ही जाता"… हर्ष मेरे अंदर चल रहे उधेड़बुन को राहत देने की कोशिश करने लगा...
nice update ..bahut din harsh se baat nahi kar paayi menka kyunki maa saath thi aur din me office ka kaam ..
ye prachi ke liye presentation dene gayi 5 star hotel me aur 52000 lootake chali aayi make up karne me ..
charges ya fees kitni hai pehle dekh lena chahiye tha ..
aur rajneesh to mast kaam le raha hai menka se ...apne biwi ke saath maja kar raha hai aur saare kaam audit ke kaam menka se karwa raha hai ..
ab ravi ke baare me bata diya harsh ko ..kya wo is baat ko najarandaaj kar payega ..
मै:- मै कल मिलती हूं हर्ष... सुबह की निकली हूं.. और नकुल भी घर पर है..
हर्ष:- पागल.. कहीं की.. हां ठीक है कि मैं कभी मॉडर्न ख्याल का नहीं हो सकता, लेकिन रूढ़िवादी भी नहीं, जो किसी भी बात का कुछ भी मतलब निकालता रहूं...
पता नहीं उस वक्त मुझे क्या हो गया था... मै जिज्ञासावश फिर पूछने बैठ गई... "और क्या मै यदि यह भी कबूल कर लूं, कि हमारा रिश्ता मे इसलिए टूट गया, क्योंकि उसे मेरा शरीर चाहिए था और वो उसे मिल गया.. मुझे इस बात का अफ़सोस नहीं कि मेरे उसके शारीरिक संबंध रहे, अफ़सोस सिर्फ इतना था कि एक धोखेबाज पर भरोसा कर बैठी"..
मेरी बात सुनकर हर्ष मेरी ओर ऐसे देखा मानो कह रहा हो पागल कहीं की... और जब उसने कहा कि...
"हां सुनने में थोड़ा अजीब लग रहा है, तुम्हे किसी ने धोका दिया उस बात के लिए गुस्से के भाव भी है, किन्तु यही जीवन है.. लोगों को पहचानने में भुल हो जाती है... मुझे इस बात से कोई सरोकार नहीं की पूर्व में क्या हुआ, मेरे लिए ये मायने रखता है कि अब तुम मेरे साथ हो और मेरे प्रति तुम्हारी चाहत अतुलनीय है, क्योंकि कोई भी लड़की इतना सज धज कर आने के बाद, एक बार तो कह ही देती, नहीं मै बाद ने घर की साफ सफाई कर दूंगी...
हर्ष एक अच्छा और सच्चा साथी की पहचान बता गया... शायद अंदर से हर्ष पर विश्वास था, तभी इतना कह गई.. अंदर से दिल धक-धक भी कर रहा था, कहीं हर्ष को परखने में मै उसे खो ना दू, लेकिन मुझसे वो बहुत ही ज्यादा प्यार करता था.. हर्ष के साथ फुर्सत में एक सुकून भरी पहली मुलाकात के बाद, फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखी...
3 घंटे का ऑफिस और फिर पुरा वक्त केवल हर्ष के नाम... मै खुद से किए वादे अनुसार सारे रिश्ते नातों को भूलकर बस हर्ष मे डूबकर रह गई.. जैसा मैंने तय किया था, इतने वर्षो से परिवार और रिश्तेदार को वक्त दिया, अब कुछ दिनों तक सबको भूलकर पुरा वक्त अपने प्यार को दूंगी... मै वहीं कर रही थी...
दिन प्रतिदिन रिश्ते गहरे होते चले गए. हम एक दूसरे मे इस कदर खोए रहते की वक्त की कमी सी मेहसूस होती रही, पर साथ रहने मे कोई कमी नहीं करते थे...
उन्ही दिनों एक रात हम समर्पित हुए.. नज़रों से नजरें टकरा रही थी, थमती श्वांस इस कदर अनियमित थी कि छाती ऊपर नीचे होती रही... होंठ से होंठ जब जुड़े तो जिस्म की आग बढ़ने लगी… उफ्फ.….वो हर्ष का हाथ, जो धीरे-धीरे मेरे बदन से फिरते मेरे स्तनों के ओर बढ़ता रहा. व्याकुलता मे मै अपने होंठ काटती रही...
लज्जा के मारे स्वांस तब अटकी जब धीमे-धीमे वो टॉप उतारने लगा.. बेबस मेरे हाथ झिझक के मारे उसे रोकने की कोशिश करते रहे और वो आगे बढ़ता रहा... उस मादक पलों को याद करके आज भी खिल जाती हूं... भागती जिंदगी को रोककर उन पलों में खो जाती हूं...
पहली बार किसी का मेरे बदन को छूना, इतना प्यारा लग रहा था, इतना आनंदमय, की श्वांस लेना दूभर हो गया और मुंह खोलकर मै सिसकारियां भरने लगी थी... जब उसके हाथ ने मेरे स्तनों को टटोला दिमाग बिल्कुल सुन्न सा पर गया, फिर कुछ भी होश कहां..
मै बस बेबस गुलाम सी बनती गई. वो छूता रहा और मै मचलती रही... पहली बार मै समझी पौरुष प्रेम.. पहली बार एहसास हुआ कि क्यों स्त्री सबसे ऊपर अपने पौरुष को रखती है. पहली बार जलते बदन ने खुद चिंख्कर कहा, बस यूं ही मुझे प्यार करते रहो..
हर्ष मेरे स्तन को मुंह में लेकर अपना अपने हाथ मेरे पूरे बदन पर चलाते हुए नीचे ले जा रहा था और मै उसके सर के बाल को पूरे मादक एहसासों मे डूबकर, उसे भींचती रही.. उसके जीभ मेरे बदन ऊपर के नंगे बदन को गिला करते गए और मै अंदर से जलकर सुख रही थी..
कभी-कभी मै खुद से हंस्तमैथुन कर लेती थी, लेकिन योनि के अंदर ये जलन प्रवाह कभी मेहसूस ही नहीं हुई.. झुरझुरी तो तब फ़ैल गई, जब हर्ष ने अपने हाथ धीरे से लेगी के अंदर सरकाया था... मानो ऊपर की श्वास ऊपर ही रह गई हो और पागलपन मे मैंने आपने दांत उसके कंधे पर गड़ाया था..
लाज की वो आखरी निशानी मेरी पैंटी, फिर जब मेरे बदन से अलग हुई, पूरी औरत बनने की ललक फिर तेज सी हुई.. खुद मे लज्जा तब मेहसूस हुई, जब मेरी योनि ने मादक स्त्राव किया और कमर अपने पूरे उफान पर लचक रहे थे.. मेरा गोरा बदन जल रहा था और मेरे साजन मेरी प्यास पहले भड़काकर, फिर बुझाने की तैयारी कर रहे थे..
ईशशशश वो उनका लिंग.. मै देख तो नहीं पाई पहली दफा, पर जब योनि के ऊपर वो रगड़ खाई.. शरीर बिल्कुल कांपने सा लगा.. आने ववाले पल की कल्पना मुझे पागल बना गई और हर्ष भी पूरे जोश में होश खोते, मेरी कौमार्य पूरे जोड़ से भंग कर गया...
हम दोनों ही हालांकि अपना कुंवारापन न्योछावर कर रहे थे, ना तो उसने किसी स्त्री को आज तक छूया था और ना ही मैंने किसी पुरुष को... प्यारा की मादक लहर मे पहली बार मुझे तेज दर्द का एहसास हुआ, जब स्त्री मिलन के पहले अवसर पर हर्ष ने योनि के अंदर पुरा जोर लगा दिया...
मेरे "आउच मांआआआआ" की पुकार इतनी दर्दनाक थी कि हर्ष का भी दिल कांप उठा था.. चिंख़ मेरी निकली और सहम सा वो गया... वो पीछे हटने की ठान चुका था, लेकिन पूर्ण समर्पण की भावना से मैंने उन्हे रोका और जो शुरू किया उसे पुरा करने कह दी..
मेरे दर्द को दिलासा देते ना जाने कितनी देर तक बिना कुछ किए, मेरे दोनो स्तन को वो प्यार करते रहे. शायद बीच-बीच में उनकी भी हालत खराब होती थी.. दर्द के कारण लिंग पर नियंत्रण तो करते रहे, किन्तु उनके हाथो ने मेरे स्तनों को खूब सताया था. इस कदर वो बेदर्दी से दबाते रहे की ऊपर तो दबा दबाकर लाल कर दिया.
किन्तु ऊपर स्तन पर दिखाया गया जोड़-आजमाइश, नीचे फिर से मादक एहसास भर दिया.. उनसे नज़रें मिलाती, मै आगे बढ़ने का उन्हे निमंत्रण देती रही और सिर्फ एक अर्जी सी निकली थी कि.… "बस धीरे-धीरे आगे बढ़ो, अभी पहली बार है और मै थोड़ी कच्ची हूं.."
मेरे इस अर्जी पर वो मेरे होंठ से होंठ को जोड़कर वो रसपान करने लगे.. मै जलने लगी और नीचे लिंग के दवाब से योनि द्वार धीरे-धीरे फैलते हुए, पूरे लिंग को कसाव के साथ योनि में समाते हुए मेहसूस करती रही.. फिर तो कमर ने खुद धक्कों की मांग करने लगी, मेरा बस कुछ भी ना चला.…
जोश सर पर सवार था और दिमाग ने जैसा काम करना छोड़ दिया हो.. वो धक्के लगाते गए और मेरा शरीर हिलता रहा.. उनके हर धक्के पर थिरकता रहा.. सिसकारियों की आवाज लंबी होती रही और जब हम दोनों चरम पर पहुंचे फिर तो आंनद के उस सागर में मै पूरे डूब गई जिसका पहली बार अनुभव कर रही थी...
जब होश में आयी तब बाल बिखरे थे.. बदन चिपचिपा था और कपड़े फर्श पर बिखरे थे.. नीचे योनि से लगा लिंग भी मै एक बार देखी और लाज से मैंने नजरे अपनी हटा ली... जिस्मानी पर्दे कि दीवार जो थी, उसके हटने के बाद तो खुद को और भी हर्ष के करीब मेहसूस करने लगी.. मै उसकी और वो मेरा, यही ख्याल चलने लगा..
अगले दिन जब हम मिले, हर्ष मेरे सर पर चपेट मारते पूछने लगा... "तुम्हे शर्म तो नहीं आयी होगी, कुंवारी होकर भी खुद को कुंवारी ना बताने में. और एक निर्दोष लड़के पर गलत इल्ज़ाम लगाने मै"…
मै क्या जवाब देती की उस दिन मै क्या कह गई थी... जवाब में बस चेहरे पर शरारत भरे अंदाज थे और होठों पर हंसी.. हर्ष भी समझ चुका था कि मै बस उस वक्त उसे परख रही थी...
इस बात से मेरे साजन थोड़े नाराज हो गए और मै मनाने लगी. बड़ी ही मिन्नतें करवाया, हाथ पाऊं जोड़े, तरह तरह के ड्रामे किए.. उसकी सजा, जो कि कान पकड़ कर 100 बार उठक बैठक की थी, वो भी पूरी करनी पड़ी.. तब जाकर हर्ष माना था... मेरा भोला, बहुत कम मौके पर गुस्सा होता था, लेकिन जब भी गुस्सा होता, हमेशा झमेला ही होता...
अप्रैल 2014 का किस्सा अब सितंबर 2014 मे कदम रख चुका था... हर्ष के लिए केवल मै थी और मेरे लिए हर्ष.. बाकियों को हमने अपनी सूझ बुझ से लगभग किनारे ही किए हुए थे...
मै गिफ्ट खरीदने में व्यस्त थी और हर्ष चिढ़ते हुए बस मेरे साथ था... "क्या हुआ ऐसे मुंह क्यों बनाए हुए हो बेबी"…
हर्ष:- तुम्हे पता है कि घूमने फिरने मे मै वक्त बर्बाद करने से अच्छा, अकेले में तुम्हारे साथ क्वालिटी टाइम बिताना पसंद करूंगा..
मै:- खूब जानती हूं, क्वालिटी टाइम बिताना है या मेरे क्वालिटी कपड़ों को बदन से अलग करके उसे फर्श पर बिखेरना है...
मेरी बात सुनकर हर्ष अपना बत्तीसी दिखाते हुए जोर-जोर से अपना सर हिलाने लगा.. मै उसे आगे धकेलती... "3 महीने से एक ही चीज करते बोर नहीं हुए क्या?"..
हर्ष:- ओह ये एहसास.. जी करता है उम्र भर यूं ही प्रेम मिलाप मे डूबी रहूं... ऊम्ममममम, हर्ष.. रुको मत.. करते रहो.. ओहहहहहहह.. और जोड़ से हर्ष...
"पागल लड़का"… उसकी बात सुनकर मै उसे पीछे से धकेलती हुई ट्रायल रूम मे भेज दी.. और उसके जाते ही, हर्ष ने जो कहा उसपर सोचती हुई ही, पूरी तरह सिहर गई.. बदन एकदम से हिल गया था...
तकरीबन 2 बजे तक हम हर्ष के फ्लैट पर थे और मै हर्ष से उसकी हरकत पर झगड़ने लगी… मै झगड़ती रही और वो केवल हंसता रहा.. मै चिल्लाकर शांत हुई और तेज-तेज श्वांस लेने लगी... हर्ष भी मेरे करीब पहुंचा.. एक नजर उसने मेरी ऊपर नीचे होती छाती को देखा और फिर नजरे चेहरे से टिका दी...
फिर तो हमारी नजरें मिली और हर्ष मेरे कांधे से कोर्ट को उतार फेंककर, बेशर्मों की तरह सीधा शर्ट के बटन खोलने लगा... मै "अरे अरे अरे.. रुक जाओ हर्ष" करती रही लेकिन वो कहां अब रुकने वाला था.. सच तो यह भी था कि अंदर से दिल यही कहता रहा... "मै रुकने कहूं तब भी रुकना मत. मै गुस्सा दिखाऊं फिर भी छोड़ना मत.. मै तुम्हारी हूं और तुम मेरे.…. इसी हक से आगे बढ़ने मे कभी घबराना मत.."
हर्ष भी तो बड़ा ढिट था, कहां मेरी आवाज वो सुनता रहा.. शर्ट के बटन खोलकर, दोनो किनारे करने के बाद सीधा मुट्ठी में मेरे दोनो कबूतरों को, ब्रा के ऊपर से ही धर दबोचा... पूरे जोश से जब हर्ष ने हक जताना शुरू किया, फिर तो मै पिघलती चली गई...
थोड़ी ही देर में फर्श पर सब कपड़े बिखरे और मेरी पाऊं फैलाकर वो धक्के लगा रहा था... क्यों कहते है जवान लड़के-लड़कि को मज़े करो, आज समझ में आ रहा था.. सेक्स से ज्यादा मज़ा किसी और चीज मे नहीं यह बात हर्ष मुझे अपने हर धक्के के साथ सीखा रहा था... अद्भुत और आनंदमय, उसके साथ मै पूर्ण मेहसूस कर रही थी...
अप्रैल से हमने मिलना शुरू किया, जून तक एक दूसरे के होकर, पूर्ण समर्पित हो चुके थे... अक्टूबर तक मेरे लिए हर्ष और हर्ष के लिए मै... काम के अलावा हमने किसी तीसरे को आने नहीं दिया... हां अक्टूबर समाप्त होने के बाद फिर हम दोनो ने अपनी मर्जी से, सबके साथ के साथ अपने रिश्ते को आगे बढ़ाने का फैसला लिया. हां अब एक दूसरे के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ता था, लेकिन जब हम साथ होते और किसी अपने का फोन आता, तब एक दूसरे को छेड़ने का मज़ा ही कुछ और था..
नवंबर का समय था, हम छठ के लिए घर निकल रहे थे.. हर्ष थोड़ा मायूस दिख रहा था क्योंकि आने वाले 8-10 दिन, शायद हम बिल्कुल भी ना मिल पाते और ना ही हमारे बीच कोई बात हो पाती...
मायूस तो मै भी थी लेकिन हर्ष को समझाते हुए मै कहने लगी कि, "एक जीवन में केवल हम दोनों ही हो, ये भी तो स्वार्थ ही है... इसलिए जनाब खुद को समझा ली, क्योंकि मै चली अपने मायके.."
मै हंसती हुई हर्ष को छेड़ गई. वह झुंझलाकर कहने लगा... "बैर तुम्हारे मायके से नहीं बल्कि वहां जाकर जो तुम मुझे पुरा भुल ही जाती हो, उससे है"…
प्रतिउत्तर मे मैंने भी कह ही दिया... "हर्ष बेबी मैंने उनके प्यार को तुम्हारे साथ बांटा है वो भी बिना उनकी इजाज़त के"…
हर्ष आश्चर्य से मुझे देखते पूछने लगा... "तो क्या प्यार करने की इजाजत पहले घर वालों से लेती"…
मै हंसती हुई हर्ष के होंठ को चूमती... 'मै इजाज़त नहीं भी लेती तो भी वो सारी दुनिया को बताकर मुझे भेजते, जा बेटा आज से ये तेरा हुआ..."
"हिहिहिहिहिहिहिही…. नहीं … हिहिहीहिहिही... हर्ष प्लीज.. हिहिहिहि... गुदगुदी मत करो ना"… मेरी बात सुनकर हर्ष मुझे कमर से पकड़ कर गुदगुदी करने लगा.. किसी तरह छूटकर मै अपनी श्वांस सामान्य करने लगी… इतने में ही वो मेरे करीब आया और मुझे पीछे करते हुए दीवार से बिल्कुल चिपका ही दिया... "अरे अब क्या पापड़ बनाओगे"…
हर्ष पूरे मूड में था. ऊपर मैंने शर्ट उंडरसेट करके पहना था और उसके ऊपर प्यारी सी हॉफ कोट, नीचे पेंसिल एंकेल जींस डालकर आयी थी... हर्ष मेरे बदन से कोट को दाएं बाएं किनारे करते, शर्ट को खींचकर बाहर निकाल दिया.. यूं तो मै भी पूरे मचलते अरमान के साथ आयी थी, कि गांव जाने से पहले कुछ तूफानी हो जाए...
उफ्फ क्या ही बताऊं, हर्ष से जब मिलने जा रही थी, पूरे रास्ते मेरा क्या हाल था... हर्ष के साथ कैसे रहेगा आज का दिन, वही बस ख्यालों सा रहा था... हर्ष बिल्कुल उसी अंदाज में, पेश आ रहा था, मेरी तरह.… बिल्कुल बेसब्रा जो हफ्तों की दूरी पर जाने से पहले, एक पुरा माहौल बनाकर विदाई देने वाला था...
लेकिन मै थी शरारत के मूड में, इतनी आसानी से कैसे हाथ आ सकती थी... मैंने जोर से धक्का मरा और हर्ष कुछ पीछे हुआ... "हिहिहिहिहिहीही… कुछ नहीं कहती तो सीधा लूट लो मुझे... आज कुछ नहीं होगा"… मै अंगूठा दिखाकर भागती हुई कहने लगी… और अंदर के कमरे की छिटकिन्नी लगा दी...
मै कमरे के अंदर बिस्तर पर लेटकर, बाहर हर्ष की बेबसी का बस मज़ा लेना चाहती थी... कान तरस रहे थे हर्ष के वो मिन्नत भरे शब्द सुनने के लिए, जो कुछ दिन पहले हुई ऐसे ही शरारत मे वो कहता रहा और मै ढीट की तरह उसे तड़पाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.. मै सपने ही सजा रही थी और इधर हर्ष बड़े प्यार से दरवाजा खोलते हुए कहने लगा...
"प्यार किया है जिनियस इसका मतलब यह नहीं कि रोज-रोज भीख मांगता रहूं... उस दिन जो तुमने सताया उसके बाद अंदर के कमरे से लॉक सिस्टम ही गायब"… "हिहिहिहिहिहि… बेबी, रुको हर्ष... सुनो तो... आवववववववव"..
मै बोलती रह गई, लेकिन मेरी बात को अनसुना करके हर्ष, बिस्तर पर ही छलांग लगा दिया... एक पल तो ऐसा लगा जैसे वो मेरे ही उपर छलांग लगा चुका है और चिंखते हुए मेरी आंखें बंद हो गई..
इससे पहले कि मेरी आंख खुलती.. हर्ष मेरे शर्ट की बीच से पकड़कर खींच दिया... एक बार मे ही सारे बटन तोड़कर, वो शर्ट को हॉफ कोट समेत किनारे किया और अपने जीभ मेरे गोरे, चिकने पेट पर चलाने लगा... "हिहिहिहि.. अरे बेसब्रे.. आउच.. हिहिहिहिही.."…
वो मेरे पेट पर जीभ ऐसे चला रहा था, कि मुझे गुदगुदी हो रही थी.. तभी मैंने उसके बाल पकड़कर अपने ऊपर लिया। हम दोनों की नजरे टकरा रही थी और होंठ प्यासे हो रहे थे.. व्याकुलता के साथ होंठ से होंठ लगाकर, हम जीभ से रसपान करने लगे... हर्ष और मै करवट होकर होंठ से होंठ चिपकाए रहे..
मै तेजी से अपने दोनो हाथ हर्ष के बदन पर फिराती, उसके टीशर्ट को खींचकर निकल दी और वापस से होंठ चूसती, उसके खुले बदन पर हाथ फेरने लगी... हर्ष भी पूरे जोश में आकर ब्रा के ऊपर से ही मेरे दोनो स्तन को इतनी जोर से दबाया... मै उसके होंठ छोड़ते उसे घूरती हुई देखी.. मानो कह रही थी रुको..
मैंने भी अपनी चुटकी मै उसके निप्पल को पकड़कर इतनी जोड़ से मरोंड़ी की चिंख्ते हुए उसने मेरे गाल पर एक चिपका दिया...
"आव... हर्ष के बच्चे मैंने तो थप्पड़ नहीं मारा था... अब मै जा रही"… "सॉरी सॉरी सॉरी... मेमनी मुझे ये नोच-खाशोंट का अनुभव नहीं था.. अचानक ही हाथ उठ गया"… "मुझे कुछ सुनना ही नहीं है.. जंगली कहीं के, चिपका दिया एक.. जाकर बाजार से मेरे लिए व्हाइट शर्ट लाओ, मुझे निकालना है"… "मेमनी मै क्या करूं जो तुम्हारे गुस्सा ठंडा होगा... प्लीज बताओ ना"… "तुम्हे भीख मांगते देख काफी सुकून मिलता रहै... थोड़ा और गिड़गिड़ाओ, फिर कुछ सोचूंगी"… "तेरी तो मै भीख मांगू… वो भी अपने हक पर"…. "हिहिहिहि... रुको रुको.. अरे हर्ष..... आह्हहहहहहहहहहह"…
मेरे कहे कहां अब रुकने वाला था... मेरे ब्रा को ऊपर खिसकाकर, सीधा एक स्तन अपने मुंह में लेकर निप्पल को ऐसे चूसने लगा कि मै सिसकियां लेने लगी... हम अब भी करवट ही लेटे थे... जिस कारण मे मेरे दोनो स्तन बिल्कुल खड़े और आकर्षक दिख रहे थे... एक स्तन को हर्ष मुंह में लेकर चूस रहा था और दूसरे स्तन पर प्यार से ऐसे हाथ फेर रहा था कि मेरी योनि में सुरसुराहट होने लगी. मेरे दोनो निप्पल पूरी तरह इरेक्ट हो गए...
"ऊम्मममममममममम.. हर्ष.. आह्हहहहहहह, मज़ा आ रहा है हर्ष... ऊम्ममममममममममम"… वो मुझे पागल बनाए जा रहा था और मैं सुधबुध खोती, अपने हाथ उसके खुले पीठ पर चलाते हुए, धीरे-धीरे अपने हाथ उसके पैंट के ओर बढ़ा दी. अपने दोनो हाथ उसके निक्कड़ के अंदर डालकर उसके नितम्बों को अपने हथेली में जकड़कर दबाने लगी...
ऐसा लगा जैसे ये सब हर्ष को अच्छा लग रहा हो.. उसने भी अपने एक हाथ पीछे से मेरी जीन्स मे डालने की कोशिश करने लगा, पर बेल्ट के कारन उसका हाथ अंदर जा ना सका.. मै शरारत करती, अपने पंजे के साथ अपने पेडिक्योर किए चौड़े नाखून से उसके नितम्बों को दबोच ली…
पहली बार मैंने उसके दर्द और आंनद का मिला जुला सिसकी सुन रही थी. मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था.. लेकिन इधर बेचारा मेरा हर्ष, परेशान हो रहा था… मैं उसकी मदद करती हुई अपने बेल्ट को अपने हाथो से खोल ली.. जैसे ही मेरा बेल्ट खुला, हर्ष अपना पूरा ध्यान लगाकर, मेरे जीन्स को उतार दिया...
"हिहिहिहि... बेशर्म कहीं के मेरी इज्जत उतारते तुम्हे शर्म नहीं आती... गांव की एक भोली लड़की को अपने हवस का शिकार बना रहे"… "तेरी तो.. फिर से मस्ती"… कहते हुए हर्ष ने मुझे गुदगुदी लगानी शुरू कर दी..
मै अपने घुटने को मोड़कर पेट से चिपका की और ठीक उसकी वक्त हर्ष नीचे आकर मेरे जांघ के ऊपर अपनी जीभ फिराने लगा... "आह्हहहह.. ये चिकनी टांगे.. लग रहा है केले पर जीभ फिरा रहा"… "सर तोड़ दूंगी तुम्हारा मै हर्ष, गंदी-गंदी कहानियों के डायलॉग मुझे मारे तो"… "मै तुम्हारे गोरी टांग जब देखता हूं, तो मुझे मेरे हाथ काले नजर आने लगते है ये टांगे इतनी चिकनी और गोरी है"… कहते हुए हर्ष ने झटके मै मेरे दोनो पाऊं ऐसे खोले की मै करवट से सीधी हो गई...
हर्ष अपना सर मेरे दोनो पाऊं के बीच लाकर, मेरे पैंटी के ऊपर होकर अपना मुंह खोला और योनि को मुंह में भरकर, हल्का दांत ऐसे गड़ाया की मै छटपटाती हुई बिस्तर को मुट्ठी में भींच ली... "आह्हहहहहहहहहह.. हर्षशशश... प्लीज.. उफ्फफफ, .. छोड़ दो ना… आह्हहहहहहहहहहहह.. मै मेरी जा रही हूं... छोड़ दोओओओओ"….
मै पागलों की तरह मस्ती में सिसकती रही.. मै तड़पती रही, लेकिन हर्ष था कि मुझे पागल बनाए जा रहे था... उसने मेरी योनि को अपने दांत से हौले हौले, ऐसे कुरेद रहा था कि मै पागल बनी जा रही थी... हर्ष मेरे दोनो पाऊं उठाकर आहिस्ते से जैसे ही मेरी पैंटी उतारी, मै दोनो हाथ से अपनी योनि छिपाती... "नो हर्ष प्लीज... क्यों जान के रहे हो... बिना कुछ किए ही मै सुस्त पड़ जाऊंगी"… "तुम बस मज़े लो, करना तो मुझे है"…
कहते हुए हर्ष मेरे स्तनों के ऊपर आ गया और घुटनों पर बैठकर वो मेरे सामने ही अपनी निक्कर नीचे करने लगा... मै अपनी आखें मूंदकर... "छी, मुझे नहीं देखना ये.. आई डोंट लाइक ओरल .. जिसकी जहां जगह है वहां डालो ना"… "अच्छा, मै जब पुसी लिक नहीं करता, तब तो मुंह बन जाता है.. फिर मुझसे क्या कहती हो… "कुछ अधूरा-अधूरा रह गया... एक्साइटमेंट के लिए पोर्न लगा दूं क्या"…
"हुंह ! निष्ठुर.. मुझसे नहीं होगा"…. "होगा तो जरूर, बस ना नुकुड़ करके मज़ेे ले रही"… आज तो उसका अंदाज ही थोड़ा जोरदार था... ऐसा लग रहा था मै मात्र उसकी गुलाम सी हूं, जो चाहकर या ना चाहकर भी, उसका हुक्म मानने को विवश हूं...
हर्ष ने इतनी जोड़ से मेरे गाल को खींचा की मेरा मुंह खुल गया और ठीक उसी वक्त वो अपने लिंग को मेरे मुंह में डालकर मेरे मुंह के ऊपर आ गया और बिना कोई रहम किए मुख मैथुन करने लगा...
मुझे बिल्कुल भी इसमें मज़ा नहीं आता था, लेकिन हर्ष के लिए मैंने भी ऊपर-ऊपर मज़ा लेना सीख लिया था... थोड़ी ही देर में वो इतने जोश में था कि मै "गू गू गू" करती रही और वो लगातार मुख मैथुन करता था...
मै जब थोड़ा जोड़ लगाकर धक्का दी, तब वो मेरे ऊपर से हटा... हर्ष हंसते हुए मेरे ओर देखा और मेरे होंठ से होंठ लगाकर एक रसभरा चुम्बन लेकर मेरे दोनो निप्पल को मड़ोड़ते हुए, मेरे दोनो पाऊं को फैलाकर बीच मे बैठ गया...
स्तनों को इतना तेज मरोड़ा, मेरी तो जान ही निकाल दी.. चींख निकल गई मेरी... अब बारी थी आखिरी खेल की, जिसकी शुरवात ही इतनी जानलेवा थी, कि मै पूरी सुधबुध खो बैठी.. हर्ष मेरे दोनो पाऊं के बीच घुटनों पर बैठकर, मेरे कमर को पकड़कर, ऊपर हवा में उठाया...
"हाय मर गई... ये तो.. आज मार ही डालेगा"… आने वाले तूफान कि कल्पना करके ही, मै जोड़ से चिल्लाए हर्ष.. लेकिन काहे सुने वो.. कमर के नीचे मेरे दोनो नितम्बों को थामा और अपनी उंगली को दरारों के बीच ले जाकर, बीच मे गोल-गोल घुमाने लगा... जैसे ही हर्ष की उंगली दरारों मे चलनी शुरू हुई, मै थोड़ी ऊपर उच्की..
मै आगे से जैसे ही अपनी कमर उछली, हर्ष बड़ा सा मुंह खोलकर, मेरे पूरी योनि मुंह के नीच लेकर, मेरे योनि द्वार को दांत से कुरेदने लगा... हाय मैं मरी... कमर में तो वाइब्रेटर लग गए थे और हारकर योनि से रास स्त्राव होने लगा... हर्ष फिर भी कहां मानने वाला था...
एक बार मै चरम पर पहुंचकर आराम भी नहीं की थी, तभी हर्ष और जालिम बनते हुए, अपनी उंगली गप से, पीछे से अंदर घुसा दिया... मै पूरी तरह से बिदक गई.. इस बार मै कुछ ज्यादा ही आगे के ओर उछली, लेकिन हर्ष ने मेरे कमर की थिरकन को और बढाने मे कोई कसर नहीं छोड़ी..
वापस से मेरी योनि को मुंह में लेकर, मेरी योनि पर अपने दांत कुरेदने लगा... अभी तो शांत हुई थी और ये फिर आग भड़काने लगा... "हर्षहहहहहहह... ऊम्ममममममममममममम... आह्हहहहहहहहहहहहह... मै पागल हुई जा रही बाबू.. प्लीज… आह्हहहहहहहहहहहहहह.. माआआआआ..."
मै पागल हुई जा रही थी... मेरी कमर हवा में और शरीर पीछे बिस्तर पर.. मै पूरी उफान पर थी और निगोड़ी कमर, लगातार खुद-व-खुद हिलती ही जा रही थी, उत्तेजना मे आने के बाद तो कभी इसपर नियंत्रण ही नहीं होता, सबसे ज्यादा यही उछलते रहती है..
तभी हर्ष ने कमर को हवा से बिस्तर पर लाकर रखा... दिल में फिर से गुदगुदी शुरी हो गई... हर्ष अब मेरे पाऊं घुटनों से ऊपर मोड़कर, लिंग को योनि से टिकाया...
जैसे ही लिंग का एहसास योनि द्वार पर हुआ, पुरा बदन मचलने लगा.. पीठ, अपने नीचे के पूरे चादर को समेट रही थी.. हमारी नजरे एक दूसरे को देख रही थी... श्वांस उत्तेजना के मेरे बिल्कुल चढ़ी और हर ऊपर खींचती स्वांस के साथ मेरे स्तन ऊपर, और छोड़ती श्वांस के साथ नीचे हो रही थी..
मेरे स्तन एक लय में इस प्रकार ऊपर नीचे हो रहे थे कि हर्ष झुककर बारी-बारी निप्पल को मुंह में लेकर चूसते हुए ऊपर तक लाकर छोड़ने लगा.… "उफ्फ ! मज़े के पूरे नशे ने मै गिरफ्त हो चुकी थी.…
और तभी जैसे ही हर्ष अपनी पीठ सीधी किया, हमारी नजरे मिलने लगी... मेरी नजर इल्तज़ा करने लगी, क्यों तड़पा रहे हो, अब लिंग को डालकर पुरा मज़ा भी से दो... जैसे मेरे नज़रों को हर्ष ने पढ़ा हो. कामुक मुस्कान उसके चेहरे पर भी थी और तभी पुरा बादन एक ही झटके में थिरक गया...
वो इतना तेज और मजेदार धक्का था, कि मेरी स्किन तक वाइब्रेंट करती थिरक रही थी... ऊम्ममममममममममममम... पूर्ण आंनद का एहसास था. मै पूरे मज़े से पूरी सिसकारी लेती, हर धक्के के साथ मज़े के सागर में तैर रही थी... हर धक्का इतना तेज था कि थपकी के साथ आवाज करते धक्का लग रहा था..
अचानक ही मज़े के बीच में खलल सी आ गई... हर्ष ने धक्का लगाना बंद करके, हट गया... मै अपनी आंख खोलकर देख ही रही थी, तभी हर्ष ने मुझे करवट घूमाकर मेरे पीछे आया, मेरे पाऊं को ऊपर करके वापस से योनिं के अंदर पुरा धक्का मारते हुए, मेरे गरदन को अपनी ओर थोड़ा घूमाकर, मेरे होंठ से होंठ लगाकर चूमते हुए, तेज-तेज धक्के लगाने लगा..
उफ्फफफफफफफ... मै फिर से मज़े की गहराइयों में तैर गई... सिसकारियों की आवाज इतनी तेज हो गई की वो मेरे चरम पर पहुंचने कहानी बात गई... और हर्ष के होंठ को काटती मै धीरे-धीरे निढल पर गई.. मै तीन बार झड़ चुकी थी, मेरे अंदर की हिम्मत अब जवाब दे चुकी थी... हर्ष अपना लिंग एक दो झटके अंदर मारकर, वो भी अपने चरम पर पहुंच गया और हम दोनों एक दूसरे मे खोकर वहीं सोए रहे...
ऐसे ताबड़तोड़ जिस्मानी संबंध के बाद निढल होकर हर्ष के ऊपर पड़े रहना और जब प्यार से उसका हाथ मेरे बदन पर चलता खासकर मेरे स्तन पर.. एक अलग ही प्यार जाग जाता था...
शाम के साढ़े 6 बज रहे थे.. हर्ष मुझे हिलाकर जगाने लगा और मै उसमे सिमटती हुई, उसके अंदर पुरा खुद को छिपा ली...
हर्ष मेरे होठ पर प्यारी सी चुम्बन देते हुए... "उठ जाओ, हमे घर के लिए निकलना भी है".. दरसअल मै और हर्ष कुछ वक्त और साथ बिताना चाहते थे, इसलिए दोनो ने ट्रेन से जाने का फैसला किया था..
मै सुबह ही निकल आयी थी.. क्योंकि मुझे सबके लिए खरीदारी करके जाना था... हालांकि घर जाने की प्लांनिंग जब हुई उसी के बाद से मै सबके कुछ ना कुछ खरीद रही थी... आज का एक बजे तक घूमना तो महज एक औपचारिकता थी और साक्षी, केशव (मेरे बड़े भैया महेश के बच्चे) कुणाल और किशोर (मेरे छोटे भैया मनीष के बच्चे) के लिए कुछ कुछ खरीदारी कर रही थी...
हर्ष की बेचैनी को देखकर मै लगभग 1 बजे अपनी शॉपिंग खत्म करके, सरा सामान बैग मे पैक करवाया और कार में लोड करवा चुकी थी...
हर्ष के जगाने के बाद, मै बाथरूम जाकर सबसे पहले तो शॉवर ली.. हालांकि मेरे साथ हर्ष शॉवर लेना चाहता था और यदि वी मेरे साथ आता तो मै उसे रोक भी नहीं पाती.. इसलिए उससे साफ कह दी... दिन में तुम बॉस थे और अभी मै.. जितनी नॉटी तमन्नाएं है वो सब लौटकर आने के बाद...
ओ, मेरे हर्ष बाबू का मुंह इत्तू सा हो गया, जिसे देखकर बुरा भी लग रहा था और थोड़ा-थोड़ा मज़ा भी आ रहा था.. वैसे अभी मज़े की बात करना ही बेईमानी थी, क्योंकि हर्ष ने तो आज मुझे पुरा मज़े से निचोड़ ही डाला था...
बहरहाल मै तैयार होकर अपना मोबाइल ऑन की.. जैसे ही मैंने अपना मोबाइल ऑन किया, धराधर एक के बाद एक 12-15 मैसेज आ गए.. सभी संदेश आईसीएआई (ICAI) वालों का था... इकोनॉमिक्स फोरम डिबेट दिल्ली में होने वाली थी और मेरे कॉलेज के ओर से, मुझे रिप्रेजेंटेटिव बनाया गया था..
मैंने तुंरत ही एच.ओ.डी के पर्सनल नंबर पर कॉल लगाई और एच.ओ.डी ने साफ कर दिया कि 3 दिन बाद होने वाले इस डिबेट मे भारत के टॉप कॉलेज से स्टूडेंट आएंगे.. सीए प्लस बिजनेस मैनेजमेंट... इसलिए मेरा वहां होना अनिवार्य था...
हर्ष तकरीबन 8 बजे तक पूरे तैयार होकर हॉल में आया और मुस्कुराकर कहने लगा... "चले क्या.. एक और ट्रेन के सफर पर.. बस डर यह है कि कहीं इस बार भी तुम किसी से रिश्ता ना जोड़ लो"…
मै:- हर्ष बेबी, तुम जाओ. मै 3-4 दिन बाद प्राची दीदी और नकुल के साथ ही आ जाऊंगी...
हर्ष:- ये क्या बात हो गई... हम दीवाली पर साथ जाने वाले थे ना...
मै अपने दोनो कान पकड़ती... "सॉरी बाबू, वो अभी मोबाइल ऑन की तो पता चका दिल्ली आई.सी.ए.आई इकोनॉमी फोरम का आयोजन करवा रही9 है और मै अपने कॉलेज को रिप्रेजेंट करूंगी"..
हर्ष खुश होकर किनारे से कमर में हाथ डालकर मुझे भींचते हुए.… "मेरी यही इक्छा रहेगी की यहां भी तुम टॉप पर रहो.. सारे जज पैनल को ऐसा लगे कि उनको अभी कई साल लग जाएंगे, तुम्हारे लेवल को मैच करने मे.. पागल मेमनी, हर बात पर इतना सॉरी क्यों बेचने लगती हो... इसका मतलब यह हुआ कि यदि परिस्थिति उलट हो गई, तो मेरा जाना तुम्हे अच्छा नहीं लगेगा ना...
मै:- हर्ष, एक ही तो ज़िन्दगी मिलती है... उसे भी अपनी ज़िंदगी से दूर रहकर, पैसे कमाने में लगा दूं, फिर हमने ज़िन्दगी जिया या फिर ज़िन्दगी भर कागज के पन्नों के पीछे भागते रहे...
हर्ष:- क्यों नकुल और प्राची दीदी के साथ रहना जिंदगी नहीं होगी क्या.. चुप एक दम और कोई काउंटर नहीं चाहिए, बस मुझे स्टेशन तक ड्रॉप कर दो...
रात के 10 बजे की ट्रेन थी.. हर्ष को ड्रॉप करके मै प्राची दीदी को बिना सूचित किए फ्लैट वापस लौट गई... कार को पार्क की और हर्ष से फोन पर बात करते हुए, जैसे ही मै अपने फ्लैट के पैसेज मे पहुंची... "मै पैसेज मे पहुंच गई हूं, कमरे में सैटल होकर कॉल करती हूं"…
हर्ष से ऐसा कहकर मैंने अपनी चाभी लगाई और दरवाजा खोला... "व्हाट द हेल" … मै पूरी आवक… मुंह पुरा खुला का खुला और कदम अपनी जगह बिल्कुल जम गए... मेरे आखों पर यकीन कर पाना मुश्किल था कि मैंने क्या देख लियाया…
प्राची दीदी और नकुल सोफे पर एक साथ नंगे लेटे थे.. दोनो करवट होकर एक दूसरे के आगोश में थे और प्राची दीदी कि खुली पीठ मेरी ओर थी और नकुल दूसरे किनारे से करवट लेटा था...
आश्चर्य से मेरी आखें फटी और मै भागकर सीधा अपने कमरे में चली गई... जैसे ही कमरे मे पहुंची हर्ष का कॉल आ गया.. मै खोई सी आवाज में कहने लगी… "आखों के सामने एक पेंचीदा टॉपिक आ गया है हर्ष, समझने में रात भी कम पड़ जाए शायद.. मै बाद मे बात करती हूं"…
मै बुत्त बनी बैठी हर्ष से बात करके फोन रखी भी नहीं, बल्कि मेरे हाथ से फोन फिसलकर नीचे गिर गया... 2 निर्लज लोग अपने कपड़े पहनकर मेरे कमरे में आए.. एक मेरे दाएं बैठा और दूसरे मेरे बाएं बैठी.. मै कभी दाएं तो कभी बाएं पलटकर उन्हे आश्चर्य से देखती....
एक ओर मेरा समझदार भाई जिसे चुलबुली गर्लफ्रेंड की ख्वाइश थी.. दूसरे ओर नकुल से उम्र में लगभग 5 साल बड़ी एक सशक्त और समझदार लड़की, जिसे सच्चे प्यार कि तलाश थी... एक ही वक्त मे अनगिनत सवाल दिमाग में घूम रहे थे, और मै उलझ गई की पहले कौन सा सवाल कर दूं...
"मेरी हिम्मत ही नहीं बची कुछ सोचने की... कहो क्या कहना है दोनो को"….
nice update ..ye kya nakul aur prachi sex kar rahe the aur menka ne dekh liya ..
isliye nakul ne pehle bataya nahi tha ki kaun gf hai uski ..
par menka ko itna shock kyu laga ,,rutu ke saath bhi to nakul kuch waqt tak pyar karta raha .
umar me badi hai prachi to kya hua agar wo nakul se sachcha pyar karti hai ..
अपने छोटे से गांव से पढ़ी प्राची, 12th में टॉप करने के बाद दिल्ली के ओर रुख कर चुकी थी, जहां उसके एक रिश्तेदार रहते थे... यूं तो रिश्ता बहुत दूर का था लेकिन दोनो परिवार में इतना मेल मिलाप था कि दोनो परिवार काफी क्लोज थे...
माधवी सिंह, राजवीर सिंह की मुंहबोली बड़ी बहन, अपने पति कौशल सिंह के साथ दिल्ली में रहती थी.. काफी कुशल और संपन्न परिवार था... जहां दिल्ली में कौशल सिंह का खुद का बहुत बड़ा रेस्त्रां था... माधवी सिंह का बड़ा बेटा रौनक जेएनयू मे कैमेस्ट्री से डॉक्ट्रेयोट की डिग्री ले रहा था और दूसरा छोटा लड़का डब्बू, बस दिल्ली कि चकाचौंध में खोया हुआ था..
प्राची के लिए यह पुरा परिवार ही अनजान था.. केवल अपने पापा के मुंह से माधवी बुआ का नाम सुनी थी... प्राची जब पैदा हुई थी, उसके बाद तो महज 1 या 2 बार ही माधवी अपने गांव और राजवीर से मिलने गई होगी..
हुआ कुछ यूं कि प्राची की मां उपासना सिंह, उसके पिता यानी प्राची के नाना और राजवीर सिंह का पुरा ससुराल के साथ-साथ, कुछ अन्य करीबी लोग, राजवीर सिंह से प्राची के अच्छे भविष्य के लिए दिल्ली भेजने की जिद करने लगे.. एक तो गांव की थोड़ी सी रूढ़िवादी सोच और ऊपर से घर की पहली लड़की का मोह.. इन सबके बाद प्राची की दादी, अपने पोते-पोति को अपनी नज़रों से कहीं ओझल नहीं करना चाहती थी...
बड़ी मुश्किल से राजवीर सिंह, प्राची को दिल्ली भेजने के लिए राजी हुआ, लेकिन शर्त वहीं थी प्राची दिल्ली में अकेली नहीं रहेगी. भले ही माधवी दिल्ली में बसकर अपने रिश्तेदारों को भुल चुकी थी लेकिन राजवीर के लिए माधवी अब भी एक बड़ी बहन थी, जो कि काफी आदरणीय थी. बस यही वजह थी कि राजवीर ने प्राची को माधवी के जिम्मेदारी मे छोड़ा था...
माधवी शुरू से ही थोड़ा स्वार्थी और खुद से मतलब रखने वाली औरत रही थी… थोड़ा खुदगर्ज और मतलबी.. जबतक उसकी मां जिंदा थी, तबतक वो गांव चली भी जाया करती थी, लेकिन उसके बाद तो कभी मुंह नहीं देखी गांव का..
पहले माधवी का पुरा परिवार ही काफी निम्न स्तर का था, लेकिन वो परिवार राजवीर के पापा, यानी की प्राची के दादा के काफी क्लोज थे, इसलिए राजवीर सिंह ने माधवी के परिवार की बहुत मदद की थी. माधवी के दोनो भाई तो राजवीर सिंह के लिए, जब कहो जान हाजिर रखने वालों में से थे और एक अच्छे पोजिशन मे पहुंचने के बाद भी, कभी राजवीर सिंह को भूले नहीं. किन्तु माधवी के लिए वो सब इतिहास बन चुका था, जो प्राची के आने के बाद फिर से पुनर्जीवित हो चुका था.....
प्राची अपने ग्रेजुएशन मे एडमिशन के लिए दिल्ली पहुंची थी. यहां की ज़िन्दगी और सामाजिक वातावरण प्राची के लिए बिल्कुल ही नया था... जहां एक छत के नीचे बैठे लोग से जब हफ्ते में किसी एक दिन किसी काम के लिए बात होती तो पड़ोसियों की तो बात ही नहीं की जा सकती...
हां लेकिन प्राची को अक्सर इस बात पर व्यंग भरी हंसी आ जाती, जब प्राची को सामाजिकता पार्टी में देखने को मिलते... बाहर के लोग जो बिजनेस एसोसिएट या फिर पहुंच वाले लोग थे, उन्हे ये लोग अपना करीबी और समाज मानते थे, लेकिन अपने गांव और समाज से पहुंची एक लड़की से आज तक बैठकर बात तक ना की...
हालांकि प्राची यह भली भांति समझती थी कि केवल माधवी जैसे लोग नहीं है दिल्ली में.. ये तो बस नए-नए अर्जे पैसों कि गर्मी है, जिसके कारण माधवी और उसके परिवार के अंदर गुरूर की भावना आ चुकी थी... यही वजह थी कि उन्हे बस अपने काम के लोग ही दिखते थे और कोई नहीं...
जहां प्राची अपने गांव में बहुत सी बंदिशें देख चुकी थी, वहीं दिल्ली में पहली बार आज़ादी की उड़ान भर रही थी.. प्राची एक व्यवहार कुशल और अच्छे संस्कारों वाली लड़की थी, जो किसी से भी यदि बात करती, तो इतने प्यार से बात करती की उसकी डांट मे भी लगता शहद की टपक रहा हो.. हां लेकिन थी थोड़ी संकोची, नए लोगों से बात करने में थोड़ी हिचक रहती थी..
वैसे प्राची ने जिस कॉलेज में अपना दाखिला करवाया था वहां माहौल काफी लुभावना था, जहां लड़के-लड़की सब एक साथ हंस बोल रहे थे, बात कर रहे थे.. प्राची को थोड़ा वक्त लगा यहां के माहौल के अनुसार खुद मे थोड़ा परिवर्तन लाने में.. किन्तु ये परिवर्तन अच्छा था..
जहां पहले लड़कों से बात करने में प्राची को काफी संकोच हुआ करता था, वहीं अब वो खुलकर हंस बोल रही थी.. हां संकोच करना अपनी जगह थी, लेकिन कोई उसे संकोची समझकर बेवकूफ आंक ले, फिर तो प्राची को किसी के सहारे की जरूरत भी नहीं थी, वह अकेली ही काफी थी किसी का भी बैंड बजाने के लिए...
कुछ ही दिनों बाद प्राची के हाथ में मोबाइल था और बोरियत के वक्त उसका अपना साथी मोबाइल.. जब हाथ में मोबाइल आया फिर तो कभी-कभी मन कुछ मचल भी जाता.. और दिमाग पोर्न की ओर आकर्षित हो जाता...
यहां खुद का निजी कमरा, ऊपर से कोई दूर-दूर तक उसके कमरे के पास नहीं पहुंचने वाला.. जब कभी भी वो पोर्न देखती, पुरा खुलकर अपने कमरे में एन्जॉय करती थी...
कच्ची उम्र और सेक्स के प्रति आकर्षण.. कभी-कभी प्राची की भी इक्छा होती की कोई उसका भी करीबी हो, कोई उसे चाहने वाला हो.. हां लेकिन उसे दिल्ली के बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड से परहेज़ था...
वजह यह नहीं थी कि किसी लड़के ने उसे आकर्षित नहीं किया हो, लेकिन उसने कभी अपने पहनावे और मेकअप को तवजजो नहीं दिया, और ये दिल्ली थी, जहां लड़कियां शर्ट्स और स्लीवलेस मे कॉलेज आया करती थी... लड़के हमेशा उन्हीं के रूप पर फिदा रहते...
प्राची को कभी इन सब बातों पर अफ़सोस नहीं हुआ कि कोई तो उसका पीछा करने वाला भी होता, क्योंकि उसे यकीन था कि कोई तो दिल से चाहने मिलेगा, जो बिना उसके कुछ बोले उसके दिल का हाल समझ सके.. उसकी आंखों की भाषा पढ़ सके...
बस इन्हीं सब वजहों से कभी उसका फोकस पढ़ाई से नीचे नहीं गया और जब कभी भी अंदर मन मचल जाता, फिर तो अपने कमरे में वो खुलकर एन्जॉय करती थी.. ग्रेजुएशन के 1 साल बीत चुका था.. तभी उसकी मुलाकात बिहार के है एक इंग्लिश लेक्चरर मोहम्मद कमाल से हुई..
कमाल से मिलना प्राची के जीवन में काफी कमाल लेकर आया था... हालांकि कमाल उस कॉलेज का एक अटेंडिंग लेक्चरर था, जो बिजनेस मैनेजमेंट की तैयारी करवाने वाले एक बड़ी सी कोचिंग का मैनेजिंग डायरेक्टर था...
उसकी एक क्लास में सैकड़ों बच्चो की तादात हुआ करती थी, किन्तु वो और उसके कोचिंग के अन्य विषयों के शिक्षक अक्सर कॉलेज में अटेंडिंग लेक्चरर का काम करते.. इससे कॉलेज प्रबंधन और कमाल के कोचिंग, दोनो का फायदा हो जाता था...
कॉलेज प्रबंधन, कमाल और उसके साथी टीचर के बड़े-बड़े हॉर्डिंग लगाकर, स्टूडेंट को अपनी ओर आकर्षित कर लेते थे वहीं कमाल और उसके कोचिंग के योग्य शिक्षक, कॉलेज में क्लास लिया करते थी तो बच्चो को समझ में आ जाता था कि क्यों कमाल की कोचिंग इंस्टीट्यूट बेस्ट मैनेजमेंट प्रिपरेशन कोचिंग सेंटर है...
प्राची ने भी कॉलेज में ही कमाल की क्लास अटेंड की थी, और उसी के बाद उसने फैसला किया कि वो मैनेजमेंट की ही तैयारी करेगी... प्राची मैथमेटिक्स की छात्रा थी, और पहले उसने तय किया था कि मैथमेटिक्स मे पीएचडी की डिग्री लेकर, शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ेगी, लेकिन कमाल की क्लास ने प्राची को अपने एक कमजोर विषय से अवगत करवाया और वो कमाल से सवाल-जवाब करने पहुंची थी..
यूं तो कमाल बहुत ही विनम्र व्यक्ति था, किन्तु रुककर बात करने की फुर्सत नहीं थी... प्राची जब पहली बार उससे मिलने के लिए आगे बढ़ी थी, कमाल के बॉडीगार्ड ने उसे रोक दिया और डांटकर भागा दिया था... अगली बार जब मोहम्मद कमाल, क्लास ले रहा था, प्राची बीच क्लास में ही उससे कह दी... "सर मेरे कुछ सवाल है..."
कमाल:- येस प्लीज..
प्राची:- सर 1000 स्टूडेंट के बीच 10 स्टूडेंट यदि आईआईएम (IIM) का रिजल्ट देते है, तो इसका ये मतलब नहीं कि उसने आप के यहां कोचिंग ली इस वजह से एग्जाम निकाला.. एक ऐसे बॉटम स्टूडेंट को आपकी कोचिंग ने तैयार किया है क्या, जिसका सभी विषय पर पकड़ तो टॉप क्लास के है, लेकिन एक विषय कमजोर है..
कमाल:- व्हाट्स योर नेम (whats your name)
प्राची ने अपना नाम बताया.. कमा,ल प्राची को अपनी जगह बिठाते हुए कहने लगे... "ये सही है कि हम किसी को भी बॉटम टू टॉप नहीं पहुंचा सकते. लेकिन मेरे पास ऐसे स्टूडेंट की लिस्ट है, जिनमे चाहत थी, और हमने उन्हे बेसिक से मार्गदर्शन दिया... उन्होंने फाइनली निकाल भी लिया मैनेजमेंट.."
"किन्तु एक बात मै आप सबको बता दूं.. आप किसी टॉप इंस्टीट्यूट के एग्जाम की तैयारी करते है, तो वहां आपके एकेडमिक को चेक नहीं किया जाता, बल्कि आप उस इंस्टीट्यूट मे क्या सीखने वाली है, उसकी योग्यता है कि नहीं, बस वो चेक करते हैं... रटकर पास करने वालों के लिए बिजनेस मैनेजमेंट नहीं है, वरना आईआईएम (IIM) के कुछ पासआउट मेरे यहां पढ़ा नहीं रहे होते..."
प्राची:- क्लास को ड्रॉप करके मेरे सवाल का जवाब दिए वही मेरे लिए बहुत है... अब जाकर मेरा ईगो सेटिस्फाई हुआ..
कमाल:- व्हाट..
प्राची:- वो क्या है ना मास्टर साहब कल बहुत जिज्ञासा थी कि आपसे कुछ बात करूं, लेकिन आपके बॉडीगार्ड ने ऐसे धुत्करा मुझे की बुरा लग गया... अब जाकर कुछ अच्छा लग रहा है...
कमाल:- क्या नाम बताया अपना..
प्राची:- आपके कोचिंग पढ़ने आ रही हूं, आगे मेरा नाम याद करने में आपको परेशानी नहीं होगी...
इतना कहकर प्राची अपने क्लास से निकल गई. पहली बार कमाल के साथ ऐसा हो रहा था कि, उससे किसी ने ऐसे बात की हो और बीच क्लास से उठकर चली गई हो. कमाल ने उसी वक्त अपने मैनेजर को बुलाकर बोल दिया कि यदि ये लड़की कोचिंग मे एडमिशन के लिए आए तो उसे माना कर देना...
हुआ भी कुछ ऐसा ही.. प्राची अगले ही दिन उस कोचिंग इंस्टीट्यूट में पहुंची... और मैनेजर ने उसे वापस लौट जाने के लिए बोल दिया.. प्राची उस मैनेजर को घूरती हुई कहने लगी.… "ये गलत कर दिया आपने सर.. ये नहीं करना चाहिए था"…
अगले ही दिन, ठीक कोचिंग के सामने वाली बिल्डिंग पर 1200 स्क्वेयर फिट का हार्डिंग लगा था, जिसपर एक ट्रिकी मैथमेटिक्स और रीजनिंग को हल करके नीचे लिखा था..
"अब तक किसी भी कोचिंग क्लास और एग्जाम की तैयारी करने वालों ने इतना संक्षिप्त मे इस सवाल को हल करके नहीं समझाया होगा.. एग्जाम के वक्त ये आपके 40 सेकंड का समय कम कर सकती है... विशेष जानकारी, मेरे फेसबुक पेज पर है.. पहले इस हॉर्डिंग पर और बाद में मेरी एफबी पेज पर हर दिन अपडेट मिल जाएंगे... बेस्ट ऑफ़ लक फॉर एग्जाम.. प्राची सिंह"..
अगले 10 दिन तक प्राची ने अपने होर्डिंग और फेसबुक पेज को ऐसे ही अपडेट करती रही. ग्यारहवें दिन कमाल सर अपने साथी सिक्षक के साथ प्राची का पता करके उसके घर पहुंच गए...
कमाल सर के काफिले को देखकर माधवी को तो एक बार लगा की जैसे ये बेंज और ऑडी वालों का काफिला उनके लिए लिए पहुंचा है.. परंतु जब उन्हे यह पता लगा की प्राची के लिए सभी लोग पहुंचे है, तब उन्हे भी जानकर हैरानी हुई कि इतने कम वक्त में प्राची ने कैसे इतनी जान पहचान बढ़ा ली..
खैर कमाल सर ने पूरे विनम्रता पूर्वक प्राची से माफी मांगी.. फिर जब पता चला कि प्राची बिहार के उस सहर से है जहां से उसके कोचिंग के सबसे ज्यादा टीचर्स है, तब वो हाथ जोड़ते हुए कहने लगे... "मै भी कहां तुम लोगों से पंगे ले बैठा, देखो माफी तक मांगने आना परा.. अब प्लीज इसे फेसबुक पर मत अपडेट कर देना.. वैसे भी तुम्हारे होर्डिंग की वजह से बहुत फजीहत हो चुकी है"..
nice update ..madhvi ke ghamand ka matter sahi hai ,,paise aa jaaye to koi bhi madhvi ki tarah ki ghamand karega hi ..
waise madhvi ne apna ego satisfy kiya aur kamaal ne apna ..par aakhir jeet prachi ki huyi ..aur kamaal maafi maangne bhi aa gaya ...
प्राची हंसती हुई... "आप बूढ़े लोग रिटायर क्यों नहीं हो जाते सर... नए लोगो को मौका दीजिए.. कितना अपने बच्चों के लिए माल छपोगे"…
महेंद्र वर्मा, मैथमेटिक्स के मुख्य सीक्षक... "हाहाहाहा... नहीं यहां के तीनो फाउंडर, मै, कमाल और योगेश तीनो ने ही शादी नहीं की है.. हम कई कोचिंग इंस्टीट्यूट को फंड रिलीज करते है, ताकि पढ़ने के इकछुक स्टूडेंट को मुफ्त में बेसिक शिक्षा मिल सके.. वहां के पासआउट सभी अच्छे स्टूडेंट को हम विभिन्न एग्जाम की तयारी मे आगे मदद करते है, बिना यह डिटेल लिए कि उनके घर वाले उन्हे कोचिंग दिलाने के लिए सक्षम है कि नहीं... हर साल हम ऐसे 200 स्टूडेंट को फाइनेंस करते है बेटा"…
प्राची आश्चर्य से सबको देखती... "ओह माय गॉड, आप वही छिपे लोग है ना जिसकी 2 कोचिंग पटना में भी है.. जहां हर स्टूडेंट को मुफ्त में पढ़ाते है.. और वहां के मेहनती स्टूडेंट को फिर आगे बढ़ाया जाता है...
कमाल:- हो गया इस बात पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नहीं है... फ्री शिक्षा एक ट्रेडमार्क बन गया है कि वहां पढ़ाई ही अच्छी नहीं मिलती... आज कल लोग जबतक अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए जमीन ना बेच दें, उन्हे संतुष्टि ही नहीं मिलती की वो अपने बच्चे को अच्छी जगह पढ़ा रहे.. हमने बस उन्हे दोनो ऑप्शन दिया है..
फिर तो ऐसा लगा ही नहीं की प्राची कोई अनजान थी. यहां के तीनो फाउंडर ने अपनी सीक्षा, साथ में ही पटना से ली थी. इन्हे पढ़ाने के लिए इनके अभिभावकों ने काफी मशक्कत की थी, जिनके दर्द को देखकर तीनो ने फैसला किया था कि, आने वाले स्टूडेंट को इस प्रकार की प्रॉब्लम फेस ना करने परे इसलिए एक विजन के साथ अपना इंस्टीट्यूट खोला..
जितना कमाते थे उसका 70% दान मे जाता था.. और बाकी 30% मे 10% की सेविंग थी उनकी और 20% मे सभी तरह के सुख सुविधा को वो मेंटेन करते थे...
ध्यान कभी डायवर्ट ना हो उसके लिए तीनो ने कभी शादी नहीं की... ऐसा कोई तीनो ने बैठकर कभी फैसला नहीं किया था, बस अपनी सवेक्षा थी... प्राची अच्छे लोगों के बीच पहुंच चुकी थी, जो उसे अपने समाज और अपने लोगो के होने का एहसास करवाते थे..
आपस में बोलचाल कि भाषा भी अपने गांव और सहर की ही रहती, जिससे कभी ये आभाष ही नहीं होता की कहीं बाहर रह रहे है... प्राची की इंगलिश पर कमाल सर खुद ध्यान देते थे... हफ्ते में 2 दिन वो खुद अपने घर में क्लास भी लेते और प्राची के सर पर चपेट भी लगाया करते थे...
प्राची धीरे-धीरे वहां की चहेती हो चुकी थी और पहली ऐसी विधार्थी, जिसका घरेलू सा नाता बन गया था तीनो टीचर्स के साथ... साल के अंत में जब मैनेजमेंट का रिजल्ट आया तब "कॉमन एडमिशन टेस्ट (CAT)" में ऊपर के 100 मे से 60 टॉपर इसी इंस्टीट्यूट के रहे... पहले शीर्ष 10 पर काबिज स्टूडेंट्स इसी इंस्टीट्यूट ने दिए थे, इसके अलावा कुल एग्जाम निकालने वाले विदार्थी की संख्या 350 थी..
इतना शानदार रिजल्ट पहले कभी नहीं हुआ था... हां लेकिन साल दर साल यह इंस्टीट्यूट लगातार अपनी पकड़ और मजबूत किए जा रही थी... इस रिजल्ट को देखकर एक बार फिर इंस्टीट्यूट ने उस पूरे बैच को होटल लीला प्लेस मे ग्रैंड पार्टी दी थी, उनके सुनहरे भविष्य और इंस्टीट्यूट को एक बात फिर बुलंदियों पर बिठाने के लिए..
हालांकि ऐसा कभी नहीं हुआ था कि किसी पढ़ रहे स्टूडेंट को पार्टी में आने का निमंत्रण मिला था, लेकिन इस बार प्राची को ना सिर्फ आने का निमंत्रण मिला था, बल्कि पुरा मैनेजमेंट भी देखने के आदेश मिले थे.. हालांकि पूरी प्लांनिंग तो इवेंट ऑर्गनाइजर के हाथों में ही थी, लेकिन पहले जहां सर लोग से डिस्कशन होता था, इस बार वो भार प्राची के कंधे पर थी...
मस्ती में खुलकर झूमना और नाचना.. यह पहला ऐसा अवसर था जब प्राची अपने दोस्तों के साथ ड्रिंक ट्राय की थी, चूंकि रात जाना नहीं था कहीं, यहीं होटल मै रुकना था इसलिए वोदका के शॉट्स लगाती चली गई..
वो अलग बात है कि 2 बार भागकर बाथरूम जाना परा था, और उल्टियां भी हुई थी.. मामला थोड़ा हाथ से निकलता देख, कमाल सर प्राची को अपने साथ अपने घर लिए चले गए... तकरीबन साढ़े 12 बजे रात को प्राची कमाल सर के साथ थी...
दोनो देर रात घर को पहुंचे और वहां माहौल कुछ ऐसा बाना कि प्राची की नजरें कमाल सर पर ठहर गई.. दोनो के ऊपर नशे का हल्का-हल्का सुरूर और दिल में अरमान जाग रहे थे...
फिर तो पहले होंठ से होंठ जुड़े उसके बाद बदन से कपड़े अलग हो गए... 18 साल की एक कमसिन लड़की अपने उम्र से लगभग 3 गुना ज्यादा बड़े एक टीचर के बाहों में झूल रही था.. उत्तेजना अपने पूरे शबाब पर था और सब कुछ भूलकर प्राची अपना पहला सेक्स पुरा एन्जॉय कर रही थी...
पहली बार जब लंड, चूत को भेद रही थी तब प्राची की थोड़ी चेतना जागी, लेकिन उत्तेजना में वो ऐसी डूबी की फिर तो चारो ओर सिसकारी ही गूंज रही थी..
सुबह जब प्राची की नींद खुली तब उसे खुद मे थोड़ी शर्मिंदगी मेहसूस होने लगी.. रात की बात याद करके वो थोड़ी सा अफसोस करती वहां से बिना बताए निकल गई.. अगले 5-6 दिन तक मोबाइल ऑफ करके वो बस माधवी के घर में ही परी रही...
एक हफ्ते बाद प्राची वापस से अपनी मुस्कान के साथ कोचिंग पहुंची, अपना पूरा क्लास अटेंड की... कमाल सर से मुलाकात हुई, दोनो एक दूसरे से नजरे मिलाने में असमर्थ थे लेकिन सामान्य रूप से बातचीत चलती रही...
लगभग महीने दिन बीते होंगे जब प्राची एक दिन कमाल सर के घर पहुंची... कमाल सर उसे अपने कमरे में बिठा कर उस रात के लिए अफ़सोस जाहिर करते माफी मांगने लगे.. प्राची उसका हाथ अपने हाथ में लेती हुई कहने लगी... "सर वो एक एक्सिडेंट था, जो हो गया, भुल जाइए"…
कमाल सर लेकिन फिर भी अफ़सोस जाहिर करते रहे... तब प्राची ने उसे सामान्य रहने और पढ़ाने के लिए कहने लगी... कुछ दिन उन्हे भी लगा इस बात को पचाने में, लेकिन उसके बाद पहले के रूटीन में ही प्राची की पढ़ाई भी जारी रही..
हां इस बीच जो एक बदलाव आया था, वो ये कि प्राची अब कभी-कभी ऐसे मज़ाक कर जाती की कमाल सर बेचारे अपना मुंह छिपा लेते.. वो लाज के पीछे अपनी प्रतिष्ठा बचाने में लगे रहते और प्राची छेड़ छाड़ के बीच उनसे मज़े ले लिया करती थी...
एक दिन प्राची कुछ ज्यादा ही कमाल सर को छेड़ दी.. और वो बेचारा 65-66 साल का बुड्ढा कुछ ज्यादा ही जोश में आते हुए प्राची को कमर से खींचकर अपने गोद में उठाकर बिठा लिया और प्राची के होंठ से होंठ लगाते उसके दोनो चूची को मसलने लगा..
प्राची लंबी लंबी श्वांस लेती.. अपनी जीभ कमाल के जीभ से मिलाते, उसके होटों को रसपान करने लगे.. कमाल पूरे जोश के साथ उसके चूची को मसलता रहा... कुछ देर बाद प्राची पलटवार करती अपने हाथ नीचे ले जाकर कमाल के लंड को टटोलने लगी... हाथ लगते ही उसके लंड जैसे जलने लगा हो..
कमाल से बर्दास्त नहीं हुआ और उसने प्राची को सोफे पर बिठा दिए.. प्राची अपनी पीठ पीछे टिकाए दोनो हाथ सोफे पर फैलाए हुई थी और दोनो पाऊं नीचे लटकाए हुई थी.. कमाल जोश में आकर उसके जींस के बटन खोलकर पैंटी को जींस समेत निकल दिया और दोनो पाऊं फैलाकर उसकी चूत में अपना लन्ड टिकाकर एक जोरदार धक्का मारा.. और प्राची के मुंह से "आह्हहहहहहहहहहहहहह, मां".. निकल गया...
"सर आराम से डालो ना"… "सॉरी कुछ ज्यादा ही जोश में आ गया था प्राची"…
"ऊम्ममममममममम, आह्हहहहहहहहहह, ईशशशशशश,.. हां ऐसे ही.. उफ्फफफफफ, मज़ा आ गया सर.. आह्हहहहहहहहहह..."
मादक सिसकारियां गूंजने लगी और प्राची पूरे जोश के साथ आगे बढ़ती रही, इसी बीच कमाल सर का लंड बीच रास्ते में ही ढीला पर गया... प्राची की प्यास देखकर कमाल को लगा ये कमसिन लौंडिया कहीं हाथ से ना निकल जाए.. रुमाल से पूरी चूत साफ़ करके कमाल अपना मुंह लगाकर चूसने लगा..
प्राची एक बार फिर से जोश में आ गई और अपने कमर हिलाने लगी... कुछ देर मेहनत करने के बाद प्राची भी निढल पर गई और हंसती हुई कहने लगी... "मज़ा आ गया सर".. और दोनो ही हसने लगे..
अब तो हफ्ते में एक दिन, दोनो के दिल मचल ही जाते... रात में ही प्लांनिंग हो जाती और सुबह कमाल शक्ति वर्धक गोली खाकर दिल लगाकर चुदाई का आनंद लेता.. दोनो अलग ही लेवल के मज़े मे रहते... हां लेकिन सेक्स के पहले या बाद में दोनो के रिश्ते हमेशा सामान्य ही रहते और प्राची कमाल सर की सबसे करीबी विधार्थी ही रहती...
इसी बीच गांव से हर्ष भी प्राची के पास ही चला आया.. वो मेडिकल की तैयारी के लिए पहुंचा हुआ था... पहले प्राची फिर हर्ष, माधवी का चेहरा देखने लायक होता लेकिन कुछ कहती नहीं थी…
इसी बीच एक दिन पता चला कि कमाल सर निकल लिए... कारन था मैसिव हार्ट अटैक... डॉक्टर्स ने मौत के कारण मे साफ लिखा था कि जोश वर्धक पिल्स के ज्यादा इस्तमाल के कारन मैसिव अटैक आया और कमाल सर अल्लाह को प्यारे हो गए...
प्राची जब यह खबर सुनी, अब वो हंस या कमाल सर के जाने का अफ़सोस करे, उसे समझ में नहीं आ रहा था.. हां एक चीज जो वो जाते-जाते कर गए थे, वो ये कि अपनी वारिस अपनी सवैक्षा से प्राची को बनाकर चले गए, जिसमे उसके हाथ कमाल सर की 58 करोड़ की संपत्ति हाथ लगी थी, जिसके बारे में केवल प्राची को पता था..
खैर जिस्मानी संबंध अपनी जगह थी लेकिन दोनो के बीच एक अपनेपन का रिश्ता सा कायम हो गया था.. जिसे दोस्त और लवर नहीं बल्कि एक चहेती वारिस की उपाधि देना ज्यादा ही सही रहेगा...
प्राची की जिंदगी फिर से सामान्य रूप से चलने लगी... कमाल के साथ कुछ महीने तक कमाल के रोमांचक रिश्ते के बाद अब सब कुछ सामान्य ही था.. कुछ महीने और बीते होंगे, जब माधवी ने अपनी खुन्नस में वो कर डाला जो उसे नहीं करना चाहिए था...
माधवी ने खुन्नस में अपने घर से 16 लाख कैश चोरी का इल्ज़ाम हर्ष पर डाल दी.. वो भी केवल इसलिए क्योंकि हर्ष बिना पूछे उनके कमरे में तब चला गया जब उनके घर में कोई नहीं था...
साथ मे इल्ज़ाम यह भी लगा था कि हर्ष का, उसके यहां काम करने वाली लड़की शांति के साथ नाजायज संबंध थे और हर्ष ने उसी को यह पैसा दिया था... माधवी ने तो पुलिस तक को बुला लिया....
जिस वक्त ये सब हो रहा था, उस वक्त प्राची कोचिंग करने ही गई हुई थी... लौटकर जब वो आयी, और पुरा मामला सामने आया, उसने तुरंत पहले अपने घर फोन लगाई.. और बाद में अपने दोस्तो को बुलाकर, जाकर हर्ष का बेल करवाई और तुरंत ही माधवी के घर से सरा सामान पैक करके, अपने ही एक दोस्त गरिमा के घर शिफ्ट हो गई थी..
गरिमा दिल्ली की स्थाई निवासी थी. उसके दादा 60 के दशक में यूपी से दिल्ली शिफ्ट किए थे और यहां पर अपनी अरबों की संपति बनाई.. कैनौट प्लेस के प्रॉपर्टी से उनकी मासिक कमाई 12 लाख की थी, जो किराए से आती थी...
प्राची को अपने दोस्तों पर भरोसा था और हुआ भी वैसा ही.. उसके 8 दोस्त आगे बढ़कर सामने से आए थे.. खैर हर्ष से जब मामला पूछा गया की बात क्या हुई थी, तब हर्ष ने बताया कि उसे काम करने वाली लड़की ने बुलाकर उस कमरे में रुकने कही थी, ताकि वो हर्ष ये सामने उस कमरे की साफ सफाई कर सके...
हर्ष मात्र 10 मिनट तक उस कमरे में रहा और जब बाहर निकल रहा था तब माधवी आ गई.. हर्ष ने उस कमरे में आने का कारन बताया और वहां से चला गया... उसी के 2 मिनट बाद माधवी छाती पिटते हुए पहुंची और हर्ष को 5-6 थप्पड़ जमाती पुरा इल्ज़ाम डाल दिया..
खैर प्राची ने हर्ष को आराम करने कहा और राजवीर को फोन लगाकर बता दी की हर्ष अब ठीक है.. हर्ष तो ठीक था लेकिन राजवीर सिंह अब बिल्कुल ठीक नहीं था… लड़कीबाजी और चोरी का इल्ज़ाम उसके बेटे के ऊपर लगा दिया गया था, जो बिल्कुल ही लड़की और पैसे मे रुचि रखने वाले लड़के मे से नहीं था..
राजवीर सिंह का फोन तो एक बार भी माधवी को नहीं गया, लेकिन माधवी के अपने भाइयों ने फोन करके साफ कर दिया... "तुम स्वार्थी थी ये तो हम जानते थे, फिर भी बहन तो थी.. अब मर गई... हर्ष के साथ तुम लोगों ने जो भी किया है, उसका हिसाब करने राजवीर आएगा ही... तुम तैयार रहना... क्योंकि वो ना तो कभी कमजोर आदमी रहा है और ना ही वो एक कमजोर पिता है"..
nice update .prachi aur kamaal sir ka sex karna nashe me sahi hai par 18 saal ki prachi sharab kyu pee rahi thi aur kisine usko roka nahi ..
bura laga kamaal sir ki maut ka ...itni umr me josh badhanewali goli le rahe the kyunki prachi ke saath sex enjoy kar sake ..
waise prachi ko apna vaaris banakar achcha kiya ..
ab madhvi ke bure din shuru honge aisa lagta hai ..harsh par sex aur chori ka iljaam lagake jail bhej diya ..aur madhvi ke bhaiyo ne bhi usse rishta tod diya ..