लगभग 10 बजे तक हम दोनों घर के सभी सदस्य को राखी बांधकर फुरसत हो गए थे. तभी रूपाली दीदी मुंह बनाती हुई आकर मेरे पास बैठ गई... "मेनका तू अपने खानदान वालों को जल्दी से राखी बांधकर आ ना"…
मै:- लेकिन मै क्यों जाऊं किसी के पास, बस यहां नकुल का ना होना अखर गया, बाकी जिसे राखी बंधवाने है उन्हे खुद ही होश नहीं... आधे घंटे और राह देखूंगी, फिर चल दूंगी आपके साथ शॉपिंग करने..
मै रूपाली दीदी से बात कर ही रही थी कि तीसरे घर के तीनो भैया पहुंच गए. वही बबलू भैया के घर के लोग थे, जिन्होंने मुझे गाड़ी चलाना सिखाया था. बबलू भैया आते ही मुझे देखते हुए कहने लगे.… "तू किसी से डर जाती तो हमारा अभिमान डर जाता, बहुत ही सधा हुआ जवाब दिया है, अब यहां से तुझे कुछ चिंता करने की जरूरत नहीं है, हम सब देख लेंगे"…
मै, बबलू भैया की आरती उतारकर राखी बांधने के बाद... "जिसके इतने सारे चाहने वाले भाई हो, उसे चिंता करने या किसी से डरने की जरूरत है क्या? वैसे भाभी की डिलीवरी कब है"..
बबलू:- अगले ही महीने है..
बाकी के दोनो भाई बबलू भैया से छोटे थे और बाहर रहकर पढ़ाई करते थे. मैंने ही उन्हे फोन करके कहा था राखी तक आ जाने. वो दोनो भी पहुंचे हुए थे. चौथे और पांचवां घर से कोई नहीं आया था अबतक. हालांकि इस बात को सभी नोटिस कर रहे थे कि जबसे मेरे और फैजान के बीच का केस हुआ था, नीलेश और नंदू का परिवार हमसे कटा हुआ था.
खैर मै 10.30 बजे तक इंतजार करने कर बाद... "मै फ्री हो गई रूपाली दीदी, बताओ कहां चलोगी बिजली गिराने"..
मेरी बात सुनकर रूपाली दीदी दबी सी हंसी निकाली और झूठा गुस्सा दिखती हुई मुझे डांटने लगी. रूपाली दीदी नौकतांकीबाज थी तो मै क्या उनसे कम थी. उन्होंने तो यह बात गोल कर दिया कि उन्हें अपने होनेवाले से मिलने सहर जाना है लेकिन वो ये भुल गई की उन्हे मेरे साथ ही जाना था..
फिर दौर शुरू हुआ मस्का पॉलिश का. मै भाव खा रही थी और रूपाली दीदी मुझे सहर चलने के लिए मना रही थी. उनके मिन्नत करना इतना मज़ेदार था कि मै हंसती हुई कहने लगी… "दीदी, मुझसे बैर करके घाटा करवा ली ना, जिस डाल पर बैठते है उसे नहीं काटा करते"..
फिर दौर शुरू हुआ मस्का पॉलिश का. मै भाव खा रही थी और रूपाली दीदी मुझे सहर चलने के लिए मना रही थी. उनके मिन्नत करना इतना मज़ेदार था कि मै हंसती हुई कहने लगी… "दीदी, मुझसे बैर करके घाटा करवा ली ना, जिस डाल पर बैठते है उसे नहीं काटा करते"..
रूपाली:- मेरी प्यारी बहना, चल तुझे आज मै कान कि बालियां दिलाऊंगी. बस थोड़ा संभल ले..
मै रूपाली दीदी के गले लगती... "वाउ दीदी, सच मे मुझे दिलाने वाली हो या फेक रही हो"..
रूपाली दीदी:- पहले से प्लान है ये तो..
मै:- ओह हो तो अमित और सुमित (मेरे ममेरे भाई के नाम) भैया से मिलने वाला गिफ्ट अपने खाते में डाल रही हो. दीदी बहुत चालू चीज हो आप..
रूपाली:- तो तू कौन सी सीधी है मेनका. ब्लैकमेलर, ठीक है तेरे होने वाले जीजाजी से तुझे एक अच्छी सी ड्रेस दिलवा दूंगी.. अब तो हंस दे बहन..
हम दोनों ही हसने लगे. सुबह साक्षी भी सहर घूमाने बोली थी, सोची केशव और साक्षी भी इसी बहाने घूमकर ले आऊंगी. जाने से पहले मै महेश भैया और मनीष भैया से मिल ली, ताकि रूपाली दीदी को कुछ देना हो तो, मै वहां से खरीद लूं. जब मै उनसे मिलने गई तो सोभा भाभी ने कहा, छोटे छोटे गिफ्ट पर पैसे खर्च ना करे, बल्कि दोनो भाई पैसे मिलाकर कोई जेवर दे दे तो काम भी आ जाएगा...
बड़ी भाभी का प्रस्ताव सबको अच्छा लगा. मनीष भैया ने मां से ये बात कही तो मां ने भी हामी भरते हुए उनके लिए कोई जेवर लेने ही बोल दी. पापा ने मुझे अपने ही खाते से दिलाने देने बोल दी, बाद में वो मुझे वापस कर देते. कुछ देर की मीटिंग के बाद मै और रूपाली दीदी, साक्षी और केशव के साथ सहर के ओर चल दिए.
मै जब गांव के बाजार से कुछ दूर आगे पहुंची, तब मुझे कुछ संका सा हुआ और मैंने कार को पेट्रोल पंप के बगल से मंदिर वाले रास्ते पर ले लिया. मेरा शक सही निकला. 2 कार निश्चित दूरी बनाकर हमारे पीछे आ रही थी. अगला मोड़ काटकर मै कार कोने में लगाकर पीछा कर रही कार के आने का इंतजार करने लगी..