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Thriller 100 - Encounter !!!! Journey Of An Innocent Girl (Completed)

Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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श्रावण मेला ।। भाग:- 10





भाभी इधर मुझे बुला रही थी उधर रवि वहां से निकल गया. रूपा भाभी अपने किए पर पूरे रास्ते पचता भी रही थी और रह रह कर सभी बातो का दोषी मुझे ही दे रही थी. खैर जबतक लता और मधु थी मैंने उन्हें कुछ भी नहीं कहा लेकिन जैसे ही उन दोनों का साथ छूटा और हम घर के ओर निकले..


मै:- थप्पड़ आप मरो और दोषी मै हो गई..


रूपा भाभी:- नहीं मेनका मै तो बस तुम्हारा चिल्लाना बर्दास्त नहीं कर पाई और मेरा हाथ उठ गया..


मै:- बहुत दिन से एक सवाल मेरे मन में कौंध रहा है क्या आप उसका जवाब देंगी..


रूपा भाभी:- क्या पूछ ना..


मै:- अनुज ने जो भी मेरे साथ किया वो उसकी एक मानसिक विलक्षण था, तो क्या आप इस बात के लिए अपने भाई का कत्ल करवा देंगे या बात कुछ और ही थी..


(अनुज रूपा भाभी का छोटा भाई जिसने भाभी के घायल होने के दौरान जब इलाज के लिए सहर गए थे तब मेरे साथ जबरदस्ती करने की कोशिश किया था)


मेनका की बात सुनकर रूपा भाभी इस कदर मुझे देखने लगी मानो उनकी सवालिया नजर मुझसे पूछने की कोशिश कर रही हो कि, क्या रवि ने भी तुम्हारे साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की है?


भाभी के सवालों पर पूर्ण विराम लगती हुई मै कहने लगी... "नकुल के बाद मै किसी पर भरोसा करती हूं तो वो रवि है. ये बात नकुल भी जानता है, इसलिए अनुज के सवाल पर रवि को मत जोड़िए और मेरे सवालों के जवाब दीजिए"..


मेरी बात सुनकर भाभी अपना गला साफ करने लगी. वो किसी गहरे सोच मे खोई सी नजर आ रही थी. भाभी का हाथ थामकर मै उन्हे हौसला देती… "इस सवाल का जवाब जानना मेरे लिए जरूरी है भाभी, क्योंकि दिल पर एक बोझ सा लदा हुआ है"…


रूपा भाभी गहरी श्वांस लेती.… "ये सच है कि मैं मुरली और वंशी को अनुज के पीछे भेजी थी, लेकिन उसे जान से नहीं मारने, बल्कि पाऊं तोड़कर उसे अपंग बना देने. ताकि फिर किसी के साथ जबरदस्ती ना कर पाए. और जब वो अपंग की स्तिथि में किसी सहारे के साथ जिएगा, तो दिमाग में फालतू ख्याल नहीं रहेंगे. लेकिन जबतक मुरली और वंशी, अनुज का पता लगाकर उसे सबक सिखाने उसके खेत वाले मकान के दरवाजे पर दस्तक देने पहुंचे, वहां अनुज की लाश पड़ी थी. मुरली और वंशी ने मुझे जब ये बात बताई तब मै खुद भी हैरान थी."

"मामले की जब छानबीन हुई तब पता चला कि घटना वाले दिन अनुज अपनी छोटी साली दिव्या को अपने ससुराल छोड़ने गया था. दिव्या अपने घर तो पहुंच गई, लेकिन अनुज उसके साथ नहीं पहुंचा था. हालांकि पहले तो अनुज के ससुराल वालों ने हमे यह बताया की दिव्या, अनुज के साथ पहुंची थी. लेकिन जब हम गहराई से पता लगाए तब पता चला कि उस दिन दिव्या अकेली ही घर पहुंची थी.."

"बहुत पूछने के बाद अनुज की साली दिव्या ने ये राज खोला... जैसा कि तुमने पहले ही कहा कि वो एक मानसिक रोगी था, वो वाकई सही कही थी.. वो सच मे एक ऐसा मानसिक रोगी था, जो छोटी उम्र की लड़की को देखकर पागल हो जाता था.."

"इसी रोग के वजह से अनुज दिव्या को उसके घर ले जाने के बदले अपने खेत वाले मकान में ले आया और उसके साथ भी जबरदस्ती की. जोर जबरदस्ती मे दिव्या ने ऐसा धक्का दिया की अनुज के सर का पिछला हिस्सा एक टेबल के कोने से टकरा गया और सिर फटने से ब्लीडिंग शुरू हो गई.. डर के मारे दिव्या की हालात खराब हो गई और वो अनुज को वहां छोड़कर अपने घर भाग गई. घर पहुंचकर उसने अपने माता पिता से सब सच सच बता दिया. अनुज के सास ससुर के लिए भी कठिन वक्त था, लेकिन दिव्या और अनुज के बीच का मामला चर्चा करने से पहले अनुज का इलाज जरूरी था, इसलिए उन्होंने अपनी बड़ी बेटी को फोन लगाने के लिए अपने हाथ में फोन लिया ही था, कि उधर से ही घंटी बज गई और खबर आयी की अनुज नहीं रहा..."

"अब तो जो दुर्घटना होनी थी वो तो हो चुकी थी और मै दिव्या से बदला लेकर भी क्या करती. तुम दोनों की उम्र तो एक जैसी थी ही, ऊपर से दिव्या की मासूमियत के सामने मुझे अनुज मे एक हैवान ही नजर आया. वो बेचारी लड़की 2 दर्द के साथ जीवन बिता रही थी, एक तो उसके जीजा से उसे ऐसी हरकत की उम्मीद नहीं थी, दूसरा अंजाने में ही वो अपने बहन का घर उजाड़ चुकी थी. उसके बहते आंसू नाकाबिले बर्दाश्त थे. ये सच बाहर लाकर मै उसे और तकलीफ देकर क्या हासिल कार लेती."

"उसके घर से चलते समय मै हौसला देती हुई चली की जो भी हुआ दिव्या उसमे उसकी गलती नहीं है बल्कि मेरे भाई की ही गलती थी. जो जैसा चल रहा है चलने दो और पाऊं फिसलने से अनुज की मौत हुई है इसी को सच रहने दो. तुम्हारी दीदी और उसके बच्चे की जिम्मेदारी हमारे परिवार की है उसकी चिंता आप ना करे... इतना समझाकर मै वहां से निकल गई..."

"जो भी हुआ वो मै अनुज की किस्मत समझकर आशुओं का घूंट पी गई और बस तब से यही मानकर चल रही हूं की वंशी और मुरली ने ही मेरे कहने पर धक्का दिया और अनुज की मृत्यु हो गई"…


भाभी की बात सुनकर मै भी गहरी श्वांस लेती हुई उनका हाथ थाम ली. उनके लिए मेरे आखों में एक बार फिर से आशु थे, क्योंकि शायद वो मेरे मोह के वजह से एक बार अपने भाई को अपंग तो क्या मरवा भी सकती थी. लेकिन दिल बड़ा होना चाहिए किसी अपने के कातिल को माफ करने के लिए, वो भी ऐसा अपना जो आपके लिए सबसे अजीज हो.


उन्होंने माफ कर दिया वरना अपने कितने भी बुरे क्यों ना हो, उसके कातिल के लिए दिल में नफरत ही रहती है और मौका मिलने पर उससे बदला लेने में भी नहीं चूकते है. लेकिन भाभी ने गलत को गलत समझा और एक ऐसी लड़की को माफ कर दिया जो उनके लिए लगभग अनजान सी एक लड़की थी..


माहौल थोड़ा गमगीन था लेकिन भाभी उसे हल्का बनती हुई पूछने लगी... मेमनि बात रवि की हो रही थी, और अचानक ही तु बात को कहां ले गई.. जान सकती हूं ऐसा क्या सोचकर कि?"


मै:- सिर्फ मेरा चिल्लाना सुनकर आपने रवि को थप्पड़ मार दिया और सीधा-सीधा कह दी कि पुरा मामला जानने के बाद पूरी सजा तय होगी. बस इसी बात से मुझे ख्याल आया कि आपने अनुज के लिए क्या सजा तय किया था क्योंकि मेरा दिल उस वक्त भी मानने को तैयार नहीं हुआ था कि आपने अनुज का कत्ल करवाया होगा..


भाभी:- हम्मम ! ठीक ही कि जो पूछ ली.. वैसे मै भी एक बात पूछूं..


मै:- हां पूछो ना भाभी?..


भाभी:- तुम रवि को चाहती हो क्या?


मै:- चाहने लगी तो क्या आप उसके घर रिश्ता लेकर जाओगी?


भाभी:- हां कह दे, क्या पता लेकर चली भी जाऊं..


मै:- मेरे भोले पापा श्री अनूप मिश्रा जी कही हम तीनो को ही गायब ना करवा दे. आपने जैसा पूछा है वैसी कोई चाहत नहीं है. हां यूं समझ लो कि वो एक लड़की है और जैसे मेरे और लता के बीच रिश्ता है ठीक वैसा ही रिश्ता रवि के साथ भी है..


भाभी:- हां तो दोस्त है ऐसा बोल ना..


मै:- भाभी ये गांव है और यहां हर बात साफ-साफ बतानी परती है, वरना एक नतीजा तो मै अभी देखकर आ रही हूं... मेरे चिल्लाने को लेकर उस बिचारे रवि को आप चिपका दी..


भाभी:- मेनका तू ही उसे मेरे ओर से सॉरी कह देना ना..


मै:- नाह, सॉरी क्यों कहना है भाभी... बिना बात के ही मुझसे वो खुन्नस खाए बैठा है. मुझे कुछ सामान मंगवाना था सहर से. सोची उसके सामान की गाड़ी जब सहर से आएगी, तो मेरा सामान भी लेता चला आएगा, लेकिन बात करना तो दूर वो मेरा फोन तक नहीं उठाया आज सुबह.. तभी तो उसपर वहां चिल्ला रही थी.. हां कारन गलत था लेकिन थप्पड़ सही पड़ा था...


भाभी:- ऐसी बात थी तो पहले बताना था, एक थप्पड़ और मारकर मै पूछती की मेरी बच्ची का फोन क्यों नहीं उठा रहा है...


मै:- वो तो मै उसके झींगुर चमचे से पता कर लूंगी, की इस रवि के बच्चे को किस कीड़े ने काटा है आप बस उसके झींगुर दोस्त को किसी तरह कोपचे मे मेरी मुलाकात करवा दो..


भाभी:- किसकी बात कर रही है..


मै:- अरे रवि के साथ एक और सांवले रंग का लड़का रहता है ना, जो थोड़ा हैल्थी है और गोल मटोल दिखता है पुनीत..


भाभी:- हां वो गोलू ना.. ठीक है मेरे फोन का इंतजार कर उसे कोपच मे लेकर कल फोन करती हूं तुम्हे...


अगले दिन तकरीबन 3 बजे भाभी पुनीत को घर ही लेकर चली आयी. अब एक ही जगह पर हम तीनो तो थे, लेकिन अब मुझे ऐसा मेहसूस हो रहा था कि बेवकूफ का प्रयावाची शब्द कहीं मेनका तो नहीं. मेरी बेवकूफी का भी कोई जवाब नहीं था. कल भावनाओ मे बहकर मैंने पुनीत को उठाने बोल तो दिया, लेकिन पुनीत से जो बात अकेले में पूछनी थी उसे अब भाभी के सामने तो नहीं ही पूछ सकती थी. फिर भी ये आया है तो कुछ तो पूछना ही होगा..


मै:- पुनीत उस दिन झूट क्यों बोले की रवि कहीं बाहर गया है कल लौटेगा, जबकि वो तो गांव में ही था..


पुनीत, हैरानी से पहले तो चारो ओर देखा, फ़िर उसने अपनी आंखें ऐसे बनाई मानो कह रहा हो… "तुम क्या पागल हो, जो मुझे घर बुलाकर रवि की पूछताछ कर रही"… उसकी आंखों की भाषा तो मैंने पढ़ ली, लेकिन रूपा भाभी तबतक दोबारा पूछ दी... "ओय गुब्बारे मेनका कुछ पूछ रही है?"


पुनीत:- मेरा नाम पुनीत है कोई गुब्बारा नहीं. रही बात रवि की तो, वो वाकई बाहर जाने वाला था पर आखरी वक्त पर नहीं गया..


रूपा भाभी:- बाहर कहां जाने वाला था..


पुनीत:- रवि और मेरा एसएससी मे सिलेक्शन हो गया है. 4-5 महीने बाद हम दोनों ही गांव छोड़कर ट्रेनिंग के लिए निकलेंगे. इसलिए वहां जाने पहले एक बार हर करीबी रिश्तेदार से मिल लिया जाए ऐसी हमारी प्लांनिंग थी.


मै हैरानी से उसे देखती... "मतलब तुम दोनो को सरकारी नौकरी लग गई, और हमे ऐसे पता चल रहा है. उस कंजर रवि को कहीं ग्रैंड पार्टी ना देना पड़ जाए इसलिए वो मेरा फोन नहीं उठा रहा है?"..


पुनीत:- हां शायद.. इस वक्त बहुत बड़े घाटे के दौड़ से गुजर रहा है वो. याद है मेले के पहले दिन विधायक के बेटे फेजान का केस. उस घटना के तीसरे दिन ही रवि के यहां बहुत बड़ी डकैती हुई. विधायक के लोगों ने ही रवि से बदला लेने के लिए करवाया था, बस इसी बात को लेकर रवि और उसके पापा इस वक्त थोड़े परेशान चल रहे है. सावन मेले से लेकर दुर्गा पूजा तक की खरीदारी हो चुकी थी. जिन-जिन लोगों से उधार माल लिया था, उन्हे वक्त पर पेमेंट भी देना है, बस इसी वजह से दोनो बाप बेटे इस वक्त पैसों के जुगाड मे डूबे रहते है..


रूपा भाभी:- उस साले असगर आलम (हमारे इलाके का विधायक) ने ऐसे बदला लिया है. उसकी हवा तो मै आज निकलती हुं.


मै बैठी ही थी इतने में भाभी ने भैया को आवाज लगा दी और पुरा मामला बताती हुई कहने लगी…. "हमारी बच्ची की मदद करने वाले से उस विधायक ने बहुत गलत तरीके से बदला लिया है. अगर हमने कोई एक्शन नहीं लिया तो भविष्य में वो फिर से ऐसा करेगा. आप सोच लीजिए कि आप मजबूत कैसे रहेंगे. जब कोई आपको टारगेट नहीं कर सकता, तो आपके आस पास के लोग को ही तोड़ने मे लगा है"..…


छोटी भाभी ने मनीष भैया के अंदर पुरा चाभी डालकर घुमा दिया. मनीष भैया ने भी बिना कोई देर किए पापा से बात करने चल दिए. जाते-जाते कहते भी गए.. "उस विधायक ने जितना नुकसान किया है, उसका 3 गुना जबतक वसूली नहीं होगी, उसे माफी नहीं मिलने वाली"…


ये सब मामला जैसे ही शांत हुआ, मै पुनीत से कहने लगी... "मुझे रवि से बात करनी है, शायद डकैती मेरी वजह से हुई है और मै उसके साथ रही तो कहीं कोई और समस्या ना हो जाए, इसलिए मुझसे बात नहीं कर रहा. प्लीज उससे एक बार मेरी मुलाकात करवा दो, मै उसे समझा दूंगी कि उसका जो भी नुकसान हुआ है उसकी भरपाई हो जाएगी"…


हम दोनों (मै और रवि का दोस्त पुनीत) ही यह बात भाली भांति जानते थे कि ऐसी कोई बात नहीं है, लेकिन वहां भाभी के होने से ना तो मै खुलकर कुछ पूछ सकती थी और ना ही वो कुछ खुलकर बता सकता था.


पुनीत:- अगर अभी फ्री हो तो अभी चल दो, रवि घर पर ही मिल जाएगा, आराम से चाय पर चर्चा कर लेना..


पुनीत की बात सुनकर मै भाभी के ओर देखने लगी. भाभी मेरे नज़रों के सवाल को पढ़ती हुई कहने लगी... "हां तो ये भी ठीक है, उसके घर पर मिल लेना और बता देने की जो लोग हमारी मदद करते है, उन्हे हम बीच मे छोड़ा नहीं करते, क्योंकि किसी वक्त उन्होंने ने अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा था."..


मै मुस्कुराती हुई भाभी को देखकर उन्हें थैंक्स कही और फटाफट चेंज करके पुनीत को साथ लेकर घर से निकल गई. जैसे ही कार कुछ दूर आगे बढ़ी... "ओय घोंचू मुझे पुरा मामला बताओ और साथ में ये भी की वो पुष्पा और रवि के बीच क्या चल रहा है"..


पुनीत:- मै घोंचू नहीं हूं..


मै:- यहां मै तुमसे घोंचू के बहस मे नहीं उतरी हूं, मुझे बस इतना बताओ की उसके दिमाग में चल क्या रहा है और वो गांव की शादी शुदा लड़की के साथ क्या कर रहा था..


पुनीत:- बहुत हुआ अब और नहीं.. वो तुम्हे 6 साल से चाहता है. तुम चाहना मतलब समझ भी रही हो.. किसी पागल प्रेमी की तरह चाहा है तुम्हे..


मै:- वो बात बताओ जो मुझे नहीं पता हो, ये बात मुझे पता है..


पुनीत हैरानी से मेरे ओर देखते हुए उसके मुंह से बस इतना ही निकला... "क्या?"…


मै:- इतना चौंकने की जरूरत नहीं है. मुझे यह भी पता है कि कहीं दूसरी जगह से उसने आगे की पढ़ाई जारी रखी थी और अपने हर क्लास में वो आगे ही बढ़ा है. अगर मै गलत नहीं तो वो इस वक्त ग्रेजुएशन के पहले ईयर मे है तुम्हारे साथ..


पुनीत मेरी बात सुनकर एक बार और हैरान.. अचंभित चेहरा बनाए वो मेरी ओर देखता रह गया... उसके चेहरे की बनावट देखकर मेरी हंसी छूट गई... "तुम सच मे घोंचू लगते हो. अब मुझे वो बात जाननी है जो मुझसे तुम छिपा रहे हो. उसके दिमाग में चल क्या रहा है और ये पुष्पा के साथ क्या चक्कर है?"
kya baat hain roopa bhabhi toh mahan nikli... :bow:
sach mein shayad hi koi aise maaf kar sakti hai yeh jaante huye bhi ki woh uska saga bhai hai..
ab bas aise hi mahan kam karti rahe roopa bhabhi..
phir se tharak na jaage mann mein...
waise aslam ne achha nahi kiya... baat sadharan si thi Panchayat mein suljha lete aise kisike ghar lut pat kar ke... yaar yeh toh sarasar aanyay hai..
aur yeh menka... isko koi aur kam nahi.. padhiye likhayi chhod bas ravi ka naam jhap raha hai.. uske siva kuch dikh hi nahi raha.. :sigh:
Khair let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill :applause: :applause:
 
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Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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श्रावण मेला ।। भाग:- 11






पुनीत मेरी बात सुनकर एक बार और हैरान.. अचंभित चेहरा बनाए वो मेरी ओर देखता रह गया... उसके चेहरे की बनावट देखकर मेरी हंसी छूट गई... "तुम सच मे घोंचू लगते हो. अब मुझे वो बात जाननी है जो मुझसे तुम छिपा रहे हो. उसके दिमाग में चल क्या रहा है और ये पुष्पा के साथ क्या चक्कर है?"


पुनीत:- मुझे कुछ पता नहीं, बेहतर होगा उसी से पूछ लो...


मै:- बेहतर क्या होगा वो मुझे पता है, तुम बताते हो या फिर मै सीधा जाकर पुष्पा से ही पूछ लूं?


पुनीत:- अगर वो तुम्हे कुछ बता सकती है तो बड़े शौक से जाओ और पूछ लो..


"बहुत अकड़ रहा है, इसकी बैंड तो मै अभी बजाती हूं"…. मन में सोचती हुई मैंने पुष्पा को कॉल लगा दिया. मेरा फोन कार के स्पीकर और माईक से कनेक्ट था इसलिए हम दोनों की बात पुनीत भी सुन सकता था... 3-4 रिंग होने के बाद पुष्पा दीदी फोन उठाकर "हेल्लो मेनका" कही...


मै:- पुष्पा दीदी कल आप जीजाजी के साथ मेला गई और मुझे बताया तक नहीं..


पुष्पा:- तू इतनी क्लोज कबसे समझने लगी जो बात यहां से शुरू कर रही है...


मै:- हा हा हा हा.. ननद को ताने देती तो समझ में आता. भाभी को ताने देती तो भी समझ में आता... बहन को ही ताने दे रही हो. माना कि हम क्लोज नहीं है लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि जीजाजी से छेड़खानी हम ना करे..


पुष्पा:- सॉरी बहना, वैसे इन सब मामले में गलती मेरी है. मै बड़ी होकर तुम्हे नहीं ढूंढी, तो हम क्लोज कैसे होंते. तो इसी बात पर आज शाम का मेला मेरे ओर से और तुझे आना है..


मै:- दीदी आज का रहने दो ना, आज के बाद कोई भी दिन..


पुष्पा:- ठीक है कल का मेला मेरे ओर से..


मै:- दीदी दीप्ति को भी साथ ले आना.. मेरी बदनसीबी देखो, मेरे गली में ना तो मेरी कोई बड़ी बहन है और ना ही कोई छोटी, सिर्फ अकेली मै..


पुष्पा:- हां इसी बात के ख्याल ने तो मुझे याद दिलाया कि जब हमे तुझसे क्लोज होना था, तब तो हम आपस की ही दुनिया में थे.. ठीक है तू चिंता मत कर इस बात की तुम्हारे गली में तुम्हारी कोई हम उम्र नहीं है.. कल हम सब बहने होंगी और तुम्हारे जीजाजी... छोड़ना मत साले को..


मै:- दीदी पापा का कॉल आ रहा है मै बाद में बात करती हूं..


पुष्पा:- ठीक है मेनका.. बस कल का याद रखना..


पुष्पा से बात करके मैंने फोन रखा और पुनीत के ओर देखने लगी. पुनीत मेरे हाव भाव देखकर कहने लगा... "मेनका जी मै हाथ जोड़ता हूं, गाड़ी आगे बढ़ाओ और घर पहुंचो, क्यों मुझे फसा रही हो"..


मै:- कैसे दोस्त हो तुम. तुम्हारा दोस्त उस लड़की से दूर हो रहा है जिसे वो 6 साल से चाहता है, और तुम उन्हे मिलाने की कोशिश भी नहीं कर रहे..


पुनीत:- बोल तो ऐसे रही हो जैसे अभी रवि से लिपट कर आई लव यू कह दोगी..


मै, पुनीत को घूरते हुए... "उसके साथ क्या करना है वो शुद्ध रूप से मेरा फैसला होगा, लेकिन अभी जो पुष्पा दीदी से मैंने बात की है उसमे सिर्फ मुझे इतना पूछना है कि ये रवि का दोस्त पुनीत क्या कह रहा था तुम्हारे बारे में.. कुछ दुकान के पीछे और डिंग डोंग जैसी बातें कर रहा है"..


पुनीत मेरी बात सुनकर हिचकियां लेने लगा... अपने दोनो हाथ जोड़कर कहने लगा... "माते आप किस से ट्यूशन ले रही है जो बिना ज्यादा बाहर घूमे भी आप इतनी खतरनाक टाइप की हो गई. मै पूरी बात बताता हूं"..


मै:- शुरू से बताओ की वो उतनी छोटी उम्र से कैसे मेरे पीछे परा और इस वक्त का क्या सीन चल रहा है..


पुनीत:- ओह तो अब शुरवात से कहानी जाननी है..


मै:- हां बिल्कुल..


पुनीत:- "7th मे थे उस वक्त हम दोनों. जब वो तुम्हे पहली बार देखा था. उस वक्त मै रवि के ही साथ था. उसने जब तुम्हे देखा तो देखता ही रह गया. टिफिन मे देखता, तुम्हे आते हुए देखता, तुम्हे जाते हुए देखता. हर वक्त बस तुम्हारे ही ख्याल मे वो डूबा... स्कूल में तुम्हारे इतने भाई थे कि तुमसे बात करने की कभी उसकी हिम्मत ही नहीं हुई."

"7th का एग्जाम जब वो दे रहा था, तभी उसे पता चला कि रिजल्ट के बाद उसे पटना भेजा जाएगा. बस फिर क्या था वो एक टीचर से मिला और उसे 5000 रुपए देकर खुद को फेल करवा लिया. वो जैसे ही फेल हुआ गंगा चाचा (रवि के पिता) ने उसे खूब मारा और साफ कह दिया कि वो कहीं नहीं जाएगा. मार जो भी लगा हो, लेकिन वो बहुत खुश था.."

"इन सब मामलों में जो एक बात कभी नहीं हुई वो था रवि ने अपना क्लास ड्रॉप किया हो.. आगे की पढ़ाई मेरे साथ ही करता रहा और चुपके से उसने मैट्रिक बोर्ड का एग्जाम भी दिया था और स्कूल में 2 बार फेल होकर वो तुम्हारे साथ तुम्हारे क्लास में था.."

"उसके लिए तुमसे बात करना उतना मायने नहीं रखता, जितना तुम्हारा होना मायने रखता था और वो उसी मे खुश था. उसे ना तो तुम्हे पाने की चिंता थी ना खोने का डर, बस वो अंदर की चाहत अंदर ही रखे हुए था. हां कॉलेज में जब तुम आयी, तब तुमसे बात करने के अरमान उसके दिल में आने लगा. रवि खुद को तुम्हारा इतना करीबी मानता है कि जब वो तुमसे बात करना शुरू किया, तब वो ये भुल गया कि तुम पहली बार उससे बात कर रही थी. उसके जो दिल की भावना थी सीधा-सीधा कह गया..."

"अभी के सिचुएशन में बस मै इतना ही कहूंगा कि रवि खुद को तुमसे दूर कर रहा है ताकि तुम अपने कंपीटिटिव एग्जाम की तैयारी कर सको. और वो तुम्हे भुलाने के लिए हर किसी में इंट्रेस्ट लेना शुरू कर चुका है.."


मै:- ये तो अच्छी बात है कि वो अपनी जिंदगी जी रहा है, लेकिन मुझे ये कतई पसंद नहीं की वो मुझे अनदेखा करे. मै उससे बात करने नहीं गई थी, वो मुझसे बात करने आया था और मेरे खाली वक्त मे कभी-कभी जब मुझे उससे बात करनी होगी, तो वो मुझसे बात करे. बात वो भी बेमन नहीं, बल्कि प्रॉपर रिस्पॉन्ड के साथ समझे..


पुनीत:- अभी जा रही हो मिलने तो तुम्ही ये बात समझा देना.. अब कार स्टार्ट भी करो, यहां रोककर खड़ा रहना अच्छा नहीं..


मै:- ठीक है चलो चलते हैं..


कुछ ही देर में मै रवि के घर पर थी. मै जैसे ही रवि के दुकान पर चढ़ी, रवि के पापा मुझे देखते ही दुकान पर आने का कारन पूछने लगे. मैंने उन्हें बताया कि रवि कुछ काम था इसलिए उससे मिलने आयी हूं. मेरी बात पर रवि के पापा ने ऐसी प्रतिक्रिया दी, मानो कहना चाह रहे हो तुम्हारा मेरे बेटे से मिलना अच्छा नहीं है लेकिन जुबान से उनके निकला... "तुम यहीं रुको मै रवि को नीचे बुलवा देता हूं"..


मै:- नीचे दुकान में तो आपसे पापा मिलने आने वाले होंगे. आप चिंता नहीं कीजिए अंकल, हमे विधायक की हरकत पता हो गई है और सब कुछ ही देर में आने वाले है. मुझे तो रवि से कुछ विषय की जानकारी चाहिए इस वजह से आयी हूं. लेकिन लगता है मेरा आना आपको अच्छा नहीं लगा..


रवि के पापा, गंगा अंकल… "नहीं ऐसी कोई बात नहीं है बेटा. इस जगह मे अच्छे लोगों को बदनाम करने वालों की कोई कमी नहीं है"..


मै:- अंकल यहां के लोग तो हर मोमेंट मे आपको बदनाम करने की कोशिश में जुटे रहते है, लोगों की सुनने लगे तो वो आपको सड़क पर के आएंगे. मुझे रवि से मैथमेटिक्स सीखना हुआ तो मै अपने सीखने पर ध्यान दूंगी या लोगो की बातो मे आकर अपने एग्जाम की तैयारी करना छोड़ दूं, आप बताइए..


गंगा:- तुम सही कह रही हो.. पुनीत इन्हे ऊपर ले जाओ..


रवि के पापा से छोटी सी बातचीत के बाद मै पुनीत के साथ रवि के कमरे में पहुंच गई. मुझे देखकर रवि हड़बड़ाते हुए.… "मेनका तुम यहां क्या कर रही हो"..


मै:- तुम्हारी वो बिंदास आवाज सुनने आयी हूं,.. मां मेरी दोस्त आयी है, एक कप चाय बनाओ..


रवि:- इतनी बेवाक अंदाज तो कभी नहीं थे तुम्हारे मेनका.. मुझसे बदला ले रही हो क्या?


मै:- हां कुछ ऐसा ही समझ लो.. चलो अब जरा उसी आवाज में मेरे लिए चाय तो मंगवाओ.…


रवि:- मां मेरी दोस्त आयी है तीन कप चाय बनाओ..


रवि की मां ने उधर से ठीक है कहा और मै रवि को देखती... "ये आज कल तुम्हारे दिमाग का एंटीना किस बात से हिला है. बिना बात घुमाए सीधा-सीधा बोल दो"..


रवि:- 4 महीने बाद मै जॉब ट्रेनिंग के लिए जाऊंगा. मुझे और पुनीत को इनकम टैक्स डिपार्टमेंट दिल्ली मिला है. जब मुझे यहां रहना ही नहीं फिर अपनी चाहत बताकर और तुम्हे परेशान करके क्यों डिस्ट्रब करना..


मै:- हां तो इसके लिए मुझे अनदेखा करोगे तो जान ना निकाल दूंगी... मैंने तुम्हे मना किया क्या कि तुम मुझे मत चाहो, या तुम मुझे क्यों चाहते हो ऐसा कभी पूछी क्या?


रवि:- नहीं..


मै:- मैंने तो तुम्हे कभी नोटिस ही नहीं किया था, लेकिन रवि को किसने मेरी जिंदगी में लाया..


रवि:- मैंने...


मै:- वो कौन था जों सबके बीच निडरता से मेरा हाथ थाम लिया और मै फिर भी उसके साथ खड़ी होकर बात करती रही..


रवि:- मैंने..


मै:- "कुछ बात सीधे-सीधे नहीं समझी जा सकती. खैर तुम किसी के साथ भी खुश रहो वो भी तुम्हारा ही फैसला होगा.. मैंने जितनी भी बातें तुम्हे बताई उसमे मेरा कोई रोल नहीं था, लेकिन खुद को मेरे सामने जाहिर करने के बाद ऐसे मुंह मारोगे तो मुझे चुभेगा. लेकिन फिर भी ये फैसला तुम्हारा ही होगा. मुझे बस खुलकर अपनी बात कहनी थी सो मैंने कह दिया."

"अब जरा काम की बात करती हूं. मुझे सीए एंट्रेंस एग्जाम के एक पेपर की तैयारी में तुम्हारी मदद चाहिए. बिजनेस मैथमेटिक्स, लॉजिकल रीजनिंग और स्टेटिक कि तैयारी मुझे करनी है. सब्जेक्ट्स के बसिक्स तो मुझे पता है लेकिन कॉम्पिटिशन लेवल नहीं आ पा रहा और ना ही सॉल्व करने की वो स्पीड है. यदि तुम ये दूर करना और पास आने वाली बेवकूफी से परे सोचो तो मुझे अपने एग्जाम की तैयारी में तुम्हारी मदद चाहिए, यदि तुम मदद करना चाहो तो.."


रवि कुछ बोलने को जैसे ही हुआ, मै उसे चुप कराती हुई कहने लगी.… सभी परिस्थिति हम जानते है. हमारे बीच जो कुछ भी हो रहा है उसके सारे फैसले तुम्हारे है, खुद ही सोचकर फैसला कर लेना, मै जा रही हूं"..


मै खुद को जानती थी, इसलिए मै ज्यादा देर रवि के पास नहीं रुक पाती. मेले में रवि को लेकर जब पुष्पा और अमृता कि बात मै सह नहीं पाई, तो रवि अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता की पुष्पा और उसके बीच चल रहे कहानी को जानकर मेरे दिल के अंदर क्या बीत रही होगी. वहां रुकती तो मै जरूर उनके सामने रो देती. चिल्लाकर जरूर पूछ लेती की जब यही सब करना था तो मेरे पीछे क्यों आए थे. लेकिन मै अपनी भावना जाहिर करके रवि को दोबारा अपने पीछे आने का न्योता नहीं दे सकती.


हां कुछ दिल की भी विवशता थी, जो मै उससे ये कह आयी की उसकी जिंदगी वो कुछ भी करे, लेकिन कम से कम मुझसे तो अच्छे से पेश आ सकता है. रवि के यहां से निकलते ही दिल में कुछ बोझ सा लग रहा था. मै बस रो कर आशुओं के साथ उस बोझ को भी निकाल फेंकना चाहती थी. मै बाजार से सीधा अपने घर आ गई और कमरे का दरवाजा लगा लिया...


मनसा जैसी भी रही हो रवि की लेकिन वो एक लड़की के दिल के अरमान को समझा ही नहीं. रुला गया मुझे. शायद हमारी कहानी यहीं तक थी. दिल टूटने जैसा मेहसूस हो रहा था, लेकिन मै कुछ कर भी नहीं सकती थी. रोते-रोते कब मेरी आंख लग गई मुझे पता ही नहीं चला.
padhayi toh mahaz ek bahana hai... is piche ki raaz yeh hai ki isike chalte dono ke bis pehle premleela.. phir raasleela suru jaani hai :lol:
writer sahab, great job yaar.. akhir Kar aapne gajab ki natakiya mod lake menka ko bhi us ravi ke pyar mein gira hi diya...:D Btw ab pyar hoga ki hawas ka khel yeh toh aane wala waqt hi bata sakta hai... :D
thrill kaha hai... koi kirdaar abhi tak nahi mara :sigh:
Khair let's see what happens next
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श्रावण मेला ।। भाग:- 12



मां ने भी मुझे नहीं जगाया श्याद उन्हे लगा हो मै देर रात तक जागती हूं, इसलिए मुझे सोते छोड़ दिया. अगले दिन दोपहर के लगभग 2 बजे कई लड़कियों का झुंड मेरे आंगन में पहुंच गया और उन सब की लीडर पुष्पा दीदी, जोर-जोर से मुझे आवाज लगाने लगी. मां को अपनी आखों पर विश्वास नहीं हुआ कि आगे के टोला से इतनी सारी लड़कियां पहुंची थी. साथ में पुष्पा और अमृता के हसबैंड भी थे.


अब थे तो वो दोनो जमाई ही. साथ मे शादी के बाद पहली बार पुष्पा और अमृता हमारे घर आयी थी, मां उन्हे कैसे बिना कुछ खाए और बिना विदाई के जाने देती. मेरी दोनो भाभी और मां लग गई काम पर और मै घर आए लोगो को बिठाकर उनसे बातें कर रही थी..


अभी पुरा माहौल भरा था कि उसी वक्त रवि भी वहां पहुंच गया. रवि को देखकर मैंने फीकी मुस्कान दी और उसे भी बैठने के लिए कहने लगी. मै क्या उसे बैठने कहूंगी, पुष्पा और अमृता ने मिलकर उसे अपने पास ही बिठा लिया और सवालिया नज़रों से घूरती हुई, मुझसे पूछने लगी कि... "उस दिन तो तुमने कहा था रवि को जानती नही, फिर ये यहां क्या कर रहा है"..


मै:- आप सब लोग रवि और उसके दोस्त को बधाई दे दो पहले. एसएससी का एग्जाम क्लियर कर लिया है. जनवरी तक ये जॉब ट्रेनिग के लिए निकल रहा है.. वो भी इसकी जॉब सीधा दिल्ली के इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में लगी है..


ये लड़कियां भी ना क्या हूटिंग करती है. फिर तो हर कोई रवि से पार्टी मांगने लगा. हंगामे जब हुआ तो उस बीच मां और भाभी भी वहां पहुंच गई और उन्होंने भी जब ये बात सुनी, तो रवि को बधाई देने लगी. किन्तु जब माहौल पुरा शांत हुआ तो सवाल फिर से वही था... "किस काम से आए हो रवि"..


सबको समझते हुए मै कहने लगी... "मुझे मैथमेटिक्स और रीजनिंग के पेपर में कुछ समस्या आ रही थी, इसलिए रवि को मैंने ही बुलवाया था, तैयारी के लिए हम टाइमिंग डिस्कस कर ले. उसी के लिए आया था"…


थोड़ी देर की बातचीत के बाद सबके लिए थोड़ा सा नस्ता लग गया और निकलते वक्त दोनो बेटी और जमाई को विदाई भी मिली. हालांकि ना नुकुर का दौड़ चलता रहा, पुष्पा और अमृता बस इतना ही समझाती रही की इस टोला में मेनका की कोई हम उम्र नहीं, इसलिए वो खुद को अकेला ना मेहसूस करे, इस वजह से पहुंची है. लेकिन रिवाज तो रिवाज होता है उसे कैसे छोड़ सकते है..


वहां से हमारा काफिला निकला तो, लेकिन इस बार पुष्पा दीदी फंस गई, क्योंकि वैसे लोग अपने-अपने ग्रुप के साथ, अपनी साधन में मेले के लिए निकल जाते है. लेकिन 10 लोग को ले जाने की व्यवस्था कहां से जुगाड़े. मैंने फिर रवि से ही मदद मांग लिया. मै अपनी कार रवि को ड्राइव करने के लिए दे दी, जिसमे 5 लोग सवार ही गए और नकुल के यहां की बोलेरो मै ले आयी, जिसमे 6 लोग सवार हो गए, और हम मेले के लिए निकल गए.


मै हंस रही थी, बात कर रही थी लेकिन अंदर ही अंदर कहीं ना कहीं घूट भी रही थी. कारन वहीं था, पुष्पा और अमृता का रवि से कुछ ज्यादा ही चिपकना. मै इस परिस्थिति में किसे दोष दूं और खुद को कितना समझाती रहूं की हर कोई अपनी जिंदगी जी रहा तुम्हे क्या. लेकिन ये दिल है कि मानता ही नहीं.


समझदारी इसी मे थी कि जो बर्दास्त ना हो, उसे अपनी आखों से देखा नहीं जाए. मै दीप्ति और एक दो लडकियों को लेकर एक जीजा को ले उड़ी और मस्ती मज़ाक के बीच मेले का आनंद लेते हुए हम सब वापस लौट आए.


देखते ही देखते मेला अपने आखरी हफ्ते में पहुंच गया था. मेले का मुख्य आकर्षण इसी हफ्ते में होता है जब औरकेस्ट्रा मे लड़कियां नाचती है और बाकी सभी उसे देखने दूर-दूर से आते है. शुद्ध रूप से कहा जाए तो ये आयोजन केवल पुरषों के मनोरंजन के लिए रखा जाता था, जिसमे नाचने वाली महिलाओं को छोड़कर, अन्य किसी महिला का वहां जाने का कोई मतलब ही नहीं बनता है.


इस बार सावन 5 सोमवार का था और मंगलवार के दिन महीने का अंत होना था इसलिए ऑर्केस्ट्रा शनिवार की रात से शुरू होता और मंगलवार के दिन समाप्त होता. नकुल के ना होने से मै पहले से अकेली पड़ गई थी, ऊपर से रवि को देखने जाने की रुचि भी खत्म हो गई.


शायद रवि भी यह फैसला कर चुका था कि वो मुझसे दूरियां ही बनाकर चलेगा इसलिए जब मै उसे अपने दिल की बात बताई, उसके बाद सिर्फ वो मेरे एग्जाम मे हेल्प के लिए दोपहर के 2 से 4 के बीच का समय लेकर गया था, जो मेला खत्म होने के कुछ दिन बाद से शुरू होता. इसके अलवा उसने कोई बात नहीं हुई..


चौथे सोमवार की सुबह थी, जब मै भाभी और मां के साथ मंदिर पहुंची थी. मुझे क्या पता था यहां पहुंचकर मुझे सरप्राइज़ मिलने वाला था. मै जैसे ही मंदिर पहुंची, मेरे ठीक सामने प्राची दीदी और राजवीर अंकल खड़े थे. मै अचंभित होकर उन्हे देखने लगी और जैसे ही वो मेरे करीब पहुंची, शिकायती लहजे में प्राची दीदी से पूछने लगी... "आने से पहले आप बता भी नहीं सकती थी क्या? अब ये मत कहना की अचानक प्लान बन गया"…


प्राची:- नहीं बाबा अचानक प्लान नहीं बना, बल्कि तुम्हे सरप्राइज़ देना था इसलिए नहीं बताई. तेरा पूंछ कहीं नजर नहीं आ रहा है, कहां गया..


मै:- मेरा पूंछ नहीं है वो, नकुल के लिए ऐसा कहोगी तो मै आपसे बात नहीं करूंगी..


प्राची:- हा हा हा हा.. तुम दोनो को छेड़ने का मज़ा ही कुछ और है वैसे सीरियसली वो आशिक़ है कहां..


मै:- उसने जैसा वादा किया था उसी पर काम कर रहा है. पॉलीहाउस के ट्रेनिंग के लिए गया है. वहां से बंगलौर अपने दोस्त के पास जाएगा और कुछ दिन घूम फिर कर जब वापस आएगा तब काम पर लग जाएगा..


प्राची:- फिर तो अच्छा है, उससे रात में आराम से बात करूंगी... चल अभी मेला घूमते है..


मै:- आपको भी सोमवार का ही दिन मिला था, किसी और दिन नहीं घूम सकती थी...


प्राची:- कोई नहीं बच्चा हम 3 दिन है अभी यहां पर.. और तीनो दिन तुम्हारे साथ मेला ही घूमेंगे..


मै:- प्योर बनिया है आप और आप 3 दिन गांव घूमने आयी है. ये क्यों नहीं कहती की बांस की सिक का कई डिज़ाइनर तैयार हो गए है, उसी सिलसिले में आप आयी है..


प्राची:- अरे अरे अरे... तू तो उलहाना भी देनें लगी...


"मुझे भी आपको छेड़ ही रही हूं. चलिए पूजा करके कुछ देर भटकते है, फिर आज आपकी छुट्टी. जो भी जरूरी काम हो आज ही निपटा लेना".. मै अपनी बात कहकर, प्राची दीदी का हाथ पकड़कर उन्हें अपने साथ मंदिर ले गई, जहां लता और मधु पहले से मेरा इंतजार कर रही थी. उन दोनों को मैंने प्राची दीदी से मिलवाया और हम पूजा करने चल दिए.


अगला 2 दिन उनके साथ कैसे बिता पता ही नहीं चला. बृहस्पति वार को प्राची दीदी वापस दिल्ली के लिए निकल गई और मै भी अपने काम मै व्यस्त हो गई. हफ्ते का आखरी दिन था वो. रविवार की सुबह लता और मधु ने इतना जिद किया की मै ना चाहते हुए भी मेले में जाने के लिए मजबूर हो गई.


हम तीनो ही मेला घूमने मे मसरूफ से हो गए. हालांकि मुझे ज्यादा रुचि तो नहीं थी, लेकिन फिर भी मै उनकी खुशी के लिए मेला घूम रही थी. मेले का लुफ्त उठाते हम उस ओर से भी गुजरे जहां इस वक्त बलून फोड़ने की प्रतियोगिता भी अपने आखरी दौड़ में चल रहा था...


प्रतियोगिता कुछ ऐसी थी कि 5 प्रतियोगी 5 फिट की दूरी पर खड़े थे. हर प्रतियोगी के लिए 20 बुलेट और 20 बलून थे. हर किसी के बलून का रंग अलग-अलग था. बलून मे गैस भरकर बलून को हवा में उड़ाया जाता और 10 सेकंड के बाद हर प्रतियोगी अपने अपने बलून पर निशाना लगाता.. एक बार बुलेट खत्म उसके बाद काउंटिंग होती की किसने कितने बलून फोड़े..


शायद आखरी चरण के पहले 5 प्रतियोगी का फैसला हो चुका था, इसलिए मनीष भैया और भाभी मे वहीं पर तीखी बहस चल रही थी. वो दोनो खुद को ही विजेता घोषित किए जा रहे थे और दोनो के समर्थक अपने-अपने प्रिय निशानची का समर्थन कर रहे थे..


तभी वहां लता और मधु पहुंच गई. वो दोनो तो रवि का ही सपोर्ट करने लगी. उन दोनों को देखकर रूपा भाभी कहने लगी... "मेनका की सहेली होकर रवि को सपोर्ट कर रही. एक लड़की दूसरी लड़की को ही सपोर्ट करे तो ज्यादा अच्छा है, इससे नारी शक्ति बढ़ती है."..


मधु:- भाभी रवि हमारे साथ पढ़ता है. बलून फोड़ने के लिए एक दुकान आरक्षित कर दिया, हम तो इसे ही सपोर्ट करेंगे, क्यों मेनका तुम क्या कहती हो..


मै:- मै तो नरेंद्र जीजू (अमृता का पति) के समर्थन में हूं.. हवा में अब तक 6 बलून फोड़ चुके है.. और मुझे लगता है वो ही सबसे आगे रहने वाले है... जीजू कम से कम 15 बलून तो फोड़कर ही आना..


जैसे ही मैंने ये बात कही, पुष्पा और अमृता दीदी दोनो ही हूटिंग करती हुई चिल्लाने लगी... "मेनका रूपा भाभी के समर्थन में आ जाओ, घर से दुश्मनी अच्छी नहीं"..


मै:- हट नहीं करती मै छोटी भाभी का समर्थन, जिसे जो दुश्मनी निकालनी है निकाल लो… वो देखो 10 बलून फोड़ डाले जीजू ने.. तीनो मशहूर निशानची, रूपा मिश्रा, मनीष मिश्रा और रवि अग्रवाल के बराबर पहुंच गए जीजू.. कम ऑन जीजू कम से कम 15 बलून फोड़कर ही दम लेना.. अभी ही डिफरेंस बाना लो..



मेरी हूटिंग सुनकर गांव की भाभी जो रूपा भाभी के समर्थन में थी, उन्होंने मजबूत प्रतिद्वंदी का ध्यान भटकाने के लिए फिर जो ही कमेंट्री की... "गोली लोड हो गई, आंख नली पर और हवा में बहन का बलून लहराते दिख रहा".. "अरे दीदी बहन ही क्यों किसी साली का बलून भी तो हो सकता है"..… "दीदी बड़ा बलून है दिमाग में सलहज का ही बलून होगा... लगा निशाना जमाई बाबू और लगाओ दम"…. फिर सब एक साथ जोड़ से चिल्लाते... "और ये गया किसी बेचारी का बलून"…


अब जब 8-10 आवाज पीछे से ऐसे हूटिंग करे, तो कहां से कोई कन्सन्ट्रेट कर पाए.. एक बात तो थी, रूपा भाभी ने अपने बहुत से समर्थक जरूर बना लिए थे. ऐसे नहीं तो वैसे लेकिन कैसे भी करके वो जीत ही जाएगी, ऐसा सबको लगता था. लेकिन नरेंद्र भी ध्यान वाला आदमी था. इतना ध्यान भटकाने के बाद भी फाइनल स्कोर उनका 12 रहा, जो की अब तक का सबसे अव्वल स्कोर था, बाकी 10 बलून के साथ रूपा भाभी, मनीष भैया और रवि तीनो टाय पर चल रहे थे...


फाइनल 4 लोगो के बीच होना था.. हालांकि फाइनल फर्स्ट और सेकंड के बीच होता है, लेकिन इस बार सेकंड पोजिशन पर 3 लोगों के बीच टाय था. फाइनल अब मंगलवार को खेला जाना था और इसी के साथ वहां की भिड़ भी समाप्त हो गई. लता और मधु की मुलाकात मैंने पुष्पा और अमृता दीदी से करवाई.


पुष्पा और अमृता दीदी, दोनो ही मुझे डांटती हुई कहने लगी, मेनका हर परिस्थिति में बहन को सपोर्ट किया कर, वरना अच्छा नहीं होगा.. उनकी बात सुनकर सभी हसने लगे. जितनी भी गांव की कुंवारी बहने थी, सबने उन दोनों को आड़े हाथ लेते हुए सुना दिया कि.… "बहनों की मेजोरिटी को आप को भी सपोर्ट करना चाहिए और हम सब जीजू के समर्थन में है, आपने मेजोरिटी छोड़ा तो आपके लिए अच्छा नहीं होगा"..

impressed yaar.... kahi fan na ban jau roopa bhabhi ki.... sach mein Kamal ki kirdaar hai.. jeet kaise hasil ki jaati hai koi unse sikhe.. bolo roopa bhabhi ki jay :bow:
are re menka jaling apni hi PUSPA didi SE :D... kya jamana aa gaya hai..ek bahan dusri bahan se jale.. are ushe bhi maja lene do :D kya pata kal ko PUSPA ka pati cuckold ban jaye :rolrun: aur PUSPA uske samne hi ravi sang kabaddi khele :rolrun: taak jhank karne wali menka ko bhi kuch naya dikhane ko mil jaye woh bhi chori chupke :D
hmm... Kya baat hai.. so tharakpan mein master degree le chuki Prachi bhi gaon mein :D
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श्रावण मेला ।। भाग:- 14


किसी तरह हांथो से पूरा जोड़ देकर अमृता, रवि को खुद से दूर की और खांसती हुई अपनी श्वांस सामान्य करने में जुट गई... लेकिन इस से पहले की वो रवि से कुछ कहती, रवि अमृता के एक पाऊं को टेबल पर रखकर नीचे घुटनों पर आ गया और पैंटी के ऊपर से ही पुरा मुंह खोलकर चूत को मुंह में भर लिया.. अमृता को ना तो वो ठीक से श्वास सामान्य करने दिया और ना ही ठीक से संभलने का मौका...


जैसे से ही रवि के दांत हौले हौले चूत को कटने लगे, अमृता पुरी तरह से छटपटा गई. रवि के सर को पकड़ कर वो किसी तरह खुद को बैलेंस की, वरना वो गिरते गिरते बची… रवि अब आराम से पैंटी को जांघो तक खिसका दिया और खुली चूत में अपना पूरा मुंह घुसाकर, अपने उंगलियों को दरार में चलाने लगा..


दरार में उंगली के स्पर्श मात्र से ही अमृता पूरी तरह बेचैन हो गई... "उफ्फ रविईई, क्यों.. आह्हहहहहहहह... पागल बनाए हो... प्लीज मुझसे खड़ा नहीं रहा जा रहा... उफ्फफफफफ, रवि अब खत्म भी करो ये खेल"…


रवि हंसते हुए अपना मुंह उसके चूत से निकला और शरारत मे कहने लगा... "बस इतनी जल्दी हार मान गई"..… "भोंसरीवाले, लंड की जगह मुंह और हाथ से जान निकाल रहे हो, तेरा लंड क्या आधा घंटा टिकेगा मेरे सामने"… "हिहिही.. तभी तो आधे घंटे से मुंह और हाथ से मज़े दे रहा, ताकि कोई शिकायत का मौका ना रहे"… "पागल कहीं के.. पता होता ऐसा होने वाला है तो खुद से मेहनत करके नहीं आती.. अब बस भी करो तरपाना रवि, डालकर अब पुरा मज़ा भी दे ही दो"..


जैसा तुम कहो अमृता... कहते हुए रवि ने उसे एक चादर के ऊपर लिटाया और दोनो पाऊं को 90⁰ के समान ऊपर करके बीच से चूत में पुरा लंड एक बार मे ही घुसा दिया. दोनो पाऊं जुड़े होने के कारन चूत की कसावट लंड पर मेहसूस करके रवि पागलों की तरह धक्के मारने लगा... "अमृता, तुम्हारी चूत के साथ मज़ा आ गया.. याआआआआ"..

"ऊम्ममममममममम, रवि कमाल का चोदते हो तुम.... उफ्फफफफफ, मै.. मै.. पागल हुई जा रही हूं... आह्हहहहहहहहहहहह और कसके मेरे राजा.. पुरा जर तक पेल दो... आह्हहहहहहहहहहहहहह"…. मादक आवाज सुनकर रवि और भी जोश में आ गया... दोनो पाऊं को अब उसने नीचे जमीन पर डालकर चूत के बीच आ गया और अपने लंड को पूरे जोश के साथ चूत में पेलते हुए उसके दोनो चूची को मुट्ठी मै दबोचकर घपाघप धक्के मारने लगा... अमृता बिल्कुल दूधिया बदन पसीने से चमक रहा था और ऐसे गदराए गोरे बदन की मालकिन को चोदकर रवि पुरा निहाल हुआ जा रहा था.. उसे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था कि इतने आकर्षक गोरे बदन की मलिक्काओं को वो अपने नीचे लिए है..


रवि पूरे जोश के साथ चूची दबा दबाकर धक्के मारने लगता है.. ऊपर चूची पर हाथ के कसावट का दर्द और नीचे चूत के अंदर जोश भरी पेलाई से अमृता तुरंत ही चरम पर पहुंच जाती है और तेज तेज सिसकारियों के साथ उसका पूरा बदन निढल पड़ जाता है... अमृता के चूत से तो रस वर्षा हो गई किन्तु रवि अब भी उसी स्पीड से धक्के लगा रहा था..


अमृता, रवि के जांघ पर अपने हाथ मारती... रवि रुको, रुको रुको... अांहहहहहहहहह, क्या हुआ रोक क्यों दी".. रवि के चेहरे से उसका चिड़चिड़ापन साफ झलक रहा था. अमृता मुस्कुराती हुई बैठ गई और आंखो के इशारे से उसे खड़ा होने कहने लगी... रवि झुंझलाते हुए खड़ा हो गया.. अमृता उसकी हालत पर खिलखिलाती हुई हसने लगती है... "बस भी करो ऐसे खी खी खी करके हंसना, अब भुल ही जाओ की आज के बाद हमारे बीच कुछ होगा".. "सॉरी बाबा, तुम गुस्सा मत करो. 4 बार मै झाड़ गई हूं, अब हिम्मत ही नहीं बची. नाराज नहीं हो मै तुम्हारा पानी निकलकर गुस्सा शांत किए देती हूं, और अगली बार पहले से तैयार होकर नहीं आऊंगी.. प्रोमिस"..


रवि फिर भी गुस्से में इधर उधर देखता रहा. अमृता, रवि के अकड़े हुए जोशीले लंड की मुट्ठी में दबोचती... "साले तेरे कारण मेरा रवि नाराज है, पहले तुझे ट्रीटमेंट देती हूं फिर इस रवि को" ..


अमृता पुरा लंड मुंह में लेकर चूसती हुई एक हाथ से उसके गोटियों को सहलाने लगी और दूसरे हाथ की मिडिल फिंगर को दरार मे चलाने लगती है. उसके गान्ड के छेद के चारो ओर घुमाने लगी. अमृता के इस जानलेवा एक्शन से रवि अभी संभला ही नहीं था कि अमृता ने अपनी बीच की उंगली छेद के चारो ओर चलाती गप से अंदर डालकर लंड को जोर जोर से चूसने लगी... रवि तो बिल्कुल हवा में ही तैर गया और 2-3 झटको के बाद अपना पूरा पानी अमृता के मुंह में छोड़कर हाफ़ने लगा..


2 मिनट बाद.. रवि अमृता के चूची के साथ खेलते... "तुम तो पत्थर से भी पानी निकाल दोगी"..


अमृता, रवि को अपने ऊपर से उठाकर, अपने कपड़े पहनती... "और तुम तो किसी रण्डी को भी कहने पर मजबूर कर दो की बस रवि मेरा हो गया"


रवि:- लेकिन मै किसी ऐसी लड़कियों या औरतों के पास नहीं जाता.. जिंदगी में पहली बार मैंने ये सब पुष्पा के साथ ही किया था.. दूसरी बार भी उसी के साथ, तीसरी बार भी उसी के साथ और चौथी बार तुम्हारे साथ..


अमृता, रवि के गाल को पकड़कर उसके होंठ को चूमती... "तुम तो हम दोनों सहेलियों की जान बन गए हो, जिंदगी जीने का नया अनुभव मिल रहा है.. तुम भी मज़े लो, और क्या...


रवि:- लेकिन चोरी तो चोरी होती है अमृता, और तुमने भी तो कई किससे सुने है इस गांव के... थोड़े से मज़े के लिए अपना घर ना तोड़ लेना..


अमृता अपने बाल संवारती... "अच्छा लगा तुम्हे ये सब चिंता है... बस जब तक हम यहां है तभी तक तो ये चलेगा और वैसे भी तुम भी तो जॉब करने के लिए बाहर जा रहे हो.. फिर तो मौका तभी मिलेगा जब तुम गांव में रहोगे... यूं समझ लो जॉब पर जाने से पहले तुम्हे औरत का सुख दे रहे, ताकि वहां जाकर खूब पैसे कमाना और भटकना मत.. और जब कभी जोश जागे तो एक दिन पहले फोन कर देना, हम दोनों मे से कोई ना कोई तो खाली मिल ही जाएगी.. किसी रण्डी के पास जाकर अपनी जिंदगी मत खराब कर लेना...


रवि:- तुम्हारी बातें सुनकर मेरा तो दोबारा खड़ा होने लगा.. 2 अप्सराएं ऐसे मेरे इंतजार में..


रवि की बात सुनकर अमृता भागती हुई कहने लगी... "आज के लिए माफ करो इतना रगड़कर ठोका है कि अब तो 3-4 घंटे मस्त नींद के बिना बदन दर्द नहीं जाएगा"…


रवि के दूसरे राउंड सेक्स के बारे में सुनकर अमृता ऐसे घबराई की वो भींगती हुई ही उसके गोदाम से निकलकर मंदिर के ओर भागी, और यही वो वक्त था जब लता और मधु ने उसे निकलते हुए देखा था.…


अभी का वक्त... मेले में मेनका, मधु और लता...



मै लता और मधु की बात सुनकर फीकी मुस्कान चेहरे पर लाती हुई कहने लगी... "लोगो कि अपनी-अपनी जिंदगी और अपने-अपने जीने के तरीके, तुम दोनो का सोचना सही भी हो सकता है या फिर परिस्थितियों के कारण उपजे हालात भी. बात जो भी हो लेकिन हम तो किसी के निजी जिंदगी में दखलंदाजी तो नहीं दे सकती"..


मेरी बात सुनकर लता और मधु भी हां मे हां मिला दी. हम तीनो ही एक चाय समोसे की दुकान में अल्पाहार लेकर वापस से घूमने लगे. घूमते-घूमते हम मेले के सबसे आखरी मे आ गए जहां अचानक ही ना जाने कहां से 20-25 लड़के पहुंच गए.


लता और मधु को वो लोग ऐसे कवर किए की वो पीछे रह गई और मेरी ओर ऐसे बढ़ रहे थे कि मै पीछे हटते-हटते मेले से अलग हो गई. अंदर डर तो मेहसूस हो रहा था, लेकिन बाहर से मै जाहिर नहीं होने दे रही थी. वो सब एक-एक कदम आगे बढ़ा रहे थे और मै धीरे-धीरे पीछे हट रही थी. तभी पीछे से मेरा बदन किसी के पीठ से टकराया और जैसे ही मुड़कर देखी, पीछे विधायक का बेटा फैजान खड़ा था.


मै तुरंत उसके पीछे हटी और घुरकर देखती हुई कहने लगी... "लगता है मेरे पिताजी ने तुम्हारे बाप को थोड़े कम मे छोड़ दिया, इसलिए तेरी हिम्मत इतनी बढ़ गई है"..


फैजान:- ये हिम्मत तो हमारे खून की है और तेरे बाप ने जितना मेरे बाप को बेइज्जत किया है, उसका बदला तो बनता है ना.. वो क्या है ना, जैसे तेरे बाप ने मेरे बाप को वार्निग दी है कि मै उसके इलाके मै दिख गया तो वो मुझे मारकर फिकवा देंगे, वैसे ही एक छोटी सी वार्निग मै भी तुम्हे देते चलता हूं. अगली बार जहां भी मुझे तू दिख गई, तुझे वहीं रगड़ दूंगा... दिल तो तुझ पर वैसे भी पहले से आया है, बस अपने दोस्तो को दिखाने आया था कि कौन सी गरम लौंडिया मैंने उनके लिए सेलेक्ट की है...


मै:- एक बाप की औलाद है ना तो अगले रविवार को बाजार के चौक पर आ जाना.. समय सुबह के 10 बजे... मै वहां लगभग घंटे भर रुकूंगी... जो कहा है करके बात देना.. चल अभी रास्ता छोड़ गीदड़.. 20 लड़का लेकर आया है एक लड़की को डराने.. तेरी औकात तो इसी से समझ में आ गई फट्टू और खुद को कहता है हिम्मत तेरे खून मे है.. जाकर ब्लड टेस्ट करवा ले रिपोर्ट मे यही आएगा.. इस प्रकार के डीएनए वाले लोग डरपोक प्रवृति के होते है जिनकी औकाद इतनी होती है कि, जब कहीं कमजोर पड़ गए तो अपनी मां-बहन को आगे करके, पीछे उसके आंचल में छिप जाते है. बाद में फिर उसी मां-बहन को 20 घर भेजकर अपने लोगों को जमा करवाते है. जब 20-30 लोग जमा हो जाते है तब अपनी वीरता का सबूत देने आते है... भाग जा जल्दी से वरना लोग जब अभी जमा होना शुरू होंगे, तो ऐसा मरेंगे की शरीर से मांस अलग और हड्डी अलग हो जाएगा, गीदड़..


मै उन लड़को के बीचोबीच से निकलती हुई अपनी बात कहते हुए आगे बढ़ रही थी और मेले के ओर चली आ रही थी. जैसा मैंने कहा था ठीक वैसा ही हो गया. मै इधर निकली ही थी कि उधर से रवि पुरा मेला प्रबंधन को लेकर पहुंच गया. सभी लड़के चारो ओर से घिरे हुए थे... तभी मेरे गांव के मुखिया चाचा मुझे रोकते हुए पूछने लगे... "मेनका ये कुत्ते का बच्चा क्या कह रहा था.....


मुखिया चाचा ने जैसे ही ये बात पूछी, उनके बेटे वरुण ने एक जोरदार थप्पड़ फैजान के गाल पर चिपका दिया.… "अरे वरुण भैया मरो मत इन चूजों को. मुझसे कह रहा था कि तेरे बाप ने मेरे बाप की बहुत बेइज्जती की है, अगली बार कहीं दिखना मत वरना कहीं मुंह दिखने के काबिल नहीं रहेगी. मैंने भी कह दिया है, एक बाप की औलाद हो तो अगले रविवार को बाजार आ जाने. मै वहां 1 घंटे रुककर राशन की खरीदारी करूंगी"..


मुखिया चाचा:- क्या बात है बेटा, क्या बात कही है.. तू जा मेला घूम आज तो इसकी हिम्मत के लिए इसको कुछ पुरस्कार दे दिया जाए.....


मुखिया चाचा ने सीआरपीएफ वालो को बुलाकर पुरा मामला समझा दिया. रात को उड़ती हुई खबर पहुंची की सभी लड़को की इतनी पिटाई की सीआरपीएफ वालो ने कि अगले 10 दिन तक हॉस्पिटल में ही रहने वाले है... वैसे रात को ये बात भी मुझे तब पता चली, जब रूपा भाभी मुझे शाबाशी दे रही थी...


उधर पता नहीं कैसे ये खबर नकुल तक पहुंची.. बुधवार को उसका पॉलीहाउस ट्रेनिंग खत्म हो रहा था और बुधवार को ही वो वापस आने वाला था और रविवार तक रुककर सोमवार को सर्वे के लिए निकलता... इधर मेला तो समाप्त हो रहा था, लेकिन पूरे गांव में एक ही हॉट टॉपिक छाया हुआ था.. वो था रविवार वाला मेरा चैलेंज.. जिसे विधायक असगर आलम का बेटा फैजान तो अब पुरा नहीं कर सकता था, लेकिन उसे पुरा करने का बीड़ा फैजान के 3 बड़े भाइयों ने उठाया था...
Yeh ravi ka bachha aur pushpa aur amrita milke gaon mein naya itihas rachenge woh bhi kamasutra ka :D
wah menka toh kaafi himmat wali nikli...
dekhiye writer sahab ab toh challenge bhi de di hai us badjat ko... toh agle update uski maut final kijiye.. kam se kam ek kirdaar ki toh maut ho... akhir thriller story likh rahe hai, koi mazak nahi :D
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अध्याय 10 :: भाग:- 1


मंगलवार को श्रावण मेला भी समाप्त हो गया. नरेंद्र जी इस बार गांव के निशानची बने और उपविजेता रूपा भाभी. फिर भी फाइनल के दिन सभी भाभी ने मिलकर जो ही हूटिंग की थी, नरेंद्र के कानो से लगभग खून निकाल चुकी थी. फिर भी किसी तरह वो ये प्रतियोगिता जितने मे कामयाब रहे.


मेले का आकर्षण ऑर्केस्ट्रा इस बार भी धांसू ही रहा, उसपर से रसियन बाला ने उसपर क्या चार चांद लगाया था, हर बूढ़ा झूम-झूम कर नाच रहा था.


सावन पूर्णिमा, सावन का आखरी दिन. राखी के त्योहार वाला दिन. सुबह उठकर मै सबसे पहले साक्षी और केशव (मेरे बड़े भैया महेश के दोनो बच्चे) के कमरे में ही गई. दोनो गहरी नींद में थे. मै उनके सिरहाने बैठकर दोनो के सर पर हाथ फेरने लगी.


जैसे ही मैंने साक्षी के सर पर हाथ फेरा, उसने अपनी आंखे खोल ली, और मुझे देखकर नकियाना शुरू कर दी... "अरे, अरे, अरे.. क्या हो गया मेरी नन्ही लाडली को, ऐसे सुबह सुबह रोना"..


साक्षी:- दीदी सोने दो ना..


मै:- हां तो मै कौन सा तुझे जगाने आयी हूं, मै तो बस देखने आयी थी...


साक्षी:- लेकिन मै तो जाग गई ना, अब छोड़ो उसे. दीदी आज सहर ले चलो ना घूमने..


मै:- इतने दिन मेला घूमी सो नहीं हुआ, कुछ दिन रुक जा फिर चलेंगे.. वैसे भी आज तो राखी का त्योहार है ना, तू केशव, कुणाल और किशोर को राखी नहीं बांधेगी…


साक्षी:- सब बेईमान है.. आपको तो ढेर सारे गिफ्ट मिलेंगे, पैसा मिलेगा, मुझे क्या मिलेगा...


मै:- पागल तेरे लिए भी ढेर सारा गिफ्ट ली हूं, और मेरा जो-जो गिफ्ट तुझे पसंद आए ले लेना.. अब खुश..


साक्षी चहकती हुई मुझसे लिपटकर... "मै तो आपका सारा सामान ले लूंगी"..


मै:- हां ठीक है तू ले लेना.. चल पहले मै तुझे तैयार कर देती हूं.. फिर मै तैयार हो जाऊंगी... वैसे भी तेरे लिए बहुत सारी चीज़ें मंगवाई है, तू देखेगी नहीं..


साक्षी:- सच्ची मे दीदी.. चलो ना दिखाओ मुझे..


मै, साक्षी की उत्सुकता समझ सकती थी. उसे मै अपने साथ लेकर अपने कमरे में ले आयी. पहले तो स्नान करवाया, फिर खुद ही उसे कपड़े पहनाने लगी. मै चाहती थी आज बुआ और भतीजी एक जैसे दिखे, इसलिए मै बिल्कुल एक जैसा नया ड्रेस लेकर आयी थी..


लाइट ग्रीन कलर का प्रिंटेड गाउन, जिसका नीचे का घेरा काफी लंबा था और दिखने में काफी खूबसूरत. जब मै साक्षी को ये नया ड्रेस पहना रही थी, तब उसके चेहरे की खुशी देखते बनती थी. कपड़े पहनाने के बाद फिर मैंने उसके बाल बनाए. उसके दोनो हाथ में लाल रंग की चूड़ियां डाली. हल्का मेकअप किया. कान, नाक और गले में जेवर पहनाकर जब मै उसे एक झलक ऊपर से नीचे देखी, तो बस देखती रह गई.. बड़ी प्यारी लग रही थी...


तैयार करने के बाद मै उसकी एक फोटो लेकर बड़ी भाभी के पास ले जाने के लिए जैसे ही अपने कमरे का दरवाजा खोला, उधर से मुख्य द्वार का भी दरवाजा खुल गया और सामने मेरे बड़े मामा, साथ में रूपाली दीदी और उनके साथ मेरे दोनो ममेरे भाई अमित और सुमित थे..


तीनों ही मुझसे बड़े थे, जिसमे से रूपाली दीदी कि शादी कुछ दिन पहले ही तय हुई थी, उससे ज्यादा पता नहीं और दोनो ममेरे भाई की शादी हो चुकी थी.. लेकिन दोनो भाभी अपने बच्चो के साथ मायके गई थी, इसलिए उनका आना नहीं हो पाया था.. हम सबने लगभग एक ही वक्त पर दरवाजा खोला था…


उन लोगो के आखों के सामने पूर्ण रूप से तैयार साक्षी थी, जिसे देखकर रूपाली दीदी भागी-भागी उसके पास आयी और साक्षी को अपने गोद में उठाकर... "अरे बाप रे, ये मेनका की लाडली इतनी बन संवर कर कहां निकली है"


साक्षी:- रूपाली बुआ मै आपसे बात नहीं करूंगी. आपने मुझे ठगा था..


रूपाली अपनी आखें बड़ी करती... "मैंने तुझे कब ठग लिया.. या तू अपने मन से सब कह रही है"…


इधर जबतक घर के सभी सदस्य बाहर निकालकर आपस में सब मेल मिलाप में लगे हुए थे. साक्षी, रूपाली की बातो का जवाब देती... "दीदी, रूपाली बुआ ने फोन पर कहा था ना कि वो होली में आएगी और हम दोनों के साथ पिकनिक पर भी जाएंगी"…


रूपाली:- अरे यार मेनका ये सोभा भाभी ने क्या खाकर इसे पैदा किया, कुछ भी भूलती नहीं है क्या ये?


मै:- दीदी, साक्षी के दिमाग का सिस्टम पुरा अपग्रेडेड है.. कुछ भी इससे आप प्रोमिस कीजिए, तुरंत अपने दिमाग में डाउनलोड करके सेव कर लेती है.. बड़ी खतरनाक चीज है...


हम दोनों जबतक बात कर रहे थे, तबतक हर किसी का ध्यान साक्षी पर जा चुका था और हर कोई उसे अपने गोद में लेकर प्यार कर रहा था. मै और रूपाली दीदी मेरे कमरे में आ गए. लगभग साल भर बाद दोनो बहने मिल रही थी, हालांकि रूपा भाभी वाले कांड मे रूपाली दीदी आयी तो थी, लेकिन फुरसत से बात नहीं हो पाई थी...


मै:- क्या बात है रूपाली दीदी आप तो आजकल फोन करना भी भुल गई..


रूपाली:- बदमाश तो तू ही कहां फोन कर लेती थी..


मै:- मुंह मत खुलवाओ मेरा, एक दो दिन छोड़कर सबसे बातें हो ही जाती है, बस आपसे ही बात नहीं हो पाती.. मुझे भी पता है मिस रूपाली आजकल कहां फोन से चिपकी रहती है...


मेरी बातो पर रूपाली दीदी केवल हंस दी और बात बदलती हुई कहने लगी... "जल्दी तैयार होकर बाहर आ जा, सबको राखी बांधकर हम शॉपिंग करने चलेंगे"..


मै:- हमदोनो अकेले, या सपरिवार..


रूपाली दीदी समझ गई मै किस ओर इशारा कर रही थी, मेरे सर पर एक हाथ मारती... "तू सुबह-सुबह मुझे ही छेड़ रही है. जो बोला वो जल्दी कर"..


is skhashi ne toh ishq risk ki aarshi ki yaad dila di.. bilkul uski hi tarah smart talented aur natkhat par badi cute.. kya baat hai kuch lena ho toh ya koi gift ya promise khub yaad rakhti hai yeh chutki rani.. hai badi sayani..

रूपाली दीदी को देखकर मै हंसती हुई बाथरूम में घुस गई. फटाफट नहाकर, मै भी बाथरूम से निकली और तैयार होने लगी. मै और साक्षी लगभग एक जैसे तैयार हुए थे. मै जैसे ही बाहर निकली सब लोग मुझे ही देखने लगे...


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साक्षी भागकर मेरे पास खड़ी हो गई और उत्साह से कहने लगी... "आज मै और दीदी सेम-सेम तैयार हुए है." क्या वाकई में मै इतनी सुंदर दिख रही थी कि मां मुझे देखकर काला टिका लगाने पहुंच गई... फिर तो लोगों ने भी ऐसे-ऐसे कमेंट किए की मै सर नीचे करके शर्माए जा रही थी...


रूपाली दीदी तो मानो बिल्कुल मुझसे इंप्रेस ही हो गई. वो मुझे अकेले कमरे में ले जाकर पूछने लगी कि कहीं किसी लड़के के लिए तो मै तैयार नहीं हुई. मै भी हंसती हुई कहने लगी, एक नहीं कई लड़को के लिए तैयार हुई हूं. मै आज अपने भाइयों के लिए तैयार हुई हूं. हम दोनों ही हसने लगे...

is photo ko dekh KASAK ji aap kya kehna chahegi.. reply plz
Kasak = hai my creator nain11ster ji pehle yeh decide kariye ki akhir menka amulya gowda tarah dikhti hai ki anupama parameswaran ki tarah :D
aur haan, wo anupama jab hansti hai lage ki uske hoth naak aapas mein chipak gaye ho like favicol ki tarah :laughing: kya menka ke bhi aise hi chipak jate hai... favicol ki tarah :lol:
(Btw nain ji mujh pe aap naraz na hona.. kyunki yeh sawal main nahi, balki aapki hi creation kasak puch rahi hai ;))

स्लीवलेस रेड कलर की गाउन, जो पेट से लेकर सीने तक ऐसा फिट था कि बदन का हर कर्व दिखा रही थी, ऊपर से कपड़े का वी गला, जो हल्की गहरी थी, जिसमे हल्की क्लीवेज लाइनिंग दिख रही थी. ऊपर से अगर अपना वो लाल रंग का फैंसी दुपट्टा नहीं डालती तो शायद कहीं उन्हे कपड़े ना बदलने पड़ जाते..

kya baat hai, .. apni hi bahan ke curves ke bade mein readers ko bata rahi hai.. sab thik toh hai na . ab to mujhe ispar hi doubt ho rahi hai

लगभग 10 बजे तक हम दोनों घर के सभी सदस्य को राखी बांधकर फुरसत हो गए थे. तभी रूपाली दीदी मुंह बनाती हुई आकर मेरे पास बैठ गई... "मेनका तू अपने खानदान वालों को जल्दी से राखी बांधकर आ ना"…


मै:- लेकिन मै क्यों जाऊं किसी के पास, बस यहां नकुल का ना होना अखर गया, बाकी जिसे राखी बंधवाने है उन्हे खुद ही होश नहीं... आधे घंटे और राह देखूंगी, फिर चल दूंगी आपके साथ शॉपिंग करने..


मै रूपाली दीदी से बात कर ही रही थी कि तीसरे घर के तीनो भैया पहुंच गए. वही बबलू भैया के घर के लोग थे, जिन्होंने मुझे गाड़ी चलाना सिखाया था. बबलू भैया आते ही मुझे देखते हुए कहने लगे.… "तू किसी से डर जाती तो हमारा अभिमान डर जाता, बहुत ही सधा हुआ जवाब दिया है, अब यहां से तुझे कुछ चिंता करने की जरूरत नहीं है, हम सब देख लेंगे"…


मै, बबलू भैया की आरती उतारकर राखी बांधने के बाद... "जिसके इतने सारे चाहने वाले भाई हो, उसे चिंता करने या किसी से डरने की जरूरत है क्या? वैसे भाभी की डिलीवरी कब है"..


बबलू:- अगले ही महीने है..


बाकी के दोनो भाई बबलू भैया से छोटे थे और बाहर रहकर पढ़ाई करते थे. मैंने ही उन्हे फोन करके कहा था राखी तक आ जाने. वो दोनो भी पहुंचे हुए थे. चौथे और पांचवां घर से कोई नहीं आया था अबतक. हालांकि इस बात को सभी नोटिस कर रहे थे कि जबसे मेरे और फैजान के बीच का केस हुआ था, नीलेश और नंदू का परिवार हमसे कटा हुआ था.


खैर मै 10.30 बजे तक इंतजार करने कर बाद... "मै फ्री हो गई रूपाली दीदी, बताओ कहां चलोगी बिजली गिराने"..


मेरी बात सुनकर रूपाली दीदी दबी सी हंसी निकाली और झूठा गुस्सा दिखती हुई मुझे डांटने लगी. रूपाली दीदी नौकतांकीबाज थी तो मै क्या उनसे कम थी. उन्होंने तो यह बात गोल कर दिया कि उन्हें अपने होनेवाले से मिलने सहर जाना है लेकिन वो ये भुल गई की उन्हे मेरे साथ ही जाना था..


फिर दौर शुरू हुआ मस्का पॉलिश का. मै भाव खा रही थी और रूपाली दीदी मुझे सहर चलने के लिए मना रही थी. उनके मिन्नत करना इतना मज़ेदार था कि मै हंसती हुई कहने लगी… "दीदी, मुझसे बैर करके घाटा करवा ली ना, जिस डाल पर बैठते है उसे नहीं काटा करते"..


फिर दौर शुरू हुआ मस्का पॉलिश का. मै भाव खा रही थी और रूपाली दीदी मुझे सहर चलने के लिए मना रही थी. उनके मिन्नत करना इतना मज़ेदार था कि मै हंसती हुई कहने लगी… "दीदी, मुझसे बैर करके घाटा करवा ली ना, जिस डाल पर बैठते है उसे नहीं काटा करते"..


रूपाली:- मेरी प्यारी बहना, चल तुझे आज मै कान कि बालियां दिलाऊंगी. बस थोड़ा संभल ले..


मै रूपाली दीदी के गले लगती... "वाउ दीदी, सच मे मुझे दिलाने वाली हो या फेक रही हो"..


रूपाली दीदी:- पहले से प्लान है ये तो..


मै:- ओह हो तो अमित और सुमित (मेरे ममेरे भाई के नाम) भैया से मिलने वाला गिफ्ट अपने खाते में डाल रही हो. दीदी बहुत चालू चीज हो आप..


रूपाली:- तो तू कौन सी सीधी है मेनका. ब्लैकमेलर, ठीक है तेरे होने वाले जीजाजी से तुझे एक अच्छी सी ड्रेस दिलवा दूंगी.. अब तो हंस दे बहन..


हम दोनों ही हसने लगे. सुबह साक्षी भी सहर घूमाने बोली थी, सोची केशव और साक्षी भी इसी बहाने घूमकर ले आऊंगी. जाने से पहले मै महेश भैया और मनीष भैया से मिल ली, ताकि रूपाली दीदी को कुछ देना हो तो, मै वहां से खरीद लूं. जब मै उनसे मिलने गई तो सोभा भाभी ने कहा, छोटे छोटे गिफ्ट पर पैसे खर्च ना करे, बल्कि दोनो भाई पैसे मिलाकर कोई जेवर दे दे तो काम भी आ जाएगा...


बड़ी भाभी का प्रस्ताव सबको अच्छा लगा. मनीष भैया ने मां से ये बात कही तो मां ने भी हामी भरते हुए उनके लिए कोई जेवर लेने ही बोल दी. पापा ने मुझे अपने ही खाते से दिलाने देने बोल दी, बाद में वो मुझे वापस कर देते. कुछ देर की मीटिंग के बाद मै और रूपाली दीदी, साक्षी और केशव के साथ सहर के ओर चल दिए.


मै जब गांव के बाजार से कुछ दूर आगे पहुंची, तब मुझे कुछ संका सा हुआ और मैंने कार को पेट्रोल पंप के बगल से मंदिर वाले रास्ते पर ले लिया. मेरा शक सही निकला. 2 कार निश्चित दूरी बनाकर हमारे पीछे आ रही थी. अगला मोड़ काटकर मै कार कोने में लगाकर पीछा कर रही कार के आने का इंतजार करने लगी..
Dono bahne nikli shopping ko aur ghumne par yeh piche koun para hai ab.. kahi us fejan bejan ke logis to nahi..
ya phir koi aur hai joh maybe as a security unke piche piche aa rahe ho woh bhi unko bina bataye...
Khair... Par joh bhi nishane baazi mein jeet roopa bhabhi ki honi chahiye thi... :dwarf:
Khair let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill :applause: :applause:
 
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Naina

Nain11ster creation... a monter in me
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अध्याय 10 :: भाग:- 2





जैसे ही गाड़ी मोड़ पर पहुंची, मै हाथ देकर स्कॉर्पियो को रुकवाई... जैसे ही आगे से एक हथियारबंद आदमी उतरा... "क्यों कपिल भईया, राजवीर अंकल ने कहा है मेरे पीछे रहने"…


कपिल, राजवीर अंकल का मैनेजर था, जो हर वक्त उनके साथ रहता था. मै रेयर व्यू से जब 2 काली स्कॉर्पियो को दूर से पीछा करते देखी, तभी समझ गई कि ये राजवीर अंकल के लोग है. कपिल हंसते हुए... "बाबूजी बोले थे कि मेरी ये बिटिया बहुत होशियार है, उसे प्रोटेक्शन कि जरूरत तो नहीं, लेकिन माहौल को अनदेखा भी नहीं कर सकते"..


मै:- इसलिए तो मै भी चारो ओर नजर डालकर सड़क पर चल रही थी..


कपिल:- देखकर अच्छा लगा कि किसी से जब दुश्मनी चल रही होती है तो तुम चौकन्ना रहती हो, लेकिन आगे जाकर किसी ने रॉड ब्लॉक कर दिया तो..


मै:- कपिल भैया एक लाइसेंसी हमेशा इस कार में रहती है.. इतना वक्त तक तो लोगो को रोका ही जा सकता है, जितने वक्त तक मे मदद आ जाए..


कपिल:- क्या बात है मेनका... मै बाबूजी से तुम्हारे ट्रेनिंग की बात करूंगा.. तुम तो लेडी डॉन बनकर यहां के पॉलिटिक्स में हिस्सा लेकर, सबको हिला सकती हो..


मै:- बस भैया ये कुछ ज्यादा ही हो जाएगा.. वैसे आप साथ चल रहे है तो सुकून है... चलिए चला जाए मुझे वापस भी लौटना है..


वहां से मेरी कार किसी काफिले के सामान निकली.. 1 स्कॉर्पियो आगे, एक स्कॉर्पियो पीछे और बीच में मेरी कार. हमलोग सीधा राजवीर अंकल के मॉल ही पहुंचे. मै जैसे ही पहुंची, राजवीर अंकल मुझे अपने साथ लेकर चल दिए. मै साक्षी और केशव को रूपाली दीदी के पास छोड़कर उनके साथ चल दी..


राजवीर अंकल ने पहले तो माफी मांगा कि वो ऐसे वक्त में खुद नहीं आ सके, क्योंकि कुछ मसले सहर मे चल रहे थे, लेकिन उनकी 2 स्कॉर्पियो लगातार गांव के बाजार में खड़ी है, जबतक कि ये मामला सुलझ ना जाए. फिर उन्होंने मुझसे पुरी बात पूछी, और मैंने पूरी कहानी डिटेल मे समझा दिया।


राजवीर अंकल पुरा मामला मुझसे सुनने के बाद तुरंत ही 22 गांव के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति और जिसके फैसले को काटने की हिम्मत उस पूरे इलाके में नहीं थी, महादेव मिश्रा को कॉल लगा दिया. दोनो मे कुछ औपचारिक बात होने के बाद उन्होंने मेरे विषय में बात किया. मामला उनकी जानकारी मे पहले से था और उन्होंने ये भी कहा कि गांव की इस वीर बेटी से वो खुद मिलने आएंगे.. गुरुवार के दिन मंदिर पर ही पंचायत होगी...


राजवीर अंकल ने फिर उन्हे बताया कि समझिए मै अपनी बेटी के लिए वहां आऊंगा. तभी उधर से कुछ उन्होंने कहा जो बात राजवीर अंकल गोल कर गए, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान और बात करते-करते जब उन्होंने अपने मूंछ पर ताऊ दिया, तभी समझ में आ गया कि इनकी कुछ तो खतरनाक प्लांनिंग हुई है जो उन्होंने मुझे बताया नहीं...


राजवीर अंकल मुझे देखकर हंसते हुए कहने लगे... "तुमने गर्व से छाती चौड़ी कर दी"..


मै:- ऐसा क्या कर दिया मैंने..


राजवीर अंकल:- ब्लड टेस्ट करवाने के लिए तुमने ही कहा था ना..


मै:- 20 लड़के को सामने खड़ा करके मुझसे कहता है हिम्मत तो मेरे खून मे है, फिर उसे और क्या कहती..


राजवीर अंकल:- हाहाहाहा... बिल्कुल सही जवाब.. जाओ आराम से मार्केटिंग करो, गुरुवार को मै मंदिर पर ही मिल जाऊंगा...


लगभग आधे घंटे तक हम दोनों के बीच बातचीत चलती रही, लेकिन जब लौटकर मै रूपाली दीदी के पास पहुंची, वो एक कोने में अपने सर पर हाथ रखकर बैठी थी. मै उनके पास पहुंचकर... "क्या हुआ दीदी, आप ऐसे क्यों बैठी हो.. अब तक शॉपिंग शुरू नहीं किए क्या?"


रूपाली दीदी थोड़ी चिढी सी आवाज में... "तुझे मेरे साथ नहीं आना था तो मत आति, लेकिन ऐसे परेशान करने से क्या मिल गया तुझे. तू आ शॉपिंग करके, मै गांव चली जाऊंगी"..


उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गई. मुझे हंसते देख वो और ज्यादा चिढ़ गई और छमककर वहां से भागने लगी. किसी तरह उनके हाथ-पाऊं पकड़ कर रोकी. वो रुकी लेकिन नाक पर गुस्सा अब भी था. मुझे लग गया कि ये सब करास्तनी साक्षी की है, उसी ने परेशान किया होगा.


मै सोच ही रही थी कि साक्षी ने ऐसा क्या किया होगा, उतने मे ही स्टोर मैनेजर रूपाली दीदी के पास पहुंचा और बड़े ही कड़क आवाज में कहने लगा... "तुमसे जब बच्चे संभलते नहीं, तो साथ क्यों ले आती हो, पुरा शॉपिंग कॉम्प्लेक्स डीस्ट्रब है उसकी वजह से. अभी के अभी तुम सब यहां से चले जाओ, नहीं चाहिए ऐसे कस्टमर..."


मै पीछे मुड़ी हुई थी, इसलिए वो स्टोर मैनेजर राजू मुझे नहीं देख पाया और रूपाली दीदी से जो जी में आया बकता चला गया... अब मामला समझ में आया कि वो गुस्से से लाल क्यों है.. उसकी बात खत्म होते ही मै पीछे मुड़ गई... मुझे देखते ही... "मैम आप कब आयी"..


मै:- राजू भैया, आप क्या हर लड़की से ऐसे ही बात करते हैं..


राजू:- नहीं मैम वो बच्चे..


मै एक दम से चिल्लाती हुई पूछी... "जो सवाल किया है आप उसका जवाब दीजिए"..


मेरा गुस्सा देखकर रूपाली दीदी का गुस्सा हवा हो गया... वो मेरा कांधा पकड़कर, मुझे खींचती... "छोड़ जाने दे मेनका, ये बड़े दुकान वाले हैं.. हम कहीं और चलते है"..


मै:- कहीं और क्यों चलना है.. स्टोर है ये या गांव का मछट्टा.. राजू भैया ऐसे आप कस्टमर से बात करते हैं..


राजू:- देखो मुझे यहां हर तरह के कस्टमर देखने पड़ते है, बेहतर होगा मेरे काम के बीच में ना आओ...


इससे पहले कि मै उसे कुछ बोलती, उसके कनपटी के नीचे एक जोरदार थप्पड़ पड़ा... "साला गांव में बेरोजगार पड़ा हुए था, बाबूजी ने तुझे रोजगार दिया और साला तू उन्हीं के धंधे में सेंध लगा रहा है... भाग जा अभी यहां से"..


ये कपिल था जो हमे शुरू से देख रहा था. जैसे ही कपिल ने उसे भगाया, मै रोकती हुई... "नहीं कपिल भईया, नौकरी से मत निकालो, सब आपस के ही लोग हैं. इनके परिवार को परेशानी होगी, तो अंकल को भी परेशानी होगी. इन्हे गोदाम वाले काम मे लगवा दीजिए और स्टोर मैनेजर किसी बेशर्म को बाना दीजिए, जो गली सुनने के बाद भी मुस्कुराकर कहे, सर आपकी परेशानी हम समझते है और उसका निदान अवश्य किया जाएगा"..


रूपाली दीदी के ओर देखकर मै फिर से उनसे माफी मांगी और उनसे कहने लगी, मुझे पता नहीं था, यहां के स्टाफ ने बदतमीजी की है, वरना उसकी क्लास तो मै यूं लगा सकती हूं. रूपाली दीदी मेरी बात और हरकतों से हंस दी. फिर हम दोनो बहने कॉफी पीती हुई इसी विषय पर बात करने लगे कि यह हंगामा कौन सा है जिसके चलते उसके पिताजी और भाइयों को यहां आना पर गया, और इस शॉपिंग मॉल की क्या कहानी है..


मै उन्हे विस्तार से सब समझाती रही और उधर कपिल, साक्षी और केशव को शॉपिंग करवा रहा था. 10 मिनट के छोटे से क्लैरिफिकेशन के बाद उनसे सॉरी बोलती हुई कहने लगी की मेरे वजह से आप जीजू को तो भुल ही गई. हालांकि रूपाली दीदी मना करती रही की अब रहने देते है फिर कभी मिल लेंगे, लेकिन मै ही जिद पकड़कर बैठ गई नहीं मुझे मिलना है...


मन तो मिलने का रूपाली दीदी का भी था, इसलिए थोड़ी सी जबरदस्ती के बाद दीदी ने जीजू को यहीं शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में ही बुलवा लिया. देखा सुनी के बाद ये पहली छुपके मुलाकात थी. वैसे इनकी जगह कोई और होता तो मिलने मे काफी रिस्क था, लेकिन यहां ना तो कोई रूपाली दीदी को पहचानता था और ना ही होने वाले जीजू नितेश को.


वैसे तो उनका पूरा परिवार इसी सहर मे रहता है लेकिन नितेश की पढ़ाई अपने ननिहाल में हुई, इसलिए यहां ज्यादा लोग पहचानते नहीं है. हमारे साथ तकरीबन आधे घंटे समय बिताने के बाद वो रूपाली दीदी को आंखो के इशारे से अकेले में आने के लिए कहने लगे...


मुझे समझते देर न लगी कि इन होने वाले जोड़े के बीच, मै हड्डी बनी हुई हूं. इसलिए मै केशव और साक्षी के पास चली गई. जाते-जाते कहती गई, मै शॉपिंग करवाने जा रही हूं, जीजू को विदा करके फोन करना. मेरे ख्याल से मेरे वहां से निकलते ही, वो दोनो भी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स से निकल गए.


केशव और साक्षी की शॉपिंग खत्म हो चुकी थी, दोनो ही पिज़्ज़ा खिलाने की जिद करने लगे. मै उन दोनों को लेकर डोमिनोज पहुंच गई, और जाते-जाते रूपाली दीदी को एसएमएस भी करती चली..


शॉपिंग हो गई थी, पिज़्ज़ा भी हमने खा लिया. मन नहीं लग रहा था तो अपने सहर वाले मकान में भी पहुंच गए. काम लगभग फिनिश होने पर थे, और ना चाहते हुए भी हमे मनीष भैया और रूपा भाभी का छेड़ छाड़ देखने को मिल रही थी, जिसमे केशव ने खलल डाल दिया.


बेचारे भैया और भाभी.. जैसे ही उन्हे पता चला हम यहां आए हैं, वो दोनो हड़बड़ा गए. मनीष भैया इधर-उधर देखते हुए, मुझे पूरे घर के बारे में बता रहे थे. कुछ देर घर देखने के बाद, मै भी उनको छोड़कर वहां से निकल गई. करने दो भाई रोमांस, बिना उसके तो वैसे भी जिंदगी में कोई रोमांच नहीं.. 11.30 बजे सहर पहुंची थी, रूपाली दीदी को 12.30 बजे छोड़ा था, और 4 बजे तक इनका कोई पता नहीं.


झल्ली को दिमाग भी नहीं की घर के लोग मेरे ही प्राण निकाल लेंगे. मै भी केशव और साक्षी को लेकर कुछ देर और घूमती रही. तकरीबन 4.30 बजे रूपाली दीदी का कॉल आया और वो मुझे किसी पते पर पहुंचने के लिए कही. मैंने भी उनको सुना दिया कि मै यहां के चप्पे-चप्पे से वाकिफ नहीं जो कहीं भी बुला रही, चुपचाप कोई आसान पता बाता दो.


तभी नितेश की आवाज उधर से आयी और मै उनके बताए रास्ते पर चलना शुरू कर दी. ये भी ना, मरवा ही देगी. जिस रास्ता वो आने के लिए कह रहे थे, वो हमारे सहर वाले घर के कॉलोनी से होकर जाता था. किसी तरह हिम्मत करके मै उस रास्ते से चली तो गई, लेकिन अब तो रात में ही पता चलता की मनीष भैया या रूपा भाभी ने कार को देखा या नहीं..


मै बताए पते पर पहुंची. मंदिर के पास ही रूपाली दीदी और नितेश खड़े थे. मै एक झलक रूपाली दीदी को देखी और मेरी आखें बड़ी हो गई. मैंने घूमाकर कार उनके पास लगाई और आगे का दरवाजा खोल दिया. नितेश आंखें बड़ी किए मेरे किनारे वाले विंडो पर पहुंचकर.… "आप कार से आयी हो"..


मै:- आप कार को देखकर सदमे मे है या मुझे ड्राइविंग सीट पर देखकर...


नितेश:- आपको ड्राइविंग सीट पर देखकर. जिस उम्र में लाइसेंस नहीं मिलती, आप कार चला रही है. ऊपर से पूरी जिंदगी गांव में ही रही..


मै:- सोच बदलीए होने वाले जीजू, गांव की लड़कियां आज कल ट्रैक्टर चलाकर खेती भी करने लगी है, आप तो कार में देखकर हैरान हो गए. केवल सहर की लड़कियां ही कार चलाती अच्छी दिखती है क्या?


नितेश:- हा हा हा हा.. इंट्रेस्टिंग.. नहीं मेरे कहने का वो मतलब नहीं था.. आत्मनिर्भर होना कोई गलत बात नहीं.. ठीक है आप लोग निकलो. रूपाली घर पहुंचकर कॉल कर लेना...


नितेश से विदा लेकर मै वहां से निकल गई. रास्ते से मैंने कपिल भईया को कॉल लगाकर बता दिया कि मै अपने नए मकान से निकल रही हूं. उन्होंने भी जवाब में कहा कि वो आउटर रॉड पर ही है. कार फिर चल दी रफ्तार मे और आगे बढ़ते ही … "तो आप दोनो के बीच चक्कर क्या है, और कबसे आप लड़के को जानती है"…


रूपाली दीदी... "देखासुनी के बाद ही तो मै जानुंगी, पता नहीं तू क्या पूछ रही है. यदि मेरे चेंज ड्रेस को देखकर ऐसा कह रही है, तो तुम्हारी सोच बहुत निम्न स्तर की है मेनका, बिल्कुल गांव वाली"..


मै:- मैंने तो बस ऐसे ही छेड़ा था, लेकिन आपका गुस्सा होना मेरे अंदर शक पैदा कर रहा है..


रूपाली:- तू कहना क्या चाह रही है वो साफ-साफ बता दे..


मै:- वहां से मेरा बैग निकलो और लिपस्टिक लगा लो.. और सॉरी जो मैंने आपको टोक दिया. मुझे नहीं पता था मेरी बहन इतनी इरिटेट हो जाएगी... गलती मेरी है जो मै किसी के भी लाइफ में घुस जाती हूं...


मेरी बात सुनकर रूपाली दीदी बिल्कुल ख़ामोश हो गई. उन्होंने तुरंत ही अपना लिपस्टिक ठीक किया और मुझसे बात करने लगी. वो तरह-तरह की सफाई मुझसे देती रही और मैंने बस इतना ही कहा कि आप सही कह रही ऐसा ही हुआ है... लेकिन उन्हें भी पता था कि मै उनकी बातो पर रत्ती भर भी यकीन नहीं कर रही.


फिर मैंने कार एक चूड़ी के शॉप पर रोक दी और रूपाली दीदी को हाथ की चूड़ियां बदल लेने कहने लगी, क्योंकि उनके कांच की लाल चूड़ियां कुछ ज्यादा ही कम हो चुकी थी... एक बार फिर वो खुद मे शर्मिंदा सी मेहसूस करने लगी. थोड़ा ढूंढने के बाद ठीक वैसी ही चूड़ियां भी मिल गई.


रूपाली दीदी कुछ बोलने को हुई, लेकिन मैंने उन्हें इशारे मे समझाया की साथ मे साक्षी और केशव बैठे है. पूरे रास्ते हम दोनों के बीच लगभग खामोशी ही रही. जैसे ही मै घर पहुंची, शॉपिंग बैग निकालकर सबके लिए लाए सामान को दिखाने लगी.


मैंने अमित और सुमित भैया के लिए घड़ी और वॉलेट ली थी. दोनो देखकर काफी खुश हो गए. साथ मे मैंने दोनो की बीवी, यानी दोनो भाभियों के लिए मेकअप किट खरीदी थी वो दे दी.. मेरी मामी मेरे सर पर एक हाथ मारती, मां से शिकायती लहजे में कहने लगी… "ये मेनका फालतू में इतने पैसे उड़ा रही है, कोई रोकने वाला नहीं. अमित और सुमित दोनो इससे इतने बड़े है, फिर भी गिफ्ट लेकर आयी है बताओ"…


मै, मामी के गले लगकर उनके गाल को चूमती... "मामी, गिफ्ट नहीं है, अपने पसंद से आप सब के लिए कुछ ली हूं बस इतना ही. इसमें बड़ा-छोटा देखोगी तो मै आपसे बात नहीं करने वाली"..


उधर से बड़ी भाभी और मां दोनो ने ही मेरा समर्थन कर दिया. तभी मां मुझसे पूछने लगी कि जो काम करने कही थी, वो हुआ की नहीं.. तभी मैंने सबके सामने नेकलेस का एक सेट रखती, रूपाली दीदी को आवाज लगा दी... "रूपाली दीदी, यहां आकर देखो तो जरा ये"..


मै तो घर के लोगों के बीच पहुंचकर उनकी बात भुल भी चुकी थी, लेकिन वो ऐसे गुमसुम पहुंची जैसे चोरी पकड़ी गई हो और सजा के लिए उन्हे बुलाया जा रहा था. हार देखकर वो पूछने लगी कि किसके लिए लिया गया है. जैसे ही मैंने कहा कि मुझे ये मनीष और महेश भैया के ओर से गिफ्ट मिला है, साक्षी फटाक से वो बॉक्स बंद करती.. "दीदी ये मेरा हुआ"..
Wah, budhau rajveer phir se ek baar meherbani dikhayi par kyun? yeh toh wohin jaane.. :D
So yeh fejan vs menka wali topic kaafi dilchasp hogi dekhne ko Panchayat mein..
ek taraf mall anchahi ek drama, udhar unfortunately rupali pakadi gayi smart menka dwara.. Khair mujhe kya :dazed:
hmm.. so chutki skhashi ki natkhat pan aur saitaani jaari hai..
Let's see what happens next
Brilliant update with awesome writing skill :applause: :applause:
 
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