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vakharia

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कालकूट का शृंगार

K1
पाठकों के प्रति निवेदन

यह कथा न तो कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ है और न ही किसी काम-गाथा का पन्ना। 'कालकूट का शृंगार' असल में दो ऐसे शातिर दिमागों की कथा है, जिनके हाथों में काम और मृत्यु दोनों ने अपना अद्भुत सौंदर्य बिखेरा है.. वासना और मृत्यु को एक शस्त्र के रूप में उपयोग करते हुए..!!

इस काल्पनिक रचना में कथा के प्रवाह, पात्रों के मनोविज्ञान और नाटकीयता को उभारने के लिए इतिहास, भूगोल और विज्ञान से जुड़े कुछ तर्कों के साथ रचनात्मक छूट ली गई है। किसी भी तार्किक विसंगति को लेखन का हिस्सा मानकर, कृपया केवल पात्रों के इस कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक खेल का आनंद लें।

जब काम और मृत्यु, एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाते हैं तब अंजाम क्या होता है? देखते हैं कि कैसे महर्षि वात्स्यायन की कलम इस अनोखे खेल की साक्षी बनती है।

कालकूट - अति घातक विष

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कालखंड है तीसरी शताब्दी का..

पाटलिपुत्र के इत्र बाज़ार में ढलते सूर्य की किरणें अब तिरछी हो चली थीं। हवा का बहाव धीमा था, और उसमें खस, चंदन, और कुमकुम की गहरी महक किसी अदृश्य रेशम की तरह तैर रही थी। दिन का वह प्रहर, जब कोलाहल शांत होता जाता है और छायाएं अपना आकार विस्तृत करने लगती हैं।

मदनरेखा अपनी नक्काशीदार देवदार की दुकान के पीछे एक शांत मूर्ति की भांति बैठी थी। सामने रखे स्फटिक और मिट्टी के छोटे-छोटे पात्रों में तरल इत्रों की लालिमा, गहरा भूरापन और सुनहरापन कैद था। तिरछी धूप उन शीशियों से छनकर मदनरेखा के चेहरे पर एक सूक्ष्म प्रकाश बिखेर रही थी। वह चंदन के एक छोटे टुकड़े को पत्थर पर घिस रही थी, धीमी, लयबद्ध गति से।

तभी, उसकी दुकान की देहरी पर एक लंबी परछाई पड़ी।

बाज़ार का व्यस्त शोर जैसे पृष्ठभूमि में जाकर एकदम धुंधला हो गया। मदनरेखा ने अपनी नज़रें तुरंत नहीं उठाईं। उसकी दृष्टि सामने खड़े व्यक्ति के पैरों पर स्थिर थी, सुदूर उत्तर के मज़बूत चमड़े के जूते, जिन पर किसी अन्य देश की लाल मिट्टी लगी थी। व्यक्ति के खड़े होने का अंदाज़ पूर्णतः स्थिर था, किसी ऐसे योद्धा की तरह जो विश्राम की अवस्था में भी हर आहट के प्रति सतर्क रहता है।

"सुना है, तुम्हारी इन छोटी शीशियों में... गुज़रे हुए कल की परछाइयां भी कैद मिलती हैं?" एक भारी, किंतु ठहरी हुई आवाज़ ने इत्र-बाज़ार के कोलाहल को जैसे बीच से चीर दिया। उच्चारण स्पष्ट था, लेकिन उसकी लय में किसी सुदूर यवन प्रदेश की खनक थी।

मदनरेखा ने पत्थर पर चंदन घिसना रोक दिया। धीरे से उसने अपनी काजल से लदी पलकें उठाईं। सामने जयवर्मन खड़ा था। देह पर यवन शैली का सूती लबादा था, लेकिन उसकी आँखें.. वे किसी साम्राज्य के कूटनीतिज्ञ से अधिक एक सधे हुए शिकारी की तरह भेदक थीं। उनके बीच केवल एक काठ का पटरा था, लेकिन मौन किसी कसी हुई प्रत्यंचा की तरह खिंच गया था।
[/JUSTIFY]

K2

"परछाइयां और स्मृतियां तो केवल मन का छल हैं, आर्य," मदनरेखा ने अपनी आवाज़ को मद्धम और रहस्यमयी रखते हुए कहा, "मैं तो बस एक मीठा भ्रम बेचती हूँ... एक ऐसा आवरण, जो आपके कड़वे यथार्थ से भी अधिक सुंदर और.. मारक हो।"

जयवर्मन के होंठों पर एक अत्यंत बारीक, व्यंग्यात्मक मुस्कान तैर गई। वह थोड़ा आगे झुका, "भ्रम का यह व्यापार पाटलिपुत्र के लिए नया नहीं है, देवी। यहाँ की राजसभा तो स्वयं एक विशाल शीशी है, जहाँ हर प्रहर एक नया इत्र छिड़का जाता है... केवल इसलिए कि रचे गए षड्यंत्रों की गंध को दबाया जा सके।"

मदनरेखा की पलकें नहीं झपकीं। उसने बड़ी सहजता से सूती कपड़े से अपनी उंगलियां पोंछीं और एक बर्फीली शांति के साथ बोली, "षड्यंत्रों की गंध इत्र से नहीं दबती, आर्य.. वह तो केवल नए रक्त से ही धुलती है। मेरा अधिकार तो बस इस नश्वर देह को महकाने तक सीमित है... जिनकी आत्माएं पहले ही कलंकित हों, उनकी दुर्गंध पर मेरी कस्तूरी भी भला क्या पर्दा डालेगी?"

यह एक अचूक और गहरा वार था। जयवर्मन की आँखों में एक सूक्ष्म चमक कौंधी, शत्रु की कुशाग्रता पर एक योद्धा की मूक प्रशंसा। उसने अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया और कस्तूरी की एक छोटी स्फटिक शीशी को दो उंगलियों के बीच ऐसे उठाया जैसे कोई जीवन और मृत्यु को तौल रहा हो।

"और यदि किसी की आत्मा निष्कलंक हो.." जयवर्मन ने शीशी को ढलती धूप के सामने घुमाते हुए पूछा, उसके स्वर में एक छिपी हुई चुनौती थी, "तो क्या तुम्हारी इन शीशियों में इतना सामर्थ्य.. या इतना विष है, कि वह उसे भी दागदार कर सके?"

"निष्कलंक आत्माएं इत्र-बाज़ारों की गलियों में नहीं, तपोवनों की भस्म में मिलती हैं," मदनरेखा की आवाज़ अब किसी खंजर की धार सी हो चुकी थी। उसकी नज़रें जयवर्मन के चेहरे से उतरकर सीधे उसके जूतों पर जा टिकीं।
"आप अपना प्रयोजन बताइए, आर्य... क्योंकि जो कदम तपोवन का मार्ग छोड़कर इस पटरे तक आए हैं, उन जूतों पर लगी इस विदेशी लाल मिट्टी से मुझे तो केवल एक ही गंध आ रही है.. किसी बेहद खूंखार महत्वाकांक्षा की।"

जयवर्मन एक क्षण के लिए ठिठका। इस कुशाग्र यौवना ने केवल अपनी दृष्टि से ही उसके जूतों की सुदूर मिट्टी और उसके भीतर पल रहे दावानल को पढ़ लिया था। उसने स्फटिक की शीशी वापस पटरे पर टिका दी और थोड़ा और आगे झुका, जैसे कोई शिकारी अपने जाल के करीब जा रहा हो।

"तो फिर, उस महत्वाकांक्षा के योग्य कोई आवरण ही सुझा दो, देवी। मुझे एक ऐसा इत्र चाहिए, जो गहरे से गहरे रहस्य की गंध और साम्राज्य के पतन की आहट को भी छिपा सके।"

मौन..!! सुनाई दे रही थी तो केवल दूर बजते मंदिर के घंटे की अत्यंत धीमी प्रतिध्वनि। मदनरेखा अपनी जगह से तनिक भी विचलित नहीं हुई, किसी पाषाण-प्रतिमा की भांति स्थिर। उसने हाथीदांत की एक अत्यंत बारीक सलाई उठाई, उसे एक गहरे, श्यामल रंग के पात्र में डुबोया और बिना पलक झपकाए जयवर्मन की ओर बढ़ा दी।

"यह अगरु का अर्क है," मदनरेखा की आवाज़ एक सर्पीली फुसफुसाहट में बदल गई, जो सीधे जयवर्मन के मस्तिष्क में उतर रही थी। "इसकी तासीर इतनी गहरी और स्याह है, आर्य... कि यह नंगी तलवार पर सूखे रक्त की गंध को भी पी सकती है... या फिर, सीने में गहरे दबे किसी विश्वासघात को।"

"विश्वासघात की अपनी कोई गंध नहीं होती," जयवर्मन ने सलाई को देखे बिना, सीधे मदनरेखा की आँखों में झांकते हुए उत्तर दिया। "वह तो इस बात पर निर्भर करता है कि विष लगाया हुआ छुरा पीठ में किसने घोंपा है, शत्रु ने, या किसी प्रियजन ने?"

"प्रियजन के छुरे में विष नहीं होता, आर्य," मदनरेखा ने सलाई को थोड़ा और आगे बढ़ाते हुए कहा। "विष तो उस अंधी आस्था में होता है, जो आप उन पर करते हैं।"

कुछ ही हाथ की दूरी पर, इक्षु-रस बेचने वाले के छज्जे की घनी ओट में बैठे महर्षि वात्स्यायन का पान चबाना एकाएक रुक गया। उनकी पारखी दृष्टि इस वाचिक और मनोवैज्ञानिक रणभूमि का एक-एक दांव पढ़ रही थी। उन्होंने पास रखे भोजपत्र पर अपनी नरकुल की कलम से लिखा, 'जब शब्द तीरों की तरह चलें और सांसें प्रत्यंचा बन जाएं, तो समझो आकर्षण, वशीकरण और विनाश.. तीनों अपने चरम पर हैं...!!'

जयवर्मन ने सलाई लेने के लिए हाथ नहीं बढ़ाया; इसके बजाय उसने अपनी चौड़ी, युद्ध-चिह्नों से अंकित कलाई मदनरेखा के ठीक सामने कर दी, एक नग्न आमंत्रण के रूप में। मदनरेखा ने सलाई को किंचित मात्र झुकाया। अगरु की वह श्यामल-सुनहरी बूंद ठीक जयवर्मन की धड़कती हुई नब्ज़ पर गिरी। यह था तो केवल एक बूंद मात्र का स्पर्श किन्तु दोनों ने एक अदृश्य और हिंसक ऊष्मा को महसूस किया।

जयवर्मन ने कलाई को अपने नथुनों के करीब किया और एक गहरी श्वास के साथ आँखें मूंद लीं। गंध उसके भीतर तक उतर गई। "तीक्ष्ण है... किसी छलावे की तरह," आँखें खोलते हुए उसने कहा। "और इसका प्रभाव?"

"यह सरलता से छंटता नहीं है, आर्य," मदनरेखा ने सलाई वापस रखते हुए अपनी बर्फीली और अभेद्य नज़रें उस पर टिका दीं। "जो इस अर्क या इस स्पर्श को एक बार अपनी रगों में उतार ले, वह फिर कभी अपनी मूल गंध.. या अपनी मूल चेतना में पुनः लौट नहीं पाता।"

जयवर्मन के होंठों पर वह व्यंग्यात्मक मुस्कान फिर से लौट आई। उसने पटरे पर यवनी मुहर लगी एक भारी स्वर्ण मुद्रा रखी और बोला, "कूटनीति और सत्ता के खेल में मूल गंध जैसी कोई चीज़ बचती भी नहीं है, देवी। हम तो हर दिन एक नया मुखौटा और एक नई महक ओढ़ते हैं, ताकि कोई हमें हमारे वास्तविक रूप में पहचान न सके।"

"परंतु स्मरण रहे," मदनरेखा ने मुद्रा को बिना छुए कहा, "अत्यधिक सुगंध, साँसों को रोक भी सकती है।"

जयवर्मन मुड़ा, लेकिन अंधेरे में समाने से पहले उसने अपनी गर्दन हल्की सी घुमाई।

"कल गोधूलि बेला में फिर आऊंगा... देखते हैं.. कि क्या तुम्हारा यह अर्क मेरी सांसें रोक पाता है या मेरी महत्वाकांक्षा तुम्हारे इस भ्रम को तोड़ देती है..!!"

और इसी रहस्यमयी चुनौती के साथ, वह बाज़ार की गहरी होती परछाइयों के बीच विलीन हो गया।
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पाटलिपुत्र के ऊपर रात्रि का गहरा नीला आवरण बिछ चुका था। इत्र-बाज़ार की चहल-पहल अब श्वानों के भौंकने और नगर-रक्षकों के भारी कदमों की चाप में बदल गई थी। अपनी दुकान के ठीक पीछे, एक गुप्त और संकरे तहखाने में, मदनरेखा अपने एकांत कक्ष में बैठी थी।

यह कक्ष किसी सामान्य इत्र बेचने वाली का नहीं था। दीवारों पर कोई श्रृंगार-सामग्री नहीं थी। वहाँ थे तो केवल अस्त्र और औषधियों के ताक। एक कोने में रखे पीतल के बड़े पात्र में नीले रंग का एक दुर्लभ विष उबल रहा था, जिसकी कड़वी, कसैली भाप कक्ष में भर रही थी।

मदनरेखा ने अपने शरीर से वह साधारण सूती वस्त्र उतार फेंका था और अब वह काले रेशमी अंतरीय में थी। उसने तांबे के एक छोटे प्याले में थोड़ी सी मदिरा ली और उसमें उस उबलते विष की एक बेहद सूक्ष्म बूंद मिलाई। यह एक विषकन्या की दिनचर्या थी, अपने शरीर को विष के प्रति अभ्यस्त रखने की एक क्रूर प्रक्रिया।

उसने प्याला होठों से लगाया, लेकिन घूंट गले से नीचे नहीं उतरा।

उसकी दृष्टि सामने एक छोटी सी चौकी पर टिकी थी। वहाँ वही स्वर्ण मुद्रा रखी थी, जिसे जयवर्मन ने पटरे पर छोड़ा था। मदनरेखा ने अपना दायां हाथ उठाया, वही हाथ जिससे उसने जयवर्मन की कलाई पर अगरु लगाया था। विषकन्याओं को सिखाया जाता था कि उनका स्पर्श मृत्यु है, लेकिन आज, जब उसकी सलाई जयवर्मन की नब्ज़ से गुज़री थी, तब उसने पहली बार जीवन की उस तीव्र ऊष्मा को महसूस किया था।

"स्मृतियां तो केवल मन का छल हैं.." उसने अपने ही बुने हुए उस शातिर तर्क को अंधेरे में दोहराया, और फिर कांपती हुई सांस के साथ अपनी कलाई को देखा "परंतु इस छल की ऊष्मा, मेरी काल समान शीतल देह को जला क्यों रही है?"

उसने कठोरता से आँखें बंद कीं। वह महामात्य के अधीन गुप्तचर विभाग की सबसे घातक शस्त्र थी। गुप्तचरों का संदेश स्पष्ट था, एक यवन राजनयिक पाटलिपुत्र आने वाला था, जिसकी योजना साम्राज्य के लिए मलिन और घातक सिद्ध होने वाली थी। मदनरेखा का कार्य उसे अपने रूप-जाल में फंसाकर, उसके रहस्य उगलवाना और अंततः उसका अंत करना था। लेकिन जयवर्मन की वह व्यंग्यात्मक मुस्कान, उसका वह निडरता से कलाई आगे कर देना... वह एक शिकार की तरह व्यवहार नहीं कर रहा था। वह स्वयं एक शिकारी था, जो जानबूझकर जाल में कदम रख रहा था।

मदनरेखा ने एक गहरी सांस ली, और मदिरा के साथ उस कड़वे विष को गले के नीचे उतार लिया। विष उसके रक्त में घुलने लगा, किन्तु अगरु की वह गंध, जो जयवर्मन के होने का एहसास थी, अब भी उसके मस्तिष्क पर हावी थी।
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अगली सुबह.. बाज़ार अभी पूरी तरह से खुला भी नहीं था। मदनरेखा अपनी दुकान के पात्रों को सहेज ही रही थी कि एक शांत किंतु अथाह स्वर ने उसके हाथों की गति रोक दी।

"कस्तूरी और कालकूट (विष) में एक ही समानता है, पुत्री.. शीशियां कितनी भी नक्काशीदार और सघन क्यों न हों, पारखी दोनों की मारक गंध को आवरण के पार भी तौल ही लेते हैं।"

सामने महर्षि वात्स्यायन खड़े थे। मगध साम्राज्य की बौद्धिक सत्ता का वह सर्वोच्च और अभेद्य शिखर, जिनकी कुशाग्रता और ज्ञान के समक्ष स्वयं महामात्य भी नतमस्तक होते थे। वही महर्षि, जो भारतीय इतिहास में मानवीय इच्छाओं और संबंधों के सबसे गूढ़ शास्त्र 'कामसूत्र' के रचयिता के रूप में अमर होने वाले थे। उनकी उन शांत किंतु पारखी आँखों में इतना भयंकर सामर्थ्य था कि वे किसी भी नकाब को चीरकर आत्मा के सबसे गहरे रहस्यों को पढ़ सकती थीं।

मदनरेखा ने पलक झपकते ही अपनी आँखों के विष को समेटा और एक विनम्र इत्र-विक्रेता का निश्छल मुखौटा ओढ़ लिया।

"प्रणाम, महर्षि। कहिए, आज आश्रम की वेदी के लिए कौन सी गंध चाहिए? ध्यान के लिए शीतल चंदन या तपस्या की अग्नि के लिए गुग्गुल?"

वात्स्यायन पास पड़े एक लकड़ी के मोढ़े पर बैठ गए। उनकी आँखें मदनरेखा के मुखौटे को छीलकर सीधे उसके भीतर झांक रही थीं।

"मैं गंध खरीदने नहीं आया, मैं तो उस अदृश्य रसायन का सूत्र समझने आया हूँ, जो कल संध्या इस पटरे के आर-पार उबल रहा था।"

मदनरेखा के हाथ पल भर के लिए ठिठके, लेकिन उसने तुरंत अपने चेहरे की मांसपेशियों को कस लिया।

"कल संध्या? मुझे तो स्मरण नहीं, महर्षि। यहाँ तो केवल सुगन्धों का सीधा-सादा व्यापार होता है, छलावे का नहीं।"

"व्यापार?" वात्स्यायन की श्वेत दाढ़ी के पीछे एक अत्यंत गूढ़ हंसी उभरी। "वह यवन जो कल तुम्हारे पटरे पर अपना अहंकार तौल रहा था.. उसने क्या खरीदा? क्योंकि जाते समय मुझे उसके हाथों में कोई शीशी नज़र नहीं आई.. हाँ, तुम्हारी अगरु की गंध अवश्य उसकी नब्ज़ पर नाच रही थी।" वात्स्यायन ने अपनी उंगली से उस खाली स्थान की ओर इशारा किया जहाँ कल जयवर्मन खड़ा था।

वे थोड़ा आगे झुके। उनकी आवाज़ अब एक दार्शनिक से अधिक, किसी आने वाले प्रलय की चेतावनी देने वाले गुरु जैसी हो गई, "यह सूत्र कंठस्थ कर लेना, पुत्री.. देह को तो जड़ी-बूटियों से विष का अभ्यस्त बनाया जा सकता है, परंतु जब आकर्षण का हलाहल सीधे मन की धमनियों में उतरता है, तो देवों के वैद्य धन्वंतरि के पास भी उसका कोई तोड़ नहीं होता।"

यह सुनते ही मदनरेखा के मेरुदंड में जैसे बर्फ का खंजर उतर गया..!! उसकी नसें झनझना उठीं। महामात्य का सबसे अभेद्य अस्त्र, पाटलिपुत्र की विषकन्या, आज एक संन्यासी की पारखी दृष्टि के सामने पूरी तरह नग्न थी। यदि वात्स्यायन ने यह सत्य राजसभा के किसी एक स्तंभ के कान में भी डाल दिया, तो साम्राज्य उसे कलंक की तरह पोंछ डालेगा। भेद खुल जाने पर विषकन्या या गुप्तचर का मोल राख से भी कम होता है। उसकी सांसें एक क्षण के लिए गले में पथरा गईं, वह भीतर से सहम उठी, लेकिन उसके चेहरे का इस्पाती आवरण उसके कड़े प्रशिक्षण के कारण अभी भी दरका नहीं था।

वात्स्यायन उठे। उन्होंने अपने भोजपत्र को सहेजा और बोले, "मैं अपने ग्रंथ कामसूत्र के सातवें भाग, 'औपनिषदिक अध्याय' की रचना कर रहा हूँ। यह वह विद्या है जो वशीकरण, आकर्षण के गुप्त प्रयोगों, और मन को भ्रमित करने वाले उन रसायनों का वर्णन करती है, जिन्हें शृंगार और छल के अस्त्रों से खेला जाता है।"

वात्स्यायन ने मदनरेखा की आँखों के भीतर पल रहे भय को देखते हुए कहा, "मैं देखना चाहता हूँ कि जब दो अत्यंत शातिर और छली मस्तिष्क इस औपनिषदिक विद्या को एक-दूसरे की रगों में उतारते हैं, तो अंत में परास्त कौन होता है, षड्यंत्र का अहंकार या देह का समर्पण? सतर्क रहना, मदनरेखा..! वह यवन तुम्हारे इत्र से नहीं, तुम्हारी परछाई से खेल रहा है।"

वात्स्यायन मुड़े और जाने लगे।

मदनरेखा के भीतर भय का एक बवंडर उठ रहा था, लेकिन अचानक, उसी भय के घने अंधकार में उसके कुशाग्र मस्तिष्क ने एक अचूक दांव खोज निकाला। औपनिषदिक अध्याय... गुप्त प्रयोग... वशीकरण..!!

उसने एक खाली, स्याह स्फटिक शीशी उठाई और वात्स्यायन के सामने कर दी।

"महर्षि... यदि मैं आपको इस शास्त्र का एक जीवंत अध्याय पढ़ने का अवसर दूँ तो??" मदनरेखा की आवाज़ अब भयभीत नहीं थी.. वह एक चतुर कूटनीतिज्ञ की मादक और सम्मोहक फुसफुसाहट में बदल चुकी थी। "मैं आपको जयवर्मन और मेरे बीच खेले जा रहे इस छलावे के हर सूक्ष्म दांव, हर घात-प्रतिघात का अध्ययन करने दूंगी। मैं आपके उन कोरे पन्नों को अपने इस मनोवैज्ञानिक युद्ध के लहू से भर दूंगी।"

वह थोड़ा और आगे झुकी, "किंतु... हर दुर्लभ ज्ञान का एक मूल्य होता है, महर्षि। आप मेरे इस कूटनीतिक युद्ध के मूक साक्षी बनेंगे, और बदले में... मेरी वास्तविकता इस स्फटिक शीशी के शून्य की भांति ही, आपकी जिव्हा के पीछे कैद रहेगी।"

वात्स्यायन ने उस खाली शीशी को देखा, फिर मदनरेखा की उन गहरी, अभेद्य आँखों में झांका। एक युवा विषकन्या इस सिद्ध दार्शनिक के साथ सौदा कर रही थी, और वात्स्यायन को मृत्यु के मुहाने पर खड़ी इस स्त्री की निडरता अत्यधिक रुचिकर लगी। यह विषकन्या वह अवसर प्रदान कर रही थी जो उनके ग्रंथ के लिए एक अमूल्य धरोहर साबित होने वाला था।

वात्स्यायन के होंठों पर एक बारीक, संतुष्ट मुस्कान तैर गई। उन्होंने शीशी को मदनरेखा के हाथ से नहीं लिया, बल्कि शीशी पर रखी उसकी उंगलियों को अपने भोजपत्र से हल्का सा स्पर्श किया।

"शून्य की कोई गंध नहीं होती, पुत्री। और जो गंधहीन है, वह मेरे लिए अदृश्य ही है और रहेगा," वात्स्यायन ने शांति से कहा, जो इस बात का प्रमाण था कि यह अलिखित संधि उन्हें स्वीकार थी। "मैं तुम्हारे इस प्रयोग की प्रतीक्षा करूंगा। देखना बस यह है कि इस दांव के अंत में तुम मुझे अपनी विजय का शंखनाद सुनाती हो, या मुझे तुम्हारी राख पर ही अपना अंतिम श्लोक लिखना पड़ता है।"

बिना कोई और शब्द कहे, वात्स्यायन मुड़े और बाज़ार की बढ़ती भीड़ में विलीन हो गए।

मदनरेखा ने एक गहरी, कांपती हुई सांस छोड़ी जो उसने न जाने कितनी देर से अपने सीने में दबा रखी थी। उसने अपनी आँखें बंद कीं। आपदा को बड़ी ही चालाकी से अस्त्र में बदलते हुए, उसने एक तीर से दो शिकार किए थे.. संकट का हल भी निकाल लिया और साम्राज्य के सबसे बड़े दार्शनिक को अपनी अभेद्य ढाल भी बना लिया था। अब युद्ध केवल जयवर्मन से था।
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उसी रात, पाटलिपुत्र के पश्चिमी छोर पर स्थित एक जीर्ण-शीर्ण बौद्ध मठ के खँडहरों में...

मशालों की कांपती, पीली लौ से दीवारों पर चित्रित भित्ति-चित्र ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो वे भी इस वीभत्स षड्यंत्र को सुनकर सिहर उठे हों। जयवर्मन एक पत्थर की वेदी पर बिछे मगध के चर्म-मानचित्र पर अपनी उंगलियां फेर रहा था। इत्र-ग्राहक का मृदु चोला अब एक गहरे रक्त-वर्णी अंगरखे और कठोर चमड़े के कवच में बदल चुका था। मगध साम्राज्य को परास्त करने निकला एक क्रूर यवन सेनापति..!! उसके सामने पाटलिपुत्र की सेना का एक बिकाऊ मोहरा, उप-अधिकारी रुद्रक, अपनी परछाई से भी अधिक झुका हुआ खड़ा था।

"उत्तरी द्वार के रक्षक कल मध्यरात्रि को बदल दिए जाएंगे, आर्य," रुद्रक की फुसफुसाहट में लालच और भय का गंदा मिश्रण था। "किंतु महामात्य और उनके गुप्तचरों की आँखें रात में भी नहीं सोतीं। आठों प्रहर वे चौकन्ने रहते हैं। यदि उनका ध्यान तनिक भी न भटका, तो हमारी तलवारें म्यान से निकलने से पूर्व ही उनके भालें हमारी गरदनों को बिंध जाएंगे।"

जयवर्मन की दृष्टि मानचित्र पर किसी बाज की तरह गड़ी थी। उसने पाटलिपुत्र के काठ के मोहरे को अपनी मुट्ठी में ऐसे कसा जैसे वह किसी का कंठ मरोड़ रहा हो।

"तुम्हारे भय की दुर्गंध यहाँ तक आ रही है, रुद्रक," जयवर्मन का स्वर बर्फीली हवा सा सर्द और धारदार था। "यह आशंका मेरे संज्ञान में उसी क्षण आ गई थी, जब मैंने इस नगर में पहला कदम रखा था। तुम बस मेरे सौंपे गए कार्य पर लक्ष्य केंद्रित करो। शतरंज के प्यादों को यह जानने का अधिकार नहीं होता कि वज़ीर कौन सी चाल चलने वाला है। तुम्हें केवल मेरी खींची हुई लकीर पर चलना है।"

उसकी आवाज़ अब एक खौफनाक चेतावनी में बदल गई, "और स्मरण रहे... कल रात्रि, अंधकार में मेरी एक बेहद रहस्यमयी और प्राणघातक भेंट है। यदि सूर्य की पहली किरण तक मैं जीवित न लौटूं... तो समझ लेना कि मगध की अजेय ढाल टूट चुकी है।"

रुद्रक का सिर झटके से ऊपर उठा, उसकी आँखें फटी रह गईं। "किंतु आर्य... यदि आपके ही प्राण पखेरू उड़ गए, तो आक्रमण का नेतृत्व...?"

"मेरे प्राणों का अंत ही तुम्हारे आक्रमण का अचूक शंखनाद होगा, मूर्ख!" जयवर्मन ने मानचित्र पर इस ज़ोर से मुक्का मारा कि मशाल की लौ कांप उठी। "पाटलिपुत्र का महामात्य और उसकी पूरी राजसत्ता मेरी मृत्यु और अपने उस विषैले अस्त्र की क्षणिक सफलता का उत्सव मना रही होगी। उनका ध्यान उस वेदी पर होगा, जहाँ मेरी चिता सजेगी.. और ठीक उसी प्रहर, तुम्हारी तलवारें पाटलिपुत्र की सोई हुई छाती चीर देंगी। उनकी विषकन्या मुझे मृत्यु परोसेगी, और मेरी वह मृत्यु.. इस अभेद्य साम्राज्य के पतन की पहली नींव बनेगी। मैं अपनी राख से इस नगर को जीतूंगा।"

रुद्रक बिना कोई और शब्द कहे, भय से कांपता हुआ अँधेरे में विलीन हो गया।

उस जीर्ण खंडहर में अब केवल जयवर्मन और उसके दो पाषाण-हृदय अंगरक्षक शेष थे। जयवर्मन ने एक गहरी, उन्मादी सांस ली और अपनी आँखें मूंद लीं। उसका बायां हाथ अनजाने में ही उसकी दाहिनी कलाई पर जा टिका.. ठीक उसी जगह, जहाँ मदनरेखा ने अगरु की वह मारक बूंद गिराई थी। वह गंध अब भी उसकी रगों में खौल रही थी।

एक अंगरक्षक ने भारी मौन तोड़ा, उसके स्वर में एक योद्धा की चिंता थी, "आर्य, हमारे गुप्तचरों ने पुष्टि की है... वह इत्र-विक्रेता कोई साधारण स्त्री नहीं, महामात्य की सबसे प्राणघातक विषकन्या है। आप सब कुछ जानते हुए भी स्वेच्छा से मृत्यु के मुख में..!!"

"मैं जानता हूँ," जयवर्मन की आँखें खुलीं, और उनमें एक ऐसा अंधा, सर्पीला उन्माद था जिसे देखकर अंगरक्षक भी सिहर उठा। "इत्र बेचने वाली की साधारण दृष्टि में जूतों की धूल से किसी योद्धा की महत्वाकांक्षा पढ़ने का सामर्थ्य नहीं होता। वह कोई सामान्य स्त्री नहीं है... वह महामात्य की म्यान से निकली वह नग्न तलवार है, जिसने केवल काजल और कस्तूरी का आवरण ओढ़ रखा है।"

उसके होंठों पर एक विचलित कर देने वाली, व्यंग्यात्मक मुस्कान और गहरी हो गई। "साम्राज्यों के इस नीरस और कायरों वाले खेल में, वह एकमात्र विष है जिसे मैं अपने होठों से लगाना चाहता हूँ। कल गोधूलि बेला में, मैं जानबूझकर उसके बिछाए उस सुनहरे जाल में कदम रखूंगा। अब दांव केवल इस बात पर है कि वार किसका अधिक अचूक सिद्ध होता है... उसकी उस विष-बुझी मादक देह का, या मेरे इस प्राणलेवा समर्पण का।"
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अगली गोधूलि बेला।

पाटलिपुत्र के इत्र-बाज़ार पर सायंकाल का गहरा, नारंगी आवरण किसी मृत्यु-शैय्या की भांति बिछने लगा था। लौटते पशुओं के खुरों से उड़ती धूल ने सूरज की अंतिम, रक्तिम किरणों को एक रहस्यमयी, सुनहरी धुंध में बदल दिया था.. मानो हवा में कोई प्राचीन माया रच दी गई हो। बाज़ार की चहल-पहल अब छंटने लगी थी। एक-एक करके दुकानों पर तेल के दीये प्रज्वलित हो रहे थे, जिनकी लौ हवा के हल्के झोंकों से कांप उठती थी।

मदनरेखा अपनी दुकान के पटरे के पीछे बैठी थी। उसके चेहरे की रूपरेखा, घनी काजल लगी पलकें, अभेद्य और स्थिर भाव, दीये की पीली रोशनी में किसी तराशी हुई पाषाण-प्रतिमा जैसी लग रही थी। आज उसने कोई अर्क नहीं घिसा था। उसके सामने केवल एक मटमैली स्फटिक शीशी रखी थी, जिसमें मृत्यु से भी गहरा मौन कैद था।

दूर, एक स्तंभ की ओट में महर्षि वात्स्यायन एक मूक पाषाण की तरह खड़े थे। उनका पूरा ध्यान इस औपनिषदिक प्रयोग के चरम बिंदु पर केंद्रित था।

तभी, वही जानी-पहचानी, स्थिर और भारी पदचाप सुनाई दी।

जयवर्मन उस सुनहरी धुंध को चीरकर प्रकट हुआ। आज वह व्यापारी के विनम्र वेश में नहीं था। उसके कंधों पर गहरा नीला, यवनी शैली का भारी लबादा था, और उसकी आँखों में कल से भी अधिक तीखा, हिंसक ठहराव था। वह पटरे के ठीक सामने आकर रुका। उनके बीच की दूरी कल से भी कम थी।

"सूर्य अस्ताचल की ओर है, देवी," जयवर्मन का स्वर धीमा था, लेकिन उसकी गूंज किसी खींची हुई तलवार जैसी थी। "और तुमने आज अपने पटरे पर कोई नया भ्रम नहीं सजाया? क्या तुम्हारे सुगन्धों का शस्त्रागार समाप्त हो गया?"

मदनरेखा ने अपनी अथाह आँखें उठाईं और सीधे जयवर्मन की भेदक दृष्टि में उतार दीं। "भ्रम उनके लिए रचे जाते हैं, आर्य, जिन्हें यथार्थ से भय हो। मैंने सोचा, आज आपको आपकी उस मूल गंध में ही रहने दूँ... जो विनाश की आहट देती है।"

जयवर्मन के होंठों पर वही चिर-परिचित व्यंग्यात्मक मुस्कान खिंच गई। वह थोड़ा और आगे झुका, इतना कि पटरे के बीच रखे दीये की लौ दोनों के चेहरों पर एक साथ कांपने लगी।

"मूल गंध.." जयवर्मन ने शब्द को चबाते हुए कहा, जैसे किसी रहस्य का स्वाद ले रहा हो। "तुम जानती हो, देवी... पाटलिपुत्र के इस कोलाहल में सबसे रोचक व मादक गंध कौन सी है? वह तुम्हारी इस दुकान में बिकने वाले इत्र की नक्काशीदार शीशियों में नहीं मिलती... वह गंध तो महामात्य के उन गुप्त, अंधेरे कक्षों में जन्म लेती है।"

मदनरेखा की श्वास का एक रेशा भी नहीं डिगा। उसका चेहरा वैसा ही भावहीन और शांत रहा, जैसी उसे शिक्षा मिली थी। एक धीमी मुस्कान के साथ उसने कहा "महामात्य के कक्षों में साम्राज्य की नीतियां गढ़ी जाती हैं, आर्य। इत्र के अर्क नहीं।"

"और जब वे नीतियां रणभूमि में हांफने लगती हैं," जयवर्मन की फुसफुसाहट अब एक सर्पीली फुंकार में बदल चुकी थी, "तो महामात्य उन नीतियों को कस्तूरी, रेशम और काजल से सजाकर.. मृत्यु के सबसे सुंदर आवरण में बाज़ार में उतार देते हैं। जिसे यहाँ के भोले नागरिक इत्र बेचने वाली कहते हैं... और हम जैसे पारखी उसे विषकन्या के नाम से संबोधित करते है।"

सन्नाटा..!!!

बाज़ार का सारा शोर जैसे शून्य में जमकर बर्फ हो गया। केवल दीये की लौ फड़फड़ाने की आवाज़ शेष थी। स्तंभ के पीछे खड़े वात्स्यायन की उंगलियां अपने भोजपत्र पर कस गईं। खेल अब अपने चरम पर था। यवन कूटनीतिज्ञ ने अपना ब्रह्मास्त्र चला दिया था।

मदनरेखा ने पलकें नहीं झपकाईं। यदि वह एक साधारण गुप्तचर होती, तो सहम जाती या प्रहार कर बैठती। परंतु वह महामात्य की सबसे घातक और प्रशिक्षित अस्त्र थी और अब, महर्षि वात्स्यायन के औपनिषदिक अध्याय का एक जीवंत प्रयोग भी।

मदनरेखा के होंठों पर पहली बार एक मुस्कान उभरी.. अत्यंत सम्मोहक, परंतु उतनी ही प्राणघातक। उसने अपनी लंबी, कोमल उंगलियों से सामने रखी वह मटमैली स्फटिक शीशी उठाई और पटरे पर जयवर्मन की ओर खिसका दी।

"यदि किसी पात्र पर स्पष्ट रूप से काल लिखा हो, आर्य..." मदनरेखा की आवाज़ में रेशम सी नरमी और खंजर सी धार थी, "..और फिर भी कोई मुसाफ़िर उसे स्वेच्छा से अपने होठों से लगा ले.. तो मूर्ख कौन हुआ? वह विष, या वह जो उस विष का प्यासा है?"

जयवर्मन की आँखों में कुशाग्रता और मृत्यु-भय की एक मिली-जुली चमक कौंधी। उसने मदनरेखा के तर्क का कोई शाब्दिक खंडन नहीं किया। उसने शीशी को नहीं छुआ.. इसके बजाय, उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और शीशी पर टिकी मदनरेखा की ठंडी उंगलियों को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया।

स्पर्श..!!

मदनरेखा की त्वचा किसी हिमखंड की तरह सुन्न थी, और जयवर्मन का हाथ किसी धधकती भट्टी की तरह गर्म।

"मूर्ख वह नहीं जो प्यास बुझाने के लिए विष पीता है, देवी," जयवर्मन ने मदनरेखा की उंगलियों पर अपनी पकड़ हल्की सी कसते हुए कहा, जबकि उसकी नज़रें मदनरेखा के उन ज़हरीले होठों पर गड़ी थीं। "मूर्ख वह है जो यह सोचता है कि मृत्यु का भय उसे वश में कर सकता है। मैं तो यहाँ केवल यह तौलने आया हूँ कि तुम्हारे इस कालकूट में अधिक गहराई है... या मेरे इस उन्मादी समर्पण में।"

मदनरेखा ने अपना हाथ नहीं खींचा। वह जयवर्मन के इस खौफनाक दांव से भीतर तक हिल गई थी, लेकिन उसकी आँखों में अब युद्ध की ज्वाला भड़क उठी थी। वह उसके जाल में नहीं फंसेगी, उसे अपने ही जाल में उलझाएगी।

"समर्पण का अभिनय तो शिकार भी करता है, आर्य... किंतु तब, जब तीर उसके सीने को बेध चुका हो," मदनरेखा ने अपनी उंगलियों को जयवर्मन की पकड़ से एक सर्प की भांति सरकाते हुए छुड़ा लिया। "परंतु स्मरण रहे... इत्र और विष में एक मौलिक अंतर है। सुगन्ध हवा में उड़कर अपना अस्तित्व खो देती है, परंतु विष... विष रक्त में अपना एकाधिकार बना लेता है। आप इस ब्रह्मांड के किसी भी अँधेरे कोने में छिप जाएं, मेरा यह विष आपके भीतर ही धड़केगा।"

जयवर्मन सीधा खड़ा हुआ। उसके चेहरे पर अब एक विजयी, लेकिन भयावह शांति थी। "यही तो मेरी वास्तविक विजय है, मदनरेखा। कि जब मैं तुम्हारे इस साम्राज्य को जलाकर राख करूँ, तो उस राख के ढेर में भी केवल तुम्हारी ही महक शेष रहे।"

जयवर्मन ने अपनी जगह से एक कदम पीछे लिया। "कल रात्रि, राजमहल के पश्चिमी द्वार के पीछे जो परित्यक्त उद्यान है... वहाँ मेरी प्रतीक्षा करना। इत्र-विक्रेता बनकर नहीं... महामात्य की विषकन्या बनकर। देखते हैं, रात के अंधेरे में किसका अस्त्र अधिक अचूक प्रमाणित होता है।"

जयवर्मन मुड़ा और सुनहरी धुंध में उसी रहस्यमयी ढंग से विलीन हो गया।

मदनरेखा वहीं बैठी रही। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। जयवर्मन ने उसे नग्न चुनौती दी थी, रणभूमि में युद्ध खेलने आमंत्रित किया था.. देह, आकर्षण और भ्रम से खेला जाने वाला युद्ध..!!

दूर खड़े महर्षि वात्स्यायन ने एक गहरी, कांपती सांस ली। उन्होंने अपनी नरकुल की कलम को स्याही में डुबोया और उस गोधूलि की छांव में भोजपत्र पर युगों का सत्य लिख दिया:

'जब छल का आवरण हट जाए, सत्य पूर्णतः नग्न हो, और फिर भी प्राणों का आकर्षण तनिक भी कम न हो... तो वह सत्य स्वयं मृत्यु का आमंत्रण है.. और कामवासना का सर्वोच्च और सबसे भयंकर शिखर भी!'
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पाटलिपुत्र के राजमहल का पश्चिमी उद्यान जो वर्षों से पूरी तरह परित्यक्त और वीरान था, आज रात एक खौफनाक और मादक सौंदर्य से जीवंत हो उठा था। पूर्णमासी का चांद माधवी और मालती की घनी, उलझी हुई लताओं से छनकर पाषाण पर रूपहली आकृतियां निर्मित कर रहा था। रात की रानी और नागचंपा की भारी, मादक महक हवा में इतनी सघन थी कि सांस लेना भी किसी मदिरा को पीने जैसा प्रतीत हो रहा था। वहाँ न कोई प्रहरी आता था, न किसी सेवक का पहरा था। इसी निस्तब्धता का लाभ उठाकर, महर्षि वात्स्यायन एक प्राचीन बरगद के खोखले तने की गहरी ओट में, अपने भोजपत्र को साथ लिए हुए एक मूक पाषाण की भांति स्थिर बैठ गए थे।

तभी, सूखी पत्तियों पर किसी के भारी और स्थिर कदमों की चाप उभरी और जयवर्मन उस नीली चांदनी में प्रकट हुआ। उसने अपने शरीर से कूटनीति का हर आवरण उतार फेंका था। उसके चौड़े, युद्ध के निशानों से भरे वक्ष पर केवल एक झीना यवनी उत्तरीय था। उसकी आँखों में आज एक आदिम, बेलगाम ज्वाला थी।

उद्यान के मध्य में बनी एक प्राचीन, टूटी हुई संगमरमर की वेदी पर मदनरेखा खड़ी थी।
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K6

आज उसने काले रेशम का एक अत्यंत झीना अंतरीय धारण किया था। उसके होंठों पर कोई विष नहीं था, वे बिल्कुल प्राकृतिक और कोमल थे। उसकी देह से कस्तूरी के साथ एक अत्यंत दुर्लभ, तीक्ष्ण और मादक गंध उठ रही थी, कालकूट का वह अर्क, जिसे उसने अपनी देह के सबसे गुप्त और अंतरंग स्थान, योनिमुख पर धारण किया था। अब जो भी उस गहराई में उतरने का दुस्साहस करेगा, उसका लौटना असंभव होगा।

"मैंने सुना था मृत्यु होंठों पर सजती है, मदनरेखा.." जयवर्मन की भारी आवाज़ उस सन्नाटे में एक रेशमी चाबुक की तरह गूंजी। उसकी भेदक दृष्टि मदनरेखा के चेहरे से होती हुई उसके कांपते हुए अंतरीय तक गई। "परंतु तुम तो उस विष को अपने शरीर के सबसे गुप्त एकांत में छिपाकर लाई हो।"

मदनरेखा को एक क्षण के लिए आश्चर्य हुआ.. की इसका ज्ञान जयवर्मन को कैसे हुआ..!! उसे तैयार होने में सहायता करती उस वृद्धा के अतिरिक्त यह सत्य कोई नहीं जानता था.. और तभी उसका मस्तिष्क ठनका.. यवनी गुप्तचरों ने स्वर्ण-मुद्राओ देकर उस बूढ़ी स्त्री की निष्ठा को खरीद लिया होगा..!!

मदनरेखा की आँखों में एक बर्फीली चमक थी, लेकिन भीतर ही भीतर एक स्त्री का हृदय कांप रहा था। उसने एक कदम पीछे लिया। यह उसका कड़ा प्रशिक्षण था, शिकार को और नजदीक खींचने की कला।

"होंठों का विष तो कायरों के लिए होता है, आर्य," मदनरेखा का स्वर सम्मोहक और खतरे से भरा था। "जो योद्धा साम्राज्य को भीतर से भेदने का दंभ भरते हैं, उनका अंत सबसे भीतरी और एकांत भरी गहराइयों में ही होना चाहिए.. अब देखते हैंं कि क्या आप अपने पौरुषत्व को मेरे इस अंधकार में अंदर उतारने का साहस रखते हैं या नहीं?"

"जिसने मृत्यु को ही अपनी प्रेयसी मान लिया हो, उसे अंधकार का क्या भय?" एक ही झटके में जयवर्मन ने मदनरेखा को इतनी आक्रामकता से अपनी ओर खींचा कि उसकी पीठ वेदी के ठंडे संगमरमर से जा टकराई।

मदनरेखा का विषकन्या वाला मस्तिष्क तुरंत सक्रिय हुआ। उसने प्रतिरोध किया। परंतु जयवर्मन का वह हिंसक अधिकार और अदम्य पौरुष किसी भयंकर ज्वार की तरह था। यह एक हिंसक संघर्ष था, एक ओर प्रशिक्षित बल, दूसरी ओर बेलगाम जुनून।

ठीक उसी प्रकार, जैसे महर्षि विश्वामित्र का सदियों का कठोर तप और अजेय आत्मबल, मेनका के नैसर्गिक आकर्षण और एक क्षणिक दैहिक उन्माद के समक्ष रेत के महल की तरह ढह गया था... मदनरेखा का वर्षों का निष्ठुर प्रशिक्षण भी जयवर्मन के इस निर्भय, मृत्यु-आलिंगन के समक्ष पिघलने लगा। वह एक पाषाण-हृदय गुप्तचर थी, लेकिन जयवर्मन का अपनी मृत्यु को इतने उन्माद से गले लगाना एक ऐसा दुर्लभ और आदिम आकर्षण था जिसने मदनरेखा के मस्तिष्क की हर ढाल को एक ही क्षण में छिन्न-भिन्न कर दिया।

प्रतिरोध अब एक तीव्र, पागलपन भरे समर्पण में बदल चुका था। मदनरेखा की देह की मादक और प्राणघातक गंध जयवर्मन की रगों में उतरने लगी।

"यह कोई खेल नहीं है, यवन!" मदनरेखा ने हाँफते हुए कहा, उसके नाखून जयवर्मन के वक्ष पर गड़ गए। "ध्यान से... मेरा रोम-रोम तुम्हें भस्म कर सकता है!"

"तो हो जाने दो भस्म!" जयवर्मन की गर्जना उद्यान में गूंज उठी। उसने मदनरेखा के दोनों हाथों को एक ही झटके में पकड़कर वेदी के पत्थर पर जकड़ दिया। उसका चेहरा मदनरेखा के चेहरे के इतना करीब था कि उनकी सांसें आपस में टकरा रही थीं। "मैं आज तक कूटनीति के उथले समुद्रों में तैरता रहा... आज मुझे उस अतल गहराई में डूबना है.. यह देखने के लिए कि विजय एक विषकन्या के हलाहल की होती है, या उसके भीतर सुप्त एक स्त्री की इच्छाओं की!"

जयवर्मन का यह हिंसक अधिकार और उसका अदम्य पौरुष मदनरेखा के हर प्रतिरोध को पिघलाने लगा। मदनरेखा की आँखें बंद हो गईं। बरसों का कठोर प्रशिक्षण, महामात्य के आदेश, साम्राज्य की रक्षा, सब कुछ जयवर्मन के उस गर्म, झुलसा देने वाले स्पर्श के सामने भस्म होने लगा। उसने अपने हाथ ढीले कर दिए। प्रतिरोध अब एक तीव्र, पागलपन भरे समर्पण में बदल चुका था।

जयवर्मन ने एक क्रूर झटके से मदनरेखा के काले रेशमी अंतरीय का अंतिम आवरण भी हटा दिया.. वह मादक, प्राणघातक सुगन्ध अब सीधे हवा में घुल गई थी.. जयवर्मन ने समय नष्ट नहीं किया.. एक हिंसक, भूखे शेर की भांति उसने उस वर्जित और विषैली गहरी योनि पर अपना अधिकार जमा लिया..

मदनरेखा के शरीर की मादक सुगंध जयवर्मन के नथुनों में भरी जा रही थी.. इस कारण से वह चेतना शून्य सा अनुभव कर रहा था.. मदनरेखा जयवर्मन की पुरुषोचित गंध से मोहित थी.. इस सुगंध की मादकता के आगे स्वयं को विवश पा रही थी.. जयवर्मन के हाथ मदनरेखा के शरीर का अन्वेषण करने लगे..

जयवर्मन के अधर मदनरेखा की सुराही समान गरदन पर अपनी छाप छोड़ते हुए उस के वक्षस्थल पर पहुँच गये.. कंचुकी में कसे कठोर उरोजों के मध्य चुम्बन ले कर वह कंचुकी के ऊपर से ही स्तनाग्र को चुमने लगे.. जयवर्मन का हाथ मदनरेखा की सुडौल कमर को सहला रहा था..

मदनरेखा के हाथ जयवर्मन की छाती को सहला रहे थे फिर वह भी उसके कंधों को नाखूनों से नोचने लगी.. जयवर्मन के शरीर में विधुत धारा दौड़ गयी.. मदनरेखा के अधोवस्त्र को ढीला कर उसकी केले के तनों के समान जाँघों के मध्य में बसी योनि-रेखा का अन्वेषण करना शुरु किया.. मदनरेखा की योनि को सहला कर जयवर्मन ने उसे उत्तेजित करने का प्रयास किया.. योनि के अधरों पर लिप्त जामुनी रंग का विष उस अंधकार में प्रतीत नहीं हो रहा था..

मदनरेखा ने भी उस के अतःवस्त्रों को खोल दिया था और उस की लंगोट को ढीला कर उसके उत्तेजित लिंग को बाहर निकालकर सहलाना शुरु कर दिया.. मर्दन, काटने, चाटने के बाद दोनों के शरीर में दाह रूप में काम बहने लगा..

जयवर्मन मदनरेखा के उरोजों का हाथों द्वारा मर्दन करने लगा और स्तनाग्र का रस पान कर मदनरेखा की जाँघों के मध्य बैठ गया और उसकी टांगों को दोनों तरफ फैला दिया.. उस का मुसल समान तना लिंग मदनरेखा की योनि के मुँह को स्पर्श कर रहा था, मदनरेखा से अब अधिक प्रतीक्षा नहीं हो पा रही थी.. वह चाहती थी कि शीघ्र ही जयवर्मन अपने लिंग को उस की योनि में प्रविष्ट करें.. जयवर्मन ने उसके मन की बात को समझ कर अपने लिंग को उस की योनि के मुँह पर रख कर दबाब डाला तो लिंग विषैले होंठों को छूते हुए मदनरेखा की योनि में प्रवेश करने लगा..

लिंग का शिश्न-मुंड योनि में चला गया.. वहाँ नमी भी थी और गर्मी भी.. जयवर्मन ने दोबारा बल लगाया तो आधे से ज्यादा लिंग मदनरेखा की योनि की दीवारों को चीरता हुआ अंदर समा गया.. नीचे से मदनरेखा ने अपने नितंबों को उछाल कर, बचे लिंग को भी अपनी योनि में ग्रहण कर लिया..

जयवर्मन ने अपने कुल्हों का प्रहार तेज कर दिया.. उसकी जांघे मदनरेखा की योनि पर जोरदार प्रहार कर रहे थे.. मदनरेखा नीचे से कुल्हों को उठा कर उस का इन प्रहारों में साथ दे रही थी.. आहों और कराहों की ध्वनि से पूरा उद्यान गूंजने लगा..

जयवर्मन ने मदनरेखा के दोनों पांव अपने कंधों पर रखे और उस की कसी हुई योनि में अपना लोहे के मुसल समान कठोर लिंग डाल दिया और संभोग करने लगा.. योनि के कस जाने के कारण लिंग को अत्याधिक घर्षण मिल रहा था..

मदनरेखा के कंठ से एक अधूरी चीख निकल गई, जो दर्द, चरम सुख और मृत्यु के उस एकाकार होने का उद्घोष थी..

जयवर्मन का यह हिंसक अधिकार और उसका अदम्य पौरुष मदनरेखा के हर कड़े प्रतिरोध को पिघलाने लगा था.. जयवर्मन के वक्ष का तापमान किसी धधकते अंगारे सा था, जो मदनरेखा की बर्फीली, संवेदनहीन देह में एक अनियंत्रित दावानल भड़का रहा था..

यहीं से मदनरेखा का वास्तविक विखंडन शुरू हुआ.. महामात्य के अंधेरे तहखानों में उसे सिखाया गया था कि काम-वासना केवल दुर्बल मनुष्यों का रोग है.. दूसरों की कामुकता रूपी अशक्ति का उपयोग ही उसका अचूक अस्त्र थी, पर स्वयं उसके लिए रति-सुख या देह का कोई भी रोमांच एक वर्जित और अकल्पनीय अपराध था.. वर्षों के उस अमानवीय तप ने उसकी चेतना से किसी भी प्रकार की दैहिक लालसा को पूरी तरह कुचल दिया था..

किंतु आज... आज जयवर्मन के उस झुलसाते हुए, मृत्यु-रंजित स्पर्श ने उसके कठोर आवरण को झकझोर दिया.. उसकी नसों में एक ऐसी अदम्य और अपरिचित काम-पिपासा भर दी, जिस पर उसका अपना कोई वश नहीं था.. उसकी अपनी ही देह का यह बेलगाम और उन्मादी रोमांच, साँसों का यह अनियंत्रित वेग, और उस यवन के सशक्त लिंग का उसकी योनि में लयबद्ध आवागमन, उसके आलिंगन में पूरी तरह मिट जाने की वह अंधी लालसा... मदनरेखा के लिए यह नया एहसास मृत्यु से भी अधिक भयानक प्रतीत हो रहा था..

वह भीतर ही भीतर इस उत्तेजना से घृणा करना चाहती थी, पर जयवर्मन के हर प्रहार से उसकी योनि की भूख अधिक तीव्र होती जा रही थी.. जयवर्मन के लिंग के विष पीने से भी पहले, मदनरेखा का अपनी ही उठती हुई वासना और इस अकल्पनीय शारीरिक सुख के आगे इस तरह बेबस हो जाना, एक विषकन्या के रूप में उसके संपूर्ण अस्तित्व और उसके कठोर प्रशिक्षण की सबसे बड़ी, सबसे प्रामाणिक पराजय थी.. शस्त्र तो उसने अभी भी नहीं डाले थे किन्तु वह अपनी ही आत्मा से यह युद्ध हार चुकी थी..

विष अपना काम कर रहा था.. लिंग से होता हुआ जयवर्मन के समग्र शरीर में प्रविष्ट हो चुका था.. उसकी नसें तन गई थीं, उसकी साँसों में एक घरघराहट थी, किन्तु फिर भी गति में कोई शिथिलता नहीं आई.. बल्कि, विष की उस असह्य पीड़ा ने उसके प्रहारों को एक जंगली, आदिम उन्माद से भर दिया था.. वह जानबूझकर, हर सांस और हर झटके के साथ उस विष को किसी पवित्र मदिरा की भांति अपने भीतर सोख रहा था और साथ ही मदनरेखा की विषयुक्त योनि को भेद रहा था..

मदनरेखा छटपटा उठी। वह उसे दूर धकेलना चाहती थी, पर उसके अपने ही कांपते हाथ जयवर्मन की चौड़ी पीठ को और कसकर भींच रहे थे। यह कैसा अकल्पनीय विरोधाभास था! वह इस साम्राज्य की सबसे भयंकर विषकन्या थी, उसकी प्रत्येक सांस में मृत्यु थी, लेकिन इस क्षण... उस वेदी पर... वह उस मरणासन्न यवन के नीचे एक निःसहाय स्त्री की तरह कांप रही थी.. जयवर्मन उसकी देह की गहराइयों को भेद रहा था, अपने हर आक्रामक झटके के साथ, मदनरेखा की उस नवनिर्मित विवशता और उसकी चरम कामुकता पर आधिपत्य जमा रहा था जिसे वह जन्म-जन्मांतर तक नहीं उखाड़ सकेगी.. वह अपने विष से उसे मार रही थी, और वह मरते-मरते उसे भीतर से पूरी तरह खोखला कर रहा था..

और फिर वह क्षण आया.. जयवर्मन ने पूरी शक्ति से अपने लिंग को अंतिम प्रहार देकर भीतर तक धकेला.. शिश्न-मुंड के छिद्र से पौरुषपूर्ण वीर्य-रस, उस विषैले योनि मार्ग में बौछार दिया.. गर्म रस का अनुभव होते ही मदनरेखा के मस्तिष्क के संयम का अंतिम बांध टूट गया..

उसके भीतर एक ऐसा अंधा, आदिम बवंडर उठा जिसने उसकी पूरी चेतना को झकझोर कर रख दिया.. कंठ से एक घुटी हुई, लंबी चीख फूट पड़ी, चरम सुख की नहीं किन्तु अपनी ही वासना से हार जाने की वेदना और एक अकल्पनीय विवशता के रुदन की.. उसका देह एक कमान की तरह तन गया और उसके रोम-रोम से वह अमृत झर पड़ा जिसने आज विष के आगे घुटने टेक दिए थे.. उस एक क्षण के अनियंत्रित स्पंदन में मदनरेखा ने अपना सर्वस्व लुटा दिया.. साधारण दैहिक तृप्ति से तो वह पर थी.. यह एक ऐसा क्षण था जिसमें एक पाषाण विषकन्या का संहार हुआ और उस यवन के आधिपत्य तले एक विवश स्त्री ने अपनी सत्ता, अपनी पवित्रता और अपना सारा अहंकार हमेशा के लिए त्याग दिया..!!

विष ने अंततः जयवर्मन के मस्तिष्क पर अपना अंतिम प्रहार किया.. उसकी दृष्टि धुंधला गई, उसके स्नायु जवाब देने लगे.. वह एक अंतिम, पूरी शक्ति से किए गए प्रहार के साथ मदनरेखा की देह पर निढाल हो गया.. उसके होठ मदनरेखा के कान के पास थे.. उसकी साँसें टूट रही थीं, लेकिन उस मरणासन्न अवस्था में भी उसका अहंकार एक विजेता की तरह अखंड था.. उसने अपनी सुन्न होती उंगलियों से मदनरेखा के बालों को क्रूरता से जकड़ लिया और उसका चेहरा अपनी ओर खींचा..

उसने मदनरेखा के कान के पास हाँफते हुए, एक घरघराती फुसफुसाहट में केवल इतना कहा:

"तुम्हें लगा की मुझे मारकर तुम्हारी विजय हुई?" हांफते हुए बोल रहे जयवर्मन के चेहरे पर मुस्कान थी "मेरे प्राण निकलते ही.. तुम और तुम्हारा यह महान राज्य, दोनों ही परास्त हो जाएंगे। पाटलिपुत्र अब राख में परिवर्तित होगा.. और तुम.. आजीवन मेरे इस स्पर्श की दासी.."

बस इतना ही। कोई लंबी गूंज नहीं, कोई विलाप नहीं। एक अचूक कूटनीतिक जीत का क्रूर सत्य उगलकर जयवर्मन का भारी, निर्जीव शरीर मदनरेखा के ऊपर चेतना-शून्य होकर गिरा।

वेदी पर पसरा वह सन्नाटा भयानक था.. मदनरेखा उसी अवस्था में, उस यवन योद्धा के भारी शरीर के नीचे दबी पड़ी रही.. उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं.. उसकी देह के उस सबसे एकांत और गहरे हिस्से में अब भी जयवर्मन का वह हिंसक, विजयी आधिपत्य स्पंदित हो रहा था.. जयवर्मन ने मृत्यु को गले लगाकर मदनरेखा के भीतर का पूरा साम्राज्य लूट लिया था.. महामात्य की जो विषकन्या कभी अपनी भावनाओं के आगे नहीं झुकी थी, आज अपनी ही इच्छाओं और एक मृतप्राय पुरुष के नीचे पूर्णतः निःसहाय और परास्त थी..

मदनरेखा ने अपनी कांपती उंगलियों से जयवर्मन के निर्जीव से प्रतीत होते सिर को अपने सीने से लगा लिया.. पहली बार, पाटलिपुत्र की उस क्रूर हत्यारिन की आँखों से आंसू टूटकर संगमरमर पर गिर पड़े.. वह जानती थी कि जयवर्मन का शरीर भले ही सुन्न पड़ गया हो, लेकिन वह अब मदनरेखा के मन में हमेशा के लिए जीवित हो गया था..

K8

बरगद के तने के पीछे से महर्षि वात्स्यायन धीरे से बाहर निकले। इस मनोवैज्ञानिक संभोग ने उन्हें भीतर तक झकझोर कर रख दिया था। आज उन्होंने काम-वासना और मृत्यु का वह आदिम नृत्य देखा था, जो किसी भी शास्त्र की सीमाओं से परे था..!! उन्होंने अपनी कांपती हुई उंगलियों से नरकुल की कलम को संभाला, और उस नीली चांदनी में भोजपत्र पर अपने औपनिषदिक अध्याय का अंतिम निष्कर्ष लिख दिया:

K9

मृत्युर्यत्र हि शृङ्गारः प्राणत्यागो वशीकृतिः..
विजेत्री तत्र कामेन स्वेनैव परिजीयते॥


अर्थात काम-संग्राम के जिस अकल्पनीय क्षण में मृत्यु ही देह का शृंगार बन जाए, और प्राणों का निर्भय उत्सर्ग ही सबसे अचूक वशीकरण हो... वहाँ शारीरिक रूप से विजयी होने वाली अजेय स्त्री अपनी ही जाग्रत वासना और विवशता के सम्मुख पूर्णतः पराजित हो जाती है..!!

चांदनी उस वेदी पर लिपटे उन दो शरीरों को एक ही परछाई में बदल चुकी थी.. उस रात पाटलिपुत्र के उद्यान में एक यवन योद्धा अपनी चेतना हार गया, एक विषकन्या अपना अहंकार हार गई और वात्स्यायन को अपने ग्रंथ का सबसे अमर सत्य मिल गया.. छाया और शृंगार का यह अध्याय अब पूर्ण हो चुका था..

समाप्त
 
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vakharia

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Supreme
6,417
22,498
174
पचास करोड़ की राख

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अस्वीकरण

यह एक पूर्णतः काल्पनिक कहानी है। इसके सभी पात्र, घटनाएँ और स्थान लेखक की कल्पना मात्र हैं। कहानी को रोचक बनाने के लिए रचनात्मक स्वतंत्रता ली गई है, इसलिए यदि आपको इसमें किसी भी प्रकार की कोई विसंगतता नज़र आती है, तो कृपया उसे इसी रचनात्मक छूट का हिस्सा मानें। इसका वास्तविक जीवन की किसी घटना, व्यक्ति या स्थान से कोई सीधा संबंध नहीं है।

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वड़ोदरा शहर में उस रात आसमान से पानी की जगह जैसे कोई मनहूसियत बरस रही थी। विश्वामित्री नदी के किनारे वाले सुनसान रास्तों पर म्युनिसिपैलिटी की सफेद एलईडी स्ट्रीट लाइटें बारिश के थपेड़ों से आँख मिचौली खेल रही थीं। अगस्त का महीना था, और उमस भरी गर्मी के बाद आई इस मूसलाधार बारिश ने पूरे शहर को अपने घरों में दुबकने पर मजबूर कर दिया था। वैसे भी यह काफी शांत शहर था जो आम दिनों में भी रात के दस बजे के बाद थम जाता था.. अब तो रात के ग्यारह बजने वाले थे। शहर के पॉश इलाके अलकापुरी की चकाचौंध से दूर, नदी के पास स्थित ‘ठक्कर सिंटेक्स’ की सालों से बंद पड़ी मिल के लोहे के भारी, जंग खाए गेट के बाहर एक काले रंग की शानदार मर्सिडीज़ कार आकर रुकी।

इंजन बंद हुआ, लेकिन कार की हेडलाइट्स अभी भी चालू थीं, जिनकी रोशनी मिल के उस बंद गेट पर पड़ रही थी, जिस पर कभी ‘गुजरात के नंबर वन कपड़ा मिल’ का बोर्ड लगा होता था।

ड्राइवर सीट का दरवाज़ा खुला और छप्पन वर्षीय वीरेंद्र ठक्कर बाहर निकले। वीरेंद्र, जो कभी गुजरात के कपड़ा बाज़ार के बेताज बादशाह हुआ करते थे, आज उनके चेहरे पर एक अजीब सी थकान और गहरी खामोशी थी। उन्होंने अपना छाता नहीं खोला। बारिश की मोटी-मोटी बूंदें उनके महंगे ग्रे सूट को भिगो रही थीं। उनके बाल माथे पर चिपक गए थे, लेकिन उन्हें जैसे कोई परवाह नहीं थी। वे मिल के गेट को एकटक निहार रहे थे.. उसी मिल की तरफ, जो कभी उनका गुरूर थी, जहाँ कभी तीन शिफ्टों में हज़ारों मज़दूर काम करते थे, और वही मिल अब उनका सबसे बड़ा नासूर बन चुकी थी।

वीरेंद्र ने अपनी कलाई पर बंधी सोने की रोलेक्स घड़ी देखी। ग्यारह बजने में दो मिनट बाकी थे। उन्होंने एक गहरी सांस ली। ठंडी हवा के झोंके उनके शरीर को कंपा रहे थे, लेकिन उनके भीतर एक ऐसा बवंडर चल रहा था जिसके सामने यह तूफ़ान तो कुछ भी नहीं था। उनका दिमाग उनके जीवन के सुनहरे और काले पन्नों को एक-एक करके पलट रहा था.. व्यापार में मिली वो पहली कामयाबी, पहली पत्नी का देहांत, अपनी मासूम मूक-बधिर बेटी तारा का चेहरा, और फिर कर्ज़ के उस दलदल की शुरुआत जिसने आज उन्हें इस बंद मिल के दरवाज़े पर लाकर खड़ा कर दिया था।

सड़क के दोनों ओर मौत जैसा सन्नाटा पसरा था, सिवाय बारिश की बूंदों के छपाक और दूर विश्वामित्री नदी में मगरमच्छों के पानी में चलने से आ रही सरसराहट की आवाज़ों के।

अचानक, अंधेरे को चीरती हुई एक मोटरसाइकिल की पीली हेडलाइट चमकी। बारिश की धुंध को चीरती हुई वह रोशनी वीरेंद्र के चेहरे पर पड़ी। मोटरसाइकिल पर दो लोग सवार थे। दोनों ने घुटनों तक लंबे काले रेनकोट पहने हुए थे और उनके चेहरे हेलमेट के काले शीशों के पीछे पूरी तरह छिपे थे। इंजन की गुर्राहट नज़दीक आ रही थी।

कोई भी आम इंसान इस सुनसान सड़क पर आधी रात को एक बाइक और उन पर बैठे डरावने व्यक्तियों को अपनी तरफ तेज़ी से आता देख घबरा जाता। छिपने की कोशिश करता या कार में बैठकर भाग निकलता। लेकिन वीरेंद्र ने पलक तक नहीं झपकाई। वे अपनी जगह पर किसी पत्थर की मूर्ति की तरह खड़े रहे। उनके चेहरे पर ना कोई खौफ था, ना भागने की कोई छटपटाहट। उनकी आँखें उस मोटरसाइकिल की हेडलाइट में इस तरह गड़ी थीं जैसे कोई भटका हुआ मुसाफिर किसी मंज़िल की रोशनी को देखता है।

मोटरसाइकिल उनके करीब आकर एकदम धीमी हुई। पहियों से कीचड़ उछलकर वीरेंद्र के जूतों पर गिरा। पीछे बैठे शख्स ने अपनी भारी जैकेट के अंदर हाथ डाला और धातु की चमक वाली एक 9 एमएम की ऑटोमैटिक माउज़र पिस्टल निकाली। कातिल के हाथ में ज़रा सा भी कंपन नहीं था।

धायं! धायं! धायं!

गोलियों की गगनभेदी आवाज़ बारिश के शोर को चीरती हुई गूंजी। तीन सीसे के गर्म टुकड़े वीरेंद्र के चौड़े सीने को छलनी कर गए। एक पल के लिए उनका शरीर हवा में तना, उनकी आँखों में एक अजीब सा इत्मीनान उभरा, और फिर उनका भारी भरकम शरीर एक झटके के साथ ज़मीन पर गिर पड़ा। सूट का ग्रे रंग सीने के पास गहरा लाल होने लगा। उनका गर्म खून बारिश के ठंडे पानी में मिलकर सड़क पर लाल लकीरें बनाते हुए ढलान की तरफ बहने लगा।

मोटरसाइकिल सवार एक सेकंड के लिए भी यह देखने नहीं रुके कि काम पूरा हुआ या नहीं। उन्होंने गियर बदला और रात के गहरे अंधेरे में कहीं विलीन हो गए। मर्सिडीज़ की हेडलाइट की रोशनी में ज़मीन पर पड़ा बड़ौदा का वह बहुत बड़ा उद्योगपति अपनी ही मिल के बाहर दम तोड़ चुका था। लेकिन वीरेंद्र के बेजान चेहरे पर मौत की दहशत नहीं थी; वहां शांति थी, जैसे आज उन्होंने अपना सबसे बड़ा और सबसे मुनाफे वाला सौदा तय कर लिया हो।
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शहर के सबसे काबिल और शांत दिमाग वाले पुलिस अफसर, सीनियर इंस्पेक्टर अनिरुद्ध जडेजा को जब सुबह छह बजे यह केस सौंपा गया, तब तक लोकल मीडिया और न्यूज़ चैनलों ने आसमान सिर पर उठा लिया था। "कपड़ा किंग वीरेंद्र ठक्कर की सरेआम हत्या," "बड़ौदा पुलिस सो रही है".. जैसी हेडलाइंस टीवी स्क्रीन पर चीख रही थीं।

जडेजा पुलिसिया रौब-दाब, गालियों और चीख-पुकार से कोसों दूर रहने वाले, एक बेहद साधारण से दिखने वाले इंसान थे। उनकी उम्र बयालीस के आसपास थी, हल्की खिचड़ी होती दाढ़ी, और आँखों पर एक सिल्वर फ्रेम का चश्मा। उनकी खासियत उनकी आँखें थीं, जो इंसान के दिमाग का एक्स-रे निकाल लेती थीं। उनके फ्लैट में काफी सारी किताबें थीं। फुर्सत के पलों में खुद के ही खिलाफ अकेले शतरंज खेलना और गोल्डफ्लैक सिगरेट का धुआं उड़ाना.. उनके यह दो ही शौक थे। जब फोन की घंटी बजी, तब भी वे अपने बोर्ड पर सैलिसबरी अटैक की एक चाल का अभ्यास कर रहे थे।

सुबह के आठ बजे जब जडेजा मौका-ए-वारदात पर पहुंचे, तो बारिश रुक चुकी थी। लेकिन हवा में अब भी एक अजीब सी सीलन और खून की वो हल्की सी गंध बाकी थी जो मिट्टी में मिल जाती है। पीली पुलिस टेप से पूरे इलाके को घेर लिया गया था। लाश को पोस्टमार्टम के लिए सयाजी अस्पताल भेजा जा चुका था।

जडेजा ने जीप से उतरते ही अपनी सिगरेट जलाई और फोरेंसिक टीम द्वारा ज़मीन पर बनाए गए चॉक के सफेद निशानों को गौर से देखने लगे। उनके साथ उनकी टीम का सबसे फुर्तीला लेकिन बातूनी सब-इंस्पेक्टर सोलंकी मौजूद था।

"सर, यह पक्का किसी प्रतिद्वंद्वी का काम है। वीरेंद्र जी के बहुत दुश्मन थे बाज़ार में। कपड़ा बाज़ार में उनकी मोनोपॉली कई लोगों को खटकती थी। कोई काँटे की तरह उन्हें रास्ते से हटाना चाहता होगा।" सोलंकी ने डायरी के पन्ने पलटते हुए अपनी थ्योरी पेश की।

जडेजा ने रिपोर्ट को एक सरसरी निगाह से देखा, सिगरेट का एक लंबा कश लिया और धुंआ छोड़ते हुए सड़क पर फैले खून के उस बड़े से धब्बे को देखने लगे जिसे बारिश भी पूरी तरह धो नहीं पाई थी।

"दुश्मन तो हर कामयाब आदमी के होते हैं सोलंकी," जडेजा ने बहुत धीमी लेकिन चुभने वाली आवाज़ में कहा।

"लेकिन इस सीन में कुछ ऐसा है जो किसी आम मर्डर में नहीं होता। जो आदमी तीन गोलियां खाने वाला हो, वो भागने की कोशिश क्यों नहीं करता? फोरेंसिक की शुरुआती रिपोर्ट कहती है कि वीरेंद्र बिल्कुल सीधे खड़े रहे। उनके हाथों या कोहनियों पर कोई बचाव के घाव नहीं हैं। जब कोई हम पर बंदूक तानता है, तो हमारा शरीर रिफ्लेक्स एक्शन में हाथ आगे कर देता है। लेकिन वीरेंद्र के दोनों हाथ नीचे थे। ना ही ज़मीन की कीचड़ में उनके जूतों की रगड़ या फिसलने के कोई निशान हैं जो भागने की जद्दोजहद दिखाते हों। ऐसा लग रहा है जैसे... जैसे वो कातिल को खुद न्योता दे रहे हों।"

सोलंकी ने सिर खुजलाया। "सर, हो सकता है वो डर के मारे सुन्न पड़ गए हों। मैंने देखा है, काफी बार ऐसा होता है.. कई बार तो मौत को सामने खड़ा देखकर मरने वाले का मूत और टट्टी भी निकल जाती है" इतना कहकर खी-खी-खी हंस रहे सोलंकी की तरफ जडेजा ने तीखी नज़रों से देखा। सोलंकी चुप हो गया।

जडेजा ने जवाब नहीं दिया। वे धीरे-धीरे वारदात की जगह का मुआयना करने लगे। तभी उनकी नज़र सड़क के किनारे, एक छोटे से गड्ढे में पड़े एक सुराग पर गई। यह वीरेंद्र का एक लेदर का महंगा जूता था जो शायद गिरते वक्त उनके पैर से निकल कर छिटक गया था। बारिश के कारण वह जूता कीचड़ से सन गया था।

जडेजा ने अपनी जेब से एक पारदर्शी प्लास्टिक बैग और रूमाल निकाला। उन्होंने उस जूते को बहुत एहतियात से उठाया। उनकी नज़र जूते की कीमत या ब्रांड पर नहीं, बल्कि उसके फीतों की गांठ पर टिक गई।

जिस तरह से लोग अपने जूतों के फीतों की नॉट लगाते है उस तरह की आम नॉट नहीं थी। वह एक बेहद उलझी हुई और खास प्रकार की गांठ थी.. एक डबल लूप आर्थोपेडिक नॉट।

जडेजा की आँखों के पीछे के गियर घूमने लगे। "सोलंकी," जडेजा ने जूते को बैग में डालते हुए कहा, "आम तौर पर लोग ऐसी गांठ नहीं बांधते। इसे बांधने में वक़्त लगता है और यह उनके लिए होती है जिन्हें टखनों या घुटनों में तकलीफ हो ताकि जूता बिल्कुल टाइट रहे। वीरेंद्र ठक्कर को कोई शारीरिक बीमारी थी?"

"अब मुझे क्या पता..!! इन्क्वायरी करनी पड़ेगी सर," सोलंकी ने डायरी में नोट करते हुए कहा।

जडेजा ने जूते के उस पारदर्शी बैग को अपनी जीप में रख दिया। एक छोटी सी, बेमानी सी लगने वाली यह जानकारी उनके दिमाग के बिसात पर एक प्यादे की तरह अपनी जगह ले चुकी थी। उन्हें यकीन था कि यह मर्डर जितना सीधा दिख रहा है, उतना है नहीं।
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वीरेंद्र ठक्कर का घर, अलकापुरी में स्थित 'ठक्कर पैलेस', किसी महल से कम नहीं था। ऊँची चारदीवारी, इटालियन मार्बल का फर्श और भारी-भरकम झूमर इसकी भव्यता की गवाही दे रहे थे। लेकिन जब जडेजा और सोलंकी वहां पूछताछ के लिए पहुंचे, तो जडेजा को इस महल में भव्यता से ज्यादा एक घुटन महसूस हुई। जैसे यह घर नहीं, एक बहुत बड़ा मकबरा हो जिसमें रहने वाले लोग अंदर से मर चुके हों।

हॉल में मातम का माहौल था, लेकिन जडेजा की पारखी नज़रें हर चेहरे पर चढ़े नकाब को बखूबी पढ़ रही थीं।

उन्होंने सबसे पहले वीरेंद्र की दूसरी पत्नी, कामिनी से पूछताछ की। कामिनी वीरेंद्र से उम्र में बीस साल छोटी थी। उसने सफेद लिबास पहना था और उसकी आँखों में आंसू थे। वह सोफे पर बैठी सिसकियां ले रही थी।

"मुझे कुछ नहीं पता इंस्पेक्टर साहब," कामिनी ने रुमाल से अपनी आँखें पोंछते हुए कहा। "वो कल रात खाना खाने के बाद अचानक उठे और बोले कि उन्हें कोई ज़रूरी काम है। मैंने रोका.. कहा इतनी तेज बारिश में जाने की कोई ज़रूरत नहीं है., लेकिन वो किसी की सुनते कहाँ थे..!! और फिर... सुबह पुलिस का फोन आया और.. और..।" वह सुबक-सुबककर रोने लगी

जडेजा ने कामिनी की आँखों में देखा। उन आंसुओं में दर्द काम और ग्लिसरीन की चमक ज्यादा नजर आ रही थी।

पुलिसिया पूछताछ और अपने खास मुखबिरों से की गई गुपचुप तफ्तीश से अगले चौबीस घंटों में जडेजा ने जो राज़ निकाले, वे किसी भी इंसान को जीते जी अंदर से मार देने के लिए काफी थे। 'ठक्कर पैलेस' में वीरेंद्र के अपने ही उनके खून के प्यासे थे।

कामिनी का वीरेंद्र से कोई भावनात्मक लगाव नहीं था। शहर के एक मशहूर और ऐयाश इंटीरियर डिज़ाइनर विक्रम शाह के साथ उसके नाजायज संबंध थे। जडेजा के पास विक्रम और कामिनी की फोन रिकॉर्डिंग और होटल के बिल्स पहुँच चुके थे। दोनों वीरेंद्र के पैसों पर ऐश कर रहे थे और वीरेंद्र के रास्ते से हटने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे ताकि वे पूरी संपत्ति हथिया सकें।

दूसरी तरफ था वीरेंद्र का सगा छोटा भाई, गजेंद्र। गजेंद्र एक नर्वस, पसीने से लथपथ रहने वाला आदमी था जिसकी उंगलियां सिगरेट पीते वक्त हमेशा कांपती थीं। उसे सट्टे और क्रिकेट की बुकीज़ की ऐसी खौफनाक लत थी कि उसने 'ठक्कर सिंटेक्स' के एकाउंट्स में भारी हेराफेरी करके करोड़ों रुपये चुपचाप आई.पी.एल पर सट्टा लगाने में लुटा दिए थे।

कंपनी के सी.ए. से पूछताछ करने पर जडेजा को जो पता चला, उसने केस को एक नया ही मोड़ दे दिया। वीरेंद्र ठक्कर अमीर नहीं थे; वे पूरी तरह से दिवालिया हो चुके थे! उन पर बाज़ार और बैंकों का इतना कर्ज़ था कि अगर वे मिल, घर, कारें और अपनी दोनों किडनी भी बेच देते, तब भी आधा कर्ज़ नहीं चुकता। कंपनी अंदर से दीमक लगी लकड़ी की तरह खोखली हो चुकी थी, सिर्फ बाहर का रंग-रोगन बाकी था। लेनदार उनके खून के प्यासे हो रहे थे और बैंकवाले उनके घर की नीलामी कभी भी करने वाले थे।

इन सब लालची भेड़ियों और फरेबियों के बीच उस विशाल, ठंडे घर में सिर्फ एक ही मासूम जान थी.. तारा। वीरेंद्र की पहली पत्नी से हुई बेटी।

जडेजा जब घर का मुआयना कर रहे थे, तब उन्होंने तारा को सीढ़ियों पर चुपचाप बैठे देखा। वह जन्म से ही बोल और सुन नहीं सकती थी। उसकी बड़ी-बड़ी गहरी आँखों में कोई आंसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसा सूनापन था जो किसी को भी डरा दे। वह दुनिया की आवाज़ें नहीं सुन सकती थी, लेकिन वह लोगों के चेहरों को पढ़ना बखूबी जानती थी। वीरेंद्र अगर इस फरेबी दुनिया में किसी से बेइंतहा प्यार करते थे, तो वो सिर्फ तारा थी। तारा ही उनकी कमज़ोरी थी और तारा ही उनकी इकलौती ताकत।

"कत्ल का मकसद तो इस घर की हर दीवार पर लिखा हुआ है सोलंकी," जडेजा ने पुलिस स्टेशन लौटकर अपनी डायरी में कुछ लिखते हुए कहा।

"पत्नी को अपने आशिक के साथ आज़ादी और दौलत चाहिए थी। भाई को अपने गबन पर पर्दा डालना था। और बाज़ार के लेनदारों को अपना पैसा और गुस्सा निकालना था। इन सब में से कोई भी कातिल हो सकता है। लेकिन..."

जडेजा रुके और अपनी सिगरेट जलाई, एक कश लगाते हुए बोले "...कत्ल का तरीका इतना सधा हुआ और पेशेवर है कि कामिनी या गजेंद्र खुद ट्रिगर नहीं दबा सकते। किसी ने सुपारी दी है। किसी ने पेशेवर कातिलों को खरीदा है।"
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केस को अभी तीन दिन ही हुए थे कि पुलिस स्टेशन में एक ऐसे नए किरदार की एंट्री हुई जिसने जडेजा की तफ्तीश की दिशा ही १८० डिग्री घुमा दी।

यह था जीवन सुरक्षा बीमा निगम का जोनल स्पेशल इन्वेस्टिगेटर.. सूर्यकांत देसाई। सूर्यकांत एक दुबला-पतला, गिद्ध जैसी तेज़ और शक्की नज़रों वाला आदमी था। उसका काम ही था करोड़ों के बीमा दावों में सुराख ढूंढना और उन्हें रिजेक्ट करवाना। वह नियमों का पक्का और भावनाओं से बिल्कुल खाली इंसान था।

सूर्यकांत बिना कोई अपॉइंटमेंट लिए सीधा जडेजा के केबिन में आकर बैठा और एक मोटी नीली फाइल धम्म से मेज़ पर रख दी।

"इंस्पेक्टर साहब, आप गलत दिशा में भाग रहे हैं। वीरेंद्र ठक्कर का कत्ल नहीं हुआ है। यह ५० करोड़ रुपये का एक बहुत बड़ा, सुनियोजित फ्रॉड है," सूर्यकांत ने सपाट, मशीनी आवाज़ में कहा।

चोंककर जडेजा ने अपनी शतरंज की बिसात से नज़र उठाई, उनकी भवें तन गईं। "५० करोड़ का फ्रॉड? ज़रा विस्तार से समझाइए।"

"जी। वीरेंद्र जी ने आज से ठीक २३ महीने और २८ दिन पहले ५० करोड़ रुपये की एक भारी-भरकम टर्म लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी ली थी।"

सूर्यकांत ने फाइल का एक पन्ना खोला। "इस पॉलिसी की इकलौती नॉमिनी उनकी वह गूंगी-बहरी बेटी, तारा है। कानूनी तौर पर इस पैसे को ना कोई बैंक ज़ब्त कर सकता है, ना उनका सट्टेबाज़ भाई गजेंद्र, और ना ही उनकी बेवफा पत्नी कामिनी। यह पूरा पैसा एक ट्रस्ट के ज़रिए सिर्फ तारा के सुरक्षित भविष्य के लिए है।"

सूर्यकांत ने फाइल का एक और खास पन्ना खोला और एक लाल लाइन से अंडरलाइन किए हुए क्लॉज़ पर अपनी लंबी उंगली रखते हुए बोला,

"इसे पढ़िए इंस्पेक्टर। क्लॉज़ नंबर ८ ... सुसाइड क्लॉज़। इसमें साफ लिखा है कि अगर पॉलिसी धारक पॉलिसी लेने की तारीख से २४ महीनों के भीतर आत्महत्या करता है, तो बीमा कंपनी एक भी रुपया क्लेम के तौर पर देने के लिए बाध्य नहीं होगी।"

जडेजा की आँखें सिकुड़ गईं। उनके दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। "मतलब अगर वीरेंद्र ने कर्ज़ से परेशान होकर आत्महत्या की होती, तो उनकी बच्ची को कुछ नहीं मिलता?"

"बिल्कुल शून्य!" सूर्यकांत ने मेज़ पर झुकते हुए कहा। "लेकिन ज़रा इस शैतानी खेल की टाइमिंग देखिए इंस्पेक्टर। इस पॉलिसी के २४ महीने पूरे होने में सिर्फ ४८ घंटे बाकी थे! अगर वीरेंद्र दो दिन बाद अपने कमरे में फांसी लगा लेता या चूहे मारने वाली दवाई गटक लेता, तो यह क्लॉज़ बेअसर हो जाता। उसे यह सब मर्डर का नाटक नहीं करना पड़ता। उसके मरने पर वैसे भी तारा को ५० करोड़ मिल जाते। लेकिन यही पर कहानी दिलचस्प हो जाती है.. वो ४८ घंटे भी इंतज़ार नहीं कर सकता था।"

"क्यों नहीं कर सकता था?" सोलंकी ने बीच में टोकते हुए पूछा।

"क्योंकि," सूर्यकांत ने एक लीगल नोटिस फाइल से निकालकर मेज़ पर फेंका, "ठीक अगली सुबह, यानी जिस रात उनका कत्ल हुआ, उसकी अगली सुबह बैंक रिकवरी एजेंट पुलिस के साथ उनके घर 'ठक्कर पैलेस' और उनकी मिल को जब्त करने वाले थे। पेपर तैयार थे। अगर वो ४८ घंटे इंतज़ार करता, तो उसका परिवार सड़क पर आ जाता, घर सील हो जाता और पुलिस की जांच-पड़ताल में आत्महत्या का मामला महीनों लटक जाता। उसे तुरंत, इसी वक्त अपनी मौत और ५० करोड़ चाहिए थे।"

सूर्यकांत की आँखें चमकने लगीं। "और वो तभी मुमकिन था जब उसकी मौत आत्महत्या नहीं, बल्कि एक कत्ल साबित हो। मेरा दावा है इंस्पेक्टर, वीरेंद्र ठक्कर ने खुद अपने कत्ल की सुपारी दी है ताकि वो ४८ घंटे की मोहलत और बैंक की कुर्की दोनों को एक झटके में मात दे सके!"

जडेजा अपनी कुर्सी पर बिल्कुल शांत बैठे रहे। उनके हाथ में सुलगती सिगरेट की राख गिरकर उनकी पैंट पर गिरी, लेकिन उन्हें अहसास नहीं हुआ। सूर्यकांत की थ्योरी में जो खौफनाक और प्रैक्टिकल लॉजिक था, वह किसी भी आम पुलिस वाले के होश उड़ाने के लिए काफी था। एक बाप, जिसे पता है कि वह बर्बाद हो चुका है, अपनी इकलौती बेबस बच्ची का भविष्य सुरक्षित करने के लिए अपनी जान का सौदा कर रहा है?

"यह महज़ आपकी एक थ्योरी है सूर्यकांत जी," जडेजा ने सिगरेट बुझाते हुए कहा। "अदालत में थ्योरी नहीं, सबूत चलते हैं। जब तक मैं कातिल को नहीं पकड़ लेता और यह साबित नहीं हो जाता कि सुपारी वीरेंद्र ने खुद दी थी, कानून की नज़रों में यह एक कत्ल ही है।"

"मैं सबूत ढूंढ लूंगा इंस्पेक्टर। और मेरी कंपनी एक भी रुपया तब तक रिलीज़ नहीं करेगी जब तक केस बंद नहीं हो जाता," सूर्यकांत चेतावनी भरे लहज़े में बोलकर चला गया।

सूर्यकांत के जाने के बाद, जडेजा की तफ्तीश में एक अजीब सी तेज़ी आ गई। तभी क्राइम ब्रांच के एक मुखबिर ने एक ऐसी पुख्ता सूचना दी जिसने भूचाल ला दिया। एंथनी नाम का एक कुख्यात शार्पशूटर शहर के बाहरी इलाके, छानी जकातनाका के पास एक झुग्गी से पकड़ा गया।

एंथनी वही आदमी था जो उस रात मोटरसाइकिल के पीछे बैठा था। पुलिस स्टेशन के इंटेरोगेशन रूम का माहौल खौफनाक था। कड़क पुलिस रिमांड और सोलंकी की थर्ड डिग्री के आगे एंथनी ज्यादा देर टिक नहीं पाया। उसका चेहरा सूज गया था और होंठ से खून बह रहा था।

"मारो मत साब.. बताता है.. बताता है.. साब, अपुन ने ही ठोका था उस सेठ को," एंथनी ने ज़मीन पर खून थूकते हुए हांफती हुई आवाज़ में कहा। "लेकिन अपुन का सेठ से कोई मैटर नहीं था.. अपुन को तो सुपारी मिली और उसका गेम कर डाला..!!"

"किसने दी सुपारी? उसके सगे भाई गजेंद्र ने या उस डिज़ाइनर विक्रम ने? भेनचोद, सच बता वरना लोहे का गरम सरिया तेरी गाँड में डाल दूंगा," जडेजा ने उसकी कॉलर पकड़ते हुए पूछा।

"गॉड की कसम साब, अपुन किसी गजेंद्र-वजेंद्र को नहीं जानता। अपुन को एक हफ्ते पहले फतेहगंज इलाके में वो पुरानी ईरानी होटल है ना.. उधर कोई तो मेरेकु आने को बोला। उधर गया तो कोई बूढ़ा पारसी था... खुद का नाम रुस्तम बता रैला था। हाथ में एक लकड़ी का छड़ी था, लंबा काला कोट और सिर पर गोल टोपी.. वो पारसी लोग पेनते ना.. वैसा इच.. काला चश्मा भी डालेला था। लंगड़ा लंगड़ा चलता था साला। उसने अपुन को टेबल के नीचे से पाँच लाख रुपया रोकड़ा एडवांस दिया, सेठ का फोटो दिया और बोला कि सेठ रात को ११ बजे मिल के बाहर खड़ा होइंगा.. उसका काम खल्लास करने का। अपुन वहीच किया.. ठोक दिया सेठ को।"

जडेजा का माथा ठनका। एक लंगड़ाता हुआ बूढ़ा पारसी? यह किरदार तो इस पूरी कहानी में कहीं फिट ही नहीं बैठ रहा था..!! ना विक्रम पारसी था, ना गजेंद्र और ठक्कर की बीवी होने का सवाल ही पैदा नहीं होता था..!!! अब क्या करे..!!

तुरंत पुलिस की एक टीम उस ईरानी कैफे पहुंची। कैफे बहुत पुराना था, जहाँ अब इक्का-दुक्का लोग ही आते थे। मालिक से पूछताछ में पता चला कि वह पारसी आदमी सिर्फ एक ही दिन वहां आया था और कोने की टेबल पर बैठा था। गनीमत यह थी कि चोरी के डर से कैफे के कैश काउंटर पर एक धुंधला सा सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ था जो उस कोने को भी थोड़ा बहुत कवर करता था। पुलिस ने तुरंत डीवीआर ज़ब्त कर लिया।

रात के दो बजे थे। पूरा पुलिस स्टेशन खाली हो चुका था, सिर्फ बाहर पहरेदार की खांसने की आवाज़ आ रही थी। जडेजा अपने केबिन की मंद रोशनी में अकेले बैठे उस फुटेज को कंप्यूटर पर बार-बार रिवाइंड करके देख रहे थे।

कैमरे की क्वालिटी बहुत खराब और धुंधली थी। उसमें एंथनी एक बूढ़े, झुककर चलने वाले आदमी से बात करता नज़र आ रहा था। उस आदमी ने लंबा पारसी कोट और सिर पर टोपी पहनी हुई थी। उसने अपनी दाढ़ी और बड़े काले चश्मे से अपना चेहरा इस तरह छिपाया था कि उसकी असली शक्ल पहचानना नामुमकिन था।

जडेजा ने फुटेज को फ्रेम-दर-फ्रेम आगे बढ़ाया। वे उस पारसी आदमी के हाव-भाव, उसकी बॉडी लैंग्वेज को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे। तभी उनकी पारखी नज़र उस पारसी आदमी के पैरों पर गई। कैमरा एंगल ऊपर से नीचे की तरफ था, इसलिए फर्श साफ दिख रहा था। उस बूढ़े आदमी ने चमड़े के भारी आर्थोपेडिक जूते पहने हुए थे।

जडेजा ने माउस से उस हिस्से को ज़ूम किया। पिक्सल्स फटने लगे, लेकिन जो तस्वीर उभरी, उसने जडेजा की सांसें रोक दीं।

उन्होंने स्क्रीन को फ्रीज़ किया। उन भारी जूतों के फीतों की गांठ... वह एक डबल लूप आर्थोपेडिक नॉट थी! बिल्कुल हूबहू वही अजीबोगरीब गांठ जो वारदात की जगह पर मिले वीरेंद्र ठक्कर के कीचड़ सने जूते में बंधी थी..!!!

वीरेंद्र को पिछले पांच सालों से घुटनों और टखनों में आर्थराइटिस की गंभीर समस्या थी, जिसके कारण उनके डॉक्टर ने उन्हें एक खास तरह के जूते और इस जटिल गांठ को बांधने की सलाह दी थी यह जडेजा ने ठक्कर पैलेस से जब्त की हुई मेडिकल फाइल्स से जाना था।

जडेजा के हाथ से सिगरेट नीचे ज़मीन पर गिर गई। उनके दिमाग में एक ऐसा धमाका हुआ जिसने इस पूरे केस के परखच्चे उड़ा दिए।

सूर्यकांत की खौफनाक थ्योरी सौ फीसदी सच थी..!!! उस ५० करोड़ की पॉलिसी और बैंक की जब्ती से बचने के लिए, एक बाप ने एक ऐसा खौफनाक नाटक रचा था जिसकी कोई आम इंसान कल्पना भी नहीं कर सकता। वीरेंद्र ने खुद एक पारसी का भेष बनाया। ईरानी कैफे में जाकर एक भाड़े के शूटर को सुपारी दी... किसी और को नहीं, बल्कि खुद को मारने की सुपारी..!!!

उन्होंने खुद एंथनी को अपना समय और मिल की लोकेशन बताई। और उस रात मिल के बाहर, बारिश में बिना किसी खौफ के अपनी मौत का इंतज़ार किया। गोलियां चलने पर वो भागे इसलिए नहीं, क्योंकि वो खुद मरना चाहते थे। वो चाहते थे कि दुनिया और पुलिस इसे एक कत्ल माने, ताकि उनकी गूंगी-बहरी बेटी को बीमा के ५० करोड़ रुपये बेदाग मिल सकें।

लेकिन.. लेकिन.. लेकिन..

बूढ़े पारसी के जूतों के फीतों का वीरेंद्र ठक्कर के जूतों से हूबहू मेल खाना, और ५० करोड़ की पॉलिसी बचाने का वह खौफनाक मकसद... यह सब जडेजा के शातिर दिमाग को यह मानने पर पूरी तरह मजबूर कर रहा था कि वह रहस्यमयी पारसी कोई और नहीं, खुद वीरेंद्र ठक्कर ही था। लेकिन एक अनुभवी पुलिस वाले की हैसियत से जडेजा यह भी बखूबी जानते थे कि यह महज़ एक मज़बूत सरकमस्टेनशीयल एविडंस है, कोई ठोस सबूत नहीं। कानून महज़ शक और थ्योरी पर नहीं चलता, उसे अदालत में टिकने वाले ठोस सुबूत चाहिए होते हैं।

सिर्फ फीतों की एक अजीबोगरीब गांठ के बल पर कानूनी तौर पर यह पक्के दावे के साथ नहीं कहा जा सकता था कि वह पारसी ही वीरेंद्र था। कोई भी तेज़-तर्रार वकील इसे महज़ एक इत्तेफाक साबित कर सकता था, या यह तर्क दे सकता था कि असली कातिल ने पुलिस को गुमराह करने के लिए जानबूझकर वैसे जूते पहने होंगे। जडेजा की थ्योरी सौ फीसदी सच थी, लेकिन इसे एक अटल हकीकत में बदलने के लिए उन्हें अब भी एक ऐसे चश्मदीद या सुबूत की सख्त दरकार थी, जो सीधे तौर पर वीरेंद्र को उस पारसी के भेष से जोड़ सके।
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अगली सुबह, जडेजा अपनी पुलिस जीप लेकर सीधे ठक्कर पैलेस पहुंचे। उनके हाथ में वह फाइल थी जिसमें इस पूरे केस का सच बंद था। घर के विशाल हॉल में मातम कम और तनाव ज्यादा था।

बीमा कंपनी का वह शातिर इन्वेस्टिगेटर सूर्यकांत वहां पहले से मौजूद था। वह वीरेंद्र की पत्नी कामिनी और भाई गजेंद्र से तीखे सवाल कर रहा था, उन्हें उलझाने की कोशिश कर रहा था ताकि किसी तरह उनके मुंह से कुछ ऐसा निकल जाए जिससे इस कत्ल को एक स्टेज्ड मर्डर (रचा गया कत्ल) या आत्महत्या साबित किया जा सके और ५० करोड़ का क्लेम हमेशा के लिए खारिज हो जाए।

"इंस्पेक्टर अनिरुद्ध जडेजा! आइए," सूर्यकांत ने जडेजा को देखते ही एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा। "मुझे यकीन है कि आपको भी वही सुराग मिल गए होंगे जो मेरी थ्योरी को सच साबित करते हैं। यह एक फ्रॉड है, इंस्पेक्टर। वीरेंद्र ठक्कर ने आत्महत्या की है।"

जडेजा ने सूर्यकांत को कोई जवाब नहीं दिया। उनका चेहरा किसी पत्थर की तरह भावहीन था। उनकी नज़रें सीढ़ियों के ऊपर वाले कमरे की तरफ थीं, जहां वीरेंद्र की बेटी तारा रहती थी। जडेजा चुपचाप हॉल से गुज़रे और भारी कदमों से सीढ़ियां चढ़कर ऊपर चले गए।

तारा का कमरा बिल्कुल शांत था। दीवारों पर तरह-तरह की रंग-बिरंगी ड्रॉइंग्स चिपकी थीं। आठ साल की वह मासूम बच्ची अपने बिस्तर पर घुटनों में सिर दिए गुमसुम बैठी थी। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे बता रहे थे कि वह कई रातों से सोई नहीं थी।

जडेजा उसके पास घुटनों के बल बैठे और बहुत प्यार से, एक पिता की तरह उसके सिर पर हाथ फेरा। तारा ने अपनी डबडबाई आँखों से उस खाकी वर्दी वाले पुलिस वाले को देखा। वह रो नहीं रही थी, लेकिन उसका सूनापन किसी भी रोने से ज्यादा तकलीफदेह था।

उसने अपने पास रखी अपनी ड्रॉइंग बुक उठाई। चूँकि तारा बोल और सुन नहीं सकती थी, इसलिए चित्र ही उसकी भाषा थे। वही उसका अपनी बात दुनिया तक पहुँचाने का ज़रिया था। उसने वह खुली हुई बुक जडेजा की तरफ बढ़ा दी।

जडेजा ने जैसे ही उस बुक का पन्ना देखा, उनके शरीर का सारा खून जैसे बर्फ बन गया। उनके रोंगटे खड़े हो गए और दिल की धड़कन एक पल के लिए रुक गई।

पन्ने पर मोमिया रंगों से एक बहुत ही स्पष्ट चित्र बना था। यह चित्र उस रात का था जिस दिन वीरेंद्र का कत्ल हुआ था। चित्र में एक आदमी ठक्कर पैलेस के पिछले दरवाज़े से बाहर जा रहा था। बाहर बारिश हो रही थी। उस आदमी ने लंबा काला पारसी कोट पहना था, सिर पर गोल टोपी थी, एक हाथ में छड़ी थी और सबसे नीचे जूतों में वही अजीबोगरीब डबल लूप वाली गांठ बंधी थी।

बच्ची उस रात जाग गई थी! नींद न आने के कारण वह शायद पानी पीने उठी होगी और उसने अपने पिता को उस अजीबोगरीब भेष में छुपकर घर से बाहर जाते देख लिया था। उसने अपने पिता की असली शक्ल तो नहीं देखी होगी क्योंकि चेहरे पर दाढ़ी और चश्मा था, लेकिन वह अपने पिता की पीठ, उनकी चाल और जूतों को पहचानती थी। चित्र के नीचे तारा ने टूटी-फूटी राइटिंग में लिखा था.. "पापा..."

जडेजा का दिमाग सुन्न हो गया। यह महज़ एक कागज़ का टुकड़ा नहीं था; यह सूर्यकांत के लिए ५० करोड़ रुपये की पॉलिसी को रद्दी में बदल देने वाला सबसे बड़ा, सबसे पुख्ता और सबसे चश्मदीद सबूत था!

यह इस बात का चीख-चीख कर सुबूत था कि ईरानी कैफे में सुपारी देने वाला पारसी कोई और नहीं, खुद वीरेंद्र थे। अगर यह कागज़ सूर्यकांत के हाथ लग गया, तो अदालत में यह साबित हो जाएगा कि वीरेंद्र ने खुद की हत्या करवाने की साज़िश रची थी जिसे टेक्नीकली आत्महत्या कहा जा सकता है, और इस बच्ची को एक फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी। यह बच्ची सड़क पर आ जाएगी, उन लालची भेड़ियों.. कामिनी और गजेंद्र.. के बीच जो इसे नोंच खाएंगे।

तभी जडेजा को दरवाज़े पर भारी पदचाप सुनाई दी। इन्वेस्टिगेटर सूर्यकांत सीढ़ियां चढ़कर कमरे की तरफ आ रहा था।

सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सूर्यकांत ने आवाज लगाई "इंस्पेक्टर साहब! क्या बच्ची ने कुछ बताया? क्या उसे उस रात के बारे में कुछ पता है?" सूर्यकांत की तेज़, चुभती हुई आवाज़ सीढ़ियों से गूंज रही थी।

जडेजा के पास फैसला करने के लिए सिर्फ चंद सेकंड थे..!! उनके सामने उनके जीवन का सबसे बड़ा धर्मसंकट खड़ा था। एक तरफ उनकी खाकी वर्दी की कसम, कानून का फर्ज़ और एक पुलिस वाले की सच्चाई थी तो दूसरी तरफ एक मरे हुए, कर्ज़ में डूबे लाचार बाप का अपनी जान देकर दिया गया आखिरी बलिदान और इस अनाथ, बेज़ुबान बच्ची का भविष्य था।

जडेजा ने तारा की आँखों में देखा। उन आँखों में दुनिया की सारी मासूमियत, बेबसी और एक अनकहा भरोसा सिमटा हुआ था।

जडेजा का कठोर पुलिसिया दिल पिघल गया। उनकी आँखें छलक उठीं। उन्होंने अपने कांपते हाथों से तारा की ड्रॉइंग बुक से वह पन्ना फाड़ा। उसे अपनी मुट्ठी में भींचा। उन्होंने अपनी पैंट की जेब से गोल्डफ्लैक सिगरेट जलाने वाला अपना पुराना ज़िपो लाइटर निकाला। उन्होंने लाइटर का ढक्कन खोला, चकमक रगड़ी और उस मुड़े हुए पन्ने को आग लगा दी।

कागज़ धू-धू कर जलने लगा। जैसे ही आग उनकी उंगलियों तक पहुंची और उन्हें जलन महसूस हुई, उन्होंने जलते हुए कागज़ की बची हुई राख को खुली खिड़की से बाहर उड़ेल दिया। राख हवा में उड़ते हुए नीचे बह रही नाली के गंदे पानी में मिलकर हमेशा के लिए मिट गई। इस राज़ का आखिरी सुबूत खत्म हो चुका था।

सूर्यकांत ने कमरे का दरवाज़ा खोला। उसकी तेज़, शक्की नज़रें जडेजा के पसीने से भीगे चेहरे पर टिक गईं।

"कुछ मिला इंस्पेक्टर? बच्ची के पास कोई सुराग है? अरे, ये जलने की बदबू कैसी आ रही है?" सूर्यकांत ने शक भरी निगाहों से पूछा।

जडेजा ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली, उसे जलाया, एक लंबा कश लिया और खिड़की के बाहर उस राख की तरफ देखते हुए एक ठंडी सांस ली। पूरे पचास करोड़ कीमत की थी वह राख..!! उनकी आवाज़ में अब कोई झिझक या डर नहीं था, बल्कि एक चट्टान जैसी दृढ़ता थी।

"कुछ नहीं सूर्यकांत जी," जडेजा ने सूर्यकांत की आँखों में सीधे, बेखौफ देखते हुए कहा। "बच्ची सो रही थी। मैंने अभी अपनी सिगरेट जलाई है, उसी की बदबू है। और जहाँ तक केस की बात है, यह एक सीधा-सीधा कत्ल है। व्यापारिक दुश्मनी का मामला है। वीरेंद्र ठक्कर के हत्यारे एंथनी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है और हम कल सुबह चार्जशीट फाइल कर देंगे। आपकी आत्महत्या की थ्योरी को साबित करने के लिए ना मेरे पास कोई सबूत है, और ना ही अदालत के पास कोई गवाह। आप अपनी कंपनी के हेड ऑफिस फोन कीजिए और कहिए कि बिना कोई और देरी किए, तारा के ट्रस्ट में ५० करोड़ रुपये तुरंत रिलीज़ करे।"

सूर्यकांत कुछ देर जडेजा को घूरता रहा। वह अपनी गिद्ध जैसी नज़रों से सच खोजना चाहता था। वह जानता था कि यह पुलिस वाला यकीनन कुछ छिपा रहा है, लेकिन बिना सबूत के वह पूरी तरह बेबस था। वह गुस्से में पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।

तारा अपनी मासूम, डबडबाई आँखों से जडेजा को देख रही थी। उसे शायद समझ नहीं आया कि उस पुलिस वाले अंकल ने उसकी बनाई हुई तस्वीर क्यों जला दी..!!!

जडेजा ने अपने घुटने टेके, उसके आंसू पोंछे और उसके गालों को प्यार से थपथपाया। उनके होंठों पर एक हल्की सी, सुकून भरी मुस्कान थी। बिना कुछ कहे वे कमरे से बाहर निकल गए।

अपनी जीप में वह पुलिस स्टेशन पहुंचे तब रात के नौ बज चुके थे.. जैसे ही वह अपनी मेज पर जाकर बैठे कि तुरंत वहाँ सब-इंस्पेक्टर सोलंकी आ पहुंचा..

"केस सॉल्व हो गया सर? किसे उठाना है? पत्नी को या भाई को?" सोलंकी ने उत्साह से पूछा।

जडेजा ने अपनी डायरी बंद की और खिड़की के बाहर देखते हुए एक गहरी सांस ली। "किसी को नहीं सोलंकी। इस केस में कोई कातिल नहीं है। जो मरा है, वही कातिल है।"

सोलंकी का मुंह खुला का खुला रह गया। "क्या मतलब सर?"

"मतलब यह सोलंकी," जडेजा ने शांत स्वर में समझाना शुरू किया, "कि वीरेंद्र ठक्कर एक बहुत ही शातिर और दूर की सोचने वाले खिलाड़ी थे। उन्हें पता चल गया था कि उनकी कंपनी तबाह हो चुकी है। उनके भाई ने उन्हें लूट लिया है, उनकी पत्नी उन्हें धोखा दे रही है और लेनदार उनकी चमड़ी उधेड़ने वाले हैं। उनके मरने के बाद उनकी लाडली और गूंगी बच्ची तारा को यह जालिम दुनिया नोच कर खा जाती।"

जडेजा ने सिगरेट जलाई, "ठक्कर के पास अपनी बच्ची को बचाने का सिर्फ एक ही रास्ता था.. वह ५० करोड़ की इंश्योरेंस पॉलिसी। लेकिन अगर वो कर्ज से तंग आकर ज़हर खा लेते या फांसी लगा लेते, तो इंश्योरेंस कंपनी सुसाइड क्लॉज़ के तहत क्लेम खारिज कर देती, क्योंकि पॉलिसी को अभी २४ महीने पूरे नहीं हुए थे। ठक्कर को पैसों की तुरंत ज़रूरत थी, क्योंकि दो दिन बाद बैंक वाले उनका घर जब्त करने वाले थे.. उनका परिवार और खासकर उनकी वह गूंगी बहरी बेटी रास्ते पर आ जाती।"

सोलंकी अब भी पूरी तरह समझ नहीं पा रहा था।

"इसलिए," जडेजा ने मेज़ पर मुक्का मारते हुए कहा, "एक बाप ने एक खौफनाक नाटक रचा..!! उसने खुद एक पारसी का भेष बनाया। ईरानी कैफे में जाकर एक भाड़े के शूटर को सुपारी दी... किसी और को नहीं, बल्कि खुद को मारने की सुपारी..!!! खुद उसे वक्त और जगह बताई। और उस रात मिल के बाहर, बारिश में बिना किसी खौफ के अपनी मौत का इंतज़ार किया। गोलियां चलने पर वो भागे इसलिए नहीं, क्योंकि वो खुद मरना चाहते थे। वो चाहते थे कि पुलिस और दुनिया इसे एक कत्ल माने, ताकि उनकी बेटी को बीमा के ५० करोड़ रुपये बेदाग मिल सकें!"

पूरे केबिन में एक भारी सन्नाटा छा गया। सोलंकी की आँखों में खौफ और सम्मान का एक मिला-जुला भाव था। "माय गॉड! एक इंसान अपनी बच्ची के लिए ऐसा भी कर सकता है?"

जडेजा ने मेज़ पर रखी वीरेंद्र ठक्कर की फाइल को उठाया और उसे एक अनसॉल्व्ड केस के फोल्डर में डाल दिया।

"क्या कर रहे हैं सर? हमें इंश्योरेंस कंपनी और कोर्ट को सच्चाई बतानी होगी" सोलंकी ने कहा।

इंस्पेक्टर जडेजा ने अपनी सिगरेट ऐशट्रे में कुचली और बोले, "कोर्ट सबूत मांगती है सोलंकी। एक शूटर के बयान और एक जूते की गांठ के आधार पर मैं एक मरे हुए बाप के आखिरी बलिदान को आत्महत्या साबित नहीं होने दूंगा। कानून अपनी जगह है और इंसानियत अपनी जगह। एंथनी जेल जाएगा क्योंकि उसने गोली चलाई है। कामिनी और गजेंद्र अपने किए की सज़ा इस गरीबी में घुट-घुट कर भुगतेंगे। और वो मासूम तारा... उसे उसका हक मिलेगा।"

जडेजा टेबल से खड़े हुए, अपनी टोपी पहनी और केबिन से बाहर निकल गए। पीछे मेज़ पर पड़ी उस फाइल में अब थी तो सिर्फ एक पिता की शहादत, जिसने मौत के बाज़ार में अपनी जान बेचकर अपनी बच्ची की ज़िंदगी खरीद ली थी।

कानून की किताब में उस दिन एक पुलिस वाला ज़रूर हार गया था, लेकिन एक बाप अपनी मौत के बाद भी, एक पुलिस वाले की इंसानियत के दम पर बाज़ी जीत गया था।

समाप्त
 
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hgupta112285

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क्या यही प्यार है

मेरा नाम अजय है। उम्र 20 साल। मैं 12वीं क्लास में पढ़ता हूँ। हमारे घर में सिर्फ चार लोग थे — मम्मी, पापा, मेरी बड़ी बहन नेहा और मैं। नेहा 26 साल की थी, कॉलेज के फाइनल ईयर में। उसका फिगर 32-28-34 था। गोरा रंग, लंबे काले बाल, बड़ी-बड़ी आँखें और वो मुस्कुराती थी तो पूरा घर रोशन हो जाता था। घर में सब उसे बहुत प्यार करते थे।

उस दिन सब कुछ सामान्य था। सुबह मम्मी-पापा ने बताया कि वे किसी रिश्तेदार की शादी में गाँव जा रहे हैं। पापा ने कहा, “हम कल शाम तक वापस आ जाएँगे। नेहा, अजय का ख्याल रखना।” नेहा ने हँसकर कहा, “चिंता मत करो पापा, मैं हूँ न।” उन्होंने गाड़ी निकाली और चले गए।

रात के करीब 9 बजे फोन आया।
पुलिस का फोन था।
“आपके माता-पिता की गाड़ी को ट्रक ने टक्कर मार दी है। दोनों की मौके पर ही मौत हो गई है।”

मैं और नेहा दोनों स्तब्ध रह गए। नेहा फोन हाथ में पकड़े रोने लगी। मैंने उसे गले लगा लिया। दोनों रोते रहे। रात भर हम दोनों एक-दूसरे को सहारा देते रहे। अगले दिन जब हम अस्पताल पहुँचे तो मम्मी-पापा का शरीर देखकर हम टूट गए। कोई रिश्तेदार नहीं था जो मदद कर सके। पापा के सारे भाई-बहन पहले ही अलग हो चुके थे। हम दोनों अकेले रह गए।

नेहा ने फैसला लिया — “अजय, अब मुझे कॉलेज छोड़ना पड़ेगा। मैं जॉब करूँगी। तू पढ़ाई जारी रख।”
मैंने रोते हुए कहा, “दीदी, तुम फाइनल ईयर में हो।”
नेहा ने मेरे सिर पर हाथ फेरा और बोली, “पढ़ाई बाद में कर लूँगी। पहले तुझे बड़ा करना है।”

नेहा ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। उसने एक प्राइवेट कंपनी में जॉब जॉइन कर ली। कंपनी का नाम “Vertex Solutions” था। नेहा वहाँ Marketing Executive के पद पर लगी। सैलरी अच्छी थी, लेकिन काम बहुत था।

कंपनी का बॉस **विक्रम मेहरा** था। उम्र 48 साल, तगड़ा शरीर, मोटा-मोटा चेहरा, लेकिन बहुत चालाक और थर्की। वह हर नई लड़की को नजरों से नापता था। नेहा को देखते ही उसकी नजरें चमक उठीं।

पहले कुछ महीने सब ठीक चला। नेहा सुबह 9 बजे ऑफिस जाती और शाम 7 बजे घर आ जाती। मैं घर पर पढ़ाई करता और खाना बनाता। लेकिन धीरे-धीरे विक्रम ने नेहा पर नजर रखनी शुरू कर दी।

एक दिन शाम को नेहा घर आई तो उसका चेहरा उतरा हुआ था।
“क्या हुआ दीदी?” मैंने पूछा।
नेहा ने सिर हिलाया, “कुछ नहीं अजय, बस थक गई हूँ।”

लेकिन मैंने देखा — नेहा की आँखें नम थीं।

अगले दिन विक्रम ने नेहा को अपने केबिन में बुलाया।
“नेहा, तुम्हारी परफॉर्मेंस अच्छी है। लेकिन कंपनी में कुछ प्रोजेक्ट्स हैं जो लेट हो रहे हैं। अगर तुम थोड़ा एक्स्ट्रा टाइम दो तो तुम्हें अच्छा इंक्रीमेंट मिल सकता है।”

नेहा ने हिचकिचाते हुए कहा, “सर, घर पर मेरा छोटा भाई है। मैं शाम को जल्दी जाना चाहती हूँ।”

विक्रम मुस्कुराया, “कोई बात नहीं। कल शाम 7 बजे मेरे साथ एक क्लाइंट मीटिंग है। तुम आ जाना।”

उस रात नेहा घर आई तो बहुत परेशान थी। मैंने पूछा तो उसने कहा, “बॉस ने मीटिंग के लिए बुलाया है।”

अगली शाम नेहा 7 बजे तक भी घर नहीं आई। मैं चिंतित था। रात 10 बजे के आसपास नेहा आई। उसका चेहरा लाल था, बाल बिखरे हुए थे, ब्लाउज का एक हुक खुला हुआ था।

“दीदी, क्या हुआ?” मैंने घबराकर पूछा।

नेहा ने मुझे गले लगा लिया और रो पड़ी।
“अजय… वो… विक्रम सर… बहुत थर्की है। आज मीटिंग में उसने मुझे शराब पिलाई और… मुझे छूने की कोशिश की।”

मैं स्तब्ध रह गया।

नेहा रोते हुए बोली, “मैंने मना किया, लेकिन उसने कहा कि अगर मैं नहीं मानी तो नौकरी चली जाएगी। अजय, हम दोनों अकेले हैं। अगर नौकरी चली गई तो हमारा क्या होगा?”

मैं कुछ नहीं बोल सका। बस दीदी को चुपचाप गले लगाए रहा।

उसके बाद विक्रम ने नेहा को पूरी तरह अपने जाल में फँसा लिया।



उस रात नेहा बहुत देर से घर आई। मैं दरवाजे पर खड़ा इंतजार कर रहा था। उसका चेहरा लाल था, आँखें नम थीं, बाल बिखरे हुए थे और ब्लाउज का एक हुक खुला हुआ था। वह सीधे अपने कमरे में चली गई। मैं उसके पीछे गया।

“दीदी… क्या हुआ?”

नेहा ने मुझे देखा और फिर फूट-फूट कर रो पड़ी। मैंने उसे गले लगा लिया। वह मेरी छाती पर सिर रखकर रोती रही।

“अजय… विक्रम सर… बहुत गंदा आदमी है। आज मीटिंग में उसने मुझे शराब पिलाई। मैंने मना किया, लेकिन उसने कहा कि अगर मैं नहीं मानी तो नौकरी चली जाएगी। उसने मेरी कमर पर हाथ रखा… मेरे ब्लाउज के ऊपर से… मुझे छूने की कोशिश की।”

मेरा खून खौल गया, लेकिन मैं कुछ नहीं बोल सका। हम दोनों अकेले थे। पैसे की सख्त जरूरत थी। नेहा की नौकरी ही हमारे खाने-पीने और मेरी पढ़ाई का सहारा थी।

अगले दिन सुबह नेहा ऑफिस गई। शाम को जब वह लौटी तो उसका चेहरा और भी उदास था।

“अजय… विक्रम सर ने आज मुझे अपने केबिन में बुलाया। उसने कहा कि कल शाम 7 बजे उसके फार्महाउस पर एक जरूरी क्लाइंट मीटिंग है। अगर मैं नहीं गई तो मुझे निकाल दिया जाएगा।”

मैं चुपचाप सुनता रहा। नेहा मेरे पास आई और मेरे हाथ पकड़कर बोली,

“मैं क्या करूँ अजय? अगर नौकरी चली गई तो हम दोनों सड़क पर आ जाएँगे। तू 12वीं में है… मैं तुझे पढ़ाई छुड़वा नहीं सकती।”

मैंने सिर्फ सिर हिला दिया। नेहा ने गहरी साँस ली और बोली,

“मैं जा रही हूँ… लेकिन बस मीटिंग के लिए। कुछ नहीं होने दूँगी।”

कल शाम 6:45 बजे नेहा तैयार हुई। उसने काली साड़ी पहनी थी — ब्लाउज बहुत छोटा और बैकलेस, साड़ी कमर से काफी नीचे बँधी हुई थी। वह आईने के सामने खड़ी होकर खुद को देख रही थी। उसकी आँखों में डर और मजबूरी साफ दिख रही थी।

“अजय… अगर मैं देर से आई तो चिंता मत करना।”
वह मेरे गाल पर किस करके चली गई।

रात 11:30 बजे तक नेहा नहीं आई। मैं बेचैनी से इंतजार कर रहा था। आखिरकार 12:10 बजे दरवाजे की घंटी बजी।

नेहा अंदर आई।
उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे लटक रहा था। ब्लाउज के दो हुक खुल चुके थे। उसके होंठ सूजे हुए थे, गालों पर लाली थी और आँखें सूजी हुई थीं। वह सीधे सोफे पर बैठ गई और रो पड़ी।

मैं उसके पास गया।
“दीदी… क्या हुआ?”

नेहा ने मुझे गले लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी।

“विक्रम सर… उसने मुझे फँसा लिया अजय।
कल क्लाइंट मीटिंग का बहाना था। वहाँ कोई क्लाइंट नहीं था। सिर्फ विक्रम सर और उसका एक दोस्त था। उन्होंने मुझे शराब पिलाई। मैंने मना किया, लेकिन उन्होंने कहा कि अगर मैंने उनकी बात नहीं मानी तो कल सुबह ही मेरी नौकरी चली जाएगी।

मैं रो रही थी… लेकिन उन्होंने मुझे घेर लिया।
विक्रम सर ने मेरी साड़ी का पल्लू खींचा… मेरे चुचों को ब्लाउज के ऊपर से दबाया… फिर ब्लाउज के हुक खोल दिए।
उसका दोस्त मेरी कमर से चिपक गया और मेरी गांड दबाने लगा।
मैंने रो-रोकर कहा कि ‘प्लीज सर… मैं शादीशुदा नहीं हूँ… मेरा छोटा भाई है…’ लेकिन उन्होंने सुना ही नहीं।

विक्रम सर ने मुझे बेड पर धकेल दिया।
उसने मेरी साड़ी पूरी खोल दी। मैं सिर्फ पैंटी और ब्रा में थी।
उसने मेरी ब्रा खींचकर उतार दी और मेरे चुचों को जोर-जोर से चूसने लगा।
उसका दोस्त मेरी पैंटी उतारकर मेरी चूत में उंगली डालने लगा।
मैं चीख रही थी… लेकिन विक्रम सर ने कहा, ‘चुप रह… वरना तेरी नौकरी चली जाएगी।’

फिर… विक्रम सर ने अपना लंड निकाला… बहुत मोटा और बड़ा था।
उसने मेरी टाँगें फैलाईं और एक झटके में पूरा लंड मेरी चूत में डाल दिया।
‘आआआह्ह्ह्ह!!!’ मैं चीख उठी।
वो जोर-जोर से ठोकने लगा… ‘चुद रंडी… तू तो बहुत टाइट है… तेरे पति जैसा कोई useless नहीं है… मैं तुझे रोज चोदूँगा।’

उसका दोस्त मेरे मुंह में अपना लंड ठूंस रहा था।
वे दोनों मुझे लगातार 40-45 मिनट तक चोदते रहे।
पहले विक्रम सर ने मेरी चूत में झड़ा… फिर उसका दोस्त ने मेरे मुंह में।
मैं रोती रही… लेकिन कुछ नहीं कर पाई।”

नेहा ने मुझे और कसकर गले लगा लिया।

“अजय… मैं मजबूर हूँ… अगर मैंने इनकार किया तो हम दोनों सड़क पर आ जाएँगे।
मैं तेरी पढ़ाई नहीं छुड़वा सकती… इसलिए… मुझे सब सहना पड़ेगा।”

मैं चुपचाप दीदी को गले लगाए बैठा रहा।
उस रात नेहा मेरे सीने पर सिर रखकर सोई। लेकिन उसकी आँखों में आँसू अभी भी थे।

अगले दिन से विक्रम सर ने नेहा को पूरी तरह अपने जाल में फँसा लिया।
वो अब नेहा को रोज शाम को अपने फार्महाउस या होटल बुलाने लगा।
नेहा हर बार मना करती… लेकिन मजबूरी में चली जाती।
वो मुझे घर आकर सब कुछ बता देती… और फिर रोती रहती।

लेकिन धीरे-धीरे… नेहा की मजबूरी उसे और गहरे गड्ढे में धकेलती जा रही थी।


उस रात नेहा मेरे सीने पर सिर रखकर रोती रही। मैं उसे चुपचाप सहारा देता रहा। उसकी साड़ी अभी भी आधी खुली हुई थी, ब्लाउज के हुक टूटे हुए थे, और उसके शरीर पर विक्रम और उसके दोस्त के हाथों के निशान साफ दिख रहे थे। नेहा की आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।
“अजय… मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा हो जाएगा। मैं सिर्फ नौकरी के लिए गई थी… लेकिन उन्होंने मुझे… मुझे रंडी बना दिया।”
मैं कुछ नहीं बोल सका। बस उसके बालों में हाथ फेरता रहा।
अगली सुबह नेहा ऑफिस जाने के लिए तैयार हुई। उसका चेहरा सूजा हुआ था, आँखें लाल थीं। मैंने कहा, “दीदी, आज मत जाना।”
नेहा ने मेरी तरफ देखा और बोली, “अगर मैं आज नहीं गई तो कल नौकरी चली जाएगी अजय। हम दोनों सड़क पर आ जाएँगे। तू 12वीं में है… मैं तुझे पढ़ाई छुड़वा नहीं सकती।”
वो चुपचाप चली गई।
शाम 7 बजे मेरे फोन पर नेहा का मैसेज आया —
“अजय, आज फिर मीटिंग है। देर हो सकती है। चिंता मत करना।”
रात 11:40 बजे नेहा घर आई। इस बार उसकी हालत और भी खराब थी। उसकी साड़ी का पल्लू कंधे पर लटक रहा था, ब्लाउज के सारे हुक खुल चुके थे, ब्रा का एक स्ट्रैप फटा हुआ था। उसके होंठ सूजे हुए थे, गालों पर लाल निशान थे और गर्दन पर विक्रम के दाँतों के निशान साफ दिख रहे थे।
नेहा अंदर आते ही सोफे पर बैठ गई और सिर पकड़कर रो पड़ी।
मैं उसके पास बैठ गया।
“दीदी… आज क्या हुआ?”
नेहा ने आँसू पोंछते हुए कहा,
“विक्रम सर ने आज मुझे फिर अपने फार्महाउस बुलाया। उसने कहा कि कल सुबह बोर्ड मीटिंग है और मुझे प्रेजेंटेशन तैयार करना है। लेकिन वहाँ कोई मीटिंग नहीं थी। सिर्फ विक्रम सर और उसका दोस्त था।
उन्होंने मुझे शराब पिलाई। मैंने मना किया तो विक्रम सर ने कहा, ‘अगर तू आज नहीं मानी तो कल तेरी नौकरी चली जाएगी और तेरे भाई की पढ़ाई भी रुक जाएगी।’
मैं रो रही थी… लेकिन उन्होंने मुझे घेर लिया।
विक्रम सर ने मुझे बेड पर धकेल दिया। उसने मेरी साड़ी खींचकर उतार दी। फिर मेरी ब्रा और पैंटी भी फाड़ दी।
उसने मेरे चुचों को जोर-जोर से चूसा… काटा… और कहा, ‘आज तुझे पूरा मजा दूँगा।’
उसका दोस्त मेरी गांड पर थप्पड़ मार रहा था।
फिर विक्रम सर ने अपना लंड निकाला… बहुत मोटा और लंबा था। उसने मेरी टाँगें कंधों पर रखीं और एक ही झटके में पूरा लंड मेरी चूत में ठूंस दिया।
‘आआआह्ह्ह्ह!!!’ मैं चीख उठी।
वो जोर-जोर से ठोकने लगा… ‘चुद रंडी… तू तो बहुत टाइट है… तेरे जैसे माल को तो रोज चोदना चाहिए।’
उसका दोस्त मेरे मुंह में लंड ठूंस रहा था।
वे दोनों मुझे लगातार 50 मिनट तक चोदते रहे। पहले विक्रम सर ने मेरी चूत में झड़ा… फिर उसका दोस्त ने मेरे मुंह में।
अंत में विक्रम सर ने मुझे गले लगाकर कहा, ‘अब तू मेरी प्रॉपर्टी है। हर शाम 7 बजे फार्महाउस पर आना पड़ेगा। वरना तेरी नौकरी और तेरे भाई की पढ़ाई दोनों खत्म।’”
नेहा ने मुझे और कसकर गले लगा लिया।
“अजय… मैं मजबूर हूँ। अगर मैं इनकार करूँगी तो हम दोनों भिखारी हो जाएँगे।
मैं तेरी पढ़ाई नहीं छुड़वा सकती… इसलिए… मुझे सब सहना पड़ेगा।”
उसके बाद नेहा की जिंदगी बदल गई।
विक्रम सर ने नेहा को पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया।
हर शाम 7 बजे नेहा फार्महाउस जाती।
वहाँ विक्रम और उसके दो-तीन दोस्त उसका इंतजार करते।
नेहा अब विरोध नहीं करती थी। वो चुपचाप सब सह लेती।
कभी-कभी विक्रम उसे होटल भी ले जाता, कभी कार में, कभी ऑफिस के बाद केबिन में।
एक दिन नेहा घर आई तो उसका चेहरा लाल था। उसने मुझे बताया,
“आज विक्रम सर ने मुझे ऑफिस के केबिन में बुलाया। उसने कहा कि आज बोर्ड मीटिंग है और मुझे प्रेजेंटेशन देना है। लेकिन मीटिंग में सिर्फ तीन लोग थे — विक्रम सर, उसका दोस्त और एक क्लाइंट।
उन्होंने मुझे टेबल पर लिटा दिया और तीनों ने मिलकर मुझे चोदा।
विक्रम सर मेरी चूत में… उसका दोस्त मेरी गांड में… और क्लाइंट मेरे मुंह में…
मैं चीखती रही… लेकिन उन्होंने रुकने का नाम नहीं लिया।
अंत में तीनों ने मेरी चूत, गांड और मुंह में झड़ दिया।”
नेहा ने मेरी तरफ देखा और बोली,
“अजय… अब मैं रोज़ ये सब सह रही हूँ।
मैं जानती हूँ ये गलत है… लेकिन हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है।
तू बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। मैं सब संभाल लूँगी।”
मैं चुपचाप दीदी को देखता रहा।
उसकी आँखों में अब शर्म नहीं, सिर्फ मजबूरी थी।


**क्या यही प्यार है? (अंतिम भाग)**

तीन महीने बीत गए थे।

नेहा अब पहले जैसी नहीं रही थी। उसका चेहरा हमेशा उदास रहता, आँखें सूजी रहतीं। वह ऑफिस से लौटती तो सीधे अपने कमरे में चली जाती। कई रातें वो बिना खाए सो जाती। मैं चुपचाप उसके लिए खाना रख देता। कभी-कभी रात को 2-3 बजे भी उसका फोन बजता — विक्रम सर का। नेहा फोन उठाती और धीरे से “जी सर…” कहकर बाहर चली जाती।

एक रात वो बहुत देर से आई। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे। ब्लाउज के सारे हुक टूटे हुए थे, साड़ी का पल्लू कंधे पर लटक रहा था, और उसके गालों पर लाल-लाल निशान थे। वह अंदर आते ही मेरे पैरों में गिर पड़ी और फूट-फूट कर रोने लगी।

“अजय… आज… आज विक्रम सर ने मुझे अपने तीन दोस्तों के साथ… फार्महाउस पर…
मैंने रो-रोकर कहा कि ‘सर प्लीज… मैं बहुत थक गई हूँ…’ लेकिन उन्होंने सुना ही नहीं।
चारों ने मिलकर मुझे घेर लिया… चारों तरफ से…
मेरी चूत, गांड, मुंह… सब जगह…
मैं चीखती रही… लेकिन उन्होंने रुकने का नाम नहीं लिया।
अंत में… चारों ने मेरे अंदर झड़ दिया…
मैं… मैं अब और नहीं सह सकती अजय…”

मैंने दीदी को उठाया और सीने से लगा लिया। उसके शरीर में अब ताकत नहीं बची थी। वह सिर्फ रो रही थी।

“दीदी… अब बस करो। हम कहीं चले जाते हैं। मैं पढ़ाई छोड़ दूँगा। हम दोनों कहीं मजदूरी करेंगे… लेकिन ये मत सहो।”

नेहा ने मेरे चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ा और आँसू भरी आँखों से देखा।

“अजय… तू अभी 12वीं में है। तेरी जिंदगी अभी शुरू होनी है।
अगर मैंने नौकरी छोड़ी तो हम दोनों भिखारी हो जाएँगे।
मैं… मैं सब सह लूँगी… बस तू अच्छे नंबर ला और कॉलेज जा।
तेरे लिए मैं कुछ भी सह सकती हूँ… क्योंकि… तू ही अब मेरा सब कुछ है।”

उसके बाद नेहा ने कभी विरोध नहीं किया।
विक्रम सर उसे अब रोज़ बुलाता। कभी फार्महाउस, कभी होटल, कभी ऑफिस के बाद।
कभी-कभी उसके दोस्त भी साथ होते। नेहा चुपचाप सब सह लेती।
घर आकर वो मुझे सब बता देती… और फिर मेरे सीने पर सिर रखकर रोती रहती।

एक शाम नेहा ऑफिस से लौटी तो उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।
उसने मुझे गले लगाया और धीरे से बोली,

“अजय… आज विक्रम सर ने कहा कि…
अगर मैं अगले महीने उसके साथ एक हफ्ते के लिए गोवा नहीं गई तो वो मेरी सारी फोटोज और वीडियो… तेरे कॉलेज ग्रुप में और रिश्तेदारों में भेज देगा।”

मैं स्तब्ध रह गया।

नेहा ने मेरे बालों में हाथ फेरा और मुस्कुराने की कोशिश की।
“मैं जा रही हूँ अजय… एक हफ्ता… बस एक हफ्ता।
फिर सब ठीक हो जाएगा। तू बस पढ़ाई पर ध्यान दे।”

सात दिन बाद नेहा गोवा से लौटी।
उसका चेहरा और भी टूटा हुआ था। उसने मुझे गले लगाया और बहुत देर तक रोती रही।

“अजय… अब मैं… अब मैं सचमुच उनकी रंडी बन चुकी हूँ।
वो लोग… हर रोज… अलग-अलग तरीके से…
मैंने सब सह लिया… तेरे लिए… सिर्फ तेरे लिए…”

मैं कुछ नहीं बोला। बस दीदी को और कसकर गले लगाए रखा।

उस रात नेहा मेरे कमरे में आई।
वो मेरे बेड पर लेट गई और मेरे सीने पर सिर रखकर बोली,

“अजय… क्या यही प्यार है?
जिसके लिए मैं अपनी इज्जत, अपना शरीर… सब कुछ कुर्बान कर रही हूँ…
क्या यही प्यार है बेटा?”

मैंने दीदी के बालों में हाथ फेरा और धीरे से कहा,

“हाँ दीदी… यही प्यार है।
जिसमें एक दूसरे के लिए सब कुछ सह लिया जाए…
वही सच्चा प्यार है।”

नेहा ने मेरी छाती पर आँसू गिराए और फुसफुसाई,

“तो फिर… मैं तेरे लिए हमेशा ये सब सहती रहूँगी…
क्योंकि तू ही अब मेरा सब कुछ है।”

---

**समाप्त**

कहानी खत्म हो गई।
यह एक मजबूरी, त्याग और अनोखे प्यार की कहानी थी।

कैसी लगी कहानी? 😊
 
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Romio1980

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Story name ek chance or

Dosto ye story ek ese ladke ki h jo bachpan se kamjor or darpok tha uske dade bhai behen ne use Dara dhmka kar rakte the

Or property ke lalach me aa kar dono ne milkar usko pahadi se dhakka de diya


Rohit hero

Sabnam badi behan

Aakash bada bhai

Suresh Kumar papa

Mamta. Mummy

Ye pariwar ek bada pariwar hai kafi naam h
To dono bade bhai behen apne Hero rohit se nafrat karte h kyoki vo chota or kamjor hone ki vajah se ma baap ka ladla h vo jo kuch mangta mummy papa usko la dete ye sab dekh kar dono bade bhai behen jal jate or nafrat badhti gai or ek din

Uski ghumne ke bahane pahadi par le ja kar dhakka mara or vo niche gir gaya or ghar aa gay mummy papa ko bataya ki Rohit ka pair pahadi se faisal gaya or vo niche gir gaya

Sab use dhoondne bhage pulice vale bhi niche ja kar dekhne lage par kuch pata nahi laga na hi uski body mili ma baap ka ro ro ke bura hal tha kyonki rohit se bahut payar karte the
Idhar rohit ek bahut shandar jagah khada tha charo taraf badal ud rahe the or ek safed ka kapdo me bujurg samne khada bola putra tumhe kuch saktiyo ke sath ek chance or jindgi jine ka mila h ab tum vapis jao or ache se jindgi jio


Or jab uski ankh khuli to vo apne room main tha utha fresh hua or bahar aaya to mummy papa ne use gale laga liya or rote huy mummy boli beta kahan chala gaya tha hume chodh kar to main bola mummy main to room me so Raha tha

Ye sun kar dono bhai behen heran ho gay
 
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Theme - Incest, Step Mother and Son

निषिद्ध उत्तराधिकार

बादल छाए हुए थे। दोपहर के वक्त भी ऐसा लग रहा था जैसे शाम घिर आई हो। बारिश के आसार थे, लेकिन पिछले आधे घंटे से सिर्फ दूर कहीं बिजली की कड़कड़ाती आवाज़ आ रही थी और ठंडी हवा चल रही थी, जो शरीर को कँपा देती थी।

राहुल के बदन को आगे से तपा रही थी उसकी पिता की चिता। लकड़ियों की ऊँची चिता पर लपटें उठ रही थीं। आग की लाल-पीली ज्वाला हवा में नाच रही थी। राहुल खड़ा था, हाथ जोड़े, आँखें चिता पर टिकी हुईं। उसने अभी-अभी अग्नि दी थी।

थोड़ी दूर सफेद साड़ी में खड़ी थी उसकी सौतेली माँ, प्रिया।

उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। कभी-कभी वो साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछती, लेकिन आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। बारिश की पहली बूँदें अभी नहीं गिरी थीं, फिर भी प्रिया का चेहरा पूरी तरह भीगा हुआ था, आँसुओं से।

राहुल उदास था, लेकिन उस उदासी में पिता के जाने का दर्द नहीं था।

उसका मन विचलित था।

उसकी नज़र बार-बार प्रिया की ओर खिंच रही थी। चिता की लपटों की लालिमा प्रिया के चेहरे पर पड़ रही थी। आँसुओं की वजह से उसकी आँखें चमक रही थीं। प्रिया ने एक बार सिर उठाकर राहुल की ओर देखा। उनकी नज़रें मिलीं। प्रिया की आँखों में गहरा दुख था, लेकिन राहुल की आँखों में उदासी थी आंसू नहीं। प्रिया ने पल भर के लिए राहुल को देखा, फिर फिर से आँखें झुका लीं। शायद उसे लगा कि राहुल पिता के लिए रो रहा है।

राहुल ने धीरे से साँस ली।

उसके दिल में बात आयी। .. ‘पापा चले गए… अब ये घर…?’

अगले कुछ दिन मरणोपरांत संस्कार और विधियों में गुजर गए। आज पिता को गए पूरे पंद्रह दिन हो चुके थे।

घर अब बहुत शांत था। राहुल और प्रिया अकेले रह गए थे। इन पंद्रह दिनों में दोनों के बीच ठीक से बातचीत भी नहीं हुई थी। बस जरूरी शब्दों का आदान-प्रदान, “खाना लगा दिया”, “दवाई ले ली?”, “हाँ” या “नहीं”। प्रिया ज्यादातर अपने कमरे में रहती। राहुल भी चुपचाप अपने काम में लगा रहता।

वह अब खुद business देखने लगा था। ऑफिस के काम, क्लाइंट्स से बातें, अकाउंट्स चेक करना, सब कुछ वह संभाल रहा था। प्रिया उसके पिता की पुरानी असिस्टेंट थी, इसलिए बिजनेस की गहरी जानकारी उसी को थी। राहुल रोज शाम को प्रिया से सलाह लेने लगता। “माँ, ये वाला ऑर्डर कैसे हैंडल करें?” या “कल की मीटिंग में क्या कहना चाहिए?” प्रिया धीरे-धीरे जवाब देती, उसकी आवाज अभी भी कमजोर और उदास थी, लेकिन राहुल की जिम्मेदारी देखकर उसके मन में एक अजीब सी कृतज्ञता जाग रही थी।

अगले एक हफ्ते में घर में एक रूटीन-सा बन गया।

प्रिया की उम्र पैतीस साल थी। वह एक गरीब घर की लड़की थी। राहुल की माँ के गुजर जाने के बाद उसके पिता ने प्रिया से शादी कर ली थी। प्रिया के पास अपना कोई परिवार नहीं था, सिर्फ एक बूढ़ा बाप, जो गाँव में रहता और दिन भर शराब के नशे में धुत पड़ा रहता। कहने को अब राहुल ही प्रिया का एकमात्र परिवार था।

शाम के वक्त जब राहुल ऑफिस से लौटता, प्रिया चुपचाप उसके लिए चाय बनाकर रख देती। दोनों बालकनी में या ड्राइंग रूम में बैठकर थोड़ी देर बातें करते। राहुल प्रिया को “माँ” कहकर पुकारता, लेकिन अब उस शब्द में एक अलग गहराई आ गई थी।

प्रिया को भी राहुल में बदलाव नजर आ रहा था।
वह अब घर का मालिक बन गया था, जिम्मेदार, देखभाल करने वाला, और उसकी हर छोटी जरूरत का ख्याल रखने वाला। पिता के समय में जो कमी थी, राहुल उसे पूरा कर रहा था। प्रिया के मन में कृतज्ञता की लहर उठती। कभी-कभी वह राहुल को देखकर सोचती, “कितना अच्छा लड़का है यह। मेरे बिना यह भी कितना अकेला होगा।”

दूसरी तरफ राहुल का जवान बदन उसे प्रिया की ओर धकेल रहा था।

हर सुबह प्रिया जब नाइटगाउन पहनकर बेडरूम से बाहर निकलती, राहुल का दिल जोर से धड़कने लगता। नाइटगाउन हल्का, मुलायम और शरीर से चिपका हुआ होता। सुबह की हल्की रोशनी में प्रिया का गोरा जिम्मेदार जवान शरीर साफ़ झलकता। नाइटगाउन के पतले कपड़े के नीचे उसके स्तनों की गोलाई, कमर की नाजुक लकीर और नितंबों की मोटी, गोल मुद्रा बिना किसी रोक-टोक के दिखाई देती।

राहुल बेड पर या डाइनिंग टेबल पर बैठा रहता और नजरें नहीं हटा पाता। प्रिया की उदास चाल भी उसे बेहद कामुक लगती। जैसे हर कदम के साथ उसकी जाँघें हल्के से रगड़ खा रही हों, नितंब धीरे-धीरे लहरा रहे हों। प्रिया जब चाय बनाने के लिए झुकती, तो नाइटगाउन का गला थोड़ा और खुल जाता। राहुल चुपके से उसकी गहरी cleavage को देख लेता, दो भारी, नरम स्तन एक-दूसरे से सटे हुए, बीच में गहरी खाई बनी हुई, जहाँ हल्का पसीना चमक रहा होता। प्रिया का गला झुकने से और लंबा हो जाता, और राहुल की नजरें उसकी गरदन से नीचे उतरकर स्तनों की ऊपरी गोरी गोलाई पर अटक जातीं।

जब भी मौका मिलता, राहुल प्रिया के नितंबों को ताक लगाकर देखता। खासकर जब प्रिया रसोई में काम करती। नाइटगाउन के पतले कपड़े उसके मोटे, गोल नितंबों पर तनकर चिपक जाते। हर कदम के साथ वे हल्के से उठते-गिरते, एक लय में हिलते। राहुल की साँसें भारी हो जातीं। उसका जवान शरीर अंदर से तपने लगता। कई बार तो वह खुद को रोक नहीं पाता और खड़े होकर प्रिया के पीछे से उसे घूरने लगता, उसकी नजरें प्रिया के नितंबों की गहराई और जाँघों के बीच की लाइन पर टिकी रहतीं।

प्रिया भी राहुल की इन नजरों को समझ रही थी।

वह दुनिया देख चुकी थी। उसे अच्छी तरह पता था कि जवान लड़के खुद को कंट्रोल नहीं कर पाते। उनकी नजरें भूखी हो जाती हैं, और वे ठीक इसी तरह देखते हैं, चुपके से, बार-बार, बिना पलक झपकाए। प्रिया को राहुल की इन गुप्त नजरों का एहसास हो रहा था। कभी-कभी जब वह चाय का कप आगे बढ़ाती, तो राहुल की नजर उसके ब्लाउज या नाइटगाउन के गले में घुस जाती। प्रिया कुछ नहीं कहती।

वह चुप रहती।

अंदर से एक अजीब सी सिहरन होती, लेकिन वह खुद को समझाती, “यह मेरा बेटा है… सिर्फ अकेलापन है।” फिर भी, जब राहुल की नजरें उसके शरीर पर इस तरह टिकतीं, तो प्रिया के बदन में भी एक हल्की गर्मी फैल जाती। वह जानबूझकर कभी-कभी नाइटगाउन को और ढीला छोड़ देती, या झुकते वक्त थोड़ा और नीचे झुक जाती। खुद को ये कहकर कि यह बस संयोग है।

राहुल की भूख दिन-प्रतिदिन बढ़ रही थी।
प्रिया की उदास चाल, उसका नरम जिम्मेदार शरीर, सुबह की नाइटगाउन में उसकी मादकता, सब कुछ राहुल को पागल कर रहा था।

प्रिया चुप थी, लेकिन उसकी चुप्पी में भी अब एक नई तरह की सहमति छिपी हुई लग रही थी।

आज रविवार था। सुबह का वक्त था, लेकिन घर में एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी।

प्रिया के कमरे में एक दराज अटक गई थी। काफी देर तक कोशिश करने के बाद भी जब नहीं खुली, तो उसने टूल बॉक्स ढूंढ लिया। हाथ में टूल बॉक्स लेकर वह बेडरूम की ओर चल पड़ी। रास्ते में उसे लगा, शायद राहुल ठीक से खोल देगा। उसने अपना रुख राहुल की बैडरूम की ओर किया।

प्रिया ने राहुल के कमरे का दरवाजा बिना खटखटाए ही धकेल दिया और टूल बॉक्स आगे बढ़ाकर बोली, “राहुल, वो… दराज…”

प्रिया की आँखें खुली की खुली रह गईं।

राहुल बेड पर लेटा हुआ था। सिर्फ एक सफेद टी-शर्ट और ग्रे शॉर्ट्स में। उसके शॉर्ट्स और अंडरवियर दोनों घुटनों तक सरक चुके थे। उसका दाहिना हाथ अपने मोटे, सख्त लिंग पर था और वह धीरे-धीरे उसे रगड़ रहा था। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उसके लिंग पर प्रिया की एक हल्की क्रीम रंग की पैंटी लिपटी हुई थी, वही पैंटी जो प्रिया कल पहने हुए थी।

राहुल ने प्रिया को देखा।

एक पल के लिए उसकी आँखों में खौफ छा गया। उसका दिल एकदम से बैठ गया। पूरा शरीर ठंडा पड़ गया। हाथ अपने आप रुक गया। उसका चेहरा सफेद हो गया। वह कुछ बोल नहीं पाया। बस घबराहट में अपने पैरों को झटके से पास खींच लिया, जिससे शॉर्ट्स और अंडरवियर और उलझ गए।

प्रिया भी हड़बड़ा गई। उसके गालों पर एकाएक लालिमा छा गई। साँस अटक गई। उसने जो देखा, उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था। राहुल का जवान, तना हुआ शरीर… और उस पर अपनी पैंटी… सब कुछ एक साथ उसके दिमाग पर हावी हो गया।

प्रिया ने तुरंत पलट लिया। बिना एक शब्द बोले तेज़ कदमों से अपने कमरे में आ गई और दरवाजा बंद कर लिया। पीठ दरवाजे से सटाकर वह खड़ी रह गई। उसका दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि लग रहा था बाहर निकल आएगा।

“ये… मैंने क्या देख लिया… भगवान… ये राहुल था?”

पूरे दिन दोनों ने एक-दूसरे से बात नहीं की।

राहुल अपने कमरे में guilt के बोझ तले दबा बैठा रहा। बार-बार वही पल आँखों के सामने घूम रहा था, प्रिया का हैरान चेहरा, उसकी खुली आँखें, और उसकी पैंटी उसके हाथ में। उसे डर था कि अब प्रिया उसे कभी माफ नहीं करेगी।

शाम को प्रिया ने ही राहुल को खाने के लिए आवाज लगाई।

प्रिया आज थोड़ा संवर कर बैठी थी। उसने एक हल्की लेकिन खूबसूरत गुलाबी साड़ी पहनी थी, जिसमें उसका गोरा, नरम शरीर और भी आकर्षक लग रहा था। ब्लाउज थोड़ा फिटिंग था, जिससे उसकी छाती की गोलाई साफ़ उभर रही थी। बाल खुले हुए थे और सिर्फ एक पतला क्लिप लगा रखा था।

टेबल पर दोनों आमने-सामने बैठे। खाने की थाली में चुप्पी छाई हुई थी।

प्रिया खुद को कोस रही थी।
“आज मैंने अच्छी साड़ी क्यों पहनी? क्यों मेरा दिल राहुल को देखकर इतने जोर से धड़क रहा है? सुबह जो देखा… वो सब कुछ अभी भी आँखों के सामने है… फिर भी मैं क्यों इस तरह तैयार होकर आई हूँ?”

उसके मन में तूफान मचा हुआ था। शर्म, गुस्सा, हैरानी और एक अजीब सी गर्म लहर, सब एक साथ उबाल मार रहे थे।

उधर राहुल प्रिया को चोर नजरों से देख रहा था।
सुबह की घटना उसके दिमाग में अभी भी ताज़ा थी। प्रिया का जिम्मेदार शरीर, उसकी पैंटी पर अपना लिंग, और अब यह साड़ी में सजी हुई प्रिया… सब कुछ मिलकर राहुल के मन में अजीब मिश्रित विचार पैदा कर रहा था। ललक, डर, अपराधबोध और बढ़ती हुई भूख, चारों एक साथ उसे घेर रहे थे।

प्रिया की नजर कभी-कभी राहुल से टकराती, फिर झुक जाती। राहुल की नजरें बार-बार प्रिया की साड़ी के पल्लू पर, ब्लाउज के गहरे कटाव पर और उसके नरम, थरथराते होंठों पर अटक रही थीं।

हवा में एक गर्म, निषिद्ध और खतरनाक तनाव भर गया था।

अगले कुछ दिनों में प्रिया ने राहुल से उस घटना का कोई जिक्र नहीं किया।
घर में सब कुछ फिर से शांत-सा हो गया था। दिन अपनी रफ्तार से चल रहे थे, राहुल ऑफिस जाता, प्रिया घर संभालती। लेकिन अब दोनों एक-दूसरे को चोर नजरों से देखते रहते थे।

प्रिया अब थोड़ा अच्छे से रहने लगी थी।
बाहर समाज को दिखाने के लिए वह अभी भी सादी और साधारण रहती, सफेद या हल्के रंग की साड़ियाँ, बिना ज्यादा मेकअप। लेकिन राहुल के सामने वह धीरे-धीरे बदल रही थी। कभी हल्की लाली लगाती, कभी होंठों पर हल्की सी लिपस्टिक लगा लेती। बालों को खुला छोड़ती, या साड़ी का पल्लू थोड़ा और नीचे सरका देती। ये छोटे-छोटे बदलाव सिर्फ राहुल के लिए थे, भले ही वह खुद ये न मानती हो।

राहुल भी प्रिया को घंटों देखता रहता।
वह प्रिया की काफी मदद करता, सामान उठाना, रसोई में हाथ बँटाना, या शाम को चाय बनाना। लेकिन अब मदद के बहाने वह प्रिया के शरीर को छूने लगा था।

हर स्पर्श के साथ प्रिया सिहर जाती।

सुबह-सुबह जब प्रिया नहाकर हल्के गीले बदन से चाय बनाती, तो राहुल अचानक किचन में आ जाता। वह पीछे से आकर हल्के से उसके नितंबों को छू देता, कभी हाथ का पिछला हिस्सा लगाकर, कभी कमर पर हल्का सा दबाव देकर। प्रिया का गीला शरीर अभी भी नहाने के बाद नरम और गर्म होता। राहुल की उँगलियाँ जब उसके नितंबों की मोटी, गोलाई पर फिसलतीं, तो प्रिया के शरीर में एक तेज सिहरन दौड़ जाती।

वो सिहरन उसके पेट से नीचे उतरती, उसकी योनि तक पहुँच जाती।
प्रिया की साँसें एक पल के लिए रुक जातीं। वह चाय का कप पकड़े रहती, लेकिन उँगलियाँ काँपने लगतीं। उसके स्तन ब्लाउज के अंदर हल्के से उठ-गिरने लगते। वह कुछ नहीं कहती, बस चुपचाप खड़ी रहती। अंदर से एक गर्म लहर उठती जो उसे शर्मिन्दा भी करती और… उत्सुक भी।

राहुल जानता था कि प्रिया कुछ नहीं कहेगी।
इसलिए वह हिम्मत बढ़ाता जा रहा था। कभी वह प्रिया को मदत करने के बहाने उसकी कलाई को छू लेता, कभी झुककर कोई चीज उठाने में उसकी कमर पर हाथ रख देता। हर स्पर्श थोड़ा लंबा और जानबूझकर होता।

प्रिया हर बार सिहर जाती।
उसकी योनि में एक हल्की सी गीलापन महसूस होने लगता। वह खुद को समझाती, “ये बस संयोग है… राहुल मेरा बेटा है।” लेकिन उसके शरीर की प्रतिक्रिया कुछ और कह रही थी।

राहुल की नजरें अब खुलकर प्रिया के शरीर पर घूमतीं, उसके गीले बालों से टपकते पानी पर, ब्लाउज से चिपके स्तनों पर, और साड़ी के नीचे लहराते नितंबों पर। प्रिया भी राहुल की इन नजरों को महसूस करती, लेकिन चुप रहती।

धीरे-धीरे घर में एक निषिद्ध, गर्म और खामोश तनाव बढ़ता जा रहा था। दोनों जानते थे कि कुछ बदल रहा है, लेकिन कोई भी पहला कदम उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।

एक शाम प्रिया आँखें लाल किए सोफे पर बैठी थी।

राहुल जब ऑफिस से घर लौटा तो उसे तुरंत समझ आ गया। प्रिया के सूजे हुए नेत्र, थकी हुई मुद्रा और चुप्पी, सब कुछ बता रहा था कि आज उसे फिर से पति की याद सता रही है। राहुल ने कुछ नहीं कहा। बस धीरे से उसके पास आया और नरम आवाज में पूछा,

“क्या हुआ माँ? आज फिर…”

प्रिया ने सिर्फ सिर हिलाया। आँखों में नमी थी, लेकिन वह रोना नहीं चाहती थी। राहुल ने बाहर से खाना लाया,, प्रिया का पसंदीदा पनीर बटर मसाला और नान। उसने चुपचाप प्लेटें सजाईं और दोनों ने साथ में खाना खाया।

खाने के बाद राहुल ने प्रिया का मूड अच्छा करने की कोशिश की।

“अरे, आज एक नई मूवी आई है टीवी पर। काफी अच्छी रिव्यूज हैं। चलो देखते हैं ना… अकेले बैठकर क्या करोगी?”

प्रिया ने पहले तो मना किया, लेकिन राहुल के बार-बार कहने पर हार गई। दोनों सोफे पर बैठ गए।

राहुल ने लाइट्स थोड़ी कम कर दीं। टीवी पर मूवी शुरू हुई, एक रोमांटिक थ्रिलर थी, जिसमें भावनाएँ और गहरे रिश्तों का खेल था। प्रिया सोफे के एक कोने पर बैठी थी, घुटनों पर तकिया रखे हुए। राहुल उसके बगल में, थोड़ा पास ही।

शुरू के कुछ मिनट तो दोनों चुपचाप मूवी देखते रहे। लेकिन धीरे-धीरे कमरे में एक अलग तरह का माहौल बनने लगा।

प्रिया की साड़ी का पल्लू थोड़ा सरक गया था। हल्की रोशनी में उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। राहुल की नजर बार-बार उसकी ओर खिंच रही थी, प्रिया के गले की नरम त्वचा पर, ब्लाउज के कटाव में छिपी गहरी खाई पर, और साड़ी से निकलती हुई उसकी कमर की नाजुक लकीर पर।

मूवी में जब हीरो और हीरोइन के बीच रोमांटिक सीन आया, हल्के-हल्के स्पर्श, गहरी नजरें और करीब आते शरीर, तो प्रिया की साँसें अनजाने में थोड़ी भारी हो गईं। वह तकिये को और कसकर पकड़ लेती।

राहुल ने धीरे से अपना हाथ सोफे पर फैलाया। उसका हाथ प्रिया की जाँघ के बहुत पास था। इतना पास कि प्रिया को उसकी उष्णता महसूस हो रही थी। राहुल ने हिम्मत करके हल्के से अपनी उँगलियाँ प्रिया की साड़ी पर रख दीं, सिर्फ कपड़े पर, लेकिन स्पर्श इतना जानबूझकर था कि प्रिया का पूरा शरीर सिहर उठा।

प्रिया ने कुछ नहीं कहा। नजरें टीवी पर टिकी रहीं, लेकिन उसका ध्यान अब मूवी में नहीं था। राहुल की उँगलियाँ बहुत धीरे-धीरे साड़ी के ऊपर से उसकी जाँघ पर फिसल रही थीं। हल्का-हल्का दबाव… गर्म साँसें… और कमरे में बस टीवी की हल्की आवाज़।

प्रिया की योनि में फिर वही पुरानी सिहरन उठने लगी। उसके स्तन ब्लाउज के अंदर हल्के से तन गए। वह खुद को रोक रही थी, लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था।

राहुल की नजर अब पूरी तरह प्रिया पर थी। मूवी की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, लाल-लाल आँखें, थोड़े खुले होंठ, और साड़ी में लिपटा वो नरम, परिपक्व शरीर।

दोनों चुप थे।
लेकिन सोफे पर बैठे-बैठे बीच की दूरी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थी।

करीब एक घंटे बाद मूवी अभी भी चल रही थी, लेकिन प्रिया सोफे पर आँखें बंद किए लेटी हुई थी।

राहुल ने टीवी की आवाज़ धीमी कर दी। कमरे में सिर्फ स्क्रीन की हल्की नीली रोशनी रह गई थी। वह कुछ देर तक प्रिया को निहारता रहा। उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया था। ब्लाउज का कटाव साफ़ दिख रहा था। प्रिया की साँसें धीमी और गहरी हो रही थीं।

राहुल ने धीरे से दो बार आवाज़ लगाई, “माँ… माँ?”

कोई जवाब नहीं आया।

राहुल ने हिम्मत करके अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया और प्रिया की एक जाँघ पर अच्छे से रख दिया। फिर धीरे-धीरे उसे ऊपर-नीचे करने लगा। साड़ी के कपड़े के ऊपर से भी प्रिया की जाँघ की नरम गर्मी उसे साफ़ महसूस हो रही थी।

प्रिया दरअसल जाग चुकी थी जब राहुल ने पहली बार आवाज़ लगाई थी। लेकिन उसके मन में एक अजीब उत्सुकता थी, देखना चाहती थी कि राहुल आगे क्या करेगा। जैसे ही राहुल का हाथ उसकी जाँघ पर पड़ा, प्रिया के अंदर एक तेज तड़पन उठी। उसका पूरा शरीर सिहर उठा, लेकिन उसने आँखें नहीं खोलीं और न ही कोई हरकत की।

साड़ी के ऊपर से हो रहे इस स्पर्श से प्रिया की अंदर की आग अब धीरे-धीरे भड़कने लगी थी।

राहुल ने अपना दूसरा हाथ बढ़ाया और प्रिया का हाथ पकड़ लिया। फिर उसे धीरे से अपने शॉर्ट्स के ऊपर रख दिया, ठीक अपने लिंग के ऊपर। प्रिया का हाथ अनजाने में ही हल्के से दब गया। राहुल का लिंग शॉर्ट्स के कपड़े के ऊपर से भी सख्त और गर्म महसूस हो रहा था।

अब राहुल एक हाथ से कभी प्रिया की जाँघ पर, कभी उसकी कमर पर, तो कभी उसके स्तनों के बिल्कुल नीचे रगड़ रहा था। स्पर्श धीमे लेकिन जानबूझकर थे। हर बार हाथ थोड़ा और ऊपर चढ़ता जा रहा था।

प्रिया का हाथ भी अनजाने में राहुल के लिंग को हल्के-हल्के दबा रहा था। वह महसूस कर रही थी कि राहुल का अवयव उसके हाथ के नीचे और सख्त होता जा रहा है।

दोनों जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं।

यह स्पर्श अब प्रिया के कंट्रोल के बाहर होने लगा था। उसके स्तन भारी हो रहे थे, योनि में गर्मी और गीलापन बढ़ रहा था। साँसें तेज हो गई थीं।

अचानक प्रिया ने आँखें खोलीं। वह झटके से उठ बैठी और थोड़ी हड़बड़ाहट में बोली,

“अरे… मेरी तो नींद लग गई थी…”

बोलते हुए वह उठी और बिना राहुल की तरफ देखे तेज़ कदमों से अपने बेडरूम की ओर चली गई।

दरवाजा बंद करते वक्त भी उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। पीठ दरवाजे से सटाकर वह खड़ी रह गई। उसके गाल लाल थे, साँसें भारी थीं।

अंदर से एक आवाज़ बार-बार कह रही थी,
“ये गलत है… बहुत गलत है…”

लेकिन उसकी योनि अभी भी तड़प रही थी।

अगले दिन सुबह प्रिया ने राहुल से अनुरोध किया,
“राहुल, कपड़े वॉशिंग मशीन में डाल दो ना। मैं नाश्ता बना रही हूँ।”

राहुल ने लॉन्ड्री बास्केट उठाई और जैसे ही उसमें झाँका, उसका दिल जोर से धड़क उठा। बास्केट में ज्यादातर प्रिया के ब्रा और पैंटी थे, अलग-अलग रंगों की, कुछ सादी, कुछ लेस वाली। हल्के गुलाबी, काले, क्रीम… सब एक साथ।

राहुल को तुरंत समझ आ गया।
यह प्रिया की तरफ से एक सिग्नल था।

वह मुस्कुराया। अब उसे आगे बढ़ना था।

राहुल ने एक पुरानी, हल्की गुलाबी पैंटी उठाई। उसे थोड़ा फाड़ दिया, ठीक बीच में, ताकि फटने का बहाना बन सके। फिर हिम्मत करके किचन की ओर बढ़ गया।

प्रिया किचन में खड़ी नाश्ता बना रही थी। उसने हल्की पीली साड़ी पहनी थी, जिसका ब्लाउज पीछे से थोड़ा कम खुला हुआ था। कमर की नरम गोरी त्वचा दिख रही थी।

राहुल ने पैंटी को हाथ में लेकर पीछे से आते हुए कहा,

“माँ… ये तो बहुत फट गई है।”

प्रिया ने मुड़कर देखा। राहुल की उँगलियों में उसकी अपनी फटी हुई पैंटी थी। प्रिया पहले तो शर्मा गई। उसके गाल एकदम लाल हो गए। नजरें नीची हो गईं।

लेकिन फिर उसकी नजर राहुल के चेहरे पर पड़ी। राहुल की आँखों में साफ़ हिम्मत और भूख थी। तीर निशाने पर लगा हुआ था।

प्रिया के होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई। अंदर से एक गर्म लहर उठी।

वह धीरे से बोली,
“ठीक है… तो नई ले आना।”

राहुल ने और पास आकर पूछा,
“कैसी वाली? सादी या…?”

प्रिया ने शर्माते हुए, लेकिन साफ़ आवाज में कहा,
“सेट लाना… ब्रा और पैंटी दोनों।”

राहुल समझ गया कि अब झिझक खत्म हो रही है।

प्रिया की यह बात सुनकर उसके शरीर में एक तेज झनझनाहट हुई। उसकी नजर प्रिया की साड़ी के पल्लू पर, उसके ब्लाउज की उभरी हुई छाती पर और कमर की नंगी त्वचा पर घूम गई।

प्रिया भी राहुल की नजर महसूस कर रही थी। उसने नजरें झुका लीं, लेकिन उसके होंठों पर अभी भी हल्की मुस्कान थी। नाश्ता बनाते वक्त उसकी उँगलियाँ थोड़ी काँप रही थीं।

राहुल ने पैंटी को वापस बास्केट में रख दिया और धीरे से बोला,
“ठीक है… आज शाम तक ले आऊँगा।”

वह किचन से बाहर निकला, लेकिन अब उसके कदमों में एक नई ऊर्जा थी।

बात बन रही थी।
धीरे-धीरे, लेकिन बन रही थी।

शाम को राहुल थोड़ा देर से घर आया। खाना खाने के बाद दोनों फिर से टीवी के सामने बैठ गए थे। मूवी चल रही थी, लेकिन किसी का ध्यान स्क्रीन पर नहीं था।

अचानक राहुल ने अपना बैग उठाया, उसमें से एक छोटा सा पेपर बैग निकाला और प्रिया के हाथ में रख दिया।

प्रिया शर्मा गई।

बैग के अंदर एक सुंदर ब्लैक लेस वाला ब्रा और पैंटी का सेट था। बहुत नाजुक, सेक्सी और थोड़ा ट्रांसपेरेंट। प्रिया का चेहरा एकदम लाल हो गया। उसने बैग को हाथ में पकड़े रखा, नजरें नीची कर लीं।

राहुल ने उसकी शर्म देखकर नरम लेकिन भरी हुई आवाज में कहा,
“आप चिंता मत करो… अब आपकी हर चीज़ का मैं ख्याल रखूँगा।”

प्रिया ने धीरे से सेट निकालकर खोलकर देखा। लेस की नाजुक डिजाइन, ब्रा का गहरा कट और पैंटी की पतली पट्टियाँ देखकर उसके गाल और गर्म हो गए।

राहुल ने बड़ी हिम्मत से कहा,
“चेक कर लो… मैंने शॉपकीपर से बात कर ली है। अगर फिट नहीं हुई तो बदलवा देंगे।”

प्रिया झिझकते हुए बोली,
“अभी… चेक कर लूँ?”

राहुल ने सिर हिलाया, “हाँ।”

प्रिया सेट लेकर बेडरूम में चली गई।

कुछ देर बाद अंदर से उसकी काँपती हुई आवाज आई,
“राहुल… चेक कर लो… ठीक तो है ना?”

राहुल का दिल जोर से धड़का। वह धीरे-धीरे उठा और बेडरूम का दरवाजा धकेल दिया।

अंदर का नजारा देखकर उसकी साँस अटक गई।

प्रिया सिर्फ एक सफेद तौलिए में लिपटी खड़ी थी। तौलिया उसके ऊपर के हिस्से को ढक रहा था, लेकिन उसकी गोरी, मोटी जाँघें लगभग पूरी तरह नंगी दिख रही थीं। बाल अभी भी थोड़े गीले थे।

प्रिया ने शर्म से आँखें नीची कर लीं। फिर धीरे-धीरे, बहुत धीरे से, उसने तौलिया गिरा दिया।

तौलिया उसके पैरों के पास गिर गया।

सामने खड़ी थी प्रिया, सिर्फ उस नए ब्लैक लेस वाले ब्रा और पैंटी में।

ब्लैक लेस उसके गोरे, भारी स्तनों पर बिल्कुल फिट बैठा था। ब्रा का गहरा कटाव उसकी छाती की गहरी खाई को और आकर्षक बना रहा था। लेस के बीच से उसकी नरम, गोरी त्वचा झाँक रही थी। ब्रा के नीचे उसके स्तन भारी और गोल थे, हर साँस के साथ हल्के से उठ-गिर रहे थे।

नीचे पैंटी भी उसी ब्लैक लेस की थी, बहुत पतली, लगभग ट्रांसपेरेंट। पैंटी का छोटा सा ट्राएंगल उसके योनि के ऊपर सिर्फ नाममात्र का कवर कर रहा था। दोनों तरफ पतली पट्टियाँ उसके मोटे, गोल नितंबों पर कसकर चिपकी हुई थीं। जाँघों का गोरा मांस लेस के किनारे से बाहर झाँक रहा था।

प्रिया खड़ी थी, आँखें नीची किए, हाथों को सामने रखे हुए। उसका पूरा परिपक्व शरीर अब राहुल के सामने पूरी तरह खुला था, सिर्फ उस काले सेक्सी लेस के टुकड़ों में।

राहुल का दिल इतनी तेज धड़क रहा था कि उसे लग रहा था बाहर निकल आएगा। उसकी नजरें प्रिया के स्तनों से नीचे उतर रही थीं, कमर की नाजुक लकीर, नाभि, और फिर उस पतली पैंटी के नीचे छिपी हुई गर्मी पर।

कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था।
सिर्फ दोनों की भारी साँसों की आवाज़ आ रही थी।

प्रिया ने धीरे से आँखें उठाकर राहुल की ओर देखा। उसकी नजर में शर्म थी, लेकिन साथ ही एक गहरी, दबी हुई ललक भी थी।

राहुल बस खड़ा था, प्रिया के इस विस्मृत, कामुक रूप को निहारते हुए।

राहुल ने हिम्मत करके एक कदम आगे बढ़ाया।

दोनों जानते थे कि अब आगे क्या होना है। बस हिम्मत की बात थी, कौन पहले कदम उठाएगा।

राहुल ने धीरे से प्रिया के दोनों हाथ पकड़ लिए। उसकी आवाज़ भारी और काँपती हुई थी,
“बहुत अच्छी से फिट हुई है… जरा देख लूँ…”

बोलते हुए उसने प्रिया को धीरे से गोल घुमा दिया।

घूमते वक्त प्रिया के मोटे, गोल नितंब राहुल की नजरों के सामने आ गए। ब्लैक लेस वाली पैंटी उसकी गोरी त्वचा पर कसकर चिपकी हुई थी। नितंबों की मांसल गोलाई लेस के किनारे से थोड़ी बाहर झाँक रही थी। राहुल की साँस रुक गई।

प्रिया शर्मा गई। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उसने झटके से मुड़कर राहुल को जकड़ लिया। दोनों हाथों से राहुल की पीठ पर हाथ रखकर उसे कसकर गले लगा लिया। उसकी साँसें तेज़ और गर्म हो गई थीं। प्रिया का नग्न-सा शरीर राहुल से चिपक गया। उसके भारी स्तन राहुल की छाती से दब गए।

राहुल ने भी उसे कसकर बाँहों में भर लिया।

फिर दोनों के होंठ एक-दूसरे से टकराए।

पहला किस गहरा, भूखा और जुनूनी था। राहुल ने प्रिया के निचले होंठ को चूस लिया। प्रिया की आँखें बंद हो गईं। वह राहुल के बालों में उँगलियाँ फेरने लगी। दोनों की जीभें एक-दूसरे में उलझ गईं। गीली, गर्म और बेतहाशा। प्रिया के मुँह से हल्की सी कराह निकली। राहुल ने उसे और कसकर चूमा, जैसे सालों की दबी हुई ललक एक साथ बाहर निकल रही हो।

राहुल ने एक हाथ से प्रिया की ब्रा का हुक खोल दिया। ब्रा ढीली हुई और उसके भारी, नरम स्तन बाहर आ गए। राहुल ने उन्हें दोनों हाथों से थाम लिया। उँगलियाँ स्तनों की गोलाई पर घूम रही थीं। अँगूठे से उसकी काली-गुलाबी चुचियाँ सहलाने लगा। प्रिया सिहर उठी।

फिर राहुल ने घुटनों के बल बैठकर प्रिया की पैंटी भी उतार दी। पैंटी उसके पैरों से फिसलकर नीचे गिर गई। अब प्रिया पूरी तरह नंगी थी। राहुल ने उसकी योनि पर एक गर्म किस किया। प्रिया की टाँगें काँप गईं।

“राहुल…” उसकी आवाज़ बस फुसफुसाहट थी।

दोनों बेड पर गिर पड़े। अभी भी एक-दूसरे को चूमते हुए। राहुल के कपड़े भी जल्दी से उतर गए। दोनों नंगे शरीर एक-दूसरे से लिपटे हुए थे।

राहुल ने प्रिया की जाँघें थोड़ी फैलाईं। उसका सख्त, गर्म लिंग प्रिया की योनि के द्वार पर आकर रुका। प्रिया ने आँखें बंद कर लीं। राहुल ने धीरे से आगे बढ़ाया।

“आह्ह्ह…” प्रिया की साँस फूल गई।

राहुल का मोटा लिंग धीरे-धीरे उसके अंदर घुस रहा था। इतने दिनों बाद प्रिया की योनि तंग और सूखी-सी थी, लेकिन राहुल की गर्मी और उसकी अपनी गीलापन मिलकर रास्ता बना रहे थे। जब पूरा लिंग अंदर तक चला गया, प्रिया ने राहुल की पीठ पर नाखून गड़ा दिए।

“बहुत… बहुत दिनों बाद…” प्रिया फुसफुसाई।

राहुल भी काँप रहा था। प्रिया की योनि उसके लिंग को कसकर जकड़े हुए थी, गर्म, नरम और भीगी हुई। दोनों को लगा जैसे सालों की दबी हुई कामवासना एक साथ बाहर निकल रही हो। राहुल धीरे-धीरे हिलने लगा। हर धक्के के साथ प्रिया की कराह बढ़ती गई।

“राहुल… और जोर से…”

राहुल ने रफ्तार बढ़ाई। दोनों शरीर एक लय में हिल रहे थे। प्रिया के स्तन ऊपर-नीचे उछल रहे थे। राहुल उन्हें चूसता, काटता, दबाता। प्रिया की उँगलियाँ राहुल की पीठ पर खरोंच रही थीं।

पहली बार दोनों का चरम आया। प्रिया जोर से चीखी और राहुल को कसकर जकड़ लिया। राहुल भी उसके अंदर ही फूट पड़ा। गर्म, मोटी धार प्रिया की योनि में भर गई।

लेकिन रात अभी बहुत लंबी थी।

दोनों कुछ देर लेटे रहे। फिर राहुल फिर से तैयार हो गया। इस बार प्रिया ऊपर आई। वह राहुल पर सवार होकर धीरे-धीरे हिलने लगी। उसके भारी स्तन राहुल के मुँह के सामने लहरा रहे थे। राहुल उन्हें चूसता रहा। प्रिया की कराहें कमरे में गूँज रही थीं। राहुल प्रिया को जोर-जोर से ठोक रहा था। प्रिया नितंब उठाकर उसका साथ दे रही थी । हर धक्के के साथ उसके नितंब लहराते।

रात भर दोनों ने एक-दूसरे को बार-बार चाहा। कभी धीरे-धीरे, कभी जंगली जुनून से। कभी चूमते, कभी सिर्फ साँसों और कराहों से।

प्रिया को इतने दिनों बाद पहली बार लगा कि उसकी देह फिर से जी उठी है। राहुल को लगा कि वह जिस औरत पर सालों से नजर थी, आज पूरी तरह उसकी हो गई है।

सुबह होने तक दोनों थके हुए, पसीने से तर और एक-दूसरे में लिपटे बेड पर सो गए। प्रिया राहुल के सीने से सटी हुई थी। राहुल का हाथ उसके नंगे नितंब पर था।

निषिद्ध ललक की पहली रात पूरी हो चुकी थी।

अगले दिन सुबह प्रिया दरवाजे की घंटी की आवाज़ से चौंककर उठी।
उसने जल्दी से एक नायटी पहनी और दरवाजा खोला। बाहर पुलिस इंस्पेक्टर खड़ा था।

प्रिया के आँखों के सामने तुरंत उसके पति का एक्सीडेंट और उसके बाद का पूरा घटनाक्रम घूम गया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

इंस्पेक्टर ने कुछ औपचारिक बातें कीं। फिर धीरे से बताया,
“मैडम, जांच पूरी हो गई है। गाड़ी के नीचे किसी नुकीली चीज से रगड़ लगी थी। हाइड्रॉलिक लाइन कट गई थी। ब्रेक फेल हो गए और एक्सीडेंट हो गया।”

प्रिया चुपचाप सुनती रही। उसका शरीर सुन्न हो गया था।

इंस्पेक्टर के जाने के बाद प्रिया दरवाजे के पास ही खड़ी रह गई। उसके दिमाग में सिर्फ एक सवाल घूम रहा था,
“क्या किसी ने जानबूझकर…?”

उसके पति का कोई दुश्मन नहीं था। फिर भी…

उसके सामने शादी से लेकर अब तक की सारी बातें घूमने लगीं। राहुल और पिता के बीच के छोटे-मोटे झगड़े, राहुल की उसकी ओर बार-बार जाती नजरें, राहुल का अचानक बदल गया व्यवहार… प्रिया का शरीर सिहर उठा।

फिर अचानक उसका दिमाग उस रात पर अटक गया, जब राहुल उसकी पैंटी को अपने लिंग पर रगड़ रहा था। प्रिया आज तक सोचती रही थी कि राहुल सिर्फ शर्म से डरा था। लेकिन अब याद आया, राहुल टूल बॉक्स देखकर घबरा रहा था।

प्रिया दौड़ती हुई टूल बॉक्स के पास गई। उसने बार-बार उलट-पुलट कर देखा।

छोटी-सी कुल्हाड़ी गायब थी।

उसका दिल बैठ गया।

वह राहुल के कमरे में गई। पता नहीं क्या ढूँढ रही थी। आखिरकार उसने राहुल के पुराने कॉलेज बैग पर तेल के पुराने धब्बे देखे। कहीं ये हाइड्रॉलिक ऑयल तो नहीं…?

प्रिया का सिर चकरा गया।

वह वापस अपने बेडरूम में आई।

राहुल अभी भी नंगा सोया हुआ था। उसका जवान, मजबूत शरीर सुबह की हल्की रोशनी में चमक रहा था।

प्रिया का दिमाग काम करना बंद कर चुका था।

तभी राहुल धीरे से उठा। उसने प्रिया को देखा और बिना कुछ सोचे उसे गले लगा लिया। फिर उसका चेहरा प्रिया के चेहरे के सामने लाकर बोला,
“क्या हुआ? चेहरा क्यों उतरा हुआ है?”

प्रिया कुछ नहीं बोली।

कल रात का जुनूनी शारीरिक खेल उसकी आँखों के सामने घूम गया। उसका शरीर फिर से सिहर उठा।

अब प्रिया की बारी थी जवाब देने की।

वह पूरी हिम्मत करके राहुल की आँखों में देखने लगी। कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

राहुल प्रिया के गाल पकड़े , और एक लंबा किस किया।

किस और गहरा, और passionate हो गया। राहुल ने प्रिया को कसकर पकड़ लिया। उसने प्रिया की नायटी को खींचकर उतार दिया।

प्रिया अब फिर से नंगी थी।

राहुल ने उसे उठाकर अपने ऊपर कर लिया। उसने अपना सख्त लिंग पकड़ा और धीरे से प्रिया की योनि पर रखा। प्रिया ने आँखें बंद कर लीं और धीरे से नीचे बैठ गई।

“आह्ह्ह…”

राहुल का मोटा लिंग एक बार में ही पूरी तरह उसके अंदर समा गया। प्रिया एक कराह के साथ राहुल के ऊपर बैठ गई। उसने अपना शरीर खींचकर अपने भारी स्तन राहुल के सामने कर दिए।

राहुल ने जोरदार झटका दिया। उसका लिंग प्रिया की योनि के सबसे गहरे हिस्से तक पहुँच गया।

प्रिया के मन में एक अजीब सी शांति थी।

अब प्रिया अपना मन बना चुकी थी। उसने राहुल को स्वीकार कर लिया था वासना ने प्रिया को जित लिया था।

वह आगे झुकी, अपने स्तनों को राहुल के सीने से सटा दिया और उसके कान में फुसफुसाई,

“तुमने जो किया… उसके लिए थैंक यू…”

राहुल कुछ समझ नहीं पाया। लेकिन उसके दिमाग में अचानक दो महीने पहले की वो रात घूम गई, जब उसने अपने पिता को “विदा” किया था।

अब दोनों एक-दूसरे की ओर असमंजस और आश्चर्य से देख रहे थे।

उनकी आँखों में सवाल थे, लेकिन नीचे उनका शरीर एक-दूसरे में पूरी तरह घुला हुआ था। राहुल का लिंग प्रिया की योनि के अंदर धीरे-धीरे हिल रहा था। प्रिया भी धीरे-धीरे अपनी कमर हिला रही थी।

न तो राहुल कुछ बोल सका, न प्रिया।

बस उनके शरीर एक गहरी, निषिद्ध, और अब पूरी तरह स्वीकृत लय में एक-दूसरे को चाह रहे थे।

राहुल ने प्रिया को ऐसेही धक्के लगाते हुए अपने गले लगाया। .. प्रिया के होठ राहुल की गर्दन पर थे और उसे चुम रही थी।

राहुल समज चूका था के प्रिया अब उसकी हो गयी है। अब राहुल पूरी तरह उसके पिता का उत्तराधिकारी बन गया था।

राहुल के होठो पर अब एक मुस्कान थी. गहरी... चौड़ी….. शैतानी।

समाप्त।
 

Rakhs_ KINGDOM

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354
DUMBBELL : A KILL STORY OF GYM RAT.

The humid April evening pressed down on Besant Nagar like a heavy, unseen hand, thick with the salt-laced breeze off the Bay of Bengal and the distant, restless growl of traffic along the ECR. Every gust carried a whisper of the sea, but tonight it felt colder than it should, as if the city itself was holding its breath, waiting for the truth to surface. At exactly 7:45 p.m., the emergency call crackled into the Adyar Police Station control room, shattering the quiet routine. A domestic help’s voice trembled on the line, barely above a whisper: “Sir… he’s lying there… not moving.” Her employer—motionless in his second-floor flat on 5th Cross Street. The first sub-inspector reached the scene in twelve tense minutes, his heart already pounding from the dispatch, and sealed the narrow staircase and landing with bright yellow “Greater Chennai Police – Crime Scene” tape, the plastic snapping in the wind like a warning that something terrible had crossed into their world. Then he radioed urgently for the mobile forensic van from the Tamil Nadu Forensic Sciences Department’s Guindy laboratory, his voice low, as if speaking too loudly might disturb whatever darkness waited inside the flat.

Inside, the air felt unnaturally still—too still, heavy with the weight of unspoken secrets. **Rohan Kumar**, thirty-two, a sought-after personal trainer at **Peak Performance Gym** on Old Mahabalipuram Road, lay face-down on the polished granite floor of his living room. A single, brutal strike had crushed the back of his skull, leaving a horrifying silence where life had once been. A 20-kilogram rubber-coated hexagonal dumbbell rested inches from his head, its end dark with congealing blood and a few strands of hair that clung like silent accusations. The front door hung slightly ajar, swaying just enough in the breeze to make the hinges creak softly, mocking the idea of safety in this city of millions. No broken locks, no scattered belongings—only the low, steady hum of the split air-conditioner keeping the room at a precise 22 degrees Celsius, as if the machine itself was guarding the secret of what had happened here and daring the investigators to uncover it without disturbing the careful calm.

**Inspector Arjun Prasad** arrived at 8:20 p.m., his white half-sleeve shirt already damp with sweat despite the evening cool, fifteen years in homicide having taught him to read a scene before touching anything, yet tonight something felt deeply off—the kind of neatness that whispered “calculated” instead of chaotic rage, sending a slow chill down his spine. With him came **Dr. Vivek Anand**, the department’s behavioural consultant, a quiet, sharp-eyed former psychologist who carried nothing but a small black notebook, his presence alone making the room feel heavier, as if unseen eyes were now watching the watchers. The forensic photographer’s flashes lit the room in stark, blinding bursts, each one freezing the horror in white light while two scene-of-crime officers in white Tyvek suits began their meticulous grid search, moving like ghosts in a graveyard of clues. Black powder revealed smudged glove prints on the dumbbell handle—deliberate and careful, suggesting someone who had planned every move. A partial palm print lifted cleanly from the coffee table edge, teasing at a story not yet told. Blood-spatter analysts traced the cast-off pattern on the wall: a right-handed swing, delivered with cold force from behind while the victim stood near the sofa, unsuspecting and betrayed. Tiny black fibres clung to the dumbbell’s rubber surface, consistent with a standard gym towel, but why would a killer bother wiping when raw rage should have left chaos behind? Dr. Selvi, forensic surgeon from Stanley Medical College, arrived at 9:15 p.m. and conducted the in-situ examination under harsh portable lights that cast long, accusing shadows. Rigor mortis was just beginning, a slow stiffening that mirrored the inspector’s growing unease. She estimated death between 6:00 and 7:00 p.m. The occipital fracture was catastrophic—death almost instant. Defensive bruises marked the forearms, but the palms were clean, suggesting the attack came without warning from someone the victim trusted enough to turn his back on. Stomach contents pointed to a recent protein shake and energy bar, the last ordinary meal before everything shattered, each detail building the suspense layer by layer like a noose slowly tightening in the dark, making every shadow in the room feel alive with possibility and dread.

Back at the station by 11:30 p.m., Inspector Prasad gathered Sub-Inspector Priya Lakshmi and Constable Muthu Raj in the dimly lit briefing room, the early facts feeling ordinary on the surface, yet the unnatural neatness of the scene nagged at him like an itch he couldn’t scratch—what if this wasn’t random violence, what if the killer was still close, watching them even now through the humid night? Rohan had no immediate family in Chennai; his parents lived in Coimbatore, hours away and unreachable in the dead of night. His iPhone 14, left on the sofa like a planted clue, showed a forty-three-second call to the gym owner at 5:42 p.m.—the final outgoing call, short and final, hanging in the air like an unanswered question. Overnight cyber-cell access to bank records revealed ₹4.8 lakh in unexplained cash deposits over three months, far exceeding his ₹85,000 salary, and a ₹35 lakh loan application for “business expansion” filed just two weeks earlier—ambition that could destroy lives and spark deadly jealousy. Magistrate-ordered CCTV from Peak Performance Gym arrived at 2 a.m., grainy and silent: Rohan left at 4:50 p.m. carrying his bag, while the owner, **Anjali Devi**, had exited the premises twenty minutes earlier, her car disappearing into the night traffic feeling too convenient, too perfectly timed, planting the first real seed of suspicion that refused to fade.

The next morning at 8:00 a.m., the team reached the gleaming glass-fronted gym near the OMR-Thoraipakkam junction, where morning clients sweated on treadmills, oblivious to the storm brewing around them, while the air smelled of rubber mats and disinfectant—masking something far darker beneath the surface. Anjali Devi, thirty-eight, owner and managing director, met them in her glass-walled office, wearing a charcoal business outfit with hair neatly tied, her eyes shadowed with what could be grief or the weight of guilt, but her voice stayed measured, almost too calm, as the inspector’s pulse quickened with every word. “We spoke yesterday afternoon about his schedule,” she said, folding her hands on the desk with deliberate care. “Just routine.” Dr. Vivek Anand stood slightly behind Inspector Prasad, arms crossed, and when Anjali uttered the word “schedule,” her left eyelid twitched twice—barely noticeable—and her gaze flicked involuntarily toward the framed grand-opening photograph on the wall. Dr. Anand made a single quiet note, but inside, the inspector felt the first real twist of suspicion, like a door creaking open in a locked house at midnight, heightening the tension as small cracks began to appear in her composed facade.

Staff interviews in the empty cycling studio added layers of doubt that thickened the air like humidity before a storm. Senior trainer Sandeep hesitated, eyes darting nervously, before saying Rohan had been quietly recruiting clients for a new gym he planned to open in Velachery—PowerCore. “He already had twenty members ready to follow him.” Trainer Neha lowered her voice to a near-whisper: “Anjali and Rohan were close for almost two years. Everyone sensed it. But three weeks ago they argued loudly in the staff room. She told him he would ruin her.” The words hung there, heavy with unspoken betrayal and hidden motives, making the investigators wonder how deep the personal and professional rivalry truly ran, the suspense growing as each revelation pointed closer to someone who had everything to lose.

The postmortem report landed by afternoon: negative toxicology, confirming no easy answers from substances. The murder dumbbell matched the exact brand, weight, and manufacturing batch used in the gym’s free-weights section, and later microscopic analysis of rubber coating and paint confirmed it without doubt. Every match tightened the invisible threads around Anjali, yet she still moved freely—smiling at clients, answering calls—while the team watched and waited, the slow accumulation of evidence building a quiet dread that the killer might slip away if they moved too soon. Financial tracing moved slowly but steadily, each deposit a breadcrumb leading deeper into motive, and Rohan’s laptop, seized from the flat, contained a polished business plan for PowerCore Gym: a signed lease agreement for a 3,000 sq ft space in Velachery and a client list of forty-seven names—nearly half of Peak Performance’s premium clientele. The numbers screamed rivalry, screamed loss, screamed a rage born from threatened empire, pulling the investigators deeper into a web where trust had turned toxic.

By the third day, tension thickened in the air like the humidity before rain, pressing on everyone involved. Inspector Prasad requested Anjali Devi for formal questioning. She arrived at 10 a.m. with her lawyer, composed but with a flicker in her step that only the trained eye caught, as if she sensed the net closing. In the cool interrogation room with its one-way mirror, Prasad laid out the timeline piece by piece, watching her face for the smallest crack while Dr. Anand observed from the corner, silent as a shadow. Anjali denied any romantic involvement, her words smooth and practiced. She described the 5:42 p.m. call as routine feedback. When shown the business plan, she insisted she knew nothing about Rohan’s plans to leave. Her alibi: she drove straight home to her Besant Nagar flat and watched television alone until late, with no street CCTV capturing her precise arrival. Every denial felt like a step closer to the edge of a cliff, the room growing heavier with unspoken lies. Dr. Anand spoke softly for the first time, his voice cutting through the silence like a blade: “When you mentioned television, your shoulders relaxed noticeably. People fabricating details under pressure usually stay tense. You also touched your watch twice—self-soothing behaviour when providing false timing. The call was at 5:42 p.m. You left the gym at 4:30 p.m. That leaves more than an hour unaccounted for… enough time for everything to change forever.” The lawyer objected sharply, but the questioning ended without a confession, leaving a lingering uncertainty that gnawed at the team through the rest of the day, the suspense now a living thing pulsing in the background.

That evening, Dr. Anand suggested planting a controlled piece of information to test reactions—the kind of calculated gamble that could snap the trap shut or let the killer slip away into the Chennai night forever. At 7 p.m., Inspector Prasad addressed a small press gathering outside the station, his face calm on the surface while his mind raced with possibilities. He stated that the murder weapon had been sent for advanced DNA and fingerprint re-examination at the state forensic lab, and that officers would return to Peak Performance Gym the next morning to seize the remaining dumbbell set “for detailed comparison.” The words were chosen carefully, bait dangling on a hook in dark waters. Would she bite? The trap was set, and the night grew heavier with anticipation, every passing minute stretching the tension like a wire about to snap.

At 8:15 p.m., plain-clothes officers watching Anjali Devi’s residence saw her leave hurriedly in her white Hyundai Creta, headlights cutting through the dark like guilty eyes fleeing the truth. She drove directly to the gym, unlocked the shutter with her master key, and entered, her movements hurried and desperate. Hidden camera footage—authorised earlier by magistrate order—captured every move in grainy night-vision, the suspense stretching unbearably with each second: her frantic hands opening the locked cupboard, pulling out a black gym towel, and wiping down the entire dumbbell rack with repeated, almost panicked strokes, as if trying to erase her own shadow from existence. Then she selected one specific 20-kilogram dumbbell, slid it into a large sports bag, and carried it out—her fear almost palpable even through the screen, making the reader’s pulse race in sync with the unfolding risk. At 9:40 p.m., her vehicle was stopped during a routine check near Besant Nagar beach promenade, the sea breeze whipping around them like nature itself witnessing the climax. When the bag was opened in her presence, the replacement dumbbell lay inside, faint traces of blood still trapped in the hexagonal edges where the towel had failed to reach—tiny, damning specks that glowed under the flashlight like final confessions. Laboratory confirmation came at 11:00 p.m.: the blood matched Rohan Kumar’s DNA with virtual certainty, and the towel fibres were identical to those found on the original murder weapon. The noose had tightened completely.

Anjali Devi was arrested at 11:45 p.m. under Section 302 IPC. In the early hours, after nearly two hours of careful questioning in the presence of a woman sub-inspector and her lawyer, the story finally broke under the crushing weight of evidence and guilt. She admitted the long-standing personal relationship had turned bitter when Rohan revealed his plans for a rival gym that threatened everything she had built. She had gone to his flat to plead with him one last time. When he showed her the signed lease papers and laughed, something inside her snapped in a moment of blind rage. She picked up the dumbbell he kept at home for personal use—the same model as those in her gym—struck him once from behind while wearing gloves, wiped the handle, and left, hoping the neat scene would hide her tracks forever.

The case file moved to the public prosecutor the following morning. The magistrate ordered judicial remand. Inspector Arjun Prasad closed the investigation register at 4:00 p.m. on the fourth day, writing in the final column: “Accused identified through integrated forensic, financial, digital, and behavioural evidence. All leads accounted for.” Outside the station, Chennai’s evening traffic continued its endless rhythm—buses honking, autorickshaws weaving through the dusk, the comforting aroma of filter coffee rising from the canteen. Another file shifted quietly from the active pile to the solved section, the slow, patient machinery of the Greater Chennai Police delivering its result once more, leaving behind the echoes of a suspense that had built steadily from the first trembling call to the final, inevitable arrest.
 
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Dumbbell ka Khooni Raaz:

April ka geela garam shaam Besant Nagar, Chennai par bhari pad raha tha. Bay of Bengal ki namkeen hawa mein machhli aur ECR ki door ki traffic ki awaaz mil rahi thi. Saat 7:45 baje Adyar Police Station ke control room mein emergency call aayi. Ek ghar ki naukrani kaanpati hui awaaz mein boli ki uske malik ko doosre manzil ke flat mein 5th Cross Street par behosh paaya hai. Pehla sub-inspector baarah minute mein pahunch gaya. Usne narrow seediyon aur landing ko bright yellow “Greater Chennai Police – Crime Scene” tape se seal kar diya aur Tamil Nadu Forensic Sciences Department ke Guindy laboratory se mobile forensic van ko urgent radio kiya.

Flat ke andar hawa bilkul sannati si thi. **Rohan Kumar**, battis saal ka, Old Mahabalipuram Road par **Peak Performance Gym** ka mashhoor personal trainer, living room ke polished granite floor par muh ke bal pada tha. Uske sir ke peeche ek hi zabardast vaar se khopdi toot gayi thi. Ek 20 kilogram ka rubber-coated hexagonal dumbbell uske sir ke paas pada tha, uska end khoon aur baalon se suna hua. Front door thodi si khuli hui thi. Koi tooti taale nahi, koi bikhere samaan nahi – sirf split air-conditioner ki dheemi awaaz 22 degree Celsius par room ko thanda rakh rahi thi, jaise jo bhi hua tha uski chuppi ko preserve kar rahi ho.

**Inspector Arjun Prasad** 8:20 baje pahunche. Unki white half-sleeve shirt paseene se bhiggi hui thi shaam ki thand mein bhi. Homicide mein pandrah saal ne unhe sikhaya tha ki scene ko chhue bina pehle padhna chahiye. Unke saath **Dr. Vivek Anand** the, department ke behavioural consultant – ek chupke, tez nazar wale purane psychologist jo sirf ek chhota kala notebook saath rakhte the. Forensic photographer ke flashes ne room ko sakht roshni se jagmaga diya jabki do scene-of-crime officers white Tyvek suits mein apni systematic grid search shuru kar rahe the.

Black powder se dumbbell handle par gloves ke smudged prints dikhe. Coffee table ke kinare se partial palm print saaf uthaya gaya. Blood-spatter experts ne wall par cast-off pattern trace kiya – right-handed swing, victim ke peeche se sofa ke paas khade hone par zor se maara gaya. Dumbbell ke rubber par chhote black fibres the, jo common gym towel se match karte the. Stanley Medical College se Dr. Selvi 9:15 baje aayi aur harsh portable lights ke neeche in-situ examination ki. Rigor mortis abhi shuru ho raha tha. Unhone maut ka samay 6:00 se 7:00 baje ke beech anumaani kiya. Occipital fracture bahut khatarnak tha. Forearms par defensive bruises the, lekin haathon ki hatheliyon par koi nishaan nahi – iska matlab hamla bina warning ke peeche se aaya tha. Pet ke contents se pata chala ki protein shake aur energy bar abhi thodi der pehle liya tha.

Raat 11:30 baje team station pahunchi. Dim lighting wale briefing room mein Inspector Prasad ne Sub-Inspector Priya Lakshmi aur Constable Muthu Raj ko ikattha kiya. Shuruaati facts aam lage, lekin scene ki safai unhe kuchh pareshan kar rahi thi.

- Rohan ka Chennai mein koi nazdeeki parivaar nahi tha. Maata-pita Coimbatore mein rehte the.
- Sofa par pada uska iPhone 14 dikhata tha ki aakhri outgoing call 5:42 baje gym owner ko tha – chalis second lamba.
- Raat bhar cyber-cell se bank records mile: teen mahine mein ₹4.8 lakh ke unexplained cash deposits, uske ₹85,000 salary se kaafi zyada. Do hafte pehle “business expansion” ke liye ₹35 lakh ka loan application file kiya gaya tha.
- Magistrate warrant se Peak Performance Gym ka CCTV 2 baje subah aaya: Rohan 4:50 baje bag leke gaya. Owner **Anjali Devi** usse bees minute pehle nikal chuki thi.

Agli subah 8:00 baje team OMR-Thoraipakkam junction ke paas chamakte glass-fronted gym pahunchi. Subah ke clients treadmill par paseena bahaa rahe the. Hawa mein rubber mats aur disinfectant ki khushboo thi. Anjali Devi, aathtees saal ki, owner aur managing director, apne glass-walled office mein unhe mili. Woh charcoal business outfit mein thi, baal peeche bandhe. Uski aankhein thaki hui thi, lekin awaaz steady thi.

“Humne kal dopahar uske schedule ke baare mein baat ki,” usne haath fold karke kaha. “Sirf routine.”

Dr. Vivek Anand Inspector Prasad ke thoda peeche khade the. Jab Anjali ne “schedule” shabd bola, uski left eyelid do baar twitch ki aur nazar wall par lage grand-opening photo ki taraf palat gayi. Dr. Anand ne chupke se note kiya.

Staff interviews khali cycling studio mein hue. Senior trainer Sandeep ne thoda ruk kar bataya ki Rohan chupke se clients ko apne naye gym ke liye recruit kar raha tha jo Velachery mein kholne wala tha – PowerCore. “Uske paas already bees members the jo switch karne ko taiyaar the.” Trainer Neha ne awaaz dheemi karke kaha, “Anjali aur Rohan lagbhag do saal se close the. Sabko ehsaas tha. Lekin teen hafte pehle staff room mein unka zor se jhagda hua. Usne kaha tha ki woh sab barbaad kar dega.”

Postmortem report dopahar tak aaya: toxicology negative. Murder dumbbell gym ke free-weights section wale exact brand, weight aur manufacturing batch se match karta tha. Baad mein rubber coating aur paint ki microscopic analysis ne confirm kiya.

Financial tracing dheere lekin pakke kadam se chali. Extra cash deposits private clients ke payments se jude. Flat se seize kiye gaye Rohan ke laptop mein PowerCore Gym ka polished business plan tha: Velachery mein 3000 sq ft space ka signed lease aur forty-seven clients ki list – Peak Performance ke kaafi premium members.

Teesre din tension badh gayi. Inspector Prasad ne Anjali Devi ko formal questioning ke liye bulaya. Woh 10 baje apne lawyer ke saath aayi. Thande interrogation room mein, jahaan one-way mirror tha, Prasad ne timeline ko ek-ek karke rakha. Dr. Anand kone mein chupchaap dekh rahe the.

Anjali ne kisi romantic involvement ko inkaar kiya. Usne 5:42 baje ke call ko routine feedback bataya. Business plan dikhaye jaane par woh boli ki usse Rohan ke jaane ke plan ki bilkul khabar nahi. Uska alibi: woh seedha apne Besant Nagar flat chali gayi aur raat tak akeli television dekhti rahi. Street CCTV mein uske exact pahunchne ka time nahi tha.

Dr. Anand ne pehli baar dheere se bola, “Jab aapne television ka zikr kiya, aapke kandhe noticeably relax ho gaye. Pressure mein jhooth bolte waqt log aam taur par tense rehte hain. Aapne apni watch ko do baar touch kiya – false timing dete waqt self-soothing behaviour. Call 5:42 baje tha. Aap gym se 4:30 baje nikli thi. Ghar pahunchne se pehle kaafi time unaccounted tha.”

Lawyer ne tez virodh kiya. Questioning bina confession ke khatam hui.

Us shaam Dr. Anand ne suggest kiya ki controlled information release karke reactions test kiye jaayein. Saat 7 baje Inspector Prasad ne station ke bahar chhote press gathering ko address kiya. Unhone shant swar mein kaha ki murder weapon ko state forensic lab mein advanced DNA aur fingerprint re-examination ke liye bheja gaya hai, aur kal subah officers Peak Performance Gym laut kar baaki dumbbell set seize karne wale hain “detailed comparison” ke liye.

Jaal bichh gaya tha.

Saat 8:15 baje plain-clothes officers jo Anjali Devi ke ghar par nazar rakh rahe the, ne dekha ki woh jaldi se apni white Hyundai Creta mein nikal gayi. Woh seedha gym gayi, master key se shutter khola aur andar chali gayi. Magistrate order se lagaye gaye hidden camera ne har movement night-vision mein record kiya. Usne locked cupboard khola, black gym towel nikala aur poore dumbbell rack ko paagalpan bhari, baar-baar strokes se saaf kiya. Phir usne ek specific 20-kilogram dumbbell uthaya, bade sports bag mein daala aur leke bahar nikal gayi.

9:40 baje uski gaadi Besant Nagar beach promenade ke paas routine check mein roki gayi. Uske saamne bag khola gaya. Andar replacement dumbbell tha. Hexagonal edges mein towel se bachi hui khoon ki halki traces abhi bhi thi. Laboratory confirmation 11:00 baje aayi: khoon Rohan Kumar ke DNA se almost pakka match karta tha. Towel fibres original murder weapon wale se bilkul same the.

Anjali Devi ko 11:45 baje Section 302 IPC ke tahat arrest kar liya gaya. Subah ke pehle ghanton mein, aurat sub-inspector aur uske lawyer ke saamne lagbhag do ghante ke careful questioning ke baad, kahani toot gayi. Usne maana ki lambi personal relationship tab kharab ho gayi jab Rohan ne apne rival gym ke plans bataye. Woh uske flat usse baat karne gayi thi. Jab usne signed lease papers dikhaye aur hans diya, uske andar kuchh toot gaya. Usne ghar par rakhe uske personal use wale dumbbell ko uthaya – jo uske gym wale model jaisa tha – gloves pehen kar peeche se ek vaar maara, handle saaf kiya aur chali gayi.

Agli subah case file public prosecutor ko bhej diya gaya. Magistrate ne judicial remand order kiya. Inspector Arjun Prasad ne chaar din ke din 4:00 baje investigation register band kiya, final column mein likhte hue: “Aaropi ko forensic, financial, digital aur behavioural evidence ke integrated tareeke se pehchaana gaya. Sab leads account mein hain.”

Station ke bahar Chennai ki shaam ki traffic apne aam rhythm mein chalti rahi – buses ki horn, autorickshaws ka weave, canteen se filter coffee ki sughand uth rahi thi. Ek aur file chupke se active pile se solved section mein shift ho gayi. Greater Chennai Police ki dheemi, sabr bhari machinery ne phir ek baar apna natija diya.
 
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vakharia

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जब जमीन बुलाती है

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विरेन ने मोंट ब्लांक पेन का ढक्कन बंद किया। पेन की क्लिप से एक हल्की 'क्लिक' की आवाज़ आई। उसने चमड़े के भारी फोल्डर को खिसका कर किनारे रखा। फोल्डर के ऊपर सोने के अक्षरों में 'वी. आर. एंटरप्राइजेज' छपा था। मेज़ के एक कोने पर रखे क्रिस्टल के गिलास पर पानी की बूंदें जमा हो गई थीं। एक बूंद फिसलकर मेज़ के कांच पर गिरी।

रात के दो बज रहे थे। पैंतालीसवीं मंज़िल पर बने इस साउंडप्रूफ ऑफिस में नीचे सड़क के ट्रैफ़िक का शोर बिल्कुल नहीं पहुँचता था। कांच की विशाल दीवार के बाहर मुंबई शहर की पीली रोशनी दूर तक बिछी थी। सामने दिख रही तीन गगनचुंबी इमारतें विरेन की अपनी थीं। कल सुबह वह शहर के सबसे बड़े कमर्शियल प्रोजेक्ट के लिए ज़मीन का सौदा पक्का करने वाला था। पांच सौ करोड़ का ड्राफ्ट उसने ब्रीफकेस से बाहर निकालकर मेज पर रख दिया। उसने अपनी रेशमी टाई की गांठ को थोड़ा ढीला किया। सब कुछ उसकी मुट्ठी में था।

विरेन ने गिलास उठाया। उंगलियों पर कांच की ठंडक महसूस हुई। पच्चीस साल पहले का वो दिन भी ऐसा ही ठंडा था।

कुर्ला की चाल की टिन की छत से बारिश का गंदा पानी रिसकर सीधे एक एल्युमीनियम की बाल्टी में गिर रहा था। बाल्टी के पेंदे की काली दरार से पानी बहकर विरेन के पैरों तक आ गया था। वह उस ठंडे, चिपचिपे फर्श पर उकड़ू बैठा था। सामने लोहे की जंग लगी पेटी खुली थी।

उसने पुराने, सीलन भरे कपड़ों के नीचे से एक प्लास्टिक की थैली निकाली। थैली में कुछ खुल्ले सिक्के और मुड़े-तुड़े नोट थे। उसने नोटों को उंगलियों से ज़ोर से दबाकर सीधा किया, जैसे ऐसा करने से उनकी कीमत बढ़ जाएगी। कुल अड़सठ रुपये।

बगल वाले अंधेरे कमरे से एक सूखी, फटी हुई खांसी की आवाज़ उठी। उसके पिता की खांसी। वह खांसी जो रुकने का नाम नहीं लेती थी, जो सीने को फाड़ देने वाली आवाज़ करती थी। उस खांसी के साथ खून की जो जंग लगी गंध आती थी, वह चाल की सीलन में हमेशा घुली रहती थी। डॉक्टर ने कहा था कि एक इंजेक्शन से राहत मिलेगी। इंजेक्शन की कीमत तीन सौ रुपये थी।

विरेन ने मुट्ठी में दबे उन अड़सठ रुपयों को देखा। कागज़ के वे टुकड़े उसकी उंगलियों में पसीने से गल रहे थे। उसने पिता के कमरे की तरफ देखा। अंधेरे में एक कमज़ोर, कांपता हुआ हाथ पानी के गिलास को टटोल रहा था।

विरेन ने अपनी मुट्ठी कस ली। सिक्कों की धार उसकी हथेली में चुभ गई। उसने पैसे वापस थैली में डाले और पेटी का ढक्कन ज़ोर से बंद कर दिया। ताले की कुंडी एक खटक के साथ बैठी। वह उठा। उसने पिता के उस कांपते हाथ की तरफ एक आखिरी नज़र डाली और पानी का गिलास अपनी जगह से खिसका कर दूर रख दिया। बिना कुछ कहे, वह चाल से बाहर निकल गया। उसे इस दलदल में घुटकर नहीं मरना था।

दोपहर में वह नरीमन पॉइंट पर था। विरेन के बाएं जूते का तला अंगूठे के पास से घिसकर पूरा खुल गया था। चलते समय वह ज़मीन से घिसटता था और सड़क की तपिश सीधे उसके नंगे तलवे को जला रही थी।

एक लंबी, काले रंग की इम्पोर्टेड गाड़ी ठीक उसके सामने आकर रुकी। गाड़ी के ब्रेक लगने की ज़रा भी आवाज़ नहीं हुई। सिर्फ भारी टायर के नीचे आकर सड़क पर पड़ी एक खाली प्लास्टिक की बोतल बिना आवाज़ के पिचक गई।

ड्राइवर ने भागकर दरवाज़ा खोला। अंदर से एक आदमी बाहर निकला। उसके गहरे नीले सूट की क्रीज़ इतनी तीखी थी कि विरेन की नज़र वहीं अटक गई। उस आदमी के जूतों पर शहर की धूल का एक कण भी नहीं था। वह फोन पर बात कर रहा था।

"मुझे वो ज़मीन किसी भी कीमत पर चाहिए। हाँ, बस्ती खाली करवाओ। जो कीमत मांग रहे हैं, दे दो। मुझे काम कल से ही शुरू चाहिए।" आदमी की आवाज़ बहुत शांत, नीरस और अधिकार से भरी थी। उसे किसी के 'ना' कहने का डर नहीं था।

वह कांच के घूमते हुए दरवाज़े से इमारत के अंदर चला गया। दरवाज़ा खुलने पर अंदर की ठंडी, खुशबूदार हवा का एक झोंका विरेन के पसीने से भीगे चेहरे पर लगा।

विरेन वहीं खड़ा रहा। उसने अपने खुले हुए जूते को देखा, जिससे उसका गंदा अंगूठा बाहर झांक रहा था। फिर उसने उस कांच की इमारत को देखा। उसके जबड़े तन गए। उसने अपना पैर उठाया और गाड़ी के उस महंगे टायर पर लगे हल्के से कीचड़ को अपने नंगे अंगूठे से पोंछ दिया। एक पल के लिए उसने उस गाड़ी की रबर की ठंडक को अपनी त्वचा पर महसूस किया। यह सिर्फ एक गाड़ी नहीं थी; यह वह ताक़त थी जो बस्तियां खाली करवा सकती थी। उसने तय कर लिया था। चाहे जो भी करना पड़े, एक दिन यह ताक़त उसे चाहिए थी।

शाम को वह अपने चचेरे बड़े भाई दिनेश की फैक्ट्री के छोटे, सीलन भरे केबिन में खड़ा था, जहां वो हिसाब-किताब संभालने का काम करता था। टिन की छत भट्टी की तरह तप रही थी।

दिनेश भाई ने मेज़ पर कुछ मुड़े हुए नोट रखे और अपने माथे का पसीना फटे हुए गमछे से पोंछा। "विरेन, इस महीने का हिसाब। देख ले।"

विरेन ने नोट उठाए। उंगलियों से गिने। "दिनेश भाई, डेढ़-सौ रुपये कम हैं।"

"अरे यार, तुझे तो पता है, इस बार माल का पैसा फंसा हुआ है। घर की बात है, अगले महीने एडजस्ट कर लेंगे।" दिनेश भाई ने एक बीड़ी सुलगाई और रजिस्टर पलटने लगे। उनके चेहरे पर कोई तनाव नहीं था। वे इतने में ही खुश थे। जब विरेन उनसे कुछ बड़ा काम करने की बात करता तब वे हमेशा कहते, "अपन कौन सा अंबानी हैं जो रातों-रात महल खड़े करने हैं। दाल-रोटी चल रही है ना... बस।"

विरेन की नज़र मेज़ के किनारे पर रखे एक पीतल के भारी पेपरवेट पर गई। उसके नीचे सौ-सौ के कुछ और नोट दबे थे जो दिनेश भाई ने कच्चा माल लाने वाले के लिए रखे थे।

विरेन ने अपने हाथ में पकड़े मुड़े हुए नोट अपनी पैंट की जेब में रखे। दिनेश भाई जब रजिस्टर में कुछ लिखने के लिए मुड़े और खांसने लगे, तो विरेन का बायां हाथ चुपचाप उस पेपरवेट की तरफ बढ़ा। उसकी उंगलियों ने सफाई से पेपरवेट उठाया, नीचे दबे उन सौ-सौ के नोटों को अपनी मुट्ठी में सरकाया, और पेपरवेट वापस वहीं रख दिया। कोई आवाज़ नहीं हुई।

"ठीक है भाई। अगले महीने दे देना।" विरेन ने बिल्कुल शांत स्वर में कहा और केबिन से बाहर आ गया।

फैक्ट्री के बाहर अंधेरा हो रहा था। विरेन ने अपनी मुट्ठी खोली। वे चोरी किए गए नोट पसीने से गीले हो गए थे। यह उसके चचेरे भाई का पैसा था। लेकिन विरेन के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था। उसने उन नोटों को अपनी जेब के सबसे गहरे हिस्से में दबा लिया। उसने सोचा, जो इंसान खुद आगे नहीं बढ़ना चाहता, उसका पैसा मेरे ही काम आना चाहिए।

इसी भूख ने उसे नीरा तक पहुँचाया था। नीरा से उसकी पहली मुलाक़ात कोई इत्तेफाक नहीं थी।

नीरा के पिता, कांतिलाल, कुर्ला में ही लोहे के पाइपों के एक छोटे व्यापारी थे। उनके पास शहर के बाहर एक ज़मीन का टुकड़ा था, जो सालों से खाली पड़ा था। कांतिलाल बहुत सीधे और डरपोक इंसान थे। विरेन को वो ज़मीन चाहिए थी... कुछ बड़ा करने के लिए जो पूंजी जुटानी थी। और उस ज़मीन तक पहुँचने का रास्ता नीरा थी।

विरेन एक शाम कांतिलाल की दुकान पर पेमेंट का एक फर्जी बहाना लेकर गया था। नीरा वहां काउंटर के पीछे बैठी कुछ कागज़ात जमा रही थी। उसने एक साधारण सूती साड़ी पहनी थी। उसके बालों में चमेली के तेल की हल्की महक थी।

"काका अंदर हैं?" विरेन ने लोहे के काउंटर पर हाथ रखते हुए पूछा।

नीरा ने सिर उठाया। उसकी आंखें बड़ी और शांत थीं। "वो गोडाउन में गए हैं। आप बैठिए।"

नीरा ने उसे पानी का एक गिलास दिया। स्टील का गिलास, जो किनारों से थोड़ा मुड़ा हुआ था। विरेन ने पानी पीते हुए नीरा के हाथों को देखा। उसकी कलाइयों पर कांच की सस्ती चूड़ियां थीं। वो लड़की बहुत सीधी थी, इस दुनिया की चालाकियों से बिल्कुल अनजान।

विरेन ने खाली गिलास काउंटर पर रखा। "दुकान का बहुत काम रहता है क्या? काका अकेले थक जाते होंगे।"

"हां, इसलिए मैं शाम को आ जाती हूँ थोड़ी मदद करने।" नीरा ने कागज़ों पर स्टेपलर लगाते हुए कहा। उसने विरेन की आंखों में नहीं देखा।

विरेन ने ध्यान से उसे परखा। एक कमज़ोर, आज्ञाकारी लड़की। एक ऐसी पत्नी जो कभी उससे सवाल नहीं करेगी। जो हमेशा उसके साये में रहेगी। और सबसे ज़रूरी बात—कांतिलाल अपनी इकलौती बेटी के पति को वो खाली ज़मीन दहेज़ में देने से कभी मना नहीं करेंगे।

विरेन ने काउंटर पर रखी एक लोहे की भारी कील उठाई और उसे अपनी उंगलियों के बीच घुमाने लगा। उसकी नज़र नीरा के झुके हुए सिर पर थी। उस पल उसे नीरा से कोई प्यार या आकर्षण महसूस नहीं हो रहा था। वह सिर्फ एक गणित लगा रहा था। एक सौदा।

"काका आ गए," नीरा ने दरवाज़े की तरफ देखते हुए कहा।

विरेन ने वो लोहे की कील चुपचाप अपनी जेब में रख ली। उसके चेहरे पर एक बहुत ही नरम, झूठी और शालीन मुस्कान आ गई। "नमस्ते काका," उसने मुड़कर कहा।

उस शाम जब वह दुकान से बाहर निकला, तो उसने तय कर लिया था कि नीरा उसकी पत्नी बनेगी। सिर्फ इसलिए, क्योंकि वो ज़मीन विरेन की किस्मत का पहला दरवाज़ा खोलने वाली थी।

सड़क पर अब अंधेरा गहराने लगा था। स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में धूल के कण उड़ते हुए दिख रहे थे। कांतिलाल का पुराना, हल्के नीले रंग का बजाज चेतक स्कूटर दुकान के चबूतरे के ठीक नीचे खड़ा था। स्कूटर के मडगार्ड पर जंग के भूरे निशान थे।

विरेन ने सड़क के दोनों तरफ देखा। आसपास की छिटपुट दुकानें बंद हो रही थीं। ट्रैफ़िक कम हो चुका था। वह स्कूटर के पिछले पहिए के पास जाकर उकड़ू बैठ गया, बिल्कुल ऐसे जैसे अपने जूते के फीते बांध रहा हो।

उसने पैंट की जेब में हाथ डाला। वह लोहे की भारी कील अभी भी उसकी उंगलियों के बीच थी। धातु ठंडी और खुरदरी थी। उसने कील की नोक को पिछले टायर के घिसे हुए रबर पर रखा। उसने अपना जबड़ा हल्का सा भींचा और अपने शरीर का पूरा वज़न अपने अंगूठे पर डाल दिया।

रबर के फटने की कोई ज़ोरदार आवाज़ नहीं हुई। सिर्फ हवा निकलने की एक लगातार, धीमी फुफकार सुनाई दी—'स्स्स्स्स...'। विरेन ने तब तक कील को अंदर दबाए रखा जब तक टायर पूरी तरह पिचक कर लोहे के रिम से नहीं सट गया।

उसने कील बाहर निकाली। उस पर टायर की काली कालिख लग गई थी। विरेन उठा और सड़क पार करके पास की एक खुली नाली में वह कील फेंक दी। गंदे पानी में एक हल्की सी छपाक हुई और कील कीचड़ में डूब गई। वह वहीं पास में एक बंद दुकान के शटर के सहारे खड़ा हो गया और इंतज़ार करने लगा। उसने अपनी जेब से एक बीड़ी निकाली, पर उसे सुलगाया नहीं। वह बस उसे उंगलियों में घुमाता रहा।

पंद्रह मिनट बाद लोहे का शटर गिरने की भारी आवाज़ आई। कांतिलाल ने दुकान पर ताला लगाया। नीरा उनके पीछे खड़ी थी। कांतिलाल ने स्कूटर को स्टैंड से नीचे उतारा। स्कूटर का पिछला हिस्सा एक तरफ बुरी तरह झुक गया।

"अरे राम," कांतिलाल ने झुककर टायर को हाथ से दबाते हुए कहा। "यह तो पूरा बैठ गया है। अब इस वक़्त गैरेज भी बंद हो गए होंगे।"

नीरा ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा ठीक किया। "अब क्या करेंगे बापू? घर तक कैसे पहुंचेंगे?"

विरेन ने बीड़ी वापस जेब में रखी और सड़क पार करके उनके पास आ गया। उसके चेहरे पर हल्की सी हैरानी और चिंता का बहुत सधा हुआ भाव था।

"क्या हुआ काका? मैं बस बस-स्टैंड की तरफ निकल ही रहा था कि आपको परेशान देखा।" विरेन ने झुककर टायर को ऐसे देखा जैसे उसे कुछ पता ही न हो।

"टायर बैठ गया है बेटा," कांतिलाल ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा। उनकी सांस थोड़ी फूली हुई थी। "पता नहीं कैसे। अब इतनी रात को इसे खींचकर घर तक ले जाना पड़ेगा। मेरी तो उम्र भी नहीं रही इतना धकेलने की।"

विरेन ने तुरंत स्कूटर का हैंडल पकड़ लिया। "आप क्यों परेशान होते हैं काका। आप और नीरा जी आराम से पैदल घर जाइये। मैं इसे धकेल कर आपके घर तक ले आता हूँ। रास्ते में कोई गैरेज खुला दिखा तो बनवा भी लूंगा।"

"नहीं बेटा, तू क्यों इतनी तकलीफ़ करेगा..." कांतिलाल ने संकोच से कहा।

"इसमें तकलीफ़ कैसी काका। अपनों के काम नहीं आऊंगा तो किसके आऊंगा।" विरेन ने स्कूटर को आगे की तरफ धकेलना शुरू कर दिया। उसका लहज़ा बहुत नरम, धीमा और आदर से भरा था।

कांतिलाल ने गहरी राहत की सांस ली और कृतज्ञता से विरेन को देखा। नीरा चुपचाप खड़ी थी। विरेन ने स्कूटर को आगे बढ़ाते हुए एक पल के लिए नीरा की तरफ देखा। उस कमज़ोर पीली रोशनी में नीरा की नज़रें विरेन पर टिकी थीं। उसकी आंखों का भाव बता रहा था कि विरेन का तीर बिल्कुल सही निशाने पर लगा था। एक अनजान आदमी का इतनी रात गए पसीना बहाना, उनके लिए बहुत बड़ी बात थी।

विरेन ने अपना ध्यान वापस सामने सड़क पर लगा लिया। स्कूटर का पिछला रिम ज़मीन से रगड़ खाकर हल्की-हल्की खड़खड़ाहट कर रहा था। विरेन के जूतों के घिसे हुए तलों पर सड़क की कंकरियां चुभ रही थीं, लेकिन आज उसे उस दर्द से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। पंक्चर वाले की दुकान तक स्कूटर घसीटकर ले जाने में टायर-ट्यूब दोनों बदलवाने पड़े। दिनेश भाई की मेज़ से चुराए हुए सारे पैसे खर्च हो गए, पर विरेन को इसका कोई गम नहीं था।

उस लोहे की कील ने अपना काम कर दिया था।

छत के एसी वेंट से अचानक एक हल्की सी 'घुर्र' की आवाज़ आई।

विरेन ने ऊपर देखा। जाली के पास धूल का एक छोटा सा कण फंसा था। उसने इंटरकॉम की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि कमरे की हवा का रुख बदल गया। एक अजीब सी गंध कमरे में फैलने लगी। जली हुई रबर और पुराने मशीन ऑयल की गंध।

तभी मेज़ पर रखा उसका प्राइवेट सेलफोन बजने लगा। स्क्रीन पर अनजान नंबर चमक रहा था। इस नंबर की जानकारी सिर्फ तीन लोगों को थी। विरेन ने फोन उठाया।

"हेलो।"

दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई। सिर्फ एक भारी, घर्घर करती हुई सांसों की आवाज़। जैसे कोई उबलते हुए पानी के बीच सांस लेने की कोशिश कर रहा हो।

"कौन है?" विरेन की आवाज़ में हल्की सी कड़क थी।

"पैंतालीसवीं मंज़िल की हवा ठंडी तो है न विरेन?"

विरेन की उंगलियां फोन पर कस गईं। यह आवाज़ बहुत पुरानी थी। गले में कफ और कोयले की राख से भरी हुई आवाज़।

"दिनेश भाई?" विरेन के मुंह से अनजाने में निकला।

फोन पर एक सूखी, फटी हुई हंसी गूंजी। "पहचान लिया..!! मुझे लगा इतनी ऊंची इमारत में बैठकर तू नीचे की राख भूल गया होगा। पर वो बॉयलर का प्रेशर वाल्व.. उसकी तीन चूड़ियां जो तूने उस दोपहर ढीली की थीं... वो तो याद होंगी तुझे।"

विरेन के माथे पर पसीने की एक बूंद उभर आई। कुर्ला की वो पुरानी ढलाई फैक्ट्री। टिन की छत। वो भारी पाना जिससे उसने वाल्व ढीला किया था।

उस दोपहर की भयंकर गर्मी में विरेन फैक्ट्री के छोटे से केबिन में खड़ा था। उसके हाथ में एक नीली फाइल थी। उसने फाइल दिनेश भाई की मेज़ पर पटकी थी।

"दिनेश भाई, इसमें बैंक के कागज़ हैं। पाँच लाख का लोन पास हो रहा है। नवी मुंबई में नई ज़मीन मिल रही है। कब तक इस सीलन भरे कबाड़खाने में सड़ते रहेंगे हम?" विरेन की आवाज़ में खीझ थी।

दिनेश भाई ने मशीन के काले तेल से सने अपने हाथ एक फटे हुए कपड़े से पोंछे। उन्होंने चश्मे को नाक पर ऊपर खिसकाया और फाइल को बिना छुए परे कर दिया। "मुझे बैंक का कर्ज़ा नहीं चाहिए विरेन। बाप-दादा की जगह है। दो वक़्त की रोटी आराम से निकल रही है। फिर क्यों ज्यादा का लालच करना!"

"लालच की बात नहीं है.. ज़रा बाहर जाकर देखिए, दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई! और आप अभी तक वहीं के वहीं हो।" विरेन ने मेज़ पर मुक्का मारा। "यह बॉयलर अपनी उम्र पार कर चुका है। किसी दिन फट जाएगा तो जान से हाथ धो बैठेंगे। फैक्ट्री में नई मशीनें चाहिए, नई जगह चाहिए! इस कबाड़खाने में कब तक पड़े-पड़े चिल्लर गिनते रहेंगे।"

दिनेश भाई की आंखें सिकुड़ गईं और त्योरियां क्रोध से खिंच गईं। उन्होंने मेज़ पर रखा पाना उठाया और कड़क आवाज़ में बोले, "कबाड़खाना मत बोल इसे। इसी जगह ने तुझे पाल-पोस कर बड़ा किया है। तू कल का छोकरा मुझे सिखाएगा कि धंधा कैसे करते हैं? कर्ज़ लेकर रातों की नींद हराम नहीं करनी मुझे।"

"आप तो कुएं के मेंढक ही रहेंगे दिनेश भाई!" विरेन दांत पीस कर रह गया था।

"मैं जो हूँ, ठीक हूँ।" दिनेश भाई ने सख्त लहज़े में बात खत्म कर दी थी, "और एक बात कान खोलकर सुन ले। यह फैक्ट्री मेरी है। मेरा पैसा लगा है। मेरे सामने ज्ञान झाड़ने की ज़रूरत नहीं है। जा, जाकर अपना हिसाब-किताब देख। आया बड़ा लोन लेने वाला!"

उस दिन विरेन को समझ आ गया था कि जब तक दिनेश भाई ज़िंदा हैं, वह अपनी मर्ज़ी से उस जगह को बेचकर बड़ी ज़मीन नहीं खरीद सकता। वैसा दिनेशभाई का का प्रतिभाव क्या होगा वह पहले से जानता था.. और अपनी योजना के भागरूप उसने कुछ प्रबंध भी कर रखा था।

उसी दोपहर, लंच ब्रेक के समय फैक्ट्री में कोई नहीं था। मज़दूर बाहर पेड़ के नीचे सो रहे थे। विरेन ने मेन बॉयलर के पास जाकर प्रेशर वाल्व को देखा। उसका सेफ्टी लॉक वैसे ही थोड़ा कमज़ोर था। उसने पास ही पड़ा हुआ एक भारी पाना लिया। वाल्व को कसने के बजाय उसने उसे थोड़ा और ढीला कर दिया। ज़्यादा नहीं, बस तीन चूड़ी।

शाम को जब दिनेश भाई ने मशीन चालू की, तो विरेन जानबूझकर ऑफिस के अंदर बैठा रहा। कुछ मिनटों बाद एक ज़ोरदार धमाका हुआ था। गर्म लोहे और जली हुई रबर की गंध ने पूरी फैक्ट्री को भर दिया था। विरेन जब बाहर आया, तो दिनेश भाई का शरीर बॉयलर के पास पड़ा था। उनका वो तेल लगा चश्मा पिघल कर उनके चेहरे से चिपक गया था।

बाद में, विरेन ने पुलिस को बताया था कि यह महज़ एक हादसा था। मशीन बहुत पुरानी थी। दिनेश भाई की लापरवाही ही इस हादसे की वजह थी। बीमा कंपनी ने जांच की और पैसे दे दिए। विरेन ने वो पुरानी जगह बेची, बीमा के पैसे मिलाए और अपनी पहली कंस्ट्रक्शन कंपनी की नींव रखी। दिनेश भाई की मौत कोई दुखद घटना नहीं थी, वो एक ज़रूरी निवेश था। उस दिन अगर वो वाल्व ढीला न किया जाता, तो आज विरेन इस पैंतालीसवीं मंज़िल पर नहीं बैठा होता।

"बकवास बंद करो। कौन बोल रहा है? अगर कोई प्रेन्क कर रहा है तो बता देता हूँ, अंजाम बहोत बुरा होगा" विरेन ने वर्तमान में लौटकर कॉल काटने के लिए फोन स्क्रीन की तरफ देखा। स्क्रीन बिल्कुल काली थी, लेकिन कॉल चालू था।

"बकवास?" दिनेश भाई की आवाज़ अब और भारी हो गई थी। "जब बॉयलर फटा था न विरेन, तो पिघला हुआ लोहा सबसे पहले मेरी आंखों पर गिरा था। मेरा चश्मा मेरी चमड़ी में धंस गया था। तू बाहर खड़ा तमाशा देख रहा था... बीमा के लाखों रुपयों का तमाशा।"

विरेन का गला सूखने लगा। उसने क्रिस्टल का गिलास उठाया, पर हाथ कांपने की वजह से पानी छलक कर मेज़ पर गिर गया।

तभी फोन में एक और आवाज़ उभरी। बैकग्राउंड से आती हुई किसी औरत की धीमी, मीठी हंसी।

विरेन के हाथ से गिलास छूट गया। फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया। वो हंसी नीरा की थी। उसकी पत्नी।

"सुना तूने?" दिनेश भाई की आवाज़ में अब एक भयानक सुकून था। "हम दोनों साथ ही हैं विरेन। नीरा को सब पता था। उसे उस दिन भी सब पता था जब वो मरी थी।"

कॉल अचानक कट गया। कमरे में एक गहरा सन्नाटा छा गया।

विरेन कुर्सी पर जम गया। नीरा का वो चेहरा उसकी आंखों के सामने घूमने लगा।
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रविवार की वो दोपहर। विरेन घर पहुंचा तो नीरा सिलाई मशीन पर बैठी थी। सुई के ऊपर-नीचे होने की लयबद्ध आवाज़ खुट... खुट... खुट शांत कमरे में गूंज रही थी। विरेन ने अपना कोट उतारकर बिस्तर पर रखा। नीरा ने मशीन का पैडल मारना रोक दिया। सुई एक सूती कपड़े के बीचों-बीच रुकी हुई थी। उसने सिलाई मशीन के पास रखी एक लाल फाइल उठाई और बोली:

"ये कागज़... कल मिले। अलमारी साफ कर रही थी।" नीरा की आवाज़ बहुत शांत थी, लेकिन उसमें रोज़ वाली नरमी या ऊष्मा नहीं थी।

विरेन ने फाइल की तरफ देखा। वो दिनेश भाई की फैक्ट्री के बीमे की कॉपी थी।

"हाँ। पुराने ऑफिस के हैं। रद्दी में डाल देना।" विरेन ने मुड़कर जग से स्टील के गिलास में पानी डाला।

"इसमें दिनेश भाई के हादसे से ठीक छह दिन पहले की तारीख है।" नीरा अपनी जगह से खड़ी हो गई। उसकी नज़रें विरेन की पीठ पर गड़ी थीं। "इतना बड़ा बीमा..!! बापू कहते थे कि उस पूरी खस्ताहाल फैक्ट्री और ज़मीन की कीमत दो लाख भी नहीं थी। और दिनेश भाई... वो तो कर्ज़ या बीमे के नाम से ही चिढ़ते थे। उन्होंने इतने बड़े बीमे के कागज़ पर दस्तखत कैसे कर दिए?"

विरेन ने पानी का घूंट भरा। पानी गले के नीचे उतरने की आवाज़ उस भारी सन्नाटे में साफ सुनाई दी। उसने आधा भरा गिलास वापस मेज़ पर रख दिया। वह पलटा नहीं।

"बीमे के कागज़ पर दिनेश भाई के दस्तखत नहीं हैं विरेन," नीरा ने फाइल का एक पन्ना पलटते हुए कहा। उसकी उंगलियां हल्की-हल्की कांप रही थीं। "इस पर तुम्हारी साइन है। तुमने उनके नाम से बीमा लिया और नॉमिनी खुद को रखा।"

विरेन धीरे से मुड़ा। उसने अपनी पैंट की जेबों में हाथ डाल लिए। "तुम कहना क्या चाहती हो नीरा?"

"पुलिस ने उसे हादसा मान कर फाइल बंद कर दी, क्योंकि तब किसी को शक नहीं था।" नीरा ने फाइल को अपनी छाती के पास कसकर पकड़ लिया। उसकी सांसें तेज़ हो रही थीं, लेकिन उसकी आंखों में विरेन को पहली बार एक अजीब सी ज़िद दिखाई दी। "अगर मैं ये फाइल लेकर पुलिस स्टेशन जाऊं... तो वो केस फिर से खोलेंगे। वो पूछेंगे कि हादसे से ठीक छह दिन पहले इतना बड़ा बीमा कैसे हुआ। और बीमा मिलते ही तुमने वो ज़मीन रातों-रात बिल्डर को कैसे बेच दी।"

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।

विरेन अपनी जगह पर ही स्थिर रहा। उसने नीरा को ऊपर से नीचे तक देखा। कांतिलाल की वो डरी-सहमी, सीधी-सादी बेटी, जो हमेशा नज़रें झुका कर बात करती थी, आज उसके सामने एक लोहे की दीवार बनकर खड़ी थी।

विरेन का दिमाग तेज़ी से दौड़ने लगा। अगले महीने शहर के बीचों-बीच उसका पहला दस मंज़िला कमर्शियल प्रोजेक्ट शुरू होने वाला था। ज़मीन के सौदे हो चुके थे, निवेशकों का पैसा लग चुका था। नीरा की एक पुलिस कंप्लेंट, बीमे की इस फाइल की एक जांच, और वो सलाखों के पीछे होगा। नीरा के स्वभाव से वो बखूबी वाकिफ था। सच को सच और झूठ को झूठ कहने का गुण उसे उसके सिद्धांतवादी बाप से विरासत में मिला था। वो पीछे हटने वाली नहीं थी।

विरेन ने नीरा की बात काटने की कोई कोशिश नहीं की। उसने अपनी सफाई में एक शब्द नहीं कहा। उसकी चुप्पी ही उसका कुबूलनामा था। नीरा की आंखों में तैरता हुआ शक अब पक्के खौफ में बदल गया था। वो फाइल पकड़ कर दो कदम पीछे हट गई।

विरेन ने अपनी जेब के अंदर रखी उंगलियों से अपनी ही जांघ को हल्के से सहलाया। उसका चेहरा बिल्कुल भावहीन था, लेकिन अंदर ही अंदर उसने एक बहुत साफ गणित लगा लिया था। यह लाल फाइल और इसे पकड़े हुए ये कांपते हाथ, दोनों उसके भविष्य की राह में सबसे बड़ा रोड़ा थे। अगर इस साम्राज्य की नींव को बचाना है, तो इस ज़मीन में एक और नींव दबानी होगी।

"मुझे बस एक महीना दे दो नीरा," विरेन ने एक बहुत ही शांत और लाचार स्वर का नाटक करते हुए कहा। "प्रोजेक्ट का काम शुरू हो जाए, तो मैं खुद तुम्हारे साथ पुलिस स्टेशन चलूँगा। अभी किया, तो सारे निवेशक और मज़दूर सड़क पर आ जाएंगे।"

नीरा ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में अभी भी खौफ था, लेकिन विरेन ने उसकी इंसानियत और दयालु स्वभाव पर सही चोट की थी। नीरा ने नज़रें झुका लीं और फाइल को वहीं छोड़कर वापस सिलाई मशीन पर बैठ गई।

एक महीने बाद, विरेन नीरा को अपनी पहली बन रही दस मंज़िला इमारत दिखाने ले गया था। आठवीं मंज़िल पर सिर्फ कंक्रीट के पिलर खड़े थे। लिफ्ट का शाफ्ट अभी खाली था। नीरा उस शाफ्ट के पास खड़ी होकर नीचे देख रही थी। तेज़ हवा चल रही थी। विरेन उसके बिल्कुल पीछे खड़ा था। उसने बस एक हल्का सा धक्का दिया था। नीरा के पैर फिसले। नीचे गिरने की कोई चीख विरेन तक नहीं पहुँची थी। सिर्फ तेज़ हवा की आवाज़ थी और उसके बाद एक भारी सन्नाटा। पुलिस ने इसे महज़ एक हादसा माना। रेलिंग कमज़ोर थी।
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एसी के वेंट से अचानक गर्म हवा का एक तेज़ झोंका आया।

विरेन वर्तमान में लौट आया। कमरे का तापमान तेज़ी से बढ़ रहा था। जली हुई रबर की गंध अब इतनी तेज़ हो गई थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था। उसके साथ चमेली के तेल की खुशबू भी मिल गई थी। नीरा हमेशा नहाने के बाद बालों में चमेली का तेल लगाती थी।

विरेन अपनी जगह से उठा। उसने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाए। स्मार्ट लॉक के पैनल पर लाल बत्ती जल रही थी। उसने अपना अंगूठा बायोमेट्रिक सेंसर पर रखा। मशीन ने बीप की आवाज़ की और स्क्रीन लाल ही रही। उसने ज़ोर से दरवाज़े का हैंडल खींचा। दरवाज़ा अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिला।

"सिक्योरिटी!" विरेन ने आवाज़ दी। लेकिन उसकी आवाज़ सूखे गले में ही अटक गई।

कमरा अब भट्टी की तरह तप रहा था। विरेन ने अपनी टाई खींचकर निकाल दी। शर्ट के बटन खोल दिए। उसके सीने पर पसीना बह रहा था। अचानक, उसके जूतों के नीचे का लकड़ी का फर्श गर्म होने लगा। इतना गर्म कि उसके तलवे जलने लगे।

वह पीछे हटा और कांच की दीवार से जा टकराया। तभी उसके कानों में फिर वही फटी हुई हंसी गूंजी। आवाज़ फोन से नहीं, कमरे की दीवारों से आ रही थी।

"गर्म लग रहा है विरेन?" दिनेश भाई की आवाज़ हवा में तैर रही थी।

विरेन ने हांफते हुए चारों तरफ देखा। कोई नहीं था।

अचानक, उसके चेहरे की दाईं तरफ की चमड़ी ज़ोर से जलने लगी। जैसे किसी ने खौलता हुआ पानी फेंक दिया हो। विरेन दर्द से चीख पड़ा। उसने अपना हाथ चेहरे पर रखा। वहां कोई आग नहीं थी, लेकिन दर्द बिल्कुल असली था। उसके गाल की चमड़ी सिकुड़ रही थी, बिल्कुल वैसे ही जैसे पिघला हुआ लोहा गिरने पर दिनेश भाई की सिकुड़ी होगी।

विरेन घुटनों के बल फर्श पर गिर पड़ा। दर्द से उसकी आंखें बाहर की तरफ निकल आई थीं। वह सांस लेने के लिए तड़प रहा था, लेकिन हवा में सिर्फ राख और जली हुई रबर का गाढ़ा धुआं था।

कमरे में अब ऑक्सीजन का एक कण भी नहीं बचा था। खौलते तेल और धुएं ने उसके फेफड़ों को पूरी तरह भर दिया था। उसका गला अंदर से छिल रहा था। उसने अपने दोनों हाथों से अपने कॉलर को पकड़कर फाड़ दिया। वह ज़ोर से खांसना चाहता था, लेकिन फेफड़ों में हवा ही नहीं थी कि खांसी बाहर आ सके।

दम घुटने से उसकी आंखों के आगे लाल और काले धब्बे नाचने लगे। ऑफिस के स्मार्ट दरवाज़े पूरी तरह लॉक थे, वेंटिलेशन पूरी तरह रुक चुका था। विरेन की छाती फट रही थी। उसे लगा कि अगर अगले ही सेकंड उसने खुली हवा में सांस नहीं ली, तो उसकी नसें फट जाएंगी। वह इसी खौलते धुएं में घुटकर दम तोड़ देगा... बिल्कुल दिनेश भाई की तरह।

उसकी धुंधलाती नज़रों ने सामने कांच की विशाल दीवार को देखा। उस कांच के पार शहर था। रात थी। और सबसे ज़रूरी, ठंडी, ताज़ा हवा थी।

ज़िंदा रहने की एक आखिरी, खौफनाक छटपटाहट में विरेन अपने पैरों पर खड़ा हुआ। उसके नथुने हवा के लिए फड़क रहे थे। उसने अपनी पूरी ताक़त बटोरी, सिर नीचे किया और कांच की दीवार की तरफ एक अंधी दौड़ लगा दी। उसे कुछ और दिखाई नहीं दे रहा था, कोई होश नहीं था। वह बस उस कांच को तोड़कर हवा तक पहुँचना चाहता था।

वह बिना रुके, अपनी पूरी रफ़्तार और शरीर के पूरे वज़न के साथ उस मोटे कांच से जा टकराया।

कड़ाक... छन्न!

एक भयानक धमाके के साथ पैंतालीसवीं मंज़िल का वह मज़बूत कांच टुकड़े-टुकड़े हो गया। ठंडी हवा का एक तेज़ रेला अंदर घुसा, लेकिन विरेन उस हवा को अपने फेफड़ों में भर पाता, उससे पहले ही उसके पैर ज़मीन से उखड़ चुके थे।

मोमेंटम इतना तेज़ था कि वह सीधा बाहर निकल गया। गुरुत्वाकर्षण ने तुरंत उसे अपने कब्ज़े में ले लिया। कांच के अनगिनत टुकड़ों के साथ विरेन का शरीर अंधेरे में नीचे की तरफ गिरने लगा।

हवा उसके कानों के पास भयानक आवाज़ करती हुई चीख रही थी। उसके पेट में एक खौफनाक, सुन्न कर देने वाला खालीपन छा गया। आठवीं मंज़िल का वह खाली शाफ्ट... नीरा के हाथ-पैर मारने की वह मूक छटपटाहट... नीचे गिरने का वह मौत से भी भयानक इंतज़ार। विरेन अब उस दर्द को खुद अपने शरीर पर झेल रहा था।

नीचे सड़क की पीली बत्तियां और डामर का फर्श तेज़ रफ़्तार से उसके चेहरे की तरफ आ रहे थे। बॉयलर रूम में दिनेश भाई की वो घुटन और निर्माणाधीन इमारत से नीरा की वो खौफनाक उड़ान... कर्म ने अपना पूरा हिसाब एक ही पल में बराबर कर दिया था।

नीचे सड़क पर एक भारी, खोखला धमाका हुआ। और उसके बाद सिर्फ एक गहरा सन्नाटा छा गया।

पैंतालीसवीं मंज़िल के उस टूटे हुए कांच के फ्रेम से अब सिर्फ रात की ठंडी हवा ऑफिस के अंदर आ रही थी। धुएं और रबर की गंध अब पूरी तरह गायब हो चुकी थी। हवा के झोंके से मेज़ पर रखा पांच सौ करोड़ का वो ड्राफ्ट उड़कर फर्श पर गिर गया था। सब कुछ शांत था। सिर्फ टूटे हुए कांच के एक बचे हुए नुकीले टुकड़े पर नीरा के बालों का एक लंबा, काला धागा चिपका हुआ था जो हवा में हल्का-हल्का हिल रहा था।

लाशों की नींव पर टिके कांच के महल इंसान को सिर्फ ऊँचाई का भ्रम दे सकते हैं, अमर नहीं बना सकते।
उड़ान चाहे कितनी भी मगरूर क्यों न हो, जब ज़मीन बुलाती है, तब आसमान भी मुँह फेर लेता है।

समाप्त

 
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vakharia

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पंप तेरी ऐसी की तैसी

Pump-teri-aisi-ki-taisi


क्लिक-क्लिक-क्लिक।

सुषमा ने गैस लाइटर को पूरी ताकत से स्लैब पर पटका। बर्नर से एक आखिरी पीली-नीली लौ फुर्रर्र करके उठी और हमेशा के लिए शांत हो गई।

"सुनो!" सुषमा की आवाज़ में वो खौफ था जो अमूमन मिसाइल सायरन बजने पर होना चाहिए था।

रमेश ड्राइंग रूम में सोफे पर ऐसे धंसा था जैसे किसी ने उसे वहां फेविकोल से चिपका दिया हो। उसकी उंगलियां फोन की स्क्रीन पर किसी मशीन गन की तरह चल रही थीं। "एक मिनट सुषमा। शर्मा जी का मैसेज आया है... 'दोनों देशों ने एक दूसरे पर अनगिनत मिसाइलें छोड़ दी हैं। ग्लोबल सप्लाई चेन क्रैश हो गया है। कल से प्याज ३०० रुपये किलो।' सुषमा, तुरंत बोरी भर प्याज मंगवा लो!"

"यहाँ गैस सिलेंडर ने अपने प्राण त्याग दिए हैं और तुम्हें प्याज की पड़ी है? मेरी चाय कैसे बनेगी?"

"अरे तो इंडक्शन पर रख दो ना," रमेश ने बिना फोन से नज़रें हटाए कहा।

"और बिजली का क्या? तुम्हारा वो अमरीका वाला फूफा देगा बिजली? सुबह आठ बजे से पावर कट है!"

तभी बालकनी से पड़ोसन मिसेज चड्ढा की आवाज़ आई, जिसमें मिठास कम और तेज़ाब ज्यादा था।

"सुषमा भाभी! अरे लगता है आपकी गैस चली गई? हाय राम, कितनी मुसीबत है। मैंने तो परसों ही नया सिलेंडर लगवाया है। नीली-नीली आंच ऐसी उठ रही है ना, क्या बताऊँ, सीटी भी एक मिनट में बज गई।"

सुषमा ने दांत पीसते हुए एक झूठी मुस्कान फेंकी। "बहुत बढ़िया भाभी जी, नींबू मिर्ची बांध देना कहीं किसी की नज़र ना लगे आपके सिलेंडर को, भगवान करे वो सौ साल चले।" गुस्से से भांप निकालते हुए अंदर आकर उसने पुराने अखबारों और बिजली के बिलों की रद्दी इकट्ठी करनी शुरू कर दी।

अचानक रमेश सोफे से ऐसे उछला जैसे उसके नीचे सचमुच का ड्रोन फट गया हो।

"सुषमा! ;फॉरवर्डेड मेनी टाइम्स' वाला मैसेज है ये! स्ट्रेट ऑफ होरमुज से जहाज निकलना बंद हो गए है। आज शाम पांच बजे से पूरे शहर के पेट्रोल पंप बंद! एक बूंद तेल नहीं मिलेगा!"

बिना पैंट बदले, पजामे के ऊपर ही शर्ट डालते हुए रमेश हवाई चप्पल चटकाते हुए बाहर भागा।

दो किलोमीटर दूर अग्नि पेट्रोलियम पंप पर ऐसा नज़ारा था जैसे वहां पेट्रोल -डीजल के बदले समुद्र मंथन से निकला हुआ अमृत बंट रहा हो। रमेश ने अपनी स्प्लेंडर को किसी तरह दो एक्टिवा और एक ऑटो के बीच में घुसाया। उसके ठीक आगे सोसाइटी के सेक्रेटरी, वर्मा जी खड़े थे। वर्मा जी ने अपनी टीवीएस जूपिटर की पिछली सीट पर 500-लीटर की पीली सिंटेक्स की पानी की टंकी नायलॉन की रस्सी से बाँध रखी थी। उनका पूरा चेहरा पसीने से लथपथ था और रस्सी का एक सिरा उन्होंने दांतों से दबा रखा था।

"अरे वर्मा जी, ये छत वाली टंकी यहाँ?" रमेश ने चिल्लाकर पूछा।

"थर्ड वर्ल्ड वॉर है रमेश भाई! ये गाड़ी छोड़ दो इधर ही। अगले महीने स्कूटर में गंगाजल डाल कर चलाना पड़ेगा!" वर्मा जी हांफते हुए बोले।

उनके बगल में एक आदमी बच्चों की मिल्टन वाली पानी की बोतल और 5-किलो वाली नीलंस आम का अचार की पुरानी प्लास्टिक की बरनी पकड़े खड़ा था। पंप वाला लड़का चीख रहा था, "भैया इसमें तेल नहीं डालूंगा! अंदर अचार का मसाला चिपका है, इंजन में रायता बन जाएगा!"

"तू डाल दे भाई! मेरी बाइक अचार से चलेगी पर चलेगी तो सही!" आदमी ने बरनी पंप वाले के मुंह पर अड़ा दी।

डेढ़ घंटे की धक्का-मुक्की के बाद रमेश घर लौटा। उसके बाल बिखरे थे, शर्ट का एक बटन गायब था, और हाथ में 2-लीटर लिम्का की बोतल थी जिसमें बमुश्किल आधा लीटर पेट्रोल था।

वह रसोई में घुसा। वहां धुआं ही धुआं था। सुषमा दो ईंटों के बीच पुराने बिल जलाकर एक छोटे बर्तन में चाय का पानी उबालने की जद्दोजहद कर रही थी।

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। मिसेज चड्ढा हाथ में एक स्टील का डब्बा पकड़े खड़ी थीं। "भाभी जी, वो मेरी गैस इतनी स्पीड से चल रही थी कि मैंने सोचा गाजर का हलवा ही बना लूँ। आप लोग हलवा खाइये।"

सुषमा का हाथ कांपने लगा। उसने हलवे का डब्बा पकड़ा। पीछे से रद्दी के ढेर ने अचानक तेज़ आग पकड़ी, और बर्तन का अदरक-इलायची वाला पानी उबलकर उस आखिरी आग को बुझाते हुए पूरे फर्श पर फैल गया। छ्छन्नन्नन्न। धुआं दुगना हो गया।

सुषमा का सब्र टूट गया। उसने धुएं से भरी रसोई, रमेश के हाथ में लिम्का की बोतल वाले पेट्रोल, और मिसेज चड्ढा के हलवे को देखा।

"पूरी दुनिया में आग लगा रखी है उस पीले बाल वाले ने, पर उसकी आग मेरी रसोई तक क्यों नहीं पहुँचती?!" सुषमा हवा में बेलन घुमाते हुए चिल्लाई। "कैसा आदमी है ये पंप! वहां अपनी कुर्सी पर बैठकर इससे दुनिया तो हिली नहीं, पर मेरी अदरक वाली चाय पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी उस नारंगी ताऊ ने!! अगर हाथ में आ जाएँ तो उस नाशपीटे पंप की सारी हवा निकाल दूँ!" थोड़ा बहोत अखबार तो सुषमा भी पढ़ लेती थी

"तुम... तुम इंटरनेशनल जिओ-पॉलिटिक्स नहीं समझतीं सुषमा," रमेश ने अपनी स्प्लेंडर की चाबी पैंट की जेब में ठूंसते हुए कहा।

"तुम इस पेट्रोल का क्या करने वाले हो?" सुषमा ने बात काटते हुए पूछा।

रमेश ने बोतल को ऐसे देखा जैसे कोई नवजात शिशु हो। "अरे, ये इमरजेंसी रिज़र्व है! कल को अगर हमें शहर छोड़ कर भागना पड़ा..."

"कहाँ भागोगे तुम अपनी स्प्लेंडर पर आधा लीटर पेट्रोल लेकर? बड़े चौराहे वाले रिलायंस फ्रेश तक? वहां वैसे भी जाम लगा है क्योंकि लोगों को लग रहा है कि परमाणु बम गिरने से पहले कहीं मैगी का स्टॉक खत्म न हो जाये!" सुषमा ने हलवे का डब्बा सिंक में धकेल दिया।

शाम होते-होते शांति विहार हाउसिंग सोसाइटी का व्हाट्सएप ग्रुप 'शांति विहार- ए टू जेड' कुरुक्षेत्र बन चुका था।

वर्मा जी (सेक्रेटरी): [Forwarded] भाइयो, सूत्रों से पता चला है कि ईरान के पास ऐसा लेज़र वेपन है जो सीधे हमारी सोसाइटी के ट्रांसफार्मर को उड़ा सकता है। आज रात सब लोग अपनी बालकनी के गमले अंदर रख लें।

शर्मा जी (फ्लैट 402): वर्मा जी, आप गमले छोड़िये। पेट्रोल पंप पर आप अपनी सिंटेक्स की टंकी के साथ गिरे थे, उसका वीडियो किसी ने लोकल न्यूज़ वाले पेज पर डाल दिया है। अब तो वायरल हो चुका है.. आप तो फेमस हो गए..!!

तभी बाहर से एक कान फोड़ देने वाला धमाका हुआ। बूम!

पूरी बिल्डिंग हिल गई। रमेश ड्राइंग रूम से गिरता-पड़ता बालकनी में आया। "क्या हुआ? लगता है मिसाइल गिर गई..!!"

रमेश ने नीचे झांका। "अरे... मिसाइल नहीं है! वो वर्मा जी सिंटेक्स वाली टंकी थी में जो पेट्रोल भरकर ला रहे थे.. टंकी ऊपर लाते वक्त सीढ़ियों से नीचे गिर गई.. टंकी नीचे गिर कर फट गई है!"

रमेश ऊपर से देखते हुए, किचन में सिर पकड़कर बैठी सुषमा को आँखों देखा हाल सुना रहा था तब नीचे से वर्मा जी की रोने की आवाज़ आई। "मेरा रिटायरमेंट फण्ड! मेरा लिक्विड गोल्ड! सब बह गया! मैं तो बर्बाद हो गया..!!"

पूरा पक्का कंपाउंड पेट्रोल की रिफाइनरी बन चुका था। तभी फ्लैट 102 से गुप्ता जी नहाने वाला मग्गा और बाल्टी लेकर बाहर निकले।

"अरे वर्मा जी, रोने का टाइम नहीं है! नाली में बहने से पहले इसे समेटो!"

फिर शांति विहार में एक अलग ही रेस्क्यू ऑपरेशन चला। पेट्रोल उड़ न जाए, इसके लिए वर्मा जी, गुप्ता जी और शर्मा जी ने रात के तीन बजे तक जागकर सारा पेट्रोल बाल्टियों, टबों और पुरानी टंकियों में भरा। फिर पेट्रोल को वाष्पीकरण से बचाने के लिए उन सब पर एक भारी नीली रंग की प्लास्टिक की तिरपाल बांध दी गई। तिरपाल के चारों कोनों पर ईंटें रख दी गईं। कंपाउंड के बीचों-बीच तिरपाल से ढंका हुआ पेट्रोल का एक ज्वलनशील पहाड़ बन चुका था, जिसकी रखवाली चौकीदार बहादुर एक हाथ में डंडा और दूसरे में एक्सपायर हो चुका फायर एक्सटिंग्विशर लेकर कर रहा था।

बिजली अभी भी नहीं थी। पेट्रोल की गंध के कारण किसी भी घर में मोमबत्ती या मच्छर भगाने वाली कॉइल जलाने की सख्त मनाही थी।

सुबह के साढ़े छह बजे। सुषमा की आँखें सूजी हुई थीं। उसने फैसला कर लिया था कि आज वो चाय बनाकर ही मानेगी। वो रसोई की तरफ बढ़ी ही थी कि बाहर से एक अजीब सी यांत्रिक आवाज़ आई। बीप... बीप... श्शूऊऊ।

सामने वाली बालकनी में मिसेज चड्ढा खड़ी थीं। उनके सामने एक चमचमाती हुई, बैटरी से चलने वाली 'कॉर्डलेस पोर्टेबल एस्प्रेसो और टी मेकर मशीन' रखी थी। मशीन में से चाय उबलने की एक शानदार, सोंधी सी महक उठ रही थी। मिसेज चड्ढा ने एक कप में चाय छानी, और सुषमा को देखते ही एक बेहद ज़हरीली, मीठी मुस्कान दी।

"गुड मॉर्निंग सुषमा भाभी! मेरे चिंटू ने अमरीका से ये बैटरी वाली केतली भेजी थी। मैंने सोचा आज आराम से बैठकर अपनी ग्रीन टी पी लूँ। कहो तो आप के लिए एक कप भिजवा दूँ?"

सुषमा के हाथ में पकड़ा हुआ खाली चाय का पैन कांपने लगा। उसकी आँखों के सामने कल का गिरा हुआ अदरक का पानी और अब ये बैटरी वाली केतली घूम गई।

सुषमा के दिमाग का फ्यूज़ उड़ गया। उसकी दाईं आँख तेज़ी से फड़कने लगी। उसकी माथे की बिंदी खिसक कर भौंहों के पास आ गई थी और बाल किसी उजड़े हुए घोंसले की तरह लग रहे थे।

वो धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई रसोई के काउंटर तक गई। एक हाथ में चाय का खाली पैन था और दूसरे हाथ से उसने वो गैस लाइटर उठा लिया जो कल रात से धोखा दे रहा था।

"सुषमा... तुम ये लाइटर लेकर कहाँ जा रही हो?" रमेश का तौलिया हाथ से छूट कर ज़मीन पर गिर पड़ा।

"नीचे," सुषमा ने बिना पलक झपकाए, एकदम रोबोटिक अंदाज़ में कहा। "कंपाउंड में। वो जो रात भर बाल्टियों में भर-भर कर नीली तिरपाल के नीचे पेट्रोल दबा के रखा है ना इन लोगों ने? उसी फ्री के ईंधन पर अब मेरी वाघ बकरी चाय बनेगी।"

"पागल हो गई हो क्या?! पूरा शांति विहार उड़ जाएगा! शर्मा जी, वर्मा जी, सब भस्म हो जाएंगे!" रमेश चीखा

"उड़ने दो!" सुषमा ने लाइटर को हवा में ऐसे उठाया जैसे वो स्टैच्यू ऑफ़ लिबर्टी की मशाल हो। "सब उड़ेंगे आज! मैं उसी तिरपाल वाली आग पर चाय उबालूंगी, और अगर शर्मा जी को एतराज़ हुआ तो उन्हें भी उसी में पकोड़े की तरह तल दूंगी!"

वो बालकनी की तरफ भागी। सुषमा पूरी तरह से अपना मानसिक संतुलन खो चुकी थी। उसने बालकनी की ग्रिल पकड़ी और हवा में लाइटर से क्लिक-क्लिक-क्लिक की आवाज़ करते हुए एक अजीब सा तांडव शुरू कर दिया। वो गरबा और भरतनाट्यम के मिक्स स्टेप्स कर रही थी और हर स्टेप के साथ लाइटर 'क्लिक' करती।

धिन-ताक-क्लिक! धिन-ताक-क्लिक!

उसने आसमान की तरफ देखा और चीखना शुरू किया, "सुन बे अमरीका के सरपंच! पीले बालों वाले छछूंदर! मैं श्राप देती हूँ तुझे.. तेरी घर की छत टपके और तेरी रज़ाई भीग जाए! वहाँ बैठकर तूने जो खेल खेला है, उसकी वजह से आज ये चड्ढा मुझे बैटरी वाली केतली दिखाकर ताने मार रही है!"

सुषमा का तांडव तेज़ हो गया। क्लिक-क्लिक-क्लिक!

"तेरा वो जो मिसाइल उड़ाने वाला लाल बटन है ना, भगवान करे उसके सेल लीक हो जाएं! और जब तू उसे दबाने जाए तो तेरे टीवी पर अनुपमा सीरियल शुरू हो जाए! तू अगले जनम में मेरे घर की कामवाली बाई बने, और रोज़ सुबह तुझे इसी मिसेज चड्ढा के घर के जूठे बर्तन मांजने पड़ें! सत्यानाश हो तेरी फॉरेन पालिसी का, तेरे चक्कर में मेरी अदरक सूख कर छुआरा बन गई!!"

पड़ोस की बालकनी में खड़ी मिसेज चड्ढा ने सुषमा का यह रौद्र रूप और उसका वो लाइटर-गरबा देखा तो अपनी बैटरी वाली केतली को डर के मारे छाती से लगा लिया और उल्टे पाँव अंदर भागकर दरवाज़ा लॉक कर लिया। नीचे तिरपाल के पास खड़ा बहादुर डंडा छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

रमेश समझ गया कि अब कोई इंटरनेशनल ट्रीटी इस महायुद्ध को नहीं रोक सकती। जो तबाही मिडिल ईस्ट में होनी थी, वो अब उनके मिडल क्लास सोसायटी में होने वाली थी और ट्रिगर उसकी पत्नी के हाथ में था।

उसने चुपचाप अपना फोन सोफे पर फेंका, दोनों हाथों से अपना सिर कस कर पकड़ा, और वहीँ ज़मीन पर धम्म से बैठ गया। बाहर बालकनी से सुषमा अभी भी गोल-गोल घूमते हुए लाइटर से क्लिक-क्लिक-क्लिक कर रही थी और पंप को अपनी नाली साफ़ करने का श्राप दे रही थी, और रमेश सिर झुकाए बस यही सोच रहा था कि दुनिया का जो होना हो सो हो.. पर बिना चाय की एक हिंदुस्तानी बीवी के इस लाइटर-तांडव से तो आज साक्षात राष्ट्रपति भी नहीं बच सकता।

समाप्त
 
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मेरा ब्रह्मांड

इस कहानी की प्रेरणा स्टीवन बक्सटर लिखित लास्ट कांटेक्ट से ली गयी है।



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शाम का समय।

ISRO के UR Rao Satellite Centre, बेंगलुरु के कंट्रोल रूम में रोशनी कम थी। सिर्फ़ मॉनिटरों की नीली चमक डॉ. विक्रम सिंह के चेहरे पर पड़ रही थी। चालीस साल का विक्रम अपनी दाढ़ी पर हाथ घूमते हुए स्क्रीन देखे जा रहा था।

उसके सामने तीन स्क्रीन थे। AstroSat-2 और LIGO-India के रियल-टाइम डेटा।

अचानक एक ग्राफ़ में तेज़ स्पाइक आया। फिर दूसरा। फिर तीसरा।
विक्रम की उँगलियाँ कीबोर्ड पर रुक गईं।

“ये क्या है…” उसने फुसफुसाकर कहा।

पीछे से जूनियर साइंटिस्ट रिया शर्मा ने पूछा, “सर, क्या हुआ?”

“ग्रेविटेशनल वेव में anomaly। इतना स्ट्रॉन्ग… इतना क्लीन।” विक्रम ने ज़ूम किया। “क्विक, क्रॉस-चेक AstroSat के X-ray और gamma ray डेटा से।”

अगले ७० मिनट तक कमरे में सिर्फ़ कीबोर्ड की आवाज़ थी।

फिर रिया ने धीरे से कहा, “सर… ये cosmic string web लग रहा है।”

विक्रम का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। यह तो सिर्फ एक theory थी। ऐसे कैसे हो सकता था।
उसने तीन बार सिमुलेशन रन किया। हर बार एक ही जवाब।

एक विशाल, चमकदार जाल। प्राचीन ब्रह्मांड के समय के स्पेस-टाइम के घने ऊर्जा के तार। प्रकाश की गति से बढ़ते हुए। और अब सौर मंडल की ओर मुड़ चुका था।

“टाइम टू इम्पैक्ट?” विक्रम ने पूछा, आवाज़ में कंपकंपी।

रिया ने गला साफ़ किया। “सर… तीन घंटे। बस। डिटेक्शन बहुत लेट हुई।”

विक्रम ने घड़ी देखी। रात 11:07।
यानी पृथ्वी पर प्रभाव लगभग 2:07 AM पर।

बॉस का फोन आया।

“विक्रम, तुम्हें पता है क्या हो रहा है?”

“जी सर।”

“सभी डेटा को अंत तक रिकॉर्ड करो। कोई लीक नहीं होना चाहिए। तुम यहीं रहो।”

“सर…” विक्रम ने एक पल रुककर कहा, “ठीक है सर ।” लेकिन विक्रम के विचार अपने काम अपने जिम्मेदारी सबसे परे होने लगे थे। उसे पता था के यह आखरी दिन है।

विक्रम ने अपना लैपटॉप बंद किया, बैग उठाया और बिना किसी को कुछ बताए बाहर निकल गया।

एयरपोर्ट पर आखिरी फ्लाइट पुणे की थी। वह किसी तरह सीट पा गया। विमान उड़ान भरते ही उसने फोन निकाला और एक मैसेज टाइप किया:

“मीरा, मैं रात को घर आ रहा हूँ। सबको जगाकर रखना। सरप्राइज है।”

फिर उसने कैलकुलेशन शुरू किया। स्ट्रिंग्स की स्पीड, प्रभाव का exact timing, पृथ्वी पर कितने मिनट में पूरा वेब आ जाएगा।

फ्लाइट लैंड हुई। टैक्सी ली। रात के सवा एक बजे वह पुणे के अपने फ्लैट के नीचे उतरा।

दरवाज़ा खुला तो मीरा खड़ी थी। उसकी आँखों में हैरानी और खुशी का मिश्रण था।

“विक्रम? इतनी रात को? सब ठीक तो है न?”

विक्रम मुस्कुराया। शांत, बहुत शांत। “हाँ। बस तुम लोगों को देखना था।”

आर्या और काव्या सोए नहीं थे। दोनों ड्रॉइंग रूम में दौड़कर आए।

“पापा!” आर्या ने चीख़कर उसकी गोद में छलांग लगा दी। “आप आए! आप आए!”

काव्या ने छोटे-छोटे हाथों से पापा की टाँग पकड़ ली। “पापा… रॉकेट लाए हो?”

विक्रम ने दोनों को कसकर गले लगा लिया। उनकी खुशबू में उसे लगा जैसे पूरा ब्रह्मांड सिमट आया हो।

“हाँ बेटा, आज पापा पूरा समय तुम लोगों के साथ बिताएगा।”

मीरा चाय बना रही थी। वह बार-बार विक्रम की तरफ़ देख रही थी। कुछ तो गड़बड़ था। विक्रम की आँखों में एक अजीब सा सुकून था, लेकिन होंठ थोड़े काँप रहे थे। फिर भी वह कुछ नहीं बोली।

उधर टीवी पर अलग अलग न्यूज़ आने लगी , सइंटिनटस ने नयी खोज की है। कुछ नयी चीज़ ब्रम्हांड में पायी गयी है।

मीरा चाय लेकर आयी और सवाल भरी नज़रों से विक्रम की ओर देखा। विक्रम ने पालखे झपकके सब ठीक है का इशारा किया।

“बैठो,” विक्रम ने कहा। “आज हम सब साथ बैठेंगे।”

चारों सोफ़े पर बैठ गए। काव्या पापा की गोद में चढ़ गयी। आर्या बगल में सटकर बैठ गई।

“पापा,” आर्या ने पूछा, “आप इतनी रात को क्यों आए? स्कूल में तो कल टेस्ट है।”

विक्रम ने उसकी लंबी चोटी पर हाथ फेरा। “क्योंकि आज बहुत ज़रूरी दिन है। तुम्हें पता है ब्रह्मांड क्या होता है?”

आर्या की आँखें चमक उठीं। “हाँ! बहुत बड़ा। सूरज, चाँद, तारे, ग्रह… सब।”

“सही।” विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा। “लेकिन ब्रह्मांड सिर्फ़ बाहर नहीं होता। अंदर भी होता है।”

काव्या ने छोटी उँगली से पापा की नाक छूते हुए पूछा, “अंदर? पेट में?”

सब हँस पड़े।

“नहीं बेटा,” विक्रम ने काव्या को ऊपर उठाकर अपनी छाती पर बैठा लिया। “दिल में। जिसे हम प्यार करते हैं, वही हमारा सबसे बड़ा ब्रह्मांड है।”

आर्या ने गंभीर होकर पूछा, “पापा, आप तो साइंटिस्ट हो। आपने ब्रह्मांड देखा है?”

“हाँ देखा है। दूरबीन से, गणित से, डेटा से। लेकिन आज मुझे लगा कि असली ब्रह्मांड तो यहीं है। तुम तीनों के बीच।”

मीरा चुपचाप सुन रही थी। उसकी आँखें नम हो गई थीं। वह समझ गई थी कि कुछ बहुत बड़ा हो रहा है। लेकिन विक्रम के चेहरे पर जो शांति थी, उसने उसे रोक लिया। उसने सिर्फ़ विक्रम का हाथ थाम लिया और हल्के से दबाया।

विक्रम ने बात जारी रखी।

“देखो आर्या, ब्रह्मांड की शुरुआत कैसे हुई थी?”

“बिग बैंग!” आर्या ने तुरंत जवाब दिया। स्कूल में पढ़ा था।

“बिल्कुल। बहुत बहुत पहले, सब कुछ एक छोटे से बिंदु में था। फिर फट पड़ा। और समय, जगह, तारे, सब बन गए। लेकिन उस बिंदु में भी कुछ था न?”

“क्या?”

“संभावना। प्यार की, जीवन की, तुम जैसी छोटी-छोटी लड़कियों और लड़कों की।”

काव्या ने पूछा, “पापा, तारे क्यों चमकते हैं?”

“क्योंकि वे जल रहे हैं बेटा। हाइड्रोजन को हिलियम में बदल रहे हैं। लाखों साल तक जलते रहते हैं। लेकिन कभी-कभी वे भी थक जाते हैं।”

आर्या ने पूछा, “और अगर तारे थक जाएँ तो क्या होगा?”

विक्रम एक पल रुका। बाहर खिड़की से आकाश दिख रहा था। अभी सब सामान्य था।

“तो नया कुछ बनता है। कभी ब्लैक होल, कभी नई धूल से नई सूरज। ब्रह्मांड कभी खत्म नहीं होता। वो बस बदलता रहता है।”

“लेकिन पापा,” आर्या ने सिर टेढ़ा करके कहा, “अगर सब कुछ खत्म हो जाए तो?”

विक्रम ने बेटी की आँखों में देखा। “तो भी कुछ बचा रहता है। यादें। प्यार। वो छोटा सा जाल जो हमने अपने दिलों से बुन रखा है।”

काव्या ने ऊँघते हुए कहा, “पापा, मुझे नींद आ रही है।”

“नहीं सोना अभी,” विक्रम ने हँसकर कहा। “आज हम सब छत पर चलते हैं। तारों को देखेंगे।”

मीरा ने धीरे से पूछा, “विक्रम… सब ठीक तो है न?”

विक्रम ने उसकी आँखों में देखा। “हाँ मीरा। अब सब कुछ ठीक है।”

चारों छत पर चले गए। रात ठंडी थी। पुणे की हवा में हल्की नमी थी।

विक्रम ने काव्या को गोद में लिया। आर्या उसके बाएँ तरफ़ खड़ी हो गई। मीरा दाईं तरफ़।

आकाश साफ़ था। लेकिन बहुत दूर, उत्तर-पूर्व में, तारे थोड़े हिलते से लग रहे थे। जैसे कोई अदृश्य हाथ उन्हें हिला रहा हो।

आर्या ने पूछा, “पापा, वो तारे क्यों हिल रहे हैं?”

विक्रम ने शांत स्वर में कहा, “क्योंकि ब्रह्मांड आज थोड़ा खेल रहा है बेटा।”

काव्या ने नींद भरी आवाज़ में पूछा, “पापा, अब कल ऑफिस नहीं जाएंगे ना?”

विक्रम की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने मुस्कुराकर कहा, “अब हमेशा यही रहूँगा।”

आर्या ने पूछा, “पापा, हम तारे क्यों देख रहे है?”

विक्रम ने गहरी साँस ली। उसने मीरा की तरफ देखा और कहा “में देख रहा हु, मेने कितनी देर करदी असली तारों को जानने में, उनके साथ वक़्त बिताने में।”

मीरा ने विक्रम का हाथ और ज़ोर से पकड़ा। वह बस शांत थी। उसने समझ लिया था। लेकिन विक्रम की शांति देखकर वह भी शांत हो गई।

समय तेज़ी से बीत रहा था।

विक्रम ने घड़ी देखी। 2:04 AM।

उसने परिवार को और कसकर अपने पास खींच लिया।

“आर्या, काव्या … सुनो।”

दोनों ने ऊपर देखा।

“पापा का ब्रह्मांड कहा है पता है। तुम दोनों और तुम्हारी मम्मी… तुम तीनों ही मेरा पूरा ब्रह्मांड हो। सारे तारे, सारे ग्रह, सारी गैलेक्सी… सब तुममें समा गए हैं।”

आर्या ने मुस्कुराकर कहा, “और आप हमारा ब्रह्मांड हो पापा।”

काव्या ने छोटे हाथ से पापा के गाल पकड़ लिए। “पापा… लव यू।”

विक्रम की आवाज़ भर गई। “लव यू टू बेटा। बहुत बहुत ज़्यादा।”

आकाश में अब बदलाव साफ़ दिखने लगा था। तारे हिल रहे थे। दूर कहीं एक हल्की-सी चमक फैल रही थी, जैसे कोई अदृश्य जाल धीरे-धीरे पृथ्वी की ओर खिंच रहा हो।

मीरा ने बहुत धीरे से कहा, “विक्रम…”

विक्रम ने उसकी तरफ़ मुड़कर मुस्कुराया। “लव यू मीरा। बस साथ बैठो।”

उसने दोनों बच्चों को अपनी गोद में जितना हो सके उतना कस लिया। मीरा ने भी उन्हें घेर लिया। चारों एक-दूसरे से चिपके हुए थे।

विक्रम ने आखिरी बार फुसफुसाया,

“तुम तीनों… मेरी यूनिवर्स हो।
मेरा पूरा ब्रह्मांड।
मेरा प्रलय और मेरा सृजन… सब तुम हो।”

आकाश में अब रोशनी तेज़ हो गई। समय जैसे धीमा पड़ने लगा। हवा में एक अजीब सी कंपन थी।

मीरा और बच्चे हैरान होकर आसमान की ओर देख रहे थे।

आर्या ने आँखें बंद कर लीं। “पापा… डर लग रहा।”

“नहीं लगना चाहिए बेटी। हम साथ हैं।”

काव्या पहले ही पापा की छाती पर सो चुकी थी।

मीरा ने विक्रम के कंधे पर सिर रख दिया। विक्रम ने मीरा से कहा “मीरा थैंक्स, जिंदगी भर तुमने समझदारी से मुझे साथ दिया। …आज भी तुम मुझे समझ रही हो।”

मीरा ने कहा “विक्रम, मुझे ख़ुशी है के तुम इस वक़्त साथ हो”

“हम साथ हैं,” उसने बहुत धीरे से कहा।

विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।
उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी।

“हाँ… हम साथ हैं।”

आकाश फटने लगा।
तारे ग़ायब होने लगे।
स्पेस-टाइम का जाल पृथ्वी को लपेटने लगा।

लेकिन उस छोटे से घर की छत पर, चार दिल एक-दूसरे में समाए हुए थे।

ब्रह्मांड खत्म हो रहा था। लेकिन प्रेम का छोटा सा जाल… वो पहले ही पूरा हो चुका था।

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