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Nice update#184.
पंचमुख महानदेव: (17.01.2002, गुरुवार, रुद्रलोक, हिमालय)
हनुका के रक्त भैरवी की डिबिया ले जाने के बाद, नीलाभ फिर से शि…वलिंग के सामने बने असंख्य त्रिशूलों पर जाकर आसन की मुद्रा में बैठ गया। कुछ देर तक उसने माया के बारे में सोचा और फिर अपनी साधना में लीन हो गया।
नीलाभ को पता था कि उसकी साधना का यह अंतिम चरण है, इसके बाद देव को उन्हें वरदान देने आना ही होगा।
कुछ घंटों के बाद नीलाभ ने अपने मंत्रोच्चारण की आखिरी आहुति को, देव को समर्पित कर दिया। अब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलकर, अपने चारो ओर देखा और फिर खड़े होकर उन त्रिशूलों के ऊपर ही तांडव करना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में नीलाभ के पैरों से निकलता खून, त्रिशूल के मध्य से होकर शिवमलिंग की ओर बढ़ा, पर इससे पहले कि अंजाने में वह खून शिवमलिंग तक पहुंचता, वातावरण में तेज डमरु की आवाज सुनाई दी, जो कि देव के प्रकट होने का द्योतक था।
हवा में एक ऊर्जा द्वार उत्पन्न हुआ, जिससे निकलकर देव, नीलाभ के समक्ष आ खड़े हुए।
महानदेव ने नीलाभ के पैरों से रिसते खून को देखा, देव के देखते ही खून का रिसाव बंद हो गया। नीलाभ ने त्रिशूल से उतरकर देव के सम्मुख दंडवत प्रणाम किया।
देव ने अपना वरदहस्त आशीर्वाद की मुद्रा में उठा दिया।
“बताओ नीलाभ, तुम इस प्रकार की कठिन साधना क्यों कर रहे हो? तुम्हें भला किस चीज की कामना है? देव ने नीलाभ से पूछा।
"आप तो अंतर्यामी है देव।” नीलाभ हाथ जोड़कर देव के सामने घुटनों के बल बैठ गया- “आप तो जानते हैं, कि मुझे मनुष्यों के कल्याण के लिये, कुछ पलों के लिये आपकी कुछ शक्तियों का वरण करना है। इसलिये हे महादेव, मुझे ये वरदान दीजिये कि मैं कुछ विषम परिस्थितियों के समय, कुछ क्षणों के लिये, आपकी कुछ शक्तियों को धारण कर सकूँ। मैंने ब्र…देव के कहे अनुसार, आपकी शक्तियों को धारण करने के लिये, अपना शरीर भी उन शक्तियों के लायक कर लिया है।'
यह सुनकर म..देव ने आगे बढ़कर नीलाभ का हाथ पकड़ लिया। इससे पहले कि नीलाभ कुछ भी समझ पाता, उसे अपना शरीर ब्रह्मांड के करोड़ों आकाशगंगाओं के मध्य दिखाई दिया।
चारो ओर अरबों-खरबों अलग-अलग रंग के सितारे फैले हुए थे। करोड़ों आकाशगंगाएं अपनी धुरी पर घूम रहीं थीं। ब्लैक होल कुछ आकाशगंगाओं को अपने अंदर समाहित कर रहे थे।
कुछ न्यूट्रान स्टार अपने ही ताप से, एक धमाके के साथ फट रहे थे। कुछ आकाशगंगाएं आपस में विलय होकर, नयी आकाशगंगा का निर्माण कर रहीं थीं।
कुल मिलाकर उस स्थान पर मनुष्य तो क्या, किसी भी आकाशगंगा का अस्तित्व भी नगण्य दिखाई दे रहा था। चारो ओर अनंत ब्रह्मांड, अनवरत समय के साथ गतिमान था।
नीलाभ ने आज से पहले कभी भी इस प्रकार का दृश्य नहीं देखा था, इसलिये वह घबराकर ..देव को याद करने लगा।
तभी उस अनंत ब्रह्मांड में सितारों और आका शगंगाओं के मध्य देव का 5 मुखों वाला शरीर प्रकट हुआ।
उसमें पूर्व मुख-पीत वर्ण, पश्चिम मुख-श्वेत वर्ण, उत्तर मुख-कृष्ण वर्ण, दक्षिण मुख-नीलवर्ण और ऊर्ध्व मुख-ईशान दुग्ध के समान प्रतीत हो रहा था। नीलाभ, देव के इस दिव्य दर्शन को देख अविभूत होने लगा।
“हे देव, मैं आपके इस पंचमुखी दर्शन से, ब्रह्मांड के सारे कष्टों को भूल चुका हूं। अब कृपया मुझे इस दिव्य दर्शन का सार समझाइये देव?" नीलाभ ने अपने आँखों में उस अद्भुत दृश्य को भरते हुए कहा।
नीलाभ के शब्द सुन देव की आवाज वातावरण में उभरी- “नीलाभ, मैं तुम्हें ईश्वर का सार समझाने की चेष्टा कर रहा हूं। ईश्वर अनंत और निराकार हैं, तुम जिस रुप में उन्हें देखने की इच्छा करोगे, वो तुम्हें उस रुप में दर्शन देंगे। तुमने हमसे हमारी शक्तियों का वरण करने का वरदान मांगा, इसलिये ही हमने तुम्हें इस पंचमुख से दर्शन दिये। हम तुम्हें इस पंचमुख के माध्यम से बताना चाहते हैं, कि हम स्वयं अपने पंचभूत की शक्तियों से निर्मित हैं। अब अगर हम तुम्हें यह वरदान दे भी दें, तब भी तुम हमारे, इन पंचरुपों के आशीर्वाद के बिना, हमारी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाओगे। तो बताओ नीलाभ क्या तुम इन पंचभूतों से आशीर्वाद प्राप्त करने के इच्छुक हो?....परंतु ध्यान रखना, इन्हें प्रसन्न करना इतना भी आसान नहीं होगा।"
“अवश्य ..देव, आप मुझे वरदान प्रदान करिये। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि बिना इन पंचभूतों के आशीर्वाद के, मैं आपकी उन शक्तियों का वरण नहीं करूंगा।” नीलाभ ने म..देव को विश्वास दिलाते हुए कहा।
“तथास्तु। तुम्हारा कल्याण हो नीलाभ।” यह कहकर महादेव अपने स्थान से अंतर्ध्यान हो गये।
तभी रोशनी का एक तेज झमाका हुआ, जिसकी वजह से नीलाभ की आँखें बंद हो गईं। परंतु जब नीलाभ ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने अपने आपको रुद्रलोक के उसी मं..दिर के बाहर पाया, जहां रहकर वह इतने समय से तपस्या कर रहा था।
इस समय नीलाभ के चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता के भाव थे। अब नीलाभ देव के पहले रुप को प्रसन्न करने के लिये चल पड़ा, जो कि वीरभद्र थे और वह रुद्रलोक के ही किसी अज्ञात स्थान पर थे।
चैपटर-3
ब्लैकून: (20 वर्ष पहले.......डेल्फानो ग्रह, एरियन आकाशगंगा)
पृथ्वी से 12 लाख प्रकाशवर्ष दूर, एरियन आकाशगंगा में एक बहुत ही खूबसूरत ग्रह है, जिसका नाम है- डेल्फानो।
वैसे तो इस ग्रह का इतिहास मात्र 5000 वर्ष ही पुराना है, परंतु अपने इस छोटे से इतिहास में भी, डेल्फानो ने अनेकों अभूतपूर्व अविष्कार करके, पूरी एरियन आकाशगंगा को चकित करके रखा था।
कहने को तो यह ग्रह छोटा है, परंतु डेल्फानो ग्रह विज्ञान की तकनीक के हिसाब से, बहुत विकसित ग्रह माना जाता रहा है। कहते हैं कि इस ग्रह के लोगों का मस्तिष्क अत्यंत विकसित होता है।
यहां के वैज्ञानिक नित नये शोध करते रहते हैं। यहां के लोग देखने में बिल्कुल पृथ्वी वासियों के जैसे ही हैं, सिर्फ उनकी औसत आयु 10,00 वर्ष की होती है।
डेल्फानो एक शांति प्रिय ग्रह होने की वजह से, इतना आधुनिक तकनीक होने के बाद भी, हथियारों का निर्माण सबसे कम मात्रा में करता है।
डेल्फानो के राजा गिरोट स्वयं भी एक निपुण वैज्ञानिक हैं, जो कि अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी प्रयोगशाला ‘ब्लैकून' को देते हैं।
कहते हैं कि गिरोट ने ही देवता नोवान का आशीर्वाद प्राप्त कर, 5,000 वर्ष पहले इस ग्रह को बसाया था। देवता नोवान के ही आशीर्वाद से गिरोट पिछले 5,000 वर्षों से वैसे ही जवान है, जैसा कि इस ग्रह के निर्माण के समय हुआ करता था।
गिरोट ने अपनी पूरी जिंदगी डेल्फानो को विकसित करने में लगा दी थी। डेल्फानो को विकसित करने में वह इतना पागल हो गया कि उसे कभी अपने विवाह का ख्याल भी नहीं आया।
आखिरकार एक रात उसे डेल्फानों के वारिस की चिंता हुई, इसलिये हजारों वर्षों के बाद गिरोट ने अपने ग्रह की ही एक साधारण सी लड़की से विवाह कर लिया।
विवाह के उपरांत, युवराज ओरस को जन्म देते हुए, गिरोट की पत्नि का स्वर्गवास हो गया। अब गिरोट के पास अपने पुत्र युवराज ओरस के सिवा कुछ भी नहीं था।
सुबह का समय था, डेल्फानो के दोनों सूर्य उदय हो चुके थे। सूर्य की पीली किरणें चारो ओर फैल गईं थीं।
इस समय गिरोट अपने महल से ब्लैकून के लिये निकलने ही वाला था, कि तभी 'कमांडर कीमोन' ने गिरोट के कक्ष में प्रवेश किया।
कीमोन को देख गिरोट की आँखों में आश्चर्य के भाव उभर आये।
“क्या हुआ कीमोन? इतनी सुबह-सुबह आने का कोई विशेष कारण है क्या?” गिरोट ने कीमोन से पूछा।
“महाराज, गुप्तचरों से समाचार मिला है, कि एंड्रोवर्स आकाशगंगा के, फेरोना ग्रह के राजा एलान्का को, आपके नये अविष्कार ‘समयचक्र' का पता लग गया है और वह किसी भी कीमत पर हमसे यह समयचक्र छीनना चाहता है।” कीमोन ने गंभीर भाव से कहा।
"एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोग?" गिरोट ने आश्चर्य से कहा- “उनके पास तो स्वयं एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जाने की शक्ति है, फिर वह हमारे समयचक्र में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?"
“वह अपनी शक्तियों से 2 ग्रहों के बीच द्वार बना सकते हैं महाराज, पर वह आकाशगंगा की अनन्त गहराइयों में, एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं जा सकते और ना ही समय को रोक और चला सकते हैं, इसी लिये उन्हें आपका समयचक्र चाहिये महाराज।” कीमोन ने कहा।
"पर समयचक्र के प्रयोग को तो हमने बहुत ही गुप्त रखा था, फिर उन्हें इस समयचक्र की जानकारी कैसे हुई?” गिरोट के चेहरे पर अब चिंता के भाव उभर आये।
“जिस प्रकार हमारे गुप्तचर हर स्थान पर हैं, मुझे लगता है कि उनके गुप्तचर भी हमारे ग्रह पर होंगे? उन्हीं के माध्यम से एंड्रोवर्स आकाशगंगा के लोगों को हमारे समयचक्र का पता चला होगा। इसलिये महाराज से निवेदन है, कि वह सदैव अपने और अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान रखें। मैं तब तक सेना को भी एलर्ट पर डाल देता हूं।" इतना कहकर कीमोन शांत हो गया और गिरोट के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
गिरोट ने इशारे से कीमोन को जाने का आदेश दिया और स्वयं कक्ष में रखी एक कुर्सी पर बैठकर समयचक्र के बारे में सोचने लगे।
“समयचक्र का निर्माण तो पूरा हो गया है, पर इसे किसी भी प्रकार से सुरक्षित रखना होगा? पर कैसे? इतने बड़े ब्लैकून को हम किसी की नजरों से छिपा भी नहीं सकते.... क्या करूं?.....हे देवता नोवान हमारी मदद करो।” गिरोट मन ही मन अपने देवता को याद करने लगा।
तभी अचानक वह खुशी से उछल पड़ा- “अरे वाह मुझे पहले 'ज़ेप्टो नाइजर' का ध्यान क्यों नहीं आया? ...हां ...उससे मेरी समस्या हल हो सकती है।"
अभी गिरोट यह सब सोच ही रहा था कि तभी 5 वर्षीय नन्हें युवराज ‘ओरस' ने कक्ष में प्रवेश किया।
“आप क्या कर रहे हैं पिताजी?" ओरस ने अपने छोटे से यान नुमा खिलौने को हाथों से घुमाते हुए कहा।
"हम तो अपने नये प्रयोग के बारे में सोच रहे थे युवराज।” गिरोट ने मुस्कुराकर अपनी बांहें फैलाते हुए कहा - “आप बताओ, आप अपने इस नन्हें से यान से, कहां की सैर कर रहे हो?"
गिरोट को बांहें फैलाते देख, नन्हा ओरस दौड़कर उनकी बांहों में समा गया।
“मैं तो अपने यान से आकाशगंगा के, दूसरे छोर की सैर कर रहा था पिताजी।" ओरस ने अपनी कल्पनाओं को उड़ान देते हुए कहा- “पर मुझे ये बताइये कि आपका यह नया प्रयोग क्या है? जिसके बारे में आप मुझसे भी ज्यादा सोचते हो।" ओरस की बात सुन गिरोट के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“अभी तुम उस प्रयोग के बारे में जानने के लिये बहुत छोटे हो युवराज, समय आने पर मैं तुम्हें सब कुछ बता दूंगा।” गिरोट ने ओरस को फुसलाते हुए कहा।
“मैं इतना भी छोटा नहीं हूं। मैं आकाशगंगा की सारी जानकारी रखता हूं। आप चाहो तो मेरे ज्ञान का परीक्षण कर सकते हो?” ओरस ने किसी ज्ञानी की तरह ज्ञान देते हुए कहा।
“अच्छा, तो बताओ कि नेबुला क्या होता है?" गिरोट सच में ही ओरस की परीक्षा लेने लगा। वैसे गिरोट को पता था, कि ओरस इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पायेगा।
"जब कोई सितारा अपनी आयु का पूरा करने के बाद फटकर कणों में बिखर जाता है, तो उससे बने गैस और धूल के बादलों को नेबुला कहते हैं।” ओरस ने अपना यान उड़ाते हुए कहा।
ओरस का उत्तर सुन गिरोट हैरान रह गया क्यों कि ओरस ने शत-प्रतिशत सही कहा था।
“अच्छा अब बताओ कि सुपरनोआ क्या होता है?" ओरस ने अपने प्रश्न को थोड़ा और कठिन कर दिया।
“जब नेबुला के बहुत से कण आपस में संकुचित हो कर मिलते हैं, तो वह एक सितारे यानि की सूर्य का निर्माण करते हैं। वह सितारा 75 प्रतिशत तक हाइड्रोजन से बना होता है। यानि की हाइड्रोजन उस सूर्य में ईधन का काम करता है। धीरे-धीरे जब उस सितारे का पूरा हाईड्रोजन खत्म होकर, हीलीयम में परिवर्तित हो जाता है, इस स्थिति में वह सितारा अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण को संभाल नहीं पाता और एक महा विस्फोट के साथ फट जाता है, जिसे सुपरनोवा कहते हैं।” ओरस ने भोलेपन से कहा।
गिरोट अब आश्चर्य से ओरस की ओर देख रहा था।
“क्या तुम 'न्यूट्रान स्टार' और 'ब्लैक होल' के बारे में भी जानते हो?” गिरोट ने अब क्लास 1 के बच्चे से ग्रेजुएशन का प्रश्न पूछ लिया था।
"जब सुपरनो वा विस्फोट होता है, तो सितारे का सबसे बड़ा टुकड़ा, जो सबसे ज्यादा घनत्व लिये होता है, वह एक गोलाकार आकृति लेकर एक न्यूट्रान स्टार में परिवर्तित हो जाता है। यह न्यूट्रान स्टार जब संकुचन की अधिकतक सीमा तक पहुंच जाता है, तो यह छोटा होकर अदृश्य हो जाता है। इसी अदृश्य पिंड को ब्लैक होल कहते हैं।" इस प्रकार क्लास 1 के बच्चे ने ग्रेजुएशन में सर्वोत्तम अंक प्राप्त कर, अध्यापक को हतप्रभ कर दिया।
“ये सब ज्ञान तुम्हें किसने दिया?” गिरोट ने आश्चर्य से ओरस से पूछा।
ओरस ने मुस्कुराते हुए, कक्ष में रखी एक प्रतिमा की ओर इशारा किया। वह प्रतिमा डेल्फानो के देवता नोवान की थी।
ओरस का इशारा देख गिरोट और भी ज्यादा आश्चर्यचकित हो गया। उसने ओरस को अपने गले से लगा लिया।
“चलो ओरस, आज मैं तुम्हें अपने उस नये प्रयोग को दिखाता हूं।” गिरोट ने खड़े होते हुए कहा।
"पर आप तो कह रहे थे कि मैं अभी छोटा हं और मैं उस प्रयोग को समझ नहीं पाऊंगा?" ओरस ने अपनी भोली जुबान में कहा।
“मैं गलत था युवराज, आप नहीं छोटे हो, मेरी मानसिकता छोटी थी, जो मैं यह सोच रहा था कि आपको कुछ समझ नहीं आयेगा? आओ, अब चलते हैं ब्लैकून की ओर, जहां मेरा प्रयोग बेसब्री से आपका इंतजार कर रहा है।
यह कहकर गिरोट ने नन्हें वैज्ञानिक को अपनी गोद में उठाया और हवा में उड़ने वाले एक यान में बैठकर ब्लैकून के पास जा पहुंचा।
ब्लैकून लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली, एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला थी, जिसका आकार बिल्कुल गोल और काले रंग का था। दूर से देखने पर वह एक बड़े से काले मोती के समान प्रतीत हो रही थी। गिरोट, ओरस को लेकर ब्लैकून के पास पहुंच गया।
“ब्लैकून में प्रवेश करने का प्रवेश द्वार तो है ही नहीं पिताजी। फिर हम इसमें प्रवेश कैसे करेंगे?" ओरस ने कहा।
“ब्लैकून का पूरा नियंत्रण अंदर मौजूद एक कंप्यूटर 'जेनिक्स' करती है। वह हमें देखते ही स्वयं द्वार खोल देगी। तभी ब्लैकून में एक स्थान पर एक द्वार खुलता दिखाई देने लगा।
“क्या यह मुझे देखकर भी द्वार खोल देगी?” ओरस ने अपनी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा।
“हां पुत्र, ज़ेनिक्स में डेल्फानों के राजवंश के, किसी भी व्यक्ति के शरीर को सेंस करने की अद्भुत क्षमता है।" ओरस ने कहा।
गिरोट और ओरस उस द्वार से अंदर प्रवेश कर गये। ब्लैकून में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था, पूरा सिस्टम ज़ेनिक्स के हवाले था।
अंदर प्रवेश करते ही ओरस को पूरा ब्लैकून, किसी एक छोटे ब्रह्मांड के समान प्रतीत हुआ। चारो ओर निहारिकाएं (नेबुला) फैली हुई थी, जिसके आसपास अनेकों ग्रह घूम रहे थे।
चूंकि ओरस पहली बार ब्लैकून में आया था, इसलिये वह आश्चर्य से सभी चीजों को निहार रहा था।
“यह कैसी प्रयोगशाला है पिताजी? यहां पर कोई मशीन तो दिखाई ही नहीं दे रही है?” ओरस ने कहा।
“ब्लैकून कुल 4 भागों में बंटा है पुत्र, कुछ देर प्रतीक्षा करो, अभी तुम्हें सबकुछ पता चल जायेगा।...यह तो अभी ब्लैकून का प्रथम भाग है, इस भाग में हम तारों और नक्षत्रों की उत्पत्ति का अध्ययन करते हैं।" गिरोट ने कहा।
उस भाग को पार करने के बाद, ओरस एक ऐसे भाग में पहुंचा, जहां पर देवता नोवान की एक बड़ी सी प्रतिमा लगी थी। देवता नोवान के कंधे पर एक फीनीक्स पक्षी बैठा था। उस भाग में और कुछ भी नहीं था।
यह ब्लैकून का दूसरा भाग था। देवता की प्रतिमा के नीचे, सामने की ओर एक गोल काँच का पारदर्शी केबिन बना था। उसे देख ओरस ने पूछ ही लिया।
जारी रहेगा_____![]()
