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कल अपडेट आ जायेगा दोस्त ।Kya bhai aap aese late update doge to kese chalega... Hum apki kahani ka kab se besabri se wait kar rahe hai.....
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Bhaut Hee Lazawab Aur Romanchak Update Diyaa Hee 



Gajab ka update but der bahut laga di waiting for nextअध्याय 4
कमरे में कुछ पल तक कोई आवाज़ नहीं गूंजी। जैसे हवा भी ठहर गई हो। कर्तिक की साँसें तेज़ थीं, वह जिस ज़िंदगी को अब तक अपनी सच्चाई मानकर जीता आया था, वह एक झटके में दरक हो चुकी थी।
पलंग पर लेटे बड़े ठाकुर ने धीरे-धीरे अपनी कमज़ोर उँगलियाँ हिलाईं। आवाज़ भारी थी, लेकिन उसमें एक अजीब-सा अपनापन था।
“बेटे… इधर आ।”
कर्तिक के कदम अपने आप आगे नहीं बढ़े। डर, उलझन और अविश्वास - तीनों ने जैसे उसके पैरों को जकड़ लिया था। छोटे चाचा धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखते है, मानो भरोसा दिलाना चाहते हो। कर्तिक हिचकिचाते हुए दो क़दम आगे बढ़ता है।
बड़े ठाकुर की नज़रें उसके चेहरे पर टिकी थीं। बहुत देर तक देखते रहे, जैसे हर लकीर में कोई भूली हुई याद तलाश रहे हों। फिर उनकी आँखें भर आईं।
“बिल्कुल उसी जैसा है…” आवाज़ टूट जाती है।
“तेरे बाप की आँखें… वही कद… वही ठहराव।”
कर्तिक का सीना भारी हो जाता है। वह अचानक बोल उठता है : “अगर… अगर मैं आपका पोता हूँ,"
उसकी आवाज़ काँप रही थी,
“तो फिर मैं अनाथ क्यों रहा?
अगर मेरा परिवार ज़िंदा था… तो मुझे अकेला क्यों छोड़ दिया गया?”
यह सवाल कमरे में हथौड़े की तरह गिरता है।
बाहर खड़ी औरतों में से किसी की सिसकी सुनाई देती है। माँ के होंठ काँपते हैं, लेकिन वह अंदर आने की हिम्मत नहीं कर पाती।
बड़े ठाकुर आँखें बंद कर लेते हैं। एक लंबी साँस लेते हैं, जैसे बरसों पुराना ज़हर सीने से निकाल रहे हों।
“क्योंकि…” वे धीरे-धीरे बोलते हैं,
“तुझे छोड़ना मेरे लिए आसान नहीं था, बेटे। तुझे छोड़ना… मेरी सबसे बड़ी हार थी।”
कर्तिक की मुट्ठियाँ भींच जाती हैं।
“मगर उस वक़्त यही एक रास्ता था,”
बड़े ठाकुर फिर बोलते हैं, “तुझे ज़िंदा रखने का।”
कमरे में खड़े सब लोग समझ जाते हैं।
अब वह सच आने वाला है, जिसे अब तक शब्दों में बाँधने की किसी ने हिम्मत नहीं की थी।
कर्तिक की आँखें दादा के चेहरे पर टिकी थीं।
दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसे एहसास होने लगा था कि जो कहानी वह सुनने वाला है, वह उसकी ज़िंदगी को दो हिस्सों में बाँट देने वाली है -
एक, जो अनाथ आश्रम में छूट गई।
और दूसरी, जो इस हवेली में उसका इंतज़ार कर रही थी।
बड़े ठाकुर ने आँखें खोलीं, लेकिन नज़रें ज़मीन पर टिकी रहीं। जैसे सामने बैठे कर्तिक को नहीं, बल्कि बरसों पुरानी उस रात को देख रहे हों। उनकी आवाज़ धीमी थी, काँपती हुई, पर सच्ची।
“बेटे… वो दिन आज भी मेरी नींद छीन लेती है।”
कमरे में बैठे सब लोग सिमट गए। बाहर खड़ी औरतों की सिसकियाँ अब साफ़ सुनाई दे रही थीं।
दादा ने उसका हाथ अपने झुर्रीदार हाथों में ले लिया। उँगलियाँ ठंडी थीं… पर पकड़ में बरसों का दबा हुआ स्नेह था। दादा ने गहरी साँस ली। आँखें कुछ पल के लिए बंद कीं… फिर बोलना शुरू किया।
बड़े ठाकुर – जिस दिन तू पैदा हुआ… उस रात आम रातों से भी ज़्यादा काली थी। हमारे यहाँ तब बिजली नहीं थी। पूरी हवेली दीयों और लालटेन की रोशनी में डूबी हुई थी। तू इसी हवेली में पैदा हुआ… और बेटा, उस रात जितनी खुशी इस घर में थी ना… उतनी पहले कभी नहीं देखी।
कार्तिक की पलकें हल्की सी झुकीं। वह चुपचाप सुन रहा था।
बड़े ठाकुर – तेरा बाप… और तेरे तया को पता चला … दोनों फूले नहीं समा रहे थे। तेरा ताया तो शहर गया हुआ था। क्यूंकि गाँव में सूखा पड़ रहा था। बारिश थम चुकी थी। वो बड़े अधिकारियों से मिलने गया था, ताकि पानी की व्यवस्था हो सके। कहता था- ‘मेरे भतीजे का जन्म हुआ है, उसके शहर से आने से पहले हवेली सज जानी चाहिए।
'’दादा की आवाज़ भारी हो गई।
बड़े ठाकुर – सुबह होते ही हवेली में मिठाई बँटने की तैयारी होने लगी। ढोलक मँगाई गई। औरतें गा रही थीं। पूरा गाँव खुश था… लेकिन…”
उनकी आँखों में अचानक आँसू भर आए।
“भगवान को शायद कुछ और मंज़ूर था।” कमरे की हवा जैसे थम गई।
बड़े ठाकुर – दोपहर होते-होते हवेली के बाहर शोर मच गया। हम सब दौड़कर बाहर आए। देखा… एक ताँगे में लाश पड़ी थी… तेरे बड़े ताया की।
कार्तिक की उँगलियाँ अनजाने में कस गईं।
बड़े ठाकुर – उसे बहुत बेरहमी से मारा गया था। पूछने पर गाँव वालों ने बताया - उसकी लाश जंगल के किनारे पड़ी थी… कुत्ते नोच रहे थे। किसी ने देखा तो पहचानकर यहाँ ले आया।
बाहर खड़ी औरतों से फिर सिसकी उठी। कमरे में सिर झुक गए।कार्तिक की आँखें नम हो चुकी थीं… मगर उसने आँसू गिरने नहीं दिए। उसका गला सूख गया था। वह स्थिर बैठा रहा।
बड़े ठाकुर – उस दिन हवेली की खुशियाँ मातम में बदल गईं। लोग फुसफुसाने लगे- ‘नया बच्चा आया… और घर का बड़ा बेटा चला गया।’ किसी ने कहा - ‘बच्चा… अशुभ है।
दादा ने सिर झुका लिया।
“लेकिन मैंने किसी की बात नहीं मानी। तेरे बाप ने भी नहीं। हम दोनों ने सबके सामने कहा - ये हमारा खून है… हमारा वारिस है। हमारा खून कोई अशुभ नहीं है।
कुछ पल के लिए कमरे में शांति छा गई।
बड़े ठाकुर – धीरे-धीरे लोग सब भूलकर तुझे प्यार करने लगे हम सब तुझ में तेरे बड़े तया को देखने लगे । तू सबका दुलारा बन गया। लेकिन फिर… एक रात खेतों में आग लग गई। कई लोग जल गए। फिर बातें शुरू हुईं… ‘लड़का सच में मनहूस है।’” गांव के जमींदार और पास पास के बड़े बड़े लोग भी यह सब कहने लगे ।
कार्तिक के चेहरे पर हल्की-सी छाया आई। भीतर कुछ सख्त होता जा रहा था।
बड़े ठाकुर – तेरे बाप ने सबको चुप करा दिया। बोला- ‘जिसे मेरे बेटे से दिक्कत है, वो इस घर में कदम न रखे।
दादा ने कार्तिक का हाथ दबाया।
“फिर एक दिन तेरी माँ तुझे गोद में लेकर उतर रही थी… अचानक उसका पैर फिसला। वो नीचे गिर गई। पर तू बच गया… लेकिन उस दिन सच में हम सब को डर लगा । हमे लगने लगा कि तुझमें कुछ तो है ।
बाहर से माँ की टूटी हुई सिसकी सुनाई दी।
“जब तू दो साल का हुआ,” दादा आगे बोले, “मैं और तेरा पिता तुझे कुल बाबा के पास ले गए। सोचा, सब शंका दूर हो जाएगी मग़र शायद भगवान को कुछ और ही मंजूर था "।
कमरे की हवा और भारी हो गई।
“कुल बाबा से मिल कर वापस लौट रहे थे… रात काली थी… जंगल का रास्ता सुनसान। अचानक एक ज़ोर का पत्थर गाड़ी के शीशे पर आकर लगा। शीशा टूट गया। तू तेरे बाप की गोद में था… डर से उससे चिपका हुआ।”
कर्तिक की साँसें तेज़ हो गईं।
“फिर चारों तरफ से पत्थर बरसने लगे। गाड़ी रुक गई।
तेरे पिता ने तुझे मेरी गोद में दे दिया और कहा - ‘बाबूजी… बच्चे को लेकर झाड़ियों में छिप जाइए।’”
दादा की उँगलियाँ काँपने लगीं।
“मैं और ड्राइवर हरिया गाड़ी से उतर कर बाहर निकले और सब से बचते हुए थोड़ी दूर अँधेरे में झाड़ियों के पीछे छिप गए। तू मेरे सीने से लगा था… एक आवाज़ तक नहीं निकाली तूने।”
कमरे में सन्नाटा जम गया।
“मै और हरिया बचते बचाते थोड़ी दूर झाड़ियों मे चुप गए मैने सोचा तेरे बाप भी चुप गया होगा मगर मैं गलत था । उन्होंने तेरे पिता को गाड़ी से घसीटकर बाहर निकाला। पूछने लगे ‘बुज़ुर्ग और बच्चा कहाँ है?’”
दादा की आँखों से आँसू ढलक पड़े।
“वो नहीं बोला। बस जंगल की तरफ देखा… जहाँ हम छिपे थे।”
कर्तिक के होंठ काँप उठे।
“मैंने सब देखा… पर कुछ कर नहीं पाया। अगर बाहर निकलता… तो तू भी नहीं बचता।”
बाहर रोने की आवाज़ अब दबाई नहीं जा रही थी।
“उन्होंने तेरे पिता को बेरहमी से मारा… बार-बार पूछा… पर उसने एक शब्द नहीं कहा। आख़िरी वक़्त तक तेरी तरफ देखा… जैसे आँखों से कह रहा हो- ‘बाबूजी मेरे बेटे को कुछ मत होने देना "।
दादा की आवाज़ टूट गई।
“मैं पत्थर बनकर खड़ा रहा… क्योंकि मुझे एक जान बचानी थी। तेरी।”
कमरे में मौजूद हर आदमी की आँखें नम थीं।
“उस रात के बाद मुझे समझ आ गया - दुश्मन हमें खत्म करना चाहते हैं। अगर उन्हें पता चलता कि तू ज़िंदा है… तो वो तुझे भी नहीं छोड़ते।”
उन्होंने कर्तिक का हाथ अपने माथे से लगा लिया।
“इसलिए मैंने तुझे अपने दोस्त के अनाथ आश्रम में भेज दिया। सबको झूठ कहा… कि तू नहीं रहा। मैंने अपने ही खून को अपने से दूर किया… ताकि वो साँस ले सके।”
कर्तिक की आँखें पूरी आसू से गीली थी ।
“मैंने तुझे नहीं छोड़ा था, बेटा… मैं तुझे बचा रहा था।”
कमरे में सब की आँखें नम थी ।
उसी सन्नाटे में… बाहर मुख्य द्वार की तरफ से एक हल्की-सी दबती हुई हँसी सुनाई दी।
इतनी धीमी… कि जैसे कोई अपने होंठ दाँतों से दबाकर हँस रहा हो। अंदर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
या शायद… किसी ने दिया, पर कुछ कहा नहीं।
दादा ने कर्तिक का चेहरा दोनों हाथों में लिया।
“अगर मैं गलत था… तो सज़ा दे देना।
कमरे में भारी सन्नाटा था।
दादा ने जब सच कह दिया… तब कर्तिक की आँखें नम तो थीं, लेकिन उनमें भरोसा नहीं था।
इतनी बड़ी बात… एक ही पल में?
वो धीरे से बोला -- अगर मैं ही इस घर का वारिस हूँ… तो कोई सबूत है? मैं कैसे मान लूँ?
कमरे में दिन की धूप खिड़कियों से भीतर आ रही थी।
धूल के कण हवा में तैर रहे थे।
सबकी निगाहें बड़े ठाकुर पर टिक गईं।
बड़े ठाकुर ने गहरी साँस ली।
“सबूत है… लेकिन वो ऐसा है जिसे सिर्फ़ देखा नहीं… समझा भी जाता है।”
उन्होंने छोटे बेटे से कहा - वो हरी काँच वाली रोशनी लाओ।
दिन था। कमरे में उजाला पहले से था।
फिर भी जब वो छोटी-सी धातु की लैंप जलाई गई, तो उसमें से निकलती हल्की हरी किरणें अलग ही लग रही थीं।
कर्तिक की भौंहें सिकुड़ गईं।
“ये क्या है?”
दादा ने सीधे उसकी आँखों में देखा।
“अपनी कमीज़ उतार।”
कमरे में खामोशी और गहरी हो गई।
कर्तिक कुछ पल तक खड़ा रहा।
फिर बिना कुछ कहे अपनी टी-शर्ट उतार दी।
उसका सीना बिल्कुल साफ था।
उसके होंठों पर हल्की-सी अविश्वास भरी मुस्कान आई जैसे कह रहा हो, देख लिया?
तभी बड़े ठाकुर ने खुद लैंप उठाई… और हरी रोशनी उसके सीने पर डाली।
पहले कुछ नहीं हुआ।
फिर… धीरे-धीरे उसकी त्वचा पर हल्की-सी रेखा उभरने लगी।
एक तना। उससे निकलती शाखाएँ। नीचे फैलती जड़ें।
पूरा आकार एक विशाल पेड़ जैसा।
दिन की रोशनी में भी… वो आकृति हरे आभा में चमक रही थी।
कमरे में खड़े सब लोग दंग रह गए।
“ये…” कर्तिक की आवाज़ सूख गई,
“ये कैसे हो सकता है? मुझे कभी पता क्यों नहीं चला?”
उसकी उँगलियाँ काँपते हुए उस निशान को छूने लगीं।
छूते ही वो हल्का-सा फीका पड़ जाता… फिर रोशनी पड़ते ही उभर आता।
बड़े ठाकुर की आँखें भर आईं।
“क्योंकि ये साधारण निशान नहीं है, बेटा।”
उन्होंने धीरे-धीरे कहना शुरू किया
“जब तू दो साल का था… तुझे मैं खुद लेकर गया था कुल बाबा के पास।” ( यही समय था जब दुश्मन ने कार्तिक के बाप को मारा था )
कमरे में खड़े लोगों के चेहरे बदल गए।
“कुल बाबा?” कर्तिक ने मन ही मन दोहराया।
बड़े ठाकुर बोले — तेरे जन्म के बाद घर में जो कुछ हुआ… तेरे ताया की मौत… खेतों में आग… तेरी माँ का गिरना… लोगों ने तुझे मनहूस कहना शुरू कर दिया था। मुझे डर लगने लगा था… कि कहीं ये सब किसी बड़े खेल का हिस्सा तो नहीं।”
उन्होंने यादों में खोकर कहा — “कुल बाबा हमारे खानदान के रक्षक माने जाते हैं। पीढ़ियों से जब भी कोई संकट आता… हम उन्हीं के पास जाते।”
“उन्होंने तुझे देखा… बहुत देर तक। फिर बोले ‘ये बच्चा साधारण नहीं है। इसके पीछे बड़ी ताक़त है… और बड़ा खतरा भी।’”
कर्तिक की साँसें भारी हो गईं।
“उन्होंने तेरे सीने पर अपने हाथ से ये वंश-वृक्ष की आकृति बनाई। कहा - ‘ये निशान इसे बचाएगा… और सही समय पर इसकी पहचान बनेगा।’”
कमरे में सन्नाटा था।
“लेकिन ये निशान सिर्फ़ इसी के पास है,” दादा ने स्पष्ट कहा।
“हमारे खानदान में कभी किसी और पर नहीं बना। क्योंकि बाबा ने कहा था - ‘वक़्त आने पर यही असली वारिस साबित होगा।
हरी रोशनी हटा ली गई। निशान धीरे-धीरे गायब हो गया। कमरा फिर सामान्य लगने लगा। लेकिन कर्तिक… अब सामान्य नहीं था।
वो वहीं खड़ा था… धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी…
और उसके भीतर कुछ टूट भी रहा था… और कुछ बन भी रहा था।
तो ये सब पहले से तय था? या मुझे किसी खेल में मोहरा बनाया गया है?
उसने बिना कुछ कहे अपनी टी-शर्ट पहन ली।
उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे। सिर्फ़ एक गहरी, सतर्क चमक।
“अगर ये निशान आपने बनवाया था…” उसने धीमे से कहा,
“तो इसका मतलब खतरा अभी खत्म नहीं हुआ।”
दादा ने उसकी तरफ देखा।
पहली बार… उन्हें अपने सामने बच्चा नहीं… एक जागता हुआ वारिस दिखाई दिया।
और बाहर हवेली के आँगन में… दिन की धूप अचानक थोड़ी तेज़ लगने लगी।
दादा ने कर्तिक का हाथ धीरे से छोड़ा। उनकी आँखें लाल थीं, आवाज़ थकी हुई।
“जा बेटा… अपनी माँ से मिल ले। वो कब से तेरे लिए रोते हुए बैठी है… इतने सालों का इंतज़ार है उसके पास।”
कमरे की हवा जैसे अचानक भारी हो गई।
कर्तिक ने एक पल दादा की तरफ देखा… फिर दरवाज़े की ओर बढ़ गया।
आँगन में दीये जल रहे थे। हल्की हवा में उनकी लौ काँप रही थी। सीढ़ियों के पास… सफेद साड़ी में खड़ी एक औरत… जैसे समय में ठहरी हुई।
उसकी आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं।
माँ।
जब कर्तिक चौखट पर आकर रुका… तो वो पहले उसे पहचान ही नहीं पाई।
इतने सालों का खालीपन… एक पल में कैसे भरता?
फिर उसकी नज़र उसके चेहरे पर ठहर गई।
वही आँखें। वही भौंहों की हल्की उठान। वही चुप्पी… जो उसके पिता में थी।
उसके हाथ काँपने लगे।
“क… कर्तिक…?”
आवाज़ टूटी हुई थी। जैसे गले में अटक गई हो।
कर्तिक कुछ पल वहीं खड़ा रहा। उसकी साँसें भारी थीं।
सीने में कुछ अटका हुआ… जो बाहर नहीं आ पा रहा था।
माँ एक कदम आगे बढ़ी।
“बोल ना… तू ही है ना?”
उसने हाथ बढ़ाया… मगर आधे रास्ते में ही रुक गया।
जैसे डर हो… कि कहीं सपना न हो।
कर्तिक की आँखें भर आईं।
इतने साल… अनाथ आश्रम की ठंडी रातें… त्योहारों पर खाली चौखट…हर बार उसने सोचा था ।
क्या सच में कोई मेरा इंतज़ार कर रहा होगा?
और आज… वो इंतज़ार सामने खड़ा था।
माँ ने अचानक उसका चेहरा दोनों हथेलियों में ले लिया।
“मेरा बच्चा…” उसकी आवाज़ फूट पड़ी।
“तुझे पता है… मैंने तेरी हर साल जन्मदिन पर दिया जलाया है… सब कहते थे भूल जा… पर मैं कैसे भूलती? माँ हूँ मैं तेरी…”
आँसू उसके गालों से फिसलकर कर्तिक के हाथों पर गिर रहे थे।
कर्तिक की सारी कठोरता… सारी बनावटी मजबूती… उस पल दरक गई।
“माँ…” बस एक शब्द निकला।
और वो झुक गया।
माँ ने उसे सीने से ऐसे भींच लिया जैसे फिर कभी छोड़ना नहीं चाहती। उसके कंधे पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगी।
“कहाँ था तू इतने साल? एक बार आवाज़ दे देता… मैं दुनिया से लड़ जाती… किसी से नहीं डरती…”
कर्तिक ने पहली बार अपनी बाँहें पूरी तरह उसके चारों ओर लपेट दीं।
उसने महसूस किया - ये वही महक है… जो शायद उसके बचपन की आखिरी याद में बसी थी।
चंदन और हल्दी की मिली-जुली खुशबू।
आँगन में खड़े लोग चुप थे। कोई खाँस भी नहीं रहा था।
जैसे समय ठहर गया हो।
माँ उसके बालों को सहलाती रही।
“देख… कितना बड़ा हो गया मेरा बेटा… पर चेहरे पर वही मासूमियत…”
कर्तिक ने हल्की मुस्कान दी।
लेकिन उसकी आँखों की गहराई में… दर्द अभी भी था।
उसने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“अब कहीं नहीं जाऊँगा… कहीं नहीं।” तेरे पास ही रहूंगा तुझसे एक पल भी अब दूर नहीं जाऊंगा।
माँ ने उसकी तरफ देखा - उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था… जो उसने पहले नहीं सुना था।
दर्द… और साथ में कोई ठंडी दृढ़ता।
“बस इतना जान ले… मैं यहीं हूँ,” माँ ने कहा,
“अब जो भी होगा… साथ में होगा।”
हवेली के आँगन में दीयों की लौ फिर से स्थिर हो गई।
लेकिन ऊपर छत की मुंडेर के पास…
हवा का एक हल्का झोंका आया।
जैसे किसी ने इस मिलन को चुपचाप देखा हो।
(और कहानी… अब सच में शुरू हुई,)
Sorry Bhai late dene ke liye ..ab aage bahot hot hot scene ke sath kahani aage badhegi . Sath bane rahiyeGajab ka update but der bahut laga di waiting for next
Shukriya bhaiBahut emotional update hai
ThanksBhaut Heen
Lajawab Start Hai
Ab Dekhba Hai Aage Ke LAJAWAB UPDATE![]()
ThanksWonderful![]()
Bhaut Hee Lazawab Aur Romanchak Update Diyaa Hee
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Keep It Up️
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