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Elder sister/baji ek married ka character jarur dena...नमस्कार सभी पाठकों को।
यह मेरी पहली कहानी होगी जो पूरी तरह से इंसेस्ट पर आधारित है। इस कहानी में कुछ ऐसे दृश्य भी आ सकते हैं जो कुछ पाठकों को पसंद न आएं, इसलिए निवेदन है कि अपनी रिस्क पर पढ़ें। यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है, इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं।
कहानी का प्रारंभ बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत मनमोहक हैं भाई मजा आ गयाअध्याय 1
घना जंगल, चारों ओर सन्नाटा, ऊपर आसमान में आधा छुपा हुआ चाँद और सामने धीरे-धीरे बहती नदी। उसी नदी के किनारे एक लड़का चट्टान पर बैठा हुआ था। तेज़ हवा उसके बालों को हिला रही थी लेकिन उसके चेहरे पर कोई हलचल नहीं थी। उसकी आँखें नदी की लहरों पर टिकी थीं, पर उसका मन कहीं बहुत दूर भटक रहा था।
“मैं हूँ कौन…?” “मेरे माँ-बाप ने मुझे क्यों छोड़ दिया…?” “आख़िर ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि मुझे अकेला छोड़ना पड़ा…?” ऐसे न जाने कितने सवाल उसके मन में उठ रहे थे और हर सवाल के साथ उसका दिल और भारी होता जा रहा था।
उस लड़के को दुनिया कार्तिक के नाम से जानती थी, लेकिन असल में यह उसका दिया हुआ नाम नहीं था। जब से उसे होश आया था, उसने खुद को एक अनाथ आश्रम में ही पाया था। न माँ की ममता याद थी, न पिता का साया—बस सफ़ेद दीवारें, लोहे के पलंग और अनाथ बच्चों की खामोश ज़िंदगियाँ। उसे अपना असली नाम तक नहीं पता था। आश्रम के लोगों ने उसे कार्तिक कहकर बुलाना शुरू किया और धीरे-धीरे वही नाम उसकी पहचान बन गया। उसने भी उसी नाम को अपना लिया। कार्तिक कद में लंबा था, छह फ़ुट से भी ऊँचा, रंग साँवला, शरीर मज़बूत। रोज़ कसरत करना उसकी आदत थी, जिससे वह बाहर से ही नहीं, अंदर से भी मज़बूत बन चुका था। लेकिन उसकी असली ताक़त उसके शरीर में नहीं, उसके भीतर थी—दर्द सहने की आदत, चुप रहकर सब कुछ झेल लेने की क्षमता और सवालों के साथ जीने की मजबूरी। आज वही कार्तिक जंगल में बैठा था, शहर और आश्रम से बहुत दूर, क्योंकि कभी-कभी इंसान को अपने सवालों के जवाब लोगों से नहीं, ख़ामोशी से मिलते हैं। और यही कार्तिक की कहानी की शुरुआत थी।
घने जंगल के उसी किनारे कार्तिक बैठा इन्हीं विचारों में डूबा हुआ था कि तभी पीछे से एक शांत लेकिन गूंजती हुई आवाज़ आई—“तुम यहाँ हो…?” आवाज़ सुनते ही कार्तिक चौंक गया और तुरंत पीछे मुड़कर देखा। सामने वही परिचित चेहरा था—एक बाबा, लंबी सफ़ेद दाढ़ी, गले में माला, नीचे धोती और ऊपर केसरिया रंग का कुर्ता, बिल्कुल वैसे ही जैसे साधु या पंडित पहनते हैं। कार्तिक उन्हें अच्छी तरह जानता था। इन दोनों की पहली मुलाक़ात पाँच साल पहले इसी जंगल में, इसी जगह हुई थी। तब से यह स्थान उनके मिलने का साक्षी बन गया था। कार्तिक हर हफ्ते मंगलवार को यहाँ आता था, क्योंकि इसी दिन बाबा से मुलाक़ात हो पाती थी और उनसे बात करके उसका मन हल्का हो जाता था। मगर पिछले एक महीने से बाबा नहीं आए थे। कार्तिक हर मंगलवार आता रहा, इंतज़ार करता रहा, लेकिन मुलाक़ात नहीं हो पाई थी। आज इतने दिनों बाद बाबा को सामने देखकर कार्तिक के चेहरे पर खुशी साफ़ झलक उठी। वह तुरंत उठा, उनके पास गया और आदर से उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया। बाबा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। असल में बाबा कोई साधारण साधु नहीं थे, वे एक बहुत बड़े ज्योतिषी थे। उन्हें यह भली-भाँति पता रहता था कि किसी के जीवन में आगे क्या होने वाला है—अच्छा या बुरा। कार्तिक को बाबा इसलिए भी बहुत पसंद थे, क्योंकि उनसे बात करके उसका मन हल्का हो जाता था। वह अपने दिल का सारा दर्द, अपने सवाल, अपनी उलझनें बिना डर उनके सामने रख देता था और बाबा उसे जीवन के नए-नए रास्ते, नए अर्थ और जीने की नई समझ देते थे। आज की यह मुलाक़ात कार्तिक के लिए सिर्फ़ खुशी नहीं थी, बल्कि उसके जीवन में आने वाले किसी बड़े मोड़ का संकेत भी थी।
कार्तिक जैसे ही बाबा के चरणों में झुककर आशीर्वाद लेता है, बाबा मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखते हैं और कहते हैं.
बाबा – सदा खुश रहो, पुत्र… और अपना कल्याण करते रहो।
बाबा की यह बात सुनकर कार्तिक थोड़ा रुक जाता है। “अपना कल्याण करते रहो” यह पंक्ति उसके मन में अटक जाती है।
कार्तिक – बाबा, आप कहाँ चले गए थे? जानते हो, मैं पिछले एक महीने से हर हफ्ते आपका इंतज़ार कर रहा था।
बाबा मुस्कुराते हुए कार्तिक के चेहरे पर स्नेह से हाथ फेरते हैं।
बाबा – पुत्र, तुम जानते ही हो, साधु कभी एक जगह नहीं ठहरता। आज यहाँ भिक्षा लेने आता है, तो कल कहीं और चला जाता है।
कार्तिक – बाबा, यह तो मैं जानता हूँ… मगर फिर भी आपकी बहुत याद आ रही थी।
बाबा उसकी आँखों में देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ पूछते हैं।
बाबा – क्यों पुत्र, अचानक मेरी याद क्यों आने लगी?
कार्तिक कुछ पल चुप रहता है, फिर अपने मन की बात कह देता है।
कार्तिक – बाबा, पिछले कुछ हफ्तों से मेरा मन कहीं नहीं लग रहा। ऐसा लगता है जैसे कुछ बुरा होने वाला है, जैसे कोई बड़ी मुसीबत मुझ पर आने वाली है। इसी वजह से मैं बहुत परेशान हूँ।
बाबा मुस्कुराते रहते हैं, जैसे उन्हें पहले से ही सब कुछ पता हो। वे बहती नदी, हिलते पेड़ों और पत्तों की ओर देखते हैं।
बाबा – पुत्र, जैसे इस दुनिया में कोई भी किसी के लिए नहीं रुकता और समय के साथ सब कुछ बदलता रहता है, ठीक उसी तरह तुम्हारा जीवन भी बदलने वाला है। तुमने बचपन से जो दुःख सहे हैं, जो इम्तिहान दिए हैं, अब उनका अंत होने वाला है। कल से तुम्हारे जीवन की एक नई शुरुआत होगी, एक नई कहानी लिखी जाने वाली है।
कार्तिक और उलझ जाता है।
कार्तिक – बाबा, मैं कुछ समझ नहीं पा रहा। दुःख खत्म होना, नया जीवन… मुझे कुछ भी साफ़ समझ में नहीं आ रहा।
बाबा हल्के से हँसते हैं।
बाबा – सब कुछ समझ जाओगे मेरे बच्चे, समय आने पर। मगर एक बात याद रखना—मैंने तुम्हें जो सिखाया है, उसे कभी मत भूलना। मुश्किलों से कभी भागना मत, क्योंकि आने वाला कल तुम्हारे लिए बहुत सी कठिनाइयाँ लेकर आने वाला है।
नदी की लहरों की आवाज़ के बीच बाबा के शब्द कार्तिक के मन में गहराई से उतर जाते हैं।
बाबा – तुम वो जड़ी-बूटी अब भी खा रहे हो न? अब उसे बंद कर दो।
बाबा की यह बात सुनकर कार्तिक थोड़ा चौंक जाता है। उसके चेहरे पर हैरानी साफ़ दिखाई देने लगती है, क्योंकि वही जड़ी-बूटी उसके जीवन का सबसे बड़ा सहारा रही थी।
असल में जब कार्तिक की पहली बार बाबा से मुलाक़ात हुई थी, तब वह बिल्कुल अलग था। एक दुबला-पतला, कमज़ोर-सा लड़का, जिसकी आँखों में डर और लाचारी भरी रहती थी। अनाथ आश्रम में उसे अक्सर सताया जाता था। बड़े बच्चे उसे धक्का देते, मारते-पीटते और उसका मज़ाक उड़ाते थे। वह चुपचाप सब सह लेता, क्योंकि उसके पास कोई अपना नहीं था।
एक दिन जब हद से ज़्यादा उसे परेशान किया गया, तो वह रोता हुआ आश्रम के पीछे फैले उस घने जंगल की ओर भाग गया, जहाँ जाने से सब डरते थे। कार्तिक को उस समय किसी डर की परवाह नहीं थी, बस दर्द था और आँसू थे। उसी जंगल में बाबा ने उसे रोते हुए देखा। वे उसके पास आए, प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और उसकी परेशानी पूछी। कार्तिक ने पहली बार अपना सारा दर्द किसी को बताया। तब बाबा ने उससे कहा कि वह हर हफ्ते उनसे मिलने आया करे। उन्होंने उसे कुछ जड़ी-बूटियाँ दीं और रोज़ उन्हें खाने को कहा, साथ ही रोज़ दौड़ लगाने और कसरत करने की सलाह दी।
कार्तिक ने बाबा की हर बात मानी। वह रोज़ जड़ी-बूटी खाता, दौड़ लगाता और खुद को मज़बूत बनाता गया। साल बीतते गए और देखते-देखते उसका शरीर पत्थर की तरह मज़बूत हो गया। जो बच्चे कभी उसे सताते थे, वही अब उसे देखकर डरने लगे। अनाथ आश्रम में किसी को समझ नहीं आ रहा था कि कार्तिक में इतना बड़ा बदलाव आखिर आया कैसे।
बाबा की बात सुनकर कार्तिक पूछ बैठता है—
कार्तिक – क्यों बाबा? अब क्यों बंद कर दूँ?
बाबा गहरी नज़र से कार्तिक को देखते हैं, मानो उसके भीतर छुपे हर राज़ को पढ़ रहे हों।
बाबा – क्योंकि अब तुम अठारह साल के हो चुके हो, पुत्र। और जो बंदिश मैंने अब तक तुम पर लगाई थी, वह अब समाप्त होने वाली है।
बाबा की यह बात कार्तिक के मन में एक अजीब-सी हलचल पैदा कर देती है। उसे महसूस होने लगता है कि उसकी ज़िंदगी सचमुच किसी बड़े मोड़ पर खड़ी है।
असल में यह बंधिश इस बात की थी कि वह जड़ी-बूटी से कार्तिक के अंदर गर्मी बढ़ती जा रही थी, जिससे उसे किसी भी औरत को देखते ही उसका लंड खड़ा हो जाता था। उसका लंड पहले काफी छोटा था, मगर बाबा की जड़ी-बूटी के कारण अब वह विशालकाय लौड़ा बन चुका था और काफी मोटा भी। अगर कोई औरत एक बार इसे ले ले, तो उसकी चूत फट जाए।
मगर बाबा ने उसे साफ कहा था कि जब तक वह (बाबा) खुद न कहे, तब तक कठिक अपने लंड को हाथ भी न लगाए और किसी औरत को इस नजर से न देखे। इसीलिए बाबा ने उसे कसरत करने और मन को शांत रखने के लिए योग बताया था।
बाबा की बात सुनकर कठिक बहुत खुश हो जाता है, क्योंकि अब उसका लंड उसे बहुत परेशान करने लगा था। बार-बार किसी औरत की गांड या चुचियों को देखकर खड़ा हो जाता, मगर वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पाता। अपने लौड़े को छू भी नहीं सकता था।
मगर जब बाबा ने उसे इस सब बंधिश से आजाद कर दिया, तो वह बहुत खुश हो गया।
कार्तिक — बाबा, सच में अब मैं इस सब से आजाद हूँ ना?
बाबा— हाँ पुत्र, अब तुम इस बंधिश से पूरी तरह आजाद हो। मगर याद रखना, कसरत करना कभी मत छोड़ना।
और तभी बाबा अपने झोले से एक तेल की छोटी शीशी निकालकर देते हैं और कहते हैं—
बाबा — यह लो, इसे तुम अपने लिंग पर हर रात मालिश करना। ज्यादा नहीं, बस दो बूँद हाथ पर लेकर अपने लिंग की मालिश करते रहना।
कार्तिक उनके हाथ से तेल की शीशी ले लेता है।
दोनों थोड़ी देर और बातें करते हैं और फिर अपने-अपने रास्ते चल देते हैं।
Nice stat..अध्याय 1
घना जंगल, चारों ओर सन्नाटा, ऊपर आसमान में आधा छुपा हुआ चाँद और सामने धीरे-धीरे बहती नदी। उसी नदी के किनारे एक लड़का चट्टान पर बैठा हुआ था। तेज़ हवा उसके बालों को हिला रही थी लेकिन उसके चेहरे पर कोई हलचल नहीं थी। उसकी आँखें नदी की लहरों पर टिकी थीं, पर उसका मन कहीं बहुत दूर भटक रहा था।
“मैं हूँ कौन…?” “मेरे माँ-बाप ने मुझे क्यों छोड़ दिया…?” “आख़िर ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि मुझे अकेला छोड़ना पड़ा…?” ऐसे न जाने कितने सवाल उसके मन में उठ रहे थे और हर सवाल के साथ उसका दिल और भारी होता जा रहा था।
उस लड़के को दुनिया कार्तिक के नाम से जानती थी, लेकिन असल में यह उसका दिया हुआ नाम नहीं था। जब से उसे होश आया था, उसने खुद को एक अनाथ आश्रम में ही पाया था। न माँ की ममता याद थी, न पिता का साया—बस सफ़ेद दीवारें, लोहे के पलंग और अनाथ बच्चों की खामोश ज़िंदगियाँ। उसे अपना असली नाम तक नहीं पता था। आश्रम के लोगों ने उसे कार्तिक कहकर बुलाना शुरू किया और धीरे-धीरे वही नाम उसकी पहचान बन गया। उसने भी उसी नाम को अपना लिया। कार्तिक कद में लंबा था, छह फ़ुट से भी ऊँचा, रंग साँवला, शरीर मज़बूत। रोज़ कसरत करना उसकी आदत थी, जिससे वह बाहर से ही नहीं, अंदर से भी मज़बूत बन चुका था। लेकिन उसकी असली ताक़त उसके शरीर में नहीं, उसके भीतर थी—दर्द सहने की आदत, चुप रहकर सब कुछ झेल लेने की क्षमता और सवालों के साथ जीने की मजबूरी। आज वही कार्तिक जंगल में बैठा था, शहर और आश्रम से बहुत दूर, क्योंकि कभी-कभी इंसान को अपने सवालों के जवाब लोगों से नहीं, ख़ामोशी से मिलते हैं। और यही कार्तिक की कहानी की शुरुआत थी।
घने जंगल के उसी किनारे कार्तिक बैठा इन्हीं विचारों में डूबा हुआ था कि तभी पीछे से एक शांत लेकिन गूंजती हुई आवाज़ आई—“तुम यहाँ हो…?” आवाज़ सुनते ही कार्तिक चौंक गया और तुरंत पीछे मुड़कर देखा। सामने वही परिचित चेहरा था—एक बाबा, लंबी सफ़ेद दाढ़ी, गले में माला, नीचे धोती और ऊपर केसरिया रंग का कुर्ता, बिल्कुल वैसे ही जैसे साधु या पंडित पहनते हैं। कार्तिक उन्हें अच्छी तरह जानता था। इन दोनों की पहली मुलाक़ात पाँच साल पहले इसी जंगल में, इसी जगह हुई थी। तब से यह स्थान उनके मिलने का साक्षी बन गया था। कार्तिक हर हफ्ते मंगलवार को यहाँ आता था, क्योंकि इसी दिन बाबा से मुलाक़ात हो पाती थी और उनसे बात करके उसका मन हल्का हो जाता था। मगर पिछले एक महीने से बाबा नहीं आए थे। कार्तिक हर मंगलवार आता रहा, इंतज़ार करता रहा, लेकिन मुलाक़ात नहीं हो पाई थी। आज इतने दिनों बाद बाबा को सामने देखकर कार्तिक के चेहरे पर खुशी साफ़ झलक उठी। वह तुरंत उठा, उनके पास गया और आदर से उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया। बाबा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। असल में बाबा कोई साधारण साधु नहीं थे, वे एक बहुत बड़े ज्योतिषी थे। उन्हें यह भली-भाँति पता रहता था कि किसी के जीवन में आगे क्या होने वाला है—अच्छा या बुरा। कार्तिक को बाबा इसलिए भी बहुत पसंद थे, क्योंकि उनसे बात करके उसका मन हल्का हो जाता था। वह अपने दिल का सारा दर्द, अपने सवाल, अपनी उलझनें बिना डर उनके सामने रख देता था और बाबा उसे जीवन के नए-नए रास्ते, नए अर्थ और जीने की नई समझ देते थे। आज की यह मुलाक़ात कार्तिक के लिए सिर्फ़ खुशी नहीं थी, बल्कि उसके जीवन में आने वाले किसी बड़े मोड़ का संकेत भी थी।
कार्तिक जैसे ही बाबा के चरणों में झुककर आशीर्वाद लेता है, बाबा मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखते हैं और कहते हैं.
बाबा – सदा खुश रहो, पुत्र… और अपना कल्याण करते रहो।
बाबा की यह बात सुनकर कार्तिक थोड़ा रुक जाता है। “अपना कल्याण करते रहो” यह पंक्ति उसके मन में अटक जाती है।
कार्तिक – बाबा, आप कहाँ चले गए थे? जानते हो, मैं पिछले एक महीने से हर हफ्ते आपका इंतज़ार कर रहा था।
बाबा मुस्कुराते हुए कार्तिक के चेहरे पर स्नेह से हाथ फेरते हैं।
बाबा – पुत्र, तुम जानते ही हो, साधु कभी एक जगह नहीं ठहरता। आज यहाँ भिक्षा लेने आता है, तो कल कहीं और चला जाता है।
कार्तिक – बाबा, यह तो मैं जानता हूँ… मगर फिर भी आपकी बहुत याद आ रही थी।
बाबा उसकी आँखों में देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ पूछते हैं।
बाबा – क्यों पुत्र, अचानक मेरी याद क्यों आने लगी?
कार्तिक कुछ पल चुप रहता है, फिर अपने मन की बात कह देता है।
कार्तिक – बाबा, पिछले कुछ हफ्तों से मेरा मन कहीं नहीं लग रहा। ऐसा लगता है जैसे कुछ बुरा होने वाला है, जैसे कोई बड़ी मुसीबत मुझ पर आने वाली है। इसी वजह से मैं बहुत परेशान हूँ।
बाबा मुस्कुराते रहते हैं, जैसे उन्हें पहले से ही सब कुछ पता हो। वे बहती नदी, हिलते पेड़ों और पत्तों की ओर देखते हैं।
बाबा – पुत्र, जैसे इस दुनिया में कोई भी किसी के लिए नहीं रुकता और समय के साथ सब कुछ बदलता रहता है, ठीक उसी तरह तुम्हारा जीवन भी बदलने वाला है। तुमने बचपन से जो दुःख सहे हैं, जो इम्तिहान दिए हैं, अब उनका अंत होने वाला है। कल से तुम्हारे जीवन की एक नई शुरुआत होगी, एक नई कहानी लिखी जाने वाली है।
कार्तिक और उलझ जाता है।
कार्तिक – बाबा, मैं कुछ समझ नहीं पा रहा। दुःख खत्म होना, नया जीवन… मुझे कुछ भी साफ़ समझ में नहीं आ रहा।
बाबा हल्के से हँसते हैं।
बाबा – सब कुछ समझ जाओगे मेरे बच्चे, समय आने पर। मगर एक बात याद रखना—मैंने तुम्हें जो सिखाया है, उसे कभी मत भूलना। मुश्किलों से कभी भागना मत, क्योंकि आने वाला कल तुम्हारे लिए बहुत सी कठिनाइयाँ लेकर आने वाला है।
नदी की लहरों की आवाज़ के बीच बाबा के शब्द कार्तिक के मन में गहराई से उतर जाते हैं।
बाबा – तुम वो जड़ी-बूटी अब भी खा रहे हो न? अब उसे बंद कर दो।
बाबा की यह बात सुनकर कार्तिक थोड़ा चौंक जाता है। उसके चेहरे पर हैरानी साफ़ दिखाई देने लगती है, क्योंकि वही जड़ी-बूटी उसके जीवन का सबसे बड़ा सहारा रही थी।
असल में जब कार्तिक की पहली बार बाबा से मुलाक़ात हुई थी, तब वह बिल्कुल अलग था। एक दुबला-पतला, कमज़ोर-सा लड़का, जिसकी आँखों में डर और लाचारी भरी रहती थी। अनाथ आश्रम में उसे अक्सर सताया जाता था। बड़े बच्चे उसे धक्का देते, मारते-पीटते और उसका मज़ाक उड़ाते थे। वह चुपचाप सब सह लेता, क्योंकि उसके पास कोई अपना नहीं था।
एक दिन जब हद से ज़्यादा उसे परेशान किया गया, तो वह रोता हुआ आश्रम के पीछे फैले उस घने जंगल की ओर भाग गया, जहाँ जाने से सब डरते थे। कार्तिक को उस समय किसी डर की परवाह नहीं थी, बस दर्द था और आँसू थे। उसी जंगल में बाबा ने उसे रोते हुए देखा। वे उसके पास आए, प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और उसकी परेशानी पूछी। कार्तिक ने पहली बार अपना सारा दर्द किसी को बताया। तब बाबा ने उससे कहा कि वह हर हफ्ते उनसे मिलने आया करे। उन्होंने उसे कुछ जड़ी-बूटियाँ दीं और रोज़ उन्हें खाने को कहा, साथ ही रोज़ दौड़ लगाने और कसरत करने की सलाह दी।
कार्तिक ने बाबा की हर बात मानी। वह रोज़ जड़ी-बूटी खाता, दौड़ लगाता और खुद को मज़बूत बनाता गया। साल बीतते गए और देखते-देखते उसका शरीर पत्थर की तरह मज़बूत हो गया। जो बच्चे कभी उसे सताते थे, वही अब उसे देखकर डरने लगे। अनाथ आश्रम में किसी को समझ नहीं आ रहा था कि कार्तिक में इतना बड़ा बदलाव आखिर आया कैसे।
बाबा की बात सुनकर कार्तिक पूछ बैठता है—
कार्तिक – क्यों बाबा? अब क्यों बंद कर दूँ?
बाबा गहरी नज़र से कार्तिक को देखते हैं, मानो उसके भीतर छुपे हर राज़ को पढ़ रहे हों।
बाबा – क्योंकि अब तुम अठारह साल के हो चुके हो, पुत्र। और जो बंदिश मैंने अब तक तुम पर लगाई थी, वह अब समाप्त होने वाली है।
बाबा की यह बात कार्तिक के मन में एक अजीब-सी हलचल पैदा कर देती है। उसे महसूस होने लगता है कि उसकी ज़िंदगी सचमुच किसी बड़े मोड़ पर खड़ी है।
असल में यह बंधिश इस बात की थी कि वह जड़ी-बूटी से कार्तिक के अंदर गर्मी बढ़ती जा रही थी, जिससे उसे किसी भी औरत को देखते ही उसका लंड खड़ा हो जाता था। उसका लंड पहले काफी छोटा था, मगर बाबा की जड़ी-बूटी के कारण अब वह विशालकाय लौड़ा बन चुका था और काफी मोटा भी। अगर कोई औरत एक बार इसे ले ले, तो उसकी चूत फट जाए।
मगर बाबा ने उसे साफ कहा था कि जब तक वह (बाबा) खुद न कहे, तब तक कठिक अपने लंड को हाथ भी न लगाए और किसी औरत को इस नजर से न देखे। इसीलिए बाबा ने उसे कसरत करने और मन को शांत रखने के लिए योग बताया था।
बाबा की बात सुनकर कठिक बहुत खुश हो जाता है, क्योंकि अब उसका लंड उसे बहुत परेशान करने लगा था। बार-बार किसी औरत की गांड या चुचियों को देखकर खड़ा हो जाता, मगर वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पाता। अपने लौड़े को छू भी नहीं सकता था।
मगर जब बाबा ने उसे इस सब बंधिश से आजाद कर दिया, तो वह बहुत खुश हो गया।
कार्तिक — बाबा, सच में अब मैं इस सब से आजाद हूँ ना?
बाबा— हाँ पुत्र, अब तुम इस बंधिश से पूरी तरह आजाद हो। मगर याद रखना, कसरत करना कभी मत छोड़ना।
और तभी बाबा अपने झोले से एक तेल की छोटी शीशी निकालकर देते हैं और कहते हैं—
बाबा — यह लो, इसे तुम अपने लिंग पर हर रात मालिश करना। ज्यादा नहीं, बस दो बूँद हाथ पर लेकर अपने लिंग की मालिश करते रहना।
कार्तिक उनके हाथ से तेल की शीशी ले लेता है।
दोनों थोड़ी देर और बातें करते हैं और फिर अपने-अपने रास्ते चल देते हैं।
Nice and beautiful update....अध्याय 1
घना जंगल, चारों ओर सन्नाटा, ऊपर आसमान में आधा छुपा हुआ चाँद और सामने धीरे-धीरे बहती नदी। उसी नदी के किनारे एक लड़का चट्टान पर बैठा हुआ था। तेज़ हवा उसके बालों को हिला रही थी लेकिन उसके चेहरे पर कोई हलचल नहीं थी। उसकी आँखें नदी की लहरों पर टिकी थीं, पर उसका मन कहीं बहुत दूर भटक रहा था।
“मैं हूँ कौन…?” “मेरे माँ-बाप ने मुझे क्यों छोड़ दिया…?” “आख़िर ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि मुझे अकेला छोड़ना पड़ा…?” ऐसे न जाने कितने सवाल उसके मन में उठ रहे थे और हर सवाल के साथ उसका दिल और भारी होता जा रहा था।
उस लड़के को दुनिया कार्तिक के नाम से जानती थी, लेकिन असल में यह उसका दिया हुआ नाम नहीं था। जब से उसे होश आया था, उसने खुद को एक अनाथ आश्रम में ही पाया था। न माँ की ममता याद थी, न पिता का साया—बस सफ़ेद दीवारें, लोहे के पलंग और अनाथ बच्चों की खामोश ज़िंदगियाँ। उसे अपना असली नाम तक नहीं पता था। आश्रम के लोगों ने उसे कार्तिक कहकर बुलाना शुरू किया और धीरे-धीरे वही नाम उसकी पहचान बन गया। उसने भी उसी नाम को अपना लिया। कार्तिक कद में लंबा था, छह फ़ुट से भी ऊँचा, रंग साँवला, शरीर मज़बूत। रोज़ कसरत करना उसकी आदत थी, जिससे वह बाहर से ही नहीं, अंदर से भी मज़बूत बन चुका था। लेकिन उसकी असली ताक़त उसके शरीर में नहीं, उसके भीतर थी—दर्द सहने की आदत, चुप रहकर सब कुछ झेल लेने की क्षमता और सवालों के साथ जीने की मजबूरी। आज वही कार्तिक जंगल में बैठा था, शहर और आश्रम से बहुत दूर, क्योंकि कभी-कभी इंसान को अपने सवालों के जवाब लोगों से नहीं, ख़ामोशी से मिलते हैं। और यही कार्तिक की कहानी की शुरुआत थी।
घने जंगल के उसी किनारे कार्तिक बैठा इन्हीं विचारों में डूबा हुआ था कि तभी पीछे से एक शांत लेकिन गूंजती हुई आवाज़ आई—“तुम यहाँ हो…?” आवाज़ सुनते ही कार्तिक चौंक गया और तुरंत पीछे मुड़कर देखा। सामने वही परिचित चेहरा था—एक बाबा, लंबी सफ़ेद दाढ़ी, गले में माला, नीचे धोती और ऊपर केसरिया रंग का कुर्ता, बिल्कुल वैसे ही जैसे साधु या पंडित पहनते हैं। कार्तिक उन्हें अच्छी तरह जानता था। इन दोनों की पहली मुलाक़ात पाँच साल पहले इसी जंगल में, इसी जगह हुई थी। तब से यह स्थान उनके मिलने का साक्षी बन गया था। कार्तिक हर हफ्ते मंगलवार को यहाँ आता था, क्योंकि इसी दिन बाबा से मुलाक़ात हो पाती थी और उनसे बात करके उसका मन हल्का हो जाता था। मगर पिछले एक महीने से बाबा नहीं आए थे। कार्तिक हर मंगलवार आता रहा, इंतज़ार करता रहा, लेकिन मुलाक़ात नहीं हो पाई थी। आज इतने दिनों बाद बाबा को सामने देखकर कार्तिक के चेहरे पर खुशी साफ़ झलक उठी। वह तुरंत उठा, उनके पास गया और आदर से उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया। बाबा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। असल में बाबा कोई साधारण साधु नहीं थे, वे एक बहुत बड़े ज्योतिषी थे। उन्हें यह भली-भाँति पता रहता था कि किसी के जीवन में आगे क्या होने वाला है—अच्छा या बुरा। कार्तिक को बाबा इसलिए भी बहुत पसंद थे, क्योंकि उनसे बात करके उसका मन हल्का हो जाता था। वह अपने दिल का सारा दर्द, अपने सवाल, अपनी उलझनें बिना डर उनके सामने रख देता था और बाबा उसे जीवन के नए-नए रास्ते, नए अर्थ और जीने की नई समझ देते थे। आज की यह मुलाक़ात कार्तिक के लिए सिर्फ़ खुशी नहीं थी, बल्कि उसके जीवन में आने वाले किसी बड़े मोड़ का संकेत भी थी।
कार्तिक जैसे ही बाबा के चरणों में झुककर आशीर्वाद लेता है, बाबा मुस्कुराते हुए उसके सिर पर हाथ रखते हैं और कहते हैं.
बाबा – सदा खुश रहो, पुत्र… और अपना कल्याण करते रहो।
बाबा की यह बात सुनकर कार्तिक थोड़ा रुक जाता है। “अपना कल्याण करते रहो” यह पंक्ति उसके मन में अटक जाती है।
कार्तिक – बाबा, आप कहाँ चले गए थे? जानते हो, मैं पिछले एक महीने से हर हफ्ते आपका इंतज़ार कर रहा था।
बाबा मुस्कुराते हुए कार्तिक के चेहरे पर स्नेह से हाथ फेरते हैं।
बाबा – पुत्र, तुम जानते ही हो, साधु कभी एक जगह नहीं ठहरता। आज यहाँ भिक्षा लेने आता है, तो कल कहीं और चला जाता है।
कार्तिक – बाबा, यह तो मैं जानता हूँ… मगर फिर भी आपकी बहुत याद आ रही थी।
बाबा उसकी आँखों में देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ पूछते हैं।
बाबा – क्यों पुत्र, अचानक मेरी याद क्यों आने लगी?
कार्तिक कुछ पल चुप रहता है, फिर अपने मन की बात कह देता है।
कार्तिक – बाबा, पिछले कुछ हफ्तों से मेरा मन कहीं नहीं लग रहा। ऐसा लगता है जैसे कुछ बुरा होने वाला है, जैसे कोई बड़ी मुसीबत मुझ पर आने वाली है। इसी वजह से मैं बहुत परेशान हूँ।
बाबा मुस्कुराते रहते हैं, जैसे उन्हें पहले से ही सब कुछ पता हो। वे बहती नदी, हिलते पेड़ों और पत्तों की ओर देखते हैं।
बाबा – पुत्र, जैसे इस दुनिया में कोई भी किसी के लिए नहीं रुकता और समय के साथ सब कुछ बदलता रहता है, ठीक उसी तरह तुम्हारा जीवन भी बदलने वाला है। तुमने बचपन से जो दुःख सहे हैं, जो इम्तिहान दिए हैं, अब उनका अंत होने वाला है। कल से तुम्हारे जीवन की एक नई शुरुआत होगी, एक नई कहानी लिखी जाने वाली है।
कार्तिक और उलझ जाता है।
कार्तिक – बाबा, मैं कुछ समझ नहीं पा रहा। दुःख खत्म होना, नया जीवन… मुझे कुछ भी साफ़ समझ में नहीं आ रहा।
बाबा हल्के से हँसते हैं।
बाबा – सब कुछ समझ जाओगे मेरे बच्चे, समय आने पर। मगर एक बात याद रखना—मैंने तुम्हें जो सिखाया है, उसे कभी मत भूलना। मुश्किलों से कभी भागना मत, क्योंकि आने वाला कल तुम्हारे लिए बहुत सी कठिनाइयाँ लेकर आने वाला है।
नदी की लहरों की आवाज़ के बीच बाबा के शब्द कार्तिक के मन में गहराई से उतर जाते हैं।
बाबा – तुम वो जड़ी-बूटी अब भी खा रहे हो न? अब उसे बंद कर दो।
बाबा की यह बात सुनकर कार्तिक थोड़ा चौंक जाता है। उसके चेहरे पर हैरानी साफ़ दिखाई देने लगती है, क्योंकि वही जड़ी-बूटी उसके जीवन का सबसे बड़ा सहारा रही थी।
असल में जब कार्तिक की पहली बार बाबा से मुलाक़ात हुई थी, तब वह बिल्कुल अलग था। एक दुबला-पतला, कमज़ोर-सा लड़का, जिसकी आँखों में डर और लाचारी भरी रहती थी। अनाथ आश्रम में उसे अक्सर सताया जाता था। बड़े बच्चे उसे धक्का देते, मारते-पीटते और उसका मज़ाक उड़ाते थे। वह चुपचाप सब सह लेता, क्योंकि उसके पास कोई अपना नहीं था।
एक दिन जब हद से ज़्यादा उसे परेशान किया गया, तो वह रोता हुआ आश्रम के पीछे फैले उस घने जंगल की ओर भाग गया, जहाँ जाने से सब डरते थे। कार्तिक को उस समय किसी डर की परवाह नहीं थी, बस दर्द था और आँसू थे। उसी जंगल में बाबा ने उसे रोते हुए देखा। वे उसके पास आए, प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और उसकी परेशानी पूछी। कार्तिक ने पहली बार अपना सारा दर्द किसी को बताया। तब बाबा ने उससे कहा कि वह हर हफ्ते उनसे मिलने आया करे। उन्होंने उसे कुछ जड़ी-बूटियाँ दीं और रोज़ उन्हें खाने को कहा, साथ ही रोज़ दौड़ लगाने और कसरत करने की सलाह दी।
कार्तिक ने बाबा की हर बात मानी। वह रोज़ जड़ी-बूटी खाता, दौड़ लगाता और खुद को मज़बूत बनाता गया। साल बीतते गए और देखते-देखते उसका शरीर पत्थर की तरह मज़बूत हो गया। जो बच्चे कभी उसे सताते थे, वही अब उसे देखकर डरने लगे। अनाथ आश्रम में किसी को समझ नहीं आ रहा था कि कार्तिक में इतना बड़ा बदलाव आखिर आया कैसे।
बाबा की बात सुनकर कार्तिक पूछ बैठता है—
कार्तिक – क्यों बाबा? अब क्यों बंद कर दूँ?
बाबा गहरी नज़र से कार्तिक को देखते हैं, मानो उसके भीतर छुपे हर राज़ को पढ़ रहे हों।
बाबा – क्योंकि अब तुम अठारह साल के हो चुके हो, पुत्र। और जो बंदिश मैंने अब तक तुम पर लगाई थी, वह अब समाप्त होने वाली है।
बाबा की यह बात कार्तिक के मन में एक अजीब-सी हलचल पैदा कर देती है। उसे महसूस होने लगता है कि उसकी ज़िंदगी सचमुच किसी बड़े मोड़ पर खड़ी है।
असल में यह बंधिश इस बात की थी कि वह जड़ी-बूटी से कार्तिक के अंदर गर्मी बढ़ती जा रही थी, जिससे उसे किसी भी औरत को देखते ही उसका लंड खड़ा हो जाता था। उसका लंड पहले काफी छोटा था, मगर बाबा की जड़ी-बूटी के कारण अब वह विशालकाय लौड़ा बन चुका था और काफी मोटा भी। अगर कोई औरत एक बार इसे ले ले, तो उसकी चूत फट जाए।
मगर बाबा ने उसे साफ कहा था कि जब तक वह (बाबा) खुद न कहे, तब तक कठिक अपने लंड को हाथ भी न लगाए और किसी औरत को इस नजर से न देखे। इसीलिए बाबा ने उसे कसरत करने और मन को शांत रखने के लिए योग बताया था।
बाबा की बात सुनकर कठिक बहुत खुश हो जाता है, क्योंकि अब उसका लंड उसे बहुत परेशान करने लगा था। बार-बार किसी औरत की गांड या चुचियों को देखकर खड़ा हो जाता, मगर वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पाता। अपने लौड़े को छू भी नहीं सकता था।
मगर जब बाबा ने उसे इस सब बंधिश से आजाद कर दिया, तो वह बहुत खुश हो गया।
कार्तिक — बाबा, सच में अब मैं इस सब से आजाद हूँ ना?
बाबा— हाँ पुत्र, अब तुम इस बंधिश से पूरी तरह आजाद हो। मगर याद रखना, कसरत करना कभी मत छोड़ना।
और तभी बाबा अपने झोले से एक तेल की छोटी शीशी निकालकर देते हैं और कहते हैं—
बाबा — यह लो, इसे तुम अपने लिंग पर हर रात मालिश करना। ज्यादा नहीं, बस दो बूँद हाथ पर लेकर अपने लिंग की मालिश करते रहना।
कार्तिक उनके हाथ से तेल की शीशी ले लेता है।
दोनों थोड़ी देर और बातें करते हैं और फिर अपने-अपने रास्ते चल देते हैं।