ये अपडेट तो सीधे दिमाग में चैंबर फिट कर देता है। अलार्म बजते ही ऐसा लगा जैसे मेरे कान में भी बीप चालू हो गई हो। परफ़्लुओरो-क्या-नाम-था-वो

वाला लिक्विड पढ़ते-पढ़ते ही साँस अपने आप shallow हो गई। घुटन।
और जिस तरह गिरता है, खाँसता है, फर्श से चिपक जाता है—पूरी “newborn but trauma ke saath” vibe।
सीन ऐसा है कि बंदा बोले:
“भाई उठ तो गया हूँ, पर ज़िंदगी से नहीं”
अब यूनिट-2…
रेड लाइट। कोई ब्लिंक नहीं।
और फिर स्क्रीन: STATUS: TERMINATED
बस यहीं पे कहानी ने कहा— “ले, संभाल ले अपने जज़्बात।”
“वर्ष 34” वाली लाइन तो अलग ही ज़हर है। एकदम casually डाल दी, जैसे सिस्टम बोल रहा हो:
“हाँ, ये तो कब का मर चुका है, तुझे अभी पता चला।”
और आख़िरी लाइन—
“वो मर गया था… जब मैं सो रहा था।”
भाई ये लाइन नहीं है, ये emotional damage है। कोई bgm नहीं, कोई ड्रामा नहीं—सीधा खालीपन।
सच्ची बात:
ये अपडेट पढ़के लगा तुम sci-fi नहीं लिख रही,
तुम trauma को future में रखकर लिख रही हो।
अगला अपडेट जल्दी डाल, वरना मैं खुद यूनिट-3 में जाकर सो जाऊँगा।