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Incestमाँ और बेटे ने घर बसाया(सच्ची घटनाओं पर आधारित)
मुझे अंदर ही अंदर यह महसूस हुआ कि मैं वाकई बहुत खुशनसीब हूँ। मुझे पत्नी के रूप में ऐसी लड़की मिली जो बचपन से आज तक मुझे इतना प्यार करती आई है और आज भी उनके दिल में वही शिद्दत है। मैं जानता हूँ कि वह ज़िंदगी भर मुझे इसी तरह टूटकर चाहेगी। मेरी सिंगल पैरेंट होने की वजह से शायद इसीलिए उन्होंने मुझे हमेशा सबसे ज्यादा प्यार दिया। उनके दिल में हमेशा मेरा ही बसेरा रहा और उनके सारे सुख-दुःख बस मेरे ही इर्द-गिर्द घूमते थे। आज नसीब हमें ज़िंदगी के उस मोड़ पर ले आया है, जहाँ हम सगे माँ - बेटा होने के बावजूद दुनिया के सबसे मज़बूत और खूबसूरत बंधन में बंध गए हैं।
माँ - बेटे के उस अटूट रिश्ते से तो हम पहले ही जुड़े थे, लेकिन आज इस नए बंधन ने हम दोनों को और भी ज्यादा मजबूती से एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया है। माँ के लिए मेरे मन में जो प्यार था, उसमें अब एक पति का समर्पण भी जुड़ गया था और मैंने अपने दिल के सारे अहसास निचोड़कर उनके नाम कर दिया। उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी में जमा किया हुआ सारा प्यार अपने नए पति के लिए लुटा दिया। अपने 'बेटे' के लिए जो मोहब्बत थी, उसमें पत्नी वाला हक़ मिलाकर उन्होंने अपना दिल पूरी तरह मेरे सामने खोलकर रख दिया था।
उन्होंने खुद को, अपने तन-मन और अपनी रूह को पूरी तरह अपने बेटे, अपने पति के पास सरेंडर कर दिया था। उनके सामने खड़े होकर उसकी आँखों में देखते हुए मैं यह सब कुछ गहराई से महसूस कर रहा था। उस भीड़ भरे स्टेशन और ट्रेन के शोर-शराबे के बीच, हम बस कुछ पल यूँ ही नज़रें मिलाकर एक-दूसरे से दिल की हज़ारों बातें कह रहे थे।
जब हम ट्रेन में चढ़े थे, तो कंपार्टमेंट मुसाफिरों से खचाखच भरा था। लोग जल्दी-जल्दी अपना डिनर निपटाकर सो गए। मेरा और माँ का बर्थ ऊपर-नीचे था। मैं ऊपर जाकर लेट गया और माँ नीचे चादर ओढ़कर सो गई। शादी के बाद एक पति-पत्नी की पहली रात, जो एक साथ एक ही छत के नीचे गुज़रनी चाहिए थी, वह ट्रेन के इन अलग-अलग बर्थ पर गुज़र रही थी। शायद ही किसी के साथ ऐसा होता होगा, पर हमारे साथ तो खैर बहुत कुछ ऐसा हो रहा था जो आम नहीं था।
मैंने एक बार ऊपर से झुककर नीचे माँ को देखा। वह मुड़कर मेरी ही बर्थ की तरफ देखते हुए लेटी थी। जैसे ही हमारी नज़रें मिलीं, उनके होंठों पर एक कोमल सी मुस्कान तैर गई। मैं बस उन्हें एकटक देखता रहा। उन्होंने अपनी चादर को थोड़ा और गले तक खींच लिया, जैसे उस गर्माहट में खुद को समेटना चाह रही हो, और फिर अपनी आँखें मूंद लीं।
थोड़ी देर बाद जब उन्होंने दोबारा आँखें खोलीं, तो हमारी नज़रें फिर से उलझ गईं। माथे पर वह लाल बिंदी और होंठों की वह प्यारी सी मुस्कुराहट—शादी के इस रूप ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया था। वह बिल्कुल उस अल्हड़ और कुंवारी लड़की जैसी लग रही थी जिसकी अभी-अभी शादी हुई हो और जो अपने पति को पहली बार एक अलग हक़ से देख रही हो। फिर उन्होंने अपना चेहरा दाईं तरफ घुमा लिया और आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगी।
अगली सुबह जब हमारी नींद खुली, तो पिछले स्टेशन पर कुछ मुसाफिर पहले ही उतर चुके थे। इस वजह से कोच अब थोड़ा खाली और शांत लग रहा था। हमारे सामने वाली बर्थ पर बस एक अधेड़ उम्र के अंकल बैठे थे। तभी ट्रेन में चाय वाला आया, जो गरम पानी का फ्लास्क, चीनी के पैकेट, मिल्क पाउडर और टी-बैग्स दे गया।
मैंने जैसे ही चाय बनाना शुरू किया, माँ ने धीरे से टोकते हुए कहा, "लाइए, मुझे दीजिए। मैं बनाती हूँ।" और वह चाय बनाने लगी। मेरी पत्नी बनने के बाद भी, उनके व्यवहार में वही पुरानी फिक्र और ममता थी जो वह बचपन से मुझे देती आई थी। मैंने भी मन ही मन खुद से वादा किया कि पति बनने के बाद भी उनके लिए मेरा सम्मान और केयर कभी कम नहीं होगी।
हम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बस एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे। यह वह पहली सुबह थी जो हर जोड़े की ज़िंदगी में सिर्फ एक बार आती है—शादी के ठीक अगले दिन की पहली सुबह। हम उन बेशकीमती पलों को अपने दिल में कैद कर रहे थे। हमारे सामने बैठे अंकल ने हमसे परिचय किया और जब उन्हें पता चला कि हम नई-नई शादी करके मेरी जॉब वाली जगह जा रहे हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हमारी जोड़ी बहुत खूबसूरत है।
बातों-बातों में उन्होंने पूछ लिया, "लव मैरिज है या अरेंज्ड?"
यह सवाल सुनते ही माँ और मैं कुछ पलों के लिए खामोश हो गए। उन्हें कैसे समझाते कि हमारा रिश्ता क्या है? मैंने तुरंत बात संभालते हुए कहा, "अरेंज्ड मैरिज है।"
मेरी बात सुनकर वह व्यक्ति बोले, "बहुत कम लोगों में अरेंज्ड मैरिज के बाद इतना प्यार झलकता है, जितना आप दोनों को देखकर लग रहा है।"
मैं और माँ एक-दूसरे को देखने लगे। मन ही मन हमने सोचा कि इन्हें क्या पता कि नसीब के किन फेरों ने हमें आज यहाँ लाकर खड़ा किया है। हम एक ऐसा जोड़ा थे, जैसा शायद ही दुनिया में कहीं और मिले। हमारे बीच जो प्यार था, वह दुनिया के किसी भी बंधन से कहीं ज़्यादा गहरा और मज़बूत था।
कुछ घंटों के सफर के बाद हम मुंबई पहुँच गए—यह वही शहर है जिसे अब से हम अपना घर कहेंगे और यहीं अपनी एक नई दुनिया बसाएंगे। जैसे ही ट्रेन रुकी, मैं और माँ प्लेटफॉर्म पर उतरे। मैंने माँ को उतरने में मदद करने के लिए हाथ बढ़ाया, उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ा और नीचे उतर आई।
उतरने के बाद माँ के चेहरे पर वह मुस्कुराहट बरकरार थी, पर अचानक कुछ याद करके उन्होंने मेरे हाथ पर अपनी ग्रिप ढीली कर दी। वह थोड़ा शर्माई और मेरा हाथ छोड़कर अपना हाथ पीछे खींच लिया। फिर वह नज़रें घुमाकर प्लेटफॉर्म की दूसरी तरफ देखने लगी। मैं अब भी उन्हें ही देख रहा था; माँ आज बहुत खुश लग रही थी। उनके होंठों पर जो मुस्कान सजी थी, उसे ताउम्र देखने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ।
हमने टैक्सी में अपना लगेज लोड किया और अपने घर की तरफ निकल पड़े—वह घर जो आज से 'हमारा' होने वाला था। प्लेटफॉर्म पर माँ ने जो मेरा हाथ छोड़ा, उनके बाद उन्होंने फिर मेरा हाथ नहीं पकड़ा। मेरा दिल चाह रहा था कि वह मेरा बाज़ू पकड़कर मेरे एकदम करीब होकर चले, पर वह पास होकर भी मेरे स्पर्श से दूर रह रही थी। शायद उनके मन में भी मेरे जैसी ही कोई बेचैनी और अनुभूति हो रही होगी। मेरे ही जैसा एक तूफ़ान उनके अंदर भी उठा होगा। एक ऐसा अद्भुत सुख, जो न मैंने कभी पाया और जिसे पाकर भी वह ज़िंदगी में कभी उसका ठीक से आनंद नहीं ले पाई थी—उस सुख को पाने के लिए शायद उनका मन भी तरस रहा होगा। और शायद इसीलिए, वह खुद को काबू में रखने के लिए मुझसे थोड़ी दूरी बनाकर रख रही थी।
टैक्सी की पिछली सीट पर माँ खिड़की के पास बैठकर बाहर की तरफ देख रही थी। वह इस नई जगह और नई ज़िंदगी में खुद को ढालते हुए, इस नए रिश्ते को अपने दिल में और भी मजबूती से बसा रही थी। रास्ते भर मैं उन्हें बताता रहा कि हमें कितनी दूर जाना है, मार्केट किस तरफ है और मेरा ऑफिस किधर पड़ता है। वह बस बीच-बीच में एक मुस्कुराहट के साथ मेरी तरफ देखती और फिर बाहर की तरफ नज़रें घुमा लेती।
खिड़की की तरफ उनका बायाँ हाथ उनकी गोद में रखा था और दाहिना हाथ मेरे और उनके बीच की खाली सीट पर। मेरा मन बुरी तरह मचल रहा था कि बस उनका वह हाथ अपने हाथ में ले लूँ। बातों-बातों में मन में यह ख्याल तो सौ बार आया, पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। हम अब पति-पत्नी थे, पर फिर भी अंदर एक अजीब सा संकोच काम कर रहा था। इतने सालों तक जिस औरत को मैंने सिर्फ एक माँ की नज़र से देखा और छुआ, आज उसे अपनी पत्नी के रूप में देख तो रहा था, मगर छूने में एक झिझक आड़े आ रही थी। शायद उनके अंदर भी अपने बेटे को अब पति के रूप में अपनाने और छूने में वैसी ही शर्म होगी।
अब मुझे एहसास हो रहा था कि पिछले 6 सालों से कल्पनाओं में उनके साथ मिलन के जो सपने मैंने देखे थे, हकीकत की ज़मीन पर आकर उन्हें पूरा करना इतना सहज और आसान नहीं था। माँ जितनी बार मेरी तरफ देखती, मेरे सीने के अंदर एक अजीब सी झनझनाहट होने लगती। खिड़की से आती हवा की वजह से जब वह मेरी तरफ देखती, तो उनकी सुंदर आँखें थोड़ी भिंच सी जातीं। फिर भी उनके चेहरे की मुस्कान और आँखों में एक गहरा प्यार साफ़ झलक रहा था।
मैंने मन ही मन थोड़ी हिम्मत जुटाई और सामने की तरफ देखते हुए अपना बायाँ हाथ बढ़ाकर उनके दाहिने हाथ पर रख दिया। मेरी उंगलियाँ बस उनकी उंगलियों को छू भर रही थीं। तभी माँ ने बाहर देखते हुए अपना हाथ थोड़ा अपनी ओर खींच लिया। मैंने हार नहीं मानी और दोबारा हाथ बढ़ाकर उनकी उंगलियाँ पकड़ लीं। अब उन्होंने हाथ हटाया तो नहीं, पर उंगलियों को मुट्ठी की तरह भींच लिया, जैसे मेरे स्पर्श से दूर भागना चाह रही हों। मेरे मन में एक ज़िद सी आ गई कि हमारे बीच पति-पत्नी बनने के बाद यह जो संकोच की दीवार है, वह अभी खत्म हो जाए।
मैंने अपना हाथ उनके हाथ पर मजबूती से टिका दिया और अपनी ग्रिप में उनका हाथ थाम लिया। उन्होंने धीरे से हाथ छुड़ाने की कोशिश तो की, पर खींचकर ले नहीं गईं। मैंने उनकी तरफ मुड़कर देखा। वह अब भी होंठों पर मुस्कान लिए बाहर देख रही थीं। मैंने धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ उनकी उंगलियों में फँसाकर (intertwine करके) उन्हें थाम लिया। तभी उन्होंने मेरी तरफ देखा। उनके चेहरे पर शर्म, एक्साइटमेंट और चाहत का एक मिला-जुला भाव था। उन्होंने आँखों ही आँखों में इशारा करते हुए मुझे ड्राइवर की तरफ देखने को कहा।
फिर एक बनावटी गुस्से वाला चेहरा बनाया, जैसे वह कहना चाहती हों— "यह क्या कर रहे हैं आप? आगे ड्राइवर बैठा है, मिरर में देख रहा होगा। छोड़िए, मुझे शर्म आ रही है।"
उनका इस तरह शर्माना मुझे और भी मज़ा देने लगा। मैंने उनका हाथ छोड़ा तो नहीं, बल्कि अपनी ग्रिप और मज़बूत करते हुए उनकी उंगलियों को अपनी मुट्ठी में और कस लिया। माँ ने तुरंत अपनी नज़रें घुमा लीं और बाहर की तरफ देखने लगी। मेरे चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी और मैं बस उन्हें ही निहारे जा रहा था। फिर मैंने उनका हाथ वैसे ही पकड़े रखा और अपनी नज़रें सामने की तरफ घुमा लीं।
तभी मुझे महसूस हुआ कि माँ अपनी मुट्ठी धीरे-धीरे खोल रही है और अपनी उंगलियों से मेरी उंगलियों को थाम रही है। मैंने नीचे हाथों की तरफ देखा—हमारी उंगलियाँ एक-दूसरे में पूरी तरह उलझी हुई (intertwined) थीं और हम दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ रखा था। मैंने उनकी तरफ देखा, तो वह बाहर देखते हुए भी समझ गईं कि मेरी नज़रें उन पर ही हैं। वह और भी ज़्यादा शर्मा गईं और अपनी हंसी को होंठों के बीच दबाने की कोशिश करने लगीं। उन्होंने अपने बाएं हाथ की कोहनी खिड़की पर टिकाई और एक उंगली को मोड़कर बार-बार अपने होंठों को छूने लगीं।
मैं समझ गया था कि माँ के अंदर की वह झिझक अब खत्म हो रही है और वह अपने बेटे के साथ इस नए रिश्ते में धीरे-धीरे खुद को खोल रही है। एक पत्नी होने का एहसास उनके चेहरे पर साफ़ था और उनके दिल की सारी खुशी झलक रही थी। मेरा मन किसी बच्चे की तरह खुशी से झूम उठा। टैक्सी में हम दोनों अलग-अलग तरफ देख रहे थे, लेकिन एक-दूसरे का हाथ पकड़कर हम जैसे बिना कुछ कहे वादा कर रहे थे कि ज़िंदगी की किसी भी परिस्थिति में यह साथ कभी नहीं छूटेगा।
माँ की ऐसी अदाएं मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं। मैं जितनी बार उन्हें देख रहा था, बस यही दुआ कर रहा था कि यह पल, यह एहसास कभी खत्म न हो। हवा के झोंकों के साथ उनके बाल उड़कर मेरे चेहरे को छू रहे थे। मेरे गाल, नाक और आँखों पर उनके बालों का वह हल्का सा स्पर्श मुझे एक रूहानी खुशी दे रहा था। उनकी वो धीमी हंसी और उनके मोतियों से चमकते दांत उनकी हंसी को और लुभावना बना रहे थे। मेरा मन कर रहा था कि बस उन्हें अपनी बाँहों में भर लूँ और जी भर कर प्यार करूँ। माँ और मैं एकांत में एक दूसरे को अपना बना कर पाने की चाहत में अंदर ही अंदर उबलने लगे.
पर मेरे मन में उठी एक छोटी सी फ़िक्र ने अचानक उस पूरी ख़ुशी को फीका कर दिया। रात में भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था, जैसे दिल पर किसी ने बोझ रख दिया हो। माँ ने शायद मेरी आँखों में उस बेचैनी को पढ़ लिया था। उनकी उस वक्त की खामोश नज़रों में एक गहरा दिलासा था, जैसे कह रही हो— "अब आप अकेले क्यों दुखी होते हैं? आज से तो हर सुख और हर दुख हमारा साझा है। हम मिलकर ज़िंदगी के सफर को आसान बनाएंगे और इसे खुशियों से भर देंगे। मैं हूँ न आपके पास, हमेशा के लिए।"
उनकी आँखों की वो तसल्ली पढ़कर तब तो मेरा मन संभल गया था, पर इस वक्त वही पुरानी चिंता फिर से सर उठाने लगी। नाना-नानी की कोशिशों और तकदीर के खेल ने हमें शास्त्र के अनुसार पति-पत्नी तो बना दिया था। माँ भी एक पत्नी के रूप में खुद को ढालकर एक सुनहरी ज़िंदगी के सपने देख रही थी। पर क्या मैं उनकी उम्मीदों पर खरा उतर पाऊँगा? मुझे यकीन है कि माँ एक आदर्श पत्नी साबित होगी, पर क्या मैं एक आदर्श पति बन पाऊँगा? एक औरत के दिल में अपने जीवनसाथी को लेकर जितने अरमान और ख़्वाब होते हैं, क्या मैं उन सबको मुकम्मल कर पाऊँगा?
यही वो सवाल थे जो रह-रहकर मेरे दिल में चुभ रहे थे। मैं जानता हूँ कि मैं माँ को दुनिया में सबसे ज़्यादा चाहता हूँ और ताउम्र चाहूँगा। उसके सिवा मेरी नज़रों में कोई और लड़की कभी आएगी ही नहीं। वह मेरी ज़िंदगी का एकमात्र सच है। हमारी उम्र के फासले को तो हम हर तरीके से पाट लेंगे, पर जब एक पति-पत्नी की सामान्य ज़िंदगी के बारे में सोचता हूँ, तो वही मायूसी फिर से घेर लेती है।
मैं जानता हूं उनके साथ मेरा हर पति पत्नी की तरह शारीरिक संपर्क होने वाला है। हम माँ बेटे के रिश्ते को दिल में रख कर एक पति पत्नी की तरह जिएंगे। वह भी जानती है शादी के बाद उनका बेटा अब एक पति के अधिकारो से उनके तन और मन को प्यार करेगा और वह इसके लिए जरूर खुदको तैयार भी की होंगी।
लेकिन मैं जब अपने लोड़े के बारे में सोचता हूं तो एक डर मन में पैदा होता है। मेरा लोड़ा नॉर्मल से थोड़ा बड़ा और मोटा तो है ही, पर जब वो उत्तेजना से खड़ा होता है, तब उसका कैप एक दम बड़े से बॉल जैसा बन जाता है।
क्या मैं, माँ के साथ ठीक तरह से शारीरिक सम्बन्ध बना पाउँगा?? क्या मैं उनको बिना दर्द दिए वो प्यार कर पाउँगा जो हर पत्नी अपने पति से चाहती है? क्या मैं उन्हें पूर्ण संतुष्टि दे पाऊंगा?
मैं उनसे बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ। उनके सिवा किसी और के साथ मिलन की कल्पना न मैंने कभी की है, और न कभी करूँगा। मेरा बस एक ही अरमान है—उन्हें हर मुमकिन खुशी देना और दुनिया का सारा सुकून उनके कदमों में लाकर रख देना।
मुझे अंदर ही अंदर यह महसूस हुआ कि मैं वाकई बहुत खुशनसीब हूँ। मुझे पत्नी के रूप में ऐसी लड़की मिली जो बचपन से आज तक मुझे इतना प्यार करती आई है और आज भी उनके दिल में वही शिद्दत है। मैं जानता हूँ कि वह ज़िंदगी भर मुझे इसी तरह टूटकर चाहेगी। मेरी सिंगल पैरेंट होने की वजह से शायद इसीलिए उन्होंने मुझे हमेशा सबसे ज्यादा प्यार दिया। उनके दिल में हमेशा मेरा ही बसेरा रहा और उनके सारे सुख-दुःख बस मेरे ही इर्द-गिर्द घूमते थे। आज नसीब हमें ज़िंदगी के उस मोड़ पर ले आया है, जहाँ हम सगे माँ - बेटा होने के बावजूद दुनिया के सबसे मज़बूत और खूबसूरत बंधन में बंध गए हैं।
माँ - बेटे के उस अटूट रिश्ते से तो हम पहले ही जुड़े थे, लेकिन आज इस नए बंधन ने हम दोनों को और भी ज्यादा मजबूती से एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया है। माँ के लिए मेरे मन में जो प्यार था, उसमें अब एक पति का समर्पण भी जुड़ गया था और मैंने अपने दिल के सारे अहसास निचोड़कर उनके नाम कर दिया। उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी में जमा किया हुआ सारा प्यार अपने नए पति के लिए लुटा दिया। अपने 'बेटे' के लिए जो मोहब्बत थी, उसमें पत्नी वाला हक़ मिलाकर उन्होंने अपना दिल पूरी तरह मेरे सामने खोलकर रख दिया था।
उन्होंने खुद को, अपने तन-मन और अपनी रूह को पूरी तरह अपने बेटे, अपने पति के पास सरेंडर कर दिया था। उनके सामने खड़े होकर उसकी आँखों में देखते हुए मैं यह सब कुछ गहराई से महसूस कर रहा था। उस भीड़ भरे स्टेशन और ट्रेन के शोर-शराबे के बीच, हम बस कुछ पल यूँ ही नज़रें मिलाकर एक-दूसरे से दिल की हज़ारों बातें कह रहे थे।
जब हम ट्रेन में चढ़े थे, तो कंपार्टमेंट मुसाफिरों से खचाखच भरा था। लोग जल्दी-जल्दी अपना डिनर निपटाकर सो गए। मेरा और माँ का बर्थ ऊपर-नीचे था। मैं ऊपर जाकर लेट गया और माँ नीचे चादर ओढ़कर सो गई। शादी के बाद एक पति-पत्नी की पहली रात, जो एक साथ एक ही छत के नीचे गुज़रनी चाहिए थी, वह ट्रेन के इन अलग-अलग बर्थ पर गुज़र रही थी। शायद ही किसी के साथ ऐसा होता होगा, पर हमारे साथ तो खैर बहुत कुछ ऐसा हो रहा था जो आम नहीं था।
मैंने एक बार ऊपर से झुककर नीचे माँ को देखा। वह मुड़कर मेरी ही बर्थ की तरफ देखते हुए लेटी थी। जैसे ही हमारी नज़रें मिलीं, उनके होंठों पर एक कोमल सी मुस्कान तैर गई। मैं बस उन्हें एकटक देखता रहा। उन्होंने अपनी चादर को थोड़ा और गले तक खींच लिया, जैसे उस गर्माहट में खुद को समेटना चाह रही हो, और फिर अपनी आँखें मूंद लीं।
थोड़ी देर बाद जब उन्होंने दोबारा आँखें खोलीं, तो हमारी नज़रें फिर से उलझ गईं। माथे पर वह लाल बिंदी और होंठों की वह प्यारी सी मुस्कुराहट—शादी के इस रूप ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया था। वह बिल्कुल उस अल्हड़ और कुंवारी लड़की जैसी लग रही थी जिसकी अभी-अभी शादी हुई हो और जो अपने पति को पहली बार एक अलग हक़ से देख रही हो। फिर उन्होंने अपना चेहरा दाईं तरफ घुमा लिया और आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगी।
अगली सुबह जब हमारी नींद खुली, तो पिछले स्टेशन पर कुछ मुसाफिर पहले ही उतर चुके थे। इस वजह से कोच अब थोड़ा खाली और शांत लग रहा था। हमारे सामने वाली बर्थ पर बस एक अधेड़ उम्र के अंकल बैठे थे। तभी ट्रेन में चाय वाला आया, जो गरम पानी का फ्लास्क, चीनी के पैकेट, मिल्क पाउडर और टी-बैग्स दे गया।
मैंने जैसे ही चाय बनाना शुरू किया, माँ ने धीरे से टोकते हुए कहा, "लाइए, मुझे दीजिए। मैं बनाती हूँ।" और वह चाय बनाने लगी। मेरी पत्नी बनने के बाद भी, उनके व्यवहार में वही पुरानी फिक्र और ममता थी जो वह बचपन से मुझे देती आई थी। मैंने भी मन ही मन खुद से वादा किया कि पति बनने के बाद भी उनके लिए मेरा सम्मान और केयर कभी कम नहीं होगी।
हम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बस एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे। यह वह पहली सुबह थी जो हर जोड़े की ज़िंदगी में सिर्फ एक बार आती है—शादी के ठीक अगले दिन की पहली सुबह। हम उन बेशकीमती पलों को अपने दिल में कैद कर रहे थे। हमारे सामने बैठे अंकल ने हमसे परिचय किया और जब उन्हें पता चला कि हम नई-नई शादी करके मेरी जॉब वाली जगह जा रहे हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हमारी जोड़ी बहुत खूबसूरत है।
बातों-बातों में उन्होंने पूछ लिया, "लव मैरिज है या अरेंज्ड?"
यह सवाल सुनते ही माँ और मैं कुछ पलों के लिए खामोश हो गए। उन्हें कैसे समझाते कि हमारा रिश्ता क्या है? मैंने तुरंत बात संभालते हुए कहा, "अरेंज्ड मैरिज है।"
मेरी बात सुनकर वह व्यक्ति बोले, "बहुत कम लोगों में अरेंज्ड मैरिज के बाद इतना प्यार झलकता है, जितना आप दोनों को देखकर लग रहा है।"
मैं और माँ एक-दूसरे को देखने लगे। मन ही मन हमने सोचा कि इन्हें क्या पता कि नसीब के किन फेरों ने हमें आज यहाँ लाकर खड़ा किया है। हम एक ऐसा जोड़ा थे, जैसा शायद ही दुनिया में कहीं और मिले। हमारे बीच जो प्यार था, वह दुनिया के किसी भी बंधन से कहीं ज़्यादा गहरा और मज़बूत था।
कुछ घंटों के सफर के बाद हम मुंबई पहुँच गए—यह वही शहर है जिसे अब से हम अपना घर कहेंगे और यहीं अपनी एक नई दुनिया बसाएंगे। जैसे ही ट्रेन रुकी, मैं और माँ प्लेटफॉर्म पर उतरे। मैंने माँ को उतरने में मदद करने के लिए हाथ बढ़ाया, उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ा और नीचे उतर आई।
उतरने के बाद माँ के चेहरे पर वह मुस्कुराहट बरकरार थी, पर अचानक कुछ याद करके उन्होंने मेरे हाथ पर अपनी ग्रिप ढीली कर दी। वह थोड़ा शर्माई और मेरा हाथ छोड़कर अपना हाथ पीछे खींच लिया। फिर वह नज़रें घुमाकर प्लेटफॉर्म की दूसरी तरफ देखने लगी। मैं अब भी उन्हें ही देख रहा था; माँ आज बहुत खुश लग रही थी। उनके होंठों पर जो मुस्कान सजी थी, उसे ताउम्र देखने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ।
हमने टैक्सी में अपना लगेज लोड किया और अपने घर की तरफ निकल पड़े—वह घर जो आज से 'हमारा' होने वाला था। प्लेटफॉर्म पर माँ ने जो मेरा हाथ छोड़ा, उनके बाद उन्होंने फिर मेरा हाथ नहीं पकड़ा। मेरा दिल चाह रहा था कि वह मेरा बाज़ू पकड़कर मेरे एकदम करीब होकर चले, पर वह पास होकर भी मेरे स्पर्श से दूर रह रही थी। शायद उनके मन में भी मेरे जैसी ही कोई बेचैनी और अनुभूति हो रही होगी। मेरे ही जैसा एक तूफ़ान उनके अंदर भी उठा होगा। एक ऐसा अद्भुत सुख, जो न मैंने कभी पाया और जिसे पाकर भी वह ज़िंदगी में कभी उसका ठीक से आनंद नहीं ले पाई थी—उस सुख को पाने के लिए शायद उनका मन भी तरस रहा होगा। और शायद इसीलिए, वह खुद को काबू में रखने के लिए मुझसे थोड़ी दूरी बनाकर रख रही थी।
टैक्सी की पिछली सीट पर माँ खिड़की के पास बैठकर बाहर की तरफ देख रही थी। वह इस नई जगह और नई ज़िंदगी में खुद को ढालते हुए, इस नए रिश्ते को अपने दिल में और भी मजबूती से बसा रही थी। रास्ते भर मैं उन्हें बताता रहा कि हमें कितनी दूर जाना है, मार्केट किस तरफ है और मेरा ऑफिस किधर पड़ता है। वह बस बीच-बीच में एक मुस्कुराहट के साथ मेरी तरफ देखती और फिर बाहर की तरफ नज़रें घुमा लेती।
खिड़की की तरफ उनका बायाँ हाथ उनकी गोद में रखा था और दाहिना हाथ मेरे और उनके बीच की खाली सीट पर। मेरा मन बुरी तरह मचल रहा था कि बस उनका वह हाथ अपने हाथ में ले लूँ। बातों-बातों में मन में यह ख्याल तो सौ बार आया, पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। हम अब पति-पत्नी थे, पर फिर भी अंदर एक अजीब सा संकोच काम कर रहा था। इतने सालों तक जिस औरत को मैंने सिर्फ एक माँ की नज़र से देखा और छुआ, आज उसे अपनी पत्नी के रूप में देख तो रहा था, मगर छूने में एक झिझक आड़े आ रही थी। शायद उनके अंदर भी अपने बेटे को अब पति के रूप में अपनाने और छूने में वैसी ही शर्म होगी।
अब मुझे एहसास हो रहा था कि पिछले 6 सालों से कल्पनाओं में उनके साथ मिलन के जो सपने मैंने देखे थे, हकीकत की ज़मीन पर आकर उन्हें पूरा करना इतना सहज और आसान नहीं था। माँ जितनी बार मेरी तरफ देखती, मेरे सीने के अंदर एक अजीब सी झनझनाहट होने लगती। खिड़की से आती हवा की वजह से जब वह मेरी तरफ देखती, तो उनकी सुंदर आँखें थोड़ी भिंच सी जातीं। फिर भी उनके चेहरे की मुस्कान और आँखों में एक गहरा प्यार साफ़ झलक रहा था।
मैंने मन ही मन थोड़ी हिम्मत जुटाई और सामने की तरफ देखते हुए अपना बायाँ हाथ बढ़ाकर उनके दाहिने हाथ पर रख दिया। मेरी उंगलियाँ बस उनकी उंगलियों को छू भर रही थीं। तभी माँ ने बाहर देखते हुए अपना हाथ थोड़ा अपनी ओर खींच लिया। मैंने हार नहीं मानी और दोबारा हाथ बढ़ाकर उनकी उंगलियाँ पकड़ लीं। अब उन्होंने हाथ हटाया तो नहीं, पर उंगलियों को मुट्ठी की तरह भींच लिया, जैसे मेरे स्पर्श से दूर भागना चाह रही हों। मेरे मन में एक ज़िद सी आ गई कि हमारे बीच पति-पत्नी बनने के बाद यह जो संकोच की दीवार है, वह अभी खत्म हो जाए।
मैंने अपना हाथ उनके हाथ पर मजबूती से टिका दिया और अपनी ग्रिप में उनका हाथ थाम लिया। उन्होंने धीरे से हाथ छुड़ाने की कोशिश तो की, पर खींचकर ले नहीं गईं। मैंने उनकी तरफ मुड़कर देखा। वह अब भी होंठों पर मुस्कान लिए बाहर देख रही थीं। मैंने धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ उनकी उंगलियों में फँसाकर (intertwine करके) उन्हें थाम लिया। तभी उन्होंने मेरी तरफ देखा। उनके चेहरे पर शर्म, एक्साइटमेंट और चाहत का एक मिला-जुला भाव था। उन्होंने आँखों ही आँखों में इशारा करते हुए मुझे ड्राइवर की तरफ देखने को कहा।
फिर एक बनावटी गुस्से वाला चेहरा बनाया, जैसे वह कहना चाहती हों— "यह क्या कर रहे हैं आप? आगे ड्राइवर बैठा है, मिरर में देख रहा होगा। छोड़िए, मुझे शर्म आ रही है।"
उनका इस तरह शर्माना मुझे और भी मज़ा देने लगा। मैंने उनका हाथ छोड़ा तो नहीं, बल्कि अपनी ग्रिप और मज़बूत करते हुए उनकी उंगलियों को अपनी मुट्ठी में और कस लिया। माँ ने तुरंत अपनी नज़रें घुमा लीं और बाहर की तरफ देखने लगी। मेरे चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी और मैं बस उन्हें ही निहारे जा रहा था। फिर मैंने उनका हाथ वैसे ही पकड़े रखा और अपनी नज़रें सामने की तरफ घुमा लीं।
तभी मुझे महसूस हुआ कि माँ अपनी मुट्ठी धीरे-धीरे खोल रही है और अपनी उंगलियों से मेरी उंगलियों को थाम रही है। मैंने नीचे हाथों की तरफ देखा—हमारी उंगलियाँ एक-दूसरे में पूरी तरह उलझी हुई (intertwined) थीं और हम दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ रखा था। मैंने उनकी तरफ देखा, तो वह बाहर देखते हुए भी समझ गईं कि मेरी नज़रें उन पर ही हैं। वह और भी ज़्यादा शर्मा गईं और अपनी हंसी को होंठों के बीच दबाने की कोशिश करने लगीं। उन्होंने अपने बाएं हाथ की कोहनी खिड़की पर टिकाई और एक उंगली को मोड़कर बार-बार अपने होंठों को छूने लगीं।
मैं समझ गया था कि माँ के अंदर की वह झिझक अब खत्म हो रही है और वह अपने बेटे के साथ इस नए रिश्ते में धीरे-धीरे खुद को खोल रही है। एक पत्नी होने का एहसास उनके चेहरे पर साफ़ था और उनके दिल की सारी खुशी झलक रही थी। मेरा मन किसी बच्चे की तरह खुशी से झूम उठा। टैक्सी में हम दोनों अलग-अलग तरफ देख रहे थे, लेकिन एक-दूसरे का हाथ पकड़कर हम जैसे बिना कुछ कहे वादा कर रहे थे कि ज़िंदगी की किसी भी परिस्थिति में यह साथ कभी नहीं छूटेगा।
माँ की ऐसी अदाएं मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं। मैं जितनी बार उन्हें देख रहा था, बस यही दुआ कर रहा था कि यह पल, यह एहसास कभी खत्म न हो। हवा के झोंकों के साथ उनके बाल उड़कर मेरे चेहरे को छू रहे थे। मेरे गाल, नाक और आँखों पर उनके बालों का वह हल्का सा स्पर्श मुझे एक रूहानी खुशी दे रहा था। उनकी वो धीमी हंसी और उनके मोतियों से चमकते दांत उनकी हंसी को और लुभावना बना रहे थे। मेरा मन कर रहा था कि बस उन्हें अपनी बाँहों में भर लूँ और जी भर कर प्यार करूँ। माँ और मैं एकांत में एक दूसरे को अपना बना कर पाने की चाहत में अंदर ही अंदर उबलने लगे.
पर मेरे मन में उठी एक छोटी सी फ़िक्र ने अचानक उस पूरी ख़ुशी को फीका कर दिया। रात में भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था, जैसे दिल पर किसी ने बोझ रख दिया हो। माँ ने शायद मेरी आँखों में उस बेचैनी को पढ़ लिया था। उनकी उस वक्त की खामोश नज़रों में एक गहरा दिलासा था, जैसे कह रही हो— "अब आप अकेले क्यों दुखी होते हैं? आज से तो हर सुख और हर दुख हमारा साझा है। हम मिलकर ज़िंदगी के सफर को आसान बनाएंगे और इसे खुशियों से भर देंगे। मैं हूँ न आपके पास, हमेशा के लिए।"
उनकी आँखों की वो तसल्ली पढ़कर तब तो मेरा मन संभल गया था, पर इस वक्त वही पुरानी चिंता फिर से सर उठाने लगी। नाना-नानी की कोशिशों और तकदीर के खेल ने हमें शास्त्र के अनुसार पति-पत्नी तो बना दिया था। माँ भी एक पत्नी के रूप में खुद को ढालकर एक सुनहरी ज़िंदगी के सपने देख रही थी। पर क्या मैं उनकी उम्मीदों पर खरा उतर पाऊँगा? मुझे यकीन है कि माँ एक आदर्श पत्नी साबित होगी, पर क्या मैं एक आदर्श पति बन पाऊँगा? एक औरत के दिल में अपने जीवनसाथी को लेकर जितने अरमान और ख़्वाब होते हैं, क्या मैं उन सबको मुकम्मल कर पाऊँगा?
यही वो सवाल थे जो रह-रहकर मेरे दिल में चुभ रहे थे। मैं जानता हूँ कि मैं माँ को दुनिया में सबसे ज़्यादा चाहता हूँ और ताउम्र चाहूँगा। उसके सिवा मेरी नज़रों में कोई और लड़की कभी आएगी ही नहीं। वह मेरी ज़िंदगी का एकमात्र सच है। हमारी उम्र के फासले को तो हम हर तरीके से पाट लेंगे, पर जब एक पति-पत्नी की सामान्य ज़िंदगी के बारे में सोचता हूँ, तो वही मायूसी फिर से घेर लेती है।
मैं जानता हूं उनके साथ मेरा हर पति पत्नी की तरह शारीरिक संपर्क होने वाला है। हम माँ बेटे के रिश्ते को दिल में रख कर एक पति पत्नी की तरह जिएंगे। वह भी जानती है शादी के बाद उनका बेटा अब एक पति के अधिकारो से उनके तन और मन को प्यार करेगा और वह इसके लिए जरूर खुदको तैयार भी की होंगी।
लेकिन मैं जब अपने लोड़े के बारे में सोचता हूं तो एक डर मन में पैदा होता है। मेरा लोड़ा नॉर्मल से थोड़ा बड़ा और मोटा तो है ही, पर जब वो उत्तेजना से खड़ा होता है, तब उसका कैप एक दम बड़े से बॉल जैसा बन जाता है।
क्या मैं, माँ के साथ ठीक तरह से शारीरिक सम्बन्ध बना पाउँगा?? क्या मैं उनको बिना दर्द दिए वो प्यार कर पाउँगा जो हर पत्नी अपने पति से चाहती है? क्या मैं उन्हें पूर्ण संतुष्टि दे पाऊंगा?
मैं उनसे बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ। उनके सिवा किसी और के साथ मिलन की कल्पना न मैंने कभी की है, और न कभी करूँगा। मेरा बस एक ही अरमान है—उन्हें हर मुमकिन खुशी देना और दुनिया का सारा सुकून उनके कदमों में लाकर रख देना।
मुझे अंदर ही अंदर यह महसूस हुआ कि मैं वाकई बहुत खुशनसीब हूँ। मुझे पत्नी के रूप में ऐसी लड़की मिली जो बचपन से आज तक मुझे इतना प्यार करती आई है और आज भी उनके दिल में वही शिद्दत है। मैं जानता हूँ कि वह ज़िंदगी भर मुझे इसी तरह टूटकर चाहेगी। मेरी सिंगल पैरेंट होने की वजह से शायद इसीलिए उन्होंने मुझे हमेशा सबसे ज्यादा प्यार दिया। उनके दिल में हमेशा मेरा ही बसेरा रहा और उनके सारे सुख-दुःख बस मेरे ही इर्द-गिर्द घूमते थे। आज नसीब हमें ज़िंदगी के उस मोड़ पर ले आया है, जहाँ हम सगे माँ - बेटा होने के बावजूद दुनिया के सबसे मज़बूत और खूबसूरत बंधन में बंध गए हैं।
माँ - बेटे के उस अटूट रिश्ते से तो हम पहले ही जुड़े थे, लेकिन आज इस नए बंधन ने हम दोनों को और भी ज्यादा मजबूती से एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया है। माँ के लिए मेरे मन में जो प्यार था, उसमें अब एक पति का समर्पण भी जुड़ गया था और मैंने अपने दिल के सारे अहसास निचोड़कर उनके नाम कर दिया। उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी में जमा किया हुआ सारा प्यार अपने नए पति के लिए लुटा दिया। अपने 'बेटे' के लिए जो मोहब्बत थी, उसमें पत्नी वाला हक़ मिलाकर उन्होंने अपना दिल पूरी तरह मेरे सामने खोलकर रख दिया था।
उन्होंने खुद को, अपने तन-मन और अपनी रूह को पूरी तरह अपने बेटे, अपने पति के पास सरेंडर कर दिया था। उनके सामने खड़े होकर उसकी आँखों में देखते हुए मैं यह सब कुछ गहराई से महसूस कर रहा था। उस भीड़ भरे स्टेशन और ट्रेन के शोर-शराबे के बीच, हम बस कुछ पल यूँ ही नज़रें मिलाकर एक-दूसरे से दिल की हज़ारों बातें कह रहे थे।
जब हम ट्रेन में चढ़े थे, तो कंपार्टमेंट मुसाफिरों से खचाखच भरा था। लोग जल्दी-जल्दी अपना डिनर निपटाकर सो गए। मेरा और माँ का बर्थ ऊपर-नीचे था। मैं ऊपर जाकर लेट गया और माँ नीचे चादर ओढ़कर सो गई। शादी के बाद एक पति-पत्नी की पहली रात, जो एक साथ एक ही छत के नीचे गुज़रनी चाहिए थी, वह ट्रेन के इन अलग-अलग बर्थ पर गुज़र रही थी। शायद ही किसी के साथ ऐसा होता होगा, पर हमारे साथ तो खैर बहुत कुछ ऐसा हो रहा था जो आम नहीं था।
मैंने एक बार ऊपर से झुककर नीचे माँ को देखा। वह मुड़कर मेरी ही बर्थ की तरफ देखते हुए लेटी थी। जैसे ही हमारी नज़रें मिलीं, उनके होंठों पर एक कोमल सी मुस्कान तैर गई। मैं बस उन्हें एकटक देखता रहा। उन्होंने अपनी चादर को थोड़ा और गले तक खींच लिया, जैसे उस गर्माहट में खुद को समेटना चाह रही हो, और फिर अपनी आँखें मूंद लीं।
थोड़ी देर बाद जब उन्होंने दोबारा आँखें खोलीं, तो हमारी नज़रें फिर से उलझ गईं। माथे पर वह लाल बिंदी और होंठों की वह प्यारी सी मुस्कुराहट—शादी के इस रूप ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया था। वह बिल्कुल उस अल्हड़ और कुंवारी लड़की जैसी लग रही थी जिसकी अभी-अभी शादी हुई हो और जो अपने पति को पहली बार एक अलग हक़ से देख रही हो। फिर उन्होंने अपना चेहरा दाईं तरफ घुमा लिया और आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगी।
अगली सुबह जब हमारी नींद खुली, तो पिछले स्टेशन पर कुछ मुसाफिर पहले ही उतर चुके थे। इस वजह से कोच अब थोड़ा खाली और शांत लग रहा था। हमारे सामने वाली बर्थ पर बस एक अधेड़ उम्र के अंकल बैठे थे। तभी ट्रेन में चाय वाला आया, जो गरम पानी का फ्लास्क, चीनी के पैकेट, मिल्क पाउडर और टी-बैग्स दे गया।
मैंने जैसे ही चाय बनाना शुरू किया, माँ ने धीरे से टोकते हुए कहा, "लाइए, मुझे दीजिए। मैं बनाती हूँ।" और वह चाय बनाने लगी। मेरी पत्नी बनने के बाद भी, उनके व्यवहार में वही पुरानी फिक्र और ममता थी जो वह बचपन से मुझे देती आई थी। मैंने भी मन ही मन खुद से वादा किया कि पति बनने के बाद भी उनके लिए मेरा सम्मान और केयर कभी कम नहीं होगी।
हम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बस एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे। यह वह पहली सुबह थी जो हर जोड़े की ज़िंदगी में सिर्फ एक बार आती है—शादी के ठीक अगले दिन की पहली सुबह। हम उन बेशकीमती पलों को अपने दिल में कैद कर रहे थे। हमारे सामने बैठे अंकल ने हमसे परिचय किया और जब उन्हें पता चला कि हम नई-नई शादी करके मेरी जॉब वाली जगह जा रहे हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हमारी जोड़ी बहुत खूबसूरत है।
बातों-बातों में उन्होंने पूछ लिया, "लव मैरिज है या अरेंज्ड?"
यह सवाल सुनते ही माँ और मैं कुछ पलों के लिए खामोश हो गए। उन्हें कैसे समझाते कि हमारा रिश्ता क्या है? मैंने तुरंत बात संभालते हुए कहा, "अरेंज्ड मैरिज है।"
मेरी बात सुनकर वह व्यक्ति बोले, "बहुत कम लोगों में अरेंज्ड मैरिज के बाद इतना प्यार झलकता है, जितना आप दोनों को देखकर लग रहा है।"
मैं और माँ एक-दूसरे को देखने लगे। मन ही मन हमने सोचा कि इन्हें क्या पता कि नसीब के किन फेरों ने हमें आज यहाँ लाकर खड़ा किया है। हम एक ऐसा जोड़ा थे, जैसा शायद ही दुनिया में कहीं और मिले। हमारे बीच जो प्यार था, वह दुनिया के किसी भी बंधन से कहीं ज़्यादा गहरा और मज़बूत था।
कुछ घंटों के सफर के बाद हम मुंबई पहुँच गए—यह वही शहर है जिसे अब से हम अपना घर कहेंगे और यहीं अपनी एक नई दुनिया बसाएंगे। जैसे ही ट्रेन रुकी, मैं और माँ प्लेटफॉर्म पर उतरे। मैंने माँ को उतरने में मदद करने के लिए हाथ बढ़ाया, उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ा और नीचे उतर आई।
उतरने के बाद माँ के चेहरे पर वह मुस्कुराहट बरकरार थी, पर अचानक कुछ याद करके उन्होंने मेरे हाथ पर अपनी ग्रिप ढीली कर दी। वह थोड़ा शर्माई और मेरा हाथ छोड़कर अपना हाथ पीछे खींच लिया। फिर वह नज़रें घुमाकर प्लेटफॉर्म की दूसरी तरफ देखने लगी। मैं अब भी उन्हें ही देख रहा था; माँ आज बहुत खुश लग रही थी। उनके होंठों पर जो मुस्कान सजी थी, उसे ताउम्र देखने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ।
हमने टैक्सी में अपना लगेज लोड किया और अपने घर की तरफ निकल पड़े—वह घर जो आज से 'हमारा' होने वाला था। प्लेटफॉर्म पर माँ ने जो मेरा हाथ छोड़ा, उनके बाद उन्होंने फिर मेरा हाथ नहीं पकड़ा। मेरा दिल चाह रहा था कि वह मेरा बाज़ू पकड़कर मेरे एकदम करीब होकर चले, पर वह पास होकर भी मेरे स्पर्श से दूर रह रही थी। शायद उनके मन में भी मेरे जैसी ही कोई बेचैनी और अनुभूति हो रही होगी। मेरे ही जैसा एक तूफ़ान उनके अंदर भी उठा होगा। एक ऐसा अद्भुत सुख, जो न मैंने कभी पाया और जिसे पाकर भी वह ज़िंदगी में कभी उसका ठीक से आनंद नहीं ले पाई थी—उस सुख को पाने के लिए शायद उनका मन भी तरस रहा होगा। और शायद इसीलिए, वह खुद को काबू में रखने के लिए मुझसे थोड़ी दूरी बनाकर रख रही थी।
टैक्सी की पिछली सीट पर माँ खिड़की के पास बैठकर बाहर की तरफ देख रही थी। वह इस नई जगह और नई ज़िंदगी में खुद को ढालते हुए, इस नए रिश्ते को अपने दिल में और भी मजबूती से बसा रही थी। रास्ते भर मैं उन्हें बताता रहा कि हमें कितनी दूर जाना है, मार्केट किस तरफ है और मेरा ऑफिस किधर पड़ता है। वह बस बीच-बीच में एक मुस्कुराहट के साथ मेरी तरफ देखती और फिर बाहर की तरफ नज़रें घुमा लेती।
खिड़की की तरफ उनका बायाँ हाथ उनकी गोद में रखा था और दाहिना हाथ मेरे और उनके बीच की खाली सीट पर। मेरा मन बुरी तरह मचल रहा था कि बस उनका वह हाथ अपने हाथ में ले लूँ। बातों-बातों में मन में यह ख्याल तो सौ बार आया, पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। हम अब पति-पत्नी थे, पर फिर भी अंदर एक अजीब सा संकोच काम कर रहा था। इतने सालों तक जिस औरत को मैंने सिर्फ एक माँ की नज़र से देखा और छुआ, आज उसे अपनी पत्नी के रूप में देख तो रहा था, मगर छूने में एक झिझक आड़े आ रही थी। शायद उनके अंदर भी अपने बेटे को अब पति के रूप में अपनाने और छूने में वैसी ही शर्म होगी।
अब मुझे एहसास हो रहा था कि पिछले 6 सालों से कल्पनाओं में उनके साथ मिलन के जो सपने मैंने देखे थे, हकीकत की ज़मीन पर आकर उन्हें पूरा करना इतना सहज और आसान नहीं था। माँ जितनी बार मेरी तरफ देखती, मेरे सीने के अंदर एक अजीब सी झनझनाहट होने लगती। खिड़की से आती हवा की वजह से जब वह मेरी तरफ देखती, तो उनकी सुंदर आँखें थोड़ी भिंच सी जातीं। फिर भी उनके चेहरे की मुस्कान और आँखों में एक गहरा प्यार साफ़ झलक रहा था।
मैंने मन ही मन थोड़ी हिम्मत जुटाई और सामने की तरफ देखते हुए अपना बायाँ हाथ बढ़ाकर उनके दाहिने हाथ पर रख दिया। मेरी उंगलियाँ बस उनकी उंगलियों को छू भर रही थीं। तभी माँ ने बाहर देखते हुए अपना हाथ थोड़ा अपनी ओर खींच लिया। मैंने हार नहीं मानी और दोबारा हाथ बढ़ाकर उनकी उंगलियाँ पकड़ लीं। अब उन्होंने हाथ हटाया तो नहीं, पर उंगलियों को मुट्ठी की तरह भींच लिया, जैसे मेरे स्पर्श से दूर भागना चाह रही हों। मेरे मन में एक ज़िद सी आ गई कि हमारे बीच पति-पत्नी बनने के बाद यह जो संकोच की दीवार है, वह अभी खत्म हो जाए।
मैंने अपना हाथ उनके हाथ पर मजबूती से टिका दिया और अपनी ग्रिप में उनका हाथ थाम लिया। उन्होंने धीरे से हाथ छुड़ाने की कोशिश तो की, पर खींचकर ले नहीं गईं। मैंने उनकी तरफ मुड़कर देखा। वह अब भी होंठों पर मुस्कान लिए बाहर देख रही थीं। मैंने धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ उनकी उंगलियों में फँसाकर (intertwine करके) उन्हें थाम लिया। तभी उन्होंने मेरी तरफ देखा। उनके चेहरे पर शर्म, एक्साइटमेंट और चाहत का एक मिला-जुला भाव था। उन्होंने आँखों ही आँखों में इशारा करते हुए मुझे ड्राइवर की तरफ देखने को कहा।
फिर एक बनावटी गुस्से वाला चेहरा बनाया, जैसे वह कहना चाहती हों— "यह क्या कर रहे हैं आप? आगे ड्राइवर बैठा है, मिरर में देख रहा होगा। छोड़िए, मुझे शर्म आ रही है।"
उनका इस तरह शर्माना मुझे और भी मज़ा देने लगा। मैंने उनका हाथ छोड़ा तो नहीं, बल्कि अपनी ग्रिप और मज़बूत करते हुए उनकी उंगलियों को अपनी मुट्ठी में और कस लिया। माँ ने तुरंत अपनी नज़रें घुमा लीं और बाहर की तरफ देखने लगी। मेरे चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी और मैं बस उन्हें ही निहारे जा रहा था। फिर मैंने उनका हाथ वैसे ही पकड़े रखा और अपनी नज़रें सामने की तरफ घुमा लीं।
तभी मुझे महसूस हुआ कि माँ अपनी मुट्ठी धीरे-धीरे खोल रही है और अपनी उंगलियों से मेरी उंगलियों को थाम रही है। मैंने नीचे हाथों की तरफ देखा—हमारी उंगलियाँ एक-दूसरे में पूरी तरह उलझी हुई (intertwined) थीं और हम दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ रखा था। मैंने उनकी तरफ देखा, तो वह बाहर देखते हुए भी समझ गईं कि मेरी नज़रें उन पर ही हैं। वह और भी ज़्यादा शर्मा गईं और अपनी हंसी को होंठों के बीच दबाने की कोशिश करने लगीं। उन्होंने अपने बाएं हाथ की कोहनी खिड़की पर टिकाई और एक उंगली को मोड़कर बार-बार अपने होंठों को छूने लगीं।
मैं समझ गया था कि माँ के अंदर की वह झिझक अब खत्म हो रही है और वह अपने बेटे के साथ इस नए रिश्ते में धीरे-धीरे खुद को खोल रही है। एक पत्नी होने का एहसास उनके चेहरे पर साफ़ था और उनके दिल की सारी खुशी झलक रही थी। मेरा मन किसी बच्चे की तरह खुशी से झूम उठा। टैक्सी में हम दोनों अलग-अलग तरफ देख रहे थे, लेकिन एक-दूसरे का हाथ पकड़कर हम जैसे बिना कुछ कहे वादा कर रहे थे कि ज़िंदगी की किसी भी परिस्थिति में यह साथ कभी नहीं छूटेगा।
माँ की ऐसी अदाएं मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं। मैं जितनी बार उन्हें देख रहा था, बस यही दुआ कर रहा था कि यह पल, यह एहसास कभी खत्म न हो। हवा के झोंकों के साथ उनके बाल उड़कर मेरे चेहरे को छू रहे थे। मेरे गाल, नाक और आँखों पर उनके बालों का वह हल्का सा स्पर्श मुझे एक रूहानी खुशी दे रहा था। उनकी वो धीमी हंसी और उनके मोतियों से चमकते दांत उनकी हंसी को और लुभावना बना रहे थे। मेरा मन कर रहा था कि बस उन्हें अपनी बाँहों में भर लूँ और जी भर कर प्यार करूँ। माँ और मैं एकांत में एक दूसरे को अपना बना कर पाने की चाहत में अंदर ही अंदर उबलने लगे.
पर मेरे मन में उठी एक छोटी सी फ़िक्र ने अचानक उस पूरी ख़ुशी को फीका कर दिया। रात में भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था, जैसे दिल पर किसी ने बोझ रख दिया हो। माँ ने शायद मेरी आँखों में उस बेचैनी को पढ़ लिया था। उनकी उस वक्त की खामोश नज़रों में एक गहरा दिलासा था, जैसे कह रही हो— "अब आप अकेले क्यों दुखी होते हैं? आज से तो हर सुख और हर दुख हमारा साझा है। हम मिलकर ज़िंदगी के सफर को आसान बनाएंगे और इसे खुशियों से भर देंगे। मैं हूँ न आपके पास, हमेशा के लिए।"
उनकी आँखों की वो तसल्ली पढ़कर तब तो मेरा मन संभल गया था, पर इस वक्त वही पुरानी चिंता फिर से सर उठाने लगी। नाना-नानी की कोशिशों और तकदीर के खेल ने हमें शास्त्र के अनुसार पति-पत्नी तो बना दिया था। माँ भी एक पत्नी के रूप में खुद को ढालकर एक सुनहरी ज़िंदगी के सपने देख रही थी। पर क्या मैं उनकी उम्मीदों पर खरा उतर पाऊँगा? मुझे यकीन है कि माँ एक आदर्श पत्नी साबित होगी, पर क्या मैं एक आदर्श पति बन पाऊँगा? एक औरत के दिल में अपने जीवनसाथी को लेकर जितने अरमान और ख़्वाब होते हैं, क्या मैं उन सबको मुकम्मल कर पाऊँगा?
यही वो सवाल थे जो रह-रहकर मेरे दिल में चुभ रहे थे। मैं जानता हूँ कि मैं माँ को दुनिया में सबसे ज़्यादा चाहता हूँ और ताउम्र चाहूँगा। उसके सिवा मेरी नज़रों में कोई और लड़की कभी आएगी ही नहीं। वह मेरी ज़िंदगी का एकमात्र सच है। हमारी उम्र के फासले को तो हम हर तरीके से पाट लेंगे, पर जब एक पति-पत्नी की सामान्य ज़िंदगी के बारे में सोचता हूँ, तो वही मायूसी फिर से घेर लेती है।
मैं जानता हूं उनके साथ मेरा हर पति पत्नी की तरह शारीरिक संपर्क होने वाला है। हम माँ बेटे के रिश्ते को दिल में रख कर एक पति पत्नी की तरह जिएंगे। वह भी जानती है शादी के बाद उनका बेटा अब एक पति के अधिकारो से उनके तन और मन को प्यार करेगा और वह इसके लिए जरूर खुदको तैयार भी की होंगी।
लेकिन मैं जब अपने लोड़े के बारे में सोचता हूं तो एक डर मन में पैदा होता है। मेरा लोड़ा नॉर्मल से थोड़ा बड़ा और मोटा तो है ही, पर जब वो उत्तेजना से खड़ा होता है, तब उसका कैप एक दम बड़े से बॉल जैसा बन जाता है।
क्या मैं, माँ के साथ ठीक तरह से शारीरिक सम्बन्ध बना पाउँगा?? क्या मैं उनको बिना दर्द दिए वो प्यार कर पाउँगा जो हर पत्नी अपने पति से चाहती है? क्या मैं उन्हें पूर्ण संतुष्टि दे पाऊंगा?
मैं उनसे बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ। उनके सिवा किसी और के साथ मिलन की कल्पना न मैंने कभी की है, और न कभी करूँगा। मेरा बस एक ही अरमान है—उन्हें हर मुमकिन खुशी देना और दुनिया का सारा सुकून उनके कदमों में लाकर रख देना।
मुझे अंदर ही अंदर यह महसूस हुआ कि मैं वाकई बहुत खुशनसीब हूँ। मुझे पत्नी के रूप में ऐसी लड़की मिली जो बचपन से आज तक मुझे इतना प्यार करती आई है और आज भी उनके दिल में वही शिद्दत है। मैं जानता हूँ कि वह ज़िंदगी भर मुझे इसी तरह टूटकर चाहेगी। मेरी सिंगल पैरेंट होने की वजह से शायद इसीलिए उन्होंने मुझे हमेशा सबसे ज्यादा प्यार दिया। उनके दिल में हमेशा मेरा ही बसेरा रहा और उनके सारे सुख-दुःख बस मेरे ही इर्द-गिर्द घूमते थे। आज नसीब हमें ज़िंदगी के उस मोड़ पर ले आया है, जहाँ हम सगे माँ - बेटा होने के बावजूद दुनिया के सबसे मज़बूत और खूबसूरत बंधन में बंध गए हैं।
माँ - बेटे के उस अटूट रिश्ते से तो हम पहले ही जुड़े थे, लेकिन आज इस नए बंधन ने हम दोनों को और भी ज्यादा मजबूती से एक-दूसरे के साथ जोड़ दिया है। माँ के लिए मेरे मन में जो प्यार था, उसमें अब एक पति का समर्पण भी जुड़ गया था और मैंने अपने दिल के सारे अहसास निचोड़कर उनके नाम कर दिया। उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी में जमा किया हुआ सारा प्यार अपने नए पति के लिए लुटा दिया। अपने 'बेटे' के लिए जो मोहब्बत थी, उसमें पत्नी वाला हक़ मिलाकर उन्होंने अपना दिल पूरी तरह मेरे सामने खोलकर रख दिया था।
उन्होंने खुद को, अपने तन-मन और अपनी रूह को पूरी तरह अपने बेटे, अपने पति के पास सरेंडर कर दिया था। उनके सामने खड़े होकर उसकी आँखों में देखते हुए मैं यह सब कुछ गहराई से महसूस कर रहा था। उस भीड़ भरे स्टेशन और ट्रेन के शोर-शराबे के बीच, हम बस कुछ पल यूँ ही नज़रें मिलाकर एक-दूसरे से दिल की हज़ारों बातें कह रहे थे।
जब हम ट्रेन में चढ़े थे, तो कंपार्टमेंट मुसाफिरों से खचाखच भरा था। लोग जल्दी-जल्दी अपना डिनर निपटाकर सो गए। मेरा और माँ का बर्थ ऊपर-नीचे था। मैं ऊपर जाकर लेट गया और माँ नीचे चादर ओढ़कर सो गई। शादी के बाद एक पति-पत्नी की पहली रात, जो एक साथ एक ही छत के नीचे गुज़रनी चाहिए थी, वह ट्रेन के इन अलग-अलग बर्थ पर गुज़र रही थी। शायद ही किसी के साथ ऐसा होता होगा, पर हमारे साथ तो खैर बहुत कुछ ऐसा हो रहा था जो आम नहीं था।
मैंने एक बार ऊपर से झुककर नीचे माँ को देखा। वह मुड़कर मेरी ही बर्थ की तरफ देखते हुए लेटी थी। जैसे ही हमारी नज़रें मिलीं, उनके होंठों पर एक कोमल सी मुस्कान तैर गई। मैं बस उन्हें एकटक देखता रहा। उन्होंने अपनी चादर को थोड़ा और गले तक खींच लिया, जैसे उस गर्माहट में खुद को समेटना चाह रही हो, और फिर अपनी आँखें मूंद लीं।
थोड़ी देर बाद जब उन्होंने दोबारा आँखें खोलीं, तो हमारी नज़रें फिर से उलझ गईं। माथे पर वह लाल बिंदी और होंठों की वह प्यारी सी मुस्कुराहट—शादी के इस रूप ने उन्हें पूरी तरह बदल दिया था। वह बिल्कुल उस अल्हड़ और कुंवारी लड़की जैसी लग रही थी जिसकी अभी-अभी शादी हुई हो और जो अपने पति को पहली बार एक अलग हक़ से देख रही हो। फिर उन्होंने अपना चेहरा दाईं तरफ घुमा लिया और आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगी।
अगली सुबह जब हमारी नींद खुली, तो पिछले स्टेशन पर कुछ मुसाफिर पहले ही उतर चुके थे। इस वजह से कोच अब थोड़ा खाली और शांत लग रहा था। हमारे सामने वाली बर्थ पर बस एक अधेड़ उम्र के अंकल बैठे थे। तभी ट्रेन में चाय वाला आया, जो गरम पानी का फ्लास्क, चीनी के पैकेट, मिल्क पाउडर और टी-बैग्स दे गया।
मैंने जैसे ही चाय बनाना शुरू किया, माँ ने धीरे से टोकते हुए कहा, "लाइए, मुझे दीजिए। मैं बनाती हूँ।" और वह चाय बनाने लगी। मेरी पत्नी बनने के बाद भी, उनके व्यवहार में वही पुरानी फिक्र और ममता थी जो वह बचपन से मुझे देती आई थी। मैंने भी मन ही मन खुद से वादा किया कि पति बनने के बाद भी उनके लिए मेरा सम्मान और केयर कभी कम नहीं होगी।
हम चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बस एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे। यह वह पहली सुबह थी जो हर जोड़े की ज़िंदगी में सिर्फ एक बार आती है—शादी के ठीक अगले दिन की पहली सुबह। हम उन बेशकीमती पलों को अपने दिल में कैद कर रहे थे। हमारे सामने बैठे अंकल ने हमसे परिचय किया और जब उन्हें पता चला कि हम नई-नई शादी करके मेरी जॉब वाली जगह जा रहे हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हमारी जोड़ी बहुत खूबसूरत है।
बातों-बातों में उन्होंने पूछ लिया, "लव मैरिज है या अरेंज्ड?"
यह सवाल सुनते ही माँ और मैं कुछ पलों के लिए खामोश हो गए। उन्हें कैसे समझाते कि हमारा रिश्ता क्या है? मैंने तुरंत बात संभालते हुए कहा, "अरेंज्ड मैरिज है।"
मेरी बात सुनकर वह व्यक्ति बोले, "बहुत कम लोगों में अरेंज्ड मैरिज के बाद इतना प्यार झलकता है, जितना आप दोनों को देखकर लग रहा है।"
मैं और माँ एक-दूसरे को देखने लगे। मन ही मन हमने सोचा कि इन्हें क्या पता कि नसीब के किन फेरों ने हमें आज यहाँ लाकर खड़ा किया है। हम एक ऐसा जोड़ा थे, जैसा शायद ही दुनिया में कहीं और मिले। हमारे बीच जो प्यार था, वह दुनिया के किसी भी बंधन से कहीं ज़्यादा गहरा और मज़बूत था।
कुछ घंटों के सफर के बाद हम मुंबई पहुँच गए—यह वही शहर है जिसे अब से हम अपना घर कहेंगे और यहीं अपनी एक नई दुनिया बसाएंगे। जैसे ही ट्रेन रुकी, मैं और माँ प्लेटफॉर्म पर उतरे। मैंने माँ को उतरने में मदद करने के लिए हाथ बढ़ाया, उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ा और नीचे उतर आई।
उतरने के बाद माँ के चेहरे पर वह मुस्कुराहट बरकरार थी, पर अचानक कुछ याद करके उन्होंने मेरे हाथ पर अपनी ग्रिप ढीली कर दी। वह थोड़ा शर्माई और मेरा हाथ छोड़कर अपना हाथ पीछे खींच लिया। फिर वह नज़रें घुमाकर प्लेटफॉर्म की दूसरी तरफ देखने लगी। मैं अब भी उन्हें ही देख रहा था; माँ आज बहुत खुश लग रही थी। उनके होंठों पर जो मुस्कान सजी थी, उसे ताउम्र देखने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ।
हमने टैक्सी में अपना लगेज लोड किया और अपने घर की तरफ निकल पड़े—वह घर जो आज से 'हमारा' होने वाला था। प्लेटफॉर्म पर माँ ने जो मेरा हाथ छोड़ा, उनके बाद उन्होंने फिर मेरा हाथ नहीं पकड़ा। मेरा दिल चाह रहा था कि वह मेरा बाज़ू पकड़कर मेरे एकदम करीब होकर चले, पर वह पास होकर भी मेरे स्पर्श से दूर रह रही थी। शायद उनके मन में भी मेरे जैसी ही कोई बेचैनी और अनुभूति हो रही होगी। मेरे ही जैसा एक तूफ़ान उनके अंदर भी उठा होगा। एक ऐसा अद्भुत सुख, जो न मैंने कभी पाया और जिसे पाकर भी वह ज़िंदगी में कभी उसका ठीक से आनंद नहीं ले पाई थी—उस सुख को पाने के लिए शायद उनका मन भी तरस रहा होगा। और शायद इसीलिए, वह खुद को काबू में रखने के लिए मुझसे थोड़ी दूरी बनाकर रख रही थी।
टैक्सी की पिछली सीट पर माँ खिड़की के पास बैठकर बाहर की तरफ देख रही थी। वह इस नई जगह और नई ज़िंदगी में खुद को ढालते हुए, इस नए रिश्ते को अपने दिल में और भी मजबूती से बसा रही थी। रास्ते भर मैं उन्हें बताता रहा कि हमें कितनी दूर जाना है, मार्केट किस तरफ है और मेरा ऑफिस किधर पड़ता है। वह बस बीच-बीच में एक मुस्कुराहट के साथ मेरी तरफ देखती और फिर बाहर की तरफ नज़रें घुमा लेती।
खिड़की की तरफ उनका बायाँ हाथ उनकी गोद में रखा था और दाहिना हाथ मेरे और उनके बीच की खाली सीट पर। मेरा मन बुरी तरह मचल रहा था कि बस उनका वह हाथ अपने हाथ में ले लूँ। बातों-बातों में मन में यह ख्याल तो सौ बार आया, पर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। हम अब पति-पत्नी थे, पर फिर भी अंदर एक अजीब सा संकोच काम कर रहा था। इतने सालों तक जिस औरत को मैंने सिर्फ एक माँ की नज़र से देखा और छुआ, आज उसे अपनी पत्नी के रूप में देख तो रहा था, मगर छूने में एक झिझक आड़े आ रही थी। शायद उनके अंदर भी अपने बेटे को अब पति के रूप में अपनाने और छूने में वैसी ही शर्म होगी।
अब मुझे एहसास हो रहा था कि पिछले 6 सालों से कल्पनाओं में उनके साथ मिलन के जो सपने मैंने देखे थे, हकीकत की ज़मीन पर आकर उन्हें पूरा करना इतना सहज और आसान नहीं था। माँ जितनी बार मेरी तरफ देखती, मेरे सीने के अंदर एक अजीब सी झनझनाहट होने लगती। खिड़की से आती हवा की वजह से जब वह मेरी तरफ देखती, तो उनकी सुंदर आँखें थोड़ी भिंच सी जातीं। फिर भी उनके चेहरे की मुस्कान और आँखों में एक गहरा प्यार साफ़ झलक रहा था।
मैंने मन ही मन थोड़ी हिम्मत जुटाई और सामने की तरफ देखते हुए अपना बायाँ हाथ बढ़ाकर उनके दाहिने हाथ पर रख दिया। मेरी उंगलियाँ बस उनकी उंगलियों को छू भर रही थीं। तभी माँ ने बाहर देखते हुए अपना हाथ थोड़ा अपनी ओर खींच लिया। मैंने हार नहीं मानी और दोबारा हाथ बढ़ाकर उनकी उंगलियाँ पकड़ लीं। अब उन्होंने हाथ हटाया तो नहीं, पर उंगलियों को मुट्ठी की तरह भींच लिया, जैसे मेरे स्पर्श से दूर भागना चाह रही हों। मेरे मन में एक ज़िद सी आ गई कि हमारे बीच पति-पत्नी बनने के बाद यह जो संकोच की दीवार है, वह अभी खत्म हो जाए।
मैंने अपना हाथ उनके हाथ पर मजबूती से टिका दिया और अपनी ग्रिप में उनका हाथ थाम लिया। उन्होंने धीरे से हाथ छुड़ाने की कोशिश तो की, पर खींचकर ले नहीं गईं। मैंने उनकी तरफ मुड़कर देखा। वह अब भी होंठों पर मुस्कान लिए बाहर देख रही थीं। मैंने धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ उनकी उंगलियों में फँसाकर (intertwine करके) उन्हें थाम लिया। तभी उन्होंने मेरी तरफ देखा। उनके चेहरे पर शर्म, एक्साइटमेंट और चाहत का एक मिला-जुला भाव था। उन्होंने आँखों ही आँखों में इशारा करते हुए मुझे ड्राइवर की तरफ देखने को कहा।
फिर एक बनावटी गुस्से वाला चेहरा बनाया, जैसे वह कहना चाहती हों— "यह क्या कर रहे हैं आप? आगे ड्राइवर बैठा है, मिरर में देख रहा होगा। छोड़िए, मुझे शर्म आ रही है।"
उनका इस तरह शर्माना मुझे और भी मज़ा देने लगा। मैंने उनका हाथ छोड़ा तो नहीं, बल्कि अपनी ग्रिप और मज़बूत करते हुए उनकी उंगलियों को अपनी मुट्ठी में और कस लिया। माँ ने तुरंत अपनी नज़रें घुमा लीं और बाहर की तरफ देखने लगी। मेरे चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी और मैं बस उन्हें ही निहारे जा रहा था। फिर मैंने उनका हाथ वैसे ही पकड़े रखा और अपनी नज़रें सामने की तरफ घुमा लीं।
तभी मुझे महसूस हुआ कि माँ अपनी मुट्ठी धीरे-धीरे खोल रही है और अपनी उंगलियों से मेरी उंगलियों को थाम रही है। मैंने नीचे हाथों की तरफ देखा—हमारी उंगलियाँ एक-दूसरे में पूरी तरह उलझी हुई (intertwined) थीं और हम दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ रखा था। मैंने उनकी तरफ देखा, तो वह बाहर देखते हुए भी समझ गईं कि मेरी नज़रें उन पर ही हैं। वह और भी ज़्यादा शर्मा गईं और अपनी हंसी को होंठों के बीच दबाने की कोशिश करने लगीं। उन्होंने अपने बाएं हाथ की कोहनी खिड़की पर टिकाई और एक उंगली को मोड़कर बार-बार अपने होंठों को छूने लगीं।
मैं समझ गया था कि माँ के अंदर की वह झिझक अब खत्म हो रही है और वह अपने बेटे के साथ इस नए रिश्ते में धीरे-धीरे खुद को खोल रही है। एक पत्नी होने का एहसास उनके चेहरे पर साफ़ था और उनके दिल की सारी खुशी झलक रही थी। मेरा मन किसी बच्चे की तरह खुशी से झूम उठा। टैक्सी में हम दोनों अलग-अलग तरफ देख रहे थे, लेकिन एक-दूसरे का हाथ पकड़कर हम जैसे बिना कुछ कहे वादा कर रहे थे कि ज़िंदगी की किसी भी परिस्थिति में यह साथ कभी नहीं छूटेगा।
माँ की ऐसी अदाएं मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं। मैं जितनी बार उन्हें देख रहा था, बस यही दुआ कर रहा था कि यह पल, यह एहसास कभी खत्म न हो। हवा के झोंकों के साथ उनके बाल उड़कर मेरे चेहरे को छू रहे थे। मेरे गाल, नाक और आँखों पर उनके बालों का वह हल्का सा स्पर्श मुझे एक रूहानी खुशी दे रहा था। उनकी वो धीमी हंसी और उनके मोतियों से चमकते दांत उनकी हंसी को और लुभावना बना रहे थे। मेरा मन कर रहा था कि बस उन्हें अपनी बाँहों में भर लूँ और जी भर कर प्यार करूँ। माँ और मैं एकांत में एक दूसरे को अपना बना कर पाने की चाहत में अंदर ही अंदर उबलने लगे.
पर मेरे मन में उठी एक छोटी सी फ़िक्र ने अचानक उस पूरी ख़ुशी को फीका कर दिया। रात में भी कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था, जैसे दिल पर किसी ने बोझ रख दिया हो। माँ ने शायद मेरी आँखों में उस बेचैनी को पढ़ लिया था। उनकी उस वक्त की खामोश नज़रों में एक गहरा दिलासा था, जैसे कह रही हो— "अब आप अकेले क्यों दुखी होते हैं? आज से तो हर सुख और हर दुख हमारा साझा है। हम मिलकर ज़िंदगी के सफर को आसान बनाएंगे और इसे खुशियों से भर देंगे। मैं हूँ न आपके पास, हमेशा के लिए।"
उनकी आँखों की वो तसल्ली पढ़कर तब तो मेरा मन संभल गया था, पर इस वक्त वही पुरानी चिंता फिर से सर उठाने लगी। नाना-नानी की कोशिशों और तकदीर के खेल ने हमें शास्त्र के अनुसार पति-पत्नी तो बना दिया था। माँ भी एक पत्नी के रूप में खुद को ढालकर एक सुनहरी ज़िंदगी के सपने देख रही थी। पर क्या मैं उनकी उम्मीदों पर खरा उतर पाऊँगा? मुझे यकीन है कि माँ एक आदर्श पत्नी साबित होगी, पर क्या मैं एक आदर्श पति बन पाऊँगा? एक औरत के दिल में अपने जीवनसाथी को लेकर जितने अरमान और ख़्वाब होते हैं, क्या मैं उन सबको मुकम्मल कर पाऊँगा?
यही वो सवाल थे जो रह-रहकर मेरे दिल में चुभ रहे थे। मैं जानता हूँ कि मैं माँ को दुनिया में सबसे ज़्यादा चाहता हूँ और ताउम्र चाहूँगा। उसके सिवा मेरी नज़रों में कोई और लड़की कभी आएगी ही नहीं। वह मेरी ज़िंदगी का एकमात्र सच है। हमारी उम्र के फासले को तो हम हर तरीके से पाट लेंगे, पर जब एक पति-पत्नी की सामान्य ज़िंदगी के बारे में सोचता हूँ, तो वही मायूसी फिर से घेर लेती है।
मैं जानता हूं उनके साथ मेरा हर पति पत्नी की तरह शारीरिक संपर्क होने वाला है। हम माँ बेटे के रिश्ते को दिल में रख कर एक पति पत्नी की तरह जिएंगे। वह भी जानती है शादी के बाद उनका बेटा अब एक पति के अधिकारो से उनके तन और मन को प्यार करेगा और वह इसके लिए जरूर खुदको तैयार भी की होंगी।
लेकिन मैं जब अपने लोड़े के बारे में सोचता हूं तो एक डर मन में पैदा होता है। मेरा लोड़ा नॉर्मल से थोड़ा बड़ा और मोटा तो है ही, पर जब वो उत्तेजना से खड़ा होता है, तब उसका कैप एक दम बड़े से बॉल जैसा बन जाता है।
क्या मैं, माँ के साथ ठीक तरह से शारीरिक सम्बन्ध बना पाउँगा?? क्या मैं उनको बिना दर्द दिए वो प्यार कर पाउँगा जो हर पत्नी अपने पति से चाहती है? क्या मैं उन्हें पूर्ण संतुष्टि दे पाऊंगा?
मैं उनसे बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ। उनके सिवा किसी और के साथ मिलन की कल्पना न मैंने कभी की है, और न कभी करूँगा। मेरा बस एक ही अरमान है—उन्हें हर मुमकिन खुशी देना और दुनिया का सारा सुकून उनके कदमों में लाकर रख देना।
मै हितेश। बचपन से मैं अपने नाना नानी और माँ के साथ रह के बड़ा हुआ । फादर न रहने के कारन मेरे नाना नानी ने कभी कोई कमी नहीं छोड़ी प्यार और सपोर्ट देने में। माँ ने हमेशा आपनी ममता और प्यार से मुझे पाला। नाना के पास पैसा होने के कारण मुझे कभी कुछ भी चीज़ की कमी महसुस करने नहीं हुई। मैं बहुत ही अच्छा स्टूडेंट था इस लिए सब लोग मुझे प्यार ही प्यार देते थे। मैं बदमाशी भी करता था पर इतना नहीं जो की बिगडे बच्चे करते है। छोटा मोटा शरारत करता वह अपनी तरीके से माफ़ किया कर देते थे। पर हाँ...मुझे हमेशा अच्चा वैल्यूज और मोरालिटी के साथ की पाला । बाहर ज़ादा लोगों के साथ मेरी दोस्ती भी नहीं थी। नाना नानी और माँ सब मेरे दोस्त भी थे और टीचर भी। डांटते भी थे , फिर सीखाते भी थे। हम चारों का एक स्ट्रॉन्ग बॉन्डिंग था। मेरे पिताजी के गुजर जाने के कुछ साल बाद , मेरे नाना नानी ने मेरी माँ की दोबारा शादी करवाने के लिए कोशिश कि थी। तब मेरी माँ 20-21 साल की थी।
और आज भी वो 24 - २5 की ही लगती है । बहुत सुन्दर देखने में। स्लिम और गोरी, लम्बे बाल था , पान के पत्ते जैसा मुह का शेप। उनकी आँखे , आय ब्रोव्स , नाक, होठ सब कोई अर्टिस्ट का बना हुआ लगता है। Bsc तक पढ़ी है।
उसके बाद जिन्दगी में हदसा और बाद में मेरी देख भाल करने में जुट गई। मेरी और कोई मौसी या मामा नही है । सो नाना नानी की वही देख भाल करती थी। घर का काम भी करती थी , फिर मुझे पढाती भी थी और टाइम मिलता तो वह बड़े बड़े लेखको के नावेल स्टोरी पड़ने में उस्ताद थी। एक बेटी होने के कारण नाना नानी भी उनका घर में रहने का सब बंदोबस्त कर दिये थे। मेरे नानी भी इतने ओल्ड नहीं थे। पर मेरी माँ मेरे पिताजी का फॅमिली नहीं होने के कारण नाना नानी के फॅमिली को ही अपनी फॅमिली समझ के सब की देखभाल करती थी। शायद इस में उनको ख़ुशी मिलती थी और वक़्त भी गुजारने का तरीका मिला था। वह शांत स्वाभाव की थी पर हंसी की बातों से हस्ती और टीवी में दुःख दर्द भरी फिल्म देखके मायूस भी हो जाती थी।
कुछ लोग नाना जी के पास उनकी शादी का प्रपोजल भी लाए थे। पर मेरी माँ ने कैंसिल कर दिया। स्टार्टिंग में नाना नानी माँ पर गुस्सा करते थे । माँ के भविष्य के लिए वह बोलते थे की सारी ज़िन्दगी पड़ी है तेरी, कैसे गुजारेगी। और यह भी कहते थे की हितेश को भी तो एक बाप की इच्छा होती होगी। पर माँ का कहना था की अगर उन्होंने किसी से फिर से शादी कि तो वह आदमी अपना अधिकार दिखा कर हितेश का त्याग करने को कहेगा और नाना नानी को छोड़ के भी जाने लिए कहेंगा। अब इस सिचुएशन ये उनके लिए सम्भव नहीं था वह मुझ से दूर नहीं रह सकती थी, और नाना नानी को अकेले छोड़ के और किसी फॅमिली में जाके अपनी गृहस्थी नही बसा सकता थीं। माँ ने मेरा मुह देख के उनकी सब खुशियां विसर्जन कर देने का फैसला किया । नाना नानी धीरे धीरे उनकी बात मान ने लगे , पर अंदर ही अंदर फ्यूचर को लेके परेशान थे।
इसी बीच मैं बड़ा होते रहा. नाना नानी को में बहुत बहुत प्यार करता था. उन लोगों से दूर नहीं रह पाता . वह लोग मेरी दुनिया बन चुके थे. सबसे ज़ादा प्यार मैं माँ को करता था. उनका सब कुछ मुझे बहुत अच्छा लगता था. वह जो कहे, जो करे, जो खाना बनाये, जो कपडा ख़रीदे मेरे लिये..सब...सब कुछ मुझे अच्छा लगता था. इतनी अच्छी होने के बाद भी उनको ज़िन्दगी ने बहुत कुछ नही दिया . हम सब का ख्याल रखा, सब की जिम्मेदारी उठाना मेरे अंदर उनके लिए एक अद्भुत प्यार था . मैंने कभी उनको दुःख न देने की कसम खाई थी .
नाना का घर काफी बड़ा था. नाना नानी एक बड़ा से रूम में रहते थे मैं माँ के साथ रहता था दूसरे एक बड़े कमरे में. घर में और भी तीन रूम है. जो खाली पड़े है. पर मैं जैसे जैसे बड़ा होता गया मेरे लिए एक स्टडी रूम बना. फिर में अकेला सोने लगा.
मैने हमेशा एक डिफरेंस देखा. मेरे बाकि दोस्तोँ की माँ और मेरी माँ में बहुत अंतर है. वह सब एक भारी भरकम माँ जैसे होती थी, पर मेरी माँ उन लोगों की बेटी जैसे लगती थी.
एक तो उम्र बहुत कम है. साथ में वह देखने में बहुत सुन्दर थी. उनको रास्ते में जाते हुए देंखे तो कॉलेज की लड़कियों की तरह लगती थी. पर किसको मालूम की उनको मेरे जैसा एक बेटा है और उनकी ज़िन्दगी में एक भयानक हदसा हो चुका है..
मैने इंजीनियरिंग के फर्स्ट इयर में एडमिशन ले लिया. मेरे रूम में भी कंप्यूटर आ गया . मेरे मन में नाना नानी और माँ के प्रति शद्ध भक्ति और प्यार , पहले जैसा ही था पर अंदर ही अंदर मेरा माँ के प्रति एक दूसरी तरह का प्यार मन में जन्म ले लिया. कब कैसे यह सब हुआ , मुझे भी पता नहीं चला. मेरे मन में उनके लिए दीवानगी जन्म लेने लगी .
मेरे ख़यालों में सिर्फ वह ही आती है. और कोई कभी एंट्री नहीं ले पाया आज तक्. मेने धीरे धीरे उनको अलग नज़रिये से देखना शूरु किया..पर सब का नज़र छुपाके, एवं माँ को भी आज तक पता नहीं चला. वह आज भी हमेशा के तरह सोते टाइम एक गिलास दूध लेके आती है, बिस्तर ठीक करवाके मेरे पास आती है और मेरे बालों पे प्यार से उँगलियाँ फ़िराती है. और थोड़ी देर बाद एक प्यारी सी स्माइल के साथ गुड नाईट कह के चली जाती है.
मैं जब उनको सोच के हिलाता हू, तोह मेरा तन मन एक नशे से भर जाता है और मुझे सब से ज़ादा संतुस्टि मिलती है.
मां हमेशा लाइट कलर की नेल पोलिश पसंद करती है. जब भी वह किसी के घर शादी या और कोई प्रोग्राम में जाती थी तो हल्का सा मेकअप लगा लेती थी. हलका लिपस्टिक उनके होठो को और भी खूबसूरत बना देता था.
वो मेरे साथ मेरी बड़ी दीदी जैसी लगती थी और नाना नानी के साथ लगता ही नहीं था की वह उनका बेटी और मैं पोता हूं. माँ का सब फोटो मेने एक सीक्रेट फोल्डर में छुपाके रखा है. जो केवल मेरे लिए ही है. उस फोल्डर में माँ की हर तरीके की फोटोज है. हस्ते हुये, घुस्से के टाइम, उदासी के फोटोस, प्यार भरी झुकि हुई नज़र का पिक्स, बाते करते वक़्त का पिक्स, काम करते वक़्त का फोटो, मेरे साथ पिक्स है जो नानाजी ने क्लिक किया. और बाकि कुछ जॉइंट फोटो से केवल माँ का पिक्चर काट के अलग कर लिया. ऐसा भरा हुआ है मेरा पिसी माँ का फोटोज से. अब मैं हर रात जब माँ दूध का गिलास देके चले जाती है और सब सो जाते है तो वह फोल्डर खोल के माँ को देखता हू
माँ के लिए प्यार उभर के आने लगता है. तब मैं आहिस्ता से पैंट का ज़िप निकाल के अपना लोड़ा निकालता हू. तब वह और भी बड़ा होने लगता है. मेरा हाथ भी कम पडता है अपनी पाँच उँगलियों से उसको टाइट पकडता हूँ और माँ के साथ मिलन का प्यारा दृश्य की कल्पना करके धीरे धीरे हिलाने लगता हू.
मेरा लोड़ा बहुत मोटा और बड़ा है. और उसका अगला पोरशन सबसे ज्यादा मोटा और राउंड शेप का है.
मेरे देखे हुये बाकि पेनिस की तरह छोटा नही हैं जब ओर्गास्म होता है तब उसके अगले भाग का कैप और भी फूल जाता है और मुठ्ठी की पकड़ में नही आ पता है. पर में ओर्गास्म के टाइम आंख बंध करके माँ के शरीर के अंदर मेरा सीमेन छोड़ने का सुख प्राप्त करने की सोचता हूं।
इसी तरह लाइफ चलती रही और मैं इंजीनियरिंग के लास्ट सेमेस्टर में पहुच गया। मेरा रिजल्ट अच्छा हो रहा था। पढाई में कोई ढील नहीं दि। जब नाना नानी और माँ मेरा इतना ख्याल रखते है, इतना प्यार देते है, तोह में क्यों न उन लोगों को खुश होने का मौका दू !! मेरी पढाई से सब खुश थे।
पढाई का प्रेशर और रात की फैंटसी सेक्स वर्ल्ड के कारण मैं बाकि स्टूडेंट से थोड़ा मेचुरड लगता था। एकबार में माँ के साथ घर की कुछ शॉपिंग में माँ को हेल्प करने के लिए उनके साथ एक सुपर मार्किट गया था । वहाँ मेरा एक क्लासमैट मेरी माँ को मेरी बहन समझ के बात कर रहा था।
जब उसे बताया की यह मेरी माँ है, तो उसकी हालत क्या हुई थी , आज भी मुझे याद है। मेरा अच्छा ख़ासा मेनली अपीयरेंस के कारण कॉलेज में कुछ लड़कियां मेरे साथ क्लोज होने की कोशिश करती थी लेकिन मुझे मेरी माँ के अलावा कोई भी अच्छी नहीं लगती थी। इस लिए शायद में अपनी माँ के ही प्यार में पडा। पर ये मेरे मन की बात मन में ही रहती थी।
मुझे यह भी मालूम था की मुझे एक दिन किसी दूसरी लड़की से शादी करनी पडेगी। मुझे मालूम था की मैं मन में जो भी सोच के रोज खुश हो जाऊं, मुझे एक दिन एक लड़की को चुनना पड़ेगा को मेरी बीवी बनेगी । तब मुझे एक डर भी लगता था। क्युकी मेरा लोड़ा और बाकि सब के जैसा नही है। यह बहुत मोटा और आगे का कैप बहुत बड़ा राउंड शेप का है। फिर रस स्खलन के टाइम तो टोपा फूल के और भी बड़ा हो जाता है। मैं कैसे अपनी बीवी के साथ सेक्स करूँगा। यह सोच के में कभी कभी मायुस हो जाता था।
मेरे फाइनल एग्जाम से पहले मुझे जॉब मिल गया M.P. में। एक बहुत बड़ा इंजिनेअरिंग कंस्ट्रक्शन कम्पनी में। भारत की पुरानी कंपनी में से एक है। उस दिन घर में जब मैने यह न्यूज़ दिया , तो सब ख़ुशी से झूम उठे। इस लिए नहीं की मुझे सैलरी मिलेगी, वह लोग खुश इसलिए थे यह लडका, जिसका बाप बचपन में चल बसा, उसको उसके नाना नानी और माँ ने पाल के एक इंडिपेंडेंट आदमी बना दिया। नाना का पैर छुआ तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया। नानी का पैर छुए तो उन्होंने मेरे सर पे हाथ रख के अशीर्वाद दिया। नाना नानी बहुत भावूक हो चुके थे। ख़ुशी से आँख नम होक कर छल छल करने लगी। दोनों बहुत सारी बाते करे जा रहे थे। माँ एक साइड में खड़ी होके यह सब देख रही थी। जब में माँ के पास गया, माँ कुछ नहीं बोली। लेकिन उनकी आँखों मैने प्यार और ख़ुशी देखी।
मेने उनके पैर छुए तो वह मुझे पकड के गले मिल गई पर मैं 5'11'' का था , वह 5' 5'' कि, तो उनका सर मेरे गले के पास कंधे में टिक गया।
उन्होंने मुझे पकड़ के रखा कुछ मोमेन्ट्स। फिर छोड़ के मेरे दोनों गालो को दोनों हाथ से पकड के, आँखों में बहुत सारा प्यार लेके और होठो में ख़ुशी का स्माइल लेके मुझे देखा । फिर मुझे नाना ने बुलाया तो में उनके पास गया। माँ और नानी किचन में चली गयी मेरे लिए खीर बनाने के लिए। जब भी कुछ ख़ुशी की बात होती थी तो घर में खीर बनती थी। मैं खीर बहुत पसंद करता हू। आज भी मेरे घर में खीर की परंपरा जारी है।