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Thriller कातिल (समाप्त)

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Update :- 2, 3, 4 and 5 :check:

Kafi shandaar tarike se case ki investigation ko darshaya hai bro...maza aa gaya :thumbup:
Dhanyawaad mitra :thank_you:
Idhar ke update read karne ke baad to filhaal yahi lagta hai ki wo laundiya kisi aise vyakti ka mohra ho sakti hai jiski romesh se personal dushmani hai...jaisa ki romesh aur ragini ne khud bhi kaboola hai. Iske alawa dusra koi reason filhal dikh nahi raha. Baaki dekhte hain :smoking:
Lagta to mujhe bhi aisa hi hai, baaki to samay hi batayega kya sach or kya jhooth :D
SI devpriya pakka ghar me apni biwi se rojana pitta hoga aur modern zamane ki nayi nayi gaaliya sunta hoga is liye uska lahja aisa hai...ghar par biwi par jor nahi to kahi aur jor chalaao...bechara :hehe:
:lol:
Kumar Gaurav...kya hero banega re tu, ek ladki se choona lagwa liya..hat lauda :buttkick:
Pel nahi paya hoga man :shhhh: Aise me to londiya chhod ke hi jayegi :D
Anyway interesting case hai bro...aise cases wali stories padhne me maza aata hai..isi liye thriller prefix me murder Mystery aur suspense se sarabor story pasand hai apan ko :yes2:
Aapki pasand sir aankho pe subham bhaiya , apun kosis karega aapko maja aaye isme, agar na aaya to doosri likh denge :declare:
Sare update shandaar aur lajawaab the, keep it up men :thumbup:
Thank you very much for your wonderful review and support bhai :hug:
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Kya kare dosto...ab pahle jaisa time nahi milta :dazed:

Time ki kami ke chalte apni koi story restart nahi kar sakta bro. Aap logo ko bhi pata hai ki story likhne ke time aur fresh mind bahut zaruri hota hai. Job aur personal life ki vajah se itni vyastata hai ki story likhne ka khayaal tak zahen me nahi aa pata. Well, pahle wali koi story restart karne ka time to nahi hai aur na hi time ki kami ki vajah se waisa mood ban sakta hai but ek new short story hai zahen me to time nikaal kar use hi thoda thoda likh kar yaha post karuga. I hope ek do din me post kar saku.... Raj_sharma ki is story jaisi hi hogi...I mean thriller prefix me...murder Mystery aur suspense me :declare:
Great man, apun wait karega :yes2:
 

Sushil@10

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#05

अंबेडकर हॉस्पिटल के पिछले गेट से थोड़ी सी दूरी पर ही कुमार की वही नीले रंग की वेलिनो खड़ी हुई थी।

इस वक़्त उस गाड़ी को तीन चार पुलिस वाले घेर कर खड़े हुए थे,और कुछ लोग उस गाड़ी की जाँच में लगे हुए थे।

मै उन लोगों के हावभाव से ही पहचान गया था कि वे फोरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग है।

गाड़ी के पास ही एसआई देवप्रिय भी मुस्तैदी के साथ खड़ा हुआ था।

हमें कुमार के साथ देखते ही उसकी न केवल भवे तन गई थी, बल्कि उसकी पेशानी पर बल भी पड़ चुके थे।

"क्या बात है, पूरा गैंग ही एक साथ घूम रहा हैं"

पता नही इस बन्दे का नाम देवप्रिय किसने रखा था, न बरखुरदार की शक्ल अच्छी थी, और न ही बाते ऐसी करता था, की किसी को भी प्रिय लगे।

"गैंग से क्या मतलब है आपका" मुझ से पहले ही रागिनी ने देवप्रिय से उसकी बात का मतलब पूछ लिया था।

"आप मे से एक बन्दे की गाड़ी चोरी हुई है, और उस गाड़ी में किसी के ताजा खून के धब्बे और निशान पाए जाते है, एक बन्दे की पिस्टल गायब है, और वैसी ही पिस्टल से निकली एक गोली किसी की जान भी ले चुकी होती है, और फिर भी आप लोग इसलिये मासूम बनकर पुलिस के सामने पेश आते है, क्यों कि इन लोगो ने पहले से ही अपनी गाड़ी और पिस्टल की चोरी की रपट पुलिस में लिखवाई हुई होती है" देवप्रिय हम लोगों को एक साथ देखते ही अपने नतीजे पर पहुंच भी चुका था।

"आपको तो इस इलाके का डीसीपी होना चाहिए था देवप्रिय जी, आप की प्रतिभा के साथ तो बहुत बड़ा अन्याय है कि आप अभी तक सिर्फ एसआई की पोस्ट तक ही पहुंचे हो" मैने तंज भरे स्वर में देवप्रिय को बोला तो उसने खा जाने वाली नजरो से मुझे देखा।

"क्यो क्या मैं कुछ गलत कह रहा हूँ" देवप्रिय जले भूने स्वर में बोला।

"आप बताइए कल रात से मेरी पिस्टल की चोरी होने की रपट पर आपने अभी तक क्या कार्यवाही की है, उसे ढूंढने की कोई एक भी कोशिश की है तो, जरा मेरी जानकारी में भी ला दो, और जब हम अपने प्रयासों से अपनी चोरी हुई चीज को ढूंढने की कोशिश में इस बन्दे तक पहुंचते है, जिसकी गाड़ी चुराकर वो लड़की मेरे घर तक आई थी, तो ये सब आपको हमारी मिली भगत लगती है, आप पर तो सचमुच बलिहारी होने का दिल कर रहा है, आपका नाम तो राष्ट्रपति के पास गोल्ड मेडल देने के लिए दिल्ली पुलिस को भेजना चाहिए"

मेरी बात सुनकर देवप्रिय के कांटो तो खून नही था, वो समझ नही पा रहा था, की क्या कोई उसकी पुलिसिया वर्दी का खौफ खाये बिना भी उससे इस लहजें मे भी बात कर सकता है।

"ज्यादा हवा में उड़ो मत जासूस साहब, बिना पुलिस की मदद के तुम किसी केस की तरफ पैर करके भी नही सो सकते हो, उसे सुलझाने की बात तो बहुत दूर की बात है, रही बात आपकी पिस्टल चोरी होने की रपट पर कार्यवाही की, तो सिर्फ एक यही काम नही रह गया है हमारे पास, सुबह से ही एक लड़की के कत्ल के केस में उलझे हुए है, जो कि आपकी पिस्टल को ढूंढने से ज्यादा बड़ा और जरूरी काम है" देवप्रिय ने मेरी ओर देखकर कुटिलता से बोला।

"अगर आप प्राथमिकता के आधार पर रात को ही मेरी पिस्टल को ढूंढने का प्रयास करते तो शायद इस कत्ल को होने से आप रोक पाते देवप्रिय जी" मैंने ये बोलकर अपने मोबाइल में उस लड़की का फोटो निकाल कर देवप्रिय के सामने रख दिया।

वो गहराई से नजर गड़ाकर उस फ़ोटो को देख रहा था।

"कौन हैं ये" देवप्रिय ने मेरी ओर देखते हुए पूछा।

"ये वही लड़की है, जिसने पहले इनकी गाड़ी चुराई, फिर उस गाड़ी में बैठकर मेरे घर तक आई, फिर मेरे घर से मेरी पिस्टल को चुराकर फरार हो गई" मैने देवप्रिय को बोला।

"लेकिन ये है कौन" देवप्रिय ने फिर से पूछा।

"एक सजा याफ्ता मुजरिम! जिसके बारे में जानकारी आप हमसे ज्यादा जुटा सकते हो" मैने बोला तो देवप्रिय मेरी और हक्का बक्का सा मेरी ओर देखता रह गया।

कुमार गौरव-5

इस वक़्त हम रोहिणी के थाने में बैठे हुए थे। कुमार गौरव के बताए हुए मल्लिका नाम के अनुसार उसका पुलिस रिकॉर्ड खंगाला जा रहा था।

लेकिन मल्लिका के नाम से कोई भी डेटा पुलिस के डेटा में नहीं मिल रहा था।

"आप फ़ोटो की पहचान से इस लड़की को ढूँढिये! शायद इस लड़की को क्यो कि हर जगह सिर्फ फ्रॉड करना होता है, तो ये हर जगह अपना नाम गलत ही बताती हो" मैने देवप्रिय की तरफ देखकर बोला।

देवप्रिय के सुर अब सुधर चुके थे, क्यो कि उसने देख लिया था कि पुलिस की बंधी बंधाई लकीर को पीटने से कुछ हासिल नही होने वाला था, बल्कि जो सवाल उससे मैने किये थे, उन सवालों को उससे कोई भी समझदार पुलिस अधिकारी कर सकता था।

"लेकिन तुम्हारे पास जो फ़ोटो है, वो बहुत धुंधली है, शायद डेटा उसे पकड़ न पाए" देवप्रिय की इस बात में दम था।

"कुमार साहब तुम्हारी तो वो लड़की गर्लफ्रेंड और एम्पलॉई दोनो ही रह चुकी है, तुम्हारे पास तो उसकी कोई फ़ोटो जरूर होनी चाहिये" रागिनी ने कुमार से मुखातिब होकर बोला।

"मैने उससे संबंधित सारा कुछ अपने मोबाइल से डिलीट कर दिया था, इसलिए मुश्किल है मेरे मोबाइल में कुछ मिलना" कुमार ने फंसे हुए स्वर में कहा।

"देखिए! एक बार मोबाइल को अच्छे से चेक कर लीजिए,नही तो मुझे आपका मोबाइल लैब में भेजना पड़ेगा, वहां पर आपका सभी डेटा रिकवर हो जाएगा" देवप्रिय ने उसे समझदारी से समझाया।

"कुमार आप डिलीट हिस्ट्री में जाओ, अगर तुमने फोन का डेटा रिबूट नही किया होगा तो डिलीट हिस्ट्री में सब मिल जाएगा" रागिनी ने कुमार को बोला।

"हाँ फ़ोन तो रिबूट नही किया हैं मैंने, मैं अभी देखता हूँ" मोबाइल को लैब में भेजने की बात सुनते ही जो चेहरा बुझ गया था, वह अब फिर से रोशन हो चुका था।

कुमार अब पूरी तल्लीनता से मोबाइल में घुस चुका था। कोई पांच मिनट के बाद ही एक विजयी मुस्कान के साथ वो मोबाइल से अपनी नजरो को उठाया।

"मिल गई एक फोटो तो मिल गई" कुमार ने सिर उठाते ही घोषणा की। उसके बाद उसने अपना मोबाइल मेरे आगे किया।

उस लड़की की फ़ोटो पर नजर पड़ते ही मैंने भी इस बात की तस्दीक करदी कि ये वही लड़की है, जो कल रात को मेरे घर मे आई थी।

देवप्रिय ने उस मोबाइल को डेटा केबल से जोड़ा और तुरन्त उस फ़ोटो को अपने कंप्यूटर में ट्रांसफर करने लगा।

फ़ोटो ट्रांसफर करनें के बाद उसने मोबाइल को कुमार को वापिस लौटा दिया। अब देवप्रिय के लिये उसकी तलाश आसान होने वाली थी।

देवप्रिय अब अपने पुलिस रिकॉर्ड के सजा याफ्ता मुजरिमो के फोटो सेक्शन में जाकर फ़ोटो ट्रेस कर रहा था। कुछ ही पलों में उसका परिणाम हमारे सामने था।

लड़की का नाम देविका था, और वो दो करोड़ की धोखाधड़ी के केस में छह माह पहले ही जेल में गई थी। अब वो जमानत पर बाहर थी।

"मुझे उस केस की डिटेल मिल सकती है, की किस कंपनी के साथ ये धोखाधड़ी करके जेल पहुंची थी, और इसने क्या धोखाधड़ी की थी" मैंने देवप्रिय की ओर देखते हुए एक हल्की सी मुस्कान के साथ पूछा।

देवप्रिय ने अजीब सी नजरो से मेरी और देखा।

"ये बंसल ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज की किसी डेटा संग्रहण कंपनी में थी, जहां पर इसने कम्पनी के कंज्यूमर डेटा को ही उनकी किसी प्रतिस्पर्धी कंपनी को दो करोड़ में बेच दिया था" देवप्रिय ने न जाने क्या सोचकर मुझे केस डिटेल देने में कोई आना -कानी नही की थी।

"बस इतना काफी है सर! बाकी बंसल ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज से मेरे अच्छे तालुक्कात है, मुझे इस लड़की की वहां से पूरी कुंडली मिल जाएगी" मैने देवप्रिय को बोला, तो देवप्रिय ने अजीब सी निग़ाहों से मेरी ओर देखा।

"भाई किस दुनिया में हो, जानते भी हो कितनी बड़ी कंपनी है ये, महीनों तक तो मिलने तक का अपॉइंटमेंट नही मिलता, इस कंपनी के मालिकों से" देवप्रिय ने बिना किसी जानकारी के ही हवा-हवाई बात बोली।

"जनाब इस कंपनी की सिर्फ एक ही मालकिन है, सौम्या बंसल! इनके पति राजीव बंसल अपने पिता और अपनी सौतेली माँ की हत्या के जुर्म में मेरी मेहरबानी से ही इस वक़्त उम्रकैद की सजा काट रहे है" मैंने ग्रुप ऑफ बंसल इंडस्ट्रीज की पूरी जन्म कुंडली देवप्रिय के सामने रख दी।

"तुम्ही वो प्राइवेट डिटेक्टिव हो जिसने इस केस को सॉल्व करने में डिपार्टमेंट की मदद की थी" देवप्रिय बदले हुए सुर में बोला।

"हाँ ! मैं ही हूँ वो आपका सेवक, रोमेश दी ग्रेट!" मैने हल्का सा अपना सिर नवाकर देवप्रिय को बोला।

"तभी मैं सोचूं की किसी पुलिस वाले से बात करने का इतना सलीका तुम में कैसे है" देवप्रिय अब खिसियाए से स्वर में बोला।

"चलिये जनाब! अब तक जो हुआ सो हुआ, मिट्टी डालिये उन बातों पर, अब आप इस केस पर अपने हिसाब से काम कीजिये, क्यो कि मुझे इस केस पर एक अलग नजरिये से काम करना है, लेकिन दोनो ही सूरत में हम दोनों का मकसद असल अपराधी को पकड़ना ही होगा" मैने देवप्रिय से अब अपने संबंध सामान्य बनाने के लिये ये पहल की।

वैसे भी पानी मे रहकर ज्यादा दिन तक आप मगरमच्छ से बैर नही रख सकते है। क्यो कि बिना पुलिसिया
मदद के एक प्राइवेट डिटेक्टिव चाह कर भी कोई तीर नही चला सकता था।

हम देवप्रिय से विदा लेकर थाने से बाहर आ चुके थे, कुमार की गाड़ी अभी पुलिस के कब्जे में ही थी, क्यो कि एक मर्डर के केस में वो गाड़ी अब बतौर सबूत पुलिस की प्रोपर्टी थी। लिहाजा हमे अभी कुमार गौरव को भी उसके घर पर ड्राप करना था।

इस केस में अब सौम्या बंसल से एक बार फिर से मुलाकात करनें का मौका मिलने वाला था।

शायद साल भर के बाद उससे मिलने का मौका आने वाला था। इसलिए सबसे पहले तो उसकी शिकायतों का पुलिंदा ही मुझे सुनना था।

कुमार को उसके घर पर छोड़कर हम फिर से मेरे फ्लैट पर आ गए थे।

दोपहर का समय होने को आया था, इसलिए मैंने उसी भोजनालय को अपने और रागिनी के लिए लंच आर्डर कर दिया था।

"देविका को हमारे खिलाफ कौन प्लांट कर सकता है" मैने रागिनी की ओर देखते हुए बोला।

"दिल्ली की तिहाड़ में तो आपके भेजे हुए बहुत सारे चाहने वाले है, सौम्या का हस्बैंड राजीव बंसल भी वही हैं, तुम्हारी चहेती मेघना भी वही है, इसके अलावा और भी बहुत लोग है" रागिनी ने मेरी बात का जवाब दिया।

"लेकिन देविका तो लड़की है तो वो तो महिला जेल में होगी" मैंने रागिनी को याद दिलाया।

"महिला जेल में उसकी मुलाकात मेघना के साथ हो सकती है, दोनो की बैकग्राउंड भी एक ही कंपनी के लिये काम करना है, तो दोनो में दोस्ती भी जल्दी हो गई होगी" रागिनी ने तुरन्त दो जमा दो बराबंर चार वाला फॉर्मूला जोड़ा।

"मुझे लगता तो नही की मेघना मुझ से बदला लेने के लिए ऐसा कुछ प्लान कर सकती है" मै रागिनी की इस बात को मानने के लिए तैयार नही था।

"क्यो ! वो तुम्हारी वजह से आज जेल में सड़ रही है, तो कभी तो तुम्हे भी किसी जाल में फ़साने का दिमाग में आया ही होगा" रागिनी की इस बात में दम था।

"एक काम करते है, खाना ख़ाकर तुम सौम्या से बात करो, फिर उससे मिलने चलते है, इस देविका की भी अब पूरी कुंडली निकालना जरुरी है" रागिनी ने लंच की थाली को मेरे सामने रखते हुए बोला।

लेकिन मैं रागिनी के बोलने से पहले ही सौम्या को फोन मिला चुका था। उधर से तीसरी बेल बजने के बाद सौम्या ने फोन उठाया।

"मैं तो आज धन्य हो गई" उधर से सौम्या ने फोन उठाते ही बोला।

"मैं भी कृतार्थ हो गया, इतनी खूबसूरत लड़की की इतनी मधुर आवाज को सुनकर" मै जानता था कि सौम्या फोन उठाते ही ऐसा ही कुछ बोलने वाली थी।

"तुम्हे अगर मेरी सुंदरता की जरा भी कदर होती तो कम से कम रात को सोने से पहले एक फ़ोन तो रोज करते तुम मुझे" सौम्या ने शिकायती लहजें में बोला।

"तुम फोन करनें की बात कर रही हो मेरी जान, मैं तो तुमसे मिलने के लिए बेताब हुए जा रहा हूँ, ये बताओ अभी कहाँ मिल सकती हो" मैंने तुरंत बात बनाई।

"बिना किसी काम के तो तुम मेरे पास आने से रहे, इसलिए पहले काम बताओ, फिर बताऊंगी मैं कहाँ हूँ" सौम्या भी अब बातो को भांपना सीख गई थी।

"सिर्फ तुम्हारे हसीन मुखड़े के दर्शन करने है, और तुम्हारें साथ कॉफी पीनी है, और रागिनी भी मेरे साथ आना चाहती है" मैंने सौम्या को बोला।

"रागिनी भी साथ आ रही है, तो पक्का किसी काम से ही आ रहे हो तुम, चलो तुम मेरे पास आ रहे हो, इतना ही काफी है, राजेन्द्र प्लेस वाले आफिस में हूँ, यही आ जाओ, छह बजे तक यही हूँ" सौम्या ने मुझे बोला।

"ठीक हैं मेरी गुले गुलजार, तुम्हारा ये बिछड़ा हुआ प्यार, सिर के बल दौड़ता हुआ आ रहा है" मेरी बात सुनकर सौम्या की एक जोर की हँसी गूँजी और फिर फोन रखने की आवाज सुनाई दी।

फोन रखते ही मैने देखा कि रागिनी मेरी ओर ही देखे जा रही थी।

"तो तुम सौम्या मैडम का बिछड़ा हुआ प्यार हो" रागिनी ने तंज भरे स्वर में कहा।

"अभी चल रही हो न मेरे साथ, तुम खुद देखना की वो मुझ से ऐसे चिपक कर मिलेगी, जैसे हम कई जन्मों से बिछड़े हुए प्रेमी हो" मैंने रागिनी को बोला।😁

"देखते है! कितना मरे जा रही है वो तुमसे मिलने के लिये, जल्दी से खाना खालो, कही लेट हो गए तो वो सुसाइड न कर ले" रागिनी ने एक कुटील मुस्कान के साथ बोला।

"कुछ जलने की बू आ रही हैं, इस ढाबे वाले ने भी लगता है जली हुई सब्जी भेज दी" ये बोलकर मैने एक सब्जी की कटोरी उठा कर उसकी महक सूंघने लगा।

"औए मिस्टर! जले मेरी जूती, अपना जलवा भी कोई कम नही है" रागिनी ने मुझे हूल दी।

मुझे कई बार रागिनी की इन बातों पर बड़ा मजा आता था।

लेकिन मैं इस बहस को अब अपनी गाड़ी में सफर के दौरान बचाकर रखना चाहता था, इसलिए मैंने अपना पूरा ध्यान अपने खाने में लगा दिया था।


जारी रहेगा_____✍️
Wonderful update and nice story
 

DesiPriyaRai

Royal
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#03

सुबह होते ही मेरे फ्लैट की बेल किसी जहांगीरी घँटे की मानिंद बजने लगी थी।

एक तो वैसे ही रात को देर से सोया था, उस पर से इतनी सर्दी में सुबह सुबह रजाई में से निकलने का सितम।

मैंने एक नजर अपनी दीवार घड़ी पर डाली, अभी सुबह के सात ही बजे थे, रागिनी ने तो नौ बजे आने के लिए बोला था, इस वक़्त इतनी सुबह कौन आया होगा, ये सोचते हुए मैं मन ही मन आने वाले को गली नुमा उपमा से नवाजता हुआ दरवाजे की ओर बढ़ गया।

दरवाजा खोलते ही मुझे सुबह सुबह उस मनहूस पुलिसिये देवप्रिय की शक्ल नजर आई।

मैंने कोतुहल से उसकी तरफ देखा। इतनी सुबह उसके आने का अभिप्राय मेरी समझ से बाहर था।

उसने एक कुटिल मुस्कान से मेरी तरफ देखा।

"चलो ! तुम्हे मेरे साथ चलना होगा, माहेश्वरी साहब भी तुम्हारा बहुत बेसब्री से इंतजार कर रहे है" देवप्रिय की वो मुस्कान बोलते हुए भी उसके चेहरे से लुप्त नही हुई थी।

"क्यो ऐसा क्या हो गया, जो इतनी सुबह सुबह पुलिस को इस नाचीज़ की याद आ गई" मैंने प्रत्यक्ष में देवप्रिय से पूछा।

"पुलिस को एक लड़की की लाश मिली है, और लड़की को गोली मारी गई है, तुम्हे उस लड़की की शिनाख्त करनी है कि क्या ये वही लड़की है, जो बकौल तुम्हारे, तुम्हारी पिस्टल चुराकर भागी थी" देवप्रिय ने इस बार गंभीर स्वर में बोला था।

"ओह्ह लाश कहाँ पर मिली है" मैंने पूछा।

"अब सारे सवालों के जवाब यही पर खड़े हुए चाहिये क्या? साथ चलिये! सब पता चल जाएगा" देवप्रिय फिर से अपनी रात वाली पुलिसिया अकड़ पर उतर आया था।

"कपडे बदलने का मौका तो दीजिये, दो मिनट इंतजार कीजिये आप" ये बोलकर मैं वापिस अंदर की तरफ मुड़ गया।

इस बार देवप्रिय ने कोई प्रतिवाद नही किया, और वही खड़े रहकर मेरे बाहर आने का इंतजार करने लगा।

उसका ये इंतजार कोई दस मिनट चला। इन दस मिनट में मैंने अपने कपङे बदले, आधा अधूरा फ्रेश हुआ और बाहर निकल कर अपने फ्लैट का ताला लगाया।

उसके बाद सुबह सुबह एक लाश की शिनाख्त करने जैसे मनहूस काम के लिये उस मनहूस इंसान के साथ रवाना हो गया।

अनजानी लाश-3

मैं एसआई देवप्रिय के साथ जिस जगह पर पहुंचा था, वो जगह सेक्टर 16 की एक पुलिया थी जो ईएसआई अस्पताल से थोड़ा सा आगे जाकर सेक्टर 16 को उस रोड से जोड़ती थी।

"बड़ी जल्दी आपकी जरूरत पड़ गयी रोमेश बाबू" थाना इंचार्ज इंस्पेक्टर देवेंद्र माहेश्वरी ने मुझ पर नजर पड़ते ही बोला।

"कानून को जब भी इस बन्दे की दरकार होती है, बन्दा तो उसी वक़्त हाजिर हो जाता है" मैंने हल्की सी मुस्कान के साथ माहेश्वरी साहब को बोला।

"मेरे साथ आइए, और देखकर बताइये की कल रात को आपके घर मे घुसकर आपके पिस्टल को चुराने वाली यही लड़की थी क्या" माहेश्वरी साहब ने मेरी ओर देखकर बोला।

मैं धड़कते दिल के साथ उन झाड़ियों की तरफ बढ़ा, जिन झाड़ियों में उस लड़की की लाश पड़ी हई थी।

मैंने एक सरसरी नजर उस लड़की पर डाली और एक राहत की सांस ली।

"ये वो लड़की नही है जनाब" मैंने माहेश्वरी साहब की ओर देखकर घोषणा की।

"ध्यान से देखो, हो सकता है नींद की वजह से तुम्हारी आंखे अभी पूरी तरह से न खुली हो" माहेश्वरी साहब ने हल्के से विनोद भरे स्वर में बोला।

"जिस आदमी के दरवाजे को सुबह सुबह पुलिस खटखटाये, उस आदमी की नीदं खुलती नही है जनाब, बल्कि उड़ जाती है" मैंने माहेश्वरी साहब की बात का जवाब उन्ही के अंदाज में दिया।

"लेकिन जनाब मृतका के शरीर मे जो गोली का घाव नजर आ रहा है, वो बिल्कुल उसी पिस्टल से निकली गोली का हो सकता है, जिसकी गुमशुदगी की रपट रोमेश साहब ने कल रात को ही लिखवाई है" देवप्रिय ने मेरी ओर अपनी शक्की निग़ाहों को डालते हुए बोला।

".32 बोर की पिस्टल क्या पूरे हिंदुस्तान में सिर्फ एक ही शख्स के पास हो सकती है क्या, और बिना पिस्टल की बरामदगी के तुम ये कैसे साबित करोगे की मृतका को लगी गोली उसी पिस्टल से निकली है" मैने उस लड़की के सीने में लगी गोली के घाव को देखते हुए बोला।

"यही बात तो हमारी शक की सुई तुम्हारी और घुमा रही है रोमेश बाबू, आपने इस लड़की को मारने के लिये अपने जासूसी दिमाग का बखूबी इस्तेमाल किया है, पहले अपने पिस्टल के गुम होने की झूठी रिपोर्ट लिखवाई, और फिर उसी पिस्टल से इस लड़की को मारकर अब मासूम बनने का दिखावा कर रहे हो" देवप्रिय एक तरीके से मुझें क़ातिल साबित करने की पूरी थ्योरी बना चुका था।

"मैं खामख्वाह क्यो किसी लड़की को क्यो मारूंगा, मैं तो इस लड़की को जानता भी नही, मैं तो इस लड़की को पहली बार देख भी रहा हूँ तो इस मुर्दा हालत में" मैने देवप्रिय की बात का तुरन्त प्रतिवाद किया।

"तुम इस लड़की को जानते हो या नही, या इससे पहले इसे कभी देखा है या नहीं, ये सब अब हमारी जांच का विषय है रोमेश बाबू" देवप्रिय अब अपने पुलिसिया हथकंडों पर उतर आया था।

"फिर जांच करके पहले साबित कीजिये, साबित कीजिये कि मैं इस लडक़ी को जानता हूँ, साबित कीजिये कि इसको मारने के पीछे मेरा क्या उद्देशय रहा होगा, उसके बाद आप मुझे फांसी पर लटका देना, अगर मुझे इस लड़की को मारना ही होता तो क्या मैं इतना बेवकूफ था, की जिस हथियार से इसे मारूंगा, उसी की गुम होने की रिपोर्ट लिखवाकर पहले से ही खुद को पुलिस की नजर में ले आऊं, आप बताइये, अगर मैं रात को आपके पास रिपोर्ट लिखवाने न आया होता तो क्या आप सुबह सुबह मेरे घर पर आ सकते थे, क्या
आपको सपना आना था कि मैं इस लड़कीं को मारकर यहां डालकर अपने घर पर जाकर सो गया हूँ" मैं एक ही सांस में उस पुलिसिये की खबर लेता चला गया।

उसके पास इस वक़्त मेरी एक भी बात का जवाब नही था। उसने आहत नजरो से अपने साहब की तरफ देखा।

"रोमेश की बात में दम है देवप्रिय, पहले हमें इस लड़की के बारे में जानना चाहिए कि ये लड़की है कौन, यहां इसकों मारकर कौन डाल गया है" माहेश्वरी ने मेरा बचाव करते हुए कहा।

"लेकिन जनाब शक तो इस आदमी पर भी बनता ही है, इसे ऐसे ही कैसे जाने दे सकते है" देवप्रिय ने बुझे हुए स्वर में बोला।

"हम रोमेश को कभी भी पूछताछ के लिए तलब कर सकते है, इन पर इतना भरोसा तो हम कर ही सकते है कि ये पुलिसिया पूछताछ से बचने के लिये कही गायब नही होंगे" माहेश्वरी साहब देवप्रिय से ज्यादा मेरे बारे में ज्यादा जानते थे।

"आप इस बात से निश्चिन्त रहिये सर! इस केस को सुलझाने के लिए मैं साये की तरह से आपके साथ रहूंगा, मेरे गायब होने की बात तो भूल ही जाइये, इलाके के बीसी को सिर्फ हफ्ते में एक बार थाने में हाजिरी देने के लिए बोला जाता हैं, मैं रोज आपके दरबार मे हाजिरी लगाऊंगा" मैने माहेश्वरी साहब की ओर देखकर बोला।

"ठीक है अब तो, ये रोज तुम्हारी नजरो के सामने रहेंगे, जिस दिन भी इस केस में इसके खिलाफ कुछ भी मिले, उसी दिन इसे पकड़कर लॉकअप में डाल देना" ये बोलकर माहेश्वरी साहब अभी देवप्रिय की तरफ देख ही रहे थें, की फोरेंसिक की टीम, फ़ोटोग्राफर और एम्बुलेंस तीनो एक साथ वहां अपनी आमद दर्ज करवा चुके थे।

देवप्रिय मेरी और तीरछी निग़ाहों से घूरता हुआ, आगे की जरूरी कार्यवाही के लिये फोरेंसिक टीम की ओर बढ़ गया।

मैं वही माहेश्वरी साहब के साथ एक कोने में जाकर खड़ा हो गया था।

"वैसे एक बात सच सच बोलो, वाकई ये लड़की वो नही है, जो कल रात को तुम्हारे घर मे घुसी थी" माहेश्वरी साहब ने ये पूछकर ये सिद्ध कर दिया था कि पुलिस वाला आख़िरकार पुलिसवाला ही होता है, उसकी वर्दी पर चाहे कितने सितारे टंगे हो।

"वो लड़की इससे कई हजार गुना सुंदर थी, और जब वो मेरे घर मे घुसी थी तब वो बुरी तरह से भीगी हुई थी, उसके भीगे हुए कपडो से मेरे बेड की वो जगह अभी तक गीली होगी, जहां पर आकर वो लड़की बैठी थी, जबकि ये लड़की तो किसी भी एंगल से नही लग रही है कि ये रात को बरसात में बुरी तरह से भीगी होगी" मैंने एक नई थ्योरी से भी माहेश्वरी साहब को अवगत करवाया।

"तुम अपनी जगह सही हो रोमेश, लेकिन मेरा एक मशविरा है, जितनी जल्दी हो सके अपनी पिस्टल को बरामद कर लो, नही तो आने वाले समय मे कोई भी नई मुसीबत तुम्हारे सामने खड़ी हो सकती है, मैं हर बार अपने मातहत की बात को काटकर उसे नजरअंदाज नही कर सकता हूँ, अगर ये सब कर रहा हूँ तो, सिर्फ इसलिए, क्यो कि मै तुम्हारे ट्रैक को अच्छी तरह से जानता हूँ" माहेश्वरी साहब ने मुझे मेरा हितेषी बनकर अपनी सलाह से नवाजा था।

फोरेंसिक वालो के विदा होते ही मैं भी वहां से अपने फ़्लैट पर आ गया।

अभी दरवाजा खोलकर अंदर घुसा ही था कि रागिनी ने भी मेरे पीछे ही फ्लैट में प्रवेश किया।

"कहीं बाहर से आ रहे हो क्या" रागिनी ने अपना बैग टेबल पर रखते हुए बोला।

"सुबह सुबह एक लाश की शिनाख्त करके आ रहा हूँ, अब इस इलाके में जितने भी मर्डर होंगे, पुलिस सोचेगी की वो मेरी ही पिस्टल से हुए है, इसलिये अब जब तक मेरी पिस्टल नही मिल जाती, मुझे ऐसे ही परेशान करेगे" मैने तपे हुए स्वर में रागिनी को बोला।

"ये तो है, इसलिए पिस्टल को हमे जल्द से जल्द ढूंढना पड़ेगा" रागिनी भी चिंतित स्वर में बोली।

"लेकिन सवाल तो यही है कि कैसे ढूंढे" मैने रागिनी की ओर देखकर बोला।

"यहां आसपास कोई सीसी टीवी कैमरा लगा हुआ है क्या, क्या पता वो लड़की किसी कैमरे की पकड़ में आई हो" रागिनी ने सही दिशा में सोचा था।

"मैंने कभी ध्यान नही दिया है, लेकीन कैमरे आसपास लगे हुए तो जरूर होंगे" मैने रागिनी की बात से सहमती जताई।

"चलो फिर सबसे पहले उन कैमरों को ही ढूंढते है, फिर उनके मालिकों से उनकी फुटेज दिखाने की गुजारिश करते है" रागिनी ने अपनी जगह से उठते हुए बोला।

"अरे पहले कुछ खा पी तो लेने दो, सुबह सात बजे से भूखा प्यासा गया हुआ था" मैंने रागिनी को बोला।

"मैं लाई हूँ ब्रेकफास्ट घर से, तुम इतने फ्रेश हो जाओ, मैं तब तक काफी बनाती हूँ" रागिनी पहले से ही समझदारी वाला काम करके आई थी।

मैंने एक मुस्कराहट भरी नजर रागिनी पर डाली, और बाथरूम में घुस गया।


जारी रहेगा_____✍️

#04

पड़ोस के दो मकानों में ही हमे सीसी टीवी कैमरे लगे हुए नजर आ गए थे। उसके बाद थोड़ी सी आगे जाकर जिस भोजनालय से मेरा टिफिन आता था, उस के बाहर भी मुझे एक कैमरा लगा हुआ मिला।

उन तीनों कैमरों को देखकर उस लड़की के बारे में जानने की कुछ उम्मीदों ने मन ही मन अंगड़ाई ली।

सबसे पहले मैंने उस भोजनालय से ही शुरुआत की।

भोजनालय के मालिक शर्मा जी मेरे अच्छे जानकार थे, इसलिए उन्होने अपने कैमरे की फुटेज दिखाने में कोई गुरेज नही किया।

मैंने करीब 7 बजे से फुटेज को देखना शुरू किया था। रागिनी भी पूरी तल्लीनता से टीवी स्क्रीन पर अपनी नजर लगाये हुए बैठी थी।

तकरीबन पौने आठ बजे के करीब एक नीले रंग की वलोनी कार आकर रुकी थी। उस कार से एक लड़की उतरी और बारिश से बचने के लिये मेरे फ्लैट की ओर तेजी से दौड़ी।

मैने एक नजर रागिनी की ओर उठा कर देखा। रागिनी ने भी मेरी ओर देखा।

"बादशाहों ये गड्डी तो कल रात को मेरे होटल के बाहर काफी देर तक खडी रही थी" शर्मा जी ने हल्के से पंजाबी लहजें में बोला था।

"इस गाड़ी से जो लड़की उतर कर मेरे फ्लैट की तरफ दौड़ती हुई गई थी, उस पर नजर पड़ी थी, क्या आपकी" मैंने शर्मा जी से पूछा।

"ना भईया ! पराई औरतों को देखने का कोई शौक नही रखता जी" :D शर्मा जी की ये बात सुनते ही रागिनी के चेहरे पर बरबस ही एक मुस्कान थिरक उठी थी।

"अब इस फुटेज को साढ़े आठ बजे के आसपास लेकर जाओ, इसी वक्त के आसपास वो लड़की मेरे फ्लैट से गायब हुई थी" मैंने रागिनी की मुस्कान से खिसिया कर उसे बोला।

"पूरी ही देख लेते है सर! क्या पता इस आधे घँटे में गाड़ी से भी कोई और बन्दा उतरा हो, या कोई और आया हो" रागिनी ने बोला तो मैंने भी सहमति में सिर को हिलाया।

"एक बात तो सिद्ध हों गई, की ये लड़की प्री प्लान आई थी, इसने अपनी जान पर खतरे की मुझें झूठी कहानी सुनाई, और किसी खास मकसद से उसने मेरी पिस्टल को भी चुराया" मैंने अभी तक की फुटेज को देखकर अपने आकलन बताया।

"इस बारे में घर पर चलकर बात करेगे" ये बोलकर रागिनी ने फिर से अपनी नजर स्क्रीन पर टिका दी।

अगले चालीस मिनट हमारे बहुत ही बोरिंग गुजरे थे, न तो कोई उस गाड़ी के पास आकर फटका था, और न ही कोई उस गाड़ी से कोई उतरा था।

कोई चालीस मिनट के बाद वहीं लड़की फिर से दौड़ती हुई आई और जैसे ही कार में बैठी, वैसे ही गाड़ी की हेडलाइट की रोशनी सड़क पर बिखर गई।

जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, गाड़ी की पिछली तरफ लगा हुआ नंबर प्लेट हमारे सामने नुमाया हो गया। जिसे मुझ से पहले ही रागिनी ने अपनी फोन की नोटबुक में लिख लिया।

हमने उस गाड़ी के वहाँ से रवाना होते ही उस फुटेज को फिर से रिवाइंड किया और जिस जिस जगह वो लड़की फुटेज में दिख रही थी, उस जगह की अपने मोबाइल से फोटो खींच कर सेव कर ली।

साथ ही उस पूरी फुटेज को डेटा केबल से अपने मोबाइल में भी ले ली।

उसके बाद हम शर्मा जी का धन्यवाद बोलकर उस भोजनालय से बाहर आ गए।

"चलो कोई तो सुराग मिला, उस लड़की का, कम से कम उसे ढूंढने की एक शुरुआत तो हो सकती है" रागिनी ने मेरी ओर देखकर बोला।

"हाँ चलो अब बाकी दोनो सीसी टीवी कैमरो की फुटेज भी देख लेते है" मैंने रागिनी को बोला, और उन घरों की ओर बढ गए, जिन पर वे कैमरे लगे हुए थे।

लेकिन दोनो ही जगह से हमें ना उम्मीदी ही हाथ लगी थी। एक पड़ोसी ने तो अपना सीसी टीवी ही खराब बताया था, और दूसरे पड़ोसी दोनो ही मियां बीवी नौकरी पेशा थे, तो दोनो ही अपने काम पर जा चुके थे, और घर पर ताला लटका हुआ था।

मैने निराशा से रागिनी की ओर देखा।

"कोई नही !अभी हमारे पास आगे बढ़ने के लिये उसकी गाड़ी नंबर का क्लू तो है ही ! हम वही से शुरू करते है" रागिनी ने मेरी निराशा को भांपते हुए बोला।

"चलो फिर इस गाड़ी की डिटेल निकालते है, उसके बाद पकड़ते है इस लड़की को" ये बोलकर मै अब अपने फ्लैट की ओर बढ़ गया था।

आजकल किसी गाड़ी की डिटेल निकालना कुछ मिनिटों का ही काम था। गूगल बाबा ने दुनिया के काफी कामो को आसान बना दिया था।

लेकिन इस वक्त मुझे जिस बात ने ज्यादा बेचैन किया हुआ था, वो ये थी कि वो लड़की एक प्लान बनाकर मेरे घर मे घुसी थी।

इस वक़्त कौन बनेगा करोड़पति से भी बड़ा सवाल मेरे सामने खड़ा हो गया था, की इस शहर में मेरा ऐसा कौन सा खैरख्वाह पैदा हो गया था, जिसने मेरे खिलाफ कोई साजिस रचने की पहल मेरे ही घर से की थी। 🤔

वैसे आपके इस सेवक के दुश्मनों की तादाद बहुतायत में थी, अब इनमें से किसी एक दुश्मन को ढूंढना भूसे के ढेर में सुई ढूँढने के बराबर था।

रागिनी का आगमन-4

वो गाड़ी रोहिणी के ही सेक्टर ग्यारह के पते पर रजिस्टर्ड थी। गाड़ी किसी कुमार गौरव के नाम से रजिस्टर्ड थी।

सेक्टर ग्यारह का पता देखते मेरी उम्मीदों के पंखों को नए परवान मिल चुके थे, क्यो कि उस अनामिका नाम की लड़की ने मुझे यही बताया था कि वो रोहिणी के सेक्टर ग्यारह में ही रहती थी।

उस पते के मिलने के बाद हमारा सबसे पहला काम अब उस पते पर पहुंचने का ही था।

इस वक़्त रोमेश, रागिनी के साथ उसी पते पर खड़ा था। रागिनी ने उस घर की बेल बजाई।

दरवाजा किसी नौकरानी ने खोला था। मैंने उसे कुमार गौरव को बुलाने के लिए बोला तो, वो बिना कुछ बोले ही वापिस अंदर मुड़ गई।

कुछ देर में ही एक कोई तीस वर्षीय जवान मेरे सामने खड़ा था। बन्दे की बॉडी देखकर लग रहा था कि
वो जिम में जमकर पसीना बहा रहा है, और जमकर सप्लीमेंट के डिब्बे पर डिब्बे खाली किये जा रहा है।

"जी कहिये, कहाँ से आये है आप" उस शख्स ने मेरी ओर अनजान निगाहों से देखते हुए पूछा।

"आप ही कुमार गौरव है" मैने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।

"जी मै ही कुमार गौरव हूँ, आपको मुझ से क्या काम है" उसने जिज्ञासा भरे स्वर में पूछा।

"वो नीले रंग की वेलिनो आप ही कि गाड़ी है" इस बार रागिनी ने पूछा।

"जी नीले रंग की वेलिनो मेरी ही गाड़ी है, आप जानते हो कुछ मेरी गाड़ी के बारे में" उसके इस सवाल ने मानो हमारे ऊपर कोई वज्रपात सा किया हो।

"जानते हो मतलब?" ये सवाल रोमेश ने किया।

"कल शाम से मेरी गाड़ी गायब है भाई, रात को थाने में रपट भी लिखवाकर आया हूँ, लेकिन अभी तक गाड़ी का कोई अता पता नही है" कुमार गौरव ने रुआंसे स्वर में बोला।

हमारी उम्मीदों पर तुषारापात हो चुका था।

"क्या हम लोग अंदर बैठकर बात कर सकतें है" तभी रागिनी ने बोला।

"जी ! लेकिन आपने अभी तक नही बताया कि आप कौन हो" कुमार गौरव के लिए ये भी मुसीबत थी कि वो ऐसे ही किसी अनजान लोगों को अपने घर के अंदर नही घुसा सकता था।

मैने अपना कार्ड निकाल कर उसके हाथ मे दिया।

"आप डिटेक्टिव है, आप मेरी गाड़ी के बारे में कुछ जानते है क्या" कुमार साहब ने मेरा परिचय जानते ही पूछा।

"हमने आपकी गाड़ी में एक लड़की को कल रात को एक सीसी टीवी की फुटेज में देखा है" इस बार फिर से रागिनी ने बोला।

"आप लोग अंदर आइए" ये बोलकर कुमार साहब ने हमारे लिए दरवाजा छोड़ दिया।

हम उसके पीछे ही अंदर की तरफ बढ़ गए। कुछ ही पलों में हम उसके ड्राइंग रूम में बैठे हुए थे।

ड्राइंग रूम में सन अस्सी के दशक के चॉकलेटी हीरो कुमार गौरव की उसकी फ़िल्म "लव स्टोरी" की एक बड़ी सी तस्वीर लगी हुई थी। मैं उस तस्वीर को देखकर मुस्करा दिया।

इस बन्दे की एकमात्र यही फ़िल्म थी, जिसने सिनेमा जगत में तहलका मचा दिया था, और रातों रात ये बन्दा उस समय की नवयौवनाओं की दिलो की धड़कन बन गया था, लेकिन इस एक फ़िल्म के बाद ही इस बन्दे के सितारे डूबते चले गए।

"लगता है कुमार गौरव के बड़े जबरा फैन हो, जो नाम भी उनका रखा हुआ है और ड्राइंग रूम भी उन्ही की तस्वीरों से सजा रखा है" मै और रागिनी इस वक़्त दिलचस्प निग़ाहों से उस तस्वीर को देख रहे थे।

"जी मै नही मेरी मम्मी इनकी बड़ी जबरा फैन है, उन्ही ने मेरा नाम भी कुमार गौरव रखा था" कुमार साहब ने मुस्करा कर जवाब दिया।

"सही बोल रहे हो, वैसे आप तो बॉडी से तो सनी देओल के फैन लगते हो" मैने अपनी भूल सुधार की।

मेरी बात उसे पसंद आई थी, तभी वो ठठाकर हँस पड़ा था।

"आप जरा इस लड़की को देखिए! ये लड़की कल रात को आपकी गाड़ी में देखी गई है" मैने अपने मोबाइल की फोटो गैलरी खोलकर उसे पहले से ली गई फ़ोटो को दिखाया।

कुमार बाबू गौर से उस तस्वीर को देखने लगे।

"ये लड़की तो मल्लिका जैसी लग रही है" कुमार की बोली हुई इस बात ने मेरे कान खड़े कर दिए थे।

"आप जानते हो इस लड़की को" मैंने गौर से कुमार के चेहरे को देखते हुए पूछा।

"हाँ ! एक नंबर की फ्रॉड लड़की है, लेकिन ये तो जेल में थी, ये बाहर कब आई" कुमार ने अचंभित स्वर में बोला।

"जरा इसके बारे में खुलकर बताओ, ये कल रात को मेरे घर से एक कांड करके भागी है" मैंने उतावले स्वर में बोला।

"क्या कांड कर दिया इसने, वैसे ये कुछ भी कर सकती है, यहां तक कि किसी का खून भी" कुमार एक के बाद एक धमाके इस लड़की के बारे में किये जा रहा था।

"ये कल रात को तकरीबन आठ बजे के करीब मेरे फ़्लैट पर बदहवासी की हालत में आई, इसने मुझे बोला कि इसके पीछे कुछ लोग पड़े हुए है, और इसे जान से मारना चाहते है, मैने इंसानियत के नाते अपने घर मे इसे शरण दे दी, लेकिन ये तो मुझे ही सेन्धी लगाकर मेरे घर से फरार हो गई"

मैने देख़ा की मेरी इंसानियत वाली बात पर रागिनी अपनी हँसी रोकने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

"क्या सेन्धी लगा दी इसने" कुमार बाबू अब अपनी कहने से ज्यादा मेरी सुनने के लिए ज्यादा लालायित थे।

"ये मेरी पिस्टल चुराकर भाग गई है, मैं कल रात से ही इस लड़की को ढूंढ रहा हूँ" मैंने अपनी पूरी आपबीती बता दी।

"मतलब इस खतरनाक लड़की के कब्जे में मेरी गाड़ी और आपकी पिस्टल है" कुमार मानो खुद से ही बोल रहा हो।

"और आज सुबह ही एक लड़की की लाश भी बरामद की है पुलिस ने, अभी ये नही पता चल पाया है कि उस लड़की को किसने मारा है" मैने कुमार की बात में अपनी बात जोड़ी।

"क्या पता उस लड़की को भी इसी मल्लिका ने मारा हो, मैने बताया न वो कुछ भी कर सकती है" कुमार उस लड़की से कुछ ज्यादा ही डरा हुआ था।

"कुमार! आपकी बातो से लग रहा है, की आप इस लड़की को काफी करीब से जानतें हो, जो कुछ भी इस लड़की के बारे में जानतें हो, वो हमें बता दो, ताकि हम इसे जल्दी से जल्दी पकड़ सके, नही तो पता नही ये किस किस की जान लेगी" रागिनी ने हमारी बातचीत के सिलसिले को तोड़ा।

"ये लड़की पहले मेरी ही कंपनी में काम करती थी, ये गजब की खूबसूरत लड़की है, इसकी खूबसूरती ही इसका सबसे बड़ा हथियार है, जो कोई इसे पहली बार देखता है, वो इसकी ओर खींचा जाता है, मैं भी उसके इस रूपजाल में फंस गया था, और ये मेरी गर्लफ्रेंड बन गई थी" कुमार ने सुनी आंखों से शून्य में निहारते हुए बोला।

"फिर तो इसके बारे में सब कुछ गहराई से जानते होंगे" रागिनी ने अब पूछताछ की कमान अपने हाथ मे ले ली थी।

"ज्यादा नही जानता, इतना जानता हूँ कि मॉडल टाउन में रहती थी, इसने मुझे मेरी गर्लफ्रेंड बनकर मुझे लाखों का चूना लगाया, और जब मैंने इसे पैसे देने से इनकार किया तो इसने मेरे साथ अपना ब्रेकअप कर लिया, बाद में मुझे पता चला कि उसका तो ये बिज़नेस है, हर कंपनी का मालिक उसका बॉयफ्रेंड होता है, और जब तक वो उस पर पैसे लुटाता रहता है, वो इस लड़की की गुडबुक में रहता है, उसको पूरी तरह से चूसने के बाद ये उसको टाटा बाई बाई करके उसकी जिन्दगी से निकल कर अपने नए शिकार की तलाश में निकल जाती है, बस इसमे एक ही अच्छी बात थी, की ये किसी को उसकी जिंदगी से जाने के बाद ब्लेकमेल नही करती" कुमार ने जो भी बताया था, वो काफी दिलचस्प था।

एक बात और थी कि इस लड़की को पकड़ने में चक्कर मे अभी कुमार जैसे कई लुटे पिटे आशिकों से मुलाकात होने वाली थी। :D

वो किसी के लिये अनामिका थी और किसी के लिये मल्लिका थी। न जाने कितने नाम और रूप थे, इस लड़की के...बहरहाल इतना तो कुमार की बातों से स्पष्ट था कि लड़की बहुत खतरनाक थी।

लेकिन इस खतरनाक लड़की ने इस बार एक गलती कर दी थी, की इसने अनजाने में रोमेश दी ग्रेट से पंगा ले लिया था। :roll3:

लेकिन क्या सच मे उसने अनजाने में मुझ से पंगा लिया था, सुबह तो मैं और रागिनी इस नतीजे पर पहुंचे
थे, की वो लड़की प्रीप्लान बनाकर मेरे घर में घुसी थी। वो जानती थी कि मैं भी उसकी खूबसूरती में उलझ जाऊंगा।

अभी मैं अपने तस्सवुर में उस लड़की के बारे में सोच ही रहा था, की कुमार का फोन बज उठा था।

कुमार ने फोरन से पेश्तर फोन को उठाया।

उसने कुछ देर फोन पर एक तरफ जाकर बात की, फिर तेज कदमों से हमारी तरफ आया।

"पुलिस को गाड़ी मिल गई है" कुमार ने उत्साहित स्वर में बोला।

"कहाँ पर" मेरा और रागिनी का सम्मिलित स्वर वहां गूंजा था।

"यही सैक्टर 6 में, अंबेडकर होस्पिटल की पीछे वाली रोड पर मिली है पुलिस को" कुमार ने मेरी ओर देखकर जवाब दिया।

"चलो फिर! आप हमारे साथ आओ, क्या पता आपकी गाड़ी से ही आगे के कोई सुराग मिल जाये।

मेरी बात सुनकर कुमार ने साथ चलने में कोई भी हिला हवाली नही की, और हमारे साथ बाहर की ओर चल पड़ा।


जारी रहेगा_____✍️

#05

अंबेडकर हॉस्पिटल के पिछले गेट से थोड़ी सी दूरी पर ही कुमार की वही नीले रंग की वेलिनो खड़ी हुई थी।

इस वक़्त उस गाड़ी को तीन चार पुलिस वाले घेर कर खड़े हुए थे,और कुछ लोग उस गाड़ी की जाँच में लगे हुए थे।

मै उन लोगों के हावभाव से ही पहचान गया था कि वे फोरेंसिक डिपार्टमेंट के लोग है।

गाड़ी के पास ही एसआई देवप्रिय भी मुस्तैदी के साथ खड़ा हुआ था।

हमें कुमार के साथ देखते ही उसकी न केवल भवे तन गई थी, बल्कि उसकी पेशानी पर बल भी पड़ चुके थे।

"क्या बात है, पूरा गैंग ही एक साथ घूम रहा हैं"

पता नही इस बन्दे का नाम देवप्रिय किसने रखा था, न बरखुरदार की शक्ल अच्छी थी, और न ही बाते ऐसी करता था, की किसी को भी प्रिय लगे।

"गैंग से क्या मतलब है आपका" मुझ से पहले ही रागिनी ने देवप्रिय से उसकी बात का मतलब पूछ लिया था।

"आप मे से एक बन्दे की गाड़ी चोरी हुई है, और उस गाड़ी में किसी के ताजा खून के धब्बे और निशान पाए जाते है, एक बन्दे की पिस्टल गायब है, और वैसी ही पिस्टल से निकली एक गोली किसी की जान भी ले चुकी होती है, और फिर भी आप लोग इसलिये मासूम बनकर पुलिस के सामने पेश आते है, क्यों कि इन लोगो ने पहले से ही अपनी गाड़ी और पिस्टल की चोरी की रपट पुलिस में लिखवाई हुई होती है" देवप्रिय हम लोगों को एक साथ देखते ही अपने नतीजे पर पहुंच भी चुका था।

"आपको तो इस इलाके का डीसीपी होना चाहिए था देवप्रिय जी, आप की प्रतिभा के साथ तो बहुत बड़ा अन्याय है कि आप अभी तक सिर्फ एसआई की पोस्ट तक ही पहुंचे हो" मैने तंज भरे स्वर में देवप्रिय को बोला तो उसने खा जाने वाली नजरो से मुझे देखा।

"क्यो क्या मैं कुछ गलत कह रहा हूँ" देवप्रिय जले भूने स्वर में बोला।

"आप बताइए कल रात से मेरी पिस्टल की चोरी होने की रपट पर आपने अभी तक क्या कार्यवाही की है, उसे ढूंढने की कोई एक भी कोशिश की है तो, जरा मेरी जानकारी में भी ला दो, और जब हम अपने प्रयासों से अपनी चोरी हुई चीज को ढूंढने की कोशिश में इस बन्दे तक पहुंचते है, जिसकी गाड़ी चुराकर वो लड़की मेरे घर तक आई थी, तो ये सब आपको हमारी मिली भगत लगती है, आप पर तो सचमुच बलिहारी होने का दिल कर रहा है, आपका नाम तो राष्ट्रपति के पास गोल्ड मेडल देने के लिए दिल्ली पुलिस को भेजना चाहिए"

मेरी बात सुनकर देवप्रिय के कांटो तो खून नही था, वो समझ नही पा रहा था, की क्या कोई उसकी पुलिसिया वर्दी का खौफ खाये बिना भी उससे इस लहजें मे भी बात कर सकता है।

"ज्यादा हवा में उड़ो मत जासूस साहब, बिना पुलिस की मदद के तुम किसी केस की तरफ पैर करके भी नही सो सकते हो, उसे सुलझाने की बात तो बहुत दूर की बात है, रही बात आपकी पिस्टल चोरी होने की रपट पर कार्यवाही की, तो सिर्फ एक यही काम नही रह गया है हमारे पास, सुबह से ही एक लड़की के कत्ल के केस में उलझे हुए है, जो कि आपकी पिस्टल को ढूंढने से ज्यादा बड़ा और जरूरी काम है" देवप्रिय ने मेरी ओर देखकर कुटिलता से बोला।

"अगर आप प्राथमिकता के आधार पर रात को ही मेरी पिस्टल को ढूंढने का प्रयास करते तो शायद इस कत्ल को होने से आप रोक पाते देवप्रिय जी" मैंने ये बोलकर अपने मोबाइल में उस लड़की का फोटो निकाल कर देवप्रिय के सामने रख दिया।

वो गहराई से नजर गड़ाकर उस फ़ोटो को देख रहा था।

"कौन हैं ये" देवप्रिय ने मेरी ओर देखते हुए पूछा।

"ये वही लड़की है, जिसने पहले इनकी गाड़ी चुराई, फिर उस गाड़ी में बैठकर मेरे घर तक आई, फिर मेरे घर से मेरी पिस्टल को चुराकर फरार हो गई" मैने देवप्रिय को बोला।

"लेकिन ये है कौन" देवप्रिय ने फिर से पूछा।

"एक सजा याफ्ता मुजरिम! जिसके बारे में जानकारी आप हमसे ज्यादा जुटा सकते हो" मैने बोला तो देवप्रिय मेरी और हक्का बक्का सा मेरी ओर देखता रह गया।

कुमार गौरव-5

इस वक़्त हम रोहिणी के थाने में बैठे हुए थे। कुमार गौरव के बताए हुए मल्लिका नाम के अनुसार उसका पुलिस रिकॉर्ड खंगाला जा रहा था।

लेकिन मल्लिका के नाम से कोई भी डेटा पुलिस के डेटा में नहीं मिल रहा था।

"आप फ़ोटो की पहचान से इस लड़की को ढूँढिये! शायद इस लड़की को क्यो कि हर जगह सिर्फ फ्रॉड करना होता है, तो ये हर जगह अपना नाम गलत ही बताती हो" मैने देवप्रिय की तरफ देखकर बोला।

देवप्रिय के सुर अब सुधर चुके थे, क्यो कि उसने देख लिया था कि पुलिस की बंधी बंधाई लकीर को पीटने से कुछ हासिल नही होने वाला था, बल्कि जो सवाल उससे मैने किये थे, उन सवालों को उससे कोई भी समझदार पुलिस अधिकारी कर सकता था।

"लेकिन तुम्हारे पास जो फ़ोटो है, वो बहुत धुंधली है, शायद डेटा उसे पकड़ न पाए" देवप्रिय की इस बात में दम था।

"कुमार साहब तुम्हारी तो वो लड़की गर्लफ्रेंड और एम्पलॉई दोनो ही रह चुकी है, तुम्हारे पास तो उसकी कोई फ़ोटो जरूर होनी चाहिये" रागिनी ने कुमार से मुखातिब होकर बोला।

"मैने उससे संबंधित सारा कुछ अपने मोबाइल से डिलीट कर दिया था, इसलिए मुश्किल है मेरे मोबाइल में कुछ मिलना" कुमार ने फंसे हुए स्वर में कहा।

"देखिए! एक बार मोबाइल को अच्छे से चेक कर लीजिए,नही तो मुझे आपका मोबाइल लैब में भेजना पड़ेगा, वहां पर आपका सभी डेटा रिकवर हो जाएगा" देवप्रिय ने उसे समझदारी से समझाया।

"कुमार आप डिलीट हिस्ट्री में जाओ, अगर तुमने फोन का डेटा रिबूट नही किया होगा तो डिलीट हिस्ट्री में सब मिल जाएगा" रागिनी ने कुमार को बोला।

"हाँ फ़ोन तो रिबूट नही किया हैं मैंने, मैं अभी देखता हूँ" मोबाइल को लैब में भेजने की बात सुनते ही जो चेहरा बुझ गया था, वह अब फिर से रोशन हो चुका था।

कुमार अब पूरी तल्लीनता से मोबाइल में घुस चुका था। कोई पांच मिनट के बाद ही एक विजयी मुस्कान के साथ वो मोबाइल से अपनी नजरो को उठाया।

"मिल गई एक फोटो तो मिल गई" कुमार ने सिर उठाते ही घोषणा की। उसके बाद उसने अपना मोबाइल मेरे आगे किया।

उस लड़की की फ़ोटो पर नजर पड़ते ही मैंने भी इस बात की तस्दीक करदी कि ये वही लड़की है, जो कल रात को मेरे घर मे आई थी।

देवप्रिय ने उस मोबाइल को डेटा केबल से जोड़ा और तुरन्त उस फ़ोटो को अपने कंप्यूटर में ट्रांसफर करने लगा।

फ़ोटो ट्रांसफर करनें के बाद उसने मोबाइल को कुमार को वापिस लौटा दिया। अब देवप्रिय के लिये उसकी तलाश आसान होने वाली थी।

देवप्रिय अब अपने पुलिस रिकॉर्ड के सजा याफ्ता मुजरिमो के फोटो सेक्शन में जाकर फ़ोटो ट्रेस कर रहा था। कुछ ही पलों में उसका परिणाम हमारे सामने था।

लड़की का नाम देविका था, और वो दो करोड़ की धोखाधड़ी के केस में छह माह पहले ही जेल में गई थी। अब वो जमानत पर बाहर थी।

"मुझे उस केस की डिटेल मिल सकती है, की किस कंपनी के साथ ये धोखाधड़ी करके जेल पहुंची थी, और इसने क्या धोखाधड़ी की थी" मैंने देवप्रिय की ओर देखते हुए एक हल्की सी मुस्कान के साथ पूछा।

देवप्रिय ने अजीब सी नजरो से मेरी और देखा।

"ये बंसल ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज की किसी डेटा संग्रहण कंपनी में थी, जहां पर इसने कम्पनी के कंज्यूमर डेटा को ही उनकी किसी प्रतिस्पर्धी कंपनी को दो करोड़ में बेच दिया था" देवप्रिय ने न जाने क्या सोचकर मुझे केस डिटेल देने में कोई आना -कानी नही की थी।

"बस इतना काफी है सर! बाकी बंसल ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज से मेरे अच्छे तालुक्कात है, मुझे इस लड़की की वहां से पूरी कुंडली मिल जाएगी" मैने देवप्रिय को बोला, तो देवप्रिय ने अजीब सी निग़ाहों से मेरी ओर देखा।

"भाई किस दुनिया में हो, जानते भी हो कितनी बड़ी कंपनी है ये, महीनों तक तो मिलने तक का अपॉइंटमेंट नही मिलता, इस कंपनी के मालिकों से" देवप्रिय ने बिना किसी जानकारी के ही हवा-हवाई बात बोली।

"जनाब इस कंपनी की सिर्फ एक ही मालकिन है, सौम्या बंसल! इनके पति राजीव बंसल अपने पिता और अपनी सौतेली माँ की हत्या के जुर्म में मेरी मेहरबानी से ही इस वक़्त उम्रकैद की सजा काट रहे है" मैंने ग्रुप ऑफ बंसल इंडस्ट्रीज की पूरी जन्म कुंडली देवप्रिय के सामने रख दी।

"तुम्ही वो प्राइवेट डिटेक्टिव हो जिसने इस केस को सॉल्व करने में डिपार्टमेंट की मदद की थी" देवप्रिय बदले हुए सुर में बोला।

"हाँ ! मैं ही हूँ वो आपका सेवक, रोमेश दी ग्रेट!" मैने हल्का सा अपना सिर नवाकर देवप्रिय को बोला।

"तभी मैं सोचूं की किसी पुलिस वाले से बात करने का इतना सलीका तुम में कैसे है" देवप्रिय अब खिसियाए से स्वर में बोला।

"चलिये जनाब! अब तक जो हुआ सो हुआ, मिट्टी डालिये उन बातों पर, अब आप इस केस पर अपने हिसाब से काम कीजिये, क्यो कि मुझे इस केस पर एक अलग नजरिये से काम करना है, लेकिन दोनो ही सूरत में हम दोनों का मकसद असल अपराधी को पकड़ना ही होगा" मैने देवप्रिय से अब अपने संबंध सामान्य बनाने के लिये ये पहल की।

वैसे भी पानी मे रहकर ज्यादा दिन तक आप मगरमच्छ से बैर नही रख सकते है। क्यो कि बिना पुलिसिया
मदद के एक प्राइवेट डिटेक्टिव चाह कर भी कोई तीर नही चला सकता था।

हम देवप्रिय से विदा लेकर थाने से बाहर आ चुके थे, कुमार की गाड़ी अभी पुलिस के कब्जे में ही थी, क्यो कि एक मर्डर के केस में वो गाड़ी अब बतौर सबूत पुलिस की प्रोपर्टी थी। लिहाजा हमे अभी कुमार गौरव को भी उसके घर पर ड्राप करना था।

इस केस में अब सौम्या बंसल से एक बार फिर से मुलाकात करनें का मौका मिलने वाला था।

शायद साल भर के बाद उससे मिलने का मौका आने वाला था। इसलिए सबसे पहले तो उसकी शिकायतों का पुलिंदा ही मुझे सुनना था।

कुमार को उसके घर पर छोड़कर हम फिर से मेरे फ्लैट पर आ गए थे।

दोपहर का समय होने को आया था, इसलिए मैंने उसी भोजनालय को अपने और रागिनी के लिए लंच आर्डर कर दिया था।

"देविका को हमारे खिलाफ कौन प्लांट कर सकता है" मैने रागिनी की ओर देखते हुए बोला।

"दिल्ली की तिहाड़ में तो आपके भेजे हुए बहुत सारे चाहने वाले है, सौम्या का हस्बैंड राजीव बंसल भी वही हैं, तुम्हारी चहेती मेघना भी वही है, इसके अलावा और भी बहुत लोग है" रागिनी ने मेरी बात का जवाब दिया।

"लेकिन देविका तो लड़की है तो वो तो महिला जेल में होगी" मैंने रागिनी को याद दिलाया।

"महिला जेल में उसकी मुलाकात मेघना के साथ हो सकती है, दोनो की बैकग्राउंड भी एक ही कंपनी के लिये काम करना है, तो दोनो में दोस्ती भी जल्दी हो गई होगी" रागिनी ने तुरन्त दो जमा दो बराबंर चार वाला फॉर्मूला जोड़ा।

"मुझे लगता तो नही की मेघना मुझ से बदला लेने के लिए ऐसा कुछ प्लान कर सकती है" मै रागिनी की इस बात को मानने के लिए तैयार नही था।

"क्यो ! वो तुम्हारी वजह से आज जेल में सड़ रही है, तो कभी तो तुम्हे भी किसी जाल में फ़साने का दिमाग में आया ही होगा" रागिनी की इस बात में दम था।

"एक काम करते है, खाना ख़ाकर तुम सौम्या से बात करो, फिर उससे मिलने चलते है, इस देविका की भी अब पूरी कुंडली निकालना जरुरी है" रागिनी ने लंच की थाली को मेरे सामने रखते हुए बोला।

लेकिन मैं रागिनी के बोलने से पहले ही सौम्या को फोन मिला चुका था। उधर से तीसरी बेल बजने के बाद सौम्या ने फोन उठाया।

"मैं तो आज धन्य हो गई" उधर से सौम्या ने फोन उठाते ही बोला।

"मैं भी कृतार्थ हो गया, इतनी खूबसूरत लड़की की इतनी मधुर आवाज को सुनकर" मै जानता था कि सौम्या फोन उठाते ही ऐसा ही कुछ बोलने वाली थी।

"तुम्हे अगर मेरी सुंदरता की जरा भी कदर होती तो कम से कम रात को सोने से पहले एक फ़ोन तो रोज करते तुम मुझे" सौम्या ने शिकायती लहजें में बोला।

"तुम फोन करनें की बात कर रही हो मेरी जान, मैं तो तुमसे मिलने के लिए बेताब हुए जा रहा हूँ, ये बताओ अभी कहाँ मिल सकती हो" मैंने तुरंत बात बनाई।

"बिना किसी काम के तो तुम मेरे पास आने से रहे, इसलिए पहले काम बताओ, फिर बताऊंगी मैं कहाँ हूँ" सौम्या भी अब बातो को भांपना सीख गई थी।

"सिर्फ तुम्हारे हसीन मुखड़े के दर्शन करने है, और तुम्हारें साथ कॉफी पीनी है, और रागिनी भी मेरे साथ आना चाहती है" मैंने सौम्या को बोला।

"रागिनी भी साथ आ रही है, तो पक्का किसी काम से ही आ रहे हो तुम, चलो तुम मेरे पास आ रहे हो, इतना ही काफी है, राजेन्द्र प्लेस वाले आफिस में हूँ, यही आ जाओ, छह बजे तक यही हूँ" सौम्या ने मुझे बोला।

"ठीक हैं मेरी गुले गुलजार, तुम्हारा ये बिछड़ा हुआ प्यार, सिर के बल दौड़ता हुआ आ रहा है" मेरी बात सुनकर सौम्या की एक जोर की हँसी गूँजी और फिर फोन रखने की आवाज सुनाई दी।

फोन रखते ही मैने देखा कि रागिनी मेरी ओर ही देखे जा रही थी।

"तो तुम सौम्या मैडम का बिछड़ा हुआ प्यार हो" रागिनी ने तंज भरे स्वर में कहा।

"अभी चल रही हो न मेरे साथ, तुम खुद देखना की वो मुझ से ऐसे चिपक कर मिलेगी, जैसे हम कई जन्मों से बिछड़े हुए प्रेमी हो" मैंने रागिनी को बोला।😁

"देखते है! कितना मरे जा रही है वो तुमसे मिलने के लिये, जल्दी से खाना खालो, कही लेट हो गए तो वो सुसाइड न कर ले" रागिनी ने एक कुटील मुस्कान के साथ बोला।

"कुछ जलने की बू आ रही हैं, इस ढाबे वाले ने भी लगता है जली हुई सब्जी भेज दी" ये बोलकर मैने एक सब्जी की कटोरी उठा कर उसकी महक सूंघने लगा।

"औए मिस्टर! जले मेरी जूती, अपना जलवा भी कोई कम नही है" रागिनी ने मुझे हूल दी।

मुझे कई बार रागिनी की इन बातों पर बड़ा मजा आता था।

लेकिन मैं इस बहस को अब अपनी गाड़ी में सफर के दौरान बचाकर रखना चाहता था, इसलिए मैंने अपना पूरा ध्यान अपने खाने में लगा दिया था।


जारी रहेगा_____✍️
Superb updates....

Kon fasana chahega Romesh ko? Aur Kyu?
 
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Reactions: Raj_sharma

Seen@12

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Ye story bhi aapki baki stories ki bahut achi h suspense and thrill se bhari .
Dete. Romesh wahi h kya jo pichili story mei tha .
dono story aapas mei link h bhi h kya ya us story ka prequel h ye
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Raj_sharma

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Superb updates....

Kon fasana chahega Romesh ko? Aur Kyu?
Yahi to raaj ki baat hai madam ji :shhhh: , thank you so much for your valuable review. :hug:

Aur tum itne din baad kyu aai ? :blush1:
 

Raj_sharma

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Ye story bhi aapki baki stories ki bahut achi h suspense and thrill se bhari .
Dete. Romesh wahi h kya jo pichili story mei tha .
dono story aapas mei link h bhi h kya ya us story ka prequel h ye
Nahi bhai, wo Romesh ek Advocate tha, ye wala spy 🕵️‍♂️ hai. Dono ka koi mel nahi hai, Thank you so much for your valuable review and support bhai :hug:
 
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