Lovely updateUpdate 7
मां के जाने के बाद जैसे मेरी ज़िंदगी से हर आवाज़ गायब हो गई थी। ना सुबह जल्दी उठने की कोई वजह बची थी, ना रात को सोने की। ज्यादातर वक्त मैं मां के कमरे में बंद रहता, या उनकी पुरानी चीज़ों को यूँ ही देखता रहता।
मेरी तरह रानी भी गुमसुम ही रहती। जैसे जताना चाह रह रही हो कि मैं अकेला दुखी नहीं हूं।
लेकिन मुझे कभी अकेला भी नहीं छोड़ती। सुबह उठता तो चाय पहले से मेज़ पर रखी मिलती। कई बार खाना खाने का मन नहीं होता, फिर भी वो बिना कुछ कहे प्लेट मेरे सामने रख जाती। और जब मैं बिना खाए उठ जाता, तो उसके चेहरे पर हल्की उदासी दिखती… मगर शिकायत कभी नहीं।
एक शाम मैं छत पर अकेला बैठा डूबते सूरज को देख रहा था। तभी रानी चुपचाप आकर मेरे पास बैठ गई।
कुछ देर तक हम दोनों खामोश रहे।
फिर उसने धीरे से पूछा,
“माँ आपको बचपन में बहुत डाँटती थीं?”
कुछ देर यादों के समुद्र में खोने के बाद मैं बोला “बहुत…”
उसने दुबारा सवाल किया जैसे मेरे दिल का बोझ कम करना चाहती हो “और प्यार?”
उस सवाल पर ना जाने क्यों मेरा गला भर आया।
मैंने नज़रें फेर अपने आंसुओं को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा “उससे भी ज्यादा…”
इतना कहते ही भीतर दबा दर्द जैसे बाहर आने लगा। पता नहीं कितने दिनों बाद मेरी आँखों से आँसू निकले थे। तभी मैंने महसूस किया… रानी ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया था।
उसने मुझे चुप कराने की कोशिश नहीं की… बस वैसे ही बैठी रही।
और ना जाने क्यों, उस पल पहली बार मुझे अकेलापन थोड़ा कम महसूस हुआ।
उस रात बहुत दिनों बाद मुझे नींद आई।
दिन धीरे-धीरे गुजरने लगे। मैं अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ था… मगर रानी की मौजूदगी मेरे भीतर के सन्नाटे को थोड़ा हल्का जरूर कर देती थी।
अब कभी-कभी मैं खुद उससे बातें कर लिया करता था। माँ की आदतों को लेकर, बचपन की बातों को लेकर… और वो हर बार मुझे ऐसे सुनती, जैसे मेरी हर बात उसके लिए जरूरी हो।
एक रात बिजली चली गई थी। मौसम भी खराब था, इसलिए पूरा घर बारिश की आवाज़ में डूबा हुआ था।
मैं अपने कमरे में बैठा बाहर छत की और देख रहा था, तभी रानी दो कप चाय लेकर आ गई।
“आप फिर सोए नहीं?” उसने धीमे से पूछा।
मैं हल्का-सा मुस्कुराया।
“नींद अब भी मुझसे नाराज़ है शायद।”
वो भी पास बैठ गई। कमरे में दाखिल होते होते बारिश ने उससे भीगा दिया था। हवा के साथ उसकी भीगी लटें बार-बार चेहरे पर आ रही थीं। मगर इस बार ना जाने क्यों… मैंने उसे थोड़ा गौर से देखा।
शायद पहली बार मैं उसे सिर्फ अपनी पत्नी की जिम्मेदारी की तरह नहीं देख रहा था।
कुछ देर बाद ठंडी हवा से वो हल्का-सा काँप गई।
अनजाने में ही मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
रानी ने मेरी ओर देखा… मगर हाथ नहीं हटाया।
उसकी आँखों में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। बस एक अपनापन था… और वही अपनापन मेरे भीतर की खाली जगहों को धीरे-धीरे भर रहा था।
लेकिन अगले ही पल माँ का ख्याल मन में कौंध गया।
मैं तुरंत पीछे हट गया।
“मुझे… शायद अभी थोड़ा वक्त चाहिए…”
मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि रानी ने धीरे से मेरा हाथ दबाया।
जैसे कहना चाह रही हो “मैं कहीं नहीं जा रही…”
उस पल ना जाने क्यों, मेरी आँखें फिर भर आईं।
उस रात के बाद हमारे बीच की दूरियाँ धीरे-धीरे कम होने लगीं।
एक रात मैं कमरे में लेटा था, तभी दरवाज़ा धीरे से खुला और रानी अंदर आई। मैं उठकर बैठा ही था कि अचानक हल्का-सा चक्कर आ गया। मैं संभल पाता, उससे पहले ही रानी ने मुझे पकड़ लिया।
कुछ पल के लिए वो बिल्कुल मेरे करीब थी।
इतना करीब कि उसकी साँसों की गर्माहट तक महसूस हो रही थी।
लेकिन इस बार ना मैंने खुद को दूर किया… ना उसने।
कमरे में अजीब-सी खामोशी थी। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, और अंदर मेरे दिल की धड़कन जैसे पहली बार साफ सुनाई दे रही थी।
रानी की नज़रें धीरे-धीरे झुक गईं।
“अब भी खुद को अकेला समझते हैं…?” उसने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा।
उस सवाल ने जैसे भीतर की सारी दीवारें तोड़ दीं।
मैंने धीरे से उसे अपनी बाँहों में खींच लिया।
उसने भी बिना झिझक खुद को मुझमें समेट लिया… जैसे वो काफी समय से इसी पल का इंतज़ार कर रही हो।
शेष अगले भाग में, आपको ये update कैसा लगा हमें बताए? और भाई लोग और उनकी दीदियों update अच्छा लगे तो Like कर देना।
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Nice updateUpdate 8
मैंने धीरे से उसे अपनी बाँहों में खींच लिया।
उसने भी बिना झिझक खुद को मुझमें समेट लिया… जैसे वो काफी समय से इसी पल का इंतज़ार कर रही हो।
अब आगे
रानी के आंखों की चमक बता रही थी कि वो इस पल का इंतजार कितने दिनों से कर रही थीं। मगर उसकी शर्म ही थी जो वो खुद आगे नहीं बढ़ पा रही थी। रानी के जिस्म की गर्माहट अब मेरे जिस्म को भी गर्म कर रही थी। मेरे लन्ड की नसों में अब खून का प्रभाव तेज हो चुका था। मैने रानी के चेहरे को अपने सामने किया। कितनी मासूम और प्यारी लग रही वो। उसकी झुकी आंखे चीख चीख के उसके प्यार का प्रमाण दे रही थी। जी कर रहा था कि बस उसकी आंखों में ही देखता रहूं। मगर लन्ड महाराज कहा माने वाले थे। वो तो अपनी ही धुन में सिर उठाए अपनी प्रेमिका चूत के इंतजार में कड़क होते जा रहे थे। रानी के होंठ काप रहे थे। जैसे उसे पता हो कि पहला हमला कहा होने वाला है। मैने रानी को अपनी बाहों से निकाल अपनी गोद में बिठाया। गोद में बैठते ही उसके चेहरे के भाव बदल गए। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसकी गान्ड पे जो चुभ रहा है वो क्या है। मैने अपने दोनों हाथों को रानी के बालों पे रख उसके कांपते होंठों से अपने होंठ जोर दिए। आज पता नहीं क्यों मगर रानी के होंठ नमकीन लग रहे थे। जिसने मेरे अंदर की आग को और बढ़ा दिया। रानी के होंठो को चूसते चूसते मैने अपने हाथ पीछे उसकी ब्लाउज पे रख दिए। मुझे उसकी ब्लाउज के हुक नहीं मिल रहे थे। मगर रानी भी अब होशियार हो गया थी। या यूं कहूं उससे पता था अगर जल्द ही मुझे उसकी ब्लाउज के हुक नहीं मिलेंगे तो उसका ये ब्लाउज भी फाड़ दिया जाएगा। मगर हवस का ऐसा नशा मेरा सिर पे सवार था कि थोड़ा इंतजार भी मुझे नागवारा लगा। और मैने रानी का ये आखरी ब्लाउज भी फाड़ दिया। हवस तो रानी ने भी थीं। इसीलिए तो ब्लाउज के फटने पे भी उसके होंठ मेरे होंठो से अगल नहीं हुएं। ब्लाउज के साथ मैने राने के ब्रा को भी फाड़ दिया। जल्द ही मैने किस खत्म किया। किस खत्म करते ही मेरी नजर रानी के चूंचे पे गई जो अब खुली हवा में सांस ले रहे थे। गोरे गोरे बदन में पे वो दो भूरे भूरे निप्पल मुझे पागल बना रहे थे। एक चूची को मैने अपने हाथ में लिया और दूसरे को अपने मुंह में। रानी की चूचियां इतनी छोटी थी कि पूरी की पूरी मेरी मुठ्ठी में समा गई। इतनी बेदर्दी से उसकी चूचियों की रगड़ने पर भी रानी ने कोई विरोध नहीं किया। हालांकि उसकी चीखें बता रही थी कि उससे कितना दर्द हो रहा है। मगर उसे इस दर्द से बचने वाला उसका पति ही खुद उससे ये दर्द दे रहा था। जैसे ही मैने रानी की चूचियों को छोड़ा तो दोनों टमाटर की तरह लाल हो चुके थे। फिर मैने रानी को अपनी गोद से उठा कर अपने सामने बिस्तर के किनारे खड़ा कर दिया। अभी रानी कमर के ऊपर पूरी नंगी थी। मगर मैने अभी तक अपने सारे कपड़े पहन रखे थे। वैसे भी मुझे अपनी कपड़े उतारने की कोई जल्दी तो थी नहीं। मैने कड़क आवाज में रानी से बोला "चलो अपने सारे बचे कपड़े उतरो"। मै देखना चाहता था कि आखिर जब औरते अपने कापड़ी उतरती है तो कैसी लगती है। एक तरह से कह सकते है कि ये मेरी fetish थी। खैर राजी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जैसे उससे कुछ सुनाई ही न दिया हो। मगर मैं कहा मानने वाला था। मैने दुबारा बोला "जल्दी से कपड़े उतरो नी तो इसे भी फाड़ दूंगा" रानी मेरी कड़क आवाज से थर थर कांप रही थी। रानी को थर थर कांपता देख मुझे एक अलग आ सुकून में रहा था। तभी मुझे Gangs of Wasepur का वो डायलॉग याद आया। सो मैने रानी के गालों को अपने हाथों से पकड़ बोला "कांप कहे रही हो"। मैने रानी के साड़ी का पल्लू उठाया जो उसके पैरों के पास धूल चाट रहा था और जोर से खींच दिया। सारी खींचने के कारण रानी गोल गोल घूम गई और उसकी सारी मेरे हाथों में आ गई। अब रानी केवल पेटीकोट में मेरे सामने खड़ी थी। उफ्फ क्या नजारा था दूध के जैसी गोरी कच्छी कली मेरे सामने पेटीकोट में खड़ी अपनी दमदार चुदाई का इंतजार कर रही थी। मैने उसकी सारी साइड में फेंकी और एक बार फिर से उसके होंठो पे हमला बोल दिया। मगर इस बार का हमला थोड़ा आक्रामक था। क्योंकि इस बार मेरी होंठो के बजाए मेरे दांत रानी के होंठो से जुड़े थे और उसकी होंठो को चूसने की जगह काट रहे थे। मैने रानी के होंठ तब तक नहीं छोड़े जब तक कि उसके होंठो ने खून न फेंक दिया। दोस्तो आप लोग मुझे judge मत करना करना मगर उसके होंठो से बहता खून मुझे और ज्यादा उत्तेजित कर रहा था। बाहर बारिश हो रही थी और यहां मेरा लन्ड रानी की चूत में बारिश करना चाह रहा था। रानी अभी भी खाती ही थी। और नीचे जमीन पे देख रहे थी। जैसे ही मैं रानी के करीब मुझे उसके दिल की धड़कने सुनाई देने लगी। जोर जोर से सांस लेने के कारण उसकी नन्ही नन्ही चूचियों भी ऊपर नीचे हो रही थीं। उसके करीब पहुंचते ही मैने उसका पेटीकोट पकड़ा और फाड़ने लगा। मगर इस बार रानी के विरोध करने लगी। वो पेटीकोट को खोलना चाह रही थी। ताकि मैं उसकी पेटीकोट को न फ़ारू। और इसने वो काफी हद तक सफल भी हुई। अब उसके पैरों में उसकी पेटीकोट पड़ीं थीं। और रानी मेरे सामने एक साधारण कच्छी में खड़ी थी। मगर वो कच्छी साधारण भी बची थी क्योंकि वो रानी के अमृत रस से पूरी तरह भीग चुकी थी। उसकी गीली कच्छी इस बात का प्रमाण थी कि रानी को भी इस जबरदस्ती में मज़ा आ रहा है। मैने रानी को अपनी गोद में उठाया और चल दिया बारिश में रूम के बाहर खुली छत पर।
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दोस्तो इस महीने में थोड़ा busy हु तो इस महीने updates regular नहीं होंगे मगर next month से updates regular रहेंगे।
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