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मां के जाने के बाद जैसे मेरी ज़िंदगी से हर आवाज़ गायब हो गई थी। ना सुबह जल्दी उठने की कोई वजह बची थी, ना रात को सोने की। ज्यादातर वक्त मैं मां के कमरे में बंद रहता, या उनकी पुरानी चीज़ों को यूँ ही देखता रहता।
मेरी तरह रानी भी गुमसुम ही रहती। जैसे जताना चाह रह रही हो कि मैं अकेला दुखी नहीं हूं।
लेकिन मुझे कभी अकेला भी नहीं छोड़ती। सुबह उठता तो चाय पहले से मेज़ पर रखी मिलती। कई बार खाना खाने का मन नहीं होता, फिर भी वो बिना कुछ कहे प्लेट मेरे सामने रख जाती। और जब मैं बिना खाए उठ जाता, तो उसके चेहरे पर हल्की उदासी दिखती… मगर शिकायत कभी नहीं।
एक शाम मैं छत पर अकेला बैठा डूबते सूरज को देख रहा था। तभी रानी चुपचाप आकर मेरे पास बैठ गई।
कुछ देर तक हम दोनों खामोश रहे।
फिर उसने धीरे से पूछा,
“माँ आपको बचपन में बहुत डाँटती थीं?”
कुछ देर यादों के समुद्र में खोने के बाद मैं बोला “बहुत…”
उसने दुबारा सवाल किया जैसे मेरे दिल का बोझ कम करना चाहती हो “और प्यार?”
उस सवाल पर ना जाने क्यों मेरा गला भर आया।
मैंने नज़रें फेर अपने आंसुओं को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा “उससे भी ज्यादा…”
इतना कहते ही भीतर दबा दर्द जैसे बाहर आने लगा। पता नहीं कितने दिनों बाद मेरी आँखों से आँसू निकले थे। तभी मैंने महसूस किया… रानी ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ लिया था।
उसने मुझे चुप कराने की कोशिश नहीं की… बस वैसे ही बैठी रही।
और ना जाने क्यों, उस पल पहली बार मुझे अकेलापन थोड़ा कम महसूस हुआ।
उस रात बहुत दिनों बाद मुझे नींद आई।
दिन धीरे-धीरे गुजरने लगे। मैं अब भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ था… मगर रानी की मौजूदगी मेरे भीतर के सन्नाटे को थोड़ा हल्का जरूर कर देती थी।
अब कभी-कभी मैं खुद उससे बातें कर लिया करता था। माँ की आदतों को लेकर, बचपन की बातों को लेकर… और वो हर बार मुझे ऐसे सुनती, जैसे मेरी हर बात उसके लिए जरूरी हो।
एक रात बिजली चली गई थी। मौसम भी खराब था, इसलिए पूरा घर बारिश की आवाज़ में डूबा हुआ था।
मैं अपने कमरे में बैठा बाहर छत की और देख रहा था, तभी रानी दो कप चाय लेकर आ गई।
“आप फिर सोए नहीं?” उसने धीमे से पूछा।
मैं हल्का-सा मुस्कुराया।
“नींद अब भी मुझसे नाराज़ है शायद।”
वो भी पास बैठ गई। कमरे में दाखिल होते होते बारिश ने उससे भीगा दिया था। हवा के साथ उसकी भीगी लटें बार-बार चेहरे पर आ रही थीं। मगर इस बार ना जाने क्यों… मैंने उसे थोड़ा गौर से देखा।
शायद पहली बार मैं उसे सिर्फ अपनी पत्नी की जिम्मेदारी की तरह नहीं देख रहा था।
कुछ देर बाद ठंडी हवा से वो हल्का-सा काँप गई।
अनजाने में ही मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
रानी ने मेरी ओर देखा… मगर हाथ नहीं हटाया।
उसकी आँखों में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। बस एक अपनापन था… और वही अपनापन मेरे भीतर की खाली जगहों को धीरे-धीरे भर रहा था।
लेकिन अगले ही पल माँ का ख्याल मन में कौंध गया।
मैं तुरंत पीछे हट गया।
“मुझे… शायद अभी थोड़ा वक्त चाहिए…”
मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि रानी ने धीरे से मेरा हाथ दबाया।
जैसे कहना चाह रही हो “मैं कहीं नहीं जा रही…”
उस पल ना जाने क्यों, मेरी आँखें फिर भर आईं।
उस रात के बाद हमारे बीच की दूरियाँ धीरे-धीरे कम होने लगीं।
एक रात मैं कमरे में लेटा था, तभी दरवाज़ा धीरे से खुला और रानी अंदर आई। मैं उठकर बैठा ही था कि अचानक हल्का-सा चक्कर आ गया। मैं संभल पाता, उससे पहले ही रानी ने मुझे पकड़ लिया।
कुछ पल के लिए वो बिल्कुल मेरे करीब थी।
इतना करीब कि उसकी साँसों की गर्माहट तक महसूस हो रही थी।
लेकिन इस बार ना मैंने खुद को दूर किया… ना उसने।
कमरे में अजीब-सी खामोशी थी। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, और अंदर मेरे दिल की धड़कन जैसे पहली बार साफ सुनाई दे रही थी।
रानी की नज़रें धीरे-धीरे झुक गईं।
“अब भी खुद को अकेला समझते हैं…?” उसने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा।
उस सवाल ने जैसे भीतर की सारी दीवारें तोड़ दीं।
मैंने धीरे से उसे अपनी बाँहों में खींच लिया।
उसने भी बिना झिझक खुद को मुझमें समेट लिया… जैसे वो काफी समय से इसी पल का इंतज़ार कर रही हो।
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