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Aryan Arya

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Update 5 (Mega Update)


मैने बड़े प्यार से उसके बाएं/लेफ्ट कांधे को सहलाते हुए कहा "तुम मुझसे इतना दूर दूर क्यों भाग रही हो। आज तो हमारे मिलन की रात है। क्या तुम्हे पता है आज के रात पति पत्नी क्या करते है?" रानी के चेहरे पे आई शर्म ने ये तो सिद्ध कर दिया कि उसे ये पता है कि आज उसके साथ क्या होने वाला है। मगर रानी से अपनी ख्वाहिशों को पूरा करवाने के लिए उसका सहज होना और खुलना बेहद जरूर है। इसलिए मैने उससे पूछा "अच्छा बताओ तो सुहागरात में पति पत्नी क्या करते है?" वैसे मुझे रानी से उत्तर की अपेक्षा भी नहीं थी और हुआ भी वही वो चुप ही रही। मगर उसका बोलना भी तो जरूरी था नहीं तो कैसे मैं जान पाता उसे सेक्स के बारे में कितना पता है और मुझे उसपर कितना मेहनत करना हैं।
मैने दुबारा बड़े प्यार से उससे पूछा "बताओ न मै तो तुम्हारा पति हु न मुझसे क्या शर्माना"
रानी एक बार फिर शांत रही। रानी की खामोशी चीख चीख कर बता रही थी कि मुझे उसपे काफी मेहनत करना पड़ेगा।
एक बार फिर मैने अपने गुस्से पे काबू पाते हुए उससे पूछा "अब बता भी दो तुम्हें मेरी कसम" वैसे मैने जानबुझ कर उसे मेरी कसम नहीं दी थी। मगर मेरी कसम का असर ही था कि उसने पहली बार आंखे उठाके मेरी आंखों में आंखे डाला और बोली "जी आप मुझे अपने कसम न दे। मां ने बोला जो आप बोले वही करने। चाहे मुझे बुरा लगे या दर्द हो फिर मै आपको न रोके" रानी ने एक सांस में सारी बात बता दी और दुबारा से अपनी पलके नीचे झुका ली। रानी के जवाब ने दो बाते सिद्ध कर दी। पहला आज की रात और आगे जो भी करना है वो मुझे ही करना है और दूसरा की रानी की शर्म के खिलाफ खसम की कसम सबसे महत्वपूर्ण हथियार सिद्ध हो सकता है। मतलब रानी को मेरी कसम देके मैं उससे कुछ भी करवाया सकता हूं।
मैं और जाना चाहता था कि इसे सेक्स के बारे में और कुछ भी पता है या नहीं।
मैं "क्या तुम्हारी मां ने और कुछ नहीं बताया तुम्हे? या तुम्हारी चाची, बुआ या सहेलियों में से किसी ने कुछ नहीं बताया"
रानी ने बिना चेहरा ऊपर किए बोला " सोनी बता रही थी कि पहली रात बहुत दर्द होता है"
मैं "सोनी कौन?" (मैं पहले साधारण साधारण सवाल पूछ रानी को सहज करना चाहता था)
रानी "मेरी सहेली, उसकी शादी पिछली ठंडी में ही हुई थी"
मैं "और क्या क्या बताया सोनी ने"
मेरे इस सवाल से रानी शर्मा गई। रानी अभी भी मेरी गोद में ही थी। शर्म के मारे वो ऐसे सिमट गई जैसे मेरे सीने में घुस जाएं। नीचे मेरा लन्ड ऐसे बगावत पे उतर आया था कि जैसे रानी के शरीर में छेद करना चाहता हो। रानी को भी मेरे लन्ड का एहसास तो हो ही चुका होगा। मगर उसकी तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई थी।
मैने रानी के ठोड़ी (Chin) को पकड़ कर ऊपर करते हुए उसकी आंखों में आंखे डालकर बड़े प्यार से पूछा "बताओ न और क्या क्या बताया तुम्हारी सहेली ने"
मेरी उम्मीद के विपरीत रानी ने जवाब देते हुए कहा "नहीं जी मुझे शर्म आती है जी"
वैसे रानी के जवाब से मै संतुष्ट तो नहीं था मगर पहले रानी का मेरे सीने में घुसना और अब मेरे सवाल का जवाब बिना किसी डर के देना ने मुझे सोचने पे मजबूर कर की कही मै रानी के बारे में गलत तो नहीं। कही ये एक सीधी सादी कच्ची कली की जगह कोई खेली खिलाई चालू लड़की तो नहीं जो सिर्फ शर्म का नाटक कर रही है।
मैं रानी की आंखों में देखता रहा और सोचता रहा। आखिर रानी के व्यवहार में एकाएक इतना बदलाव कैसे आ गया? थोड़ा देर पहले यही लड़की जो मेरे डर के कारण इतना धीरे बोल रही थी कि मुझे सुनाई भी नहीं दे रहा था और अभी मेरी आंखों में आंखे डाल कर बिना डर के जवाब दे रही है। काफी देर अपने अंदर के अन्तर्द्वन्द से लड़ने के बाद भी मैं कोई निष्कर्ष पे नहीं पहुंच पा रहा था। अंतिम में मैने निश्चय किया कि इससे बाते जारी रखता हूं। तभी कुछ पता चल सकता है।
मैं "अब मुझसे क्या शर्माना जो भी तुम्हारी सहेली ने बताया। मुझे भी बताओ"
इस बार उसकी नज़रे तो नहीं मिली मगर उसने जवाब दिया "सोनी बता रही थी कि पहले बहुत दर्द होता है मगर फिर मजा भी आता है"
मैं "क्या करने पे मजा आता है?"
रानी "वो...वो मुझे शर्म आती है"
मैं मन में "अगर इसे इसके मन की बात जाननी है तो इसे प्यार से हैंडल करना पड़ेगा"
मैने रानी के गालों को सहलाते हुए कहा " मुझसे क्या शर्माना हम तो पति पत्नी है ना जान"
"जान" पर मैने ज्यादा जोर देके बोला था। जिसका असर भी हुआ रानी के चेहरे पे पहली बार मैने मुस्कान देखी थी। रानी मेरे सीने में मुंह छुपाकर धीरे से ही सही मगर बोली "सोनी बता रही थीं कि जब आदमी का व...वो हम औरतों के उसमें घुसता है तो मजा आता है"
रानी की बातों से इतना तो पता चल ही गया था कि इसे सेक्स का ज्ञान मिल चुका है अब मुझे ये पता करना था क्या इसने इस ज्ञान का प्रयोग भी कही किया है या नहीं।
मैं "क्या वो और किसमें? खुल के बताओ न जान"
रानी "नहीं जी मुझे शर्म आती हैं"
रानी ने पहली बार मेरे किसी सवाल का जवाब देने से साफ इनकार किया था। मेरा मन तो कर रहा था कि अभी इसके कपड़े फाड़कर इसे नंगा करूं और पटक के चोद दू। वैसे भी इसे यहां बचाने वाला कोई नहीं था। मगर मुझे सिर्फ एक दिन की खुशी नहीं चाहिए थी बल्कि अपने आने वाली पूरी जिंदगी मै इससे अपनी ख्वाहिशों को पूरा करवाना चाहता था। मैने अपने गुस्से को शांत करते हुए खुद से ही कहा "कोई बात नहीं हर बात का हिसाब होगा"
मैने रानी की पीठ जो साड़ी से ढकी थी को सहलाते हुए अपना आखिरी दाव खेला "तुम्हे मेरी कसम बताओ ना"
रानी अभी भी मेरे सीने में सिर छुपाए थी। कुछ देर शांत रही फिर बोली "सोनी ने बस इतना ही बताया कि जब आदमी का पेशाब करने वाला हम औरतों के पेशाब करने वाले में घुसता है तो मजा आता है"
अब तक मेरा लन्ड खड़ा ही था। करीब पिछले आधे घंटे से रानी मेरी गोद में ही थी और मेरा लन्ड उसकी गान्ड पे रगड़ खा रहा था। मुझे थोड़ा बहुत दर्द या कहे दबाव भी महसूस होने लगा था। साथ ही साथ मेरे लिए सब्र करना भी मुश्किल होता जा रहा था। सो मैने रानी से बातों को पूर्णविराम लगाकर असली खेल खेलने का निश्चय करते हुए रानी से पूछा "तुम्हे वो मजा चाहिए?"
रानी कोई प्रतिक्रिया देती उससे पहले ही मैने अपने होंठ रानी के होंठ पे रख दिए और चूसने लगा। मेरी आंखे बंद थी इसलिए मैं रानी का रिएक्शन नहीं देख पाया मगर वो चौंकी तो जरूर होगी। एक हाथ से रानी के सिर को सहला रहा था या यू कहे थम रखा था तो वही दूसरी हाथ को मैने काम पे लगते हुए रानी के साड़ी के पल्लू को उसके कंधे से अलग कर दिया। रानी के होंठ चूसते चूसते मै पूरी तरह आश्वासत हो गया था कि ये उसका पहला चुम्बन हैं। था तो मेरा भी ये पहले चुंबन ही मगर उसके चुम्बन का तरीका ही बता रही थी मेरे होंठ ही पहले होंठ है जिसने रानी के होंठो को छुआ था। चुम्बन टूटने के बाद जब मैने रानी की तरफ देखा तो पाया कि रानी की आंखे बंद है और वह जोड़ जोड़ से सांस ले रही। जिससे उसकी छाती ऊपर नीचे हो रही थी। पल्लू तो मैं पहले ही हटा चुका था अब बारी ब्लाउज की थी। मैने जैसे ही ब्लाउज के हुक पे हाथ रखा दो हाथ मुझे ब्लाउज खोलने से रोकने लगे। मगर अब मैं कहा रुकने वाला था। मैने उन दोनों हाथों को झटका और दुबारा से हुक खोलने की कोशिश करने लगा। एक हुक खुला ही था कि फिर से वो दोनों हाथ मुझे रोकने पहुंच चुके थे। अब तक मेरे सब्र का बंद टूट चुका था। अब किसी भी तरह की देरी मुझे नागवारा थी। सो पहले मैने उन दोनों हाथों को फिर से हटाया और इस बार ब्लाउज का हुक खोलने की बजाय मैने दोनों हाथों से ब्लाउज को पकड़ के फाड़ दिया। ब्लाउज फटते ही रानी ने आंख खोला मगर कुछ बोली नहीं। अगर वो कुछ बोलती या मुझे रोकती भी तो मैं उस समय उस मूड में था कि उसके गोरे गालों को लाल करने से पहले सोचता भी नहीं। ब्लाउज के अंदर उसने सफेद कलर की सिंपल सी ब्रा पहनी थी। जिसका हुक पीछे पीठ की तरफ था। मैने दोनों हाथों से पकड़ ब्रा को भी फाड़ने ही वाला था कि रानी ने अपने हाथ पीछे ले जाक खुद से ही ब्रा खोल दी। मैने जल्दी से रानी के फटे ब्लाउज और ब्रा को उसके शरीर से अगल किया। अब रानी मेरे गोद में कमर के ऊपर पूरी तरह से नंगी थी। रानी की चूचियां ज्यादा बड़ी नहीं था। मगर मैं इतना उत्तेजित हो चुका था कि मुझे उसके छोटे चूचियों से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। मैं तो बस उसके दोनों संतरों पे टूट पड़ा। पहले दोनों हाथों से जमके उसकी चूचियों को दबाया। दबाया क्या मसला। वो दर्द से कराहती रही मगर मुझे क्या फर्क पड़ने वाला था। उसकी नन्ही नन्ही चूचियों से खेलने के बाद मैं उसके दोनों निप्पलों को बेरहमो की तरह मसलने लगा। अब तक उसके गोरे गोरे संतरे टमाटर की तरह लाल हो चुके था। मुझे तो ये भी होश नहीं था कि जिसकी चूचियां मैं बेरहमो की तरह दावा रहा हूं उसपर क्या बीत रही है। खैर, मुझे उससे फर्क भी नहीं पड़ रहा था। फिर मैने निपल्स को मुंह में लिया और चूसने से ज्यादा काटने लगा। रानी से अब दर्द बर्दास्त नहीं हो रहा था। उसने मेरे सिर को अपने निपल्स से हटाने की कोशिश भी की। जिसका परिणाम उसके दोनों गोरे गोरे गालों को चुकाना पड़ा। अब मैने रानी को अपनी गोद में उठाया और बेड पे लाके लिटा दिया। अभी भी साड़ी रानी के कमर पे बांधी हुई थी। पहले मैने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद किया। फिर जल्दी से रानी की साड़ी को खोला। साड़ी के अंदर उसने लाल रंग का ही साया/पेटीकोट पहना हुआ था। जो उसके कमर पे बांधी हुआ था। मैने पेटीकोट की गांठ को खोलने की कोशिश की मगर जब वो मुझसे नहीं खुला तो मैने उसकी पेटीकोट को भी फाड़ दिया। रानी बस आंखे फाड़े मेरी हरकतें देख रही थी। और वो कर भी क्या सकती थी। अगर कुछ बोलती या मुझे रोकने की कोशिश करती तो थप्पड़ ही खाती। पेटीकोट फाड़ने के बाद, रानी के शरीर पर केवल एक भूरे रंग की कच्छी ही बचीं रह गई थी। कच्छी ही क्योंकि की फुल साइज में सस्ते में जो बच्चों को पहनाया जाने वाली कच्छी होती है वहीं रानी ने पहन रखा था। रानी की कच्छी उसके चूतरस से पूरी भींग चुकी थी। ऐसा लग रहा था। जैसे उसने अपनी कच्छी में ही मूत दिया हो। उसकी कच्छी देखके मुझे समझ आया कि क्यों रानी के व्यवहार में एकाएक बदलाव आया था। उसकी कच्छी को भी मैने फाड़कर उसके जिस्म से अलग कर दिया। अब रानी मेरे बिस्तर पे जन्मजात नंगी पड़ी थी। मैने भी जल्दी से अपने सारे कपड़े खोले। मेरे लन्ड का तनाव अपने चरम पर था। लन्ड की नसे साफ दिख रही थी। जल्दी से जल्दी इसका लावा उगलवाना जरूरी था। नहीं तो मैं उत्तेजना के कारण पागल हो जाता। मैं जल्दी से अपने बिस्तर पर चढ़ा जहां रानी आंख मूंदे नंगी पड़ी थी। रानी के मुंह के ऊपर लगभग बैठने जैसे पोजीशन में आने के बाद मैने अपने दाएं पैर को उसके बाएं तरफ और बाय पैर को उसके दाएं तरफ किया। और अपने लन्ड को उसके मुंह ठीक सामने कर दिया। रानी सब कुछ अपनी आंखों से देख रही थी मगर उसमें मेरी हरकतों का विरोध करना का साहस नहीं बचा था।
मैने रानी को ऑर्डर देते हुए "मुंह खोलो अपना"
रानी बेचारी भी क्या करी। उसके तो ये भी नहीं पता था कि जो मैं अभी करने वाला हु उससे मुखचोदन कहते है। जैसे ही उसने अपना मुंह खोला मैने अपना 6 इंच का लन्ड पूरा एक बार में ही उसके गले तक उतर दिया। रानी को प्रतिक्रिया बता रही थी कि उसे कितना बुरा लग रहा और घिन आ रही है। उससे तो खासी भी होने लगी। मगर मुझमें तो जैसे कोई जानवर आ गया था। रानी की चिंता किए बगैर मैं उसके मुंह को जितना तेज हो सके उतनी तेजी से चोदने लगा। करीब पिछले 1 घंटे से मेरा लन्ड खड़ा था। जिसका असर ये हुआ कि मेरे लन्ड ने एक मिनिट के भीतर ही अपना जहर रानी के मुंह में उगल दिया। लन्ड के लावा निकलते ही मुझपर से वासना का असर कम होने लगा। अपनी और रानी की स्थिति को देखकर एक बार को तो मन किया ये सब यही छोड़ दूं और रानी से माफी मांग लूं। आखिर मैंने रानी के साथ किया तो जबरदस्ती ही था। मगर मेरे अंदर के शैतान ने मुझे आवाज लगते हुए सलाह दी कि अब तो जो होना था हो गया। अब पीछे हटने से क्या फायदा। जैसा चल रहा है चलने दो। अब तक मेरा लन्ड रानी के मुंह से बाहर आ चुका था मगर एक बार फिर से अपना सिर उठाने लगा था। बढ़ती उत्तेजना में मैने अपने अंदर के शैतान की बात मानते हुए इस जबरदस्ती के खेल को चालू रखने का फैसला लिया। वैसे तो मैने अपने सुहागरात के लिए काफी प्लानिंग कर रखी थी कि मैं अपनी पत्नी की चूत चाटूंगा, उसके कांख को चाटूंगा और भी शरीर के कई अंग चूमूंगा और चाटूंगा। मगर फिलहाल मैने अपनी सारी ख्वाहिशों तो ताक पे रख। रानी को डायरेक्ट चोदने का निश्चय किया। अब तक मैने गौर से रानी की चूत को नहीं देखा था। जब मैने गौर किया तो पाया कि उसकी चूत को तो उसकी झांटों ने धक रखा हैं। अगर कोई नॉर्मल कंडीशन होता तो पहले मैं उसकी झांटों को साफ करता और फिर इससे चोदता। मगर आज मुझपे उत्तेजना का भूत सवार था। जिससे बस चूत चोदना था। चाहे चूत झांटों से ढकी हो या चिकनी हो। मैने रानी की चूत में अपनी एक उंगली डालने की कोशिश मगर ये क्या मेरी उंगली तो उसकी चूत में घुस ही नहीं रही। इस असफलता ने मेरे अंदर खुशी और उमंग की लहर का दी थी। खुश होता भी क्यों नहीं आखिर 26 साल वर्जिन रहने के बाद एक कुंवारी कच्ची कली अभी मेरे बिस्तर पे नंगी लेटी थी। और मजे की बात ये थी कि जिस चूत में मेरी उंगली नहीं घुस रही उसमें मै अपना लन्ड डालकर आज पूरे 26 साल की वर्जिनिटी का बदला लेने वाला था। फिर, मैने अपना लन्ड रानी की चूत पे सेट किया और जोड़ से धक्का मारा। रानी की चूत इतनी टाइट थी कि मेरा लन्ड उसकी चूत के अंदर तो नहीं गया मगर उसकी आंखों से आंसू और मुंह से चीख जरूर बाहर निकल आई। रानी की आंसू से तो मुझे वैसे भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। मगर उसकी चीखें मेरे लिए मुश्किल पैदा कर सकती थी। अगर नीचे मेरी मां उसकी चीखें सुन लेती तो शायद सुहागरात के रात भी मैं वर्जिन ही सोता। सो सबसे ज्यादा जरूरी था रानी की चीखों को बंद करना। मैने अपने दाएं हाथ को उसके मुंह पे और लन्ड को उसकी चूत पे रख रख एक बार फिर से धक्का लगाया। मगर मेरे हाथ के ऊपर उसके मुंह पर होने के कारण इस बार भी मेरे लन्ड को असफलता ही मिली। मैने इधर उधर नजर दौड़ाया तो मुझे रानी की चूतरस से भीगी फटी कच्छी बेड के नीचे नजर आईं। मैने उसकी कच्छी को नीचे से उठाया और मोर मार के उसके मुंह में घुसा दिया। हालांकि इस बार उसने विरोध किया मगर दो झापड़ में ही उसका विरोध ठंडा पड़ गए। इस बार मैने अच्छे से अपने लन्ड को उसकी चूत पे रखा और दे मर धक्का। रानी की चूत इतनी टाइट थी कि केवल मेरे लन्ड का टोपा ही उसकी चूत में घुस पाया था। रानी के मुंह में कच्छी होने बाबजूद उसकी चीख पूरे कमरे में गूंज उठी। मैने जल्दी से अपनी हाथों से उसका मुंह दावा और 4–5 धक्के में पूरा लन्ड उसकी कोरी चूत में उतार दिया। करीब 10 मिनिट तक तबियत से रानी को चोदने के बाद एक बार फिर से छोटे आर्यन ने अपनी मणि उगल दी। मगर इस बार मणि रानी की मुंह के जगह उसकी मुनिया में थी। इस दमदार चुदाई के बाद जैसे ही मेरी नजर रानी पे पड़ी। तो मैं हैरान परेशान हो गया क्योंकि रानी की चुदाई करने के चक्कर में मुझे पता ही नहीं चला कि रानी कब बेहोश हो गई। ऊपर से रानी के चूत से खून और मेरी मणि का संगम धीरे धीरे बाहर निकल रहा था। मैने रानी को दो तीन बार हिलाकर होश में लाने की कोशिश भी की मगर उससे होश नहीं आया। अब तक मेरा लन्ड उसके चूत में ही था और एक बार फिर से खड़ा हो चुका था। वासना में मै इस प्रकार अंधा हो चुका था कि मुझे ये तक नहीं सूझ रहा था कि थोड़ा सा पानी लेक मै रानी के चेहरे पे मारु जिससे वो होश में आ सके। उल्टा मेरा मन एक बार फिर से रानी को चोदने का करने लगा। मैने मेरे मन की सुनी। पहले अपने लन्ड को रानी की चूत से बाहर खींचा। लन्ड बाहर खींचते ही रानी की चूत से निकले वाले खून और मेरे मणि का मिश्रण तेजी से बाहर निकलने लगा। पता क्यों मगर उस लाल तरल को रानी की झांटों से भरी चूत से बाहर निकलता देख मुझे बहुत खुशी मिल रही थी। मैं तब तक इंतजार करता रहा जब तक उसके चूत ने सारा तरल बाहर नहीं कर दिया। मैने एक बात और गौर किया कि अब रानी की चूत पहले के मुकाबले थोड़ी फैली हुई लग रही थीं। मगर ज्यादा ध्यान न देते हुए एक बार फिर मैने अपने लन्ड को रानी की चूत पे रखा और धक्का मारा। इस बार लन्ड एक बार में ही रानी की चूत में घुस गया। भले ही आधा ही घुसा था मगर एक बार में ही घुस गया। चूत में लैंड घुसते ही रानी के मुंह से एक दबी से चीख निकली। शायद दर्द के कारण उसे होश आया होगा और दर्द के कारण ही वो तुरंत फिर से बेहोश भी हो गई। दूसरा धक्का मार पहले मैने अपने पूरे लैंड को रानी की चूत में उतरा फिर उससे बेरहमों की तरह चोदने लगा। मैने रानी के मुंह से अब उसकी फटी कच्छी भी निकाल दी थी। और अपने होंठों से उसके होंठो पे अपने सुहागरात की निशान छोड़ने लगा। मेरे दोनों हाथ भी खुद ब खुद रानी की चूचियों को अपने गिरफ्त में ले चुके थे। और उसकी चूचियों को मसलते जा रहे थे। यह बेरहम चुदाई लगभग 15 मिनिट चला। जिसके बीच दो तीन बार रानी होश में आती और तुरंत बेहोश हो जाती। मगर उसके आंखों से आंसू लगातार निकल रहे थे। एक बार फिर मैने अपने अंदर का लावा रानी की मुनिया में ही निकाल दिया। रात के कितना बज रहे थे मुझे नहीं पता मगर मुझे बहुत जोड़ों की नींद आने लगी। वैसे भी दमदार चुदाई करने के बाद नींद बढ़िया ही आती है। मैने रानी के चूत से बिना अपना लन्ड बाहर निकले ही उसके ऊपर निढाल हो गया और नींद की आगोश में कब चला गया पता ही नहीं चला।
सुबह मेरी नींद मेरे मोबाइल की आवाज से खुली। शायद किसी का कॉल था। मगर मोबाइल मेरी पहुंच से दूर फर्स पे पड़े मेरे पैंट में था। सो मुझे उतना पड़ा। अभी मैं और रानी दोनों बिस्तर पे नंगे थे। मैं रानी के नंगे शरार पर ही लेटा हुआ था। और मेरा लन्ड अभी भी रानी के चूत में ही था। अब तक मेरे और रानी के मिलन से निकला अमृत हमारे गुप्तांगों के पास जम चुका था। खास करके रानी की झांटों पे। एक बार फिर से मोबाइल बजा। मगर रानी की नींद अब तक नहीं खुली थीं। शायद वो अभी तक बेहोश ही थी। मैने जल्दी से अपना लन्ड रानि की चूत के बाहर खींचा और नीचे फर्स पे पड़े अपने पेंट से मोबाइल निकले लगा। इस बार फिर से कॉल कट चुका था। मोबाइल निकला तो पता चला ऑफिस(बैंक) से कॉल था। मैने पहले अपनी हालत देखी फिर बिस्तर पे नंगी लेटी रबी की हालत देखी और फिर अपने कमरे ही हालत देखी। मैने मोबाइल सोफे पे रखा और बाथरूम में घुसके पहले फ्रेश हुआ फिर खुद को साफ किया। और नंगा ही बाथरूम से बाहर कमरे में दाखिल हुआ और गोदरेज से धूले कपड़े निकाल कर पहन लिए। अब बारी थीं। रानी को उठने की। मैने बाथरूम से एक जग पानी लाया और सारा का सारा पानी रानी के चेहरे पे उझल दिया। रानी ने एक चीख के साथ अपनी आंखे खोली। खुद को नंगी हालत में बिस्तर पे लेटा देख जल्दी से वो नंगी ही बाथरूम की तरफ भागी। मगर रास्ते में ही रात की चुदाई के दर्द के कारण वो फर्श पे गिर गई। मुझपर नजर पड़ते ही वो ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। मैं उसके पास गया और बैठकर उससे गले लगते हुए उससे चुप कराने लगा। मगर मेरे सारे प्रयास विफल हो रहे थे। आखिर में मैने झूठ का सहारा लेते हुए कहा "मुझे पता है जान कल रात जो हुआ उससे तुम्हे बहुत दर्द हुआ और वो तुम्हे अच्छे भी नहीं लगा। मगर जान पति पत्नी ऐसे ही तो प्यार करते है" मेरी बात का असर रानी पे हुआ मगर वो अब भी रो रही थी। मैं मन में "इसे थोड़ा प्यार से हैंडल करना पड़ेगा"
मैने रानी को गोदी में उठाया और बाथरूम में ले गया। जहां मैने रानी के सारे अंगों को रगड़ रगड़ के साफ किया। मैने गौर किया कि रानी का गुस्सा अब चूमंतर हो चुका है और वो मुझे बारे प्यार से देख रही है। हा कभी कभी उसकी चीखें निकल जाती थी जब मैं उसकी चूत की सफाई कर रहा था। रानी को अच्छे से नहलाने के बाद मैने उससे अपनी गोद में उठा कमरे मे लाके बेड पे बिठाया। और उसके बैग को खोल उसके कपड़े ढूंढने लगा। उसके बैग में बस एक जोड़ी वही सिंपल वाली ब्रा कच्छी थी और एक जोड़ी पीले रंग की साड़ी,ब्लाउज और पेटीकोट थी।
मैने उससे साड़ी,ब्लाउज और पेटीकोट देते हुए कहा कि "आज से तुम ये पुरानी अंगिया(ब्रा) और कच्छी नहीं पहनोगी। मैं आज बाजार से तुम्हारे लिए नई अंगिया, कच्छी और कुछ कपड़े ले आऊंगा" उसने बस सहमति में सिर हिलाया। और जल्दी से पहले पेटीकोट फिर ब्लाउज पहना और फिर साड़ी पहन वो तैयार हो गई। मगर कमरे की हालत अब भी ठीक नहीं थी। कमरे के फर्श पे हम दोनों के कपड़े बिखरे हुए थे। बिस्तर तो रानी की चूत के खून और मेरे स्पर्म से लालम लाल हो गया था। मैने उसे फर्स पे बिखरे से कपड़े और बेडशीट को बाथरूम में रखने को कहा। उसने भी बिना किसी शिकायत के जैसा मैने कहा वैसा कर दिया। मेरी बात माने के ईनाम के तौर पे मैने उसके माथे(forehead) को चूमा। रानी को भी ईनाम पसंद आया और मंद मंद मुस्कुरा रही थी।


शेष अगले भाग में, आपको ये update कैसा लगा हमें बताए? और भाई लोग और उनकी दीदियों update अच्छा लगे तो Like कर देना।


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मैने दुबारा बड़े प्यार से उससे पूछा "बताओ न मै तो तुम्हारा पति हु न मुझसे क्या शर्माना"
रानी एक बार फिर शांत रही। रानी की खामोशी चीख चीख कर बता रही थी कि मुझे उसपे काफी मेहनत करना पड़ेगा।
एक बार फिर मैने अपने गुस्से पे काबू पाते हुए उससे पूछा "अब बता भी दो तुम्हें मेरी कसम" वैसे मैने जानबुझ कर उसे मेरी कसम नहीं दी थी। मगर मेरी कसम का असर ही था कि उसने पहली बार आंखे उठाके मेरी आंखों में आंखे डाला और बोली "जी आप मुझे अपने कसम न दे। मां ने बोला जो आप बोले वही करने। चाहे मुझे बुरा लगे या दर्द हो फिर मै आपको न रोके" रानी ने एक सांस में सारी बात बता दी और दुबारा से अपनी पलके नीचे झुका ली। रानी के जवाब ने दो बाते सिद्ध कर दी। पहला आज की रात और आगे जो भी करना है वो मुझे ही करना है और दूसरा की रानी की शर्म के खिलाफ खसम की कसम सबसे महत्वपूर्ण हथियार सिद्ध हो सकता है। मतलब रानी को मेरी कसम देके मैं उससे कुछ भी करवाया सकता हूं।
मैं और जाना चाहता था कि इसे सेक्स के बारे में और कुछ भी पता है या नहीं।
मैं "क्या तुम्हारी मां ने और कुछ नहीं बताया तुम्हे? या तुम्हारी चाची, बुआ या सहेलियों में से किसी ने कुछ नहीं बताया"
रानी ने बिना चेहरा ऊपर किए बोला " सोनी बता रही थी कि पहली रात बहुत दर्द होता है"
मैं "सोनी कौन?" (मैं पहले साधारण साधारण सवाल पूछ रानी को सहज करना चाहता था)
रानी "मेरी सहेली, उसकी शादी पिछली ठंडी में ही हुई थी"
मैं "और क्या क्या बताया सोनी ने"
मेरे इस सवाल से रानी शर्मा गई। रानी अभी भी मेरी गोद में ही थी। शर्म के मारे वो ऐसे सिमट गई जैसे मेरे सीने में घुस जाएं। नीचे मेरा लन्ड ऐसे बगावत पे उतर आया था कि जैसे रानी के शरीर में छेद करना चाहता हो। रानी को भी मेरे लन्ड का एहसास तो हो ही चुका होगा। मगर उसकी तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई थी।
मैने रानी के ठोड़ी (Chin) को पकड़ कर ऊपर करते हुए उसकी आंखों में आंखे डालकर बड़े प्यार से पूछा "बताओ न और क्या क्या बताया तुम्हारी सहेली ने"
मेरी उम्मीद के विपरीत रानी ने जवाब देते हुए कहा "नहीं जी मुझे शर्म आती है जी"
वैसे रानी के जवाब से मै संतुष्ट तो नहीं था मगर पहले रानी का मेरे सीने में घुसना और अब मेरे सवाल का जवाब बिना किसी डर के देना ने मुझे सोचने पे मजबूर कर की कही मै रानी के बारे में गलत तो नहीं। कही ये एक सीधी सादी कच्ची कली की जगह कोई खेली खिलाई चालू लड़की तो नहीं जो सिर्फ शर्म का नाटक कर रही है।
मैं रानी की आंखों में देखता रहा और सोचता रहा। आखिर रानी के व्यवहार में एकाएक इतना बदलाव कैसे आ गया? थोड़ा देर पहले यही लड़की जो मेरे डर के कारण इतना धीरे बोल रही थी कि मुझे सुनाई भी नहीं दे रहा था और अभी मेरी आंखों में आंखे डाल कर बिना डर के जवाब दे रही है। काफी देर अपने अंदर के अन्तर्द्वन्द से लड़ने के बाद भी मैं कोई निष्कर्ष पे नहीं पहुंच पा रहा था। अंतिम में मैने निश्चय किया कि इससे बाते जारी रखता हूं। तभी कुछ पता चल सकता है।
मैं "अब मुझसे क्या शर्माना जो भी तुम्हारी सहेली ने बताया। मुझे भी बताओ"
इस बार उसकी नज़रे तो नहीं मिली मगर उसने जवाब दिया "सोनी बता रही थी कि पहले बहुत दर्द होता है मगर फिर मजा भी आता है"
मैं "क्या करने पे मजा आता है?"
रानी "वो...वो मुझे शर्म आती है"
मैं मन में "अगर इसे इसके मन की बात जाननी है तो इसे प्यार से हैंडल करना पड़ेगा"
मैने रानी के गालों को सहलाते हुए कहा " मुझसे क्या शर्माना हम तो पति पत्नी है ना जान"
"जान" पर मैने ज्यादा जोर देके बोला था। जिसका असर भी हुआ रानी के चेहरे पे पहली बार मैने मुस्कान देखी थी। रानी मेरे सीने में मुंह छुपाकर धीरे से ही सही मगर बोली "सोनी बता रही थीं कि जब आदमी का व...वो हम औरतों के उसमें घुसता है तो मजा आता है"
रानी की बातों से इतना तो पता चल ही गया था कि इसे सेक्स का ज्ञान मिल चुका है अब मुझे ये पता करना था क्या इसने इस ज्ञान का प्रयोग भी कही किया है या नहीं।
मैं "क्या वो और किसमें? खुल के बताओ न जान"
रानी "नहीं जी मुझे शर्म आती हैं"
रानी ने पहली बार मेरे किसी सवाल का जवाब देने से साफ इनकार किया था। मेरा मन तो कर रहा था कि अभी इसके कपड़े फाड़कर इसे नंगा करूं और पटक के चोद दू। वैसे भी इसे यहां बचाने वाला कोई नहीं था। मगर मुझे सिर्फ एक दिन की खुशी नहीं चाहिए थी बल्कि अपने आने वाली पूरी जिंदगी मै इससे अपनी ख्वाहिशों को पूरा करवाना चाहता था। मैने अपने गुस्से को शांत करते हुए खुद से ही कहा "कोई बात नहीं हर बात का हिसाब होगा"
मैने रानी की पीठ जो साड़ी से ढकी थी को सहलाते हुए अपना आखिरी दाव खेला "तुम्हे मेरी कसम बताओ ना"
रानी अभी भी मेरे सीने में सिर छुपाए थी। कुछ देर शांत रही फिर बोली "सोनी ने बस इतना ही बताया कि जब आदमी का पेशाब करने वाला हम औरतों के पेशाब करने वाले में घुसता है तो मजा आता है"
अब तक मेरा लन्ड खड़ा ही था। करीब पिछले आधे घंटे से रानी मेरी गोद में ही थी और मेरा लन्ड उसकी गान्ड पे रगड़ खा रहा था। मुझे थोड़ा बहुत दर्द या कहे दबाव भी महसूस होने लगा था। साथ ही साथ मेरे लिए सब्र करना भी मुश्किल होता जा रहा था। सो मैने रानी से बातों को पूर्णविराम लगाकर असली खेल खेलने का निश्चय करते हुए रानी से पूछा "तुम्हे वो मजा चाहिए?"
रानी कोई प्रतिक्रिया देती उससे पहले ही मैने अपने होंठ रानी के होंठ पे रख दिए और चूसने लगा। मेरी आंखे बंद थी इसलिए मैं रानी का रिएक्शन नहीं देख पाया मगर वो चौंकी तो जरूर होगी। एक हाथ से रानी के सिर को सहला रहा था या यू कहे थम रखा था तो वही दूसरी हाथ को मैने काम पे लगते हुए रानी के साड़ी के पल्लू को उसके कंधे से अलग कर दिया। रानी के होंठ चूसते चूसते मै पूरी तरह आश्वासत हो गया था कि ये उसका पहला चुम्बन हैं। था तो मेरा भी ये पहले चुंबन ही मगर उसके चुम्बन का तरीका ही बता रही थी मेरे होंठ ही पहले होंठ है जिसने रानी के होंठो को छुआ था। चुम्बन टूटने के बाद जब मैने रानी की तरफ देखा तो पाया कि रानी की आंखे बंद है और वह जोड़ जोड़ से सांस ले रही। जिससे उसकी छाती ऊपर नीचे हो रही थी। पल्लू तो मैं पहले ही हटा चुका था अब बारी ब्लाउज की थी। मैने जैसे ही ब्लाउज के हुक पे हाथ रखा दो हाथ मुझे ब्लाउज खोलने से रोकने लगे। मगर अब मैं कहा रुकने वाला था। मैने उन दोनों हाथों को झटका और दुबारा से हुक खोलने की कोशिश करने लगा। एक हुक खुला ही था कि फिर से वो दोनों हाथ मुझे रोकने पहुंच चुके थे। अब तक मेरे सब्र का बंद टूट चुका था। अब किसी भी तरह की देरी मुझे नागवारा थी। सो पहले मैने उन दोनों हाथों को फिर से हटाया और इस बार ब्लाउज का हुक खोलने की बजाय मैने दोनों हाथों से ब्लाउज को पकड़ के फाड़ दिया। ब्लाउज फटते ही रानी ने आंख खोला मगर कुछ बोली नहीं। अगर वो कुछ बोलती या मुझे रोकती भी तो मैं उस समय उस मूड में था कि उसके गोरे गालों को लाल करने से पहले सोचता भी नहीं। ब्लाउज के अंदर उसने सफेद कलर की सिंपल सी ब्रा पहनी थी। जिसका हुक पीछे पीठ की तरफ था। मैने दोनों हाथों से पकड़ ब्रा को भी फाड़ने ही वाला था कि रानी ने अपने हाथ पीछे ले जाक खुद से ही ब्रा खोल दी। मैने जल्दी से रानी के फटे ब्लाउज और ब्रा को उसके शरीर से अगल किया। अब रानी मेरे गोद में कमर के ऊपर पूरी तरह से नंगी थी। रानी की चूचियां ज्यादा बड़ी नहीं था। मगर मैं इतना उत्तेजित हो चुका था कि मुझे उसके छोटे चूचियों से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। मैं तो बस उसके दोनों संतरों पे टूट पड़ा। पहले दोनों हाथों से जमके उसकी चूचियों को दबाया। दबाया क्या मसला। वो दर्द से कराहती रही मगर मुझे क्या फर्क पड़ने वाला था। उसकी नन्ही नन्ही चूचियों से खेलने के बाद मैं उसके दोनों निप्पलों को बेरहमो की तरह मसलने लगा। अब तक उसके गोरे गोरे संतरे टमाटर की तरह लाल हो चुके था। मुझे तो ये भी होश नहीं था कि जिसकी चूचियां मैं बेरहमो की तरह दावा रहा हूं उसपर क्या बीत रही है। खैर, मुझे उससे फर्क भी नहीं पड़ रहा था। फिर मैने निपल्स को मुंह में लिया और चूसने से ज्यादा काटने लगा। रानी से अब दर्द बर्दास्त नहीं हो रहा था। उसने मेरे सिर को अपने निपल्स से हटाने की कोशिश भी की। जिसका परिणाम उसके दोनों गोरे गोरे गालों को चुकाना पड़ा। अब मैने रानी को अपनी गोद में उठाया और बेड पे लाके लिटा दिया। अभी भी साड़ी रानी के कमर पे बांधी हुई थी। पहले मैने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद किया। फिर जल्दी से रानी की साड़ी को खोला। साड़ी के अंदर उसने लाल रंग का ही साया/पेटीकोट पहना हुआ था। जो उसके कमर पे बांधी हुआ था। मैने पेटीकोट की गांठ को खोलने की कोशिश की मगर जब वो मुझसे नहीं खुला तो मैने उसकी पेटीकोट को भी फाड़ दिया। रानी बस आंखे फाड़े मेरी हरकतें देख रही थी। और वो कर भी क्या सकती थी। अगर कुछ बोलती या मुझे रोकने की कोशिश करती तो थप्पड़ ही खाती। पेटीकोट फाड़ने के बाद, रानी के शरीर पर केवल एक भूरे रंग की कच्छी ही बचीं रह गई थी। कच्छी ही क्योंकि की फुल साइज में सस्ते में जो बच्चों को पहनाया जाने वाली कच्छी होती है वहीं रानी ने पहन रखा था। रानी की कच्छी उसके चूतरस से पूरी भींग चुकी थी। ऐसा लग रहा था। जैसे उसने अपनी कच्छी में ही मूत दिया हो। उसकी कच्छी देखके मुझे समझ आया कि क्यों रानी के व्यवहार में एकाएक बदलाव आया था। उसकी कच्छी को भी मैने फाड़कर उसके जिस्म से अलग कर दिया। अब रानी मेरे बिस्तर पे जन्मजात नंगी पड़ी थी। मैने भी जल्दी से अपने सारे कपड़े खोले। मेरे लन्ड का तनाव अपने चरम पर था। लन्ड की नसे साफ दिख रही थी। जल्दी से जल्दी इसका लावा उगलवाना जरूरी था। नहीं तो मैं उत्तेजना के कारण पागल हो जाता। मैं जल्दी से अपने बिस्तर पर चढ़ा जहां रानी आंख मूंदे नंगी पड़ी थी। रानी के मुंह के ऊपर लगभग बैठने जैसे पोजीशन में आने के बाद मैने अपने दाएं पैर को उसके बाएं तरफ और बाय पैर को उसके दाएं तरफ किया। और अपने लन्ड को उसके मुंह ठीक सामने कर दिया। रानी सब कुछ अपनी आंखों से देख रही थी मगर उसमें मेरी हरकतों का विरोध करना का साहस नहीं बचा था।
मैने रानी को ऑर्डर देते हुए "मुंह खोलो अपना"
रानी बेचारी भी क्या करी। उसके तो ये भी नहीं पता था कि जो मैं अभी करने वाला हु उससे मुखचोदन कहते है। जैसे ही उसने अपना मुंह खोला मैने अपना 6 इंच का लन्ड पूरा एक बार में ही उसके गले तक उतर दिया। रानी को प्रतिक्रिया बता रही थी कि उसे कितना बुरा लग रहा और घिन आ रही है। उससे तो खासी भी होने लगी। मगर मुझमें तो जैसे कोई जानवर आ गया था। रानी की चिंता किए बगैर मैं उसके मुंह को जितना तेज हो सके उतनी तेजी से चोदने लगा। करीब पिछले 1 घंटे से मेरा लन्ड खड़ा था। जिसका असर ये हुआ कि मेरे लन्ड ने एक मिनिट के भीतर ही अपना जहर रानी के मुंह में उगल दिया। लन्ड के लावा निकलते ही मुझपर से वासना का असर कम होने लगा। अपनी और रानी की स्थिति को देखकर एक बार को तो मन किया ये सब यही छोड़ दूं और रानी से माफी मांग लूं। आखिर मैंने रानी के साथ किया तो जबरदस्ती ही था। मगर मेरे अंदर के शैतान ने मुझे आवाज लगते हुए सलाह दी कि अब तो जो होना था हो गया। अब पीछे हटने से क्या फायदा। जैसा चल रहा है चलने दो। अब तक मेरा लन्ड रानी के मुंह से बाहर आ चुका था मगर एक बार फिर से अपना सिर उठाने लगा था। बढ़ती उत्तेजना में मैने अपने अंदर के शैतान की बात मानते हुए इस जबरदस्ती के खेल को चालू रखने का फैसला लिया। वैसे तो मैने अपने सुहागरात के लिए काफी प्लानिंग कर रखी थी कि मैं अपनी पत्नी की चूत चाटूंगा, उसके कांख को चाटूंगा और भी शरीर के कई अंग चूमूंगा और चाटूंगा। मगर फिलहाल मैने अपनी सारी ख्वाहिशों तो ताक पे रख। रानी को डायरेक्ट चोदने का निश्चय किया। अब तक मैने गौर से रानी की चूत को नहीं देखा था। जब मैने गौर किया तो पाया कि उसकी चूत को तो उसकी झांटों ने धक रखा हैं। अगर कोई नॉर्मल कंडीशन होता तो पहले मैं उसकी झांटों को साफ करता और फिर इससे चोदता। मगर आज मुझपे उत्तेजना का भूत सवार था। जिससे बस चूत चोदना था। चाहे चूत झांटों से ढकी हो या चिकनी हो। मैने रानी की चूत में अपनी एक उंगली डालने की कोशिश मगर ये क्या मेरी उंगली तो उसकी चूत में घुस ही नहीं रही। इस असफलता ने मेरे अंदर खुशी और उमंग की लहर का दी थी। खुश होता भी क्यों नहीं आखिर 26 साल वर्जिन रहने के बाद एक कुंवारी कच्ची कली अभी मेरे बिस्तर पे नंगी लेटी थी। और मजे की बात ये थी कि जिस चूत में मेरी उंगली नहीं घुस रही उसमें मै अपना लन्ड डालकर आज पूरे 26 साल की वर्जिनिटी का बदला लेने वाला था। फिर, मैने अपना लन्ड रानी की चूत पे सेट किया और जोड़ से धक्का मारा। रानी की चूत इतनी टाइट थी कि मेरा लन्ड उसकी चूत के अंदर तो नहीं गया मगर उसकी आंखों से आंसू और मुंह से चीख जरूर बाहर निकल आई। रानी की आंसू से तो मुझे वैसे भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। मगर उसकी चीखें मेरे लिए मुश्किल पैदा कर सकती थी। अगर नीचे मेरी मां उसकी चीखें सुन लेती तो शायद सुहागरात के रात भी मैं वर्जिन ही सोता। सो सबसे ज्यादा जरूरी था रानी की चीखों को बंद करना। मैने अपने दाएं हाथ को उसके मुंह पे और लन्ड को उसकी चूत पे रख रख एक बार फिर से धक्का लगाया। मगर मेरे हाथ के ऊपर उसके मुंह पर होने के कारण इस बार भी मेरे लन्ड को असफलता ही मिली। मैने इधर उधर नजर दौड़ाया तो मुझे रानी की चूतरस से भीगी फटी कच्छी बेड के नीचे नजर आईं। मैने उसकी कच्छी को नीचे से उठाया और मोर मार के उसके मुंह में घुसा दिया। हालांकि इस बार उसने विरोध किया मगर दो झापड़ में ही उसका विरोध ठंडा पड़ गए। इस बार मैने अच्छे से अपने लन्ड को उसकी चूत पे रखा और दे मर धक्का। रानी की चूत इतनी टाइट थी कि केवल मेरे लन्ड का टोपा ही उसकी चूत में घुस पाया था। रानी के मुंह में कच्छी होने बाबजूद उसकी चीख पूरे कमरे में गूंज उठी। मैने जल्दी से अपनी हाथों से उसका मुंह दावा और 4–5 धक्के में पूरा लन्ड उसकी कोरी चूत में उतार दिया। करीब 10 मिनिट तक तबियत से रानी को चोदने के बाद एक बार फिर से छोटे आर्यन ने अपनी मणि उगल दी। मगर इस बार मणि रानी की मुंह के जगह उसकी मुनिया में थी। इस दमदार चुदाई के बाद जैसे ही मेरी नजर रानी पे पड़ी। तो मैं हैरान परेशान हो गया क्योंकि रानी की चुदाई करने के चक्कर में मुझे पता ही नहीं चला कि रानी कब बेहोश हो गई। ऊपर से रानी के चूत से खून और मेरी मणि का संगम धीरे धीरे बाहर निकल रहा था। मैने रानी को दो तीन बार हिलाकर होश में लाने की कोशिश भी की मगर उससे होश नहीं आया। अब तक मेरा लन्ड उसके चूत में ही था और एक बार फिर से खड़ा हो चुका था। वासना में मै इस प्रकार अंधा हो चुका था कि मुझे ये तक नहीं सूझ रहा था कि थोड़ा सा पानी लेक मै रानी के चेहरे पे मारु जिससे वो होश में आ सके। उल्टा मेरा मन एक बार फिर से रानी को चोदने का करने लगा। मैने मेरे मन की सुनी। पहले अपने लन्ड को रानी की चूत से बाहर खींचा। लन्ड बाहर खींचते ही रानी की चूत से निकले वाले खून और मेरे मणि का मिश्रण तेजी से बाहर निकलने लगा। पता क्यों मगर उस लाल तरल को रानी की झांटों से भरी चूत से बाहर निकलता देख मुझे बहुत खुशी मिल रही थी। मैं तब तक इंतजार करता रहा जब तक उसके चूत ने सारा तरल बाहर नहीं कर दिया। मैने एक बात और गौर किया कि अब रानी की चूत पहले के मुकाबले थोड़ी फैली हुई लग रही थीं। मगर ज्यादा ध्यान न देते हुए एक बार फिर मैने अपने लन्ड को रानी की चूत पे रखा और धक्का मारा। इस बार लन्ड एक बार में ही रानी की चूत में घुस गया। भले ही आधा ही घुसा था मगर एक बार में ही घुस गया। चूत में लैंड घुसते ही रानी के मुंह से एक दबी से चीख निकली। शायद दर्द के कारण उसे होश आया होगा और दर्द के कारण ही वो तुरंत फिर से बेहोश भी हो गई। दूसरा धक्का मार पहले मैने अपने पूरे लैंड को रानी की चूत में उतरा फिर उससे बेरहमों की तरह चोदने लगा। मैने रानी के मुंह से अब उसकी फटी कच्छी भी निकाल दी थी। और अपने होंठों से उसके होंठो पे अपने सुहागरात की निशान छोड़ने लगा। मेरे दोनों हाथ भी खुद ब खुद रानी की चूचियों को अपने गिरफ्त में ले चुके थे। और उसकी चूचियों को मसलते जा रहे थे। यह बेरहम चुदाई लगभग 15 मिनिट चला। जिसके बीच दो तीन बार रानी होश में आती और तुरंत बेहोश हो जाती। मगर उसके आंखों से आंसू लगातार निकल रहे थे। एक बार फिर मैने अपने अंदर का लावा रानी की मुनिया में ही निकाल दिया। रात के कितना बज रहे थे मुझे नहीं पता मगर मुझे बहुत जोड़ों की नींद आने लगी। वैसे भी दमदार चुदाई करने के बाद नींद बढ़िया ही आती है। मैने रानी के चूत से बिना अपना लन्ड बाहर निकले ही उसके ऊपर निढाल हो गया और नींद की आगोश में कब चला गया पता ही नहीं चला।
सुबह मेरी नींद मेरे मोबाइल की आवाज से खुली। शायद किसी का कॉल था। मगर मोबाइल मेरी पहुंच से दूर फर्स पे पड़े मेरे पैंट में था। सो मुझे उतना पड़ा। अभी मैं और रानी दोनों बिस्तर पे नंगे थे। मैं रानी के नंगे शरार पर ही लेटा हुआ था। और मेरा लन्ड अभी भी रानी के चूत में ही था। अब तक मेरे और रानी के मिलन से निकला अमृत हमारे गुप्तांगों के पास जम चुका था। खास करके रानी की झांटों पे। एक बार फिर से मोबाइल बजा। मगर रानी की नींद अब तक नहीं खुली थीं। शायद वो अभी तक बेहोश ही थी। मैने जल्दी से अपना लन्ड रानि की चूत के बाहर खींचा और नीचे फर्स पे पड़े अपने पेंट से मोबाइल निकले लगा। इस बार फिर से कॉल कट चुका था। मोबाइल निकला तो पता चला ऑफिस(बैंक) से कॉल था। मैने पहले अपनी हालत देखी फिर बिस्तर पे नंगी लेटी रबी की हालत देखी और फिर अपने कमरे ही हालत देखी। मैने मोबाइल सोफे पे रखा और बाथरूम में घुसके पहले फ्रेश हुआ फिर खुद को साफ किया। और नंगा ही बाथरूम से बाहर कमरे में दाखिल हुआ और गोदरेज से धूले कपड़े निकाल कर पहन लिए। अब बारी थीं। रानी को उठने की। मैने बाथरूम से एक जग पानी लाया और सारा का सारा पानी रानी के चेहरे पे उझल दिया। रानी ने एक चीख के साथ अपनी आंखे खोली। खुद को नंगी हालत में बिस्तर पे लेटा देख जल्दी से वो नंगी ही बाथरूम की तरफ भागी। मगर रास्ते में ही रात की चुदाई के दर्द के कारण वो फर्श पे गिर गई। मुझपर नजर पड़ते ही वो ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। मैं उसके पास गया और बैठकर उससे गले लगते हुए उससे चुप कराने लगा। मगर मेरे सारे प्रयास विफल हो रहे थे। आखिर में मैने झूठ का सहारा लेते हुए कहा "मुझे पता है जान कल रात जो हुआ उससे तुम्हे बहुत दर्द हुआ और वो तुम्हे अच्छे भी नहीं लगा। मगर जान पति पत्नी ऐसे ही तो प्यार करते है" मेरी बात का असर रानी पे हुआ मगर वो अब भी रो रही थी। मैं मन में "इसे थोड़ा प्यार से हैंडल करना पड़ेगा"
मैने रानी को गोदी में उठाया और बाथरूम में ले गया। जहां मैने रानी के सारे अंगों को रगड़ रगड़ के साफ किया। मैने गौर किया कि रानी का गुस्सा अब चूमंतर हो चुका है और वो मुझे बारे प्यार से देख रही है। हा कभी कभी उसकी चीखें निकल जाती थी जब मैं उसकी चूत की सफाई कर रहा था। रानी को अच्छे से नहलाने के बाद मैने उससे अपनी गोद में उठा कमरे मे लाके बेड पे बिठाया। और उसके बैग को खोल उसके कपड़े ढूंढने लगा। उसके बैग में बस एक जोड़ी वही सिंपल वाली ब्रा कच्छी थी और एक जोड़ी पीले रंग की साड़ी,ब्लाउज और पेटीकोट थी।
मैने उससे साड़ी,ब्लाउज और पेटीकोट देते हुए कहा कि "आज से तुम ये पुरानी अंगिया(ब्रा) और कच्छी नहीं पहनोगी। मैं आज बाजार से तुम्हारे लिए नई अंगिया, कच्छी और कुछ कपड़े ले आऊंगा" उसने बस सहमति में सिर हिलाया। और जल्दी से पहले पेटीकोट फिर ब्लाउज पहना और फिर साड़ी पहन वो तैयार हो गई। मगर कमरे की हालत अब भी ठीक नहीं थी। कमरे के फर्श पे हम दोनों के कपड़े बिखरे हुए थे। बिस्तर तो रानी की चूत के खून और मेरे स्पर्म से लालम लाल हो गया था। मैने उसे फर्स पे बिखरे से कपड़े और बेडशीट को बाथरूम में रखने को कहा। उसने भी बिना किसी शिकायत के जैसा मैने कहा वैसा कर दिया। मेरी बात माने के ईनाम के तौर पे मैने उसके माथे(forehead) को चूमा। रानी को भी ईनाम पसंद आया और मंद मंद मुस्कुरा रही थी।


शेष अगले भाग में, आपको ये update कैसा लगा हमें बताए? और भाई लोग और उनकी दीदियों update अच्छा लगे तो Like कर देना।


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Aryan Arya

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Update 6


मैं और रानी एक साथ ही नीचे आए। हालांकि रानी को चलने में तकलीफ हो रही थी। मगर मेरे झूठ और झूठे प्यार का ही असर था कि दर्द में भी रानी के चेहरे पे शिकन की जगह एक प्यारी सी मुस्कान ने ले रखी थीं। वैसे रानी मुझे कोई खास सुंदर नहीं लगती थीं। मगर रानी की
वो मुस्कान जैसे मुझे गलत साबित करने के लिए ही आई थीं। मैं कोई मनोवैज्ञानिक या अंतर्यामी तो नहीं हूं। मगर इतना दावे के साथ का सकता हूं कि रानी की मुस्कान चीख चीख के बताना चाह रही थी कि उसके मन में मेरे लिए प्यार के अंकुर फूट चुके थे।


हॉल में पहुंचा तो पाया कि वहां कोई नहीं हैं। खैर मुझे ताजुभ भी नहीं हुआ। अक्सर मां इस समय पूजा घर में ध्यान करती रहती है। मैंने रानी से चाय बनाने को कहा और खुद मां का आशीर्वाद लेने चल पड़ा। पूजा घर के बाहर पहुंचा तो देखा कि दरवाजा आज बंद है। एक अजीब-सा ख्याल मन में आया—क्या मां अभी तक जागी भी नहीं? दीवार पर लगी घड़ी की ओर देखा, दोपहर होने में अभी वक्त था। मन में बेचैनी बढ़ने लगी—“मां तो इस समय यहीं होती हैं, आज क्या हुआ?”


अब चिंता साफ-साफ डर में बदल रही थी—“कहीं मां की तबीयत तो खराब नहीं?”


इन्हीं ख्यालों के साथ मैं उनके कमरे की ओर बढ़ा। मां अक्सर दरवाजा भिड़का के ही रखती थी। जैसे ही मैंने दरवाज़े को धक्का दिया… मेरी साँसें जैसे थम गईं।


जो सामने था, उस पर विश्वास करना असंभव-सा लग रहा था। ऐसा लग रहा था मानो मैं कोई भयानक सपना देख रहा हूँ, जो अभी टूट जाएगा। मैं कुछ क्षण वहीं जड़ हो गया—बस उस दृश्य के बदल जाने का इंतज़ार करता रहा। लेकिन हकीकत इतनी आसान नहीं थी। मेरी इस टूटती उम्मीद को रानी की अचानक गूँजी चीख ने चूर कर दिया।


माँ फर्श पर बेसुध पड़ी थीं। पास ही उनकी दवाई की शीशी और बिखरी हुई गोलियाँ इस सच्चाई की गवाही दे रही थीं—माँ अब हमारे बीच नहीं रहीं।


एक बेटा इस सच को कैसे मान ले?


मैं भागकर उनके पास गया, उन हाथों को थामा जिन्होंने मुझे चलना सिखाया था… जिनसे मैंने डाँट भी खाई थी और स्नेह भी पाया था। लेकिन अब उन हाथों में कोई हरकत नहीं थी। उनकी नब्ज—मेरी दुनिया की तरह—थम चुकी थी।


रानी का विलाप कमरे में गूंज रहा था, और हर आवाज़ मेरे दर्द को और गहरा कर रही थी। फिर भी, मैंने हकीकत को झुठलाने की आख़िरी कोशिश की—माँ को उठाया, उन्हें सहारा देकर बैठाया, और घबराहट में गाड़ी लेकर अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा।


लेकिन डॉक्टरों ने वही कहा, जिसे सुनने की हिम्मत मुझमें नहीं थी।


मैं टूट गया।


वहीं अस्पताल के फर्श पर बैठकर फूट-फूटकर रो पड़ा। शायद सच ही है—किसी की अहमियत हमें तब समझ आती है, जब वह हमें हमेशा के लिए छोड़कर चला जाता है।


होश तब आया जब एक नर्स ने आकर कहा—“पैसे जमा कर दीजिए और बॉडी ले जाईए...”
उस पल मुझे गुस्सा भी आया—दर्द के बीच यह शब्द कितना कठोर लगा। एक बेटे के लिए उसकी माँ ‘बॉडी’ कैसे हो सकती है? लेकिन सच से भागना अब मुमकिन नहीं था।


कल तक इस दुनिया में मेरा अपना कहने वाला सिर्फ माँ थीं… और आज वो भी मुझे अकेला छोड़कर चली गईं। उनके अंतिम संस्कार की सारी ज़िम्मेदारी अब मेरे ही कंधों पर थी। इस कठिन समय में रानी ने एक सच्ची अर्धांगिनी की तरह मेरा हर कदम पर साथ दिया।


माँ की यादों में खोए-खोए कब दो हफ्ते बीत गए, पता ही नहीं चला। इस बीच बैंक से लगातार कॉल आ रहे थे। वैसे भी वह नौकरी मुझे कभी पसंद नहीं थी—मैं तो सिर्फ माँ के कहने पर कर रहा था।


अब जब माँ ही नहीं रहीं, तो उस नौकरी का कोई अर्थ भी नहीं बचा था।


आख़िर अब मेरा अपना कौन था, रानी के अलावा? और हम दो लोग मिलकर कितना ही खर्च कर लेते? ऊपर से मेरे पास आम के बगीचे तो थे ही। सो पैसों की कोई खास कमी भी नहीं थी।


आख़िरकार, मैंने नौकरी छोड़ दी।


शेष अगले भाग में, आपको ये update कैसा लगा हमें बताए? और भाई लोग और उनकी दीदियों update अच्छा लगे तो Like कर देना।



दोस्तो मुझे पता है ये अपडेट आपकी आकांक्षाओं के विपरीत था। मगर आप मेरा विश्वास करे इस अपडेट को देना कहानी को और ज्यादा मजेदार बनाने के लिए जरूरी था...।
 
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malikarman

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Update 6


मैं और रानी एक साथ ही नीचे आए। हालांकि रानी को चलने में तकलीफ हो रही थी। मगर मेरे झूठ और झूठे प्यार का ही असर था कि दर्द में भी रानी के चेहरे पे शिकन की जगह एक प्यारी सी मुस्कान ने ले रखी थीं। वैसे रानी मुझे कोई खास सुंदर नहीं लगती थीं। मगर रानी की
वो मुस्कान जैसे मुझे गलत साबित करने के लिए ही आई थीं। मैं कोई मनोवैज्ञानिक या अंतर्यामी तो नहीं हूं। मगर इतना दावे के साथ का सकता हूं कि रानी की मुस्कान चीख चीख के बताना चाह रही थी कि उसके मन में मेरे लिए प्यार के अंकुर फूट चुके थे।


हॉल में पहुंचा तो पाया कि वहां कोई नहीं हैं। खैर मुझे ताजुभ भी नहीं हुआ। अक्सर मां इस समय पूजा घर में ध्यान करती रहती है। मैंने रानी से चाय बनाने को कहा और खुद मां का आशीर्वाद लेने चल पड़ा। पूजा घर के बाहर पहुंचा तो देखा कि दरवाजा आज बंद है। एक अजीब-सा ख्याल मन में आया—क्या मां अभी तक जागी भी नहीं? दीवार पर लगी घड़ी की ओर देखा, दोपहर होने में अभी वक्त था। मन में बेचैनी बढ़ने लगी—“मां तो इस समय यहीं होती हैं, आज क्या हुआ?”


अब चिंता साफ-साफ डर में बदल रही थी—“कहीं मां की तबीयत तो खराब नहीं?”


इन्हीं ख्यालों के साथ मैं उनके कमरे की ओर बढ़ा। मां अक्सर दरवाजा भिड़का के ही रखती थी। जैसे ही मैंने दरवाज़े को धक्का दिया… मेरी साँसें जैसे थम गईं।


जो सामने था, उस पर विश्वास करना असंभव-सा लग रहा था। ऐसा लग रहा था मानो मैं कोई भयानक सपना देख रहा हूँ, जो अभी टूट जाएगा। मैं कुछ क्षण वहीं जड़ हो गया—बस उस दृश्य के बदल जाने का इंतज़ार करता रहा। लेकिन हकीकत इतनी आसान नहीं थी। मेरी इस टूटती उम्मीद को रानी की अचानक गूँजी चीख ने चूर कर दिया।


माँ फर्श पर बेसुध पड़ी थीं। पास ही उनकी दवाई की शीशी और बिखरी हुई गोलियाँ इस सच्चाई की गवाही दे रही थीं—माँ अब हमारे बीच नहीं रहीं।


एक बेटा इस सच को कैसे मान ले?


मैं भागकर उनके पास गया, उन हाथों को थामा जिन्होंने मुझे चलना सिखाया था… जिनसे मैंने डाँट भी खाई थी और स्नेह भी पाया था। लेकिन अब उन हाथों में कोई हरकत नहीं थी। उनकी नब्ज—मेरी दुनिया की तरह—थम चुकी थी।


रानी का विलाप कमरे में गूंज रहा था, और हर आवाज़ मेरे दर्द को और गहरा कर रही थी। फिर भी, मैंने हकीकत को झुठलाने की आख़िरी कोशिश की—माँ को उठाया, उन्हें सहारा देकर बैठाया, और घबराहट में गाड़ी लेकर अस्पताल की ओर दौड़ पड़ा।


लेकिन डॉक्टरों ने वही कहा, जिसे सुनने की हिम्मत मुझमें नहीं थी।


मैं टूट गया।


वहीं अस्पताल के फर्श पर बैठकर फूट-फूटकर रो पड़ा। शायद सच ही है—किसी की अहमियत हमें तब समझ आती है, जब वह हमें हमेशा के लिए छोड़कर चला जाता है।


होश तब आया जब एक नर्स ने आकर कहा—“पैसे जमा कर दीजिए और बॉडी ले जाईए...”
उस पल मुझे गुस्सा भी आया—दर्द के बीच यह शब्द कितना कठोर लगा। एक बेटे के लिए उसकी माँ ‘बॉडी’ कैसे हो सकती है? लेकिन सच से भागना अब मुमकिन नहीं था।


कल तक इस दुनिया में मेरा अपना कहने वाला सिर्फ माँ थीं… और आज वो भी मुझे अकेला छोड़कर चली गईं। उनके अंतिम संस्कार की सारी ज़िम्मेदारी अब मेरे ही कंधों पर थी। इस कठिन समय में रानी ने एक सच्ची अर्धांगिनी की तरह मेरा हर कदम पर साथ दिया।


माँ की यादों में खोए-खोए कब दो हफ्ते बीत गए, पता ही नहीं चला। इस बीच बैंक से लगातार कॉल आ रहे थे। वैसे भी वह नौकरी मुझे कभी पसंद नहीं थी—मैं तो सिर्फ माँ के कहने पर कर रहा था।


अब जब माँ ही नहीं रहीं, तो उस नौकरी का कोई अर्थ भी नहीं बचा था।


आख़िर अब मेरा अपना कौन था, रानी के अलावा? और हम दो लोग मिलकर कितना ही खर्च कर लेते? ऊपर से मेरे पास आम के बगीचे तो थे ही। सो पैसों की कोई खास कमी भी नहीं थी।


आख़िरकार, मैंने नौकरी छोड़ दी।


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दोस्तो मुझे पता है ये अपडेट आपकी आकांक्षाओं के विपरीत था। मगर आप मेरा विश्वास करे इस अपडेट को देना कहानी को और ज्यादा मजेदार बनाने के लिए जरूरी था...।
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