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Incest Sagar (Completed)

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Update 12.



बादलों की गड़गड़ाहट की आवाज से अचानक मेरी नींद खुल गई । मैंने घड़ी में टाईम देखा सुबह के साढ़े पांच बज रहे थे । मैं बिस्तर से उठ कर खिड़की से बाहर की तरफ आसमान की ओर देखा । मेघों ने भास्कर की उदय होती लालिमा को अपने गोद में छुपा लिया था । मेघ रौद्र रूप में कहर बरपाने के लिए तैयार थे। आंधियों ने उनके लय में लय मिलाया और धरती पर तेज आक्रमण कर दिया ।

बादलों ने तीव्र गति से हमला कर दिया था । शोर के साथ साथ बरसात भी तीव्र गति से होने लगी । मैंने छत पर देखा वहां रस्सियों पर कपड़े सुखाने के लिए पड़े हुए थे । मैं जल्दी से दरवाजा खोला और कपड़ों को समेटने लगा । डैड के , मेरे , रीतु के , माॅम के सभी के कपड़े आनन फानन में उतारा और तभी माॅम के साड़ियों में छुपा उनकी पैंटी जमीन पर गिर पड़ी । बारिश तेज हो गई थी । मैंने पैंटी को उठाया और भागते हुए अपने कमरे में प्रवेश किया । सारे कपड़े वहीं बगल में पड़े कुर्सी पर रखा । खिड़की बंद की और बिस्तर पर लेट गया ।

घनघोर बारिश हो रही थी । बादल भी तेजी से गरज रहे थे । मौसम काफी ठंडा हो गया था । मेरी नींद भी उचट गई थी । अचानक से मुझे कुछ याद आया और मैंने माॅम की पैन्टी कपड़ों के अन्दर से बाहर निकला । मैं उसे देख कर उत्तेजित हो गया । पैंटी को उपर से भीतर से सब तरफ से देखा । उसे हाथ से सहलाया । नाक से सूंघा । और अंत में उसे अपने पैजामा के अन्दर अपने जांघिया के अन्दर अपने लिंग से लपेट कर सो गया ।

माॅम की आवाज से मेरी नींद खुली । माॅम मेरे उपर झुक कर मुझे उठाने की कोशिश कर रही है । माॅम के यूं झुकने से साड़ी का आंचल उनके सीने से ढलक गया था । मेरी नजर ब्लाउज में कैद उनके बड़े बड़े उरोजो पर गयी । एक तो सुबह का इरेक्शन उपर से ब्लाउज के ऊपर से उनके बड़े बड़े संतरों का दर्शन मेरी अवस्था नाजुक होने लगी ।

" सागर जल्दी से उठो ।"

" क्या हुआ ।" मैं उनके वक्ष देखते हुए बोला ।

" नीचे बाथरूम के पास पानी भर गया है । और अभी तक किसी ने भी बाथरूम यूज़ तक नहीं किया है ।"

" अच्छा देखता हूं । आप चलो मैं आता हूं ‌।"

" नाले का पानी भी जाम हो गया है । पानी निकल नहीं रहा है ।"

मैं उठ कर बैठ गया । तुम यहीं नहाओ फ्रेश हो जाओ । मैं देखता हूं ।"

मैंने चुपके से उनकी पैंटी ‌जो अभी भी मेरे लिंग से लिपटी हुई थी निकाल कर बेड के नीचे रख दिया । फिर नीचे हाल में गया। डैड उठ गये थे और वहीं बैठ थे । उन्होंने भी मुझसे वहीं कहा जो माॅम ने कहा था । मैं हाल से आगे बढ़ा और किचन को पार कर के अन्दर के दरवाजे से बाहर निकल कर देखा ।

किचन के पिछे बाहर का काफी एरिया ओपन था और वो बाउंड्री वॉल से घिरा हुआ था । वहां हमने कुछ आम और अमरुद के पेड़ लगाए थे जो कि पक गए थे । थोड़े बहुत फूल भी लगाए थे । दाहिने तरफ दिवाल से लगकर बाथरूम कम टायलेट बना हुआ था जो ६ बाई ७ का बना हुआ था । पहले बाथरूम था फिर उसी से सटकर टायलेट बना हुआ था जिसका फर्श बाथरूम से एक फीट ऊंचा था ।

सुबह की घनघोर बारिश से बाथरूम के अन्दर तक पानी प्रवेश कर गया था । पानी को बाहर की ओर निकालने के लिए एक नाला बना हुआ था जो मिट्टी और पत्तों से जाम हो गया था ।

मैंने अपनी पैंट उतारी और सिर्फ जाघिये में ही पानी के बीच उतर गया । पौन घंटे की मशक्कत के बाद नाला साफ हुआ । अब जमा पानी बिना रुकावट के बाहर की तरफ निकलने लगा ।

साफ सफाई के बाद मैं वहीं बाथरूम में फ्रेश हुआ और एक तौलिया लपेट कर घर में चला गया । अपने कमरे में प्रवेश कर मैं कपड़े पहन तैयार हुआ तो उसी समय मेरी नजर कुर्सी पर पड़ी । वहां पर जो कपड़े मैंने सुबह बरसात से भींगने से बचने के लिए रखे हुए थे वो नहीं थे । मैं समझ गया माॅम जब मुझे जगाने आई थी उसी समय वो कपड़े लेकर चली गई ।

तभी मुझे ध्यान आया कि मैंने माॅम की पैन्टी को अपने बिस्तर के नीचे दबा कर रखा है । मैं चिन्तित हो गया । कहीं वो अपनी पैंटी न पाकर मुझ पर शक वगैरह ना कर बैठे । मैं जल्दी से उनकी पैंटी को बेड के नीचे से निकाल कर उसे पैंट के अन्दर छुपा कर नीचे हाल में पहुंचा ।

डैड टीबी देख रहे थे । रीतु शायद अपने कमरे में थी और माॅम किचन में नाश्ते की तैयारी कर रही थी । मैं माॅम के कमरे में प्रवेश किया । सारे कपड़े उनके कवर्ड में बिना चपेते हुए रखे हुए थे । मैंने उनकी पैंटी उन कपड़ों के अन्दर ठूंस दिया और कमरे से बाहर निकल आया । अब मैं थोड़ा आश्वस्त हुआ ।

नाश्ता करने के बाद डैड बैंक चले गए और रीतु कालेज । माॅम वापस किचन में चली गई । नाश्ते के दौरान माॅम के हाव भाव से मुझे कुछ समझ नहीं आया ।

मैं फिर अपने रूम में चला गया । सुबह के साढ़े नौ बज गए थे । मैंने श्वेता दी को फोन लगाया ।

" हैलो !" उधर से श्वेता दी की आवाज आई ।

" कैसी हो स्वीट हार्ट ?"

" मस्त । तु अपनी बता ।"

" ठीक ही हूं । जीजू कैसे हैं ?"

" पहले से बेहतर है ।"

" तुम कहां से बात कर रही हो ?"

" किचन से । नाश्ता बना रही हूं ।"

" और जीजू ?"

" रूम में बैठ कर टीवी देख रहे हैं । और हां मैंने उन्हें दिल्ली शिफ्ट होने की तुम्हारे सलाह के बारे में बताया था । वो राजी हैं बल्कि बहुत उत्साहित है ।"

" ठीक है मैं आज आन्टी से बात करता हूं ।"

" तुमने नाश्ता कर लिया ?"

" कर तो लिया लेकिन मजा नहीं आया ।"

" क्यों ?"

" तुम्हारा ‌ नाश्ते से कहां घर का नाश्ता अच्छा लगेगा ।"

" तो आ जाते । "

" नाश्ता करा देती ? जीजू के रहते ?"

" हां करा देती और उन्हें क्या फर्क पड़ता ?"

" उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि मैं साया साड़ी उठा कर अपनी मुंह तुम्हारे जांघों के बीच ढुका कर अपना नाश्ता कर लेता ।"

" कुत्ता कहीं का । सुबह सुबह ही शुरू हो गया । और मैं उसकी बात नहीं कर रही थी ।"

" क्या उसका भी कोई टाइम होता है ।"

" होता है ।"

" कब ?"

" रात को । और बकवास बंद करो मुझे नाश्ता बनाना है ।"

" एक बात तो बताती जाओ उर्वशी और तुम्हारे बीच में क्या क्या बातें हुई थी ?"

" बहुत सारी बातें हुई थी तुम क्या सुनना चाहते हो ?"

" होटल वाली । मेरे और तुम्हारे बारे में । हमारे रिश्तों के बारे में ।"

" कमीने ! खुद ही सारी राम कहानी उसे सुना कर मुझसे पुछता है कि क्या बातें हुई ।"

" मैंने कुछ न थोड़ी बताया । फर्श पर गिरे हुए हमारे कछी को देख कर उसने खुद ही अंदाजा लगा लिया । और उपर से ताश के पत्तों पर हमने चित्र कारी भी तो कर दी थी ।"

" उसी के बारे में पुछ रही थी । पहले तो मै ना नुकुर की लेकिन बाद में मानना पड़ा ।"

" फिर ?"

" फिर क्या । फिर सारे राज खुल गये । मैंने अपना बताया तो उसने भी अपना बताया ।"

" उसने क्या बताया ?"

" यही कि तुम दोनों की स्टोरी कैसे चालु हुईं । अच्छा सुनो फोन रखती हूं नाश्ते के लिए देरी हो रही है ।"

" ओके । बाय ।" और मैंने फोन पर उसे कीस किया ।

" बाय ।" उसने भी कीस किया फिर फोन काट दी ।
 
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Incestlala

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बादलों की गड़गड़ाहट की आवाज से अचानक मेरी नींद खुल गई । मैंने घड़ी में टाईम देखा सुबह के साढ़े पांच बज रहे थे । मैं बिस्तर से उठ कर खिड़की से बाहर की तरफ आसमान की ओर देखा । मेघों ने भास्कर की उदय होती लालिमा को अपने गोद में छुपा लिया था । मेघ रौद्र रूप में कहर बरपाने के लिए तैयार थे। आंधियों ने उनके लय में लय मिलाया और धरती पर तेज आक्रमण कर दिया ।

बादलों ने तीव्र गति से हमला कर दिया था । शोर के साथ साथ बरसात भी तीव्र गति से होने लगी । मैंने छत पर देखा वहां रस्सियों पर कपड़े सुखाने के लिए पड़े हुए थे । मैं जल्दी से दरवाजा खोला और कपड़ों को समेटने लगा । डैड के , मेरे , रीतु के , माॅम के सभी के कपड़े आनन फानन में उतारा और तभी माॅम के साड़ियों में छुपा उनकी पैंटी जमीन पर गिर पड़ी । बारिश तेज हो गई थी । मैंने पैंटी को उठाया और भागते हुए अपने कमरे में प्रवेश किया । सारे कपड़े वहीं बगल में पड़े कुर्सी पर रखा । खिड़की बंद की और बिस्तर पर लेट गया ।

घनघोर बारिश हो रही थी । बादल भी तेजी से गरज रहे थे । मौसम काफी ठंडा हो गया था । मेरी नींद भी उचट गई थी । अचानक से मुझे कुछ याद आया और मैंने माॅम की पैन्टी कपड़ों के अन्दर से बाहर निकला । मैं उसे देख कर उत्तेजित हो गया । पैंटी को उपर से भीतर से सब तरफ से देखा । उसे हाथ से सहलाया । नाक से सूंघा । और अंत में उसे अपने पैजामा के अन्दर अपने जांघिया के अन्दर अपने लिंग से लपेट कर सो गया ।

माॅम की आवाज से मेरी नींद खुली । माॅम मेरे उपर झुक कर मुझे उठाने की कोशिश कर रही है । माॅम के यूं झुकने से साड़ी का आंचल उनके सीने से ढलक गया था । मेरी नजर ब्लाउज में कैद उनके बड़े बड़े उरोजो पर गयी । एक तो सुबह का इरेक्शन उपर से ब्लाउज के ऊपर से उनके बड़े बड़े संतरों का दर्शन मेरी अवस्था नाजुक होने लगी ।

" सागर जल्दी से उठो ।"

" क्या हुआ ।" मैं उनके वक्ष देखते हुए बोला ।

" नीचे बाथरूम के पास पानी भर गया है । और अभी तक किसी ने भी बाथरूम यूज़ तक नहीं किया है ।"

" अच्छा देखता हूं । आप चलो मैं आता हूं ‌।"

" नाले का पानी भी जाम हो गया है । पानी निकल नहीं रहा है ।"

मैं उठ कर बैठ गया । तुम यहीं नहाओ फ्रेश हो जाओ । मैं देखता हूं ।"

मैंने चुपके से उनकी पैंटी ‌जो अभी भी मेरे लिंग से लिपटी हुई थी निकाल कर बेड के नीचे रख दिया । फिर नीचे हाल में गया। डैड उठ गये थे और वहीं बैठ थे । उन्होंने भी मुझसे वहीं कहा जो माॅम ने कहा था । मैं हाल से आगे बढ़ा और किचन को पार कर के अन्दर के दरवाजे से बाहर निकल कर देखा ।

किचन के पिछे बाहर का काफी एरिया ओपन था और वो बाउंड्री वॉल से घिरा हुआ था । वहां हमने कुछ आम और अमरुद के पेड़ लगाए थे जो कि पक गए थे । थोड़े बहुत फूल भी लगाए थे । दाहिने तरफ दिवाल से लगकर बाथरूम कम टायलेट बना हुआ था जो ६ बाई ७ का बना हुआ था । पहले बाथरूम था फिर उसी से सटकर टायलेट बना हुआ था जिसका फर्श बाथरूम से एक फीट ऊंचा था ।

सुबह की घनघोर बारिश से बाथरूम के अन्दर तक पानी प्रवेश कर गया था । पानी को बाहर की ओर निकालने के लिए एक नाला बना हुआ था जो मिट्टी और पत्तों से जाम हो गया था ।

मैंने अपनी पैंट उतारी और सिर्फ जाघिये में ही पानी के बीच उतर गया । पौन घंटे की मशक्कत के बाद नाला साफ हुआ । अब जमा पानी बिना रुकावट के बाहर की तरफ निकलने लगा ।

साफ सफाई के बाद मैं वहीं बाथरूम में फ्रेश हुआ और एक तौलिया लपेट कर घर में चला गया । अपने कमरे में प्रवेश कर मैं कपड़े पहन तैयार हुआ तो उसी समय मेरी नजर कुर्सी पर पड़ी । वहां पर जो कपड़े मैंने सुबह बरसात से भींगने से बचने के लिए रखे हुए थे वो नहीं थे । मैं समझ गया माॅम जब मुझे जगाने आई थी उसी समय वो कपड़े लेकर चली गई ।

तभी मुझे ध्यान आया कि मैंने माॅम की पैन्टी को अपने बिस्तर के नीचे दबा कर रखा है । मैं चिन्तित हो गया । कहीं वो अपनी पैंटी न पाकर मुझ पर शक वगैरह ना कर बैठे । मैं जल्दी से उनकी पैंटी को बेड के नीचे से निकाल कर उसे पैंट के अन्दर छुपा कर नीचे हाल में पहुंचा ।

डैड टीबी देख रहे थे । रीतु शायद अपने कमरे में थी और माॅम किचन में नाश्ते की तैयारी कर रही थी । मैं माॅम के कमरे में प्रवेश किया । सारे कपड़े उनके कवर्ड में बिना चपेते हुए रखे हुए थे । मैंने उनकी पैंटी उन कपड़ों के अन्दर ठूंस दिया और कमरे से बाहर निकल आया । अब मैं थोड़ा आश्वस्त हुआ ।

नाश्ता करने के बाद डैड बैंक चले गए और रीतु कालेज । माॅम वापस किचन में चली गई । नाश्ते के दौरान माॅम के हाव भाव से मुझे कुछ समझ नहीं आया ।

मैं फिर अपने रूम में चला गया । सुबह के साढ़े नौ बज गए थे । मैंने श्वेता दी को फोन लगाया ।

" हैलो !" उधर से श्वेता दी की आवाज आई ।

" कैसी हो स्वीट हार्ट ?"

" मस्त । तु अपनी बता ।"

" ठीक ही हूं । जीजू कैसे हैं ?"

" पहले से बेहतर है ।"

" तुम कहां से बात कर रही हो ?"

" किचन से । नाश्ता बना रही हूं ।"

" और जीजू ?"

" रूम में बैठ कर टीवी देख रहे हैं । और हां मैंने उन्हें दिल्ली शिफ्ट होने की तुम्हारे सलाह के बारे में बताया था । वो राजी हैं बल्कि बहुत उत्साहित है ।"

" ठीक है मैं आज आन्टी से बात करता हूं ।"

" तुमने नाश्ता कर लिया ?"

" कर तो लिया लेकिन मजा नहीं आया ।"

" क्यों ?"

" तुम्हारा ‌ नाश्ते से कहां घर का नाश्ता अच्छा लगेगा ।"

" तो आ जाते । "

" नाश्ता करा देती ? जीजू के रहते ?"

" हां करा देती और उन्हें क्या फर्क पड़ता ?"

" उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि मैं साया साड़ी उठा कर अपनी मुंह तुम्हारे जांघों के बीच ढुका कर अपना नाश्ता कर लेता ।"

" कुत्ता कहीं का । सुबह सुबह ही शुरू हो गया । और मैं उसकी बात नहीं कर रही थी ।"

" क्या उसका भी कोई टाइम होता है ।"

" होता है ।"

" कब ?"

" रात को । और बकवास बंद करो मुझे नाश्ता बनाना है ।"

" एक बात तो बताती जाओ उर्वशी और तुम्हारे बीच में क्या क्या बातें हुई थी ?"

" बहुत सारी बातें हुई थी तुम क्या सुनना चाहते हो ?"

" होटल वाली । मेरे और तुम्हारे बारे में । हमारे रिश्तों के बारे में ।"

" कमीने ! खुद ही सारी राम कहानी उसे सुना कर मुझसे पुछता है कि क्या बातें हुई ।"

" मैंने कुछ न थोड़ी बताया । फर्श पर गिरे हुए हमारे कछी को देख कर उसने खुद ही अंदाजा लगा लिया । और उपर से ताश के पत्तों पर हमने चित्र कारी भी तो कर दी थी ।"

" उसी के बारे में पुछ रही थी । पहले तो मै ना नुकुर की लेकिन बाद में मानना पड़ा ।"

" फिर ?"

" फिर क्या । फिर सारे राज खुल गये । मैंने अपना बताया तो उसने भी अपना बताया ।"

" उसने क्या बताया ?"

" यही कि तुम दोनों की स्टोरी कैसे चालु हुईं । अच्छा सुनो फोन रखती हूं नाश्ते के लिए देरी हो रही है ।"

" ओके । बाय ।" और मैंने फोन पर उसे कीस किया ।

" बाय ।" उसने भी कीस किया फिर फोन काट दी ।
Superb update
 
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Bhai,story to bahut hi achhi chal rahi hai..Bilkul incest aur murder mystry dono ke bich badhia balancing hai..Lekin Bhai ek baat kehna tha..Us kitab ko padhne wali Sagar ka maa nahin honi chahiye..Kyunki incest me maa ke saath sex karne keliye bahut hi mehnat karna padta hai..Agar uska maa is kitabon ko padhti hogi to uski bhi yahi fantasy hogi..To wo asani se chud sakti hai..To maza nahin aayega..Ritu aur Sweta ki baat alag hai..To plz is baat ko thoda sochna..Baaki apka marzi..
Sahi kaha bhai
Sahi kaha rahe ho
 
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